संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विषंग पलायन वर्णन
ततः श्रुत्वा वधं तेषां तपोबलवतामपि ।
न्यश्वसत्कृष्णसर्पेन्द्र इव भंडो महासुरः ॥१
एकांतो मंत्रयामास स आहूय महोदरो ।
भण्डः प्रचंडशौंडीर्यः कांक्षमाणो रणे जयम् ॥२
युवराजोऽपि सक्रोधो विषंगेण यवीयसा ।
भंडासुरं नमस्कृत्य मंत्रस्थानमुपागमत् ॥३
अत्याप्तैर्मंत्रिभिर्युक्तः कुटिलाक्षपुरः सरैः ।
ललिताविजये मंत्रं चकार क्वथिताशयः ॥४
भंडउवाच-
अहो बत कुलभ्रंशः समायातः सुरद्विषाम् ।
उपेक्षामधुना कर्तुं प्रवृत्तो बलवान्विधिः ॥५
मद्भृत्यनाममात्रेण विद्रवंति दिवौकसः ।
तादृशानामिहास्माकमागतोऽयं विपर्ययः ॥६
करोति बलिनं क्लीबं धनिनं धनवर्जितम् ।
दीर्घायुषमनायुष्कं दुर्घटा भवितव्यता ॥७
इसके अनन्तर महासुर भंड ने जब महान बलवान और वरदानी उन सातों का वध सुना तो वह उस समय में काले सर्प के ही समान निश्वास लेने लगा था ।१। महान शौण्डीर्य वह रण में विजय की इच्छा वाला होकर एकान्त में महोदरोँ को बुलाते हुए उनके साथ भंडासुर ने मन्त्रणा की थी। ।२२। युवराज भी क्रोध युक्त हुआ था और छोटे भाई विषङ्ग के साथ वहाँ उपस्थित हुआ था । उसने भंडासुर को नमस्कार किया था और फिर वह भी मन्त्रणा के स्थान पर प्राप्त हो गया था ।३। वे उसके मन्त्री बहुत ही विश्वास पात्र थे जिनमें कुटिलाक्ष आदि अग्रणी थे । बिगड़े हुए विचार वाले उस भंड ने उनके साथ ललिता के विजय करने की मन्त्रणा की थी ।४। भंड ने कहा—अहो ! अब तो असुरों के कुल का विनाश ही प्राप्त हो गया है । यह विधि बड़ा बलवान् है इसने हम लोगों की ओर में उपेक्षा ही करने में अपनी प्रवृत्ति करती है ।५। मेरे भृत्यों के नाम से ही देवगण भाग जाया
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करते हैं । ऐसे हमारा भी इस समय में विपरीत समय उपस्थित हो गया है ।६। यह होनहार ऐसी बलवान है कि यह बलवान को क्लीव (नपुंसक) और धनवान को भी धनहीन कर दिया करती है। जो दीर्घ आयु वाला है उसको आयुहीन कर दिया करती है। इस होनी का प्रहार बड़ा ही कठिन है ।७।
क्व सत्वमस्मद्बाहूनां क्वेयं दुर्ललिता वधूः ।
अकांड एव विधिना कृतोऽयं निष्ठुरो विधिः ॥८
सर्पिणीमाययोदग्रास्तया दुर्घटशौर्यया ।
अधिसंग्रामभूचक्रे सेनान्यो विनिपातिताः ॥६
एवमुद्दामदर्पाढया वनिता कापि मायिनी ।
यदि संप्रहरत्यस्मान्धिग्बलं नो भुजार्जितम् ॥१०
इमं प्रसंगं वक्तुं च जिह्वा जिह्वेति मामकी ।
वनिता किमु मत्सैन्यं मर्दयिष्यति दुर्मदा ॥११
तदद्य मूलच्छेदाय तस्या यत्नो विधीयताम् ।
मया चारमुखाज्ज्ञाता तस्या वृत्तिर्महाबला ॥१२
सर्वेषामपि सैन्यानां पश्चादेवावतिष्ठते ।
अग्रतश्चलितं सैन्यं पयहस्तिरथादिकम् ॥१३
अस्मिन्नेव ह्यवसरे पार्ष्णिग्राहो विधीयताम् ।
पार्ष्णिग्राहमिमं कर्तुं विषण्णश्चतुरो भवेत् ॥१४
हमारी भुजाओं का बल तो कहाँ अर्थात् उस कितना विशाल है और यह दुर्ललिता वधू कहाँ है अर्थात् नारी की शक्ति हमारे सामने सर्वथा तुच्छ है। अनवसर में ही विधाता के ऐसा निष्ठुर विधान कर दिया है कि हमारा विनाश इन अबला नारियों द्वारा हो रहा है ।८। दुर्घट शूरता वाली सर्पिणी माया के द्वारा बड़े-बड़े उदग्र सेनानी गण संग्राम भूमि में मारे गये हैं ।६। इस रीति से उद्दाम दर्प से संयुत कोई माया वाली नारी यदि हमारा संहार कर देती है तो हमारी बाहुओं के द्वारा जो भी बल अर्जित किया गया है उसको धिक्कार ही है ।१०। इस प्रसङ्ग को कहने में भी मेरी जिह्वा लज्जित होती है । क्या यह दुर्मदा स्त्री हमारी सेना का मर्दन कर देगी
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।१। इसलिए उसके मूल का उच्छेदन करने के लिए कोई यत्न करना ही चाहिए। मैंने दूतों के मुख से सुना है कि उसकी वृत्ति महा बलवती है ।२। वह सब सेना के वह पीछे ही रहती है और उसके आगे हाथी-घोड़े और सेनाएं सब चला करती हैं ।३। अब इसी अवसर पर उसका पाष्णिग्राह करो। इस पाष्णिग्राह में अर्थात् पीछे पहुँचकर उसको पकड़ने में विषङ्ग बहुत कुशल है ।४।
तेन प्रोढमदोन्मत्ता बहुसंग्रामदुर्मदाः ।
दश पञ्च च सेनान्यः सह यांतु युयुत्सया ॥१५
पृष्ठतः परिवारास्तु न तथा सन्ति ते पुनः ।
अल्पैस्तु रक्षिता वै स्यात्तेनेवासौ सुनिग्रहा ॥१६
अतस्त्वं बहुसन्नाहमाविधाय मदोत्कटः ।
विषंग गुप्तरूपेण पाष्णिग्राहं समाचर ॥१७
अल्पीयसी त्वया सार्द्धं सेना गच्छतु विक्रमात् ।
सज्जाश्चलंतु सेनान्यो दिक्पालविजयोद्धताः ॥१८
अक्षौहिण्यश्च सेनानां दश पञ्च चलंतु ते ।
त्वं गुप्तवेषस्तां दुष्टां सन्निपत्य दृढं जहि ॥१९
सैव निःशेषशक्तीनां मूलभूता महीयसी ।
तस्याः समूलनाशेन शक्तिवृन्दं विनश्यति ॥२०
कंदच्छेदे सरोजिन्या दलजालमिवाम्भसि ।
सर्वेषामेव पश्चाद्यो रथश्चलति भासुरः ॥२१
उस विषंग के साथ युद्ध करने की इच्छा से बड़े प्रौढ़ और मदोन्मत्त दश पाँच सेनानी भी जावें ।१५। उनके पीछे की ओर कोई परिवार नहीं है। वह बहुत थोड़े से सैनिकों के द्वारा रक्षित है अतः सबका निग्रह आसान है ।१६। इसीलिए मदोत्कट तुम बहुत संग्राम न करके गुप्त रूप से विषंग को समाचरण करो ।१७। आपके साथ बहुत थोड़ी सेना जावे और सेनानी सज्जित होकर चलें जो विक्रम से दिक्पालों के भी विजय करने से उद्धत हैं ।१८। पन्द्रह अक्षौहिणी सेनाएं भी जावें और तुम गुप्त वेष वाले होकर दुष्टा उसको मार डालो ।१९। वह ही सम्पूर्ण शक्तियों की बहुत बड़ी मूल
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स्वरूपा है। उसके समूल विनाश से ही सम्पूर्ण शक्तियों का समुदाय विनष्ट हो जायगा।२०। जिस प्रकार से सरोजिनी के कन्द के उच्छेदन करने पर जल में उसके दलों का विनाश हो जाया करता है। सबके पीछे ही जो एक बड़ा भासुर रथ चला करता है।२१।
दशयोजनसंपन्ननिजदेहसमुच्छ्रयः ।
महामुक्तातपत्रेण सर्वोर्द्ध्वं परिशोभितः ॥२२
वहन्मुहुर्वीज्यमानं चामराणां चतुष्टयम् ।
उत्तुंगकेतुसंघातलिखितांबुदमंडलः ॥२३
तस्मिन्न्थे समायाति सा दृष्टा हरिणेक्षणा ।
निभृतं संनिपत्य त्वं चिह्नानेन लक्षिताम् ॥२४
तां विजित्य दुराचारां केशेष्वाकृष्य मर्दय ।
पुरतश्चलिने सैन्ये सत्त्वशालिनि सा वधूः ॥२५
स्त्रीमात्ररक्षा भवतो वशमेष्यति सत्वरम् ।
भवत्सहायभूतायां सेनेन्द्राणामिहाभिधा ॥२६
शृणु यैर्भवतो युद्धे साह्यंकार्यमतन्द्रितैः ।
आद्यो मदनको नाम दीर्घजिह्वो द्वितीयकः ॥२७
हुवको हुलुमुलूश्च कवलसः कक्किवाहनः ।
थुक्लसः पुण्ड्रकेतुश्च चंडबाहुश्च कुक्कुरः ॥२८
वह रथ दशयोजन से सम्पन्न अपने कलेवर की ऊँचाई वाला है। सबके ऊपर एक छत्र पर रहा करता है जो बड़े-बड़े मुक्ताओं से विनिर्मित है और परिशोभित है ।२२। वह चार चमरों के द्वारा बार-बार वीज्यमान रहता है अर्थात् चार चमर उस पर ढुलाये जाया करते हैं। उस पर एक बहुत ऊँची ध्वजा टंगी रहा करती है जो अम्बुदों के मंडल तक पहुँचती है ।२३। ऐसे ही उस रथ पर वह हरिण के समान सुन्दर नेत्रों वाली आया करती है । तुम चुपचाप इसी चिह्न से उसको लक्षित कर लेना और उस पर धावा करके उस दुराचारिणी को जीतकर उसके केश खींचकर मर्दन करना। आगे सत्त्वशाली सेना चलने पर वह वधू स्त्रियों के ही द्वारा रक्षित है ।२४-२५। अतः आपके वश में शीघ्र ही आ जायगी। आपकी सहायता
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करने वाले सेनानियों के ये नाम हैं ।२६। सुनिए, आपकी सहायता के कार्य में जो भी हैं वे पूर्ण सावधान होंगे । पहिला मदनक नामक है-दूसरा दीर्घ जिह्व है ।२७। हुबक-हुलु मुलु-कक्लस-कल्क वाहन-थुक्लस-पुण्ड्र- केतु चण्ड बाहु-कुक्कुर ये सब नामों वाले होंगे ।२८।
जम्बुकाक्षो जंभनश्च तीक्ष्णशृङ्गस्त्रिकंटकः । चन्द्रगुप्तश्च पंचेते दश चोक्ताश्चमूवराः ॥२९ एकैकाक्षौहिणीयुक्ताः प्रत्येकं भवता सह । आगमिष्यन्ति सेनान्यो दमनाद्या महाबलाः ॥३० परस्य कटकं नैव यथा जानाति ते गतिम् । तथा गुप्तसमाचारः पाष्णिग्राहं समाचर ॥३१ अस्मिन्कार्ये सुमहतां प्रौढिमानं समुद्वहन् । विषंग त्वं हि लभसे जयसिद्धिमनुत्तमाम् ॥३२ इति मंत्रितमंत्रोऽयं दुर्मंत्री भंडदानवः । विषंगं प्रेषयामास रक्षितं सैन्यपालकैः ॥३३ अथ श्रीललितादेव्याः पाष्णिग्राहकृतोद्यमे । युवराजानुजे दैत्ये सूर्योऽस्तगिरिमाययौ ॥३४ प्रथमे युद्धदिवसे व्यतीते लोकभीषणे । अंधकारः समभवत्तस्य बाह्यं चिकीर्षया ॥३५
जम्बुकाक्ष-जंभन-तीक्ष्णशृंग-त्रिकण्टक-और चन्द्रगुप्त ये पन्द्रह श्रेष्ठ सेनानी हैं ।२९। ये सब एक-एक अक्षौहिणी सेना से समन्वित होकर आपके साथ रहेंगे। महान बल वाले दमन प्रभृति भी सेनानी गण आयेंगे ।३०। तुम्हारी गति को शत्रु की सेना जिस तरह से न जान पावे उसी भाँति परम गुप्त समाचरण वाला होकर पाष्णिग्राह का समाचरण करो ।३१। इस कार्य में महान पुरुषों की प्रौढ़ता का उद्वहन करते हुए ही हे विषंग ! परम उत्तम जय सिद्धि को प्राप्त करोगे ।३२। दुर्मन्त्रणा वाले उस भंड ने इस तरह से ऐसी मन्त्रणा करते हुए सैन्य पालकों के द्वारा रक्षित करके विषंग को भेजा था ।३३। इसके अनन्तर श्री ललिता देवी के पाष्णिग्राह के उद्योग
विषंग पलायन वर्णन ] [ ३३६
में युवराजानुज दैत्य के होने पर सूर्य अस्ताचल पर चला गया था ॥३४॥ लोक भीषण प्रथम युद्ध के दिवस में पार्ष्णिग्राह के करने की इच्छा से उसको अन्धकार हो गया था ॥३५॥
महिषस्कंधधूम्राभ वनक्रोडवपुद्द्युति । नीलकण्ठनिभच्छायं निबिडं पप्रथे तमः ॥३६॥ कुञ्जेषु पिण्डितमिव प्रधावदिव सन्धिषु । उज्जिहानमिव क्षोणीविवरेभ्यः सहस्रशः ॥३७॥ निर्गच्छदिव शैलानां भूरि कन्दरमंदिरात् । क्वचिद्दीपप्रभा जाले कृतकातरचेष्टितम् ॥३८॥ दत्तावलंबनमिव स्त्रीणां कर्णोत्पलत्विषि । एकीभूतमिव प्रौढदिङ्नागमिव कज्जले । आबद्ध मैत्रकमिव स्फुरच्छाद्वलमंडले ॥३६॥ कृतप्रियाश्लेषमिव स्फुरंतीष्वसियष्टिषु । गुप्तप्रविष्टमिव च श्यामासु वनपंक्तिषु ॥४०॥ क्रमेण बहुलीभूतं प्रससार महत्तमः । त्रियामावामनयना नीलकंचुकरोचिषा ॥४१॥ तिमिरेणावृतं विश्वं न किंचित्प्रत्यपद्यत । असुराणां प्रदुष्टानां रात्रिरेव बलावहा ॥४२॥
अब उस अन्धकार के स्वरूप का वर्णन किया जाता है जो उस समय में वहाँ छाया हुआ था—वह अन्धकार महिष के स्कन्ध के तुल्य धूम्र आभा वाला था। उसकी कान्ति वन क्रोड़ के वपु सदृश थी—नीलकण्ठ पक्षी के समान उसकी कान्ति थी—ऐसा बहुत ही घना अन्धकार छा गया था ॥३६॥ वह तम कुञ्जों में पिण्डित सा हो रहा था तथा सन्धियों में दौड़ सी लगा रहा था वह अन्धकार सहस्रों भूमि के विवरों से बाहिर की ओर निकल सा रहा था ॥३७॥ पर्वतों की कन्दराओं से मानों वह अन्धकार बाहिर निकलकर आ रहा था। कहीं पर वह दीपों की प्रभा के जाल में कातर चेष्टित कर रहा था ॥३८॥ स्त्रियों के कानों के उत्पल की कान्ति में मानों उस तम ने
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समाभ्रम ग्रहण किया था। प्रौढ़ दिङ्नाग की भांति कज्जल में वह अन्धकार एकीभूत-सा हो रहा था और स्फुरित जाङ्गल के मंडल में मित्रता सी आबद्ध कर रहा था ।३६। स्फुरण करती हुई असियष्टियों में प्रिया के आश्लेष सा वह तम कर रहा था । श्याम वनों की पंक्तियों में गुप्त रूप से वह प्रविष्ट-सा हो रहा था । वह अन्धेरी रात्रि सुन्दर नेत्रों वाली रमणी है जो अपनी नीली कंचुकी की कान्ति से समन्वित है । ऐसे अन्धकार से सम्पूर्ण विश्व समावृत हो गया था और कुछ भी सूझ नहीं रहा था । पूरे दुष्ट असुरों को तो रात्रि ही बल देने वाली हुआ करती है ।४१-४२।
तेषां मायाविलासोऽयं तस्यामेव हि वर्धते । अथ प्रचलितं सैन्यं विषंगेण महौजसा ॥४३॥ धौतखड्गलताच्छायावर्धिष्णु तिमिरच्छटम् । दमनाद्याश्च सेनान्यः श्यामकंकटधारिणः ॥४४॥ श्यामोष्णीषधराः श्यामवर्णसर्वपरिच्छदाः । एकत्वमिव संप्राप्तास्तिमिरेणातिभूयसा ॥४५॥ विषंगमनुसंचेरुः कृताग्रजनमस्कृतिम् । कूटेन युद्धकृत्येन विजिगीषुर्महेश्वरीम् ॥४६॥ मेघडंबरकं नाम दधे वक्षसि कंकटम् । यथा तस्य निशायुद्धानुरूपो वेषसंग्रहः ॥४७॥ तथा कृतवती सेना श्यामलं कंचुकादिकम् । न च दुंदुभिनिस्वानो न च मर्दलगर्जितम् ॥४८॥ पणवानकभेरीणां न च घोषविजृंभणम् । गुप्ताचाराः प्रचलितास्तिमिरेण समावृताः ॥४९॥
उन असुरों का यह माया का विलास उस अँधेरी रात्रि में ही बढ़ा करता है । इसके उपरान्त महान् ओज वाले विषंग के साथ सेना रवाना हुई थी ।४३। दमन प्रभृति सेनानीगण श्याम कङ्कट के धारण करने वाले हैं और अन्धकार की छटा धौत खड्ग की कान्ति को बढ़ाने वाला था ।४४। वे सब श्याम पगड़ी के धारण करने वाले थे और उनके समस्त परिच्छद भी श्याम वर्ण के ही थे । अत्यधिक अन्धकार से आवृत्त हुए वे सब एकता को
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प्राप्त जैसे हो गये थे॥४५॥ अपने बड़े भाई को नमस्कार करने वाले विषंग के पीछे चल दिये थे। वह विषंग कूट युद्ध के द्वारा महेश्वरी के जीतने की इच्छा वाला था॥४६॥ उसने मेघडम्बर नाम वाले कङ्कट को वक्षः स्थल पर धारण किया था। उसके वेष का संग्रह भी निशा के युद्ध के ही अनुरूप था ॥४७॥ उसी भाँति से सेना ने भी श्याम वर्ण के कंचुक आदि धारण किये थे। उस समय में न तो किसी दुन्दुभि का घोष था और न कोई मर्दल की ही गर्जना थी ॥४८॥ प्रणव-आनक और भेरियों की भी उस समय में ध्वनि नहीं हुई थी। वे सबके सब गुप्त समाचरण वाले आकार से समावृत होते हुए रवाना हुए थे ॥४९॥
परैरदृश्यगतयो विष्कोशीकृतरिष्टयः ।
पश्चिमाभिमुखं यांति ललितायाः पताकिनीम् ॥५०॥
आवृतोत्तरमार्गेण पूर्वभागमशिश्रियन् ।
निश्वासमपि सस्वानमकुर्वंतः पदे पदे ॥५१॥
सावधानाः प्रचलिताः पाष्णिग्राहाय दानवाः ।
भूयः पुरस्य दिग्भागं गत्वा मन्दपराक्रमाः ॥५२॥
ललितासैन्यमेव स्वान्सूचयंत प्रपृच्छतः ।
आगत्य निभृतं पृष्ठे कवचच्छन्नविग्रहाः ॥५३॥
चक्रराजरथं तुंगं मेरुमंदरसंनिभम् ।
अपश्यन्नतिदीप्ताभिः शक्तिभिः परिवारितम् ॥५४॥
तत्र मुक्तातपत्रस्य वर्त्तमानामधः स्थले ।
सहस्रादित्यसंकाशां पश्चिमामुखीं स्थिताम् ॥५५॥
कामेश्वर्यादिनित्याभिः स्वसमानसमृद्धिभिः ।
नर्मालापविनोदेन सेव्यमानां रथोत्तमे ॥५६॥
ये सब ऐसे वहां से चले थे कि दूसरों के द्वारा न देखे जावें। इन्होंने रिष्टियों को म्यानों से निकाल लिया था। ललिता की सेना के पश्चिम की ओर मुह करके ही ये गमन कर रहे थे ॥५०॥ आवृत उत्तर मार्ग से इन्होंने पूर्व भाग का समाश्रय ग्रहण किया था। ये पद-पद पर अपने निःश्वासों की ध्वनि को भी चलने में नहीं कर रहे थे ॥५१॥ दानवगण बहुत
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ही सावधान होकर पाणिग्राह के लिए चल दिये थे । फिर पुर के दिग्भाग में जाकर मन्द पराक्रम वाले हो गये थे ।५२। ललिता देवी की सेना भी अपने लोगों को सूचना दे रही थी । वे कवचों से ढके हुए शरीरों वाले पीछे की ओर चुपचाप आ गये थे ।५३। और उन्होंने ऊँचे तथा मेरु गिरि के समान चक्रराज रथ को देखा था जो अत्यधिक प्रदीप्त शक्तियों से परिवारित था ।५४। वहाँ पर मुक्ता निर्मित आतपत्र (छत्र) के नीचे वह देवी विराजमान थी । सहस्रों सूर्यों के सदृश कान्ति वाली और पश्चिम की मुख किये हुए स्थित थीं ।५५। उस उत्तम रथ में अपने ही समान समृद्धि से संयुत कामेश्वरी आदि नित्याओं के साथ नर्म आलाप के विनोद से सेव्यमान हो रहीं थी ।५६।
तां तथाभूतवृत्तांतामतादृशरणोद्यमाम् । पुरोगतं महत्सैन्यं वीक्षमाणं सकौतुकम् ॥५७॥ मन्वानश्च हि तामेव विषंगः सुदुराजयः । पृष्ठवंशे रथेंद्रस्य घट्टयामास सैनिकैः ॥५८॥ तत्राणिमादिशक्तीनां परिवारवरूथिनी । महाकलकलं चक्रुरणिमाद्याः परः शतम् ॥५९॥ पट्टिशैर्द्रुघणैश्चैव भिदिपालैर्भुशुण्डिभिः । कठोरवज्रनिर्घातनिष्ठुरैः शक्तिमंडलैः ॥६०॥ मर्दयंतो महासत्त्वाः समयं बहुमेनिरे । आकस्मिकरणोत्साहविपर्याविष्टविग्रहम् ॥६१॥ अकांडक्षुभितं चासीद्रथस्थं शक्तिमंडलम् । विपाटैः पाटयामासुरदृश्यैरंधकारिणः ॥६२॥ ततश्चक्ररथेंद्रस्य नवमे पर्वणि स्थिताः । अदृश्यमानशस्त्राणामदृश्यनिजवर्मणाम् ॥६३॥ तिमिरच्छन्नरूपाणां दानवानां शिलीमुखैः । इतस्ततो बहु क्लिष्टं छन्नवर्मितमर्मवत् ॥६४॥
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उस प्रकार से वर्त्तमान तथा अतादृशों की शरणागति के उद्यम वाली को देखा था। उसके सामने महान् सेना कौतुक पूर्वक देख रही थी ।५७। बुरे आशय वाले विषंग ने उसी को मान लिया था कि यही वह देवी है। उस रथेन्द्र के पीछे की ओर में सैनिकों द्वारा घट्टन किया था।५८। वहाँ पर अणिमा आदि शक्तियों के परिवार की सेनाओं ने महान् कलकल किया था अणिमा आदिक सैकड़ों से भी अधिक थीं ।५६। पट्टिश—द्रुघण—भिन्दि- पाल—भुशुण्डी—कठोर वज्र के समान निर्घात से निष्ठुर शक्तियों के मण्डलों से युद्ध हुआ था।६०। महान् सत्त्व वाले असुर मर्दन करते हुए उस समर को बहुत मानने लगे थे । उस रथ में संस्थित शक्तियों का मण्डल अचानक रणोत्साह के विपर्ययं से आविष्ट विग्रहों वाला हो गया था और अनवसर में क्षोभयुत हुआ था। अन्धकारों ने अदृश्य विपाटों से पाटित कर दिया था ।६१-६२। इसके अनन्तर वे नवम चक्र रथेन्द्र के पर्व पर संस्थित थे । अदृश्यमान निजवर्मों वाले—अदृश्य शस्त्रों वाले तथा अन्धकार से छन्न स्वरूपों वाले दानवों के बाणों से शक्तियों का मण्डल छन्नवर्मित की भाँति इधर-उधर बहुत कष्टित हुआ था ।६३-६४।
शक्तीनां मंडलं तेने क्रन्दनं ललितां प्रति । पूर्वानुक्रमतस्तत्र संप्राप्तं सुमहद्भयम् ॥६५ कर्णाकर्णिकयाकर्ण्य ललिता कोपमादधे । एतस्मिन्नंतरे मंडश्चंडदुर्मंत्रिपंडितः ॥६६ दशाऽक्षौहिणिकायुक्तं कुटिलाक्षं महौजसम् । ललितासैन्यनाशाय युद्धाय प्रजिघाय सः ॥६७ यथा पश्चात्कलकलं श्रुत्वाग्रे वर्तिनी चमूः । नागच्छति तथा चक्रे कुटिलाक्षो महारथम् ॥६८ एवं चोभयतो युद्धं पश्चादग्रे तथाऽभवत् । अत्यन्ततुमुलं चासीच्छक्तीनां सैनिके महत् ॥६६ नक्तसत्त्वाश्च दैत्येन्द्रास्तिमिरैण समावृताः । इतस्ततः शिथिलतां कंटके निन्युरुद्धताः ॥७०
और उसने ललिता देवी के पास क्रन्दन किया था। वहाँ पर पूर्व अनुक्रम से महान् भय प्राप्त हो गया था ।६५। कानों-कानों से ललिता देवी
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ने सुना तो बड़ा ही अधिक कोप किया था। इसी बीच में दुष्ट मन्त्रियों से मन्त्रणा करके चण्ड भण्ड ने दश अक्षौहिणी से संयुत—महम् ओज वाले कुटिलाक्ष को ललिता की सेना के विनाश करने के लिये भेजा था ॥६६-६७॥ जिस रीति से पीछे की ओर कल-कल ध्वनि को सुनकर आगे वाली सेना न आ सके इसी प्रकार से कुटिलाक्ष ने महान् संग्राम किया था ॥६८॥ इसी तरह से पीछे और आगे दोनों ओर था वह युद्ध हुआ था और वह युद्ध शक्तियों के सैन्य में महान् तुमुल हुआ था ॥६९॥ रात्रि में सत्त्व वाले दैत्येन्द्र थे जो तिमित से समावृत थे और उद्धतों ने कण्टक में शिथिलता को प्राप्त कर दिया था ॥७०॥
विषंगेण दुराशेन धमनाद्यैश्चमूबरैः।
चमूभिश्च प्रणहिता न्यपतञ्छत्रुकोटयः ॥७१॥
ताभिर्दैत्यास्त्रमालाभिश्चक्रराजरथो वृतः।
बकावलीनिबिडतः शैलराज इवाबभौ ॥७२॥
आक्रांतपर्वणाधस्ताद्विषंगेण दुरात्मना।
मुक्त एकः शरो देव्यास्तालवृंतमचूर्णयत् ॥७३॥
अथ तेनाव्याहितेन संभ्रान्ते शक्तिमण्डले।
कामेश्वरीमुखा नित्या महांर्त क्रोधमाययुः ॥७४॥
ईषद्भ्रुकुटिसंसक्तं श्रीदेव्या वदनांबुजम्।
अवलोक्य भृशोद्विग्ना नित्या दधुरतिश्रमम् ॥७५॥
नित्या कालस्वरूपिण्यः प्रत्येकं तिथिविग्रहाः।
क्रोधमुद्वीक्ष्य सम्राज्या युद्धाय दधुरुद्यमम् ॥७६॥
प्रणिपत्य च तां देवीं महाराज्ञीं महोदयाम्।
ऊचुर्वाचमकांडोत्थां युद्धकौतुकगद्गदाम् ॥७७॥
बुरे आशय वाले विषंग ने धमनादि श्रेष्ठ सेनापतियों के और सेनाओं के द्वारा प्रणहित शत्रु की कोटियां निपतित कर दी थीं ॥७१॥ उन दैत्यों के अस्त्रों की मालाओं से वह चक्रराज रथ ढक गया था और वह बकों की पंक्तियों से ढके हुए शैल राज की ही भाँति शोभित हो गया था ॥७२॥ आक्रान्त पर्व के नीचे दुरात्मा विषंग के द्वारा छोड़े हुए एक बाण ने देवी के तालवृन्त को चूर्ण कर दिया था ॥७३॥ इसके पश्चात् अव्याहत उसके द्वारा
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शक्तियों का मण्डल हो गया तो ऐसा होने पर कामेश्वरी प्रमुख जो नित्याएँ थीं उनको बड़ा भारी क्रोध हो गया था ॥७४॥ थोड़ा-सा भ्रुकुटियों से संसक्त श्री देवी के मुख कमल को देखकर नित्याओं को बहुत ही उद्वेग हो गया था और उन्होंने अत्यधिक श्रम किया था ॥७५॥ नित्याएं काल के ही स्वरूप वाली थीं और प्रत्येक तिथि के विग्रह वाली थीं। उन्होंने साम्राज्ञी के क्रोध को देखकर युद्ध करने का विशेष उद्यम किया था ॥७६॥ उनने महान् उद्यम से समन्विता उस महाराज्ञी को प्रणिपात करके उस समय अनवसर में उत्थित और युद्ध के कौतुक से गद्गद वाणी कही थी ॥७७॥
तिथिनित्या ऊचुः— देवदेवी महाराज्ञी तवाग्रे प्रेक्षितां चमूम् । दंडिनीमन्त्रनाथादिमहाशवतचभिपालिताम् ॥७८ धर्षितुं कातरा दुष्टा मायाच्छद्मपरायणाः । पाष्णिग्राहेण युद्धेन बाधंते रथपुङ्गवम् ॥७९ तस्मात्तिमिरसंछन्नमूर्तीनां विबुधद्रुहाम् । शमयामो वयं दर्पं क्षणमात्रं विलोकय ॥८० या वह्निवासिनी नित्या या ज्वालामालिनी परा । ताभ्यां प्रदीपिते युद्धे द्रष्टुं शक्ताः सुरद्विषः ॥८१ प्रशमय्य महादर्पं पाष्णिग्राहप्रवर्तिनाम् । सहसैवागमिष्यामः सेवितुं श्रीपदांबुजम् । आज्ञां देहि महाराज्ञि मर्दनाथं दुरात्मनाम् ॥८२ इत्युक्ते सति नित्याभिस्तथास्त्विति जगाद सा । अथ कामेश्वरी नित्या प्रणम्य ललितेश्वरीम् । तया संप्रेषिता ताभिः कुण्डलीकृतकार्मुका ॥८३ सा हन्तुं तान्दुराचारान्कूटयुद्धकृतक्षणान् । बालारुणमिव क्रोधारुणं वक्त्रं वितन्वती ॥८४
तिथि नित्याओं ने कहा था—हे देवदेवि ! आप तो महाराज्ञी हैं। आपके आगे प्रेक्षित सेना है जो दण्डिनी और मन्त्रनाथा आदि महान्
३४६ । [ ब्रह्माण्ड पुराण
शक्तियों से अभिपालित हैं ॥७८॥ ये माया के कपट में परायण दुष्ट और कातर दैत्यगण पार्णिग्राह युद्ध के द्वारा इस श्रेष्ठ रथ को धर्षित करने के लिए बाधा पहुँचा रहे हैं ॥७९॥ इस कारण से अन्धकार से संच्छन्न कलेवरों वाले असुरों के घमण्ड को हम एक ही क्षण में शमन करती हैं—आप देखिये ॥८०॥ जो वह्निवासिनी देवी है और दूसरी जो ज्वालामालिनी है, उन दोनों के द्वारा प्रदीपित युद्ध में ये असुर देखे जा सकते हैं ॥८१॥ पाष्णिग्राह में अर्थात् पीछे से घेरा डालकर युद्ध करने में प्रवृत्त हुए दैत्यों के महान् दर्प को प्रशान्त कर हम लोग तुरन्त ही आपके श्री चरण कमलों की सेवा करने के लिए वापिस आ जायेंगी । हे महाराज्ञि ! आप हमको आज्ञा दीजिए कि हम उन दुरात्माओं का मदन कर डालें ॥८२॥ नित्याओं के द्वारा इस प्रकार से कहने पर उस महादेवी ने कहा था—ऐसा ही करो । इसके पश्चात् नित्या कामेश्वरी ने ललितेश्वरी को प्रणाम किया था और उसके द्वारा भेजी हुईं शक्तियों ने धनुष को खींचकर कुण्डलीकृत बना दिया था ॥८३॥ उसने बाल सूर्य के समान क्रोध से लाल अपने मुख करके क्रूर युद्ध करने वाले उन दुष्टात्माओं का हनन करने के लिए धावा बोल दिया था और उनसे कहा था ॥८४॥
रे रे तिष्ठत पापिष्ठा मायानिष्ठाश्छिनद्मि वः ।
अन्धकारमनुप्राप्य कूटयुद्धपरायणाः ॥८५
इति तान्भर्त्सयंती सा तूणीरोत्खातसायकात् ।
पर्वावरोहणं चक्रे क्रोधेन प्रस्खलद्गतिः ॥८६
सज्जकार्मुकहस्ताश्च भगमालापुरः सराः ।
अन्याश्च चलिता नित्याः कृतपर्वावरोहणाः ॥८७
ज्वालामालिनि नित्या च या नित्या वह्निवासिनी ।
सज्जे युद्धे स्वतेजोभिः समदीपयतां रणे ॥८८
अथ ते दुष्टदनुजाः प्रदीप्ते युद्धमण्डले ।
प्रकाशवपुषस्तत्र महांतां क्रोधमाययुः ॥८९
कामेश्वर्यादिका नित्यास्ताः पञ्चदश सायुधाः ।
ससिंहनादास्तान्दैत्यानमृद्नन्नेव हेलया ॥९०
विशंग पलायन वर्णन ] [ ३४७
महाकलकलस्तत्र समभूद्युद्धसीमनि ।
मन्दरक्षोभितां भोधिद्वेल्लत्कल्लोलमण्डलः ॥६१
हे पापियो ! ठहरो, माया में संस्थित तुमको मैं कभी छिन्न-भिन्न करे देती तुम लोग अन्धकार को प्राप्त करके इस क्रूर युद्ध में तत्पर हो रहे हो ।८५। इस रीति से उनको फटकारती हुई उससे अपने तूणीर से उत्खात सायक से पर्वारोहण किया था और क्रोधावेश से उसकी गति प्रस्खलित हो रही थी ।८६। वे कार्मुकों को हाथों में सजाये हुई थीं और उनके आगे भगमालायें थीं और अन्य नित्याएँ पर्वारोहण करके चल दी थीं ।८७। ज्वाला मालिनी नित्या और वह्निवासिनी नित्या ये दोनों ही युद्ध में सज्जित हुई थी और इन्होंने अपने तेजों से रण में प्रदीपन कर दिया था । ।८८। इसके अनन्तर युद्ध मण्डल के प्रदीप्त होने पर वे दुष्ट दनुज प्रकाशित कलेवरों वाले हो गये थे और उनको बड़ा क्रोध हो गया था ।८९। कामेश्वरी प्रभृति नित्याएँ आयुधों से सयुत पन्द्रह थीं । वे सिंहनादों से ही उन दैत्यों का मर्दन सा हो कर रही थीं । इस समय में यहाँ युद्ध में महान् कल-कल हो गया था । वह कलकल ऐसा ही था मानों मन्दराचल से क्षोभित सागर के विलोडन से तरंगों के मण्डल का हो रहा होवे ।६०-६१।
ताश्च नित्यावलत्क्वाणकंकणैर्युधि पाणिभिः ।
आकृष्य प्राणकोदंडास्तेनिरे युद्धमुद्धतम् ॥६२
यामत्रितयपर्यन्तमेवं युद्धमवर्त्तत ।
नित्यानां निशितैर्बाणैरक्षौहिण्यश्च संहृता ॥६३
जघान दमनं दुष्टं कामेशी प्रथमं शरैः ।
दीर्घजिह्वं चमूनाथं भगमाला व्यदारत् ॥६४
नित्यक्लिन्ना च भेरुण्डा हुम्बेकं हुलुमल्लकम् ।
कक्कसं वह्निवासा च निजघान शरैः शतैः ॥६५
महावज्रेश्वरी बाणैरभिनत्केकिवाहनम् ।
पुक्कसं शिवदूती च प्राहिणोद्यमसादनम् ॥६६
पुण्ड्रकेतुं भुजोद्दण्डं त्वरिता समदारयत् ।
कुलसुन्दरिका नित्या चंडबाहुं च कुक्कुरम् ॥६७
३४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अथ नीलपताका च विजया च जयोद्धते । जम्बुकाक्षं जृम्भणं च व्यतन्वातां रणे बलिम् । सर्वमंगलिका नित्या तीक्ष्णशृङ्गमखंडयत् । ज्वालामालिनिका नित्या जघानोग्रं त्रिकर्णकम् ॥६८
उन नित्याओं ने बड़ा ही उद्धत युद्ध किया था। उन्होंने प्राण को दंड को आकर्षित किया था। प्रहार करने के समय में नित्याओं के करों के वलयों और कङ्कणों का क्वणन हो रहा था ।६२। तीन प्रहर तक ऐसा घोर युद्ध हुआ था। नित्याओं के तीक्ष्ण बाणों से अक्षौहिणियों का संहार हो गया था ।६३। सर्व प्रथम कामेशी ने शरों से दुष्ट दमन को निहत किया था भग-माला ने सेनापति दीर्घ जिह्व को मार डाला था ।६४। नित्य क्लिन्ना और भेरुण्डा ने हुम्बेक और हुल्लुमल्लक को वह्निवासा ने क्लस को तीक्ष्ण शरों से निहत कर दिया था ।६५। महा वज्रेश्वरी ने बाणों से केकि वाहन को मार डाला था और शिव दूती ने पुल्कस को यमपुर भेज दिया था ।६४। त्वरिता ने पुण्ड्रकेतु को पैने बाणों से मार डाला था। कुल सुन्दरिका नित्या ने चंड बाहु और कुक्कुर को मार दिया था ।६७। इसके अनन्तर नील पताका और विजया दोनों ही जय करने में उद्धत थीं इन्होंने जम्बुकाक्ष और जृम्भण को मार दिया था। सर्वमङ्गलिका नित्या ने तीक्ष्ण शृङ्ग का हनन किया था। ज्वाला मालिनिका नित्या ने उग्र त्रिकर्णक का हनन कर दिया था ।६८।
चन्द्रगुप्तं च दुःशीलं चित्रं चित्रा व्यदारत् । सेनानाथेषु सर्वेषु निहतेषु दुरात्मसु ॥६६ विषंगः परमः क्रुद्धश्चचाल पुरतो बली । अथ यामाव शेषायां यामिन्यां घटिकाद्वयम् ॥१०० नित्याभिः सङ्ग्रामं विधाय स दुराशयः । अशक्यत्वं समुद्दिश्य चक्राम प्रपलायितुम् ॥१०१ कामेश्वरीकराकृष्टचापोत्थैर्निशितैः शरैः । भिन्नवर्मा दृढतरं विषंगो विह्वलाशयः । हतावशिष्टै योधैश्च सार्धमेव पलायितः ॥१०२
भण्डपुत्र वध वर्णन ] [ ३४६
ताभिर्न निहतो दुष्टो यस्माद्वध्यः स दानवः । दण्डनाथाशरेणैव कालदण्डसमत्विषा ॥१०३ तस्मिन्पलायिते दुष्टे विषङ्गे भण्डसोदरे । स विभाता च रजनी प्रसन्नाश्चाभवन्दिशः ॥१०४ पलायितं रणे वीरमनुसर्तुं मनौचिती । इति ताः समरान्नित्यास्तस्मिन्काले व्यरंसिषुः ॥१०५
चित्रा ने चन्द्रगुप्त को और दुश्शील चित्र का विमर्दन किया था। सभी दुरात्मा सेनापतियों के निहत हो जाने पर विषङ्ग युद्ध के लिये चल दिया था । ९९। विषम बड़ा बलवान् था और बहुत क्रुद्ध होकर आगे गया था। इसके बाद रात्रि में एक प्रहर शेष रह गया था जो केवल दो घड़ी का समय था ।१००। उस दुष्ट आशय वाले ने नित्याओं के साथ संग्राम किया था किन्तु जब उसने यह देखा था जीत नहीं हो सकती है तो उसने वहाँ से भाग जाने की ही इच्छा की थी ।१०१। कामेश्वरी के हाथों से खींचे हुए धनुष से निकले हुए पैने बाणों से विषङ्ग का कवच छिन्न हो गया था और वह बहुत अधिक विह्वल हो गया था। वहाँ पर जो भी मरने से बचे थे उन सभी सैनिकों के ही साथ में भाग खड़ा हुआ था ।१०२। उन्होंने उस दुष्ट का वध नहीं किया था क्योंकि वह दानव तो कालदण्ड की कान्ति वाले दण्डनाथा के ही शर से मारे जाने योग्य था ।१०३। भण्ड के सहोदर उस दुष्ट विषंग के भाग जाने पर वह रात्रि विभात हो गयी थी और सब दिशाएँ प्रसन्न हो गयी थीं ।१०४। रण में भागे हुए के पीछे गमन करना उचित नहीं था अतएव वे नित्याएं उस संग्राम से उस समय विरत हो गयी थीं ।१०५।
दैत्यशस्त्रव्रणस्यंदिशोणितप्लुतविग्रहाः । नित्याः श्रीललितां देवीं प्रणिपेतूर्जयोद्धताः ॥१०६ इत्थं रात्रौ महद्युद्धं तत्र जातं भयंकरम् । नित्यानां रूपजालं च शस्त्रक्षतमलोकयत् ॥१०७ श्रुत्वोदन्तं महाराज्ञी कृपापांगेन सैक्षत । तदालोकनमात्रेण व्रणो निर्व्रणतामगात् ॥१०८ नित्यानां विक्रमैश्चापि ललिता प्रीतिमासदत् ॥१०६
३५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दैत्यों के शस्त्रों से व्रणों से निकलते हुए रुधिर से उन नित्याओं का कलेवर रक्त से समाप्लुत था और उसी दशा में वे जयोद्धत होती हुई श्री ललिता देवी को आकर प्रणाम करने लगी थीं ।१०६। इस प्रकार से वहाँ पर रात्रि में भयकर महान् युद्ध हुआ था । श्री ललिता देवी ने नित्याओं के उस स्वरूप को जो शस्त्रों से विक्षत था, देखा था । सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर महाराज्ञी ने कृपा दृष्टि से उनको देखा था । उनके देखने मात्र से ही समस्त व्रण भरकर ठीक हो गये थे ।१०७-१०८। नित्याओं के उस विक्रम से भी ललिता देवी को बड़ी प्रसन्नता हुई थी ।१०६।
भंडपुत्र वध वर्णन
दशाक्षौहिणिकायुक्तः कुटिलाक्षोऽपि वीर्यवान् । दण्डनाथाशरैस्तीक्ष्णै रणे भग्नः पलायितः । दशाक्षौहिणिकं सैन्यं तया रात्रौ विनाशितम् ॥१
इमं वृत्तांतमाकर्ण्य भण्डः क्षोभमथाययौ । रात्रौ कपटसंग्रामं दुष्टानां निर्जरद्रुहाम् । मंत्रिणी दण्डनाथा च श्रुत्वा निर्वेदमापतुः ॥२
अहो बत महत्कष्टं दैत्यैर्देव्याः समागतम् । उत्तानबुद्धिभिर्दू रमस्माभिश्चलितं पुरः ॥३
महाचक्ररथेंद्रस्य न जातं रक्षणं बलैः । एतं त्ववसरं प्राप्य रात्रौ दुष्टैः पराकृतम् ॥४
को वृत्तांतोऽभवत्तत्र स्वामिन्या किं रणः कृतः । अन्या वा शक्तयस्तत्र चक्रुर्युद्धं महासुरैः ॥५
विम्रष्टव्यमिदं कार्यं प्रवृत्तिस्तत्र कीदृशी । महादेव्याश्च हृदये कः प्रसंगः प्रवर्तते ॥६
इति शंकाकुलास्तत्र दण्डनाथापुरोगमाः । मंत्रिणीं पुरतः कृत्वा प्रचेलुर्ललितां प्रति ॥७
भण्डपुत्र वध वर्णन ] [ ३५१
अथ प्रथम युद्ध दिवसः—दश अक्षौहिणियों से युक्त वीर्यशाली भी दण्डनाथा के तीक्ष्ण शरों से रण में भग्न होकर भाग गया था। उस देवी ने दश अक्षौहिणी सेना नष्ट कर दी थी।१। भण्डासुर इस वृत्तान्त को सुन-कर बड़ा क्षुब्ध हो गया था। रात्रि में कपटयुक्त संग्राम जो दुष्ट असुरों ने किया था, इसको सुनकर मन्त्रिणी और दण्डनाथा दोनों को बड़ा निर्वेद हुआ था ।२। दैत्यों के द्वारा देवी का समागमन का होना बहुत ही कष्ट का विषम है। उत्तान बुद्धि वाली हम आगे दूर चल दी थीं ।३। महाचक्र रथेन्द्र की रक्षा सैनिकों द्वारा नहीं हुई है। रात्रि में इसी अवसर को पाकर दुष्टों ने पराकरण किया था।४। वहाँ पर क्या वृत्तान्त हुआ था ? क्या स्वामिनी ने युद्ध किया था ? अथवा अन्य शक्तियों ने असुरों के साथ युद्ध किया ? ।५। यह कार्य विनष्ट हो गया-वहाँ पर कैसी प्रवृत्ति है और महा-देवी के हृदय में कौन सा प्रसंग प्रवृत्त हो रहा है।६। इस रीति से उन शक्तियों ने जिनमें दण्डनाथा अग्रणी थी शंका से बेचैन होकर मन्त्रिणी को अपना अगुआ बनाकर ललिता के समीप में गमन किया था ।७।
शक्तिचक्रचमूनाथाः सर्वास्ताः पूजिता द्रुतम् । व्यतीतायां विभावर्यां रथेन्द्रं पर्यवारयन् ॥८ अवरुह्य स्वयानाभ्यां मंत्रिणोदण्डनायिके । अधस्तात्सैन्यमावेश्य तदारुरुहतू रथम् ॥६ क्रमेण नव पर्वाणि व्यतीत्य त्वरितक्रमैः । तत्तत्सर्वगतै शक्तिचक्रैः सम्यङ् निवेदितैः ॥१० अभजेतां महाराज्ञीं मंत्रिणिदण्डनायिके । ते व्यजिज्ञपतां देव्या अष्टांगस्पृष्टभूतले ॥११ महाप्रमादः समभूदिति नः श्रुतमंबिके । कूटयुद्धप्रकारेण दैत्यैरपकृतं खलैः ॥१२ स दुरात्मा दुराचारः प्रकाशसमरात्त्रसन् । कुहकव्यवहारेण जयसिद्धिं तु कांक्षति ॥१३ दैवान्नः स्वामिनीगात्रे दुष्टानाममरद्रुहाम् । शरादिकपरामर्शो न जातस्तेन जीवति ॥१४
३५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
शक्तिचक्र की सेना की सब स्वामिनी शीघ्र ही पूजित हुईं और विभावरी रात्रि के व्यतीत होने पर उन्होंने रथेन्द्र को चारों ओर से परिवारित कर लिया था ।८। मन्त्रिणी और दण्ड नायिका दोनों अपने यानों से नीचे उतरी थीं ओर नीचे की ओर सेना को आवेशित करके तब रथ पर समारूढ़ हुई थीं ।६। क्रम से नौ पर्वों को व्यतीत करके शीघ्र क्रमों वे चलीं थीं। उन-उनके सर्वगत शक्ति चक्र जो सम्यक् रीति से निवेदित थे वे युक्त थीं ।१०। मन्त्रिणी ओर दण्ड नायिका दोनों ने महाराज्ञी का सेवन किया था। उन्होंने देवी के आगे भूमि में साष्टाङ्ग प्रणाम किया था और निवेदित किया था ।११। हे अम्बिके ! महान प्रमाद हो गया है ऐसा हमने श्रवण किया है। उन खल दैत्यों ने कूट युद्ध के प्रकार से आपका अपकार किया है ।१२। वह दुष्ट बुरे आचार वाला प्रकाश में युद्ध से डरकर कुहक व्यवहार से जय की सिद्धि चाहता है ।१३। यह तो दैव की गति है कि उन सुरों के द्रोही दुष्टों का हमारी स्वामिनी के शरीर में शर आदि का स्पर्श नहीं हुआ ओर उसी से जीवित विद्यमान हैं ।१४।
एकावलंबनं कृत्वा महाराज्ञि भवत्पदम् । वयं सर्वा हि जीवामः साधयामः समीहितम् ॥१५
अतोऽस्माभिः प्रकर्त्तव्यं श्रीमत्त्यंगस्य रक्षणम् । मायाविनश्च दैत्येन्द्रास्तत्र मन्त्रो विधीयताम् ॥१६
आपत्कालेषु जेतव्या भंडाद्या दानवाधमाः । कूटयुद्धं न कुर्वन्ति न विशंति चमूमिमाम् ॥१७
प्रथमयुद्धदिवसः— तथा महेंद्रशैलस्य कार्यं दक्षिणदेशतः । शिबिरं बहुविस्तारं योजनानां शतावधि ॥१८
वह्निप्राकारवलयं रक्षणार्थं विधीयताम् । अस्मत्सेनानिवेशस्य द्विषां दर्पशमाय च ॥१९
शतयोजनमात्रस्तु मध्यदेशः प्रकल्प्यताम् । वह्निप्राकारचक्रस्य द्वारं दक्षिणतो भवेत् ॥२०
यतो दक्षिणदेशस्थं शून्यकं विद्धिषां पुरम् । द्वारे च बहवः कल्प्याः परिवारा उदायुधाः ॥२१
भंडासुर वध वर्णन ] [ ३५३
हे महाराज्ञि ! हम तो सब एक मात्र आपका ही चरण का अवलम्बन ग्रहण करके जीवित हैं और आपके समीहित का साधन करती हैं। ।१५। इसलिए हमको श्रीमती के अङ्ग की रक्षा करनी चाहिए ।१६। भण्ड आदि महान अधम दानव आपत्ति के समय में ही जीतने के योग्य हैं। ये कूट युद्ध नहीं करते हैं और इस सेना में भी प्रवेश नहीं करते हैं ।१७। उसी भाँति से महेन्द्र पर्वत के दक्षिण भाग में एक बहुत विस्तार वाला जिसकी सीमा सौ योजन की होवे शिविर बनाना चाहिए ।१८। उसकी रक्षा के लिए चारों ओर अग्नि का प्राकार बनाना चाहिए । उसमें हमारी सेना का निवेश होगा और यह द्वेषियों के दर्प का शमन करने के लिए भी होगा ।१९। सौ योजन मात्र इसका मध्य भाग प्रकल्पित किया जावे। वह्नि प्राकार चक्र का द्वार दक्षिण की ओर होना चाहिए ।२०। विद्वेषियों के पुर की स्थिति दक्षिण भाग में है जिसका नाम शून्यक है। उसके द्वार पर आयुध लिए हुए बहुत से परिवार कल्पित रहने चाहिए ।२१।
निर्गच्छतां प्रविशतां जनानामुपरोधकाः ।
अनालस्या अनिद्राश्च विधेयाः सततोद्यताः ॥२२
एवं च सति दुष्टानां कूटयुद्धं चिकीर्षितम् ।
अवेलासु च संध्यासु मध्यरात्रिषु च द्विषाम् ।
अशक्यमेव भवति प्रौढमाक्रमणं हठात् ॥२३
नो चेद्दुराशया दैत्या बहुमायापरिग्रहाः ।
पश्यतोहरवत्सर्वं विलुंठति महद्बलम् ॥२४
मंत्रिण्या दंडनाथाया इति श्रुत्वा वचस्तदा ।
शुचिदन्तरुचा मुक्ता वहन्ती ललिताब्रवीत् ॥२५
भवतीनामयं मन्त्रश्चारुबुद्ध्या विचारितः ।
अयं कुशलधीमार्गो नीतिरेषा सनातना ॥२६
स्वचक्रस्य पुरो रक्षां विधाय दृढसाधनः ।
परचक्राक्रमः कार्यो जिगीषद्भिर्महाजनैः ॥२७
इत्युक्त्वा मन्त्रिणीदंडनाथे सा ललितेश्वरी ।
ज्वालामालिनिकां नित्यामाहूयेदमुवाच ह ॥२८