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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

आयु जानने का दूसरा प्रकार कह रहा हूँ, जिसे दीर्घादि तीनों प्रकार से ब्रह्माजी ने कहा है।।९।। जन्मलग्नाष्टमेशौ द्वौ चिन्तयेज्जन्मपत्रके। पञ्चमैकादशे विप्र दीर्घायुश्च प्रजायते।।१०।। जन्मांग चक्र में लग्नेश और अष्टमेश यदि ५।११ भाव में हों तो दीर्घायु ।।१०।। लाभे तृतीयगे वापि मध्यमायुर्विचिन्तयेत्। लाभे वित्ते त्रिकोणे वा ह्यायुरल्पं भवेद्द्विज।।११।। ११।३ भावों में हों तो मध्यमायु और ११।२।५।९ भावों में हों तो अल्पायु ।।११।। गतायुर्लाभगौ द्वौ चेज्जातकोऽपि न जीवति। एवं समस्तजन्तूनामीदृग्योगं विचिन्तयेत्।।१२।। और दोनों ११ भाव में हों तो गतायु होता है और जातक नहीं जीता है। इस प्रकार से सभी प्राणियों के आयुर्दाय का निर्णय करना चाहिए।।१२।। अथैवं भिन्नमार्गेण आयुर्दायं निरूप्यते। तनुतन्वीशतद्राशिपत्युर्भानां त्रिकोणके।।१३।। पुनः प्रकारान्तर से आयु का निर्णय कह रहा हूँ। लग्न, लग्नेश और उनकी राशियों के स्वामि से त्रिकोण में।।१३।। अल्पमध्यचिरायुष्यं रूपवर्णप्रमाणतः। अष्टमेशादियोगेन निर्याणं कारयेद्ग्रहः।।१४।। अल्प, मध्य और दीर्घायु रूप वर्ष प्रमाण से होती है। इसमें अष्टमेश आदि के युग से निर्याणकर्ता ग्रह होता है।।१४।। लग्नत्रिकोणगेऽल्पायुर्लग्नेशस्य त्रिकोणगे। मध्यमायुर्विजानीयान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।१५।। लग्न त्रिकोण में अल्पायु, लग्नेश से त्रिकोण में मध्यमायु।।१५।। लग्नेशात्स्वीयराशीशे त्रिकोणे रन्ध्रनायके। दीर्घायुषि प्रदातव्यं पुरा शम्भुप्रणोदितम्।।१६।। लग्नेश वा जन्मराशीश वा अष्टमेश त्रिकोण में हो तो दीर्घायु होता है।।१६।।

२८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् तेषां मध्ये त्रिकोणानां विभागे च नवं कथम्। स्वल्पमध्यचिरायुष्यं द्वादशाद्धाधिकेन च॥१७॥ यहाँ पर त्रिकोण के विभाग में नव का भेद कैसे हो ? यहाँ प्रत्येक त्रिकोण में अल्प, मध्य, दीर्घायु बारह (१२) वर्ष का भेद होता है॥१७॥ अल्पायुषस्त्रयो भेदास्त्र्यस्थाने पृथक् पृथक् । विलग्नेशाष्टमेशादि लग्नस्थेऽपि द्विजोत्तम ॥१८॥ अल्पायु का तीन भेद तीनों स्थानों में होता है। यदि लग्नेश, अष्टमेश लग्न में हों तो ॥१८॥ द्वादशाब्दं भवेदायुश्चतुर्विंशति पञ्चमे। नवमे च षट्त्रिंशाब्दमित्येवं न तु संशयः॥१९॥ १२ वर्ष, पाँचवें भाव में हों तो २४ वर्ष और नवें भाव में हों तो ३६ वर्ष की अल्पायु होती है॥१९॥ लग्नेशराशिकोणेषु लग्नरन्ध्राधिपा यदि। तत्र स्थितेष्टवेदाब्दं षष्ट्यब्दं पञ्चमे स्थिते॥२०॥ लग्नेश की राशि से त्रिकोण में लग्नेश अष्टमेश हों तो तीन भेद होता हैं। राशि में हो तो ४८ वर्ष, पाँचवें भाव में हों तो ६० वर्ष॥२०॥ नवमस्थे द्विसप्ताब्दं तन्नवकमिदं मतम्। लग्नेशाश्रितराशीशात्त्रिकोणेषु स्थिते द्विज॥२१॥ और नवें भाव में हों तो ७२ वर्ष की मध्यमायु होती है। लग्नेश जिस राशि में हों उसके स्वामी से त्रिकोण में लग्नेश, अष्टमेश हों तो दीर्घायु के तीन भेद होते हैं॥२१॥ लग्नेशादष्टमेशादि त्रिभागं दीर्घमायुषि। लग्नस्थे चतुरशीतिः पञ्चमे षटनवात्मकः॥२२॥ लग्नेश, अष्टमेश के योग से दीर्घायु में भी तीन भेद होते हैं। लग्न में हों तो ८४ वर्ष, पाँचवें भाव में हों तो ९६ वर्ष॥२२॥ नवमेऽष्टोत्तरशतं वर्षेष्वायुर्विनिर्णयः। द्वादशाब्दानुपाते च ह्येतच्छम्भुप्रणोदितम्॥२३॥ नवम भाव में हों तो १०८ वर्ष की दीर्घायु होती है। यही १२ वर्ष के अनुपात से शंभु ने कहा है॥२३॥

आयुर्दायाध्यायः २८३ रविः कुजः शनी राहुर्मरणे बलिनः क्रमात्। विशेषं दुर्बलं हित्वा गृह्णीयाद्बलिनः सुधीः।।२४।। सूर्य, भौम, शनि और राहु ये प्रबल मारक होते हैं। इनमें जो विशेष दुर्बल हो उसे छोड़कर प्रबल को ही लेना चाहिए।।२४।। केतुश्च शनिवन्मृत्युनाथसम्बद्धमादिशेत्। शनिना राहुणा वापि युक्ते सौम्ये रवीक्षिते।।२५।। केतु भी शनि के समान ही मारक होता है। शनि वा राहु के साथ शुभ ग्रह युत हो तथा सूर्य से देखा जाता हो तो।।२५।। पर्यायमेकं तन्मध्ये एकराशौ मृतिं वदेत्। तयोस्तु शुभयोगेन तद्दशामृतिमादिशेत् ।।२६।। एक पर्याय के मध्य में ही मृत्यु करता है। दोनों यदि शुभयुक्त हों तो उनकी दशा में मृत्यु होती है।।२६।। भोगराशौ दुर्बले वा प्रबले ग्रहसंस्थिते। तथापि निर्दिशेत्काले मरणं नात्र संशयः।।२७।। अन्तर दशा की राशि दुर्बल हो वा प्रबल ग्रह से युक्त हो तो उसके समय में मृत्यु कहना चाहिए।।२७।। केतौ चैवासनस्थे वा नाथे वाऽशुभवीक्षिते। केतोर्दशान्ते मृत्युः स्याच्छुभदृष्टेन किञ्चन।।२८।। यदि केतु अंत्य में हो अथवा उस राशि के स्वामी पापग्रह से देखा जाता हो तो केतु की दशा में मृत्यु होती है। शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो कुछ भी नहीं होता है।।२८।। तन्वधीशाष्टमेशाभ्यां योगेनायुः कृते द्विज। अष्टमेशस्य स्वोच्चस्थे चरपर्याब्दप्रमाणके।।२९।। लग्नेश, अष्टमेश से आयु योग होता हो और अष्टमेश अपनी उच्च राशि में हो तो चर पर्याय के वर्ष में।।२९।। अर्धाधिकाब्दं दत्वैव योजयेत्पूर्वमायुषि। एवं नाथान्तरीत्या च चरपर्यातिरिक्तकः।।३०।। आधे से अधिक वर्ष पूर्व आयु में जोड़कर विचार करना चाहिए। इस प्रकार राशिस्वामी तक चर पर्याय में विचार करना चाहिए।।३०।।

२८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् मर्यादायापि यदायुरष्टमेशेन दीयते। तत्सर्वमर्धाधिक्ये च विधेयं द्विजसत्तम।।३१।। मर्यादा के अनुसार अष्टमेश जिस आयु को देता हो उसमें अर्धाधिक्य कर देना चाहिए।।३१।। एवं रन्ध्रपतिर्विप्र नीचराशिगतोऽपि च। तद्ग्रहेण दीयमानमायुरर्द्धं च नाशयेत्।।३२।। इसी प्रकार अष्टमेश नीच राशि में हो तो उससे प्राप्त आयु का आधा ह्रास हो जाता है।।३२।। एवं रन्ध्रपतिर्विप्र नीचखेटेन संयुतः। तद्ग्रहेण दीयमानमायुरर्द्धं विनश्यति।।३३।। अथवा अष्टमेश किसी नीच राशि में स्थित ग्रह से युक्त हो तो भी प्राप्त आयु का आधा ह्रास होता है।।३३।। एवं रन्ध्रपतिर्विप्र तुङ्गखेटेन संयुतः। तद्ग्रहेण दीयमानमायुरर्द्धं च वर्धति।।३४।। इसी प्रकार अष्टमेश उच्च स्थित ग्रह से युक्त हो तो उससे प्राप्त आयु का आधा बढ़ता है।।३४।। एवमुक्तं च विप्रेन्द्र परमायुर्विनिश्चितम्। लग्नेशाष्टमेशाभ्यां योगायुर्दायमागते।।३५।। इस प्रकार मैंने आयु का निर्णय तुमसे कहा। लग्नेश, अष्टमेश के योग से आये हुए आयुर्दाय का।।३५।। तेषु संस्कारमाज्ञेयमिदं पूर्वोक्तसंकथाम्। लग्नेशाद्र्दायुरित्येवं तत्तद्योगकलात्मकम्।।३६।। यथोचित संस्कार करके जो फल उच्च-नीचादि के अनुसार का आवे।।३६।। संभुक्ताश्च ग्रहा उच्चनीचादिगुणदोषतः। वृद्धिह्रासावुक्तरीत्या कार्या वै सम्प्रदायतः।।३७।। उसे आयु में जोड़ देना चाहिए और संप्रदाय के अनुसार ह्रास-वृद्धि भी कर देना चाहिए।।३७।।

आयुर्दायाध्यायः २८५ द्वित्र्यादिमृत्युयोगश्च प्रबलः पूर्वभाषितः। नैसर्गिकोऽपि वीर्याय तस्य पाके मृतिर्भवेत् ।।३८।। यदि पूर्व में कहे हुए दो या तीन प्रबल मृत्यु योग हों तो नैसर्गिक योग- कारक भी बलवान् होते हैं। उसी की दशा में मृत्यु कहना चाहिए ।।३८।। रव्यारराहुपंगूनां चतुःखेटान्तरे बली। तस्य योगानुसारेण जातकस्य मृतिं वदेत् ।।३९।। रवि, भौम, राहु और शनि इन चारों में जो बलवान् हो उसी की दशा में मृत्यु होती है।।३९।। अष्टमेशेन संयुक्तः शनिराहुः कुजो रविः। न वीक्ष्यन्ते ग्रहैर्वापि तस्य मृत्युं विनिर्दिशेत् ।।४०।। यदि शनि, राहु, भौम और रवि में से कोई अष्टमेश से युत हो, अन्य ग्रहों से न देखे जाते हों तो उसकी दशा में मृत्यु होती है।।४०।। एषां मध्येषु प्रबला सा तत्स्वामिकराशिगे। पाके मृत्युं विजानीयान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।४१।। इनमें जो प्रबल हों तो उसके स्वामी की राशि की दशा में निःसंशय मृत्यु होती है।।४१।। एषां चतुर्ग्रहाणां च मध्ये चैको बली क्वचित्। तस्य राशिदशाकाले मृतिस्थानं विनिर्दिशेत् ।।४२।। इन चारों ग्रहों में कोई एक बली ग्रह हो उस ग्रह की राशि दशा में मृत्यु होती है।।४२।। मृत्युस्थानाभिभूतायां सिद्धायां च महादशा। तत्तस्यापि क्रमेणैव तदनन्तरमृतिप्रदा ।।४३।। मृत्युकारक ग्रह के निर्णयानुसार उसकी अंतर्दशा में भी मृत्यु होती है।।४३।। शुभग्रहेण सम्बन्धे शनिराहु कुंजो रविः। तत्तस्वामिदशाकाले मरणं च विनिर्दिशेत् ।।४४।। यदि शनि, राहु, भौम, रवि शुभग्रह से सम्बन्ध करते हों तो भी उनकी दशा में मृत्यु होती है।।४४।।

२८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् तदाश्रयरोशिपाके मृत्युर्भवति निश्चितम्। निर्विशङ्कं महाप्राज्ञ पुरा शम्भुप्रणोदितम् ।।४५।। एवं उनके आश्रयभूत राशि की दशा में भी मृत्यु होती है ।।४५।। सुखदुःखादि सन्ब्रूयात्पाकराशौ विचिन्तयेत्। योगान्तर्गता त्तत्तु तत्तद्वीर्यानुसारतः ।।४६।। पाकेश्वर के अनुसार सुख-दुःखादि उस ग्रह के योग और बल के अनुसार कहना चाहिए ।।४६।। सबलायां सुखं ब्रूयाद्दुर्बला दुःखदायिका। वैषम्येन फलं वाच्यं तथा मरणमेव च ।।४७।। यदि बलवान् हो तो मृत्यु और निर्बल हो तो दुःख देने वाला होता है, वैषम्य हो तो मृत्यु होती है ।।४७।। द्वादशे दशमे वापि संस्थिते पुच्छनायके। पापदृष्टे दशाप्राप्ते तदन्तरगते मृतिः ।।४८।। यदि केतु १२ या १० भाव में हो और पापग्रह से दृष्ट हो तो उसके दशा और अन्तर से मृत्यु होती है ।।४८।। द्वादशे दशमे केतुः शुभग्रहनिरीक्षितः। नायं योगो महाप्राज्ञ न कष्टं न च मृत्युकृत् ।।४९।। यदि १२ या १० भाव में केंतु हो और शुभग्रह से देखा जाता हो तो यह योग न तो कष्टकारक होता है और न मृत्युकारक होता है ।।४९।। प्राणिनीत्युक्तं विप्रेन्द्र प्राणानयनमुच्यते। राश्यधीनं बलं ज्ञेयं तदुक्तं कथ्यतेऽधुना ।।५०।। पहले बल की चर्चा कर आये हैं अतः उसका विचार कह रहे हैं। राशि के अधीन ही बल का विचार होता है ।।५०।। अग्रहात्सग्रहो ज्यायान्सग्रहे त्वधिकग्रहः। साम्ये चरस्थिरद्वन्द्वाः क्रमात्स्युर्बलशालिनः ।।५१।। जो ग्रह अकेला है उसकी अपेक्षा ग्रहयुक्त ग्रह बली होता है। ग्रहयुक्त ग्रह यदि समान ग्रहों से युक्त हो तो जो संख्या में अधिक ग्रहों से युक्त हो वह उसकी अपेक्षा बली होता है। इसमे भी समानता हो तो चर राशि में बैठे हुए की अपेक्षा स्थिर राशिवाला और इसकी अपेक्षा द्विस्वभावस्थ बली होता है ।।५१।।

आयुर्दायाध्यायः २८७ अथ दीर्घादियोगेषु त्रिषु च द्विजसत्तम। कक्षाह्रासकृते योगान्दर्शयामि तवाग्रतः॥५२॥ दीर्घायु, मध्यायु और अल्पायु योगों में कक्षा के ह्रास की स्थिति को कह रहा हूँ॥५२॥ लग्नसप्तमयोर्विप्र द्विद्वादशकयोरपि। षष्ठरन्ध्राधिपस्यापि जनुल्लग्ने विचिन्तयेत् ॥५३॥ लग्न सप्तम, द्वितीय-द्वादश, षष्ठ-अष्टम इनके अधिपति॥५३॥ पापाक्रान्ते पापयोगे पापमध्यत्वमागते। कक्षाह्रासो विजानीयान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥५४॥ पापाक्रांत पापग्रह पापग्रह से युक्त और और पापग्रह के मध्यम में हो तो कक्षा का ह्रास होता है॥५४॥ दीर्घस्य मध्यमा याता भवेदायूषि मध्यमे। अल्पादल्पं च विज्ञेयं कक्षाह्रासस्य लक्षणम्॥५५॥ अर्थात् दीर्घायु हो तो मध्यायु, मध्यायु हो तो अल्पायु और अल्पायु हो तो उससे भी अल्प आयु होती है। यही कक्षाह्रास का लक्षण है॥५५॥ कक्षाह्रासो यदार्थोऽपि पूर्ववज्जायते ध्रुवम्। अथैवं लग्नकुण्डल्यां पापयोगत्रिकोणके॥५६॥ कक्षाह्रास होने से आर्थिक स्थिति में न्यूनता आ जाती है। इसी प्रकार लग्न कुंडली में भी त्रिकोण में पाप योग से कक्षाह्रास होता है॥५६॥ लग्नपञ्चमभाग्येषु पापयोगकृते द्विज। कक्षाह्रासो भवेद्विप्र निर्विशङ्कं विधेः सुत ॥५७॥ लग्न, पंचम और नवम भाव में पाप ग्रह का योग होने पर कक्षा का ह्रास होता है॥५७॥ अत्रास्मिन्कारके लग्ने चिन्तयेज्जनिलग्नवत्। कारकांशे द्यूनराशेः पापमध्यत्वमेव हि॥५८॥ कारक लग्न में भी जन्मलग्न के समान ही विचार करना चाहिए। कारकांश से सप्तम भी पापमध्य में हो तो भी कक्षाह्रास होता है॥५८॥

२८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् एको योगः स विज्ञेयः कक्षाह्रासं च पूर्ववत्। अथैककक्षाह्रासस्य चापवादं वदाम्यहम्।।५९।। अब इसका अपवाद कह रहा हूँ।।५९।। एकस्थकक्षाह्रासं च वित्तपे चान्यथा भवेत्। पूर्ववच्छुभयोगेन कक्षावृद्धिर्भविष्यति।।६०।। जिसमें शुभ योग होने से कक्षावृद्धि होती है।।६०।। जनुर्लग्ने कारके च चिन्तयेत्पूर्ववद्विज। लग्ने द्यूने धने रिष्फे षष्ठे रंध्रे स्थलत्रये।।६१।। लग्न, सप्तम, द्वितीय, द्वादश, षष्ठ और अष्टम इनमें किन्हीं तीन स्थान में।।६१।। शुभखेटकृते योगे कक्षावृद्धिर्भवत्यपि। चिन्तयेत्पूर्ववद्विप्र त्रिकोणेषु स्थलद्वये।।६२।। शुभ ग्रह का योग हो तो कक्षा की वृद्धि होती है। इसी प्रकार दोनों त्रिकोणों में भी विचार करना चाहिए।।६२।। जनुर्लग्नं कारकं च शुभयोगं करोति चेत्। कक्षावृद्धिर्न सन्देहो भविष्यति द्विजोत्तम।।६३।। तथा जन्मलग्न और कारक शुभग्रह से योग करता हो तो कक्षा की वृद्धि होती है इसमें संदेह नहीं है।।६३।। कारके च त्रिकोणस्थ नीचस्थाः पापखेचराः। कक्षाह्रासो महाप्राज्ञ द्वितयेन भविष्यति।।६४।। यदि कारक त्रिकोण में हो और पापग्रह अपनी नीचराशि में हो तो दोनों से कक्षा का ह्रास होता है।।६४।। कारकांशात त्रिकोणेषु शुभखेटे शुभस्थले। कक्षावृद्धिर्भवेत्तत्र न सन्देहो द्विजोत्तम।।६५।। कारकांश में त्रिकोण में शुभराशि में शुभग्रह हो तो कक्षा में वृद्धि होती है।।६५।। कारके पापखेटाच्च अन्त्यगें पापसंयुते। कक्षाह्रासो भवेत्तत्र प्रणीते द्विजसत्तम।।६६।। पापग्रह १२वें भाव में कारक हो और पापग्रह से युक्त हो तो कक्षा का ह्रास होता है।।६६।।

आयुर्दायाध्यायः २८९ कारके शुभसंयुक्ते स्वतुङ्गे शुभखेचराः। कक्षावृद्धिर्भवेत्तत्र निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥६७॥ कारक शुभग्रह से युक्त हो और शुभग्रह अपने उच्च में हों तो कक्षावृद्धि होती है॥६७॥ पापकारकजैर्हासो वृद्धिर्वा कथिता द्विज। अथैव गुरुणा कक्षाह्रासवृद्धिं वदाम्यहम्॥६८॥ इस प्रकार पापग्रह से उत्पन्न कक्षा की ह्रास वृद्धि मैंने कहा। इसी प्रकार गुरु से कक्षा की ह्रास-वृद्धि कह रहा हूँ॥६८॥ वित्ते व्यये लग्नषष्ठे त्रिकोणे पापयोर्द्विज। कक्षाह्रासो भवेत्तत्र पूर्ववद्द्विजसत्तम॥६९॥ गुरु से दूसरे, बारहवें, लग्न, छठे और त्रिकोण में पापग्रह हों तो कक्षा का ह्रास पूर्ववत् होता है॥६९॥ गुरौ नीचे स्वतुङ्गे च संयुक्तेऽशुभखेचरैः। कक्षाह्रासो भवेत्तत्र निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥७०॥ गुरु अपने नीच में अथवा अपनी उच्चराशि में पापग्रहों से संयुक्त हो तो कक्षा का ह्रास होता है॥७०॥ वित्तगे च गुरौ ज्ञेयं पूर्ववन्नियमं द्विज। प्रागुक्तार्थकृतेयं कक्षा सर्वा प्रकथ्यते॥७१॥ गुरु दूसरे भाव में हो तो पूर्ववत् कक्षाह्रास-वृद्धि को समझना चाहिए। पूर्वोक्त कक्ष क्रम के ही लिए यह सब कहा गया है॥७१॥ तथैव शुभयोगेषु चापवादं वदाम्यहम्। उक्तस्थाने शुभैर्योगे पूर्णेन्दुशुक्रयोर्द्विज॥७२॥ उक्त स्थानों में शुभग्रह के योग का अपवाद कह रहा हूँ। उक्त स्थानों में शुभग्रह का योग पूर्णचन्द्र, शुक्र का हो तो॥७२॥ योगप्रकरणे कक्षाह्रासाय न तु वृद्धये। तत्रैकराशिवृद्धिश्च भवत्येव न संशयः॥७३॥ कक्षा का ह्रास ही होता है, न कि वृद्धि, एक राशि की वृद्धि ही होती है॥७२॥ पूर्ववच्चोक्तपापेषु शनिना योगकारकः। कक्षाह्रासश्च तत्रैव यत्रैको राशिह्रासकृत्॥७४॥

२९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् पूर्वोक्त पापग्रह योग में शनि योग करता हो तो वहाँ पर कक्षा ह्रास में एक राशि का ह्रास होता है।।७४।। अथ स्थिरदशायां मृत्युसमयज्ञानम्- अधुना सम्प्रवक्ष्यामि विशेषेण द्विजोत्तम। आलम्ब्य स्थिरदंशायां योगात्रिधनमेव च।।७५।। अब मैं स्थिर के अनुसार चार खंड के अनुसार मृत्युसमय को कह रहा हूँ।।७५।। त्रित्रिभिराशिभिरेकं खण्डाश्चत्वार एव च। कस्मिन्खण्डे च निधनं तस्य योगं विचिन्तयेत् ।।७६।। तीन-तीन राशियों के चार खंड होते हैं। किस खंड में मृत्यु होगी इसको कहता हूँ।।७६।। योगत्रयमहं वक्ष्ये दीर्घमध्याल्पभेदतः। चतुःखण्डेषु यत्रायुरागतां तत्र चिन्तयेत् ।।७७।। दीर्घायुर्योगवत्तत्तु यस्मिन्खण्डे समागते। तस्मिन्खण्डे च निधनं भवत्यपि न सन्देहः ।।७८।। दीर्घायु, मध्यायु, अल्पायु के भेद चारों खंडों में जहाँ समाप्त हो उसी समय मृत्यु को कहना चाहिए।।७७-७८।। वक्ष्यमाणप्रकारेण मध्यमाल्पायुषि द्विज। निधनाश्रयखण्डेषु लक्षणाक्रान्तया दशा ।।७९।। इसी प्रकार मध्यायु और अल्पायु के खंडों में जिस खंड के जिस दशा में मृत्यु का संदेह हो उसी खंड में उसे कहना चाहिए।।७९।। तद्दशायां च निधनं भवत्येव द्विजोत्तम। कदाचित्र मृतिस्तत्र क्लेशदुःखभयानि च।।८०।। यदि कदाचित् मृत्यु न हो तो उस समय क्लेश, दुःख और भय होता है।।८०।। भवन्ति तत्र संस्कारं पुनरित्थं वदाम्यहम्। पापद्वयमध्यगते राशिपाके मृतिर्भवेत् ।।८१।। पापग्रहों के मध्य में स्थित राशि की दशा में मृत्यु होती है।।८१।।

आयुर्दायाध्यायः २९१ लग्नाद्वा कारकाद्विप्र पापाक्रांते त्रिकोणके। द्वादशाष्टमराश्येवं पापाक्रांतं भवेदपि॥८२॥ लग्न से आत्मकारक से त्रिकोण में पापग्रह हों अथवा १२वीं राशि में पापग्रह हों॥८२॥ तद्दशायां च निधनं जातकस्य न संशयः। खण्डे स्थिरदशायां च चिन्तनीयं प्रयत्नतः॥८३॥ तो उस राशि की दशा में मृत्यु कहना चाहिए॥८३॥ पापराशेस्त्रिकोणेषु द्वादशाष्टमराशिषु। पापाक्रान्ते तद्दशायां निधनं भवति ध्रुवम्॥८४॥ पापग्रह की राशि से त्रिकोण में अथवा १२।८वीं राशि में पापग्रह हो तो उस राशि की दशा में मृत्यु होती है॥८४॥ शुभमध्ये मृतिर्नैव पापमध्ये मृतिर्भवेत्। भूयोऽपि निधनार्थाय राशिदोषं वदाम्यहम्॥८५॥ शुभग्रह के मध्य की राशि में मृत्यु नहीं होती है और पापग्रह के मध्य की राशि की दशा में मृत्यु होती है। फिर भी निधन राशि के दोष को कह रहा हूँ॥८५॥ द्वादशाष्टमपत्योश्च दृष्टौ क्षीणेन्दुशुक्रयोः। तद्दशायां च निधनं भवत्येव न संशयः॥८६॥ १२।८ के स्वामी क्षीणचन्द्र और शुक्र से देखे जाते हों तो उनकी दशा में निधन होता है॥८६॥ क्षीणेन्दोः केवलं दृष्टिः शुक्रदृष्टिश्च केवलम्। दृष्टिमात्रेण निधनं स्थिरदशायां विचिन्तयेत्॥८७॥ केवल क्षीणचन्द्र और शुक्र के दृष्टि भाव से स्थिर दशा में मृत्यु होती है॥८७॥ मृत्युस्थाने तु या दृष्टिः पापमध्यर्क्षं प्रपश्यति। तस्य दशां समालोक्य व्योमषष्ठाधिपाद्द्विज॥८८॥ पापग्रह के मध्य में स्थित अष्टम स्थान को पूर्वोक्त (क्षीण चन्द्र वा शुक्र) वा १०, ६ भाव के स्वामी देखते हों तो इसकी दशा में॥८८॥ निरीक्षते नवांशेषु द्वयोः स्थाने द्विजोत्तम। तत्रैव निधनं ज्ञेयं भाषितं च तवाग्रके॥८९॥

२९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथवा १०, ६ के स्वामी से देखी जाती हुई अष्टमस्थ पापद्वयमध्यस्थित राशि की अन्तर दशा में निधन होता है।।८९।। पूर्वोक्तनिधनस्थाने महापाकं नरेष्वपि। व्योमषष्ठाधिपौ विप्र तयोरंशं निरीक्षिते।।९०।। राशेरन्तर्दशाकाले निधनं भवति ध्रुवम्। अन्तर्दशायां रूपे द्वे निधनस्थानमेव च।।९१।। पूर्वोक्त निधन स्थान के समय महादशा मे १०, ६ भावों के नवांशराशि के अन्तर में निधन होता है।।९०-९१।। इति आयुर्दायप्रकरणम्। अथ मारकप्रकरणम् पराशर उवाच- अथातः सम्प्रवक्ष्यामि निधनार्थे विशेषतः। प्रकारान्तर्दशायास्तच्च रुद्राद्द्विजसत्तम।।१।। अब मै विशेषकर निधन के सम्बंध में दशा-अन्तर्दशा के विषय में रुद्रग्रह द्वारा कह रहा हूँ।।१।। लग्नद्यूनाष्टमेशौ यौ तयोर्मध्ये च यो बली। प्राणीरुद्रः स विज्ञेयः निधनार्थे विचिन्त्यताम् ।।२।। लग्न और सप्तम से जो अष्टमेश उनमें जो बली हो वही रुद्रग्रह होता है।।२।। तयोर्मध्ये बली चिन्त्यः शुभदृष्टेन संयुते। दुर्बलः सोऽपि गौणाख्यो रुद्रग्रह इतीर्यते।।३।। वह शुभ दृष्ट वा शुभ युक्त हो तो बली होता है।।३।। तत्रैव प्राणिरुद्रस्य विशेषं गणयेत्फलम्। प्रवक्ष्यामि तवाग्रे च शृणुष्व त्वं महामते।।४।। जो दुर्बल है वह भी रुद्रग्रह होता है।।४।। शुभैर्युक्ते शुभैर्दृष्टे शुभसम्बन्धकारकः। प्राणीरुद्रः स विज्ञेयस्तत्सीमांतमायुरेव च।।५।। कारक यदि शुभग्रह से युक्त हो, शुभदृष्ट हो वा संबंध करता हो, बली हो तो वह रुद्रग्रह होता है। रुद्र शूलान्त पर्यन्त आयु होती है।।५।।

अथ मारकप्रकरणम् २९३ रुद्रशूलान्तमायुः स्यात् त्रिकोणान्ते तथा पुनः। लग्नान्ते पञ्चमान्ते च नवमान्ते त्रयस्थले ।।१६।। अथवा उसके त्रिकोण राशि पर्यन्त आयु होती है। लग्नान्त, पंचमान्त और नवमांत इन्हीं तीनों को त्रिकोणांत समझना चाहिए।।१६।। चिन्तनीयं महाप्राज्ञ तत्तद्राशिदशान्तरे। अल्पमध्यं च दीर्घायुर्योगभेदा न संशयः ।।१७।। तत्राप्यायुःसमायोगे त्रिकोणमध्यमोत्तरे। आयुस्तत्रैव विज्ञेयं तदग्रे च क्रमेण च ।।१८।। योगे मध्यायुषं प्राप्ते त्रिकोणे मध्यमान्तगे। आयुर्दायसमाप्तिश्च निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।१९।। दीर्घायुर्योगसंलब्धे त्रिकोणे नवमान्तगे। दशान्तरे महाप्राज्ञ आयुर्दायसमाप्तये ।।२०।। इन्हीं खंडों में अल्पायु, मध्यायु और दीर्घायु के भेदों को समझना चाहिए। लग्न से पंचमांत अल्पायु, नवमान्त पर्यन्त मध्यमायु और इसके बाद दीर्घायु को समझना चाहिए।।२०।। अथैवं लग्नद्यूनादि आरभ्य च दशाक्रमः। प्रवृत्तिर्जन्मतो ज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।२१।। इसी प्रकार लग्न सप्तमादि से आरम्भ कर दशाक्रम जन्म से ही जानना चाहिए।।२१।। यत्र रुद्रग्रहस्यापि शुभदत्वं न भाव्यते। तत्र जीवस्य नष्टत्वान्नेदं फलमिति स्थितिः ।।२२।। जिसमें रुद्रग्रह का भी शुभदत्व नहीं होता है, वहाँ पर जीव के नष्ट हो जाने से उपरोक्त फल नहीं होता है।।२२।। अथैव रुद्रशूलान्तमायुर्दायेति कारणे। योगेऽस्मिंश्च समुत्कर्षात्किञ्चिद्दर्शयति द्विज ।।२३।। इसी प्रकार से रुद्रशूलान्त आयुर्दाय होने का जो कारण होता है, उसका कारण कह रहा हूँ।।२३।।

२९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्राणीरुद्रशुभैर्दृष्टे पूर्वोक्तफलदायकः। शुभयोगे न सन्देहो रुद्रशूलान्तमायुषि।।१४।। यदि रुद्रग्रह शुभ दृष्ट हो तो पूर्वोक्त फल को देने वाला होता है और शुभ युक्त हो तो रुद्रशूलान्त आयु होती है, इसमें संदेह नहीं है।।१४।। स्थित एव फलं जन्म कथितं कारणान्तरे। निरुक्ते शुभसंयोगे किं कीर्तयति भो द्विज ।।१५।। पूर्वमेवं फलं सांधो समुत्कृष्टे तदेव चेत्। सुतरां तदेव वक्तव्यं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।१६।। कारणान्तर से पूर्वोक्त फल होता है किन्तु शुभयोग में कोई कारणांतर नहीं होता है।।१६।। अनेन पूर्वयोगेन फलं किञ्चिद्धि न्यूनता। आद्योदितादुक्तकालात्पूर्वं पश्चान्मृतिर्यदि ।।१७।। निरुक्तयोगश्च तदा ह्यपवादं वदाम्यहम्। रविं विहाय नितरां पापयोगो भवेद्द्विज ।।१८।। इसमें भी यदि पूर्वोक्त फल यदि उत्कृष्ट हो तो वही होता है। यदि पूर्वोक्त फल में कुछ न्यूनता हो और उसके पूर्व पीछे मृत्यु हो जाय तो यह योग निष्फल होता है।।१८।। योगोऽयं निष्फलो वाच्यः पुरा ब्रह्मप्रणोदितः। इदं फलं न भवति योगेऽस्मिन्द्विजसत्तम।।१९।। नाशयोगस्य वक्तव्यं फलं वापि भयङ्करम्। अधुना सम्प्रवक्ष्यामि गौणरुद्रस्य वै द्विज ।।२०।। किन्तु नाश होने के योग का फल भयंकर होता है। अब मैं गौणरुद्र का विवेचन कर रहा हूँ।।१९-२०।। गुणप्रकर्षेण फलं विशेषेण तवाग्रतः। गौणरुद्रे महाप्राज्ञ मन्दारेन्दुनिरीक्षिते ।।२१।। अब मैं गुण की प्रकर्षता से फल-विशेष को कह रहा हूँ। गौणरुद्र शनि, भौम, चन्द्र से देखा जाता हो।।२१।। अभावे शुभयोगस्य पापयोगोत्तरे तथा। शूलान्तात्फल विप्रेन्द्र आयुर्दायं भवत्यपि ।।२२।।

अथ मारक प्रकरणम्। २९५ शुभग्रह का योग न हो, पापयोग भी न हो, वा पाप योग हो अथवा भौम, शनि, चन्द्रमा के साथ और भी शुभग्रह की दृष्टि हो तो रुद्रा- श्रित राशि की अग्रिम राशि की दशा में मृत्यु होती है।।२२।। शुभदृष्टे वा शूलान्तात्परञ्चायुर्भवेदपि। योगद्वयपरत्वेन योजनीयं न संशयः।।२३।। शुभग्रह के योग के अभाव में पापग्रह का योग होते हुए दोनों योगों का एक के बाद दूसरे का विचार करना चाहिए।।२३।। एतद्योगद्वयं किञ्चिन्न्यूनतायामपि द्विज। नेदं फलं प्रवक्तव्यं मैत्रेय भाषितं पुरा।।२४।। इन दोनों के योगों के न्यून होने से पूर्व का फल नहीं होता है।।२४।। शुभदृष्टिभवे चैव योगे च परपूर्ववत्। शुभदृष्टावसन्त्यां च पापयोगाद्यभावतः।।२५।। शुभ दृष्टि होते हुए अथवा शुभ दृष्टि के अभाव में पापयोगादि के अभाव में शुभ दृष्टि के होते हुए एक योग होता है।।२५।। कृत एको हि योगश्च पूर्वयोगजमेव च। अशुभयोगे शुभदृष्टौ योगोऽयमपरो द्विज।।२६।। पापग्रह के योग में शुभ दृष्टि के होते हुए दूसरा योग होता है।।२६।। पापयोगैरभावे च शुभदृष्टौ च संयुते। १कैमुतिकाख्यन्यायेन सिद्धो योगस्तृतीयकः।।२७।। पाप योग के अभाव में शुभ दृष्टि होते हुए कैमुतिक न्याय से तीसरा योग भी होता है।।२७।। पुरा प्रोवाच यच्छम्भुस्तवाग्रे कथयाम्यहम्। द्वितीययोजनायां तु शुभदृष्टिसमन्विते।।२८।। पूर्व में शम्भु ने जो कहा था उसे मैंने तुमसे कहा। दूसरे योग में पापयोग शुभदृष्टि में।।२८।। पापयोगस्य चाभावे योगः प्रथम उच्यते। पापयोगे महाप्राज्ञ शुभदृष्टे प्रभावके।।२९।। १. कैमुतिकन्याय अर्थापत्ति को कहते हैं, जैसे चूहा लकड़ी को खा गया तो इससे मृदुपदार्थ मिठाई आदि को भी खा सकता है।

२९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् पापग्रह के योग के अभाव में प्रथम योग और पापग्रह योग में शुभदृष्टि में दूसरा ॥२९॥ द्वितीययोगपक्षेऽहं पूर्वस्मिन् द्विजसत्तम। पापयोगस्य चाभावे पापदृष्टिविवर्जितः॥३०॥ अथवा पापयोग के अभाव में पापदृष्टि के न होने में॥३०॥ कैमुतिकाख्यन्यायेन तृतीयो योग उच्यते। अथैवं प्राणिरुद्रस्य ह्युक्ता पक्षान्तरे कथा॥३१॥ कैमुतिकन्याय से यह तीसरा योग हुआ। यह प्राणीरुद्र के पक्षान्तर से स्वरूप कहा है॥३१॥ तत्रैव प्रथमे योगे शुभदृष्टिविवर्जिते। शुभयोगादियोगश्च द्वितीयोक्तेन योगकृत्॥३२॥ प्रथम योग में शुभ दृष्टि से रहित होने में शुभादि योग होने से॥३२॥ तृतीयेन द्वयस्यापि योगभङ्गं करोत्यपि। अधुनोक्तत्रयाभावे मन्दादिदृष्टिमात्रतः॥३३॥ तीसरे से दूसरे के साथ योग होने से तथा उक्त तीनों योगों के अभाव में शन्यादि दृष्टि के भेद से निर्विशंक कह रहा हूँ॥३३॥ एवं स्थिते सुयोगश्च निःशङ्कं प्रतिपाद्यते। अशुभैः खेचरैर्दृष्टे पापयोग इति स्थितिः॥३४॥ अशुभ ग्रह की दृष्टि और पापयोग॥३४॥ शुभयोगविहीने च मन्दारेन्दुनिरीक्षिते। तदायुः परतो विप्र समानादिति योजयेत्॥३५॥ शुभ योग से हीन शनि, भौम, चन्द्र से दृष्ट हो तो रुद्रशूल के बाद तक आयु होती है॥३५॥ प्रथमे द्वितीये सन्तः पापयोगैरभावतः। योगो भङ्गमपेक्षा च तृतीयोक्तमिदं वदेत्॥३६॥ प्रथम, द्वितीय योग में पापयोग के अभाव में योग भंग होने से तीसरे योग की उत्पत्ति होती है॥३६॥

अथ मारक प्रकरणम्। २९७ पापदृष्टिमात्रमेवं योगनिर्वाहकारणे। अपवादविहीनेन इत्येवोक्तं तृतीयेके।।३७।। केवल पापग्रह मान्य की दृष्टि से योग होने के कारण तीसरा योग होता है।।३७।। रुद्राभ्यां प्राणिगौणाभ्यां ताभ्यामाश्रितमेव च। गुणविशेषे आयुरन्तं वक्ष्यामीह महामते।।३८।। अब दोनों रुद्रों से और उनके आश्रित गुण-विशेष से आयु का निर्णय कर रहा हूँ।।३८।। गौणरुद्रे शुभैर्योगेशुभदृष्टिसमन्विते। रुद्रशूलान्तमायुश्च योजनीयं द्विजोत्तम।।३९।। गौणरुद्र शुभ ग्रह से योग करता हो और शुभदृष्टि से युक्त हो तो रुद्रशूलान्त आयु होती है।।३९।। पूर्वोक्त प्राणिरुद्रेण द्वियोगप्राणकेन च। द्वाभ्यां शूलान्तमायुश्च तवाग्रे कथितं मया।।४०।। पूर्वोक्त बली (प्राणि) रुद्र से जो दो योग कहे हैं उनमें दोनों रुद्रों की शूलान्त पर्यन्त आयु होती है।।४०।। अधुना सम्प्रवक्ष्यामि द्वयोर्निर्वाहकारणम्। तयो रूपं भिन्नभिन्नं शृणुष्व मुनिसत्तम।।४१।। अब दोनों के निर्वाह के कारण कह रह हूँ। दोनों के भिन्न-भिन्न रूप होते हैं।।४१।। प्राणिरुद्रे शुभैर्दृष्टे योगोऽयं द्विजसत्तम। शुभयोगेति का वार्ता शूलान्तायुर्विनिश्चितम्।।४२।। प्राणिरुद्र शुभग्रहों से देखा जाता हो और शुभयोग हो तो रुद्रशूलान्त आयु होती है।।४२।। गौणरुद्रे शुभैर्दृष्टे योगोऽयं क्लेशदायकः। रोगशोकभयं कर्त्ता मृत्युं नैव करोति च।।४३।। गौणरुद्र शुभग्रहों से दृष्ट हो तो क्लेशदायक, रोग-शोकदायक तथा भयकारक होता है, न कि मृत्युकारक।।४३।। शुभयोगे महाप्राज्ञ योगोऽयं बलवत्तरः। तस्य शूलान्तमायुश्च निर्विशङ्कं न संशयः।।४४।।

२९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि इस योग में शुभयोग भी हो तो निश्चय ही इसके शूलान्त पर्यन्त आयु होती है॥४४॥ उभौ रुद्रौ शुभैर्दृष्टावथवा योगद्वयोरपि। शुभग्रहेण क्लेशश्च रुद्रशूलान्तमायुषि॥४५॥ दोनों रुद्र शुभ ग्रहों से दृष्ट और योग करते हों तो रुद्रशूलान्त आयु न हाकर केवल क्लेशमात्र होता है॥४५॥ प्राणी चाप्राणिरुद्राभ्यां कृतयोगद्वयेन च। तयोर्वा सम्प्रवक्ष्यामि तवाग्रे द्विजसत्तम॥४६॥ बलवान् या निर्बल रुद्रों से दोनों योगों में जो विशेषता होती है, उसे कह रहा हूँ॥४६॥ मार्त्तण्डरहितो चान्यः पापयोगकृते द्विज। योगद्वयं न भवति पापयुक्तं द्वयोरपि॥४७॥ दोनों रुद्रों के दोनों योगों में सूर्य को छोड़कर अन्य पापग्रह योग करते हों तो दोनों योग नहीं होते हैं॥४७॥ शुभयोगः शुभैर्दृष्टेरुभयेऽपि विना रविम्। पापयोगकृते विप्र भययोगो विनश्यति॥४८॥ शुभयोग शुभग्रह से दृष्ट दोनों हों तो पापग्रह से उत्पन्न भययोग निवृत्त हो जाता है॥४८॥ शुभयोगः शुभदृष्टिरभावे न भवत्यपि। यत्रायुः कथयाञ्चक्रुर्वक्तव्यं द्विजसत्तम॥४९॥ शुभयोग शुभदृष्टि के अभाव में भी कुछ नहीं होता है॥४९॥ उभयोः पापयोगे च कश्चिद्रोगार्तिको भवेत्। क्लेशः शोको नृपाद्भीतिः देशपर्यटनं द्विज॥५०॥ यदि दोनों पाप योग करते हों तो कुछ रोग आदि होते हैं, क्लेश, शोक, राजा से भय, देशपर्यटन होता है॥५०॥ शुभदृष्टेरभावे च शुभयोगविवर्जिते। पापयोगप्रभावेण मरणं सारणं दृशा॥५१॥ शुभदृष्टि के अभाव में शुभयोग के बिना पापयोग के प्रभाव से मरण होता है॥५१॥

अथ मारकप्रकरणम्। २९९ शुभयोगदृष्टचभावे पापयोगे द्विजोत्तम। शुभवर्गो पापवर्गो तवाग्रे कथयाम्यहम्।।५२।। अब मैं शुभ वर्ग और पाप वर्ग को कह रहा हूँ।।५२।। अर्कारमन्दफणिनः क्रमात् क्रूरायथाक्रमम्। चन्द्रोऽपि क्रूर एवात्र क्वचिदङ्गारकाश्रयात् ।।५३।। सूर्य, भौम, शनि और राहु ये यथाक्रम से क्रूर होते हैं। चन्द्रमा भी कभी भौम के संसर्ग से क्रूर होता है।।५३।। गुरुःकविशिखिज्ञाश्च यथापूर्वं शुभग्रहाः। क्रूरखेटा महाप्राज्ञ चार्काद्या उत्तरोत्तरम्।।५४।। गुरु, शुक्र, केतु और बुध ये यथाक्रम से शुभग्रह हैं। सूर्यादि ग्रह क्रूर होते हैं।।५४।। क्रूराः क्रूरभगाश्चैव महत्क्रूरा भवन्ति च। शुभक्षेत्रगतैः क्रूरैः क्रूरता ह्युपशाम्यति।।५५।। क्रूर ग्रह क्रूरग्रह की राशि में हों तो बड़े क्रूर होते हैं। शुभग्रह की राशि में क्रूरग्रह हों तो उनकी क्रूरता शान्त हो जाती है।।५५।। गुर्वादयः शुभग्रहा यथापूर्वं बुधः कविः। कवितः केतु विज्ञेयः केतुतो वाक्पतिर्द्विज।।५६।। गुरु आदि शुभग्रह बुध से शुक्र यथापूर्वं बली होते हैं। शुक्र से केतु और केतु से गुरु क्रम से उत्तरोत्तर बली होते हैं।।५६।। क्रमेणैव विजानीयाच्छुभखेटोत्तरोत्तरम्। यथापूर्वं क्रूरग्रहाः क्रूराश्रयसमागते।।५७।। इसी क्रम से क्रूरग्रह क्रूरराशि में यथाक्रम से बली होते हैं।।५७।। एवं क्रौर्यं समापन्नं क्रौर्यं तु शोभनाश्रयः। एवं गुर्वादि सौम्याश्च शुभाः श्रेयातिशोभनाः।।५८।। एवं गुरु आदि शुभग्रह भी शुभराशि में अत्यंत शुभद होते हैं।।५८।। क्रूराश्रये सौम्यखेटाः सौम्यता नश्यते क्वचित्। एवमेवापरांयुक्तिं कथयामि द्विजोत्तम।।५९।। कभी-कभी क्रूरग्रह की राशि में गये हुए शुभग्रह अपनी शुभता को नाश कर देते हैं।।५९।।

३०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्रत्येकं शुभराशिस्थो उच्चस्थो वा बुधः शुभः। गुरुशुक्रौ च सौम्यस्थौ ततोऽन्ये च शुभाः स्मृताः।।६०।। प्रत्येक शुभराशि में वा अपनी उच्चराशि में बुध शुभद होता है एवं गुरु-शुक्र शुभराशि में अत्यंत शुभद होते हैं।।६०।। पूर्वस्मिन् पापयोगेन योगभङ्गद्वये द्विज। निरूपितं तवाग्रे च निर्विशङ्कं न संशयः।।६१।। एवं पूर्वोक्त पापग्रह के योग से दोनों पूर्वोक्त भंग योग कहा गया है।।६१।। योगद्वयेऽपि भङ्गार्थे पापदृष्टौ विशेषकम्। न दर्शयति कदापि स्यात् तवाग्रे कथयामि वै।।६२।। किन्तु दोनों योगों में विशेषतः पापदृष्टि अपेक्षित है।।६२।। शुभग्रहाणामभावे मन्दारेन्दुनिरीक्षिते। पापयोगे शुभैर्दृष्टे परतश्चायुषि द्विज।।६३।। प्राणिरुद्रेऽप्यगौणेन शुभयोगविवर्जिते। पापयोगेऽथवा दृष्टे तथा शुभनिरीक्षिते।।६४।। शुभग्रहों की दृष्टि न हो, शनि, भौम, चन्द्रमा देखते हों अथवा पापग्रह का योग वा दृष्टि हो, शुभग्रह देखता हो तो पूर्ववत् तारतम्य से फल का विचार करना चाहिए।।६४।। व्यापारतानुविज्ञेया पूर्ववद्द्विजसत्तम। अत्रोपपदपापाच्च राहोरप्युपलक्षणम्।।६५।। इसी प्रकार उपपद की चर्चा से राहु की चर्चा से उपलक्षण मात्र है।।६५।। एवं सूर्यातिरिक्तोऽपि पापयोगस्तथैव च। तस्यैवेहानुवादाच्च राहोश्चोपबृंहणात्।।६६।। सूर्य के अतिरिक्त पापग्रह के योग से भी योग होता है।।६६।। परिग्रहदर्शनाच्च परतो रुद्रमाश्रयात्। शुभस्थाने आयुरन्तः शूलत्रयमलङ्घनात्।।६७।। इन परिग्रहों के रहते हुए रुद्रग्रह के आश्रय से शूलान्त पर्यन्त आयु होती है।।६७।।