भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

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बरतेंगे। हम भारत (द्यूत प्रश्न) मेल्लो यदि उन्होंने उसकी पूर्ति न की तो हम उनके सग निकाह हरगिज नही करेंगे। फिर उसने बसौधीको बारात देखनेको भेजा। बसौधीको आते देख संवरू दूबेसे बोला— अगोरीकाकी बड़ी चर्चा सुनी है। यहाँका राजा मलयसिह बलवान् है। न मालूम किस ढगसे वह युद्ध करता है कि वह सब बारातियोंको मारकर बहुके डोलेको छीन लेता है और अपने रनिवासमें ले जाकर उसे अपनी रानी बना लेता है। अगोरीवाकी स्थिति अभी तक मेरी समझमें नहीं आयी। सामनेसे एक बाम्हन आ रहा है। यदि आप कहें तो उसे बारातमें घुसने न दिया जाय। यदि उसने बारातमें घुसकर बारातको फाड डाला तो पीछे उसके मारने से क्या लाभ होगा। यह सुनकर काकाने कहा— बात तो ठीक है। वह बारातमें घुसने न पावे। आज्ञा पाते ही सँवरूने एक ताड़का पेड़ उखाड लिया और उसे भूमिपर पटक दिया—जिससे वह फटकर चॅवर सरीखा बन गया। उसे इतने जोरसे घुमाया कि उसकी हवा जब बाम्हनको लगी तो वह गशखाकर मनियारके दरवाजेपर वापस जा पहुँचा। बोला—मै आपकी बारात देखने न जाऊँगा। बारातवाले आदमी नहीं जान पड़ते। उन्होंने तो ताडका पेड उखाडकर रख छोड़ा है। यह सुनकर महरा ने शिवचन्दसे कहा—यह लोग तो असुर जान पडते हैं। अपनी बारातके प्रति मै पहलेसे ही सजग हूँ। जबतक कोई जानकार नहीं जायेगा तब तक वे किसीको भीतर नहीं घुसने देंगे। इसलिए तुम नाई और पण्डित तीनो आदमी जाओ। विवाहका तो कोई प्रबन्ध अभी हुआ नहीं है। इसलिए पण्डितजीसे कहना कि वह अहीरको समझा दें कि लग्नका दिन निश्चय करनेमें गड़बड़ी हो गयी। अभी सात दिन और सात रात मज़ा है इसलिए तबतक वह अपनी बारात ठहराय। रसद पानी जो भी कहेंगे वह सब हम इकट्ठा कर देंगे। इस बीच बारातका जो प्रबन्ध करना होगा कर लिया जायगा। उधर मलयसिह अगोरीवाले बारात भगानेका उपाय रचने लगा। उसने गाँव भरके लड़कोंको बुलाकर समझा दिया। लड़कोंने शह पाकर अपनी काँछमे इटोंके टुकड़े इकट्ठे कर लिये और बारातके निकट पहुँचकर विखर गये और लगे ईंट फेंकने। सँवरूने देखा कि लड़के बारातियोंको ईंटोंसे मारकर परेशान कर रहे हैं तो उसने अपने ताडवाला झाड़ू उठाया। यह देख लड़के भाग खड़े हुए। मलयसिंहने तब महराके पास सदशा भेजा कि अहीरकी बारातमें जितने हुड़दंगे हों उन सबको निकाल बाहर करो अन्यथा विवाहके हर्पमे विषाद उत्पन्न हो जायेगा। यह सुनकर महरा सोचने लगा कि राजा किसी तरह मेरी इज्जत रहने नहीं देना चाहता। दुविधामें पड़कर बोला—राजा बलवान् है उसकी बात तो माननी ही होगी। शिवचन्द पण्डित और नाई तीनों बारातकी ओर चले। शिवचन्दके आते ही दैवन्दने उठकर प्रणाम किया और फिर कुशल क्षेमकी बात होने लगी। इस बीच

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पण्डितजी बोले—उस दिन लग्न देखनेमें मुझसे गड़बड़ी हो गयी। आजसे सात दिन तक रात दिन भद्रा है। तब तक आप बारात यहीं ठहराइये। इतना सुनकर सँवरू कहा—दूर देशसे बारात यहाँ आयी है। पासमें जो रसद वगैरह था, सब समाप्त हो गया है। यदि आपलोग ऐसी व्यवस्था कर दें कि हमारी बारात भूखों न मरे तो सात दिन क्या, हम सात महीने ठहर सकते हैं। शिवचन्दने कहा—हम बारातकी सारी व्यवस्था कर देंगे। किन्तु हमारे राज्य का आदेश है कि सब बूढ़ोंको निकाल बाहर किया जाय। आप उन्हें नहीं निकालते तो महराकी बड़ी बेइज्जती होगी। यह सुनकर सँवरू अत्यन्त दुखी हुआ। बोला—हमारी बारातमें सब तो ऐसे ही जवान हैं जिनकी अभी रेल उठ रही है। बूढ़ोंमें अकेले काका ही हैं। उनको हम बारात से अलग कर देंगे। और उसने उन्हें एक टोकरीमें बन्द कर दिया। यह बताकर कि बारातमें कोई बूढ़ा नहीं है शिवचन्द घर वापस आ गये। प्रत्येक आदमीके लिए एक मन चावल एक मन आटा, एक बकरा और एक बोझ उरद और एक मट्टी शराब भिजवाकर उन्हों सँवरूको लिखा—हम जो रसद भिजवा रहे हैं वह केवल चौदह वक्तके लिए है। यह इसीके अन्दर खत्म हो जानी चाहिए। यदि कुछ बच रहा तो आपको सीधे गौराका रास्ता नापना होगा। हम बेटीसे ब्याह नहीं करेंगे। पत्र पढ़कर सँवरू सोचमें पड़ गया। टोकरीमें बन्द काकासे जाकर कहा— महराकी यह शरारत हमसे सही नहीं जाती। रसदका ढेर लगा दिया है और कहता है कि रसद समाप्त नहीं होगी तो हम ब्याह नहीं करेंगे। बताइये कि किस प्रकार रसद समाप्त हो। यह सुनकर काकाने कहा—अहीर के लड़के होकर भी अक्ल नहीं है। सारी बारात छप्पन हजार है। एक बार दस मन आटा सनवा दो और एक-एक लोई देने लगो। कोई कच्चा खायेगा कोई पकाकर खायेगा मालूम भी न पड़ेगा और सभी भूखों रह जायेंगे। इसी प्रकार चावलका भी बँटवाओ। इस प्रकार दिन-रात रसद बँटवाते जाओ। कभी किसीका पेट नहीं भरेगा और रसद भी दस कूलम ही समाप्त हो जायगा। इसी तरह तुम शराबकी मट्ठीकी भी व्यवस्था करो। दस-बीस खस्सी (बकरा) एक साथ कटवाओ टुकड़े टुकड़े सबको बाट दो। कोई कच्चा खायेगा कोई पकाक। इसी प्रकार उरदको भी बाटो। जब सब रसद समाप्त हो जाये तो महराका और रसद भेजनेके लिए फिर भेजो। सँवरूने इसी प्रकार रसद बाटना शुरू किया। इतनेमें महराका दूसरा पत्र आया। सबने उसे पढ़ा और काकाके पास फिर गया और बोला—महरा हमें बेकार परेशान करना चाहता है। इस बार उसने लिख भेजा है कि हमारे पास कोयलेकी रस्सी भेज दो ताकि हम मंडप बांधकर तैयार करें। हमने तो कभी कोयलेकी रस्सी सुनी ही नहीं। सुनकर काकाने कहा—जाओ दस आदमी भेजकर सोनपी नदीके किनारेसे ६४

१७ कास कटवाकर मंगाओ। कासको कूटकर धूपमें सुखाओ फिर उसकी रस्सी बनाओ और उसका गोलाकार लपेट लो और फिर नाँव मंगाकर उसे ठीकसे रख दो; बादमें उसमें आग लगा दो। रस्सी जलकर कोयला हो जायेगी फिर भी वह ज्योंकी त्यों बनी रहेगी। उसीको उसके पास भेज दो। संबरू ने वैसा ही किया और महरा की इच्छा पूरी कर दी। यह देखकर महरा मूर्च्छित हो गया और कहने लगा—विश्वेश्वर, तुम कहते हो कि महराकी बारातमें एक भी बुड्ढा नहीं है। बिना किसी बुड्ढेके मेरी यह मांग कैसे पूरी हुई। विश्वेश्वरने उसे समझाकर कहा—मुग्गेका बड़ा लड़का लंबरू बड़ा चतुर है। वही सबको पूरा कर देता है। तब उन्होंने फिर दूसरी मांग भेजी कि हमने मडप तैयार कर लिया है! १६ पोरकी साठी भेजो जिससे हम उसको उठाकर आँगनमें लगा सकें। इस बातको भी संबरू ने काकासे कहा और काकाने बताया—सोनपीके किनारे कुशके पुराने हूर होंगे। उन्हें जड़ सहित उखाड़कर ले आओ। प्रत्येककी जड़में अनागिनत पोर होंगे। उसीको गिनकर तुम उसके पास भेज दो। इस तरह संबरूने उनकी उस माँगको पूरी करके भेज दिया और यह भी लिख भेजा कि भांजी हुई रसद समाप्त हो गयी है। रसदका प्रबंध करके जल्दी भेजिये। यह पत्र पाकर महरा घबरा उठा और तत्काल कहला भेजा—लगनकी घड़ी समाप्त हो रही है अपलोग बारात लेकर आइये। यह बात जब संबरूने काकासे कहा तो वे बोले—महराने हमें इतना परेशान किया। अब जब तक वे हमारी बात पूरी नहीं करेंगे, तब तक हम बारात लेकर न जायेंगे। तदनुसार संबरूने लिख भेजा हमारे कुलकी रीति है कि बेटीवाला बारातके पाँव पखारनेके लिए एक जोड़ी भुँझुआ भेजता है। जब तक वह नहीं आता तब तक बारात आपके दरवाजे नहीं आ सकती। यह सुनकर तो महराके होश गुम हो गये। अडोस-पड़ोससे पूछने लगा—यह भुंझोका क्या मँगता है हम कैसे भरें। जो सुनता वही आश्चर्यचकित रह जाता। तब महरा मन्दारसिंहके दरबारमे गया। वहाँ भी भुंझोके माँगकी बात कही। सब दर बारी सुनकर दंग रह गये। महराने बताया—जब तक बरातियोंकी यह माँग पूरी न होगी वे मेरे दरवाजे नहीं आवेंगे। परन्तु कोई भी इसका निराकरण न कर सका। हताश महरा घर लोट आया और खाट पर पड़ रहा। मन्दोदने जब सुना तो बोली—चौदह वर्षंतक आप उसको परेशान कर रहे थे। अब जब उन्होंने एक साधारण-सी मांग की तो आप परेशान हो गये। आप मेरी ननदी चन्दोके पास जाइये। उनसे कहियेगा वह सारा प्रबन्ध कर देगी। महरा तत्काल सुखदीके पास गया और उससे सारी बात कही। सुनकर वह बोली—यह कौनसी बड़ी बात है।

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वह अन्दर गयी और कपड़ा पहनकर तैयार हुई और और सूर्यसे आँचल पसारकर विनय की कि मेरे लाजकी लाज रखिये। और विनय करके चम्बेली की पंखनी एकमे ही जोड़कर महराको दे दिया और बोली—कि दोनों पंखनीमें पानी भर दें। इनमें जितना पानी रहेगा, उसमें धरिरकी बारात सात बार पाँव पखारेगी फिर भी यह नहीं घटेगा। इस प्रकार जब काकाकी वह माँगकी पूर्ति हो गयी तो उसने दूसरा पत्र लिख वाया और कहा कि बारह स्तनोंवाली ऐसी वस्तु भेजिए जिसकी धार एक ही हो। इस बातका अर्थ जाननेके लिए महरा मुहल्ले भरमें घूमता फिरा लेकिन किसीसे उसकी पूर्ति न हो सकी। तब वह मलयगिरिके दरबारमें पहुँचा। जब वहाँ भी कुछ न हो सका तो घर लौटकर कुत्सित होकर रानी पद्मासे कहने लगा—बेटी मंजरीके कारण मेरी दुर्गति हो रही है। मञ्जरीने जब यह सुना तो बोली—आप जरा-सी बातमें घबड़ा जाते हैं और बेटीके भाग्यको दोष देने लगते हैं। कुम्हारके यहाँ चले जाइए और उससे एक करवा बनवाइए, उसमें बारह छेद करवा दीजिए और उसके ऊपर एक टोंटी लगवा दीजिए और उसीको भेज दीजिए। महराने वही किया। इस प्रकार उनके माँगकी पूर्ति हो गयी। दोनों ओरकी प्रतिस्पद्धा समाप्त हो जानेपर विवाहकी तैयारी होने लगी। जब यह सूचना मलयगिरिको मिली तो उसने अपने भँवरानन्द नामक हाथीको शराब पिलायी। शराब पीकर जब हाथी नशेमें चूर हो गया तब उसे लोहेकी अस्सी मनकी जंजीर पकड़ा दी और बारातको रास्तेमें ही रोक देनेके लिए भेजा। हाथीने महराके मुख्य दरवाजे को रोक दिया। जब सँवरूकी बारात द्वारके निकट पहुँची तो हाथीने पीछे घूमकर जंजीर घुमाना शुरू किया। फलतः बारात बादलोंकी तरह फटकर भाग निकली। सँवरू और मिला एक किनारे हट गये। लोरिक भी एक तरफ होकर हाथीकी मार बचाने लगा। जब हाथी दाहिने घूमे तो वह बाय तरफ उछल जाय और जब वह बायें घूमे तो लोरिक दाहिने उछल जाय। जिस प्रकार हाथी घूमे लोरिक भी उसी प्रकार घूम जाय। अन्तमें लोरिकने खड्ग निकालकर मलयसि हाथीको ललकारा। जब सूँड घुमाकर हाथीने लोरिकपर जंजीर चलाया तो लोरिक उछलकर एक बगल हो गया और कूदकर खड्गसे हाथीके गरदनपर वार किया। हाथीका सिर धड़से अलग हो गया। लोरिकने सूँडको उठाकर इतने जोरसे फेंका कि वह मलयगिरिके दरवाजेपर जा गिरा और सिर पैरको पकड़कर इतने जोरसे घुमाकर फेंका कि वह चौताके सीमापर जाकर गिरा। लोरिककी ऐसी शक्ति देखकर सँगौरिवास्त नर-नारी दंग रह गये। बारात महराके द्वारपर पहुँची। द्वारपूजाके पश्चात् विवाहका काम आरम्भ हुआ। सँवरूने मिलासे कहा—यहाँका राजा बहुत चालाक है। अगर हम होशियार नहीं रहे तो हो सकता है मण्डपमें ही छले जायें। अतः आप सतर्क होकर द्वारपर या

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मण्डपमें जाने दो। यह सुनकर भिताने दरवाजा खोल दिया और वह भीतर घुस गया। सखियोंमें घुसकर वह भी मंगलाचार गान लगा। सभी सखियोंका स्वर एक-सा उठता था, किन्तु डढियाके स्वरमें अन्तर पड़ जाता था। यह देखकर सभी सखियोंको एकाएक सन्देह हो गया कि स्त्रीका वेश बदलकर कोई पुरुष हमारे बीच घुस गया है। यह सोच- कर उन्होंने गाना बन्द कर दिया। मंजरी सोचने लगी कि इन लोगोंने गाना क्यों बन्द कर दिया और उनकी ओर देखने लगी। देखते ही उसने डढियाको पहचान लिया। वह सोचने लगी कि शत्रु मण्डपमें घुस आया है। वह स्वामीको मारकर मुझे कोहबरमें ही विधवा बना देगा। अतः कोई ऐसा उपाय करना चाहिए कि स्वामीको यह बात मालूम हो जाय। लेकिन यदि मैं बोलती हूँ तो मण्डपमें लोग हँसी उड़ायेंगे कि अभी ब्याह हुआ नहीं कि मैं अपने पतिसे बात करने लगी। इसलिए कोई दूसरा उपाय निकालना चाहिए। यह सोचकर नींद आनेका बहानाकर वह आगे-पीछे, दायें-बायें झुकने लगी और जाकर लोरिकके ऊपर झुक पड़ी और उँगलीसे खोदकर संकेत लगी। लोरिकने सोचा कि इम कैसी पागल स्त्री मिली है, जो कोहबर पर ही मुझे खोद रही है। घर जानेपर पता नहीं क्या करेगी। वह यह बात सोच रहा था कि सारी सखियाँ एक-एक कर मिलने आने लगीं और जब सब मिल चुकीं तो डढिया सामने आया। उस समय फिर मंजरीने उसे उकसाया। तब लोरिकको ध्यान आया कि शत्रुको देखकर पत्नी मुझे चेतावनी दे रही है। डढियाको देखते ही उसने ध्यान किया कि वह स्त्री नहीं है और खड्ग लेकर होशियार हो गया। जब डढिया आकर लोरिकके बगलमें खड़ा हुआ तब लोरिकने उसे ध्यानसे देखा। जिस चादरसे उसका मंजरीके साथ गठबन्धन हुआ था उसे तत्काल उतारकर उसने एक तरफ रख दिया और खड़ा हो गया फिर उसने डढियाकी साड़ीका छोर खींच लिया। वह नंगा होकर भागा। तदनन्तर सखिया वर-वधूको कोहबर ले गयीं और उनके साथ मज़ाक करने लगीं। जब वे चली गयीं तब लोरिकने मंजरीसे कहा—जब मैं विवाहके लिए चलने लगा था तो भाभी मदागिनने मुझे पावक बनाकर सिखाया था और कहा था कि जब तुम विवाह करके कोहबरमें जाओगे तभी भूख लगेगी। उनकी बात सच जान पड़ती है। अब मुझे भूख लगी है। मंजरी बोली—जब सब सखियाँ यहाँ थीं तब तो आपने कुछ कहा नहीं। उस समय तो मैं चावल मंगाकर आपको खिला भी देती। अब वे चली गयीं तब आप कह रहे हैं। मैं कैसे खिलाऊँ ! रसोई घरके दरवाजेपर भाभी खड़ी हुई हैं। मैं जाती हूँ और अगर वह जाग गयीं तो मेरा बड़ा उपहास होगा। अब रात भर चुपचाप पड़े रहिए। सुबह सखियाँ आयेंगी तब मैं भोजन मँगा दूँगी। लोरिक बोला—नहीं मुझे तो इसी समय कादोंकी भूख लगी है। यह सुनकर मंजरीने सोचा कि ये मेरे सत्त्वकी परीक्षा ले रहे हैं। वस्तुतः उसने

अपने छत्तम ध्यान किया और अपने सत् बब्बर वहीं रिंजकी उतारकर लोरिकको दिला दिया। पश्चात् पति और पत्नी बीचमें खड्ग रखकर सो रहे। जब डंडिया लौटकर मखयारितके दरबारमें नहीं पहुँचा तब मखयारित चिंतित हुआ। उसने दूसरी बार पानका बीड़ा रखकर पूर्ववत् घोषणा की। घोषणा सुनकर रुद्रक पँवार सामने आया और पान उठाकर खा गया। फिर वह कंधेपर लाठी रखकर मंडपमें घुसकर कोहवरके दरवाजेपर लाठी रखकर खड़ा हो गया। फिर उसने सोचा कि अगर लोगोंने मुझे यहाँ खड़े देख लिया तो वे मुझे चोर कहकर पुकारेंगे और मेरी बड़ी बदनामी होगी। अच्छा तो यह होगा कि जाकर महराकी सब गायोंको गवां करूँ। यह सोचकर वह परिखाके मचानपर पहुँचा और महराकी सब गायोंको खोलकर सजरिया बाजारकी ओर ले चला। तब नन्हुआ परघाइ उसके पास आया और पूछा—हमसे क्या गलती हुई है जो हमारी गायोंको तुम लिये जा रहे हो ! क्या उन्होंने राजाका खेत चरा है या फुलवारी उजाड़ी है ! रुद्रक बोला—न तो उन्होंने खेत खाया है न फुलवारी उजाड़ी है, फिर भी मैं इन्हें ले जाकर रूपली बाजारके माठामें दूँगा। अगोरियामें महराक्य को खबर है उसे जब यह खबर मिलेगी तो वह गायोंको छुड़ाने आयेगा उस समय मैं उसे मार डालूँगा। इस प्रकार राजाके प्रति अपना वचन पूरा करूँगा। अगर वह निर्बल होगा तो मेरा नाम सुनकर ही मंजरीको छोड़कर रातोरात गौरा भाग जायेगा और मैं मंजरीको राजाके रनिवासमें पहुँचा दूँगा। यह कहकर रुद्रक गायोंको लेकर रूपलीके बाजारमें पहुँचा और उन्हें मठामें देकर सड़कके किनारे आरामसे सो रहा। नन्हुआ भागता हुआ अगोरिया पहुँचा। और मकानके पिछवाड़े जाकर जोरसे चिल्लाया—ग्यम्हा हमारे मित्र नहीं, शत्रु हैं। जिस दिनसे बारात आयी है उस दिनसे हमारी गायोंके ऊपर आपत्ति आ रही है। और मंडपकी ओर जाकर गाली देने लगा। लोरिककी नींद खुल गयी और मंजरीसे बोला—इतनी रातको गालियाँ कौन दे रहा है ! वह बोली—आजकी रात तुम गालीपर मत ध्यान दो। ससुराल आये हो। शत्रु मित्र सभी गाली देंगे। लोरिक इस उत्तरसे सन्तुष्ट न हुआ। और उठकर नन्हुआके पास पहुँचा और गाली देनेका कारण पूछा। नन्हुआने जब उसे स्थिति बतायी तो लोरिक उसके साथ चल पड़ा और रूपलियाके बाजार पहुँचा। पहुँचते ही उसने माठाका फाटक तोड़ दिया। तब गायें निकल बाहर हो गयीं। उसके बाद वह रुद्रकके पास आया। उसे सोता देख बोला— सोए हुए शत्रुको मारना अपराध है। यह सुनकर नन्हुआ रुद्रकको जगानेकी कोशिश करने लगा पर उसकी नींद टूटती ही नहीं थी। तब उसने पासमें पड़ी मट्टीने शब्दको खोलकर मटका दिया। वै

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टटक्कर ऊरुब्रूकी ओर भागीं। उनके भागनेसे धूल उड़कर जब ऊरुब्रूकी नाकमें घुसी तो वह छींकता हुआ उठ खड़ा हुआ। देखा भाठेका दरवाजा खुला हुआ है और सामने ओरिक खड़ा है। तत्काल वह लड़नेके लिए तैयार हो गया। दोनोंमें बात तय हुई कि पहले तीन बार ऊरुब्रू वार करेगा और उसके पीछे तीन बार ओरिक करेगा। ऊरुब्रूक तीनों बार खाली गये और ओरिकने एक ही वारमें उसका सिर काटकर नीचे गिरा दिया। ऊरुब्रूका सिर उड़कर इन्द्रके दरबारमें पहुँचा और वहाँ नाचने लगा। इन्द्रने उसे देखकर कहा—अभी तुम्हारी मौत नहीं है, तुम यहाँ कैसे आ गये ? वापस जाओ। और वह सिर पुनः आकर धड़से जुड़ गया और ऊरूब्रूक उठकर खड़ा हुआ और ओरिकसे फिर लड़ना शुरू किया। ओरिकने पुनः अपनी खड्गसे उसका सिर काट दिया और वह पुनः इन्द्रके दरबारमें पहुँचा। इन्द्रने पुनः वहाँसे खदेड़ा और वह फिर आकर अपने धड़से जुड़ गया। तीसरी बार जब ओरिक खड्ग लेकर आगे बढ़ा तो देवीने उसे संकेत किया कि यदि इस बार उसका सिर इन्द्रके दरबारमें पहुँचा तो इन्द्र उसे आशिष दे देंगे। यदि वह पुनः धड़से जुट गया तो फिर वह न कभी काटे कटेगा न मारे मरेगा, न पानीमें डूबेगा और न आगम जलेगा। उस समय उसे मार सकना असम्भव होगा। इसलिए दायें हाथसे खड्ग चलाओ और बायें हाथसे उसका सिर लपक लो ताकि उसका सिर यहीं रह जाये और वह लड़ाईके मैदानमें ही मर जाये। तदनुसार ओरिकने खड्ग मारा और जैसे ही सिर आकाशकी ओर जाने लगा उसे उसने बायें हाथसे पकड़ लिया और उसे लेकर बैंगोरिया पहुँचा। और उसे लाकर मण्डपमें टाँग दिया। स्वयं कोहबरमें आकर खूनसे सने खड्गको सेजके सिरहाने रख चादर तानकर सो रहा। ओरिकको नींद आ ही रही थी कि डढिया दरवाजेपर आ पहुँचा। स्वप्नमें देवीने मंजरीको इसकी सूचना दे दी वह तुरन्त दरवाजेपर पहुँची और दरवाजेकी साँस मेंसे देखा कि डढिया दरवाजा रोककर खड़ा है। लौटकर उसने ओरिकका हाथ हिलाकर इशारेसे बताया कि बाहर शत्रु आया हुआ है। ओरिकने उठकर जैसे ही दरवाजा खोला डढिया भाग खड़ा हुआ। ओरिकने झपटकर पकड़ लिया और उसका सिर काट डाला। सिर मुण्डको इतनी जोरसे फेंका कि वह मलयगीतके दरबारमें जा गिरा। ओरिक पुनः आकर कोहबरमें सो रहा। जब आकाशमें लाली छायी और कोयल बोलने लगी तो अनुसियाकी नींद टूटी। वह झाड़ू लेकर घर बुहारने लगी। घर बुहारकर वह आंगनमें पहुँची। आंगन बुहार चुकी तो सिर उठाया। देखा—मंडपमें एक सिर लटक रहा है। उसे देखते ही वह रोने लगी। उसका रोना सुनकर सब लोग घबड़ाकर उठे। मंडपमें आकर मुण्डको उन्होंने देखा। अनुसिया बोलकर मरण मनियारके पास पहुँची; उन्हें जगाया और रो-रोकर बताया कि मलयगीतने ओरिकको मार डाला और उसका मुण्ड मंडपमें टाँगा है।

१७६ यह सुनते ही सँवरू बेहोश हो गया। होश आनेपर वह कनकासे गया और लोरिकके मारे जानेकी सूचना दी। मिया गुरूको इस बातपर तनिक भी विश्वास न आया। बोले—अपने शिष्य- को मैं जानता हूँ। वह भेड़-बकरी नहीं है, जो रातमें कोहबरमें मारा जाये जान पड़ता है किसी शत्रुसे उसकी मुठभेड़ हुई थी और उसे मारकर उसने मंडपमें टांग दिया और खुद मस्त होकर सो रहा है। इसलिए चलो चल कर मुण्डकी पहचान तो की जाय। और सँवरूको लेकर मिया अगोरियाकी ओर चल पड़े। मंडपमें पहुँचकर उन्होंने मुण्डको उठा लिया और देखकर बोले—यह सिर हमारे शिष्यका नहीं वरन् उसके पँवारका है। मेरा शिष्य तो कहीं सोता होगा। यह सुनते ही अगुनियां दौड़ी हुई कोहबर के दरवाजे पर पहुँची और धक्का देकर दरवाजा खोल और भीतर घुस गयी। देखा—वहाँ पति-पत्नी दोनों ही थे। लोरिक तत्काल कमरेसे बाहर आया। उसे जीवित देख सँवरूकी प्रसन्नताका वारपार न रहा। उसने दहेजमें मिली चीजोंको बरातियोंमें बाँट दिया और उन्हें अपने घर जानेको कह दिया। कूचे काका भी समधियानसे मिले सामानको लेकर घरकी ओर चल पड़े। अगोरियामें केवल सँवरू और लोरिक दोनों भाई रुक गये। कुछ दिन बाद सँवरू भी दहेजमें मिले जानवरोंकी व्यवस्था कर गौरा गुजरात चले गये। अन्तमें लोरिककी विदाई हुई। पाल्की ढोने वाले कहारोंने पूछा—किस रास्ते चला जाय ? लोरिकने कहा—यदि हम चुपचाप अपना डोला ले चलें तो राजा मल्ल पित अपनी बड़ाई करेगा और कहेगा कि अहीर निबल था इसलिए अगोरिया छोड़ कर भाग गया। तुम लोग डोला अगोरियाके बीच बाजारसे उस रास्तेसे ले चलो, जो उसके दरबारसे होकर जाता हो। कहार उसीके अनुसार चल पड़े। जब राजा मल्लपतिको सूचना मिली कि महरका दामाद डोला लेकर जा रहा है तो उसने अपनी फौजको तैयार होनेका आदेश दिया। फौज किलेसे निकल कर गलीमें पहुँची। एक ओर राजा मल्लपतिकी विशाल सेना और दूसरी ओर अकेला लोरिक। लोरिकपर हथियार गिरने लगे। लोरिकने भी अपनी साँड़ खींच ली। उसकी चका चौंधसे पल्टन थर्रा गयी। लोरिक साँड़ चलाने लगा और गलीमें खूनकी नदी बह निकली। थोड़ी देरमें मल्लपतिकी फौज भाग चली। युद्ध जीतकर लोरिक अपने डोलेके साथ आगे बढ़ा। मल्लपतिके मकानके सामने पहुँचकर डोला उसके सायेमें अटक गया। यह देख कर लोरिकने अपनी टाँगी चलायी और मकान ढह पड़ा। डोला फिर आगे बढ़ा। पहली ड्योढ़ी पार कर दूसरी ड्योढ़ीपर पहुँचा। वहाँ मल्लपतिका हथिसार था। लोरिकने उसे अपनी टाँगीका मजा दिया जिससे मकान हिल उठा और उसके

छप्पन नीचे गिर पड़े। इस प्रकार राज्यके मकानोंको गिराता हुआ लोरिक जब आगे बढ़ा तो उसने देखा कि एक धिक्कार टँगा हुआ है जिसमें लिखा था कि चौछापर बिना हमसे लड़े और हमें बिना पराजित किये जाओगे तो मैं यही समझूँगा कि तुम डरकर भाग गये। उसे पढ़कर लोरिकने चौछा पहुँच कर रुकनेका निश्चय किया। जब महराने देख लिया कि लोरिक और मंजरी नगरसे बाहर पहुँच गये तो वह अपना वचन पूरा करनेके लिए राजाके यहाँ पहुँचा। बोला—बेटीका विवाह कर मेरी जाँघ पवित्र हुई और मेरा वचन भी पूरा हो गया। अब यदि आपमें शक्ति हो तो लोरिकको मार कर सहप मंजरीका डोला अपने घर ले आयें। यह सुनकर मलयगिन्नने पानका बीड़ा रखा और घोषणा कर दी कि जो वीर बीरा बनायेगा उसे डालभर सोना इनामम मिलेगा। महराके दामादको मार कर मञ्जरीको गढ़में लानेपर उसे आधा राज्य दिया जायगा। यह सुनकर जुबरी पण्डितको लालच हुई और उन्होंने पानका बीड़ा उठाकर खा लिया और कांखमें पोथी-पत्रा दाब कर चौछाकी ओर चले। नगरसे बाहर आते ही लोरिककी नजर उनपर पड़ी और उसन मंजरीसे कहा—एक आदमी अंगोरियासे आता हुआ जान पड़ता है। जरा देखो तो कौन है। मंजरीने देखकर कहा—यह तो विवाह कराने वाले पण्डितजी हैं। मालूम होता है जेठजीने उनकी कुछ दान दक्षिणा रोक ली है। हो सकता है और कोई दूसरी ही बात हो। आ रहे हैं तो उनका आदर-सत्कार कीजिये। जब पण्डितजी निकट आये तो लोरिकने उन्हें प्रणाम किया। पण्डितजीने आशीर्वाद दिया। लोरिकने कन्धेसे चादर उतार कर बिछा दिया और बैठनेके लिए कहा। कुशल क्षेम पूछनेपर जुबरी पण्डितने कहा—घरपर तो सब कुशल है। इस समय मैं तुम्हारी ही कुशल कामनासे आया हूँ। तुम एक स्त्रीके लिए नाहक अपने प्राण दे रहे हो। तुम्हारे विरुद्ध मलयगिन्नने अपनी बेशुमार फौज खड़ी कर रखी है और वह अपने सब नाते-रिश्तेदारोंके पास खबर भेज रखा है। नौगढ़के सोम्भारको अपने किलेमें बुलाकर रख छोड़ा है। मेरा कहना मानो मञ्जरीको छोड़ दो। मैं उसे मलयगिन्नके दरबारमें पहुँचा आऊँ। तुमको उसके दूने वजनके बराबर धन तौल कर दिलवा दूँगा। तुम गौरा वापस जाकर दूसरी शादी कर लेना और उसी स्त्रीको मञ्जरी समझ लेना। इतना सुनना था कि लोरिक जलकर अंगार हो उठा। बोला—मलयगिन्न का मुझे तनिक भी डर नहीं। उसके घरको मैं गिरा आया उसकी फौज मैंने मार डाली और उसके देखते-देखते अपना डोला चौछाके किनारे तक ले आया। अब तक मैं कभीका गउरा गुजरात जा चुका होता लेकिन उसका धिक्कार सुनकर रुका हुआ हूँ। मलयगिन्नके गर्वको तोड़कर ही मैं यहाँसे जाऊँगा। राजाके गढ़में जो भी बहू बेटी हों उन्हें यहाँ ले आओ और उनके वजनका दूना धन मुझसे लेकर जाओ। मैं

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उन्हें अपने साथ ले जाऊँगा। राजाको बहुत सी बहू-बेटियाँ मिल जावेगी। वह किसी को भी अपनी बेटी-बहू समझ लेगा। इतना कहकर उसने पण्डितजीकी खूब मरम्मत की। पण्डितजीने लौटकर मल्लगीतको अपनी दुर्व्यवस्था कह सुनायी। मल्लगीतने दुबारा पानका बीड़ा रखा। इस बार शफ़ा मावने बीड़ा उठाया और ढाकका डोना लेकर घर पहुँचा। अपनी पत्नीको चर्खा चलाते देखकर क्षुब्ध हुआ और चर्खेको उठाकर फेंक दिया वह चूर-चूर हो गया। बोला— अब क्या चर्खा चलाती हो। अब तो मैं राजाके राज्यमें आधेका हिस्सेदार हूँ। लङ्केके धूप-मात लायेंगे। मैं चौंसा जा रहा हूँ। महराके साझलको मारकर मंजरीको कच्ची दरबारमें पहुँचाता हूँ। यह सुनकर उसकी पत्नीने उसे बहुत समझाने-बुझानेकी कोशिश की पर उसके मनमें कुछ समा नहीं। जब अँगोरियाके बाहर निकला। उसे आते देख मञ्जरीने कहा— राजाका पीरव्हाई है, इससे होशियार रहना। शफ़ाने पहुँच कर मल्लगीतकी बहुत बड़ाई की और राजाकी बात मान जानेके लिए समझाया। लोरिकने शफाकी भी दुर्गति की और वह भागकर राजाके पास पहुँचा। राजाने सोच विचार कर फिर पानका बीड़ा रखा। इस बार सैयद कुल्हाने पानका बीड़ा उठाया। उसने दो सौ साठ कुल्होंको एकत्र किया और उनको साथ लेकर चौंसाकी ओर चला। लोरिकने उन्हें आते ही मार कर भगा दिया। मल्लगीत सोच विचार कर ही रहा था कि नौगढ़के राजाकी सेना आ पहुँची और तैयार होकर चौंसाकी ओर चली। उसे देखकर मञ्जरीने लोरिकसे कहा— तुम अकेले हो और राजाकी सेना असंख्य है। उसका सामना न कर सकोगे। इसलिए अच्छा होगा तुम मुझे अकेले छोड़कर चले जाओ। यह सुनकर लोरिक क्रुद्ध हुआ। बोला—अगर यही बात थी। तुम्हें मल्ल गीतके ही घर रहना पसन्द था तो क्यों गौना तिलक भेजा और ब्याह क्यों रचाया? मुझे व्यर्थकी परेशानी उठानी पड़ी। जान पड़ता है मल्लगीतसे तुम्हें प्रेम है। मञ्जरी बोली—यदि मल्लगीतपर मेरा तनिक भी ध्यान हो तो मेरा शरीर जलकर खाक हो जाये। अगर मेरा तनिक भी ध्यान उसके प्रति होता तो आपके प्रति क्यों आकृष्ट होती! तुम्हारे भाई सबरू गायोंका संदेश पाकर घर भाग गये। उन्हें गायोंसे प्रेम था। तुम्हारे गुरु पिता गवहोंको लेकर घर चले गये। अकेले आप नाहक मेरे पीछे मरेंगे। जिस समय मैं घरसे डोलीमें निकली, उसी समय मैंने अपने आँचलमें विष बाँध लिया था। सोच लिया था कि यदि आप युद्धमें मारे गये तो विष खाकर अपने प्राण तज दूँगी। यह सुनकर लोरिकने कहा—क्या विष तो दिखाओ; मैंने कभी देखा नहीं है। और विषको लेकर अपनी चुटकीसे मलकर हवामें उड़ा दिया। यह देख मंजरी

३७९ अत्यन्त दुखी हुई और बोली—इज्जत बचानेका जो साधन मेरे पास था उसे तो आपने फेंक दिया। अब मैं अपनी इज्जत किस प्रकार बचाऊँगी ? इतनेमें सेना निकट आ पहुँची। लोरिक भी लंगोट कस कर तैयार हो गया। गौराके देवी देवताओं को स्मरण कर उसने म्यानसे खाड़ बाहर निकाल ली। जब सेनाने लोरिकको चारों ओरसे घेर लिया तब लोरिकने सैनिकोंको ललकारा और ललकार कर लगा उन्हें मारने। लोरिक को लड़ते देख मलयगिलसे उसके मन्त्रीने कहा—जब तक यह अहीर लड़ रहा है तब तक मजरीका डोला यहाँसे उठाकर रनिवासमें ले जाकर बैठा दिया जाय। वह जब वहाँ पहुँच जायेगी तो आपकी हो ही जायेगी। उसके बाद तो यह अहीर शर्मके मारे जा छिपेगा। यह सुनकर मलयगिलने मञ्जरीका डोला उठाने का आदेश दिया। संकट आया देखकर मञ्जरी डोलेसे बाहर निकल आयी। साड़ीको फाड़कर मूसल उठा लिया और उसीसे फौजपर आघात करने लगी। एक ओरसे मञ्जरी फौज पर आघात कर रही थी और दूसरी ओरसे लोरिक। दोनों सेनापर आघात करते करते आमने-सामने आ पहुंचे। मञ्जरीने मूसल चलाया लोरिकने उसे खड्गपर रोक लिया। और तब दोनोंने एक दूसरेको पहचाना। लोरिक बोला—मैं सेनाको अकेले मारनेके लिए पर्याप्त हूँ। तुम क्यों जूझ रही हो ! सेनाको अकेले मार कर ही मैं तुम्हें ले जाऊँगा नहीं तो तुम घर जाकर अपनी बड़ाई करोगी कि पतिके साथ मैं भी लड़ी थी और लड़कर मैंने ही जीत करायी। इस तरहकी बातमें मेरी बदनामी होगी। इतना कहकर लोरिकने मञ्जरीको अलग कर दिया और फिर जूझने लगा। सवा पहर तक लड़ाई होती रही। अन्तमें सेना मर कर समाप्त हो गयी। मलयगिलने हार कर अपने भानजे निर्मल परिहारको तमाम सेना लेकर आनेको कहना भेजा। सूचना मिलते ही निर्मलने छत्तीस हजार सेना तैयार करायी। घर में नयी आयी बहुने उसे रोकनेकी कोशिश की परन्तु उसकी बात अनसुनी कर वह अगारिया पहुँचा। तत्काल अपने हाथी कलुआको मदमस्तकर अस्सी मनकी जंजीर देकर लोरिककी ओर भेजा। कलुआ इन्द्रका हाथी था और उसे उन्होंने अपने भक्त निर्मलको दिया था। उसे आते देख मञ्जरी डोलेसे बाहर निकल पड़ी और एक पैरपर खड़ी होकर कहने लगी—जिस समय मैं इन्द्रपुरीमें थी उस समय मैंने तुम्हारी बहुत सेवा की थी; उस बातका ध्यान रखकर इस सिन्दूरकी रक्षा करो। मञ्जरीकी बात सुनते ही हाथी लौट पड़ा। उसे लौटते देख निर्मलने सोचा कि अभी उसे पूरा नशा नहीं हुआ है। अतः पुनः उसे नशा पिलाकर वापस भेजा। उसे आते देख मञ्जरीने लोरिकसे कहा— मालूम होता है निर्मलने इस बार उसे नशा पिला दिया है इसलिए वह इस बार मेरी बात नहीं मानेगा। उसका सामना करनेके लिए तैयार हो जाओ।

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हाथी शरीर उठाकर घुमाने लगा। लोरिक उसे बचाकर इधरसे उधर हो जाता। इस तरह बचाव करते करते जब सवा पहर बीत गया। तब हाथीने मौका पाकर लोरिकको अपनी सूँडमे पकड़ लिया और अपने पैरके नीचे दबाकर चीत्कार करने लगा। उसकी चीत्कार सुनकर निर्मलने मलयगिरिसे कहा कि तुम्हारा दुश्मन मारा गया। लेकिन तत्काल देवी लोरिककी सहायताके लिए आ पहुँचीं। दाबनेके लिए हाथीने जैसे ही पैर उठाया वैसे ही लोरिक कूदकर दूर जाकर खड़ा हो गया। देवीने खड्ग चलानेका आदेश दिया। लोरिकने साठ पुरण ऊपर कूदकर हाथीकी सूँडपर खड्ग चलायी। हाथी व्याकुल होकर भाग चला। निर्मलने जब यह देखा तो बोला— यह तो अनहोनी बात हो गयी; और वह क्रुद्ध होकर अपनी सेना लेकर बाहर निकला और अग्निबाण चलाने लगा। लोरिक उनको अपनी ढालसे रोकने लगा। जब निर्मलके सारे अग्निबाण समाप्त हो गये तब उसने चक्र चलाना शुरू किया। इस प्रकार उसने एक एककर अपने सभी अस्त्र शस्त्र चलाये। जब वे सब-के सब समाप्त हो गये तब निर्मल और लोरिक दोनों आपस में भिड़ गये। इस प्रकार लड़ते-लड़ते जब सवा पहर बीता तब देवी अलन्त हुडाका रूप धारणकर वहाँ पहुँचीं और बोलीं—हमने तो ऐसी लड़ाई नहीं देखी जिसमें आपसमें गुथकर लड़ते हों। यदि तुम क्षत्रियोंके वंश हो तोएक दूसरेसे अलग होकर लड़ो। यह सुन दोनों एक दूसरेको छोड़कर अलग हुए। निर्मल दस लोरिक बीस दूर हटा। जब दोनों ढाल लेकर लड़नेको तैयार हुए तब देवी लोहेकी सूई बनाकर वहाँ डाल गयीं, जिसमें निर्मलका पैर उलझ गया। लोरिकने तत्काल साँङ चलायी निर्मल जमीनपर गिर गया। निर्मल फिर उठकर खड़ा हुआ तो लोरिकने दूसरा हाथ मारा और निर्मलका सिर कटकर अलख जा गिरा। वह सिर इन्द्रके यहाँ पहुँचा। उसे देखते ही इन्द्रने कहा कि अभी तुम्हारी मृत्यु नहीं है वापस जाओ। वह सिर पुनः लौटकर निर्मलके धड़से जुड़ गया। सिर जुड़ते ही निर्मलने हथियार उठाया। लोरिकने दुबारा साङ चलायी और सिर कटकर फिर इन्द्रके पास पहुँचा। इन्द्रने उसे पुनः वापस भेज दिया। इस प्रकार लोरिकने छः बार सिर काटा और हर बार वह इन्द्रके पास गया और लौट आया। जब सातवीं बार आकर सिर धड़से जुड़ा और लोरिकने मारनेको साङ उठाया तो देवीने चेतावनी दी कि यदि इस बार उसका सिर इन्द्रके पास पहुँच गया तो अमर हो जायेगा और वह फिर किसी भी उपायसे मारे नहीं मरेगा। इसलिए बायें हाथसे मारो और दायें हाथसे उसे पकड़ लो। तदनुसार लोरिकने दाहिने हाथसे खड्ग चलायी और बायें हाथसे उसका सिर पकड़कर भूमिपर पटक दिया। फिर निर्मलकी रही सही सेनाको भी मार भगाया। फिर वह अपनी पत्नीके डोलेके पास आकर बैठ गया। उधर गौरामें लोरिककी माँ कुन्दनाने स्वप्न देखा कि बेटेके साथ युद्ध हो रहा है। वह तत्काल गुरु सिताके पास पहुँची और स्वप्नकी सारी बातें कह सुनायीं। सिताने

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कहा—तुम निश्चिन्त रहो। लोरिकका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। माताको तो समझा-बुझाकर घर भेजा और स्वयं पूरी तैयारीके साथ वह बोहा बथान पहुँचा और सोते हुए सँवरू को जगाया और उसे लेकर अगोरिया चल पड़ा। जब दोनों सोनपीके किनार पहुंचे तो वह खूनकी धारासे भरा हुआ दिखाइ पड़ा। दोनोंने सोनपीको कूदकर पार किया और पूर्व दिशाकी ओर दूरपर उन्हें मञ्जरीके डोलेका पर्दा चमकता हुआ दिखाइ पड़ा। उसे देखकर मिताने सँवरूको दिखाया। तब सँवरूको विश्वास हुआ कि भाई अभी जीवित है। मिताने कहा—मैं यहींसे बैठे-बैठे लोरिकका पता लगाता हूँ। यदि चौतापर लोरिक होगा तो जो बाण मैं फेंक रहा हूँ, उसे वह रोक लेगा यदि कोई शत्रु होगा तो मेरा यह बाण वापस लौट आयेगा। इतना कहकर मिताने तिलङ्गी बाण छोड़ा। उस बाणको देखते ही मञ्जरीने लोरिकसे कहा—तुमने इतनी बड़ी सेनाको परास्त तो कर दिया परन्तु अब जो यह बाण आरहा है उससे बचना कठिन है। यह सुनकर लोरिकने कहा—लड़ाईके कारण मेरी आँखोंमें खून भर गया है, इसलिए पूर्व-पश्चिम कुछ नहीं दिखाई दे रहा है। बताओ किस ओरसे बाण आरहा है और कितना तेज आ रहा है। मञ्जरीने बताया—बाण पश्चिमसे आ रहा है और धरती-आसमानके बीच गरजता हुआ आ रहा है। लोरिकने कहा—निश्चय ही यह मेरे गुरुका बाण है। इतनेमें बाण लोरिकके पास आ पहुँचा। लोरिकने उसमें अपनी छाती लगा दी। बाण मिताके प्यारसे लोरिकको चूमने लगा। इस प्रकार बाणको गये जब एक घण्टा बीत गया और वह नहीं लौटा तो मिताने जान लिया कि लोरिक जीवित है। दोनों चौखाकी ओर चल पड़े। लोरिक मिता और सँवरूको आते देखकर उठ खड़ा हुआ और उन दोनोंसे गले मिला। मिताने सँवरूसे कहा कि अब यहाँ रहनेका कोई काम नहीं रह गया वापस चलो। लेकिन सँवरूने कहा—जब आये ही हैं तो चलो अगोरिया चलें और वहाँसे गौना और दौंगा¹ दोनों ही रस्म पूरी कराते चलें। अगोरिया पहुँचकर सँवरूने टांकेको चोकपर रखवा दिया। इन लोगोंको देखकर मख्यामित पहले तो बहुत भयभीत हुआ और डरके मारे सिंहासनसे उठ खड़ा हुआ। फिर सम्हलकर बोला—एक बात मेरी मानो। मैं यह त्रिशूल गड़वाता हूँ, जो इसे उखाड़ लेगा मञ्जरी उसीकी पत्नी होगी। यदि त्रिशूल नहीं उखड़ा तो मञ्जरी मेरी हो जायेगी। इतना कहकर उसने त्रिशूल गड़वा दिया। सँवरूने लोरिकसे कहा—युद्ध करनेके कारण तुम थक गये होग इसलिए तुमसे शायद न यह त्रिशूल उखड़ सके। यदि मञ्जरी राजाकी पत्नी हो जायेगी तो अबतक किया हुआ सारा श्रम व्यर्थ हो जायेगा। कहो तो मैं इसे उखाड़ दूँ। १ गौनाके पश्चात् वधूके मायके भेजने करानेकी रस्मको "दौंगा" कहते हैं।

१८२ गोरिकने उत्तर दिया— मम्मगिंतने बात फेरकर कही है। यदि तुम उलाडोगे तो मंजरी तुम्हारी पत्नी हो जायेगी। इस प्रकार उसने सब तरहसे धर्म नष्ट करनेका षड्यन्त्र किया है। मुझ ही त्रिशूल उलाडने दो। उलटडगा तो उपजेगा नहीं उलटा तो मैं मम्मगिंतको ही मार डालूँगा। इतना कहकर गोरिकने सात पुरुखा उछलकर त्रिशूल उलाड दिया। यह देखते ही मम्मगिंत डरा और भाग निकला। गोरिकने उसका पीछा किया। मम्मगिंत रनिवासमें घुसा ही था कि गोरिकने अपनी साँड़ चलायी वह वहीं ढेर हो गया। उसके बाद वे लोग महराके घर पहुँचे। दूसरे दिन मंजरीको विदा करा के लोग घर लौट आये। ✕ ✕ ✕ जिन दिनों गोरिक अगोरियामें मंजरीसे विवाह करने गया हुआ था उन्हीं दिनों सहदेवने चन्द्राके विवाहकी तैयारी की और डिग्हट्टमें दिगम्बरके साथ तिलक चढा दिया। निश्चित समय पर बारात आयी और विवाह कराकर बारात चली गयी। वे लोग चन्द्राको छोड़ गये कि गौनेके समय ले जायेंगे। दिगम्बर महाबीर था। एक दिन उसने दूध पीकर दोना फेंक दिया। उसी रास्ते शिवजी जा रहे थे। दोनेमें दूधका फेन लगा देखकर उनका मन चञ्चल उठा और उनसे रहा न गया। उन्होंने उसे उठाकर चाट लिया। कैलाश जाकर जब वे पार्वती के साथ रमण करने लगे तो वे परेशान हो उठीं फिर भी शिवजीको सन्तोष नहीं हुआ ! पार्वती ने इसका कारण पूछा तो शिवजीने अपने दोना चाटनेकी बात कह सुनायी। जब पार्वती ने यह सुना तो सोचने लगीं—जिस पुरुषके जूठे दोनेके चाटनेके कारण मेरे पति इस प्रकार कामातुर हो उठे हैं तो वह जिस स्त्रीका पति होगा उसकी न जाने क्या गति होती होगी। यह सोचकर पार्वती ने दिगम्बरको शाप दे दिया जिससे वह काम-रहित हो गया। जब दिगम्बर चन्द्राको गौना कराकर अपने घर ले गया तो उसने देखा कि दिगम्बर कभी घर नहीं आता उसकी सास ही उसके लिए भोजन बनाकर जिस मकान में ले जाती है। उसके मनकी उमंगें मनमें ही घुटकर रह जाती थीं। अतः एक दिन उसने स्वयं भोजन ले जानेका निश्चय किया और अपने मनकी बात साससे कही। सासने भोजन ले जानेकी अनुमति सहर्ष दे दी। वह सम्पूर्ण शृंगार कर भोजन लेकर चली। जब वह मकानके निकट पहुँची तो उसकी नूपुरोंकी झंकारसे गायें बिहुँक उठीं। यह देख दिगम्बरने सोचा कि कोई बनिया हाथीको लेकर चला आ रहा है, जिसकी घंटी सुनकर गायें भड़क उठीं हैं। तभी उसकी दृष्टि चन्द्रापर पड़ी। उसे देखते ही वह अपनी असमर्थता पर अत्यन्त दुःखी हुआ। खिन्न मनसे किसी प्रकार उसने भोजन किया। भोजन कर चुकनेके बाद भी चन्द्रा दिगम्बरकी प्रतीक्षामें बैठी रही। किन्तु दिगम्बरने उससे बात तक नहीं की तब उसने दिगम्बरको

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१८४ जब चदाने बठवाको पीछा करत हुए आते देखा तो पास ही भैंस चराते वाले चरवाहेको देखकर बोली—तुम मेरे धर्म के भाई हो। चमार मेरा पीछा कर रहा है। उसे मत बताना कि यहाँसे मैं गयी हूँ। इस प्रकार रास्तेमें जितने लोग मिले सबसे विनय करती हुए वह आगे बढ़ती गयी और शीघ्र ही वह गौरा अपने महलमें जा पहुँची। बठवा भी उसका पीछा करता हुआ गाँवमे पहुँचा और गाँवके लोगोंसे कहने लगा—चदासे मेरी शादी करा दो। लेकिन किसीने उसका उत्तर न दिया। राजा सहदेव भी उसको आते देख बहुत घबराये और महलमें छिप रहे। बाहर न निकले। जब किसीने उसकी बात न सुनी तो उसने गायोंकी हड्डी इकट्ठी की और गाँवके सभी कुओंमें डाल दी। इस प्रकार कुँओंको भ्रष्ट कर उसने सब पनघटको रोक दिया केवल उस कुएँको बख्श छोड़ जिसका पानी मिता और लोरिक भरते थे। इस तरह पानीका अभाव करके बठवाने गाँवके सभी लोगोंको परेशानीमें डाल दिया। उन्हें एक बूँद पानी मिलना कठिन हो गया। जब बुढ़िया कुण्डन अपने कुएँसे पानी भरकर मकानकी ओर जाती तो गौराके स्त्री-पुरुष रास्तेमें उससे माँगकर पानी पीते। इस प्रकार बीचमें ही उसके घड़ेका पानी समाप्त हो जाता। निदान वह दुबारा पानी भरने जाती। इस तरह बार-बार पानी भरते-भरते जब वह थक गयी तो मंजरी पानी भरने आयी। जब वह पानी भरकर गाँवमें घुसी तो लोग पानीके लिए दौड़े। पानी बाँटकर वह दुबारा कुएँ पर आयी। इस बार जब वह पानी भरने लगी तो बठवाने, जो अब तक चुपचाप बैठा था मंजरीसे कहा—तुम मेरे गुरुभाई की पत्नी हो। नाहक शत्रुता मोल ले रही और मेरे काममें विघ्न डाल रही हो। मञ्जरीने पूछा—तुम्हारे किस काममे विघ्न डाल रही हूँ! मैं तुमसे कौन-सी तकरार कर रही हूँ। बठवाने उत्तर दिया—तुम गौरामें मेरा विवाह होना रोक रही हो। गाँवके लोग चदासे मेरा विवाह नहीं कराते, इसलिए सब लोगोंको मैं बिना पानीके मार डालना चाहता हूँ। लेकिन तुम पानी भरकर उनको बाँट रही हो। इस बार पानी ले जा रही हो तो ले जाओ फिर लौटकर मत आना। यह सुनकर मंजरी चुपचाप चली गयी और लोगोंको फिर पानी बाँट दिया। जब वह पुनः कुएँकी ओर लौटी तो बठवा उठ खड़ा हुआ और बोला—मैं तुम्हें पानी भरने नहीं दूँगा। यदि तुम सीधे नहीं मानोगी, तो डोरी छीन लूँगा। इतना सुनना था कि मंजरी आग बबूला हो गयी। उसने डोरी कुएँमें फेंक दी और दोनों घड़ोंको कुएँ पर पटक दिया। वह रोती हुई घर पहुँची। कुण्डनसे बोली—पतिके रहते मेरा अपमान हुआ है। मैं जहर खाकर मर जाऊँगी। बठवाने

मेरा रास्ता रोका है। यदि मुझे जीवित देखना चाहती हो तो तत्काल पुढ़ियापुर जाकर स्वामी को सूचना दो और उन्हें बुला लाओ। उसकी बात सुनते ही सुखदिन पुढ़ियापुर पहुँची। मिता और लोरिक दोनों डंड रहे थे। माँ को आते देख दोनों खड़े हो गये और अगवाइक बाहर आये। माँ से कुशल पूछने लगे। माँने सारी स्थिति कह सुनायी। सुनकर लोरिक गुस्सेसे लाल हो गया और गुरु मिताका आशीर्वाद लेकर गौराकी ओर चल पड़ा। बठवाने उस देखते ही नमस्कार किया और अपने आनेका उद्देश्य कह सुनाया और कहा कि उसने कुएँ का छोड़ रखा है जिसमें वह और मिता पानी भरते हैं। अन्तमें बोला—तुम और मिता भले ही पानी भरो लेकिन दूसरोंको मैं पानी भरने न दूँगा। यदि तुम मेरे गुरुभाइ न होते तो इसमें भी हड्डी डाल देता। अभी मैंने पानी रोका है पीछे रास्ता भी रोक दूँगा। यह सुनकर लोरिक बहुत बिगड़ा। बोला—चमार होकर तुम अहीरकी बेटीसे विवाह करना चाहते हो। पहले मुझसे हाथ मिलाओ पीछे चंदासे शादी करना। फिर क्या था। दोनों परस्पर भिड़ गये। लोरिकने बठवाके दोनों पैरोंको पकड़कर ऊपर उठा लिया और इस प्रकार पटका कि वह दूर जाकर गिरा फिर वह उसकी छातीपर सवार हो गया और कटार निकाल ली। कटार निकलते देख बठवाने दुहाइ दी—तुम मेरे गुरुभाइ हो। जीवनभर डरकर मानूँगा; मुझे छोड़ दो। लोरिकने कहा—यदि मैं तुम्हें यों ही छोड़ देता हूँ। तो तुम जाकर गवरण अपनी बड़ाई करते फिरोगे। इसलिए तुम्हें गौरा आनेकी सौगात मिलनी ही चाहिए। और उसने उसका दाहिना आधा हाथ और नाक काट ली। लोरिकने बठवाको गौरासे भगा दिया यह सूचना जब महुवरके महलोंमें पहुँची तो उसकी खुशीका कोई ठिकाना न रहा। चंदाने मन ही मन निश्चय किया कि लोरिकने मेरी हर तरह रक्षा की है मैं अपनी इच्छा उसे ही दूँगी। यदि उन्होंने मुझे अपने साथ रखना स्वीकार नहीं किया तो मैं किसी औरके साथ नहीं जाऊँगी वरन् जहर खाकर मर जाऊँगी। यह निश्चय कर वह लोरिकसे भेंट करनेका उपाय सोचने लगी। राजाको एक पत्र लिखा कि मेरी इज्जतकी रक्षा हुई है इस खुशीमें आज सारे लोग पिखालियोंको दावत दीजिए। राजाको यह बात पसन्द आयी। उसने तत्काल सबको आमंत्रित करनेकेलिए न्योतहारको भिजवा भेज दिया। दावतके दिन बड़े जोरका धूम धाम था। उन सारे दावतका प्रबन्ध लोरिकपर सौंपा गया। लोरिक निःसंकोच पैर हिला और ... ... ...

१८६ उसे उठाकर लोरिक ऊपर देखने लगा। चंदाको देखते ही वह खाना भूल गया और पानी पीनेके बहाने बार-बार ऊपर देखने लगा। ज्योनार समाप्त होनेके बाद वह घर आकर अपनी माँसे बोला-सहदेवके घर ज्योनार अच्छी नहीं थी। थोड़ा चबेना दो। चबेना लेकर वह घरसे बाहर निकला और गाँवके दो-चार लड़कोंको साथ लेकर जंगलमें पहुँचा। लड़कोंसे काँस- कुश कटवाकर एक बरहा (मोटी रस्सी) तैयार करवायी। उसे लेकर वह गाँवमें लौट आया और उसे उसने अपने मित्र शिवचन्द्र कान्दूके घर रख दिया। जब शाम हुई और सब लोग खा-पीकर सो गये तो लोरिक घरसे निकला और अपने मित्रके घरसे बरहा लेकर राजा सहदेवके मकानके पीछे जा पहुँचा। मकानके झरोखेके पास खड़े होकर उसने बरहा ऊपर फेंका। उसकी आवाज सुनकर चंदा चौंक उठी। उसने खिड़की खोलकर नीचे देखा। लोरिकने बरहा फिर ऊपर फेंका। चंदाने उसे पकड़ लिया। जब लोरिक उसके सहारे ऊपर चढ़ने लगा तब चंदाको घबराहट सूझी। उसने रस्सी छोड़ दी, लोरिक नीचे गिर पड़ा और गाली देने लगा। फिर कुछ रुककर दुबारा रस्सी फेंकी और बोला-यदि इस बार तुमने रस्सी छोड़ी तो फिर पछताओगी। इस बार चंदाने रस्सी लेकर खिड़कीमें बाँध दी और उसके सहारे लोरिक ऊपर पहुँच गया। रातभर दोनोंने आनन्द मनाया। सुबह होनेसे पहले ही लोरिक खिड़कीसे उतरा, रस्सी अपने मित्रके घर रखकर, घर आकर सो रहा। यह क्रम दस-पाँच दिन चलता रहा। एक दिन चन्दाकी चादरसे लोरिककी चादर बदल गयी। चन्दाकी चादर सिरपर बाँधकर लोरिक घर चला आया। सुबह जब महरी आँगन बुहारने उठी तो उसकी नजर लोरिकपर पड़ी और वह ठठाकर हँस पड़ी। सासको बुलाकर बोली- जरा बाहर आकर देखो तो। धोबीका सामान आया है। लोरिकने जब यह सुना तो चादर उठाकर देखा; फिर पीछे हटकर मित्राके घर गया। वहाँ जाकर मित्रकी पत्नीसे बोला-आज तो मेरी बेइज्जती होना चाहती है। रातमें चन्दाके घर गया था; वहाँ मेरी चादर बदल गयी। ऐसा उपाय करो जिससे कोई कलंकी बात न जानने पावे। यह सुनकर मित्रकी पत्नी खिसिया उठी। उसने चादरको ले ली। उसको बाकायदे तह कर रखी थी और फिर महरूकी ओर चल पड़ी। रातभर जागनेके कारण चन्दा अतल नींदमें सोयी थी। जब मुन्दिया दासी उसे जगाने आयी तो उसके पास उसने लोरिककी चादर पड़ी देखी। उसने चन्दाका मुँह सूजा और शृंगार बिखरा हुआ देखकर वह रानीके पास पहुँची और बोली- जान पड़ता है कि चन्दाकी किसी पुरुषसे भेंट हुई। उसकी स्थिति तो है सो है ही; उसका प्रमाण भी पलंगके पास पड़ा है। यह सुनकर चन्दाकी माँ उसके पास पहुँची और पूछा-रात कौन आया था। चन्दाने उत्तर दिया-मैंने अपनी चादर धुलानेके लिए भेजी थी। धोबिन उसे धोकर देरसे दे गयी। मैं रातभर उसे ओढ़े रही और सुबह तह कर सिरहाने रख दिया। पता नहीं कि चादर किस तरह बदल गयी।

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यह बात हो ही रही थी कि बिरजा पहुँची और खिसियाकर बोली—रात मुझसे भूल हो गयी। मैं दूसरेकी चादर तुम्हें दे गयी। अपनी चादर ले लो। इस प्रकार वह लोरिककी चादर लेकर घर आयी और लोरिकको दे दिया। चन्दाकी बातपर पर्दा पड़ गया और लोरिक उसके पास फिर उसी तरह आने-जाने लगा। इस तरह कुछ दिन बीते। जब चन्दा गर्भवती हो गयी तो सारे गाँवमें इसकी गुपचुप चर्चा होने लगी। तब चन्दाने लोरिकसे कहा कि अब यहाँ रहना कठिन है। जहाँ चार स्त्रियाँ एकत्र होती हैं वहीं हम दोनोंकी चर्चा शुरू हो जाती है। इस तरह मेरी बदनामी हो रही है चलो हम दोनों कहीं भाग चलें। लोरिकने कहा—भादों समाप्त होने दो कुँवार आनेपर मैं तुमको भगाकर ले जाऊँगा। चन्दाने उत्तर दिया—यहाँ एक दिन भी ठहरना कठिन है। शामसे सुबह होनेतक मौत भी हो ले सकती। लोरिकने तब कहा—रास्तेका कुछ खर्च एकत्र हो जाने दो। भाईसे छिपकर कुछ जमा कर लूँ तो ले चलूँगा। चन्दाने कहा—तुम्हारी बुद्धि मारी गयी है। तुम पचीस-पचास एकत्र करोगे। इतनेमें रास्तेका खर्च कैसे चलेगा। खर्चकी चिन्ता तुम मत करो। पिताका घर भरा हुआ है। मैं सोनेकी एक पिटारी चुरा लूँगी तो दैवने १२ कत्तक दुर्भिक्ष पडे तब भी हम दोनोंका पाला नहीं छूटेगा। यह सुनकर लोरिकने पूछा—किस देश चलनेका इरादा है! चन्दाने कहा—करीब ही बंगालमें हरदी देश है। वहाँका राजा महुबरी जातिका है। उसके यहाँ धन अपार है। उस नगरमें महीपचन्द नामक बनजारा रहता है। वहीं मेरा चलनेका इरादा है। वहीं हम लोगोंका गुजारा हो सकता है। वैसे जैसी तुम्हारी मर्जी। इस प्रकार जब हरदी चलनेकी बात हो गयी तो चन्दाने कहा कि हरदी चल तो रहे हैं लेकिन इस बातका वादा करो कि तुम महुबरीके राजा और महीपचन्द पर कभी हाथ न उठाओगे। लोरिकने इसका वचन दे दिया। तदनन्तर दोनोंने पलायनकी योजना बनायी। लोरिकने कहा—अगर तुम पहले घरसे निकलो तो गौराके मुख्य मार्गसे आगे बढना और रास्तेमें जहाँ-तहाँ सिन्दूरका टीका लगा देना और आगे चलकर पकड़ीके पेड़के नीचे मेरी प्रतीक्षा करना। यदि मैं पहले बाहर निकला तो जहाँ-तहाँ मैं अपनी खाँड़ेसे निशान बना दूँगा। इस प्रकार शुक्रवार या सोमवार चलनेका दिन निश्चित हुआ। लोरिक अपने घर लौट आया। दूसरे दिन सुबह जब चन्दा शौचके निमित्त बाहर निकली तो रास्तेमें मजरीसे उसकी भेंट हो गयी। मजरीने चन्दासे पूछा—तुम्हें छतारमें दृश्य कोई कुँवारा