छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| त्सत्यकामादिगुणवत्त्वं च वक्तव्यम् । तथा यद्यपि ब्रह्मविदां स्त्र्यादिविषयेभ्यः स्वयमेवोपरमो भवति तथाप्यनेकजन्मविषयसेवाभ्यासजनिता विषयविषया तृष्णा न सहसा निवर्तयितुं शक्यत इति ब्रह्मचर्यादिसाधनविशेषो विधातव्यः । तथा यद्यप्यात्मैकत्वविदां गन्तृगमनगन्तव्याभावादविद्यादिशेषस्थिति-निमित्तक्षये गगन इव विद्युदुद्भूत इव वायुरुद्धेन्धन इवाग्निः स्वात्मन्येव निवृत्तिस्तथापि गन्तृगमनादिवासितबुद्धीनां हृदयदेशगुणविशिष्टब्रह्मोपासकानां मूर्धन्यया नाड्या गतिर्वक्तव्येत्यष्टमः प्रपाठक आरभ्यते । | होनेका प्रतिपादन करना आवश्यक है । इसी प्रकार यद्यपि ब्रह्मोपासकोंको स्त्री आदि विषयोंसे स्वयं ही उपरति होती है तो भी अनेक जन्मोंके विषयसेवनके अभ्याससे उत्पन्न हुई विषयसम्बन्धिनी तृष्णा सहसा निवृत्त नहीं की जा सकती, इसलिये ब्रह्मचर्यादि साधनविशेषका विधान करना भी आवश्यक है, इसी तरह यद्यपि आत्माका एकत्व जाननेवालोंकी दृष्टिमें गमन करनेवाले, गमनक्रिया और गन्तव्य देशका अभाव हो जानेके कारण शरीरकी स्थितिकी निमित्तभूत अविद्या आदिका क्षय हो जानेपर उनकी विद्युत, बढ़े हुए वायु और जिसका ईंधन जल गया है उस अग्निके आकाशमें लीन हो जानेके समान अपने आत्मामें ही निवृत्ति हो जाती है तो भी जिनकी बुद्धि गन्ता और गमनादिकी वासनासे युक्त है अपने हृदयदेशस्थित गुणविशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करनेवाले उन पुरुषोंकी शिरोगत नाडीसे होनेवाली गतिका प्रतिपादन करना आवश्यक है, इसीलिये अष्टम प्रपाठकका आरम्भ किया जाता है । |
| दिग्देशगुणगतिफलभेदशून्यं हि परमार्थसदद्वयं ब्रह्म मन्द- | दिशा, देश, गुण, गति और फलभेदसे शून्य जो परमार्थ सत् |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यथ ८०५
| बुद्धीनामसदिव प्रतिभाति । सन्मार्गस्थास्तावद्भवन्तु; ततः शनैः परमार्थसदपि ग्राहयिष्यामीति मन्यते श्रुतिः । | अद्वितीय ब्रह्म है, वह मन्दबुद्धि पुरुषोंको असत्के समान प्रतीत होता है; ये सन्मार्गमें स्थित हों, तब धीरे-धीरे मैं इन्हें परमार्थ सत्को भी ग्रहण करा दूँगी--ऐसा श्रुति मानती है। |
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हरिः ॐ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥
अब इस ब्रह्मपुरके भीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है इसमें जो सूक्ष्म आकाश है उसके भीतर जो वस्तु है उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसीकी जिज्ञासा करनी चाहिये ॥ १ ॥
| अथानन्तरं यदिदं वक्ष्यमाणं दहरमल्पं पुण्डरीकं पुण्डरीकसदृशं वेश्मेव वेश्म द्वारपालादिमत्त्वात्; अस्मिन्ब्रह्मपुरे ब्रह्मणः परस्य पुरं राज्ञोऽनेकप्रकृतिमद्यथा पुरं तथेदमनेकेन्द्रियमनोबुद्धिभिः स्वाम्यर्थकारिभिर्युक्तमिति ब्रह्मपुरम् । पुरे च वेश्म राज्ञो यथा तथा तस्मिन् ब्रह्मपुरे शरीरे दहरं वेश्म ब्रह्मण उपलब्ध्यधि- | अथ-इसके पश्चात् [ यह कहा जाता है कि ] यह जो आगे कहा जानेवाला दहर अर्थात् छोटा-सा कमल सदृश गृह है-द्वारपालादिसे युक्त होनेके कारण जो गृहके समान गृह है वह इस ब्रह्मपुरमें-ब्रह्म यानी परमात्माके पुरमें, जैसा कि राजाका अनेकों प्रजाओंसे युक्त पुर होता है उसी प्रकार यह ( शरीर ) भी [आत्मारूप] अपने स्वामीका अर्थ सिद्ध करनेवाली अनेकों इन्द्रियों तथा मन और बुद्धिसे युक्त पुर है, अतः यह ब्रह्मपुर है। जिस प्रकार पुरमें राजाका भवन होता है उसी प्रकार उस ब्रह्मपुररूप शरीरमें एक सूक्ष्म गृह अर्थात् ब्रह्मकी उपलब्धिका अधिष्ठान है, जिस प्रकार कि शाल- |
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| ८०६ | छान्दोग्योपनिषद् | अध्याय ८ |
| ८०६ | छान्दोग्योपनिषद् | अध्याय ८ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| ष्ठानमित्यर्थः, यथा विष्णोः शालग्रामः ।<br><br>अस्मिन् हि स्वविकारशुङ्गे देहे नामरूपव्याकरणाय प्रविष्टं सदाख्यं ब्रह्म जीवेनात्मनेत्युक्तम् । तस्मादस्मिन्हृदयपुण्डरीके वेश्मन्युपसंहृतकरणैर्बाह्यविषयविरक्तैर्विशेषतो ब्रह्मचर्यसत्यसाधनाभ्यां युक्तैर्वक्ष्यमाणगुणवद्ध्यायमानैर्ब्रह्मोपलभ्यत इति प्रकरणार्थः ।<br><br>दहरोऽल्पतरोऽस्मिन्दहरे वेश्मनि वेश्मनोऽल्पत्वात्तदन्तर्वर्तिनोऽल्पतरत्वं वेश्मनोऽन्तराकाश आकाशाख्यं ब्रह्म । आकाशो वै नामेति हि वक्ष्यति ।<br><br>आकाश इवाशरीरत्वात्सूक्ष्मत्वसर्वगतत्वसामान्याच्च । तस्मिन्ना- | ग्रामशिला विष्णुकी उपलब्धिकी अधिष्ठान होती है—ऐसा इसका तात्पर्य है।<br><br>इस अपने विकारभूत कार्य--देहमें सत्संज्ञक ब्रह्म नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये जीवात्मभावसे अनुप्रविष्ट है—यह कहा जा चुका है। इसीसे जिन्होंने इस हृदयकमलरूप भवनमें अपने इन्द्रियवर्गका उपसंहार कर दिया है उन बाह्य विषयोंसे विरक्त, विशेषतः ब्रह्मचर्य एवं सत्यरूप साधनोंसे सम्पन्न तथा आगे बतलाये जानेवाले गुणोंसे युक्त पुरुषोंद्वारा चिन्तन किये जानेपर ब्रह्मकी उपलब्धि होती है—ऐसा इस प्रकरणका तात्पर्य है।<br><br>इस सूक्ष्म गृहमें दहर—अत्यन्त सूक्ष्म अन्तराकाश यानी आकाशसंज्ञक ब्रह्म है। गृह सूक्ष्म होनेके कारण उसके अन्तर्वर्ती आकाशका सूक्ष्मतरत्व सिद्ध होता है। 'आकाश ही नाम-रूपका निर्वाह करनेवाला है' ऐसा श्रुति कहेगी भी। आकाशके समान अशरीर होनेके कारण तथा सूक्ष्मत्व और सर्वगतत्वमें उससे समानता होनेके कारण [ उसे आकाश कहा |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०७
| काशाख्ये यदन्तर्मध्ये तदन्वेष्टव्यम् । तद्भाव तदेव च विशेषेण जिज्ञासितव्यं गुर्वाश्रयश्रवणाद्युपायैरन्विष्य च साक्षात्करणीयमित्यर्थः ॥ १ ॥ | गया है ] । उस आकाशसंज्ञक तत्त्वके भीतर जो वस्तु है, उसका अन्वेषण करना चाहिये, तथा उसीकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये, अर्थात् गुरुके आश्रय तथा श्रवणादि उपायोंसे अन्वेषण करके उसका साक्षात्कार करना चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥ |
—:०:—
तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥
उस (गुरु) से यदि [ शिष्यगण ] कहें कि इस ब्रह्मपुरमें जो सूक्ष्म कमलाकार गृह है उसमें जो अन्तराकाश है उसके भीतर क्या वस्तु है जिसका अन्वेषण करना चाहिये अथवा जिसकी जिज्ञासा करनी चाहिये?—तो [ इस प्रकार पूछनेवाले शिष्योंके प्रति ] वह आचार्य यों कहे ॥ २ ॥
| तं चेदेवमुक्तवन्तमाचार्यं यदि ब्रूयुरन्तेवासिनश्चोदययुः, कथम् ? यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे परिच्छिन्नेऽन्तर्दहरं पुण्डरीकं वेश्म ततोऽप्यन्तरल्पतर एवाकाशः । पुण्डरीक एव वेश्मनि तावत्किं | इस प्रकार कहनेवाले उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें अर्थात् शङ्का करें, किस प्रकार शङ्का करें?—इस परिच्छिन्न ब्रह्मपुरमें जो यह अन्तर्वर्ती कमलाकार सूक्ष्म गृह है उसके भीतर तो उससे भी सूक्ष्मतर आकाश है । प्रथम तो उस कमलाकार गृहमें ही क्या वस्तु रह सकती है ? फिर उससे भी |
| १०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
| १०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| स्यात् । किं ततोऽल्पतरे खे यद्द्भवेदित्याहुः । दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते न किञ्चन विद्यत इत्यभिप्रायः । <br><br> यदि नाम बदरमात्रं किमपि विद्यते किं तस्यान्वेषणेन विजिज्ञासनेन वा फलं विजिज्ञासितुः स्यात् ? अतो यत्तत्रान्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं वा न तेन प्रयोजनमित्युक्तवतः स आचार्यो ब्रूयादिति श्रुतेर्वचनम् ॥ २ ॥ | अल्पतर आकाशमें जो हो ऐसी क्या वस्तु हो सकती है ?--इस प्रकार यदि वे पूछें। अभिप्राय यह है कि इस हृदयपुण्डरीकके भीतर जो आकाश है वह सूक्ष्म है, उसमें क्या वस्तु हो सकती है ? अर्थात् कुछ भी नहीं हो सकती। <br><br> यदि बेरके समान कोई वस्तु हो भी तो उसकी खोज अथवा जिज्ञासा करनेसे जिज्ञासुको फल भी क्या होगा ? अतः वहाँ जो खोज करने योग्य अथवा जिज्ञासा करने योग्य वस्तु है उससे हमें कोई प्रयोजन नहीं है तो इस प्रकार कहनेवाले शिष्योंसे आचार्यको इस प्रकार कहना चाहिये—यह श्रुतिका वाक्य है ॥ २ ॥ |
| शृणुत, तत्र यद्ब्रूथ पुण्डरीकान्तःखस्याल्पत्वात्तत्स्थमल्पतरं स्यादिति, तदसत् । न हि खं पुण्डरीकवेश्मगतं पुण्डरीकादल्पतरं मत्वावोचं दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश इति । किन्तर्हि ? पुण्डरीकमल्पं तदनुविधायि | सुनो, इस विषयमें तुम जो कहते हो कि हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाश सूक्ष्म होनेके कारण उसका अन्तर्वर्ती ब्रह्म और भी सूक्ष्म होगा, वह ठीक नहीं। मैंने हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाशको हृदयकमलसे सूक्ष्मतर मानकर यह नहीं कहा कि इसका अन्तर्वर्ती आकाश सूक्ष्म है। तो क्या बात है ?—हृदयकमल सूक्ष्म है उसका अनुवर्तन |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०९
| तत्स्थमन्तःकरणं पुण्डरीकाकाश- | करनेवाला उसका अन्तर्वर्ती अन्तः- | | परिच्छिन्नं तस्मिन्विशुद्धे संहृत- | करण उस पुण्डरीकाकाशसे परि- | | करणानां योगिनां स्वच्छ इवो- | च्छिन्न है। जिन्होंने अपनी इन्द्रि- | | दके प्रतिबिम्बरूपमादर्श इव च | योंका उपसंहार कर लिया है उन | | शुद्धे स्वच्छं विज्ञानज्योतिः- | योगियोंको उस विशुद्ध अन्तःकरणमें | | स्वरूपावभासं तावन्मात्रं ब्रह्मो- | जलमें प्रतिबिम्बके समान तथा | | पलभ्यत इति दहरोऽस्मिन्नन्तरा- | स्वच्छ दर्पणमें रूपके समान विशुद्ध | | काश इत्यवोचामान्तःकरणोपा- | विज्ञानज्योतिःस्वरूपसे प्रतीत होने- | | धिनिमित्तम्; स्वतस्तु-- | वाला ब्रह्म उसीके बराबर उपलब्ध | | | होता है। इसीसे अन्तःकरणरूप | | | उपाधिके कारण हमने यह कहा | | | था कि इसका अन्तर्वर्ती आकाश | | | अन्तःकरणरूप उपाधिके कारण | | | सूक्ष्म है; स्वयं तो— |
यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ॥ ३ ॥
जितना यह [ भौतिक ] आकाश है उतना ही हृदयान्तर्गत आकाश है। द्युलोक और पृथिवी—ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे इसके भीतर ही स्थित हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु—ये दोनों, सूर्य और चन्द्रमा—ये दोनों तथा विद्युत् और नक्षत्र एवं इस आत्माका जो कुछ इस लोकमें है और जो नहीं है वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ॥ ३ ॥
८१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| यावान्वै प्रसिद्धः परिमाणतोऽयमाकाशो भौतिकस्तावतानेषोऽन्तर्हृदय आकाशो यस्मिन्नन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं चावोचाम । नाप्याकाशतुल्यपरिमाणत्वमभिप्रेत्य तावानित्युच्यते। किं तर्हि ? ब्रह्मणोऽनुरूपस्य दृष्टान्तान्तरस्याभावात् । कथं पुनराकाशसममेव ब्रह्मेत्यवगम्यते । “येनावृतं खं च दिवं महीं च” ( महानारा० उ० १।३ ) “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः ।” (तै०उ० २।१।१) “एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाशः ।” (बृ०उ० ३।८।११)<br><br>इत्यादिश्रुतिभ्यः ।<br>किञ्चोभे अस्मिन्द्यावापृथिवी ब्रह्माकाशे बुद्धद्युपाधिविशिष्टे अन्तरेव समाहिते सम्यगाहिते स्थिते। यथा वा अरा नाभावित्युक्तं हि । तथोभावग्निश्च वायुश्चेत्यादि | परिमाणमें जितना यह भौतिक आकाश प्रसिद्ध है उतना ही यह हृदयान्तर्गत आकाश है, जिसके विषयमें कि हमने 'अन्वेषण करना चाहिये तथा जिज्ञासा करनी चाहिये' ऐसा कहा था । [ यही नहीं ] 'ब्रह्मको आकाशके समान परिमाणवाला मानकर भी ऐसा नहीं कहा जाता । तो फिर क्या बात है ? — ब्रह्मके अनुरूप कोई अन्य दृष्टान्त न होनेके कारण ऐसा कहा जाता है । [ प्रश्न] किंतु ब्रह्म आकाशके समान ही नहीं है—यह कैसे जाना जाता है ? [उत्तर] 'जिसने आकाश, द्युलोक और पृथ्वीको आवृत किया हुआ है” “उस इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ” “हे गार्गि ! इस अक्षरमें ही आकाश स्थित है” इत्यादि श्रुतियोंसे यह बात सिद्ध होती है ।<br>यही नहीं, इस बुद्धयुपाधिविशिष्ट ब्रह्माकाशके भीतर ही द्युलोक और पृथिवी समाहित—सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं; जिस प्रकारकी नाभिमें अरे—ऐसा पहले कह ही चुके हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु —ये दोनों भी |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८११
| समानम् । यच्चास्यात्मन आत्मीयत्वेन देहवतोऽस्ति विद्यत इह लोके, तथा यच्चात्मीयत्वेन न विद्यते; नष्टं भविष्यच्च नास्तोत्युच्यते । न त्वत्यन्तमेवासत्, तस्य हृद्याकाशे समाधानानुपपत्तेः ॥ ३ ॥ | स्थित हैं—इत्यादि शेष वाक्यका तात्पर्य भी इसीके समान है । इस देहवान् आत्माका आत्मीयरूपसे जो कुछ पदार्थ इस लोकमें है ओर जो कुछ 'आत्मीयरूपसे [ इस समय ] नहीं है, नष्ट हो गया है अथवा भविष्यमें नहीं होगा'—ऐसा कहा जाता है [ वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ] । यहाँ अत्यन्त असत् वस्तुसे अभिप्राय नहीं है, क्योंकि उसकी तो हृदयाकाशमें स्थिति होनी ही सम्भव नहीं है ॥ ३ ॥ |
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तं चेद्ब्रूयुरस्मिँश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वँसमाहितँ सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैतज्जरा वाप्नोति प्रध्वँसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥
उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें यह सब समाहित है तथा सम्पूर्ण भूत और समस्त कामनाएँ भी सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं तो जिस समय यह वृद्धावस्थाको प्राप्त होता अथवा नष्ट हो जाता है उस समय क्या शेष रह जाता है ? ॥ ४ ॥
| तं चेदेवमुक्तवन्तं ब्रूयुः पुनरन्तेवासिनोऽस्मिंश्चेद्यथोक्ते चेद्यदि ब्रह्मपुरे ब्रह्मपुरोपलक्षितान्तराकाश | किंतु यदि इस प्रकार कहनेवाले उस आचार्यसे शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें अर्थात् ब्रह्मपुरोपलक्षित अन्तराकाशमें यह सब सम्यक् प्रकारसे स्थित है तथा |
८१२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
८१२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| इत्यर्थः । इदं सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामाः । | सम्पूर्ण भूत और समस्त कामनाएँ भी स्थित हैं [ तो जिस समय यह वृद्ध होता या नष्ट हो जाता है उस समय क्या क्या रहता है ? ] |
| कथमाचार्येणानुक्ताः कामा अन्तेवासिभिरुच्यन्ते ? | **शङ्का—**आचार्यने जिनका निरूपण नहीं किया उन कामनाओंको शिष्यगण क्यों [ ब्रह्मपुरमें स्थित ] बतलाते हैं ? |
| नैष दोषः; यच्चास्येहास्ति यच्च नास्तीत्युक्ता एव ह्याचार्येण कामाः । अपि च सर्वशब्देन चोक्ता एव कामाः । यदा यस्मिन्काल एतच्छरीरं ब्रह्मपुराख्यं जरावलीपलितदिलक्षणा वयोहानिर्माप्नोति शस्त्रादिना वा वृक्णं प्रध्वंसते विस्रंसते विनश्यति किं ततोऽन्यदतिशिष्यते । | **समाधान—**यह दोष नहीं है; 'इस लोकमें जो कुछ इसका है और जो कुछ नहीं है' इस प्रकार आचार्यने कामनाओंके विषयमें कहा ही है। इसके सिवा 'सर्व' शब्दसे भी कामनाओंका कथन हो ही जाता है । जब—जिस समय इस ब्रह्मपुरसंज्ञक शरीरको झुर्रियाँ पड़ जाने और केशोंके पक जाने आदि रूपसे वृद्धावस्था अपनाती है अथवा उसकी आयुका क्षय प्राप्त होता है अथवा वह शस्त्रादिसे काटा जाकर ध्वंस—विस्रंसन यानी नाशको प्राप्त हो जाता है तो उससे भिन्न और क्या शेष रहता है ? |
| घटाश्रितक्षीरदधिस्नेहादिवद्-घटनाशे देहनाशेऽपि देहाश्रयमुत्तरोत्तरं पूर्वपूर्वनाशान्नश्यती- | अभिप्राय यह है कि घटका नाश होनेपर घटस्थित दुग्ध, दही और घृतादिके नाशके समान देहका नाश होनेपर भी देहके आश्रित |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१३
| त्यभिप्रायः। एवं प्राप्ते नाशे किं ततोऽन्यद्यथोक्तादतिशिष्यतेऽवतिष्ठते न किञ्चनावतिष्ठत इत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ | उत्तरोत्तर कार्य पूर्व-पूर्व कारणका नाश होनेके कारण नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार नाश होनेपर उपर्युक्त नाशसे भिन्न और क्या रह जाता है? अर्थात् कुछ भी नहीं रहता—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥४॥ |
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| एवमन्तेवासिभिश्चोदितः— | शिष्योंद्वारा इस प्रकार प्रश्न किये जानेपर— |
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स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥
उसे कहना चाहिए 'इस (देह) की जरावस्थासे यह (आकाशाख्य ब्रह्म) जीर्ण नहीं होता। इसके वधसे उसका नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है; इसमें [सम्पूर्ण] कामनाएँ सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं; यह आत्मा है, धर्माधर्मसे शून्य है तथा जराहीन, मृत्युहीन, शोकरहित, भोजनेच्छारहित, पिपासाशून्य, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है; जिस प्रकार इस लोकमें प्रजा राजाकी आज्ञाका अनुवर्तन करती है तो वह जिस-जिस सन्निहित वस्तुकी कामना करती है तथा जिस-जिस देश या भूभागकी इच्छा करती है उसी-उसीके आश्रित जीवन धारण करती है' ॥ ५ ॥
८१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| स आचार्यो ब्रूयात्तन्मतिमपनयन् । कथम् ? अस्य देहस्य जरयैतद्यथोक्तमन्तराकाशाख्यं ब्रह्म यस्मिन् सर्वं समाहितं न जीर्यति देहवन्न विक्रियत इत्यर्थः। न चास्य वधेन शस्त्रादिघातेनैतद्धन्यते यथाकाशम्; किमु ततोऽपि सूक्ष्मतरमशब्दमस्पर्शं ब्रह्म देहेन्द्रियादिदोषैर्नस्पृश्यत इत्यर्थः । <br><br> कथं देहेन्द्रियादिदोषैर्न स्पृश्यत इत्येतस्मिन्नवसरे वक्तव्यं प्राप्तं तत्प्रकृतव्यासङ्गो मा भूदिति नोच्यते । इन्द्रविरोचनाख्यायिकायामुपरिष्टाद्वक्ष्यामो युक्तितः । <br><br> एतत्सत्यमवितथं ब्रह्मपुरं <br> ब्रह्मैव ब्रह्म-पुरम् । ब्रह्मैव पुरं ब्रह्मपुरं शरीराख्यं तु ब्रह्म- | उस आचार्यको उनकी [ शून्य-विषयिणी ] बुद्धिकी निवृत्ति करते हुए इस प्रकार कहना चाहिये । किस प्रकार कहना चाहिये ?— इस देहकी जरावस्थासे यह उपर्युक्त अन्तराकाशसंज्ञक ब्रह्म, जिसमें कि सब कुछ स्थित है जीर्ण नहीं होता, अर्थात् देहके समान उसका विकार नहीं होता, और न इसके वध अर्थात् शस्त्रादिके प्रहारसे यह नष्ट ही होता है, जैसे कि [ शस्त्रादिके आघातसे ] आकाशका नाश नहीं होता; फिर उससे भी सूक्ष्मतर अशब्द एवं अस्पर्श ब्रह्मको देह एवं इन्द्रियादिके दोषसे स्पर्श नहीं होता—इस विषयमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका तात्पर्य है । <br><br> देह एवं इन्द्रियादिके दोषोंसे ब्रह्मका स्पर्श क्यों नहीं होता ? इस बातका उल्लेख करना इस अवसरपर आवश्यक है; परंतु प्रसङ्गका विच्छेद न हो, इसलिये यहाँ नहीं कहा जाता । आगे इन्द्र-विरोचनकी आख्यायिकामें इसका युक्तिपूर्वक वर्णन करेंगे । <br><br> यह ब्रह्मपुर सत्य—अवितथ है । ब्रह्म ही पुर [अर्थात् ब्रह्मरूप पुरका नाम ] ब्रह्मपुर है । किंतु यह |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१५
| पुरं ब्रह्मोपलक्षणार्थत्वात्। तच्चानृतमेव, “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः। तद्विकारेऽनृतेऽपि देहशृङ्गे ब्रह्मोपलक्ष्यत इति ब्रह्मपुरमित्युक्तं व्यावहारिकम्। सत्यं तु ब्रह्मपुरमेतदेव ब्रह्म; सर्वव्यवहारास्पदत्वात्। अतोऽस्मिन्पुण्डरीकोपलक्षिते ब्रह्मपुरे सर्वे कामा ये बहिर्भवद्भिः प्रार्थ्यन्ते तेऽस्मिन्नेव स्वात्मनि समाहिताः। अतस्तत्प्राप्त्युपायमेवानुतिष्ठत बाह्यविषयतृष्णां त्यजतेत्यभिप्रायः। | शरीरसंज्ञक ब्रह्मपुर ब्रह्मके उपलक्षणके लिये होनेके कारण [ ब्रह्मपुर कहा जाता ] है। और वह तो मिथ्या ही है, क्योंकि “वाणीके आश्रित विकार नाममात्र है” ऐसी श्रुति है। ब्रह्मका विकार और मिथ्या होनेपर भी इस देहरूप अङ्कुर—कार्यमें ब्रह्मकी उपलब्धि होती है, इसलिये इसे व्यावहारिक ब्रह्मपुर कहा गया है। वास्तविक ब्रह्मपुर तो यह ब्रह्म ही है, क्योंकि यह सम्पूर्ण व्यवहारका आश्रय है। अतः इस हृदयपुण्डरीकोपलक्षित ब्रह्मपुरमें सम्पूर्ण कामनाएँ जिन्हें कि आप बाहर पाना चाहते हैं। वे सब-की-सब इस अपने आत्मामें ही स्थित हैं। इसलिये आपको उसकी प्राप्तिके उपायका ही अनुष्ठान करना चाहिये और बाह्य विषयोंकी तृष्णाका परित्याग कर देना चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है। | | एष आत्मा भवतां स्वरूपम्। आत्मनो लक्षणम्। शृणुत तस्य लक्षणम्। अपहतपाप्मा, अपहतः पाप्मा धर्माधर्माख्यो यस्य सोऽयमपहतपाप्मा। तथा विजरो विगतजरो विमृत्युश्च। | यह आत्मा आपका स्वरूप है। आप उसका लक्षण सुनिये। अपहतपाप्मा—जिसका धर्माधर्मसंज्ञक पाप अपहत—नष्ट हो गया है वह यह ब्रह्म अपहतपाप्मा है। इसी प्रकार विजर—जिसकी जरावस्था बीत गयी है और मृत्युहीन है। |
८१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| तदुक्तं पूर्वमेव न वधेनास्य हन्यत इति किमर्थं पुनरुच्यते ? | शङ्का—'इस (शरीर) के नाशसे उसका नाश नहीं होता'—यह बात तो पहले ही कही जा चुकी है, फिर इसे पुनः क्यों कहा जाता है ? | | यद्यपि देहसम्बन्धिभ्यां जरा-मृत्युभ्यां न सम्बध्यते। अन्यथापि सम्बन्धस्ताभ्यां स्यादित्याशङ्कानिवृत्त्यर्थम्। | समाधान—यद्यपि देह-सम्बन्धी जरा-मृत्युसे उसका सम्बन्ध नहीं होता तो भी अन्य प्रकारसे तो उनके साथ उसका सम्बन्ध हो ही सकता है—इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये ऐसा किया गया है। | | विशोको विगतशोकः। शोको नामेष्टादिवियोगनिमित्तो मानसः सन्तापः। विजिघत्सो विगताशनेच्छः। अपिपासोऽपानेच्छः। | वह—विशोक—शोकरहित—इष्टादिका वियोग होनेके कारण जो मानसिक संताप होता है उसे शोक कहते हैं, विजिघत्स—भोजनेच्छासे रहित और अपिपास—पीनेकी इच्छासे रहित है। | | नन्वपहतपाप्मत्वेन जरादयः शोकान्ताः प्रतिषिद्धा एव भवन्ति। कारणप्रतिषेधात्। धर्माधर्मकार्या हि त इति। जरादिप्रतिषेधेन वा धर्माधर्मयोः कार्याभावे विद्यमानयोरप्यसत्समत्वमिति पृथक्प्रतिषेधोऽनर्थकः स्यात्। | शङ्का—किंतु अपहतपाप्मत्वके द्वारा तो जरासे लेकर शोकपर्यन्त सभी विशेषण प्रतिषिद्ध हो जाते हैं, क्योंकि उनके कारणका प्रतिषेध हो जाता है, कारण वे सब धर्माधर्मके ही कार्य हैं; अथवा जरादिके प्रतिषेधसे धर्माधर्मका कोई कार्य न रहनेके कारण, विद्यमान रहते हुए भी, उनका असत्समत्व सिद्ध होता है। इसलिये इन दोनोंका पृथक् प्रतिषेध निरर्थक ही है। |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| जरादि-प्रतिषेध-सामर्थ्यम्<br>सत्यमेवं तथापि धर्मकार्यानन्दव्यतिरेकेण स्वाभाविकानन्दो यथेश्वरे “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० ३ । ९ । २८) इति श्रुतेः । तथाधर्मकार्यजरादिव्यतिरेकेणापि जरादिदुःखस्वरूपं स्वाभाविकं स्यादित्याशङ्क्यते । अतो युक्तस्तन्निवृत्तये जरादीनां धर्माधर्माभ्यां पृथक्प्रतिषेधः । जरादिग्रहणं सर्वदुःखोपलक्षणार्थम् । पापनिमित्तानां तु दुःखानामानन्त्यात्प्रत्येकं च तत्प्रतिषेधस्याशक्यत्वात्सर्वदुःखप्रतिषेधार्थं युक्तमेवापहतपाप्मत्ववचनम् । | समाधान—ठीक है, ऐसा ही होता है; किंतु जिस प्रकार ईश्वरमें धर्मके कार्यभूत आनन्दसे भिन्न “ब्रह्म विज्ञानस्वरूप और आनन्दमय है” इस श्रुतिके अनुसार स्वाभाविक आनन्द है इसी प्रकार अधर्मके कार्यरूप जरादिसे भिन्न स्वाभाविक जरादि दुःखका होना भी सम्भव है—ऐसी आशङ्का हो सकती है । इसलिये उसकी निवृत्तिके लिये धर्माधर्मसे जरादिका पृथक् प्रतिषेध करना उचित ही है । जरादिका ग्रहण सम्पूर्ण दुःखोंके उपलक्षणके लिये है । पापनिमित्तक दुःखोंकी अनन्तता होनेके कारण और उनमेंसे प्रत्येकका प्रतिषेध करना असम्भव होनेसे सम्पूर्ण दुःखोंका प्रतिषेध करनेके लिये उसके अपहतपाप्मत्वका प्रतिपादन करना उचित ही है । |
| सत्या अवितथाः कामा यस्य सोऽयं सत्यकामः । वितथा हि संसारिणां कामाः । ईश्वरस्य तद्विपरीताः । तथा कामहेतवः संकल्पा अपि सत्या यस्य स सत्यसंकल्पः । संकल्पाः कामाश्च शुद्धसत्त्वोपाधिनिमित्ता ईश्वरस्य | जिसकी कामनाएँ सत्य—अमिथ्या हैं उसे सत्यकाम कहते हैं । असत्य तो संसारियोंकी ही कामनाएँ हुआ करती हैं, ईश्वरकी कामनाएँ तो उससे विपरीत होती हैं । इसी प्रकार जिसके कामके हेतुभूत संकल्प भी सत्य हैं वह ईश्वर सत्यसंकल्प है । ईश्वरके |
८१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| भाष्यम् | अनुवाद |
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| चित्रगुवत्। न स्वतो नेति नेतीत्युक्तत्वात्। यथोक्तलक्षण एवात्मा विज्ञेयो गुरुभ्यः शास्त्रतश्चात्मसंवेद्यतया च स्वाराज्यकामैः। | संकल्प और कामना चित्रगुके समान* उसकी शुद्धसत्त्वरूप उपाधिके कारण हैं, स्वतः नहीं; क्योंकि 'नेति नेति' ऐसा कहकर उनका प्रतिषेध किया गया है। स्वाराज्यकी इच्छावाले पुरुषोंको गुरु और शास्त्रद्वारा उपर्युक्त लक्षणोंवाले आत्माको ही स्वसंवेद्यरूपसे जानना चाहिये। |
| (आत्मतत्त्वाज्ञाने दोषः)<br>न चेद्विज्ञायते को दोषः स्यादिति, शृणु—तत्र दोषं दृष्टान्तेन। यथा हीवेह लोके प्रजा अन्वाविशन्त्यनुवर्तन्ते यथानुशासनं यथेह प्रजा अन्यं स्वामिनं मन्यमानाः स्वस्य स्वामिनो यथा यथानुशासनं तथा तथान्वाविशन्ति। किम् ? यं यमन्तं प्रत्यन्तं जनपदं क्षेत्रभागं वाभिकामा अर्थिन्यो भवन्त्यात्मबुद्ध्यनुरूपं तं तमेव च प्रत्यन्तादिमुपजीवन्तीति। एष दृष्टान्तोऽस्वातन्त्र्यदोषं प्रति पुण्यफलोपभोगे ॥ ५ ॥ | यदि कहो कि उसे न जानें तो भी क्या दोष है तो इसमें जो दोष है वह दृष्टान्तपूर्वक सुनो। इस लोकमें जिस प्रकार प्रजा [राजाके] अनुशासनके अनुसार रहती है—इस लोकमें जिस प्रकार अपनेसे भिन्न कोई अन्य स्वामी माननेवाली प्रजा जैसी अपने स्वामीकी आज्ञा होती है उसी प्रकार अनुवर्तन करती है; किसका अनुवर्तन करती है?—वह अपनी बुद्धिके अनुसार जिस-जिस प्रत्यन्त (वस्तुकी संनिधि), देश अथवा क्षेत्रभागकी कामना करती है उसी-उसी प्रत्यन्तादिकी उपजीविनी होती है। यह दृष्टान्त पुण्यफलोपभोगमें अस्वातन्त्र्यदोषके प्रति है ॥ ५ ॥ |
* जिस प्रकार जिसके यहाँ चित्र-वर्णवाली गौएँ हैं उसको चित्रगु कहते हैं, उसी प्रकार।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१९
पुण्यकर्मफलोंका अनित्यत्व
| अथान्यो दृष्टान्तस्तत्क्षयं प्रति तद्यथेहेत्यादिः । | अब उस (कर्मफल) के क्षयके लिये 'तद्यथेत्यादि' श्रुतिसे दूसरा दृष्टान्त दिया जाता है— |
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तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान्कामाँस्तेषाँ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान् कामाँस्तेषाँसर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ६ ॥
जिस प्रकार यहाँ कर्मसे प्राप्त किया हुआ लोक क्षीण हो जाता है उसी प्रकार परलोकमें पुण्योपार्जित लोक क्षीण हो जाता है । जो लोग इस लोकमें आत्माको और इन सत्य कामनाओंको बिना जाने ही परलोकगामी होते हैं उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति नहीं होती और जो इस लोकमें आत्माको तथा सत्य कामनाओंको जानकर [ परलोकमें ] जाते हैं उनकी समस्त लोकोंमें यथेच्छगति होती है ॥ ६ ॥
| तत्तत्र यथेह लोके तासामेव स्वाम्यनुशासनानुवर्तिनीनां प्रजानां सेवादिजितो लोकः पराधीनोपभोगः क्षीयतेऽन्तवान्भवति । अथेदानीं दार्ष्टान्तिकमुपसंहरति एवमेवामुत्राग्निहोत्रादिपुण्यजितो लोकः पराधीनोपभोगः क्षीयत एवेति । उक्तो दोष | सो जिस प्रकार इस लोकमें अपने स्वामीके अनुशासनका अनुवर्तन करनेवाली उन प्रजाओंका सेवादि-कर्मसे प्राप्त किया हुआ यह लोक, जिसका उपभोग पराधीन है, क्षीण-अन्तवान् हो जाता है—अब श्रुति दार्ष्टान्तका उपसंहार करती है—उसी प्रकार परलोकमें अग्निहोत्रादि पुण्यकर्मसे प्राप्त किया हुआ लोक भी, जिसका उपभोग पराधीन है, क्षीण ही हो जाता है । उक्त दोष |
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८२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| एषामिति विषयं दर्शयति तद्य इत्यादिना। | इन (अनात्मवेत्ताओं) को ही प्राप्त होता है—इस प्रकार श्रुति 'तद्ये' इत्यादि वाक्यसे दोषका विषय दिखलाती है। |
| तत्तत्रेहास्मिँल्लोके ज्ञानकर्मणोरधिकृता योग्याः सन्त आत्मानं यथोक्तलक्षणं शास्त्राचार्योपदिष्टमननुविद्य यथोपदेशमनु स्वसंवेद्यतामकृत्वा व्रजन्ति देहादस्मात्प्रयन्ति। य एतांश्च यथोक्तान्सत्यान्सत्यसंकल्पकार्यांश्च स्वात्मस्थान् कामानननुविद्य व्रजन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारोऽस्वतन्त्रता भवति। यथा राजानुशासनाननुवर्तिनीनां प्रजानामित्यर्थः। | सो इस लोकमें ज्ञान और कर्मके अधिकारी अर्थात् योग्यतासम्पन्न होकर जो लोग शास्त्र और आचार्यद्वारा उपदेश किये हुए उपर्युक्त लक्षणवाले आत्माको उनके उपदेशके अनुसार बिना जाने—स्वात्मसंवेद्यताको बिना प्राप्त किये इस देहसे चले जाते हैं और जो इन उपर्युक्त सत्य—सत्यसंकल्पकी कार्यभूत अपने अन्तःकरणमें स्थित सत्य कामनाओंको बिना जाने चले जाते हैं उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें अकामगति—अस्वतन्त्रता होती है। जिस प्रकार कि राजाकी आज्ञाका अनुवर्तन करनेवाली प्रजाओंकी परतन्त्रता रहती है। |
| अथ येऽन्य इह लोक आत्मानं शास्त्राचार्योपदेशमनुविद्य स्वात्मसंवेद्यतामापाद्य व्रजन्ति यथोक्तांश्च सत्यान्कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति राज्ञ इव सार्वभौमस्येह लोके ॥ ६ ॥ | और जो दूसरे लोग इस लोकमें शास्त्र और आचार्यके उपदेशके अनुसार आत्माको जानकर—स्वात्मसंवेद्यताको प्राप्त करके और उपर्युक्त सत्य कामनाओंको जानकर परलोकमें जाते हैं उनकी इस लोकमें सार्वभौम राजाके समान सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति होती है ॥६॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषच्छङ्करभाष्ये
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥
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द्वितीय खण्ड
—: o :—
दहर-ब्रह्मकी उपासनाका फल
| कथं सर्वेषु लोकेषु कामाचारो भवतीत्युच्यते। य आत्मानं यथोक्तलक्षणं हृदि साक्षात्कृतवान्वक्ष्यमाणब्रह्मचर्यादिसाधनसम्पन्नः संस्तत्स्थांश्च सत्यान् कामान् — | उसकी सम्पूर्ण लोकोंमें किस प्रकार यथेच्छगति हो जाती है, यह बतलाते हैं—जिसने आगे बतलाये जानेवाले ब्रह्मचर्यादि साधनोंसे सम्पन्न हो अपने हृदयमें [अर्थात् ध्यानके द्वारा] उपर्युक्त लक्षणोंवाले आत्माका साक्षात्कार किया है तथा उसमें रहनेवाले सत्य कामोंको प्राप्त किया है— |
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स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवाश्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ १ ॥
वह यदि पितृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही पितृगण वहाँ उपस्थित होते हैं [अर्थात् उसके आत्मसम्बन्धी हो जाते हैं,] उस पितृलोकसे सम्पन्न होकर वह महिमान्वित होता है ॥१॥
| स त्यक्तदेहो यदि पितृलोककामः पितरो जनयितारस्त एव सुखहेतुत्वेन भोग्यत्वाल्लोका उच्यन्ते तेषु कामो यस्य तैः पितृभिः सम्बन्धेच्छा यस्य भवति तस्य संकल्पमात्रादेव | वह यदि देह छोड़नेपर पितृलोककी कामनावाला होता है— पितर उत्पत्तिकर्त्ताओंको कहते हैं, सुखके हेतुरूपसे भोग्य होनेके कारण वे ही लोक कहे जाते हैं, उनके प्रति जिसकी कामना होती है अर्थात् उन पितृगणके साथ सम्बन्ध करनेकी जिनकी इच्छा |
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८२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ८
| ८२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ८ |
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| पितरः समुत्तिष्ठन्त्यात्मसम्बन्धि- <br> तामापद्यन्ते । विशुद्धसत्त्वतया <br> सत्यसंकल्पत्वादीश्वरस्येव तेन <br> पितृलोकेन भोगेन सम्पन्नः सम्प- <br> त्तिरिष्टप्राप्तिस्तया समृद्धो मही- <br> यते पूज्यते वर्धते वा महिमान- <br> मनुभवति ॥ १ ॥ | होती है उसके संकल्पमात्रसे ही <br> पितृगण समुत्थित हो जाते हैं <br> अर्थात् आत्म-सम्बन्धित्वको प्राप्त <br> हो जाते हैं। शुद्धचित्त होनेसे ईश्वरके <br> समान सत्यसंकल्प होनेके कारण <br> वह उस पितृलोकके भोगसे सम्पन्न <br> हो—सम्पत्ति इष्टप्राप्तिका नाम है— <br> उससे समृद्ध हो वह महनीय पूजित <br> होता अथवा वृद्धिको प्राप्त होता है <br> यानी महिमाका अनुभव करता <br> है ॥ १ ॥ |
—: ० :—
अथ यदि मातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ २ ॥
और यदि वह मातृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही माताएँ वहाँ उपस्थित हो जाती हैं। उस मातृलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ २ ॥
अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ३ ॥
और यदि वह भ्रातृलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही भ्रातृगण वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उस भ्रातृलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
अथ यदि स्वसृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्वसृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ४ ॥
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२३
और यदि वह भगिनीलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही बहिनें वहाँ उपस्थित हो जाती हैं। उस भगिनीलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
अथ यदि सखिलोककामो भवति संकल्पादेवास्य सखायः समुत्तिष्ठन्ति तेन सखिलोकेन सम्पन्नोमहीयते। ५।
और यदि वह सखाओंके लोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही सखालोग वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उस सखाओंके लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति संकल्पा-
देवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन गन्धमाल्यलोकेन
सम्पन्नो महीयते ॥ ६ ॥
और यदि वह गन्धमाल्यलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही गन्धमाल्यादि वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उस गन्धमाल्य-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
अथ यद्यन्नपानलोककामो भवति संकल्पादेवास्यान्न-
पाने समुत्तिष्ठतस्तेनान्नपानलोकेन सम्पन्नो महीयते ।७।
और यदि वह अन्नपानसम्बन्धी लोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही अन्नपान उसके पास उपस्थित हो जाते हैं। उस अन्नपान-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ७ ॥
अथ यदि गीतवादित्रलोककामो भवति संकल्पा-
देवास्य गीतवादित्रे समुत्तिष्ठतस्तेन गीतवादित्रलोकेन
सम्पन्नो महीयते ॥ ८ ॥