बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
त्रयोविंशोऽध्यायः १५५ परान्नलोलुपं चैवं परस्त्रीनिरतं तथा । व्रतोपवासनिरतो वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥२८॥ इत्येवमादिभिः शुद्धो वशी सर्वहिते रतः । उपवासपरो भूत्वा परां सिद्धिमवाप्नुयात् ॥२९॥ नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरुः । नास्ति विष्णुसमं दैवं तपो नानशनात्परम् ॥३०॥ नास्ति क्षमासमा माता नास्ति कीर्तिसमं धनम् । नास्ति ज्ञानसमो लाभो न च धर्मसमः पिता ॥३१॥ न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्याः परं व्रतम् । अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् ॥३२॥ संवादं भद्रशीलस्य तत्पितुर्गलवस्य च । पुरा हि गालवो नाम मुनिः सत्यपरायणः ॥३३॥ उवास नर्मदातीरे शान्तो दान्तस्तपोनिधिः । बहुवृक्षसमाकीर्णे गजभल्लूकनिषेविते ॥३४॥ सिद्धचारणगन्धर्वयक्षविद्याधरान्विते । कन्दमूलफलैः पूर्ण मुनिवृन्दनिषेविते ॥३५॥ गालवो नाम विप्रेन्द्रो निवासमकरोच्चिरम् । तस्याभवद्भद्रशील इति ख्यातः सुतो वशी ॥३६॥ जातिस्मरो महाभागो नारायणपरायणः । बालकीडनकालेऽपि भद्रशीलो महामतिः ॥३७॥ मृदा च विष्णोः प्रतिमां कृत्वा पूजयते क्षणम् । वयस्यान्योधयेच्चापि विष्णुः पूज्यो नरैः सदा ॥३८॥ एकादशीव्रतं चैव कर्तव्यमपि पण्डितैः । एवं ते बोधितास्तेन शिशवोऽपि मुनीश्वर ॥३९॥ हरिं मृदेव निर्माय पृथक्संभूय वा मुदा । अर्चयन्ति महाभागा विष्णुभक्तिपरायणाः ॥४०॥ नमस्कुर्वन्भद्रमतिः विष्णवे सर्वविष्णवे । सर्वेषां जगतां स्वस्ति भूयादित्यब्रवीदिदम् ॥४१॥ क्रीडाकाले मुहूर्त्तं वा मुहूर्ताद्धमथापि वा । एकादशीति संकल्प्य व्रतं यच्छति केशवे ॥४२॥ एवं सुचरितं दृष्ट्वा तनयं गालवो मुनिः । अपृच्छद्विस्मयाविष्टः समालिङ्ग्य तपोनिधिः ॥४३॥
परस्त्रीगामी की चर्चा भी न चलावे । इन नियमों का पालन करने वाला, शुद्ध, जितेन्द्रिय और सब प्राणियों की भलाई करने वाला व्रती उपवासपरायण होकर परम सिद्धि को प्राप्त करता है ॥२८-२९॥ गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, माता के समान कोई गुरु नहीं, विष्णु के समान कोई देवता नहीं और उपवास से बढ़कर कोई तपस्या नहीं है । क्षमा के समान माता नहीं और कीर्ति के समान धन नहीं है। इसी प्रकार विवेक के समान कोई बन्धु नहीं और एकादशी से बढ़कर कोई व्रत नहीं है । इस व्रत के विषय में एक पुरातन इतिहास, जो भद्रशील और उनके पिता गालव के संवाद के रूप में है, सुना रहा हूँ ॥३०-३२॥ प्राचीन काल में गालव नाम के एक सत्यवादी मुनि थे । वे शान्त, दान्त और तपोनिधि मुनि नर्मदा तट पर एक घने वन में रहते थे । जंगली हाथो और भालुओं से भरा वह वन सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष और विद्याधरों का क्रीड़ा स्थल था ॥३३-३४॥ कंद, मूल और फलों से परिपूर्ण और मुनियों से सुशोभित उस वन में वे विप्रशिरोमणि गालव चिरकाल तक निवास करते रहे । उनको भद्रशील नामक एक संयमी पुत्र उत्पन्न हुआ । वह नारायण का भक्त, महासौभाग्यशाली और अपने पूर्वजन्म की घटनाओं का ज्ञाता था । वह महामति भद्रशील बालकों के साथ खेलने के समय भी विष्णु की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर कुछ देर तक पूजा करता था और अपने साथियों को समझाता था कि मनुष्य को विष्णु की सर्वदा पूजा करनी चाहिए ॥३५-३८॥ ज्ञानी को भी एकादशी व्रत करना चाहिए । मुनीश्वर ! इस प्रकार उसके द्वारा उपदेश पाये हुए वे भाग्यशाली बालक भी मिलजुलकर या अलग प्रेमपूर्वक मिट्टी की विष्णु-प्रतिमा बनाते थे और विष्णुभक्तिपरायण होकर भगवान् की पूजा करते थे । सबके रक्षक विष्णु को नमस्कार करते समय वह भद्रमति 'सारे विश्व का कल्याण हो' यही कहता था । क्रीड़ा के समय क्षणभर या आधे क्षण तक एकादशी व्रत का संकल्प कर भगवान् को अर्पण करता था । मुनि गालव पुत्र के शुभ चरित्र को देखकर आश्चर्यचकित हो गए । उस तपोनिधि ने पुत्र को छाती से लगाकर पूछा ॥३९-४३॥
१५६ नारदीयपुराणम् गालव उवाच भद्रशील महाभाग भद्रशीलोऽसि सुव्रत । चरितं मंगलं यत्ते योगिनामपि दुर्लभम् ॥४४॥ हरिपूजापरो नित्यं सर्वभूतहितेरतः । एकादशीव्रतपरो निषिद्धाचारवर्जितः ॥४५॥ निर्द्वन्द्वो निर्ममः शान्तो हरिध्यानपरायणः ॥४५॥ एवमेतादृशी बुद्धिः कथं जातार्भकस्य ते । विनापि महतां सेवां हरिभक्तिर्हि दुर्लभा ॥४६॥ स्वभावतो जनस्यास्य ह्यविद्याकामकर्मसु । प्रवर्त्तते मतिर्वत्स कथं तेऽलौकिकी कृतिः ॥४७॥ सत्सङ्गेऽपि मनुष्याणां पूर्वपुण्यातिरेकतः । जायते भगवद्भक्तिस्तदहं विस्मयं गतः ॥४८॥ पृच्छामि प्रीतिमापन्नस्तद्भवान्वक्तुमर्हसि । भद्रशीलो मुनिश्रेष्ठः पित्रैवं सुविकल्पितैः ॥४६॥ जातिस्मरः सुकृतात्मा हृष्टप्रहसिताननः । स्वानुभूतं यथावृत्तं सर्वं पित्रे न्यवेदयत् ॥५०॥ भद्रशील उवाच शृणु तात मुनिश्रेष्ठ ह्यनुभूतं मया पुरा । जातिस्मरत्वाज्जानामि यमेन परिभावितम् ॥५१॥ एतच्छ्रुत्वा महाभागो गालवो विस्मयान्वितः । उवाच प्रीतिमापन्नो भद्रशीलं महामतिम् ॥५२॥ गालव उवाच कस्त्वं पूर्वं महाभाग किमुक्तं च यमेन ते । कस्य वा केन वा हेतोस्तत्सर्वं वक्तुमर्हसि ॥५३॥ गालव बोले--भद्रशील ! महाभाग ! सुव्रत ! तुम सचमुच भद्रशील हो, क्योंकि तुम्हारा शुभ चरित्र योगियों के लिए भी दुर्लभ है । तुम नित्य हरि की पूजा करते, सब प्राणियों के हित में लगे रहते, एकादशी व्रत करते और निषिद्ध कर्मों से सदा दूर रहते हो । तुम शान्त, निर्मम, निर्द्वन्द्व और भगवान् के ध्यान में मग्न रहते हो । तुम बालक की ऐसी बुद्धि कैसे हो गई ? बिना महात्माओं की सेवा के हरि-भक्ति दुर्लभ है ॥४४-४६॥ स्वभावतः मनुष्यों की बुद्धि अविद्या, काम आदि दुष्कर्मों की ओर ही झुकती है, परन्तु वत्स ! तुममें यह अलौकिक क्रियाशीलता कैसे आई ? सत्संगति में भी पूर्वजन्म के पुण्यों की अधिकता से ही भगवद्भक्ति प्राप्त होती है, परन्तु तुम्हारे सदाचार को तो देखकर मैं आश्चर्यचकित हूँ । मैं अत्यन्त प्रसन्न होकर पूछ रहा हूँ, तुम अवश्य मुझसे कहो ॥४७-४८॥ मुनिश्रेष्ठ भद्रशील पिता के इस प्रकार के शुभ विकल्पों को सुनकर प्रसन्न हो गया । सुकृतशील, पूर्व जन्म का ज्ञान रखने वाले उस बालक ने अपने पूर्वानुभूत रहस्यों को यथावत् रूप से पिता से कह दिया ॥४६॥ भद्रशील बोला--'तात ! मुनिश्रेष्ठ ! मुझे पूर्वकाल की जो अनुभूति है, उसको सुनो । मैं जातिस्मर१ होने के कारण उन सब बातों को जानता हूँ जिनको यम ने कहा था । महाभाग्यशाली गालव इतनी बातें सुनकर विस्मित हो गए और प्रसन्न हो महामति भद्रशील से बोले ॥५०-५२॥ महाभाग ! तुम पूर्व जन्म में कौन थे ? यम ने क्यों किसलिए और क्या कहा ? इसको पूर्णरूप से मुझसे कहो ॥५३॥ १--पूर्व जन्म का ज्ञान रखने वाला ।
१५७ त्रयोविंशोऽध्यायः भद्रशील उवाच अहमासं पुरा तात राजा सोमकुलोद्भवः । धर्मकीर्तिरिति ख्यातो दत्तात्रेयेण शासितः ॥५४॥ नव वर्षसहस्राणि महीं कृत्स्नामपालयन् । अधर्माश्च तथा धर्मा मया तु बहवः कृताः ॥५५॥ ततः श्रिया प्रमत्तोऽहं बहुधर्ममकारिषम् । पाषण्डजनसंसर्गात्पाषण्डचरितोऽभवम् ॥५६॥ पुराजितानि पुण्यानि मया तु सुबहून्यपि । पाषण्डैर्बाधितोऽहं तु वेदमार्गं समत्यजम् ॥५७॥ मखाश्च सर्वे विध्वस्ता कूटयुक्तिविदा मया । अधर्मनिरतं मां तु दृष्ट्वा मद्देशजाः प्रजाः ॥५८॥ सदैव दुष्कृतं चक्रुः षष्ठांशस्तत्र मेऽभवत् । एवं पापसमाचारो व्यसनाभिरतः सदा ॥५९॥ मृगयाभिरतो भूत्वा ह्येकदा प्राविशं वनम् । ससैन्योऽहं वने तत्र हत्वा बहुविधान्मृगान् ॥६०॥ क्षुत्तृट्परिवृतः श्रांतो रेवातीरमुपागमम् । रवितीक्ष्णातपक्लांता रेवायां स्नानमाचरम् ॥६१॥ अदृष्टसैन्य एकाकी पीड्यमानः क्षुधा भृशम् ॥६२॥ समेतास्तत्र ये केचिद्रेवातीरनिवासिनः । एकादशीव्रतपरा मया दृष्टा निशामुखे ॥६३॥ निराहारश्च तत्राहमेकाकी तज्जनैः सह । जागरं कृतवांश्चापि सेनया रहितो निशि ॥६४॥ अध्वश्रमपरिश्रांतः क्षुत्पिपासाप्रपीडितः । तत्रैव जागरन्तेऽहं तात पंचत्वमागतः ॥६५॥ ततो यमभटैर्बद्धो महादंष्ट्राभयंकरैः । अनेकक्लेशसंपन्नमार्गेणाप्तो यमांतिकम् । दंष्ट्राकरालवदनमपश्यं समवर्तिनम् ॥६६॥ अथ कालश्चित्रगुप्तमाहूयेदमभाषत । अस्य शिक्षाविधानं च यथावद्वद पंडित ॥६७॥ एवमुक्तश्चित्रगुप्तो धर्मराजेन सत्तम । चिरं विचारयामास पुनश्चेदमभाषत ॥६८॥ भद्रशील बोला--तात ! मैं पहले सोमवंशीय राजा था । धर्मकीर्ति मेरा नाम और दत्तात्रेय द्वारा मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ था । मैंने नौ हजार वर्ष तक इस सम्पूर्ण भूमण्डल का शासन किया । इस बीच बहुत से धर्म और अधर्म भी किये । पाखण्डी जनों की कुसंगति में पड़कर स्वयं मैं पाखण्डी बन गया ॥५४-५६॥ यद्यपि मैंने पूर्व जन्म में बहुत से पुण्य किये थे, तथापि पाखण्ड से विवश होकर वेदमार्ग का त्याग कर दिया । कूटनीति के सहारे मैंने सारे यज्ञों को ध्वस्त कर दिया । मुझको पापकर्म करते देखकर मेरी प्रजा भी सर्वदा दुष्कर्म ही करती रही, जिसका छठा भाग मुझको मिला । इस प्रकार पापाचरण में लीन रहने वाला, व्यसनशील मैं एक दिन आखेट खेलने के लिए वन में गया । सैनिकों के सहित मैंने उस वन में बहुविध पशुओं का वध किया ॥५७-६०॥ भूख प्यास से व्याकुल और थका हुआ मैं रेवा (नर्मदा) के तीर पर पहुँचा । उस समय सूर्य के असह्य ताप से मेरा शरीर झुलस गया था । अकेला ही रेवा में नहाकर सैनिकों के दृष्टि-पथ से दूर चला गया । मैं भूख से उस समय अत्यन्त पीड़ित था । सायंकाल देखा कि नर्मदा तीर निवासी सभी एकादशी व्रत कर रहे हैं। मैं भी उन्हीं लोगों के साथ रात्रि में अकेला ही निराहार रह गया और जागरण भी करता रहा । मेरे सैनिक तो पीछे ही छूट गये थे ॥६१-६४॥ तात ! रास्ता चलते-चलते थक जाने, भूखप्यास से पीड़ित होने के कारण जागरण के बाद वहीं मेरी मृत्यु हो गई । तदनन्तर महाभयङ्कर दांतों वाले यमदूतों ने मुझे बांधा और अनेक कष्टों से युक्त मार्ग से यमराज के समीप ले आये । वहाँ मैंने भयङ्कर दांत और मुख वाले, समीप में बैठे हुए अनेक समान आकार वाले यमदूतों से घिरे हुए यमराज को देखा । यमराज ने चित्रगुप्त को बुलाकर कहा । पंडित ! इसके किये कर्मों का लेखा यथार्थ रूप से प्रस्तुत करो ॥६५-६७॥ सज्जनाग्रणी ! धर्मराज की इस प्रकार की आज्ञा पाकर चित्रगुप्त बहुत देर तक सोचता रहा । अन्त में उसने कहा
१५८ नारदीयपुराणम् असौ पापरतः सत्यं तथापि शृणु धर्मप । एकादश्यां निराहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥६९॥ एष रेवातटे रम्ये निराहरो हरेदिने । जागरं चोपवासं च कृत्वा निष्पापतां गतः ॥७०॥ यानि कानि च पापानि कृतानि सुबहूनि च । तानि सर्वाणि नष्टानि ह्युपवासप्रभावतः ॥७१॥ एवमुक्तो धर्मराजश्चित्रगुप्तेन धीमता । ननाम दंडवद् भूमौ ममाग्रे सोऽनुकंपितः ॥७२॥ धर्मराज उवाच पूजयामास मां तत्र भक्तिभावेन धर्मराट् । ततश्च स्वभटाःसर्वान्नाहूयेदमुवाच ह ॥७३॥ शृणुध्वं मद्बचो दूता हितं वक्ष्याम्यनुत्तमम् । धर्ममार्ग रतान्मर्त्यान्मानयध्वं ममान्तिकम् ॥७४॥ ये विष्णुपूजनरताः प्रयताः कृतज्ञाश्चैकादशीव्रतपरा विजितेन्द्रियाश्च । नारायणाच्युतहरे शरणं भवेति शान्ता वदन्ति सततं तरसा त्यजध्वम् ॥७५॥ नारःयणाच्युत जनार्दन कृष्ण विष्णो पद्मेश पद्मजपितः शिव शंकरेति । नित्यं वदन्त्यखिललोकहिताः प्रशान्ता दूराद्भटास्त्यजत तान्न ममैष शिक्षा ॥७६॥ नारायर्णापितकृतान्हरिभक्तिभाजः स्वाचारमार्गनिरतान् गुरुसेवकांश्च । सत्पात्रदाननिरतांश्च सुदीनपालान्दूतास्त्यजध्वमनिशं हरिनामसक्तान् ॥७७॥ पाखंडसङ्गरहितान्द्विजभक्तिनिष्ठान्सत्संगलोलुपतरांश्च तथातिथेयान् । शंभौ हरौ च समबुद्धिमतरतयैवत्तांस्त्यजध्वमुपकारपराञ्जनानाम् ॥७८॥ ये वर्जिता हरिकथामृतसेवनैश्च नारायणस्मृतिपरायणमानसैश्च । विप्रेन्द्रपादजलसेचनतोऽप्रहृष्टांस्तान्पापिनो मम भटा गृह्मानयध्वम् ॥७९॥ यद्यपि यह पापी है तथापि धर्मराज ! सुनिए । एकादशी के दिन निराहार रहने से मनुष्य सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है । यह तो नर्मदा तट पर एकादशी के दिन निराहार रहा, रात्रि में जागरण करने और उपवास करने से यह तो निष्पाप हो गया । इसने जो अत्यधिक पाप किये थे वे तो व्रत के प्रभाव से नष्ट हो गये । धीमान् चित्रगुप्त के इस प्रकार कहने पर धर्मराज ने बड़ी कृपा की और मेरे सामने ही दण्डवत् प्रणाम किया । धर्मराज ने भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की और अपने अनुचरों को बुलाकर कहा ॥६८-७२॥ धर्मराज बोले-दूतो ! मेरी बातें सुनो, मैं तुम लोगों के हित की उत्तम बातें कह रहा हूँ । धर्म मार्ग में निरत रहने वाले मनुष्यों को मेरे समीप मत लाओ । सम्पूर्ण लोक का हित चाहने वाले उन शान्त महापुरुषों को जो प्रतिदिन नारायण ! अच्युत ! जनार्दन ! कृष्ण ! विष्णु ! पद्मेश ! शिव ! शंकर ! आदि कहा करते हैं उनको दूर से ही प्रणाम करो और उनको मेरे पास न ले आओ यही मेरी इन लोगों के विषय में शिक्षा है ॥७३-७६॥ नारायण को ही अपना सब कुछ अर्पित करने वाले, भगवद्भक्ति के प्रेमी, अपने कुलाचार का पालन करने वाले, गुरुसेवक, सत्पात्र को दान देने वाले, दीनों का पालन करने वाले और हरिनाम स्मरण करने वाले सज्जनों को सर्वदा छोड़ दो । दूतो ! उसी प्रकार पाखण्डियों की संगति न करने वालों, ब्राह्मण-भक्तों, सत्संगति-प्रेमियों, अतिथि-सेवकों, शम्भु और विष्णु में समान भाव रखने वालों और उपकार-परायण जनों को भी छोड़ दिया करो । मेरे सेवको ! जो भगवत्कथा रूपी अमृत के पान से अपने को दूर रखते, नारायण के स्मरण में दिन रात लगे रहने वालों से दूर रहते और जो विप्रेन्द्रों के चरणोदक के अभिषेक से प्रसन्न नहीं होते उन पापियों को ही मेरे यहाँ
१५६ त्रयोविंशोऽध्यायः ये मातृतातपरिभर्त्सनशीलिनश्च लोकद्विषो हितजनाहितकर्मणश्च । देवस्वलोभनिरताज्जननाशकृत् न्त्रानयध्वमपराघपरांश्च दूताः ॥८०॥ एकादशीव्रतपराङ्मुखमुग्रशीलं लोकापवादिनिरतं परनिंदकं च । ग्रामस्य नाशकरमुत्तमवैरयुक्तं दूताः समानयत विप्रधनेषु लुब्धम् ॥८१॥ ये विष्णुभक्तिविमुखाः प्रणमंति नैव नारायणं हि शरणागतपालकं च । विष्णुवाल्यं च नहि यांति नराः सुमूर्खास्तानयध्वमतिपापरतान्प्रसह्य ॥८२॥ एवं श्रुतं यदा तत्र यमेन परिभाषितम् । मयानुतापद्ग्धेन स्मृतं तत्कर्म निंदितम् ॥८३॥ असत्कर्मानुतापेन सद्धर्मश्रवणेन च । तत्रैव सर्वपापानि निःशेषाणि गतानि मे ॥८४॥ पापशेषाद्विनिर्मुक्तं हरिसारूप्यतां गतम् । सहस्रसूर्यसंकाशं प्रणनाम यमश्च तम् ॥८५॥ एवं दृष्ट्वा विस्मितास्ते यमदूता भयोत्कटाः । विश्वासं परमं चक्रुर्यमेन परिभाषिते ॥८६॥ ततः संपूज्य मां कालो विमानशतसंकुलम् । सद्यः संप्रेषयामास तद्विष्णोः परमं पदम् ॥८७॥ विमानकोटिभिः सार्द्धं सर्वभोगसमन्वितैः । कर्मणा तेन विप्रर्षे विष्णुलोके मयोवितम् ॥८८॥ कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च । स्थित्वा विष्णुपदं पश्चादिंद्रलोकमुपागमम् ॥८६॥ तत्रापि सर्वभोगाढ्यः सर्वदेवनमस्कृतः । तावत्कालं दिवि स्थित्वा ततो भूमिमुपागतः ॥६०॥ अत्रापि विष्णुभक्तानां जातोऽहं भवतां कुले । जातिस्मरत्वाज्जानामि सर्वमेतन्मुनीश्वर ॥६१॥ तस्माद्विष्ण्वर्चनोद्योगं करोमि सह बालकैः । एकादशीव्रतमिदमिति न ज्ञातवान्पुरा ॥६२॥ लाओ ॥७७-७६॥ दूतो ! जो माता-पिता को झिड़कियाँ सुनाते, जो लोकद्वेषी, शुभचिन्तकों का अहित करने वाले, देव-धन का अपहरण करने वाले, अपराधी और जनता की हत्या करने वाले पापी हैं उनको यहाँ लाओ। दूतो ! एकादशी व्रत न करने वाले, उग्रस्वभाव, मेरे-निन्दक, लोकापवाद-प्रेमी, ग्राम हित को हानि पहुँचाने वाले, ब्राह्मणों की सम्पत्ति हड़प जाने वाले और कट्टर शत्रुता करने वाले को यहाँ लाओ ॥८०-८१॥ जो विष्णु- भक्ति से विमुख रहते और शरणागत-पालक नारायण को प्रणाम नहीं करते अथवा जो महामूर्ख और हरि-मन्दिर में नहीं जाते उन घोर पापियों को हठपूर्वक यहाँ लाओ । जिस समय वहाँ यम की कही हुई इन बातों को सुना मेरा हृदय पश्चात्ताप की ज्वाला से जल उठा, अपने किये हुये निन्दित कर्मों का स्मरण करके दुःखी हो गया ॥८२-८३॥ असत्कर्मों के लिये पश्चात्ताप करने और धर्म की उत्तमोत्तम बातें सुनने से वहीं मेरे सम्पूर्ण पाप निःशेष हो गए । अशेष पापों के नष्ट हो जाने से मुझे हरि का सारूप्य प्राप्त हो गया । यमराज ने सहस्र सूर्य के समान तेजोमय उस रूप को देखकर प्रणाम किया । यह देखकर वे भयंकर यमदूत विस्मित हो गए । उनको यम की बातों पर पूर्णरूप से विश्वास हो गया । तदनन्तर यम ने मेरी पूजा की और तत्काल सैकड़ों देव विमानों के साथ मुझे विष्णु के परम पद को भेज दिया ।॥८४-८७॥ विप्रर्षि ! उस सत्कर्म के प्रभाव से करोड़ों देव-विमानों और सब प्रकार के भोगों का उपभोग करता हुआ वहाँ रहने लगा । असंख्य कल्पों तक उस विष्णु लोक में निवास करने के बाद इन्द्रलोक में आया । वहाँ भी उतने ही कल्पों तक सब देवताओं की श्रद्धा का पात्र बनकर मैंने सम्पूर्ण दिव्य भोगों का उपभोग किया । तत्पश्चात् मैं इस पृथ्वी पर आया । यहाँ भी आप के समान विष्णु भक्त के कुल में ही उत्पन्न हुआ । मुनीश्वर ! जातिस्मर होने के कारण ही मैं इन बातों को जानता हूँ ॥८८-९१॥ इसलिए मैं बालकों के साथ विष्णु-पूजा के लिये प्रयत्न किया करता हूँ । पहले इस एकादशी व्रत की उत्कृष्टता को नहीं जानता था; परन्तु इस समय पूर्वजन्म के ज्ञान के
१६० नारदीयपुराणम् जातिस्मृतिप्रभावेण तज्ज्ञातं सांप्रतं मया । अत्र स्वेनापि यत्कर्म कृतं तस्य फलं त्विदम् ॥६३॥ एकादशीव्रतं भक्त्या कुर्वतां किमुत प्रभो । तस्माच्चरिष्ये विप्रेन्द्र शुभमेकादशीव्रतम् ॥६४॥ विष्णुपूजां चाहरहः परमस्थानकांक्षया । एकादशीव्रतं यत्तु कुर्वंति श्रद्धया नराः ॥६५॥ तेषां तु विष्णुभवनं परमानंददायकम् । एवं पुत्रवचः श्रुत्वा संतुष्टो गालवो मुनिः ॥६६॥ अवाप परमां तुष्टिं मनसा चातिहर्षितः । मज्जन्म सफलं जातं मद्द्वंशः पावनीकृतः ॥६७॥ यतस्त्वं मद्गृहे जातो विष्णुभक्तिपरायणः । इति संतुष्टचित्तस्तु तस्य पुत्रस्य कर्मणा ॥६८॥ हरिपूजाविधानं च यथावत्समबोधयत् । इत्येतत्ते मुनिश्रेष्ठ यथावत्कथितं मया । संकोचविस्तराभ्यां च किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥६९॥ इति श्रीबृहन्नारदीये पुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने ॥२३॥ एकादशीव्रतमहिमानुवर्णनंनाम त्रयोविंशोऽध्यायः
प्रभाव से सब कुछ जान लिया है। यहाँ अनिच्छया जो कुछ किया उसका यह फल मिला । प्रभो ! तो भक्तिपूर्वक एकादशी व्रत करने वाले को कितना फल मिलता होगा । विप्रेन्द्र ! इसीलिए इस शुभ एकादशी व्रत को मैं करता हूँ । श्रद्धा पूर्वक जो मनुष्य परम पद पाने की अभिलाषा से प्रतिदिन विष्णु की पूजा करते और एकादशी व्रत को करते हैं, उनको अवश्य परमानन्ददायक विष्णु-पद प्राप्त होता है ॥६२-६५॥ पुत्र की इन बातों को सुनकर मुनि गालव सन्तुष्ट हो गये । उनको परमानन्द प्राप्त हो गया । वे अन्तः- करण से अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले— मेरा जन्म सफल हो गया, मेरा वंश पवित्र हो गया क्योंकि तुम्हारे समान विष्णु भक्त मेरे घर में उत्पन्न हो गया है । उस पुत्र के कर्त्तव्यों से प्रसन्न होकर उन्होंने पूर्णरूप से हरि-पूजन की विधि बता दी । मुनिश्रेष्ठ ! ये सारी बातें तुमसे संक्षेप और विस्तार से भी ज्यों की त्यों कह दी । अब और क्या सुनना चाहते हो ॥६६-६९॥ श्रीनारदीयमहापुराण में एकादशीव्रतकथन नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३॥
चतुर्विंशोऽध्यायः सूत उवाच एतन्निशम्य सनकोदितमप्रमेयं पुण्यं हरेर्दिनभवं निखिलोत्त मं च । पापौघशांतिकरणं व्रतसारमेवं ब्रह्मात्मजः पुनरभाषत हर्षयुक्तः ॥१॥ नारद उवाच कथितं भवता सर्वं मुने तत्त्वार्थकोविद । व्रताख्यानं महापुण्यं यथावद्धरिभक्तिदम् ॥२॥ इदानीं श्रोतुमिच्छामि वर्णाचारविधिं मुने । तथा सर्वाश्रमाचारं प्रायश्चित्तविधिं तथा ॥३॥ एतत्सर्वं महाभाग सर्वतत्त्वार्थकोविद । कृपया परया मह्यं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥४॥ सनक उवाच शृणुष्व मुनिशार्दूल यथा भक्तप्रियंकरः । वर्णाश्रमाचारपरैः पूज्यते हरिरव्ययः ॥५॥ मन्वाद्यैरुदितं यच्च वर्णाश्रमनिबंधनम् । तत्ते वक्ष्यामि विधिवद्भक्तोऽसि त्वमधोक्षजे ॥६॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चत्वार एव ते । वर्णा इति समाख्याता एतेषु ब्राह्मणोऽधिकः ॥७॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या द्विजाः प्रोक्तास्त्रयस्तथा । मातृतश्चोपनयनाद्द्विजत्वं प्राप्यते त्रिभिः ॥८॥ एतैर्वर्णैः सर्वधर्माः कार्या वर्णानुरूपतः । स्ववर्णधर्मत्यागेन पाखंडः प्रोच्यते बुधैः ॥६॥ स्वगृह्याचोदितं कर्म द्विजः कुर्वन्कृती भवेत् । अन्यथा पतितो भूयात्सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥१०॥ अध्याय २४ ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि के सदाचार-वर्णन सूत बोले- सनक जी ने पाप-समूहों को नष्ट करने वाले, सम्पूर्ण व्रतों के सारभूत एकादशी व्रत के परमोत्तम असंख्य पुण्यों को कहा। ब्रह्मा के पुत्र नारद जी इस रहस्य को सुनकर आनन्दित होकर फिर पूछने लगे ॥१॥ नारद बोले- मुनिवर ! तत्त्वार्थ के ज्ञाता ! आपने अत्यन्त पुण्यदायक हरिभक्ति प्रदान करने वाले व्रता- ख्यान को पूर्ण रूप से कह दिया । मुने ! अब मैं वर्ण-धर्म, सब आश्रमों के आचार और प्रायश्चित्त विधि को सुनना चाहता हूँ । महाभाग ! सब रहस्यों के ज्ञाता ! आप अत्यन्त कृपा करके इन सब तत्त्वों को यथार्थ रूप से मुझसे कहिए ॥२-४॥ सनक बोले- मुनिवर ! सुनो। वर्ण और आश्रम के आचारों का पालन करने वाले सज्जन जिस विधि से भक्तों के प्रिय कार्य करने वाले, अव्यय, हरि की पूजा करते हैं और मनु आदि धर्माचार्यों ने वर्णाश्रम धर्म के जिन नियमों को बनाया है उनको विधिपूर्वक कह रहा हूँ, सुनो; क्योंकि तुम भगवान् हरि के भक्त हो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण कहे गये हैं। इनमें ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन द्विज कहे जाते हैं। इन तीनों ने मातृजन्म और उपनयन के कारण द्विजत्व प्राप्त किया है। इन वर्णों के लोगों को अपने वर्णों के अनुरूप सब धर्मों का पालन करना चाहिए। बुधजन अपने वर्णानुकूल धर्म के त्याग को 'पाखण्ड' कहते हैं ॥५-९॥ अपने गृह्यसूत्रों के अनुसार कर्म को करने वाला द्विज कृती होता है, अन्यथा वह अपने धर्मों से २१-नार०
१६२ नारदीयपुराणम् युगधर्मः परिग्राह्यो वर्णैरेतैर्यथोचितम् । देशाचारास्तथाग्राह्याः स्मृतिधर्माविरोधतः ॥११॥ कर्मणा मनसा वाचा यत्नाद्धर्मं समाचरेत् । अस्वर्ग्यं लोक विद्विष्टं धर्म्यमप्याचरेन्न तु ॥१२॥ समुद्रयात्रास्वीकारः कमंडलुविधारणम् । द्विजानामसवर्णासु कन्या सूपयमस्तथा ॥१३॥ देवराच्च सुतोत्पत्तिमधुपर्के पशोर्वधः । मांसादनं तथा श्राद्धे वानप्रस्थाश्रमस्तथा ॥१४॥ दत्ताक्षतायाः कन्यायाः पुनर्दानं वराय च । नैष्ठिकं ब्रह्मचर्यं च नरमेधाश्वमेधकौ ॥१५॥ महाप्रस्थानगमनं गोमेधश्च तथा मखः । एतान्धर्मान्कलियुगे वर्ज्यानाहुर्मनीषिणः ॥१६॥ देशाचाराः परिग्राह्यास्तत्तद्देशगतैर्नरैः । अन्यथा पतितो ज्ञेयः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥१७॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च द्विजोत्तम । क्रियाः सामान्यतो वक्ष्ये तच्छृणुष्व समाहितः ॥१८॥ दानं दद्याद्ब्राह्मणेभ्यस्तथा यज्ञैर्यजेत्सुरान् । वृत्त्यर्थं याचयेच्चैव अन्यानध्यापयेत्तथा ॥१९॥ याजयेद्यजने योग्यान्विप्रो नित्योदकी भवेत् । कुर्याच्च वेदग्रहणं तथाग्नेश्च परिग्रहम् ॥२०॥ ग्राह्ये द्रव्ये च पारक्ये समबुद्धिर्भवेत्तथा । सर्वलोकहितं कुर्यान्मृदुवाक्यमुदीरयेत् ॥२१॥ ऋतावभिगमः पत्न्यां शस्यते ब्राह्मणस्य वै । न कस्याप्यहितं ब्रूयाद्विष्णुपूजापरो भवेत् ॥२२॥ दद्याद्दानानि विप्रेभ्यः क्षत्रियोऽपि द्विजोत्तम । कुर्याच्च वेदग्रहणं यज्ञैर्देवान्यजेत्तथा ॥२३॥ शस्त्राजीवी भवेच्चैव पालयेद्धर्मतो महीम् । दुष्टानां शासनं कुर्याच्छिष्टानां पालनं तथा ॥२४॥ पाशुपाल्यं च वाणिज्यं कृषिश्च द्विजसत्तम । वेदस्याध्ययनं चैव वैश्यस्यापि प्रकीर्तितम् ॥२५॥ कुर्याच्च दारग्रहणं धर्मांश्चैव समाचरेत् । क्रयविक्रयजैर्वापि धनैः कारुक्रियोद्भवैः ॥२६॥ दद्याद्दानानि शूद्रोऽपि पाकयज्ञैर्यजेन्न च । ब्राह्मणक्षत्रियविशां शुश्रूषानिरतो भवेत् ॥२७॥ बहिष्कृत होकर पतित हो जाता है। इन द्विजों को उचित रूप से अपने युगधर्मों का आचरण करना चाहिए और स्मृतियों के अनुकूल ही देशाचार को अपनाना चाहिए। मन, वचन और कर्म से यत्न पूर्वक धर्म का आचरण करना चाहिए। लोक-विरुद्ध और स्वर्ग प्राप्ति में सहायता न पहुँचाने वाले कर्मों को, चाहे वह धर्मसंगत ही क्यों न हो, नहीं करना चाहिए ॥१०-१२॥ मनीषियों ने कलियुग में समुद्र-यात्रा करना, संन्यास ग्रहण करना, असवर्ण कन्याओं के साथ द्विजों का विवाह, देवर से पुत्र उत्पन्न करना, मधुपर्क में पशुओं का वध, श्राद्ध में मांस-भोजन, वानप्रस्थाश्रम, एक बार की दी हुई अक्षत कन्या का पुनर्विवाह, नैष्ठिक ब्रह्मचर्य, नरमेध, अश्वमेध, महाप्रस्थानगमन (सती प्रथा) गोमेध-यज्ञ, इन धर्मों को कलियुग के लिए निषिद्ध कहा है। तत्तद्देशीय मनुष्यों को उन देशों के आचारों को ही अपनाना चाहिए, अन्यथा वह सब धर्मों से बहिष्कृत होकर पतित समझा जाता है ॥१३-१७॥ द्विजोत्तम ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्मों का सामान्य रूप से वर्णन कर रहा हूँ, उसको सावधान होकर सुनो। दान ब्राह्मणों को ही देना चाहिए और यज्ञों द्वारा देवताओं की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण जीविका के लिए याचना करे और दूसरों को पढ़ावे। ब्राह्मण यज्ञाधिकारी जनों को यज्ञ करावे और सर्वदा सन्ध्यार्पण आदि करे। वेदाध्ययन और अग्न्याधान अवश्य करे ॥१८-२०॥ ग्राह्य द्रव्य और पराये द्रव्य में समान भाव रखे। लोक हित में सर्वदा लीन रहे और प्रिय भाषण करे। ब्राह्मण का ऋतुकाल में स्वस्त्रीगमन प्रशंसनीय है। किसी के अहित की बात न सोचे, न तो बोले ही, सर्वदा विष्णु पूजा में लवलीन रहे। द्विजवर्य ! क्षत्रिय भी ब्राह्मणों को ही दान दे। वह भी वेद का अध्ययन करे और यज्ञों द्वारा देवों को पूजा करे। वह शस्त्र द्वारा जीविका चलावे और पृथिवी का पालन करे। दुष्टों का शासन और सज्जनों का पालन क्षत्रिय का धर्म है ॥२१-२४॥ पशु पालन, व्यापार, कृषि और वेदाध्ययन वैश्य का धर्म माना गया है। विवाह करना और धर्माचरण वैश्य के लिए प्रशस्त हैं। क्रय-विक्रय अथवा शिल्प के द्वारा धनोपार्जन करे। शूद्र भी दान दे परन्तु पाक-यज्ञ न करे। वह ब्राह्मण, क्षत्रिय,
१६३ पञ्चविशोऽध्यायः ऋतुकालाभिगामी च स्वदारेषु भवेत्तथा । सर्वलोकहितेप्सित्वं मंगलं प्रियवादिता ॥२८॥ अनायासो मनोहर्षस्तितिक्षा नातिमानिता । सामान्यं सर्ववर्णानां मुनिभिः परिकीर्तितम् ॥२९॥ सर्वे च मुनितां यांति स्वाश्रमोचितकर्मणा । ब्राह्मणः क्षत्रियाचारमाश्रयेदापदि द्विज ॥३०॥ क्षत्रियोऽपि च विड्वृत्तिमत्यादापदि समाश्रयेत् । नाशयेच्छूद्रवृत्ति तु अत्यापद्यपि वै द्विजः ॥३१॥ यद्याश्रयेद्विजो मूढस्तदा चांडालतां व्रजेत् । ब्राह्मणक्षत्रियविशां त्रयाणां मुनिसत्तम ॥३२॥ चत्वार आश्रमाः प्रोक्ताः पंचमो नोपपद्यते । ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो भिक्षुश्च सत्तम् ॥३३॥ चतुर्भिराश्रमैरैभिः साध्यते धर्म उत्तमः । विष्णुस्तुष्यति विप्रेन्द्र कर्मयोगरतात्मनः ॥३४॥ निःस्पृहाशांतमनसः स्वकर्मनिरतस्य च । ततो याति परं स्थानं यतो नावर्त्तते पुनः ॥३५॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सदाचारो नाम चतुर्विशोऽध्यायः ॥२४॥
पञ्चविंशोऽध्यायः सनक उवाच वर्णाश्रमाचारविधि प्रवक्ष्यामि विशेषतः । शृणुष्व तन्मुनिश्रेष्ठ सावधानेन चेतसा ॥१॥ यः स्वधर्मं परित्यज्य परधर्मं समाचरेत् । पाखंडः स हि विज्ञेयः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥२॥ गर्भाधानादिसंस्काराः कार्या मंत्रविधानतः । स्त्रीणाममंत्रतः कार्या यथाकालं यथाविधि ॥३॥ सीमंतकर्म प्रथमं चतुर्थे मासि शस्यते । षष्ठे वा सप्तमे वापि अष्टमे वापि कारयेत् ॥४॥
वैश्यों की शुश्रूषा में निरत रहे ॥२५-२७॥ अपनी स्त्री के निकट ऋतुकाल में जाय और सर्वदा लोकमंगल की इच्छा करे । प्रिय भाषण, स्वाभाविक प्रसन्नता, तितिक्षा और निरभिमानता ये सामान्यतः सब वर्णों के कर्त्तव्य हैं । सब अपने वर्ण और आश्रमोचित कर्त्तव्यों के पालन के द्वारा मुनि का पद पा जाते हैं। द्विज ! आपत्ति-काल में ब्राह्मण क्षत्रिय का कार्य कर सकता है क्षत्रिय वैश्य का । परन्तु ब्राह्मण आपत्ति काल में भी शूद्र वृत्ति न अपनावे । यदि कोई मूढतावश द्विज ऐसा करता है तो वह चाण्डाल सा हो जाता है ॥२८-३२॥ मुनिश्रेष्ठ ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों के चार आश्रम कहे गये हैं, पाँचवां कोई आश्रम नहीं है । सज्जनों में अग्रणी ! ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास ये ही चार व्रत हैं। इन चतुराश्रमों के द्वारा उत्तम धर्म को प्राप्त किया जाता है । विप्रेन्द्र ! कर्मयोगी, निःस्पृह, शान्त चित्त और स्वकर्म निरत जनों पर ही भगवान् प्रसन्न होते हैं । उनकी प्रसन्नता से वे उस लोक को चले जाते हैं जहाँ से पुनः लौटना नहीं होता । ॥३३-३५॥ श्री नारदीय महापुराण में सदाचार वर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२४॥
अध्याय २५ सनक बोले—वर्णाश्रमाचार विधि को विशेष रूप से कह रहा हूँ, मुनिश्रेष्ठ ! उसको ध्यान पूर्वक सुनो । जो अपने धर्म को छोड़कर दूसरे के धर्म को अपनाता है, उस व्यक्ति को सब धर्मों से बहिष्कृत पाषण्डी समझना चाहिए । गर्भाधान आदि संस्कार मन्त्र विधि से करना चाहिए । स्त्रियों के ये संस्कार यथा समय, बिना मन्त्रोच्चा- रण के ही विधि पूर्वक होने चाहिए । सीमन्त संस्कार चौथे महीने में श्रेष्ठ माना गया है, परन्तु छठे, सातवें या
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१६४ नारदीयपुराणम् जाते पुत्रे पिता स्नात्वा सचैलं जातकर्म च । कुर्याच्च नांदीश्राद्धं च स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ॥५॥ हेम्ना वा रजतेनापि वृद्धिश्राद्धं प्रकल्पयेत् । अन्नेन कारयेद्यस्तु स चंडालसमो भवेत् ॥६॥ कृत्वान्द्युदयिकं श्राद्धं पिता पुत्रस्य वाग्यतः । कुर्वीत नामनिर्देशं सूतकांते यथाविधि ॥७॥ अस्पष्टमर्थहीनं च ह्यतिगुर्वक्षरन्वितम् । न दद्यान्नाम विप्रेंद्र तथा च विषमाक्षरम् ॥८॥ तृतीयवर्षे चौलं च पंचमे षष्ठसम्मिते । सप्तमे चाष्टमे वापि कुर्याद् गृह्योक्तमार्गतः ॥९॥ दैवयोगादतिक्रांते गर्भाधानादिकर्मणि । कर्तव्यः पादकृच्छ्रो वै चौले त्वद्धं प्रकल्पयेत् ॥१०॥ गर्भाष्टमेऽष्टमे वाब्दे वटुकस्योपनयनम् । आषोडशाब्दपर्यंतं गौणं कालमुशंति च ॥११॥ गर्भैकादशमेऽब्दे तु राजन्यस्योपनयनम् । आद्वाविंशाब्दपर्यंतं कालमाहुर्विपश्चितः ॥१२॥ वैश्योपनयनं प्रोक्तं गर्भाद्द्वादशमे तथा । चतुर्विंशाब्दपर्यन्तं गौणमाहुर्मनीषिणः ॥१३॥ एतत्कालावधेरूर्ध्वस्य द्विजस्यातिक्रमो भवेत् । सावित्रीपतितं विद्यात्तं तु नैवालपेतकदा ॥१४॥ द्विजोपनयने विप्र मुख्यकालब्यतिक्रमे । द्वादशाब्दं चरेत्कृच्छ्रं पश्चाच्चांद्रायणं तथा सांतपनद्वयं चैव कृत्वा कर्म समाचरेत् ॥१५॥ अन्यथा पतितं विद्यात्कर्तापि ब्रह्महा भवेत् । मौंजी विप्रस्य विज्ञेया धनुर्ज्या क्षत्रियस्य तु ॥१६॥ आवी वैश्यस्य विज्ञेया श्रूयतामजिनं तथा । विप्रस्य चोक्तमैणेयं रौरवं क्षत्रियस्य तु ॥१७॥ आजं वैश्यस्य विज्ञेयं दंडांश्वक्ष्ये यथाक्रमम् । पालाशं ब्राह्मणस्योक्तं नृपस्यौदुम्बरं तथा ॥१८॥ आठवें महीने में भी यह किया जा सकता है ॥१-४॥ पुत्र उत्पन्न हो जाने पर पिता सचैल स्नान जात कर्म करे साथ साथ स्वस्तिवाचन पूर्वक नान्दी श्राद्ध भी करे। नान्दी श्राद्ध सोना अथवा चाँदी से करना चाहिए। जो अन्न से श्राद्ध करता है, वह चाण्डाल के समान समझा जाता है। पिता पुत्र के लिए आभ्युदयिक श्राद्ध करने के बाद वाणी का संयम करते हुए अनन्तर विधि पूर्वक नामकरण करे। विप्रेन्द्र ! अस्पष्ट, निरर्थक, दीर्घ अक्षरों और विषम अक्षरों वाला नाम नहीं रखना चाहिए। तीसरे वर्ष, पाँचवें, छठे, सातवें या आठवें वर्ष गृह्य सूत्रों के अनु- सार चोल संस्कार करना चाहिए। ॥५-६॥ दैवयोग से यदि गर्भाधान आदि संस्कार न हुआ हो तो पाद कृच्छ्रव्रत करे। चौल संस्कार के न करने पर अर्द्ध कृच्छ्रव्रत करे। गर्भ से आठवें वर्ष में ब्राह्मण वटुक का उपनयन संस्कार होना चाहिए। सोलहवें वर्ष तक उपनयन का काल मुनियों ने मध्यम कोटि का माना है ॥१०-११॥ क्षत्रिय का गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में उपनयन होना उत्तम है; परन्तु विद्वानों ने अट्ठाईस वर्ष तक क्षत्रियों का उपनयन-काल स्वीकार किया है और वैश्यों का उपनयन गर्भ से बारहवें वर्ष तक हो जाना उत्तम है, परन्तु मनीषियों ने चौबीस वर्ष तक गौण काल माना है। जिस द्विज का इस अवधि तक उपनयन नहीं होता, उसको सावित्रीपतित समझना चाहिए और कभी भी उससे बातचीत न करे । विप्र ! द्विजों के उपनयन संस्कार में उचित समय का उल्लंघन कर देने पर बारह वर्ष तक कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत करे । तत्पश्चात् दो बार सान्तपन व्रत कर उपनयन करे ॥१२-१५॥ अन्यथा वह व्यक्ति पतित हो जाता है और उपनयन कराने वाला भी ब्रह्म हत्या का भागी होता है। विप्र के लिए मूंज की मेखला, क्षत्रिय के लिए धनुष की डोरी की और वैश्य के लिए भेड़ के ऊन की बनी मेखला प्रशस्त समझी जाती है। अब अजिन के विषय में सुनो। विप्र का अजिन मृगचर्म का, क्षत्रिय का कृष्ण मृग का और वैश्य का अजा चर्म का होना चाहिए। अब क्रमशः दण्ड को कह रहा हूँ। ब्राह्मण का दण्ड पलाश का क्षत्रिय का गूलर का और वैश्य का विल्व का होना चाहिए। अब उसकी लम्बाई बतला रहा हूँ सुनो। ब्राह्मण का
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पञ्चविंशोऽध्यायः १६५ बैल्वं वैश्यस्य विज्ञेयं तत्प्रमाणं शृणुष्व मे । विप्रस्य केशमानं स्यादाललाटं नृपस्य च ॥१९॥ नासाग्रसंमितं दण्डं वैश्यस्याहुर्विपश्चितः । तथा वासांसि वक्ष्यामि विप्रादीनां यथाक्रमम् ॥२०॥ कषायं चैव मांनिष्ठं हारिद्रं च प्रकीर्तितम् । उपनीतो द्विजो विप्र परिचर्यापरो गुरोः ॥२१॥ वेदग्रहणपर्यंतं निवसेद्गुरुवेश्मनि । प्रातःस्नायी भवेद्वर्णी समित्कुशफलादिकान् ॥२२॥ गुर्वर्थमाहरेन्नित्यं कल्ये कल्ये मुनीश्वर । यज्ञोपवीतमजिनं दंडं च मुनिसत्तम ॥२३॥ नष्टे भ्रष्टे नवं मंत्राद्धृत्वा भ्रष्टं जले क्षिपेत् । वर्णिर्नो वर्तनं प्राहुर्भिक्षान्नेनैव केवलम् ॥२४॥ भिक्षा च श्रोत्रियागारादाहरेत्प्रयतेन्द्रियः । भवत्पूर्वं ब्राह्मणस्य भवन्मध्यं नृपस्य च ॥२५॥ भवदंत्यं विशः प्रोक्तं भिक्षाहरणकं वचः । सायं प्रातर्वृत्तिकार्यं यथाचारं जितेन्द्रियः ॥२६॥ कुर्यात्प्रतिदिनं वर्णी ब्रह्मयज्ञं च तर्पणम् । अग्निकार्यपरित्यागी पतितः प्रोच्यते बुधैः ॥२७॥ ब्रह्मयज्ञविहीनश्च ब्रह्महा परिकीर्तितः । देवताभ्यर्चनं कुर्याच्छुश्रूषानुपदं गुरोः ॥२८॥ भिक्षान्नं भोजयेन्नित्यं नैकान्नाशी कदाचन । आनीयानन्द्यविप्राणां गृहाद्भिक्षां जितेन्द्रियः ॥२९॥ निवेद्य गुरवेऽश्नीयाद्वाग्यतस्तदनुज्ञया । मधुस्त्रीमांसलवणं ताम्बूलं दंतधावनम् ॥३०॥ उच्छिष्टभोजनं चैव दिवास्वापं च वर्जयेत् । छत्रपादुकगंधांश्च तथा माल्यानुलेपनम् ॥३१॥ जलकेलिं नृत्यगीतवाद्यं तु परिवर्जयेत् । परिवादं चोपतापं विप्रलापं तथांजनम् ॥३२॥ पाषण्डजनसंयोगं शूद्रसंगं च वर्जयेत् । अभिवादनशीलः स्याद् वृद्धेषु च यथाक्रमम् ॥३३॥ ज्ञानवृद्धास्तपोवृद्धा वयोवृद्धा इति त्रयः । आध्यात्मिकादिदुःखानि निवारयति यो गुरुः ॥३४॥
दण्ड शिर के केश तक, क्षत्रिय का ललाट तक और वैश्य का दण्ड नासिका के अग्र भाग तक का होना चाहिए ॥१९½-१९३॥ अब मैं ब्राह्मण आदि के वस्त्रों को क्रमानुसार कह रहा हूँ । कषाय, मजीठ और पीला वस्त्र क्रमशः वर्णा- नुसार होना चाहिए । विप्र ! उपनीत द्विज गुरु की सेवा करता हुआ वेदाध्ययन काल तक गुरु-गृह में ही निवास करे। मुनीश्वर । ब्रह्मचारी नित्य प्रातःकाल स्नान कर गुरु के लिए उसी समय समिधा, कुशा और फल आदि लावे ॥२०-२२॥ मुनिश्रेष्ठ ! यज्ञोपवीत, अजिन और दण्ड के टूट जाने या अशुद्ध हो जाने पर पुनः मन्त्र पढ़कर नवीन धारण करना चाहिए और पुराने को किसी जलाशय में फेंक देना चाहिए । ब्रह्मचारी को केवल भिक्षान्न के द्वारा ही प्रति दिन का भोजन चलाना चाहिए ॥२३-२४॥ भिक्षा संयत होकर किसी श्रोत्रिय के घर से लानी चाहिए । भिक्षा माँगते समय ब्राह्मण ब्रह्मचारी भवान् (आप) शब्द का पहले ही प्रयोग करें, क्षत्रिय मध्य में और वैश्य अन्त में करें । यही भिक्षा काल का वाक्य होना चाहिए । वर्णी प्रतिदिन संयमपूर्वक आचारानुकूल हवन, ब्रह्मयज्ञ और तर्पण करे । अग्नि कार्य (हवन) का परित्याग करने वाले को पंडितों ने पतित कहा है ॥२५-२७॥ ब्रह्म यज्ञ को न करने वाला ब्रह्मघाती कहा गया है । गुरु की शुश्रूषा के पश्चात् देवपूजा करनी चाहिए । प्रतिदिन भिक्षान्न भोजन करे और कभी भी एक ही अन्न न खाये । जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी अनिन्द्य ब्राह्मणों के घर से भिक्षा लाकर गुरु को अर्पित करे पुनः उनकी आज्ञा से स्वयं वाक्संयमी होकर भोजन करे । ब्रह्मचारी के लिए मद्य, स्त्री, मांस, नमक, ताम्बूल, दातौन, जूठा भोजन और दिन का सोना वर्जित है । उसको छाता, जूता सुगन्धित पदार्थ, माला, लेप, जल-क्रीड़ा, नृत्य, गीत और बाजा बजाना सर्वथा छोड़ देना चाहिए । निन्दा, अनुताप, व्यर्थलाप, अंजन, धूर्तों की संगति और शूद्रों की संगति नहीं करनी चाहिए । सर्वदा वृद्धजनों का क्रमानुसार अभिवादन करे ॥२८-३३॥ ज्ञानवृद्ध, तपोवृद्ध और वयोवृद्ध तीन वृद्ध हैं । जो गुरु वेदशास्त्रों के उपदेश से मानसिक दुःखों को दूर कर देता है, उसको
१६६ नारदीयपुराणम् वेदशास्त्रोपदेशेन तं पूर्वमभिवादयेत् । असावहमिति ब्रूयाद्द्विजो वै ह्यभिवादने ॥३५॥ नाभिवाद्याश्च विप्रेण क्षत्रियाद्याः कथंचन । नास्तिकं भिन्नमर्यादं कृतघ्नं ग्रामयाजकम् ॥३६॥ स्तेनं च कितवं चैव कदाचिन्नाभिवादयेत् । पाषण्डं पतितं व्रात्यं तथा नक्षत्रजीविनम् ॥३७॥ तथा पातकिनं चैव कदाचिन्नाभिवादयेत् । उन्मत्तं च शठं धूतं धावन्तमशुचिं तथा ॥३८॥ अभ्यक्तशिरसं चैव जपन्तं नाभिवादयेत् । विवादशीलिनं चंडं वमंतं जलमध्यगम् ॥३९॥ भिक्षान्नधारिणं चैव शयानं नाभिवादयेत् । भर्तृघ्नीं पुष्पिणीं जारां सूतिकां गर्भपातिनीम् ॥४०॥ कृतघ्नीं च तथा चंडीं कदाचिन्नाभिवादयेत् । सभायां यज्ञशालायां देवतायतनेष्वपि ॥४१॥ प्रत्येकं तु नमस्कारोहंति पुण्यं पुराकृतम् । श्राद्धं व्रतं तथा दानं देवताभ्यर्चनं तथा ॥४२॥ यज्ञं च तर्पणं चैव कुर्वंतं नाभिवादयेत् । कृतेऽभिवादने यस्तु न कुर्यात्प्रतिवादनम् ॥४३॥ नाभिवाद्यः स विज्ञेयो यथा शूद्रस्तथैव सः । प्रक्षाल्य पादावाचम्य गुरोरभिमुखः सदा ॥४४॥ तस्य पादौ च संगृह्य आधीयीत विचक्षणः । अष्टकासु चतुर्दश्यां प्रतिपत्पर्वणोस्तथा ॥४५॥ महाभरण्यां विप्रेन्द्र श्रवणद्वादशीदिने । भाद्रपदापरपक्षे द्वितीयायां तथैव च ॥४६॥ माघस्य शुक्लसप्तम्यां नवम्यामाश्विनस्य च । परिवेषं गते सूर्ये श्रोत्रिये गृहमागते ॥४७॥ वंचिते ब्राह्मणे चैव प्रवृद्धकलहे तथा । संध्यायां गर्जिते मेघे ह्यकाले परिवर्षणे ॥४८॥ उल्काशनिप्रपाते च तथा विप्रेऽवमानिते । मन्वादिषु च देवर्षे युगादिषु चतुर्ष्वपि ॥४९॥ नाधीयीत द्विजः कश्चित्सर्वकर्मफलोत्सुकः । तृतीया माधवे शुक्ला भाद्रे कृष्णा त्रयोदशी ॥५०॥ कार्तिके नवमी शुक्ला माघे पंचदशी तिथिः । एता युगाद्याः कथिता दत्तस्याक्षयकारिकाः ॥५१॥
सबसे पहले अभिवादन करना चाहिए। द्विज अभिवादन के समय असौ (यह) अहम् (मैं) ऐसा कहे ॥३४-३५॥ किसी भी अवस्था में क्षत्रिय आदि जाति के मनुष्य विप्रों के अभिवादन के योग्य नहीं हैं। नास्तिक, सामाजिक मर्यादा भङ्ग करने वाले, कृतघ्न, पुरोहित, चोर और धूर्त का कभी भी अभिवादन नहीं करना चाहिये। पाखण्डी, पतित व्रात्य, ज्योतिषी और पापी का कभी भी अभिवादन नहीं करना चाहिए। उन्मत्त, शठ, धूर्त, दौड़ते हुए व्यक्ति, अपवित्र, तैल से भीगे हुए शिर वाले और जप करते हुए व्यक्ति को प्रणाम नहीं करना चाहिए। बकवादी, उद्धत, वमन करते हुए, जल में खड़े, भिक्षुक और सोते हुए को प्रणाम सर्वथा निषिद्ध है ॥३६-३९॥ इसी प्रकार पति की हत्या करने वाली, ऋतुमती, व्यभिचारिणी, सूतिका, गर्भपात करने वाली, कृतघ्न तथा उद्धत स्त्री को भी नमस्कार करना उचित नहीं है। सभा, यज्ञशाला और देवमन्दिर में किया हुआ प्रत्येक व्यक्ति का नमस्कार पूर्व- कृत पुण्यों का नाश करता है श्राद्ध, व्रत, दान, देवार्चन, यज्ञ और तर्पण करते हुए व्यक्ति का अभिवादन नहीं करना चाहिए। जो अभिवादन करने पर भी प्रत्यभिवादन (आशीर्वाद आदि) नहीं करता, उसको अभिवादन के अयोग्य समझना चाहिए। वह तो शूद्र के समान है ॥४०-४३॥ बुद्धिमान् शिष्य सर्वदा पाद प्रक्षालन और आचमन कर गुरु के सम्मुख बैठकर उनके चरणों को छूकर पढ़ना प्रारम्भ करे। विप्रेन्द्र ! सब कर्मों के फल को चाहने वाला कोई भी द्विज अष्टमी, चतुर्दशी, प्रतिपदा, पर्वतिथि, महाभरणी, श्रावण की द्वादशी, भाद्र शुक्ल द्वितीया, माघ शुक्ल सप्तमी, आश्विन की नवमी, सूर्य के चारों ओर मण्डलाकार चिह्न दिखाई देने के दिन, श्रोत्रिय के घर आने पर, ब्राह्मण के बंधन में पड़ने पर, कलह बढ़ जाने पर, सायंकाल मेघ-गर्जन होने पर, अकालवृष्टि होने पर उल्का और बिजली गिरने पर, ब्राह्मण के अपमानित होने पर, देवर्षे ! चारों युगों के आर मन्वन्तरों के प्रारम्भ के दिन में न पढ़े। वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) भाद्र कृष्ण त्रयोदशी, कार्तिक शुक्ल नवमी, माघी पूर्णिमा, ये तिथियां युग-प्रारम्भ की तिथियां हैं। इन तिथियों में दिया हुआ दान
पञ्चविंशोऽध्यायः १६७
मन्वादींश्च प्रवक्ष्यामि शृणुष्व सुसमाहितः । अक्षय्यशुक्लनवमी कार्तिके द्वादशी सिता ॥५२॥ तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च । आषाढशुक्लदशमी सिता माघस्य सप्तमी ॥५३॥ श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा । फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौषस्यैकादशी सिता ॥५४॥ कार्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्यैष्ठी पंचदशी सिता । मन्वादयः समाख्याता दत्तस्याक्षयकारिकाः ॥५५॥ द्विजैः श्राद्धं च कर्त्तव्यं मन्वादिषु युगादिषु । श्राद्धे निमन्त्रिते चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ॥५६॥ अयनद्वितये चैव तथा भूकम्पने मुने । गलग्रहे दुर्दिने च नाधीयीत कदाचन ॥५७॥ एवमादिषु सर्वेषु अनध्यायेषु नारद । अधीयतां सुमूढानां प्रजां प्रज्ञां यशः श्रियम् ॥५८॥ आयुष्यं बलमारोग्यं निकृन्तति यमः स्वयम् । अनध्याये तु योऽधीते तं विद्याद्ब्रह्मघातकम् ॥५९॥ न तं संभाष्येद्विप्र न तेन सह संवसेत् । कुण्डगोलकयोः केचिज्जडादीनां च नारद ॥६०॥ वदन्ति चोपनयनं तत्पुत्रादिषु केचन । अनधीत्य तु यो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ॥६१॥ शूद्रतुल्यः स विज्ञेयो नरकस्य प्रियोऽतिथिः । अनधीतश्रुतिर्विप्र आचारं प्रतिपद्यते ॥६२॥ नाचारफलमाप्नोति यथा शूद्रस्तथैव सः । नित्यं नैमित्तिकं काम्यं यच्चान्यत्कर्म वैदिकम् ॥६३॥ अनधीतस्य विप्रस्य सर्वं भवति निष्फलम् । शब्दब्रह्ममयो विष्णुर्वेदः साक्षाद्धरि स्मृतः ॥६४॥ वेदाध्यायी ततो विप्रः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥६५॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे स्मार्त्ताचारेषु वर्णाश्रमधर्मेष्व- ध्ययनादिधर्मनिरूपणं नाम पंचविंशोऽध्यायः ॥२५॥
अक्षय होता है ॥५४-५१॥ अब मैं मन्वादि तिथियों को बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। आश्विन शुक्ल की नवमी, कार्तिक शुक्ल की द्वादशी, चैत्र और भाद्रपद की तृतीया, आषाढ़ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी, श्रावण-कृष्णाष्टमी, आषाढ़ी पूर्णिमा, फाल्गुन की अमावस्या, पौष शुक्ल एकादशी, कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठ की पूर्णिमा, ये मन्वादि तिथियाँ हैं । इन पर्वों को दिया हुआ दान अक्षय होता है ॥५२-५५॥ मन्वादि और युगादि तिथियों में द्विजों को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। मुनि ! श्राद्ध में निमन्त्रित होने पर, चन्द्र और सूर्य ग्रहण के समय, दोनों अयनों के समय, भूकम्प, गलग्रह और दुर्दिन में कभी भी अध्ययन नहीं करना चाहिए ॥५६-५७॥ नारद ! इन उपर्युक्त अनध्याय के दिनों में अध्ययन करने वाले अविवेकी जनों की सन्तति, प्रज्ञा, यश, लक्ष्मी, आयु, बल, आरोग्य इन सबको यम स्वयं नष्ट कर देते हैं। जो अनध्याय के दिन पढ़ता है उसको ब्रह्मघातक समझना चाहिए । विप्र ! न तो उनके साथ बातचीत करनी चाहिए और न उनके साथ रहना ही चाहिए । नारद ! कुछ लोग कुण्ड, गोलक और जड़ पुरुषों का भी उपनयन करना चाहते हैं और कुछ उनके पुत्रों का । जो विप्र वेदों का अध्ययन न कर दूसरे विषयों में व्यर्थ परिश्रम करता है वह शूद्र के समान है और वह नरकगामी होता है ॥५८-६१३॥ जो विप्र वेदों को बिना पढ़े आचार पालन करता है वह कभी भी आचार पालन का फल नहीं पाता है वह तो उसी प्रकार है जैसे शूद्र । अशिक्षित विप्रों का नित्य नैमित्तिक, काम्य अथवा जो कुछ वैदिक कर्म हैं वे सब निष्फल होते हैं । विष्णु शब्द ब्रह्ममय हैं, वेद साक्षात् हरि कहे गए हैं और वेदाध्यायी विप्र सब मनोरथों को प्राप्त करता है ॥६२-६५॥ श्री नारदीय महापुराण में स्मार्ताचार और आश्रम धर्म निरूपण नामक पचीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२५॥
षड्विंशोऽध्यायः सनक उवाच वेदग्रहणपर्यन्तं शुश्रूषानियतो गुरोः। अनुज्ञातस्ततस्तेन कुर्यादग्निपरिग्रहम् ॥१॥ वेदांश्च धर्मशास्त्राणि वेदाङ्गान्यपि च द्विजः। अधीत्य गुरवे दत्त्वा दक्षिणां संविशेदगृहम् ॥२॥ रूपलावण्यसंपन्नां सगुणां सुकुलोद्भवाम् । द्विजः समुद्वहेत्कन्यां सुशीलां धर्मचारिणीम् ॥३॥ मातृतः पंचमीं धीमान्पितृतः सप्तमीं तथा । द्विजः समुद्वहेत्कन्यामन्यथा गुरुतल्पगः ॥४॥ रोगिणीं चैव वृत्ताक्षीं सरोगकुलसंभवाम् । अतिकेशामकेशां च वाचालां नोद्वहेद्बुधः ॥५॥ कोपनां वामनां चैव दीर्घदेहां विरूपिणीम् । न्यूनाधिकाङ्गीमुन्मत्तां पिशुनां नोद्वहेद्बुधः ॥६॥ स्थूलगुल्फां दीर्घजंघां तथैव पुरुषाकृतिम् । श्मश्रुव्यंजनसंयुक्तां कुब्जां चैवोद्वहेन्न च ॥७॥ वृथाहास्यमुखीं चैव सदाऽन्यगृहवासिनीम् । विवादशीलां भ्रमितां निष्ठुरां नोद्वहेद्बुधः ॥८॥ बह्वाशिनीं स्थूलदंतां स्थूलोष्ठीं घुर्घुरस्वनाम् । अतिकृष्णां रक्तवर्णां धूर्तां नैवोद्वहेद्बुधः ॥६॥ सदारोदनशीलां च पांडुराभां च कुत्सिताम् । कासश्वासादिसंयुक्तां निद्राशीलां च नोद्वहेत् ॥१०॥ अनर्थभाषिणीं चैव लोकद्वेषपरायणाम् । परापवादनिरतां तस्करां नोद्वहेद्बुधः ॥११॥ दीर्घनासां च कितवां तनूरूहविभूषिताम् । गर्वितां वकवृत्तिं च सर्वथा नोद्वहेद्बुधः ॥१२॥ बालभावादविज्ञातस्वभावामुद्वहेद्यदि । प्रगल्भां वाऽगुणां ज्ञात्वा सर्वथा तां परित्यजेत् ॥१३॥ अध्याय २६ द्विजातियों के वेदाध्ययन आदि धर्मों का निरूपण सनक जी बोले-वेदाध्ययन काल तक ब्रह्मचारी गुरु की सेवा करे । तत्पश्चात् गुरु की आज्ञा पाकर अग्न्याधान करे । द्विज वेद, धर्मशास्त्र और वेदांगो का अध्ययन कर गुरु की दक्षिणा देने के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे । द्विज रूप-सौन्दर्य से युक्त, गुणी, कुलीन, सुशीला और धर्म- चारिणी कन्या से विवाह करे। बुद्धिमान् द्विज मातृ-कुल से पाँच और पितृ-कुल से सात पीढ़ी छोड़कर ही किसी कन्या से विवाह करे अन्यथा वह गुरु पत्नीगामी होगा ॥१-४॥ बुद्धिमान् व्यक्ति रोगी, वृत्ताक्षी (गोल आँखों वाली) रोगी कुल में उत्पन्न, अतिकेशा, अकेशा और वाचाल कन्या से विवाह न करे। क्रोधी, बौनी, अधिक लम्बी, कुरूप, न्यूनाधिक अंगों वाली, उन्मत्त और पिशुन कन्या से विवाह न करे। मोटे टखनों वाली, दीर्घजंघा, पुरुष के रूप वाली, दाढ़ी मूंछ के चिह्नों से युक्त और कुबड़ी स्त्री से विवाह न करे। व्यर्थ हँसी हँसने वाली, सदा दूसरे के घर रहने वाली, बकवादी, घर-घर घूमने वाली, और निष्ठुर कन्या से विवाह न करे ॥५-८॥ बहुत भोजन करने वाली, स्थूलदन्त, स्थूलोष्ठी, घुर्घुर शब्द करने वाली, अत्यन्त काली, रक्तवर्णा और धूर्त स्त्री से विवाह न करे। सदा रोती रहने वाली, पीली, कुत्सित, कास (दमा) रोग वाली, और बहुत अधिक सोने वाली से विवाह न करे। व्यर्थ बोलने वाली, लोक से द्वेष करने वाली, दूसरों की निन्दा करने वाली और चोर कन्या से विवाह न करे। बुधजन बड़ी नाक वाली, धूर्त, अधिक रोम वाली, गर्वीली, और बगुले के समान कपटी स्त्री से पंडित कभी भी विवाह न करे। यदि कोई कुमारी अवस्था में उसके स्वभाव का परिचय न पाने के कारण विवाह कर ले और बाद में वह ढीठ और गुणहीन निकले तो उसको सर्वथा छोड़ दे ॥९-१३॥
१६६ षड्विंशोऽध्यायः भर्तृपुत्रेषु या नारी सर्वदा निष्ठुरा भवेत् । परानुकूलिनी या च सर्वथा तां परित्यजेत् ॥१४॥ विवाहाश्चाष्टधा ज्ञेया ब्राह्माद्या मुनिसत्तम । पूर्वः पूर्वो वरो ज्ञेयः पूर्वाभावे परः परः ॥१५॥ ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः । गांधर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमो मतः ॥१६॥ ब्राह्मेण च विवाहेन वैवाह्यो वै द्विजोत्तमः । दैवेनाप्यथवा विप्र केचिदार्षं प्रचक्षते ॥१७॥ प्राजापत्यादयो विप्र विवाहाः पंच गर्हिताः । अभावेषु तु पूर्वेषां कुर्यादेव परांबुधः ॥१८॥ यज्ञोपवीतद्वितयं सोत्तरीयं च धारयेत् । सुवर्णकुण्डले चैव धौतवस्त्रद्वयं तथा ॥१९॥ अनुलेपनलिप्तांगः कृत्तकेशनखः शुचिः । धारयेद्वैणवं दंडं सोदकं च कमंडलुम् ॥२०॥ उष्णीषममलं छत्रं पादुके चाप्युपानहौ । धारयेत्पुष्पमाल्ये च सुगंधं प्रियदर्शनः ॥२१॥ नित्यं स्वाध्यायशीलः स्याद्यथाचारं समाचरेत् । परान्नं नैव भुञ्जीत परवादं च वर्जयेत् ॥२२॥ पादेन नाक्रमेत्पादमुच्छिष्टं नैव लंघयेत् । न संहताभ्यां हस्ताभ्यां कंडूयेदात्मनः शिरः ॥२३॥ पूज्यं देवालयं चैव नापसव्यं व्रजेद्विजः । देवार्चाचमनस्नानव्रतश्राद्धक्रियादिषु ॥२४॥ न भवेन्मुक्तकेशश्च नैकवस्त्रधरस्तथा । नारोहेदुष्ट्रयानं च शुष्कवादं च वर्जयेत् ॥२५॥ अन्यस्त्रियं न गच्छेच्च पैशून्यं परिवर्जयेत् । नापसव्यं व्रजेद्विप्र गोऽश्वत्थानलपर्वतान् ॥२६॥ चतुष्पथं चैत्यवृक्षं देवखातं नृपं तथा । असूयां मत्सरत्वं च दिवास्वापं च वर्जयेत् ॥२७॥ न वदेत्परपापानि स्वपुण्यं न प्रकाशयेत् । स्वकं नाम स्वनक्षत्रं मानं चैवातिगोपयेत् ॥२८॥ न दुर्जनैः सह वसेन्नाशास्त्रं शृणुयात्तथा । आसवद्यूतगीतेषु द्विजस्तु न रतिं चरेत् ॥२९॥
जो स्त्री पति और पुत्र से सर्वथा निष्ठुर और दूसरे के अनुकूल रहे तो उसको सदा के लिए छोड़ दे ॥१०-१४॥ मुनिश्रेष्ठ ! ब्राह्म आदि आठ प्रकार के विवाह बतलाये गए हैं। इनमें पर की अपेक्षा पूर्व को श्रेष्ठ माना गया है । पूर्व के अभाव में पर वाला ही ग्राह्य होता है। ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गांधर्व, राक्षस और आठवां पैशाच विवाह है । द्विजोत्तम ब्राह्म विवाह विधि से ही विवाह करे । विप्र ! अथवा किसी के मत से दैव और आर्ष भी ब्राह्मण के लिए ग्राह्य माना गया है । विप्र ! प्राजापत्य आदि पांच विवाह निन्दित हैं, परन्तु पूर्व के अभाव में पर को ही बुधजन अपनायें ॥१५-१८॥ बुध जन दो यज्ञोपवीत, उत्तरीय वस्त्र सहित दो धोतियां और सोने के कुण्डल धारण करें । अंगों में सर्वदा सुगन्धित लेप लगावे, केश और नख को कटा कर सर्वदा पवित्र रहे । बाँस की छड़ी, शुद्ध कमण्डलु, स्वच्छ पगड़ी, छाता, खड़ाऊं और जूता पहने, पुष्प या पुष्प माला धारण करे सदा सुगंधित द्रव्य (इत्र आदि) लगाकर अपने को सौम्य और प्रिय दर्शन बनाये रहे । सर्वदा स्वाध्याय करता रहे और देशानुकूल आचरण करे । दूसरे का अन्न न खावे और दूसरों की निन्दा तो सर्वथा ही छोड़ देनी चाहिए ॥१६-२२॥ अपने पैर से पैर को न मारे और न तो जूठे भोजन को ही लांघे । अपने शिर को मिले हुए दोनों हाथों से न खुजलाये । द्विज पूज्य मन्दिरों में अपसव्य (उल्टा) होकर न जाये । देवार्चन, आचमन, स्नान, व्रत और श्राद्ध में केशों को न बिखेरे तथा केवल एक वस्त्र ही न पहने । ऊँट की सवारो न करे । और न तो शुष्कवाद ही करे । पर स्त्री के पास न जाय और न तो चुगली करे । विप्र ! अपसव्य होकर गौ, अश्वत्थ, अग्नि और पर्वत के समीप न जाय ॥२३-२६॥ चौराहा, चैत्यवृक्ष (बोधिवट और बुद्ध समाधि के समोप के वृक्ष), देव कुण्ड अथवा गुफा, राजा, छिद्रान्वेषण, मात्सर्य और दिन का सोना सर्वथा छोड़ देना चाहिए । दूसरों के पापों को न कहे और न अपने पुण्य को प्रकट करे । नाम, नक्षत्र और मान को गुप्त ही रखना चाहिए । दुर्जनों के साथ न रहे, न तो २२—ना० पु०
१७० नारदीयपुराणम् आर्द्रान्स्थि च तयोच्छिष्टं शूद्रं च पतितं तथा । सर्पं च श्वशणं स्पृष्ट्वा सचैलं स्नानाचरेत् ॥३०॥ चितिं च चितिकाष्ठं च यूपं चांडालमेव च । स्पृष्ट्वा देवलकं चैव सवासा जलमाविशेत् ॥३१॥ दीपखट्वातनुच्छायाकेशवस्त्रकटोदकम् । अजामार्जनिमार्जाररेणुदैवं शुभं हरेत् ॥३२॥ शूर्पवातं प्रेतधूमं तथा शूद्रान्नभोजनम् । वृषलीपतिसङ्गं च दूरतः परिवर्जयेत् ॥३३॥ असच्छास्त्रार्थमननं खादनं नखकेशयोः । तथैव नग्नशयनं सर्वदा परिवर्जयेत् ॥३४॥ शिरोभ्यंगावशिष्टेन तैलेनांगं न लेपयेत् । ताम्बूलमशुचिं नाद्यात्तथा सुप्तं न बोधयेत् ॥३५॥ नाशुद्धोऽग्निं परिचरेत्पूजयेद्गुरुदेवताः । न वामहस्तेनैकेन पिबेद्वक्त्रेण वा जलम् ॥३६॥ न चाक्रमेदगुरोश्छायां तदाज्ञां च मुनीश्वर । न निंदेद्योगिनो विप्रान्व्रतिनोऽपि यतींस्तथा ॥३७॥ परस्परस्य मर्माणि न कदापि वदेद्द्विजः । दर्श च पौर्णमास्यां च यागं कुर्याद्यथाविधि ॥३८॥ उपासनं च होतव्यं सायं प्रातर्द्विजातिभिः । उपासनपरित्यागी सुरापीत्युच्यते बुधैः ॥३९॥ अयने विषुवे चैव युगादिषु चतुर्ष्वपि । दर्श च प्रेतपक्षे च श्राद्धं कुर्याद्गृही द्विजः ॥४०॥ मन्वादिषु मृताहे च अष्टकासु च नारद । नवधान्ये समायाते गृही श्राद्धं समाचरेत् ॥४१॥ श्रोत्रिये गृहमायाते ग्रहणे चंद्रसूर्ययोः । पुण्यक्षेत्रेषु तीर्थेषु गृही श्राद्धं समाचरेत् ॥४२॥ यज्ञो दानं तपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम् । वृथा भवति तत्सर्वमूर्ध्वपुंडूं विना कृतम् ॥४३॥ ऊर्ध्वपुंडूं च तुलसीं श्राद्धे नेच्छंति केचन । वृथाचारः परित्याज्यस्तमाच्छ्रेयोऽर्थिभिर्द्विजैः ॥४४॥ इत्येवमादयो धर्माः स्मृतिमार्गप्रचोदिताः । कार्या द्विजातिभिः सम्यक्सर्वकर्मफलप्रदाः ॥४५॥
शास्त्र विरुद्ध बातों को ही सुने। द्विज जुआ और अश्लील गीतों में रुचि न रखे । गीली हड्डी, जूठा भोजन, शूद्र, पतित, साँप और कुत्ते के छू जाने पर सचैल स्नान करना चाहिए ॥२७-३०॥ चिता, चिता का काठ, यूप, चाण्डाल, पुजारी के स्पर्श हो जाने पर जल में वस्त्र सहित डूबकी लगावे । दीपक, खटिया, परछाईं, केश, वस्त्र और चटाई का जल, बकरी, झाड़ू और बिल्ली के शरीर की धूलि मनुष्य के भाग्य और कल्याण को नष्ट कर देती है। सूप की वायु, प्रेत (चिता) का धुआं, शूद्रान्न-भोजन, शूद्रा-पति का साथ दूर से छोड़ देना चाहिए । गन्दी पुस्तकों का पढ़ना, नख और केश को मुख से चबाना और नंगे ही सोना सर्वदा निषिद्ध है । शिर पर लगाने से बचे हुए तेल को अपने शरीर में नहीं लगाना चाहिए, न तो अशुद्ध पान ही खाना चाहिए। सोये हुए को जगाना भी उचित नहीं ॥३१-३५॥स्वयं अशुद्ध रहकर अग्नि, गुरु और देवता की पूजा नहीं करनी चाहिए । बायें हाथ से, एक हाथ से अथवा पात्र को मुंह में लगाकर नहीं पीना चाहिए । मुनीश्वर ! गुरु की छाया और आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए । योगी, व्रती, ब्राह्मण और संन्यासियों की निन्दा नहीं करनी चाहिए । द्विज एक दूसरे के रहस्य या मर्मपीड़ा पहुँचाने वाली बातें न करे । शास्त्रानुसार पूर्णिमा और अमावास्या को पौर्णमास और दर्श यज्ञ करे । द्विज प्रातः और सायंकाल की सन्ध्या तथा हवन करे । सन्ध्या न करने वाले को पंडित मद्यप कहते हैं ॥३६-३६॥ गृहस्थ द्विज अयन, विषुव, चारों युगादि तिथियों को, अमावस्या और पितृपक्ष में अवश्य श्राद्ध करे । नारद ! गृहस्थ, मन्वादितिथियों में, मृत्यु के दिन, अष्टमी और नया अन्न घर आने पर श्राद्ध अवश्य करे । किसी श्रोत्रिय के घर आने पर चन्द्र और सूर्य ग्रहण के समय, पुण्य क्षेत्रों और तीर्थों में गृहस्थ अवश्य श्राद्ध करे । बिना ऊर्ध्व पुंड्र तिलक लगाये यज्ञ, दान, तप, होम, स्वाध्याय और पितृतर्पण आदि कर्म निष्फल हो जाते हैं। कुछ विद्वान् ऊर्ध्व पुंड्र तुलसी की माला को श्राद्ध के लिए अपेक्षित नहीं समझते । इसलिए श्रेय की कामना करने वाले द्विज व्यर्थ के आचारों का सर्वथा परित्याग कर दें ॥४०-४५॥ ये उपर्युक्त धर्म स्मृतिमार्ग के अनुकूल
सदाचारपरा ये तु तेषां विष्णुः प्रसीदति । विष्णौ प्रसन्नतां याते किमसाध्यं द्विजोत्तम ॥४६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे स्मार्त्तधर्मेषु वेदाध्ययनादिकस्य गृहस्थधर्मस्य च निरूपणं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥२६॥
सप्तविंशोऽध्यायः सनक उवाच गृहस्थस्य सदाचारं वक्ष्यामि मुनिसत्तम । यद्गतां सर्वपापानि नश्यंत्येव न संशयः ॥१॥ ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय पुरुषार्थाविरोधिनीम् । वृत्तिं संचिंतयेद्विप्र कृतकेशप्रसाधनः ॥२॥ दिवा संध्यासुकर्णस्थब्रह्मसूत्र उदङ्मुखः । कुर्यान्मूत्रपुरीषे तु रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः ॥३॥ शिरः प्रावृत्य वस्त्रेण ह्यंतर्द्धाय तृणैर्महीम् । वहन्काष्ठं करेणैकं तावन्मौनी भवेद्द्विजः ॥४॥ पथि गोष्ठे नदीतीरे तडागगृहसन्निधौ । तथा वृक्षस्यच्छायायां कांतारे वह्निसन्निधौ ॥५॥ देवालये तथोद्याने कृष्टभूमौ चतुष्पथे । ब्राह्मणानां समीपे च तथा गोगुरुयोषिताम् ॥६॥ तुषांगारकपालेषु जलमध्ये तथैव च । एवमादिषु देशेषु मलमूत्रं न कारयेत् ॥७॥ शौचे यत्नः सदा कार्यः शौचमूलो द्विजः स्मृतः । शौचाचारविहीनस्य समस्तं कर्म निष्फलम् ॥८॥
और सब कर्म फलों के देने वाले हैं । अतएव द्विज इनका अवश्य पालन करें । द्विजोत्तम ! सदाचारी व्यक्ति पर विष्णु सदा प्रसन्न रहते हैं, विष्णु के प्रसन्न हो जाने पर संसार में असाध्य ही क्या है ॥४५-४६॥ श्री नारदीय महापुराण में वेदाध्ययन और गृहस्थधर्म निरूपण नामक छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२६॥
अध्याय २७ गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी के धर्म का निरूपण सनक बोले—मुनिश्रेष्ठ ! गृहस्थ के सदाचारों का वर्णन कर रहा हूँ । जिसके कथन मात्र से मनुष्यों के सब पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें थोड़ा भी सन्देह नहीं । विप्र ! प्रातःकाल उठकर पहले अपने केशों को कंघी करे और तब पुरुषार्थ के अनुकूल कार्यों पर विचार करे । दिन में और सन्ध्या समय उत्तराभिमुख होकर कान पर यज्ञोपवीत चढ़ाकर और रात्रि में दक्षिणाभिमुख होकर लघुशंका आदि करे ॥१-३॥ उस समय वस्त्र से अपना शिर ढँक ले, घास या तृण को पृथ्वी पर रखकर एक हाथ में काठ ले और मूत्रत्याग आदि करते समय तक मौन रहे । मार्ग में, गोशाला में, नदी तीर में, तालाब और घर के समीप, वृक्षों की छाया में, वन में, अग्नि के समीप, देवालय में, उद्यान में, जुती भूमि पर, चौराहे पर, ब्राह्मणों के समीप, गाय, गुरु और स्त्रियों के पास, भूसा, अंगार, कपाल, जल के बीच और अन्य पवित्र स्थानों में मलमूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए । पवित्रता पर सर्वदा ध्यान देना चाहिए । क्योंकि द्विज पवित्रता के ही कारण श्रेष्ठ माने गये हैं । शुद्धता और आचार से हीन व्यक्ति के सारे कार्य निष्फल
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१७२ नारदीयपुराणम् शौचं तु द्विविधं प्रोक्तं बाह्यमाभ्यंतरं तथा । मृज्जलाभ्यां बहिः शुद्धिर्भावशुद्धिस्तथांतरम् ॥८॥ गृहीतशिश्नश्चोत्थाय शौचार्थं मृदमाहरेत् । न मूषिकादिखनितां फालोत्कृष्टां तथैव च ॥९०॥ वापीकूपतडागेभ्यो नाहरेदपि मृत्तिकाम् । शौचं कुर्यात्प्रयत्नेन समादाय शुभां मृदम् ॥९१॥ लिंगे मृदेका दातव्या तिस्रो वा मेढ्रयोर्द्वयोः । एतन्मूत्रसमुत्सर्गे शौचमाहुर्मनीषिणः ॥९२॥ एका लिंगे गुदे पंच दश वामे तथोभयोः । सप्त तिस्रः प्रदातव्याः पादयोर्मृत्तिकाः पृथक् ॥९३॥ एतच्छौचं विडुत्सर्गे गंधलेपापनुत्तये । एतच्छौचं गृहस्थस्य द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ॥९४॥ त्रिगुणं तु वनस्थानां यतीनां तच्चतुर्गुणम् । स्वस्थाने पूर्णशौचं स्यात्पथ्यर्द्धं मुनिसत्तम ॥९५॥ आतुरे नियमो नास्ति महापादि तथैव च । गंधलेपक्षयकरं शौचं कुर्याद्विचक्षणः ॥९६॥ स्त्रीणामनुपनीतानां गंधलेपक्षयावधि । व्रतस्थानां तु सर्वेषां यतिवच्छौचमिष्यते ॥९७॥ विधवानां च विप्रेन्द्र एतदेव निगद्यते । एवं शौचं तु निर्वर्त्य पश्चादाचैः सुसमाहितः ॥९८॥ प्रागास्य उदगास्यो वाप्याचामेत्प्रयतेंद्रियः । त्रिश्चतुर्वा पिबेदापो गंधफेनादिवर्जिताः ॥९९॥ द्विमार्जयेत्कपोलं च तलेनौष्ठौ च सत्तम । तर्जन्यंगुष्ठयोगेन नासारंध्रद्वयं स्पृशेत् ॥ २००॥ अंगुष्ठानामिकाभ्यां च चक्षुः श्रोत्रे यथाक्रमम् । कनिष्ठांगुष्ठयोगेन नाभिदेशे स्पृशेद्द्विजः ॥२१॥ तलेनोरःस्थलं चैव अंगुल्यग्रैः शिरः स्पृशेत् । तलेन चांगुलाग्रैर्वा स्पृशेदंसौ विचक्षणः ॥२२॥ एवमाचम्य विप्रेन्द्र शुद्धिमाप्नोत्यनुत्तमाम् । दंतकाष्ठं ततः खादेत्सत्वचं शस्तवृक्षजम् ॥२३॥ होते हैं ॥४-८॥ शौच दो प्रकार का होता है, शारीरिक और मानसिक । मिट्टी और जल से शरीर की और भावनाओं द्वारा अन्तःकरण की शुद्धि होती है। मूत्रेन्द्रिय को हाथ से पकड़कर उठे और शुद्धि के लिए मिट्टी लावे। चूहों के बिल की मिट्टी, फाल से जोती हुई, बावली, कुँआ और तालाब से मिट्टी न ले। अच्छी मिट्टी लेकर यत्नपूर्वक शुद्धि करनी चाहिए। मूत्रेन्द्रिय में एक बार दोनों अण्डकोषों में तीन बार मिट्टी लगानी चाहिए। मनीषी मूत्र त्याग के समय यही शुद्धि बतलाते हैं ॥९-१२॥ जननेन्द्रिय में एक बार, गुदा में पाँच, बायें हाथ में दश, दोनों हाथों में सात और पैरों में तीन बार मिट्टी लगानी चाहिए। मलत्याग करने पर दुर्गन्ध मिटाने के लिए इस प्रकार शुद्धि के नियम हैं। गृहस्थों के लिए शुद्धता के ये नियम हैं परन्तु ब्रह्मचारी के दुगुना परिमाण बताया गया है। वानप्रस्थ के लिए तीन गुना और संन्यासियों के लिए चौगुना कहा गया है ॥१३-१४३॥ अपने घर पर तो इसका पालन पूर्ण रूप से होना चाहिए, परन्तु मार्ग में इसका आधा और रोग अथवा आपत्ति के समय इस पर विशेष विचार नहीं रखा जाता। स्त्रियों और उपनयन से रहितों को दुर्गन्ध मिटने तक मिट्टी लगानी चाहिए। व्रतपालन के समय प्रत्येक को यति के समान शौच के नियमों का पालन करना चाहिए। विप्रेन्द्र ! विधवाओं के लिए भी यही नियम कहे गये हैं। इस प्रकार पवित्र हो जाने के बाद भली भाँति संयम पूर्वक पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर तीन बार या चार बार कुल्ली करे। कुल्ली करने या पीने का जल गंध तथा फेन से रहित होना चाहिए। मुनिश्रेष्ठ ! दो बार कपोलों को धोना चाहिए और हथेली से ओठों को, तर्जनी और अंगूठे को मिलाकर दोनों नासा छिद्रों को छूना चाहिए ॥१५-२०॥ अंगूठा और अनामिका से आँख और कान को क्रमशः स्पर्श करना चाहिए। द्विज कनिष्ठा और अंगूठे को मिला- कर नाभि का स्पर्श करे। हथेली से छाती और अंगुलियों से शिर का स्पर्श करे। विद्वान् मनुष्य हथेली से या अंगुलियों के अग्र भाग से दोनों कंधों को छुवे। विप्रेन्द्र ! इस प्रकार आचमन करने से अत्यन्त शुद्धि प्राप्त होती है ॥२१-२२३॥ इसके अनन्तर वल्कल के सहित किसी उत्तम वृक्ष की दातौन करनी चाहिए । बिल्व, असन वृक्ष, अपामार्ग
१७३ सप्तविंशोऽध्यायः बिल्वासनापामार्गाणां निम्बाम्राकादिशानिाम् । प्रक्षाल्य वारिणा चैव मंत्रेणाप्यभिमंत्रितम् ॥२४॥ आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च । ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वन्नो धेहि वनस्पते ॥२५॥ कनिष्ठाम्रसमं स्थौल्ये विप्रः खादेद्दशांगुलम् । नवांगुलं क्षत्रियश्च वैश्यश्चाष्टांगुलोन्मितम् ॥२६॥ शूद्रो वेदांगुलमितं वनिता च मुनीश्वर । अलाभे दन्तकाष्ठानां गंडूषैर्भानुसंमितैः ॥२७॥ मुखशुद्धिर्विधीयेत तृणपत्रसमन्वितैः । करेणादाय वामेन संचवेद्वामदंष्ट्रया ॥२८॥ द्विजान्संघर्ष्य गोदोहं ततः प्रक्षाल्य पाटयेत् । जिह्वामुल्लिख्य ताभ्यां तु दलाभ्यां नियतेन्द्रियः ॥२९॥ प्रक्षाल्य प्रक्षिपेद् दूरे भूयश्चाचम्य पूर्ववत् । ततः स्नानं प्रकुर्वीत नद्यादौ विमले जले ॥३०॥ तटं प्रक्षाल्य दर्भांश्च विन्यस्य प्रविशेज्जलम् । प्रणम्य तत्र तीर्थानि आवाह्य रविमंडलात् ॥३१॥ गंधाद्यैर्मंडलं कृत्वा ध्यात्वा देवं जनार्दनम् । स्नायान्मंत्रांन्स्मरन्पुण्यांस्तीर्थानि च विरिंचिज ॥३२॥ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिंधुकावेरि जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ॥३३॥ पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा । आगच्छंतु महाभागाः स्नानकाले सदा मम ॥३४॥ अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवंतिका । पुरी द्वारावती ज्ञेया सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥३५॥ ततोऽघमर्षणं जप्त्वा यतासुर्वारिसंप्लुतः । स्नानांगं तर्पणं कृत्वाचम्यार्घ्यं भानवेऽर्पयेत् ॥३६॥ ततो ध्यात्वा विवस्वंतं जलान्निर्गत्य नारद । परिधायाहतं धौतं द्वितीयं परिवीय च ॥३७॥ कुशासने समाविश्य संध्याकर्म समारभेत् । ईशानाभिमुखो विप्र गायत्र्याचम्य वै द्विज ॥३८॥ (चिचिड़ा) नीम, आम और अर्क आदि वृक्षों की दातौन करनी चाहिए। पहले उसको पानी से धोकर मन्त्र से अभिमन्त्रित करना चाहिए। मन्त्र--वनस्पते ! तुम हमको आयु, बल, यश, तेज, संतति, पशु, धन, ज्ञान, प्रज्ञा और मेधा प्रदान करो । विप्र ! कनिष्ठा के अगले भाग के समान और दश अंगुल लम्बी मोटो दातौन करे । मुनीश्वर ! क्षत्रिय नव अंगुल लम्बी, वैश्य आठ अंगुल, शूद्र और स्त्री चार अंगुल लम्बी दतुअन करे । दातौन न मिलने पर बारह बार कुल्ली करके तृण अथवा पत्तियों से मुख शुद्धि करनी चाहिए २३-२७॥ बायें हाथ से दातौन लेकर उसको बायीं ओर के दांतों से ही चबाना चाहिए । फिर दांतों को भली भाँति रगड़कर मसूड़ों को भी धीरे-धीरे रगड़े और धोवे । उस दातौन के चीरे से जीभ को भली भाँति साफ कर उसको पानी से धोवे और उस दातौन को दूर फेंक दे । पुनः पूर्व की भाँति आचमन करे ॥२८-२६॥ इतनी क्रिया के बाद नदी या स्वच्छ जल वाले तालाब में स्नान करना चाहिए । पहले तट को धोकर उस पर कुशों को रख देना चाहिए । तब जल में नहाने के लिए घुसना चाहिए। उस जल में सब तीर्थों का आवाहन कर प्रणाम करना चाहिए । ब्रह्मा के पुत्र ! उस जल में गंध आदि से मण्डल बनाकर भगवान् जनार्दन का ध्यान करना चाहिए । तत्पश्चात् पुण्यप्रद मन्त्रों और तीर्थों का स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिए ॥३०-३२॥ मन्त्र—गंगे ! यमुने ! गोदावरि । सरस्वति ! नर्मदे ! सिन्धु और कावेरि ! इस जल में निवास करो । हे महाभाग पुष्कर आदि तीर्थों ! गंगा आदि नदियों ! सदा मेरे लिए स्नान के समय आप लोग आइए । अयोध्या मथुरा, माया, काशी, कांची, अवन्तिका, और द्वारिका पुरी ये सात मोक्ष देने वाली पुरी समझी जाती हैं । इसके बाद अघमर्षण मन्त्र को जपकर उसी जल में रहकर ही स्वस्थ भाव से स्नान करे । तदनन्तर तर्पण और आच- मन कर सूर्य को अर्घ्य दे ।।३३-३६॥ इतनी क्रियायें स्नान में ही सम्मिलित हैं । नारद ! स्नान के बाद सूर्य का ध्यान कर जल से बाहर आवे । भीगे वस्त्र को छोड़कर दूसरा स्वच्छ वस्त्र पहने और कुशासन पर बैठकर सन्ध्या करे । विप्र ! ईशानाभिमुख होकर गायत्री मन्त्र से आचमन करे । बुद्धिमान् व्यक्ति 'ऋतञ्च सत्यम्' इस मन्त्र से पुनः आचमन करे । तदनन्तर जल से अपने को परिवेष्टित कर अभिषेक करे (जल छिड़के) । संकल्प करने के बाद
१७४ नारदीयपुराणम् ऋतञ्चित्यादिमन्त्रेणाथ पुनरेवाचमेद् बुधः । ततस्तु वारिणात्मानं वेष्टयित्वा समुक्ष्य च ॥३६॥ संकल्प्य प्रणवान्ते तु ऋषिच्छन्दःसुरान्स्मरन् । भूरादिभिर्व्याहृतिभिः सप्तभिः प्रोक्ष्य मस्तकम् ॥४०॥ न्यासं समाचरेन्मंत्री पृथगेव करांगयोः । विन्यस्य हृदये तारं भूः शिरस्यथ विन्यसेत् ॥४१॥ भुवः शिखायां स्वश्चैव कवचे भूर्भुवोऽक्षिषुः । भूर्भुवः स्वस्तथात्रास्त्रं दिक्षु तालत्रयं न्यसेत् ॥४२॥ तत आवाहयेत्संध्यां प्रातः कोकनदस्थिताम् । आगच्छ वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि ॥४३॥ गायत्रि च्छंदसां मातर्ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते । मध्याह्ने वृषभारूढां शुक्लाम्बरसमावृताम् ॥४४॥ सावित्रीं रुद्रयोनिं चावाहयेद्रुद्रवादिनीम् । सायं तु गरुडारूढां पीताम्बरसमावृताम् ॥४५॥ सरस्वतीं विष्णुयोनिमाह्वयेद्विष्णुवादिनीम् । तारं च व्याहतीः सप्त त्रिपदां च समुच्चरन् ॥४६॥ शिरः शिखां च संपूर्थ कुम्भयित्वा विरेचयेत् । वाममध्यात्परैर्वायुं क्रमेण प्राणसंयमे ॥४७॥ द्विराचामेत्ततः पश्चात्प्रातः सूर्यश्चमेति च । आपः पुनंतु मध्याह्ने सायमग्निश्चमेति च ॥४८॥ आपोहिष्ठेति तिसृभिर्मार्जनं च ततश्चरेत् । सुमित्रिया न इत्युक्त्वा नासास्पृष्टजलेन च ॥४६॥ द्विषद्वगं समुत्तार्य द्रुपदां शिरसि क्षिपेत् । ऋतं च सत्यमेतेन कृत्वा चैवाघमर्षणम् ॥५०॥ अंतश्चरसि मंत्रेण सकृदेव पिबेदपः । ततः सूर्याय विधिवद्गन्धं पुष्पं जलांजलिम् ॥५१॥ क्षिप्त्वोपत्तिष्ठेद्दे वर्षे भास्करं स्वस्तिकांजलिम् । ऊर्द्धबाहुरधोबाहुः क्रमात्कल्यादिके त्रिके ॥५२॥
प्रणाम करे और ऋषि, छन्द तथा देवता का स्मरण करते हुए भूः आदि सात व्याहृतियों से मस्तक पर जल छिड़के ॥३७-४०॥ मन्त्र पढ़कर भुजाओं या अन्य अंगों पर पृथक्-पृथक् न्यास करना चाहिए । हृदय पर ‘तार (ॐ) का न्यास कर शिर पर भूः, शिखा पर भुवः, कवच में (दोनों हाथों से कंधों को छूना) स्वः और दोनों नेत्रों पर भूर्भुवः का न्यास करे । और भूर्भुवः स्वः को पढ़कर अस्त्राय फट् को और दिशाओं में तीन ताल का न्यास करे अर्थात् तीन चुटकी बजावे ॥४१-४२॥ यह न्यास कर चुकने पर प्रातःकाल अरुण कमल पर बैठी हुई सन्ध्या देवी का आवाहन करे । ‘देवि ! वरदायिनि ! आओ, अक्षरे ! ब्रह्मवादिनि ! गायत्रि ! छन्दों की माता ! ब्रह्मयोनि ! (ज्ञानदात्री !) तुमको नमस्कार है । दोपहर को बैल पर चढ़ी हुई श्वेत वस्त्र से सुशोभित रुद्रयोनि और रुद्रवादिनी सावित्री का आवाहन करे । ॥४३-४४॥ सायं गरुड़ पर चढ़ी हुई पीतांबर से सुशोभित, विष्णुवादिनी, विष्णुयोनि सरस्वती का आवाहन करे । ॐ, सप्तमहाव्याहृति और त्रिपदागायत्री का उच्चारण करता हुआ शिर और शिखा को पूरक (प्राणायाम) द्वारा पूर्णकर कुम्भक और तत्पश्चात् रेचक (प्राणायाम) करे । पहले बायीं नाड़ी से (पिंगला) प्राणायाम के समय वायु को खींच कर मध्यनाड़ी (सुषुम्ना में) स्थापित करे पुनः इड़ा (दाहिनी नाड़ी दाहिना नासिका छिद्र) से उसको बाहर निकाल दे । तदनन्तर प्रातः काल 'सूर्यश्च मामन्युश्च, इस मन्त्र से दो बार आचमन करे 'मध्याह्न में 'आपः पुनन्तु, इस मन्त्र से और सायं 'अग्निश्च मामन्युश्च, इस मन्त्र से आचमन करे ॥४५-४८॥ आचमन के अनन्तर 'आपोहिष्ठामयोभुवः, इस मन्त्र से तीन बार मार्जन करना चाहिए । 'सुमित्रिया न, यह मन्त्र पढ़ कर नासिका से जल हुआ कर, शत्रुओं का ध्यान कर उनका निःसारण करना चाहिए । फिर 'द्रुपदादिव, मन्त्र पढ़कर शिर पर जल छिड़के । 'ऋतञ्च सत्यम्' इस मन्त्र से अघमर्षण करके 'अन्तश्चरसि, इस मन्त्र से एक बार आचमन करना चाहिए । तदनन्तर सूर्य को विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प और जल का अर्घ्य देकर स्वस्तिकांजलि के साथ सूर्योपस्थान करना चाहिए । सूर्योपस्थान के समय तीनों काल क्रमशः ऊर्ध्वबाहु और अधोबाहु रहना चाहिए ॥४९-५२॥ नारद ! 'उदुत्यं जात, चित्रं देवानाम्,