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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

आयुर्दायाध्यायः २६१ शुक्र अस्त होते हुए भी आधा हानि नहीं करते हैं। बारहवें भाव से विलोम संपूर्ण, आधा, तृतीयांश, चतुर्थांश, पंचमांश और षष्ठांश पापग्रह अपने आयु की हानि करते हैं और शुभग्रह इन्हीं भावों में आधा हानि करते हैं। अर्थात् १२वें भाव में पापग्रह हों तो अपने संपूर्ण आयु का नाश, ग्यारहवें भाव में हो तो आधा इत्यादि ।।५।। एकस्थानस्थिताश्चेत्स्युर्द्वात्रयो गगनेचराः। तदा बलयुतः खेटो हरत्येकेन चापरे ।।६।। एक ही स्थान में दो-तीन ग्रह बैठे हों तो उनमें जो बलवान् हो उसी के आयु का अपहरण होता है।।६।। वर्गोत्तमस्वर्क्षनवांशदृक्के द्विसंगुणं तत्सकलं विधेयम्। वक्रोच्चयोस्तत्त्रिगुणं विधेयं द्वित्रिगुणत्वे त्रिगुणं सकृच्च ।।७।। जो ग्रह वर्गोत्तम नवांश, अपनी राशि या नवांश या द्रेष्काण में हो उसके संपूर्ण आयु को दूना कर देना चाहिए। जो वक्री हो या अपनी उच्चराशि में हो तो उसकी आयु को तिगुना कर देना चाहिए। एक ही ग्रह की आंयु द्विगुणित और त्रिगुणित करनी हो तो केवल त्रिगुणित ही करना चाहिए।।७।। अंशायु-साधन का उदाहरण पृ. २४ में दिये हुए स्पष्ट ग्रहचक्र और जन्माङ्ग को देखना चाहिए। सूर्य ३।१८।२६।३४ है। ३ १८ २६ ३४ × १०८ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ३२४ ८६४ ६४८ ४३२ १०८ २१६ ३२४ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ३२८ १९४४ २८०८ ३६७२ ÷ ६० ६६ ४७ ६१ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ३२ ÷ १२ ३९० ÷ १२ १९९१ ÷ ३० २८६९ ÷ ६० ८ शेष ६ शेष ११ शेष ४९ शेष १२ शेष = ८।६।११।४९।१२ सूर्यायुर्दाय वर्षादि। इसी प्रकार से लग्न सहित सभी ग्रहों के अंशायु का साधन करना चाहिए।

२६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् असंस्कृतांशायुचक्रम्

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.ग्रहायु
वर्ष
१०मास
१११११९२९दिन
४९२४५०२२३७३३५७घटी
१२३६२४१२१२३६४८पल
विशेष संस्कार
सूर्य सातवें भाव में है, अतः सूर्यायुवर्षादि ८।६।११।४९।१२ ÷ ६ =
१।५।१।५८।१२ लब्धि वर्षादि हुई। इस लब्धि को सूर्यायु
८।६।११।४९।१२ में
लब्धि- १।५।१।५८।१२ को घटाया तो
= स्पष्टसूर्यायुवर्षादि ७।१।९।५१।० हुए।
चन्द्र में हानि-वृद्धि का कोई योग न होने के कारण स्पष्ट चन्द्रायुवर्षादि
०।९।१।२४।३६ हुए।
भौम अपने नवमांश (मेष) में होने के कारण भौमायु ०।९।३।५०।२४
× २ = ०।१८।७।४०।४८ भौम का स्पष्टायुवर्षादि हुआ।
बुध में हानि वृद्धि के कोई योग न होने से स्पष्ट बुधायुवर्षादि =
१।७।११।२२।१२ हुए।
गुरु आठवें भाव में है अतः आधा भाग कम होना चाहिए, अतः गुरु
की आयुवर्षादि ३।१०।७।३७।१२ ÷ २ = १।११।३।४८।३६ लब्धि को
गुरु आयुवर्षादि ३।१०।७।३७।१२ में
लब्धि १।११।३।४८।३६ घटाया तो
शेष १।११।३।४८।३६ वर्षादि हुए।
गुरु अपने द्रेष्काण का है अतः हानिकृत गुरु आयुवर्षादि
१।११।३।४८।३६ ×२ = २।२२।७।३७।१२ स्पष्ट गुरु की आयु हुई।
शुक्र में कोई हानि-वृद्धि के योग न होने से स्पष्ट शुक्रायुवर्षादि
७।६।५।३३।० हुए।
शनि शत्रु राशि में है, अतः शनि के आयुवर्षादि ३।६।१९।५७।३६
÷ ३ लब्धि १।२।५।१९।१२ को घटाना चाहिए। अतः शनि की आयुवर्षादि
३।६।१९।५७।३६ में
लब्धि १।२।५।१९।१२ को घटाया तो
स्पष्टशन्यायु २।४।१०।३८।२४ वर्षादि हुए।

आयुर्दायाध्यायः २६३ लग्नायु को त्रैराशि द्वारा लाना चाहिए, जिसके लिए नीचे दी हुई तालिका से काम लेना चाहिए। १ राशि वा ३० अंश = १ वर्ष = १२ मास ∴ १ मास = ३०/१२ = २ १/२ अंश ∴ १ अंश = १२ दिन = ६० कला ∴ १ दिन = ५ कला = ६० घटी ∴ १ कला = १२ घटी = ६० विकला ∴ १ घटी = ५ विकला = ६० पल ∴ १ विकला = १२ पल अर्थात् १ राशि = १२ मास १ अंश = १२ दिन १ कला = १२ घटी १ विकला = १२ पल तात्पर्य यह हुआ कि अंश को २ से गुणाकर ५ से भाग देने से लब्धि मास शेष को ६ से गुणा कर देने से दिन होता है। कला को २ से गुणा कर १० से भाग देने से लब्धि दिन शेष को ६ से गुणा देने से घटी होता है। विकला को २ से गुणाकर १० से भाग देने से लब्धि घटी और शेष को ६ से गुणा करने से पल होता है। लग्न राश्यादि ९।१५।३२।५१ बलवान् है अतः राशितुल्य वर्ष ९ प्राप्त हुआ, शेष अंशादि १५।३२।५१ का त्रैराशिक द्वारा मासादि का साधन- अंश १५ × २ = ३० ÷ ५ = लब्धि ६ मास, शेष ० × ६ = ० दिन कला ३२ × २ = ६४ ÷ १० = लब्धि ६ दिन, शेष ४ × ६ = २४ घटी विकला ५१ × २ = १०२ ÷ १० = लब्धि १० घटी, शेष २ × ६ = १२ पल। राशितुल्य वर्षादि- ९।०।०।०।० अंशोत्पन्न मासादि- ०।६।०।०।० कलोत्पन्न दिनादि- ०।०।६।२४।० विकलोत्पन्न घट्यादि- ०।०।६।१०।१२ योगफल- ९।६।६।३४।१२ में पूर्वोक्त लग्नायुर्वर्षादि- ६।१।२९।९।३८ को जोड़ा तो स्पष्ट लग्नायुवर्षादि- १५।८।५।४२।० हुए।

२६४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् संस्कृतांशायुचक्रम्

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.ग्रहायुयोग
१९वर्ष४०
१८२२मास
१०दिन२९
५१२४४०२२३७३३३८४२घटी४९
३६४८१२२२२४पल२२
अथ पिण्डायुसाधनम्-
१. तत्रादौ पिण्डायुषि वर्षाणि-
नन्देन्दवो पञ्च यमाः शरक्ष्मा भास्कराश्च पञ्चेन्दवः कुपक्षाः।
नखाश्च रव्यादिमुखग्रहाणां पिण्डायुषोऽब्दाः निजोच्चगानाम् ।।
सूर्यादि ग्रह अपनी उच्चराशि में हों तो पिण्डायुसाधन में क्रम से
१९, २५, १५, १२, १५, २१, २० सूर्यादि ग्रहों के वर्ष होते हैं।।७।।
निसर्गायुसाधने वर्षादिः-
कृत्येकद्व्यङ्कधृत्यश्च नखपञ्चाशदेव हि।
सूर्यादीनां क्रमादब्दाः स्वोच्चे नैसर्गिके द्विज ।।८।।
सूर्यादि ग्रह अपनी उच्चराशि में हो तो क्रम से २०, १, २, ९, १८, २०,
५० वर्ष नैसर्गिक आयु में होते हैं।।८।।
पिण्ड-निसर्गायुसाधनम्-
स्वोच्चशुद्धो ग्रहः शोध्यः षड्भादूनो भमण्डलात् ।
षड्भाधिको यथास्थित एव लिप्तानिघ्नो निजाब्दैः ।।९।।
जिस ग्रह की पिण्डायु या निसर्गायु साधन करना हो उसके राश्यादि
को उसके परमोच्च राश्यादि में घटाकर शेष ६ राशि से न्यून हो तो उसे
१२ राशि में घटावे। यदि शेष ६ राशि से अधिक हो तो राश्यादि की

आयुर्दायाध्यायः २६५ कला बनाकर उसे ग्रहवर्ष संख्या (पिण्डायुसाधन में पिण्डायु ग्रहवर्ष, निसर्गायुसाधन में नैसर्गिक ग्रहवर्ष) से गुणा कर।।९।। खाभ्ररसभूनेत्रैर्भक्ते प्राप्यते तु यत्फलम्। वर्षमासदिनादिकं तद्धि पिण्डायुः स्फुटं भवेत्। एवं क्रियानिसर्गेऽपि हानिवृद्धिस्तु पूर्ववत् ।।१०।। २१६०० से भाग देने से लब्धि वर्ष, मास, दिनादि पिण्डायु या निसर्गायु होते हैं।।१०।। ० पिण्डायु-साधन का उदाहरण— सूर्योच्चांशराश्यादि = ०।१०।०।० में सूर्य = ३।१८।२६।३४ को घटाया तो उच्चांशान्तर ८।१२।३३।२६ हुआ। नोट— यह ६ राशि से अधिक हैं अतः १२ राशि में नहीं घटाया गया। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह का चक्र शुद्ध उच्चांशान्तरचक्र नीचे लिखा है। ग्रहोच्चांशान्तरचक्रम्—

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
१०१११०१०११राशि
२११०२३२२२११८अंश
३३२९२७२२१६११कला
२६१३५२५९५५विकला

सूर्यपिण्डायुसाधनम्— उदाहरण— परमोच्चांशान्तर ८।२१।३३।२६ पिण्डायु वर्ष १९ राशि ८ × १९ = मास १५२ ÷ १२ = वर्षादि १२।८ अंश २१ × १९ = दिन ३९९ ÷ ३० = मासादि १३।९ कला ३३ × १९ = घटी ६२७ ÷ ६० = दिनादि १०।२७ विकला २६ × १९ = पल ४९४ ÷ ६० = घट्यादि ८।१४ वर्षादि = १२।८।०।०।० मासादि = ०।१३।९।०।० दिनादि = ०।०।१०।२७।० घट्यादि = ०।०।०।८।१४ सूर्यायुवर्षादि = १२।२१।१९।३५।१४ इस प्रकार प्रत्येक ग्रहों का पिंडायु एवं निसर्गायु साधन कर असंस्कृतपिण्डायु चक्र और असंस्कृतनिसर्गायु चक्र दिया जाता है।

२६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् , असंस्कृतपिण्डायुचक्रम्—

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहायु
१२२०१३१०१२१७१८वर्ष
२११८१११७१६मास
१९२२२११०१०दिन
३५१०५८३५१६५५४२घटी
२४२५४८३०१५४०पल
असंस्कृतनिसर्गायुचक्रम्—
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहायु
:---:---:---:---:---:---:---:---
१३१५१५४६वर्ष
१८१०१०१३१४१०मास
१११०१०१११८दिन
२६२९५५२०४२५८१६घटी
१३५४५१४८२०४०पल
विशेष— सूर्य सातवें भाव में है, अतः सूर्य का पिण्डायुवर्षादि
२१।२१।१९।३५।२४ ÷ ६ = २।३।१८।१५।५४ लब्धि वर्षादि हुई। इस
लब्धि को सूर्यायु—
१२।२१।१९।३५।२४ में
लब्धि २।३।१८।१५।५४ को घटाया तो
शेष स्पष्टसूर्यायुवर्षादि १०।१८।१।१९।३० हुए।
चन्द्र में हानि-वृद्धि का कोई लक्षण न होने से स्पष्ट चन्द्रायुवर्षादि
२०।१८।२२।१०।२५ हुए।
भौम अपने नवांश में हैं, अतः भौमायु १३।११।२१।५८।० × २ =
२७।११।१३।५६।० भौमायु हुआ।
बुध में हानि-वृद्धि का कोई योग न होने से बुधायुवर्षादि
१०।९।१०।३५।४८ हुआ।
गुरु आठवें भाव में है, गुरु से आयु का आधा भाग घटाकर शेष को
दूना करने से गुरु के आयु में से घटाकर शेष को दूना करने से गुरु की
स्पष्टायु वर्षादि ६।८।१८।१५ हुई।
शुक्र में कोई हानि-वृद्धि का योग न होने से शुक्रायुवर्षादि
१७।०।१०।५५।१५ हुई।

आयुर्दायाध्यायः २६७ शनि शत्रुराशि में है, शनि के आयु का तृतीय भाग १८।१६।३।४२।४० ÷ ३ = ६।५।९।१४।१३ को शन्यायु में घटाने से शेष १२।१०।२२।२८।२७ शनि की स्पष्टायु हुई। संस्कृतपिण्डायुचक्रम्—

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.योगग्रहायु
१०२०२७१०१७१२११२वर्ष
१८१८१११०मास
२२१३१०१८१०२२२९दिन
१९१०५६३५५५२८३३घटी
३०२५४८१५१५२७४८२८पल

निसर्गायु में विशेष— सूर्य सातवें भाव में है, अतः नैसर्गिक सूर्यायु का छठा भाग घटाने से स्पष्ट सूर्यायु नैसर्गिक वर्षादि ९।७।१।६।१५ हुई। चन्द्र में कोई हानि-वृद्धि नहीं हुई। भौम अपने नवांश में है, अतः भौम की आयु दूनी हुई = २।२०।२१।५१।४८ बुध में कोई हानि-वृद्धि नहीं हुई। गुरु आठवें भाव में है, अतः गुरु के आयु का आधा भाग घटाना चाहिए और अपने द्रेष्काण में है अतः दूना करना चाहिए। इसलिए गुरु की आयु ज्यों की त्यों रही। शुक्र की आयु में कोई संस्कार नहीं है। शनि शत्रु राशि में है, अतः शन्यायु का तीसरा भाग उसमें घटाने से शनि की आयु = ८।७।४।५८।५८ हुई। संस्कृतनिसर्गायुचक्रम्—

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ल.योगग्रहायु
१५१५६७वर्ष
१०२०१३१४११मास
३२१०२११११८२९१०दिन
२८२९५५२०४३५८५८घटी
१५१३४८५१४८२०५८४८पल

२६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अत्र लग्नायुसाधनम्— राशीन्विहाय लग्नस्य लिप्तीकृत्य तथा द्विज। शतद्वयेन भक्ते च फलं वर्षादिकं च यत्। सबले लग्ने फलं त्वत्र पूर्वोक्तं नैवमत्र हि।।९१।। यहाँ बलवान् लग्न हो तो लग्न की राशि को त्याग कर अंशादि को कला बनाकर दो सौ से भाग देने से जो वर्षादि फल होता है, यही लग्न की आयु यहाँ होती है।।९१।। विशेषः— क्रूरे लग्नस्थिते विद्वन् लग्नस्यांशसंख्यया। निघ्नं क्रूरग्रहस्यायुः भक्ताष्टोत्तरशतेन च। लब्धं वर्षादिकं शोध्यं ग्रहस्यायुः स्फुटो भवेत् ।।९२।। यदि लग्न में क्रूरग्रह हो तो लग्न की नवमांश संख्या से उस ग्रह की आयु को गुणाकर १०८ से भाग देने से लब्ध वर्षादि को उस ग्रह की आयु में घटाने से शेष ग्रह की स्पष्टायु होती है।।९२।। उदाहरण— जन्मलग्न राश्यादि ९ । १५ । ३२ । ५१ है, राशि का त्याग कर अंशादि १५ । ३२ । ५१ का विकला बनाया तो अंश १५ × ६० + ३२ = ९३२ कला हुई। ९३२ × ६० + ५१ = ५५९७१ विकला हुई। इसमें १२००० से भाग देने से लब्धि ४ (वर्ष) शेष ७९७१ × १२ = ९५६५२ ÷ १२००० = लब्धि ७ मास, शेष ११६१२ × ३० = ३४८९५६ ÷ १२००० = लब्धि २९ दिन, शेष १४६० × ६० = ९३६०० ÷ १२००० = लब्धि ७ घटी, शेष ९६०० × ६० = ५७६००० ÷ १२००० लब्धि ४८ पल लग्नायु प्राप्त हुई। आयुग्रहणे विशेषः— अंशायुः सबले लग्ने सूर्ये ग्राह्यं तु पैण्डकम्। चन्द्रे नैसर्गिकं ग्राह्यं बलसाम्ये द्वयोस्तथा।।९३।। यदि लग्न बली हो तो अंशायु ही मुख्य आयु होती है। सूर्य बली हो तो पिण्डायु और चन्द्रमा बली हो तो निसर्गायु प्रधान आयु होती है।।९३।। योगार्धमायुस्तत्र स्यादिति प्राज्ञैर्विनिश्चितम्।। त्रयोऽप्येते बलाढ्यश्चेत्सर्वेषां योगत्र्यंशकः। आयुर्ग्राह्यं तु सर्वेषामिति प्रोक्तं पुरातनैः।।९४।।

आयुर्दायाध्यायः २६९ इनमें दो समान बली हों तो दोनों के आयु का योगार्ध मुख्य आयु होती है। यदि तीनों समान बली हों तो तीनों के आययोग का तृतीयांश स्पष्टायु होती है।।१४।। अथ नानाजातीयमायुः— गृध्रोलूकशुकध्वाङ्क्षसर्पाणां च सहस्रकम्। श्येनवानरभल्लूकमण्डूकानां शतत्रयम् ।।१५।। गिद्ध-उल्लू-शुक-कौआ और सर्पों की एक हजार वर्ष की आयु होती है। बटेर-वानर-भालू-मेढक की तीन सौ वर्ष की आयु होती है।।१५।। पञ्चाशदुत्तरशतं राक्षसानां प्रकीर्त्तितम्। नराणां कुञ्जराणां च विंशोत्तरशतं विदुः ।।१६।। राक्षसों की १५० वर्ष की आयु होती है। मनुष्य और हाथियों की १२० वर्ष की आयु होती है।।१६।। द्वात्रिंशदायुरश्वानां पञ्चविंशत् खरोष्ट्रयोः। वृषमाहिषयोश्चैव चतुर्विंशतिवत्सराः ।।१७।। घोड़ों की ३२ वर्ष की आयु होती है। गधा और ऊँट की २५ वर्ष की आयु होती है। बैल और भैंसा की आयु २४ वर्ष की होती है।।१७।। विंशत्यायुर्मयूराणां छागादीनां च षोडश। हंसस्य पञ्चनवकं पिकानां द्वादशाब्दकाः ।।१८।। मोर की २० वर्ष की आयु होती है। बकरा आदि की १६ वर्ष की आयु होती है। हंस की १४ वर्ष की आयु होती है। कोकिल और कबूतर की १२ वर्ष की आयु होती है।।१८।। तद्वत्पारावतानाञ्च कुक्कुटस्याष्टवत्सराः। बुद्बुदानामण्डजानां सप्तसङ्ख्याः समाःस्मृताः ।।१९।। मुर्गों की ८ वर्ष आयु होती है। बुलबुलों की ७ वर्ष की आयु होती है।।१९।। अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि आयुर्दायगतिं तव। यस्य विज्ञानमात्रेण कालज्ञो भवति ध्रुवम् ।।२०।। अन्य रीति से आयु जानने की रीति कह रहा हूँ, जिसके जान लेने से मनुष्य कालज्ञ हो जाता है।।२०।।

२७० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् लग्नेशाष्टमेशाभ्यां योगैकः कथितो द्विज। द्वितीयं शनिचन्द्राभ्यां चिन्तनीयं सदा द्विज।।२१।। प्रथम लग्नेश और अष्टमेश से १ योग। द्वितीय शनि और चन्द्रमा से॥२१॥ होरालग्नलग्नाभ्यां तृतीयं च विचिन्तयेत्। लग्नेन्दूमदने वापि चिन्तयेल्लग्नचन्द्रतः।।२२।। तथा तीसरा होरालग्न और जन्मलग्न से होता है। दूसरे योग में यदि चन्द्रमा जन्मलग्न या सातवें भाव में हो तो लग्न और चन्द्रमा से अन्यथा शनि और चन्द्रमा से जो आयु आवे उसे लेना चाहिए॥२२॥ चरे चरे स्थिते द्वौ च लग्नरन्ध्राधिपौ यदि। दीर्घायुयोगो विज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२३।। यदि लग्नेश और अष्टमेश दोनों चर राशि में हों।।२३।। स्थिरर्क्षे लग्ननाथो हि लयेशे द्वन्द्वभे स्थिते। तदा दीर्घायुषो योगः सम्भवेद्गणिताग्रणीः।।२४।। अथवा एक स्थिर और दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो तो दीर्घायु योग होता है॥२४॥ लग्नाधीशे स्थिते द्वन्द्वे स्थिरे रन्ध्राधिपे स्थिते। दीर्घायुयोगो विज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२५।। यदि लग्नेश और अष्टमेश में से एक चर राशि में और दूसरा स्थिर राशि में हो तो मध्यायु योग होता है।।२५।। अथातः सम्प्रवक्ष्यामि मध्यायुर्योगमुत्तमम्। चरे लग्नाधिपे विप्र स्थिरे रन्ध्रपतिर्यदि।।२६।। अथवा दोनों द्विस्वभाव राशि में हों तो भी मध्यायु योग होता है।।२६।। तदा मध्यायुषं विद्याद् द्वौ द्वन्द्वे मध्यमायुषः। अधुनाल्पायुयोगं च तवाग्रे कथयाम्यहम्।।२७।। लग्नेश और अष्टमेश दोनों में से एक चर राशि में तथा दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो तो अल्पायु योग होता है।।२७।।

आयुर्दायाध्यायः २७१ लग्नाधीशश्चरे यस्य द्वन्द्भे रन्ध्रनायके। तस्याल्पायुर्महाप्राज्ञ निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥२८॥ अथवा लग्नेश और अष्टमेश दोनों स्थिर राशि में ही हों तो भी अल्पायु योग होता है॥२८॥ स्थिरे स्थिरे स्थितौ द्वौ चेल्लग्नरन्ध्राधिपौ द्विज। अल्पायुस्तत्र विज्ञेयं सृष्टिकर्त्रा प्रणोदितम्॥२९॥ इसी प्रकार शनि-चन्द्रमा या लग्न-चन्द्रमा तथा होरालग्न और जन्मलग्न से भी आयु लाना चाहिए॥२९॥ एकरूपत्वयोगौ द्वौ तृतीयो भिन्नरूपकः। द्वयोर्योगेन सङ्ग्राह्यं न ग्राह्यं चैकरूपतः॥३०॥ यदि तीनों प्रकार में दो प्रकार से एक आयु और तीसरे से भिन्नायु आती हो तो दो प्रकार से आई हुई आयु को ही लेना चाहिए॥३०॥ योगत्रयं त्रयं रूपं भिन्नं भिन्नं भवेद्द्विज। होरालग्नविलग्नाभ्यां प्राप्तायुर्योगनिश्चितम्॥३१॥ यदि तीनों प्रकार से भिन्न-भिन्न आयु आती हो तो होरालग्न और लग्न से जो आयु आती हो उसे ही लेना चाहिए।॥३१॥ अथाहं सम्प्रवक्ष्यामि आयुर्वर्षाणि भो द्विज। यस्य ज्ञानं विना विद्वन् स्पष्टायुर्नोपलभ्यते॥३२॥ हे द्विज! अब मैं आयु के वर्गों को कह रहा हूँ, जिसके ज्ञान के बिना आयु की स्पष्टता नहीं होती है॥३२॥ रसाङ्कैर्गजाभ्रेन्दुभिः शून्यमासैस्त्रिधा दीर्घमायुः कलौ सम्प्रदिष्टम्। चतुःषष्टिबाह्वद्र्यशीति प्रमाणैर्मतं मध्यमायुर्नृणां वत्सरैः स्यात्॥ ९०, १०८, १२० वर्ष ये तीन प्रकार की दीर्घायु कलियुग में होती है। ६४, ७२, ८० वर्ष की मध्यमायु होती है॥३३॥ तथा द्वित्रिषड्वह्निदेनशून्याब्धिवर्षै- र्भवेदल्पमायुर्नराणां युगान्ते॥३४॥ ३२, ३६, ३० वर्ष की अल्पायु का प्रमाण कहा है॥३४॥ योगत्रयेण दीर्घायुस्तदा ग्राह्यं खवेदकम्। योगद्वयेन सम्प्राप्ते ग्राह्यं षट्त्रिंशताब्दकम्॥३५॥

२७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि ३ प्रकार से दीर्घायु आये तो ४० वर्ष का खंड और दो प्रकार से दीर्घायु हो तो ३६ वर्ष का ॥३५॥ योगैकेन सदा ग्राह्यं द्वात्रिंशन्मिताब्दकम्। एवमल्पायुयोगे तु प्रोक्ताच्च विपरीतकम्॥३६॥ और एक प्रकार से दीर्घायु हो तो ३२ वर्ष का खंड लेना चाहिए। इसी प्रकार अल्पायु योग में इसके विपरीत यानि ३ प्रकार से अल्पायु हो तो ३२ वर्ष, दो प्रकार से अल्पायु हो तो ३६ और एक प्रकार से अल्पायु हो तो ४० वर्ष का खंड स्पष्टायु साधन में लेना चाहिए॥३६॥ तथा लग्नेशाष्टमेशाभ्यां मध्यमायुः समागते। ग्राह्यं चत्वारिंशन्मितं वर्षं च द्विजसत्तम॥३७॥ इसी प्रकार लग्नेश, अष्टमेश से मध्यमायु हो तो ४० वर्ष॥३७॥ लग्नेन्दुना वा चन्द्रमन्दाभ्यां मध्यायुः समागते। खण्डं ग्राह्यं तदा विद्वन् षट्त्रिंशन्मिताब्दकम्॥३८॥ लग्नचन्द्र वा शनिचन्द्र से मध्यमायु हो तो ३६ वर्ष॥३८॥ होरालग्नलग्नाभ्यां मध्यमायुः समागते। ग्राह्यं तत्र सदा विप्र द्वात्रिंशन्मिताब्दकम्॥३९॥ और होरालग्न, जन्मलग्न से मध्यमायु हो तो ३२ वर्ष का खंड लेना चाहिए॥३९॥ अथायुर्बोधकचक्रम्—

दीर्घायुः<br>चरे लग्नेशः<br>चरेऽष्टमेशःदीर्घायुः<br>स्थिरे लग्नेशः<br>द्विस्वभावेऽष्टमेशःदीर्घायुः<br>द्विस्वभावे लग्नेशः<br>स्थिरेऽष्टमेशः
मध्यायुः<br>चरे लग्नेशः<br>स्थिरेऽष्टमेशःमध्यायुः<br>स्थिरे लग्नेशः<br>चरेऽष्टमेशःमध्यायुः<br>द्विस्वभावे लग्नेशः<br>द्विस्वभावेऽष्टमेशः
हीनायुः<br>चरे लग्नेशः<br>द्विस्वभावेऽष्टमेशःहीनायुः<br>स्थिरे लग्नेशः<br>स्थिरेऽष्टमेशःहीनायुः<br>द्विस्वभावे लग्नेशः<br>चरेऽष्टमेशः

आयुर्दायाध्यायः २७३ अथायुष्खण्डबोधकचक्रम्—

आयुःप्रकारत्रयेणखण्डम्वर्षम्
प्रकारत्रयेण१२०
दीर्घायुःप्रकारद्वयेन१०८
प्रकारैकेन९६
प्रकारत्रयेण८०
मध्यायुःप्रकारद्वयेन७२
प्रकारैकेन६४
प्रकारत्रयेण४०
अल्पायुःप्रकारद्वयेन३६
प्रकारैकेन३२
अथ स्पष्टायुःसाधनप्रकारः—
योगकारकखेटानां राशीन्त्यक्त्वांशकस्य च।
योगं कृत्वा भजेत्तत्र योगकारकसंख्यया॥४०॥
योगकारक ग्रहों की राशियों को छोड़कर शेष अंशादिकों का योग करके
योगकारक ग्रहों की संख्या (१,२,३ आदि) से भाग देवे॥४०॥
लब्धघ्नं प्राप्तखण्डेन त्रिंशता तु विभाजितम्।
लब्धं वर्षादिकं यच्च प्राप्तखण्डे तु शोधयेत्॥४१॥
भाग देने से लब्धि को आयु के अनुसार अल्पायु के प्राप्त खंड से
गुणाकर गुणन फल में ३० का भाग देने से लब्ध वर्षादि को दीर्घायु वा
मध्यायु के प्राप्त खंडों में घटादे॥४१॥
शेषं वर्षादिकमत्र स्पष्टायुः परिकीर्त्तितम्।
एवं स्पष्टक्रिया प्रोक्ता ब्रह्मणा शङ्करादिभिः॥४२॥
उदाहरण— पृ.२५ के जन्माङ्गचक्र और आयुर्बोधक चक्र पृ. २५६ के
अनुसार—
लग्नेश शनि स्थिर (८) में } मध्यायु
अष्टमेश सूर्य चर (४) में }
शनि स्थिर (८) में } दीर्घायु
चन्द्र द्विस्वभाव (३) में }

·२७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् होरालग्न पृ. (२४) स्थिर (२) में } मध्यायु जन्मलग्न चर (१०) में } पृ. २५५ श्लोक ३३ के अनुसार दो प्रकार से मध्यायु तथा आयुखण्ड- बोधक चक्र (पृ. २५७) के अनुसार मध्यायु का दूसरा खण्ड (७२) वर्ष प्राप्त हुआ। लग्नेश शनि १।४८।५।२ } योगकर्ता ४ हैं अतः चारों अष्टमेश सूर्य १८।२६।३४ } के अंशादि का योग होरा लग्न १५।०।० } किया गया है। जन्म लग्न १५।२३।३७ } ५०।३८।३ ÷ ४ : = १२।३९।३०।४५ अंशादि १२।३९।३०।४५ × ३६ (द्वितीय खण्ड पृ. २५७) ३०) ४५५।४२।२७।० (१५ (वर्ष) ३० १५५ १५० ५ × १२ ६० ४२ १०२ (३ (मास) ९० १२ × ३० ३६० २७ ३८७ (१२ (दिन) ३० ८७ ६० २७ × ६० | लब्धि वर्षादि = १५।३।१२।५४।० १६२० ० १६२० (५४ (घटी) १५० १२० १२० x मध्यायु द्वितीय खण्ड वर्षादि ७२।०।०।०।० में लब्धि वर्षादि = १५।३।१२।५४।० घटाने से स्पष्टायुर्वर्षादि = ५६।८।१७।६।०

आयुर्दायाध्यायः २७५ शेष स्पष्टायु होती है, शेष स्पष्ट है॥४२॥ तत्र विशेषः- अथ योगत्रये विप्र शनियोगं करोति चेत्। एकएकादशहासः कक्ष्याहासस्त्वयं क्रमात्॥४३॥ हे विप्र ! तीनों प्रकार के आयु के योगों में यदि शनि योग करता हो तो क्रम से कक्ष्या का ह्रास होता है॥४३॥ ततः फलविशेषार्थं गुणदोषौ वदाम्यहम्। गुणैः प्रपूरितः सौरिः कक्ष्यावृद्धिं करोति च॥४४॥ अतः उसके गुण-दोष को कह रहा हूँ। गुणों से युक्त शनि कक्ष्या वृद्धि को करता है॥४४॥ दोषयुक्ता भवेद्धानिस्ताभ्यां निर्णय उच्यते। अत्यल्पायुर्भवेदल्पमल्पान्मध्यं प्रजायते॥४५॥ यदि दोषयुक्त हो तो कक्ष्या की हानि करता है अर्थात् अत्यंत अल्पायु हो तो मध्यायु॥४५॥ मध्यमाज्जायते दीर्घं कक्ष्यावृद्धेश्च लक्षणम्। एवं नीचारिगः सौरिः पापदृष्टिसमन्वितः॥४६॥ मध्यायु हो तों दीर्घायु करता है। इसी प्रकार शनि अपनी नीच राशि, शत्रु की राशि में पापग्रह से दृष्ट और युत हो तो॥४६॥ कक्ष्याह्रासकृतों विप्र त्रिभागेनायुहानिकृत्। दीर्घाद्भवति मध्यायुर्मध्यादल्पायुरेव च॥४७॥ कक्ष्या की हानि करता है। अर्थात् दीर्घायु हो तो मध्यायु, मध्यायु हो तो अल्पायु॥४७॥ अल्पादत्यल्पकं याति बाल्ये निधनसम्भवः। लग्नेशे वापि होरेशे केवलं शनिसंयुते॥४८॥ और अल्पायु हो तो अत्यल्पायु होता है तथा बाल्यकाल में ही मरण हो जाता है। लग्नेश वा होरेश केवल शनि से युत हो॥४८॥ पापर्क्षे पापयुक्ते वा पापदृष्टिसमन्विते। कक्ष्याह्रासं न कुर्वीत विना नीचारिगे द्विज॥४९॥ पापग्रह की राशि में वा पापयुक्त हो, पापग्रह से देखा जाता हो, यदि नीच राशि या शत्रु की राशि में न हो तो कक्ष्या का ह्रास नहीं करता है॥४९॥

२७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् एवं तुङ्गादिरहितः कक्ष्यावृद्धिं न कारयेत्। शुभर्क्षे शुभसंयुक्ते शुभदृष्टौ च तुङ्गगे।।५०।। इसी प्रकार उच्चादि से रहित हो तो कक्ष्यावृद्धि को नहीं करता है। यदि शनि शुभ ग्रह की राशि में शुभ ग्रह से युक्त और शुभ ग्रह से दृष्ट होकर अपने उच्च में हो।।५०।। पापयोगेन रहिते कक्ष्यावृद्धिकरः शनिः। एवं नीचादिदोषेण कक्ष्याह्रासः प्रजायते।।५१।। और पापग्रह के योग से रहित हो तो कक्ष्या की वृद्धि करता है। इसी प्रकार नीचादि दोष के कारण कक्ष्या का ह्रास होता है।।५१।। गुरुणा स्थानसम्बन्धेऽप्येवं वृद्धिर्भविष्यति। लग्ने वा सप्तमे वापि तुङ्गादिगुणसंयुते।।५२।। इसी प्रकार गुरु भी स्थान संबंध से आयु में वृद्धि करता है। यदि गुरु लग्न में वा सप्तम में उच्चादि गुणों से युक्त हो।।५२।। शुभर्क्षे शुभदृग्युक्ते कक्ष्यावृद्धिकरो गुरुः। जीवने संशयो यस्य अल्पायुर्वृद्धिकारकम्।।५३।। शुभ राशि में शुभ ग्रह से दृष्ट और युक्त हो तो कक्ष्या की वृद्धि करता है।।५३।। अल्पायुषि च मध्यायुर्मध्याप्ते दीर्घमायुषि। एवं भेदानुभेदेन कथयामि तवाग्रतः।।५४।। अल्पायु हो तो मध्यायु, मध्यायु हो तो दीर्घायु को करता है। इस प्रकार भेदानुभेद से मैंने ह्रास-वृद्धि तुमसे कहा।।५४।। अथ अमितायुर्योगः— गुरुचन्द्रौ च कर्काङ्गे बुधशुक्रौ च केन्द्रगौ। शेषे लाभत्रिषष्ठस्थश्चेदमितायुस्तदा भवेत्।।५५।। जन्मलग्न कर्क हो, उसमें गुरु चन्द्रमा हों, बुध-शुक्र केन्द्र में हों और शेष ग्रह ११।३।६ भाव में हों तो अमित आयु होती है।।५५।। अथ मुनितुल्यायुर्योगः— देवलोकांशके मन्दे भौमे पारावतांशके। गुरौ सिंहासने लग्ने जातो मुनिसमो भवेत्।।५६।।

आयुर्दायाध्यायः २७७ देवलोकांश में शनि हो, भौम पारावतांश में हो और गुरु सिंहासनांश में होकर लग्न में हो तो मुनि समान आयुवाला होता है।।५६।। अथ युगान्तायुर्योगः- गोपुरांशे गुरौ केन्द्रे शुक्रे पारावतांशके। त्रिकोणे कर्कटे लग्ने युगान्तं स तु जीवति।।५७।। गोपुरांश में होकर गुरु केन्द्र में हो, शुक्र पारावतांश में होकर त्रिकोण में हो और कर्क-लग्न में जन्म हो तो युगान्त पर्यन्त आयु होती है।।५७।। अथ पूर्णायुर्योगः- चतुष्टये शुभैर्युक्ते लग्नेशे शुभसंयुते। गुरुणा दृष्टिसंयोगे पूर्णमायुस्तु जायते।।५८।। यदि केन्द्र में शुभ ग्रह हों, लग्नेश शुभग्रह से युक्त हो और गुरु से देखा जाता हो तो दीर्घायु होता है।।५८।। केन्द्रस्थिते च लग्नेशे गुरुशुक्रसमन्विते। ताभ्यां निरीक्षिते वापि पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत्।।५९।। लग्नेश केन्द्र में हो और गुरु-शुक्र से युत वा दृष्ट हो तो पूर्णायु होती है।।५९।। स्वोच्चस्थितैस्त्रिभिः खेटैर्लग्नरन्ध्रेशसंयुतैः। रन्ध्रे पापविहीने च दीर्घमायुः समादिशेत्।।६०।। कोई तीन ग्रह अपनी उच्च राशि में लग्नेश, अष्टमेश से युत हों और अष्टम स्थान में कोई ग्रह न हो तो दीर्घायु होता है।।६०।। लयस्थितैस्त्रिभिः खेटैः स्वोच्चमित्रस्ववर्गगैः। लग्नेशे बलसंयुक्ते पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत् ।।६१।। अपनी उच्च राशि वा मित्र की राशि में वा अपने वर्ग में होकर तीन ग्रह और लग्नेश बली हो तो पूर्ण आयु होती है।।६१।। स्वोच्चस्थितेन केनापि खेचरेण समन्वितः। रन्ध्रनाथो शनिर्वापि पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत्।।६२।। अपने उच्च में गये हुए किसी ग्रह से अष्टमेश या शनि युत हो तो पूर्ण आयु होती है।।६२।।

२७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् त्रिषडायगताः पापाः शुभाः केन्द्रत्रिकोणगाः। लग्नेशो बलसंयुक्तः पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत् ॥६३॥ ३।६।११ भाव में पापग्रह हों और शुभग्रह केन्द्र-त्रिकोण में हों तथा लग्नेश बली हो तो पूर्ण आयु होती है॥६३॥ षट्सप्तरन्ध्रभावेषु संयुक्तेषु शुभेषु च। त्रिषडायेषु पापेषु पूर्णमायुर्विनिर्दिशेत् ॥६४॥ ६।७।८ भाव में शुभ ग्रह हों और ३।६।११ भाव में पापग्रह हों तो पूर्ण आयु होती है॥६४॥ अथायुर्बाधकं विप्र कथयामि तवाग्रतः। दीर्घायुर्योगं सम्प्राप्य प्रकारशकलेष्वपि॥६५॥ आयु के बाधक योगों को कह रहा हूँ॥६५॥ अथ निधनसमयज्ञानम्- किं दशायां च निधनमिति ज्ञातुमपेक्षया। निर्णयं तस्य कुर्वीत तवाग्रे कथयाम्यहम्॥६६॥ तीनों प्रकार से दीर्घायु योग के प्राप्त होने पर किस दशा में मृत्यु होती है, इसके ज्ञान के लिए मै निर्णय कह रहा हूँ॥६६॥ दीर्धे द्विसप्ततिवर्षे तदूर्ध्वं तु चिन्तयेन्मृतिम्। षट्त्रिंशदकादूर्ध्वं च चिन्तयेन्मध्यमायुषि॥६७॥ दीर्घायु योग में ७२ वर्ष के बाद और मध्यायु योग में ३६ वर्ष के बाद मृत्यु का विचार करना चाहिए॥६७॥ अथ स्पष्टं प्रवक्ष्यामि मलिने द्वारबाह्ययोः। नवांशे निधनं तस्य त्रिशूलिभाषितं पुरा॥६८॥ द्वार राशि और बाह्य राशि के पापाक्रांत होने से उसकी दशा में मृत्यु होती है॥६८॥ द्वारद्वारेशयोर्विप्र मालिन्ये तन्नवांशके। जातस्य हि भवेन्मृत्युः सत्यमेव न संशयः॥६९॥ अथवा द्वार राशि वा द्वारेश के पापाक्रांत होने से उसकी दशा में मृत्यु होती है॥६९॥ पाकभोगद्वये विप्र चिन्तनीयं प्रयत्नतः। स्वयं पापः पापदृष्टे पापखेटसमन्विते। तन्नवांशदशाकाले निधनं च भवेद्ध्रुवम् ॥७०॥

आयुर्दायाध्यायः २७९ दोनों दशाओं में (दशा-अंतर्दशा) में अर्थात् द्वारेश स्वयं पापी हो अथवा पापग्रह से देखा जाता हो वा पापयुक्त हो तो उसकी दशा या अंतरदशा में मृत्यु होती है।॥७०॥ अथवा योगायुर्दायसमाप्तिसमयेष्वपि। प्रोक्ते मूलाश्रयीभूते चिन्तनीयं द्विजोत्तम ॥७१॥ अथवा योगज आयु की समाप्ति समय में मृत्यु काल के समीप की दशा में मृत्यु का विचार करना चाहिए।।७१।। खण्डे वा यदि पाकस्य बाह्यस्य मलिने यदि। दशा न हि समाप्येत तत्रिकोणान्दके मृतिः ।।७२।। अथवा बाह्य राशि के मलिन होने के समय उसके खंड में यदि दशा न समाप्त हो तो उसकी त्रिकोण राशि के वर्ष में मृत्यु होती है।।७२।। अधुना सम्प्रवक्ष्यामि मृत्युयोगापवादकम्। शुभदृष्ट्या शुभयोगे शुभखेचरसंयुते ।।७३।। यदि द्वारबाह्य राशि वा उनके स्वामी शुभ ग्रह से युक्त वा शुभ दृष्टि से युक्त हों तो।।७३।। न च द्वारे न बाह्ये च द्वारेशे चोपलक्षिते। द्वारेशांश्चयनवांशभुक्तौ च निधनं भवेत् ।।७४।। उक्त द्वार बाह्य राशि वा इनके स्वामियों की दशा अंतर में मृत्यु नहीं होती है, किन्तु द्वारेश के आश्रयीभूत नवांश की दशा में मृत्यु होती है।।७४।। अथातः सम्प्रवक्ष्यामि प्रकारं वै द्वितीयकम्। यस्य विज्ञानमात्रेण आयुर्दासूचको भवेत् ।।१।। अब मैं आयु के निर्णय का दूसरा प्रकार कह रहा हूँ, जिसके ज्ञान मात्र से आयु को जाननेवाला मनुष्य होता है।।१।। कारकान्तत्सप्तमाद्विप्र अष्टमेशो तयोर्द्वयोः। मध्ये चैको बली चिन्त्यः सोऽपि ह्यायुःप्रदो ग्रहः ।।२।। आत्मकारक और उससे सातवाँ भाव दोनों से जो अष्टमेश, दोनों अष्टमेशों में जो बली हो ।।२।।

२८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् . केन्द्रादित्रिकयोगेन दीर्घमध्याल्पतायुषि । स विज्ञेया महाप्राज्ञ तवाग्रे प्रवदाम्यहम् ॥३॥ वह यदि केंद्र में हो तो दीर्घायु, पणफर में हो तो मध्यायु और आपोक्लिम में हो तो अल्पायु होती है।।३।। केन्द्रे स्थितेऽपि दीर्घायुर्मध्यायुः पणफरे स्थिते । आपोक्लिमे स्थिते त्वल्पमायुर्भवति निश्चितम् ।।४।। इसी प्रकार लग्न और उससे सप्तम भाव, दोनों से अष्टमेश, इन दोनों अष्टमेशों में जो बली हो वह यदि केंद्र में हो तो दीर्घायु, पणफर में हो तो मध्यायु और आपोक्लिम में हो तो अल्पायु होती है।।४।। लग्नात्तत्सप्तमाद्विप्र अष्टमेशो तयोर्द्वयोः। ताभ्यां मध्ये बली चैकः स्थितः केन्द्रादि पूर्ववत् । दीर्घमध्याल्पभेदेन आयुर्निश्चित्य पूर्ववत् ।।५।। हे विप्र ! लग्न और सप्तम से जो अष्टमेश, दोनों में जो एक बली, उसके केन्द्रादि में रहने से पूर्ववत् दीर्घ, मध्य, अल्पायु का निर्णय करना चाहिए।।५।। पूर्ववद्दृन्दखण्डस्य त्रैराशिकक्रमेण च। आयुर्दायकृते स्पष्टं प्रवक्ष्यामि इदं वचः ।।६।। इस प्रकार दीर्घ आदि में आयु का निर्णय करके पूर्व कहे हुए आयु को स्पष्ट करके निर्णय इस प्रकार करना चाहिए।।६।। स्वस्मिन्समबले खेटेऽनधिके च बले द्विज। न वीर्यतायां दीर्घादि विपरीतायुषि भवेत् ।।७।। यदि आयुर्कर्ता ग्रह समान बल के अथवा अल्प बल के हों तो दीर्घादि विपरीत आयु होती है।।७।। दीर्घमध्ये च वाल्पं च स्वल्पं वा किञ्चिदेव च । विपरीतं योगभङ्गे सत्यमेव न संशयः ।।८।। दीर्घ, मध्य, अल्प वा उससे कुछ कम आयु होती है। इस प्रकार योग भंग होने से विपरीत आयु होती है।।८।। अथाग्रेऽनेकभेदानामायुषो निर्णयः कृतः। दीर्घादित्रयरूपेण इत्युक्तं ब्रह्मणोदितम् ।।९।।