बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
४६० नारदीयपुराणम् एवं गृहादिषु द्वारविस्ताराद्विगुणोच्छ्रितम् । पश्चिमे दक्षिणे वापि कपाटं स्थापयेद्गृहे ॥५५३॥ प्राकारांतःक्षिति कुर्यादेकाशीतिपदं यथा । मध्ये नवपदे ब्रह्मस्थानं तदतिनिन्दितम् ॥५५४॥ द्वात्रिंशदंशाः प्राकारसमीपांशाः समंततः । पिशाचांशे गृहारंभो दुःखशोकभयप्रदः ॥५५५॥ शेषांशाः स्युश्च निर्माणे पुत्रपौत्रधनप्रदाः । शिराः स्युर्वास्तुतो रेखा दिग्विदिग्मध्यसंभवाः ॥५५६॥ ब्रह्मभागाः पिशाचांशाः शिराणां यत्र संहतिः । तत्र तत्र विजातीयाद्वास्तुनो मर्मसंधयः ॥५५७॥ मर्माणि संधयो नेष्टाः स्वस्थेऽप्येवं निवेशने । सौम्यफाल्गुनवैशाखमाघश्रावणकार्तिकाः ॥५५८॥ मासाः स्युगृ हनिर्माणे पुत्रारोग्यधनप्रदाः । अकारादिषु भागेषु दिक्षु प्रागादिषु क्रमात् ॥५५६॥ खरोऽश्वोऽथ हरिः श्वाख्यः सर्पाखुगजशशकाः । दिग्दर्गाणामियं योनिः स्ववर्गात्पंचमो रिपुः ॥५६०॥ साध्यवर्गः पुरः स्थाप्य पृष्ठतः साधकं न्यसेत् । व्यत्यये नाशनं तस्य ऋणमल्पं धनाच्छुभम् ॥५६१॥ आरभ्य साधकं धिष्ण्यं साध्यं यावच्चतुर्गुणम् । विभजेत्सप्तभिः शेषं साधकस्य धनं तदा ॥५६२॥ हैं। इसी प्रकार उत्तर दिशा में (पश्चिम से पूर्व तक) १. स्त्रीहानि, २. निर्बलता, ३. हानि, ४. धान्यलाभ, ५. धनागम, ६. सम्पत्तिवृद्धि, ७. भय तथा ८. रोग-ये क्रमशः आठ द्वारों के फल हैं ॥५४५-५५३॥ इसी तरह पूर्व आदि दिशाओं के गृहादि में भी द्वार और उसके फल समझने चाहिए। द्वार का जितना विस्तार (चौड़ाई) हो, उससे दुगुनी ऊंची किंवाड़े बनाकर उन्हें घर में (चहार दीवारी के) दक्षिण या पश्चिम भाग में लगाये ॥५५३॥ चहारदीवारी के भीतर जितनी भूमि हो, उसके इक्यासी पद (समान खण्ड) बनाये। उनके बीच के नौ खण्डों में ब्रह्मा का स्थान है। यह गृहनिर्माण में अत्यन्त निन्दित है। चहारदीवारी से मिले हुए जो चारों ओर के ३२ भाग हैं, वे पिशाचांश हैं। उनमें घर बनाने से दुःख, शोक और भय प्राप्त होता है। शेष अंशों (पदों) में घर बनाये जायं तो पुत्र, पौत्र और धन की वृद्धि होती है ॥५५४-५५५॥ वास्तु भूमि की दिशा-विदिशाओं की रेखा वास्तु की शिरा कहलाती है। एवं ब्राह्मभाग, पिशाचभाग तथा शिरा का जहाँ-जहाँ योग हो वहाँ-वहाँ वास्तु की मर्मसन्धि वह मर्मसन्धि तथा गृहारम्भ तथा गृह-प्रवेश में अनिष्टकारक समझी जाती है ॥५५६-५५७॥ गृहारम्भ में प्रशस्त मास--मार्गशीर्ष, फाल्गुन, वैशाख, माघ, श्रावण और कार्तिक-ये मास गृहारंभ में पुत्र, आरोग्य और धन देने वाले होते हैं ॥५५८॥ दिशाओं में वर्ग और वर्गेश--पूर्व आदि आठों दिशाओं में क्रमशः अकारादि आठ वर्ग होते हैं। इन दिशा वर्गों के क्रमशः गरुड, मार्जार, सिंह, श्वान, सर्प, मूषक, गज और शशक (खरगोश) ये योनियाँ होती हैं। इन योनि वर्गों में अपने से पांचवे वर्ग वाले परस्पर शत्रु होते हैं ॥५५९-५६०॥ जिस ग्राम में या जिस स्थान में घर बनाना हो, वह साध्य तथा घर बनाने वाला साधक, कर्ता और भर्ता आदि कहलाता है। इसको ध्यान में रखना चाहिए ।) साध्य (ग्राम) की वर्गसंख्या को लिखकर, उसके पीछे (बायें भाग में) साधक की वर्गसंख्या लिखे। उसमें आठ का भाग देकर जो शेष बचे, वह साधक का धन होता है। इसके विपरीत विधि से (अर्थात् साधक की वर्गसंख्या के बायें भाग में साध्य की वर्गसंख्या रखकर जो संख्या बने, उसमें आठ से भाग देकर शेष) साधक का ऋण होता है। इस प्रकार ऋण की संख्या अल्प और धन-संख्या अधिक हो तो शुभ माने (अर्थात् उस ग्राम या उस दिशा में बनाया हुआ घर रहने योग्य है, ऐसा समझे) ॥५६१॥ इसी प्रकार, साधक के नक्षत्र से साध्य के नक्षत्र तक गिनकर जो संख्या हो उसको चार से गुणा करके गुणनफल में सात से भाग दे तो शेष साधक का धन होता है ॥५६२॥
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६१ विस्तार आयामगुणो गृहस्य पदमुच्यते । तस्माद्धनाधनायर्क्षवारांशाः संख्यया क्रमात् ॥५६३॥ धनाधिकं गृहं वृद्धयै ऋणाधिकमशोभनम् । विषमायः शुभायैव समायोधनाय निर्धनाय च ॥५६४॥ धनक्षयस्तृतीय पञ्चमर्क्षे परः क्षयः । आत्मक्षयः सप्तमोर्क्षे भवेत्येव हि भर्तृभात् ॥५६५॥ द्विर्द्वादशो निर्धनाय त्रिकोणमसुताय च । षट्काष्टकं मृत्यवे स्याच्छुभदा राशयः परे ॥५६६॥ सूर्याङ्गारकवारांशा वैश्वानरभयप्रदाः । इतरे ग्रहवारांशाः सर्वकामार्थसिद्धिदाः ॥५६७॥ नभस्यादिषु मासेषु त्रिषु त्रिषु यथाक्रमम् । पूर्वादिदक्शिरोवामपार्श्वशयायाप्रदक्षिणम् ॥५६८॥ चराह्वयो वास्तुपुमान् चरत्येवं महोदरः । यद्दिङ्मुखो वास्तुपुमान् कुर्यात्तद्दिङ्मुखं गृहम् ॥५६९॥ प्रतिकूलमुखं गेहं रोगशोकभयप्रदम् । सबलो मुखगेहानामेष दोषो न विद्यते ॥५७०॥ वृत्येटिकां स्वर्णरेणुधान्यशैवलसंयुक्तम् । गृहमध्ये हस्तमात्रे गर्ते न्यासाय विन्यसेत् ॥५७१॥ वस्त्वायामदलं नाभिस्तस्माद्व्यंगुलत्रयम् । कुक्षिस्तस्मिन्यसेच्छंकुं पुत्रपौत्रविवर्धनम् ॥५७२॥ चतुर्विंशत्रयोविंशत्षोडशद्वादशांगुलैः । विप्रादीनां कुक्षिमानं स्वर्णवस्त्राद्यलंकृतम् ॥५७३॥
वास्तुभूमि तथा घर के धन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार, और अंश के ज्ञान का साधन - वास्तुभूमि या घर को चौड़ाई को लम्बाई से गुणा करने पर गुणनफल 'पद' कहलाता है । उस 'पद' को (६ स्थानों में रख कर क्रमशः ८,३,९,८,९,६ से गुणा करे और गुणनफल में क्रमशः १२,८,८,२७,७,९ से भाग दे । फिर जो शेष बचे वे क्रमशः धन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार तथा अंश होते हैं। धन अधिक हो तो वह घर शुभ होता है । यदि ऋण अधिक हो तो अशुभ होता है तथा विषम (१,३,५,७) आय शुभ और सम (२,४,६,८) आय अशुभ होता है। घर का जो नक्षत्र हो, वहाँ से अपने नाम के नक्षत्र तक गिनकर जो संख्या हो, उसमें ९ से भाग दे । फिर यदि शेष (तारा) ३ बचे तो धन का नाश होता है । ५ बचे तो यश की हानि होती है और ७ बचे तो गृहकर्ता का ही मरण होता है। घर की राशि और अपनो गिनने पर परस्पर २,१२ हो तो धनहानि होती है; ९, ५ हो तो पुत्र की हानि होती है और ६,८ हो तो अनिष्ट होता है; अन्य संख्या हो तो शुभ समझना चाहिए । सूर्य और मंगल के वार तथा अंश हो तो उस घर में अग्निभय होता है। अन्य वार-अंश हो तो सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं की सिद्धि होती है ॥५६३-५६७॥ वास्तु पुरुष की स्थिति-भादों आदि तीन-तीन मासों में क्रमशः पूर्व आदि दिशाओं की ओर मस्तक करके बायीं करवट से सोये हुए महासर्पस्वरूप 'घर' नामक वास्तु पुरुष प्रदक्षिण-क्रम से विचरण करते रहते हैं । जिस समय जिस दिशा में वास्तुपुरुष का मस्तक हो, उस समय उसी दिशा में घर का दरवाजा बनाना चाहिए, मुख से विपरीत दिशा में घर का दरवाजा बनाने से रोग, शोक और भय होते हैं। किन्तु यदि घर में चारो दिशाओं में द्वार हो तो यह दोष नहीं होता है ॥५६८-५७०॥ गृहारम्भकाल में नींव के भीतर हाथ भर के गड्ढे में स्थापित करने के लिए सोना, पवित्र स्थान की रेणु (धूलि), धान्य और सेवारसहित ईंट घर के भीतर संग्रह करके रखे । घर की जितनी लम्बाई हो, उसके तीन अंगुल नीचे (वास्तुपुरुष के पुच्छभाग की ओर) कुक्षि रहती है। उसमें शंकु का न्यास करने से पुत्र आदि की वृद्धि होती है ॥५७१-५७२॥ शंकु प्रमाण-खैर, अर्जुन, शाखू, कचनार, रक्तचन्दन, पलाश, रक्तशाल विशाल आदि वृक्षों में से किसी की लकड़ी से शंकु बनता है। ब्राह्मणादि वर्गों के लिए क्रमशः २४, २३, २० और १६ अंगुल के शंकु होने चाहिए।
४६२ नारदीयपुराणम् खादिगञ्जु नशालोत्थं युगयंत्रं तद्भवम् । रक्तचंदनपालाशरक्तशालविशालजम् ॥५७४॥ शंकुं त्रिधा विभज्याद्यं चतुरस्रं ततः परम् । अष्टास्रं च तृतीयासौ मन्वलं सुदुमव्रणम् ॥५७५॥ एवं लक्षणसंयुक्तं परिकल्प्य शुभे दिने । षड्वर्गशुद्धिसूत्रेण सूत्रिते धरणीतले ॥५७६॥ मृदुध्रुवक्षिप्रभेषु रिक्ताभावर्जिते दिने । व्यर्कारचरलग्नेषु पापे चाष्टमवर्जिते ॥५७७॥ नैधने शुद्धिसंयुक्ते शुभलग्ने शुभांशके । शुभेक्षितेऽथ वा युक्ते लग्ने शंकुं विनिक्षिपेत् ॥५७८॥ पुण्याहघोषैर्विप्रैस्तैः पुण्यपुण्यांगनादिभिः । स्वत्रिकेंद्रत्रिकोणस्थैः शुभैस्त्वयायारिगैः परैः ॥५७९॥ लग्नांशाष्टारिचंद्रेण दैवज्ञाचंनपूर्वकम् । एकद्वित्रिचतुःशालाःसप्त शाला दशाङ्गयाः ॥५८०॥ ताः पुनः षड्विधाः शालाः प्रत्येकं दशषड्विधाः । ध्रुवं धान्यं जयं नंदं खरैः कांतं मनोरमम् ॥५८१॥ सुमुखं दुर्मुखं क्रूरं शत्रुं स्वर्णप्रदं क्षयम् । आक्रंदं विपुलाख्यं च विजयं षोडशं गृहम् ॥५८२॥ गृहाणि गणयेदेवं तेषां प्रस्तारभेदतः । गुरोरधो लघुः स्थाप्यः पुरस्तादूर्ध्वन्त्यसेत् ॥५८३॥ गृहभिः पूरयेत्पश्चात्सर्वलघववधीविधिः । कुर्याल्लघुपदेऽलिंदं गृहद्वारात्प्रदक्षिणम् ॥५८४॥
उस शंकु के बराबर-बराबर तीन भाग करके ऊपर वाले भाग में चतुष्कोण, मध्य वाले भाग में अष्टकोण और नीचे वाले (तृतीय) भाग में बिना कोण का (गोलाकार) उसका स्वरूप होना उचित है इस प्रकार उत्तम लक्षणों से युक्त कोमल और छेदरहित शंकु शुभ दिन में बनाये। उसके षड्वर्ग द्वारा शुद्ध सूत्र से सूत्रित भूमि (गृहक्षेत्र) में मृदु, ध्रुव, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रों में, अमावास्या और रिक्ता को छोड़कर अन्य तिथियों में, रविवार, मंगलवार तथा चर लग्न को छोड़कर अन्य वारों और अन्य (स्थिर या द्विस्वभाव) लग्नों में, जब पापग्रह लग्न में न हो, अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हो; शुभ राशि लग्न हो और उसमें शुभ नवमांश हो, उस लग्न में शुभग्रह का संयोग या दृष्टि हो; ऐसे समय (सुलग्न) में ब्राह्मणों द्वारा पुण्याहवाचन कराते हुए मांगलिक वाद्य और सौभाग्यवती स्त्रियों के मंगलगीत आदि के साथ मुहूर्त बताने वाले दैवज्ञ (ज्योतिष के विद्वान् ब्राह्मण) के पूजन (सत्कार) पूर्वक कुक्षि- स्थान में शंकु की स्थापना करे । लग्न से केन्द्र और त्रिकोण में शुभ ग्रह तथा ३,६,११ में पापग्रह और चन्द्रमा हो तो यह शंकुस्थापन श्रेष्ठ है ।।५७३-५७६है।। घर के छह भेद होते हैं १ एकशाला २ द्विशाला ३ त्रिशाला, ४ चतुश्शाला, ५ सप्तशाला तथा ६ दशशाला इन छहों शालाओं में से प्रत्येक के १६ भेद होते हैं। उन सब भेदों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-ध्रुव, २ धान्य, ३ जय, ४ नन्द, ५ खर, ६ कान्त, ७ मनोरम, ८ सुमुख, ९ दुर्मुख, १० क्रूर, ११ शत्रुद, १२ स्वर्णद, १३ क्षय, १४ आक्रन्द, १५ विपुल और १६वां विजय नामक गृह होता है। चार अक्षरों के प्रस्तार के भेद से क्रमशः इन गृहों की गणना करनी चाहिए ।।५८०-५८२है।। प्रस्तारभेद--प्रथम ४ गुरु (S) चिह्न लिख कर उनमें प्रथम गुरु के नीचे लघु (I) चिह्न लिखे । फिर आगे जैसा ऊपर हो उसी प्रकार के गुरु या लघु चिह्न लिखना चाहिए । फिर उसके नीचे (तीसरी पंक्ति में) प्रथम गुरु चिह्न के नीचे लघु चिह्न लिखकर आगे (दाहिने भाग में) जैसे ऊपर गुरु या लघु हो वैसे ही चिह्न लिखे तथा पीछे (बायें भाग में) गुरुचिह्न से पूरा करे। इसी प्रकार पुनः पुनः तब तक लिखता जाय जब तक पंक्ति (प्रस्तार) में सब चिह्न लघु न हो जाय। इस प्रकार चार दिशा होने के कारण ४ अक्षरों से १६ भेद होते हैं। प्रत्येक भेद में चारों चिह्न को प्रदक्षिणक्रम से पूर्व आदि दिशा समझकर जहां-जहां लघु चिह्न पड़े; वहां-वहां घर का द्वार और अलिन्द (द्वार के आगे का भाग—चबूतरा) बनाना चाहिए। इस प्रकार पूर्वादि दिशाओं में अलिन्द के भेदों से १६ प्रकार के घर होते हैं ।।५८३-५८४है।।
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६३ पूर्वादिगेष्वलिदेषु गृहभेदास्तु षोडश । स्नानागारं दिशि प्राच्यामाग्नेय्यां पाकमंदिरम् ॥५८५॥ याम्यां च शयनागारं नैऋत्यां शास्त्रमंदिरम् । प्रतीच्यां भोजनगृहं वायव्यां धान्यमंदिरम् ॥५८६॥ कौबेर्यां देवतागारमीशान्यां क्षीरमंदिरम् । शय्यामूत्रास्त्रतद्विच्च भोजनं मंगलाश्रयम् ॥५८७॥ धान्यस्त्रीभोगवित्तं च शृंगारायतनानि च । ईशान्यादिक्रमेस्तेषां गृहनिर्माणकं शुभम् ॥५८८॥ एतेष्वेतानि शस्त्राणि स्वं स्थाप्यानि स्वदिक्ष्वपि । ध्वजो धूम्रोऽथ सिंहःश्वा सौरमेयः खरो गजः ॥५८६॥ ध्वांक्षश्चैव भवंत्यष्टौ पूर्वादिपाः क्रमादमी । प्लक्षोदुंबरचूताख्या निंबस्तु हि विभीतकाः ॥५६०॥ ये कंटका दुग्धवृक्षा वृक्षाश्वत्थकपित्थकाः । अगस्तिसिधुवालाख्यतितिडीकाश्च निंदिताः ॥५६१॥ धित्त्वाग्नजदेहस्यात्पश्चिमे दक्षिणे तथा । गृहपादागृहस्तंभाः समाः शस्ताश्च नासमाः ॥५६२॥ नात्युच्छ्रितं नातिनीचं कुडचोत्सेधं यथार्हति । गृहोपरि गृहादीनामेवं सर्वत्र चिंतयेत् ॥५६३॥ गृहादीनां गृहस्रावं क्रमशोडष्टविधं स्मृतम् । पांचालमानं वैदेहं कौरवं च कुजन्यकम् ॥५६४॥ मागधं शूरसेनं च गांधारावितका स्मृतम् । सचतुर्भागविस्तारमुत्सेधं यत्तदुच्यते ॥५६५॥ पांचालमातुलानां च ह्युत्तरोत्तरवृद्धितः । वैदेहादीन्यशेषाणि मानानि स्युर्यथाक्रमम् ॥५६६॥ पांचालमानं सर्वेषां साधारणमतः परम् । अवंतिमानं विप्राणां गांधारं क्षत्रियस्य च ॥५६७॥ कौजन्यमानं वैश्यानां विप्रादीनां यथोत्तरम् । यथोदितं जलस्राव्यं द्वित्रिभूमिकवेश्मनाम् ॥५६८॥ वास्तुभूमि की पूर्वदिशा में स्नानगृह, अग्निकोण में पाकगृह, दक्षिण में शयनगृह, नैऋत्यकोण में शस्त्रागार, पश्चिम में भोजनगृह, वायुकोण में धनधान्यादि रखने का घर, उत्तर में देवताओं का गृह और ईशानकोण में जल का गृह बनाना चाहिए तथा आग्नेयकोण से आरंभ करके उक्त दो-दो घरों के बीच क्रमशः मन्थन (दूध-दही से घृत निकालने) का, घृत रखने का, पैखाने का, विद्याभ्यास का, स्त्रीसहवास का, औषध का और शृङ्गार की सामग्री रखने का घर बनाना शुभ है । अतः इन सब घरों में उन-उन वस्तुओं को रखना चाहिए ॥५८५-५८८१/२॥ आयों के नाम और दिशा—पूर्वादि आठ दिशाओं में क्रम से ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, (खर गदहा), गज और ध्वांक्ष (काक)-ये आठ आय होते हैं ॥५८९१/२॥ घर के समीप निन्द्य वृक्ष—पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा तथा कांटे वाले और दुग्धवाले सब वृक्ष, पीपल, कपित्थ (कैथ), अगस्त्य वृक्ष, सिन्धुवार (निर्गुण्डी) और इमली ये सब वृक्ष घर के समीप निन्दित कहे गये हैं । विशेषतः घर के दक्षिण और पश्चिम-भाग में वृक्ष हों तो धन आदि का नाश करने वाले होते ॥५९०-५९११/२॥ गृह प्रमाण--घर के स्तम्भ घर के पैर होते हैं । इसलिए वे समसंख्या (४,६,८ आदि) में होने पर ही उत्तम कहे गये हैं; विषम संख्या में नहीं । घर को न तो अधिक ऊँचा ही करना चाहिए, न अधिक नीचा ही। इसलिए अपनी इच्छा (निर्वाह) के अनुसार दीवार की ऊँचाई करनी चाहिए। घर के ऊपर जो घर (दूसरा मंजिल) बनाया जाता है, उसमें भी इस प्रकार का विचार करना चाहिए । घरों की ऊँचाई के प्रमाण आठ प्रकार के कहे गये हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-१पाञ्चाल, २ वैदेह, ३ कौरव, ४ कुजन्य (कान्यकुब्ज ?), ५ मागध, शूरसेन, ७ गान्धार और ८ आवन्तिक । जहाँ घर की ऊँचाई उसकी चौड़ाई से सवागुनी अधिक होती है, वह भूतल से ऊपरतक का पाञ्चालमान कहलाता है, फिर उसी ऊँचाई को उत्तरोत्तर सवागुनी बढ़ाने से वैदेह आदि सब मान होतेहैं। इनमें पाञ्चालमान तो सर्वसाधारण जनों के लिए शुभ हैं। ब्राह्मणों के लिए आवन्तिकमान, क्षत्रियों के लिए गान्धारमान तथा वैश्यों के लिए कौजन्यमान है। इस प्रकार ब्राह्मणादि वर्णों के लिए यथोत्तर गृहमान समझना चाहिए तथा दूसरे मंजिल और तीसरे मंजिल के मकान में भी पानी का बहाव पहले बताये अनुसार ही बनाना चाहिए ॥५६२-५९८॥
४६४ | नारदीयपुराणम् उष्ट्रकुंजरशालानां ध्वजायेऽथ वा गजे । पशुशालाश्च शालानां ध्वजायेऽथ वा गजे ॥५९६६॥ द्वारशय्याशनानामथध्वजाः सिंहवृषध्वजाः । वास्तुपूजाविधिं वक्ष्ये नववेश्मप्रवेशने ॥६००॥ हस्तमात्रा लिखेल्लेखा दश पूर्वा दशोत्तराः । गृहमध्ये तंडुलोपर्येकाशीतिपदं भवेत् ॥६०१॥ पंचोत्तरान्वक्ष्यमाणांश्चत्वारिंशत्सुरान् लिखेत् । द्वात्रिंशद्वाह्यतः पूज्यास्त्वंतःस्थास्त्रयोदश ॥६०२॥ तेषां स्थानानि नामानि वक्ष्यामि क्रमशोधुना । ईशानकोणतो बाह्ये द्वात्रिंशत्त्रिदशा अमी ॥६०३॥ कृपीटयोनिः पर्जन्यो जयंतः पाकशासनः । सूर्यः शशो मृगाकशी वायुः पूषा च नैऋतिः ॥६०४॥ गृहाक्षतो दंडधरो गांधर्वो भृगुराजकः । मृगः पितृगणाधीशस्ततो दौवारिकाह्वयः ॥६०५॥ सोमः सुग्रीऽदितिदिती द्वात्रिंशत्त्रिदशा अमी । अथेशानादिकोणस्थाश्चत्वारस्तत्समीपगाः ॥६०६॥ आपः सावित्रसंज्ञश्च जयो रुद्रः क्रमादमी । एकांतराः स्युः प्रागाद्याः परितो ब्रह्मणः स्मृताः । ६०७॥ अर्यमा सविता बिबविवस्वान्वसुधाधिपः । मित्रोऽथ राजयक्ष्मा च तथा पृथ्वीधराह्वयः ॥६०८॥ आपवत्सोऽष्टमः पंचचत्वारिंशत्सुरा अमी । आपश्चैवापवत्सश्च पर्जन्योऽग्निर्दितिः क्रमात् ॥६०९॥ यद्विकानां च वर्गोऽयमेवं कोणेष्वशेषतः । तन्मध्ये विंशतिर्बाह्या द्विपदास्ते तु सर्वदा ॥६१०॥
घर में प्रशस्त आय—ध्वज अथवा गज आय में ऊँट और हाथी के रहने के लिए घर बनवाये तथा अन्य सब पशुओं के घर भी उसो (ध्वज ओर गज) आय में बनाने चाहिए । द्वार, शय्या, आसन, छाता और ध्वजा-इन सबों के निर्माण के लिए सिंह, वृष अथवा ध्वज आय होने चाहिए ॥५९९१/२॥ अब मैं नूतनगृह में प्रवेश के लिए वास्तुपूजा की विधि बताता हूँ-घर के मध्यभाग में तन्दुल (चावल) पर पूर्व से पश्चिम की ओर एक-एक हाथ लम्बो दस रेखायें खींचे । फिर उत्तर से दक्षिण की ओर भी उतनी ही लम्बी-चौड़ी दस रेखायें बनाये । इस प्रकार उसमें बराबर-बराबर ८१ पद (कोष्ठ) होते हैं । उनमें आगे बताये जाने वाले ४५ देवताओं का यथोक्त स्थान में नामोल्लेख करे । बत्तीस देवता बाहर (प्रान्त के कोष्ठ में) और तेरह देवता भीतर पूजनीय होते हैं । उन ४५ देवताओं के स्थान और नाम का क्रमशः वर्णन करता हूँ । किनारे के बत्तीस कोष्ठों में ईशान कोण से आरंभ करके क्रमशः बत्तीस देवता पूज्य हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं-कृपीट- योनि (अग्नि) १, पर्जन्य २, जयन्त ३, इन्द्र ४, सूर्य ५, सत्य ६, भृश ७, आकाश ८, वायु ९, पूषा १०, अनृत ११, गृहक्षत १२, यम १३, गन्धर्व १४, भृंगराज १५, मृग १६, पितर १७, दौवारिक १८, सुग्रीव १९, पुष्पदन्त २०, वरुण २१, असुर २२, शेष २३, राजयक्ष्मा २४, रोग २५, अहि २६, मुख्य २७, भल्लाटक २८, सोम २९, सर्प ३०, अदिति ३१, और दिति-ये चारों किनारों के देवता हैं । ईशान, अग्नि, नैऋत्य और वायु कोण के देवों के समीप क्रमशः आप ३३, सावित्र ३४, जय ३५, तथा रुद्र ३६ के पद हैं । ब्रह्मा के चारों ओर पूर्व आदि आठों दिशाओं में क्रमशः अर्यमा ३७, सविता ३८, विवस्वान् ३९, विबुधाधिप ४०, मित्र ४१, राजयक्ष्मा ४२, पृथ्वीधर ४३, आपवत्स ४४, हैं और मध्य के नव पदों में ब्रह्माजी (४५) को स्थापित करना चाहिए । इस प्रकार सब पदों में ये पेंतालीस देवता पूजनीय होते हैं । जैसे ईशान-कोण में आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि और दिति-ये पाँच देव एक पद होते हैं, उसी प्रकार अन्य कोष्ठों ये पाँच-पांच देवता भी एकपद के भागी हैं । अन्य जो बाह्य पंक्ति के (जयन्त, इन्द्र आदि) बीस देवता है, वे सब द्विपद दो-दो पदों के भागी हैं तथा ब्रह्मा से पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में जो अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर-ये चार देवता हैं, वे त्रिपद (तीन-तीन पदों के भागी) हैं, अतः वास्तु-विधि के ज्ञाता विद्वान् पुरुष को चाहिए कि ब्रह्माजी सहित इन एकपद, द्विपद तथा त्रिपद
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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६५ अर्यमा च विवस्वांश्च मित्रः पृथ्वोधराह्वयः । ब्रह्मणः परितो दिक्षु चत्वारस्त्रिपदाः स्मृताः ॥६११॥ ब्रह्माणं च तथैकद्वित्रिपदानर्चयेत्सुरान् । वास्तुमंत्रेण वास्तुज्ञो दूर्वादध्यक्षतादिभिः ॥६१२॥ ब्रह्ममंत्रेण वा श्वेतवस्त्रयुग्मं प्रदापयेत् । आवाहनादिसर्वोपचारांश्च क्रमशस्तथा ॥६१३॥ नैवेद्यं त्रिविधान्नेन वाद्यैः सह समर्पयेत् । ताम्बूलं च ततः कर्ता प्रार्थयेद्वास्तुपुरुषम् ॥६१४॥ वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्यानिरत प्रभो । मद्गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा ॥६१५॥ इति प्रार्थ्य यथाशक्त्या दक्षिणामर्चकाय च । दद्यात्तदग्रे विप्रेभ्यो भोजनं च स्वशक्तितः ॥६१६॥ अनेन विधिना सम्यग्वास्तुपूजां करोति यः । आरोग्यं च पुत्रलाभं धनं धान्यं लभेन्नरः ॥६१७॥ अकृत्वा वास्तुपूजां यः प्रविशेन्नवमंदिरम् । रोगान्नानाविधान्क्लेशानश्नुते सर्वसंकटम् ॥६१८॥ अकपाटमनाच्छन्नमदत्तबलिभोजनम् । गृहं न प्रविशेदेवं विपदामाकरं हि तत् ॥६१९॥ अथो यात्रां नृपादीनामभीष्टफल सिद्धये । स्यात्तथा तां प्रवक्ष्यामि सम्यग्विज्ञातजन्मनाम् ॥६२०॥ अज्ञातजन्मनां नृणां फलाप्तिर्घुणवर्णवत् । प्रश्नोदयनिमित्ताद्यैस्तेषामपि फलोदयः ॥६२१॥ षष्ठ्यष्टमीद्वादशीषु रिक्तामापूर्णमासु च । यात्रा शुक्लप्रतिपदि निर्द्धनाय क्षयाय च ॥६२२॥
देवताओं का वास्तुमन्त्रों द्वारा दूर्वा, दही, अक्षत, फूल, चन्दन, धूप, दीप और नैवेद्यादि से विधिवत् पूजन करे, अथवा ब्राह्म मंत्र से आवाहनादि षोडश (या पञ्च) उपचारों द्वारा उन्हें दो श्वेत वस्त्र समर्पित करे ॥६००-६१३॥ नैवेद्य में तीन प्रकार के (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य) अन्न मांगलिक गीत और वाद्य के साथ अर्पण करे। अन्त में ताम्बूल अर्पण करके वास्तुपुरुष की इस प्रकार प्रार्थना करे ॥६१४॥ (भूमि-शय्या पर शयन करने वाले वास्तुपुरुष ! आपको मेरा नमस्कार है । प्रभो ! आप मेरे घर को धन-धान्य से सम्पन्न करें ।) इस प्रकार प्रार्थना करके देवता के समक्ष पूजा कराने वाले (पुरोहित) को यथाशक्ति दक्षिणा दे तथा अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें भी दक्षिणा दे । जो मनुष्य सावधान होकर गृहारम्भ या गृह- प्रवेश के समय इस विधि से वास्तु-पूजा करता है, वह आरोग्य, पुत्र, धन और धान्य प्राप्त करके सुखी होता है । जो मनुष्य वास्तु-पूजा न करके नये घर में प्रवेश करता है, वह नाना प्रकार के रोग, क्लेश और संकट प्राप्त करता है ॥६१५-६१८॥ जिसमें किवाड़े न लगी हों, जिसके ऊपर से छत आदि के द्वारा छाया न गया हो तथा जिसके लिए (पूर्वोक्त रूप से वास्तुपूजन करके) देवताओं को बलि और ब्राह्मण आदि को भोजन न दिया गया हो, ऐसे नूतन गृह में कभी प्रवेश न करे; क्योंकि वह विपत्तियों की खान होता है ॥६१९॥ यात्रा-प्रकरण--अब मैं जिस प्रकार से यात्रा करने पर वह राजा तथा अन्य जनों के लिए अभीष्ट फल की सिद्धि कराने वाली होती है, उस विधि का वर्णन करता हूँ । जिनके जन्म-समय का ठीक-ठीक ज्ञान है, उन राजाओं तथा अन्य जनों को उस विधि से यात्रा करने पर उत्तम फल की प्राप्ति होती है । जिन मनुष्यों का जन्मसमय अज्ञात है, उनको तो घुणाक्षरन्याय से ही कभी फल की प्राप्ति होती है, तथापि उनको भी प्रश्न-लग्न से तथा निमित्त और शकुन आदि द्वारा शुभाशुभ देखकर यात्रा करने से अभीष्ट फल का लाभ होता है ॥६२०-६२१॥ यात्रा में निषिद्ध तिथियाँ—षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा और शुक्लपक्ष की प्रतिपदा—इन तिथियों में यात्रा करने से दरिद्रता तथा अनिष्ट की प्राप्ति होती है ॥६२२॥
४९६ नारदीयपुराणम् मैत्रादितीन्द्रर्क्षा त्याश्विविहरितिव्यवसूडुषु । असप्तपञ्चद्वयाद्येषु यात्राभीष्टफलप्रदाः ॥६२३॥ न मंदेंदुदिने प्राचीं न व्रजेद्दक्षिणं गुरौ । सिताक॑योर्न प्रतीचीं नोदीचीं ज्ञारयोर्दिने ॥६२४॥ इंद्राजपादवम्ब्वगस्यार्यमक्षांणि पूर्वतः । शूलानि सर्वद्वाराणि मित्राकॅज्याश्वभानि च ॥६२५॥ क्रमाद्दिग्द्वारभानि स्युः सप्तसप्ताग्निधिष्ण्यतः । पुर्धिं लंघयेद्दंडं नाग्निश्वसनदिग्गमम् ॥६२६॥ आग्नेयं पूर्वादिग्धिष्ण्यैर्विदिशश्चैवमेव हि । दिग्दाशयस्तु क्रमशो मेषाद्याश्च पुनः पुनः ॥६२७॥ दिगीश्वरे ललाटस्थे यातुर्न पुनरागमः । लग्नस्थो भास्करः प्राच्यां दिशि यातुर्ललाटगः ॥६२८॥ द्वादशैकादशः शुक्रोऽप्याग्नेय्यां तु ललाटगः । दशमस्थः कुजो लग्नाद्याम्यां यातुर्ललाटगः ॥६२६॥ नवमाष्टमगो राहुनैर्ऋत्यां तु ललाटगः । लग्नात्सप्तमंगः सौरिः प्रतीच्यां तु ललाटगः ॥६३०॥ षष्ठः पञ्चमगाश्चन्द्रो वायव्यां च ललाटगः । चतुर्थस्थानगः सौम्यश्चोत्तरस्यां ललाटगः ॥६३१॥ द्वित्रिस्थानगतो जीव ईशान्यां वै ललाटगः । ललाटं तु परित्यज्य जीवितेच्छुव्रजेन्नरः ॥६३२॥ विहित नक्षत्र--अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, रेवती, अश्वनी, श्रवण, पुष्य और धनिष्ठा-इन नक्षत्रों में यदि अपने जन्म-नक्षत्र से सातवीं, पाँचवीं और तीसरी तारा न हो तो यात्रा अभीष्ट फल को देने वाली होती है ।।६२३।। दिशाशूल--शनि और सोमवार के दिन पूर्व दिशा की ओर नहीं जाना चाहिए । गुरुवार को दक्षिण नहीं जाना चाहिए । शुक्र और रविवार को पश्चिम नहीं जाना चाहिए । तथा बुध और मंगल को उत्तर दिशा यात्रा नहीं करना चाहिए । ।।६२४।। ज्येष्ठा, पूर्वभाद्रपद, रोहिणी और उत्तरा फाल्गुनी-ये नक्षत्र क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में शूल होते हैं । सर्वदिग्गमन नक्षत्र-अनुराधा, हस्त, पुष्य और अश्विनी-ये चार नक्षत्र सब दिशाओं को यात्रा में प्रशस्त हैं ।।६२५।। दिग्द्वार-नक्षत्र- कृत्तिका से आरंभ करके सात-सात नक्षत्र-समूह पूर्वादि दिशाओं में रहते हैं। तथा अग्निकोण से वायुकोण तक परिघदण्ड रहता है; अतः इस प्रकार यात्रा करनी चाहिए, जिससे परिघदण्ड का लंघन न हो ।।६२६।। पूर्व के नक्षत्रों में अग्निकोण की यात्रा करे । इसी प्रकार दक्षिण के नक्षत्रों में अग्निकोण तथा पश्चिम और उत्तर के नक्षत्रों में वायुकोण की यात्रा कर सकते हैं । दिशाओं की राशियाँ- पूर्व आदि चार दिशाओं में मेष आदि १२ राशियाँ क्रमशः पुनः पुनः (तीन आवृत्ति से) आती हैं ।।६२७।। लालाटिक योग- जिस दिशा में यात्रा करनी हो, उस दिशा का स्वामी ललाटगत (सामने) हो तो यात्रा करने वाला लौटकर नहीं आता है। पूर्व दिशा में यात्रा करने वाले को लग्न में यदि सूर्य हो तो वह ललाटगत माना जाता है। यदि शुक्र लग्न से ग्यारहवें या बारहवें स्थान में हो तो अग्निकोण में यात्रा करने से, मगंल दशम भाव में हो तो दक्षिण यात्रा करने से, राहु नवें और आठवें भाग में हो तो नैऋत्यकोण की यात्रा से, शनि सप्तम भाव में हो तो पश्चिम-यात्रा से, चन्द्रमा पाँचवें और छठे भाव में हो तो वायुकोण की यात्रा से, बुध चतुर्थ भाव में हो तो उत्तर को यात्रा से, गुरु तीसरे और दूसरे भाव में हो तो ईशानकोण की यात्रा करने से ललाटगत होते हैं। जीवन की इच्छा रखने वाले मनुष्य इस ललाटयोग को त्यागकर यात्रा करे ।।६२८-६३२।।
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६७ विलोमगो ग्रहो यस्य यात्रालग्नोपगो यदि । तस्य भङ्गप्रदो राज्ञस्तद्वर्गोऽपि विलग्नगः ॥६३३॥ रव्योर्द्वयनयोर्यातमनुकूलं शुभप्रदम् । तदभावे दिवारात्रौ या यायाद्यातुर्वधोऽन्यथा ॥६३४॥ मूढे शुक्रे कार्यहानिः प्रतिशुक्रे पराजयः । प्रतिशुक्रकृतं दोषं हंतुं शक्ता ग्रहा न हि ॥६३५॥ वासिष्ठकाश्यपेयात्रिभारद्वाजाः सगौतमाः । एतेषां पञ्चगोत्राणां प्रतिशुक्रो न विद्यते ॥६३६॥ एकग्रामे विवाहे च दुर्भिक्षे राजविग्रहे । द्विजक्षोभे नृपक्षोभे प्रतिशुक्रो न विद्यते ॥६३७॥ नीचगोऽरिगृहस्थो वा वक्रगो वा पराजितः । यातुर्भंगप्रदः शुक्रः स्वोच्चस्थश्चेज्जयप्रदः ॥६३८॥ स्वाष्टलग्नेष्टराशौ वा शत्रुभात्त्राष्टमेऽपि वा । तेषामीशस्थराशौ वा यातुर्मृत्युर्न संशयः ॥६३९॥ जन्मेशाष्टमलग्रेशौ मिथो मित्रे व्यवस्थितौ । जन्मराश्यष्टपक्षोत्थदोषा नश्यंति भावतः ॥६४०॥ क्रूरग्रहेक्षितोयुक्तो द्विःस्वभावोऽपि भंगदः । याने स्थिरोदये नेष्टो भव्ययुक्तेक्षितः स्वयम् ॥६४१॥ वस्वंत्याद्यर्द्धादिपं च संग्रहं तृणकाष्ठयोः । याम्यदिग्गमनं शय्या न कुर्याद्गेहगोपनम् ॥६४२॥ लग्न में वक्रगति ग्रह या उसके षड्वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करने वाले राजाओं को पराजय होती है ॥६३३॥ अब जिस अयन में सूर्य और चन्द्रमा दोनों हों, उस समय उस दिशा की यात्रा शुभ फल देने वाली होती है। यदि दोनों भिन्न अयन में हों तो जिस अयन में सूर्य हों उधर दिन में तथा जिस अयन में चन्द्रमा हों उधर रात्रि में यात्रा शुभ होती है। अन्यथा यात्रा करने से यात्री की पराजय होती है ॥६३४॥ शुक्रदोष-शुक्र अस्त हों तो यात्रा में हानि होती है। यदि वह सम्मुख हो तो यात्रा करने से पराजय होती है। सम्मुख शुक्र के दोष को कोई भी ग्रह नहीं हटा सकता है। किन्तु वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भरद्वाज और गौतम-इन पाँच गोत्र वालों को सम्मुख शुक्र का दोष नहीं होता है। यदि एक ग्राम के भीतर ही यात्रा करनी हो या विवाह में जाना हो या दुर्भिक्ष होने पर अथवा राजाओं में युद्ध होने पर तथा राजा या ब्राह्मणों का कोप होने पर कहीं जाना पड़े तो इन अवस्थाओं में सम्मुख शुक्र का दोष नहीं होता है। शुक्र यदि नीच राशि में या शत्रुराशि में अथवा वक्रगति या पराजित हो तो यात्रा करने वालों की पराजय होती है। यदि शुक्र अपनी उच्च राशि (मीन) में हो तो यात्रा में विजय होती है ॥६३५-६३८॥ अपने जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम राशि या लग्न में तथा शत्रु की राशि से अष्टम राशि में या लग्न में अथवा इन सबों के स्वामी जिस राशि में हों उस लग्न या राशि में यात्रा करने वाले की निश्चय ही मृत्यु होती है। परन्तु यदि जन्मलग्नराशिपति और अष्टम राशिपति में परस्पर मैत्री हो तो उक्त अष्टम राशि- जन्य दोष स्वयं नष्ट हो जाता है ॥६३९-६४०॥ द्विस्वभाव लग्न यदि पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो यात्रा में पराजय होती है। तथा स्थिर राशि पापग्रह से युक्त न हो तो भी वह यात्रालग्न में अशुभ है। यदि स्थिर लग्न में शुभग्रह का योग या दृष्टि हो तो शुभ फल होता है ॥६४१॥ धनिष्ठा नक्षत्र के उत्तरार्ध से आरंभ करके (रेवती पर्यन्त) पांच नक्षत्रों में गृहार्थ तृणकाष्ठों का संग्रह, दक्षिण की यात्रा, शय्या (तकिया, पलंग आदि) का बनाना, घर को छवाना आदि कार्य नहीं करने चाहिये ॥६४२॥ ६३ ना० पु०
४६८ नारदीयपुराणम् जन्मोदये जन्मभे वा तयोरीशस्य भेऽपि वा । ताभ्यां तयोरिकेंद्रेषु यातुः शत्रुक्षयो भवेत् ॥६४३॥ शीर्षोदये लग्नगते द्विर्लग्ने लग्नगेऽपि वा । शुभवर्गोऽथ वा लग्ने यातुः शत्रुक्षयस्तदा ॥६४४॥ शत्रुजन्मोदये जन्मराशेर्वा निधनोदये । तयोरीशस्थिते राशौ यातुः शत्रुक्षयो भवेत् ॥६४५॥ वक्रः पन्था मीनलगने यातुमीनांशकेऽपि वा । निंद्यो निखिलयात्रासु घटलग्नो घटांशकः ॥६४६॥ जललग्नो जलांशो वा जलयोनेः शुभावहः । मूर्तिः कोशो धन्विन्वश्च वाहनं मंतसंज्ञकम् ॥६४७॥ शत्रुमार्गस्तथायुश्च मनोव्यापारसंज्ञिकम् । प्राप्तिरप्राप्तिरुदयाद्भावाः स्युर्द्वादशैव ते ॥६४८॥ घ्नंति क्रूरास्त्वयाप्तिवर्गं भावान्सूर्यमहीसुतौ । न निधनतो हि व्यापारं सौम्याः पुष्णंत्यर्रि विना ॥६४९॥ शुक्रोऽस्तं च न पुष्णाति मूर्ति मृत्युं च चंद्रमाः । याम्यदिग्गमनं त्यक्त्वा सर्वकाष्ठासु यायिनाम् ॥६५०॥ यदि यात्रालग्न में जन्मलग्न, जन्मराशि या इन दोनों के स्वामी हों अथवा जन्मलग्न या जन्मराशि से ३,६,११,१०वीं राशि हो तो शत्रुओं का नाश होता है ॥६४३॥ यदि शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुम्भ) तथा दिग्द्वार (यात्रा की दिशा) की राशि लग्न में हो अथवा किसी भी लग्न में शुभग्रह के वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करने वाले राजा के शत्रुओं का नाश होता है ॥६४४॥ शत्रु के जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम राशि या उन दोनों के स्वामी जिस राशि में हों, वह राशि यात्रालग्न में हो तो शत्रु का नाश होता है । मीन लग्न में या लग्नगत मीन के नवमांश में यात्रा करने से मार्ग टेढ़ा हो जाता है (अर्थात् बहुत घूमना पड़ता है) तथा कुम्भलग्न और लग्नगत कुम्भ का नवमांश भी यात्रा में अत्यन्त निन्दित है ॥६४६॥ जलचर राशि (कर्क, मीन) या जलचर राशि का नवमांश लग्न में हो तो नौका द्वारा नदी-नद आदि मार्ग से यात्रा शुभ होती है ॥६४६॥ लग्नभावों की संज्ञा—१ मूर्ति (तन), २ कोष (धन), ३धन्वी (पराक्रम, भ्राता), ४ वाहन (सवारी, माता), ५ मंत्र (विद्या, सन्तान), ६ शत्रु (रोग, मामा), ७ मार्ग (यात्रा, पति-पत्नी), ८ आयु (मृत्यु), ९ मन (अन्तःकरण, भाग्य), १० व्यापार (व्यवसाय, पिता), ११ प्राप्ति (लाभ), १२ अप्राप्ति (व्यय)-ये क्रम से लग्न आदि १२ स्थानों की संज्ञायें हैं ॥६४७-६४८॥ पापग्रह (शनि, रवि, मंगल, राहु तथा केतु तीसरे और ग्यारहवें को छोड़कर अन्य सब भावों में जाने से भावफल को नष्ट कर देते हैं। तीसरे और ग्यारहवें भाव में जाने से वे इन दोनों भावों को पुष्ट करते हैं। सूर्य और मंगल ये दोनों दशम भाव को भी नष्ट नहीं करते, अपितु दशम भाव में जाने से उस भावफल (व्यापार, पिता, राज्य तथा कर्म) को पुष्ट ही करते हैं और शुभग्रह (चन्द्र, बुध, गुरु तथा शुक्र) जिस भाव में जाते हैं, उस भावफल को पुष्ट ही करते हैं; केवल षष्ठ (६) भाव में जाने से उस भावफल (शत्रु और रोग) को नष्ट करते हैं ॥६४९॥ शुभ ग्रहों में शुक्र सप्तम भाव को और चन्द्रमा लग्न एवं अष्टम (१,८) को पुष्ट नहीं करते हैं (अपितु नष्ट ही करते हैं) । अभिजित्-प्रशंसा-अभिजित् मुहूर्त (दिन का मध्यकाल - १२ बजे से १ घड़ी आगे और १ घड़ी पीछे) अभीष्ट फल सिद्ध करने वाला योग है। यह दक्षिण दिशा की यात्रा छोड़कर अन्य दिशाओं की यात्रा में
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६६ अभिजित्क्षणयोगोऽयमभीष्टफलसिद्धिदः । पञ्चांगशुद्धिरहिते दिवसेऽपि फलप्रदः ॥६५१॥ यात्राद्योगा विचित्रास्तान् योगान्वक्ष्ये यतस्ततः । फलसिद्धिर्यागलग्नाद्राज्ञां विप्रस्य धिष्ण्यतः ॥६५२॥ मुहूर्तशक्तितोऽन्येषां शकुनैस्तस्करस्य च। केंद्रत्रिकोणे ह्येकेन योगः शुक्रज्ञसूरिणाम् ॥६५३॥ अधियोगो भवेद्द्वाभ्यां त्रिभिर्योगाधियोगकः । योगेऽपि यायिनां क्षेममधियोगे जयो भवेत् ॥६५४॥ योगाधियोगे क्षेमं च विजयोर्थविभूतयः । व्यापारशत्रुमूर्त्तिस्थैश्चन्द्रमन्ददिवाकरैः ॥६५५॥ रणे गतस्य भूपस्य जयलक्ष्मीः प्रमाणिका । शुक्रार्कज्ञाकिभौमेषु लग्नाश्वस्तविशत्रुषु ॥६५६॥ गतस्याग्रे वैरिचमूवह्नौ लाक्षेव लीयते । लग्नस्थे त्रिदशाचार्ये धनायस्थैः परग्रहैः ॥६५७॥ गतस्य राज्ञोऽरिसेना नीयते यममंदिरम् । लग्ने शुक्रे रवौ लाभे चन्द्रे बन्धुस्थिते यदा ॥६५८॥ गतो नृपो रिपूहंति केसरीवेभसंहतिम् । स्वोच्चसंस्थे सिते लग्ने स्वोच्चे चन्द्रे च लाभगे ॥६५९॥ हंति यातोऽरिघटतनां केशवः पूतनामिव । त्रिकोणे केंद्रगाः सौम्याः क्रूरास्त्वायारिगा यदि ॥६६०॥ यस्य यातेरलक्ष्मीस्तमुपैतीवाभिसारिका । जीवार्कचन्द्रा लग्नादिरंध्रगा यदि गच्छतः ॥६६१॥ शुभ फल देता है। इस (अभिजित् मुहूर्त) में पञ्चाङ्ग (तिथि-वारादि) शुभ न हो तो भी यात्रा में वह उत्तम फल देने वाला होता है ॥६५०-६५१॥ यात्रा योग--लग्न और ग्रहों की स्थिति से नाना प्रकार के यात्रा-योग होते हैं। अब उन योगों का वर्णन करता हूँ, क्योंकि राजाओं (क्षत्रियों) को योगबल से ही अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। ब्राह्मणों को नक्षत्र- बल से तथा अन्य मनुष्यों को मुहूर्त-बल से इष्टसिद्धि होती है। तस्करों को शकुनबल से अपने अभीष्ट की प्राप्ति होती है। ६५२॥ शुक्र, बुध और बृहस्पति-इन तीन में से कोई भी यदि केन्द्र या त्रिकोण में हो तो योग कहलाता है। यदि उनमें से दो ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तो (अधियोग) कहलाता है तथा तथा यदि तीनों लग्न से केन्द्र (१,४,७,१०) या त्रिकोण (५,९) में हों तो योगाधियोग कहलाता है ॥६५३॥ योग में यात्रा करने वालों का कल्याण होता है । अधियोग में यात्रा करने से विजय प्राप्त होती है और योगाधियोग में यात्रा करने वाले को कल्याण, विजय तथा सम्पत्ति का लाभ होता है ॥६५४॥ लग्न से दसवें स्थान में चन्द्रमा, षष्ठ स्थान में शनि और लग्न में सूर्य हों तो इस समय यात्रा करने वाले राजा को विजय तथा शत्रु की सम्पत्ति भी प्राप्त होती है ॥६५५॥ शुक्र, रवि, बुध, शनि और मंगल-ये पाँचों ग्रह क्रम से लग्न चतुर्थ, सप्तम, तृतीय और षष्ठ भाव में हों तो यात्रा करने वाले राजा के सम्मुख आये हुए शत्रुगण आग में पड़ी हुई लाह की तरह नष्ट हो जाते हैं ॥६५६॥ बृहस्पति लग्न में और अन्य ग्रह यदि दूसरे और ग्यारहवें भाव में हों तो इस योग में यात्रा करने वाले राजा के शत्रुओं की सेना यमराज के घर पहुँच जाती है ॥६५७॥ यदि लग्न में शुक्र, ग्यारहवें में रवि और चतुर्थ भाव में चन्द्रमा हो तो इस योग में यात्रा करने वाला राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे हाथियों के झुंड को सिंह ॥६५८॥ अपने उच्च (मीन) में स्थित शुक्र लग्न में हो अथवा अपने उच्च (वृष) चन्द्रमा लाभ (११) भाव में स्थित हो तो यात्रा करने वाला नरेश अपने शत्रु की सेना को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे भगवान् श्रीकृष्ण ने पूतना को नष्ट किया था ॥६५९॥ यदि यात्रा के समय शुभ ग्रह केन्द्र में या त्रिकोण में हों तो तथा पापग्रह तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थान में हों तो यात्रा करने वाले राजा के शत्रु की लक्ष्मी अभिसारिका के समान उसके समीप आ जाती है ॥६६०॥ गुरु, रवि और चन्द्रमा-ये क्रमशः लग्न, ६ और ८ में हों तो यात्रा करने वाले राजा के सामने दुर्जनों की मैत्री के समान शत्रुओं की सेना नहीं ठहरती है ॥६६१॥ यदि लग्न से ३, ६ ११ में पापग्रह
५०० नारदीयपुराणम् तस्याग्रे खलमैत्रीव न स्थिरा रिपुवाहिनी । त्रिखंडायेषु मन्दारौ बलवंतः शुभा यदि ॥६६२॥ यात्रायां नृपतस्तस्य हस्तस्था शत्रुमेदिनी । स्वोच्चस्थे लग्ने जीवे चंद्रे लाभगते यदि ॥६६३॥ गतो राजा रिपूहंति पिनाकी त्रिपुरं यथा । मस्तकोदयगे शुक्रे लग्नस्थे लाभगे गुरौ ॥६६४॥ गतो राजा रिपूहंति कुमारस्तारकं यथा । जीवे लग्नगते शुक्रे केंद्रे वापि त्रिकोणगे ॥६६५॥ गतो दहत्यरीन्द्राजा कृष्णवर्मा यथा वनम् । लग्नगे ज्ञे शुभे केंद्रे धिष्ण्ये चोबकुले गतः ॥६६६॥ नृपाः शुष्यंत्यरीन् ग्रीष्मे ह्रदिनीं वार्करश्मयः । शुभे त्रिकोणे केंद्रस्थे लाभे चंद्रेऽथवा रवौ ॥६६७॥ शत्रून्हन्ति गतो राजा ह्यंधकारं यथा रविः । स्वक्षेत्रगे शुभे केंद्रे त्रिकोणावगते गतः ॥६६८॥ विनाशयत्यरीन्द्राजा तूलराशिमिवानलः । इंदौ स्वस्थे गुरौ केंद्रे मंत्रः सप्रणवो गतः ॥६६६॥ नृपो हंति रिपून्सर्वान्पापान्पंचाक्षरो यथा । वर्गोत्तमगते शुक्रेऽप्येकस्मिन्नेव लग्नेगे ॥६७०॥ हरिस्मृतिर्यथाघौघान्हंति शत्रून् गतो नृपः । शुभे केंद्रे त्रिकोणस्थे चंद्रे वर्गोत्तमे गतः ॥६७१॥ सगोत्रारोन्नृपान् हंति यथा गोत्रांश्च गोत्रभित् । मित्रभेऽथ गुरौ केंद्रे त्रिकोणस्थेऽथ वा सिते ॥६७२॥ हों और शुभ ग्रह बलवान् होकर अपने उच्चादि स्थान में (स्थित) हों तो शत्रु की भूमि यात्रा करने वाले राजा के हाथ में आ जाती है ॥६६२३॥ अपने उच्च (कर्क) में स्थित बृहस्पति यदि लग्न में हों और चन्द्रमा ११ भाव में स्थित हों तो यात्रा करने वाला नरेश अपने शत्रु को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे त्रिपुरासुर को शंकर ने नष्ट किया था ॥६६३३॥ शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ) राशि में स्थित शुक्र यदि लग्न में हों और गुरु ग्यारहवें स्थान में हों तो यात्रा करने वाला पुरुष तारकासुर को कार्तिकेय के समान अपने शत्रु को नष्ट कर देता है ॥६६४३॥ गुरु लग्न में और शुक्र किसी केन्द्र या त्रिकोण में हों तो यात्री नरेश अपने शत्रुओं को वैसे ही भस्म कर देता है जैसे वन को दावानल ॥६६५३॥ यदि बुध लग्न में और अन्य शुभग्रह किसी केन्द्र में हों तथा नक्षत्र भी अनुकूल हो तो उसमें यात्रा करने वाला राजा अपने शत्रुओं को वैसे ही सोख लेता है, जैसे सूर्य की किरणें ग्रीष्मऋतु में क्षुद्र नदियों को सोख लेती हैं ॥६६६३॥ सम्पूर्ण शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तथा सूर्य या चन्द्रमा ग्यारहवें भाव में स्थित हों तो यात्रा करने वाला नरेश अन्धकार को सूर्य की भांति अपने शत्रु को नष्ट कर देता है ॥६६७३॥ शुभग्रह यदि अपनी राशि में स्थित होकर केन्द्र (१,४,७,१०) त्रिकोण (५,९) तथा आय (११) भाव में हो तो यात्रा करने वाला राजा रूई को अग्नि के समान अपने शत्रुओं को जलाकर भस्म कर देता है ॥६६८३॥ चन्द्रमा दसवें भाव में और वृहस्पति केन्द्र में हों तो उसमें यात्रा करने वाला राजा अपने सम्पूर्ण शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे प्रणव सहित पञ्चाक्षरमंत्र (ओं नमः शिवाय) पाप-समूह का नाश कर देता है ॥६६६३॥ अकेला शुक्र भी यदि वर्गोत्तम नवमांशगत लग्न में स्थित हो तो उसमें भी यात्रा करने से राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे पापों को श्रीभगवान् का स्मरण ॥६७०३॥ शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तथा चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांश में हो तो ऐसे समय में यात्रा करने से राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार सपरिवार नष्ट करता है, जैसे इन्द्र पर्वतों को ॥६७१३॥ बृहस्पति अथवा शुक्र अपने मित्र की राशि में होकर केन्द्र या त्रिकोण में हों तो ऐसे समय में यात्रा करने वाला भूपाल सर्पों को गरुड़ के समान अपने शत्रुओं को अवश्य नष्ट करता है ॥६७२॥ यदि एक भी ग्रह वर्गोत्तम नवमांश में स्थित होकर केन्द्र में हो तो
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०१ शत्रून्हंति गतो राजा भुजंगान् गरुडो यथा । शुभकेन्द्रत्रिकोणस्थे वर्गोत्तमगते गतः ॥६७३॥ विनाशयत्यरीन्द्राजा पापान्भागीरथी यथा । ये नृपा यान्त्यरीञ्जेतुं तेषां योगैर्नृपाह्वयैः ॥६७४॥ उपैति शांतिं कोपाग्निः शत्रुयोषाश्रुबिंदुभिः । बलक्षपक्षदशमीमासीषे विजयाभिधा ॥६७५॥ विजयस्तत्र यांतॄणां संधिर्वा न पराजयः । निमित्तशकुनादिभ्यः प्रधानं हि मनोजयः ॥६७६॥ तस्मान्मनस्विनां यत्नात्फलहेतुर्मनोदयः । उत्सवोपनयोद्वाहप्रतिष्ठाशौचसूतके ॥६७७॥ असमाप्त न कुर्वीत यात्रां मर्त्यो जिजीविषुः । महिषौंदुरयोर्युद्धे कलत्रकलहातवे ॥६७८॥ वस्त्रादेः स्खलिते क्रोधे दुरुक्ते न व्रजेन्नृपः । घृतान्नं तिलपिष्टान्नं मत्स्यान्नं घृतपायसम् ॥६७९॥ प्रागादिक्रमशो भुक्त्वा याति राजा जयत्यरीन् । सज्जिका परमान्नं च कांजिकं च पयो दधि ॥६८०॥ क्षीरं तिलोदनं भुक्त्वा भानुवारादिषु क्रमात् । कुल्माषांश्च तिलान्नं च दधि क्षौद्रं घृतं पयः ॥६८१॥ मृगमांसं च तत्सारं पायसं च खगं मृगम् । शशमांसं च षाष्टिक्यं प्रियंगुकमपूपकम् ॥६८२॥ चित्रांडजफलं कूर्मशवाविद्गोधांश्र्च शास्तकम् । हविष्यं कृशरान्नं च मुद्गान्नं यवपिष्टकम् ॥६८३॥ यात्रा करने वाला नरेश पाप समूह को गंगाजी के समान अपने शत्रुओं को क्षणभर में नष्ट कर देता है ॥६७३१/२॥ जो राजा शत्रुओं को जीतने के लिए उपर्युक्त राजयोगों में यात्रा करता है, उसका कोपानल शत्रुओं की स्त्रियों के अश्रुजल से शान्त होता है ॥६७४१/२॥ आश्विन मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि विजया कहलाती है। उसमें जो यात्रा करता है, उसे अपने शत्रुओं पर विजय होती है। अथवा शत्रुओं से सन्धि हो जाती है। किसी भी दशा में उसकी पराजय नहीं होती है ॥६७५१/२॥ मनोजय प्रशंसा—यात्रा आदि सभी कार्यों में निमित्त और शकुन आदि (लग्न एवं योग) की अपेक्षा भी मनोजय प्रबल है। इसलिए मनस्वी पुरुषों के लिए यत्नपूर्वक फलसिद्धि में मनोजय ही प्रधान कारण होता है ॥६७६ १/२॥ यात्रा में प्रतिबन्ध—यदि घर में उत्सव, उपनयन, विवाह, प्रतिष्ठा या सूतक उपस्थित हो तो जीवन की इच्छा रखने वालों को बिना उत्सव को समाप्त किये यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६७७१/२॥ यात्रा में अपशकुन—यात्रा के समय यदि परस्पर दो भैंसों या चूहों में लड़ाई हो, स्त्री से कलह हो या स्त्री को मासिक धर्म हुआ हो, वस्त्र आदि शरीर से खिसककर गिर पड़े, किसी पर क्रोध हो जाय या मुख से दुर्वचन कहा गया हो तो उस दशा में राजा को यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६७८१/२॥ दिशा, वार तथा नक्षत्र-दोहद—यदि राजा घृतमिश्रित अन्न खाकर पूर्व दिशा की यात्रा करे, तिलचूर्ण मिलाया हुआ अन्न खाकर दक्षिण दिशा को जाय और घृतमिश्रित खीर खाकर उत्तर दिशा की यात्रा करे तो निश्चय ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। रविवार को सज्जिका (मिसरी और मसाला मिला हुआ दही), सोमवार को खीर मंगलवार को कांजी, बुधवार को दूध, गुरुवार को दही, शुक्रवार को दूध तथा शनिवार को तिल और भात खाकर यात्रा करे तो शत्रुओं को जीत लेता है। अश्विनी में कुल्माष (कुलथी) भरणी में तिल, कृत्तिका में उड़द, रोहिणी में गाय का दही, मृगशिरा में गाय का घी, आर्द्रा में गाय का दूध, अश्लेषा में खीर, मघा में नीलकण्ठ का दर्शन, हस्त में षाष्टिक्य (साठी धान्य) के चावल का भात, चित्रा में प्रियंगु (कंगनी), स्वाती में अपूप (मालपूआ), अनुराधा में फल, उत्तराषाढ में चावल, अभिजित् में हविष्य, श्रवण में कृशरान्न (खिचड़ी), धनिष्ठा में मूंग,
५०२ नारदीयपुराणम् मत्स्यान्नं च विवित्तान्नं दध्यन्नं दत्तभाक्रमात् । भुक्त्वा राजेभाश्वरथनरैर्य्याति जयत्यरीन् ॥६८४॥ हुताशनं तिलैर्हुत्वा पूजयेत दिगीश्वरम् । प्रणम्य देवभूदेवानाशीर्वादैर्नृपो व्रजेत् ॥६८५॥ यद्वर्णवस्त्रगंधाद्यैस्तन्मंत्रेण विधानतः । इंद्रमैरावतारूढं शच्या सह विराजितम् ॥६८६॥ वज्रपाणिं स्वर्णवर्णं दिव्याभरणभूषितम् । सप्तहस्तं सप्तजिह्वं षण्मुखं मेषवाहनम् ॥६८७॥ स्वाहाप्रियं रक्तवर्णं स्रुक्स्रुवायुधधारिणम् । दंडाधुधं लोहिताक्षं यमं महिषवाहनम् ॥६८८॥ श्यामलं सहितं रक्तवर्णैरूध्र्वमुखं शुभम् । खङ्गचर्मधरं नीलं निर्र्ऋति नरवाहनम् ॥६८६॥ ऊर्ध्वकेशं विरूपाक्षं दीर्घग्रीवायुतं विभुम् । नागपाशधरं पीतवर्णं मकरवाहनम् ॥६९०॥ वरुणं कालिकानाथं रत्नाभरणभूषितम् । प्राणिनां प्राणरूपं तं द्विबाहुं दंडपाणिकम् ॥६९१॥ वायुं कृष्णमृगारूढं पूजयेदंजनीपतिम् । अश्वारूढं कुंभपाणिं द्विबाहुं स्वर्णसन्निभम् ॥६९२॥ कुबेरं चित्रलेखेशं यक्षगंधर्वनायकम् । पिनाकिनं वृषारूढं गौरीपतिमनुत्तमम् ॥६९३॥
शतभिषा में जौ का आटा, उत्तरभाद्रपद में खिचड़ी तथा रेवती में दही-भात खाकर राजा यदि हाथी, घोड़े, रथ या पालकी पर बैठकर यात्रा करे तो शत्रुओं पर विजय पाता है और उसका अभीष्ट सिद्ध होता है ॥६७९-६८४॥ यात्रा विधि—प्रज्वलित अग्नि में तिलों से हवन करके जिस दिशा में जाना हो, उस दिशा के स्वामी को उन्हीं के समान रंग वाले वस्त्र, गन्ध तथा पुष्प आदि उपचार अर्पण करके उन दिक्पालों के मन्त्रों द्वारा विधिपूर्वक उनका पूजन करे । फिर अपने इष्टदेव और ब्राह्मणों को प्रणाम करके ब्राह्मणों से आशीर्वाद लेकर राजा को यात्रा करनी चाहिए ॥६८५॥ दिक्पालों के स्वरूप का ध्यान—(१ पूर्व दिशा के स्वामी) देवराज इन्द्र शची देवी के साथ ऐरावत पर आरूढ हो सुशोभित हो रहे हैं। उनके हाथ में वज्र है। उनकी कान्ति सुवर्ण सदृश है तथा वे दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं। (२ अग्निकोण के अधीश्वर) अग्निदेव के सात हाथ, सात जिह्वायें और छह मुख हैं। वे भेड़ पर सवार हैं, उनकी कान्ति लाल है, वे स्वाहा देवी के प्रियतम हैं तथा स्रुक्-स्रुवा और नाना प्रकार के आयुध धारण करते हैं। (३ दक्षिण दिशा के स्वामी) यमराज का दण्ड ही अस्त्र है। उनकी आंखें लाल हैं और वे भैंसे पर आरूढ़ हैं। उनके शरीर का रंग कुछ लाली लिये हुए सांवला है। वे ऊपर की ओर मुंह किये हुए हैं तथा शुभस्वरूप हैं। (४ नैर्ऋत्यकोण के अधिपति) निर्ऋति का वर्ण नील है। वे अपने हाथों में ढाल और तलवार धारण किये हुए हैं; मनुष्य ही उनका वाहन है। उनकी आंखें भयंकर तथा केश ऊपर की ओर उठे हुए हैं। वे सामर्थ्य- शाली हैं और उनकी गर्दन बहुत बड़ी है। (५ पश्चिम दिशा के स्वामी) कालिका देवी के प्राणनाथ वरुण की अंगकांति पीली है। वे नाग पाश धारण करते हैं। ग्राह उनका वाहन है और रत्नमय आभूषणों से विभूषित हैं। (६ वायव्य कोण के अधिपति) अञ्जनीपति वायुदेव काले रंग के मृग पर आरूढ़ हैं। वे समस्त प्राणियों के प्राण- स्वरूप हैं। उनकी दो भुजाएं हैं। वे हाथ में कलश धारण करते हैं। उनकी अंग कान्ति सुवर्ण के सदृश है। ७ उत्तर दिशा के स्वामी कुबेर चित्रलेखा देवी के प्राणवल्लभ तथा यक्षों और गन्धर्वों के राजा हैं। (८ ईशानकोण के स्वामी) गौरीपति भगवान् शंकर हाथ में पिनाक लिये वृषभ पर आरूढ़ हैं। वे सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। उनकी अंग कान्ति श्वेत है। माथे पर चन्द्रमा का मुकुट सुशोभित है और सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं। (इस प्रकार इन सब दिक्पालों का ध्यान और पूजन करना चाहिए) ॥६८६-६९३॥
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०३ श्वेतवर्णं चन्द्रमौलिं नागयज्ञोपवीतिनम् । अप्रयाणे स्वयं कार्या प्रेष्या भूभुजस्तथा ॥६६४॥ कार्यं निर्गमनं छत्रं ध्वजशस्त्रास्त्रवाहनैः । स्वस्थानान्निर्गमस्थानं दंडानां च शतद्वयम् ॥६६५॥ चत्वारिंशद्द्वादशैव प्रस्थितः स स्वयं गतः । दिनान्येकत्र न वसेत्सप्तषड् वा परो जनः ॥६६६॥ पंचरात्रं च पुरतः पुनर्लग्नांतरे व्रजेत् । अकालजेषु नृपतिविद्युद्गर्जितवृष्टिषु ॥६६७॥ उत्पातेषु त्रिविधेषु सप्तरात्रं तु न व्रजेत् । रत्नाकुडचशिवाकाककपोतानां गिरस्तथा ॥६६८॥ झल्लेभूकूहेमवक्षोरस्वराणां वामतो गतिः । पीतकारभरद्वाजपक्षिणां दक्षिणा गतिः ॥६६९॥ चापं त्यक्त्वा चतुष्पात्तु शुभदा वामतो मताः । कृष्णं त्यक्त्वा प्रयाणे तु कृकलासेन वीक्षितः ॥७००॥ वाराहशशगोधास्तु सर्पाणां कीर्तनं शुभम् । हृतेक्षणं नेष्टमेवव्यत्ययं कपिऋक्षयोः ॥७०१॥ मयूरच्छागनकुलचाषपारावताः शुभाः । दृष्टमात्रेण यात्रायां व्यस्तं सर्वं प्रवेशने ॥७०२॥ यात्रासिद्धिर्भवेद्दृष्टे शवेरोदनवर्जिते । प्रवेशे रोदनयुतः शवः शवप्रदस्तथा ॥७०३॥
प्रस्थानविधि—यदि किसी आवश्यक कार्यवश निश्चित यात्रालग्न में राजा स्वयं न जा सके तो छत्र, ध्वजा, शस्त्र, अस्त्र या वाहन में से किसी एक वस्तु को यात्रा के निर्धारित समय में घर से निकालकर जिस दिशा में जाना हो उसी दिशा की ओर दूर रखा दे । अपने स्थान से निर्गमस्थान (प्रस्थान रखने की जगह) २०० दण्ड (चार हाथ की लग्गी) से दूर होना उचित है । अथवा चालीस या कम से कम बारह दण्ड की दूरी होनी आवश्यक है । राजा स्वयं प्रस्तुत होकर जाय तो किसी एक स्थान में सात दिन न ठहरे । अन्य (राजमन्त्री तथा साधारण) जन भी प्रस्थान करके एक स्थान में छह या पाँच दिन न ठहरे । यदि इससे अधिक ठहरना पड़े तो उसके बाद दूसरा शुभ मुहूर्त और उत्तम लग्न विचार कर यात्रा करनी चाहिए । ॥६६४-६९६॥ असमय में (पौष से चैत्र पर्यन्त) बिजली चमके मेघ की गर्जना हो या वर्षा होने लगे तथा त्रिविध (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) उत्पात होने लग जाय तो राजा को सात रात तक अन्य स्थानों की यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६६७॥ शकुन—यात्राकाल में रत्ना नामक पक्षी, चूहा, सियारिन, कौवा तथा कबूतर—इनके शब्द वामभाग में सुनायी दें तो शुभ होता है। छछूँदर, पिंगला (उल्लू), पल्ली और गदहा—ये यात्रा के समय वाम भाग में हों तो श्रेष्ठ हैं। कोयल, तोता और भरदूल आदि पक्षी यदि दाहिने भाग में आ जायं तो श्रेष्ठ हैं। काले रंग को छोड़कर अन्य सब रंगों के चौपाये यदि वाम भाग में दीख पड़ें तो श्रेष्ठ हैं तथा यात्रासमय में कृकलास (गिरगिट) का दर्शन शुभ नहीं है ॥६६८-७००॥ यात्राकाल में सूअर, खरगोश, गोधा (गोह) और सर्पों की चर्चा शुभ होती है, किसी भूली हुई वस्तु को खोजने के लिए जाना हो तो इनकी चर्चा अशुभ होती है। वानर और भालुओं की चर्चा का विपरीत फल होता है ॥७०१॥ यात्रा में मोर, बकरा, नेवला, नीलकंठ और कबूतर दीख जायं तो, इनके दर्शनमात्र से शुभ होता है; परन्तु लौटकर अपने नगर में आने या घर में प्रवेश करने के समय ये दर्शन दें तो सब अशुभ होता है। यात्राकाल में रोदन-शब्दरहित कोई शव सामने दीख पड़े तो यात्रा के उद्देश्य की सिद्धि होती है। परन्तु लौटकर घर आने तथा नवीन गृह में प्रवेश करने के समय यदि रोदन-शब्द के साथ शव दिखाई पड़े तो वह घातक होता है ॥७०२-७०३॥
५०४ नारदीयपुराणम् पतितक्लीबजटिलमत्तवांतौषधादिभिः । अभ्यक्तवसास्थिचर्माङ्गारदारुणरोगिभिः ॥७०४॥ गुडकार्पासलवणरिपुप्रश्नतृणोरगैः । वंध्याकुब्जककाषायमुक्तकेशबुभुक्षितैः ॥७०५॥ प्रयाणसमये नग्नैर्दृष्टैः सिद्धिर्न जायते । प्रज्वलाग्निसुतुरगनृपासनपुरांगनाः ॥७०६॥ गंधपुष्पाक्षतच्छत्रचामरांदोलिकं नृपः । भक्ष्येक्षुफलमृत्स्नान्नमध्वाज्यदधिगोमयाः ॥७०७॥ मद्यमांससुधाधौतवस्त्रशंखवृषध्वजाः । पुण्यस्त्रीपुण्यकलशरत्नशृङ्गारगोद्विजाः ॥७०८॥ भेरीमृदंगपटहघंटावीणादिनिःस्वनाः । वेदमंगलघोषाः स्युः यायिनां कार्यसिद्धिदाः ॥७०६॥ आदौ विह्वद्द्शकुनं दृष्ट्वा यायीष्टदेवताम् । स्मृत्वा द्वितीये विप्राणां कृत्वा पूजां निवर्तयेत् ॥७१०॥ सर्वदिक्क्षुतं नेष्टं गोक्षुतं निधनप्रदम् । अफलं यद्बालवृद्धरोगिपैत्तसिकैः कृतम् ॥७११॥ परस्त्री द्विजदेवस्वं तत्स्पृशेद्दिग्गजाश्वकान् । हन्यात्परपुरप्राप्तौ न स्त्रीन्नित्यं निरायुधान् ॥७१२॥ आदौ सौम्यायने कार्य नववास्तुप्रवेशनम् । विधाय पूर्वदिवसे वास्तुपूजाबलिक्रियाम् ॥७१३॥ माघफाल्गुनवैशाखज्येष्ठमासेषु शोभनम् । प्रवेशो मध्यमो ज्ञेयः सौम्यकार्तिकमासयोः ॥७१४॥
अपशकुन—यात्रा के समय पतित, नपुंसक, जटाधारी, पागल, औषध आदि खाकर वमन करने वाला, शरीर में तेल लगाने वाला, वसा, अस्थि, चर्म, अंगार, दीर्घरोगी, गुड़, कपास, नमक, प्रश्न (पूछने या रोकने का शब्द), तृण, गिरगिट, वन्ध्या स्त्री, कुबड़ा, गेरुआ वस्त्रधारी, खुले केश वाला, भूखा तथा नंगा—ये सब सामने उपस्थित हो जायें तो अभीष्ट-सिद्धि नहीं होती है ॥७०४-७०५॥
शुभ शकुन—प्रज्वलित अग्नि, सुन्दर घोड़ा, राजसिंहासन, सुन्दरी स्त्री, चन्दन आदि की सुगंध, फल, अक्षत, छत्र, चामर, डोली या पालकी, राजा, खाद्य पदार्थ, ईख, फल, चिकनी मिट्टी, अन्न, मधु, घृत, दही, गोबर, मद्य, मांस, चूना, धुला हुआ वस्त्र, शंख, श्वेत बैल, ध्वजा, सौभाग्यवती स्त्री, भरा हुआ कलश, रत्न, शृंगार, स्वर्णपात्र या अभिषेकपात्रों गो, ब्राह्मण, नगाड़ा, मृदंग, दुंदुभि, घंटा तथा वीणा आदि वाद्यों के शब्द, वेदमंत्र एवं मंगल गीत आदि के शब्द—ये यात्रा के समय यदि देखने या सुनने में आयें तो यात्रा करने वाले लोगों के सब कार्य सिद्ध करते हैं ॥७०६-७०९॥
अपशकुन-परिहार—यात्रा के समय प्रथम बार अपशकुन हो तो खड़ा होकर इष्टदेव का स्मरण करके फिर चले । दूसरा अपशकुन हो तो ब्राह्मणों की पूजा करके चले । यदि तीसरी बार अपशकुन हो जाय तो यात्रा स्थगित कर देनी चाहिए ॥७१०॥
छींक के फल—यात्रा के समय सभी दिशाओं की छींक निन्दित है। गौ की छींक घातक होती हैं; किन्तु बालक, वृद्ध, रोगी या कफ वाले मनुष्य की छींक निष्फल होती है ॥७११॥
परस्त्रियों का स्पर्श करने वाला तथा ब्राह्मण और देवता के धन का अपहरण करने वाला तथा अपने छोड़े हुए हाथी और घोड़े को बाँध लेने वाला, शत्रु यदि सामने आ जाय तो राजा उसे अवश्य मार डाले; परन्तु स्त्रियों तथा शस्त्रहीन मनुष्यों पर कदापि हाथ न उठाये ॥७१२॥
गृह प्रवेश—नये घर में प्रथम बार प्रवेश करना हो तो उत्तरायण के शुभ मुहूर्त में करे । पहले दिन विधिपूर्वक वास्तु-पूजा और बलि अर्पण करके गृह में प्रवेश करना चाहिए ॥७१३॥ गृह-प्रवेश में विहित मास—माघ,फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ—इन चार मासों में गृह प्रवेश श्रेष्ठ होता है । कार्तिक और मार्गशीर्ष मास में मध्यम है ।
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०५
शशौज्यौतेषु वरुणत्वाष्ट्रमित्रस्थिरोडुषु । शुभः प्रवेशो देवेज्यशुक्रयोर्दृश्यमानयोः ॥७१५॥ व्यर्करारवारे तिथिषु रिक्तामावर्जितेषु च । दिवा वा यदि वा रात्रौ प्रवेशो मंगलप्रदः ॥७१६॥ चन्द्रताराबलोपेते पूर्वाह्ने शोभने दिने । स्थिरलग्ने स्थिरांशे च नैधने शुद्धिसंयुते ॥७१७॥ त्रिकोणकेन्द्रसंस्थैश्च सौम्यैस्तृपायारिगैः परैः । लग्नांत्याष्टमषष्ठस्थवर्जितेन हिमांशुना ॥७१८॥ कर्तुर्वा जन्मभे लग्ने ताभ्यामुपचयेऽपि वा । प्रवेशलग्ने स्याद्वृद्धिरन्यथे शोकनिःस्वता ॥७१९॥ दर्शनीयं गृहं रम्यं विविधैर्मंगलस्वनैः । कृत्वाकं वामतो विद्वान्भृंगारं चाग्रतो विशेत् ॥७२०॥ वर्षप्रवेशे शशिनि जलराशिगतेऽपि वा । केंद्रगे वा शुक्लपक्षे चातिवृष्टिः शुभेक्षिते ॥७२१॥ अल्पवृष्टिः पापखण्डे प्रावृट्कालेऽचिराद्भवेत् । चंद्रश्चेद्भार्गवे सर्वमेवं विधुगुणान्विते ॥७२२॥ प्रावृषींदुः सितात्सप्तराशिगः शुभवीक्षितः । मंदात्त्रिकोणसप्तस्थो यदि वा वृद्धिकृद्भवेत् ॥७२३॥ सद्यो वृष्टिकरः शुक्नो यदा बुद्धसमीपगः । तयोर्मध्यगते भानौ भवेद्वृष्टिविनाशनम् ॥७२४॥
विहित नक्षत्र- मृगशिरा, पुष्य, रेवती, शतभिषा, चित्रा, अनुराधा और स्थिर-संज्ञक (तीनों उत्तरा) और रोहिणी नक्षत्रों में बृहस्पति और शुक्र दोनों उदित हों तब रवि और मंगल को छोड़कर अन्य वारों में रिक्ता (४, ९, १४) तथा अमावास्या को छोड़कर अन्य तिथियों में दिन या रात्रिके समय गृहप्रवेश शुभप्रद होता है। चन्द्रबल और ताराबल सहित उपद्रवरहित दिन के पूर्वाह्न भाग में स्थिर राशि के नवमांशयुक्त स्थिर लग्न में जब लग्न से अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हों, शुभग्रह त्रिकोण या केन्द्र में हों, पापग्रह ३, ६, ११ भावों में हों और चन्द्रमा लग्न, १२, ८, ६ से भिन्न स्थानों में हो, तब गृहप्रवेश करने वाले यजमान की जन्मराशि, जन्मलग्न या इन दोनों से उपचय (३, ६, १०, ११वीं) राशि के गृहप्रवेश लग्न में विद्यमान होने पर सब प्रकार के सुख और सम्पत्ति की वृद्धि होती है। अन्यथा इससे विपरीत समय में गृहप्रवेश किया जाय तो शोक और निर्धनता प्राप्त होती है ॥७१४-७१९॥
प्रवेश-विधि- जिस नूतन गृह में प्रवेश करना हो उसको चित्र आदि से सजाकर तथा पुष्प, तोरण आदि से अलंकृत करके वेदध्वनि, शान्तिपाठ, सौभाग्यवती स्त्रियों के मांगलिक गीत तथा वाद्य आदि के शब्दों के साथ सूर्य को वाम भाग में रखकर जल से भरे हुए कलश को आगे करके उसमें प्रवेश करना चाहिए ॥७२०॥
वृष्टि-विचार- वर्षा-प्रवेश (आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य के प्रवेश) के समय यदि शुक्लपक्ष हो, चन्द्रमा जलचर राशि में या लग्न से केन्द्र (१, ४, ७, १०) में स्थित होकर शुभग्रह से देखे जाते हों तो अधिक वृष्टि होती है। यदि उस समय चन्द्रमा पर पापग्रह की दृष्टि हो तो दीर्घकाल में अल्पवृष्टि समझनी चाहिए। (यदि चन्द्रमा पर पाप और शुभ दोनों ग्रहों की दृष्टि हो तो मध्यम वृष्टि होती है, जिस प्रकार चन्द्रमा से फल कहा गया है, उसी प्रकार उस समय शुक्र से भी समझना चाहिए। (अर्थात् सूर्य के आर्द्रा-प्रवेश के समय चन्द्रमा और शुक्र दोनों की स्थिति देखकर तारतम्य से फल समझना चाहिए ॥७२१-७२२॥
वर्षाकाल में आर्द्रा से स्वाती तक सूर्य के रहने पर चन्द्रमा यदि शुक्र से सप्तम स्थान में अथवा शनि से पञ्चम, नवम तथा सप्तम स्थान में हो, उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि पड़े तो उस समय अवश्य वर्षा होती है ॥७२३॥
यदि बुध और शुक्र समीपवर्ती (एक राशि में स्थित) हों तो तत्काल वर्षा होती है। किन्तु उन दोनों (बुध और शुक्र) के बीच में सूर्य हो तो वृष्टि का अभाव होता है ॥७२४॥ ६४ ना० पृ०
५०६ नारदीयपुराणम् मघादिपंचधिष्ण्यस्थःपूर्वे स्वातित्रये परे । प्रवर्षणं भृगुः कुर्याद्विपरीते न वर्षणम् ॥७२५॥ पुरतः पृष्ठतो भानोर्ग्रहा यदि समीपगाः । तदावृष्टिं प्रकुर्वन्ति न ते चेत्प्रतिलोमगाः ॥७२६॥ वामभागस्थितः शुक्नो वृष्टिकृच्चेत्तु याम्यगः । उदयास्तेषु वृष्टिः स्याद्भानोरार्द्राप्रवेशने ॥७२७॥ संध्ययोः सस्यवृद्धिः स्यात्सर्वसंपन्नृणान्निशि । स्तोकवृष्टिरनर्घः स्याद्वृष्टिः सस्यसंपदः ॥७२८॥ आर्द्रोदयेग्रभिन्ना चेद्मवेदिति न संशयः । चन्द्रेज्ये ज्ञेय वा शुक्रे केन्द्रेन्वीतिर्विनश्यति ॥७२६॥ पूर्वाषाढां गतो भानुर्जीमूतैः परिवेष्टितः । वर्षत्यार्द्रोदिमूलांतं प्रत्यक्षं प्रत्यहं तथा ॥७३०॥ वृष्टिश्चेत्पौष्णभे तस्माद्दशर्वेषु न वर्षति । सिंहे भिन्ने कुजो वृष्टिरभिन्ने कर्कटे तथा ॥७३१॥ कन्योदये प्रभिन्ने चेत्सर्वदा वृष्टिरुत्तमा । अहिर्बुध्न्यं पूर्वशस्यं परशस्या च रेवती ॥७३२॥ भरणी सर्वसस्या च सर्वनाशाय चाश्विनी । गुरोः सप्तमराशिस्थः प्रत्यग्गो भृगुजो यदा ॥७३३॥ तदातिवर्षणं भूरि प्रावृट्काले बलोज्झिते । आसप्तमक्षं शशिनः परिवेषगतोत्तरा ॥७३४॥ विद्युत्प्रपूर्णमंडूकास्वनावृष्टिर्भवेत्तदा । यदा प्रत्यङ्नता मेघाः खसप्तोपरि संस्थिताः ॥७३५॥ पतंति दक्षिणस्था ये भवेद्वृष्टिस्तदाचिरात् । नखैल्लिखन्तोमार्जाराइचावनिं लोहसंयुते ॥७३६॥ यदि मघा आदि पाँच नक्षत्रों में शुक्र पूर्व दिशा में उदित हों और स्वाती तीन नक्षत्रों (स्वाती, विशाखा, अनुराधा) में शुक्र पश्चिम दिशा में उदित हो तो निश्चय ही वर्षा होती है, इससे विपरीत हो तो वर्षा नहीं समझनी चाहिए ॥७२५॥ यदि सूर्य के समीप (एक राशि के भीतर होकर) कोई ग्रह आगे या पीछे पड़ते हों तो वे वर्षा अवश्य करते हैं। यदि उनकी गति वक्र न हुई हो ॥७२६॥ सूर्य के वाम भाग में शुक्र हो तो वृष्टिकारक होता है। आर्द्रा में प्रवेश के समय शुक्र दक्षिण में हो तो उदय और अस्त के समय वर्षा होती है। यदि सूर्य का आर्द्रा-प्रवेश सन्ध्या के समय हो तो सस्य (धान्य) की वृद्धि होती है। यदि रात्रि में हो तो मनुष्यों को सब प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त होती है। यदि प्रवेश काल में चन्द्रमा, गुरु, बुध एवं शुक्र से आर्द्रा भेदित हो तो क्रमशः अल्पवृष्टि, धान्यहानि, अनावृष्टि और धान्यवृष्टि होती है; इसमें संशय नहीं है। यदि ये चारों चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र प्रवेश-लग्न से केन्द्र में पड़ते हों तो ईति (खेती के टिड्डी आदि सब उपद्रव) का नाश होता है ॥७२७-७२९॥ यदि सूर्य पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में प्रवेश के समय मेघों से आच्छन्न हो तो आर्द्रा से मूल तक प्रतिदिन वर्षा होती हैं। सिंह-प्रवेश में लग्न यदि मंगल से भिन्न (भेदित) हो, कर्क-प्रवेश में अभिन्न हो एव कन्या प्रवेश में भिन्न हो तो उत्तम वृष्टि होती है ॥७३०-७३१३॥ उत्तर भाद्रपद पूर्वधान्य, रेवती परधान्य तथा भरणी सर्वधान्य नक्षत्र है । अश्विनी को सर्वधान्यों का नाशक नक्षत्र कहा गया है। वर्षा काल (चातुर्मास्य) में पश्चिम उदित हुए शुक्र यदि गुरु से सप्तम राशि में निर्बल हो तो आर्द्रा से सात नक्षत्र तक प्रतिदिन अतिवृष्टि होती है। चन्द्रमण्डल में परिवेष (घेरा) हो और उत्तर दिशा में बिजली दीख पड़े या मेढ़कों के शब्द सुनाई पड़े तो निश्चय ही वर्षा होती है। पश्चिम भाग में लटका हुआ मेघ यदि आकाश के बीच में होकर दक्षिण दिशा में जाय तो शीघ्र वर्षा होती है। बिलाव अपने नाखूनों से धरती को खोदे, लोहे (तथा तांबे और काँसे आदि) में मल जमने लगे अथवा बहुत से बालक मिलकर सड़कों पर पुल बाँधे तो ये वर्षा के सूचक चिह्न हैं ॥७३२-७३६३॥
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०७
रथ्यायां सेतुबंधाः स्युर्बालानां वृष्टिहेतवः । पिपीलिकाश्रेणयश्छिन्नाः खद्योता बहवस्तदा ॥७३७॥ द्रुमादिरोहःसर्पाणां प्रीतिर्दुर्विष्टिसूचकाः । उदयास्तमये काले विवर्णोऽर्कोथ वा शशी ॥७३८॥ मधुवर्णोऽतिवायुश्चेदतिवृष्टिर्भवेत्तदा । प्राङ्मुखस्य तु कूर्मस्य नवांगेषु धरामिमाम् ॥७३८½॥ विमज्य नवधा खण्डे मंडलानि प्रदक्षिणम् । अन्तर्वेदाश्च पांचालस्तस्येदं नाभिमण्डलम् ॥७४०॥ प्राच्यामागधलाटोत्था देशास्तन्मुखमंडलम् । स्त्रीकौलिंगकिराताख्या देशास्तद्द्बाहुमंडलम् ॥७४१॥ अवंती द्रविडा भिल्ला देशास्तत्पार्श्वमण्डलम् । गौडकौंकणशाल्वांध्रपौंड्रस्तत्पादमण्डलम् ॥७४२॥ सिंधुकाशिमहाराह्रूसौराष्ट्राः पुच्छमण्डलम् । पुलिंदचीनयवनगुर्जराः पादमंडलम् ॥७४३॥ कुरुकाश्मीरमाद्रेयमत्स्यास्तत्पार्श्वमण्डलम् । खसांगवंगवाहीकं कांबोजाः पाणिमंडलम् ॥७४४॥ कृत्तिकादीनि धिष्ण्यानि त्रीणि त्रीणि क्रमान्न्यसेत् । नाभ्यादिषु नवांगेषु पापैर्दुष्टं शुभैः शुभम् ॥७४५॥ देवता यत्र नृत्यंति पतंति प्रज्वलंति च । मुहु रुदंति गायंति प्रस्विद्यंति हसंति च ॥७४६॥ वमंत्यग्नि तथा धूमं स्नेहं रक्तं पयो जलम् । अधोमुखाधितिष्ठंति स्थानात्स्थानं व्रजंति च ॥७४७॥ एवमाद्या हि दृश्यंते विकाराः प्रतिमासु च । गंधर्वनगरं चैव दिवा नक्षत्रदर्शनम् ॥७४८॥
चींटी की पंक्ति छिन्न-भिन्न हो जाय, आकाश में बहुतेरे जुगुनू दीख पड़ें तथा सर्पों का वृक्ष पर चढ़ना और प्रसन्न होना देखा जाय तो ये सब दुवृष्टिसूचक हैं । उदय या अस्त समय में यदि सूर्य या चन्द्रमा का रंग बदला हुआ जान पड़े या उनकी कान्ति मधु के समान दीख पड़े तथा बड़े जोर की हवा चलने लगे तो अतिवृष्टि होती है ॥ ७३७-७३८½ ॥ पृथ्वी के आधार कूर्म के अंग-विभाग--कूर्म देवता पूर्व की ओर मुख करके स्थित हैं, उनके नव अंगों में इस भारत भूमि के नौ विभाग करके प्रत्येक खंड में प्रदक्षिण-क्रम से विभिन्न मंडलों (देशों) को समझे। अन्त- र्वेदी (मध्य विभाग) में पाञ्चालदेश स्थित है, वहाँ कूर्म भगवान् का नाभिमण्डल है। मगध और लाटदेश पूर्व दिशा में विद्यमान हैं, वे ही उनका मुखमण्डल हैं। स्त्री, कलिंग और किरात देश भुजा हैं। अवन्ती, द्राविड़ और भिल्ल देश उनका दाहिना पार्श्व हैं। गौड, कोंकण, शाल्व, आन्ध्र और पौण्ड्र ये सब देश दोनों अगले पैर हैं। सिन्ध, काशी, महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्रदेश पुच्छभाग हैं। पुलिन्द, चीन, यवन और गुर्जर ये सब देश दोनों पिछले पैर हैं। कुरु, काश्मीर, मद्र तथा मत्स्यदेश वाम पार्श्व हैं। खस (नेपाल), अंग, वंग, बाह्लीक और काम्बोज-ये दोनों हाथ हैं ॥७३९-७४४॥ इन नवों अंगों में क्रमशः कृत्तिका आदि तीन-तीन नक्षत्रों का न्यास करे । जिस अंग के नक्षत्र में पापग्रह रहते हैं, उस अंग के देशों में तब तक अशुभ फल होता है और जिस अंग के नक्षत्रों में शुभग्रह रहते हैं; उस अंग के देशों में शुभ फल होते हैं ॥७४५॥ मूर्ति-प्रतिमा-विकार--देवताओं की प्रतिमा यदि नीचे गिर पड़े, जले, बार-बार रोये, गाये, पसीने से तर हो जाय, हँसे, अग्नि, धुआँ, तेल, शोणित, दूध या जल का वमन करे, अधोमुख हो जाय, एक स्थान से दूसरे स्थान में चली जाय तथा इसी तरह की अनेक अद्भुत बातें दीख पड़ें तो ये प्रतिमा-विकार कहलाते हैं। ये विकार अशुभ फल के सूचक होते हैं ॥७४६-७४७½॥ विविध विकार--यदि आकाश में गन्धर्व-नगर (ग्राम के समान आकार), दिन में ताराओं का दर्शन, उल्कापतन, काष्ठ, तृण और शोणित की वर्षा, गन्धर्वो का दर्शन, दिग्दाह, दिशाओं में धूम्न छा जाना, दिन या
५०८ नारदीयपुराणम् महोल्कापतनं काष्ठतृणरक्तप्रवर्षणम् । गांधर्वं देहदिग्धूमं भूमिकंपं दिवा निशि ॥७४८॥ अनग्नौ च स्फुलिङ्गाश्चज्वलनं च विनेंधनम् । निशीन्द्रचापमंडकं शिखरे श्वेतवायसः ॥७५०॥ दृश्यंते विस्फुलिङ्गाश्च गोगजाश्वोष्ट्रगात्रतः । जंतवो द्वित्रिशिरसो जायते वापि योनिषु ॥७५१॥ प्रातः सूर्याश्चतसृषु ह्यादितायुगपद्रवेः । जम्बूकग्रामसंवासः केतूनां च प्रदर्शनम् ॥७५२॥ काकानामाकुलं रात्रौ कपोतानां दिवा यदि । अकाले पुष्पिता वृक्षा दृश्यंते फलिता यदि ॥७५३॥ कार्यं तच्छेदनं तत्र ततः शांतिर्मनीषिभिः । एवमाद्या महोत्पाता बहवः स्थाननाशदाः ॥७५४॥ केचिन्मृत्युप्रदाः केचिच्छत्रुभ्यश्च भयप्रदाः । मभ्याद्भयं यशो मृत्युः क्षयः कीर्तिः सुखासुखम् ॥७५५॥ ऐश्वर्यं धनहानि च मधुच्छन्नं च वाल्मिकम् । इत्यादिषु च सर्वेषूत्पातेषु द्विजसत्तम ॥७५६॥ शांतिं कुर्यात्प्रयत्नेन कल्पोक्तविधिना शुभम् । इत्येतत्कथितं विप्र ज्यौतिषं ते समासतः ॥७५७॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि च्छंदःशास्त्रमनुत्तमम् ॥७५८॥ इति श्रीबृहन्ना० पूर्व० बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५६॥
रात्रि में भूकम्प होना, बिना आग के स्फुलिंग (अंगार) दीखना, बिना लकड़ी के आग का जलना, रात्रि में इन्द्र- धनुष या परिवेष (घेरा) दीखना, पर्वत या वृक्षादि के ऊपर उजला कौआ दिखाई देना तथा आग को चिनगारियों का प्रकट होना आदि बातें दिखाई देने लगें, गो, हाथी और घोड़ों के दो या तीन मस्तक वाला बच्चा पैदा हो । प्रातःकाल एक साथ ही चारों दिशाओं में अरुणोदय-सा प्रतीत हो, गांवों में गीदड़ों का दिन में वास हो, धूम- केतुओं का दर्शन होने लगे ।।७४८-७५२।। तथा रात्रि में कौओं का और दिन में कबूतरों का क्रन्दन हो तो ये भयंकर उत्पात हैं। वृक्षों में बिना समय के फूल या फल दीख पड़े तो उस वृक्ष को काट देना चाहिए । इस प्रकार और भी वृक्ष से बड़े-बड़े उत्पात दृष्टिगोचर होते हैं, वे स्थान (देश या ग्राम) का नाश करने वाले होते हैं। बहुत से उत्पात घातक होते हैं; बहुत से शत्रुओं से भय उपस्थित करते हैं। बहुत उत्पातों से भय, यश, मृत्यु, हानि, कीर्ति, सुख-दुःख और ऐश्वर्य की भी प्राप्ति होती है। यदि वल्मीक (दीमक की मिट्टी के ढेर) पर शहद दीख पड़े तो धन की हानि होती है। द्विजश्रेष्ठ ! इस तरह के सभी उत्पातों में यत्नपूर्वक कल्पोक्त विधि से शान्ति अवश्य करा लेनी चाहिए। नारद ! इस प्रकार संक्षेप से मैंने ज्योतिष शास्त्र का वर्णन किया है। अब वेद के छहों अंगों में श्रेष्ठ छन्दःशास्त्र का परिचय देता हूँ ।।७५३-७५८।। श्री नारदीयपुराण के पूर्व भाग के द्वितीय पाद में छप्पनवां अध्याय समाप्त ॥५६॥
अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच वैदिकं लौकिकं चापि छन्दो द्विविधमुच्यते । मात्रावर्णविभेदेन तच्चापि द्विविधं पुनः ॥१॥ मयौ रसौ तजौ भनौ गुरुलघुरपि द्विज । कारणं छंदसि प्रोक्ताश्छन्दःशास्त्रविशारदैः ॥२॥ सर्वगो मगणः प्रोक्तोमुखलो यगणः स्मृतः । मध्यलो रगणश्चैव प्रांत्यगः सगणो मतः ॥३॥ तगणोऽतलघुः ख्यातो मध्यगो जो भआदिगः । त्रिलघुनंगरणः प्रोक्तस्त्रिका वर्णगणा मुने ॥४॥ चतुर्लास्तु गणाः पञ्च प्रोक्त आर्यादिसंमताः । संयोगश्च विसर्गश्चानुस्वारो लघृतः परः ॥५॥ लघोर्दीर्घत्वमाख्याति दीर्घो गो लो लघुर्मतः । पादश्चतुर्थभागः स्याद्विच्छेद्यतिरुरुच्यते ॥६॥ सममर्द्धसमं वृत्तं विषमं चापि नारद । तुल्यलक्षणतः पादचतुष्के सममुच्यते ॥७॥ आदित्रिके द्विचतुर्थे सममर्द्धसमं ततम् । लक्ष्म भिन्नं यस्य पादचतुष्के विषमं हि तत् ॥८॥ एकाक्षरात्समारभ्य वर्णैकैकस्य वृद्धितः । षड्विंशत्यक्षरं यावत्पादस्तावत्पृथक् पृथक् ॥६॥
अध्याय ५७ छन्दः शास्त्र का संक्षिप्त परिचय सनन्दन बोले-नारद ! छन्द दो प्रकार के बताये जाते हैं-वैदिक और लौकिक । मात्रा और वर्ण के भेद से वे लौकिक या वैदिक छन्द भी दो-दो प्रकार के हो जाते हैं (मात्रिक छन्द और वर्णिक छन्द) ॥१॥ छन्द शास्त्र के विद्वानों ने मगण, यगण, रगण, तगण, जगण, भगण और नगण तथा गुरु एवं लघु-इन्हीं को छन्दों की सिद्धि में कारण बताया है ॥२॥ जिसमें सभी अर्थात् तीनों अक्षर गुरु हों उसे मगण (ऽऽऽ) कहा गया है, जिसका आदि अक्षर लघु (और शेष दो अक्षर गुरु) हो, वह यगण (।ऽऽ) माना गया है। जिसका मध्यवर्ती अक्षर लघु हो, वह रगण (ऽ।ऽ) और जिसका अन्तिम अक्षर गुरु हो, वह सगण (।।ऽ) है ॥३॥ जिसमें अन्तिम अक्षर लघु हो, वह तगण (ऽऽ।) कहा गया है। जहाँ मध्य गुरु हो, वह जगण (।ऽ।) और जिसमें आदि गुरु हो, वह भगण (ऽ।।) है । मुने ! जिसमें तीनों अक्षर लघु हों, वह नगण (।।।) कहा गया है। तीन अक्षरों के समुदाय का नाम गण है ॥४॥ आर्या आदि छन्दों में चार मात्रा वाले पाँच गण कहे गये हैं, जो चार लघु वाले गण से युक्त हैं। यदि लघु अक्षर से परे संयोग, विसर्ग और अनुस्वार हो तो वह लघु की दीर्घता का बोधक होता है। इस छन्दः शास्त्र में 'ग' का अर्थ गुरु या दीर्घ माना गया है और 'ल' का अर्थ लघु समझा जाता है। पद्य या श्लोक के एक चौथाई भाग को पाद कहते हैं । विच्छेद या विराम का नाम 'यति' है ॥५-६॥ नारद ! वृत्त (छन्द) के तीन भेद माने गये हैं-समवृत्त, अर्ध समवृत्त तथा विषमवृत्त । जिसके चारों चरणों में समान लक्षण लक्षित होता हो, वह समवृत्त कहलाता है ॥७॥ जिसके प्रथम और तीसरे चरणों में एवं दूसरे तथा चौथे चरणों में समान लक्षण हों, वह अर्धसम वृत्त हैं । जिसके चारों चरणों में एक दूसरे से भिन्न लक्षण लक्षित होते हों, वह विषमवृत्त है ॥८॥ एक अक्षर के पाद से आरम्भ करके एक-एक अक्षर बढ़ाते हुए जब तक छब्बीस अक्षर का पाद पूरा हो तब तक पृथक्-पृथक् छन्द