चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
१८ २२२ ( रौङ्गस १०३५ ) जवाब दादने लोरक चाँदा रा ( लोरकस चाँदाको उत्तर ) जिहँ दिन चाँद देखो फङ्गा । तिह दिन देखि तोर रंग चढ़ा ॥१ (बिसरा लोग कुटुँब घर बारा) । बिसरा अरथ दरब मोबारा ॥२ सुख तँबोल सिर तेल बिसारा । बिसरा परिमल फूल कँ हारा ॥३ अन न रूख निसि नीद बिसारी । बिसरी सेज सफ़ल फुलवारी ॥४ बुध बिसरी रंग भयलैं समाइ । ताकहँ न रंग गड़े माराइ ॥५ नेह तोरें रग पुरावा, हिरईं लागेउँ आइ ।६ कूहष सरग भइ धरती, जे सर बाइ तो बाइ ॥७ मूलपाठ—(२) बिसरा लोग कुटुँब घर बार निथारा । २२३ ( रौङ्गस १०३७ ) गुफ़्तन चाँदा हिकायते इश्के खुद बर लोरक रा ( चाँदाका लोरकस अपने प्रेमकी बात कहना ) जिहि दिन सारक रन मिति आयहु । पैठि नगर धाइ दिखरायहु ॥१ तिह दिन हुत मैं अन न करायी । परी न नीदु सेज न सुहाई ॥२ पेट पैसि जिठ लीन्हा फाड़ी । बिनु सीठ नारि बीउ बर ठाड़ी ॥३ मैं तुम्ह लाग बेठनार कराइ । अंतस फरी पिवहिं हँकराइ ॥४ महु तुम्ह एक टक देखैं पायेउँ । देख रूप मुख नैन सराहेउँ ॥५ तिहि दिन हुत हौं भूखेउँ, मोर जीउ तुम्हकौं भानु ।६ चिर बिथा पिरम तुम्हारा, तोर धुनि करियहि फाडु ॥७
२०१ २२४ ( रोसिएड्स १०३ ब ) बैसियत दर पन्वह व आगे शब गुजरानीदन ( हँसी मजारमें रात बिताना ) अमरित पचन चाँठ अनुसारा । हँसा लोर भा घोल अपारा ॥१ हँसि कै लार धीर कर गहा । मोतिह हार टूटि कै रहा ॥२ चौं कहा जिन एफ मँभारहु । हार त्रुटि गा मोतिह सँभारहु ॥३ पीनि मोति भय चीर उठावहु । तों चढ़ि मेज पिरम रस रानहु ॥४ मोति उठावत रैन बिहानी । उठा सुर पै साध न मानी ॥५ बीर टरान भार भा, मन कै चेख गँवाउ ।६ मेज इठ लै धौंदै, सूरज दिवस लुफाउ ॥७ टिप्पणी—(७) इठ—नाचे । ( सम्भव है यहाँ कुछ और कड़वक रहे हो ) २२५ ( रोसिएड्स १०५ ) मुबामबत कर्दने तरफ बा चॉदा ( लोरक-चाँदाका प्रणय ) गिन एक हाय पाय सँग आये । पुन रे भिर दुहुँ हींउर लाये ॥१ यदि सुहाग दइ दूसर घर । सूझे ऊठि जनु सोंगे भिर ॥२ अधर अधर कर कर गह । नाभी नाँद भा बान रह ॥३ जाँग आर तन पैं नै राय । अनु गप मयन परकहुँ आय ॥४ काम सुतृति रस पहि जिमि आई । पुनरुइ बहुत अपरप न भय ॥५ चाँद धरटि सूरज आधा, रैन समासी हाइ ।६ पाँचभूत आत्मा मिलन, अस पिरमा मद फाह ॥७ १४
२१ २२६ ( रीफ्रेंस १०६ ) बस्ते सुबह गाना कर्ने चाँदा लोरक बा बेर एकत ( प्राताकाल चाँदका लोरकको सीसराने भींचे उठाना ) केलि करत सब रैन बिहानी । देख घर धनि उठी डरानी ॥१ जाँलहि चेरी उठै न पावा । साँलहि चाँदै सुरुज लुकावा ॥२ मन सँउ आपुन नाहीं लोरा । मत कुछ होइ सुल टर तोरा ॥३ मत कोइ चेरी देख पावा । जाइ महर पहँ बात जनावा ॥४ जो कोइ तिहको देख आई । हाँ पुन मरों तोहु बिख खाई ॥५ पिरम खेलैँ सो कर साहस, सो तरि लागे पार ।६ माँझ समुद होइ थाके, तीर लाउ करतार ॥७ २२७ ( रीफ्रेंस १०० ) आब आवदने कनीज़गान व रूये चाँदा शुस्तन व आमदने सहैलियान ( दासियोंका पानी लाकर चाँदका मुँह धुलाना ; सहेलियोंका आना ) भोर चेरि पानी लै आयीं । मुख धोवा और सखी बुलायीं ॥१ फेंफर मुख निसि चाँद न सोभा । चीर फाट कहुवाँ सइ गाभा ॥२ फिरी माँग केस उधियानी । फूल झरि मरि रही कुम्लानी ॥३ सखिहँ देखि दो बातें अइसे । तोर चाँद कर आँगी कैसे ॥४ भये अनन्द लोयन रतनारी । रंग रस तंबोल पियारी ॥५ चोली चीर सँवारहु, सीस सिन्दूरहु माँग ।६ भँवर फूल पर बैठो, लाग दीख तिइ ऑँग ॥७ २२८ ( रीफ्रेंस १०८ ) बज़म दादन चाँदा मर सहैलियान अज़ बहाना ( चाँदका सहेलियोंसे बहाना करना ) चाँद सहलिन सा अस कहा । एकउ चेरि न जागत रहा ॥१
२११ रैन चौखण्डी चढ़िइ बिरारी । लै ऊँदर घुस गा बिलारी ॥२ ऊपर परी सोह मैं जागा । नखथन लाग चीर फुनि भागा ॥३ तोइ हुसें मोर नींद उड़ानी । इत फुनि जागत रैन बिहानी ॥४ हाथ पाँव में सर न सँभारा । फिरी माँग सीस औ पारा ॥५ तिह गुन नैन रात मोर, मुख फेंकर कुँबलान ।६ आइस रात मैंइ दमर, मंदिर न फोरु सान ॥७ टिप्पणी—(२) बिरारी—बिलारी बिल्ली। ऊँदर—(सं उन्दुर)—चूहा। बिलारी— बिछौना। (३) सम—खान । २२९ ( रीडंग्स १०९ ) रफ़्तने बिरस्पत बर महरि ब कैफियते गिरिया उफ्तादन साज नमूदून ( बिरस्पतका महरिको चाँदके डर जानेकी सूचना देना ) जाइ बिरस्पत महरि जुहारी । कइ जुहारि फुनि पात उमारी ॥१ रैन डरानी चाँद डुलारी । बिसथै ऊपर परी मँझारी ॥२ चीर फाट मुख गा कुँभलाइ । चाँद चितहि मैंह बहुत लजाई ॥३ जेगें सोइ भा अँधियारा । जागत चाँद भयउ भिनसारा ॥४ अन न रूच औ माठ न पानी । फूल घाम वस चाँद सुखानी ॥५ चला महरि कुछ देखउ, औ कुछ धरहु उत्तारि ।६ सोवत बैस झरँकी, अस भई चाँदा नारि ॥७ टिप्पणी—(२) बिसथ—बिस्तर । मँझारी (सं० माजारी)—बिल्ली । (४) भिनसारा—प्रातःकाल । २३० ( रीडंग्स १८ ) आमदने मादरो पिदरे ब दर दास्तान चाँदा खुद रा ( चाँदके माता पिताका आना : चाँदका सोनेका बहाना करना ) माता पिता लोग जन आवा । कुँवरि चाँदहि मुख ढरसावा ॥१ एक अपुहि अस अगरग लायसु । औ तिह ऊपर सुरुज लुकायसु ॥२
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२२१ चलत पाइ फर आरो पावा । कहा पँवरियहिँ तसकर आवा ॥४ चाँद कहा मैं घेरि भुलावउ । फूलहिं कहँ फुलवारि पठाऊअ ॥५ अखरैं पँवर घजर कै, बीर समुँद या मागि ।६ चाँद चढ़ी चौखण्डी, पँवर बझर होइ लागि ॥७ टिप्पणी—(४) आरो—आहट । तसकर—तस्कर, चोर । २३३ ( रौकेन्स १६३ ) मुवज्जिमै शिमुर्दने लोरक चाँदा बर कस खुद रफ्तन (चाँदाका धौरहर पर जाकर लोरकका ग्रह देखना ) चाँदा धौराहर चढ़ि अस चाहा । बुरुज कौन मंदिर दिन आहा ॥१ जनम अस्थान छाड़ पग धरा । पाँच आठ सत्रह दिन फिरा ॥२ मीन राशि जो फरकाहिँ आहइ । संग परोस नियर होइ आहइ ॥३ तुलाँ रैन दिन दूसम आवहिँ । पन्थ बराबर बैरी पावहिँ ॥४ पाछे मरै गगन चढ़ आवइ । रैन चाँद कस घेरी पावइ ॥५ यहि दिन होइ मिलावा, चाँद गुनि देखी राशि ।६ गांग लाँधि कै लोरक, जो हरदीँ लै बासि ॥७ २३४ ( रौकेन्स १६४ ) पुरसीदने मैना मर लोरक रा जेह शव कुजा बूद ( मैनाका लोरकसे रातको गायब रहनेकी बात पूछना ) मैना पूछहि कहाँ निसि कीन्ह । कौन नारि मोर कँ दीन्ह ॥१ रकत न देह हरद बनु लाइ । औ मसि मुख पै दीन्हि चढ़ाई ॥२ पियर पात अस लोरक डोलसि । मुर मुर हँस निरग भा बोलसि ॥३ हौं मनुसहिं ओहट पहचानी । बात कहौ नैन देख बानी ॥४ धीरु फाछ सत आप गँवाया । सत कहि हंजस तुम घर आवा ॥५
२१४ हँसि लोर अस बोला, राधा रात भुझायउँ ।६ कौतुक रैन बिहानि, तिह देखत नैन न लायउँ ॥७ २३७ (रीडिंग्स १८५) खबर याफ़्तने मादरौ पिदरे चाँदा अज आमदने कसी बीगाना दर कफ़ (परपुरुषके महकमें आनेकी बात चाँदाके माता-पिताको ज्ञात होना) महरी महर पासँ अस जाहा । मदिर पुरुख एक आवहि आहा ॥१ घेरी घेर नाथ औ भारी । तिह सुन पुर घर बात सँधारी ॥२ गोवरौ मात घना फुनि मयी । और कुछ मैनाँ पँह फुनि गयी ॥३ फूल घाम बस रही सुखाई । फुनि मैना गइ कुँभलाई ॥४ घर घर महरी खीस कड़ही । सुन कै अगरग धिसैंहिन बरहीँ ॥५ मालिन कङ्गा लोर करैई, रोवत मैना जाइ ।६ आग लाग सुन बिस्तर, बरतें जाइ बुझाई ॥७ २३६ (रीडिंग्स १८६) पुरसीदन रोसिन मर मैनाँ रा अज बगीदरे हाले ऊ (रोसिनका मैनासे चमककर तबीयत खराब होनेका कारण पूछना) रोसिन मैनाहि देखतें अहा । कहसि तिह कुरषी कैं कछु कहा ॥१ चरन रात साँवर तोर फाबँ । चरन सँवर रात होइ चाबै ॥२ मैंह कहु सुनी कछु तँ बाबा । लोर बीर भयउ किंवा राबा ॥३ बारी उतर बेस न मोही । कै कुछ आइ कहा है तोही ॥४ जीभ काढ़ि ताकर हीं खारीँ । परहिँ छुड़ाइ तिह देस निसारौं ॥५ ठरघ फाट हाँ मरिहतँ, कहसि तिह बेदन फाइ ।६ सुंदर रूप तोर, भोर बदरी ढाँकत आइ ॥७
२१५ २३७ ( रीसैन्ड्स १८७८ ) मुनफ़िर शुदने श्लोबिन बह मन रीच नमीदानम ( श्लोभिका अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना ) ओही पोइ मोर मानी हो[ऊ*]। मँह आगि जो कहि कुछ कोऊ ॥१ हाँ दोखी जो कछु न जानाँ। अनजाने कम काह पखानाँ ॥२ दई ठाँठ भल बार न पाऊँ। जान मुनि जिह जो तोहि झुकाऊँ ॥३ सो कम आइ राँड भैंठहाइ । सेज छाँड़ि जो आने जाइ ॥४ घर कें धिय कीन्हि पराइ । अपने कीतस आन घुराइ ॥५ ताहि लाग जिठ धाँधउँ, जीउ मोर सूँ आहि ।६ कड़मि तिह कान महहाइ, देस निसारउँ ताहि ॥७ २३८ ( रीकंग्रह्म १८७९ ) बाज गुफ़्तन मैनों बर श्लोबिन रा ( श्लोभिनसे मैनाका कथन ) माइ मोर तुम माम न डोहू। बोलेउँ चितहि उठा जो कोहू ॥१ साकर नित उठि पाठ गुहाराँ। ताकर ओछ कहे का पारी ॥२ कडु बियाइ पारी हों आनीं । साँसहि न माँगहि गहउँ न पानी॥३ मँवर पास कूँवरी कें राता। कँवल कली इन पूछि न बाता ॥४ अमरित कुण्ड ओ आछत मरा। सो सरवर लै अनसँ धरा ॥५ बाइ दखु माइ खोलिन, लोरक हूँ सत डल ।६ सारस बर रर मराँ, पिउ बिन रैन अकेल ॥७ टिप्पणी—(७) सारसकी जोडीका प्रेम प्रसिद्ध है। एककी मृत्यु हो जान पर दूसरा भी उसके वियोगमें झिसक झिसककर प्राण दे देता है।
२१५ २३९ (रीडिंग्स १८८क) जवाब दादन लोकिन मर मैना रा (मैनाका लोरिकका उत्तर) रोस न आइ होइ हरुवाइ । हिरदै घात आइ गरुवाइ ॥१ हिरदै घोल भार सह लीजा । हिरदै कहुँ खीउ गरू न कीजा ॥२ हिरद होइ पुछ केर उठानां । हिरद नसैनी फङ्गा सयानां ॥३ हिरद मों भूँख न जाइ अदाभी । पाउ न खोल जिंह चित गरुआभी ॥४ गरुवइ होइ घर अपनें रहठ । अस हिरवैं कहूँ चिन्त न करहु ॥५ आनेठँ बात गुन आगर, मैना न कीजइ फोइ ।६ गारु फार दोइ जीभ उपारो, तू लोरक कर आइ ॥७ २४० (रीडिंग्स १८८ख : काछी) तक़रीर कदने लोरिन मर मैना रा (लोरिकका मैनासे कथन) बारि बियाहि जो तैं हुत आनी । बीर बाँधि क दीन्ह उसानी¹ ॥१ गुन खोर² धन नाव चढ़ाई । तिहँ न कन्त कौ कोउ पतियाई³ ॥२ यह मेरौँ कम होइ हियारी । लेसु फाटि कै गुनँ अनारी ॥३ लागइ आग सेब दिन मोरी । छोड़ सुरुज रँगइ निसि चोरी⁴ ॥४ जोइ सुरुज चाँद पहँ आवा । सरग तराइन भइँ दिखरावा ॥५ लाज मयौँ तिहिँ साँवर, बइस रात अँधियार ।६ नीरस चाँद मुख फारी, रात भरें उजिआर ॥७ पाठान्तर—काछी प्रति । शीर्षक—जवाब दादन मैना लोरिन रा (मैनाका लोरिकको जवाब) १—बारि बिवाहि मूँ को रानी । बीर बाँज औ नाव कहाती ॥ २—गुन जो खोर । ३—तिह पग तह को पूँछिया । ४—[--] काट कहत गुनें
अनारी । ५—गारीं । ६—चोरीं । ७—लाख होएउँ दस साँवर । ८—कारीं । ९—भवन् रात जबियार ॥ २४१ ( रीट्संस १८९ ) दबाब दादन मैना बर चोलिन रा ( चोलिनको मैनाका उत्तर ) काह कहउँ हौं खोलिन माइ । हौँ मुइ आहौं दही परायी ॥१ घिय कें जात आइ मह फेरीं । हौं फुनि भइ तिहूँ कें चेरी ॥२ जान बूझ कें महँ कस गोवहु । होइ तुम्हार उसफर रोवहु ॥३ जाकइ कोइ जरै सो जाने । बिनु जरतें कस काइ बखाने ॥४ तुम्ह जानहु मोसेटों कर चोरी । लोरक भीर रँगइ किह गोरी ॥५ हौँ जो कहत तुम्ह दिन दिन, लोर रैन फित जाइ ।६ भर न दाख रस पूरे, घर घर आठ पराइ ॥७ २४२ ( रीट्सड्स १९ ) दर गातिर गुजश्तनोरने लोरक कि मैना मुनीदने बस्त ( लोरकका समझ जाना कि मैनाको बात ज्ञात हो गयी ) फह गियान मन लोरक गुनौं । अयसि मैनों कुछ हँ सुनौं ॥१ तार पिरोध महँ सुतैं फीन्हा । तार अन्तर पर अन्तर बीन्हा ॥२ बरके लार पास धनि पँठा । रक्त झरत मुख रोवत दीठा ॥३ आँसु पोंछि पानी धोंवा । माहिं देउि तुम्ह कहइ रोवा ॥४ नित रहै न पारी मैनों । दरम न करे पफ्त महिं धैनों ॥५ के मन सोक सकायहु, के कुछ भयउ पियाउ ।६ रम मँह बिरम सँवारे, पिवहि पड़ा कम भाउ ॥७
२१८ टिप्पणी—(१) अबसि—अवश्य। (२) सेवैं—नाहक। २४३ (रीडिंग्स १९१) गुफ़्तन शबुन मैना लोरक रा पागुस्सा (मैनाका लोरकको क्रुद्ध होकर उत्तर देना) तिन्हें कै भाव चढ़ायहु लोरा। जिन्ह सेवैं मन लागेउ तोरा ॥१ सनि मारग जो कुमारग जाई। सो कस मुख दरसावइ आई ॥२ मुद्ध सान्त अनु कछु न बानें। माँगत पान तो पानी आनें ॥३ जे छँद नौखंड गावैहु आयी। ते लोरफ तुम्ह कहवाँ पायी ॥४ सेस छाड़ तूं सरगहिं जायी। चाँदहि रँगइ कर आन [बतायी]* ॥५ पहान मोल मइँ ईंफस, जानसु कछु न जान ।६ नार फीन्ह तें पाठर, तिह पथ भूल सयान ॥७ २४४ (रीडिंग्स १९२) जवान ; तरसानीदने लोरक बर मैना रा (उत्तर; लोरकका मैनाको डराना) अस धनि पुरुख सो बेग मरावा। आन सैंपोप अस उत्तर आवा ॥१ ठाकुर क थिय परजहि लावा। अइस ध्रें लै मुँह कुटारा ॥२ सरग खाँद परि लोरक आहा। इन्ह पातँ दुनि कहिये काहा ॥३ सरग गय पनि बहुरि न आवइ। तियतैं सरगहि जान न पावइ ॥४ जाँ बा तुम हम सरग पठाउब। सरग गयें का बहुरि न आउन ॥५ जीम सँकारहु मैनाँ, हाइ पहुत सञ्जियाउ ।६ थिय महँ सरग पठानहु, हम सो कहौं मिराउ ॥७
२१९ २४५ (रीसेन्ट्स १९३) ब आमदने मादर लोरक व आश्ती कदन मियाने लोरक व मैना ( लोरककी माँका आकर लोरक-मैनामें सुलह कराना ) सुन खरभर खोलिन तस धाइ । जस मगिरथ यह छगिन आयी ॥१ लोरइ अजफर पकसि न आवा । अबहूँ इहँ भव फही फहावा ॥२ केस गही गर माथ ओनायसि । कुचछाल दुहुँ गालहि आयसि ॥३ वास्त्र चेरि पियावहिं पानी । साकर घिय चेरी फहूँ आनी ॥४ आँ विह ऊपर बरस अँङ्गारा । दहि दहि कोयला भइ सो नारा ॥५ आग लाइ घर अपने, लोर दहाँ दिसि धावहु ।६ बेग धँस जर मैनाँ, अमरित छिड़क बुझावहु ॥७ २४६ ( रीसेन्ट्स १९४ ) आश्ती कदन लोरक बा मैना बज गुफ्तार मादर ( माँके कहने पर लोरक-मैनाका सुलह करना ) लोरक हरकि खोलिन घर आइ । धीर नारि फेंट लाइ मनाइ ॥१ सुआ छलि धनि सेज सँमारे । पान फीरें मुख दीनि सँधार ॥२ रँग बिनु पान खियायसि मोही । मा रँग इहँ न देखउँ तोही ॥३ रंग बिनु पातहिं भाउ बनाया । तुम लोरक रंग अनतँ आवा ॥४ घर हर आगि मैना जरौं । चित मन घाउड पाँड़ौँ जरौं ॥५ मज न भाउ रुचि न कामिनि, आ न हाइ मन हाथ ।६ सो मैं नैन न ढरूँ, तिल न रहूँ संग साथ ॥७
३. लोरिक-वीरता, युद्ध व चन्दा से मिलन (कड़वक २०१-३००)
९२ २४७ ( रीकेण्ड्स १९५ ) गुफ्तने लोरक जमालियत व खूबिये मैना ( लोरक का मैनाकी प्रशंसा करना ) मैना तिइ जस विरी न भाहे । तोहि छाड़ि चित एक न चाहे ॥१ मैं तोरैं रस बिरस बिमारा । देख न भावैइ आपु सहारा ॥२ मैं तों नारि चाँद अस पाई । चाँद जोत सब गमी हेराई ॥३ सो सुन अपजस कें लाई । लागु न मैना कहैं बुराई ॥४ नैन देखि हँ पाठ उभारी । हाँकी सुनि कै अखरत पारी ॥५ तू चाइ को आगर मैना, मोरैं चित न समाइ ।६ अमरित कुण्ड बिंद परसै, सो हरनित नहि खाइ ॥७ २४८ ( रीकेण्ड्स १९३क ) गुफ्तन मैना मर लोरक रा ( मैनाका लोरकसे कथन ) तोर घाँद मोर उकेरेहु काहा । जो करिये सो आछस जाहा ॥१ सोरह कराँ चोरी दिखरावइ । चाँदा मोसों सरमरि पावइ ॥२ लोरक तोरैं नारँग बारी । भूलि न पैसु परई बारी ॥३ बास केतकी भँबर चोरावइ । सो हर काटैं बीड गँवावइ ॥४ हौँ मिय तारैं लोर डराऊँ । नींद न जानउँ सुगति न खाऊँ ॥५ छोर मत्त मन संका, पर बेलैं कित जाइ ।६ घर न दास रस पूरे, पर घर आठ पराइ ॥७
२२१ २४९ (रीड्सण्ड्स १९५क) नूहू। दर खुशदिली लोरक व मैना गोयद (वही: लोरक और मैना की प्रसन्नता का वर्णन) बैठि सान्त हँसि लोरक कहा । कासो कोप मैना चित अहा ॥१ घर ठमर कै मंदिर सँवारा । कीत रसोइ अगिन परजारा ॥२ सेब पिछाइ लोर अन्हवावा । औ भल भोजन फाड़ि जिंवावा ॥३ रंग बिरंग सो लीन्हि सुपारी । पान बीरें मुख दीन्हि सँबारी ॥४ हँसत लोर बाहर नीसरा । चाँद पात मैना बीसरा ॥५ सोइ बिरख सोइ तरुवर, सोई लोर सो मीर ।६ सोइ मिरघ सो थरहर, सोइ अहेरिया सो अहेर ॥७ २५० (रीड्सण्ड्स १९०) कैफियते चाँदा तराउशत दर बुतखाना गुफ्तन महत (मन्दिर में चाँदा ब्राह्मन का कहना) असाइ असाढ़ी गयी तिह अही । दूज गिन देउ चातरा कही ॥१ सोमवार महत गिन कहा । सो दिन आगैं आवत अहा ॥२ होम जाप अगियार करावहु । परस देउ कर जोरि मनावहु ॥३ सो घरि माँथ देउ पाँ आवइ । सो बस चाँद सुरुज बर पावइ ॥४ सोमनाथ कहँ पूजा कीजइ । अखय फूल मार लै दीजइ ॥५ पते पिरथिमी नौखण्ड, देउ आव सुन आइ ।६ चाँद सुरुज मन रहँसे, देउ मनायस [आइ*] ॥७ टिप्पणी—(१) चातरा—यात्रा देवता की पूजा (मनौती) के निमित्त जाना । (३) होम—हवन। जाप—जप। अगियार—धूप अथवा घी शक्कर को अग्नि में डाल देवता के सम्मुख आरती की भाँति फिरना ।
१२४ २५३ ( रीकह्म्स २ ) रफ्तन चाँदा बरूये मुफ़साना व आशिक शुदने बेजान दीदने चाँदा (चाँदा मन्दिरमें प्रवेश : उसपर देवताओँका आसक्त होना) हाथ सिंघोरा सेंदुर भरा । भीतर मंदिर चाँद पाँ धरा ॥१ सखीं साथ एकगोहन भयी । नावत सीस देउ पह गयी ॥२ देउ दिस्टि चाँदा मुख लागे । मुष बिसरी आँसिष फुनि मागे ॥३ देखत देउ गयउ मुरझाइ । चाँद घराइन सों चल आइ ॥४ के बिधि मोहि मोह जो दीन्हा । क हौं सरग मंदिर महँ कीन्हा ॥५ मंदिर तराइन भरि गा, चाँद कियउ अजोर ।६ होम जाप सब बिसरा, कवन देवस यह मोर ॥७ टिप्पणी—(१) सिंघोरा—सिन्दूर रखनेका पात्र। विवाहित हिन्दू स्त्रियाँ देवार्चन पूजा आदि अवसरों पर इसे अपने साथ रखती रही हैं। (२) नावत—'ठाट' पाठ भी सम्भव है। २५४ ( रीकह्म्स ३ । ) परस्तीदने चाँदा बुत रा व खास्तने मुहब्बत बा लोरक ( चाँदाका देवतकी पूजा करना और लोरकका प्रेम माँगना ) सेंदुर छिरुक अगर चढ़ावा । नमस्कार कै देउ मनावा ॥१ सोवन अगरत फूल कै माला । पायँन्ह लागि बिनवइ अमनाला ॥२ दव पूजि माँगिउँ तुम्ह पासा । मठ करु मन पूँजइ आसा ॥३ चाँद सुरुज बर बिहँ पाऊँ । दउ करम महँ पिरत भराऊँ ॥४ बिनवइ चाँदा पाँपन परी । दउगुरुज बिनु जीउ न घरी ॥५ एक पहरु कै महँ हर, बिछी राँध बुझाइ ।६ दउ पूजि क चाँदा, बिनती ठाड़ि कराइ ॥७
२२५ टिप्पणी—(४) देउ करस महँ फिरत मराऊं—मनोरथ पूर्ण होनेके निमित्त धूप घी अथवा तीर्थ रूपसे देउ करस भरनेकी मनौती (मान्यता) प्रायः स्त्रियाँ मानती हैं। २५५ (रीडिंग्स २१) आम्दने मैना व मुनिदयान खुद दर बुतखाना व परस्तीन्दने बेष रा (मैनाका सहेलियोंके साथ मंदिर आना और पूजा करना) चढ़ी पालकी मैनाँ रानी। सखी सात सौ आइ भुलानी ॥१ सोक संताप बिरह कै मारी। किसन बरन मुख रीसा नारी ॥२ झुर मून (अरु) सीस अति रूखा। मुक्ता कंचन कंदरप झर सूखा ॥३ बहुल उदग उघाट सतायी। पूजा देउ चदामसु आयी ॥४ अखत फूल दीन्हि कर फाड़ी। देउ परांवर उतर भइ ठाढ़ी ॥५ अहो देउ तिह फहा यह, जो बर मरकह राउ ।६ अपने सेज छाड़ि निस अनतँ, फिर फिर घाउ ॥७ मूलपाठ—(१) अम्मर। टिप्पणी—(१) झुर—मूँड सर। २५६ (रीडिंग्स २१) पुरसीदने बाँदी बर मैना रा अज दिल्लगी हाये ऊ (बाँदीका मैनासे उदासीका कारण पूछना) हँस कै बाँदि मैनाँ पूछी। कै सुरँगहुत आमहु छुछी ॥१ अति दो मन आँ साँवर भानूँ। सीस न चंदन अधर न पानूँ ॥२ कै साइ निसि सेज न आवइ। तिहिं संताप दुख रोइ बढ़ावइ ॥३ कै तिह नारि आइ मुष चोरी। तिह अवगुन पीठ लावइ खोगी ॥४ कै तुम्ह करहु न अरप सिंगारू। कै सुहाग दै ढूँव पीरू ॥५ १५
२२२ २५१ ( रीकैन्ह्स १९८ ) रवान शुदने औरतहाने शहर ब आम बराय परस्तीदन देवता ( देउपूजाके लिए प्रत्येक वर्गकी स्त्रियोंका जाना ) टाँकनि खतरिन बाँभनि मिलीं । बैस डगरिन भाटिन चलीं ॥१ चौहानिन पुनि पहिर पटोरा । गवन करन जनु समुँद हिलोरा ॥२ कर सिंगार पहुइनि नीसरीं । कैंथिन दिबानि औ गूँजरी ॥३ चमकत निकरीं रूप सोनारी । निकरीं मालिन औ फलवारिन ॥४ चली बेसवाँ आनों भाँती । परमा पौन सो पावहिं पाँती ॥५ धला महर फर गोयर, देस परा बहु रोर ।६ सोमनाथ कइ पूजहुँ, सेंदुर फूल बटोर ॥७ टिप्पणी—(१) टाँकनि—टाँक देशकी निवासिनी पंचांगिनी। खतरिन—खत्री अथवा क्षत्री जातिकी स्त्री। बाँभनि—ब्राह्मणी। बैस—वैश्य। डगरिन—उस वर्गकी स्त्री जिसका पेशा प्रसूतिकाकी सेवा करना बच्चेका नाल काटना गुदना गोदना आदि है। भाटिन—भाट (चारण) जातिकी स्त्री। (२) चौहानिन—चौहान (क्षत्रिय जातिका एक अंग) की स्त्री। (३) पहुइनि—पहुना अथवा पहुइरा जातिकी स्त्री। कैंथिन—कायस्थ स्त्री। दिबानि—दीवान (अधिकारी) वर्गकी स्त्रियों। गूँजरी—(गुर्जरी), अहीरनी, दूध बेचनेवाली। (४) सोनारी—सुनारिन। फलवारिन—कलवार नामक जातिकी स्त्री। (मुख्यतः शराबका काम करनेवाला वग कलवार कहा जाता था।) (५) बेसवाँ—वेश्याएँ। (६) रोर—शोर। २५२ ( रीकैन्ह्स १९९ ) तलबौदन चाँदा सहेलियान रा ब रवान कर्दन सुये बुतखाना ( सहेलियोंको बुलाकर चाँदाका मन्दिर जाना ) पाँच सहेलिन सबै बुलायी । सरग इतै जनु अछरिन्ह आयीं ॥१
२२१
पहिर कै चाँद चउँ दिसि दीठी । जनु तरई चहुँ पास बईठी ॥२ न्हाइ धोइ कै चीर पहिरावा । अगर चंदन लाइ सीस गुंघावा ॥३ सेंदुर छिड़क भइ रतनारी । मुँह तंबोल सब जोवन भारी ॥४ इँदर सबद पँच तूर बजायीँ । गरह नखत चलिफो किस आयीँ ॥५ सोन सिंघासन चढ़ी, बहुकन कियउ सवार ।६ चाँद तरायीं सेवैं, गथनीं बैठ दुआर ॥७ टिप्पणी—(५) इँदर सबद—इन्द्रके अखाड़ेमें अप्सराओंके नृत्यके समय बजनेवाले वीणा वेणु मृदंग कांस्य ताल आदि वाद्य । पँचतूर—पालि साहित्य में पञ्चङ्गिक तूर्यिका उल्लेख पाया जाता है। मध्यकालीन ताम्रशासनोंमे पञ्चशब्द और पञ्चमहाशब्द पाये जाते हैं जिससे ऐसा जान पड़ता है कि उसका उपयोग कुछ विशिष्ट सामन्त ही कर सकते हैं। डाक्टर अल्तेकरके मतानुसार श्रृंग शंख भेरी जयघण्ट टमट, ये पाँच वाद्य पञ्चमहाशब्द कहे जाते थे (राष्ट्रकूट, पृ २६९)। सम्भवतः पञ्चशब्दको पञ्चतूर भी कहते थे। किन्तु वासुदेवशरण अग्रवालका अनुमान है कि पञ्चतूर नौबतके लिए प्राचीन शब्द है। (६) सिंघासन—विशेष प्रकारकी पालकी । 'सुगासन' पाठ भी सम्भव है। 'सुगासन' पाठ माताप्रसाद गुप्तने पद्मावत (६१९।१) में स्वीकार किया है। तदनुसार हमने भी वही पाठ ग्रहण किया था और कड़वक ५ और ५१ में वही पाठ दिया भी है। पर वासुदेवशरण अग्रवालने इस बातकी ओर ध्यान आकृष्ट किया कि आइन-अकबरी (ब्लाकमैन कृत अनुवाद, पृ २६४) में अबुल फज्लने पालकी सिंहासन चौडोल और डोली चार प्रकारके यानोंका उल्लेख किया है जिन्हें कहार (पालकीबरदार) कन्धेपर उठाकर चलते थे। अतः हमने यहाँ और आगे सर्वत्र 'सिंहासन' पाठ स्वीकार किया है। पाठक पीछे इस पाठका सुधार लें। पालकीके अर्थमे सुगासनका कहीं उल्लेख नहीं मिलता। बहुकन—बहुद्दारक । (७) सेवैं—टाँकि ।
१२४ २५३ ( रीकंग्स १ ) रफ़्तन चाँदा बरूने कुतुख़ाना व आशिक़ शुदने देवान दीदने चाँदा ( चाँदा मन्दिरम प्रवेश : उमवर देवता का कसरत हाना ) हाथ सिंधोरा सेंदुर भरा । भीतर मंदिर चाँद पाँ धरा ॥१ सखी साथ एफगोइन भयी । नावत सीस देउ पह गयी ॥२ देउ दिसिट चाँदा मुख लागे । पुष बिसरी आँ सिघ फुनि मागे ॥३ देखत देउ गयउ मुरझाइ । चाँद तराइन सों यस आइ ॥४ के विधि मोहि मोह जो दीन्हा । के हाँ सरग मंदिर महँ कीन्हा ॥५ मंदिर तराइन भरि गा, चाँद किएउ उजोर ।६ होम जाप तप बिसरा, कवन देवस यह मोर ॥७ टिप्पणी—(१) सिंधोरा—सिन्दूर रखनेका पात्र। विवाहित हिन्दू स्त्रियाँ देवदर्शन, पूजा आदि अवसरों पर इसे अपने साथ रखती रही हैं। (२) सात—'ठाट' पाठ भी सम्भव है। २५४ ( रीकंग्स २ ) परस्तीदने चाँदा कुल रा व ख़ास्तने मुहब्बत पा लोरक ( चाँदा देवताकी पूजा करना और लोरकका प्रेम माँगना ) सेंदुर छिड़क अगर चढ़ावा । नममकार कै देउ मनावा ॥१ सोभन अउत फूल कै मारा । पायेइ लगि बिनवइ असनारा ॥२ दव पूजि माँगेउँ तुम्ह पासा । सठ करौ मन पूँजइ आसा ॥३ चाँद सुरुज बर बिहँ पारूँ । दउ करस महँ पिरत मराऊँ ॥४ बिनवइ चाँदा पाँयन परी । दउसुरुज बिनु जाँठ न भरी ॥५ एक पहस कै महँ देहु, पिरही राँच पुजाइ ।६ देउ पूजि कै चाँदा, बिनती टारि फगाइ ॥७
२२७ टिप्पणी—(४) देउ करत महँ फिरत मराऊं—मनोरथ पूर्ण होनेके निमित्त वृक्ष की अथवा तीर्थ जलसे देव करन भरनेकी मनौती (मान्यता) प्रायः स्त्रियाँ मानती हैं। २५५ (रीकैण्ड्स ३३) आमदने मैना ब मुनिश्यान खुद दर बुतखाना व परस्तीदने देव रा (मैनाका सहेलियोंके साथ मंदिर आना और पूजा करना) चढ़ी पालकी मैनाँ रानी। सखी सात सौं आइ तुलानी ॥१ सोक सँताप बिरह कै जारी। किसन बरन मुख रीसा नारी ॥२ मुरसन (अरु) सीस अति रूखा। सुखा कवल कँदरप झर सूखा ॥३ बहुत उदेग उघाट सतामी। पूजा देउ चढ़ायसु आमी ॥४ अक्षत फूल दीन्हि कर काढ़ी। देउ परावर उतर भइ ठाढ़ी ॥५ अहो देउ तिह फहा यह, जो बर बरकइँ राउ। ६ अपने सेज छाड़ि निस भनतैं, फिर फिर धाउ ॥७ मूलपाठ—(३) कसर । टिप्पणी—(३) सुर—मूँड सर । २५६ (रीकैण्ड्स ३४) पुरसीदने चौंदा मर मैना रा अज शिकस्तगी हाले ऊ (चाँदका मैनासे उदासीका कारण पूछना) हँस कै चाँदे मैनाँ पूछी। कै सुरँहुत आयसु छूछी ॥१ अति दो मन औ साँभर पानीं। सीस न बेदन अधर न पानीं ॥२ कै साइ निसि सेज न आपइ । तिहिं सताप दुख रोइ पहाबइ ॥३ कै तिह नारि आइ मुघ थोरी । तिइ अपगुन पिउ लायइ खोरी ॥४ कै तुम्ह करहु न भरप सिंगारू। कै सुहाग मैं हूँव पीरू ॥५ १५ 1