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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ
  • ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५३ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो काव्य करने वाला, बुद्धिमान्, वीणा, मृदंग आदि बाजों को बजाने में चतुर और धन की उन्नति करने वाला होता है।।१२१।। कौतुकभवनं गतवति शुक्रे शक्रेशत्वं सदसि महत्त्वम्। हृद्या विद्या भवति च पुंसः पद्मा निवसति सद्मादरतः।।१२२।। कौतुक अवस्था में हो तो इन्द्र के समान पराक्रमी, सभा में चतुर, उत्तम विद्या और गृह मे सदा लक्ष्मी के वास वाला होता है।।१२२।। परसेवारतो नित्यं निद्रामुपगते कवौ। परनिन्दापरो वीरो वाचालो भ्रमते महीम्।।१२३।। यदि निद्रावस्था में हो तो दूसरे की सेवा करने वाला, दूसरे की निंदा करने वाला; व्यर्थ बोलनेवाला और व्यर्थ घूमने वाला होता है।।१२३।। अथ शनेरवस्थाफलम्- क्षुत्पिपासापरिक्रान्तो विश्रान्तः शयने शनौ। वयसि प्रथमे रोगी ततो भाग्यवतां वरः।।१२४।। यदि शनि शयनावस्था में हो तो जातक बाल्यकाल में रोगी, भूख-प्यास से पीडित रहता है, परन्तु वृद्धावस्था में भाग्यवान् होता है।।१२४।। भानोः सुते चेदुपवेशनस्थे करालकारातिजनानुतप्तः। अपायशाली खलु दद्रुमाली नराऽभिमानी नृपदण्डयुक्तः।।१२५।। उपवेशन अवस्था में हो तो प्रबल शत्रु द्वारा पीड़ित, व्यर्थ अपव्यय करने वाला, दाद-खुजली रोग वाला, अभिमानी और राजदंड से दंडित होता है।।१२५।। नयनपाणिगते नृपनन्दने परमया रमया रमया युतः। नृपतितो हिततो मतितोषकृद्बहुकलाकलितो विमलोक्तिकृत्।।१२६।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो परम सुंदरी स्त्री और संपत्ति से युक्त, राजा और मित्रों से उपकृत, अनेक कलाओं का ज्ञाता और प्रिय बोलने वाला होता है।।१२६।। नानागुणग्रामधनाधिशाली सदां नरो बुद्धिविनोदमाली। प्रकाशने भानुसुते सुभानुः कृपानुरक्तो हरपादभक्तः।।१२७।। प्रकाश अवस्था में हो तो अनेक गुण-ग्राम-धन से युक्त, बुद्धिमान्,

२५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कृपालु और ईश्वरभक्त होता है॥१२७॥ महाधनी नन्दननन्दितः स्यादपायकारी रिपुभूमिहारी। गमे शनौ पण्डितराजभावं धरापतेरायतने प्रयाति॥१२८॥ गमन अवस्था में हो तो महाधनी, पुत्र से युक्त, खर्चीला, शत्रु की भूमि को लेने वाला, राजा का पंडित होता है॥१२८॥ आगमने पदगर्दभयुक्तः पुत्रकलत्रसुखेन विमुक्तः। भानुसुते भ्रमते भुवि नित्यं दीनमना विजनाश्रयभावम्॥१२९॥ आगमन अवस्था में हो तो स्थान का भय, रोगभय, पुत्र, स्त्री के सुख से रहित, दीन स्थिति में निरंतर घूमने वाला होता है॥१२९॥ रत्नावलीकाञ्चनमौक्तिकानां व्रातेन नित्यंव्रजति प्रमोदम्। सभागते भानुसुते नितान्तं नयेन पूर्णो मनुजो महौजाः॥१३०॥ सभा अवस्था में हो तो रत्न-सुवर्ण-मुक्ता के समूह से नित्य आनंदित, नीतियुक्त, महातेजस्वी होता है॥१३०॥ आगमे गदसमागमो नृणामब्जबन्धुतनये यदा तदा। मन्दमेव गमनं धरापतेर्याचनाविरहिता मतिः सदा॥१३१॥ आगमन अवस्था में हो तो रोग युक्त, मंदगति और राजा से लाभ पाने की बुद्धि से हीन होता है॥१३१॥ सङ्गते जनुषि भानुनन्दने भोजनं भवति भोजनं रसैः। संयुक्तं नयनमन्दतानना मोहतापपरितापिता मतिः॥१३२॥ भोजन अवस्था में हो तो सरस भोजन का लाभ, नेत्रज्योति मन्द और माया-मोह से मन्द बुद्धि वाला होता है॥१३२॥ नृत्यलिप्सागते मन्दे धर्मात्मा वित्तपूरितः। राजपूज्यो नरो धीरो महावीरो रणाङ्गणे॥१३३॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हों तो धर्मात्मा, धन से पूर्ण, राजा से पूज्य, धीर, महावीर होता है॥१३३॥ भवति कौतुकभावमुपागते रविसुते वसुधावसुपूरितः। अतिसुखी सुमुखी सुखपूरितः कवितयामलया कलया नरः॥ कौतुक अवस्था में हों तो भूमि, धन से पूर्ण, अत्यंत सुखी, स्त्रीसुख से पूर्ण और कविता करने वाला होता है।।१३४।। निद्रागते वासरनाथपुत्रे धनी सदा चारुगुणैरुपेतः।

ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५५ पराक्रमी चण्डविपक्षहन्ता सुवारकान्तारतिरीतिविज्ञः ।।१३५।। निद्रा अवस्था में हो तो धनी, सुंदर गुणों से युक्त, पराक्रमी, दुष्टों का नाश करने वाला और वेश्यागामी होता है ।।१३५।। अथ राहोरवस्थाफलम्- यदागमो जन्मनि यस्य राहौ क्लेशाधिकत्वं शयनं प्रयाते । वृषेऽथ युग्मेऽपि च कन्यकामजे समाजो धनधान्यराशेः ।।१३६।। यदि राहु जन्मसमय में शयन अवस्था में हो तो जातक अधिक क्लेश से युक्त होता है। किन्तु वृष, मिथुन, कन्या या मेष में शयन अवस्था में हो तो धन-धान्य से पूर्ण होता है ।।१३६।। उपवेशनमिह गतवति राहौ दद्गुगदेन जनः परितप्तः। राजसमाजयुतो बहुमानी वित्तसुखेन सदा रहितः स्यात् ।।१३७।। उपवेशन अवस्था में हो तो दाद से पीडित, राजा से सम्मानित, अभिमानी, धनसुख से हीन होता है ।।१३७।। नेत्रपाणावगौ नेत्रे भवतो रोगपीडिते । दुष्टव्यालारिचोराणां भयं तस्य धनक्षयः ।।१३८।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो नेत्ररोग से पीडित, दुष्ट सर्प, शत्रु और चोर के भय से युक्त और धन की हानि होती है ।।१३८।। प्रकाशने शुभासने स्थितिः कृतिः शुभा नृणां धनोन्नतिर्गुणोन्नतिः सदा विदामगाविह । धराधिपाधिकारिता यशोलता तता भवे- न्नवीननीरदाकृतिर्विदेशतो महोन्नतिः ।।१३९।। प्रकाश अवस्था में हो तो सुंदर स्थान, सुंदर यश, धन और गुण की उन्नति, राजा से अधिकार की प्राप्ति, नूतन मेघ के समान आकृति और विदेश में उन्नति पाने वाला होता है ।।१३९।। गमने च यदा राहौ बहुसन्तानवान्नरः । पण्डितो धनवान्दाता राजपूज्यो नरो भवेत् ।।१४०।। गमन अवस्था में राहु हो तो बहुत संतानवाला, पंडित, धनी, दाता, राजा से पूज्य होता है ।।१४०।। राहावागमने क्रोधी सदा धीधनवर्जितः । कुटिलः कृपणः कामी नरो भवति सर्वथा ।।१४१।।

२५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् आगमन अवस्था में हो तो क्रोधी, बुद्धि तथा धन से हीन, कुटिल, कृपण, कामी होता है॥१४१॥ सभागतो यदा राहुः पण्डितः कृपणो नरः। नानागुणपरिक्रान्तो वित्तसौख्यसमन्वितः ॥१४२॥ सभा अवस्था में राहु हो तो पंडित और कृपण, अनेक गुणों से युक्त, धनसुख से युक्त होता है॥१४२॥ चेदगावागमं यस्य याते तदा व्याकुलत्वं सदारातिभीत्या भयम्। महद्बन्धुवादो जनानां निपातो भवेद्वित्तहानिः शठत्वं कृशत्वम्॥ आगमन अवस्था में हो तो हमेशा शत्रुभय से भयभीत और व्याकुल, बंधुओं से बड़ा विवाद और पतन, धन की हानि, मूर्खता और कृशता होती है॥१४३॥ भोजने भोजनेनालं विकलो मनुजो भवेत्। मन्दबुद्धिः क्रियाभीरुः स्त्रीपुत्रसुखवर्जितः॥१४४॥ भोजन अवस्था में हो तो भोजन के बिना विकल, मन्दबुद्धि, कार्य में आलसी, स्त्री-पुत्र के सुख से रहित होता है॥१४४॥ नृत्यलिप्सागते राहौ महाव्याधिविवर्धनम्। नेत्ररोगी रिपोर्भीतिर्धनधर्मक्षयो नृणाम् ॥१४५॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो महाव्याधि का भय, नेत्र में रोग, शत्रुभय, धन-धर्म का नाश होता है॥१४५॥ कौतुके च यदा राहौ स्थानहीनो नरो भवेत्। परदाररतो नित्यं परवित्तापहारकः॥१४६॥ कौतुकावस्था में हो तो स्थानहीन, परस्त्रीगामी और परधन हरण करने वाला होता है॥१४६॥ निद्रावस्थां गते राहौ गुणग्रामयुतो नरः। कान्तासन्तानवान्धीरो गर्वितो बहुवित्तवान् ॥१४७॥ निद्रावस्था में हो तो गुण-समूह से युक्त, स्त्री-संतान से युक्त, धीर, गर्वीला और अधिक धनी होता है॥१४७॥ अथ केतोरवस्थाफलम्— मेषे वृषेऽथ युग्मे वा कन्यायां शयनं गते। केतौ धनसमृद्धिः स्यादन्यभे रोगवर्धनम् ॥१४८॥

ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५७ केतु शयनावस्था में मेष, वृष, मिथुन वा कन्या राशि में हो तो जातक धनी होता है। अन्य राशि में हो तो रोग की वृद्धि होती है॥१४८॥ उपवेशं गते केतौ दद्रुरोगविवर्धनम्। अरिवातन्नृपव्यालचौरशङ्का समन्ततः॥१४९॥ उपवेशनावस्था में हो तो दादरोग की वृद्धि, शत्रु-वायु-राज-सर्प-चोर का भय होता है॥१४९॥ नेत्रपाणिं गते केतौ नेत्ररोगः प्रजायते। दुष्टसर्पादिभीतिश्च रिपुराजकुलादपि॥१५०॥ नेत्रपाणि अवस्था में हो तो नेत्र-रोग, दुष्ट सर्प आदि का भय, शत्रु तथा राजकुल से भी भय होता है॥१५०॥ केतौ प्रकाशने संज्ञे धनवान्धार्मिकः सदा। नित्यं प्रवासी चोत्साही सात्त्विको राजसेवकः॥१५१॥ प्रकाश अवस्था में हो तो धनी, धार्मिक, नित्य परदेशी, उत्साही, सात्त्विक और राजसेवक होता है॥१५१॥ गमेच्छायां भवेत्केतुर्बहुपुत्रो महाधनः। पण्डितो गुणवान्दाता जायते च नरोत्तमः॥१५२॥ गमन अवस्था में हो तो महाधनी, पंडित, गुणी, दाता होता है॥१५२॥ आगमे च यदा केतुर्नानारोगो धनक्षयः। दन्तघाती महारोगी पिशुनः परनिन्दकः॥१५३॥ आगमन अवस्था में हो तो अनेक रोग होते हैं, धन का नाश, दंतरोग, महारोग, कृपण, दूसरे की निंदा करने वाला होता है॥१५३॥ सभावस्थां गते केतौ वाचालो बहुगर्वितः। कृपणो लम्पटश्चैव धूर्त्तविद्याविशारदः॥१५४॥ सभावस्था में हो तो वाचाल, गर्वीला, कृपण, लम्पट और धूर्त्तविद्या का पंडित होता है॥१५४॥ यदागमे भवेत्केतुः केतुः स्यात्पापकर्मणाम्। बन्धुवादरतो दुष्टो रिपुरोगनिपीडितः॥१५५॥ आगम अवस्था में केतु हो तो पापकर्म करनेवालों में श्रेष्ठ, बंधुओं से विवादरत, दुष्ट और शत्रु तथा रोग से पीडित होता है॥१५५॥

२५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भोजने तु जनो नित्यं क्षुधया परिपीडितः। दरिद्रो रोगसन्तप्तः केतौ भ्रमति मेदिनीम्॥१५६॥ भोजन अवस्था में हो तो भूख से पीडित, दरिद्र, रोग से संतप्त होकर घूमता है॥१५६॥ नृत्यलिप्सामते केतौ व्याधिना विकलो भवेत्। बुद्बुदाक्षो दुराधर्षो धूर्तोऽनर्थकरो नरः॥१५७॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो व्याधि से विकल, चकाचौंध नेत्रवाला, किसी के वश में न होने वाला, धूर्त और अनर्थकारी होता है॥१५७॥ कौतुकी कौतुके केतौ नटवामारतिप्रियः। स्थानभ्रष्टो दुराचारी दरिद्रो भ्रमते महीम्॥१५८॥ कौतुक अवस्था में हो तो वेश्या आदि से प्रेम करने वाला, स्थान- भ्रष्ट, दुराचारी और दरिद्र होता है॥१५८॥ निद्रावस्थां गते केतौ धनधान्यसुखं महत्। नानागुणविनोदेन कालो गच्छति जन्मिनाम्॥१५९॥ निद्रा अवस्था में हो तो धन-धान्य का बड़ा सुख होता है। अनेक गुणों की चर्चा में समय व्यतीत करने वाला होता है॥१५९॥ अथ ग्रहावस्थानुसारेण भावफलम्– शयने येषु भावेषु यस्य तिष्ठन्ति सद्ग्रहाः। नित्यं तस्य शुभंज्ञानं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥१६०॥ जन्म समय शयन अवस्था में स्थित शुभ ग्रह जिन-जिन भावों में होता है तो उन-उन भावों के फलों को शुभकारक होता है॥१६०॥ भोजने येषु भावेषु पापास्तिष्ठन्ति सर्वथा। तदा सर्वविनाशोऽपि नात्र कार्या विचारणा॥१६१॥ एवं भोजन अवस्था में गया हुआ पापग्रह जिन भावों में होता है उनके फलों का नाश करता है॥१६१॥ निद्रायां च यदा पापो जायास्थाने शुभं वदेत्। यदि पापग्रहैर्दृष्टो न शुभं च कदाचन॥१६२॥ यदि निद्रा अवस्था में पापग्रह सातवें भाव में हो तो शुभ फल, यदि पापग्रह से दृष्ट हो तो अशुभ फल करता है॥१६३॥

ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५९ सुतस्थाने स्थितः पापो निद्रायां शयनेऽपि वा। तदा शुभं भवेत्तस्य नात्र कार्या विचारणा॥१६३॥ पाँचवें भाव मे निद्रा या शयन अवस्था में पापग्रह हो तो शुभद नहीं होता है॥१६३॥ मृत्युस्थानस्थितः पापो निद्रायां शयनेऽपि वा। तदा तस्यापमृत्युः स्याद्राजतः परतस्तथा॥१६४॥ आठवें स्थान में पापग्रह निद्रा या शयन अवस्था में हो तो उसकी अपमृत्यु राजा के द्वारा या शत्रु के द्वारा होती है॥१६४॥ शुभग्रहैर्यदा युक्तः शुभैर्वा यदि वीक्षितः। तदा तु मरणं तस्य गङ्गायां च विशेषतः॥१६५॥ यदि पापग्रह शुभग्रहों से युक्त वा दृष्ट हो तो गंगा नदी में मृत्यु होती है॥१६५॥ कर्मस्थाने यदा पापः शयने भोजनेऽपि वा। तदा कर्मविपाकः स्यान्नानादुःखप्रदायकः॥१६६॥ कर्मभाव में पापग्रह शयन या भोजन अवस्था में हो तो कर्म से अनेक दुःख होते हैं॥१६६॥ दशमस्थो निशानाथो कौतुके च प्रकाशने। तदैव राजयोगः स्यान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥१६७॥ दशम स्थान में चन्द्रमा कौतुक या प्रकाशन अवस्था में हो तो राजयोग होता है॥१६७॥ बलाबलविचारेण ज्ञायते च शुभाशुभम्। एवं क्रमेण बोद्धव्यं सर्वभावेषु बुद्धिमान्॥१६८॥ ग्रहों के बल और निर्बलता को देखकर शुभ-अशुभ फलों को बुद्धिमान् को जानना चाहिए।॥१६८॥ इति ग्रहाणामवस्थाध्यायः॥

२६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् आयुर्दायाध्यायः मैत्रेय उवाच– दरिद्रधनयोगौ च कथितौ प्राङ्‌महामुने ! । नराणामायुषो ज्ञानं कथं जातं महामुने ! ॥१॥ मैत्रेय ने कहा– हे मुने ! आपने दरिद्र और धन योग को कहा। हे महामुने ! मनुष्यों की आयु का ज्ञान कैसे होता है, इसे कहिए ॥१॥ पराशर उवाच– साधु पृष्टं त्वया विप्र ! नराणां हितकाम्यया । आयुर्ज्ञानं प्रवक्ष्यामि दुर्लभं यत् सुरैरपि ॥२॥ पराशरजी ने कहा– हे विप्र ! मनुष्यों के हित की कामना से तुमने बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है, अब मैं आयुष्य ज्ञान को कहता हूँ, जो कि देवताओं को भी दुर्लभ है ॥२॥ अंशायुसाधनम्– समाहता भांशकलाविलिप्ता गजाभ्रचन्द्रैर्गहपर्ययेभ्यः । विकर्त्तनैः संविहतावशेषेऽब्दमासाद्यस्त्रादिकमायुरेवम् ॥३॥ ग्रहों की राशि अंश, कला, विकला को १०८ से गुणा कर १२ से भाग देने से शेष वर्ष, मास, दिन, घटी आदि ग्रह की आयु होती है ॥३॥ होरादायोष्येवमत्राधिवीर्यं लग्नं चेद्राशितुल्यैस्तथाब्दकैः । युक्तं शेषं भागपूर्वद्विनिघ्नं बाणैर्भक्तं मासपूर्वैर्युतं तत् ॥४॥ इसी प्रकार लग्न की भी आयु होती है, किन्तु लग्न अधिक बली हो तो लग्न राशि के तुल्य वर्ष और शेष अंशादि को २ से गुणाकर ५ से भाग देने से मास आदि आयु होती है ॥४॥ अंशायुषि साधने विशेषः– नीचेऽस्तगेऽर्द्धमरिभे त्रिलवं हरन्ति नास्तङ्गतौ शनिसितौ व्ययतौऽत्र वामम् । सर्वार्धकत्रिकचतुर्थशरर्तुभागान् हरन्त्यशुभदाः शुभदास्तदर्धम् ॥५॥ यदि ग्रह अपनी नीचराशि में हो या अस्त हो तो आयु का आधा, शत्रु की राशि में हों तो आयु का तीसरा भाग कम आयु देता है। किन्तु शनि,

आयुर्दायाध्यायः २६१ शुक्र अस्त होते हुए भी आधा हानि नहीं करते हैं। बारहवें भाव से विलोम संपूर्ण, आधा, तृतीयांश, चतुर्थांश, पंचमांश और षष्ठांश पापग्रह अपने आयु की हानि करते हैं और शुभग्रह इन्हीं भावों में आधा हानि करते हैं। अर्थात् १२वें भाव में पापग्रह हों तो अपने संपूर्ण आयु का नाश, ग्यारहवें भाव में हो तो आधा इत्यादि ।।५।। एकस्थानस्थिताश्चेत्स्युर्द्वात्रयो गगनेचराः। तदा बलयुतः खेटो हरत्येकेन चापरे ।।६।। एक ही स्थान में दो-तीन ग्रह बैठे हों तो उनमें जो बलवान् हो उसी के आयु का अपहरण होता है।।६।। वर्गोत्तमस्वर्क्षनवांशदृक्के द्विसंगुणं तत्सकलं विधेयम्। वक्रोच्चयोस्तत्त्रिगुणं विधेयं द्वित्रिगुणत्वे त्रिगुणं सकृच्च ।।७।। जो ग्रह वर्गोत्तम नवांश, अपनी राशि या नवांश या द्रेष्काण में हो उसके संपूर्ण आयु को दूना कर देना चाहिए। जो वक्री हो या अपनी उच्चराशि में हो तो उसकी आयु को तिगुना कर देना चाहिए। एक ही ग्रह की आंयु द्विगुणित और त्रिगुणित करनी हो तो केवल त्रिगुणित ही करना चाहिए।।७।। अंशायु-साधन का उदाहरण पृ. २४ में दिये हुए स्पष्ट ग्रहचक्र और जन्माङ्ग को देखना चाहिए। सूर्य ३।१८।२६।३४ है। ३ १८ २६ ३४ × १०८ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ३२४ ८६४ ६४८ ४३२ १०८ २१६ ३२४ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ३२८ १९४४ २८०८ ३६७२ ÷ ६० ६६ ४७ ६१ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ३२ ÷ १२ ३९० ÷ १२ १९९१ ÷ ३० २८६९ ÷ ६० ८ शेष ६ शेष ११ शेष ४९ शेष १२ शेष = ८।६।११।४९।१२ सूर्यायुर्दाय वर्षादि। इसी प्रकार से लग्न सहित सभी ग्रहों के अंशायु का साधन करना चाहिए।

२६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् असंस्कृतांशायुचक्रम्

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.ग्रहायु
वर्ष
१०मास
१११११९२९दिन
४९२४५०२२३७३३५७घटी
१२३६२४१२१२३६४८पल
विशेष संस्कार
सूर्य सातवें भाव में है, अतः सूर्यायुवर्षादि ८।६।११।४९।१२ ÷ ६ =
१।५।१।५८।१२ लब्धि वर्षादि हुई। इस लब्धि को सूर्यायु
८।६।११।४९।१२ में
लब्धि- १।५।१।५८।१२ को घटाया तो
= स्पष्टसूर्यायुवर्षादि ७।१।९।५१।० हुए।
चन्द्र में हानि-वृद्धि का कोई योग न होने के कारण स्पष्ट चन्द्रायुवर्षादि
०।९।१।२४।३६ हुए।
भौम अपने नवमांश (मेष) में होने के कारण भौमायु ०।९।३।५०।२४
× २ = ०।१८।७।४०।४८ भौम का स्पष्टायुवर्षादि हुआ।
बुध में हानि वृद्धि के कोई योग न होने से स्पष्ट बुधायुवर्षादि =
१।७।११।२२।१२ हुए।
गुरु आठवें भाव में है अतः आधा भाग कम होना चाहिए, अतः गुरु
की आयुवर्षादि ३।१०।७।३७।१२ ÷ २ = १।११।३।४८।३६ लब्धि को
गुरु आयुवर्षादि ३।१०।७।३७।१२ में
लब्धि १।११।३।४८।३६ घटाया तो
शेष १।११।३।४८।३६ वर्षादि हुए।
गुरु अपने द्रेष्काण का है अतः हानिकृत गुरु आयुवर्षादि
१।११।३।४८।३६ ×२ = २।२२।७।३७।१२ स्पष्ट गुरु की आयु हुई।
शुक्र में कोई हानि-वृद्धि के योग न होने से स्पष्ट शुक्रायुवर्षादि
७।६।५।३३।० हुए।
शनि शत्रु राशि में है, अतः शनि के आयुवर्षादि ३।६।१९।५७।३६
÷ ३ लब्धि १।२।५।१९।१२ को घटाना चाहिए। अतः शनि की आयुवर्षादि
३।६।१९।५७।३६ में
लब्धि १।२।५।१९।१२ को घटाया तो
स्पष्टशन्यायु २।४।१०।३८।२४ वर्षादि हुए।

आयुर्दायाध्यायः २६३ लग्नायु को त्रैराशि द्वारा लाना चाहिए, जिसके लिए नीचे दी हुई तालिका से काम लेना चाहिए। १ राशि वा ३० अंश = १ वर्ष = १२ मास ∴ १ मास = ३०/१२ = २ १/२ अंश ∴ १ अंश = १२ दिन = ६० कला ∴ १ दिन = ५ कला = ६० घटी ∴ १ कला = १२ घटी = ६० विकला ∴ १ घटी = ५ विकला = ६० पल ∴ १ विकला = १२ पल अर्थात् १ राशि = १२ मास १ अंश = १२ दिन १ कला = १२ घटी १ विकला = १२ पल तात्पर्य यह हुआ कि अंश को २ से गुणाकर ५ से भाग देने से लब्धि मास शेष को ६ से गुणा कर देने से दिन होता है। कला को २ से गुणा कर १० से भाग देने से लब्धि दिन शेष को ६ से गुणा देने से घटी होता है। विकला को २ से गुणाकर १० से भाग देने से लब्धि घटी और शेष को ६ से गुणा करने से पल होता है। लग्न राश्यादि ९।१५।३२।५१ बलवान् है अतः राशितुल्य वर्ष ९ प्राप्त हुआ, शेष अंशादि १५।३२।५१ का त्रैराशिक द्वारा मासादि का साधन- अंश १५ × २ = ३० ÷ ५ = लब्धि ६ मास, शेष ० × ६ = ० दिन कला ३२ × २ = ६४ ÷ १० = लब्धि ६ दिन, शेष ४ × ६ = २४ घटी विकला ५१ × २ = १०२ ÷ १० = लब्धि १० घटी, शेष २ × ६ = १२ पल। राशितुल्य वर्षादि- ९।०।०।०।० अंशोत्पन्न मासादि- ०।६।०।०।० कलोत्पन्न दिनादि- ०।०।६।२४।० विकलोत्पन्न घट्यादि- ०।०।६।१०।१२ योगफल- ९।६।६।३४।१२ में पूर्वोक्त लग्नायुर्वर्षादि- ६।१।२९।९।३८ को जोड़ा तो स्पष्ट लग्नायुवर्षादि- १५।८।५।४२।० हुए।

२६४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् संस्कृतांशायुचक्रम्

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.ग्रहायुयोग
१९वर्ष४०
१८२२मास
१०दिन२९
५१२४४०२२३७३३३८४२घटी४९
३६४८१२२२२४पल२२
अथ पिण्डायुसाधनम्-
१. तत्रादौ पिण्डायुषि वर्षाणि-
नन्देन्दवो पञ्च यमाः शरक्ष्मा भास्कराश्च पञ्चेन्दवः कुपक्षाः।
नखाश्च रव्यादिमुखग्रहाणां पिण्डायुषोऽब्दाः निजोच्चगानाम् ।।
सूर्यादि ग्रह अपनी उच्चराशि में हों तो पिण्डायुसाधन में क्रम से
१९, २५, १५, १२, १५, २१, २० सूर्यादि ग्रहों के वर्ष होते हैं।।७।।
निसर्गायुसाधने वर्षादिः-
कृत्येकद्व्यङ्कधृत्यश्च नखपञ्चाशदेव हि।
सूर्यादीनां क्रमादब्दाः स्वोच्चे नैसर्गिके द्विज ।।८।।
सूर्यादि ग्रह अपनी उच्चराशि में हो तो क्रम से २०, १, २, ९, १८, २०,
५० वर्ष नैसर्गिक आयु में होते हैं।।८।।
पिण्ड-निसर्गायुसाधनम्-
स्वोच्चशुद्धो ग्रहः शोध्यः षड्भादूनो भमण्डलात् ।
षड्भाधिको यथास्थित एव लिप्तानिघ्नो निजाब्दैः ।।९।।
जिस ग्रह की पिण्डायु या निसर्गायु साधन करना हो उसके राश्यादि
को उसके परमोच्च राश्यादि में घटाकर शेष ६ राशि से न्यून हो तो उसे
१२ राशि में घटावे। यदि शेष ६ राशि से अधिक हो तो राश्यादि की

आयुर्दायाध्यायः २६५ कला बनाकर उसे ग्रहवर्ष संख्या (पिण्डायुसाधन में पिण्डायु ग्रहवर्ष, निसर्गायुसाधन में नैसर्गिक ग्रहवर्ष) से गुणा कर।।९।। खाभ्ररसभूनेत्रैर्भक्ते प्राप्यते तु यत्फलम्। वर्षमासदिनादिकं तद्धि पिण्डायुः स्फुटं भवेत्। एवं क्रियानिसर्गेऽपि हानिवृद्धिस्तु पूर्ववत् ।।१०।। २१६०० से भाग देने से लब्धि वर्ष, मास, दिनादि पिण्डायु या निसर्गायु होते हैं।।१०।। ० पिण्डायु-साधन का उदाहरण— सूर्योच्चांशराश्यादि = ०।१०।०।० में सूर्य = ३।१८।२६।३४ को घटाया तो उच्चांशान्तर ८।१२।३३।२६ हुआ। नोट— यह ६ राशि से अधिक हैं अतः १२ राशि में नहीं घटाया गया। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह का चक्र शुद्ध उच्चांशान्तरचक्र नीचे लिखा है। ग्रहोच्चांशान्तरचक्रम्—

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
१०१११०१०११राशि
२११०२३२२२११८अंश
३३२९२७२२१६११कला
२६१३५२५९५५विकला

सूर्यपिण्डायुसाधनम्— उदाहरण— परमोच्चांशान्तर ८।२१।३३।२६ पिण्डायु वर्ष १९ राशि ८ × १९ = मास १५२ ÷ १२ = वर्षादि १२।८ अंश २१ × १९ = दिन ३९९ ÷ ३० = मासादि १३।९ कला ३३ × १९ = घटी ६२७ ÷ ६० = दिनादि १०।२७ विकला २६ × १९ = पल ४९४ ÷ ६० = घट्यादि ८।१४ वर्षादि = १२।८।०।०।० मासादि = ०।१३।९।०।० दिनादि = ०।०।१०।२७।० घट्यादि = ०।०।०।८।१४ सूर्यायुवर्षादि = १२।२१।१९।३५।१४ इस प्रकार प्रत्येक ग्रहों का पिंडायु एवं निसर्गायु साधन कर असंस्कृतपिण्डायु चक्र और असंस्कृतनिसर्गायु चक्र दिया जाता है।

२६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् , असंस्कृतपिण्डायुचक्रम्—

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहायु
१२२०१३१०१२१७१८वर्ष
२११८१११७१६मास
१९२२२११०१०दिन
३५१०५८३५१६५५४२घटी
२४२५४८३०१५४०पल
असंस्कृतनिसर्गायुचक्रम्—
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहायु
:---:---:---:---:---:---:---:---
१३१५१५४६वर्ष
१८१०१०१३१४१०मास
१११०१०१११८दिन
२६२९५५२०४२५८१६घटी
१३५४५१४८२०४०पल
विशेष— सूर्य सातवें भाव में है, अतः सूर्य का पिण्डायुवर्षादि
२१।२१।१९।३५।२४ ÷ ६ = २।३।१८।१५।५४ लब्धि वर्षादि हुई। इस
लब्धि को सूर्यायु—
१२।२१।१९।३५।२४ में
लब्धि २।३।१८।१५।५४ को घटाया तो
शेष स्पष्टसूर्यायुवर्षादि १०।१८।१।१९।३० हुए।
चन्द्र में हानि-वृद्धि का कोई लक्षण न होने से स्पष्ट चन्द्रायुवर्षादि
२०।१८।२२।१०।२५ हुए।
भौम अपने नवांश में हैं, अतः भौमायु १३।११।२१।५८।० × २ =
२७।११।१३।५६।० भौमायु हुआ।
बुध में हानि-वृद्धि का कोई योग न होने से बुधायुवर्षादि
१०।९।१०।३५।४८ हुआ।
गुरु आठवें भाव में है, गुरु से आयु का आधा भाग घटाकर शेष को
दूना करने से गुरु के आयु में से घटाकर शेष को दूना करने से गुरु की
स्पष्टायु वर्षादि ६।८।१८।१५ हुई।
शुक्र में कोई हानि-वृद्धि का योग न होने से शुक्रायुवर्षादि
१७।०।१०।५५।१५ हुई।

आयुर्दायाध्यायः २६७ शनि शत्रुराशि में है, शनि के आयु का तृतीय भाग १८।१६।३।४२।४० ÷ ३ = ६।५।९।१४।१३ को शन्यायु में घटाने से शेष १२।१०।२२।२८।२७ शनि की स्पष्टायु हुई। संस्कृतपिण्डायुचक्रम्—

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.योगग्रहायु
१०२०२७१०१७१२११२वर्ष
१८१८१११०मास
२२१३१०१८१०२२२९दिन
१९१०५६३५५५२८३३घटी
३०२५४८१५१५२७४८२८पल

निसर्गायु में विशेष— सूर्य सातवें भाव में है, अतः नैसर्गिक सूर्यायु का छठा भाग घटाने से स्पष्ट सूर्यायु नैसर्गिक वर्षादि ९।७।१।६।१५ हुई। चन्द्र में कोई हानि-वृद्धि नहीं हुई। भौम अपने नवांश में है, अतः भौम की आयु दूनी हुई = २।२०।२१।५१।४८ बुध में कोई हानि-वृद्धि नहीं हुई। गुरु आठवें भाव में है, अतः गुरु के आयु का आधा भाग घटाना चाहिए और अपने द्रेष्काण में है अतः दूना करना चाहिए। इसलिए गुरु की आयु ज्यों की त्यों रही। शुक्र की आयु में कोई संस्कार नहीं है। शनि शत्रु राशि में है, अतः शन्यायु का तीसरा भाग उसमें घटाने से शनि की आयु = ८।७।४।५८।५८ हुई। संस्कृतनिसर्गायुचक्रम्—

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.योगग्रहायु
१५१५६७वर्ष
१०२०१३१४११मास
३२१०२११११८२९१०दिन
२८२९५५२०४३५८५८घटी
१५१३४८५१४८२०५८४८पल

२६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अत्र लग्नायुसाधनम्— राशीन्विहाय लग्नस्य लिप्तीकृत्य तथा द्विज। शतद्वयेन भक्ते च फलं वर्षादिकं च यत्। सबले लग्ने फलं त्वत्र पूर्वोक्तं नैवमत्र हि।।९१।। यहाँ बलवान् लग्न हो तो लग्न की राशि को त्याग कर अंशादि को कला बनाकर दो सौ से भाग देने से जो वर्षादि फल होता है, यही लग्न की आयु यहाँ होती है।।९१।। विशेषः— क्रूरे लग्नस्थिते विद्वन् लग्नस्यांशसंख्यया। निघ्नं क्रूरग्रहस्यायुः भक्ताष्टोत्तरशतेन च। लब्धं वर्षादिकं शोध्यं ग्रहस्यायुः स्फुटो भवेत् ।।९२।। यदि लग्न में क्रूरग्रह हो तो लग्न की नवमांश संख्या से उस ग्रह की आयु को गुणाकर १०८ से भाग देने से लब्ध वर्षादि को उस ग्रह की आयु में घटाने से शेष ग्रह की स्पष्टायु होती है।।९२।। उदाहरण— जन्मलग्न राश्यादि ९ । १५ । ३२ । ५१ है, राशि का त्याग कर अंशादि १५ । ३२ । ५१ का विकला बनाया तो अंश १५ × ६० + ३२ = ९३२ कला हुई। ९३२ × ६० + ५१ = ५५९७१ विकला हुई। इसमें १२००० से भाग देने से लब्धि ४ (वर्ष) शेष ७९७१ × १२ = ९५६५२ ÷ १२००० = लब्धि ७ मास, शेष ११६१२ × ३० = ३४८९५६ ÷ १२००० = लब्धि २९ दिन, शेष १४६० × ६० = ९३६०० ÷ १२००० = लब्धि ७ घटी, शेष ९६०० × ६० = ५७६००० ÷ १२००० लब्धि ४८ पल लग्नायु प्राप्त हुई। आयुग्रहणे विशेषः— अंशायुः सबले लग्ने सूर्ये ग्राह्यं तु पैण्डकम्। चन्द्रे नैसर्गिकं ग्राह्यं बलसाम्ये द्वयोस्तथा।।९३।। यदि लग्न बली हो तो अंशायु ही मुख्य आयु होती है। सूर्य बली हो तो पिण्डायु और चन्द्रमा बली हो तो निसर्गायु प्रधान आयु होती है।।९३।। योगार्धमायुस्तत्र स्यादिति प्राज्ञैर्विनिश्चितम्।। त्रयोऽप्येते बलाढ्यश्चेत्सर्वेषां योगत्र्यंशकः। आयुर्ग्राह्यं तु सर्वेषामिति प्रोक्तं पुरातनैः।।९४।।

आयुर्दायाध्यायः २६९ इनमें दो समान बली हों तो दोनों के आयु का योगार्ध मुख्य आयु होती है। यदि तीनों समान बली हों तो तीनों के आययोग का तृतीयांश स्पष्टायु होती है।।१४।। अथ नानाजातीयमायुः— गृध्रोलूकशुकध्वाङ्क्षसर्पाणां च सहस्रकम्। श्येनवानरभल्लूकमण्डूकानां शतत्रयम् ।।१५।। गिद्ध-उल्लू-शुक-कौआ और सर्पों की एक हजार वर्ष की आयु होती है। बटेर-वानर-भालू-मेढक की तीन सौ वर्ष की आयु होती है।।१५।। पञ्चाशदुत्तरशतं राक्षसानां प्रकीर्त्तितम्। नराणां कुञ्जराणां च विंशोत्तरशतं विदुः ।।१६।। राक्षसों की १५० वर्ष की आयु होती है। मनुष्य और हाथियों की १२० वर्ष की आयु होती है।।१६।। द्वात्रिंशदायुरश्वानां पञ्चविंशत् खरोष्ट्रयोः। वृषमाहिषयोश्चैव चतुर्विंशतिवत्सराः ।।१७।। घोड़ों की ३२ वर्ष की आयु होती है। गधा और ऊँट की २५ वर्ष की आयु होती है। बैल और भैंसा की आयु २४ वर्ष की होती है।।१७।। विंशत्यायुर्मयूराणां छागादीनां च षोडश। हंसस्य पञ्चनवकं पिकानां द्वादशाब्दकाः ।।१८।। मोर की २० वर्ष की आयु होती है। बकरा आदि की १६ वर्ष की आयु होती है। हंस की १४ वर्ष की आयु होती है। कोकिल और कबूतर की १२ वर्ष की आयु होती है।।१८।। तद्वत्पारावतानाञ्च कुक्कुटस्याष्टवत्सराः। बुद्बुदानामण्डजानां सप्तसङ्ख्याः समाःस्मृताः ।।१९।। मुर्गों की ८ वर्ष आयु होती है। बुलबुलों की ७ वर्ष की आयु होती है।।१९।। अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि आयुर्दायगतिं तव। यस्य विज्ञानमात्रेण कालज्ञो भवति ध्रुवम् ।।२०।। अन्य रीति से आयु जानने की रीति कह रहा हूँ, जिसके जान लेने से मनुष्य कालज्ञ हो जाता है।।२०।।

२७० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् लग्नेशाष्टमेशाभ्यां योगैकः कथितो द्विज। द्वितीयं शनिचन्द्राभ्यां चिन्तनीयं सदा द्विज।।२१।। प्रथम लग्नेश और अष्टमेश से १ योग। द्वितीय शनि और चन्द्रमा से॥२१॥ होरालग्नलग्नाभ्यां तृतीयं च विचिन्तयेत्। लग्नेन्दूमदने वापि चिन्तयेल्लग्नचन्द्रतः।।२२।। तथा तीसरा होरालग्न और जन्मलग्न से होता है। दूसरे योग में यदि चन्द्रमा जन्मलग्न या सातवें भाव में हो तो लग्न और चन्द्रमा से अन्यथा शनि और चन्द्रमा से जो आयु आवे उसे लेना चाहिए॥२२॥ चरे चरे स्थिते द्वौ च लग्नरन्ध्राधिपौ यदि। दीर्घायुयोगो विज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२३।। यदि लग्नेश और अष्टमेश दोनों चर राशि में हों।।२३।। स्थिरर्क्षे लग्ननाथो हि लयेशे द्वन्द्वभे स्थिते। तदा दीर्घायुषो योगः सम्भवेद्गणिताग्रणीः।।२४।। अथवा एक स्थिर और दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो तो दीर्घायु योग होता है॥२४॥ लग्नाधीशे स्थिते द्वन्द्वे स्थिरे रन्ध्राधिपे स्थिते। दीर्घायुयोगो विज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२५।। यदि लग्नेश और अष्टमेश में से एक चर राशि में और दूसरा स्थिर राशि में हो तो मध्यायु योग होता है।।२५।। अथातः सम्प्रवक्ष्यामि मध्यायुर्योगमुत्तमम्। चरे लग्नाधिपे विप्र स्थिरे रन्ध्रपतिर्यदि।।२६।। अथवा दोनों द्विस्वभाव राशि में हों तो भी मध्यायु योग होता है।।२६।। तदा मध्यायुषं विद्याद् द्वौ द्वन्द्वे मध्यमायुषः। अधुनाल्पायुयोगं च तवाग्रे कथयाम्यहम्।।२७।। लग्नेश और अष्टमेश दोनों में से एक चर राशि में तथा दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो तो अल्पायु योग होता है।।२७।।

आयुर्दायाध्यायः २७१ लग्नाधीशश्चरे यस्य द्वन्द्भे रन्ध्रनायके। तस्याल्पायुर्महाप्राज्ञ निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥२८॥ अथवा लग्नेश और अष्टमेश दोनों स्थिर राशि में ही हों तो भी अल्पायु योग होता है॥२८॥ स्थिरे स्थिरे स्थितौ द्वौ चेल्लग्नरन्ध्राधिपौ द्विज। अल्पायुस्तत्र विज्ञेयं सृष्टिकर्त्रा प्रणोदितम्॥२९॥ इसी प्रकार शनि-चन्द्रमा या लग्न-चन्द्रमा तथा होरालग्न और जन्मलग्न से भी आयु लाना चाहिए॥२९॥ एकरूपत्वयोगौ द्वौ तृतीयो भिन्नरूपकः। द्वयोर्योगेन सङ्ग्राह्यं न ग्राह्यं चैकरूपतः॥३०॥ यदि तीनों प्रकार में दो प्रकार से एक आयु और तीसरे से भिन्नायु आती हो तो दो प्रकार से आई हुई आयु को ही लेना चाहिए॥३०॥ योगत्रयं त्रयं रूपं भिन्नं भिन्नं भवेद्द्विज। होरालग्नविलग्नाभ्यां प्राप्तायुर्योगनिश्चितम्॥३१॥ यदि तीनों प्रकार से भिन्न-भिन्न आयु आती हो तो होरालग्न और लग्न से जो आयु आती हो उसे ही लेना चाहिए।॥३१॥ अथाहं सम्प्रवक्ष्यामि आयुर्वर्षाणि भो द्विज। यस्य ज्ञानं विना विद्वन् स्पष्टायुर्नोपलभ्यते॥३२॥ हे द्विज! अब मैं आयु के वर्गों को कह रहा हूँ, जिसके ज्ञान के बिना आयु की स्पष्टता नहीं होती है॥३२॥ रसाङ्कैर्गजाभ्रेन्दुभिः शून्यमासैस्त्रिधा दीर्घमायुः कलौ सम्प्रदिष्टम्। चतुःषष्टिबाह्वद्र्यशीति प्रमाणैर्मतं मध्यमायुर्नृणां वत्सरैः स्यात्॥ ९०, १०८, १२० वर्ष ये तीन प्रकार की दीर्घायु कलियुग में होती है। ६४, ७२, ८० वर्ष की मध्यमायु होती है॥३३॥ तथा द्वित्रिषड्वह्निदेनशून्याब्धिवर्षै- र्भवेदल्पमायुर्नराणां युगान्ते॥३४॥ ३२, ३६, ३० वर्ष की अल्पायु का प्रमाण कहा है॥३४॥ योगत्रयेण दीर्घायुस्तदा ग्राह्यं खवेदकम्। योगद्वयेन सम्प्राप्ते ग्राह्यं षट्त्रिंशताब्दकम्॥३५॥

२७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि ३ प्रकार से दीर्घायु आये तो ४० वर्ष का खंड और दो प्रकार से दीर्घायु हो तो ३६ वर्ष का ॥३५॥ योगैकेन सदा ग्राह्यं द्वात्रिंशन्मिताब्दकम्। एवमल्पायुयोगे तु प्रोक्ताच्च विपरीतकम्॥३६॥ और एक प्रकार से दीर्घायु हो तो ३२ वर्ष का खंड लेना चाहिए। इसी प्रकार अल्पायु योग में इसके विपरीत यानि ३ प्रकार से अल्पायु हो तो ३२ वर्ष, दो प्रकार से अल्पायु हो तो ३६ और एक प्रकार से अल्पायु हो तो ४० वर्ष का खंड स्पष्टायु साधन में लेना चाहिए॥३६॥ तथा लग्नेशाष्टमेशाभ्यां मध्यमायुः समागते। ग्राह्यं चत्वारिंशन्मितं वर्षं च द्विजसत्तम॥३७॥ इसी प्रकार लग्नेश, अष्टमेश से मध्यमायु हो तो ४० वर्ष॥३७॥ लग्नेन्दुना वा चन्द्रमन्दाभ्यां मध्यायुः समागते। खण्डं ग्राह्यं तदा विद्वन् षट्त्रिंशन्मिताब्दकम्॥३८॥ लग्नचन्द्र वा शनिचन्द्र से मध्यमायु हो तो ३६ वर्ष॥३८॥ होरालग्नलग्नाभ्यां मध्यमायुः समागते। ग्राह्यं तत्र सदा विप्र द्वात्रिंशन्मिताब्दकम्॥३९॥ और होरालग्न, जन्मलग्न से मध्यमायु हो तो ३२ वर्ष का खंड लेना चाहिए॥३९॥ अथायुर्बोधकचक्रम्—

दीर्घायुः<br>चरे लग्नेशः<br>चरेऽष्टमेशःदीर्घायुः<br>स्थिरे लग्नेशः<br>द्विस्वभावेऽष्टमेशःदीर्घायुः<br>द्विस्वभावे लग्नेशः<br>स्थिरेऽष्टमेशः
मध्यायुः<br>चरे लग्नेशः<br>स्थिरेऽष्टमेशःमध्यायुः<br>स्थिरे लग्नेशः<br>चरेऽष्टमेशःमध्यायुः<br>द्विस्वभावे लग्नेशः<br>द्विस्वभावेऽष्टमेशः
हीनायुः<br>चरे लग्नेशः<br>द्विस्वभावेऽष्टमेशःहीनायुः<br>स्थिरे लग्नेशः<br>स्थिरेऽष्टमेशःहीनायुः<br>द्विस्वभावे लग्नेशः<br>चरेऽष्टमेशः