छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| द्विक्रोशेत्, अभिनद्धाक्षोऽहं गन्धारेभ्यस्तस्करेणानीतोऽभिनद्धाक्ष एव विसृष्ट इति ॥ १ ॥ | करके इस प्रकार शब्द कहे अर्थात् चिल्लावे कि मुझे गान्धार देशसे आँखें बाँधकर यहाँ चोर ले आया है और आँखें बँधे हुए ही छोड़ दिया है' ॥ १ ॥ |
-: ० :-
| एवं विक्रोशतः— | इस प्रकार चिल्लानेवाले— |
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तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन्पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहाचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्य इति ॥ २ ॥
उस पुरुषके बन्धनको खोलकर जैसे कोई कहे कि 'गान्धार देश इस दिशामें है, अतः इसी दिशाको जा,' तो वह बुद्धिमान् और समझदार पुरुष एक ग्रामसे दूसरा ग्राम पूछता हुआ गान्धारमें ही पहुँच जाता है, इसी प्रकार इस लोकमें आचार्यवान् पुरुष ही [सत्को] जानता है; उसके लिये [ मोक्ष होनेमें ] उतना ही विलम्ब है जबतक कि वह [ देहबन्धनसे ] मुक्त नहीं होता । उसके पश्चात् तो वह सत्सम्पन्न (ब्रह्मको प्राप्त ) हो जाता है ॥ २ ॥
| तस्य यथाभिनहनं यथा बन्धनं प्रमुच्य मुक्त्वा कारुणिकः कश्चिदेतां दिशमुत्तरतो गन्धारा | उस पुरुषके अभिनहन—बन्धनको खोलकर जिस प्रकार कोई कृपालु पुरुष कहे कि इस दिशामें उत्तरकी ओर गान्धार | | एतां दिशं व्रजेति प्रब्रूयात्स एवं कारुणिकेन बन्धनान्मोक्षितो | देश है; अतः इस दिशाकी ओर जा तो इस प्रकार उस कृपालु | | ग्रामाद्ग्रामान्तरं पृच्छन्पण्डित | पुरुषद्वारा बन्धनसे छुड़ाया हुआ |
| खण्ड १४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६८७ |
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| उपदेशवान्मेधावी परोपदिष्टग्रामप्रवेश मार्गाविधारणसमर्थः सन्गन्धारानेवोपसम्पद्येत, नेतरो मूढमतिर्देशान्तरदर्शनतृड्वा । | वह पण्डित—उपदेशवान् और मेधावी—दूसरोंके बतलाये हुए ग्राममें प्रवेश करनेके मार्गको ठीक-ठीक समझनेमें समर्थ पुरुष एक गाँवसे दूसरे गाँवको पूछता हुआ गान्धार देशमें ही पहुँच जाता है—दूसरा मूढमति अथवा देशान्तर देखनेको तृष्णावाला नहीं पहुँच पाता । | | यथायं दृष्टान्तो वर्णितः, स्वविषयेभ्यो गन्धारेभ्यः पुरुषस्तस्करैरभिनद्धाक्षोऽविवेको दिङ्मूढोऽशनायापिपासादिमान्व्याघ्रतस्कराद्यनेकभयानर्थव्रातयुतमरण्यं प्रवेशितो दुःखार्तो विक्रोशन्बन्धनेभ्यो मुमुक्षुस्तिष्ठति स कथञ्चिदेव कारुणिकेन केनचिन्मोक्षितः स्वदेशान्गन्धारानेवापन्नो निर्वृतः सुखीभूत्— | जिस प्रकार यह दृष्टान्त वर्णन किया गया है अर्थात् अपने देश गान्धारसे चोरोंद्वारा आँखें बाँधकर लाया जानेके कारण विवेकशून्य दिङ्मूढ तथा भूख-प्याससे युक्त होकर व्याघ्र-तस्कर आदि अनेकों भय और अनर्थसमूहसे सम्पन्न वनमें प्रवेशित किया हुआ पुरुष दुःखार्त होकर चिल्लाता हुआ बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिये उत्सुक था और वह किसी कृपालुद्वारा उन बन्धनोंसे छुड़ा दिये जानेपर किसी प्रकार अपने देश गान्धारमें पहुँचकर ही कृतार्थ यानी सुखी हुआ । | | एवमेव सतो जगदात्मस्वरूपात्तेजोऽबन्नादिमयं देहारण्यं वातपित्तकफरुधिरमेदोमांसास्थि- | ठीक इसी प्रकार संसारके आत्मस्वरूप सत्से तेज, जल और अन्नादिमय देहरूप वनमें जो कि वात, पित्त, कफ, रुधिर, मेद, मांस, अस्थि, मज्जा, शुक्र, कृमि |
६८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मज्जाशुक्रकृमिमूत्रपुरीषवच्छीतो- | और मल-मूत्रसे पूर्ण तथा शीतोष्णादि | | ष्णाद्यनेकद्वन्द्वसुखदुःखवच्चेदंमो- | अनेकों द्वन्द्व और सुख-दुःखसे युक्त | | हपटाभिनद्धाक्षो भार्यापुत्रमित्र- | है, यह जीव मोहरूप वस्त्रसे बँधे हुए | | पशुबन्ध्वादिदृष्टानेकविषयतृष्णा- | नेत्रवाला होकर तथा स्त्री, पुत्र, मित्र, | | पाशितः पुण्यापुण्यादितस्करैः | पशु और बन्धु आदि दृष्ट तथा अदृष्ट | | प्रवेशितः 'अहममुष्य पुत्रो ममैते | अनेकों विषयतृष्णाओंसे जकड़ा जाकर | | बान्धवाः सुख्यहं दुःखी मूढः | पुण्य-पापरूप चोरोंद्वारा प्रवेशित | | पण्डितो धार्मिको बन्धुमाञ्जातो | कर दिये जानेपर 'मैं इसका पुत्र हूँ, | | मृतो जीर्णः पापी पुत्रो मे मृतो | ये मेरे बान्धव हैं, मैं सुखी, दुखी, | | धनं मे नष्टं हा हतोऽस्मि कथं | मूढ़, पण्डित, धार्मिक अथवा बन्धु- | | जीविष्यामि का मे गतिः किं मे | मान् हूँ, मैं उत्पन्न हुआ हूँ, मरता | | त्राणम् ?' इत्येवमनेकशतसहस्रा- | हूँ, जरामस्त हूँ, पापी हूँ, मेरा पुत्र | | नर्थजालवान्विक्रोशन्कथञ्चिद्देव | मर गया है, धन नष्ट हो गया है, | | पुण्यातिशयात्परमकारुणिकं क- | हा ! मैं मारा गया, अब कैसे जीवित | | ञ्चित्सद्ब्रह्मात्मविदं विमुक्तबन्धनं | रहूँगा ? मेरी क्या गति होगी ? | | ब्रह्मनिष्ठं यदासादयति । तेन च | अब मेरा रक्षक कौन है ?' इसी | | ब्रह्मविदा कारुण्याद्दर्शितसंसार- | प्रकारके अनेकों सैकड़ों अनर्थजालोंसे | | विषयदोषदर्शनमार्गो विरक्तः | युक्त होकर रोता हुआ जब पुण्यकी | | संसारविषयेभ्यः 'नासि त्वं | अधिकता होनेसे किसी प्रकार किसी | | संसार्यमुष्य पुत्रत्वादिधर्म- | परम कृपालु सद्ब्रह्मात्मज्ञ बन्ध- | | वान्' किं तर्हि ? 'सद् | नमुक्त ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषको प्राप्त | | यत्तत्त्वमसि' इत्यविद्यामोहप- | होता है और उस ब्रह्मवेत्ताद्वारा | | टामिनद्धनान्मोक्षितो गन्धारपुरुष- | दयावश सांसारिक विषयोंके दोष- | | | दर्शनका मार्ग दिखाये जानेपर | | | सांसारिक विषयोंसे विरक्त हो जाता | | | है तथा 'तू संसारी नहीं है और न | | | इसके पुत्रत्वादि धर्मवाला ही है;' | | | तो कौन है ?—'जो सत् तत्त्व है | | | वही तू है' इस प्रकारके उपदेशसे | | | अविद्यामय मोहरूप वस्त्रके बन्धनसे | | | छुड़ाया जाकर गान्धारदेशीय पुरुष |
खण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ ६८९
| संस्कृत-भाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| वच्च स्वं सदात्मानमुपसंपद्य सुखी निर्वृतः स्यादित्येतमेवार्थमाहाचार्यवान् पुरुषो वेदेति । | के समान अपने सदात्माको प्राप्त होकर सुखी और शान्त हो जाता है—इसी बातको [ आरुणिने ] ‘आचार्यवान्पुरुषो वेद’ इस वाक्यसे कहा है । |
| तस्यास्यैवमाचार्यवतो मुक्ताविद्याभिनहनस्य तावदेव तावानेव कालश्चिरं क्षेपः सदात्मस्वरूपसम्पत्तेरिति वाक्यशेषः । कियान्कालश्चिरम् ? इत्युच्यते— | इस प्रकार आचार्यवान् तथा अविद्यारूप बन्धनसे मुक्त हुए उस पुरुषके लिये सदात्मस्वरूपकी प्राप्तिमें—इतना वाक्यशेष जोड़ना चाहिये—उतने ही समयतक देर अर्थात् कालक्षेप करना है—कितने समयतक देर है ? सो बतलाया जाता है— |
| यावन्न विमोक्ष्ये न विमोक्ष्यत इत्येतत् पुरुषव्यत्ययेन, सामर्थ्यात्; येन कर्मणा शरीरमारब्धं तस्योपभोगेन क्षयाद्देहपातो यावदित्यर्थः । अथ तदैव सत्सम्पत्स्ये सम्पत्स्यत इति पूर्ववत् । न हि देहमोक्षस्य सत्सम्पत्तेश्च कालभेदोऽस्ति, येनाथशब्द आनन्तर्यार्थः स्यात् । | जबतक कि वह [ देहबन्धनसे ] मुक्त न हो जाय । यहाँ प्रसंगके सामर्थ्यसे ‘विमोक्ष्ये’ को ‘विमोक्ष्यते’ इस प्रकार प्रथम पुरुषमें बदलकर अर्थ करना चाहिये । तात्पर्य यह है कि जिस कर्मसे उसके देहका आरम्भ हुआ था उसका उपभोगद्वारा क्षय होकर जबतक देहपात होगा [ तभीतक देर है ] । देहपात होनेपर तो वह उसी समय सत्को प्राप्त हो जायगा । ‘सम्पत्स्ये’ के स्थानमें ‘सम्पत्स्यते’ ऐसा पूर्ववत् पुरुषपरिवर्तन कर लेना चाहिये । देहपात और सत्की प्राप्तिमें कालका अन्तर नहीं है, जिससे कि ‘अथ’ शब्द आनन्तर्य अर्थवाची हो* । |
* अथ शब्दका मुख्य अर्थ 'अनन्तर' है, इसलिये 'अथ सम्पत्स्ये' का यह अर्थ हो सकता है कि देहपात होनेके अनन्तर ( बाद ) वह 'सत्' को प्राप्त होगा । परंतु भाष्यकार यह कहते हैं कि यहाँ 'अथ' शब्दका अर्थ 'उसी समय'
६९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| [ज्ञानानर्थक्योद्भावनम्]<br>ननु यथा सद्विज्ञानानन्तरमेव देहपातः सत्सम्पत्तिश्च न भवति कर्मशेषवशात्, यथाप्रवृत्तफलानि प्राग्ज्ञानोत्पत्तेर्जन्मान्तरसञ्चितान्यपि कर्माणि सन्तीति तत्फलोपभोगार्थं पतितेऽस्मिञ्छरीरान्तरमारब्धव्यम् । उत्पन्ने च ज्ञाने यावज्जीवं विहितानि प्रतिषिद्धानि वा कर्माणि करोत्येवेति तत्फलोपभोगार्थं चावश्यं शरीरान्तरमारब्धव्यम्; ततश्च कर्माणि ततः शरीरान्तरमिति ज्ञानानर्थक्यं कर्मणां फलवत्त्वात् ।<br><br>[ज्ञानात्कर्मक्षयाङ्गीकारेऽनुपपत्तिप्रदर्शनम्]<br>अथ ज्ञानवतः क्षीयन्ते कर्माणीति तदा ज्ञानप्राप्तिसमकालमेव ज्ञानस्य सत्सम्पत्तिहेतुत्वान्मोक्षः स्यादिति शरीरपातः स्यात् । तथा चाचार्याभाव इत्याचार्यवान्पुरुषो | पूर्व०—किंतु जिस प्रकार प्रारब्धकर्म अवशिष्ट रहनेके कारण सत्का ज्ञान होनेके बाद ही देहपात और सत्की प्राप्ति नहीं होती उसी प्रकार ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व तथा जन्मान्तरोंमें किये हुए और भी ऐसे संचित कर्म हैं ही जो अभी फल देनेमें प्रवृत्त नहीं हुए । अतः उनका फल भोगनेके लिये इस शरीरका पतन होनेपर दूसरे शरीरका प्राप्त होना आवश्यक है । ज्ञान उत्पन्न हो जानेपर भी पुरुष जीवनपर्यन्त विहित अथवा प्रतिषिद्ध कर्म करता ही है, अतः उनका फल भोगनेके लिये भी देहान्तरकी प्राप्ति अवश्य होनी चाहिये, उस समय फिर कर्म होंगे और उनसे फिर देहान्तरकी प्राप्ति होगी । इस प्रकार कर्मोंके फलयुक्त होनेके कारण ज्ञानकी व्यर्थता सिद्ध होती है ।<br><br>और यदि यह मानो कि ज्ञानीके कर्म क्षीण हो जाते हैं तो ज्ञान सत्सम्पत्तिका हेतु होनेके कारण ज्ञानप्राप्तिके समय ही मोक्ष हो जायगा, अतः उसी समय देहपात हो जाना चाहिये । ऐसा होनेपर आचार्यका अभाव हो जायगा; अतः 'आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है' यह वाक्य अनुपपन्न होगा तथा |
है अर्थात् देहपात होनेके ही समय वह सत्को प्राप्त हो जायगा । यदि देहपात और सत्की प्राप्तिमें कुछ कालका अन्तर होता तो 'अथ' का अनन्तर अर्थ किया जाता, पर ऐसा है नहीं अतः यहाँ 'अनन्तर' अर्थ ठीक नहीं है ।
खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९१
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| वेदेत्यनुपपत्तिर्ज्ञानान्मोक्षाभावप्रसङ्गश्च। देशान्तरप्राप्त्युपायज्ञानवदनैकान्तिकफलत्वं वा ज्ञानस्य। | ज्ञानसे मोक्षप्राप्तिके अभावका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। अथवा देशान्तरकी प्राप्तिके साधनोंके ज्ञानके समान ज्ञानका व्यभिचारिफलयुक्त होना सिद्ध होगा। ⁕ |
| (पूर्वोक्तदोष-परिहारः)<br>न; कर्मणां प्रवृत्ताप्रवृत्तफलत्वविशेषोपपत्तेः। यदुक्तमप्रवृत्तफलानां कर्मणां ध्रुवफलत्वाद्ब्रह्मविदः शरीरे पतिते शरीरान्तरमारब्धव्यमप्रवृत्तकर्मफलोपभोगार्थमिति, एतदसत्; विदुषः "तस्य तावदेव चिरम्" इति श्रुतेः प्रामाण्यात्। | सिद्धान्ती— ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि कर्मोंमें प्रवृत्तफलत्व और अप्रवृत्तफलत्व यह विशेषता होनी सम्भव है। अतः तुमने जो कहा कि अप्रवृत्तफल कर्म भी निश्चय फल देनेवाले हैं, इसलिये देहपात होनेके पश्चात् उन अप्रवृत्तफल कर्मोंका फल भोगनेके लिये देहान्तरका प्राप्त होना अवश्यम्भावी है—सो ठीक नहीं; क्योंकि "उस विद्वानके मोक्षमें तो उतना (देहपात होनेतकका) ही विलम्ब है"—यह श्रुति प्रमाण है। |
| ननु "पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति" (बृ० उ० ३।२।१३) इत्यादिश्रुतेरपि प्रामाण्यमेव। | पूर्व०— किंतु "पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् होता है" यह श्रुति भी तो प्रामाणिक ही है। |
| सत्यमेवम्, तथापि प्रवृत्तफलानामप्रवृत्तफलानां च कर्मणां | सिद्धान्ती— सचमुच ऐसा ही है। तो भी प्रवृत्तफल और अप्रवृत्त- |
⁕ अर्थात् जिस प्रकार देशान्तरकी प्राप्तिके साधन घोड़े आदि कोई विशेष विघ्न न होनेपर ही अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँचते हैं उसी प्रकार जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं उन्हीं ज्ञानियोंका मोक्ष हो सकेगा—सबका नहीं।
| ६९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| ६९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| विशेषोऽस्ति । कथम् ? यानि प्रवृत्तफलानि कर्माणि यैर्विद्वच्छरीरमारब्धम्, तेषामुपभोगेनैव क्षयः । यथारब्धवेगस्य लक्ष्यमुक्तेष्वादेर्वेगक्षयादेव स्थितिर्न तु लक्ष्यवेधसमकालमेव प्रयोजनं नास्तीति तद्वत् । अन्यानि त्वप्रवृत्तफलानीह प्राग्ज्ञानोत्पत्तेरूर्ध्वं च कृतानि वा क्रियमाणानि वातीतजन्मान्तरकृतानि वाप्रवृत्तफलानि ज्ञानेन दह्यन्ते प्रायश्चित्तेनेव । "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा" (गीता ४।३७) इति स्मृतेश्च । "क्षीयन्ते चास्य कर्माणि" इति चाथर्वणे ।<br><br>अतो ब्रह्मविदो जीवनादिप्रयोजनाभावेऽपि प्रवृत्तफलानां | फलकर्मोंमें कुछ विशेषता है । किस प्रकार ?—जो प्रवृत्तफलकर्म हैं; जिनसे कि विद्वान्के शरीरका आरम्भ हुआ है उनका क्षय फलोपभोगके द्वारा ही हो सकता है; जिस प्रकार जिसका वेग आरम्भ हो गया है उस लक्ष्यकी ओर छोड़े हुए बाणकी स्थिति उसके वेगका क्षय होनेपर ही हो सकती है, लक्ष्यवेध करते ही उसे [ आगे जानेका ] कोई प्रयोजन नहीं रहता—ऐसी बात नहीं है; उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये । ज्ञानीके जो अन्य अप्रवृत्तफलकर्म ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व किये हुए अथवा उसके पश्चात् किये जानेवाले होते हैं अथवा जो पूर्व जन्मोंमें किये हुए अप्रवृत्तफलकर्म होते हैं वे प्रायश्चित्तसे पापोंके समान ज्ञानसे दग्ध हो जाते हैं । "तथा ज्ञानाग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको भस्मीभूत कर देता है" इस स्मृतिसे यही प्रमाणित होता है, और "इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं" ऐसा अथर्वण-श्रुतिमें भी कहा है ।<br><br>अतः ब्रह्मवेत्ताको जीवनादिका प्रयोजन न होनेपर भी प्रवृत्तफल- |
खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९३
| कर्मणामवश्यमेव फलोपभोगः स्यादिति मुक्तेषुवत् 'तस्य तावदेव चिरम्' इति युक्तमेवोक्तमिति यथोक्तदोषचोदनानुपपत्तिः । ज्ञानोत्पत्तेरूर्ध्वं च ब्रह्मविदः कर्माभावमवोचाम 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इत्यत्र तच्च स्मर्तुमर्हसि ॥ २ ॥ | कर्मोंका फलोपभोग अवश्य होना है इसलिये छोड़े हुए बाणके समान 'उसे [ सत्की प्राप्तिमें ] तभीतक विलम्ब है जबतक कि वह देहबन्धनसे नहीं छूटता' ऐसा ठीक ही कहा है, अतः उपर्युक्त दोषकी शङ्का करना ठीक नहीं। 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इस वाक्यकी व्याख्याके समय ज्ञानोत्पत्तिके पश्चात् तो हमने ब्रह्मवेत्ताके कर्मका अभाव प्रतिपादन किया है, उसे इस समय स्मरण करना चाहिये ॥ २ ॥ |
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥
| स य इत्याद्युक्तार्थम् । आचार्यवान्विद्वान्येन क्रमेण सत्सम्पद्यते तं क्रमं दृष्टान्तेन भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ | 'स यः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पहले कहा जा चुका है। 'हे भगवन् ! आचार्यवान् विद्वान् जिस क्रमसे सत्को प्राप्त होता है वह क्रम मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये' ऐसा श्वेतकेतुने कहा। तब आरुणिने कहा 'सोम्य ! अच्छा' ॥ ३ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१४॥
पञ्चदश खण्ड
मुमूर्षु पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
पुरुषᳪसोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति। तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! [ ज्वरादिसे ] संतप्त [ मुमूर्षु ] पुरुषको चारों ओरसे घेरकर उसके बान्धवगण पूछा करते हैं—'क्या तू मुझे जानता है ? क्या तू मुझे पहचानता है ?' जबतक उसकी वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता तबतक वह पहचान लेता है ॥ १ ॥
| पुरुषं हे सोम्योतोपतापिनं ज्वराद्युपतापवन्तं ज्ञातयो बान्धवाः परिवार्योपासते मुमूर्षुम्— जानासि मां तव पितरं पुत्रं भ्रातरं वा—इति पृच्छन्तः। तस्य मुमूर्षोर्यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामित्येतदुक्तार्थम् ॥ १ ॥ | हे सोम्य ! उपतापी—ज्वरादिसे अत्यन्त संतप्त हुए पुरुषको ज्ञातिजन-बान्धवगण घेरकर उस मुमूर्षु पुरुषसे 'क्या तू मुझ अपने पिता, पुत्र अथवा भाईको पहचानता है ?' इस प्रकार पूछते हुए उसके चारों ओर बैठ जाते हैं । उस मुमूर्षु की जबतक वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा जा चुका है ॥ १ ॥ |
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९५
| संसारिणो यो मरणक्रमः स एवायं विदुषोऽपि सत्सम्पत्तिक्रम इत्येतदाह-- | संसारी जीवका जो मरणक्रम है वही विद्वान्की सत्सम्पत्तिका क्रम है--इसी बातको आरुणि बतलाता है-- |
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अथ यदास्य वाङ् मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २ ॥
फिर जिस समय उसकी वाणी मनमें लीन हो जाती है तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है तब वह नहीं पहचानता ॥ २ ॥
| परस्यां देवतायां तेजसि सम्पन्नेऽथ न जानाति ।<br><br>सत्सम्पत्तिक्रमः<br>अविद्वांस्तु सत उत्थाय प्राग्भावितं व्याघ्रादिभावं देवमनुष्यादिभावं वा विशति । विद्वांस्तु शास्त्राचार्योपदेशजनितज्ञानदीपप्रकाशितं सद्ब्रह्मात्मानं प्रविश्य नावर्तत इत्येष सत्सम्पत्तिक्रमः ।<br><br>अन्ये तु मूर्धन्यया नाड्योत्क्रम्यादित्यादि-<br>मतान्तरनिरासः<br>द्वारेण सद्गच्छन्तीत्याहुः, तदसत्; देशकाल- | परदेवतामें तेजके लीन हो जानेपर फिर यह नहीं पहचानता। किंतु जो अविद्वान् होता है वह तो सत्से उत्थित होकर पहले भावना किये हुए व्याघ्रादि भाव और देव-मनुष्यादि भावमें प्रवेश करता है; किंतु विद्वान् शास्त्र और आचार्यके उपदेशजनित ज्ञानदीपकसे प्रकाशित सद्ब्रह्मरूप आत्मामें प्रवेशकर फिर नहीं लौटता—यही सत्प्राप्तिका क्रम है।<br><br>कुछ अन्य मतावलम्बियोंने जो कहा है कि मूर्धन्य नाडीसे उत्क्रमण कर आदित्यादिद्वारा सत्को प्राप्त होता है, वह ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकारका गमन तो देश, काल, निमित्त और फलके अभिनिवेश- |
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६९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ६
| ६९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| निमित्तफलाभिसंधानेन गमनदर्शनात् । न हि सदात्मैकत्वदर्शिनः सत्याभिसन्धस्य देशकालनिमित्तफलाद्यनृताभिसंधिरुपपद्यते, विरोधात्। अविद्याकामकर्मणां च गमननिमित्तानां सद्विज्ञानहुताशनविप्लुष्टत्वादगमनानुपपत्तिरेव, "पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्त्विहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः" इत्याद्याथर्वणे। नदीसमुद्रदृष्टान्तश्रुतेश्च ॥ २ ॥ | पूर्वक देखा जाता है और सदात्माका एकत्व देखनेवाले सत्यनिष्ठ विद्वान्को देश, काल, निमित्त और फल आदि असद्वस्तुओंका अभिनिवेश होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इसका उस (सत्यनिष्ठा) से विरोध है। गमनके निमित्तभूत अविद्या, कामना और कर्मोंके सद्विज्ञानरूप अग्निसे भस्म हो जानेके कारण उसके गमनकी अनुपपत्ति ही है। "पूर्णकाम कृतकृत्य पुरुषकी सम्पूर्ण कामनाएँ यहीं लीन हो जाती हैं" ऐसा अथर्वण श्रुतिमें कहा है; और इसके सिवा नदी-समुद्र-दृष्टान्तकी श्रुति भी है * ॥ २ ॥ |
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</div>स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ सर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला--] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [तब आरुणिने] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥
* देखिये मुण्डक० ३।२।८
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्य ६९७
| स य इत्यादि समानम् ।<br><br>यदि मरिष्यतो मुमुक्षतश्च तुल्या सत्सम्पत्तिस्तत्र विद्वान्सत्सम्पन्नो नावर्तत आवर्तते त्वविद्वानित्यत्र कारणं दृष्टान्तेन भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति। तथा सोम्येति होवाच॥ ३ । | ‘स यः’ इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। ‘यदि मरनेवाले और मुमुक्षुकी सत्सम्पत्ति एक-जैसी है तो विद्वान् तो सत्को प्राप्त होकर नहीं लौटता और अविद्वान् लौटता है—इसमें जो कारण है उसे हे भगवन् ! दृष्टान्तद्वारा मुझे फिर समझाइये’ [ —ऐसा श्वेतकेतुने कहा ] । तब आरुणिने कहा—‘सौम्य ! अच्छा’ ॥ ३ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
षोडश खण्ड
—: ० :—
चोरके तप्त परशुग्रहणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
| शृणु यथा— | सुन, जिस प्रकार— |
पुरुषँ सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेय-
मकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्ता भवति
तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृते-
नात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ
हन्यते ॥ १ ॥
हे सोम्य ! [ राजकर्मचारी ] किसी पुरुषको हाथ बाँधकर लाते हैं [ और कहते हैं— ] 'इसने धनका अपहरण किया है, चोरी की है इसके लिये परशु तपाओ।' वह यदि उसका (चोरीका) करनेवाला होता है तो अपनेको मिथ्यावादी प्रमाणित करता है। वह मिथ्याभिनिवेशवाला पुरुष अपनेको मिथ्यासे छिपाता हुआ तपे हुए परशुको ग्रहण करता है; किंतु वह उससे दग्ध होता है और मारा जाता है ॥ १ ॥
| सोम्य पुरुषं चौर्यकर्मणि संदिह्यमानं निग्रहाय परीक्षणाय वोतापि हस्तगृहीतं बद्धहस्तमानयन्ति राजपुरुषाः । किं कृतवानयमिति पृष्टाश्चाहुरपहार्षीद्धनमस्यायम् । ते चाहुः किमपहरणमात्रेण बन्धनमर्हति ? | हे सोम्य ! जिस पुरुषके विषयमें चोरी करनेका संदेह होता है उसे राजकर्मचारी दण्ड देने अथवा उसकी परीक्षा करनेके लिये 'हस्त-गृहीत'—हाथ बाँधकर लाते हैं। 'इसने क्या किया है ?' इस प्रकार पूछे जानेपर वे कहते हैं कि 'इसने इस पुरुषका धन लिया है।' तब वे (न्यायाधीश) कहते हैं 'क्या धन लेनेमात्रसे यह बन्धनके योग्य हो गया; तब तो अन्य किसी प्रकार |
खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| अन्यथा दत्तेऽपि धने बन्धनप्रसङ्गात्; इत्युक्ताः पुनराहुः-स्तेयमकार्षीच्चौर्येण धनमपहार्षीदिति। <br><br> तेष्वेवं वदत्स्वितरोऽपह्नुते नाहं तत्कर्तेति । | धन देनेपर भी उसे लेनेवालेको बन्धनका प्रसंग उपस्थित होता है।' इस प्रकार कहे जानेपर वे फिर कहते हैं—'इसने चोरी की है अर्थात् चोरीसे धन लिया है।' <br><br> उनके इस प्रकार कहनेपर वह पुरुष 'मैं चोरी करनेवाला नहीं हूँ' ऐसा कहकर अपने कर्मको छिपाता है। |
| ते चाहुः संदिह्यमानं स्तेयमकार्षीस्त्वमस्य धनस्येति । <br><br> तस्मिंश्चापह्नुवान् आहुः परशुमस्मै तपतेति शोधयत्वात्मानमिति । स यदि तस्य स्तैन्यस्य कर्ता भवति बहिश्चापह्नुते स एवं भूतस्तत एवानृतमन्यथाभूतं सन्तमन्यथात्मानं कुरुते । | तब वे संदेह किये जानेवाले पुरुषसे कहते हैं—'तूने इसके धनकी चोरी अवश्य की है।' <br><br> फिर भी उसके छिपानेपर वे कहते हैं—'इसके लिये परशु तपाओ—इस प्रकार यह अपनेको निर्दोष सिद्ध करे।' यदि वह उस चोरीका करनेवाला होता है और ऊपरसे छिपाता है तो ऐसा होनेपर वह अपनेको अनृत अर्थात् अन्यथा (चोर) होनेपर अपनेको अन्यथा (साहु) प्रदर्शित करता है। |
| स तथानृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय व्यवहितं कृत्वा परशुं तप्तं मोहात्प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते राजपुरुषैः स्वकृतेनानृताभिसन्धिदोषेण ॥१॥ | इस प्रकार मिथ्याभिनिवेशवाला होकर वह अपनेको मिथ्यासे अन्तर्हित करता—छिपाता हुआ मोहवश तपे हुए परशुको ग्रहण करता और जल जाता है। तब अपने किये हुए मिथ्याभिनिवेशरूप दोषसे वह राजपुरुषोंद्वारा मारा जाता है ॥ १ ॥ |
७०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ७०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥२॥
और यदि वह उस (चोरी) का करनेवाला नहीं होता तो उसीसे वह अपनेको सत्य प्रमाणित करता है। वह सत्याभिसन्ध अपनेको सत्यसे आवृत कर उस तपे हुए परशुको पकड़ लेता है। वह उससे नहीं जलता और तत्काल छोड़ दिया जाता है ॥ २ ॥
| अथ यदि तस्य कर्मणोऽकर्ता भवति, तत एव सत्यमात्मानं कुरुते। स सत्येन तया स्तैन्याकर्तृतयात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति। स सत्याभिसन्धः सन्न दह्यते सत्यव्यवधानात्, अथ मुच्यते च मृषाभियोक्तृभ्यः। तप्तपरशुहस्ततलसंयोगस्य तुल्यत्वेऽपि स्तेयकर्तृकर्त्रोरनृताभिसन्धो दह्यते न तु सत्याभिसन्धः ॥ २ ॥ | और यदि वह उस कर्मका करनेवाला नहीं होता तो उस (चोरीके अकर्तृत्व) के ही द्वारा वह अपनेको सत्य प्रमाणित करता है। वह उस चोरीकी अकर्तृतारूप सत्यसे अपनेको अन्तर्हित कर उस तपे हुए परशुको ग्रहण करता है और सत्याभिसन्ध होनेके कारण सत्यका व्यवधान हो जानेसे वह उससे नहीं जलता। तब मिथ्या अभियोग लगानेवाले उसे तत्काल छोड़ देते हैं। इस प्रकार तप्त परशु और हथेलीके संयोगमें समानता होनेपर भी चोरी करने और न करनेवालोंमें मिथ्याभिसन्ध करनेवाला जल जाता है और सत्याभिसन्ध नहीं जलता ॥ २ ॥ |
खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्य ७०१
स यथा तत्र नादाह्यैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ३ ॥
वह जिस प्रकार उस [परीक्षाके] समय नहीं जलता [उसी प्रकार विद्वान्का पुनरावर्तन नहीं होता और अविद्वान्का होता है]। यह सब एतद्रूप ही है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो! वही तू है। तब वह (श्वेतकेतु) उसे जान गया—उसे जान गया ॥३॥
| स यथा सत्याभिसन्धस्तप्तपरशुग्रहणकर्मणि सत्यव्यवहितहस्ततलत्वान्नादाह्येत न दह्येतेत्येतदेवं सद्ब्रह्मसत्याभिसन्धीतरयोः शरीरपातकाले च तुल्यायां सत्सम्पत्तौ विद्वान्सत्सम्पद्य न पुनर्व्याघ्रदेवादिदेहग्रहणायोवर्तते। अविद्वांस्तु विकारानृताभिसन्धः पुनर्व्याघ्रादिभावं देवतादिभावं वा यथाकर्म यथाश्रुतं प्रतिपद्यते।<br><br>यदात्माभिसन्ध्यनभिसन्धिकृते मोक्षबन्धने यच्च मूलं जगतो | वह सत्याभिसन्ध पुरुष जिस प्रकार उस तप्त परशुको ग्रहण करनेके कर्ममें हथेलीके सत्यसे व्यवहित रहनेके कारण नहीं जलता उसी प्रकार देहपातके समय सद्ब्रह्म-रूप सत्यमें निष्ठा रखनेवाले और उससे भिन्न असन्निविष्ट पुरुषकी सत्सम्पत्तिमें समानता होनेपर भी जो विद्वान् है वह व्याघ्र अथवा देवादि शरीरोंको ग्रहण करनेके लिये नहीं लौटता, किंतु अविद्वान् विकाररूप अनृतमें अभिनिविष्ट होनेके कारण अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार पुनः व्याघ्रादिभाव अथवा देवादिभावको प्राप्त हो जाता है।<br><br>जिस आत्माकी अभिसन्धि और अनभिसन्धिके कारण मोक्ष और बन्धन होते हैं, जो संसारका मूल |
७०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ७०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| यदायतना यत्प्रतिष्ठाश्च सर्वाः प्रजा यदात्मकं च सर्वं यच्चाजममृतमभयं शिवमद्वितीयं तत्सत्यं स आत्मा तवातस्तत्त्वमसि हे श्वेतकेतो इत्युक्तार्थमसकृद्वाक्यम् । <br><br> कः पुनरसौ श्वेतकेतुस्त्वंशब्दार्थः । योऽहं श्वेतकेतुरुद्दालकस्य पुत्र इति वेदात्मानमादेशं श्रुत्वा मत्वा विज्ञाय चाश्रुतममतमविज्ञातं विज्ञातुं पितरं पप्रच्छ कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति । स एषोऽधिकृतः श्रोता मन्ता विज्ञाता तेजोऽबन्नमयं कार्यकरणसङ्घातं प्रविष्टा परैव देवता नामरूपव्याकरणायादर्श इव पुरुषः सूर्यादिरिव जलादौ प्रतिबिम्बरूपेण स आत्मानं कार्यकारणेभ्यः प्रविभक्तं सद्रूपं सर्वात्मानं प्राक् पितुः | है, सम्पूर्ण प्रजा जिसके आश्रित और जिसमें प्रतिष्ठित है, सारा संसार जिस स्वरूपवाला है तथा जो अजन्मा, अमृत, अभय, शिव और अद्वितीय है वही सत्य है और वही तेरा आत्मा है; अतः हे श्वेतकेतो ! तू वह है। इस प्रकार इस वाक्यका अर्थ कई बार कहा जा चुका है। <br><br> [ अब यहाँ प्रश्न होता है कि ] त्वं शब्दका वाच्य यह श्वेतकेतु कौन है ? [ उत्तर— ] जो 'मैं श्वेतकेतु उद्दालकका पुत्र हूँ' ऐसा अपनेको जानता था तथा जिसने [अपने पिताके] उस आदेशका श्रवण, मनन और ज्ञान प्राप्त करके अश्रुत, अमत और अविज्ञातको जाननेके लिये पितासे पूछा था कि 'भगवन् ! वह आदेश किस प्रकार है ?' वह यह अधिकारी श्रोता, मन्ता और विज्ञाता दर्पणमें प्रतिफलित हुए पुरुष और जलादिमें प्रतिबिम्ब-रूपसे प्रविष्ट हुए सूर्यादिके समान तेज-जल अन्नमय देहेन्द्रियसङ्घातमें नाम-रूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये प्रविष्ट हुई परदेवता ही है। वह पिताका उपदेश सुननेसे पूर्व |
खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०३
| संस्कृत | हिन्दी |
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| श्रवणाच्च विजज्ञौ । अथेेदानीं पित्रा प्रतिबोधितस्तत्त्वमसीतिदृष्टान्तैर्हेतुभिश्च तत्पितुरस्य ह किलोक्तं सदेवाहमस्मीति विजज्ञौ विज्ञातवान् । द्विर्वचनमध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् । | अपनेको देह और इन्द्रियोंसे भिन्न सद्रूप सर्वात्मा नहीं जानता था । अब 'तू वह है' इस प्रकार दृष्टान्त और हेतुपूर्वक पिताद्वारा समझाये जानेपर वह पिताके इस कथनको कि 'मैं सत ही हूँ' समझ गया है । 'विजज्ञौ इति' इस पदकी द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है । |
| किं पुनरत्र षष्ठे वाक्यप्रमाणे- | पूर्वं०—किंतु इस छठे अध्यायमें वाक्यप्रमाणसे आत्मामें क्या फल हुआ ? |
| न जनितं फलमात्मनि ? | |
| [षष्ठाध्यायवाक्यप्रमाणजन्यफलदर्शनम्]<br><br>कर्तृत्वभोक्तृत्वयोरधिकृतत्वविज्ञाननिवृत्तिस्तस्यफलं यमवोचाम त्वंशब्दवाच्यमर्थं श्रोतुं मन्तुं चाधिकृतत्वमविज्ञातविज्ञानफलार्थम् । प्राक्चैतस्माद्विज्ञानादहमेवं करिष्याम्यग्निहोत्रादीनि कर्माण्यहमत्राधिकृतः, एषां च कर्मणां फलमिहामुत्र च भोक्ष्ये कृतेषु वा कर्मसु कृतकर्तव्यः स्यामित्येवं कर्तृत्वभोक्तृत्वयोरधिकृ- | सिद्धान्ती—हमने अविज्ञातके विज्ञानरूप फलके लिये श्रवण और मनन करनेमें अधिकृत जिस 'त्वम्' शब्दवाच्य अर्थका वर्णन किया है उसके अपनेमें (आरोपित) कर्तृत्व भोक्तृत्वके अधिकृतत्व-विज्ञानकी निवृत्ति ही इसका फल है । इस विज्ञानसे पूर्व 'मैं इस प्रकार अग्निहोत्रादि कर्म करूँगा, मैं इसका अधिकारी हूँ, तथा इन कर्मोंका फल मैं इस लोक और परलोकमें भोगूँगा और इन कर्मोंके करनेपर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा' इस प्रकार मैं कर्तृत्व और भोक्तृत्वका अधिकारी हूँ—ऐसा जो उसे आत्मामें विज्ञान |
| ७०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| ७०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तोऽस्मीत्यात्मनि यद्विज्ञानमभूतस्य, यत्सज्जगतो मूलमेकमेवाद्वितीयं तत्त्वमसीत्यनेन वाक्येन प्रतिबुद्धस्य निवर्तते, विरोधात् । न ह्येकस्मिन्नद्वितीये आत्मन्ययमहमस्मीति विज्ञाते ममेदमन्यदनेन कर्तव्यमिदं कृत्वास्य फलं भोक्ष्य इति वा भेदविज्ञानमुपपद्यते । तस्मात्सत्सत्याद्वितीयात्मविज्ञाने विकारानृतजीवात्मविज्ञानं निवर्तत इति युक्तम् ।<br><br>ननु तत्त्वमसीत्यत्र त्वंशब्दवाच्येऽर्थे सद्बुद्धिरादिश्यते यथादित्यमनआदिषु ब्रह्मादिबुद्धिः । यथा च लोके प्रतिमादिषु विष्ण्वादिबुद्धिस्तद्वन्न तु सदेव त्वमिति । यदि सदेव श्वेतकेतुः स्यात्कथमात्मानं न विजानीयाद्येन तस्मै तत्त्वमसीत्युपदिश्यते । | था, वह — जो एकमात्र अद्वितीय सत् जगत्का मूल है वही तू है— इस वाक्यद्वारा जग उठनेपर निवृत्त हो जाता है, क्योंकि [ पूर्व मिथ्या ज्ञानसे ] इसका विरोध है । कारण, एकमात्र अद्वितीय आत्माके विषयमें 'यह मैं हूँ'—ऐसा ज्ञान हो जानेपर 'मुझे अपना यह अन्य कर्तव्य इस साधनसे करना चाहिये, इसे करनेपर मैं इसका फल भोगूँगा।' इस प्रकारकी भेदबुद्धि होनी सम्भव नहीं है । अतः सद्रूप सत्य और अद्वितीय आत्माका ज्ञान होनेपर विकाररूप मिथ्या जीवात्मबुद्धिकी निवृत्ति हो जाती है—यह कथन ठीक ही है ।<br><br>पूर्व०—किंतु जिस प्रकार आदित्य और मन आदिमें ब्रह्मादिबुद्धिका तथा लोकमें प्रतिमा आदिमें विष्णुबुद्धिका आरोप किया जाता है उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' इस वाक्यके द्वारा 'त्वम्' शब्दके वाच्यार्थमें तो सद्बुद्धिका आरोप ही किया जाता है । वस्तुतः त्वमर्थ सत् ही नहीं है। यदि श्वेतकेतु सत् ही होता तो अपनेको क्यों न जानता, जिससे कि उसे 'तू वह है' इस प्रकार उपदेश किया गया । |
खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०५
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| तत्परिहारः<br>न; आदित्यादिवाक्यवैलक्षण्यात् । आदित्यो ब्रह्मेत्यादावितिशब्दव्यवधानान्न साक्षाद्ब्रह्मत्वं गम्यते । रूपादिमत्त्वाच्चादित्यादीनामाकाशमनसोश्चेतिशब्दव्यवधानादेवाब्रह्मत्वम् । इह तु सत एवेह प्रवेशं दर्शयित्वा तत्त्वमसीति निरङ्कुशं सदात्मभावमुपदिशति । | सिद्धान्ती— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि 'आदित्यो ब्रह्मेत्युपासीत' इत्यादि वाक्योंसे इस वाक्यमें विलक्षणता है। 'आदित्यो ब्रह्मेत्युपासीत' आदि वाक्योंमें 'इति' शब्दका व्यवधान रहनेके कारण उनका साक्षात् ब्रह्मत्व ज्ञात नहीं होता। इसके सिवा आदित्यादि रूपवान् होनेके कारण तथा आकाश और मनके 'इति' शब्दसे व्यवधान होनेके कारण वे ब्रह्म नहीं हो सकते। किंतु इस प्रसङ्गमें तो [ आरुणि ] सत्का ही इस (तेजोऽवन्नमय-संघात) में प्रवेश दिखलाकर 'तू वह है' इस प्रकार निरंकुश सदात्मभावका उपदेश करता है। |
| ननु पराक्रमादिगुणः सिंहोऽसि त्वमितिवत्तत्त्वमसीति स्यात् । | पूर्व० — जिस प्रकार पराक्रमादि गुणवाला 'तू सिंह है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार 'तू वह है' यह वाक्य भी तो हो सकता है ? |
| न; मृदादिवत्सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमित्युपदेशात् । न चोपचारविज्ञानात्तस्य तावदेव चिरमिति सत्सम्पत्तिरुपदिश्येत । | सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि 'मृत्तिकादिके समान एकमात्र अद्वितीय सत् ही सत्य है' ऐसा उपदेश किया गया है। औपचारिक विज्ञानके द्वारा उसे तभीतक विलम्ब है' इस प्रकार सत्की प्राप्तिका उपदेश नहीं किया जा |