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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

अथ दशाफलाध्यायः । ४३९ जंतोः फलं खलु करोति यदारिनीचस्थानस्थितोऽशुभफलं विबलो विशेषात् ।।८०।। यदि भावेश बली हो अपने गृह वा उच्च वा मूलत्रिकोण में वा शुभग्रह के वर्ग में हो तो पूर्ण फल देता है। यदि शत्रुगृह, नीचराशि में हो तो अशुभ फल करता है।।८०।। आहुः शुभाशुभफलं नृणां कालविदो जनाः । एतद्वलं विनिर्णीतमायुषां निश्चयो नृणाम् ।।८१।। शुभग्रह यदि शुभद है तो शुभ फल देता है इस प्रकार दशा के वश आयु का निर्णय करना चाहिये।।८१।। पंचमेशयुतस्यापि धर्मेशस्य दशातुया । अतीव शुभदा प्रोक्ता कालविद्भिर्मुनीश्वरैः ।।८२।। स पंचमेशस्य तपोधिपस्य दशा भवेद्राज्यसुखार्थलाभदा । तथैव मानाधिपसंयुतस्य सुतेश्वरस्यापि दशाशुभास्यात् ।।८३।। पंचमेश से युक्त धर्मेश की दशा अत्यंत शुभद होती है। पंचमेश से युक्त धर्मेश की दशा राज्य, सुख, धन का लाभ करती है। उसी प्रकार कर्मेश से युत पंचमेश की दशा भी शुभद होती है।।८३।। षष्ठाष्टमव्ययाधीशाः पंचमाधिप संयुताः । तेषां दशा च शुभदा प्रोच्यते कालवित्तमैः ।।८४।। ६।८।१२ भाव के स्वामी पंचमेश से युत हों तो उनकी दशा शुभद होती है।।८४।। सुखेशो मानभावस्थो मानेशो सुखराशिगः । तयोर्दशां शुभां प्राहुर्ज्योतिः शास्त्रविदो जनाः ।।८५।। सुखेश दशम भाव में हो और कर्मेश चौथे भाव में हो तो दोनों दशा शुभद होती है।।८५।। सुतेशमानेशसुखेशधर्मपा एकत्र युक्ता यदियत्रकुत्र । तेषां दशा राज्यफलप्रदा वै तैर्युक्तग्रहाणामपिवै वदेत्तथा ।।८६।। पंचमेश, कर्मेश, सुखेश, धर्मेश एक ही भाव में हो तो इनकी दशा राज्य देने वाली होती है।।८६।। वाहन स्थान संयुक्त-मंत्रनाथदशा शुभा । सुखराशिस्थकर्मेशदशा राज्यप्रदायिनी ।।८७।।

४४० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । चौथे भाव में स्थित पंचमेश की दशा शुभद होती है। चौथे भाव में बैठे हुये कर्मेश की दशा राज्यदायिनी होती है।।८७।। ताभ्यां युक्तस्य खेटस्य दृष्टियुक्तस्य चैतयोः । राज्यप्रदां दशां प्राहुर्विद्वांसो दैवचिन्तकाः ।।८८।। इन दोनों से युक्त वा दृष्ट ग्रह की दशा भी राज्यदायिनी होती है।।८८।। कर्मस्थानस्थ बुद्धीशदशा सम्पत्करी भवेत् । मान्स्ति तपोधीश दशा राज्यप्रदायिनी ।।८९।। कर्म भाव में बैठे हुये पंचमेश की दशा सम्पत्ति देने वाली होती है। दशमस्थित धर्मेश की दशा राज्य देने वाली होती है।।८९।। यस्माद्व्ययगतोयस्तु तद्दशायां धनक्षयम् । यस्मात्त्रिकोणगा पापात्तत्रात्मशमनाशनम् ।।९०।। जिससे (भाव से) जो बारह स्थान में हो उसके दशा में धन की हानि होती है। जिससे त्रिकोण स्थान में पापग्रह हों उसकी दशा में आत्मीय पुरुषार्थ का नाश।।९०।। पुत्रहानिः पितुः पीडा मनस्तापो महान्भवेत् । यस्मात्त्रिकोणगाः रिःफरन्ध्रेशार्केन्दुसूर्यजाः ।।९१।। पुत्र की हानि, पिता को पीड़ा, मन को संताप होता है जिससे त्रिकोण में अष्टमेश, व्ययेश और सूर्य चन्द्रमा शनि हों।।९१।। पुत्रपीडा द्रव्यहानिस्तत्र केत्वहि संगमे । विदेशभ्रमणं क्लेशो भयं चैव पदे पदे ।।९२।। तो विदेश की यात्रा तथा क्लेश और केतु राहु युत हों तो पद पद पर भय होता है।।९२।। यस्मात्षष्ठाष्टमे क्रूरनीचखेटाश्च संस्थिताः । रोगशत्रुनृपाद्वा स्यान्मुहुः पीडासुदुःसहा ।।९३।। जिससे ३।८ भाव में क्रूरग्रह हो नीच आदि स्थानगत ग्रह हो तो उसकी दशा में रोग, शत्रु, राज से दुःसह पीड़ा होती है।।९३।। यस्माच्चतुर्थगः क्रूरः स्याद्भूगृहक्षेत्रनाशनम् । पशुहानिस्तत्र भौमे गृहदाहप्रमादतः ।।९४।। जिससे चौथे भाव में क्रूरग्रह हो तो उसकी दशा में भूमि, गृह, खेत का नाश

अथ दशाफलाध्यायः । ४४१ होता है और पशु की हानि होती है। यदि भौम हो तो प्रमाद से घर जल जाता है।।९४।। शनौ हृदयशूलत्वं स्यात्सूर्ये राजप्रकोपनम् । सर्वस्वहरणं राहौ विषचौरादिजंभयम् ।।९५।। चौथे शनि हो तो हृदय में शूल होता है। सूर्य हो तो राजा के कोप से सर्वस्व नाश और राहु हो तो विष तथा चोर से भय होता है।।९५।। यस्माद्दशमभे राहुः पुण्यतीर्थाटनं भवेत् । यस्मात्कर्मार्थभाग्यर्क्षगताः शोभनखेचराः ।।९६।। जिससे १० वें स्थान में राहु हो तो उसकी दशा में पुण्यतीर्थों का भ्रमण होता है। जिससे १०, ११, ९ स्थान में शुभ ग्रह गये हों उसकी दशा में।।९६।। विद्यार्थधर्मसत्कर्मख्यातिपौरुषसिद्धयः । यतः पंचमकामारिगताः स्वोच्चे शुभग्रहाः ।।९७।। विद्या, धन, धर्म और सत्कर्म तथा पुरुषार्थ की सिद्धि होती है जिससे ५।७।६ स्थान में अपने उच्चराशि में शुभग्रह गये हों।।९७।। पुत्रदारादि संप्राप्तिर्नृपपूजा महत्तरा । यस्मिन्विद्यायकर्माम्बुनवलग्नाधिपाः स्थिताः ।।९८।। तो उसकी दशा में पुत्र, स्त्री आदि का लाभ और राज्य से पूजित होता है।।९८।। तत्तद्भावार्थसिद्धिः स्याच्छ्रेयो योगानुसारतः । यस्मिन् गुरुर्वा शुक्रो वा शुभेशो वापिसंस्थितः ।।९९।। जिन-जिन भावों में ५।११।१०।४।९ और लग्न के स्वामी बैठे हों। उन- उन भावों के फल में पुष्टता होती है तथा योगानुसार विशेष फल भी होता है।।९९।। कल्याणोत्सवसम्पत्तिर्देवब्राह्मणपूजनम् । यच्चतुर्थे तुङ्गखेटाः शुभस्वामी ग्रहश्च वा ।।१००।। जिस भाव में गुरु वा शुक्र वा ९ भावं के स्वामी बैठे हों तो उसकी दशा में कल्याण, उत्सव, सम्पत्ति, देवता और ब्राह्मण का पूजन होता है। जिससे चौथे भाव में कोई उच्चराशि का ग्रह हो वा शुभ ग्रह हो तो उसकी दशा में।।१००।। वाहनग्रामलाभश्च पशुवृद्धिश्च भूयसी । तत्र चन्द्रेष्टलाभः स्याद्बहुधान्यरसान्युतः ।।१०१।।

४४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वाहन, ग्राम का लाभ और पशुओं की वृद्धि होती है। यदि चन्द्रमा हो तो इष्ट की सिद्धि और रसयुक्त धान्य का लाभ होता है।।१०१।। पूर्णेविधौ निधिप्राप्तिर्भेद्व्या मणिसंचयम् । तत्र शुक्रे मृदङ्गादि वाद्यमान पुरस्कृतः ।।१०२।। यदि चन्द्रमा पूर्ण हो तो निधि (गड़े हुये धन) का नाश वा मणि का लाभ होता है। यदि शुक्र हो तो मृदङ्ग आदि बाजे का लाभ और मानपत्र से पुरस्कृत होता है।।१०२।। आंदोलिकाप्तिर्जीवे तु कनकांदोलिकाध्रुवम् । लग्नकर्मेशभाग्येश तुङ्गस्थ शुभयोगतः ।।१०३।। गुरु हो तो सुवर्ण की पालकी का लाभ होता है। लग्नेश कर्मेश भाग्येश यदि अपने उच्च राशि में हो तो शुभ योग होता है।।१०३।। सर्वोत्कर्षमहैश्वर्यसाम्राज्यादि महत्फलम् । एवं तत्तद्भावबलदायफलं यत्स्याद्विचिंतयेत् ।। एकैवोडुदशा स्वीया गुणैरष्टादशात्मना । भिन्ना फलेविपाकस्तु कुर्याद्वैचित्रसंयुतम् ।।१०४।। इसमें सभी प्रकार की उन्नति, ऐश्वर्य राज्य आदि का लाभ होता है। इसी प्रकार से सभी भावों से फल का विचार करना चाहिये। एक एक राशि को वा ग्रह की दशा अपने १८ गुणों से भिन्न भिन्न फलों को देने वाली होती है।।१०४।। परमोच्चे तुङ्गमात्रे तदर्वाक्तदुपर्यपि । मूलत्रिकोणभे स्वक्षे स्वाधिमित्रग्रहस्यभे ।।१०५।। वे १८ गुण इस प्रकार हैं— परमोच्च केवल उच्च में, इसके पूर्व या आगे, मूलत्रिकोण, स्वराशि अधिमित्र की राशि।।१०५।। तत्कालसुहृदो गेहे उदासीनस्य भे तथा । शत्रोर्भेऽधिरिपोर्भे च नीचान्तादूर्ध्व देशभे ।।१०६।। तात्कालिक मित्रराशि, सम की राशि शत्रु की राशि, अधिशत्रु की राशि, नीचराशि या उससे पूर्व या आगे।।१०६।। तस्मादर्वाङ् नीचमात्रे नीचान्ते परमांशके । नीचारिवर्गे सखले स्ववर्गे केन्द्रकोणभे ।।१०७।।

अथ दशाफलाध्यायः । ४४३ नीच परमनीच में, नीच वा शत्रुवर्ग में, पापयुक्त, अपने वर्ग में, केन्द्रकोण में।।१०७।। व्यवस्थितस्य खेटस्य समरे पीडितस्य च । गाढमूढस्य च दशापचिति स्वगुणैः फलम् ।।१०८।। युद्ध में पीडित, परमअस्त में गये हुये ग्रहों की दशा अपने गुण के अनुसार फलदायक होती है।।१०८।। परमोच्चगतो यस्तु योऽतिवीर्यचरित्रवान् । सम्पूर्णाख्या च तद्दशा राज्यभोग्यशुभप्रदा ।।१०९।। जो ग्रह परमोच्च में हो और अत्यंत बली हो उसकी दशा को सम्पूर्ण कहते हैं, उसकी दशा में राज्य का सुख और शुभफल होते हैं।।१०९।। लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानां चिदावासगृहप्रदा । तुङ्गमात्रगतस्यापि तथा वीर्याधिकस्य च ।।११०।। और लक्ष्मी की कृपा होती है तथा गृह की प्राप्ति होती है। जो केवल उच्चराशि में हो और अधिक बली हो।।११०।। पूर्णाख्या बहुधैश्वर्यदान्यपि रुजप्रदा । अतिनीचगतस्यापि दुर्बलस्य ग्रहस्य तु ।।१११।। उसकी दशा को पूर्णा कहते हैं, वह ऐश्वर्य को देने वाली होते हुये भी रोगप्रद होती है। अस्तंगत नीच में गये हुये दुर्बलग्रह की दशा को।।१११।। रिक्तासानिष्टफलदा न्याध्यनर्थमृतिप्रदा । अत्युच्चेऽप्यतिनीचंगे मध्यगस्यावरोहिणी ।।११२।। रिक्ता कहते हैं इस दशा में अनिष्ट फल, व्याधि, अनेक अनर्थ होते हैं। अत्यंत उच्च और अत्यंत नीच के मध्य में गये हुये ग्रहं की दशा को अवरोहिणी कहते हैं।।११२।। मित्रोच्चभावप्राप्तस्य मध्याख्याह्यर्थदा दशा । नीचान्तादुच्चभागान्तं भषट्के मध्यमस्य च ।।११३।। जो ग्रह मित्र की राशि या उच्चराशि में हो उसकी दशा का नाम मध्या होता है वह ध्यान देने वाली होती है। नीचे से उच्च तक ६. राशि के मध्य में रहने वाले ग्रह की।।११३।। दशाचारोहिणी नीचरिपुभांशगंतस्य च । अधमाख्या भयक्लेश व्याधिदुःखविवर्धिनी ।।११४।।

४४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । तया दशा आरोहिणी कहते हैं, नीच शत्रु की राशि या नवांशगत ग्रह ग्रह की दशा को अधम दशा कहते हैं यह दशा भय, कष्ट व्याधि दुःख को बढ़ाने वाली होती है।।११४।। नामानुरूपफलदाः पाककाले दशाक्रमात् । भाग्येशगुरुसम्बन्धो योगदृक्केन्द्रभादिभिः ।।११५।। अपने-अपने नाम के अनुरूप ही अपने-अपने दशा का फल होता है। यदि अन्य ग्रह के साथ भाग्येश, गुरु का योग, दृष्टि, केन्द्र आदि में कोई सम्बन्ध होता है।।११५।। परेषामपि दायेषु भाग्योपक्रममुन्नयेत् । जातको यस्तु फलदो भाग्यप्रदोऽथ यः ।।११६।। तो उस ग्रह की दशा में भी भाग्य वृद्धि होती है। जन्म समय भाग्योदय आदि फल देने वाला ग्रह हो ।।११६।। सफलो वक्रिमादूर्ध्वमन्यानपि च खेचरात् । दुर्बला न समर्थाश्च फलदानेषु योगतः ।।११७।। वह वक्रगति को छोड़ने के बाद फलप्रद होता है। इसी प्रकार जो दुर्बल और असमर्थ है वह भी योग होने से फल देने में समर्थ हो जाता है।।११७।। तारतम्यात्सुसम्बन्धा दशा ह्येताः फलप्रदाः । स्वकेन्द्रादिजुषां तेषां पूर्णाद्धर्धिघ्र्यव्यवस्था ।।११८।। इस प्रकार तारतम्य से अच्छे सम्बन्ध से दशा फलप्रद होती है। तथा दशेश के केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम में रहने से पूर्ण, आधा और चौथाई दशा का फल तारतम्य से होता है।।११८।। शीर्षोदयस्थिताः स्वस्वदशादौ स्वफलप्रदा । उभयोदयराशिस्थः मध्यफलप्रदा ।।११९।। शीर्षोदय राशि में बैठा हुआ ग्रह अपनी दशा के आदि में अपने शुभ अशुभ फल को देता है, द्विस्वभाव राशिगत ग्रह दशा के मध्य में ।।११९।। पृष्ठोदयर्क्षगाः खेटाः स्वदशान्ते फलप्रदाः । निसर्गतश्च तत्काले सुहृदां हरणेशुभम् ।।१२०।। अपने शुभ अशुभ फल को देता है। पृष्ठोदय राशि में गया हुआ ग्रह अपनी दशा के अन्त में अपने शुभ अशुभ फल को देता है। नैसर्गिक वा तत्काल में मित्र ग्रह के अन्तरदशा में शुभ फल होता है।।१२०।।

अथ दशाफलाध्यायः । ४४५ सम्पादयेत्तदा कष्टं तद्विपर्ययगामिनाम् । दशेशाक्रांत भावाच्चारभ्य द्वादशर्क्षभम् ।।१२१।। और शत्रुग्रह की अन्तरदशा में अशुभ फल होता है (दशेश जिस भाव में हो वहाँ से आरम्भ कर १२ राशियों की अन्तरदशा होती है।।१२१।। भुक्त्वा द्वादशराशीनां दशाभुक्तिं प्रकल्पयेत् । एकैकराशेर्या तत्र सुहृऽस्वक्षेत्रगामिनी ।।१२२।। उसमें भी जो राशि मित्र राशिस्थ वा अपने राशिस्थ ग्रह से युत हो उसकी अन्तरदशा में राज्यादि सम्पत्ति पूर्वक शुभ फल होता है।।१२२।। तस्यां राज्यादिसम्पत्तिपूर्वकं शुभमीरयेत् । दुःस्थानरिपुनीचस्थनीचक्रूरयुता च या ।।१२३।। जो राशि शत्रुराशिस्थ, नीचस्थ, नीचक्रूरयुक्त ग्रह से युत हो उसके।।१२३।। तस्यामनर्थकलहं रोगमृत्युभयादिकम् । बिन्दुभूयस्त्वशून्यत्ववशात् स्वीयाष्टवर्गके ।।१२४।। अन्तरदशा में अनर्थ, कलह, रोग, मृत्युभय आदि दुष्ट फल होते हैं, अष्टकवर्ग के अनुसार।।१२४।। वृद्धिं हानिं च तद्राशियावस्य स्वगृहात्क्रमात् । भावयोजनया विद्यात्सुताद्यादि शुभाशुभम् ।।१२५।। धात्वादिराशिभेदाच्च धात्वादिग्रहयोगतः । शुभपापदशाभेदाच्छुभपापयुतैरपि ।।१२६।। जिस राशि में रेखा या बिन्दु अधिक हो उसमें शुभफल और जिसमें रेखा वा बिन्दु अल्प हो उसमें हानि होती है। (यहाँ कोई आचार्य अष्टकवर्ग में शुभद्योतक रेखा और कोई शुभद्योतक शून्य को मानते हैं)। भाव के योजना के अनुसार (अर्थात् लग्न आदि भावों से जिस भाव का विचार करना हो उसी को लग्न मानकर उससे अन्य भावों से उनके शुभ अशुभ का विचार करना चाहिये) जैसे भाई के सुख दुःखादि का विचार करना है तो तीसरे भाव को लग्न मानकर उससे दूसरे भाव से भाई के धन आदि का विचार करना चाहिये।।१२५।। राशियों के धातु आदि के भेद से और ग्रहों के धातु आदि के भेद से उन- उन राशियों वा शुभ पापदशा भेद और शुभ पाप के योग से।।१२६।।

४४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । इष्टानिष्टस्थानभेदात् फलभेदात्समुन्नयेत् । एवं सर्वग्रहाणां च स्वां स्वामन्तर्दशामपि ॥१२७॥ अन्तरदशा काल में अशुभ स्थान भेद से सभी ग्रहों के अन्तर्दशा का शुभ पापफल का विचार करना चाहिये ।। १२७।। स्वराशितो राशिभुक्तिं प्रकल्प्य फलमीरयेत् । अन्तरन्तर्दशां स्वीयां विभज्यैवं पुनः पुनः ।।१२८।। एवं राशि से राशि की अन्तर्दशा की कल्पना कर फल कहना चाहिये तथा अन्तर्दशा में पुनः अन्तर्दशा कल्पना कर उससे भी सूक्ष्म फल कहना चाहिये ।। १२८ ।। गुर्जरे कच्छ सौराष्ट्रे पांचाले सिन्धुपर्वते । एते अष्टोत्तरी श्रेष्ठा अन्ये विंशोत्तरी मता ।। १२९ ।। गुजरात, कच्छ, सौराष्ट्र, पांचाल, सिन्धु, पर्वत में अष्टोत्तरी दशा लेनी चाहिये और अन्यत्र विंशोत्तरी दशा लेनी चाहिये ।। १२९ ।। इति बृहत्पाराशर होरायां पूर्वार्धे दशाफल कथनाध्यायः । अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । तत्रादौ अन्तर्दशाऽऽनयनप्रकारमाह- दशादशाहता कार्या दशभिर्भागमाहरेत् । लब्धं मासास्तथा शेषं त्रिंशघ्नं च दिनानिच ।।१।। जिस ग्रह की दशा में जिस ग्रह का अन्तर निकालना हो उसके दशा वर्ष को दशेश के वर्ष से गुणाकर गुणनफल में १० का भाग देने से लब्धि मास और शेष को ३०. से गुणा कर १० से भाग देने से लब्ध दिन होता है ।। १ ।। उदाहरण-जैसे सूर्य के दशा में सूर्य का अन्तर निकालना है तो सूर्य के दशा वर्ष संख्या ६ को ६ से गुणने से ३६ हुआ इसमें १० का भाग देने से लब्धि ३ मास शेष ६ को ३० से गुणा कर १० का भाग देने से १८ दिन आया। अर्थात् सूर्य की दशा में ३ मास १८ दिन सूर्य का ही अन्तर रहेगा। इसी प्रकार चन्द्रमा के दशा वर्ष १० से सूर्य के दशा वर्ष का गुणा कर १० का भाग देने से लब्धि ६ मास चन्द्रमा का अन्तर हुआ ।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४४७ अन्तर्दशा लिखने का क्रम- शन्यन्तर्दशाचक्रम् -

श.बु.के.शु.सू.चं.मं.रा.बृ.ग्रहाः
व.
१११०मा.
१२१२दि.
२०२५२८३१३२३५३६३७३८४१२०४४
११
१२१५१३१३२५२५१०२२
सूर्यदशा वर्ष ६ अन्तर्दशा
सू.चं.मं.रा.बृ.श.बु.के.शु.ग्र.
वः
१०१११०मा.
१८२४१८१२दिं.
भौमदशा वर्ष ७ अन्तर्दशा
मं.रा.वृ.श.बु.के.शु.सू.चं.ग्र.
ब.
२४११११मा
१८२७२७दि.
गुरुदशा वर्ष १६ अन्तर्दशा
बृ.श.बु.के.शु.सू.चं.मं.रा.ग्र.
ब.
११११मा
१८१२१८२४दि.
बुधदशावर्ष १७ अन्तर्दशा
बु.के.शु.सू.चं.मं.रा.बृ.श.ग्र.
व.
१११०१०११ना.
२७२७२७१८दि.

४४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । शुक्रदशावर्ष २० अन्तर्दशा | शु. | सू. | चं. | मं. | रा. | बृ. | श. | बु. | के. | ग्र. | | ३ | १ | १ | १ | ३ | २ | ३ | २ | १ | व. | | ४ | ० | ८ | २ | ० | ८ | २ | १० | २ | मा. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | दि. | फलमाह- स्वद्वादशांशके लग्न नाथे वा स्वदृक्काणगे । तस्य भुक्तिं शुभामाहुर्मुनयः कालचिंतकाः ।।२।। अपने द्वादशांश में लग्नेश हो अथवा अपने द्रेष्काण में हो तो उसका अन्तर शुभद होता है ऐसा दैवज्ञ कहते हैं।।२।। स्वत्रिंशांशेऽथवा मित्र त्रिंशाशकेऽपिवा । तस्य भुक्तिः शुभाः प्रोक्ताकालविद्भिर्मनीषिभेः।।३।। अपने त्रिंशांश में अथवा मित्र के त्रिंशांश में ग्रह हो तो उसका अन्तर भी शुभद होता है।।३।। मित्रक्षेत्रे नवांशस्थे मित्रस्य द्वादशांशके । तस्यभुक्तिः शुभाप्रोक्ता कालविद्भिर्मनीषिभिः ।।४।। मित्र की राशि में अथवा नवांश में वा द्वादशांश में ग्रह हो तो उसका अन्तर धी शुभद होता है।।४।। बुद्धिक्षेत्रनवांशस्थे पुत्रस्य द्वादशांशके । मित्रद्रेष्काणगेवापि तस्यभुक्तिः शुभावहा ।।५।। पंचम भाव के नवांश में वा पंचम भाव के द्वादशांश में वा मित्र के द्रेष्काण में हो तो उसका अन्तर भी शुभद होता है।।५।। तयोः राशिनवांशस्थे धर्मस्य द्विरसांशके । गुरु द्रेष्काणमे वापि तस्य भुक्तिः शुभावहा ।।६।। नवम भाव की राशि या नवांश में वा नवम भाव के द्वादशांश में ग्रह हो अथवा गुरु के द्रेष्काण में हो तो उसका अन्तर शुभद होता है।।६।। सुखराशिनवांशस्थे बाहनद्विरसांशके । सुखद्रेष्काणगे वापि तस्यभुक्तिः शुभावहा ।।७।। सुख भाव की राशि वा नवांश में वा द्वादशांश का सुख भाव के द्रेष्काण में हो तो उसका अन्तर शुभद होता है।।७।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४४९ विलग्नवाथस्थितमांशनाथे मित्रांशगे मित्रखगेन दृष्टे। सुहृदृष्काणस्यनवांशके वा तदास्य भुक्तिं शुभदा वदंति॥८८॥ लग्नेश जिस राशि नवांश में है उसका स्वामी अपने मित्र के नवांश में हो और मित्र ग्रह से देखा जाता हो अथवा अपने मित्र के द्रेष्काण वा नवांश में हो तो उसका अन्तर शुभद होता है॥८८॥ अथ वक्ष्ये विशेषेण दशा कष्टप्रदा नृणाम् । षष्ठाष्टमव्ययेशानां दशा कष्ट प्रदायिनी ॥८९॥ अब विशेषतः कष्टप्रद दशा और अन्तर को कह रहा हूँ। ६।८।१२ भावों के स्वामियों की दशा कष्टप्रद होती है॥८९॥ एषां भुक्तिर्हि कष्टा स्यान्मारकस्य दशायदि । मारकेशेन षष्ठेशे युक्ते लग्नाधिपे यदि ॥९०॥ यदि ये मारकेश की दशा में इनका अंतर भी कष्ट देनेवाला होता है। मारकेश के लग्नेश युत हो तो॥९०॥ तस्य भुक्तौ ज्वरप्राप्तिं प्राहुः कालविदो जनाः । सरोगेश शरीरेशश्चन्द्रषड्वर्गगो यदि ॥९१॥ इसके अन्तर में ज्वर होता है। षष्ठेशयुक्त लग्नेश चन्द्रमा के वर्ग में हो तो॥९१॥ जलदोषस्तस्य भुक्तौ स्यादजीर्णो न संशयः । षष्ठेशयुतलग्नेशो बुध षड्वर्गगो यदि ॥९२॥ इसके अन्तर में जलंधर या अजीर्ण रोग से कष्ट होता है॥९२॥ तस्य भुक्तौ भवेद्वायुर्वातो वा देहजाड्यकृत् । सारिनाथविलग्नेशो गुरु षड्वर्गगो यदि ॥ तस्य भुक्तौ भवेद्रोगः पीडा वा ब्राह्मणेन तु ॥९३॥ षष्ठेश से युत लग्नेश बुध के षड्वर्ग में हो तो॥९३॥ सषष्ठेश विलग्नेशो भृगु षड्वर्गगो यदि । तस्य भुक्तौ भवेत्पीडा रोगस्त्रीसंगमेन च ॥९४॥ इसके अन्तर में वायु वा बात से शरीर जकड़ जाता है। षष्ठेश से युत लग्नेश गुरु के षड्वर्ग में हो तो इसके अन्तर में रोग वा ब्राह्मण से पीड़ा होती है। षष्ठेश से युक्त लग्नेश शुक्र के षड्वर्ग में हो तो इसके अन्तर में पीड़ा या स्त्री प्रसंग से रोग होता है॥९४॥

४५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सरोगेशविलग्नेशः शनिषड्वर्गगो यदि । तस्य भुक्तौ भवेद्वातः सन्निपातोऽथवानृणाम् ।।१९५।। रोगेश से युत लग्नेश शनि के षड्वर्ग में हो तो इसके अन्तर में वातरोग वा सन्निपात रोग होता है।।१९५।। मृत्युस्थितैःसैंहिकमन्दकेतुभिर्मनोह्रिकाश्वासविषूचिकामिः। रोगोनराणामथ तस्यभुक्तौ भवेद्यदामारक संयुतिश्च।।१९६।। यदि आठवें भाव में राहु, शनि, केतु और मारकेश से युत हों तो इनके अन्तर में काशश्वास रोग वा विषूचिका होता है।।१९६।। एवं भ्रात्रादि भावानां नायको यत्र संस्थितः । तत्तत्षड्वर्गयोगेन तत्तद्भावफलं वदेत् ।।१९७।। भ्रातृ आदि स्थानों के स्वामी और उनके षड्वर्ग के अनुसार उनकी दशा अन्तर में उनके फलों को कहना चाहिये।।१९७।। उच्चक्षेत्रगते सूर्ये केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वदाये च स्वभुक्तौ च धनधान्यादिलाभकृत् ।।१९८।। यदि सूर्य अपनी उच्च राशि में अथवा अपनी राशि में होकर केन्द्र वा त्रिकोण में हो तो उसकी दशा व अन्तर में धन धान्य का लाभ होता है।।१९८।। देहरोगं वित्तलाभं राजप्रीतिकरं शुभम् । सर्वकार्यार्थसिद्धिः स्याद् विवाहं राजदर्शनम् ।।१९९।। देह में रोग, धन का लाभ, राजा से प्रियता होती है, सभी कार्य और धन की सिद्धि, विवाह और राजा का दर्शन होता है।।१९९।। द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत् ।। सूर्यप्रीतिकरीं शान्तिं कुर्यादारोग्यप्राप्तये ।।२००।। यदि सूर्य दूसरे और सातवें भाव का स्वामी हो उसकी दशा और अन्तर में अकाल मृत्युभय होता है अनिष्ट फल की शान्ति के लिये मृत्युंजय मन्त्र का जप और सूर्य के प्रसन्नार्थ शान्ति करने से आरोग्यता होती है।।२००।। सूर्यस्यान्तर्गते चन्द्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । विवाहं शुभकार्यं च धनधान्यसमृद्धिकृत् ।।२०१।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४५१ सूर्य की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में बैठे हुये चन्द्रमा के अन्तर में विवाह, शुभ कार्य, धन, धान्य और समृद्धि का लाभ॥२१॥ गृहक्षेत्राभिवृद्धिं च पशुवाहनसम्पदाम् । तुङ्गे वा स्वर्शगे वापि दारसौख्यं धनागमम् ॥२२॥ गृह क्षेत्र की वृद्धि, पशु वाहन और सम्पत्ति की वृद्धि होती है॥२२॥ पुत्रलाभसुखं चैव सौख्यं राजसमागमम् । महाराज प्रसादेन इष्टसिद्धि सुखावहम् ॥२३॥ चन्द्रमा अपने उच्च अपनी राशि में हो तो स्त्री का सुख, धन का आगम और महाराजा की कृपा से अभीष्ट सिद्ध होता है॥२३॥ क्षीणे वा पापसंयुक्ते दारपुत्रादि पीडनम् । वैषम्य जन सम्वादं भृत्यवर्गविनाशनम् ॥२४॥ यदि चन्द्रमा क्षीण हो वा पापग्रह से युक्त हो तो उसके अन्तर में स्त्री पुत्रादि को कष्ट, लोगों से झगड़ा, नौकरों की हानि होती है॥२४॥ विरोधं राजकलहं धनधान्यपशुक्षयम् । षष्ठाष्टमव्यये चन्द्रे जलभीतिं मनोरुजम् ॥२५॥ राजा से कलह, धन धान्य और पशु की हानि होती है। ६।८।१२ भाव में चन्द्रमा हो तो जल भय, मानसिक कष्ट॥२५॥ बन्धनं रोगपीडां च स्थानविच्युतिकारकम् । दुःस्थानं चापि चित्तेन दायादजनविग्रहम् ॥२६॥ बन्धन, रोग पीड़ा, स्थान च्युति, दुष्ट स्थान की यात्रा, दायादों से विग्रह॥२६॥ निर्धनं कुत्सितान्नं च चौरादिनृपपीडनम् । मूत्रकृच्छ्रादिरोगश्च देहपीडा क्षयो भवेत् ॥२७॥ निर्धनता, खराब अन्न का भोजन, चोर तथा राजा से पीड़ा, मूत्रकृच्छ्र (सूजाक) रोग और क्षयरोग से कष्ट होता है॥२७॥ दायेशाल्लाभभाग्ये च केन्द्रे वा शुभसंयुते । भोगभाग्यादिसंतोषदारपुत्रादिवर्धनम् ॥२८॥ दशा के स्वामी से ११ वा ९ भाव में चन्द्रमा हो अथवा केन्द्र में वा शुभग्रह से युत हो तो अपने अन्तर में भोग, भाग्य, संतोष स्त्री आदि की वृद्धि करता है॥२८॥

४५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राज्यप्राप्तिं महत्सौख्यं स्थानप्राप्तिं च शास्वतीम् । विवाहं यज्ञदीक्षां च सुधान्याम्बरभूषणम् ।।२९।। राज्य का लाभ, अपार सुख, स्थान की प्राप्ति, विवाह, यश, दीक्षा, सुन्दर अन्न, वस्त्र, आभूषण।।२९।। वाहनं पुत्रपौत्रादि लभते सुखवर्द्धनम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते ।।३०।। वाहन और पुत्र पौत्रादि जन्य सुख को देता है। दशेश से ६।८।१२ भाव में चन्द्रमा हो और निर्बल हो तो।।३०।। अकाले भोजनं चैव देशादेशं गमिष्यति । द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युर्भविष्यति । श्वेतां गां महिषीं दद्याच्छान्तिं कुर्यात्सुखं भवेत् ।।३१।। उसके अन्तर में असमय भोजन, एक देश से दूसरे देश की यात्रा होती है। यदि चन्द्रमा २।७ भाव का स्वामी हो तो अकाल मृत्यु होती है। शान्ति के लिये सफेद गौ और भैंस का दान करने से सुख की प्राप्ति होती है।।३१।। अथ रविदशायां भौमान्तर्दशाफलम्- सूर्यस्यान्तर्गते भौमे स्वोच्चे स्वक्षेत्रलाभगे । लग्नात्केन्द्रत्रिकोणे वा शुभकार्यशुभादिकम् ।।३२।। सूर्य की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में गया हुआ लग्न से ११ भाव वा केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये भौम का अन्तर हो तो शुभ कार्य।।३२।। भूलाभं कृषिलाभं च धनधान्यादिवृद्धिदम् । गृहक्षेत्रादिलाभं च रक्तवस्त्रादिलाभकृत् ।।३३।। भूमि का लाभ, कृषि से लाभ, धन धान्य की वृद्धि गृह क्षेत्र का लाभ और रक्तवस्त्र आदि का लाभ होता है।।३३।। लग्नाधिपेन संयुक्ते सौख्यं राजप्रियं सुखम् । भाग्यलाभाधिपैर्युक्ते लाभश्चैव भविष्यति ।।३४।। लग्नेश से युक्त हो तो सुख और राजा का प्रिय पात्र बनाता है। भाग्येश लाभेश से युक्त हो तो लाभ होता है।।३४।।

अथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः । ४५३ बहुसेनाधिपत्यं च शत्रुनाशं मनोदृढम् । आत्मबंधुसुखं चैव भ्रातृवर्धनकं तथा ।।३५।। सेनापति पद का लाभ, शत्रु का नाश आत्मीय बन्धुओं का सुख और भाइयों की वृद्धि होती है।।३५।। दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे पापयुक्ते च वीक्षिते । आधिपत्यबलैर्हीने क्रूरबुद्धिं मनोरुजम् ।।३६।। दशा के स्वामी से ६।८ भाव में पापग्रह से युक्त और दृष्ट तथा बलहीन भौम हो तो दुष्टबुद्धि, मानसिक कष्ट।।३६।। कारागृहे प्रवेशं च निर्गलं बन्धुनाशनम् । भ्रातृवर्गविरोधं च कर्मनाशमथापि वा ।।३७।। जेलयात्रा अनायास बन्धु का नाश, भाइयों से विरोध, कर्म का नाश होता है।।३७।। नीचेवा दुर्बले भौमे राजमूलाद्धनक्षयः । द्वितीयद्यूननाथे तु देहेजाड्यं मनोरुजम् ।।३८।। अपनी नीचराशि में दुर्बल भौम हो तो राजा के कोप से धन की हानि होती है। यदि २।७ भाव का स्वामी हो तो देह में जड़ता और मानसिक कष्ट होता है।।३८।। सुब्रह्मजपदानं च अनड्वाहं तथैव च । शांतिं कुर्वीत विधिवदायुरारोग्य सिद्धिदम् ।।३९।। इसकी शान्ति के लिये वेदपाठ, गायत्री का जप, दान, बैल का दान आदि करने से आयु, आरोग्यता आदि की सिद्धि होती है।।३९।। अथ रविदशायांराह्वन्तर्दशाफलम्- सूर्यस्यान्तर्गते राहौ लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । आदौ द्विमासपर्यन्तं धननाशं महद्भयम् ।।४०।। सूर्य की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये राहु की अन्तर्दशा हो तो पहले २ मास पर्यन्त धन का नाश और महाभय होता है।।४०।। चौरादिव्रणभीतिश्च दारपुत्रादिपीडनम् । तत्परं सुखमाप्नोति शुभयुक्ते शुभांशके ।।४१।।

४५४ . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । चोर आदि तथा फोड़ा आदि का भय स्त्री पुत्रादि को कष्ट होता हैं। इसके बाद सुख होता है। राहु शुभग्रह से युक्त और शुभग्रह के अंश में हो तो।।४१।। देहारोग्यं मनस्तुष्टी राजप्रीतिकरं सुखम्। लग्नादुपचये राहौ योगकारकसंयुते।।४२।। शरीर में आरोग्यता, मन को संतोष, राजा से मित्रता और सुख होता है। लग्न से उपचय (३।६।११) स्थान में योगकारक ग्रह से युक्त हो।।४२।। दायेशाच्छुभराशिस्थे राजसन्मानकीर्त्तिदम्। भाग्यवृद्धिं यशोलाभं दारपुत्रादिपीडनम्।।४३।। और दशेश से शुभ स्थान में हो तो राजा से सम्मान और कीर्त्ति में वृद्धि, भाग्य वृद्धि, यश का लाभ, स्त्री पुत्रादि को पीड़ा।।४३।। पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे कल्याणशोभनम्। दायेशात्षष्ठरिःफस्थे रंध्रे वा बलवर्जिते।।४४।। पुत्रोत्सव आदि उत्सव गृह में होते हैं। दशेश से ६।१२।८ भाव में राहु हो और निर्बल हो तो।।४४।। बंधनं स्थाननाशश्च कारागृह निवेशनम्। चौराहिब्रणभीतिश्च दारपुत्रादिवर्द्धनम्।।४५।। बंधन स्थान हानि, जेलखाना, चोर, सूर्य, फोड़ा से भय, स्त्री पुत्रादि को सुख।।४५।। चतुष्पाज्जीवनाशश्च गृहक्षेत्रादिनाशनम्। गुल्मक्षयादिरोगश्च अतिसारादिपीडनम् ।।४६।। चौपाये जानवर की हानि, गृह क्षेत्र की हानि, गुल्म, क्षय और अतिसार रोग से पीड़ा होती है।।४६।। द्विसप्तस्थे तथा राहौ तत्स्थानाधिपसंयुते । अपमृत्युभयं चैव सर्वभीतिश्च सम्भवेत् ।।४७।। २।७ भाव में इन स्थानों के स्वामी से युत राहु हो तो अपमृत्यु का भय तथा अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ता है।।४७।। दुर्गाजपं च कुर्वीत छागदानं समाचरेत् । कृष्णांगां महिषीं दद्याच्छान्तिमाप्नोत्यसंशयम् ।।४८।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४५५ इसकी शांति के लिये दुर्गापाठ, बकरी, काली गौ, भैंस का दान करना चाहिये इससे आराम होता है।।४८।। रविदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । स्वोच्चमित्रस्य वर्गस्थे विवाहं राजदर्शनम् ।।४९।। सूर्य की दशा में अपने उच्च वा अपने मित्र के वर्ग में स्थित केन्द्र वा त्रिकोण में रहने वाले गुरु के अंतर में विवाह राजा का दर्शन।।४९।। धनधान्यादिलाभं च पुत्रलाभं महत्सुखम् । महाराजप्रसादेन इष्टकामार्थलाभकृत् ।।५०।। धन; धान्य का लाभ, पुत्र सुख, बड़ा सुख, राजा की प्रसन्नता से इष्ट कार्य, धन का लाभ।।५०।। ब्राह्मणप्रियसन्मानं प्रियवस्त्रादिलाभकृत् । भाग्यकर्माधिपवशाद्राज्यलाभं महोत्सवम् ।।५१।। ब्राह्मण और मित्रों से सम्मान, प्रियवस्त्रादि का लाभ होता है। भाग्येश और कर्मेश हो तो राज्य का लाभ, बड़ा उत्सव।।५१।। नरवाहनयोगश्च स्थानाधिक्यं महत्सुखम् । दायेशाच्छुभराशिस्थे भाग्यवृद्धिः सुखावहा ।।५२।। मनुष्य की सवारी (पालकी) स्थान लाभ, सुख होता है। दशेश से शुभ राशि में हो तो भाग्यवृद्धि, सुख। दानधर्मक्रियायुक्तो देवताराधनप्रियः । गुरुभक्तिः मनः सिद्धिःपुण्यकर्मादिसंग्रहः ।।५३।। दान आदि धार्मिक क्रिया में प्रवृत्त देवता का आराधन, गुरु की भक्ति और पुण्य कर्मों का संग्रह होता है।।५३।। दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे नीचे वा पापसंयुते । दारपुत्रादिपीडाच देहपीडा महद्भयम् ।।५४।। दशेश से ६।८ स्थान में अपने नीचराशि में पापग्रह से युत हो तो स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा, शरीर में पीड़ा, बड़ा भय।।५४।। राजकोपं प्रकुरुते इष्टवस्तुविनाशनम् । पापमूलाद्द्रव्यनाशं देहभ्रष्टं मनोरुजम् ।।५५।।

४५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राजकोप, इष्टवस्तु का नाश, पापमूल से धन का नाश देह में कष्ट और मानसिक कष्ट होता है।।५५।। स्वर्णदानं प्रकुर्वीत इष्टजाप्यं च कारयेत् । गवां कपिलवर्णानां दानेनारोग्यमादिशेत् ।।५६।। शान्ति के लिये सोना का और कपिला गौ का दान करना चाहिये। इष्टदेव (गुरु) का जप कराने से आरोग्यता प्राप्ति होती है।।५६।। अथ रविदशायांशन्यन्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । शत्रुनाशं महत्सौख्यं स्वल्पधान्यार्थलाभकृत् ।।५७।। सूर्य की दशा में लग्न से केन्द्र त्रिकोण में गये हुये शनि के अतर में शत्रुओं का नाश, सुख, अल्प धन धान्य आदि का लाभ।।५७।। विवाहोत्सव कार्याणि शुभकार्य शुभावहम् । स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे मन्दे सुहृद्ग्रहसमन्विते ।।५८।। विवाहोत्सव आदि कार्य, शुभ क्रियायें होती हैं। यदि शनि अपने उच्च, अपनी राशि में हो अपने मित्र ग्रह से युत हो तो।।५८।। गृहेकल्याणसम्पत्तिर्विवाहादि च सत्क्रियाम् । राजसन्मानकीर्त्तिश्च नानावस्त्रधनागमः ।।५९।। गृह में कल्याण, सम्पत्ति, विवाहादि अच्छी क्रियायें, राजा से सम्मान, कीर्त्ति और अनेक प्रकार के वस्त्र तथा धन का लाभ होता है।।५९।। दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते । वातशूलमहाव्याधिज्वरातीसारपीडनम् ।।६०।। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो वात, शूल, महाव्याधि, ज्वर, अतिसार की पीड़ा।।६०।। बन्धनं कार्यहानिश्च वित्तनाशं महद्भयम् । अकस्मात्कलहश्चैव दायादजनविग्रहम् ।।६१।। बन्धन, कार्य की हानि, धन का नाश, बड़ा भय, अकस्मात् झगड़ा, दायादों से विग्रह होता है।।६१।। भुक्त्यादौ मित्रहानिः स्यान्मध्ये किंचित्सुखावहम्। अन्ते क्लेशकरं चैव नीचे तेषां तथैव च ।।६२।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४५७ अन्तर के आदि में मित्रों की हानि, मध्य में कुछ सुख और अन्त में क्लेश होता है, इसी प्रकार नीच राशि में रहने से भी होता है।।६२।। पितृमातृवियोगं च गमनागमनं तथा । द्वितीयद्यूननाथेतु अपमृत्युभयं भवेत् ।।६३।। यदि शनि २।७ भावों का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। पिता माता का वियोग और आनाजाना लगा रहता है।।६३।। कृष्णां गां महिषीं दद्यान्मृत्युञ्जय जपं चरेत् । छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।६४।। शान्ति के लिये काली गौ, भैंस का दान करना चाहिये और मृत्युञ्जय का जप करना चाहिये और बकरी का दान करने से सभी सुख का लाभ होता है।।६४।। अथ रविदशायांबुधान्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते सौम्ये स्वोच्चे वास्वर्क्षगेऽपिवा । केन्द्रत्रिकोणलाभस्थे बुधे वर्गबलैर्युते ।।६५।। सूर्य की दशा में अपने उच्च राशि वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण वा ११ में गये हुये अपने वर्ग में बली बुध के अन्तर में।।६५।। राज्यलाभं महोत्साहं दारपुत्रादि सौख्यकृत् । महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम् ।।६६।। राज्य का लाभ बड़ा उत्साह स्त्री पुत्रादि को सुख, राजा की प्रसन्नता से वाहन, वस्त्र आभूषण।।६६।। पुण्यतीर्थकलाप्राप्तिर्गृहे गोधनसंकुलम् । भाग्यलाभाधिपैर्युक्ते लाभवृद्धिकरोभवेत् ।।६७।। पुण्यतीर्थ, कला के ज्ञान की प्राप्ति, गृह में गोधन की वृद्धि होती है। यदि ९।११ भाव के स्वामी से युत हो तो लाभ में वृद्धि करता है।।६७।। भाग्यपंचमकर्मस्थे सन्मानो भवति ध्रुवम् । स्वकर्मधर्मबुद्धिश्च गुरुपित्रद्विजार्चनम् ।।६८।। यदि बुध ९।५।१० भाव में हो तो सम्मान होता है। अपने धर्मकर्म में वृद्धि गुरु, पिता ब्राह्मण का पूजन।।६८।। धनधान्यादिसंयुक्तं विवाहं पुत्रसम्भवम् । दायेशाच्छुभरांशिस्ये सौम्यभुक्तौ महत्सुखम् ।।६९।।

४५८ . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । धन, धान्य से युक्त, विवाह और पुत्र का लाभ होता है। दशेश से शुभ राशि में हो तो बड़ा सुख ।।६९।। वैवाहिकं यज्ञकर्म दान धर्म जपादिकम् । स्वनामांकितपद्यानि नामद्वयमथापि वा ।।७०।। वैवाहिक यज्ञ धर्म, जप आदि होते हैं, नामांकित पद्य बनते हैं ।।७०।। भोजनाम्बरभूषाप्तिरमरेशो भवेन्नरः । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे रिष्फगे नीचगेऽपिवा ।।७१।। भोजन वस्त्र की प्राप्ति और इन्द्र के समान सुख देता है। दशेश से ६।८।१२ भाव में वा नीचराशि में हो तो ।।७१।। देहपीडा मनस्तापो दारपुत्रादिपीडनम् । भुक्त्यादौ दुःखमाप्नोति मध्येकिञ्चित्सुखावहम् ।।७२।। शरीर में पीड़ा मन में सन्ताप, स्त्री पुत्रादि को कष्ट होता है। तथा अन्तर के आरम्भ में दुःख मध्य में कुछ सुख ।।७२।। अन्ते तु राजभीतिश्च गमनागमनं तथा । द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं ज्वरादिकम् ।।७३।। और अन्त में राजभय और गमनागमन होता है। २।७ भाव के स्वामी हो तो देह में जड़ता और ज्वर आदि से कष्ट होता है ।।७३।। विष्णुनामसहस्रंच ह्यन्नदानं च कारयेत् । रजतप्रतिमादानं कुर्यादारोग्य प्राप्तये ।।७४।। आरोग्यता के लिये विष्णुसहस्र स्तोत्र का पाठ, अन्नदान और चाँदी की प्रतिमा का दान करना चाहिये ।।७४।। अथ रविदशायाकेत्वन्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते केतौ देहपीडा मनोव्यथा । अर्थव्ययं राजकोपं स्वजनादिरुपद्रवम् ।।७५।। सूर्य की दशा में केतु के अन्तर में शरीर में पीड़ा, मन में कष्ट धन का व्यय, राजभय, अपने ही लोगों से उपद्रव होता है ।।७५।। लग्नाधिपेन संयुक्ते आद्ये सौख्यं धनागमम् । मध्ये तत्क्लेशमाप्नोति मृतवार्तागमं वदेत् ।।७६।। लग्नेश से युत हो तो पहले सुख धन का लाभ होता है, मध्य में उन्हीं क्लेशों