भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अन्ये तेभ्योऽपरिज्ञाता ह्रस्वाः स्वल्पोपजीविनः ॥२३ तैर्विमिश्रा जनपदा आर्या म्लेच्छाश्च भागशः । पीयन्ते यैर्रिमा नद्यो गंगा सिंधुः सरस्वती ॥२४ शतद्रुश्चंद्रभागा च यमुना सरयूस्तथा । इरावती वितस्ता च विपाशा देविका कुहूः ॥२५ गोमती धूतपापा च बुद्बुदा च दृषद्वती । कौशिकी त्रिदिवा चैव निष्ठीवी गंडकी तथा ॥२६ चक्षुर्लोहित इत्येता हिमवत्पादनिस्सृताः । वेदस्मृतिर्वेदवती वृत्रघ्नी सिंधुरेव ॥२७ कर्णाशा नंदना चैव सदानीरा महानदी । पाशा चर्मणवतीनूपा विदिशा वेत्रवत्यपि ॥२८

तुङ्गप्रस्थ—कृष्णगिरि—गोधनगिरि—पुष्प गिरि—उज्जयन्त तथा श्वेतक शैल है ।२२। श्री पर्वत—चित्रकूट—कूट शैल गिरि हैं । उनसे भी अन्य छोटे-छोटे गिरि हैं जो भली-भाँति परिज्ञात नहीं हे और स्वल्पोप जीवी है ।२३। उन शैलों से मिले-जुले जनपद यह भी हैं जिनके भागों में आर्य तथा म्लेच्छ निवास किया करते हैं जिनके द्वारा इन नदियों का पान किया जाया करता है । उन नदियों के कुछ नामों का परिगणन किया जाता है जैसे— गङ्गा—सिन्धु—और सरस्वती हैं ।२४। शतद्रु—चन्द्रभागा—जमुना—सरयू—इरावती—वितस्ता—विपाशा—देविका—कुहू है ।२५। गोमती—धूतपापा—बुद्बुदा—दृषद्वती—कौशिकी—त्रिदिवा—निष्ठीवी—गण्डकी—चक्षु—लोहित—ये सब नदियाँ हिमवान् महाशैल के पाद से निकली हैं । वेदस्मृति—वेदवती—वृत्रघ्नी और सिन्धु है । वर्णाशा—नन्दना—सदानीरा—महानदी—पाशा—चर्मणवती—नूपा—विदिशा—वेत्रवती है ।२६-२८।

क्षिप्रा ह्यवंति च तथा पारियात्राश्रयाः स्मृताः । शोणो महानदश्चैव नर्म्मदा सुरसा क्रिया ॥२६ मंदाकिनी दशार्णा च चित्रकूटा तथैव च । तमसा पिप्पला श्येना करमोदा पिशाचिका ॥३० चित्रोपला विशाला च बंजुला वास्तुवाहिनी ।

भारतदेश ] [ ६३

सनेरुजा शुक्तिमती मंकुती त्रिदिवा क्रतुः ॥३१ ऋक्षवत्संप्रसूतास्ता नद्यो मणिजलाः शिवाः । तापी पयोष्णी निर्विन्ध्या सृपा च निषधा नदी ॥३२ वेणी वैतरणी चैव क्षिप्रा वाला कुमुद्वती । तोया चैव महागौरी दुर्गा वान्तशिला तथा ॥३३ विन्ध्यपादप्रसूतास्ता नद्यः पुण्यजलाः शुभाः । गोदावरी भीमरथी कृष्णवेणाथ मंजुला ॥३४ तुंगभद्रा सुप्रयोगा बाह्या कावेर्यथापि च । दक्षिणप्रवहा नद्यः सह्यपादाद्विनिः स्मृताः ॥३५

क्षिप्रा और अवन्ति ये नदियां पारियात्र के समाश्रय वाली हैं—ऐसा कहा गया है—शोण महानन्द हैं। सुरसा—नर्मदा—क्रिया—मन्दाकिनी दशार्णा—चित्रकूटा—तमसा—पिप्पला—श्येना—करमोदा और पिशाचिका—ये नदियाँ हैं ।२९-३०। चित्रोत्पला—विशाला—मंजुला—वास्तुवाहिनी—सनेरुजा—शुक्तिमती—मंकुती—त्रिदिवा—ऋतु नदियां हैं ।३१। ये सब ऋक्ष वत्स पर्वत से संभूत होने वाली हैं जिनका जल मणि के समान परम स्वच्छ और शिव है । तापी—पयोष्णी—निर्विन्ध्या—सृपा और निषधा नदी हैं ।३२। वेणी—वैतरणी—वाला—कुमुद्वती—तोया—महागौरी—दुर्गा—वान्तशिला नदियाँ हैं ।३३। ये सब नदियां विन्ध्य गिरि के पाद से प्रसूत होने वाली हैं जिनका जल परम पुण्यमय ह और जो बहुत ही शुभ है । गोदावरी-भीमरथी-कृष्णवेणा-मंजुला-तुङ्गभद्रा-सुप्रयोगा-बाह्या-कावेरी—ये नदियाँ दक्षिणा की ओर प्रवाह करने वाली हैं और सह्य गिरि के पाद से निकलने वाली हैं ।३४-३५।

कृतमाला ताम्रपर्णी पुष्पजात्युत्पलावती । नद्योऽभिजाता मलयात्सर्वाः शीतजलाः शुभाः ॥३६ त्रिसामा ऋषिकुल्या च मंजुला त्रिदिवाबला । लांगूलिनी वंशधरा महेन्द्रतनयाः स्मृताः ॥३७ ऋषिकुल्या कुमारी च मंदगा मंदगामिनी । कृपा पलाशिनी चैव शुक्तिमत्प्रभवाः स्मृताः ॥३८

६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तास्तु नद्यः सरस्वत्यः सर्वा गंगाः समुद्रगाः । विश्वस्य मातरः सर्वा जगत्पापहराः स्मृताः ॥३६

तासां नद्युपनद्योऽन्याः शतशोऽथ सहस्रशः । तास्विमे कुरुपांचालाः शाल्वा माद्रेयजांगलाः ॥४०

शूरसेना भद्रकारा बोधाः सहपटच्चराः । मत्स्याः कुशलयाः सौशल्याः कुंतलाः काशिकौशलाः ॥४१

गोधा भद्राः कलिंगाश्च मागधाश्चोत्कलैः सह । मध्यदेश्या जनपदाः प्रायशस्तत्र कीर्त्तिताः ॥४२

कृतमाला-ताम्रपर्णी-पुष्पजाती-उत्पलावती—ये सब नदियां मलय पर्वत से अभिजात हुई हैं जिनका जल बहुत ही शीतल और शुभ है ।३६। त्रिसामा-ऋषिकुल्या-बंजुला-त्रिदिवा-बला-लांगूलिनी-वंशधरा-ये सब महेन्द्र-गिरि की तनया कही गयी हैं ।३७। ऋषिकुल्या-मन्दगा-मन्द गामिनी-कृपा-पलाशिनी—ये नदियां शुक्तिमान् पर्वत से समुत्पत्ति पाने वाली है ।३८। ये सब नदियां सरस्वती हैं और सब समुद्र में गमन करने वाली गङ्गा है । ये सभी इस विश्व की मातायें हैं और जगत् के समस्त पापों के हरण करने वाली कही गयी हैं ।३६। इन सब नदियों की अन्य सैकड़ों और हजारों ही उप नदियां हैं । उनमें ये कुरु पाञ्चाल-शाल्व-माद्रेय-जांगल-शूरसेन-भद्रकार-बोध-सहपटच्चर-मत्स्य कुशल्य-कुन्तल-काशि-कौशल-गोध-भद्र-कलिंग-मागध-उत्कल-मध्य देश में होने वाले जनपद प्रायः करके वहाँ पर कीर्त्तित किये गये हैं ।४०-४२।

सह्यस्य चोत्तरांतेषु यत्र गोदावरी नदी । पृथिव्यामपि कृत्स्नायां स प्रदेशो मनोरमः ॥४३

तत्र गोवर्द्धनं नाम पुरं रामेण निर्मितम् । रामप्रियार्थ स्वर्गीया वृक्षा दिव्यास्तथौषधीः ॥४४

भरद्वाजेन मुनिना तत्प्रियार्थेऽवरोपिताः । अतः पुरवरोद्देशस्तेन जज्ञे मनोरमः ॥४५

वाहलीका वाटधानाश्च आभीरा कालतोयकाः । अपरांताश्च सुह्याश्च पाञ्चालाश्चर्ममंडलाः ॥४६

भारतदेश ] [ ६५

पंड्याश्च केरलाश्चैव चोलाः कुल्यास्तथैव च । सेतुका मूषिकाश्चैव क्षपणा वनवासिकाः ॥५६ अत्रिगण-भरद्वाज-प्रस्थल-दशेरक-लमक-तालशाल-भूषिक-ईजिक-ये सब उत्तर दिशा में हैं। अब जो पूर्व दिशा में देश हैं उनका भी आप ज्ञान प्राप्त कर लीजिए। अङ्ग-दङ्ग-चोल भद्र-किरातों की जातियां-तोमर-हंसभंग-काश्मीर-तंगण-झिल्लिक-आहुक-हुणदर्व-अन्ध्रगक-मुद्गर अन्तर्गिरि-बहिर्गिरि—इसके अनन्तर प्लवङ्गव-मलद और मलवर्त्तिक जानने के योग्य हैं। ।५०-५३। समंतर-प्रावृषेय-भार्गव-गोपपार्थिव-प्राग्ज्योतिष-पुण्ड्र-विदेह-ताम्रलिप्तिक-मल्ल-मगध और गोनर्द—ये जनपद पूर्वी दिशा में हैं ऐसा कहा गया है। इसके उपरान्त दूसरे दक्षिणा पथवासी जनपद हैं ।५३-५४। पण्ड्य-केरल-चोल-कुल्य-सेतुक-मूषिक-क्षपण और वनवासिक देश हैं ।५६।

महाराष्ट्रा महिषिकाः कलिङ्गाश्चैव सर्वशः । आभीराश्च सहैषीका आटव्या सारवास्तथा ॥५७ पुलिंदा विन्ध्यमौलीया वैदर्भा दंडकैः सह । पौरिका मौलिकाश्चैव अश्मका भोगवर्द्धनाः ॥५८ कौंकणाः कुंतलाश्चांध्राः पुलिन्दाङ्गारमारिषाः । दाक्षिणाश्चैव ये देशा अपरांस्तान्निबोधत ॥५९ सूर्य्यारकाः कलिवना दुर्गालाः कुन्तलैः । पौलेयाश्च किराताश्च रूपकास्तापकैः सह ॥६० तथा करीत्तयश्चैव सर्वे चैव करंधराः । नासिकाश्चैव ये चान्ये ये चैवांतरनर्मदाः ॥६१ सहकच्छाः समाहेयाः सह सारस्वतैरपि । कच्छिपाश्च सुराष्ट्राश्च आनर्ताश्चार्बुदै सह ॥६२ इत्येते अपरांताश्च शृणुध्वं विन्ध्यवासिनः । मलदाश्च करूषाश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह ॥६३

महाराष्ट्र-महिषिक-कलिङ्ग-सब ओर आभीर-सहैषीक-आटव्य-सारव-पुलिन्द-विन्ध्य मौलेय-वैदर्भ-दण्डक-पौरिक-मौलिक-अश्मक-भोग वर्धन-कोङ्कण-कुन्तल-आन्ध्र-पुलिन्द-अंगार-मारिष-ये सब देश दक्षिणा पथ वासी

६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गांधारा यवनांश्चैव सिंधुसौवीरमण्डलाः । चीनांश्चैव तुषारांश्च पल्लवा गिरिगह्वराः ॥४७ शका भद्राः कुलिंदाश्च पारदा विन्ध्यचूलिकाः । अभीषाहा उलूतांश्च केकया दशमालिकाः ॥४८ ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव वैश्यशूद्रकुलानि तु । कांबोजा दरदाश्चैव बर्बरा अंगलोहिकाः ॥४६

सह्य गिरि के उत्तरान्तों में जहाँ पर गोदावरी नदी बहती है इस सम्पूर्ण पृथिवी में वह प्रदेश परम सुन्दर है ।४३। वहाँ पुर है जिसका गोवर्धन नाम है और इसका निर्माण श्रीराम ने किया था । वहाँ पर श्रीराम के प्रिय स्वर्गीय और अत्युत्तम वृक्ष तथा औषधियाँ हैं ।४४। इन सबका अब रोपण श्रीराम की प्रीति के लिए भरद्वाज मुनि ने किया था । अतएव उन्होंने इस पुरवर का मनोरम उद्देश्य किया था। वाहलीक-वाटधान-आभीर-कालतोयक-अपरान्त-सुह्य-पाञ्चाल-चर्ममंडल-गान्धार-यवन-सिन्धु सौवीर मण्डल-चीन-तुषार-पल्लव-गिरि गह्वरशक-भद्र-कुलिन्द-पारद-विन्ध्यचूलिका-अभी-षाहु-उलूत-केकय-दशमालिक ये सब देश तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कुल, काम्बोज-दरद-उर्वर और अङ्गलोहिक ये सब देश हैं ।४६-४६।

अत्रयः सभरद्वाजाः प्रस्थलाश्च दशेरकाः । लमकास्तालशालाश्च भूषिका ईजिकैः सह ॥५० एते देशा उदीच्या वै प्राच्यान्देशान्निबोधत । अंगवंगाश्चोलभद्राः किरातानां च जातयः । तोमरा हंसभंगाश्च काश्मीरास्तंगणास्तथा ॥५१ झिल्लिकाश्चाहुकाश्चैव हूणदर्वास्तथैव च ॥५२ अंध्रवाका मुद्गरका अंतर्गिरिबहिर्गिराः । ततः प्लवंगवो ज्ञेया मलदा मलवर्तिकाः ॥५३ समंतराः प्रावृषेया भार्गवा गोपपार्थिवाः । प्राग्ज्योतिषाश्च पुंड्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तकाः ॥५४ मल्ला मगधगोनर्दाः प्राच्यां जनपदां स्मृताः । अथापरे जन पदा दक्षिणापथवासिनः ॥५५

युग संख्यावर्ती ] [ ६७

हैं। और जो दक्षिण में होने वाले दूसरे जनपद हैं उनका भी ज्ञान प्राप्त करलो ।५७-५६। सूर्पारिक-कलिवन-गुर्गल-कुन्तल-पौलेय-किरात-रूपक-तापक-करीति और सब करन्धर और नासिक तथा जो अन्य नर्मदा के अन्तर में हैं ।६०-६१। सहकच्छ-समाहेय-सारस्वत-कच्छिप-सुराष्ट्र-आनर्त-अर्बुद—ये सब और अपरान्त जो विन्ध्य के वास करने वाले हैं उनको आप सुनिये। मलद-करुष-मेकल-उत्कल-ये जनपद विन्ध्य के वास करने वाले हैं। ।६२-६३।

उत्तमानां दशार्णाश्च भोजाः किष्किन्धकैः सह ।
तोशलाः कोशलाश्चैव त्रैपुरा वैदिशास्तथा ॥६४
तुहुण्डा बर्वराश्चैव षट्पुरा नैषधै-सह ।
अनूपास्तुं डिकेराश्च वीतिहोत्रा ह्यवंतयः ॥६५
एते जनपदाः सर्वे विन्ध्यपृष्ठनिवासिनः ।
अतो देशान्प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये ॥६६
निहीरा हंसमार्गाश्च कुपथास्तंगणा शकाः ।
खपप्रावरणाश्चैव ऊर्णा दर्वाः सहूहूकाः ॥६७
त्रिगर्त्ता मंडलाश्चैव किरातास्तामरैः सह ।
चत्वारि भारते वर्षे युगानि ऋषयोऽब्रुवन् ॥६८
कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं तिष्यमेव च ।
तेषां निसर्गं वक्ष्यामि उपरिष्टादशेषतः ॥६९

उत्तमों के दशार्ण-भोज-किष्किन्धक-तोशल-कोशल-त्रैपुर-वैदिश—तुहुण्ड—वर्वर—षट्पुर—नैषध—अनूप—तुण्डिकेर—वीतिहोत्र-अवन्ति—ये सब जनपद विन्ध्य गिरि के ऊपर निवास करने वाले हैं। इसके आगे मैं उन देशों का वर्णन करूँगा जो पर्वतों का आश्रय ग्रहण करके निवास किया करते हैं ।६४-६६। निहीर-हंसमार्ग-कुपथ-तङ्गण-शक-अप प्रावरण-ऊर्ण-दर्व-सहूह्क-त्रिगर्त-मण्डल-किरात-तामर-ये समस्त देश पर्वतों के ऊपर समाश्रय लेने वाले हैं। ऋषियों ने भारतवर्ष में चार युगों का होना बतलाया था। प्रथम कृतयुग अर्थात् सत्ययुग है—दूसरा त्रेता, तीसरा द्वापर और चौथा तिष्य है। इन सबका निसर्ग ऊपर से ही सम्पूर्ण मैं आपको बतलाऊँगा ।६७-६९।

६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

युग संख्यावर्तं

ऋषिरुवाच-चतुर्युगानि यान्यासन्पूर्वं स्वायंभुवेऽन्तरे । तेषां निसर्गं तत्त्वं च श्रोतुमिच्छामि विस्तरात् ॥१॥ सूत उवाच-पृथिव्यादिप्रसंगेन यन्मया प्रागुदीरितम् । तेषां चतुर्युगं ह्येतत्तद्वक्ष्यामि निबोधत ॥२ संख्ययेह प्रसंख्याय विस्तराच्चैव सर्वशः । युगं च युगभेदश्च युगधर्मस्तथैव च ॥३ युगसंख्यांशकश्चैव युगसंधानमेव च । षट्प्रकाशयुगाख्यैषा तां प्रवक्ष्यामि तत्वतः ॥४ लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याब्दं तु मानुषम् । तेनाब्देन प्रसंख्याये वक्ष्यामीह चतुर्युगम् । निमेषकालतुल्यं हि विद्याल्लध्वक्षरं च यत् ॥५ काष्ठा निमेषा दश पंच चैव त्रिंशच्च काष्ठा गणयेत्कलां तु । त्रिंशत्कलाश्चापि भवेन्मुहूर्तंस्तैस्त्रिंशता रात्र्यहनी समेते ॥६ अहोरात्रौ विभजते सूर्यो मानुषलौकिको ॥७

ऋषि ने कहा—जो चार युग हैं और पूर्व में स्वायम्भुव मन्वन्तर में थे। हे भगवन् ! उनका निसर्ग कैसे हुआ और उनका क्या तत्व है—यह मैं विस्तार के साथ श्रवण करना चाहता हूँ ।१। श्रीसूत जी ने कहा—पृथिवी आदि के प्रसंग से जो मैंने पूर्व में कहा था उनके चारों युगों के विषय में मैं अब बतलाऊँगा । उसको आप भली-भाँति समझ लीजिए ।२। यहाँ पर संख्या के द्वारा प्रसंख्यान करके और सब प्रकार से विस्तृत मैं कहूँगा । युग-युग का भेद-युग का धर्म-युग सन्धि का अंश-युग सन्धान-यह षट् प्रकाश युग की आख्या है । उन सबको मैं तात्विक रूप से आपको बतलाऊँगा ।३-४। लौकिक प्रमाण मनुष्य के वर्ष का निष्पादन करके उसी शब्द से प्रसंख्यान करके यहाँ पर मैं चारों युगों को बतलाऊँगा । निमेष काल उसे ही जानना चाहिए जो कि लघु अक्षर के तुल्य होता है ।५। पन्द्रहनिमेषों का जितना काल होता है उसकी एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाओं के समय को

युग संख्यावर्ता ] [ ६६

कला गिनना चाहिए। तीस कलाओं का एक मुहूर्त होता है। तीस मुहूर्तों के सम रात्रि और दिन हुआ करते हैं।६। दिन और रात्रि का विभाग सूर्य किया करता है जो कि मनुष्य का लौकिक होता है।७।

तत्राहः कर्मचेष्टायां रात्रिः स्वप्नाय कल्पते ।
पित्र्ये राज्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः ॥८
कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी ।
त्रिंशद्ये मानुषा मासाः पित्र्यो मासस्तु सः स्मृतः ॥६
शतानि त्रीणि मासानां षष्ट्या चाप्यधिकानि वै ।
पित्र्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण विभाव्यते ॥१०
मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत् ।
पितॄणां त्रीणि वर्षाणि संख्यातानीह तानि वै ॥११
दश चैवाधिका मासाः पितृसंख्येह संज्ञिताः ।
लौकिकेनेव मानेन ह्यब्दो यो मानुषः स्मृतः ॥१२
एतद्दिव्यमहोरात्रं शास्त्रे स्यान्निश्चयो गतः ।
दिव्ये राज्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः ॥१३
अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद्दक्षिणायनम् ।
ये ते राज्यहनी दिव्ये प्रसंख्यानं तयोः पुनः ॥१४

उनमें दिन तो कर्मों के करने की चेष्टा में लगाया जाता है और रात्रि का समय सोने के लिए कहा जाता है। दिव्य रात्रि और दिन मास होता है। उन दोनों या प्रविभाग फिर होता है।८। उनका कृष्ण पक्ष उनकी रात्रि होती है। मनुष्यों के जो तीस मास होते हैं वही पितृगणों का मास कहा गया है।६। तीन सौ साठ मासों का पितृगणों का एक वर्ष होता है। यह संख्या मनुष्यों के मासों से विभावित हुआ करती है।१०। मनुष्यों के मान से जो सौ वर्ष होते हैं वे पितृगणों के तीन वर्ष संख्यात किये गये हैं।११। यहाँ पर दश मास अधिक पितृ गणों की संख्या संज्ञा वाली हुई है। लौकिक मान से ही जो मनुष्यों का शब्द कहा गया है।१२। यह दिव्य अर्थात् देवों का अहोरात्र अर्थात् एक दिन और रात है जो शास्त्र निश्चय को प्राप्त हुआ है। दिव्य रात्रि और दिन वर्ष है और उन दोनों का फिर

१०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रविभाग है ।१३। वहाँ पर जो दिन है वह उत्तरायण होता है और जो रात्रि है वह दक्षिणायन होता है जो वे दिव्य रात्रि और दिन हैं उनका पुनः प्रसंख्यान है ।१४।

त्रिंशद्यानि तु वर्षाणि दिव्यो मासस्तु स स्मृतः । यन्मानुषं शतं विद्धि दिव्या मासास्त्रयस्तु ते ॥१५ दश चैव तथाऽहानि दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः । त्रीणि वर्षशतान्येव षष्टिवर्षाणि यानि तु । दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्त्तितः ॥१६ त्रीणि वर्षसहस्राणि मानुषाणि प्रमाणतः । त्रिंशदन्यानि वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः ॥१७ नव यानि सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु । अन्यानि नवतिश्चैव ध्रुवः संवत्सरः स्मृतः ॥१८ षड्विंशतिसहस्राणि वर्षाणि मानुषाणि तु । वर्षाणि तु शतं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः ॥१९ त्रीण्येव नियुतान्याहुर्वर्षाणां मानुषाणि तु ॥२० षष्टिश्चैव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया । दिव्यवर्षसहस्रं तु प्राहुः संख्याविदो जनाः ॥२१

मनुष्यों के जो तीस वर्ष होते हैं उतने समय का देवों का दिव्य मास कहा गया है । जो मानवों के एक सौ वर्ष हैं उतने समय का दिव्य तीन मास हुआ करते हैं ।१५। तथा दश दिन हैं—यही दिव्य विधि कही गयी है । तीन सौ साठ जो वर्ष मनुष्यों के होते हैं यह एक दिव्य सम्वत्सर कहा गया है ।१६। मनुष्यों के तीन हजार वर्ष प्रमाण से होते हैं और अन्य वर्ष हैं इतने समय का सप्तषियों का एक वत्सर होता है ।१७। मानवों के जो नौ हजार वर्ष होते हैं और अन्य नब्बे वर्ष हैं-इतने समय का ध्रुव सम्वत्सर हुआ करता है । मनुष्यों के छब्बीस हजार वर्षों का जो समय होता है वह समय होता है वह समय देवों का अर्थात् दिव्य सौ वर्ष हुआ करते हैं—यह विधि कही गयी है ।१८-१९। तीन नियुत ही मनुष्यों के वर्ष कहे जाते हैं ।२०। संख्या के द्वारा साठ सहस्र वर्ष ही संख्यात किये गये हैं । संख्या के ज्ञाता मनीषी गण दिव्य सहस्र वर्ष कहते हैं ।२१।

युग संख्यावर्ता ] [ १०१

इत्येवमृषिभिर्गीतं दिव्यया संख्यया त्विह । दिव्येनेव प्रमाणेन युगसंख्याप्रकल्पनम् ॥२२ चत्वारि भारते वर्षे युगानि कवयोऽब्रुवन् । कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुष्टयम् ॥२३ पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेता विधीयते । द्वापरं च कलिश्चैव युगान्येतानि कल्पयेत् ॥२४ चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां च कृतं युगम् । तस्य तावच्छती संध्या संध्यायाः संध्यया समः ॥२५ इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु । एकन्यायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च ॥२६ त्रीणि द्वे च सहस्राणि त्रेताद्वापरयोः क्रमात् । त्रिशती द्विशती संध्ये संध्यांशौ चापि तत्समौ ॥२७ कलिं वर्षसहस्रं तु युगमाहुर्द्विजोत्तमाः । तस्यैकशतिका संध्या संध्यांशं संध्याय समः ॥२८

ऋषियों ने यह इस प्रकार से दिव्य संख्या के साथ गान किया है और दिव्य प्रमाण के ही द्वारा युगों की प्रकृष्ट संख्या की कल्पना की जाया करती है ।२२। कविगणों ने भारत वर्ष में चार युग बताये थे । कृतयुग-त्रेता-द्वापर और कलियुग ये चार युगों की चौकड़ी है ।२३। सबसे प्रथम जो युग है उसका कृतयुग अर्थात् सत्ययुग है । इसके उपरान्त त्रेता युग का विधान किया जाता है । फिर द्वापर और इसके बाद कलियुग आता है—इन चार युगों की कल्पना की जाती है ।२४। कृतयुग के बरतने का काल चार सहस्र दिव्य वर्षों का होता है । उस युग की उतने ही सौ वर्षों की सन्ध्या होती है है और सन्ध्या का अंश सन्ध्या के ही समान होता है ।२५। सन्ध्या के सहित और सन्ध्यांशों के सहित अन्य तीनों में एक ही न्याय से सहस्र और शत बरता करते हैं ।२६। त्रेता और द्वापर में क्रम से तीन और दो सहस्र होते हैं । तीन सौ और दो सौ सन्ध्यायैं और सन्ध्यांश भी उनके ही समान हुआ करते हैं ।२७। द्विजोत्तम कलियुग एक सहस्र वर्ष कहते हैं । उसकी एक सौ वर्षों वाली सन्ध्या होती है और सन्ध्या के ही समान सन्ध्या का अंश हुआ करता है ।२८।

१०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तेषां द्वादशसाहस्री युगसंख्या प्रकीर्त्तिता । कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैव चतुष्टयम् ॥२९ अत्र संवत्सरा दृष्टा मानुषेण प्रमाणतः । कृतस्य तावद्वक्ष्यामि वर्षाणि च निबोधत ॥३० सहस्राणां शतान्याहुश्चतुर्दश हि संख्यया । चत्वारिंशत्सहस्राणि तथान्यानि कृतं युगम् ॥३१ तथा शतसहस्राणि वर्षाणि दशसंख्यया । अशीतिश्च सहस्राणि कालस्त्रेतायुगस्य सः ॥३२ सप्तैव नियुतान्याहुर्वर्षाणां मानुषेण तु । विंशतिश्च सहस्राणि कालः स द्वापरस्य च ॥३३ तथा शतसहस्राणि वर्षाणि त्रीणि संख्यया । षष्टिश्चैव सहस्राणि कालः कलियुगस्य तु ॥३४ एवं चतुर्युगे काल ऋतै संध्यांशकैः स्मृतः । नियुतान्येव षड्विंशन्निरसानि युगानि वै ॥३५ चत्वारिंशत्तथा त्रीणि नियुतानीह संख्यया । विंशतिश्च सहस्राणि स संध्यांशश्चतुर्युगः ॥३६ एवं चतुर्युगाख्यानां साधिका ह्येकसप्ततिः । कृतत्रेतादियुक्तानां मनोरन्तरमुच्यते ॥३७

उनकी बारह सहस्रों वाली युगों की संख्या कीर्तित की गयी है । इस प्रकार से कृतयुग-त्रेता-द्वापर और कलियुग इन चार युगों की चौकड़ी है ।२९। यहाँ पर मानुष प्रमाण से सम्वत्सर देखे गये हैं। अब कृत युग के वर्षों को बतलाऊँगा । उनको भली भाँति समझ लीजिए ।३०। संख्या के द्वारा चौदह सौ सहस्र कहे गये हैं । तथा अन्य चालीस सहस्र कृतयुग हैं ।३१। दश की संख्या से सो सहस्र वर्ष हैं। वह अस्सी सहस्र काल त्रेतायुग का होता है ।३२। मानुष प्रमाण से सात ही विपुल वर्ष कहे गये हैं । और द्वापर युग का काल बीस सहस्र वर्ष होता है ।३३। संख्या से तीन शत सहस्र वर्ष कलियुग का काल होता है ।३४। इस प्रकार से इन चार युगों में ऋत संध्यांशों

युग संख्यावर्ण ] [ १०३

के सहित काल कहा गया है। युग निरस छब्बीस नियुत ही हैं। ३५। इन चारों युगों का संख्या से तैतालीस नियुत और बीस हजार वह सन्ध्यांश होता है। ३६। इस प्रकार से कृत से लेकर त्रेता आदि चारों युगों की साधिका इकहत्तर होती है। इसी को एक मन्वन्तर कहा जाता है अर्थात् इकत्तर चारों युगों की चोकड़ियाँ जब समाप्त हो जाती हैं तभी एक मनु के शासन का समय पूर्ण होकर दूसरा मन्वन्तर आता है ।३७।

अंतरिक्षे समुद्रे च पाताले पर्वतेषु च । इज्या दानं तपः सत्यं त्रेतायां धर्म उच्यते ॥३८ तदा प्रवर्त्तन्ते धर्मो वर्णाश्रमविभागशः । मर्यादास्थापनार्थं च दण्डनीतिः प्रवर्त्तते ॥३९ हृष्टपुष्टाः प्रजाः सर्व्वा अरोगाः पूर्णमानसाः । एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतायुगविधौ स्मृतः ॥४० त्रीणि वर्षसहस्राणि तदा जीवन्ति मानवाः । पुत्रपौत्रसमाकीर्णा म्रियन्ते च क्रमेण तु ॥४१ एष त्रेतायुगे धर्मस्त्रेतासंख्यां निबोधत । त्रेतायुगस्वभावानां संध्यापादेन वर्त्तते । संख्यापादः स्वभावस्तु सोऽशपादेन तिष्ठति ॥४२

अन्तरिक्ष में—समुद्र में—पाताल में और पर्वतों में इज्या-दान, तप और सत्य का समाचरण ही त्रेतायुग में धर्म कहा जाया करता है ।३८। उस समय में वर्गों और आश्रमों के विभाग के अनुसार धर्म की प्रवृत्ति हुआ करती है। मर्यादा की स्थापना करने के लिए दण्ड देने की नीति भी उस समय में प्रवृत्त होती है ।३९। उस समय में समस्त प्रजा के जन समुदाय दृष्ट-पुष्ट, रोगों से रहित और पूर्ण मानस वाले होते हैं। त्रेतायुग की विधि में चार पादों वाला एक ही वेद कहा गया है ।४०। उस समय में मानवों की आयु बड़ी होती थी और वे तीन हजार वर्षों तक जीवित करते रहा थे। वे सब अपने पुत्रों—पौत्रों से घिरे हुए रहा करते थे तथा उनकी मृत्यु भी आयु के अनुसार क्रम से ही हुआ करती थी ।४१। त्रेतायुग में इसी प्रकार से धर्म होता था। अब त्रेता की संख्या का भी ज्ञान प्राप्त कर लीजिए। त्रेता

१०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

युग के जो स्वभाव हैं उनकी सन्ध्या पाद से बरता करती है। सन्ध्यापाद का स्वभाव जो है वह अंश पाद से स्थित होता है ॥४२॥

चतुर्युगाख्यान वर्णनम्

सूत उवाच--अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि द्वापरस्य विधिं पुनः । तत्र त्रेतायुगे क्षीणे द्वापरं प्रतिपद्यते ॥१ द्वापरादौ प्रजानां तु सिद्धिस्त्रेतायुगे तु या । परिवृत्ते युगे तस्मिंस्ततस्ताभिः प्रणश्यति ॥२ ततः प्रवर्तते तासां प्रजानां द्वापरे पुनः । संभेदश्चैव वर्णानां कार्याणां च विपर्ययः ॥३ यज्ञावधारणं दण्डो मदो दंभः क्षमा बलम् । एषा रजस्तमोयुक्ता प्रवृत्तिर्द्वापरे स्मृता ॥४ आद्ये कृते यो धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते । द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे ॥५ वर्णानां विपरिध्वंसः संकीर्यन्ते तथाश्रमाः । द्वैविध्यं प्रतिपद्येते युगे तस्मिञ्छुतिस्मृती ॥६ द्वैधात्तथा श्रुतिस्मृत्योर्निश्चयो नाधिगम्यते । अनिश्चयाधिगमनाद्धर्मतत्त्वं न विद्यते ॥७

श्री सूतजी ने कहा —उसके आगे फिर द्वापर युग की विधि का वर्णन करूँगा। वहाँ पर त्रेता युग के क्षीण होने पर द्वापर युग प्रतिपन्न होता है ।१। द्वापर युग के आदि में प्रजाओं की वही सिद्धि थी जो कि त्रेतायुग में में थी। उस युग के परिवर्तित हो जाने पर इसके पश्चात् उन सिद्धियों से विनष्ट हो जाता है ।२। फिर द्वापर में उस प्रजाओं का संभेद प्रवृत्त हो जाता है और समस्त वर्णों का और कार्यों का विपर्यय हो जाया करता है ।३। यज्ञों का अवधारण, दण्ड, दम्भ, क्षमा और बल द्वापर में यह प्रवृत्ति जो भी थी वह रजोगुण और तमोगुण से युक्त कही गयी है ।४। सबसे आदि में होने वाले कृतयुग में जो धर्म है वह त्रेतायुग में प्रवृत्त होता है। द्वापर युग में वह धर्म व्याकुलित होकर कलियुग में विनष्ट ही जाता है ।५। सभी वर्णों का विशेष रूप से परिध्वंस होता है तथा सब आश्रम भी बिगड़ जाया करते

चतुर्युगाख्यान वर्णनम् ] | १०५

हैं। उस युग में श्रुतियाँ और स्मृतियाँ दो प्रकारों को प्राप्त कर लिया करती हैं। श्रुति-स्मृतियों के दो प्रकार के स्वरूप हो जाने से किसी निश्चय का अधिगम नहीं हुआ करता है और अनिश्चय के अधिगम से धर्म का वास्त- विक तत्त्व नहीं रहता है ।६-७।

धर्मासत्वेन मित्राणां मतिभेदो भवेन्नृणाम् । परस्परविभिन्नैस्तैर्दृष्टीनां विभ्रमेण च ॥८ अयं धर्मो ह्ययं नेति निश्चयो नाधिगम्यते । कारणानां च वैकल्यात्कार्याणां चाप्यनिश्चयात् ॥९ मतिभेदेन तेषां वै दृष्टीनां विभ्रमो भवेत् । ततो दृष्टिविभिन्नैस्तु कृतं शास्त्राकुलं त्विदम् ॥१० एको वेदश्चतुष्पाद्धि त्रेतास्विह विधीयते । संक्षयादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेषु च ॥११ ऋषिमंत्रात्पुनर्भेदाद्भिद्यते दृष्टिविभ्रमैः । मंत्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः ॥१२ संहिता ऋग्यजुः साम्नां संपठ्यंते महर्षिभिः । सामान्या वैकृताश्चैव दृष्टिभिन्ने क्वचित्क्वचित् ॥१३ ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि मंत्रप्रवचनानि च । अन्येऽपि प्रस्थितास्तान्वै केचित्तान्प्रत्यवस्थिताः ॥१४

धार्मिकता के न रहने से भिन्न मनुष्यों की मति का भेद हो जाया करता है। वे सब आपस को भी किसी के साथ सहानुभूति नहीं होती है। सब की सृष्टि में विभ्रम हो जाया करता है ।८। यह धर्म है अथवा यह अधर्म है—इसका कोई भी निश्चय नहीं हुआ करता है। कारणों के विकल्प होने से और कार्यों के निश्चय नहीं होने से धर्माधर्म का कोई निश्चय नहीं हुआ करता है ।९। उन मनुष्यों की मति के विभेद होने से उनकी दृष्टियों का भी विभ्रम हो जाता है। फिर विभिन्न दृष्टियों वाले मनुष्यों के द्वारा शास्त्रों को भी आकुलित कर दिया था ।१०। वेद एक ही था उसको त्रेता- युग में चार पादों वाला किया जाता है। आयु के संक्षय होने से द्वापर युग में यह व्यवस्थित हो जाता है ।११। ऋषियों ने और मन्त्रों के फिर भेद

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होने से यह दृष्टि के विभ्रमों से युक्त हो जाता है । जिस से मन्त्र भाग और ब्राह्मण भाग का विन्यास होता है और स्वरों तथा वर्णों का विपर्यय होता है ।१२। महर्षियों के द्वारा ऋग्वेद-यजुर्वेद और सामवेद की संहितायें पढ़ी जाया करती हैं । कहीं पर सामान्य और कहीं-कहीं पर दृष्टि की भिन्नता होने पर वैकृत ये पढ़ी जाया है ।१३। ब्राह्मण-कल्प सूत्र और मन्त्र प्रवचन और अन्य भी प्रथित हैं और कुछ उनके प्रति अवस्थित हैं ।१४।

द्वापरेषु प्रवर्त्तन्ते निवर्त्तन्ते कलौ युगे ।
एकमाध्वर्यवं त्यासीत्पुनर्द्वैधमजायत ।।१५
सामान्यविपरीतार्थैः कृतशास्त्राकुलं त्विदम् ।
आध्वर्यवस्य प्रस्थानैर्बहुधा व्याकुलीकृतैः ।।१६
तथैवाथर्वऋक्सांम्नां विकल्पैश्चापि संज्ञया ।
व्याकुले द्वापरे नित्यं क्रियते भिन्नदर्शनैः ।।१७
तेषां भेदाः प्रतीभेदा विकल्पाश्चापि संख्यया ।
द्वापरे संप्रवर्त्तन्ते विनश्यन्ति ततः कलौ ।।१८
तेषां विपर्ययोत्पन्ना भवन्ति द्वापरे पुनः ।
अवृष्टिर्मरणं चैव तथैव व्याध्युपद्रवाः ।।१९
वाङ्मनः कर्मजैर्दुःखैर्निर्वेदो जायते पुनः ।
निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ।।२०
विचारणाच्च वैराग्यं वैराग्याद्दोषदर्शनम् ।
दोषदर्शनतश्चैव द्वापरेऽज्ञानसंभवः ।।२१

यह सब कुछ द्वापर युग में प्रवृत्त होते हैं और कलियुग में भी सभी भेद-प्रभेद निवृत्त हो जाते हैं । एक आध्वर्यव था और फिर दो प्रकार हो गये थे ।१५। साधारण और विपरीत अर्थों के द्वारा यह शास्त्र आकुल कर दिया गया था यह बहुधा आध्वर्यव के व्याकुली कृत प्रस्थानों के द्वारा ही हुआ था ।१६। तथा अर्थात् उसी प्रकार से संज्ञा के द्वारा अथर्व-ऋक् और सामों के विकल्पों से भी हुआ था । नित्य ही इस तरह से व्याकुल द्वापर में विभिन्न दर्शन शास्त्रों के द्वारा किया जाता है ।१७। संख्या से उनके भेद-प्रतीभेद-और विकल्प द्वापर युग में भली-भाँति प्रवृत्त होते हैं और फिर जब कलियुग आ जाता है तो सभी विनष्ट हो जाया करते हैं ।१८। द्वापर में फिर

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् । [ १०७

उनके विपरीत समुत्पन्न हो जाते हैं। वृष्टि का अभाव-व्याधि-उपद्रव-मरण- ये सब होते हैं ।१६। कायिक, वाचिक और मानसिक सभी प्रकार के दुःख होते हैं और उन दुःखों के समुदाय से फिर मनों निर्वेद उत्पन्न हो जाता है । यह सभी निस्सार है—ऐसा जब निर्वेद हृदयों में होता है तो फिर उन प्राणियों के हृदयों में इन सब दुःखों से छुटकारा पाने का विचार होता है ।२०। ऐसी जब विचारणा होती है तो उससे सबके प्रति विरागता हो जाया करती है और उस वैराग्य से भोगोपभोगों में दोषों का दर्शन होने लगता है । दोषों के देखने से ही द्वापर में अज्ञान की उत्पत्ति हो जाती है ।२१।

तेषामज्ञानिनां पूर्वमाद्ये स्वायंभुवेऽन्तरे । उत्पद्यंते हि शास्त्राणां द्वापरे परिपंथिनः ॥२२ आयुर्वेदविकल्पश्च ह्यङ्गानां ज्योतिषस्य च । अर्थशास्त्रविकल्पाश्च हेतुशास्त्रविकल्पनम् ॥२३ प्रक्रियाकल्पसूत्राणां भाष्यविद्याविकल्पनम् । स्मृतिशास्त्रप्रभेदश्च प्रस्थानानि पृथक्पृथक् ॥२४ द्वापरेष्वभिवर्त्तंते मतिभेदाश्चयान्नृणाम् । मनसा कर्मणा वाचा कृच्छ्राद्वार्त्ता प्रसिद्ध्यति ॥२५ द्वापरे सर्वभूतानां कायक्लेशपुरस्कृता । लोभो वृत्तिर्वणिक्पूर्वा तत्त्वानांमविनिश्चयः ॥२६ वेदशास्त्रप्रणयनं धर्माणां संकरस्तथा । वर्णाश्रमपरिध्वंसः कामक्रोधौ तथैव च ॥२७ द्वापरेषु प्रवर्त्तन्ते रोगो लोभो वधस्तथा । वेदं व्यासश्चतुर्द्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु ॥२८

उन ज्ञान से रहित मानवों से पहिले स्वायम्भुव मन्वन्तर में जो कि सबसे पहिला है उस द्वापर में सभी शास्त्रों के परिपन्थी अर्थात् विरोध करने वाले लोग समुत्पन्न हो जाया करते हैं ।२२। रोगों के विषय में आयु- र्वेद शास्त्र का विकल्प और ज्योतिष शास्त्र का विकल्प-अर्थशास्त्र के विषय में विकल्प और हेतु शास्त्र का विकल्प है ।२३। कल्पसूत्रों की प्रक्रिया, भाष्य विद्या का विकल्प और स्मृति शास्त्रों के प्रभेद ऐसे अलग-अलग प्रस्थान हैं

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।२४। ये सभी द्वापर युग में मनुष्यों की बुद्धियों के भेद होने से अभिवर्तित हैं। मन से-वचन से और कर्म से बड़ी कठिनाई से वार्त्ता प्रसिद्ध होती है ।२५। द्वापर में समस्त प्राणियों के कार्य शारीरिक क्लेश के साथ ही होते हैं। सबकी वृत्ति होती है जैसी कि वणिजों की हुआ करती हैं और किसी को भी तत्वों का निश्चय नहीं होता है ।२६। लोग स्वयं ही वेदों और शास्त्रों का प्रणयन किया करते हैं और धर्म सब मिलकर एकमेक जाते हैं और धर्मों की सङ्करता हो जाती है। चारों वर्णों और चारों आश्रमों का पूर्णतया विध्वंस हो जाता है और प्राणियों में प्रायः काम और क्रोध उत्पन्न हो जाया करते हैं ।२७। द्वापर युग में लोगों के मनों में राग-लोभ और वध करने की भावनायें उत्पन्न हो जाया करती है। द्वापर के आदि में व्यासदेव जी ने वेद के चार भाग किये थे ।२८।

निःशेषे द्वापरे तस्मिंस्तस्य संध्या तु यादृशी । प्रतिष्ठितगुणैर्हीनो धर्मोऽसौ द्वापरस्य तु ॥२९ तथैव संध्या पादेन ह्यङ्गः संध्या इतीष्यते । द्वापरस्यावशेषेण तिष्यस्य तु निबोधत ॥३० द्वापरस्यांशषेण प्रतिपत्तिः कलेरपि । हिंसासूयानृतं माया वधश्चैव तपस्विनाम् ॥३१ एते स्वभावास्तिष्यस्य साधयंति च वै प्रजाः । एष धर्मः कृतः कृत्स्नो धर्मश्च परिहीयते ॥३२ मनसा कर्मणा स्तुत्या वार्त्ता सिध्यति वा न वा । कलौ प्रमारको रोगः सततं क्षुद्भयानि च ॥३३ अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः । न प्रमाणं स्मृतेरस्ति तिष्ये लोकेषु वै युगे ॥३४ गर्भस्थो म्रियते कश्चिद्यौवनस्थस्तथापरः । स्थविराः केऽपि कौमारे म्रियन्ते वै कलौ प्रजाः ॥३५

द्वापरयुग के निःशेष होने पर उसकी सन्ध्या का काल भी जैसा ही था। द्वापर का यह धर्म गुणों से हीन प्रतिष्ठित होता है ।२९। उसी भाँति की पाद से सन्ध्या होती है। अङ्ग-ही सन्ध्या अभीष्ट हुआ करती है। द्वापर

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ १०६

के अवशेष से अब तिष्य के विषय में समझ लो ।३०। जब द्वापर युग का अंश शेष रहता है तभी कलियुग की भी प्रतिपत्ति हो जाया करती है। जो तपश्चर्या का समाचरण करने वाले हैं उनमें भी युग के प्रभाव से हिंसा—असूया—अनृत—माया और वध की भावनायें उत्पन्न हो जाती हैं ।३१। ये तिष्य (कलि) के स्वभाव हैं जिनका साधन प्रजा के जन किया करते हैं। यह ही किया गया पूर्ण धर्म है और वास्तविक जो भी धर्म है वह परिहीण हो जाया करता है ।३२। मन से-कर्म से और स्तुति से वार्त्ता सिद्ध होती है अथवा नहीं होती है। कलियुग में रोग प्रकृष्ट रूप से मारक होता है और क्षुधा तथा भय होते हैं ।३३। कलि में वृष्टि के समय पर न होने को घोर भय होता है तथा देशों का विपर्यय हो जाता है। कलियुग में लोगों में स्मृति का कोई भी प्रमाण नहीं माना जाता है। कोई तो माता के गर्भ में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, कोई युवावस्था में ही मर जाया करता है, कोई-कोई वृद्ध होकर मर जाते हैं। इस कलियुग में प्रजाजन कुमारावस्था में ही परलोक में चले जाया करते हैं ।३४-३५।

दुरिष्टैर्दु रधीतै श्च दुष्कृतैश्च दुरागमैः ।
विप्राणां कर्मदोषैस्तैः प्रजानां जायते भयम् ॥३६
हिंसा माया तथेष्र्या च क्रोधोऽसूयाक्षमा नृषु ।
तिष्ये भवन्ति जंतूना रोगा लोभश्च सर्वशः ॥३७
संक्षोभो जायतेऽत्यर्थं कलिमासाद्य वै युगम् ।
पूर्णे वर्षसहस्रे वै परमायुस्तदा नृणाम् ॥३८
नाधीयंते तदा वेदान्न यजंते द्विजातयः ।
उत्सीदंति नराश्चैव क्षत्रियाश्च विशः क्रमात् ॥३९
शूद्राणामंत्ययोनेस्तु संबंधा ब्राह्मणैः सह ।
भवंतीह कलौ तस्मिञ्छयनासनभोजनेः ॥४०
राजानः शूद्रभूयिष्ठाः पाखंडानां प्रवर्त्तकाः ।
गुणहीनाः प्रजाश्चैव तदा वै संप्रवर्त्तते ॥४१
आयुर्मेधा बलं रूपं कुलं चैव प्रणश्यति ।
शूद्राश्च ब्राह्मणाचाराः शूद्राचाराश्च ब्राह्मणाः ॥४२

११० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

बुरे मनोरथ-असद् विषयों का अध्ययन-बुरे पाप कर्म-बुरे शास्त्र और प्रजाओं के कुत्सित कर्मों के दोषों से ही भय उत्पन्न हो जाया करता है ।३६। हिंसा-माया-ईर्ष्या-क्रोध-निन्दा और अक्षमा-राग और सब प्रकार लोभ कलियुग में जन्तुओं में और मनुष्यों में होते हैं ।३७। अत्यधिक संक्षोभ कलियुग के प्राप्त होने पर समुत्पन्न हो जाता है । उस समय में मानवों की परमायु पूरे सहस्र वर्ष की होती है ।३८। उस समय में द्विजातिगण वेदों का अध्ययन नहीं किया करते हैं और न वे यजन ही किया करते हैं । सभी नर-क्षत्रिय और वैश्य क्रम से उत्पन्न हो जाया करते हैं ।३६। शूद्रों के ब्राह्मणों साथ अन्त्यजों से सम्बन्ध होते हैं और उस कलियुग में शय-आसर और भोजन का सब परस्पर में सम्बन्ध किया करते हैं ।४०। राजाओं में बहुधा शूद्र वर्ण वालों की अधिकता होती है जो कि पाखण्डों के प्रवर्त्तक ही हुआ करते हैं । उस समय में प्रजाजनों में भी गुणों की हीनता संप्रवृत होती है ।४१। न तो मानवों में मेधा होती है और न उनकी कुछ आयु ही होती है । बल-रूप और कुल सभी विनष्ट हो जाया करते हैं । जो शूद्र वर्ण वाले मानव हैं उनके आचार तो ब्राह्मणों के समान होते हैं और ब्राह्मण शूद्रों के तुल्य आचरण किया करते हैं ।४२।

राजवृत्ताः स्थिताश्चोराश्चोराचाराश्च पार्थिवाः । भृत्या एते ह्यसुभृतो युगांते समवस्थिते ॥४३

अशीलिन्योऽनृताश्चैव स्त्रियो मद्यामिषप्रियाः । मायाविन्यो भविष्यंति युगांते मुनिसत्तम ॥४४

एकपत्न्यो न शिष्यंति युगांते मुनिसत्तम । श्वापदप्रबलत्वं च गवां चैव ह्युपक्षयः ॥४५

साधूनां विनिवृत्तिश्च विद्यास्तस्मिन्युगक्षये । तदा धर्मो महोदर्को दुर्लभो दानमूलवान् ॥४६

चातुराश्रमशैथिल्यो धर्मः प्रविचरिष्यति । तदा ह्यल्पफला भूमिः क्वचिच्चापि महाफला ॥४७

न रक्षितारो भोक्तरो बलिभागस्य पार्थिवाः । युगान्ते च भविष्यंति स्वरक्षणपरायणाः ॥४८

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् । [ १११

अरक्षितारो राजानो विप्राः शूद्रोपजीविनः । शूद्राभिवादिनः सर्वे युगान्ते द्विजसत्तमाः ॥४६

चौर्यं कर्म करने वाले पुरुष राजाओं के समान आचरण वाले हैं और जो पार्थिव हैं वे चोरों के समान आचरण करने वाले हैं। इस युग के अन्त समय के उपस्थित होने पर भृत्यगण प्राणों का भरण करने वाले हैं ।४३। नारियां शील से शून्य-मिथ्याचार वाली तथा मदिरा और मांस से प्रेम करने वाली होती हैं। हे मुनि श्रेष्ठ ! इस युग के अन्त में सभी स्त्रियां माया रचने वाली होती हैं ।४४। पुरुष भी एक ही पत्नी रखने के व्रत वाले नहीं होते हैं । हे मुनिसत्तम ! युग के अन्त समय में सर्वत्र ऐसा ही दिखलाई देता है । सब जगह अन्य पशुओं की प्रबलता होती है और गौओं के कुल का क्षय होता है ।४५। उस युग के क्षय में साधुजनों की विशेष रूप से निवृत्ति होती है। ऐसा ही जान लेना चाहिए। उस समय में अपने आपको बहुत ऊंचा उठाना ही धर्म है और दान के मूल वाला धर्म परम दुर्लभ होता है ।४६। ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य-वानप्रस्थ और संस्थान—इन चारों आश्रमों की शिथिलता वाला धर्म ही सब जगह चलेगा । उस समय में भूमि भी अल्प फल देने वाली होती है और कहीं पर महान् फल वाली होगी ।४७। राजा लोग केवल अपनी बलि का भोग करने वाले होंगे और प्रजा की रक्षा करने वाले नहीं होंगे । और युग के अन्त में ये नृपगण अपनी ही रक्षा करने में तत्पर रहा करेंगे । राजा लोग संरक्षण नहीं करने वाले और विप्रगण शूद्रों से उपजीविका चलाने वाले हो जायेंगे । और युग के अन्त में श्रेष्ठ द्विजगण भी शूद्रों के अभिवादन करने वाले हो जायेंगे ।४८-४६।

अट्टशूला जनपदाः शिवशूला द्विजास्तथा ।
प्रमदाः केशशूलाश्च युगान्ते समुपस्थिते ॥५०
तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजोत्तमाः ।
यतयश्च भविष्यंति बहवोऽस्मिन्कलौ युगे ॥५१
चित्रवर्षी यदा देवस्तदा प्राहुर्युगक्षयम् ।
सर्वे वाणिजकाश्चापि भविष्यन्त्यधमे युगे ॥५२
भूयिष्ठं कूटमानैश्च पण्यं विक्रीणते जनाः ।
कुशीलचर्यापाखंडैर्व्याधिरूपैः समावृतम् ॥५३