भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

६६ चाणक्यनीतिदर्पणः

समझदार लोगों का समय सबेरे जुए के प्रसंग (कथा) में, दोपहर को स्त्री प्रसंग (कथा) में और रात को चोर की चर्चा में जाता है। यह तो हुआ शब्दार्थ, पर भावार्थ इसका यह है जो समझदार होते हैं, वे सबेरे यह कथा कहते सुनते हैं कि जिसमें जुए की कथा आती है यानी महाभारत। दोपहर को स्त्री प्रसंग यानी स्त्री से सम्बन्ध रखनेवाली कथा अर्थात् रामायण कि जिसमें आदि से अंत तक सीता की तपस्या झलकती रहती है। रात को चोर के प्रसंग अर्थात् श्रीकृष्णचन्द्र की कथा यानी श्रीमद्भागवत कहते सुनते हैं ॥११॥

स्वहस्तग्रथिता माला स्वहस्ताद् घृष्टचन्दनम् ।
स्वहस्तलिखितस्तोत्रं शक्रस्यापिश्रियं हरेत् ॥१२॥

दोहा—सुमन माल निजकर रचित, स्वलिखित पुस्तक पाठ ।
धन इन्द्रहु नाशै दिये, स्वघसित चन्दन काठ ॥१२॥

अपने हाथ गूँथकर पहनी माला, अपने हाथ से घिस कर लगाया चन्दन और अपने हाथ लिखकर किया हुआ स्तोत्रपाठ इन्द्र की भी श्री को नष्ट कर देता है ॥१२॥

इक्षुदंडास्तिलाः शूद्राः कान्ता कांचनमेदिनी ।
चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्द्धनम् ॥१३॥

दोहा—ऊख शूद्र दधि नायिका, हेम मेदिनी पान ।
तल चन्दन इन नवनको, मर्दनही गुण जान ॥१३॥

ऊख, तिल, शूद्र, सुवर्ण, स्त्री, पृथ्व़ी चन्दन दही और पान, ये वस्तुएँ जितनी ही मर्दन की जाती है, उतनी ही गुण-दायक होती हैं ॥१३॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ६७

दरिद्रता धीरतया विराजते । कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते ॥ कन्दनता चोष्णतया विराजते । कुरूपता शीलतया विराजते ॥१४॥

दोहा—दारिद सोहत धीरते, कुपट सुभगता पाय । लहि कुअन्न उष्णत्व को, शील कुरूप सुहाय ॥१४॥

धैर्य से दरिद्रता की, सफाई से खराब वस्त्र की, गर्मी से कदन्न की, और शील से कुरूपता भी सुन्दर लगती है ॥१४॥

इति चाणक्ये नवमोऽध्यायः ॥९॥

---:०:---

अथ वृद्ध चाणक्यस्योत्तरार्द्धम् ।

धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः । विद्यारत्नेन हीनो यः स हीनः सर्ववस्तुषु ॥१॥

दोहा—हीन नहीं धन हीन है, धन थिर नाहिं प्रवीन । हीन न और बखानिये, विद्याहीन सुदीन ॥१॥

धनहीन मनुष्य हीन नहीं कहा जा सकता वहां वास्तव में धनी है । किन्तु जो मनुष्य विद्यारूपी रत्न से हीन है, वह सभी वस्तुओं से हीन है ॥१॥

६४ | चाणक्यनीतिदर्पणः

दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम् ।
शास्त्रपूतं वदेद्वाक्यं मनःपूतं समाचरेत् ॥२॥

दोहा--दृष्टिशोधि पग धरिय मग, पीजिय जल पटशोधि ।
शास्त्रशोधि बोलिय बचन, करिय काज मन शोधि ॥२॥

आँख से अच्छी तरह देख-भाल कर पैर धरे, कपड़े से छान कर जल पिये, शास्त्रसम्मत बात कहे और मन को हमेशा पवित्र रखे ॥२॥

सुखार्थी चेत्त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी चेत्त्यजेत्सुखम् ।
सुखार्थिनः कुतो विद्या सुखं विद्यार्थिनः कुतः ॥३॥

दोहा--सुख चाहै विद्या तजै, सुख तजि विद्या चाह ।
अर्थिहिं को विद्या कहा, विद्यार्थिहिं सुख काह ॥३॥

जो मनुष्य विषय सुख चाहता हो, वह विद्या के पास न जाय । जो विद्या का इच्छुक हो, वह विषय सुख छोड़े । सुखार्थी को विद्या और विद्यार्थी को सुख कहाँ मिल सकता है ॥३॥

कवयः किं न पश्यन्ति किं न कुर्वन्ति योषितः ।
मद्यपाः किं न जल्पन्ति किं न खादन्ति वायसाः ॥४॥

दोहा--काह न जाने सुकवि जन, करै काह नहिं नारि ।
मद्यप काह न बकि सकै, काग खाहिं केहि वारि ॥४॥

कवि क्या वस्तु नहीं देख पाते ? स्त्रियाँ क्या नहीं कर सकतीं ? शराबी क्या नहीं बक जाते ? और कौवे क्या नहीं खा जाते ॥४॥

रंकं करोति राजानं राजानं रंकमेव च ।
धनिनं निर्धनं चैव निधनं धनिनं विधिः ॥५॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ६९

छं०--बनवै अति रंकन भूमिपती अरु भूमिपतीनहुँ रंक अति ।
धनिकै धनहीन फिरै करती अधनीन धनी विधिकेरि गती ॥
विधाता कङ्गाल को राजा, राजा को कङ्गाल, धनी को निर्धन और निर्धन को धनी बनाता ही रहता है ॥५॥

लुब्धानां याचकः शत्रुर्मूर्खाणां बोधको रिपुः ।
जारस्त्रीणां पतिः शत्रुश्चौराणां चन्द्रमा रिपुः॥६॥

दोहा--याचक रिपु लोभीन के, मूढ़नि जो शिषदान ।
जार तियन निज पति कह्यो, चोरन शशि रिपु जान ॥६॥

लोभी का शत्रु है याचक, मूर्ख का शत्रु है उपदेश देने वाला, कुलटा स्त्री का शत्रु है उसका पति और चोरों का शत्रु चन्द्रमा है ॥६॥

येषां न विद्या न तपो न दानं
न चापि शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मृत्युलोके भुवि भारभूता
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥७॥

दोहा--धर्मशील गुण नाहिं जेहि, नहिं विद्या तप दान ।
मनुज रूप भुवि भार ते, विचरत मृग कर जान ॥७॥

जिस मनुष्य में न विद्या है, न तप है, न शील है और न गुण है ऐसे मनुष्य पृथ्वी के बोझ रूप होकर मनुष्य रूप में पशु सदृश जीवन-यापन करते हैं ॥७॥

अन्तः सारविहीनानामुपदेशो न जायते ।
मलयाचलसंसर्गान्न वेणुश्चन्दनायते ॥८॥

७० चाणक्यनीतिदर्पणः

सोरठा--शून्य हृदय उपदेश, नाहिं लगै कैसो करिय ।
बसै मलय गिरि देश, तऊ बाँस में वास नहिं ॥८॥

जिनकी अन्तरात्मा में कुछ तत्व नहीं होता ऐसे मनुष्यों को किसी का उपदेश कुछ भी असर नहीं करता । मलयाचल के संसर्ग से और वृक्ष चन्दन हो जाते हैं, पर बाँस चन्दन नहीं होता ॥८॥

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥६॥

दोहा--स्वाभाविक नहिं बुद्धि जेहि, ताहि शास्त्र करु काह ।
जो नर नयनविहीन हैं, दर्पण से करु काह ॥९॥

जिसके पास स्वयं बुद्धि नहीं है, उसे क्या शास्त्र सिखा देगा । जिसकी दोनों आँखें फूट गई हों, क्या उसे शीशा दिखा देगा ? ॥९॥

दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले ।
अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत् ॥१०॥

दोहा--दुर्जन को सज्जन करन, भूतल नहीं उपाय ।
हो अपान इन्द्रिय न शुचि, सौ सौं धोयी जाय ॥१०॥

इस पृथ्वीतल में दुर्जन को सज्जन बनाने का कोई यत्न है ही नहीं । अपान प्रदेश को चाहे सैकड़ों बार क्यों न धोया जाय फिर भी वह श्रेष्ठ इन्द्रिय नहीं हो सकता ॥१०॥

आप्तद्वेषाद्भवेन्मृत्युः परद्वेषाद्धनक्षयः ।
राजद्वेषाद्भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः ॥११॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ७१

दोहा--सन्त विरोध से मृत्यु, धन क्षय करि पर द्वेष ।
राजद्वेष से नसत है, कुल क्षय कर द्विज द्वेष ॥११॥
बड़े बूढ़ों से द्वेष करने पर मृत्यु होती है । शत्रु से द्वेष करने पर धन का नाश होता है । राजा से द्वेष करने पर सर्वनाश हो जाता है और ब्राह्मण से द्वेष करने पर कुल का ही क्षय हो जाता है ॥११॥

वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं
द्रुमालयं पक्वफलाम्बुसेवनम् ।
तृणेषु शय्या शतजीर्णवल्कलं
न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम् ॥१२॥

छन्द--गज बाघ सेवित बृत्त घन वन माहि बरु रहिबो करै ।
अरु पक्व फल जल सेवनो तृण सेज बरु लहिबो करै ॥
शतछिद्र वल्कल वस्त्र करिबहु चाल यह गहिबो करै ।
निज बन्धु महँ धनहीनह्वै नहिं जीवनो चहिबो करै ।

बाघ और बड़े-बड़े हाथियों के झुण्ड जिस वन में रहते हों उसमें रहना पड़े, निवास करके पके फल तथा जल पर जीवन-यापन करना पड़ जाय, घास फूस पर सोना पड़े और सकड़ों जगह फटे वल्कल वस्त्र पहनना पड़े तो अच्छा पर अपनी बिरादरी में दरिद्र होकर जीवन बिताना अच्छा नहीं है ॥१२॥

विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या
वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् ।
तस्मात् मूलं यत्नतो रक्षणीयम् ।
छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ॥१३॥

७२ चाणक्यनीतिदर्पणः

छन्द--विप्र वृक्ष हैं मूल सन्ध्या वेद शाखा जानिये । धर्म कर्म हैं पत्र दोऊ मूल को नहिं नाशिये ॥ जो नष्ट मूल है जाय तो कुछ शाख पात न फूटिये । यही नीति सुनीति है की मूल रक्षा कीजिये ॥१३॥

ब्राह्मण वृक्ष के समान है, उसकी जड़ है सन्ध्या, वेद हैं शाखा और कर्म पत्ते हैं। इसलिए मूल ( सन्ध्या ) की यत्न पूर्वक रक्षा करो। क्योंकि जब जड़ ही कट जायगी तो न शाखा रहेगी और न पत्र ही रहेगा ॥१३॥

माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः । बान्धवा विष्णु भक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१४॥

दोहा--लक्ष्मी देवी मातु हैं, पिता विष्णु सर्वेश । कृष्णभक्त बन्धू सभी, तीन भुवन निज देश ॥१४॥

भक्त मनुष्यकी माता हैं लक्ष्मीजी, विष्णु भगवान् पिता हैं, विष्णुके भक्त भाई बन्धु हैं और तीनों भुवन उसका देश है ॥१४॥

एकवृक्षे समारूढ़ा नानावर्णा विहंगमाः । प्रभाते दिक्षु दशसु का तत्र परिवेदना ? ॥१५॥

दोहा--बहु विधि पक्षी एक तरु, जो बैठें निशि आय । भोर दशो दिशि उड़ि चलें, कह कोही पछिताय ॥१५॥

विविध वर्ण ( रंग ) के पक्षी एक ही वृक्ष पर रात भर बसेरा करते हैं और सबेरे दशों दिशाओं में उड़ जाते हैं। यही दशा मनुष्यों की भी है, फिर इसके लिये सन्ताप करने की क्या जरूरत ? ॥१५॥

बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।

चाणक्यनीतिदर्पणः ७३

वने हस्ती मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥१६॥

दोहा—बुद्धि जासु है सो बली, निबुद्धिहि बल नाहिं । अति बल हाथिहिं स्यार लघु, चतुर हतेसि बन माहिं ॥१६॥

जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है, जिसके बुद्धि ही नहीं उसके बल कहाँ से होगा । एक जंगल में एक बुद्धिमान् खरगोश ने एक मतवाले हाथी को मार डाला था ॥१६॥

का चिन्ता मम जीवने यदि हरिविश्वम्भरो गीयते । नो चेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निःसरेत् ॥ इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलम् । त्वत्पादाम्बुजसेवनेन सततं कालो मया नीयते ॥१७॥

छन्द—है नाम हरिको पालक मन जीवन शंका क्यों करनी । नहिं तो बालकजीवन को थन से पय निसरत क्यों जननी ॥ यही जानकर बार है यदुपति लक्ष्मीपति तेरे । चरण कमल के सेवन से दिन बीते जायँ सदा मेरे ॥१७॥

यदि भगवान् विश्वंभर कहलाते हैं तो हमें अपने जीवन सम्बन्धी झंझटों (अन्न-वस्त्र आदि) की क्या चिन्ता ? यदि वे विश्वम्भर न होते तो जन्म के पहले ही बच्चे को पीने के लिए माता के स्तन में दूध कैसे उतर आता । बार-बार इसी बात को सोचकर हे यदुपते ! हे लक्ष्मीपते ! मैं केवल आप के चरण-कमलों की सेवा करके अपना समय बिताता हूं ॥१७॥

गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुद्धि— स्तथापि भाषान्तरलोलुपोऽहम् ।

७४ चाणक्यनीतिदर्पणः

यथा सुधायाममरेषु सत्यां स्वर्गाङ्गनानामधरासवे रुचिः ॥१८॥

सो०—देववानि बस बुद्धि, तऊ और भाषा चहौं। यदपि सुधा सुर देश, तहँ अवस सुर अधर रस ॥१८॥

यद्यपि मैं देववाणी में विशेष योग्यता रखता हूँ, फिर भी भाषान्तर का लोभ है ही। जैसे स्वर्ग में अमृत जैसी उत्तम वस्तु विद्यमान है फिर भी देवताओं को देवांगनाओं के अधरामृत पान करने की रुचि रहती ही है ॥१८॥

अन्नाद्दशगुणं पिष्टं पिष्टाद्दशगुणं पयः। पयसोऽष्टगुणं मांसं मांसाद्दशगुणं घृतम् ॥१९॥

दोहा—चूर्ण दश गुणो अन्न ते, ता दश गुण पय जान। पय से अठगुण मांस ते, तेहि दशगुण घृत मान ॥१९॥

खड़े अन्न की अपेक्षा दसगुना बल रहता है पिसान में। पिसान से दसगुना बल रहता है दूध में। दूध से अठगुना बल रहता है मांस में और मांस से भी दसगुना बल है घी में ॥१९॥

शाकेन रोगा वर्द्धन्ते पयसो वर्द्धते तनुः। घृतेन वर्द्धते वीर्यं मांसान्मासं प्रवर्द्धते ॥२०॥

दोहा—रोग बढ़त है शाकते, पय से बढ़त शरीर। घृत खाये वीरज बढ़े, मांस मांस गम्भीर ॥२०॥

शाक से रोग, दूध से शरीर, घी से वीर्य और मांस से मांस की वृद्धि होती है ॥२०॥

इति चाणक्ये दशमोऽध्यायः ॥१०॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ७५

अथ एकादशोऽध्यायः ॥११॥

दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता ।
अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वारः सहजा गुणाः ॥१॥

दोहा–दानशक्ति प्रिय बोलिबो, धीरज उचित विचार ।
ये गुण सीखे ना मिलैं, स्वाभाविक हैं चार ॥१॥

दानशक्ति, मीठी बात करना, धैर्य धारण करना, समय पर उचित अनुचित का निर्णय करना, ये चार गुण स्वाभाविक सिद्ध हैं । सीखने से नहीं आते ॥१॥

आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत् ।
स्वयमेव लयं याति यथा राज्यमधर्मतः ॥२॥

दोहा–वर्ग आपनो छोड़ि के, गहे वर्ग जो आन ।
सो आपुइ नशि जात है, राज अधर्म समान ॥२॥

जो मनुष्य अपना वग छोड़कर पराये वर्ग में जाकर मिल जाता है तो वह अपने आप नष्ट हो जाता है । जैसे अधर्म से राजा लोग चौपट हो जाते हैं ॥२॥

हस्ती स्थूलतनुः स चांकुशवशःकिं हस्तिमात्रांकुशः।
दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः कि दीपमात्रं तमः ॥
वज्रेणापि हताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रन्नगाः ।
तेजो यस्य विराजते स बलवान्स्थूलेषु कः प्रत्ययः ।३।

सवैया–आरि करी रह अंकुश के वश का वह अंकुश भारी करीसों ।
त्यौं तम पुंजहिं नाशत दीपसो दीपकहू अँधियार सरीसों ॥

७६ चाणक्यनीतिदर्पणः

वज्र के मारे गिरे गिरिहूँ कहूँ होय भला वह वज्र गिरीसों।
तेज है जासु सोई बलवान कहा विसवास शरीर बड़ोसों ॥३॥
हाथी मोटा-ताजा होता है, किन्तु अंकुश के वश में रहता है तो क्या अंकुश हाथी के बराबर है ? दीपक के जल जानेपर अन्धकार दूर हो जाता है तो क्या अन्धकार के बराबर दीपक है ? इन्द्र के वज्रप्रहार से पहाड़ गिर जाते हैं तो क्या वज्र उन पर्वतों के बराबर है ? इसका मतलब यह निकला कि जिसमें तेज है, वही बलवान् है यों मोटा-ताजा होने से कुछ नहीं होता ॥३॥

कलौ दश सहस्राणि हरिस्त्यजति मेदिनीम् ।
तदर्द्धं जाह्नवीतोयं तदर्द्धं ग्रामदेवताः ॥४॥
दोहा—दस हजार बीते बरस, कलि में तजि हरि देहि ।
तासु अर्द्ध सुर नदी जल, ग्रामदेव अधि तेहिं ॥४॥
कलि के दस हजार वर्ष बीतने पर विष्णु भगवान् पृथ्वी छोड़ देते हैं। पाँच हजार वर्ष बाद गंगा का जल पृथ्वी को छोड़ देता है और उसके आधे यानी ढाई हजार वर्ष में ग्राम-देवता ग्राम छोड़कर चलते हैं ॥४॥

गृहासक्तस्य नो विद्या न दया मांस भोजिनः ।
द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता ॥५॥
दोहा—विद्या गृह आसक्त को, दया मांस जे खाहिं ।
लोभहिं होत न सत्यता, जारहिं शुचिता नाहिं ॥५॥
गृहस्थी के जंजाल में फँसे व्यक्ति को विद्या नहीं आती, मांसभोजी के हृदय में दया नहीं आती, लोभी के पास सच्चाई नहीं आती और कामी पुरुष के पास पवित्रता नहीं आती ॥५॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ७७

न दुर्जनःसाधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिद्यमाणः । आमूलसिक्तःपयसाघृतेन न निम्बवृक्षोमंधुरत्वमेति ।६।

दोहा—साधु दशा को नहिं गहै, दुर्जन बहु सिखलाय । दूध घीव से सींचिये, नाम न तदपि मिठाय ॥६॥

दुर्जन व्यक्ति को चाहे कितना भी उपदेश क्यों न दिया जाय वह अच्छी दशा को नहीं पहुँच सकता । नीम के वृक्ष को चाहे जड़ से लेकर सिर तक घी और दूध से ही क्यों न सींचा जाय फिर भी उसमें मीठापन नहीं आ सकता ॥६॥

अन्तर्गतमलो दुष्टः तीर्थस्नानशतैरपि । न शुद्ध्यति तथा भाण्डं सुरदा दाहितं च यत् ॥७॥

दोहा—मन मलीन खल तीर्थ ये, यदि सौ बार नहाहि । होयँ शुद्ध नहिं जिमि सुरा, बासन दीनेहु दाहि ॥७॥

जिसके हृदय में पाप घर कर चुका है, वह सैकड़ों बार तीर्थ-स्नान करके भी शुद्ध नहीं हो सकता । जैसे कि मदिरा का पात्र अग्नि में झुलसने पर भी पवित्र नहीं होता ॥७॥

न वेत्ति यो यस्य गुण प्रकर्षं स तं सदा निन्दन्ति नाऽत्र चित्रम् । यथा किराती करिकुम्भलब्धां मुक्तां परित्यज्य बिभर्ति गुञ्जाम् ॥८॥

चा० छं०—जो न जानु उत्तमत्व जाहिके गुण गान की । निन्दतो सो ताहि तो अचर्ज कौन खान की ॥ ज्यों किराति हाथि माथ मोतियाँ विहाय कै । घूँघची पहीनतीं विभूषणै बनाय कै ॥८॥

७८ | चाणक्यनीतिदर्पणः

जो जिसके गुणों को नहीं जानता, वह उसकी निन्दा करता रहता है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। देखो न, जंगल की रहनेवाली भिलनी हाथी के मस्तक की मुक्ता को छोड़कर घुँघची ही पहनती है ॥८॥

ये तु संवत्सरं पूर्णं नित्यं मौनेन भुंजते ।
युगकोटि सहस्रन्तु स्वर्गलोके महीयते ॥६॥

दोहा—जो पूरे इक बरस अर, मौन धरे नित खात ।
युग कोटिन कै सहस तरु, स्वर्ग माहिं पूजि जात ॥९॥

जो लोग केवल एक वर्ष तक, मौन रहकर भोजन करते हैं वे दश हजार वर्ष तक स्वर्गवासियों से सम्मानित होकर स्वर्ग में निवास करते हैं ॥९॥

कामं क्रोधं तथा लोभं स्वादुशृंगारकौतुकम् ।
अतिनिद्राऽतिसेवा च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत् ॥१०॥

सोरठा—काम क्रोध अरु स्वाद, लोभ शृङ्गारहिं कौतुकहिं ।
अति सेवन निद्राहि, विद्यार्थी आठौ तजे ॥१०॥

काम, क्रोध, लोभ, स्वाद, शृङ्गार, खेल-तमाशे, अधिक नींद और किसी की अधिक सेवा, विद्यार्थी इन आठ कर्मों को त्याग दे। क्योंकि ये आठ विद्याध्ययन में बाधक हैं ॥१०॥

अकृष्टफलमूलानि वनवासरतः सदा ।
कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते ॥११॥

दोहा—बिनु जोते महि मूल फल, खाय रहे बन माहिं ।
श्राद्ध करै जो प्रति दिवस, कहिय विप्र ऋषि ताहि ॥११॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ७९

जो ब्राह्मण बिना जोते फल पर जीवन बिताता, हमेशा वन में रहना पसन्द करता और प्रति दिन श्राद्ध करता है, उस विप्र को ऋषि कहना चाहिए ॥११॥

एकाहारेण सन्तुष्टः षट्कर्मनिरतः सदा ।
ऋतुकालेऽभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते ॥१२॥

सोरठा—एकै बार अहार, तुष्ट सदा षटकर्मरत ।
ऋतु में प्रिया विहार, करै बनै सो द्विज कहै ॥१२॥

जो ब्राह्मण केवल एक बार के भोजन से सन्तुष्ट रहता और यज्ञ, अध्ययन दानादि षट्कर्मों में सदा लीन रहता और केवल ऋतु-काल में स्त्रीगमन करता है, उसे द्विज कहना चाहिए ॥१२॥

लौकिके कर्मणि रतः पशूनां परिपालकः ।
वाणिज्यकृषिकर्ता यः स विप्रो वैश्य उच्यते ॥१३॥

सोरठा—निरत लोक के कर्म, पशु पालै बानिज करै ।
खेती में मन कर्म, करै विप्र सो वैश्य है ॥१३॥

जो ब्राह्मण सांसारिक धन्धों में लगा रहता है पशु पालन करता, वाणिज्य व्यवसाय करता या खेती ही करता है, वह विप्र वैश्य कहलाता है ॥१३॥

लाक्षादितैलनीलानां कौसुम्भमधुसर्पिषाम् ।
विक्रेता मद्यमांसानां स विप्रः शूद्र उच्यते ॥१४॥

सोरठा—लाख आदि मदमांसु, घीव कुसुम अरु नील मधु ।
तेल बेचियत तासु, शूद्र जानिये विप्र यदि ॥१४॥

जो लाख, तेल, नील कुसुम, शहद, घी, मदिरा और मांस बेचता है, उस ब्राह्मण को शूद्र-ब्राह्मण कहते हैं ॥१४॥

८० चाणक्यनीतिदर्पणः

परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थधकः ।
छली द्वेषी मृदुक्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते ॥१५॥
सोरठा—दंभी स्वार्थ सूर, पर कारज घालै छली ।
द्वेषी कोमल क्रूर, विप्र बिल्लार कहाव ॥१५॥
जो औरों का काम बिगाड़ता, पाखण्डपरायण रहता, अपना मतलब साधने में तत्पर रहता, छल, आदि कर्म करता ऊपर से मीठा, किन्तु हृदय से क्रूर रहता ऐसे ब्राह्मण को मार्जार विप्र कहते हैं ॥१५॥

वापीकूपतड़ागानामारामसुरवेश्मनाम् ।
उच्छेदने निराशंकः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते ॥१६॥
सोरठा—कूप बावली बाग, औ तड़ाग सुरमन्दिरहिं ।
नाशै जो भय त्यागि, म्लेच्छ विप्र कहाव सो ॥१६॥
जो बावली, कुआँ, तालाब, बगीचा और देवमन्दिरों के नष्ट करने में नहीं हिचकता, ऐसे ब्राह्मण को ब्राह्मण न कहकर म्लेच्छ कहा जाता है ॥१६॥

देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराभिमर्षणम् ।
निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते ॥१७॥
सोरठा—परनारी रत जोय, जो गुरु सुर धन को हरै ।
द्विज चाण्डाल सो होय, सबमें करु निर्वाह जो ॥१७॥
जो देवद्रव्य और गुरुद्रव्य अपहरण करता, परायी स्त्री के साथ दुराचार करता और लोगों की वृत्ति पर ही जो अपना निर्वाह करता है, ऐसे ब्राह्मण को चाण्डाल कहा जाता है ॥१७॥

६ चाणक्यनीतिदर्पणः ८१

देयं भोज्यधनं सुकृतिभिर्नो संचयस्तस्य वै श्रीकर्णस्य बलेश्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्त्तिः स्थिता । अस्माकं मधुदानभोगरहितं नष्टं चिरात्सञ्चितं निर्वाणादिति नष्टपादयुगलं घर्षन्त्यहो मक्षिकाः ॥१८॥

सवैया—मतिमानको चाहिये वे धन भोज्य सुसंचहिं नाहिं दियोई करें ते बलि विक्रम कर्णहू कीरति, आजुलों लोग कहोई करें ॥ चिरसंचि मधु हम लोगन को बिनु भोग दिये नसिबोई करें । यह जानि गये मधुनास दोऊ मधुमखियाँ पाँव घिसोई करें ।

आत्म-कल्याण की भावनावालों को चाहिये कि अपनी साधारण आवश्यकता से अधिक बचा हुआ अन्न वस्त्र या धन दान कर दिया करें, जोड़ें नहीं। दान ही की बदौलत कर्ण बलि और महाराज विक्रमादित्य की कीर्ति आज भी विद्यमान है। मधुमक्खियों को देखिये वे यही सोचती हुई अपने पैर रगड़तीं हैं कि "हाय ! मैंने दान और भोग से रहित मधु को बहुत दिनों में इकट्ठा किया और वह क्षण में दूसरा ले गया"॥१८॥

इति चाणक्ये एकादशोऽध्यायः ॥११॥


अथ द्वादशोऽध्यायः ।

सानन्दं सदनं सुतास्तु सुधियः कान्ता प्रियालापिनी इच्छापूर्तिधनं स्वयोषितिरतिः स्वाज्ञापराः सेवकाः

८२ चाणक्यनीतिदर्पणः

आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्ठान्नपानं गृहे साधोः सङ्गमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः॥१॥

स० सानन्दमंदिर पंडित पुत्र सुबोल रहै तिरिया पुनि प्राणपियारी। इच्छित सम्पति और स्वतीय रति रहै सेवक भौंह निहारी॥ आतिथ औ शिवपूजन रोज रहे घर संच सुअन्न औ वारी। साधुन संग उपासात है नित धन्य अहै गृह आश्रम धारी॥१॥

आनन्द से रहने लायक घर हो, पुत्र बुद्धिमान् हो, स्त्री मधुरभाषिणी हो, मानमाना धन हो, अपनी स्त्री पर प्रेम हो, सेवक आज्ञाकारी हो, घर आये हुए अतिथियों का सत्कार हो, प्रति दिन शिवजी का पूजन होता रहे और सज्जनों का साथ हो तो फिर वह गृहस्थाश्रम धन्य है॥१॥

आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्चे- च्छ्रद्धेण या स्वल्पमुपैति दानम्। अनन्तपारं समुपैति दानम्। यद्दीयते तन्न लभेद् द्विजेभ्यः॥२॥

दोहा—दिया दयायुत साधुसो, आरत विप्रहिं जौन। थोड़ी मिलै अनन्त ह्वै, द्विज से मिलै न तौन॥२॥

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक और दयाभाव से दीन-दुखियों तथा ब्राह्मणों को थोड़ा भी दान दे देता है तो वह उसे अनन्तगुणा होकर उन दीन ब्राह्मणों से नहीं बल्कि ईश्वर के दरबार से मिलता है॥२॥

चाणक्यनीतिदर्पण। ८३

दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जने प्रीतिःसाधुजने स्मयः खलजने विद्वज्जने चार्जवम् । शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता इत्थं ये पुरुषा कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः ॥३॥

कविता–दक्षता स्वजनबीच दया परजन बीच शठता सदा ही रहे बीच दुरजन के । प्रीति साधुजन में खलन माहिं अभिमान सरल स्वभाव रहे बीच पण्डितन के। शत्रुन में शूरता सयानन में क्षमा पूर धुरताई राखे फेरि बीच नारिजन के। ऐसे सब कला में कुशल रहैं जेते लोग लोक थिति रहि रहे बीच तिनहिन के ॥३॥

जो मनुष्य अपने परिवार में उदारता, दुर्जनों के साथ शठता, सज्जनों से प्रेम, दुष्टों में अभिमान, विद्वानों में कोमलता, शत्रुओं में वीरता, गुरुजनों में क्षमा, और स्त्रियों में धूर्तता का व्यवहार करते हैं । ऐसे ही कलाकुशल मनुष्य संसार में आनंद के साथ रह सकते हैं ॥३॥

हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणौ नेत्रे साधुवलोकनेन रहिते पादौ न तीर्थं गतौ ॥ अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुङ्गं शिरो । रे रे जम्बुक मुञ्चमुञ्च सहसा नीचं सुनिन्द्यं वपुः ॥४॥

छ०–यह पाणि दान विहीन कान पुराण वेद सुने नहीं । अरु आँखि साधुन दर्शहीन न पाँव तीरथ में कहीं ॥

७४ चाणक्यनीतिदर्पणः

अन्याय वित्त भरो सुपेट उठयो शिरो अभिमानहीं । वपु नीच निंदित छोड़ु छोड़ अरे सियार सो वेगहीं ॥ १ ॥

जिसके दोनों हाथ दान विहीन हैं, दोनों कान विद्याश्रवण से परांगमुख हैं, नेत्र सज्जनों का दर्शन नहीं करते और पैर तीर्थों का पर्यटन नहीं करते । जो अन्याय से अर्जित धन से पेट पालते हैं और गर्व से सिर ऊँचा करके चलते हैं, ऐसे मनुष्यों का रूप धारण किये हुए ऐ सियार ! तू झटपट अपने इस नीच और निन्दनीय शरीर को छोड़ दे ॥ ४ ॥

येषां श्रीमद्यशोदा सुतपदकमले नास्ति भक्तिर्नराणां येषामाभीरकन्याप्रियगुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा । येषां श्रीकृष्णलीलाललितरसकथा सादरोनैव कर्णौ धिक्तांधिक्तांधिगेतां कथयतिसततं कीर्तनस्थोमृदङ्गः

छं०-जो नर यसुमतिसुत चरणन में भक्ति हृदय से कीन नहीं । जो राधाप्रिय कृष्ण चन्द्र के गुण जिह्वा नाहिं कहीं ॥ जिनके दोउ कानन माहिं कथारस कृष्ण को पीय नहीं । कीर्तन माहिं मृदंग इन्हें धिक् २एहि म् ति कहेहि कहीं ।५।

कीर्तन के समय बजता हुआ मृदंग कहता है कि जिन मनुष्यों को श्रीकृष्णचन्द्रजी के चरण कमलों में भक्ति नहीं है श्रीराधारानी के प्रिय गुणों के कहने में जिसकी रसना अनुरक्त नहीं और श्रीकृष्ण भगवान् की लीलाओं को सुनने के लिए जिसके कान उत्सुक नहीं हैं । ऐसे लोगों को धिक्कार है, धिक्कार है ॥ ५ ॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ८५

पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किं नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्। वर्षा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम् । यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः

छं०-पात न होय करीरन में यदि दोष बसन्तहि कौन तहाँ है। त्यौं जब देखि सकै न उलूक दिये तहँ सूरज दोष कहाँ है। चातक आनन बूँदपरै नहिं मेघन दूषण कौन यहाँ है॥ जो कछु पूरब माथ लिखा विधि मेटनको समरथ कहाँ है॥

यदि करीर के पेड़ में पत्ते नहीं लगते तो बसन्त ऋतु का क्या दोष ? उल्लू दिन को नहीं देखता तो इसमें सूर्य का क्या दोष ? बरसात की बूँदें चातक के मुख में नहीं गिरतीं तो इसमें मेघ का क्या दोष ? विधाता ने पहले ही ललाट में जो लिख दिया है, उसे कौन मिटा सकता है ॥ ६ ॥

सत्सङ्गाद् भवति हि साधुता खलानाम् । साधूनां न हि खलसंगतेः खलत्वम् ॥ आमोदं कुसुमभवं मृदेव धत्ते मृद्गन्धं नहि कुसुमानि धारयन्ति ॥७॥

व० ति०-सतसंगसों खलन साधु स्वभाव लेव । साधू न दुष्टपन संग परेहु लेव ॥