बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
५५२. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । भौम के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में बुद्धि का नाश, दुःख, संतापं कलह और सभी चिंतित कार्य विफल हो जाते हैं।।२२।। स्वामिनाशस्तथा पीडा धनहानिर्महाभयम् । वैकल्यं कलहंस्त्रासो भौमभौमान्तरे शनिः ।।२३।। (मं.श.) भौम के अन्तर में शनि के प्रत्यन्तर में स्वामी का नाश, पीडा, धन की हानि, महाभय, विकलता, कलह और त्रास होता है।।२३।। सर्वथा बुद्धिनाशश्च धनहानिज्वरस्तनौ । वस्त्रान्नसुहृदां नाशो भौमभौमान्तरे बुधः ।।२४।। (मं.बु.) भौम के अन्तरदशा में बुध के प्रत्यन्तर में बुद्धि का नाश, धनहानि, शरीर में ज्वर, वस्त्र अन्न और मित्रों का नाश होता है।।२४।। आलस्यं च शिरः पीडा पापरोगअपमृत्युकृत् । राजभीतिः शस्त्रघातो भौमभौमान्तरे शिखी ।।२५।। (मं.के.) भौम के अन्तर में केतु के प्रत्यन्तर में आलस्य, शिर में पीडा, पाप, रोग, अपमृत्यु राजभय और शस्त्र से चोट लगने का भय होता है।।२५।। चांडालात्संकटस्त्रासो राजशस्त्रभयं भवेत् । अतिसारो च वमनं भौमभौमान्तरे भृगुः ।।२६।। (मं.शु.) भौम के अन्तर में शुक्र के प्रत्यन्तर में चांडाल से संकट और त्रास राजा और शस्त्र से भय, अतिसार और वमन होता है।।२६।। भूमिलाभोऽर्थसम्पत्तिः संतोषोमित्रसंमतिः । सर्वत्र सुख माप्नोति भौमभौमान्तरे रविः ।।२७।। (मं.सू.) भौम के अंतर में सूर्य के प्रत्यन्तर में भूमि का लाभ, धन सम्पत्ति का लाभ, संतोष, मित्रों का लाभ और सर्वत्र सुख होता है।।२७।। याम्यां दिशि भवेल्लाभः सितवस्त्रविभूषणम् । संसिद्धिः सर्वकार्याणां भौमभौमान्तरे शशी ।।२८।। (मं.चं.) भौम की दशा में चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में दक्षिणदिशा से लाभ, सफेद वस्त्र आभूषण का लाभ और सभी कार्यों की सिद्धि होती है।।२८।। इति भौमप्रत्यन्तर फलम् - अथराह्वन्तरेराह्यादीनां प्रत्यन्तरफलम् - बंधनं बहुधारोगो बाहुघातं सुहृद्भयम् । अकस्मात्प्राप्यते व्याधिः राहुप्रत्यन्तरे राहुः ।।२९।। (रा.रा.)
अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५५३ राहु की दशा में राहु के अन्तर में बंधन, अनेक रोग, बाहु में आघात, मित्र से भय, अकस्मात् व्याधि होती है।।२९।। सर्वत्रलभते लाभं गजाश्वं च धनागमम् । राजसन्मानदं राज्यं भवेद्राह्वन्तरे गुरुः ।।३०।। (रा.वृ.) राहु के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में सर्वत्र लाभ, हाथी, घोड़ा, धन का लाभ, राज सन्मान से युक्त राज्य की प्राप्ति होती है।।३०।। बंधनं जायते घोरं सुखहानिर्महद्भयम् । प्रत्यहं वातपीडा च राहौ राह्वन्तरे शनिः ।।३१।। (रा.श.) राहु के अन्तर में शनि के प्रत्यन्तर में घोर वंधन होता है। सुख की हानि और बड़ा भय और प्रतिदिन वायु से पीड़ा होती है।।३१।। सर्वत्र बहुधा लाभः स्त्री समश्र विशेषतः । परदेशगतिः सिद्धिं राहो राह्वन्तरे बुधः ।।३२।। (रा.बु.) राहु की दशा में बुध के प्रत्यन्तर में सर्वत्र अनेक लाभ स्त्री संसर्ग से विशेष लाभ और परदेश से विशेष सिद्धि होती है।।३२।। बुद्धिनाशो भयं विघ्नं धनहानिर्महद्भयम् । सर्वत्र कलहोद्वेगो राहो राह्वन्तरे शिखी ।।३३।। (रा.के.) राहु के अन्तर में केतु के प्रत्यन्तर में, बुद्धि का नाश, भय, विघ्न, धन की हानि, बड़ा भय और सर्वत्र कलह और द्वेष होता है।।३३।। योगिनीभ्योभयं भूयादश्वहानिः कुभोजनम् । स्त्रीनाशः कुलजं शोकं राहो राह्वंतरेसितः ।।३४।। (रा.शु.) राहु के अन्तर में शुक्र के प्रत्यंतर में योगिनी (पिशाचिनी आदि) से भय, घोड़े का नाश, खराब भोजन, स्त्री का नाश और कुलजनित शोक होता है।।३४।। ज्वररोगो महाभीतिः पुत्रपौत्रादिपीडनम् । अल्पमृत्युः प्रभादश्च राहो राह्वन्तरे रविः ।।३५।। (रा.सू.) राहु के अन्तर में सूर्य के प्रत्यन्तर में ज्वररोग, महाभय, पुत्र-पौत्र को पीड़ा, अपमृत्यु और प्रमाद होता है।।३५।। उद्वेगकलहो चिन्ता मानहानिर्भहद्भयम् । पितुर्विकलता देहे राहो राह्वन्तरे शशी ।।३६।। (रा.चं.)
५५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राहु की दशा में चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में उद्वेग, कलह, चिन्ता, मानहानि, महाभय, पिता आदि के शरीर में विकलता होती है।।३६।। भगंदरकृता पीडा रक्तपित्तप्रपीडनम् । अर्थहानिर्महोद्वेगो राहो राह्वन्तरे कुजः ।।३७।। (रा.मं.) राहु के अन्तर में भौम के प्रत्यंतर में भगंदर रोग से पीड़ा, रक्त पित्त से पीड़ा, धन हानि और महा उद्वेग होता है।।३७।। इति राहु प्रत्यन्तर फलम् । अथ गुर्वन्तरे गुर्वादीनांप्रत्यंतर फलम्- हेमलाभो धान्यवृद्धिः कल्याणं च फलोदयः । बहुभाग्यं गृहे वृद्धिं जीवजीवान्तरे गुरुः ।।३८।। (वृ.शू.) गुरु के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में सुवर्ण का लाभ, धान्य वृद्धि, कल्याण, फलोदय अनेक प्रकार से भाग्योदय और घर में वृद्धि होती है।।३८।। गोभूमिहयलाभः स्यात्सर्वत्र सुखसाधनम् । संग्रहो ह्यन्नपानादि गुरुर्गुर्वन्तराशनिः ।।३९।। (वृ.श.) गुरु के अन्तर में शनि के प्रत्यन्तर में गौ, भूमि, सुवर्ण का लाभ, सर्वत्र सुख का साधन, अन्न, पान आदि का संग्रह होता है।।३९।। विद्यालाभो वस्त्रलाभो ज्ञानलाभः समौक्षिकः । सुहृदां संगमः स्नेहो जीवजीवान्तराबुधः ।।४०।। (वृ.बु.) गुरु के अन्तर में बुध के प्रत्यन्तर में विद्या का लाभ, वस्त्र का लाभ, मौक्षिक ज्ञान का लाभ, मित्रों से समागम और स्नेह होता है।।४०।। जलभीतिस्तथा चौर्यं बंधनं कलहो भवेत् । अल्पमृत्युर्भयं घोरं जीव जीवांतरे ध्वजः ।।४१।। (वृ.के.) गुरु के अन्तर में केतु के प्रत्यंतर में जल से भय, चोरी का भय, बंधन, कलह, घोर अपमृत्यु का भय होता है।।४१।। नानाविद्यार्थसम्प्राप्तिर्हेमवस्त्रविभूषणम् । लभतेक्षेमसंतोषं जीवजीवांतरे कविः ।।४२।। (वृ.शु.) गुरु के अन्तर में शुक्र के प्रत्यंतर में अनेक प्रकार से धन का लाभ, सुवर्ण, वस्त्र, आभूषण का लाभ और कुशल, संतोष का लाभ होता है।।४२।।
अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५५५ नृपाल्लाभस्तथा मित्रान्पितृतो मातृतोऽपि वा । सर्वत्र लभते पूजां जीवजीवान्तरा रविः ।।४३।। (वृ.सू.) गुरु के अंतर में सूर्य के प्रत्यंतर में राजा से लाभ, मित्र, पिता, माता से लाभ और सर्वत्र पूजनीय होता है।।४३।। सर्वदुःखविमोक्षश्च मुक्तालाभो हयस्य च । सिध्यंति सर्व कार्याणि जीवजीवांतरे शशी ।।४४।। (वृ.चं.) गुरु के अन्तर में चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में सभी दुःखों का नाश, मुक्ता और अश्व का लाभ और सभी कार्य सिद्ध होते हैं।।४४।। शस्त्रभीतिर्गुदे पीडावह्निमान्द्यमजीर्णता । पीडाशत्रुकृता भूरि जीवजीवान्तरे कुजः ।।४५।। (वृ.मं.) गुरु के अन्तर में भौम के प्रत्यंतर में शस्त्र का भय, गुदा में पीड़ा, अग्निमांद्य, अजीर्ण और शत्रु से अधिक पीड़ा होती है।।४५।। चांडालेन विरोधः स्याद्भयं तेभ्यो रतिग्रहः । कष्टं स्याद्व्याधिशत्रुभ्यो जीवजीवान्तरे तमः ।।४६।। (वृ.रा.) गुरु के अन्तर में राहु के प्रत्यंतर में चांडाल से विरोध और उनसे भय, व्याधि और शत्रु से कष्ट होता है।।४६।। इति गुरुप्रत्यंतरफलम्। अथ शन्यन्तरेशान्यादीनांप्रत्यन्तरफलम्- देहपीडा कलेर्भीतिर्भयमन्त्यलोकतः । विदेशगमनं दुःखं शनेः शन्यन्तरे शनिः ।।४७।। (श.श.) शनि के अन्तर में शनि के प्रत्यंतर में शरीर में पीड़ा, झगड़े का भय, नीचों से भय, विदेश की यात्रा और दुःख होता है।।४७।। बुद्धिनाशो कलेर्भीतिमन्नपानादिहानिकृत् । धनहानिर्भयं शत्रोः शनेः शन्यन्तरे बुधः ।।४८।। (श.बु.) शनि के अन्तर में बुध के प्रत्यंतर में बुद्धि का नाश, कलह का भय, अन्नादि की हानि, धन की हानि और शत्रु का भय होता है।।४८।। बन्धः शत्रुगृहे जातो वर्णहानिर्बहुक्षुधा । चित्तेचिन्ता भयं त्रासः शनेःसौरान्तरे शिखी ।।४९।। (श.के.) शनि के अन्तर में केतु के प्रत्यंतर में शत्रु गृह में बन्धन, तेज की हानि.
.५५६. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । बहुत भूख लगती है, चित्त में चिन्ता, भय और त्रास होता है।।४९।। चिंतितं फलितं वस्तु कल्याणं स्वजने तथा । मनुष्यकृतितो लाभः शनेः शन्यन्तरे भृगुः ।।५०।। (श.शु.) शनि की दशा में शुक्र के अन्तर में चिंतित वस्तु का लाभ, आत्मीयजनों का कल्याण, मनुष्य की कृति से लाभ होता है।।५०।। राजतेजोऽधिकारित्वं स्वगृहे जायते कलिः । ज्वरादिव्याधिपीडाच कोणे कोणान्तरे रविः ।।५१।। (श.सू.) शनि के अन्तर में सूर्य के प्रत्यन्तर में राजा के ऐसा तेज, अधिकार की प्राप्ति, अपने घर में कलह और ज्वर आदि व्याधि से पीड़ा होती है।।५१।। स्फीतबुद्धिर्महारम्भो मंदतेजो बहुव्ययः । बहुस्त्रीभिःसमं भोगं कोणे कोणान्तरे शशी ।।५२।। (श.चं.) शनि के अन्तर में चन्द्रमा के प्रत्यंतर में स्वच्छ बुद्धि, महान् कार्य का आरम्भ, कान्ति की कमी, अधिक खर्च, अनेक स्त्रियों से संभोग होता है।।५२।। तेजोहानिः पुत्रघातो वह्निभीतिरिपोर्भयम् । वातपित्तकृतापींडा कोणेकोणान्तरे कुजः ।।५३।। (श.मं.) शनि के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में कान्ति की हानि, पुत्र को कष्ट, अग्नि का भय, शत्रु भय और बात-पित्त से पीड़ा होती है।।५३।। धननाशो वस्त्रहानिर्भूमिनाशो भयं भवेत् । विदेशगमनं मृत्युः कोणेकोणान्तरे तमः ।।५४।। (श.रा.) शनि के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में धन का नाश, वस्त्र की हानि, भूमि की हानि, भय, विदेश यात्रा और मृत्यु होती है।।५४।। गृहेषु स्त्रीकृतं छिद्रं ह्यसमर्थो निरीक्षणे । अथवा कलिमुद्वेगं दाने सौरान्तरे गुरुः ।।५५।। (श.बृ.) शनि के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में गृह में स्त्री द्वारा कलह की उत्पत्ति जिसके निरीक्षण में असमर्थ, कलह और उद्वेग होता है।।५५।। इति शनि प्रत्यंतरफलम्।
. Wait, why would it be द्वय? Could it be a misprint in the book for द्भय? YES, very likely a typesetter misread/misprint: द्वयinstead ofद्भय! Wait, should we transcribe it as printed or corrected? The prompt says: "Transcribe this classical Vedic Jyotisha ... page line by line into pure, clean Markdown in Unicode Devanagari ... Transcribe the text as it is". Wait, if it's द्द्वयorद्भय: let's look closely at whether it's actually द्भयorद्वय. Wait, let's zoom in 500% on स्त्रीभिरकस्मा...सम्भवः: Pixels: स्मा(sma) Then: a top horizontal line. Under it:दcharacter. Below theद: a loop that curves down to the left, then goes down and curves right like a व! Wait, does it have a loop on the left? YES! A loop on the left! Wait! A loop on the left is the letter भ! Wait, भhas a loop on the left!व` does NOT have a loop on the left!
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५५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । बुध के अन्तर में गुरु के प्रत्यंतर में राज्य वा राज्याधिकारी की प्राप्ति, राजा- से पूजा, विद्याधर से अन्न वस्त्र की प्राप्ति होती है।।६३।। वातपित्तमहापीडा देहघातसमुद्भवा । धननाशमवाप्नोति सौम्यसौम्यन्तरे शनिः ।।६४।। (बु.श.) बुध के अंतर में शनि के प्रत्यंतर में वात-पित्त से महापीडा, देह में चोट आदि लगने की सम्भावना और धन का नाश होता है।।६४।। इति बुधप्रत्यन्तरफलम्। अथ केत्वन्तरे केत्वादीनांप्रत्यन्तरफलम्- अपां समुद्भवोऽकस्माद्देशान्तरसमागमः । धननाशोऽल्पमृत्युश्च केतोः केत्वन्तरे शिखी ।।६५।। (के.के.) केतु के अन्तर में केतु के प्रत्यन्तर में अकस्मात जलमार्ग से देशान्तरं की यात्रा, धन की हानि और प्राणभय होता है।।६५।। म्लेक्षभीत्यर्थनाशो वा नेत्ररोगः शिरोव्यथा । हानिश्चतुष्पदानांच केतोः केत्वन्तरे भृगुः ।।६६।। (के.शु.) केतु के अन्तर में शुक्र के प्रत्यन्तर में म्लेक्ष से भय, अत्यंत धन का नाश, नेत्र रोग, शिर में व्यथा और चतुष्पद जीव की हानि होती है।।६६।। मित्रैः सह विरोधश्च स्वल्पमृत्यु, पराजयः । मतिभ्रंशो विवादश्च केतो, केत्वन्तरे रविः ।।६७।। (के.सू.) केतु के अन्तर में सूर्य के प्रत्यंतर में मित्रों से विरोध, अल्पमृत्यु, पराजय, बुद्धि का नाश और विवाद उपस्थित होता है।।६७।। अन्ननाशो यशोहानिर्देहपीडा मतिभ्रमः । आमवातादिवृद्धिश्च केतोः केत्वन्तरे शशी ।।६८।। (के.चं.) केतु के अंतर में चन्द्रमा के प्रत्यंतर में अन्न की हानि, यश की हानि, देह में पीड़ा, बुद्धि में भ्रम और आम-बात की वृद्धि होती है।।६८।। शस्त्रघातेन पातेन पीडितो वह्निपीडया । नीचाद्धीति रिपोः शङ्का केतोः केत्वन्तरं कुजः ।।६९।। (के.मं.) केतु के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में शस्त्रलगने से वा गिरने से पीड़ा, अग्नि
अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५५९ से पीड़ा, नीच से भय और शत्रु भय की शंक' होती है।।६९।। कामिनीभ्यो भयं भूयात्तथा वैरिसमुद्भवः । शूद्रादपि भवेद्भीतिः केतोः केत्वन्तरे तमः ।।७०।। (के.र.) केतु के अंतर में राहु के प्रत्यंतर में स्त्रियों से भय, राजा से तथा शत्रुओं से भय शूद्र से भी भय होता है।।७०।। धनहानिर्महोत्पातो वस्त्रमित्रविनाशनम् । सर्वत्र लभते क्लेशं केतोः केत्वन्तरे गुरुः ।।७१।। (के.बृ.) केतु के अंतर में गुरु के प्रत्यंतर में धन की हानि, महाउत्पात, वस्त्र, मित्र की हानि और सर्वत्र क्लेश होता है।।७१।। गोमहिष्यादिमरणं देहपीडा सुहृद्वधः । स्वल्पालपलाभकरणं केतोः केत्वंतरे शनिः ।।७२।। (के.श.) केतु के अंतर में शनि के प्रत्यंतर में गौ भैंस आदि का मरण, शरीर में पीड़ा, मित्रों का वध और थोड़ा-थोड़ा लाभ होता है।।७२।। बुद्धिनाशो महोद्वेगो विद्याहानिर्महाभयम् । कार्यसिद्धिर्न जायेत केतोः केत्वन्तरे बुधः ।।७३।। (के.बु.) केतु के अन्तर में बुध के प्रत्यंतर में बुद्धि का नाश, बड़ा उद्वेग, विद्या की हानि महाभय और कार्य की सिद्धि में बाधा होती है।।७३।। इति केतु प्रत्यंतर फलम्। अथ शुक्रान्तरेशुक्रादीनां प्रत्यतरफलम्- श्वेताश्ववस्त्रमुक्ताद्याः स्वर्णमाणिक्य संभवः । लभते सुन्दरी नारी शुक्रे शुक्रांतरे भृगुः ।।७४।। (शु.शु.) शुक्र के अन्तर में शुक्र के प्रत्यंतर में सफेद घोड़ा, सफेद वस्त्र, मोती का लाभ सुवर्ण माणिवय के लाभ की संभावना और सुन्दरी स्त्री का लाभ होता है।।७४।। वातज्वरः शिरःपीडा राज्ञः पीडा रिपोरपि । जायते स्वल्पलाभोऽपि शुक्रे शुक्रान्तरे रविः ।।७५।। (शु.सू.) शुक्र के अंतर में सूर्य के प्रत्यंतर में वातज्वर, शिर में पीड़ा, राजा और शत्रु से पीड़ा और अल्प लाभ होता है।।७५।।
५६० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । कन्याजन्म नृपाल्लाभो वस्त्राभरणसंयुतः । राज्याधिकारसंप्राप्ति शुक्रे शुक्रान्तरे शशी ॥७६॥ (शु.चं.) शुक्र के अंतर में चन्द्रमा के प्रत्यंतर में कन्या का जन्म, राजा से वस्त्र-आभूषण का लाभ और राज्याधिकार की प्राप्ति होती है।।७६।। रक्तपित्तादिरोगश्च कलहंताडनं भवेत् । महान्क्लेशोभवेद्र शुक्रे शुक्रान्तरे कुजः ।।७७।। (शु.मं.) शुक्र के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में रक्त-पित्त के रोग, कलह-ताडना, और बड़ा कष्ट होता है।।७७।। कलहो जायते स्त्रीभिरकस्माद्भयसंभवः । राजतः शत्रुत: पीडा शुक्रे शुक्रान्तरेतमः ।।७८।। (शु.रा.) शुक्र के अंतर में राहु के प्रत्यंतर में काक सतत् स्त्री से झगड़ा और भय और राजा तथा शत्रु से पीड़ा होती है।।७८।। महद्द्रव्यं महद्राज्यं वस्त्रमुक्तादिभूषणम् । गजाश्वादिपदप्राप्तिः शुक्रे शुक्रान्तरे गुरुः ।।७९।। (शु.वृ.) शुक्र के अंतर में गुरु के प्रत्यंतर में बड़े द्रव्य, बड़े राज्य, वस्त्र, मुक्ता आदि के. आभूषण, हाथी-घोड़ा पद की प्राप्ति होती है।।७९।। खरोष्ट्रछागसम्प्राप्तिर्लोहमाषतिलादिकम् ।
अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६१ अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । तत्रादौ सूक्ष्मांतरानयनप्रकारः- ग्रहवर्षेण संगुण्यं प्रत्यन्तरघटिकादिकम् । विंशोत्तरशतेनाप्तं सूक्ष्मान्तरदशामितिः ॥१॥ जिस ग्रह के प्रत्यंतर में जिस ग्रह का सूक्ष्मान्तर लाना हो उस ग्रह की दशा वर्ष से प्रत्यन्तर के (घटिकादिपिंडबनाकर) घटिकादि को गुणाकर गुणनफल में १२० का भाग देने से लब्धि घटिका और शेष को ६० से गुणाकर पुनः १२० का भाग देने से फल जो प्राप्त होता है इस प्रकार घटी-पल वा दिन (यदि घटी ६० से अधिक हो तो उसमें साठ से भाग देने से लब्धि दिन होता है) सूक्ष्म अन्तर होता है॥१॥ उदाहरण-जैसे सूर्य के प्रत्यंतर में सूर्यादि ग्रहों का सूक्ष्मान्तर लाना है तो सूर्य का प्रत्यन्तर ५ दिन २४ घटी है। इसका पिड ५×६०+२४ = ३२४ घटी हुआ इसे सूर्य के दशावर्ष ६ से गुणने ३२४×६ = १९४४ हुआ इसमें १२० का भाग देने से लब्धि १६ घटी और शेष २४ को ६० गुणने से २४×६० = १४४० हुआ इसमें १२० का भाग देने से १२ पल हुआ अर्थात् सूर्य के प्रत्यंतर घटी पिंड को चन्द्रमा के दशा वर्ष १० से गुणनकर १२० का भाग देने से २७ घटी सूर्य के प्रत्यंतर में चंद्रमा का सूक्ष्मान्तर हुआ। इसी प्रकार सभी ग्रहों का सूक्ष्मांतर लाना चाहिये। अथसूर्यप्रत्यंतरे सूर्यादीनांसूक्ष्मन्तरदशाफलम्- नृणां भूमिपरित्यागो नियतं प्राणनाशनम् । स्थाननाशो महाहानिः सूर्यसूक्ष्मदशाफलम् ॥२॥ (सू.सू.) सूर्य के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मांतर में मनुष्य को भूमि का त्याग करना पड़ता है, प्राण नाश की आशंका और स्थान का नाश होता है॥२॥ देवब्राह्मणभक्तिश्च नित्यकर्मरतस्तथा । सुप्रीतिः सर्वमित्रैश्च रवेः सूक्ष्मगते विधौ ॥३॥ (सू.चं.) सूर्य के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में देवता ब्राह्मण में भक्ति, नित्यकर्म में आसक्ति और सभी मित्रों से सुन्दर प्रेम होता है॥३॥ क्रूरकर्मरतिस्तिग्मशत्रुभिः परिपीडनम् । रक्तस्त्रावादिरोगश्च रवेः सूक्ष्मगते कुजे ॥४॥ (सू. मं.)
५६२ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सूर्य के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में क्रूरकर्म में आसक्ति, शत्रुओं से पीड़ा और रक्तस्राव के रोग होते हैं ।।४।। चौराग्विविषभीतिश्च रणे भंगः पराजयः । दानधर्मादिहीनश्च रवेः सूक्ष्मगते ह्यगौ ।।५।। (सू.रा.) सूर्य के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मांतर में चोर, अग्नि, विष से भय, संग्राम में विफलता वा पराजय और दान-धर्म से हीन होता है।।५।। नृपसत्कारराजार्हः सेवकैः परिपूजितः । राजचक्षुर्गतः शान्तः सूर्यसूक्ष्मगतेगुरौ ।।६।। (सू.वृ.) सूर्य के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मांतर में राजा के समान सत्कार, नौकरो से पूजित और राजा का कृपापात्र और शांत होता है।।६।। धैर्यसाहसकर्मार्थ देवब्राह्मणपीड़नम् । स्थानच्युतिं मनोदुःखं रवेः सूक्ष्मगतेशनौ ।।७।। (सू.शं.) सूर्य के प्रत्यंतर में शनि के सूक्ष्मांतर में धैर्य और साहस के कार्य के लिये देवता और ब्राह्मण का पीड़न, स्थान की हानि और मन में दुःख होता है।।७।। दिव्याम्बरादिलब्धिश्च दिव्यस्त्रीपरिभोगता । अचिंतितार्थसिद्धिश्च रवेः सूक्ष्ममते बुधे ।।८।। (सू.बु.) सूर्य के प्रत्यंतर में बुध के सूक्ष्मांतर में दिव्य वस्त्र आदि की प्राप्ति, दिव्य स्त्री का योग और अचिंतित कार्य की सिद्धि होती है।।८।। गुरुतार्त्तिविनाशश्च भृत्यदारभवस्तथा । क्वचित्सेवकसम्बन्धो रवेः सूक्ष्मतेध्वजे ।।९।। (सू.के.) सूर्य के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मांतर में गौरव नौकर और स्त्री जनित दुःख का नाश और कभी किसी सेवक से संबंध भी होता है।।९।। पुत्रमित्रकलत्रादिसौख्यसम्पन्न एव च । नानाविद्या च सम्पत्ती रवेः सूक्ष्मगते भृगौ ।।१०।। (सू.शु.) सूर्य के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मांतर में पुत्र, मित्र, स्त्री आदि का सुख सम्पन्न होता है और अनेक प्रकार की सम्पत्ति का लाभ होता है।।१०।। इति रवौ सूक्ष्मांतरफलम्।
अथ सूक्ष्मन्तरदशाध्यायः । ५६३ अथचंद्राप्रत्यंतरेचंद्रादीनांसूक्ष्मांतरफलम्- भूषणं भूमिलाभश्च सन्मानं नृपपूजनम् । तामसत्वं गुरुत्वं च चन्दसूक्ष्मदशाफलम् ॥१९१॥ (चं.चं.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में आभूषण तथा भूमि का लाभ, सन्मान और राजा से पूजन, तामस और गुरुता होता है॥१९१॥ दुःखं शत्रुविरोधश्च कुक्षिरोगः पितुर्मृतिः । वातपित्तकफोद्रेकः शशिसूक्ष्मगते कुजः ॥१९२॥ (चं.मं.) चन्द्रमा के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में दुःख, शत्रु से विरोध, कुक्षीस्थान में रोग, पिता की मृत्यु और वात-पित्त-कफ का रोग होता है॥१९२॥ क्रोधनं मित्रबंधूनां देशत्यागो धनक्षयः । विंदेशात्रिगडप्राप्तिरिन्दुसूक्ष्मगतेत्यहौ ॥१९३॥ (चं.स.) चन्द्रमा के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मान्तर में मित्र तथा बन्धुओं से द्वेष, देश का त्याग, धन का नाश, विदेश में बंधन होता है॥१९३॥ छत्रचामर संयुक्तं वैभवं पुत्रसम्पदः । सर्वत्र सुखमाप्नोति चन्द्रसूक्ष्मगतेगुरौ ॥१९४॥ (चं.रा.) चन्द्रमा के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मान्तर में छत्र-चामर युक्त राज वैभव की प्राप्ति पुत्र का लाभ और सुख होता है॥१९४॥ राजोपद्रवनाशः स्याद्व्यवहारे धनक्षयः । चौरत्वं विप्रभीतिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते शनौ ॥१९५॥ (चं.श.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में शनि के सूक्ष्मान्तर में राजा के उपद्रव से हानि, रोजगार में धन की हानि, चोरी और ब्राह्मण से भय होता है॥१९५॥ राजमानं वस्तुलाभं विदेद्वाहनादिकम् । पुत्रपौत्रसमृद्धिश्च चन्द्र सूक्ष्मगते बुधे ॥१९६॥ (चं.बु.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में बुध के सूक्ष्मान्तर में राजा से प्रतिष्ठा, वस्तु का लाभ, विदेश से वाहनादि का लाभ और पुत्र-पौत्र आदि समृद्धि का लाभ होता है॥१९६॥ आत्मनो वृत्तिहननं सस्यशृंगवृषादिभिः । अग्निसूर्यादिभीतिः स्याच्चन्द्रसूक्ष्मगतेध्वजे ॥१९७॥ (चं.के.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में केतु के सूक्ष्मान्तर में धान्य मृग और बैल आदि से
५६४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अपने वृत्ति का उच्छेद, और अग्नि तथा सूर्य से भय होता है।।१७।। विवाहो, भूमिलाभश्च वस्त्राभरणवैभवम् । राज्यलाभश्च कीर्त्तिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते भृगौ ।।१८।। (चं.शु.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में शुक्र के सूक्ष्मान्तर में विवाह, भूमि का लाभ, वस्त्र, आभूषण आदि वैभव, राज्यलाभ और यश होता है।।१८।। क्लेशात्क्लेशः कार्यनाशः पशुधान्यधनक्षयः । गात्रवैषम्यभूमिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते रवौ ।।१९।। (चं.सू.) चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में क्लेश से क्लेश, कार्य की हानि, पशु, धान्य और पशु का नाश, शरीर तथा भूमि में विषमता होती है।।१९।। इति चन्द्रसूक्ष्मान्तर फलम्। अथ भौम प्रत्यन्तरे भौमादीनां सूक्ष्मान्तर फलम् - भूमिहानिर्मनः खेदोह्यपस्मारी च बंधुयुक् । पुरक्षोभमनस्तापो भौमसूक्ष्मदशाफलम् ।।२०।। (मं.मं.) भौम के प्रत्यन्तर में भौम के सूक्ष्म अंतर में भूमि की हानि, चित्त में खेद, मृगी रोग, बंधु से युक्त, ग्राम से क्षोभ और मन में संताप होता है।।२०।। अङ्गदोषो जनाद्भीतिः प्रमदावंशनाशनम् । वह्निसर्पभयं घोरं भौमसूक्ष्मगतेप्यहौ ।।२१।। (मं.रा.) भौम के प्रत्यन्तर में राहु के सूक्ष्मान्तर में किसी अंग में विकार लोगों से भय, कन्या की हानि, और अग्नि तथा सर्प से बड़ा भय होता है।।२१।। देहपूजारतिश्चात्र मंत्राभ्युत्थानतत्परः । लोकपूज्यं प्रमादं च भौमसूक्ष्मगते गुरौ ।।२२।। (मं.वृ.) भौम के प्रत्यन्तर गुरु के सूक्ष्मान्तर में देह की पूजा, मंत्र साधन में रति, लोक से पूजा और प्रमाद होता है।।२२।। बंधनान्मुच्यते बद्धो धनधान्यपरिच्छदः । भृत्यार्थबहुलः श्रीमान्भौमसूक्ष्मगते शनौ ।।२३।। (मं.श.) भौम के प्रत्यन्तर में शनि के सूक्ष्मान्तर में बंधन से मुक्ति, धन, धान्य, नौकर आदि विशेष होते हैं।।२३।।
अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६५ वाहनं छत्रसंयुक्तं राज्यभोगपरं सुखम् । कासश्वासादिका पीडा भौमसूक्ष्मगते बुधे ।।२४।। (मं.बु.) भौम के प्रत्यन्तर में बुध के सूक्ष्मान्तर में वाहन, छत्र आदि राज्य के सुख का लाभ और सुख तथा कासश्वास से पीड़ा होती है।।२४।। परप्रेरितबुद्धिश्च सर्वत्रापि च गर्हितः । अशुचिः सर्वकार्येषु भौमसूक्ष्मगते ध्वजे ।।२५।। (मं.के.) भौम के प्रत्यन्तर में केतु के सूक्ष्मान्तर में दूसरे की प्रेरणा वाली बुद्धि, सर्वत्र निंदा और सभी कार्यों में असफलता होती है।।२५।। इष्ट स्त्रीभोगसम्पत्तिरिष्टभोजनसंग्रहः । इष्टार्थश्चैव लाभश्च भौमसूक्ष्मगते भृगौ ।।२६।। (मं.शु.) भौम के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मांतर में अभीष्ट स्त्री का सुख, सम्पत्ति अभीष्ट भोजन का लाभ और अभीष्ट की सिद्धि होती है।।२६।। राजद्वेषोद्विजात्क्लेशः कार्याभिप्रायवंचकः । लोकेऽपि निंद्यतामेति भौमसूक्ष्मगते रवौ ।।२७।। (मं.सू.) भौम के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मांतर में राजा से शत्रुता, ब्राह्मण से कष्ट, कार्य के अभिप्राय से रहित और लोक में निंदा होती है।।२७।। शुद्धत्वं धनसंप्राप्तिर्देवब्राह्मणवत्सलः । व्याधिना परिभूयेत भौमसूक्ष्मगतेविधौ ।।२८।। (मं.चं.) भौम के प्रत्यंतर में चंद्रमा के सूक्ष्मांतर में चित्त में शुद्धता, धन का लाभ, देवता ब्राह्मण में प्रेम और व्याधि से पीड़ित होता है।।२८।। इति भौम सूक्ष्मांतरफलम्। अथ राहु प्रत्यन्तरे राह्वादीनांसूक्ष्मांतरफलम्- लोकोपद्रवबुद्धिश्च स्वकार्ये मतिविभ्रमः । शून्यता चित्तदोषः स्याद्राहोः सूक्ष्मदशाफलम् ।।२९।। (रा.रा.) राहु के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मांतर में उपद्रव करने की बुद्धि, बुद्धि में भ्रम, शून्यता होती है।।२९।। दीर्घरोगी दरिद्रश्च सर्वेषां प्रियदर्शनः । दानधर्मरतः शस्तो राहोः सूक्ष्मगते गुरौ ।।३०।। (रा.बृ.)
५६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राहु के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मांतर में दीर्घ रोग, दरिद्रता, सबका दर्शन प्रिय, और दानादि में आसक्त होता है।।३०।। कुमार्गात्कुत्सितोग्रश्च दुष्टश्च परसेवकः । असत्संगमतिमूढो राहोः सूक्ष्मगते शनौ ।।३१।। (रा.श.) राहु के प्रत्यंतर में शनि के सूक्ष्मांतर में कुमार्ग से निंदित, उग्रस्वभाव दुष्ट और दूसरे का सेवक और दुष्टों का संग साथ होता है।।३१।। स्त्रीसंभोगमतिर्वाग्मी लोकसम्भावनावृतः । अन्नमिच्छंस्तनुम्लानी राहोः सूक्ष्मगते बुधे ।।३२।। (रा.बु.) राहु के प्रत्यंतर में बुध के सूक्ष्मांतर में स्त्री प्रसंग की बुद्धि, संसार में विख्यात हमेशा अन्न की चिंता से युक्त होता है।।३२।। माधुर्यं मानहानिश्च बंधनं चाप्रमादकम् । पारुष्यं जीवहानिश्च राहोः सूक्ष्मगते ध्वजे ।।३३।। (रा.के.) राहु के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मांतर में मधुरस्वभाव, मानहानि, बंधन, कठोरता और किसी जीव की हानि होती है।।३३।। बंधनान्मुच्यते बद्धः स्थानमानार्थसंचयः । कारणद्रव्यलाभश्च राहोः सूक्ष्मगते भृगौ ।।३४।। (रा.शु.) राहु के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मांतर में बंधन से मुक्ति, स्थान, यश, धन का लाभ और भाग्योदय होता है।।३४।। व्यक्ताशों गुल्मरोगश्च क्रोधहानिस्तथैव च । वाहनादिसुखं सर्वं राहोः सूक्ष्मगते रवौ ।।३५।। (रा.सू.) राहु के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मांतर में अर्श (बवासीर) गुल्म रोग, क्रोध और वाहनादि के सुख की हानि होती है।।३५।। मणिरत्नधनावाप्तिर्विद्योपासनशीलवान् । देवार्चनपरोभक्त्या राहोः सूक्ष्मगते विधौ ।।३६।। (रा.चं.) राहु के प्रत्यन्तर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में मणि, रत्न, धन की प्राप्ति, विद्या की उपासना और भक्ति से देवता की पूजा होती है।।३६।। निर्जितं जनविद्रावो जने क्रोधश्च बंधनात् । चौर्यशीलरतिः नित्यं राहोः सूक्ष्मगते कुजे ।।३७।। (रा.म.)
अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६७ राहु के प्रत्यन्तर में भौम के सूक्ष्मान्तर में मनुष्यों से विद्रोह, पराजय, जन समुदाय का क्रोध भाजन, बंधन और चौर भय होता है।।३७।। इति राहु सूक्ष्मन्तरफलम्। अथ गुरु प्रत्यन्तरे गुर्वादीनांसूक्ष्मान्तरफलम् - शोकनाशो धनाधिक्यमग्निहोत्रं शिवार्चनम् । वाहनक्षत्रसंयुक्तं जीवसूक्ष्मदशाफलम् ।।३८।। (वृ.वृ.) गुरु के प्रत्यन्तर में गुरु के सूक्ष्मान्तर में शोक का नाश, धन का लाभ, शिव का पूजन, वाहन और क्षेत्र का लाभ होता है।।३८।। व्रतहा सूर्यवर्त्ती च विदेशे वसुनाशनम् । विरोधो धननाशश्च गुरोः सूक्ष्मगते शनौ ।।३९।। (वृ.श.) गुरु के प्रत्यन्तर में शनि के सूक्ष्मान्तर में व्रत का छूट जाना, विदेश में धन का नाश, शत्रुता और धन की हानि होती है।।३९।। विद्यामानयशप्राप्तिः धनागमनमेव च । नित्योत्सवस्तुसंजातः गुरोः सूक्ष्मगते बुधे ।।४०।। (वृ.बु.) गुरु के प्रत्यंतर में बुध के सूक्ष्मान्तर में विद्या, मान और यश का लाभ, धन का आगमन और नित्य उत्सव होता रहता है।।४०।। ज्ञानं विभवपाण्डित्यं शास्त्रश्रोता शिवार्चनम् । अग्निहोत्रं गुरोर्भक्तिर्गुरोः सूक्ष्मगते ध्वजे ।।४१।। (वृ.के.) गुरु के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मान्तर में ज्ञान में वृद्धि, विभव, पांडित्य, शास्त्र का अध्ययन, शिव की पूजा और अग्निहोत्र और गुरु भक्ति होती है।।४१।। रोगान्मुक्तिः सुखं भोगं धनधान्यसमागमम् । पुत्रदारादिकं सौख्यं गुरोः सूक्ष्मगते भृगौ ।।४२।। (वृ.शु.) गुरु के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मान्तर में रोग से मुक्ति, सुख, भोग, धन, धान्य का लाभ और पुत्र स्त्री आदि का सुख होता है।।४२।। वातपित्तप्रकोपश्च श्लेष्मोद्रेकस्तु दारूणः । रसव्याधिकृतं शूलं गुरोः सूक्ष्मगते रवौ ।।४३।। (वृ.सू.) गुरु के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में वायु और पित्त का प्रकोप कफ की अधिकता से कष्ट और रसदोष से शूलरोग होता है।।४३।।
५६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ! छत्रचामरसंयुक्तं वैभवं पुत्रसम्पदः । नेत्रकुक्षिगता पीडा गुरोः सूक्ष्मगते विधौ ।।४४।। (वृ.चं.) गुरु के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में छत्र, चामर से युक्त, वैभव का लाभ, पुत्र सुख, नेत्र और कोख (कुक्षि) में पीड़ा होती है।।४४।। स्त्रीजनाच्चविषोत्पत्तिर्वधनं चातिनिग्रहम् । देशांतरगमो भ्रांतिर्गुरोः सूक्ष्मगते कुजे ।।४५।। (वृ.मं.) गुरु के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में स्त्रियों के द्वारा कलह, बंधन और अत्यंत विग्रह, देशांतर की यात्रा और भ्रान्ति होती है।।४५।। व्याधिभिः परिभूतः स्याच्चौरोपहतं धनम् । सर्पवृश्चिकदंष्ट्रत्वं गुरोः सूक्ष्मगतेऽप्यहौ ।।४६।। (वृ.रा.) गुरु के प्रत्यन्तर में राहु के सूक्ष्मान्तर में व्याधियों से दुःखी, चोरों द्वारा धन का अपहरण और सर्प-बिच्छू के काटने का भय होता है।।४६।। इति गुरु सूक्ष्मांतर फलम् । अथ शनि प्रत्यंतरे शन्यादीनां सूक्ष्मान्तर फलम् - धनहानिर्महाव्याधिः वायुपीडा कुलक्षयः । भिक्षाहारी महादुःखी मंदसूक्ष्मदशाफलम् ।।४७।। (श.श.) शनि प्रत्यंतर में शनिसूक्ष्मान्तर में धन की हानि, महाव्याधि, वायु की पीड़ा, कुल का नाश और भिक्षा का भोजन तथा बड़ा दुःखी होता है।।४७।। वाणिज्यवृत्तेर्लाभश्च विद्याविभवमेव च । स्त्रीलाभश्च महीप्राप्तिः शनेः सूक्ष्मगतेबुधे ।।४८।। (श.बु.) शनि के प्रत्यंतर में बुध के सूक्ष्मान्तर में व्यापार में लाभ, विद्या और वैभव, स्त्री का लाभ और पृथ्वी का लाभ होता है।।४८।। चौरोपद्रवकुष्ठादि वृत्तिक्षयविगुंफनम् । सर्वाङ्गपीडनं व्याधिः शनिसूक्ष्मगते ध्वजे ।।४९।। (श.के.) शनि के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मान्तर में चोरी का भय, कुष्ठरोग, वृत्ति की हानि, कुंठता, सर्वांग में पीड़ा और व्याधि होती है।।४९।।
अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६९ ऐश्वर्यमायुधाभ्यासं पुत्रलाभोभिषेचनम् । आरोग्यं धनकामौ च शनिसूक्ष्मगते भृगौ ॥५०॥ (श.शु.) शनि के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मन्तर में ऐश्वर्य का लाभ, आयुध का अभ्यास, पुत्र का लाभ, अभिषेक, आरोग्यता आदि होता है॥५०॥ राजतेजोविकारत्वं स्वगृहे जायते कलिः । किंचित्पीडा स्वदेहोत्था शनिसूक्ष्मगते रवौ ॥५१॥ (श.सू.) शनि के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में राज कार्य में विकार, अपने घर में कलि, अपने शरीर में कुछ पीड़ा होती है॥५१॥ स्फीतबुद्धिर्महारम्भो मदं तेजो बहुव्ययः । स्त्रीपुत्रैश्च समं सौख्यं शनिसूक्ष्मगते विधौ ॥५२॥ (श.चं.) शनि के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में संगीत का प्रेम, किसी बड़े कार्य का आरम्भ, यज्ञ में कमी, द्रव्य का भय और स्त्री पुत्र का सुख होता है॥५२॥ नेत्रोहानिर्महोद्वेगो वह्निक्षयभ्रमो कलिः । वातपित्तकृतापीडा शनेः सूक्ष्मगते कुजो ॥५३॥ (श.मं.) शनि के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में नेत्र की हानि, उद्वेग, मंदाग्नि, क्षय, भ्रम, झगड़ा और वात पित्त से कष्ट होता है॥५३॥ पितृमातृविनाशश्च मनोदुःखं गुरुव्ययम् । सर्वत्र विफलं स्यात्तु शनिसूक्ष्मगतेप्यहौ ॥५४॥ (श.रा.) शनि के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मान्तर में पिता-माता की हानि, मन में दुःख, अधिक व्यय, और सब जगह विफलता होती है॥५४॥ सन्मुद्राभोगसन्मानं धनधान्यविवर्धनम् । छत्रचामरसम्प्राप्तिः शनेः सूक्ष्मगते गुरौ ॥५५॥ (श.बृ.) शनि के प्रत्यन्तर में गुरु के सूक्ष्मान्तर में द्रव्य का लाभ, धन धान्य की वृद्धि और छत्र चामर का लाभ होता है॥५५॥ इति शनि सूक्ष्मान्तर फलम्। अथ बुध प्रत्यंतरे बुधादीनां सूक्ष्मान्तर फलम् - सौभाग्यंराजसम्मानं धनधान्यादिसम्पदः । सर्वेषां प्रियदर्शी च बुधसूक्ष्मदशाफलम् ॥५६॥ (बु.बु.)
५७० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । बुध के प्रत्यन्तर में बुध के सूक्ष्मांतर में भाग्योदय, राजा से सम्मान की प्राप्ति, धन धान्य का लाभ और सबका प्रिय होता है।।५६।। बालग्रहाग्निभीस्तापः स्त्रीमदोद्भवदोषभाक् । कुमार्गी कुत्सिताशी च बुधसूक्ष्मगतेध्वजे ।।५७।। (बु.के.) बुध के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मांतर में बालग्रह तथा अग्नि से भय, ज्वर, स्त्री के रजोविकार से कष्ट, कुमार्ग में प्रवृत्ति और निंदित आन्नों का भोजन होता है।।५७।। वाहनंधन सम्पत्तिर्जलजान्नार्थसम्भवः । शुभकीर्तिर्महाभोगो बुधसूक्ष्मगते भृगौ ।।५८।। (बु.शु.) बुध के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मान्तर में वाहन, धन, सम्पत्ति और जल से उत्पन्न होने वाले अन्न और द्रव्य का लाभ, यशोवृद्धि और महाभोग प्राप्त होता है।।५८।। ताडनं नृपवैषम्यं बुद्धिस्खलनरोगभाक् । हानिर्जनापवादं च बुधसूक्ष्मगते रवौ ।।५९।। (बु.सू.) बुध के प्रत्यंतर में सूक्ष्मांतर में ताडना, राजा से शत्रुता, मंदबुद्धि होने का रोग, हानि और जनापवाद (कलंक) होता है।।५९।। सुभगः स्थिरबुद्धिश्च राजसन्मानसम्पदः । सुहृदां गुरुसंस्कारो बुधसूक्ष्मगते विधौ ।।६०।। (बु.चं.) बुध के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में सौभाग्य, स्थिर बुद्धि, राजा से सन्मान और संपत्ति का लाभ और मित्रों का समागम होता है।।६०।। अग्निदाहं विषोत्पत्तिर्जडत्वं च दरिद्रता । विभ्रमश्च महोद्वेगो बुधसूक्ष्मगते कुजे ।।६१।। (बु.मं.) बुध के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मांतर में अग्नि से जलने का तथा विष का भय, जड़ता, दरिद्रता, भ्रम और बड़ा उद्वेग होता है।।६१।। अग्निसर्पनृपाद्भीतिः कृच्छ्वादरिपराभवः । भूतावेशभ्रमाद्भ्रांतिर्बुधसूक्ष्मगतेप्यहौ ।।६२।। (बु.रा.) बुध के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मांतर में अग्नि, सर्प और राजा से भय। कष्ट से शत्रु का पराभव, भूत का आवेश और भ्रम से भ्रान्ति होता है।।६२।।
·अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५७१ ग्रहोपकरणं भव्यं त्यांगं भोगादिवैभवम् । राजप्रसादसम्पत्तिर्बुधसूक्ष्मगते भगौ ॥६३॥ (बु.बृ.) बुध के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मांतर में गृह के सुन्दर उपकरणों का लाभ। त्याग भाव वैभव, राजा की प्रसन्नता से सम्पत्ति का लाभ होता है।।६३।। वाणिज्यवृत्तिलाभश्च विद्याविभवमेव च । स्त्रीलाभश्च महाव्याधिबुधसूक्ष्मगते शनौ ॥६४॥ (बु.श.) बुध के प्रत्यंतर में शनि के सूक्ष्मान्तर में व्यापार से लाभ, विद्या और वैभव का लाभ, स्त्री का लाभ और महाव्याधि की संभावना होती है।।६४।। इति बुधसूक्ष्मांतर फलम्। अथ केतोः प्रत्यन्तरे केत्वादीनां सूक्ष्मान्तरफलम् - पुत्रदारादिजं दुःखं गात्रवैषम्यमेव च । दारिद्र्याद्भिक्षुवृत्तिश्च केतोःसूक्ष्मदशाफलम् ॥६५॥ (के.के.) केतु के प्रत्यंतर में केतु के ही सूक्ष्मांतर में पुत्र, स्त्री जन्मादि दुःख, शरीर में विकलता और दरिद्रता से भिक्षुक वृत्ति होती है।।६५।। रोगनाशोऽर्थलाभश्च गुरुविप्रानुवत्सलः । संगमः स्वजनैः सार्धे केतोः सूक्ष्मगते भृगौ ॥६६॥ (के.शु.) केतु के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मांतर में रोग का नाश, धन का लाभ, गुरु और ब्राह्मण से प्रेम और स्वजनों का समागम होता है।।६६।। पुत्रभूमिविनाशश्च विप्रवासः स्वदेशतः । सुहृद्विपत्तिरार्त्तिश्च केतोः सूक्ष्मगते रवौ ॥६७॥ (के.सू.) केतु के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में पुत्र-भूमि की हानि, स्वदेश से प्रवास मित्र की विपत्ति और पीड़ा होती है।।६७।। दासीदाससमृद्धिश्च युद्धे लब्धिर्जयस्तथा । ललिता कीर्त्तिरुत्पन्ना केतोः सूक्ष्मगते विधौ ॥६८॥ (के.चं.) केतु के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में दासी, नौकर और समृद्धि का लाभ, युद्ध में द्रव्यलाभ और विजय और सुन्दर कीर्ति होती है।।६८।।