छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
|---|
| मन्त्राद्युच्चारणे । तां च वाचम् नाम्नि नामोच्चारणनिमित्तं विवक्षां कृत्वेरयति नाम्नि नामसामान्ये मन्त्राः शब्दविशेषाः सन्त एकं भवन्त्यन्तर्भवन्तीत्यर्थः । सामान्ये हि विशेषोऽन्तर्भवति ।<br><br>मन्त्रेषु कर्माण्येकं भवन्ति, मन्त्रप्रकाशितानि कर्माणि क्रियन्ते नामन्त्रकमस्ति कर्म । यद्धि मन्त्रप्रकाशनेन लब्धसत्ताकं सत्कर्म ब्राह्मणेनेदं कर्तव्यमस्मै फलायेति विधीयते। याप्युत्पत्तिर्ब्राह्मणेषु कर्मणां दृश्यते सापि मन्त्रेषु लब्धसत्ताकानामेव कर्मणां स्पष्टीकरणम् । न हि मन्त्राप्रकाशितं कर्म किञ्चिद्ब्राह्मणे उत्पन्नं दृश्यते । त्रयोविहितं कर्मेति | वाणीको प्रेरित करता है । और उस वाणीको नाममें अर्थात् नामोच्चारणनिमित्तक विवक्षा करके नाममें प्रेरित करता है तथा नामरूप सामान्यमें मन्त्र, जो शब्दविशेष ही हैं, एक होते हैं अर्थात् उसके अन्तर्भूत होते हैं; क्योंकि सामान्यमें विशेषका अन्तर्भाव होता है ।<br><br>मन्त्रोंमें कर्म एकरूप हो जाते हैं। मन्त्रोंसे प्रकाशित कर्म ही किये जाते हैं, मन्त्रहीन कोई भी कर्म नहीं है । [ यदि कहो कि कर्मोंका विधान तो ब्राह्मणभागमें भी है, फिर ऐसा कैसे माना जा सकता है कि कर्म मन्त्रप्रकाशित ही हैं तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ] जिस सत्कर्मको मन्त्रोंके प्रकाशित करनेसे सत्ता प्राप्त हुई है ब्राह्मणोंने उसीका ‘इसे अमुक फलके लिये करना चाहिये’ इस प्रकार विधान किया है । इसके सिवा ब्राह्मणोंमें जो कर्मोंकी उत्पत्ति देखी जाती है वह भी मन्त्रोंमें सत्ता प्राप्त किये हुए कर्मोंका ही स्पष्टीकरण है; मन्त्रोंसे अप्रकाशित कोई भी कर्म ब्राह्मणभागमें उत्पन्न हुआ नहीं देखा |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२९
| प्रसिद्धं लोके । त्रयीशब्दश्च ऋग्यजुःसामसमाख्या । "मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यन्" (मु० उ० १ । २ । १) इति चाथर्वणे । तस्माद्युक्तं मन्त्रेषु कर्माण्येकं भवन्तीति ॥ १ ॥ | जाता। लोकमें यह बात प्रसिद्ध ही है कि 'कर्म त्रयीविहित है' और 'त्रयी' शब्द ऋक्-यजुः-सामका ही नाम है। "विद्वानोंने जिन कर्मोंको मन्त्रोंमें देखा" ऐसा आथर्वणोपनिषद्में कहा भी है। अतः यह कहना कि 'मन्त्रोंमें सब कर्म एकरूप हो जाते हैं, ठीक ही है ॥ १ ॥ |
तानि ह वा एतानि संकल्पैकायनानि संकल्पात्मकानि संकल्पे प्रतिष्ठितानि समक्लृपतां द्यावापृथिवी समकल्पेतां वायुश्चाकाशं च समकल्पन्तापश्च तेजश्च तेषाँ१सङ्क्लृप्त्यै वर्षँ१संकल्पते वर्षस्य संक्लृप्त्या अन्नँ१संकल्पतेऽन्नस्य संक्लृप्त्यै प्राणाः संकल्पन्ते प्राणानाँ१संक्लृप्त्यै मन्त्राः संकल्पन्ते मन्त्राणाँ१संक्लृप्त्यै कर्माणि संकल्पन्ते कर्मणाँ१संक्लृप्त्यै लोकः संकल्पते लोकस्य संक्लृप्त्यै सर्वँ१संकल्पते स एष संकल्पः संकल्पमुपास्स्वेति ॥ २ ॥
वे ये (मन आदि) एकमात्र संकल्परूप लयस्थानवाले, संकल्पमय और संकल्पमें ही प्रतिष्ठित हैं। द्युलोक और पृथिवीने मानो संकल्प किया है। वायु और आकाशने संकल्प किया है; जल और तेजने संकल्प किया है। उनके संकल्पके लिये वृष्टि समर्थ होती है [अर्थात् उन द्युलोकादिके संकल्पसे वृष्टि होती है ], वृष्टिके संकल्पके लिये अन्न समर्थ होता है, अन्नके संकल्पके लिये प्राण समर्थ होते हैं, प्राणोंके संकल्पके लिये मन्त्र समर्थ
७६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
|---|
होते हैं, मन्त्रोंके संकल्पके लिये कर्म समर्थ होते हैं, कर्मोंके संकल्पके लिये लोक (फल) समर्थ होता है और लोकोंके संकल्पके लिये सब समर्थ होते हैं। वह (ऐसा) यह संकल्प है; तुम संकल्पकी उपासना करो ॥ २ ॥
| तानि ह वा एतानि मनआदीनि संकल्पैकायनानि संकल्प एकोऽयनं गमनं प्रलयो येषां तानि संकल्पैकायनानि। संकल्पात्मकान्युत्पत्तौ संकल्पे प्रतिष्ठितानि स्थितौ समक्लृपतां संकल्पं कृतवत्याविव हि द्यौश्च पृथिवी च द्यावापृथिवी द्यावापृथिव्यौ निश्चले लक्ष्येते। तथा समकल्पेतां वायुश्चाकाशं चैतावपि संकल्पं कृतवन्ताविव। तथा समकल्पन्तापश्च तेजश्च स्वेन रूपेण निश्चलानि लक्ष्यन्ते यतः। <br><br> तेषां द्यावापृथिव्यादीनां संक्लृप्त्यै संकल्पनिमित्तं वर्षं संकल्पते समर्थीभवति। तथा वर्षस्य संक्लृप्त्यै संकल्पनिमित्तमन्नं संकल्पते। वृष्टेर्ह्यन्नं भवत्यन्नस्य संक्लृप्त्यै प्राणाः संकल्पन्ते। | वे ये मन आदि संकल्पैकायन हैं—संकल्प ही है एक अयन—गमन अर्थात् प्रलयस्थान जिनका ऐसे संकल्पैकायन हैं। वे उत्पत्तिके समय संकल्पमय हैं तथा स्थितिके समय संकल्पमें प्रतिष्ठित हैं। द्युलोक और पृथिवीने मानो संकल्प किया है, क्योंकि ये द्यावापृथिवी—द्यौ और पृथिवी निश्चल दिखायी देते हैं। तथा वायु और आकाश इन दोनोंने भी मानो संकल्प किया है। इसी प्रकार जल और तेजने भी संकल्प किया है, क्योंकि ये भी अपने स्वरूपसे निश्चल दिखायी देते हैं। <br><br> उन द्युलोक और पृथिवी आदिकी संक्लृप्ति यानी संकल्पके लिये वर्षा संकल्पित होती अर्थात् समर्थ होती है। तथा वर्षाकी संक्लृप्ति—संकल्पके लिये अन्न समर्थ होता है, क्योंकि वृष्टिसे ही अन्न होता है। अन्नकी संक्लृप्तिके लिये प्राण समर्थ होते हैं, क्योंकि प्राण अन्नमय |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अन्नमया हि प्राणा अन्नोपष्टम्भकाः । "अन्नं दाम" (बृ० उ० २।२।१) इति हि श्रुतिः । | हैं और अन्नके ही आश्रय रहनेवाले हैं। श्रुति कहती है "[ प्राणरूप शिशुके लिये ] अन्न डोरी है"। |
| तेषां संक्लृप्त्यै मन्त्राः संक्लपन्ते । प्राणवान् हि मन्त्रानधीते नाबलः । मन्त्राणां हि संक्लृप्त्यै कर्माण्यग्निहोत्रादीनि संक्लपन्तेऽनुष्ठीयमानानि मन्त्रप्रकाशितानि समर्थीभवन्ति फलाय । ततो लोकः फलं संक्लपते कर्मकर्तृसमवायितया समर्थीभवतीत्यर्थः । लोकस्य संक्लृप्त्यै सर्वं जगत्संक्लपते स्वरूपावैकल्याय । एतद्यदिदं सर्वं जगद्यत्फलावसानं तत्सर्वं संकल्पमूलम् । अतो विशिष्टः स एव संकल्पः । अतः संकल्पमुपास्स्वेत्युक्त्वा फलमाह तदुपासकस्य ॥ २ ॥ | उन प्राणोंके संकल्पके लिये मन्त्र समर्थ होते हैं, क्योंकि प्राणवान् (बलवान्) ही मन्त्रोंको पढ़ सकता है, बलहीन नहीं। मन्त्रोंके संकल्पके लिये अग्निहोत्र आदि कर्म समर्थ होते हैं, क्योंकि मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित कर्म अनुष्ठान किये जानेपर फलप्रदानमें समर्थ होते हैं। उनसे लोक अर्थात् फल संक्लृप्त होता है, अर्थात् कर्म और कर्ताके समवायीरूपसे समर्थ होता है। लोक (फल) के संकल्पके लिये सम्पूर्ण जगत् अपने स्वरूपकी अविकलतामें समर्थ होता है। इस प्रकार फलपर्यन्त जो सारा जगत् है वह सब-का-सब संकल्पमूलक ही है। अतः वह संकल्प ही विशिष्ट है, इसलिये तुम संकल्पकी उपासना करो। ऐसा कहकर सनत्कुमारजी उसके उपासकके लिये फल बतलाते हैं—॥ २ ॥ |
७३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७
| ७३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७ |
|---|
स यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते कॢप्तान् वै स लोकान्ध्रुवान्ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति। यावत्संकल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः संकल्पाद्भूय इति संकल्पाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥
वह जो कि संकल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है [विधाताके] रचे हुए ध्रुवलोकोंको स्वयं ध्रुव होकर, प्रतिष्ठित लोकोंको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पानेवाले लोकोंको स्वयं व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है। जहाँतक संकल्पकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि संकल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन्! क्या संकल्पसे भी बढ़कर कुछ है?' [सनत्कुमार—] 'संकल्पसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ ३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| स यः संकल्पं ब्रह्मेति ब्रह्मबुद्धयोपास्ते कॢप्तान् वै धात्रास्येमे लोकाः फलमिति कॢप्तान् समर्थितान् संकल्पितान्स विद्वान्ध्रुवान् नित्यानत्यन्ताध्रुवापेक्षया ध्रुवश्च स्वयम्। लोकिनो ह्यध्रुवत्वे लोके ध्रुवकॢप्तिर्व्यर्थेति ध्रुवः सन् प्रतिष्ठितानुपकरण- | वह जो कि संकल्पकी 'ब्रह्म' इस प्रकार अर्थात् ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करता है, कॢप्त— विधाताद्वारा 'इसे ये लोक यानी फल प्राप्त हों' इस प्रकार समर्थित—संकल्पित ध्रुव अर्थात् नित्य लोकोंको, जो अन्य अध्रुव लोकोंकी अपेक्षा ध्रुव हैं, स्वयं ध्रुव होकर, क्योंकि लोकवान् भोक्ताके अध्रुव होनेपर लोकोंमें ध्रुवताकी कल्पना करना व्यर्थ है, अतः ध्रुव होकर; प्रतिष्ठित अर्थात् सामग्री- |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३३
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
|---|---|
| सम्पन्नानित्यर्थः । पशुपुत्रादिभिः प्रतितिष्ठतीति दर्शनात्स्वयं च प्रतिष्ठित आत्मीयोपकरणसम्पन्नोऽव्यथमानानमित्रादित्रासरहितानव्यथमानश्च स्वयमभिसिद्ध्यत्यभिप्राप्नोतीत्यर्थः । यावत्संकल्पस्य गतं संकल्पगोचरस्तत्रास्य यथाकामचारो भवति आत्मनः संकल्पस्य न तु सर्वेषां संकल्पस्येति । उत्तरफलविरोधात् । यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्त इत्यादि पूर्ववत् ॥ ३ ॥ | सम्पन्न [लोकोंको]; क्योंकि वह पशु-पुत्रादिसे प्रतिष्ठित होता है—ऐसा देखा गया है, स्वयं भी प्रतिष्ठित—अपनी सामग्रीसे सम्पन्न होकर तथा अव्यथमान—शत्रु आदिके भयसे रहित लोकोंको स्वयं भी अव्यथमान—व्यथित न होता हुआ 'अभिसिध्यति'—सब प्रकारसे प्राप्त करता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। जहाँतक संकल्पकी गति है अर्थात् संकल्पका विषय है वहाँतक इसकी स्वेच्छागति हो जाती है; जहाँतक उसके संकल्पकी गति होती है वहींतक, न कि सबके संकल्पकी गतितक, क्योंकि [ऐसा न माननेसे] आगे बतलाये हुए फलोंसे विरोध आवेगा । 'यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
पञ्चम खण्ड
संकल्पकी अपेक्षा चित्तकी प्रधानता
चित्तं वाव संकल्पाद्भूयो यदा वै चेतयतेऽथ संकल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १॥
चित्त ही संकल्पसे उत्कृष्ट है। जिस समय पुरुष चेतनावान् होता है तभी वह सङ्कल्प करता है, फिर मनन करता है, तत्पश्चात् वाणीको प्रेरित करता है, उसे नाममें प्रवृत्त करता है। नाममें मन्त्र एकरूप होते हैं और मन्त्रोंमें कर्म ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्तं वाव संकल्पाद्भूयः, चित्तं चेतयितृत्वं प्राप्तकालानुरूपबोधवत्त्वमतीतानागतविषयप्रयोजननिरूपणसामर्थ्यं च तत् संकल्पादपि भूयः । कथम् ? यदा वै प्राप्तं वस्त्विदमेवं प्राप्तमिति चेतयते तदादानाय वापोहाय वाथ संकल्पयतेऽथ मनस्यतीत्यादि पूर्ववत् ॥ १॥ | चित्त ही सङ्कल्पसे उत्कृष्ट है। चित्त यानी चेतयितृत्व—प्राप्त कालके अनुरूप बोधयुक्त होना तथा भूत और भविष्यत् विषयोंके प्रयोजनका निरूपण करनेमें समर्थ होना—यह सङ्कल्पकी अपेक्षा भी बढ़कर है। यह कैसे ? [ सो बतलाते हैं—] जिस समय पुरुष प्राप्त हुई वस्तुको 'यह इस प्रकारकी वस्तु प्राप्त हुई है' इस प्रकार चेतित करता है, तभी वह उसे ग्रहण करने अथवा त्यागनेके लिये सङ्कल्प करता है। फिर मनस्यन करता है—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १ ॥ |
—: ० :—
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३५
तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद्यद्यपि बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वानेत्थमचित्तः स्यादित्यथ यद्यल्पविच्चित्तवान्भवति तस्मा एवोत शुश्रूषन्ते चित्तं ह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति ॥ २ ॥
वे ये [ संकल्पादि ] एकमात्र चित्तरूप लयस्थानवाले, चित्तमय तथा चित्तमें ही प्रतिष्ठित हैं। इसीसे यद्यपि कोई मनुष्य बहुज्ञ भी हो तो भी यदि वह अचित्त होता है तो लोग कहने लगते हैं कि 'यह तो कुछ भी नहीं है, यदि यह कुछ जानता अथवा विद्वान् होता तो ऐसा अचित्त न होता।' और यदि कोई अल्पज्ञ होनेपर भी चित्तवान् हो तो उसीसे वे सब श्रवण करना चाहते हैं। अतः चित्त ही इनका एकमात्र आश्रय है, चित्त ही आत्मा है और चित्त ही प्रतिष्ठा है, तुम चित्तकी उपासना करो ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तानि संकल्पादीनि कर्मफलान्तानि चित्तैकायनानि चित्तात्मानि चित्तोत्पत्तीनि चित्ते प्रतिष्ठितानि चित्तस्थितानीत्यपि पूर्ववत् । किञ्च चित्तस्य माहात्म्यम् । यस्माच्चित्तं संकल्पादिमूलं तस्माद्यद्यपि बहुविद्बहुशास्त्रादिपरिज्ञानवान्सन्नचित्तो | संकल्पसे लेकर कर्मफलपर्यन्त वे सब एकमात्र चित्तरूप लयस्थानवाले, चित्तमय—चित्तसे उत्पन्न होनेवाले और चित्तसे प्रतिष्ठित अर्थात् चित्तमें ही स्थित रहनेवाले हैं—इस प्रकार पूर्ववत् ही समझना चाहिये । इसके सिवा चित्तकी महिमा इस प्रकार है; क्योंकि चित्त संकल्पादिका मूल है इसलिये यदि कोई पुरुष बहुज्ञ—बहुत-से शास्त्रादिका परिज्ञान रखनेवाला |
७३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
|---|
| भवति प्राप्तादिचेतयितृत्वसाम- <br> र्थ्यविरहितो भवति तं निपुणा <br> लौकिका नायमस्ति विद्यमानो- <br> ऽप्यसत्सम एवेत्येनमाहुः । <br><br> यच्चायं किञ्चिच्छास्त्रादि वेद <br> श्रुतवांस्तदप्यस्य वृथैवेति कथ- <br> यन्ति । कस्मात् ? यद्ययं <br> विद्वान् स्यादित्थमैवमचित्तो न <br> स्यात्तस्मादस्य श्रुतमप्यश्रुतमेवे- <br> त्याहुरित्यर्थः । अथालपविदपि <br> यदि चित्तवान्भवति तस्मा <br> एतस्मै तदुक्तार्थग्रहणायैवोतापि <br> शुश्रूषन्ते श्रोतुमिच्छन्ति । तस्माच्च <br> चित्तं ह्येवैषां संकल्पादीनामेका- <br> यनमित्यादि पूर्ववत् ॥ २ ॥ | होकर भी अचित्त अर्थात् प्राप्त विषयादिके यथार्थ स्वरूपको जाननेकी सामर्थ्यसे रहित हो तो निपुण लौकिक पुरुष उसके विषयमें 'यह कुछ नहीं है—विद्यमान होते हुए भी असद्रूप ही है' ऐसा कहने लगते हैं । <br><br> वे यह भी कहते हैं कि 'इसने जो कुछ शास्त्रादि जाने अथवा सुने हैं वे भी इसके लिये व्यर्थ ही हैं। क्यों व्यर्थ हैं ? यदि यह विद्वान् होता तो ऐसा अचित्त (मूढ़) न होता; अतः तात्पर्य यह है कि इसका श्रवण किया हुआ भी अश्रुत ही है' ऐसा वे कहते हैं । और यदि अल्पवित् होनेपर भी वह चित्तवान् होता है तो उससे उसकी कही हुई बातको ग्रहण करनेके लिये ही वे सुननेकी इच्छा करते हैं । अतः चित्त ही इन संकल्पादि- <br> का एकायन है इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ २ ॥ |
स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते चित्तान्वै स लोकान् ध्रुवा-
न्ध्रुवःप्रतिष्ठितान्प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसि-
ध्यति । यावच्चित्तस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३७
यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवश्चित्ताद्भूय इति चित्ताद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥३॥
वह जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है [ अपने लिये ] उपचित हुए ध्रुवलोकोंको स्वयं ध्रुव होकर, प्रतिष्ठित लोकोंको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पानेवाले लोकोंको स्वयं व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है । जहाँतक चित्तकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या चित्तसे बढ़कर भी कुछ है ?' [ सनत्कुमार— ] 'चित्तसे बढ़कर भी है ही । [ नारद— ] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ ३ ॥
| चित्तानुपचितान्बुद्धिमद्गुणैः<br><br>स चित्तोपासको ध्रुवानित्यादि<br><br>चोक्तार्थम् ॥ ३ ॥ | चित्त अर्थात् बुद्धियुक्त गुणोंसे उपचित ध्रुवलोकोंको वह चित्तोपासक ध्रुव होकर—इत्यादि अर्थ पहले कहे हुएके समान है ॥ ३ ॥ |
|---|
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
चित्तकी अपेक्षा ध्यानका महत्त्व
ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो ध्यायतीव पृथिवी ध्यायतीवान्तरिक्षं ध्यायतीव द्यौर्ध्यायन्तीवापो ध्यायन्तीव पर्वता ध्यायन्तीव देवमनुष्यास्तस्माद्य इह मनुष्याणां महतां प्राप्नुवन्ति ध्यानापादाँशा इवैव ते भवन्त्यथ येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिनस्तेऽथ ये प्रभवो ध्यानापादाँशा इवैव ते भवन्ति ध्यानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
ध्यान ही चित्तसे बढ़कर है। पृथिवी मानो ध्यान करती है, अन्तरिक्ष मानो ध्यान करता है, द्युलोक मानो ध्यान करता है, जल मानो ध्यान करते हैं, पर्वत मानो ध्यान करते हैं तथा देवता और मनुष्य भी मानो ध्यान करते हैं। अतः जो लोग यहाँ मनुष्योंमें महत्त्व प्राप्त करते हैं वे मानो ध्यानके लाभका ही अंश पाते हैं; किंतु जो क्षुद्र होते हैं वे कलहप्रिय, चुगलखोर और दूसरोंके मुँहपर ही उनकी निन्दा करनेवाले होते हैं। तथा जो सामर्थ्यवान् हैं वे भी ध्यानके लाभका ही अंश प्राप्त करनेवाले हैं। अतः तुम ध्यानकी उपासना करो ॥ १ ॥
| ध्यानं वाव चित्ताद्भूयः । | ध्यानं ही चित्तसे बढ़कर है। |
|---|---|
| ध्यानं नाम शास्त्रोक्तदेवताद्यालम्बनेष्वचलो भिन्नजातीयैरनन्तरितः प्रत्ययसन्तानः, एकाग्रतेति | देवता आदि शास्त्रोक्त आलम्बनमें विजातीय वृत्तियोंसे अविच्छिन्न एक ही वृत्तिके प्रवाहका नाम 'ध्यान' है, जिसे 'एकाग्रता' ऐसा |
खण्ड ६] शाङ्करभाष्यं ७३९
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
| शाङ्करभाष्यम् | अनुवाद |
|---|---|
| यमाहुः। दृश्यते च ध्यानस्य माहात्म्यं फलतः, कथम् ? यथा योगी ध्यायन्निश्चलो भवति ध्यानफललाभे। एवं ध्यायतीव निश्चला दृश्यते पृथिवी ध्यायतीवान्तरिक्षमित्यादि समानमन्यत् । देवाश्च मनुष्याश्च देवमनुष्या मनुष्या एव वा देवसमा देवमनुष्याः शमादिगुणसम्पन्ना मनुष्या देवस्वरूपं न जहतीत्यर्थः। | भी कहते हैं। फलसे भी ध्यानका माहात्म्य देखा ही जाता है। किस प्रकार ?—जिस प्रकार ध्यान करता हुआ योगी ध्यानका फल प्राप्त होनेपर निश्चल हो जाता है इसी प्रकार पृथिवी ध्यान करती हुई-सी निश्चल दिखलायी देती है, तथा अन्तरिक्ष ध्यान करता-सा जान पड़ता है इत्यादि। शेष अर्थ इसी प्रकार समझना चाहिये। देव और मनुष्य देवमनुष्य कहे गये हैं अथवा देवतुल्य मनुष्य ही देवमनुष्य हैं। तात्पर्य यह है कि शमादि गुणोंसे सम्पन्न पुरुष देवभावका कभी त्याग नहीं करते। |
| यस्मादेवं विशिष्टं ध्यानं तस्माद्य इह लोके मनुष्याणामेव धनैर्विद्यया गुणैर्वा महत्तां महत्त्वं प्राप्नुवन्ति धनादिमहत्त्वहेतुं लभन्त इत्यर्थः। ध्यानापादांशा इव ध्यानस्यापादनमापादो ध्यानफललाभ इत्येतत्, तस्यांशोऽवयवः कला काचिद्ध्यानफललाभकलावन्त इवैवेत्यर्थः, ते | क्योंकि इस प्रकार ध्यान विशिष्ट है, इसलिये मनुष्योंमें भी जो लोग इस लोकमें धन, विद्या अथवा गुणोंके कारण महत्ता—महत्त्व प्राप्त करते हैं अर्थात् महत्त्वके हेतुभूत धनादि प्राप्त करते हैं वे ध्यानापादांशके समान हैं। ध्यानके आपादनका नाम है 'ध्यानापाद' अर्थात् ध्यानके फलकी प्राप्ति उसके एक अंश—अवयव यानी कलासे युक्त होते हैं; तात्पर्य यह है कि वे मानो ध्यानफलके आंशिक लाभसे |
छा० उ० २४—
७५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
|---|
| भवन्ति । निश्चला इव लक्ष्यन्ते न क्षुद्रा इव ।<br><br>अथ ये पुनरल्पाः क्षुद्राः किञ्चिदपि धनादिमहत्त्वैकदेशमप्राप्तास्ते पूर्वोक्तविपरीताः कलहिनः कलहशीलाः पिशुनाः परदोषोद्भासको उपवादिनः परदोषं सामीप्ययुक्तमेव वदितुं शीलं येषां त उपवादिनश्च भवन्ति । | सम्पन्न होते हैं। तथा वे निश्चल-से दिखलायी देते हैं—क्षुद्र पुरुषोंके समान नहीं देखे जाते ।<br><br>और जो अल्प—क्षुद्र अर्थात् धनादि महत्त्वके एक अंशको भी प्राप्त नहीं हैं वे उपर्युक्त मनुष्योंसे विपरीत कलही—कलह करनेवाले, पिशुन—दूसरोंके दोषोंको प्रकट करनेवाले और उपवादी—जिनका दूसरोंके दोषोंको उनके समीप ही कहनेका स्वभाव होता है—ऐसे होते हैं। | | अथ ये महत्त्वं प्राप्ता धनादिनिमित्तं तेऽन्यान् प्रति प्रभवन्तीति प्रभवो विद्याचार्यराजेश्वरादयो ध्यानापादांशा इवेत्याद्युक्तार्थम् । अतो दृश्यते ध्यानस्य महत्त्वं फलतोऽतो भूयश्चित्तादतस्तदुपास्वेत्याद्युक्तार्थम् ॥ १ ॥ | और जो लोग धनादिके कारण महत्त्वको प्राप्त हुए हैं तथा जो दूसरेके प्रति प्रभु होते हैं; प्रभु अर्थात् विद्याचार्य या राजेश्वरादि होते हैं वे मानो ध्यानफलका अंश प्राप्त करनेवाले हैं—ऐसा [ध्यानापादांशका] अर्थ पहले कहा जा चुका है। अतः फलसे भी ध्यानका महत्त्व प्रतीत होता है। इसलिये यह चित्तसे बढ़कर है; अतः तुम इसीकी उपासना करो—ऐसा पूर्ववत् अर्थ समझना चाहिये ॥ १ ॥ |
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थं ७४१
स यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो ध्यानाद्भूय इति ध्यानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
वह जो कि ध्यानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसो उपासना करता है, जहाँतक ध्यानकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि ध्यानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन्! क्या ध्यानसे भी उत्कृष्ट कुछ है?' [सनत्कुमार—] 'ध्यानसे भी उत्कृष्ट है ही।' [नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
—: ० :—
ध्यानसे विज्ञानकी महत्ता
विज्ञानं वाव ध्यानाद्भूयो विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेदꣳसामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यꣳराशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याꣳसर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवाꣳश्च मनुष्याꣳश्च पशूꣳश्च वयाꣳसि च तृणवनस्पतीञ्श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं चान्नं च रसं चेमं च लोकममुं च विज्ञानेनैव विजानाति विज्ञानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
विज्ञान ही ध्यानसे श्रेष्ठ है। विज्ञानसे ही पुरुष ऋग्वेद समझता है; तथा विज्ञानसे ही वह यजुर्वेद, सामवेद, चौथे आथर्वण वेद, वेदोंमें पाँचवें वेद इतिहास-पुराण, व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या (निरुक्त), ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड और शिल्पविद्या, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, तृण, वनस्पति, श्वापद, कीट-पतंग, पिपीलिकापर्यन्त सम्पूर्ण जीव, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य, साधु, असाधु, मनोज्ञ, अमनोज्ञ, अन्न, रस तथा इहलोक और परलोकको जानता है । तुम विज्ञानकी उपासना करो ॥ १ ॥
| खण्ड ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७४३ |
|---|
| विज्ञानं वाव ध्यानाद्भूयः। विज्ञानं शास्त्रार्थविषयं ज्ञानं तस्य ध्यानकारणत्वाद्ध्यानाद्भूयस्त्वम्। कथं च तस्य भूयस्त्वमित्याह। विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानात्ययमृग्वेद इति प्रमाणतया यस्यार्थज्ञानं ध्यानकारणम्। तथा यजुर्वेदमित्यादि समानम्। किञ्च पश्वादींश्च धर्माधर्मौ शास्त्रसिद्धौ साध्वसाधुनी लोकतः स्मार्ते वादृष्टविषयं च सर्वं विज्ञानेनैव विजानातीत्यर्थः। तस्माद्युक्तं ध्यानाद्विज्ञानस्य भूयस्त्वम्। अतो विज्ञानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ | विज्ञान ही ध्यानसे श्रेष्ठ है। विज्ञान शास्त्रार्थविषयक ज्ञानको कहते हैं; ध्यानका कारण होनेके कारण ध्यानकी अपेक्षा उसकी श्रेष्ठता है। उसकी श्रेष्ठता किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं—विज्ञानसे ही पुरुष ऋग्वेदको 'यह ऋग्वेद है' इस प्रकार प्रमाणरूपसे जानता है, जिसका अर्थज्ञान ध्यानका कारण है। तथा यजुर्वेद इत्यादि शेष अर्थ भी इसी प्रकार समझना चाहिये। यही नहीं, पशु आदिको, शास्त्रसिद्ध धर्म और अधर्मको, लोकदृष्टिसे अथवा स्मृतियोंद्वारा निर्णीत शुभ और अशुभको एवं सम्पूर्ण अदृष्ट विषयको भी वह विज्ञानसे ही जानता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। अतः ध्यानसे विज्ञानकी श्रेष्ठता ठीक ही है। इसलिये तुम विज्ञानकी उपासना करो ॥ १ ॥ |
-: ० :-
स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते विज्ञानवतो वै स लोकाञ्ज्ञानवतोऽभिसिध्यति यावद्विज्ञानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो विज्ञानं ब्रह्म त्युपास्तेऽस्ति भगवो विज्ञानाद्भूय इति विज्ञानाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
७४४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
७४४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
वह जो विज्ञानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे विज्ञानवान् एवं ज्ञानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक विज्ञानकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है जो कि विज्ञानकी 'यह ब्रह्म है ऐसी उपासना करता है। [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या विज्ञानसे भी श्रेष्ठ कुछ है?' [ सनत्कुमार— ] 'विज्ञानसे श्रेष्ठ भी है ही।' ( नारद— ) 'भगवान् मुझे वही बतलावें' ॥ २ ॥
| शृणूपासनफलं विज्ञानवतो विज्ञानं येषु लोकेषु तान्विज्ञानवतो लोकाञ्ज्ञानवतश्चाभिसिध्यत्यभिप्राप्नोति। विज्ञानं शास्त्रार्थविषयं ज्ञानमन्यविषयं नैपुण्यं तद्भिर्युक्ताँल्लोकान् प्राप्नोतीत्यर्थः। यावद्विज्ञानस्येत्यादि पूर्ववत् ॥ २ ॥ | इस उपासनाका फल श्रवण करो—विज्ञानवान् अर्थात् जिन लोकोंमें विज्ञान है उन्हें तथा ज्ञानवान् लोकोंको अभिसिद्ध—प्राप्त कर लेता है। विज्ञान शास्त्रार्थविषयक तथा अन्य विषय-सम्बन्धी निपुणताका नाम है, उनसे सम्पन्न पुरुषोंसे युक्त लोकोंको प्राप्त कर लेता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। 'यावद्विज्ञानस्य गतम्' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |
—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम खण्ड
विज्ञानसे बलकी श्रेष्ठता
बलं वाव विज्ञानाद्भूयोऽपि ह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते । स यदा बली भवत्यथोत्थाता भवत्युत्तिष्ठन् परिचरिता भवति परिचरन्नुपसत्ता भवत्युपसीदन् द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति । बलेन वै पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं बलेन द्यौर्बलेन पर्वता बलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च वयांसि च तृण-वनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं बलेन लोकस्तिष्ठति बलमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
बल ही विज्ञानकी अपेक्षा उत्कृष्ट है । सौ विज्ञानवानोंको भी एक बलवान् हिला देता है । जिस समय यह पुरुष बलवान् होता है तभी उठनेवाला भी होता है, उठकर [ अर्थात् उठनेवाला होनेपर ] ही परिचर्या करनेवाला होता है तथा परिचर्या करनेवाला होनेपर ही उपसदन [ समीप गमन ] करनेवाला होता है; और उपसदन करनेपर ही दर्शन करनेवाला होता है, श्रवण करनेवाला होता है, मनन करने-वाला होता है, बोधवान् होता है, कर्ता होता है एवं विज्ञाता होता है । बलसे ही पृथिवी स्थित है; बलसे ही अन्तरिक्ष, बलसे ही द्युलोक, बलसे ही पर्वत, बलसे ही देवता और मनुष्य, बलसे ही पशु, पक्षी, तृण, वन-स्पति, श्वापद और कीट-पतंग एवं पिपीलिकापर्यन्त समस्त प्राणी स्थित हैं तथा बलसे ही लोक स्थित है । तुम बलकी उपासना करो ॥ १ ॥
७४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
|---|
| बलं वाव विज्ञानाद्भूयः । | बल ही विज्ञानसे उत्कृष्ट है। |
|---|---|
| बलमित्यन्नोपयोगजनितं मनसो विज्ञेये प्रतिभानसामर्थ्यम् । अनशनात् "ऋगादीनि न वै मा प्रतिभान्ति भोः" (छा० उ० ६।७।२) इति श्रुतेः। शरीरेऽपि तदेवोत्थानादि सामर्थ्यं यस्माद्विज्ञानवतां शतमप्येकः प्राणी बलवानाकम्पयते यथा हस्ती मत्तो मनुष्याणां शतं समुदितमपि । | अन्नके उपयोगसे प्राप्त हुई मनकी विज्ञेय पदार्थके प्रतिभानकी शक्तिका नाम 'बल' है; क्योंकि अनशन करनेके कारण "भगवन् ! मुझे ऋगादिका प्रतिभान नहीं होता" ऐसी [छठे अध्यायमें श्वेतकेतुका वाक्यरूप] श्रुति है। शरीरमें भी वह बल ही उठने आदिका सामर्थ्य है, क्योंकि सौ विज्ञानवानोंको भी एक ही बलवान् प्राणी इस प्रकार कम्पायमान कर देता है जैसे एकत्रित हुए सौ मनुष्योंको एक मत्त हाथी । |
| यस्मादेवमन्नाद्युपयोगनिमित्तं बलं तस्मात्स पुरुषो यदा बली बलेन तद्वान्भवत्यथोत्थातोत्थानस्य कर्तोत्तिष्ठंश्च गुरूणामाचार्यस्य च परिचरिता परिचरणस्य शुश्रूषायाः कर्ता भवति परिचरन्नुपसत्ता तेषां समीपगोऽन्तरङ्गः प्रियो भवतीत्यर्थः । | क्योंकि अन्नादिके उपयोगके कारण होनेवाला बल ऐसा है इसलिये यह पुरुष जिस समय बली अर्थात् बलसे बलयुक्त होता है तो वह उत्थाता अर्थात् उत्थान करनेवाला होता है । उत्थान करनेवाला होकर वह गुरुजन और आचार्यका परिचारक-परिचर्या यानी शुश्रूषा करनेवाला होता है ! परिचर्या करनेपर उपसत्ति करनेवाला-उनके समीप पहुँचनेवाला-उनका अन्तरङ्ग अर्थात् प्रिय होता है । |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४७
| उपसीदंश्च सामीप्यं गच्छन्नेकाग्रतयाचार्यस्यान्यस्य चोपदेष्टुर्गुरोर्द्रष्टा भवति । ततस्तदुक्तस्य श्रोता भवति । तत इदमेभिरुक्तमेवमुपपद्यत इत्युपपत्तितो मन्ता भवति मन्वानश्च बोद्धा भवत्येवमेवेदमिति । तत एवं निश्चित्य तदुक्तार्थस्य कर्तानुष्ठाता भवति विज्ञातानुष्ठानफलस्यानुभविता भवतीत्यर्थः । किञ्च बलस्य माहात्म्यं बलेन वै पृथिवी तिष्ठतीत्याद्यृज्वर्थम् ॥ १ ॥ | उपसन्न होने अर्थात् समीप जानेपर वह एकाग्रभावसे आचार्य अथवा किसी अन्य उपदेश करनेवाले गुरुका दर्शन करनेवाला होता है । फिर वह उनके कथनको श्रवण करनेवाला होता है । तत्पश्चात् 'इनका यह कथन इस प्रकार उपपन्न है' इस प्रकार युक्तिपूर्वक मनन करनेवाला होता है । तथा मनन करनेपर 'यह बात ऐसी ही है' इस प्रकार उसे जाननेवाला होता है । फिर इस प्रकार निश्चय कर वह उनकी कही हुई बातका कर्ता—अनुष्ठान करनेवाला होता है, तथा विज्ञाता यानी अनुष्ठानके फलका अनुभव करनेवाला होता है—ऐसा इसका तात्पर्य है । इसके सिवा बलकी महिमा इस प्रकार है—बलसे पृथिवी स्थित है—इत्यादि शेष अर्थ सरल है ॥१॥ |
—: ० :—
स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद्भूय इति बलाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥