भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

शूरं चण्डमसूयकमैश्वर्यवन्तमौपधिकं रौद्रमननुक्रोशमात्मपूजक- मासुरं विद्यात् ॥ ४६ ॥ (१) आसुर—जो शूरवीर, प्रचण्ड, दूसरे की निन्दा करने वाला, ऐश्वर्यशाली, छल कपट करने वाला, रुद्र के तुल्य कोप से शत्रुओं को रुलाने वाला, भयकर, दूसरों पर दया न करने वाला, अपनी ही बड़ाई चाहने वाला, आत्माभिमानी हो उसको 'आसुर' जाने ॥ ४६ ॥ अमर्षणमनुबन्धकोपं छिद्रप्रहारिणं क्रूरमाहारातिमात्ररुचिमा मिषप्रियतमं स्वप्नायासबहुलमर्षुं राक्षसं विद्यात् ॥ ४७ ॥ (२) राक्षस—जो असहनशील, कारण से कुपित होने वाला, छिद्र अर्थात् शत्रु के कमजोर स्थान पर चोट करने वाला, क्रूर, भोजन में अधिक रुचि रखने वाला, मांस का बहुत प्यारा, खूब सोने और खूब परिश्रम करने वाला, ईर्ष्या- शील हो उसको 'राक्षस' चित्त वाला जाने ॥ ४७ ॥ महालसं(शनं) स्त्रैण स्त्रीरहस्काममशुचि शुचिद्वेषिणं भीरु भीषयि- तारं विकृत-विहाराहार-शीलं पैशाचं विद्यात् ॥ ४८ ॥ (३) पैशाच—जो बहुत खाने वाला, स्त्री के समान स्वभाव का, स्त्रियों के साथ एकान्त मे रहने की इच्छावाला, अपवित्र, शुद्धता वा स्वच्छता से द्वेष करनेवाला, भीरु, दूसरों को डरानेवाला, विकृत आहार और विकृत विहार वाला हो उसको 'पैशाच' स्वभाव का जाने ॥ ४८ ॥ क्रुद्धं शूरमक्रुद्धं भीरु तीक्ष्णमायासबहुलं संत्रस्तगोचरमाहारविहा- रपरं सार्पं विद्यात् ॥ ४९ ॥ (४) सार्प—जो क्रोधित होने पर शूर और अक्रोधित होने पर भीरु, तीखे स्वभाव का, परिश्रम करनेवाला, भययुक्त स्थानों मे भी दीखनेवाला और आहार विहार करने वाला हो उस पुरुष को 'सार्प' स्वभाव का जाने ॥ ४९ ॥ आहारकाममतिदुःखशीलाचारोपचारमसूयकमसंविभागिनमतिलो लुपमकर्मशीलं प्रैतं विद्यात् ॥ ५० ॥ (५) प्रैत—जो सदा भोजन की इच्छा करने वाला, बहुत दुःखकारी शील और आचार और उपचार से युक्त, निन्दा करने वाला, दूसरों को अपने धन में से भाग न देने वाला, बहुत लोभी, कर्म न करने वाला पुरुष हो उसको 'प्रैत' अर्थात् प्रेत स्वभाव का जाने ॥ ५० ॥ अनुषक्तकाममजस्रमाहार-विहार-परमनवस्थितममर्षिणमसंचयं- शाकुणं विद्यात् ॥ ५१ ॥

६८ चरकसंहिता [ अ० ४ इत्येवं खलु राजसस्य सत्त्वस्य षड्विध भेदांशं विद्याद्रोषांशत्वात् ५२ ( ६ ) शाकुन—जो कामो मे फसा हुआ, निरन्तर आहार-विहार मे रित, चञ्चल, असहनशील, सचय न करने वाला पुरुष हो उसको 'शाकुन' जाने । इस प्रकार से रोष अर्थात् क्रोध के अश होने से राजस सत्त्व के ये छः भेद जाने ॥ ५१-५२ ॥ तामस के तीन प्रकार— निरलंकरिष्णुमधमवेशं जुगुप्सिताचाराहार-मैथुन-पर स्वप्नशीलं पाशवं विद्यात् ॥ ५३ ॥ ( १ ) पाशव—जो शरीर को अलकृत करने की इच्छा न रखने वाला, अपवित्रस्वभाव, निन्दितआचार और भोजनवाला, मैथुनकामी, सोने के स्वभाववाला पुरुष हो उसको 'पाशव' प्रकृति का जाने ॥ ५३ ॥ भीरुमबुधमाहारलुब्धमनवस्थितमनुषक्त-काम-क्रोध सरणशीलं तोयकाम मात्स्य विद्यात् ॥ ५४ ॥ ( २ ) मात्स्य—जो डरपाक, अज्ञानी, भोजन का लोभी, अस्थिरचित्त, चंचल, काम और क्रोध में फसा हुआ, भ्रमणशील, पानी की अधिक चाह करनेवाला हो उसको 'मात्स्य' प्रकृति का जाने ॥ ५४ ॥ अलसं केवलमभिनिविष्टमाहारे सर्वबुद्ध्या हीनं वानस्पत्यं विद्यात् ५५ इत्येव खलु तामसस्य सत्त्वस्य त्रिविध भेदाश विद्यान्मोहांशत्वात् ५६ ( ३ ) वानस्पत्य—जो आलसी, केवल भोजन मे ही दत्तचित्त, सब प्रकार के ज्ञान वा बुद्धि से रहित जड़ पुरुष हो उसको 'वानस्पत्य' अर्थात् स्थावर प्रकृति का जाने । इस प्रकार से मोह का अश होने से तामस सत्त्व के तीन भेद हैं ॥ ५५-५६ ॥ इत्यपरिसंख्येयभेदानां खलु त्रयाणामपि सत्त्वानां भेदैकदेशो व्याख्यातः, शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधो ब्रह्मर्षि-शक्र-वरुण-यम-कुबेर- गन्धर्व-सत्त्वानुकारेण, राजसस्य षड्विधो दैत्य-राक्षस-पिशाच-सर्प-प्रेत- शकुनि-सत्त्वानुकारेण, तामसस्य त्रिविधः पशु-मत्स्य-वनस्पति-सत्त्वा- नुकारेण । कथं च यथासत्त्वमुपचारः स्यादिति । केवलश्वायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्टो भवति गर्भावक्रान्तिसंप्रयुक्तः। तस्यार्थस्य विज्ञाने सामर्थ्यं—गर्भकरणा च भावानामनुसमाधिर्विघातश्च विघातकरणा भावानामिति ॥५७॥ इस प्रकार से तीनों प्रकार के सत्त्वों (चित्तों) के असंख्य भेद होने पर भी कुछ भेदों के कुछ अंश की व्याख्या कर दी है। ब्रह्म, ऋषि, शक्र, यम,

अ० ५ ] शारीरस्थानम् ६६

अ० ५ ] शारीरस्थानम् ६६ वरुण, कुबेर, गन्धर्व इनके सत्त्व के अनुसार क्रम से शुद्ध सत्त्व के सात भेद हैं। दैत्य, पिशाच, राक्षस, सर्प, प्रेत और शकुनि इनके सत्त्व के अनुसार राजस सत्त्व के छः भेद हैं। पशु, मत्स्य और वनस्पति इनके सत्त्व के अनुसार तामस सत्त्व के तीन भेद हैं। किस प्रकार से इन सत्त्वों के अनुसार प्राणियों के साथ बर्त्ताव हो, इसका दिग्दर्शन करा दिया है। इस प्रकार से प्रतिज्ञानुसार यह गर्भावक्रान्ति प्रकरण सम्पूर्ण रूप से कह दिया है। इसमें जानने के प्रयोजन, गर्भकारक भावों के अनुष्ठान, गर्भ के नाश करने वाले कारणों को इस अध्याय से सम्पूर्ण रूप से कह दिया है ॥५७॥ तत्र श्लोकाः—निमित्तमात्मा प्रकृतिर्वृद्धिः कुक्षौ क्रमेण च । वृद्धिहेतुश्च गर्भस्य पञ्चार्थाः शुभसञ्ज्ञिताः ॥ ५८ ॥ अजन्मनि च यो हेतुर्विनाशे विकृतावपि । इमांस्त्रीनशुभान् भावानाहुर्गर्भविघातकान् ॥५९॥ शुभाशुभसमाख्यातानष्टौ भावानिमान् भिषक् । सर्वथा वेद यः सर्वान् स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥६०॥ अवाप्त्युपायान् गर्भस्य स एव ज्ञातुमर्हति । ये च गर्भविघातोक्ता भावांस्तांश्चाप्युदारधीः ॥६१॥ गर्भ के लिये पाच बातें शुभ है—गर्भ का कारण, आत्मा, प्रकृति, बुद्धि और गर्भ का कुक्षि में बढने का कारण। ये पाच अर्थ गर्भ के लिये शुभ कहाते हैं। गर्भ के न होने मे कारण, गर्भ के विनाश में तथा विकार में कारण ये तीन बातें गर्भ को नाश करनेवाले 'अशुभ' कहे जाते हैं। जो वैद्य इन शुभ-अशुभ रूपी आठों बातों को भली प्रकार से जानता है, वह राजा की चिकित्सा करने योग्य है। उदार, विशाल बुद्धिवाले वैद्य को गर्भ की रक्षा वा प्राप्ति के उपाय तथा गर्भ के नाश करनेवाले कारण भी जानने चाहिये ॥५८-६१॥ इत्यग्निवेश कृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने महतीगर्भाव- क्रान्तिशारीर नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः । अथातः पुरुषविचयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'पुरुषविचय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

७० चरकसंहिता [ अ० ५

पुरुषोऽयं लोकसंमित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः । यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके, इत्येवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—नैतावता वाक्ये- नोक्तं वाक्यार्थमवगाह्यामहे, भगवता बुद्ध्या भूयस्तरमनुव्याख्यायमानं शुश्रूषामहे— इति ।

ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने उपदेश किया है कि यह पुरुष लोक के तुल्य है, लोक में जितने भी विशेष भाव (पदार्थ) है, वे सब इस पुरुष (शरीर) मे हैं, और जितनी बाते इस पुरुष मे हैं, उतनी ही सब लोक में हैं, इस प्रकार कहते हुए भगवान् पुनर्वसु को शिष्य अग्निवेश ने कहा— हे भगवन् ! इतना कह देने से ही हम सम्पूर्ण वाक्यार्थ नही समझ सकते । हे भगवन् ! आपकी बुद्धि से हम अधिक विस्तार में इसको सुनना चाहते हैं ।

तमुवाच भगवानात्रेयः—अपरिसंख्येया लोकावयवविशेषाः, पुरु- षावयवविशेषा अप्यपरिसंख्येया । तेषा यथास्थूलं भावान् सामान्य- मभिप्रेत्योदाहरिष्यामः, तानेक मना निबोध सम्यगुपवर्ण्यमानानग्नि- वेश ! षड्धातवः समुदिता 'लोक' इति शब्द लभन्ते । तद्यथा—पृथिव्या- पस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमित्येत एव च षड्धातवः समु- दिताः 'पुरुष' इति शब्दं लभन्ते ॥ ३ ॥

इस पर अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—लोक के विशेष अवयव (वृक्ष, तृण, पशु आदि) तथा पुरुष के विशेष अवयव (स्नायु, कण्डरा, धमनी आदि) भी असख्य हैं। परन्तु यहा पर मोटी माटी बातो का सामान्य रूप से दिग्दर्शन करायेगे । हे अग्निवेश ! उनका वर्णन एकाग्र-चित्त होकर ध्यान से सुनो ! छ धातुऐ मिलकर एक समुदाय 'पुरुष' नाम से कहे जाते हैं । अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश और अव्यक्त ब्रह्म । इन छ धातु का समुदाय मिलकर 'पुरुष' ऐसा कहा जाता है ॥ ३ ॥

तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्ति', आपः क्लेदः, तेजोऽभिसंतापो, वायुः प्राणो, वियच्छिषिराणि, ब्रह्माऽन्तरात्मा, यथा खलु ब्राह्मी विभूतिर्लोके तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूतिः, ब्रह्मणो विभूतिर्लोके प्रजापति- रन्तरात्मनो विभूतिः पुरुषे सत्त्व, यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः, आदित्यस्तु आदान, रुद्रो रोषः, सोमःप्रसादो, वसवः सुखम्, अश्विनौ कान्तिः, मरुदुत्साहो, विश्वेदेवाः सर्वेन्द्रियाणि सर्वेन्द्रियार्थाश्च, तमो मोहो, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं,

अ० ५ ] शरीरस्थानम् ७१

अ० ५ ] शरीरस्थानम् ७१ यथा कृतयुगमेवं बाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं, यथा द्वापरस्तथा स्थाविर्यं, यथा कलिरैवमातुर्यं, यथा युगान्तस्तथा मरणमिति । एव- मनुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्निवेश ! सामा- न्य विद्यात् ॥ ४ ॥ इस पुरुष में पृथिवी कठिन भाग है, क्लेद अर्थात् जलवाला अंश आप (जल) है, तेज उष्णिमा है, वायु प्राण है, आकाश छिद्ररूप है, ब्रह्म आत्मा है। जिस प्रकार लोक में ब्रह्म की विभूति है उसी प्रकार पुरुष में अन्तरात्मा की विभूति (ऐश्वर्य) है। लोक में ब्रह्म की विभूति प्रजापति है, पुरुष में अन्त- रात्मा की विभूति 'सत्त्व' है। लोक में जो इन्द्र है, पुरुष में वही अहंकार है। लोक में जो आदित्य है, पुरुष में वही आदान है। लोक में जो रुद्र है पुरुष में वही रोष (क्रोध) है। लोक का सोम पुरुष में प्रसाद है। लोक में जो वसु हैं, वे पुरुष में सुख हैं। लोक के दो अश्विनी हैं, पुरुष में वे ही कान्तिरूप हैं। लोक में जो मरुत हैं पुरुष में वह उत्साह है। लोक में जो विश्वेदेव हैं, पुरुष में वे इन्द्रियां और इन्द्रियों के विषय हैं। लोक का तम पुरुष में मोह है। लोक की ज्योति पुरुष में ज्ञान है। जिस प्रकार लोक में सर्ग अर्थात् सृष्टि का प्रारम्भ है उसी प्रकार पुरुष में गर्भाधान क्रिया है। जिस प्रकार लोक में सत्युग है उसी प्रकार पुरुष में बाल्य-अवस्था है। जिस प्रकार लोक में त्रेतायुग है उसी प्रकार पुरुष में यौवन है। जिस प्रकार लोक में द्वापर है उसी प्रकार पुरुष में बुढ़ापा है। जिस प्रकार लोक में कलियुग है उसी प्रकार पुरुष में रोग है। जिस प्रकार लोक में युग का समाप्ति है उसी प्रकार पुरुष में मृत्यु है। इस प्रकार से हे अग्निवेश ! लोक और पुरुष इन दोनों के उन २ विशेष अवयवों को समानता को अनुमान के द्वारा जान लेना चाहिये जिनका यहां वर्णन नहीं किया है ॥ ४ ॥ इत्येववादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-एवमेतत्सर्वमनप- वादं यथोक्तं भगवता लोकपुरुषयोः सामान्यम् । किन्वस्य सामान्यो- पदेशस्य प्रयोजनमिति ॥ ५ ॥ इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा-हे भगवन् ! आपने जो लोक और पुरुष की समानता कही है वह बिना किसी अपवाद के निर्विवाद ठीक है। परन्तु इस समानता के उपदेश का प्रयोजन क्या है ? ॥ ५ ॥ भगवानुवाच-कथमग्निवेश ! सर्वलोकमात्मन्यात्मानं च सर्वलोके समनुपश्यतः सत्या बुद्धिः समुत्पत्स्यते इति, सर्वलोकं ह्यात्मनि पश्यतो

७२ चरकसंहिता [ अ० ५

भवत्यात्मैव सुखदुःखयो कर्ता नान्य इति, कर्मात्मकत्वाच्च हेत्वादिभि-
र्युक्तः सर्वलोकोऽहमिति विदित्वा ज्ञान पूर्वमुत्थाप्यतेऽपवर्गायेति ।
तत्र संयोगापेक्षी लोकशब्दः, षड्धातुसमुदायो हि सामान्यत-
सर्वलोकः ॥ ६ ॥
भगवान् बोले- हे अग्निवेश क्योंकि-अपने में सम्पूर्ण लोक और सम्पूर्ण
लोक में अपनी समानता देख कर 'सत्य बुद्धि' उत्पन्न होती है । सम्पूर्ण लोक
को अपने में देखने से प्रतीत होता है कि अपना आत्मा ही सुख-दुःख का
कर्त्ता है और दूसरा नहीं। कर्म के कारण यह सब कुछ होने से तथा आगे कहे
जाने वाले हेतु आदि से 'मैं सम्पूर्ण लोक हूं' ऐसा जान लेने पर ही मोक्ष के
लिये प्रथम ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । यहां 'लोक' शब्द संयोग की अपेक्षा से
है। छः धातुओं का समुदाय ही सामान्यत 'सर्वलोक' है ॥ ६ ॥
तस्य हेतुरुत्पत्तिर्वृद्धिरुपप्लवो वियोगश्च । तत्र हेतुरुत्पत्तिकारणं,
उत्पत्तिर्जन्म, वृद्धिराप्यायनं, उपप्लवो दुःखागम । षड्धातुविभागो
वियोगः, स जीवापगमः, स प्राणनिरोधः, स भङ्गः, स लोकस्वभावः ।
तस्य मूलं सर्वोपप्लवानां च प्रवृत्तिः, निवृत्तिरुपरमः । प्रवृत्तिर्दुःख
निवृत्तिः सुखमिति यज्ज्ञानमुत्पद्यते तत्सत्य, तस्य हेतुः सर्वलोकसामा-
न्यज्ञान, तत्प्रयोजनं सामान्योपदेशस्येति ॥ ७ ॥
उसके उत्पत्ति, वृद्धि, उपप्लव और वियोग ये पाच हेतु हैं। इनमें से
उत्पत्ति के कारण को 'हेतु' कहते हैं। उत्पत्ति का अर्थ 'जन्म' है। वृद्धि का
अर्थ है बढ़ना। दुःख का आना 'उपप्लव' है, छ धातुओं के विभाग का नाम
'वियोग' है, यही जीव का देह से पृथक् होजाना है। इसी को प्राण का नाश
और इसी को 'भग' कहते हैं। यह लोक का स्वभाव है। सब सुख दुःखों को
प्रवृत्ति इसका मूल कारण है। सब से उपरम निवृत्ति है। प्रवृत्ति दुःख है,
निवृत्ति सुख है। जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह सत्य है । इस सत्य ज्ञान का
कारण सम्पूर्ण लोक की समानता का ज्ञान होना है। समानता के उपदेश करने
का यही प्रयोजन है ॥ ७ ॥
अथाग्निवेश उवाच-किंमूला भगवन् ! प्रवृत्तिर्निवृत्तौ वा उपाय
इति ॥ ८ ॥
अग्निवेश ने पूछा- हे भगवन् ! ससाररूप प्रवृत्ति का कारण तथा मोक्ष
रूप निवृत्ति का उपाय क्या है ? ॥ ८ ॥
भगवानुवाच - मोहेच्छा-द्वेष-कर्म-मूला प्रवृत्तिः, तज्जा ह्यहङ्कार-
सङ्ग-संशयाभिसंप्लवाभ्यवपात-विप्रत्ययाविशेषाऽनुपायास्तरुणमिव द्रुम-

अ० ५ ] शारीरस्थानम् ७३ मतिविपुलशाखास्तरवोऽभिभूय पुरुषमवतत्यैवोत्तिष्ठन्ते, यैरभिभूतो न सत्तामतिवर्तते । भगवान् आत्रेय बोले—मोह (मिथ्याज्ञान), इच्छा, द्वेष और कर्म (धर्मा- धर्म) इनके कारण से प्रवृत्ति होती है। जैसे—एक छोटे वृक्ष को इसी वृक्ष से उत्पन्न बहुत बड़ी बड़ी शाखाये और अन्य अनेक वृक्ष घेर लेते है, उसी प्रकार इन मोह आदि से उत्पन्न अहंकार (मैं हू ऐसा भाव), अच्छा बुरा सग, सशय, अभिसप्लव (अपने को सब कुछ मानना), अभ्यवपात (बाह्य सम्बन्धों की ममता में फसना), विप्रत्यय (विपरीत प्रतीति करना), अविशेष (धर्म अधर्म आदि मे समान प्रतीति) और अनुपाय (स्नान, मार्जन, होम, जप, अग्नि मे प्रवेश आदि अवास्तविक उपायो का अवलम्बन) पुरुष को घेर कर स्वय प्रबल हो जाते हैं। इनसे दब कर पुरुष अपनी वास्तविक सत्ता वा प्रवृत्ति के कारण को नहीं जान सकता । तत्रैवजाति-रूप-वित्त-वृत्त-बुद्धि-शील-विद्याभिजन-वयो-वीर्य- प्रभाव-सपन्नोऽहमित्यहङ्कारः, यद्यन्मनोवाक्कायकर्म नापवर्गाय स सङ्गः। कर्मफल-मोक्ष-पुरुष-प्रेत्यभावादयः सन्ति वा नेति सशयः, सर्वास्ववस्थास्व- नन्योऽहमहं स्रष्टा स्वभावसंसिद्धोऽहमहं शरीरेन्द्रिय-बुद्धि-स्मृति-विशेष- राशिरिति ग्रहणमभिसप्लवः, मम मातृ पितृ-भ्रातृ-दारापत्य-बन्धु-मित्र- भृत्य-गणो गणस्य चाहमित्यभ्यवपातः, कार्याकार्य-हिताहित-शुभाशुभेषु विपरीताभिनिवेशो विप्रत्ययः, ज्ञाज्ञयोः प्रकृतिविकारयोः प्रवृत्तिनिवृ- त्त्योश्च सामान्यदर्शनमविशेषः, प्रोक्षणानशनाग्निहोत्र-त्रिःसवनाभ्युक्ष- णावाहन-यजन-याजन याचना-सलिल-हुताशन-प्रवेशादयः समारम्भाः प्रोच्यन्ते ह्यनुपायाः । इस अवस्था मे वह जाति, रूप, वित्त, आचार, बुद्धि, शील, विद्या, कुटुम्ब, वय, वीर्य, प्रभाव से मैं ऐश्वर्य्यशाली हूँ ऐसा भाव होना 'अहकार' है । मन, वाणी, शरीर के जो कार्य मोक्ष के लिये न हों वह 'सग' है । कर्मों के फल, मोक्ष, पुरुष (आत्मा) प्रेत्यभाव अर्थात् पुनर्जन्म आदि है या नहीं इसका नाम 'सशय' है। सब अवस्थाओं में मैं ही एक मात्र हूँ, मैं ही स्रष्टा हूँ, मै स्वभाव से सिद्ध हूँ, मै ही शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि, स्मृति विशेष का समूह हूँ-ऐसा सम- झना अभिसप्लव है । मेरी माता, मेरे पिता, मेरे भाई, मेरी स्त्री, मेरे पुत्र, मेरे बन्धु, मेरे मित्र, मेरे भृत्य आदि और मै इनका हूँ, इसी का नाम ममता 'अभ्य वपात' है । कार्य-अकार्य, हित-अहित, शुभ-अशुभ में विपरीत (कार्य में अकार्य और अकार्य में कार्य आदि का) ज्ञान होना 'विप्रत्यय' है । ज्ञानी-अज्ञानी

७४ चरकसंहिता [ अ० ५

प्रकृति-विकार, प्रवृत्ति-निवृत्ति इनमें समानता देखना 'अविशेष' है। प्रोक्षण,
उपवास, अग्निहोत्र, तीनवार भली प्रकार स्नान, अभ्युक्षण ( जल से मार्जन ),
आवाहन, यजन, याजन, याचना ( प्रार्थना ) जल में प्रवेश या अग्नि में प्रवेश
आदि कर्म परम मोक्ष के उपाय नहीं हैं, तो भी उनका उपाय समझना यह
'अनुपाय' है।
एवमयमधी धृति-स्मृतिरहङ्काराभिनिविष्टः सक्त ससशयोऽभिसंप्लु-
तबुद्धिरभ्यवपतितोऽन्यथादृष्टिरविशेषग्राही विमार्गगतिर्निवासवृक्षः
सत्त्व-शरीर-दोष-मूलानां मूलं सर्वदुःखानां भवति । एवमहङ्कारादिभि-
र्दोषैर्भ्राम्यमाणो नानिवर्तते प्रवृत्ति, सा च मूलमघस्य ॥ ६ ॥
इस प्रकार से यह पुरुष बुद्धि, धृति और स्मृति से रहित, अहङ्कार से अह-
ङ्कारी होकर, मोक्ष से दूर करने वाले कार्यों में फस कर, कर्मफल, मोक्ष, आत्मा
आदि मे सन्देह करता हुआ, अपने को ही कर्त्ता, धर्त्ता आदि सब कुछ समझता
हुआ, 'ये मेरे मै इनका' इस ममता के गड्ढे मे गिरा हुआ, अन्यथा-दृष्टि
अर्थात् सम्यग् दृष्टि से रहित होकर, धर्म-अधर्म, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य आदि में
विशेष विवेक न करता हुआ, विपरीत मार्ग से चलता हुआ चित्त और शरीर
के दोषों से उत्पन्न होने वाले समस्त दुःखों का निवास वृक्ष हो जाता है। इस
प्रकार से अहङ्कार आदि आठ दोषों के कारण चक्कर खाता हुआ प्रवृत्ति
( संसार ), से निकल नही सकता और यह प्रवृत्ति ही पाप का कारण है ॥६॥
निवृत्तिरपवर्गस्तत्परं तत् प्रशान्त तदक्षरं तद् ब्रह्म स मोक्षः । तत्र
मुमुक्षूणामुदयनानि व्याख्यास्यामः—
निवृत्ति का नाम 'अपवर्ग' है। यही परम सर्वश्रेष्ठ शान्त पद है, यही
अक्षर, यही ब्रह्म और इसी को मोक्ष कहते है। इस प्रसंग में मुमुक्षु पुरुषों के
लिये उन्नति के उपायों का उपदेश करते हैं।
तत्र लोकदोषदर्शिनो मुमुक्षोरादित एवाऽऽचार्याभिगमन, तस्योपदे-
शानुष्ठान, अग्नेरेवोपचर्या, धर्मशास्त्रान्वगमन १, तदर्थावबोधः, तेना-
वष्टम्भः, तत्र यथोक्ताः क्रियाः, सतामुपासनमसतां परिवर्जन, अस-
ङ्गत्तिर्दुर्जनैन, सत्य सर्वभूतहितमपरुषमनतिकाले परीक्ष्य वचन, सर्व-
प्राणिष्वात्मनीवावेक्षा, सर्वांसामस्मरणमसंकल्पनमप्रार्थनमनभिभा-
षण च स्त्रीणा, सर्वपरिग्रहत्यागः, कौपानं प्रच्छादनार्थं धातुरागनि-
वसन, कन्थासीवनहेतोः सूचीपिप्पलकं, शौचाधानहेतोर्जलकुण्डिका,
१. 'सर्वप्रवृत्तिष्ववसङ्गा' इति च पाठः ।

[अ० ५ ] शारीरस्थानम् ७५

[अ० ५ ] शारीरस्थानम् ७५

दण्डधारणं, भैक्ष्यचर्यार्थं पात्रं, प्राणधारणार्थमेककालमग्राम्यो यथोपपन्नोऽभ्यवहारः, श्रमापनयनार्थं शीर्ण-शुष्क-पर्ण-तृणास्तरणोप- धान, ध्यानहेतोः कायनिबन्धन, वनेष्वनिकेतवासः, तन्द्रा-निद्रालस्यादि- कर्मवर्जनं, इन्द्रियार्थेष्वनुरागोपतापनिग्रहः, सुप्रस्थित-गत-प्रेक्षिताहार- प्रत्यङ्ग-चेष्टादिकेष्वारम्भेषु स्मृतिपूर्विका प्रवृत्तिः, सत्कार-स्तुति-गर्हा- वमान-क्षमत्वं, क्षुत्पिपासायास-श्रम-शीतोष्ण-वात-वर्षा-सुख-दुःख- संस्पर्श-सहत्वं, शोक-दैन्योद्वेग-मद-मान लोभ-रागेर्ष्या-भय-क्रोधादि- भिरसचलनम्, अहङ्कारादिषूपसर्गसंज्ञा, लोकपुरुषयोः सर्गादिसाम्या- न्वावेक्षणं, कार्यकालात्ययभय, योगारम्भे सततमनिर्वेदः, सत्त्वोत्सा- होऽपवर्गाय धी-धृति-स्मृति-बलावान, नियमनमिन्द्रियाणां चेतसि, चेतस आत्मनश्च धातुभेदेन शरीरावयवसंख्यान, अभीक्ष्णं सर्वं कार- णवद् दुःखमम्वमनित्यमित्यभ्युपगमः, सर्वप्रवृत्तिषु दुःखसंज्ञा १, सर्व- संन्यासेषु सुखमित्यभिनिवेशः एष मार्गोऽपवर्गाय। अतोऽन्यथा बध्यत इत्युदयनानि व्याख्यातानि ॥ १०॥

लोक में दोष देख कर मुमुक्षु पुरुष का सब से प्रथम आचार्य के पास जाना, आचार्य के उपदेश के अनुसार आचरण करना, अग्नि और अग्नि के तुल्य आचार्य की सेवा करना, धर्मशास्त्र का सम्पूर्ण अध्ययन करना, धर्मशास्त्र के अर्थ का ज्ञान, अर्थज्ञान में धैर्य, दृढ़ता रखना, शास्त्र के अनुसार क्रिया करना, सत्पुरुषों की सेवा, दुर्जनों का परित्याग, दुर्जन के साथ मेल न करना, मन, वचन से सत्य का पालन, सब प्राणियो का हितकारी रहना, कठोर भाषण न करना, मधुर और समय पर परीक्षा करके बोलना, सब प्राणियों पर अपने समान प्रेम दृष्टि रखना, किसी भी स्त्री का स्मरण न करना, न स्त्रियों का सङ्कल्प करना, न उनसे कोई प्रार्थना करना और न उनसे बातचीत करना, सब प्रकार के परिग्रहो का त्याग, कटि को ढापने मात्र तथा ब्रह्मचर्य रक्षा के लिये कौपीन का ही धारण करना, कन्था (गूद्दड़ी) को सीने के लिये सूई और सूई रखने का पात्र, शौच क्रिया के लिये जलपात्र (कमण्डलु), दण्ड का धारण करना, भिक्षा अर्थात् मधुकरी के लिये पात्र, प्राणरक्षामात्र के लिये एक समय अग्राम्य (पवित्र) जैसा प्राप्त हो सके वैसा भोजन, थकान दूर करने के लिये गिरे सूखे पत्ते, तिनकों आदि का बिस्तर और तकिया, ध्यान समाधि के लिये शरीर की रक्षा, जगलो मे बिना घर बनाए रहना, तन्द्रा, निद्रा, आलस्य आदि का परि- त्याग, इन्द्रियों के विषय, गन्ध आदि में अनुराग न करना, उपताप, उनके न


१. 'धर्मशास्त्रानुगमन' इति च पाठः।

मिलने से प्राप्त द्वेष आदि का निग्रह करना, सोने, बैठने, चलने, देखने, आहार, विहार, अंग, प्रत्यग आदि की चेष्टाओं में 'मै कौन हूँ' किस लिये तप करता हूँ। ऐसा स्मरण करके प्रवृत्त होना, सत्कार, स्तुति आदि मे प्रसन्न न होना, निन्दा और अपमान में क्रोधित न होकर उनको सहना, भूख, प्यास, मेहनत, थकान, शीत, गरमी, वर्षा, वायु, सुख, दुःख आदि को सहन करने की शक्ति का होना, शोक, दीनता, मान, उद्वेग, मद, लोभ, राग, ईर्ष्या, भय ओर क्रोध मे चलायमान न होना, उनसे अधीर न होना, अलकार आदि वस्तुओं को अनिष्टकारी विघ्न जानना। लोक और पुरुष दोनों में सृष्टि की आदि मे ही समानता को देखना, कार्य का समय न बीत जाये इसमें भय मानना, योगक्रिया मे कभी उदासीन न रहना, प्रत्युत सदा तत्पर रहना, आलस्य न करना, अपवर्ग के लिये सत्त्व और उत्साह रखना, धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति का बल बढाते रहना, बाह्य विषयों से इन्द्रियों को रोकना, चिन्ता आदि विषयों से चित्त को रोकना, सुख दुख आदि विषयों से आत्मा को रोकना, बार बार धातुभेद से शरीरावयवों, रक्त, मल, स्नायु आदि अवयवों का ठीक २ ज्ञान करना, (जिससे वैराग्य हो), आत्मा से अतिरिक्त उत्पन्न होने वाले सब पदार्थ दुःखों के कारण और अनित्य हैं यह ज्ञान करना, सब प्रकार की प्रवृत्ति को पाप जानना, सब प्रकार के त्यागों में सुख मानना, यह मार्ग अपवर्ग के लिये है। इस मार्ग से विपरीत चलने पर पुरुष बन्धन मे बध जाता है। ये अभ्युदय के साधन अर्थात् मोक्ष के उपाय कह दिये गये हैं॥१०॥ भवन्ति चात्र—एतैरविमलं सत्त्वं शुद्धयुपायैर्विशुध्यति । मृज्यमान इवाऽऽदर्शस्तैल-चैल-कचादिभिः ॥ ११ ॥ ग्रहाम्बुद-रजो-धूम-नीहारैरसमावृतम् । यथार्कमण्डलं भाति भाति सत्त्वं यथाऽमलम् ॥ १२ ॥ ज्वलत्यात्मनि संरुद्धं तत्सत्त्व संवृतायने । शुद्धः स्थिर प्रसन्नाचिर्दीपो दीपाशये यथा ॥ १३ ॥ जिस प्रकार तैल, वस्त्र और हाथ आदि से साफ करने पर दर्पण चमक उठता है, उसी प्रकार इन शुद्धि के उपायों से मलिन सत्त्व (चित्त) भी शुद्ध हो जाता है। जिस प्रकार कि राहु, बादल, धूल, धुवा या बर्फ से रहित सूर्य- विम्ब चमकता है, उसी प्रकार शुद्ध सत्त्व भी प्रकाशित होता है। जिस प्रकार सत्त्व (चित्त) को पाच इन्द्रियों ढा ढापती हैं, उसी प्रकार सूर्य को भी राहु आदि पाच वस्तुएँ आवृत करती हैं*। जिस प्रकार सुरक्षित घर में दीपक की

  • धूमेनाऽऽव्रियते वह्निः यथाऽऽदर्शो मलेन च । यथोल्बेनाऽऽवृतो गर्भः तथा तेनेदमावृतम् ॥

अ० ५ ] शरीरस्थानम् ७७

अ० ५ ] शरीरस्थानम् ७७ ज्योति शुद्ध, स्थिर और प्रसन्न होकर जलती है, उसी प्रकार इन्द्रियों से असक्त आत्मा में नियमित सत्त्व शुद्ध स्थिर होकर प्रकाशित होता है ॥११-१३॥ शुद्धसत्त्वस्य या शुद्धा सत्या बुद्धिः प्रवर्त्तते । यया भिनत्त्यतिबलं महामोहमयं तमः ॥ १४॥ सर्वभावस्वभावज्ञो यया भवति निस्पृहः । योगं यया साधयते सांख्यः संपद्यते यया ॥ १५॥ यया नोपैत्यहङ्कारं नोपास्ते कारणं यया । यया नालम्बते किञ्चित्सर्वं संन्यस्यते यया ॥ १६॥ याति ब्रह्म यया नित्यमजरः शान्तमक्षरम् १ । विद्या सिद्धिर्मतिर्मेधा प्रज्ञा ज्ञानं च सा मता ॥ १७॥ शुद्ध सत्त्व से जो निर्मल सत्य बुद्धि उत्पन्न होती है, जिस बुद्धि के द्वारा अति बलवान् महा मोहयुक्त अन्धकार का नाश करता है, जिसके द्वारा सब पदार्थों के स्वभाव को जानता है, जिसके द्वारा वह निःस्पृह बनता है, जिसके द्वारा विषयों से हटे मन को आत्मा में लगाकर 'योग' करता है और जिस बुद्धि के द्वारा वह तत्त्वज्ञानी बनता है । जिसके द्वारा वह अहङ्कार के वश नहीं होता, जिसके द्वारा सुख दुःख के कारणों का सेवन नहीं करता, जिसके द्वारा कहीं भी आश्रय-स्थान नहीं बनाता, जिसके कारण सब कुछ त्याग करता है, जिसके द्वारा नित्य, अजर, शान्त, अव्यय ब्रह्म-मोक्ष को प्राप्त करता है, उसी बुद्धि को विद्या, सिद्धि, मति, मेधा अर्थात् प्रज्ञा और ज्ञान नाम से कहते हैं ॥१४-१७॥ लोके विततमात्मानं लोकं चाऽऽत्मनि पश्यतः । परावरदृशः शान्तिर्ज्ञानमूला न नश्यति ॥ १८॥ लोक में अपने आत्मा को, तथा अपने आत्मा में लोक को देखनेवाले, तथा परमात्मा और अवर प्रकृति (प्रधान प्रकृति) आदि को देखनेवाले पुरुष में ज्ञान के द्वारा उत्पन्न हुई शान्ति कभी नष्ट नहीं होती ॥१८॥ पश्यतः सर्वभावान् हि २ सर्वावस्थासु सर्वदा । ब्रह्मभूतस्य संयोगो न शुद्धस्योपपद्यते ॥ १९॥ सब अवस्थाओं में, सब भावों पदार्थों को देखते हुए इनमें राग और द्वेष न करने से समबुद्धि रहने के कारण ब्रह्म रूप हुए शुद्ध सत्त्व के साथ [धर्म और अधर्म का] संयोग नहीं होता ॥१९॥ १. शान्तमव्ययम् इति च पाठ । २ 'सर्व भूतानि' इति च पाठः ।

७८ चरकसंहिता [ अ० ६ नाऽऽत्मनः कारणाभावाल्लिङ्गमप्युपलभ्यते । स सर्वकारणत्यागान्मुक्त इत्यभिधीयते ॥ २० ॥ मुक्त पुरुष के इन्द्रिय आदि करण न होने से मुक्त पुरुष का कोई लक्षण नहीं मिलता । इस मुक्तात्मा पुरुष के साथ मन, इन्द्रिय आदि करणों का योग नहीं होता, इसीलिये उसको 'मुक्त' कहते हैं ॥२०॥ विपापं विरजः शान्तं परमक्षरमव्ययम् । अमृतं ब्रह्म निर्वाणं पर्यायैः शान्तिरुच्यते ॥ २१ ॥ एतत्तत्सौम्य ! विज्ञानं यज्ज्ञात्वा मुक्तसंशयाः । मुनयः प्रशमं जग्मुर्वीत-मोह-रजः-स्पृहाः ॥ २२ ॥ विपाप ( पापरहित ), विरज ( रजोगुण से रहित ), शान्त, पर, अक्षर, अव्यय, अमृत, ब्रह्म, निर्वाण, शान्ति इत्यादि पर्यायों से मोक्ष को कहते हैं । हे सौम्य ! जिस विज्ञान को जान कर संशय, मोह, रज और स्पृहा से रहित होकर मुनि लोगों ने शान्ति प्राप्त की है वह यही विज्ञान है ॥ २२ ॥ तत्र श्लोकौ-सप्रयोजनमुद्दिष्टं लोकस्य पुरुषस्य च । सामान्यं मूलमुत्पत्तौ निवृत्तौ मार्ग एव च ॥ २३ ॥ शुद्धसत्त्वसमाधानं सत्या बुद्धिश्च नैष्ठिकी । विचये पुरुषस्योक्ता निष्ठा च परमर्षिणा ॥ २४ ॥ लोक और पुरुष की समानता, इस समानता का प्रयोजन, उत्पत्ति का कारण, निवृत्ति का मार्ग, शुद्ध सत्त्व का रूप, मोक्षसाधक सत्यबुद्धि और मोक्ष का रूप, यह सब परमऋषि आत्रेय ने इस 'पुरुष विचय' अध्याय में कह दिया है ॥ २३-२४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने पुरुष- विचयशारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ षष्ठोऽध्यायः । अथातः शरीरविचय शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'शरीर-विचय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

अ० ६ ] शारीरस्थानम् ७६ शरीरविचयः शरीरोपकारार्थमिष्यते भिषग्विद्यया, ज्ञात्वा हि शरीरतत्त्वं शरीरोपकारकरेषु भावेषु ज्ञानमुत्पद्यते । तस्माच्छरीरवि- चयं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ ३ ॥ शरीर का विचय अर्थात् रचनाविज्ञान (प्रविभाग रूप से ज्ञान) शरीर के उपकार के लिये आवश्यक है । शरीर का यथार्थ तत्त्व जान कर ही शरीर के लिये उपयोगी पदार्थों में ज्ञान उत्पन्न होता है। इसलिये बुद्धिमान् शरीर के रचनाविज्ञान को श्रेष्ठ बतलाते हैं ॥ ३ ॥ तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पञ्चभूतविकारसमुदायात्मकं समयोगवाहि । यदा ह्यस्मिन् शरीरे धातवो वैषम्यमापद्यन्ते तदा क्लेशं विनाशं वा प्राप्नोति । वैषम्यगमनं हि पुनर्धातूनां वृद्धि ह्रास- गमनमकार्त्स्न्येन प्रकृत्या च ॥ ४ ॥ इसमें शरीर शब्द से अभिप्राय आत्मा (चेतना) के आश्रय स्थान, पञ्च महाभूतों के विकारों का समुदाय तथा धातुओं के उचित प्रमाण में (समयोग में) मेल को धारण करने वाला शरीर है । जिस समय इस शरीर के भीतर रस, रक्त आदि धातु विषम हो जाते हैं, उस समय शरीर में क्लेश होता है, अथवा शरीर विनष्ट हो जाता है। धातुओं में सम्पूर्ण रूप में अथवा एकांश में वृद्धि और ह्रास होना 'धातुओं का विषम होना' कहाता है ॥ ४ ॥ यौगपद्येन तु विरोधिनां धातूनां वृद्धिह्रासौ भवतः । यद्धि यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्ततो विपरीतगुणस्य धातोः प्रत्यवायकरं संपद्यते ॥५॥ उपयुक्त भैषज्य से परस्पर विरोधी धातुओं की वृद्धि और ह्रास एक साथ होता है। जो औषध जिस धातु की वृद्धि करने वाली है वह औषध उस धातु से विपरीत गुणवाली धातु में ह्रास करती है। [जैसे-दूध, कफ और शुक्र आदि की वृद्धि करता है साथ ही अपने से विरोधि गुणवाले पित्त और रक्त का ह्रास भी करता है। कहीं २ सजातीय होकर गुण विपरीत होने से धातु का ह्रास करता है जैसे-गोमूत्र द्रव होकर भी कटु उष्ण है वैसे कफ- नाशक भी है ] ॥ ५ ॥ तदेवं तस्माद्भेषजं सम्यगवचार्यमाणं युगपन्न्यूनातिरिक्तानां धातूनां साम्यकरं भवति । अधिकमपकर्षति, न्यूनमाप्याययति ॥ ६ ॥ इसलिये भली प्रकार से प्रयोग की हुई औषध एक समय में ही न्यून तथा बढ़ी हुई धातुओं को समान करती है और बढ़ी हुई धातु को कम करती है और कम हुए धातु को बढ़ाती है ॥ ६ ॥

८० चरकसंहिता [अ० ६ एतावदेव हि भेषज्यप्रयोगे फलमिष्टं स्वस्थवृत्तानुष्ठाने च यावद्धा- तूनां साम्यं स्यात् । स्वस्था ह्यपि धातूनां साम्यानुग्रहार्थमेव कुशला रसगुणानाहारविकारांश्च पर्यायेणेच्छन्त्युपयोक्तुं, सात्म्यसमाज्ञातानेक- प्रकारभूयिष्ठांश्चोपयुञ्जानास्तद्विपरीतकरसमाज्ञातया चेष्टया सममिच्छ- न्ति कर्तुम् ॥ ७॥ औषध प्रयोग तथा स्वस्थ-वृत्त के पालने का यही फल है कि धातुओं की समानता रहे। बुद्धिमान् पुरुष स्वस्थ अवस्था में भी धातुओं मे समता रखने के लिये मधुरादि रस, गुरु आदि गुणों को तथा यवागू आदि आहार के विकारों का क्रम से उपयोग करते हैं। अर्थात् मधुर रस खाने से उत्पन्न हुए कफ की वृद्धि को शान्त करने के लिये कटु रस आदि का उपयोग करते हैं। गुरु आदि गुण के पदार्थों के सेवन के पीछे लघु गुण वाले पदार्थों का उपयोग, यवागू ( लप्सी ), आदि खा कर इसके पाक के लिये पेया आदि का उपयोग करते हैं, यह क्रम है। सात्म्य ( अनुकूल ) रूप से जाने गये अनेक प्रकार के वा बहुत से पदार्थों का उपयोग करते हुए उससे विपरीत गुण करनेवाली चेष्टा से पुनः समान करने की इच्छा करते है । [ जमे—मधुर प्रकार के आहार को खाने से मधुर के समान कफकी वृद्धि होने से कफ का क्षय करनेवाली विपरीत व्यायाम क्रिया करते हैं। इससे समानता आ जाती है ] ॥ ७ ॥ देश-कालात्म-गुण-विपरीतानां हि कर्मणामाहारविकाराणा च क्रियोपयोगः सम्यक् सर्वांतियोगसधारणमुदीर्णानां च गतिमतां साहसाना च वर्जनं स्वस्थवृत्तमेतावद्धातूना साम्यानुग्रहार्थमुपदिश्यते ॥ ८ ॥ संक्षेप में स्वस्थवृत्त—देश विपरीत कर्म ( मरु देश में सोना ), काल विप- रीत कर्म ( वसन्त में व्यायाम ), आत्म विपरीत कर्मों ( स्थूल शरीर मे व्यायाम, जागरण आदि ) तथा आहार-विकारों की क्रियाओं का ठीक प्रकार से उपयोग, काल, बुद्धि और इन्द्रियों के अर्थों के मिथ्यायोग ( अतियोग, मिथ्यायोग तथा अयोग ) का परित्याग, गतिशील मल ( पाखाना ), आदि के उपस्थित बेगों को न रोकना, साहसिक कर्मों का परित्याग करना यह स्वस्थवृत्त है। यह स्वस्थ- वृत्त धातुओं की समानता के लिये हो उपदेश किया जाता है ॥ ८ ॥ धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः समानगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहारवि- हारैरभ्यस्यमानैर्वृद्धिं प्राप्नुवन्ति, ह्रास तु विपरीतगुणैर्विपरीतगुणभू- यिष्ठैर्वाऽप्यभ्यस्यमानैः ॥ ६ ॥ धातु अपने समान गुणों से तथा अपने अधिक समान गुणवाले आहार विहार के निरन्तर सेवन करने से बढ़ते हैं और अपने विपरीत गुणों से तथा

अ० ६ ] ६ शारीरस्थानम् ८१ अपने अधिक विपरीत गुणवाले आहार-विहार के निरन्तर सेवन से शरीर के धातु घटते हैं ॥ ६ ॥ तत्रेमे शरीरधातुगुणाः संख्यासामर्थ्यकराः । तद्यथा—गुरु-लघु-शी- तोष्ण-स्निग्ध-रूक्ष-मन्द-तीक्ष्ण-स्थिर-सर-मृदु-कठिन-विशद-पिच्छिल- श्लक्ष्ण-खर-सूक्ष्म-स्थूल-सान्द्र-द्रवाः।तेषु ये गुरुवस्ते गुरुभिराहारगुणैरभ्य- स्यमानैराप्यायन्ते लघवाश्च ह्रसन्ति, लघवस्तु लघुभिराप्यायन्ते गुरु- वश्च ह्रसन्ति । एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद् वृद्धिविपर्ययाद् ह्रासः। एतस्मान्मासमाप्यायते मांसेन भूयन्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्यः, तथा लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थना, मज्जा मऽज्ञा, शुक्रं शुक्रेण, गर्भस्त्वामगर्भेण ॥ १० ॥ शरीर धातुओं के गुण, सख्या ( गणना ), तथा सामर्थ्य करने वाले हैं। जैसे—गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद पिच्छिल, श्लक्षण, खर, स्थूल, सान्द्र और द्रव। इनमें जो गुण गुरु हैं वे गुरु आहार के गुणों के निरन्तर सेवन करने से बढ़ते हैं और लघु गुणों को घटाते हैं। जो लघु गुण हैं वे लघु आहार के गुणों से निरन्तर बढ़ते हैं और गुरु गुणों को घटाते हैं। इसी प्रकार सब धातुओं के गुण अपने समान गुणों के योग से बढ़ते हैं और अपने विपरीत गुणों से कम होते है। इसलिये शरीरस्थ मास-धातु मास से अन्य सब शरीर धातुओं की अपेक्षा अधिक बढ़ता है। इसी प्रकार रक्त, रक्त से अधिक बढ़ता है। मेद मेद से, वसा वसा से, अस्थिया तरुणास्थियों से, मज्जा मज्जा से, शुक्र शुक्र से, गर्भ आमगर्भ से अधिक बढता है ॥ १० ॥ यत्र त्वेवंलक्षणेन सामान्येन सामान्यवतामाहारविकाराणामसा- निध्यं स्यात्, सनिहितानां वाऽप्ययुक्तत्वान्नोपयोगो घृणित्वादन्यस्माद्वा कारणात्, स च धातुरभिवर्धयितव्यः स्यात् । तस्य ये समानगुणाः स्युराहारविकारा असेव्याश्च, तत्र समानगुणभूयिष्ठानामन्यप्रकृतीनाम- प्याहारविकाराणामुपयोगः स्यात् । तद्यथा—शुक्रक्षये क्षीरसर्पिषोरुपयोगो मधुर-स्निग्ध-समाख्यातानां चापरेषामेव द्रव्याणा, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरस-वारुणी मण्ड-द्रव-मधुराम्ल- लवणोपक्लेदिनां, पुरीषक्षये कुल्माष-माष-कुष्कुण्डाज मध्य-यव शाक- धान्याम्लानां, वातक्षये कटुक-तिक्त-कषाय-रूक्ष-लघु-शीतानां, पित्तक्ष- येऽम्ल-लवण-कटुक-क्षारोष्ण-तीक्ष्णानां, श्लेष्मक्षये स्निग्ध-गुरु-मधुर-

८२ चरकसंहिता [ अ० ६ सान्द्र-पिच्छिलानां द्रव्याणाम् । कर्मापि च यद्यद्यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्त- दासेव्यम् । एवमन्येषामपि शरीरधातूनां सामान्यविपर्ययाभ्यां वृद्धिह्रासौ यथाकालं कार्यौ । इति सर्वधातूनामेकैकशोऽविशेषाश्च वृद्धिकराणि व्याख्यातानि भवन्ति ॥ ११ ॥ समान गुणवाले विजातीय पदार्थो मे वृद्धि—जहा पर कि इस प्रकार के लक्षणों वाले समान गुण के आहार विकारों का प्राप्त होना सम्भव न हो, अथवा प्राप्त होने पर भी घृणा आदि के कारण अथवा धर्म आदि के कारण उपयोग करने में बाधा पड़ती हो वहा पर विजातीय समान गुण के आहार-विकारों का उपयोग करना चाहिये । जिससे कि इच्छित धातु [ जिसके लिये समान गुण वाले आहार विकार घृणा अथवा धर्म के कारण असेव्य हैं उस धातु ] की वृद्धि हो। जैसे—शुक्र का क्षय होने पर दूध और घी का उपयोग, तथा मधुर और स्निग्ध विजातीय दूसरे पदार्थों का उपयोग करना । मूत्र का क्षय होने पर गन्ने का रस, वारुणी, मण्ड तथा कुल्माष, उड़द, कुष्कुण्ड (साप की छतरी), बकरी का मध्य भाग, जौ, शाक, धान्य और अम्ल आदि वस्तुओं का उपयोग करना चाहिये । वात का क्षय होने पर कटु, तिक्त, कषाय, रूक्ष, लघु, शीत वस्तुओं का उपयोग करना चाहिये । पित्त का क्षय होने पर अम्ल, लवण, कटु, क्षार उष्ण, तीक्ष्ण वस्तुओं का और कफ का क्षय होने पर स्निग्ध, गुरु, मधुर, सान्द्र और पिच्छिल द्रव्यों का उपयोग करना चाहिये । द्रव्यों की भाति धातु की वृद्धि करनेवाले समान गुण के अचिन्त्य प्रभाव रूपी कर्म का भी उपयोग करना चाहिये । इसी प्रकार से अन्य शरीर धातुओं को भी सामान्य और विपर्यय द्वारा समयानुसार बढ़ाना अथवा घटाना चाहिये । इस प्रकार से सब धातुओं के पृथक् पृथक् तथा समग्र रूप में वृद्धि तथा ह्रास के कारणों की व्याख्या कर दी गई है ॥ ११ ॥ कात्स्न्र्येन शरीरवृद्धिकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—काल- योगः, स्वभावसंसिद्धिः, आहारसौष्ठवमविघातश्चेति । बलवृद्धिकरा- स्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—बलवत्पुरुषे देशे जन्म, बलवत्पुरुषे काले च । सुखश्च कालयोगो, बीज-क्षेत्र-गुण संपच्चाऽऽहारसंपच्च, शरीरसं- पच्च, सात्म्यसंपच्च, सत्त्वसंपच्च, स्वभावसंसिद्धिश्च, यौवनं च, कर्म च, सहर्षश्चेति ॥ १२ ॥ निम्न बाते सम्पूर्ण रूप में सारे शरीर की वृद्धि करते है । जैसे—वृद्धिका- रक यौवनादि का समय, स्वभाव, अर्थात् अदृष्ट के कारण वृद्धि, उत्तम आहार और अभिघात (अतिव्यवाय या मनोविघात आदि का न होना ),

अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८३

अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८३ ये वस्तुऐ सम्पूर्ण शरीर में वृद्धि करती है। निम्न बाते शरीर में बल की वृद्धि करती हैं। जैसे—बलवान् पुरुषों वाले देश में उत्पन्न होना, बलवान् माता पिता मे, बलवान् काल हेमन्त या शिशिर में उत्पन्न होना । साधारण समय का योग, बीज, शुक्र, क्षेत्र, आर्त्तव और गर्भाशय के उत्तम गुण, उत्तम गुणयुक्त आहार, उत्तम शरीर, उत्तम सात्म्य, उत्तम सत्त्व, स्वभाव से सिद्धि अर्थात् स्वभावतः शरीर की अष्टविध उत्तम बढ़ती वा बल को उत्पन्न करने वाले कर्म का सेवन, यौवनावस्था और व्यायाम आदि कर्म इनसे बल उत्पन्न होता है ॥ १२ ॥ आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—ऊष्मा वायु- क्लेद स्नेहः कालः समयोगश्चेति । तत्र तु खल्वेषामूष्मादीनामाहारप- रिणामकराणां भावानामिमे कर्मविशेषा भवन्ति । तद्यथा—ऊष्मा पचति, वायुरपकर्षति, क्लेदः शैथिल्यमापादयति, स्नेहो मार्दव जनयति, कालः पर्याप्तिमभिनिर्वर्त्तयति, समयोगस्त्वेषा परिणामधातुसाम्यकरः संपद्यते ॥ १३ ॥ निम्न बाते आहार को पचाने वाली हैं। जैसे—उष्णिमा, वायु, क्लेद, स्नेह, पाक काल और प्रकृति आदि आठ बातो का समयोग आहार सम्पत् को उत्पन्न करता है। आहार को भली प्रकार पचाने में उष्णिमा आदि निम्नलि- खित कार्य करते हैं। जैसे—उष्णिमा भोजन को पचाती है । वायु उष्णिमा से दूर स्थित भोजन को उष्णिमा के पास लाता है । क्लेद शिथिलता को उत्पन्न करता है। स्नेह कोमलता को पैदा करता है । समय तृप्ति को पैदा करता है । समयोग इनमें परिणाम तथा धातुओं की समता को उत्पन्न करता है ॥ १३ ॥ परिणामतस्त्वाहारास्थ गुणा शरीरगुणभावमापद्यन्ते यथास्वमवि- रुद्धाः विरुद्धाश्च विहन्युर्विहताश्च विरोधिभिः शरीरम् ॥ १४ ॥ आहार के परिपाक होने पर भोजन के गुण अपने समान शरीर के गुणों में बदल जाते हैं। जैसे—आहार का कठिन भाग मास, अस्थि आदि शरीर के कठिन भाग का पोषण करता है और द्रव भाग रक्त आदि रूप में बदल जाता है। शरीर गुणो के विरोधी आहार-गुण विरुद्ध गुणों को नष्ट करते हैं। इस प्रकार से नष्ट हुए गुण शरीर को नष्ट कर देते हैं । [जैसे—दूध और मछली आदि विरुद्ध आहार के कारण नष्ट हुए गुण शरीर को नष्ट कर देते हैं] ॥१४॥ शरीरधातवः पुनर्द्विविधाः संग्रहेण—मलभूताः, प्रसादभूताश्च । तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्य आबाधकराः स्युः । तद्यथा—शरीरच्छिद्रे- षूपदेहाः पृथग्जन्मानो बहिर्मुखाः परिपक्वाश्च धातवः प्रकुपिताश्च वात-

८४ चरकसंहिता [ अ० ६

पित्तश्लेष्माणो ये चान्येऽपि केचिच्छरीरे तिष्ठन्तो भावाः शरीरस्योपघा-
तायोपपद्यन्ते सर्वांस्तान्मले संप्रचक्ष्महे, इतरांस्तु प्रसादे, गुर्वादींश्च
द्रवान्तान् गुणभेदेन, रसादींश्च शुक्रान्तान् द्रव्यभेदेन ॥ १५ ॥
संक्षेप से शरीर के धातु दो प्रकार के हैं। जैसे—मलरूप और प्रसाद रूप ।
इनमें जो शरीर में पीड़ा उत्पन्न करते हैं वे मलरूप हैं । जैसे—जन्म से पृथक्
या शरीर से बाहर निकलने वाले या शरीर के छिद्रों में लगे (जैसे—नाक का
मल आदि), पाक होकर पूय बने धातु (रक्त आदि), कुपित वात, पित्त, कफ
(बढे या घटे वातादि), इनके अतिरिक्त और भी जो वस्तुए शरीर मे रह कर
शरीर की नाशकारक होती हैं, उन सबको 'मल' शब्द से कहते हैं। इनसे भिन्न
वस्तुओ को 'प्रसाद' कहते हैं। गुरु से लेकर द्रव तक कहे गुणों को और रस से
लेकर शुक्र तक कहे द्रव्यों को भी प्रसाद-धातु कहते हैं ॥ १५ ॥
तेषां सर्वेषामेव वात-पित्त-श्लेष्माणो दुष्टा दूषयितारो भवन्ति
दोषस्वभावात्, वातादीनां पुनर्धातवन्तरे कालान्तरे प्रदुष्टाना विविधा-
शितपीतीयेऽध्याये विज्ञानान्युक्तानि । एतावत्येव दुष्टदोषगतिर्यावत्सं
स्पर्शहीनाच्छरीरधातूनाम् । प्रकृतिभूतानां खलु वातादीना फलमारोग्यं,
तस्मादेषा प्रकृतिभावे प्रयतितव्यं बुद्धिमद्भिः ॥ १६ ॥
अपने कारणों से कुपित हुए वात, पित्त, कफ इन सबों को दूषित कर
देते हैं। क्योकि दोष का स्वभाव (प्रकृति) ही दूषित करने का है। वात
आदि और रस आदि धातुओं के दूषित होने के लक्षण 'विविधाशित
पीतीय' अध्याय मे कह दिये हैं। दुष्ट हुए वात आदि की केश, श्मश्रु
आदि में गति नहीं है, क्योंकि इनमें त्वचा का स्पर्श नहीं है। जहा जहा पर
स्पर्शेन्द्रिय का सम्बन्ध है वहा वहा पर दूषित वात आदि की गति होती है।
प्रकृति मे रहते हुए वात आदि शरीर-धातुओ का फल 'आरोग्य' है। इसलिये
बुद्धिमानों को इनको प्रकृति मे रखने का प्रयत्न करना चाहिये ॥१६॥
भवति चात्र—सर्वदा सर्वथा सर्व शरीरं वेद यो भिषक् ।
आयुर्वेदं स कात्स्न्येन वेद लोकसुखप्रदम् ॥ १७॥ इति ॥
जो वैद्य सम्पूर्ण शरीर को भली प्रकार सब समयों में सब प्रकारों से जानता
है, वह लोक को सुख देने वाले आयुर्वेद को भी सम्पूर्ण रूप में जानता है ॥१७॥
तमेवमुक्तवन्त भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—श्रुतमेतद्यदुक्तं
भगवता शरीराधिकारे वचः, किन्तु खलु गर्भस्याङ्गं पूर्वमभिनिर्वर्तते
कुक्षौ, कुतोमुखः कथं वा चान्तर्गतस्तिष्ठति, किमाहारश्च वर्तयति

अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८५

अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८५ कथंभूतश्च निष्क्रामति, कैश्चायमाहारोपचारैर्जातः सद्यो हन्यते, जातस्तु कैरव्याधिरभिवर्धते, किं चास्य देवादिप्रकोपनिमित्ता बिकाराः सम्भवन्ति, आहोस्विन्न, किचास्य कालाकालमृत्योर्भावाभावयोर्भगवान्ध्यवस्यति, किंवास्य परमायुः, कानि चास्य परमायुषो निमित्तानीति ॥ १८ ॥ गर्भ के सम्बन्ध में प्रश्न—इस प्रकार से उपदेश करते हुए भगवान् आत्रेय को अग्निवेश ने कहा—हे भगवन् ! आपने शरीर के अधिकरण में जा कुछ कहा वह सुन लिया । ( १ ) अब बतलाइये कि गर्भाशय मे गर्भ का प्रथम कौन सा अंग बनता है ? (२) गर्भ का मुख किधर रहता है और (३) गर्भा- शय के भीतर गर्भ किस स्थिति में रहता है ? ( ४ ) किस आहार से जीता है और ( ५ ) किस प्रकार से बाहर आता है ? ( ६ ) किन २ प्रकार के आहार उपचारां से उत्पन्न हुआ यह शीघ्र मर जाता है ? ( ७ ) उत्पन्न होकर नीरोग अवस्था मे किन से बढ़ता है ? ( ८ ) क्या इस गर्भ को देवता आदि के प्रकोप के कारण होनेवाले विकार होते हैं वा नहीं ? ( ६ ) क्या इस गर्भ में भी काल मृत्यु और अकाल-मृत्यु के होने और न होने का भगवान् निश्चय करता है । (१०) इस गर्भ की परम आयु क्या है और (११) परमायु के क्या कारण हैं ॥१८॥ तमेवमुक्तवन्तमग्निवेशं भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच—पूर्वमुक्तमे- तद् गर्भावक्रान्तौ यथाऽयमभिनिर्वर्तते कुक्षौ, यच्चास्य यदा संतिष्ठतेऽ- ङ्गजातम् । विप्रतिपत्तिवादास्त्वत्र बहुविधा सूत्रकारिणामृषीणां सन्ति सर्वेषां, तानपि निबोधोच्यमानान्—शिरः पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षाविति कुमारशिरा भरद्वाजः पश्यति, सर्वेन्द्रियाणां तदधिष्ठानमिति कृत्वा । हृदयमिति काङ्कायनो बाह्लीकभिषक्, चेतनाधिष्ठानत्वात् । नाभिरिति भद्रकाप्यः, आहारागम इति कृत्वा । पक्वाशयगुदमिति भद्रशौनक, मारुताधिष्ठानत्वात् । हस्तपादमिति वडिशः, तत्करणत्वात्पुरुषस्य । इन्द्रियाणीति जनको वैदेह, तान्यस्य बुद्धयधिष्ठानानोति कृत्वा । परो- क्षत्वादचिन्त्यमिति मारीचि कश्यपः, सर्वाङ्गनिर्वृत्तिर्युगपदिति धन्व- न्तरि, तदुपपन्नं सिद्धत्वात्, सर्वाङ्गानां तस्य हृदयं मूलमधिष्ठानं च केषांचिद्भावानां, न च तस्मात्पूर्वाभिनिर्वृत्तिरेषा, तस्माद्धृदयप्रभृतीनां सर्वाङ्गाना तुल्यकालाभिनिर्वृत्तिः । सर्वभावा ह्यन्योन्यप्रतिबद्धाः । तस्माद्यथाभूतं दर्शनं साधु ॥ १६ ॥ इस प्रकार से कहते हुए अग्निवेश को भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने कहा— जिस प्रकार से गर्भ गर्भाशय में बढ़ता है यह बात पीछे 'गर्भावक्रान्ति' अध्याय

८६ चरकसंहिता [ अ० ६ में कह चुके हैं। इस गर्भ की अगरचना मे सूत्रकार ऋषियो के बहुत प्रकार के मतभेद हैं । उन सब को भी सुनो—कुमारशिरा भरद्वाज का दर्शन है कि गर्भाशय में गर्भ का प्रथम शिर बनता है, क्योंकि यही शिर सब इन्द्रियो का आश्रय स्थान है । बाह्लीक भिक्कू काङ्कायन का मत यह है कि सबसे प्रथम हृदय बनता है, क्योंकि हृदय ही चेतना का स्थान है। भद्रकाप्य का कथन है कि सबसे प्रथम नाभि बनती है क्योकि आहार प्राप्ति का यहा मार्ग है । भद्रशौनक का मत है कि प्रथम पक्वाशय, गुदा बनती है, क्योकि यही वायु का स्थान है। बडिश का कथन है कि प्रथम हाथ पाव बनते हैं, क्योकि ये ही पुरुष के करण (साधन) हैं। वैदेह जनक ऋषि का मत है कि इन्द्रियाँ सबसे प्रथम बनती हैं, क्योंकि ये इन्द्रियाँ ही बुद्धि (ज्ञान) का आश्रय स्थान हैं। मारीचि कश्यप का कहना है कि परोक्ष हान के कारण कौन सा अग प्रथम बनता है यह कुछ नहीं कहा जा सकता, यह अचिन्त्य विषय है । धन्वन्तरि का मत है कि सब अग एक साथ मे बनते है । यह बात ठीक भी है। ऐसा ही प्रमाणो से सिद्ध होता है । गर्भ के सब अगों का तथा कुछ अन्य वस्तुओं का मूल आश्रयस्थान हृदय है। इसलिये इस हृदय से पूर्व अन्य अग नहीं बन सकते । अतः हृदय आदि सब अगो का निर्माण एक साथ में ही होता है । सब पदार्थ परस्पर एक दूसरे के साथ सम्बन्धित हैं । इसलिये यह यथार्थ दर्शन (धन्वन्तरि का मत) ही ठीक है ॥ १९ ॥ गर्भस्तु खलु मातुः पृष्ठाभिमुख ऊर्ध्वशिराः संकुच्याङ्गान्यस्ते जरायुवृतः कुक्षौ ॥२०॥ गर्भाशय में गर्भ माता की पीठ की ओर मुख किये हुए रहता है। गर्भ का शिर ऊपर (गर्भाशय के शिखर में) रहता है और अङ्ग सकुचित अवस्था में रहते हैं ॥२०॥ व्यपगत-पिपासा-बुभुक्षस्तु खलु गर्भः परतन्त्रवृत्तिः, मातरमाश्रित्य वर्तयत्युपस्नेहोपस्वेदाभ्या गर्भस्तु सदसद्भूताङ्गावयवः, तदनन्तर ह्यस्य लोमकूपायनै रुपस्नेहः कश्चिन्नाभिनाड्ययनैः । नाभ्या ह्यस्य नाडी प्र- सत्ता, सा नाभ्या चापरा, अपरा चास्य मातुः प्रसक्ता हृदये, मातृहृदयं ह्यस्य तामपरामभिस्रववे सिराभिः स्यन्दमानाभिः, स तस्य रसो बलवर्णकरः सपद्यते, स च सर्वरसवानाहारः स्त्रिया ह्यापन्नगर्भायास्त्रिधा रसः प्रतिपद्यते स्वशरीरपुष्टये स्तन्याय गर्भवृद्धये च, स तेनाहारेणो- पष्टब्ध परतन्त्रवृत्तिर्मातरमाश्रित्य वर्तयत्यन्तर्गतः ॥२१॥