चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५६५
अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५६५ रक्तशालिर्महाशालिः कलमो जाङ्गलः सितः । शारदः षष्टिकश्चैव स्यादन्नविधिरर्शसाम् ॥ ९६ ॥ इत्युक्तो भिन्नशकृतामर्शासां च विधिक्रमः । (१५) अन्नविधि—लाल चावल, महाचावल, कलम, जागल, सित, शरद् ऋतु में पकने वाले धान्य और साठी के चावल अर्श रोगियों के लिये हितकारी हैं । जिन अर्शरोगियो को पतला मल आता है, उनकी चिकित्सा-विधि कह दी है ॥ ९६ ॥ येऽत्यर्थं गाढशकृतस्तेषां वक्ष्यामि भेषजम् ॥ ९७ ॥ सस्नेहैः शक्तुभिर्युक्तां प्रसन्नां लवणीकृताम् । दद्यान्मत्स्यण्डिका पूर्वं भक्षयित्वा सनागराम् ॥ ९८ ॥ जिन रोगियो का मल कठिन है, उनके लिये औषध कहते हैं— (१६) रोगी का राब के साथ सोंठ खिलाकर पीछे से स्नेह बहुल सक्तुओ से युक्त और सैन्धव नमक से नमकीन करके प्रसन्ना ( मद्य ) को देना चाहिये ॥ ९७-९८ ॥ गुडं सनागरं पाठा फलाम्लं पाययेच्च तम् । गुडं घृतं यवक्षारं युक्त वाऽपि प्रयोजयेत् ॥ ९९ ॥ यवानीं नागरं पाठा दाडिमस्य रसं गुडम् । (१७) अनार आदि अम्ल फलो के रस मे गुड़, सोठ और पाठा का चूर्ण मिला कर देना चाहिये । अथवा यवक्षार और घी के साथ गुड़ खिलाना चाहिये । अथवा सोठ, गुड, पाठा को पानी मे घोल कर अनार के रस से खट्टा बना कर देना चाहिये ॥ ९९- ॥ सतक्रलवणं दद्याद्वातवर्चोऽनुलोमनम् ॥ १०० ॥ (१८) अजवायन, पाठा और सोठ का चूर्ण करके अनार का रस, गुड़, छाछ और नमक मे मिला कर देने से वायु और मल का अनुलोमन होता है ॥१००॥ दुःस्पर्शकेन बिल्वेन यवान्या नागरेण वा । एकैकेनापि संयुक्ता पाठा हन्त्यर्शसां रुजम् ॥ १०१ ॥ प्रागुक्तान् यमके भृष्टान् सक्तुभिश्चावचूर्णितान् । (१६) दुरालभा या बेलगिरी के साथ अथवा अजवायन या सोंठ के साथ पाठा के चूर्ण को मिला कर देने से गाढे मल से उत्पन्न वेदना नष्ट होती है ॥ १०१ ॥
५६६ चरकसंहिता [ अ० १४ करञ्जपल्लवान् दद्याद्वातवर्चोऽनुलोमनान् ॥ १०२ ॥ (२०) करञ्ज के कोमल पत्तों को जौ के सत्तु के साथ घी और तेल यमक मे भून लेना चाहिये । इनके चूर्ण को भोजन से पूर्व देना चाहिये । इससे वायु और मल का अनुलोमन होता है ॥ १०२ ॥ मदिरां वा सलवणा शीधुं सौवीरक तथा । गुडनागरसंयुक्त पिबेद्वा पौर्वभक्तिकम् ॥ १०३ ॥ (२१) भोजन से पूर्व प्रसन्ना को नमक से नमकीन बना कर पीये । अथवा सीधु को नमकीन करके या काजी को नमकीन करके पीये । अथवा गुड़ के साथ हरड़ को खाना चाहिये ॥ १०३ ॥ पिप्पलीनागरक्षारकारवीधान्यजीरकैः । फाणितेन च सयोज्य फलाम्ल सावयेद् घृतम् ॥ १०४ ॥ (२२) पिप्पली, मोठ, यवक्षार, कालीजीरी, धनिया, जीरा इन सबको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को फाणित (राब) और घी मे मिला कर अनार के रस से खट्टा करके रोगी को देना चाहिये १ । [ जल्पकल्पतरु मे पिप्पल्यादि के कल्क से घृत सिद्ध करके देना चाहिये ऐसा माना है ] ॥ १०४ ॥ पिप्पली पिप्पलीमूल चित्रको हस्तिपिप्पली । शृङ्गवेरं यवक्षारं तैः सिद्धं वा पिबेद् घृतम् ॥ १०५ ॥ (२३) पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोठ, यवक्षार, मिलित २० तोला, घृत १ सेर ओर जल ४ सेर लेकर पिप्पली आदि कल्क से घृत सिद्ध करना चाहिये ॥ १०५ ॥ चव्यचित्रकसिद्धं वा गुडक्षारसमन्वितम् । पिप्पलीमूलसिद्धं वा सगुडक्षारनागरम् ॥ १०६ ॥ पिप्पलीपिप्पलीमूलदधिदाडिमधान्यकैः । सिद्धं सर्पिर्विधातव्य वातवर्चोविबन्धनुत् ॥ १०७ ॥ (२४) तीन घृत—(१) चव्य और चित्रक का कल्क २० ताला, पानी ४ सेर, घृत १ सेर लेकर घृत सिद्ध करन चाहिये । इसमे गुड़ और यवक्षार १ यहा पर अपक्व ही घृत का प्रयोग है। जैसा कि वाग्भट में कहा है— रूक्षकोष्ठश्चार्शसो नागरक्षारकृष्णाजाजीधान्यकारवीगर्भं फलाम्लं सफाणित सर्पिः पिबेत् । अ० स० चि० १० ।
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६७
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६७ मिला कर खाना चाहिये । इसी प्रकार ( २ ) पिप्पलीमूल के कल्क से घृत को सिद्ध करके गुड और यवक्षार का प्रक्षेप देकर खाना चाहिये । ( ३ ) पिप्पली, पिप्पलीमूल, सोठ और धनिया इनके कल्क से दही मे घृत सिद्ध करना चाहिये । ये तीनो घृत वायु और मल के विबन्ध को नष्ट करते है ॥१०६-१०७॥ चव्यं त्रिकटुकं पाठां क्षारं कुस्तुम्बुरूरणि च । यवानी पिप्पलीमूलमुभे च बिडसैन्धवे ॥ १०८ ॥ चित्रकं बिल्वमभया पिष्ट्वा सर्पिर्विपाचयेत् । शकृद्वातानुलोम्यार्थं जाते दध्नि चतुर्गुणे ॥ १०६ ॥ प्रवाहिका गुदभ्रंशं मूत्रकृच्छ्रं परिस्रवम् । गुदवंक्षणशूलं च घृतमेतद् व्यपोहति ॥ ११० ॥ ( २५ ) चव्याद्य घृत—चव्य, सोठ, मरिच, पिप्पली, पाठा, यवक्षार, हरा धनिया, अजवायन, पिप्पलीमूल, बिड् नमक, सैन्धव, चित्रक, बेलगिरी, हरड़ इन चौदह द्रव्या को पीस कर कल्क ( २० तोला ) तैयार करना चाहिये । दही ( ४ सेर ) ओर घृत ( १ सेर ) लेकर वायु, मल के अनुलोमन के लिये घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत प्रवाहिका, गुदभ्रंश, मूत्रकृच्छू, परिस्रव ( पिच्छास्राव ), गुदाशूल और वक्षण शूल को नष्ट करता है ॥१०८-११०॥ नागरं पिप्पलीमूलं चित्रको हस्तिपिप्पली । श्वदंष्ट्रा पिप्पली धान्यं बिल्वं पाठा यवानिका ॥ १११ ॥ चाङ्गेरीस्वरसे सर्पिः कल्कैरेतैर्विपाचयेत् । चतुर्गुणेन दध्ना च तद् घृतं कफवातनुत् ॥ ११२ ॥ अर्शसि ग्रहणीदोषं मूत्रकृच्छ्र प्रवाहिकाम् । गुदभ्रंशार्तिमानाहं घृतमेतद् व्यपोहति ॥ ११३ ॥ इति नागरादिघृतम् । ( २६ ) नागराद्य घृत—सोठ, पिप्पलीमूल, चित्रक, गजपिप्पली, गोखरू, पिप्पली, धनिया, बेलगिरी, पाठा, अजवायन इनको समान भाग लेकर इनका कल्क ( २० तोला ), चागेरी ( तिपतिया ) का स्वरस ४ सेर, दही ४ सेर ओर घी १ सेर लेकर घृत पकाना चाहिये । यह घृत कफ और वायु का नाश करता है । अर्श, ग्रहणीरोग, मूत्रकृच्छ्र, प्रवाहिका, गुदभ्रंश और आनाह-रोग मे हितकारी है ॥ १११-११३ ॥ पिप्पलीं नागरं पाठां श्वदंष्ट्रां च पृथक् पृथक् । भागांस्त्रिपलिकान्कृत्वा कषायमुपकल्पयेत् ॥ ११४ ॥
५६८ चरकसंहिता [अ० १४
गण्डीरं पिप्पलीमूलं व्योषं चव्यं च चित्रकम् ।
पिष्ट्वा कषाये विनयेत्पूते द्विपलिकं पृथक् ॥ ११५ ॥
पलानि सर्पिषस्तस्मिंश्चत्वारिंशत्प्र दापयेत् ।
चाङ्गेरीस्वरसं तुल्यं सर्पिषा दधि षड्गुणम् ॥ ११६ ॥
मृद्वग्निना ततः साध्यं सिद्धं सर्पिर्निधापयेत् ।
तदाहारे विधातव्यं पाने प्रायोगिके विधौ ॥ ११७ ॥
ग्रहणीशोविकारघ्नं गुल्महृद्रोगनाशनम् ।
शोथप्लीहोदरानाहमूत्रकृच्छ्रज्वरापहम् ॥ ११८ ॥
कासहिक्कारुचिश्वाससूदनं पार्श्वशूलनुत् ।
बलपुष्टिकरं वर्ण्यमग्निसंदीपनं परम् ॥ ११९ ॥
इति पिप्पल्याद्यं घृतम् ।
(२७) पिप्पल्याद्य घृत—पिप्पली, सोंठ, पाठा और गोखरू प्रत्येक
द्रव्य तीन पल लेकर क्वाथ-विधि से क्वाथ करना चाहिये । इस क्वाथ मे
गण्डीर, पिप्पलीमूल, व्योष, (त्रिकट), चव्य, चित्रक प्रत्येक आधा पल लेकर
पीस कर कल्क रूप मे मिला देना चाहिये । साथ मे घी ४० पल, चागेरी का
स्वरस ४० पल, दही २४० पल मिला कर मृदु अग्नि पर पाक करना चाहिये ।
इस प्रकार से सिद्ध घृत को प्रति-दिन खान-पान मे बरतना चाहिये । यह घृत
ग्रहणी, अर्शारोग, गुल्म, हृदय रोग, शोथ, प्लीहा, उदर, आनाह, ज्वर, मूत्र-
कृच्छ्र, कास, हिचकी, अरुचि, श्वासपीड़ा, ओर पार्श्वशूल को नष्ट करता है ।
यह बलकारक, पुष्टिदायक, कान्तिवर्धक और अग्निदीपक है ॥११४-११६॥
सगुडां पिप्पलीयुक्तां घृतभृष्टां हरीतकीम् ।
त्रिवृद्दन्तयुतां वाऽपि भक्षयेदानुलोमिकीम् ॥ १२० ॥
विड्वातकफपित्तानामानुलोम्येन निर्मले ।
गुदेऽर्शांसि प्रशाम्यन्ति पावकश्चाभिवर्धते ॥ १२१ ॥
पिप्पली से युक्त घी मे भुनी त्रिवृत् (निशोथ), दन्ती से युक्त हरड़ को
वायु और मल के अनुलोमन के लिये सेवन करे ।
वायु मल, कफ, पित्त का अनुलोमन होने पर, गुदा के स्वस्थ होने से अर्श
स्वयं शान्त हो जाते हैं और अग्नि बढती है ॥ १२०-१२१ ॥
बर्हिंतित्तिरिलावानां रसानम्लान् सुसंस्कृतान् ।
दक्षाणां वर्तकानां च दद्याद्विड्वातसंग्रहे ॥ १२२ ॥
(२८) मल और वायु का अवरोध होने पर मोर, तीतर, बटेर इनके मास-
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६६
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६६ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ रस को तथा दक्ष ( कुक्कुट ) और वर्त्तको ( बतख ) के मासरस को घी से सस्कृत करके बेर, आवले आदि फलों से खट्टा बना कर देना चाहिये ॥१२२॥ त्रिवृद्दन्तीपलाशानां चाङ्गेर्याश्चित्रकस्य च । सुभृष्टं यमके दद्याच्छाकं दधिसमन्वितम् ॥ १२३ ॥ उपोदिकां तण्डुलीय वीरा वास्तुकपल्लवाम् । सुवर्चलां सलोणीकां यवशाकमवल्गुजम् ॥ १२४ ॥ काकमाचीं रुहापत्र महापत्रो तथाऽम्लिकाम् । जीवन्तींशटिशाक च शाकं गृञ्जनकस्य च ॥ १२५ ॥ दधिदाडिमसिद्धानि यमके भर्जितानि च । धान्यनागरयुक्तानि शाकान्येतानि दापयेत् ॥ १२६ ॥ ( २६ ) शाक—निशोथ, दन्ती, पलाश, चागेरी, चीता इनके शाको को घी और तैल मे भून कर दधि के साथ मिला कर देना चाहिये । इसी प्रकार से उपोदिका ( चौलाई ), तण्डुलीय, वीरा ( पृश्निपर्णी ), बथुआ, सुवर्चला ( हुलहुल ), लोणि, यवशाक, अवल्गुजा ( बावची ), काकमाची ( मकोय ), रूहापत्र, महापत्री ( जामुन ), अम्लिका, जीवन्ती, कचूर का शाक, गृञ्जनक ( शलजम ) का शाक इनको घी और तैल यमक मे भूनकर दही तथा अनार के रस से खट्टा करके धनिया और सोठ मिलाकर देना चाहिये ॥ १२३-१२६ ॥ गोधाश्वावित्सलोपाकमार्जारोष्ट्रगवामपि । कूर्मशल्लकयोश्चैव साधयेच्छाकवद्रसान् ॥ १२७ ॥ ( ३० ) गोह, लोपक ( शृगाल भेद ), बिल्ली, श्वावित् , ऊट, गाय, कछुआ और शल्लकी इनके मास-रसों को भी शाक की भाति दही और अनार रस में सिद्ध करके घी और तैल मे भून कर धनिया और सोठ मिला कर देना चाहिये ॥ १२७ ॥ रक्तशाल्योदनं दद्याद्रसैस्तैर्वातशान्तये । ( ३१ ) यदि रोगी मे वायु की प्रधानता है, रोगी रूक्ष हो, अग्नि मन्द हो तो वायु की शान्ति के लिये मासरसो के साथ लाल चावल देने चाहिये । ज्ञात्वा वातोल्बणं रूक्षं मन्दाग्नि गुदजातुरम् ॥ १२८ ॥ मदिरां शार्करं जातं शीधुं तक्रं तुषोदकम् । अरिष्टं दधिमण्डं वा शृतं वा शिशिरं जलम् ॥ १२६ ॥ कण्टकार्या शृतं वाऽपि शृतं नागरधान्यकैः । अनुपानं भिषग्दद्याद्वातवर्चोऽनुलोमनम् ॥ १३० ॥
५७० चरकसंहिता [ अ० १४ (३२) वैद्य को चाहिये कि वायु और मल का अनुलोमन करने के लिये शर्करा से उत्पन्न मदिरा, मीधु, तक्र, तुषोदक, अरष्टि, दधि मस्तु, पका कर ठण्डा किया जल, कण्टकारी (छोटी कटेरी) का पका कषाय, सोंठ और धनिया का पका कषाय अनुपान रूप मे देवे ॥ १२८-१३० ॥ उदावर्तपरीता ये ये चात्यर्थं विरूक्षिताः । विलोमवाताः शूलार्तास्तेष्विष्टमनुवासनम् ॥ १३१ ॥ (३३) जो अर्श रोगी उदावर्त्त रोग से पीड़ित हो, जो अत्यन्त रूक्ष हो, जिनका वायु विलोम हो, शूल से पीड़ित हो उन रोगियों को अनुवासन देना चाहिये ॥ १३१ ॥ पिप्पली मदनं बिल्वं शताह्वा मधुकं वचाम् । कुष्ठं शटी पुष्कराख्यं चित्रकं देवदारु च ॥ १३२ ॥ पिष्ट्वा तैल विपक्तव्य पयसा द्विगुणेन च । अर्शसा मूढवाताना तच्छ्रेष्ठमनुवासनम् ॥ १३३ ॥ गुदनिःसरणं शूलं मूत्रकृच्छ्रं प्रवाहिकाम् । कट्यूरुपृष्ठदौर्बल्यमानाहं वंक्षणाश्रयम् ॥ १३४ ॥ पिच्छास्राव गुदे शोफ वातवर्चोविनिग्रहम् । उत्थान बहुशो यच्च जयेत्तच्चानुवासनात् ॥ १३५ ॥ अनुवासन द्रव्य—पिप्पली, मैनफल, बेलगिरी, सौंफ, मुलहठी, वच, कूठ, कचूर, पोहकर मूल, चित्रक, देवदारु प्रत्येक समान भाग लेकर कल्क रूप मे पीस लेना चाहिये । यह कल्क २० तोला, दूध २ सेर, तैल १ सेर लेकर तैल सिद्ध करना चाहिये । यह तैल मूढ-वात (जिनमे वायु न ऊपर जाये न नीचे जाती हो) रोगिया के लिये उत्तम अनुवासन है। गुदा का बाहर निकलना, शूल, मूत्रकृच्छ्र, प्रवाहिका, कटि, पीठ, जाघो की निर्बलता, काखो का फूलना, पिच्छा स्राव, गुदा की सूजन, वायु और मल का अवरोध, बार-बार थोड़ा- थोड़ा मल आता हो तो वह भी इससे शान्त होता है ॥ १३२-१३५ ॥ आनुवासनिकैः पिष्टैः सुखोष्णैः स्नेहसंयुतैः । दर्व्या तैरौषधैर्देह्याः स्तब्धाः शूना गुदेरुहाः१ ॥ १३६ ॥ दिग्धास्तैः प्रस्रवन्त्याशु श्लेष्मपिच्छां सशोणिताम्२ । कण्डूः स्तम्भः सरुक् शोफः स्रुतानां विनिवर्तते ॥ १३७ ॥ १. 'दार्वन्तै स्तब्धशूलानि गुदजानि प्रलेपयेत्' इति च । २ श्लेष्मपिच्छासशोणिताः इति च पाठः ।
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७१
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७१
( ३४ ) अंकुर यदि कठोर तथा सूजे हुए हो तो पिप्पल्यादि अनुवासन द्रव्यों को पीसकर घी आदि मिलाकर थोड़ा सा गरम करके कड़छी ( चम्मच ) द्वारा अंकुरो पर लेप करना चाहिये । इस प्रकार लेप करने से रक्तयुक्त कफ मिश्रित पिच्छा ( स्राव ) अंकुरो से निकल आती है । इससे कण्डु ( खाज ), कठोरता, वेदना और सूजन शान्त हो जाती है ॥ १३६-१३७ ॥ निरूहं वा प्रयुञ्जीत सक्षीरं दाशमूलिकम् । समृत्रस्नेहलवणं कल्कैर्युक्तं फलादिभिः ॥ १३८ ॥ ( ३५ ) दशमूल के क्वाथ में दूध, गोमूत्र, घृतादि स्नेह, नमक, मेनफल आदि का कल्क मिलाकर इनसे सिद्ध निरूह का प्रयोग करना चाहिये ॥१३८॥ हरीतकीनां प्रस्थार्धं प्रस्थमामलकस्य च । स्यात्कपित्थाद्दशपलं ततोऽर्धा चेन्द्रवारुणी ॥ १३६ ॥ विडङ्गं पिप्पली लोध्रं मरिचं सेलवालुकम् । द्विपलांशं जलस्यैतच्चतुर्द्रोणे विपाचयेत् ॥ १४० ॥ द्रोणशेषे रसे तस्मिन्पूते शीते समावपेत् । गुडस्य द्विशतं तिष्ठेत्तत्पक्षं घृतभाजने ॥ १४१ ॥ पक्षादूर्ध्वं भवेत्पेया ततो मात्रा यथाबलम् । अस्याभ्यासादरिष्टस्य नश्यन्ति गुदजा द्रुतम् ॥ १४२ ॥ ग्रहणीपाण्डुहृद्रोगप्लीहगुल्मोदरापहः । कुष्ठशोफारुचिहरो बलवर्णाग्निवर्धनः ॥ १४३ ॥ सिद्धोऽयमभयारिष्टः कामलाश्वित्रनाशनः । कृमिग्रन्थ्यर्बुदव्यङ्गराजयक्ष्मज्वरान्तकृत् ॥ १४४ ॥ इत्यभयारिष्टः । ( ३६ ) अभयारिष्ट—हरड ( बिना गुठलियो के ) ८ पल, बिना गुठली का आवला ८ पल, कैथ का गूदा १० पल, इन्द्रवारुणी ( भसडूम्बा ) ५ पल, वायविडग, पिप्पली, लोध, मरिच, ऐलावालुक प्रत्येक द्रव्य दो पल इन सब द्रव्यों का चार द्रोण पानी में क्वाथ करना चाहिये । जब एक द्रोण रह जाये तो छान लेना चाहिये । ठण्डा होने पर इसमे गुड़ २०० पल मिला कर घी से भावित घड़े मे १५ दिन तक रख देना चाहिये । पन्द्रह दिन के पीछे अग्नि के बलानुसार इसको पीना चाहिये । इसके निरन्तर सेवन से अर्श रोग नष्ट होता है १ । यह अरिष्ट ग्रहणी, पाण्डुरोग, हृदयरोग, प्लीहा, गुल्म, उदररोग, कुष्ठ, १ जल्पकल्पतरु में 'पलादर्धेनेन्द्रवारुणी' इस पाठ से आधा पल इन्द्र- वारुणी लिया है । परन्तु सुश्रुत के पाठ से असगत होने के कारण विचारणीय
५७२ चरकसंहिता [ अ० १४ शोफ और अरुचि को नष्ट करता है, बल, वर्ण और अग्नि को बढाता है, कामला, श्वित्र, कृमिरोग, ग्रन्थिरोग, अर्बुद, व्यंग और राजयक्ष्मा ज्वर को नष्ट करता है, यह अरिष्ट सिद्ध फलप्रद है ॥१३६-१४४॥ दन्तीचित्रकमूलानामुभयोः पञ्चमूलयोः । भागान् पलांशानापोथ्य जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ १४५ ॥ त्रिफलाया दलानां च प्रक्षिप्य त्रिपलं ततः । रसे चतुर्थशेषे तु पूते शीते समावपेत् ॥ १४६ ॥ तुला गुडस्य तत्तिष्ठन्मासार्थं घृतभाजने । तन्मात्रया पिबेन्नित्यमर्शोभ्योऽपि प्रमुच्यते ॥ १४७॥ ग्रहणीपाण्डुरोगघ्न वातवर्चोनुलोमनम् । दीपनं चारुचिन्नं च दन्त्यरिष्टमिमं विदुः ॥ १४८ ॥ इति दन्त्यरिष्टः । (३७) दन्त्यरिष्ट—दन्तीमूल, चित्रकमूल, दोनों पञ्चमूल (दशमूल) और गुठलीरहित हरड़, आवला और बहेड़ा प्रत्येक एक-एक पल लेकर एक द्रोण पानी मे क्वाथ करना चाहिये । जब चतुर्थांश रह जाये तब इस को छान कर ठण्डा होने पर गुड़ के १०० पल मिला कर घी से भावित घडे मे १५ दिना तक रखना चाहिये । इस अरिष्ट को मात्रानुसार पीने से अर्श-रोग से मुक्ति हो जाती है१ । यह अरिष्ट ग्रहणी, पाण्डु रोग नाशक, वायु ओर मल का अनुलोमक, अग्निदीपक, भोजन मे रुचि उत्पन्न करता है ॥१४५-१४८॥ हरीतकीफलप्रस्थं प्रस्थमामलकस्य च । विशालाया दधित्यस्य पाठाचित्रकमूलयोः ॥ १४६ ॥ द्वे द्वे पले समापोथ्य द्विद्रोणे साधयेदपाम् । पादावशेषे पूते च रसे तस्मिन् प्रदापयेत् ॥ १५० ॥ गुडस्यैका तुला वैद्यस्तत्स्थाप्यं घृतभाजने । पक्षस्थितं पिबेदेनं ग्रहण्यर्शोविकारवान् ॥ १५१ ॥ हृत्पाण्डुरोग प्लीहानं कामला विषमज्वरम् । है। यथा—पिप्पलीमरिचविडङ्गैलावाळुकलोध्राणा द्वे पले । इन्द्रवारुण्याः पञ्च पलानि ॥ सुश्रुत० चि० ७ ॥ १ वृद्धवाग्भट मे पाठ इस प्रकार से है—'दन्ती चित्रकत्रिफलादश- मूलानि पलिकानि उदकद्रोणे साधयेत् ।' जल्पकल्पतरु में त्रिफला मे प्रत्येक द्रव्य तीन पल लेना लिखा है ।
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७३
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७३ वचोमूत्रानिलकृतान्विबन्धानग्निमार्दवम् ॥ १५२ ॥ कासं गुल्ममुदावर्त्तं फलारिष्टो व्यपोहति । अग्निसन्दीपनो ह्येष कृष्णात्रेयेण भाषितः ॥ १५३ ॥ इति फलारिष्टः । ( ३८ ) फलारिष्ट—गुठलीरहित हरड़ १ प्रस्थ, गुठलीरहित आवले १ प्रस्थ, विशाला ( इन्द्रवारुणा ), कपित्थ ( कैथ ), पाठा और चित्रक- मूल प्रत्येक द्रव्य दो पल इन सब वस्तुओ को कूट कर दो द्रोण पानी मे क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे गुड़ १०० पल मिला कर घी से भावित घडे मे १५ दिन तक रख देना चाहिये । इसके पीछे ग्रहणी, अर्शारोग, हृदय, पाण्डुरोग, प्लीहा, कामला, विषम ज्वर, मल-मूत्र वायुजन्य विबन्धो मे, अग्निमान्द्य मे, कास, गुल्म और उदावर्त्त मे पीना चाहिये । यह फलारिष्ट अग्नि-सन्दीपक है । इसका कृष्णात्रेय ने उपदेश किया है ॥ १४६-१५३ ॥ दुरालभायाः प्रस्थः स्याच्चित्रकस्य वृषस्य च । पथ्यामलकयोश्चैव पाठाया नागरस्य च ॥ १५४ ॥ दन्त्याश्च द्विपलान् भागाञ्जलद्रोणे विपाचयेत् । पादावशेषे पूते च सुशीते शर्कराशतम् ॥ १५५ ॥ दत्त्वा कुम्भे दृढे स्थाप्यं मासार्धं घृतभाजने । प्रलिप्ते पिप्पलीचव्यप्रियङ्गुक्षौद्रसर्पिषा ॥ १५६ ॥ तस्य मात्रा पिवेत्काले शार्करास्य यथाबलम् । अर्शांसि ग्रहणीदोषमुदावर्त्तमरोचकम् ॥ १५७॥ शकृन्मूत्रानिलोद्गारविबन्धानग्निमार्दवम् । हृद्रोग पाण्डुरोग च सर्वमेतेन साधयेत् ॥ १५८ ॥ इति शर्करासवः । ( ३६ ) शर्करारिष्ट—दुरलभा १ प्रस्थ, चीता, बासा, हरड़, आवला, पाठा, सोठ, दन्तीमूल प्रत्येक द्रव्य दो पल लेकर एक द्रोण पानी मे क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे गुड़ १०० पल मिला कर घी से भावित घड़े मे १५ दिनो तक रख देना चाहिये । घड़े को पिप्पली, चव्य, प्रियगु, मधु और घी के कल्क से प्रथम लेप कर देना चाहिये । पीछे तैय्यार होने पर बल और मात्रानुसार इसको पीना चाहिये, इसको प्रति- दिन प्रातः पीना चाहिये । यह अर्श, ग्रहणी, उदावर्त्त, अरुचि, मल-मूत्र और
५७४ चरकसंहिता [ अ० १४ वायु के विबन्ध, उद्गार, अग्नि-मार्दव ( मन्दता ) हृदयरोग और पाण्डुरोग सब को शान्त करता है ॥ १५४-१५८॥ नवस्यामलकस्यैका कुर्याज्जर्जरिता तुलाम् । कुडवांशांश्च पिप्पल्यो विडङ्गं मरिचं तथा ॥ १५६॥ पाठां मूलं च पिप्पल्याः क्रमुकं चव्यचित्रकौ । मञ्जिष्ठा वालुकं लोध्रं पलिकानुपकल्पयेत् ॥ १६० ॥ कुष्ठं दारुहरिद्रा च सुराह्वां सारिवाद्वयम् । इन्द्राह्वं भद्रमुस्तं च कुर्यादर्धपलोन्मितम् ॥ १६१ ॥ चत्वारि नागपुष्पस्य पलान्यभिनवस्य च । द्रोणाभ्यामम्भसो द्वाभ्या साधयित्वाऽवतारयेत् ॥ १६२॥ पादावशेषे पूते च शीते तस्मिन्समावपेत् । मृद्वीकाद्वयाढकरसं शीतं निर्यूहसंमितम् ॥ १६३ ॥ शर्करायाश्च भिन्नाया दद्याद् द्विगुणितां तुलाम् । कुसुमस्य रसस्यैकमर्धप्रस्थं नवस्य च ॥ १६४ ॥ त्वगेलासवपत्राम्बुसेन्यक्रमुककेशरान् । चूर्णयित्वा तु मतिमान्कार्षिकानत्र दापयेत् ॥ १६५ ॥ तत्सर्वं स्थापयेत्पक्षं सुचौक्षे घृतभाजने । प्रलिप्ते सर्पिषा किञ्चिच्छर्करागुरुधूपिते ॥ १६६ ॥ पक्षादूर्ध्वमरिष्टोऽय कनको नाम विश्रुतः । पेयः स्वादुरसो हृद्यः प्रयोगाद्वक्त्ररोचनः ॥ १६७॥ अशांसि ग्रहणीदोषमानाहमुदर ज्वरम् । हृद्रोग पाण्डुता शोषं गुल्म वर्चोविनिग्रहम् ॥ १६८॥ कासं श्लेष्मामयाश्चोग्राञ् सर्वानैवापकर्षति । वलीपलितखालित्यं दोषज च व्यपोहति ॥ १६६ ॥ इति कनकारिष्टः । (४०) कनकारिष्ट—नूतन आवला १०० पल लेकर इसको जर्जरित कर लेना चाहिये । पिप्पली ४ पल, बायविडंग, मरिच, पाठा, पिप्पली मूल, क्रमुक ( सुपारी), चव्य, चित्रक, मजीठ, एलावालुक, लोध्र प्रत्येक द्रव्य एक पल, कूट, दारुहल्दी, देवदारु [ वृद्ध वाग्भट में शताह्वा पाठ होने से सौंफ ], श्वेत सारिवा, कृष्ण सारिवा, इन्द्रजौ, नागरमोथा प्रत्येक द्रव्य आधा पल, नूतन नागकेसर ४ पल इन सब द्रव्यों को कूट कर दो द्रोण पानी में पकाना चाहिये । जब आधा रह जाये तब उतार लेना चाहिये । इसको छान
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७५ कर शीतल होने पर इसमे द्राक्षा का क्वाथ १ आढक (द्राक्षा को दो आढक पानी मे पका कर जब आधा रह जाये तब छान कर) मिलाना चाहिये। इसमे बारीक शक्कर २०० पल, मधु आधा प्रस्थ, दालचीनी, इलायची, प्लव (कैवर्त्त मुस्ता), तेजपात, अम्बु, (बालक), सेव्य (खस), क्रमुक (सुपारी), नाग- केसर प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण एक कर्ष मिला लेना चाहिये। इन सब को घी से भावित शर्करा, गुड़ से दूषित, पवित्र पात्र मे रख देना चाहिये। पन्द्रह दिन के पीछे स्वर्ण के समान वर्ण करने से कनकारिष्ट नामक अरिष्ट बनता है। इसको प्रतिदिन पीना चाहिये। यह मधुर रस, हृदय के लिये प्रिय अन्न मे रुचिकारक, अर्श, ग्रहणी रोग, आनाह, उदररोग, ज्वर, हृदयरोग, पाण्डु- रोग, शोथ, गुल्म, मलबन्ध, कास, कफजन्य, रोगो को तथा दोषजन्य वलि, पलित (वालोका श्वेत होना) और खालित्य (गज) को नष्ट करता है॥१५६-१६६॥ पत्रभङ्गोदकैः शौचं कुर्यादुष्णेन चाम्भसा। इति शुष्कार्शसा सिद्धमुक्तमेतच्चिकित्सितम् ॥ १७० ॥ चिकित्सितमिदं सिद्ध स्राविणां शृण्वतः परम् । (४१) पत्रभग एरण्ड आदि वातनाशक पत्तों के क्वाथ से तथा गरम पानी से शौच कार्य करना चाहिये। यह शुष्कार्शो की सिद्ध फल चिकित्सा कह दी है। इसके आगे स्रावी (आर्द्र) अर्शों की सिद्ध फल चिकित्सा को कहते हैं १ ॥ १७०- ॥ तत्रानुबन्धो द्विविधः श्लेष्मणो मारुतस्य च ॥ १७१ ॥ विट् श्यावं कठिनं रूक्षं चाधो वायुर्न वर्तते । तनु चारुणवर्णं च फेनिलं चासृगर्शसाम् ॥ १७२ ॥ कट्यूरूदशूलं च दौर्बल्यं यदि चाधिकम् । तत्रानुबन्धो वातस्य हेतुर्यदि च रूक्षणम् ॥ १७३ ॥ रक्त-पित्तोल्बण स्रावयुक्त अर्शों की चिकित्सा— रक्त पित्तोल्बण (स्रावयुक्त) अर्शों मे दो प्रकार का अनुबन्ध होता है। एक वायु का और दूसरा कफ का। इसमे यदि मल कृष्ण वर्ण, कठिन, रूक्ष हो, अपान वायु बाहर न आये, अर्श में से निकलने वाला रक्त पतला झागदार, लाल रंग का हो, कटि, गुदा १ पत्रभंग—अर्श नाशक, जो वस्तुऐ अर्शनाशक है, वे वातनाशक है। इसलिये वातनाशक पत्तो के क्वाथ से शौच कार्य करना चाहिये। जैसे-'पत्रभङ्गै- रिति वातघ्नैः ऐरण्डादिपल्लवैः ।' डल्हण ।
५७६ चरकसंहिता [अ० १४ और ऊरु मे दर्द होता हो, निर्बलता अधिक हो, अर्श रोग का कारण रूक्ष हो तो वायु का अनुबन्ध समझना चाहिये ॥ १७१-१७३ ॥ शिथिलं श्वेतपीतं च विट् स्निग्धं गुरु शीतलम् । यद्यर्शसा घनं चासृक् तन्तुमत् पाण्डु पिच्छिलम् ॥ १७४ ॥ गुदं सपिच्छं स्तिमितं गुरु स्निग्ध च कारणम् । श्लेष्मानुबन्धो विज्ञेयस्तत्र रक्ताशसा बुधः ॥ १७५ ॥ यदि मल शिथिल (पतला), श्वेत या पीले रंग का, स्निग्ध, गुरु ओर शीतल हो, अर्श मे से निकलने वाला रक्त घना रेशे वाला, पाण्डु वर्ण ओर पिच्छिल (चिकासयुक्त) हो, गुदा पिच्छा (चिकास) से युक्त और स्तिमित हो, रोग का कारण गुरु आर स्निग्ध खानपान हो तो रक्तजन्य अशो मे कफ का अनुन्ध समझना चाहिये ॥ १७४-१७५ ॥ स्निग्धशीतं हितं वाते रूक्षशीतं कफानुगे । चिकित्सितमिदं तस्मात् सम्प्रधार्ये प्रयोजयेत् ॥ १७६ ॥ वायु के अनुबन्ध मे स्निग्ध और शीतल चिकित्सा, कफ के अनुबन्ध मे रूक्ष और शीतल चिकित्सा हितकारी है यह सोच कर कार्य प्रारम्भ करना चाहिये ॥ १७६ ॥ पित्तश्लेष्माधिकं मत्वा शोधनेनोपपादयेत् । स्रवणं चाप्युपेक्षेत लंघनैर्वा समाचरेत् ॥ १७७ ॥ अर्श मे पित्त-कफ की प्रधानता को देखकर प्रथम शोधन (विरेचन) करना चाहिये । अथवा लघन कराना चाहिये । बहते हुए दूषित रक्त की उपेक्षा करनी चाहिये, इसको रोकना नहीं चाहिये ॥ १७७ ॥ प्रवृत्तमादावर्शोभ्यो यो निगृह्णात्यबुद्धिमान् । शोणितं दोषमलिनं तद्रोगाञ्जनयेद्बहून् ॥ १७८ ॥ रक्तपित्तं ज्वरं तृष्णामग्निनाशमरोचकम् । कामलां श्वयथु शूलं गुदवंक्षणसंश्रयम् ॥ १७९ ॥ कण्ड्वूरुःकोठपिडकाः कुष्ठं पाण्ड्वामयं गदम् । वातमूत्रपुरीषाणा विबन्धं शिरसो रुजम् ॥ १८० ॥ स्तैमित्यं गुरुगात्रत्वं तथाऽन्यान्रक्तजान् गदान् । तस्मात्स्रुते दुष्टरक्तं रक्तसंग्रहणं मतम् ॥ १८१ ॥ जो वैद्य प्रथम अर्शों से बहते हुए दूषित रक्त को रोक देता है, वह मूढ है । क्योकि रोका हुआ दूषित रक्त बहुत से रोगों को उत्पन्न कर देता है।
अ० १४ ] ३७ चिकित्सितस्थानम् ५७७
अ० १४ ] ३७ चिकित्सितस्थानम् ५७७ जैसे—रक्तपित्त, ज्वर, तृष्णा, अग्निमान्द्य, अरोचक, कामला, श्वयथु, गुदा मे शूल, वक्षण ( कोख ) मे शूल, कण्डू, कोठ, पिडकाये, कुष्ठ, पाण्डुरोग, वायु, मूत्र, मल की विबन्धता, शिरोवेदना, स्तिमितता, शरीर मे भारीपन, अन्य रक्त- जन्य रोगो को उत्पन्न कर देता है । इसलिये दूषित रक्त के निकल जाने पर ही रक्त का रोकना हितकारी है । प्रारम्भ मे नही रोकना चाहिये ॥ १७८-१८१ ॥ हेतुलक्षणकालज्ञो बलशोणितवर्णवित् । कालं तावदुपेक्षेत यावन्नात्ययमाप्नुयात् ॥ १८२ ॥ हेतु, लक्षण और काल को समझने वाले तथा बल और शुद्ध एव अशुद्ध रक्त के वर्ण की पहिचान करने वाले वैद्य को चाहिये कि रक्तस्राव की उपेक्षा उस समय तक करता रहे जब तक कि भयानक रूप धारण न करले, अथवा काई घातक रूप पैदा न करे १ ॥ १८२ ॥ अग्निसन्दीपनार्थं च रक्तसङ्ग्रहणाय च । दोषाणा पाचनार्थं च परं तिक्तेरुपाचरेत् ॥ १८३ ॥ ( ४२ ) अग्नि को बढ़ाने के लिये और रक्त को रोकने के लिये तथा दोषा के पाचन के लिये तिक्त क्वाथों से या तिक्त घृतो से चिकित्सा करना श्रेष्ठ है॥१८३॥ यत्तु प्रक्षीणदोषस्य रक्त वातोल्बणस्य च । वर्तते स्नेहसाध्य तत्पानाभ्यङ्गातुवासनैः ॥ १८४ ॥ यत्तु पित्तोल्बण रक्तं घर्मकाले प्रवर्त्तते । स्तम्भनीय तदेकान्तान्न चेद्वातकफानुगम् ॥ १८५ ॥ जिस व्यक्ति के दोष क्षीण हो गये हो और रक्त मे वायु की प्रधानता हो, उसके लिये पान, अभ्यग और अनुवासन मे स्नेह क्रिया का उपयोग करना चाहिये । वह रोगी स्नेहसाध्य है और जिस रक्त मे पित्त की प्रधानता हो तथा ग्रीष्म काल मे रक्त स्रवित होता है, उसके लिये स्तम्भन-चिकित्सा करनी चाहिये, इस रक्त का रोकना ही उत्तम है । परन्तु स्तम्भन क्रिया मे यह देख लेना चाहिये कि इस रक्त मे वायु और कफ का ससर्ग न हो । यदि कफ का अनुबल हो तो उपेक्षा अथवा लघन करना चाहिये ॥१८४-१८५॥ कुटजत्वङ्निर्यूहः सनागरः स्निग्धरक्तसंग्रहणः । त्वग्दाडिमस्य तद्वत्सनागरश्चन्दनरसश्च ॥ १८६ ॥ १ शुद्ध रक्त की परीक्षा—तपनेन्द्रगोपप्रतिम पद्माक्तकसन्निभम् । गुञ्जाफलसवर्णं च विशुद्धं विद्धि शोणितम् ॥च०सू०२४॥ अशुद्ध रक्त के लिये देखिये चरक०सूत्रस्थान अ०२४और सुश्रुतसूत्रस्थान अ०१२॥
५७८ चरकसंहिता [ अ० १४ ( ४३ ) कूड़े की छाल के क्वाथ के साथ थोडा सा सोठ चूर्ण मिला कर लेने से स्निग्ध रक्त (कफ मिश्रित रक्त का) अवरोध होता है । इसी प्रकार से अनार की छाल और चन्दन के क्वाथ को सोंठ के चूर्ण के साथ देने से स्निग्ध रक्त का अवरोध होता है ॥ १८६ ॥ चन्दनकिराततिक्तकधन्वयवासाः सनागराः कथिताः । रक्तार्शासां प्रशमना दार्बीत्वगुशीरनिम्बाश्च ॥ १८७ ॥ (४४) चन्दन, चिरायता, धमासा, बासा और सोंठ, दारुहल्दी की छाल, खस तथा नीम की छाल इनका क्वाथ रक्तजन्य अर्श मे शान्ति करता है । दारुहल्दी की छाल, खस और नीम की छाल इनको पृथक् भी प्रयोग करने से रक्त रुकता है ॥ १८७ ॥ सातिविषा कुटजत्वक् फलं च सरसाञ्जनं मधुयुतानि । रक्तापहानि दद्यात्पिपासवे तण्डुलजलेन ॥ १८८ ॥ (४५) अतीस, कूड़े की छाल, इन्द्रजौ, रसौत इनके चूर्ण को मधु मे मिला कर प्यास लगने पर तण्डुलोदक के साथ देना चाहिये । यह योग रक्तनाशक है ॥ १८८ ॥ कुटजत्वचो विपाच्यं पलशतमाद्रं महेन्द्रसलिलेन १ । यावत्स्याद् गतरसं तद्द्रव्यं पूतो रसस्ततो ग्राह्यः ॥ १८९ ॥ मोचरसः समङ्गा फलिनी च पलांशिकै २ स्त्रिभिस्तैश्च । वत्सकबीजं तुल्यं चूर्णीकृतमत्र प्रदातव्यम् ॥ १९० ॥ पूतोत्कथितः सान्द्रः स रसोऽदार्वाप्रलेपनो ग्राह्यः । मात्राकालोपहिता रसक्रियैषा जयत्यसृक्स्रावम् ३ ॥ १९१ ॥ छागलिपयसा युक्ता ४ पेया मण्डेन वा यथाग्निबलम् । जीर्णौषधश्च शालीन् पयसा छागेन भुञ्जीत ॥ १९२ ॥ रक्तार्शांस्यतिसारं रक्तं सासृग्रुजो निहन्त्याशु । बलवच्च रक्तपित्तं रसक्रियैषा जयत्युभयभागम् ॥ १९३ ॥ इति कुटजादिरसक्रिया । (४६) कुटजादि-रस-क्रिया—कूडे की गीली छाल १०० पल लेकर बरसात का पानी एक द्रोण लेकर इसमे क्वाथ करना चाहिये । जब सब रस निकल जाये और अष्टमाश रह जाये तब छान लेना चाहिये । इसमें मोचरस (सीम्बल का १ 'तु मेघसलिलेन' इति, २ 'समांशिकै' इति, ३ 'जयति रक्तम्' इति, ४ 'पीता' इति च पाठान्तराणि ।
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७६ गोंद ), समंगा ( मजीठ या लाजवन्ती ) और फलिनी ( प्रियंगु ) प्रत्येक द्रव्य समान भाग ( १, १ पल ) और तीनो के बराबर इन्द्रजौ का चूर्ण ( ३ पल ) इस क्वाथ मे मिलाना चाहिये । इसको अग्नि पर गरम करना चाहिये । जिस समय पकते-पकते यह अवलेह के समान हो जाये तथा कड़छी के साथ उठने लगे तो इसको उतार लेना चाहिये । इसमे से अग्नि बल के अनुसार रस-क्रिया की मात्रा खानी चाहिये । यह अवलेह रक्त को शान्त करता है । औषध के जीर्ण होने पर पेया को बकरी के दूध के साथ अथवा मण्ड के साथ पीना चाहिये । अथवा बकरी के दूध के साथ चावलो को खाना चाहिये । यह रस-क्रिया, रक्तजन्य अर्शोग को, रक्तातिसार को, रक्त सहित वेदना को ( रक्त-स्राव से उत्पन्न रोगो को ) बलवान् रक्तपित्त को चाहे वह किसी भी मार्ग से प्रवृत्त होता है, सब को शान्त करता है । ऊर्ध्वग रक्तपित्त साध्य है, अधोगामी याप्य है ॥ १८६-१६३ ॥ नीलोत्पलं समङ्गा मोचरसश्चन्दनं तिला लोध्रम् । पीत्वा छागलिपयसा भोज्यं पयसैव शाल्यन्नम् ॥ १६४ ॥ ( ४७ ) नीला कमल, समगा ( लाजवन्ती ), मोचरस (सीम्बल की गोद), तिल, पठानी लोध इनको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इसको ( ६ माशे लेकर ) बकरी के दूध के साथ पीना चाहिये । जीर्ण होने पर बकरी के दूध के साथ चावल ( हेमन्त ऋतु मे पके ) खाने चाहिये ॥ १६४ ॥ छागलिपयः प्रयुक्तं निहन्ति रक्तं सवास्तुकंरसं च । धन्वविहङ्गमृगाणां रसो निरम्लः कदम्लो वा ॥ १६५ ॥ ( ४८ ) बथुए के रस मे बकरी का दूध मिलाकर पीने से रक्तस्राव रुकता है । इसी प्रकार जागल पशु-पक्षियो के मास-रस को अनार के रस आदि से थोड़ा खट्टा बना कर अथवा बिना खट्टा किये पीने से रक्त-स्राव रुकता ॥ १६५ ॥ पाठा वत्सकबीजं रसाञ्जनं नागरं यवान्यश्च । बिल्वमिति चार्शसैश्र्चूर्णितानि पेयानि सशूलेषु ॥ १६६ ॥ ( ४६ ) पाठा, इन्द्रजौ, रसौत, सोंठ, अजवायन और बेलगिरी इनको परस्पर समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को ( ६ माशा मात्रा में ) पानी के साथ पीने से शूलयुक्त अर्श-रोग शान्त होते हैं ॥ १६६ ॥ दार्वी किरातातिक्तं मुस्तं दुःस्पर्शकश्च रुधिरघ्नम् । रक्तेऽतिवर्तमाने शूले च घृतं विधातव्यम् ॥ १६७ ॥
५८० चरकसंहिता [ अ० १४ (५०) दारूहल्दी, चिरायता, नागरमोथा और कौंच इनका चूर्ण या क्वाथ रक्तनाशक है । परन्तु यदि रक्त बहुत होता हो और शूल हो तो इनके क्वाथ में इन्हीं के कल्क से घृत सिद्ध करके प्रयोग करना चाहिये ॥ १६७ ॥ कुटजफलवल्ककेशरनीलोत्पललोध्रधातकीकल्कैः । सिद्धं घृतं विधेयं शूले रक्तार्शसां भिषजा ॥ १६८ ॥ (५१) वैद्य को चाहिये कि रक्तार्श में यदि शूल भी हो तो कुड़े की छाल और इन्द्रजो, नागकेशर, नीला कमल, पठानी लोध, धाय के फूल इनका कल्क मिलित १ पाव, पानी ४ सेर और घृत १ सेर लेकर घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत रक्तार्श में उत्तम है ॥ १६८ ॥ सर्पिः सदाडिमरसं सयावशूकं जयत्याशु । रक्तं सशूलमथवा निदिग्धिकादुग्धिकासिद्धम् ॥ १६६ ॥ (५२) अनार के रस में और यावशूक (जवासे) के रस में घी सिद्ध करके लेने से अथवा छोटी कटेरी और दधि के रस में सिद्ध किया घृत शूलयुक्त रक्त-स्राव को शान्त करता है ॥ १६६ ॥ लाजापेया पीता चुक्रिका केशरोत्पलैः सिद्धा । हन्त्याश्वस्रक्स्रावं तथा बलापृश्निपर्णीभ्याम् ॥ २०० ॥ (५३) चुक्रिका (चांगेरी), केशर (नागकेशर) और कमलगट्टे से सिद्ध की हुई लाजा से बनी पेया पीने से रक्तस्राव रुकता है । अथवा बला और पृश्निपर्णी द्वारा लाजा से बनी पेया को सिद्ध करके पीना चाहिये ॥ २०० ॥ ह्रीबेरबिल्वनागरनिर्यूहे साधिता सनवनीताम् । वृक्षाम्लदाडिमाम्लामम्लीकाम्ला सकोलाम्लाम् ॥ २०१ ॥ गृञ्जनकसुरासिद्धां भृष्टा यमकेन वा पिबेत्पेयाम् । रक्तातिसारशूलप्रवाहिकाशोथनिग्रहणीम् ॥ २०२ ॥ (५४) ह्रीवेर (नेत्रबाला), बेलगिरी, सोंठ इनके क्वाथ में पेया को सिद्ध करे । इस पेया को वृक्षाम्ल (समगदाना), अनारदाना, इमली, खट्टे बेर इनसे खट्टा बना कर मक्खन मिला कर पीना चाहिये । अथवा गृञ्जनक (शलजम या प्याज) के रस में सिद्ध पेया को घी और तैल यमक में भून कर पीना चाहिये। ये पेया रक्तातिसार, शूल, प्रवाहिका और शोथ को हटाती है ॥२०२॥ काश्मर्यामलकानां सकर्बुदारफलाम्लानाम् । गृञ्जनकशाल्मलीनां क्षीरिण्याश्चुक्रिकायाश्च ॥ २०३ ॥
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८१
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८१ न्यग्रोधशुङ्गानां खडास्तथा कोविदारपुष्पाणाम् । दध्नः सरेण सिद्धान्द्याद्रक्ते प्रवृत्तेऽति ॥ २०४ ॥ (५५) रक्त के अतिस्राव होने पर—गम्भारी, आवला और कर्बुदार (कचनार का भेद) इनके फलो से गृञ्जनक (प्याज़), सिम्बल, दूधी तथा चागेरी (चोपतिया), बरगद के कोमल पत्ता से, कोविदार (कचनार) के फूलो से सिद्ध किये पदाथो (पेया आदि) को दही की मलाई के साथ देना चाहिये ॥ २०३-२०४ ॥ सिद्धं पलाण्डुशाकं तक्रेणोपोदिकां सबदराम्लाम् । रुधिरस्रुतौ प्रदद्यान्मसूरयूषं च तक्राम्लम् ॥ २०५ ॥ (५६) तीनयोग—(१) प्याज के शाक को बेर से खट्टा करके तक्र के साथ, (२) उपोदिका (पोई या लुणी शाक) के शाक को बेर से खट्टा करके तक्र के साथ, (३) मसूर की दाल को तक्र से खट्टा करके रक्त स्राव मे देना चाहिये । ये तीन योग है ॥ २०५ ॥ पयसा शृतेन यूषैर्मसूरमुद्गाढकीमकुष्ठानाम् । भोजनमद्यादम्लैः शालिश्यामाककोद्रवजम् ॥२०६॥ (५७) शालि धान्य, श्यामाक (सावक), कोद्रव (कोदों) धान्यों को दूध मे सिद्ध करके मसूर, मूग, अरहर या मोठ इनको अनार, आवला, बेर आदि द्वारा खट्टे बनाये यूषो के साथ खाना चाहिये ॥ २०६ ॥ शशहरिणलावमासैः कपिञ्जलैणेयैः सुसिद्धैश्च । भोजनमद्यादम्लैर्मधुरैरुपत्समरिचैर्वा ॥ २०७ ॥ (५८) अथवा शशक, हरिण, बटेर, कपिञ्जल, एण (हरिण का भेद) इनके मास-रसो को सिद्ध करके अनार के रस से थोडा खट्टा मधुर करके थोड़ा सा काली मरिच का चूर्ण मिला कर खाना चाहिये ॥ २०७ ॥ दक्षशिखिनित्तिररसैर्द्विककुल्लोपाकजैश्च मधुराम्लैः । अद्याद्रसैरतिवहेष्वर्शःस्वनिलोल्वणशरीरः ॥ २०८ ॥ (५६) दक्ष (कुक्कुट), शिखि (मोर), तीतर, द्विककुद (ऊट) और लोपाक (शृगाल का भेद) इनके मास-रसो को मीठा खट्टा (अनार रस या बेर द्वारा) बना कर वात-प्रधान रक्तार्शो मे खाना चाहिये ॥ २०८ ॥ रसखड्यूषयवागूसंयोगतः १ केवलोऽथवा जयति । रक्तमतिवर्तमानं वातं च पलाण्डुरुपयुक्तः ॥ २०६॥ १ 'संयुक्त' इति वा पाठ ।
५८२ चरकसंहिता [ अ० १४ (६०) पलाण्डु (प्याज) अकेला स्वतन्त्र रूपमे अथवा मास-रस खड, यूष वा यवागू के साथ लेने से अति रक्तस्राव और वायु का शमन करता है ॥२०६॥ छागान्तराधितरुणं सरुधिरमुपसाधितं बहुपलाण्डु । व्यत्यासान्मधुराम्ल विट्शोणितसङ्क्षये देयम् ॥२१०॥ (६१) जवान बकरी के शरीर का मध्य भाग ( यकृत् भाग और फेफड़े ) रक्त सहित लेकर प्याज के साथ सिद्ध करना चाहिये । मल और रक्त का क्षय होने पर क्रमशः मधुर तथा अम्ल रूप मे प्रयोग करना चाहिये । प्रथम मधुर देना चाहिये, पीछे अम्ल और फिर मधुर फिर अम्ल इस प्रकार से देना चाहिये २१० नवनीततिलाभ्यासात्केसरनवनीतशर्कराभ्यासात् । दधिसरमथिताभ्यासादर्शारस्यपयान्ति रक्तानि ॥२११॥ (६२) रक्तजन्य अर्शों के लिये तीन योग—( १ ) मक्खन और तिल का चूर्ण नित्य प्रति खाना चाहिये । ( २ ) नागकेशर, मक्खन और मिश्री नित्य खानी चाहिये । ( ३ ) दही की मलाई का मथ कर प्रतिदिन खाने से रक्तजन्य अर्श शान्त होते है ॥ २११ ॥ नवनीतघृतं छागं मांसं सषष्टिकः शालिः । तरुणश्च सुरामण्डस्तरुणी च सुरा निहन्त्यस्रम् ॥२१२॥ ( ६३ ) नवनीत (ताजा मक्खन ), घी ( बकरी का ), बकरी का मास, साठी चावल, तरुण सुरामण्ड ओर तरुणसुरा ( जो पुरातन न हो ) ये रक्तस्राव को नष्ट करते है ॥ २१२ ॥ प्रायेण वातबहुलान्यर्शांसि भवन्त्यतिस्रुते रक्ते । दुष्टेऽपि कफपित्ते तस्मादनिलोऽधिको ज्ञेयः॥२१३॥ कफ, पित्त, दूषित होने पर भी रक्त का अधिक स्राव होने से प्राय. अर्श में वायु की प्रबलता हो जाती है, इसलिये वायु को मुख्य समझना चाहिये २१३ दृष्ट्वा तु रक्तपित्त प्रबल कफवातलिङ्गमल्पं च । शीताः क्रियाः प्रयोज्या यथेरिता वक्ष्यते चान्या ॥२१४॥ मधुकं सपञ्चवल्कं बदरीत्वगुदुम्बर धवपटोलम् । परिषेचने विदध्याद् वृषककुभमयवासनिम्बांश्च ॥२१५॥ यदि रक्त, पित्त प्रबल हों, वायु और कफ के लक्षण मन्द हो तो पूर्वकथित तथा अन्य आगे कहे जाने वाली शीतल क्रियाये बरतनी चाहिये । ( ६४ ) मुलहठी, पचवल्कल ( बरगद, गूलर, पीपल, पारस पीपल, जामुन इनकी छाल ), बेर की छाल, गूलर, धव ( धवा ), पटोल, वासा, ककुभ
अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८३ ( अर्जुन ), यवास ( जवासा ) और नीम की छाल इनका क्वाथ करके परि- षेचन करना चाहिये ॥ २१४-२१५ ॥ रक्तेऽतिवर्तमाने दाहे क्लेदेऽवगाहयेच्चापि । मधुकमृणालपद्मकचन्दनकुशकाशनिःक्वाथे ॥ २१६ ॥ इक्षुरसमधुकवेतसनिर्यूहे शीतले पयसि वा तम् । अवगाहयेत्प्रदिग्धं पूर्वं शिशिरेण तैलेन ॥ २१७॥ ( ६५ ) रोगी को जलन हो, रक्त का अतिस्राव होता हो, आर्द्रता हो तो मुलहठी, मृणाल ( कमलनाल ), पद्माख, चन्दन, कुश और काश इनके क्वाथ मे रोगी को अवगाहन कराना चाहिये । अथवा शरीर पर चन्दनादि शीतल द्रव्यो से साधित शीतल तैल लगवा कर रोगी को शीतल दूध मे या जल मे अथवा गन्ने का रस, मुलहठी और अम्लवेतस इनके शीतल क्वाथ में अवगाहन देना चाहिये ॥ २१६-२१७ ॥ दत्त्वा घृत सशर्करमुपस्थदेशे त्रिके च गुददेशे । शिशिरजलस्पर्शसुखा धारा प्रस्तम्भनी योज्या ॥ २१८ ॥ ( ६६ ) उपस्थ प्रदेश ( शिश्न भाग पेड़ू से सम्पूर्ण निचला प्रदेश ), गुदा ओर त्रिक ( कूल्हा ) प्रदेश पर शर्करा मिश्रित घृत मिलाकर लेप करना चाहिये । फिर इन स्थानों पर ठण्डे जल की धारा जो सहन हो सके बल से गिरानी चाहिये । इस प्रकार करने से रक्तस्राव रुक जाता है। जल-धारा बहुत तीव्र नही गिरानी चाहिये ॥ २१८ ॥ कदलीदलरभिनवः पुष्करपत्रैश्च शीतजलसिक्तैः । प्रच्छादनं मुहुर्मुहुरिष्टं पद्मोत्पलदलैश्च ॥ २१६ ॥ ( ६७ ) केले के नये कोमल पत्ता या कमल के पत्तों को शीतल जल से गीला करके अथवा पद्म और उत्पल के पत्तो से उपस्थ प्रदेश, गुदा और त्रिक- भाग पर बार बार रखना चाहिये । पुनः गरम होने पर उनका हटा कर फिर नये पत्ते रखने चाहिये ॥ २१६ ॥ दूर्वाघृत प्रदेहः शतधौतसहस्रधोतमपि सर्पिः । व्यजनपवनश्च शीतो रक्तस्राव जयत्याशु ॥ २२० ॥ ( ६८ ) दूर्वा के घृत का लेप, शतधौत या सहस्रधौत घृत का लेप अर्श मे करना चाहिये । इस प्रकार से पंखे की शीतल वायु रक्तस्राव को शान्त करती है ॥ २२० ॥ समङ्गामधुकाभ्यां तिलमधुकाभ्यां रसाञ्जनघृताभ्याम् । सर्जरसघृताभ्यां वा निम्बघृताभ्यां मधुघृताभ्यां च ॥२२१॥
५८४ चरकसंहिता [ अ० १४
दार्वीत्वक्सर्पिर्भ्यां सचन्दनाभ्याम्थोत्पलघृताभ्याम् ।
दाहे क्लेदे च गुदभ्रंशे गुदजाः प्रतिसारणीयाः स्युः ॥२२२॥
( ६६ ) अर्श के मस्सो पर प्रतिसारण करने के लिये नौ योग—(१) लाज-
वन्ती और मुलहठी का चूर्ण, ( २ ) तिल और मुलहठी का चूर्ण, ( ३ ) रसोत
और घी का लेप, ( ४ ) राल और घी का लेप, ( ५ ) नीम की छाल ओर घी,
( ८ ) चन्दन और घी के साथ, ( ६ ) मल और घी को दाह मे, क्लेद मे,
गुदभ्रंश मे ओर अर्श-रोग मे मस्सो पर प्रतिसारण करना चाहिये ॥२२१-२२२॥
आभिः क्रियाभिरथवा शीताभिर्यस्य तिष्ठति न रक्तम् ।
तं काले स्निग्धोष्णैर्मांसरसैस्तर्पयेन्मतिमान् ॥ २२३ ॥
अवपीडकसर्पिर्भिः कोष्णैर्घृततैलिकैस्तथाऽभ्यङ्गैः ।
क्षीरघृततैलसेकैः कोष्णैः समुपाचरेदाशु ॥ २२४ ॥
( ७० ) उपरोक्त प्रतिसारण से अथवा शीतल क्रियाओं द्वारा भी जिस
रोगी का रक्त बन्द न हो उसके लिये बृंहण-विधि बरतनी चाहिये ।
बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि भोजन काल मे रोगी को स्निग्ध, उष्ण मास-
रसों से तर्पण करे । इसके लिये अवपीड़क-घृत ( भोजन के ऊपर अथवा
अधिक मात्रा में घृतपान ) का प्रयोग करना चाहिये । थोड़े गरम सुहाते हुए
गरम तैल और घृत से मालिश करनी चाहिये । कवोष्ण दूध या घी अथवा
तैल से सेक करना चाहिये ॥ २२३-२२४ ॥
कोष्णेन वातप्रबले घृतमण्डेनानुवासयेच्छीघ्रम् ।
पिच्छाबस्तिं दद्याद् बस्ति काले तस्याथवा सिद्धम् ॥ २२५ ॥
( ७१ ) वायु की प्रधानता होने पर कवोष्ण घृत-मण्ड से अनुवासन-बस्ति
देनी चाहिये । अथवा रोगी को समय २ पर सिद्ध पिच्छा की बस्तिया
देनी चाहिये ॥ २२५ ॥
यवासकुशकाशानां मूलं पुष्पं च शाल्मलम् ।
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थशुङ्गांश्च द्विपलोन्मिताः ॥ २२६ ॥
त्रिप्रस्थं सलिलस्यैतत्क्षीरप्रस्थं च साधयेत् ।
क्षीरशेषं कषायं च पूतं कल्कैर्विमिश्रयेत् ॥ २२७ ॥
कल्काः शाल्मलिर्नियाससमङ्गाचन्दनोत्पलम् ।
वत्सकस्य च बीजानि प्रियङ्गु पद्मकेशरम् ॥ २२८ ॥
पिच्छाबस्तिरयं सिद्धः सघृतक्षौद्रशर्करः ।
प्रवाहिकागुदभ्रंशरक्तस्रावज्वरापहः ॥ २२६ ॥
इति पिच्छाबस्तिः ।