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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

बादशाह से आपकी जान को खतरा है। इस प्रकार की सूचना मुगलों के मिरज और रहिमतपुर की चौकियों पर पहुँच गयी है। आप किसी भी समय कैद हो सकते हैं। जाल को तोड़ दीजिए और पक्षियों की तरह उड़ान भरिए।" शम्भूमहाराज निकल भागने के लिए मौका ढूँढ़ रहे थे। किन्तु दिलेरखान गत दिन उनके आसपास ही घूमता रहता था। एक दिन दोपहर को उसने युवराज से स्पष्ट शब्दों में कहा, "शम्भू महाराज ! हमें आपके झंडे के नीचे पन्हाला जीतना है।" खान की धूर्तता को शम्भूमहाराज समझ रहे थे। उन्होंने खिन्नता से कहा, "इसका मतलब ! तुमको मुझे आगे करके भूपालगढ़ की तरह पुनः लड़ाई करवानी है। हमारे प्रदेश में ले जाकर मुझे बदनाम करना है।" शम्भू महाराज को अपनी बगल में दबोचे दिलेरखान पन्हाला की ओर जाने की ज़िद कर रहा था। उसी समय गुप्त जासूसों ने युवराज को सूचित किया- "दो साल पहले इसी दिलेरखान ने वाडकर पिता-पुत्र को मित्र बनाया था। पंचमी के त्योहार के दिन रायगढ़ में दंगा फसाद करके शिवाजी महाराज की जान लेने की योजना बनायी थी। उस पर विश्वास करना एक गुनाह ही है। खान ने अभी तक शराफत का नकाब पहना हुआ था। किन्तु इन दिनों उसके भीतर छुपा हुआ शैतान उसे चुप नहीं बैठने दे रहा था। उसने फौज के रास्ते में पड़ने वाले टिकोटा और अथणी गाँवों पर गधे का हल चलवा दिया था। वास्तव में इन दोनों गाँवों में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमान ही अधिक बसे थे। उनका केवल यह गुनाह था कि वे बीजापुर की सीमा में रहने वाले थे। "दिलेरखान ने भयानक अत्याचार किये। उसने दुकानें लूटीं और व्यापारियों को नंगा किया। सारे खेत जला दिये। किन्तु इतने से भी उसकी भूख नहीं मिटी। दिलेर दुष्ट सैनिकों ने हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्म की लड़कियों में कोई भेद नहीं किया। दिन दहाड़े उनकी इज्जत लूटी। बहुत सी महिलाओं को बेइज्जत करके मार डाला। उनके शव पेड़ों पर लटकाए। अनेक माँ बहनों ने भरे हुए कुओं का आश्रय लिया और अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दी।" दिलेरखान के इस क्रूर अत्याचार से बहुत से मुसलमान भी सहम गये थे। किन्तु खान के विरोध में खड़े होने की उनमें हिम्मत न थी। उन सभी लोगों ने एक साथ मिलकर शम्भूमहाराज से शिकायत की। पहले से ही नाराज शम्भूमहाराज क्रोधावेश में पैर पटकते हुए दिलेरखान की छावनी में गये। उन्होंने डाँटते हुए उससे पूछा- "आप इनसान हैं या हैवान ? गरीब प्रजा पर इस तरह का अत्याचार आप कर कैसे पाते हैं?" "शम्भूशहजादे ! हो गया न यकीन ? हम सिर्फ हिन्दुओं का ही गला नहीं सम्भाजी 141

काटते, मुसलमानों का भी उसी तरह खात्मा करते हैं।" "आप हो कौन? दिल्ली के बादशाह के सूबेदार या लुटेरे पिंडारियों के मुखिया ? यह अत्याचार तुरन्त बन्द करो ! नहीं तो - ?" "नहीं तो क्या कर लोगे ?" दिलेरखान ने मुस्कराते हुए पूछा। शम्भूराजा के पूरे शरीर को मानो बिच्छू डंक मार गया हो। वे आँखें फाड़े अपने बिस्तर पर बैठे थे। उनकी वह विकल अवस्था देखकर दुर्गाबाई और राणूबाई के होश उड़ गये। कोल्हू में जिस प्रकार गन्ने को निचोड़ा जाता है उसी प्रकार शम्भूमहाराज का मन आक्रान्त हो रहा था। उन्होंने कहा, "दुर्गा, हम अपने ही हाथों से अपना क्या कर बैठे ? यह दिलेरखान अब चुप नहीं बैठेगा। वह इसी तरह हमें पन्हाला तक खींचकर ले जाएगा। वहाँ भी वह भूपालगढ़ जैसा ही नाच करेगा और हमें जन्म जन्मान्तर के लिए बदनाम कर देगा।" दो ही दिनों में शम्भूमहाराज को बहादुरगढ़ से एक गुप्त पत्र मिला। यह जानकर कि यह पत्र मियाँखान का ही लिखा है, शम्भूमहाराज आनन्दित हो उठे। मियाँखान ने राजाजी को लिखा था- "मेरे प्यारे दोस्त शम्भूमहाराज ! सिर्फ आपके एहसान से मेरी दोनों लाड़ली बेटियों के हाथ में सगाई की मेहँदी लगी। आजकल जब भी मैं छोटी उम्र में ही मर गये अपने बेटों की सूरत याद करता हूँ तब महाराज आपकी ही तस्वीर मेरी आँखों के सामने आती है। यह खत इतनी जल्दी भेजने की दो वजहें हैं। एक यह खुशखबरी है कि दिल्ली के शाही फरमान ने मुझे बेगुनाह घोषित कर दिया है। जल्दी ही मेरी रिहाई हो जाएगी। लेकिन उन्हीं कर्मचारियों से यह भी मालूम पड़ा कि आने वाले दो-चार दिनों में आप गिरफ्तार हो जाएँगे। यह बहुत बुरी खबर है। इसी काम के लिए बादशाह के खास शैतान औरंगजेब से पाँच हजार की फौज लेकर कब के निकले चुके हैं। आपको हमेशा के लिए कैद करके हाथ-पैर के नाखून निकालकर चिड़ियाघर के मजबूर शेर की तरह जिन्दगी भर नचाने और शिवाजी जैसे आपके महान पिता का जीना हराम कर देने का औरंगजेब का पक्का इरादा है। याद रखो दिलेरखान सिर्फ औरंगजेब का गुलाम है। वह कभी भी किसी का दोस्त नहीं बन सकता। एक पल की भी देर नहीं कीजिए। शम्भूमहाराज ! भाग जाइए, भाग जाइए।" मियाँखान का पत्र पढ़कर शम्भूमहाराज के सिर के बाल खड़े हो गये उनकी रातें शत्रु बनकर शैतान की तरह परेशान करने लगीं। एक ओर बड़े महाराज की दुखी मनःस्थिति उन्हें परेशान कर रही थी तो दूसरी ओर भूपालगढ़ पर टूट कर गिरे सात सौ हाथ और लँगड़े हो गये पाँव भूत बनकर उनकी आँखों के सामने मशाल की तरह नाचते रहते थे। शिवाजी महाराज के अधिकार से बाहर निकला बहादुरगढ़ का वह हाथी युवराज के सारे शरीर को मसल रहा था। उनके उद्गार निकले—"नहीं 142 :: सम्भाजी

नहीं चाहिए यह अपमानित जिन्दगी! दुश्मन की सलाखों के पीछे तड़पते रहना और सूर्य जैसे पिता को जीवनभर दुखी करना, यह भी कोई जिन्दगी है?'' अपनी आँखों की ज्योति जलाये हुए शम्भूराजा रातभर मन्दिर के सामने बैठे रहे। वहीं पर दुर्गाबाई भी आ गयीं। उन्होंने आँसुओं से भीगा अपना चेहरा शम्भूराज के पैरों पर रख दिया। उनका धीरे-धीरे सिसकना फूटकर क्रन्दन बन गया। "युवराज, हमारी चिन्ता से ही आपके जैसे वीर के पैर यहाँ अटके हैं। हमारे कारण ही आपके पंखों में उड़ान की शक्ति नहीं आ रही है। आपका कलेजा फटता है। लेकिन महाराज हम यहाँ की यातनाभरी जिन्दगी में मर भी गये तो कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं है। किन्तु आपकी रक्षा से शिवाजी महाराज का स्वराज्य टिकने वाला है।" शम्भूमहाराज ने आँसू पोंछ लिया। वे कुछ निश्चय करके उठे। दुर्गाबाई के गर्भ में छः सात महीने का बच्चा था। पाँव भारी होने के कारण उनका पूरा शरीर सूजा था। उनका पीला रंग, भारी हो गया शरीर और काजल अँजी आँखें देखकर संभाजी राजा का मन भर आया। अपने भारी शरीर को लेकर दुर्गाबाई आगे बढ़ीं। वे गिर न पड़ें, इसलिए उन्हें सँभालने के लिए शम्भूमहाराज अपने आँसू पोंछते हुए आगे बढ़ आए। उन्होंने दुर्गाबाई के तप्त शरीर को बाँहों में भर लिया। दुर्गाबाई ने कहा, "महाराज हमारी ममता में आप इतना क्यों उलझ रहे हैं?" "दुर्गा कैसी बुरो तकदीर है हमारी? हम शृंगारपुर से बाहर निकले तो येसूबाई के पेट में भी बच्चा था। आज ऐसी ही हालत में तुम्हें शैतानों के हाथ मे छोड़कर हम स्वराज्य में वापस चले जाएँ? क्या तुम यही सलाह मुझे दे रही हो? अपनी ही लताओं पर खिलने वाली कलियों को अपनी आँखों से देखने का सौभाग्य इस अभागे शम्भू को कभी मिलेगा कि नहीं?" भोर होते ही शम्भूमहाराज ने राणूबाई को जगाया। वे पहले से ही जग रही थीं। उन सभी का भाग्य अँधेरे की खाई में था। अपनी बड़ी बहन को समझाते हुए शम्भूमहाराज बोले, "कल परसों जब भी अवसर मिलेगा मैं घोड़े को बाहर निकालूँगा। साथ शृंगारपुर के अश्वदल के दो सौ बहादुर सवार होंगे। पलक झपकते ही हम दोनों को यहाँ से बाहर निकलना है।" "हम दोनों को? मतलब ?" राणूबाई चौंक गयी। "दुर्गा यहाँ खान की छावनी में ही रहेगी।" "शम्भूराजा! ऐसी पाँव भारी अवस्था में उनकी देखभाल कौन करेगा?" णू ने प्रश्न किया। "पागल हो गयी हैं दीदी आप? चार दिन की मेहमानी के लिए जीजाजी ने पको मायके भेजा था। आपको यहाँ छोड़कर हम किस मुँह से वापस स्वराज्य में सम्भाजी : 143

जाएँ? शादीशुदा बहन को ससुराल वाले मायके क्यों भेजते हैं? इसीलिए न कि वह नयी साड़ी पहनकर वापस जाए? जनानखाने में छोड़ देने के लिए नहीं।" राणूबाई शम्भूराजा के समीप आयी। उनका हाथ अपने माथे पर रखते हुए बोली, "शम्भूभाई! शान्त हो जाओ! मेरी चिन्ता न करो। मुझे साथ लेकर जाने की जल्दबाजी में तुम खुद मुगलों की कैद में जिन्दगी भर के लिए अटक जाओगे। वाई के जाधव को मेरी जैसी बहुएँ बहुत मिल जाएँगी, किन्तु शिवाजी महाराज के स्वराज्य को आगे सँभालने वाला दूसरा संभाजी नहीं मिलेगा। क्षमा करो। समय मत गँवाओ। अपनी बड़ी बहन के पल्लू में सिर्फ इतनी दया की भीख दो और आप अपने स्वराज्य में वापस चले जाओ।" बड़ी देर तक शम्भूराजा बहुत देर तक शून्य मनःस्थिति में बैठे रहे। उन्हें सूझ ही नहीं रहा था कि क्या करे? और क्या न करें? राणूबाई पुनः शम्भूराजा के पास आयीं और उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोलीं, "शम्भूराजा, पिताजी का हृदय आपके लिए कितना पीड़ित होता है? इसका शायद आपको पता नहीं है। उन्होंने कई बार मुझसे कहा है, "हमारे शम्भू का हृदय यदि केवल राजा का होता तो हमें कोई चिन्ता न होती। किन्तु उनके हृदय का एक हिस्सा राजा का है तो दूसरा हिस्सा कवि का। ऐसे व्यक्तियों के साथ बड़ा धोखा होता है। यदि इन्हें क्रोध आ गया तो हाथियों के झुंड की तरह गरजते हुए हमला कर देंगे। किन्तु एक बार यदि उनके मन के भाव तरल होकर प्रवाहित हुए तो झरने की तरह प्रवाहित ही रहेंगे। राजा के लिए इस तरह प्रवाहित होना ठीक नहीं है। राजा के लिए ईर्ष्या, प्रतिशोध जैसे विष के कुम्भ को उचित समय की प्रतीक्षा में सँभालकर रखना आवश्यक होता है। हमारे शम्भू के पेट में ऐसा कुछ भी पचता नहीं। इसीलिए हमें उनकी चिन्ता हमेशा लगी रहती है।" शम्भूमहाराज बहुत देर तक वैसे ही बैठे रहे। तब उनका हाथ खींचकर उन्हें उठाने का प्रयास करते हुए राणूबाई ने कहा- "उठो, शम्भूराजा! पिछले कुछ दिनों से भाग्य हमारे साथ जुआ खेल रहा है। जबसे हम कृष्णा नदी पार करके यवनों के प्रदेश में आये हैं तब से पिताजी की स्थिति क्या हो रही होगी? एक भी दिन उन्हें चैन की नींद नहीं आयी होगी। इस बात का मुझे पूरा विश्वास है।" "परन्तु दीदीजी ! सबके रोकने के बावजूद आप मेरे साथ यहाँ क्यों आयीं ?" "क्यों आयी? मुझे भी नहीं पता। ऐसे ही हमारा मन हमें कोस रहा था। बेवजह आपकी चिन्ता सता रही थी। इसीलिए यहाँ चली आयी। किन्तु शम्भू अब समय व्यर्थ में न गँवाओ। चलो तैयार हो जाओ। शम्भूभाई क्या आप जानते हैं कि 144 .. सम्भाजी

अपने यहाँ बहुत से किलों को बनाते समय क्या किया जाता था?'' "क्या ?" "पुराने जमाने में कभी कभी किले बनाते समय उनकी दीवारें गिर जाती थीं, बुर्ज गिर जाते थे! उस निर्माण को पक्का करने के लिए नींव में नरबलि दी जाती थी। स्त्रियों और बच्चों के रक्त में चूना घोला जाता था। तो मेरे भैया आप अपनी इस बहन और लाड़ली की चिन्ता न करें। भविष्य में यदि भाग्य ने साथ दिया तो हम सब अवश्य मिलेंगे। किन्तु वैसा नहीं हो पाया तो भी चिन्ता की कोई बात नहीं। हम मर गये तो भी कोई बात नहीं लेकिन शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज के स्वराज्य का बुर्ज हर तूफ़ान से टकराते हुए ऐसे ही खड़ा रहना चाहिए।" छह दिलेरखान की नींद अब सच में उड़ गयी थी। इतनी बड़ी फौज के सामने मराठों के युवराज के ऊपर तलवार उठाने के साहस से दिलेरखान घबरा गया था। उसी सुबह मुनासिबखान दिलेरखान से मिलने के लिए आया। उसके साथ उसका भतीजा बालेखान भी था। कुछ महीने बीजापुर की नौकरी छोड़कर अपने भतीजे के साथ दिलेरखान से आ मिला था। मुनासिब के पास अपनी पाँच हजार की फौज थी। दिलेर खान ने चिन्तित स्वर में पूछा- "मुनासिब चाचा आगे क्या हुआ?'' "खानसाहब आपके हुक्म की तामील हो गयी। संभा के प्रदेश से आये हुए दो सौ मराठे घुड़सवारों को हमने अलग कर दिया।" "बहुत अच्छा।" "उनके घोड़ों को हमने अपने क़ब्ज़े में ले लिया और उन दो सौ नामर्दों को अपने बेगारियों में सम्मिलित कर लिया।" मुनासिबखान से यह समाचार सुनकर दिलेरखान बहुत प्रसन्न हो गया। उसने बगल में रखी सुराही का शरबत गटाक से पी लिया। अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोला, "संभा के खून में खूब जलवा है। कल उसका साहस देखकर मैं सम्भाजी :: 145

हैरान हो गया था।" "लेकिन खान साहब इस आग को कब तक सँभालना है?" "मुनासिब चाचा कल सुबह तक औरंगाबाद की पाँच हजार की फौज यहाँ पहुँच जाएगी। साथ में अपने पाँच हजार सैनिक दे देंगे फिर इस आग के अंगार को भेज देंगे औरंगजेब के पास। एक बार आलमगीर साहब के क़ब्ज़े में कोई चीज तो भभकती आग भी पानी पानी हो जाती है। औरंगजेब की इस शक्ति को सारी दुनिया जानती है।" दूसरे दिन दोपहर में फौज आगे बढ़ रही थी। दिलेरखान ने जानबूझकर संभाजी को अपनी बगल में चल रहे हाथी के हौदे में बिठाया था। वह चाहता था कि कल के झगड़े का क्रोध उनके मन से निकल जाय। कम-से कम उन्हें कैद करने के लिए बादशाह की फौज से निकला घोड़ों का दल जब तक यहाँ नहीं पहुँचता, उन्हें रोक रखना था। दिलेरखान उनके साथ मीठी मीठी बातें कर रहा था। उन्हें खुश रखने का प्रयास कर रहा था। फौज ने सामने की एक पहाड़ी पार की। हाथी घोड़े पहाड़ी उतरने लगे। शम्भूमहाराज की दृष्टि बगल की घाटी में पड़ी। वहाँ एक पानी से भरा तालाब था। उसकी बगल में एक झरना भी दिखाई पड़ा। तालाब के किनारे एक छोटा सा पत्थरो का बना पुराना शिवमन्दिर था। युवराज ने हाथी को रोकने के लिए कहा। उन्होंने हँसते हुए दिलेरखान से कहा, "खानसाहब बहुत दिन हो गये मैंने भगवान का दर्शन नहीं किया। यहाँ कुछ समय ठहरिये। मेरी इच्छा हो रही है कि स्नान करके भगवान के दर्शन कर लूँ।" दिलेरखान ने प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए कहा, "युवराज इस तरह विनती क्यों करते हैं? हमें भी दोपहर में आराम के लिए रुकना ही था, कीजिए आप अपनी पूजा।" दिलेरखान बहुत प्रसन्न था। उसका पक्का विश्वास था कि उसके कब्जे में रहते हुए संभाजी का यह आखिरी स्नान है। फौज वहीं रास्ते के आसपास, आगे- पीछे जहाँ भी जगह मिली आराम के लिए पसरने लगी। संभाजी राजा अपने खास सेवकों के साथ तालाब की ओर गये। पहले महादेव को प्रणाम करके फिर बगल के तालाब में उतरे। आज शम्भूमहाराज का मन बहुत प्रसन्न था। उन्होंने अपने सेवकों को भी कपड़े उतारकर पानी में प्रवेश करने के लिए विवश किया। स्वयं युवराज हाथ आगे-पीछे मारते हुए, पानी उड़ाते हुए, प्यार से जल-क्रीड़ा का आनन्द ले रहे थे। उनके पहरे वाली मुनासिबखान की फौज झरने के किनारे दोपहर का भोजन ले रही थी। किन्तु सावधानी के लिए मुनासिब ने कुछ बहादुर सैनिकों को तालाब के किनारे 146 संभाजी

पहरे पर खड़ा किया था। उसी तालाब के किनारे पाँच साधु स्नान कर रहे थे। उनका मन्त्रपाठ चल रहा था। बीच बीच में वे 'जय शंभोऽऽ' कहकर पुकार रहे थे। पहले तो शम्भूमहाराज का ध्यान उनकी ओर नहीं गया। फिर कानों तक एक आवाज पहुँची—'शंभोऽऽ शिवा का शंभोऽऽ।' शम्भूमहाराज का ध्यान उनकी ओर गया। उन्होंने ध्यान से देखा तो उनके शरीर में बिजली दौड़ गयी। उन पाँच साधुओं में एक थे जोत्याजी और दूसरे रायप्पा। राजा की आँखें चारों ओर घूमीं। पहरेदारों को शक न हो इस दृष्टि से वे धीरे धीरे तैरते हुए आगे को सरकने लगे। साधुओं के पास पहुँचते ही मन्त्रपाठ के बहाने से जोत्याजी ने धीमे स्वर में कहा, "मन्दिर के पीछे हमारे सिर्फ चार घोड़े हैं। पहाड़ी के पीछे जंगल में सिर्फ साठ शृंगारपुरी घुड़सवार हैं। इन्हीं के भरोसे आपको साहस करना है।" शम्भुराजा ने पानी में सूर्य को नमस्कार किया। वे पानी में बार बार डुबकियाँ लेने लगे। पहरे पर खड़े सिपाही उनकी ओर तारीफ की दृष्टि से देखने लगे। बहुत देर तक शम्भूमहाराज पानी से बाहर नहीं आये तब पहरेदार और सिपाही हैरान होने लगे। समीप के मन्दिर के पीछे से कुछ शोरगुल सुनाई पड़ा—'संभा निकल गयाऽऽ. संभा भाग गयाऽऽ, संभा गयाऽऽ।' दिलेरखान की छावनी में हलचल मच गयी। दिलेरखान क्रोध से नाचने लगा। किन्तु उसी समय हुक्म की प्रतीक्षा किये बिना ही बालेखान अपनी पाँच हजार की सेना लेकर जंगल में घुस गया। दिलेरखान क्रोध से आग बरसाने लगा। इसी समय बूढ़ा मुनासिबखान घोड़ा दौड़ाते हुए दिलेरखान के सामने आ गया। उसके चेहरे पर चिन्ता की कोई रेखा नहीं थी। दिलेरखान मुनासिबखान से उखड़कर बोला—"ये क्या हँसी की बात है?" "नहीं तो क्या हुजूर?" मुनासिब ने कहा, "संभा जैसा बेवकूफ लौंडा किसी ने देखा तक न होगा। हुजूर मैंने पूरी जानकारी ले ली है। गिने चुने पाँच साधु उसके साथ हैं। हमारा बालेखान पाँच हजार की फौज लेकर जंगल में घुसा है। भाग भागकर भी वह बेवकूफ संभा कितना भागेगा? पूरा जंगल छान मारता हूँ। एक-दो घंटे में ही उसकी बोटी-बोटी करके रूमाल में बाँधकर ले आता हूँ।" मुनासिबखान का घोड़ा आगे बढ़ा ही था कि दिलेरखान चिल्लाया, "ठहरो मुनासिब मियाँ।" "क्यों? खान साहब?" "संभा को जिन्दा पकड़कर ले आइए। उसे मारना मत। नहीं तो शाहंशाह को यकीन नहीं होगा कि लाश संभा की ही है। आफत आ जाएगी।" सम्भाजी :: 147

मुनासिबखान अपने साथ के सैनिकों को लेकर जंगल में घुसा। किन्तु शम्भूराजा और उनके साथी तेज गति से आगे निकल चुके थे। उनका पीछा करते हुए बालेखान की फौज बहुत आगे जा चुकी थी। यह जानकर मुनासिब हैरान हो गया। अपने घोड़े को बार-बार ललकारते हुए, उस जानवर को अपनी जाँघों से दबाते हुए वह पवन की गति से आगे निकल रहा था। शाम होने को आ गयी। परछाइयाँ जंगलों में उतरने लगीं। नाचता हुआ मोर जिस प्रकार अपने पंख समेटता है उसी प्रकार सूर्य की एक-एक किरण विलुप्त हो रही थी। सूर्य डूब चला। एक पहाड़ी पर से मुनासिबखान ने घाटी में देखा। वहाँ एक बड़ा झरना बह रहा था। झरने के किनारे शम्भूमहाराज को एक पेड़ के तने से बाँधा गया था। जंगल में आकर उनसे मिले साठ शृंगारपुरी सैनिकों में से आधे मरकर एक ओर गिरे थे। पीछा करते समय बड़ी लड़ाई हो चुकी थी, यह साफ साफ दिखाई पड़ रहा था। शम्भूराजा का सारा शरीर खून से लथपथ था। चेहरा भी खून लगे खरोंचों से भर गया था। उनकी खरोंचों और उनके शरीर के घावों से स्पष्ट दिख रहा था कि इस बहादुर ने कम-से-कम साठ-सत्तर लोगों को घायल किया होगा। उनका और बालेखान का जोरदार झगड़ा चल रहा था। उनके झगड़े को मुनासिबखान ऊपर से देख रहा था। बालेखान हाथ में तलवार नचाते हुए संभाजी राजा के सामने नाच रहा था। दोनों क्रोधित होकर एक-दूसरे को गालियाँ दे रहे थे। यह दृश्य देखकर मुनासिब का कलेजा हिल गया। वह अपने भतीजे की ओर देखकर चिल्लाया—"बेटे बालेखानऽ ठहरोऽऽ। आगे मत बढ़ोऽऽ। खुदा के वास्ते बेटेऽऽ।" ऐसा कहते हुए उसने घोड़े पर से नीचे छलाँग मारी। घोड़े पर जो हथियार लदे थे उसमें से पल्लेदार भाला हाथ में लिया। भाले के डंडे का सहारा लेते हुए सीधे रास्ते से उतरते सरकते नीचे जाने लगा। अभी भी बालेखान और शम्भूराजा के झगड़े की ऊँची आवाज उसके कानों तक पहुँच रही थी। सरकते सरकते नीचे जाने वाला मुनासिबखान बीच-बीच में बोल रहा था, "बेटे बालेखान कुछ मत करना। मैं आ रहा हूँ, बेटे।" मुनासिब ढलान उतरकर कुछ ही दूर गया था कि उसने देखा। कि क्रुद्ध बालेखान आगे बढ़कर बँधे हुए शम्भूराजा को मुट्ठियों से मार रहा है। उन्हें गालियाँ दे रहा है। क्रोध-उन्मत्त होकर उसने शम्भूमहाराज की दाढ़ी पकड़कर खींची। शम्भूराजा बहुत चिढ़ गये। उन्होंने बालेखान के मुँह पर जोर से थूक दिया। इस पर बालेखान अपने क्रोध पर नियन्त्रण खो बैठा। उसने म्यान से अपनी तलवार खींच ली। तलवार की नोक से शम्भूराजा के सिर पर वार करने ही वाला था कि पीछे से एक गर्जना आयी—"बालेखानऽऽ बेटेऽऽ।" उसके ठीक बाद तीर की गति से 148 :. सम्भाजी

भाला आया और उमकी नोक तेजी से बालेखान की पीठ में घुस गयी। देखते- देखते बालेखान अपने ही खून के गड्ढे में गिर गया। स्वयं शम्भूमहाराज, उन्हें घेरकर खड़े हजारों मुमलमान सैनिक और भाला फेंकने वाले मुनासिबखान सभी आश्चर्यचकित रह गये। दूसरे ही क्षण मुनासिब बालेखान की ओर झपटा। खून से लथपथ बालेखान का शरीर उसने बाँहों में भर लिया। उसे पानी पिलाने का भी व्यर्थ प्रयास किया। बालेखान तो कब का समाप्त हो चुका था। मुनासिब उसके लिए दहाड़ें मारकर रो रहा था। मुनासिबखान के अनेक फौजी साथी आगे आये। उन्हें अपने मालिक पर बहुत क्रोध आया। उनमें से एक ने बहुत सन्तप्त होकर पूछा—“चाचा, एक जहन्नमी काफिर को बचाने के लिए आपने यह क्या किया? अपने भतीजे को ही मार डाला?" बालेखान के शव को देखकर एकबार पुनः मुनासिब को रोना आया। आँसू बहाते हुए वह बोला, “जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ। दोस्तोऽऽ यह तुम्हारा मुखिया था और मेरा इस दुनिया में एकलौता वारिस।” "वही कह रहा हूँ खानसाहब ! एक मूर्ख काफिर के लिए अपने ही बच्चे की हत्या करने की आपको क्या ज़रूरत थी?” "क्यों बेटे, सिर्फ एक मुर्दा देखकर तुमको इतना बुरा लग गया?" "मतलब?" अपने सहयोगियों पर एक तीखी नजर फेंकते हुए मुनासिबखान गरजा, “अथणी और तिकोता में उस बदमाश दिलेरखान ने भरे चौक में किसकी इज्जत लूटी थी? अनेक औरतों, माँ, बहनों को नंगी करके पेड़ों पर किसने लटकाया था? भूल गये आप लोग? उन बेसहारा औरतों में हिन्दू कम मुसलमान ज्यादा थीं। किन्तु उस दारुण दृश्य को देखकर तुम में से किसी की भी तलवार म्यान से बाहर क्यों नहीं निकली?" "याने?" "उस अत्याचार को देखकर जिसके शरीर का खून खौल उठा था, उस अत्याचारी दिलेरखान पर आक्रमण करने जो व्यक्ति गया था, वह एक ही व्यक्ति था शिवाजी का बेटा। आप में से कोई नहीं था। तब कहाँ थीं अपनी तलवारें? कहाँ चुप बैठी थी यह मर्दानगी?" सभी चुप हो गये। मुनासिब की बात से सभी चकरा गये। उनमें से एक ने अधीर होकर पूछा- "चाचा, आप कहना क्या चाहते हैं?" "बस इतना ही! हम सबकी बड़ी इच्छा थी। इसलिए छः महीने पहले हम सम्भाजी १२१

सब अपनी बीजापुर की चाकरी छोड़कर दिलेरखान से मिल गये। वह हमारी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा गुनाह था। आज औरंगजेब का एक सरदार दक्खिन में आकर हमारी मुस्लिम माँ-बहनों पर इतना अत्याचार कर रहा है तो कल औरंगजेब के आने के बाद क्या होगा?'' “चाचा, आप ठीक कहते हैं।'' सामने से कुछ आवाजें आयीं। “मैं ख़ुदा की कसम खाकर कहता हूँ आज शियापन्थी दक्खिन मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा काफ़िर बादशाह औरंगजेब है। बच्चो! दिल्ली का यह शैतान मराठों का राज्य नेस्तनाबूद करने में कामयाब हो गया तो अपनी बीजापुर और गोलकुंडा की सल्तनतों को एक दिन के लिए भी ज़िन्दा नहीं छोड़ेगा। हम कैसे भूल सकते हैं? पिछले साल बीजापुर की सहायता के लिए शिवाजी महाराज ने दस हजार बैलों की पीठ पर लादकर अनाज भेजा था। औरंगज़ेब ने नहीं। इसलिए कहता हूँ कि औरंगजेब के अत्याचारों से दक्खिनियों को मुक्ति दिलाने के लिए शिवाजी का राज्य बना रहना चाहिए।'' मुनासिबखान ने अपनी कमर की कटार बाहर निकाली। बात ही-बात में उसने शम्भुराजा के सारे बन्धन काट दिये। सामने से उसने अपने कुछ साथियों को पास बुलाया। शम्भुमहाराज को ले जाने के लिए आये हुए लोगों को पच्चीस-तीस नये घोड़े दिये। शम्भुराजा की पीठ पर प्यार से हाथ थपथपाते हुए मुनासिब ने अपने साथियों से कहा, “शिवाजी पर एहसान करने के लिए नहीं, दक्खिन की हिफ़ाज़त के लिए शिवाजी का बेटा सलामत रहना चाहिए। जाऽऽ बेटेऽऽ भाग जा। निश्चिन्त होकर निकल जाऽऽ।'' शम्भुराजा ने ख़ून से लथपथ अपनी बाँहों में मुनासिब को भर लिया। सभी को अलविदा कहा। संभा किस चतुराई से भाग गया? दिलेरखान को क्या बताया जाय? यही सोचते-सोचते बीजापुरी फौज वापस लौटी। फौजी बालेखान का खून से भीगा शव कन्धे पर उठाये दफ़नाने के लिए ले जा रहे थे। साथ में घोड़े पर चल रहा मुनासिब अपने वारिस के शव को बार-बार देख रहा था। वह अपनी बूढ़ी दाढ़ी पर निरन्तर गिर रहे आँसुओं को पोंछने का प्रयास कर रहा था। 150 · सम्भाजी

जीव ही शिव

एक

कल देर रात शिवाजी महाराज की पालकी पन्हालगढ़ पर आ पहुँची थी। उस समय सिंह द्वार पर तोपें दागी गयी थीं। महाराज का स्वागत किया गया था। उसी भीड़ में सामने की ओर शम्भूमहाराज खड़े थे। शिवाजी महाराज ने उन्हें अपनी बाँहों में भर लिया। वे अपने काँपते हाथों को उनकी पीठ पर फेरने लगे। मन भर आया। उन्हें बहुत सी बातें करनी थीं। किन्तु इस भीड़ के सामने खुलकर बातें करना उचित नहीं था। शम्भूमहाराज को पन्हाना आये एक महीना बीत चुका था। वे प्रायः बाहर नहीं निकलते थे। उनके जैसा सुयोग्य युवराज मुसलमान शत्रुओं से जाकर मिल जाय, इस कल्पना से ही प्रजा को बड़ा दुख हो रहा था। यदि वे सहज रूप में घोड़े पर बाहर निकलते तो भी लोग उन्हें कुछ विचित्र दृष्टि से देखते थे। इसलिए महल के भीतर बैठे रहना ही युवराज को ठीक लगता था। कल रात तक शम्भूमहाराज के मन में भयंकर भ्रम बना हुआ था। वे भीतर ही भीतर बहुत तड़प रहे थे। तोप के सामने जाना उतना भयानक नहीं था जितना स्वराज्य द्रोह जैसा भयानक अपराध करके पिता के सामने जाना। कौन सा मुँह लेकर पिता के सामने जाएँ? किन्तु कल रात को पिता का आलिंगन शम्भू महाराज को बहुत आह्लादकारी और आश्वस्तिकारक प्रतीत हुआ। सुबह संभाजी राजा ने अपने शरीर पर से चादर हटाई। खिड़कियाँ खोल दीं। प्रभात की शीतल हवा अन्दर आकर उनके शरीर का स्पर्श करने लगी। रात समाप्त हो रही थी। मस्तिष्क के गर्भगृह में पवित्रता की घंटियाँ बज रही थीं। युवराज की स्मृति अतीत की ओर मुड़ रही थी। तेरह वर्ष पहले आगरा के वे तूफानी दिन याद आ रहे थे। मराठा साम्राज्य के शिवराय भयंकर जानलेवा संकट में फँस गये थे। उस समय शम्भूमहाराज की उम्र सिर्फ नौ वर्ष थी। उनके चेहरे की शिशुता समाप्त नहीं सम्भाजी :: 151

हुई थी। तब भी अपनी कमर में छोटी-सी तलवार सँभाले हुए दिल्ली के शाहंशाह के दरबार में उपस्थित थे। शिवाजी महाराज के लिए आगरा के उस शाही दरबार में आने की यात्रा बहुत अपमानजनक थी। मराठों के छत्रपति को साधारण पाँच हजारी मनसबदार के खूँटे से बाँधा गया था। उस अपमान से शिवाजी महाराज बहुत क्रुद्ध हुए थे। उन्होंने भरे दरबार में विरोध की फुफकार व्यक्त कर दी थी। किन्तु ऊँचे आसन पर बैठा बादशाह शान्ति से जपमाला के मनके गिन रहा था। अन्त में दरबार समाप्त हुआ। क्रोध से काँपते हुए शिवाजी महाराज रामसिंह के साथ जयपुर महल की ओर आये। भरे दरबार में दिये गये अपमान के जलते दाग से शिवाजी का शरीर अभी भी जल रहा था। उनका दम घुट रहा था। उनके क्रुद्ध चेहरे की ओर संभाजी मासूम आँखों से देखते रह गये थे। शिवाजी ने दरबार में जो विरोध प्रकट किया था, औरंगजेब के दरबारियों ने उस पर पूरा ध्यान दिया था। दरबार ने अनुमान लगा लिया था कि यह अभिमानी मराठा इतने मे ही सन्तुष्ट न होगा, वह कल्पना से परे कुछ असम्भव कदम उठाएगा। यही कारण था कि शिवाजी और संभाजी के जयपुर महल में पहुँचने के साथ ही वहाँ पर पीछे पीछे घुड़सवारों के दल और साँडिनियों के दल भी पहुँच गये। महल का घेराव कर लिया। शिवाजी महाराज ने झरोखे से देखा तो लगा कि महल के चारों ओर मानो अस्त्र-शस्त्रों का जंगल उग आया है। वह समय आपातकाल का था। महाराष्ट्र की धरती आगरा से सैकड़ों कोस की दूरी पर थी। आसपास कोई भी अपना लगा सगा नहीं था। औरंगजेब जैसा उल्टे दिमागवाला असुर सीने पर पाँव रखकर खड़ा था। पलभर को महाराज को लगा जैसे उनकी सारी शक्ति ही समाप्त हो गयी। सब कुछ समाप्त हो गया। पहरे पर लगी मशालें भयवह लगने लगी थीं। दुश्मन के घुड़सवार सैनिक महल को घेर कर ऐसे खड़े थे, जैसे भूतों के समूह ने घेरा डाल रखा हो। बड़े महाराज फूट-फूटकर रो पड़े। उनकी गोरी और लम्बी लम्बी उँगलियों से भी जैसे आँसू टपक रहे थे। इतने में ही एक छोटा सा हाथ उनके लम्बे लम्बे बालों में फिरने लगा। उस कोमल और ममता भरे हाथ के स्पर्श से महाराज का शरीर रोमांचित हो गया। उनके सामने नौ वर्ष के भोले-भाले संभाजी खड़े थे। महाराज ने उन्हें बाँहों में भर लिया। पश्चाताप में जलते हुए शिवाजी महाराज ने कहा, "कलेजा फट रहा है रे बेटाऽऽ। इस दुर्दैवी चक्रव्यूह में से मातृभूमि तक जाने का रास्ता कैसे मिलेगा मुझे और तुमको?" बालराजा कुछ नहीं बोले। उन्होंने सिर्फ महाराज का मुँह अपने गुड्डे की तरह अपने पास लेकर उससे प्यार किया। उनको थपथपाया, उनके ऊपर हाथ फेरा, उन्हें प्यार किया। उस स्थिति में भी महाराज को हँसी आ गयी। उन्होंने संभाजी से 152 :: सम्भाजी

पूछा, "वाह ! वाह ! एकदम बड़े आदमी जैसा बर्ताव करने लगा है। ये सब कहाँ से सीखा बेटेऽऽ ?" "जीजा माता के पास ! और कहाँ ?" महाराज ने निश्चय कर लिया कि चाहे जान भले ही चली जाय किन्तु औरंगजेब के अपमानजनक दरबार का मुँह वे दुबारा नहीं देखेंगे। किन्तु यह भी निश्चित था कि ऐसी अहंकारी भाषा और किसी का ऐसा गुरूर औरंगजेब कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। उसके सन्तोष के लिए कुछ तो करना पड़ेगा। इस प्रकार आग्रह करते हुए रामसिंह महाराज के पास बैठे रहे। अन्त में उन दोनों ने एक उपाय ढूँढ़ निकाला। तय हुआ कि शिवाजी महाराज बीमार हो जाने का बहाना करें और उनके स्थान पर छोटे संभाजी राजा औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हों। पहले दिन जब संभाजी दरबार में जाने लगे तो शिवाजी ने स्वयं उन्हें तैयार किया। अन्त में उन्होंने उनके गोरे-गोरे मस्तक पर केसर चन्दन का टीका लगाया। संभाजी के गोल-मटोल चेहरे को देखकर महाराज का मन भर आया। उन्होंने बड़ी ममता से संभाजी के गालों पर, पीठ पर हाथ फेरा। शम्भुराजा हँस पड़े। अपने छोटे-से हाथ में महाराज के हाथ को कसने का प्रयास करते हुए संभाजी बोले, "पिताजी, आप इस तरह परेशान मत होइए। जहाँ- जहाँ भी आप उपस्थित नहीं रह सकेंगे, उस जगह को भरने का प्रयास यह शम्भू अवश्य करेगा।" सवेरे ही बड़े महाराज का सन्देश आया। उन्होंने सवेरे ही शम्भुराजा को गढ़ पर महालक्ष्मी के मन्दिर में बुलाया था। उनके आगमन के लिए महापूजा का संकल्प किया गया था। विधिवत पूजा समाप्त होते-होते बहुत समय निकल गया। अन्ततः पिता-पुत्र दोपहर को ही एकान्त में मिल पाये। बड़े महाराज ने हँसते-हँसते कहा, "शम्भुराजा ! मुसलमानों का साथ छोड़ देने पर भी आप स्वराज्य में वापस लौटेंगे इसमें मुझे शक था और इस चिन्ता ने हमें बेचैन कर दिया था। मुझे लगता था कि वहाँ आने में आप संकोच करेंगे। हो सकता था कि किसी दूसरी जगह चले जाते।" "पिताजी, बहुत दुनिया देखी। अँधेरे में रास्ता चलते-चलते अटक गये। किन्तु फिर अपने ही हाथों से अपना फटा हुआ कलेजा जोड़ लिया। सोचा, सूर्यदेव की ओर ही जाना है तो डरना क्यों?" शम्भुराजा ने कहा। "शम्भू, मैं कहता हूँ कि पहले आप कवि हैं, बाद में युवराज।" शिवाजी महाराज ने बड़े प्यार से कहा। संभाजी राजा को शिवाजी महाराज अपनी आँखों में समा लेने का प्रयास कर रहे थे। एकाएक उनकी आँखों से गालों पर मोती झर पड़े थे। भरे गले से वे दुखी सम्भाजी :: 153

स्वर में बोले, "तो शम्भूराजा आप अकेले ही वापस आये?" "क्षमा करें पिताजी!" शिवाजी महाराज के प्रश्न पूछने पर संभाजी का हृदय विदीर्ण हो गया। पिता-पुत्र दोनों ही बहुत दुखी हो गये थे। संभाजी बोले, "पिताजी, दुर्गा और राणू दीदी से मैंने साथ निकलने के लिए बहुत आग्रह किया। जी-जान लगाकर प्रार्थना की। किन्तु उन्होंने सुना ही नहीं।" "नहीं, नहीं शम्भू बेटे! उन बेटियों का सोचना ही ठीक था। उनको साथ ले आने की कोशिश में आप स्वयं वहाँ हमेशा के लिए अटक जाते। ठीक है शम्भू बेटे! आज नहीं तो कल, माँ भवानी आपके हाथ में शक्ति देंगी। तब अपने मजबूत हाथों से दोनों को छुड़ाकर ले आना बस।" अपने होनहार पुत्र पर दृष्टि डालते हुए शिवाजी महाराज ने कहा, "शम्भू बेटे कर्नाटक युद्ध पर आपको अपने साथ न ले जाकर मैंने आपके साथ बड़ा अन्याय किया। आप ऐसा ही समझते हैं न?" शम्भूमहाराज कुछ हिचकिचाए अवश्य, किन्तु चुप्पी तोड़कर बोले, "क्यों न समझँ पिताजी! मैं जब केवल नौ वर्ष का था तब भी आपने मुझे दूर रखा। पुरन्दर की सन्धि के अनुसार मिर्जाराजा जयसिंह के पास मुझे गिरवी रखा।" "शम्भू बेटे! वे सभी बातें मुझे स्मरण हैं।" शिवाजी महाराज ने कहा। "और थोड़ी याद दिलाता हूँ, पिताजी।" युवराज आगे कहने लगे, "औरंगजेब के शहजादे, तेज-तर्रार मुअज्जम को फोड़कर पिता औरंगजेब से बगावत कराने का काम आपने मुझे सौंपा था। आपने कहा था कि बगावत के लिए मैं उसे मजबूर करूँ।" उस बात को याद करके शिवाजी मन्द-मन्द मुस्कराये। शिवाजी महाराज की प्रसन्न मुद्रा को देखकर शम्भूराज ने बात को आगे बढ़ाया। "क्यों पिताजी? प्रयत्न करने पर भी मुझे उस कार्य में सफलता नहीं मिली। किन्तु केवल ग्यारह-बारह वर्ष की उस उम्र में आपने जिस युवराज पर, औरंगजेब के शहजादे को बाप से अलग करने का जोखिम भरा दायित्व सौंपा था, वही आपका पुत्र बीस वर्ष की उम्र में अपने पिता की उँगली पकड़कर मुहिम पर जाने के लिए अयोग्य कैसे हो गया?" शिवाजी महाराज का चेहरा खिन्न हो गया। उन्होंने कहा, "शम्भू! कर्नाटक की मुहिम पर साथ न ले जाने की घटना मेरे जीवन के लिए एक कड़ुआ अहसास है। आप जब छत्रपति बनेंगे तभी मेरे दर्द को ठीक-ठीक समझ पाएँगे। कभी-कभी राज्य की, समाज की भलाई के लिए अपने प्रियजनों से जानबूझकर अन्याय करना पड़ता है। क्या उतना भी अधिकार आप पर नहीं था मेरा, शम्भू बेटे?" "परन्तु रायगढ़ में तो हमें सुख से रहने दे सकते थे?" रायगढ़ का नाम सुनते ही शिवाजी महाराज चुप हो गये। एक लम्बी आह 154 सम्भाजी

भरते हुए बोले, "शम्भू बेटे! रायगढ़ अब पहले जैसा नहीं रहा। साधारण लोगों की भूख एकदम छोटी रहती है। किन्तु बड़े स्त्री-पुरुषों की प्यास बहुत बड़ी होती है, उसमें भी राज्यलिप्सा जैसी जहरीली प्यास दूसरी नहीं होती। राज्य की प्यास बुझाने के लिए कभी कभी बच्चे भी अपने बाप का गला घोंट देते हैं। माताएँ भी दुश्मन बन जाती हैं। आजकल रायगढ़ में इस तरह की राज्यलिप्सा की लम्बी जबान निकलने लगी है। ये सारी बातें सोचकर ही मैंने आपको वहाँ न रखने का निर्णय लिया था। दिलेरखान के क़ब्ज़े से शम्भुराजा के छूट जाने की महाराज को बड़ी प्रसन्नता थी। उन्होंने कहा, "आप वापस आ गये और हम भाग्यशाली हो गये। पूरे राज्य को सूर्यग्रहण लग गया था। यह तो अपने स्वराज्य का भाग्य अच्छा था, अन्यथा आपको समाप्त करने के लिए औरंगजेब ने पक्का निश्चय कर लिया था। शम्भुराजा, आपके स्वराज्य में वापस आने का समाचार मुझे जालना के रास्ते में ही मिल गया था। उस आनन्द के नशे में मैंने चार दिन में ही जालना की लड़ाई जीत ली थी। वहाँ बड़ी लूट से लदे हुए हाथी और ऊँट झुक गये थे। किन्तु- " "क्या हुआ, पिताजी ?" "यह केवल ईश्वर की कृपा है कि आज हम आपसे मिल रहे हैं।" कुछ खिन्नता और कुछ भयभीत स्वर में शिवाजी महाराज ने कहा। 'क्यों? रास्ते में आपकी तबीयत खराब हो गयी थी क्या?' शम्भुराजा ने चिन्तित होकर पूछा। "शम्भू बेटे, तबीयत की बात छोड़ो। हम जान बचाकर वापस आ गये हैं। यही क्या कम है?" जब लूट के सामान से लदे जानवरों के साथ हम अपनी सेना लेकर जालना से आ रहे थे, संगमनेर घाट के पास, जंगल के बीच में, रणमस्तखान नाम के मुगल सरदार ने औरंगाबाद से बीस हज़ार की फौज लेकर हमारा रास्ता रोक लिया। चारों ओर से हमें घेरकर संकट में डाल दिया। रायगढ़ का राजदंड हम वहाँ खो देते तो क्या होता? किन्तु ऐन मौके पर हमारे सहायक बने वहाँ के घने जंगल और अपने बहिर्जी नाइक। वह जंगल इतना घना था कि तीन दिनों तक उस जंगल में सूर्य की किरण भी हमारे पास तक नहीं पहुँच पायी।" इस प्रसंग को सुनते सुनते शम्भुमहाराज हक्का बक्का हो गये। बड़े महाराज ने आगे कहा, "कितनी भी वीरता हो, उसका क्या लाभ? दुर्भाग्य से यदि हम मुगलों के हाथ लग गये होते तो हमारी क्या इज्जत रहती ? शम्भू बेटे, मनुष्य चाहे जितना भी बहादुर हो, उसके सभी प्रयासों को भगवान का सहारा होना ही चाहिए।" बड़े महाराज बहुत प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। सम्भाजी 155

"हम फिर से मिल गये, यह जगदम्बा की महंती कृपा है। किन्तु एक बात हमेशा याद रखना कि मोह-माया में न फँसते हुए राजा को अनेक बार कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं।" शम्भुराजा ने चकित भाव से महाराज की ओर देखा। महाराज आनन्दित होकर बोले, "जिस समय मैं कर्नाटक की ओर था उस समय आपने गरीब किसानों और मजदूरों के कर में छूट देने का निर्णय लिया, उसकी मैंने पूरी पूछताछ की है। उससे प्रसन्न होकर इस बूढ़े राजा ने अपने युवराज को नहीं, प्रजा के हित में कार्य करने वाले उत्तराधिकारी को शुभाशीर्वाद देने का निश्चय किया।" शम्भुराजा शिवाजी महाराज की ओर आश्चर्य से देखने लगे। तब उनके कन्धे पर हाथ रखकर शिवाजी महाराज ने कहा, "अभी तक औरंगजेब काबुल, कन्धार जैसी अनेक लड़ाइयों में उलझा हुआ था। किन्तु शम्भू, गुप्तचरों से मिली सूचनाएँ बहुत चिन्ताजनक हैं। साल-दो-साल में औरंगजेब बड़ी फौज लेकर दक्खिन में आये बिना नहीं रहेगा। इसीलिए उसने गुजरात, बुरहानपुर और मालवा में भी डेढ़ दो लाख की नयी फौज तैयार कर ली है।" शम्भुराजा बड़े महाराज की ओर देखकर ठठाकर हँसे। गर्व से महाराज की ओर देखते हुए उन्होंने कहा, "पिताजी, अब समझ में आया कि पिछले कुछ सालों से आप फिरंगियों से इतना अधिक बारूद क्यों खरीद रहे हैं?" "बेटे! मेरे सच्चे बारूद तो आप हैं। एक मिर्जाराजा जयसिंह और दूमरा दिलेरखान, ये दो ही सरदार औरंगजेब ने महाराष्ट्र में भेजे थे। उन दोनों ने ही हमारी नाक में दम करके पुरन्दर की अपमानजनक सन्धि पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश कर दिया था। हमारी पीठ पर दहशत की तलवार लगाकर आगरा जाने के लिए विवश किया था। आज तो पूरे स्वराज्य पर दस्तूरखुद औरंगजेब के आक्रमण का भय निर्मित हो गया है। यह नहीं भूलना चाहिए कि आज दुनिया के दो तीन बड़े साम्राज्यशालियों में औरंगजेब एक है। उसका सामना दक्षिण के मैदान में केवल हमारा बेटा कर सकता है। यह घोषित करने के लिए हमें किमी ऐरे गैरे ज्योतिषी की आवश्यकता नहीं है-'बेटाऽऽ, उस कराल काल से जान की बाजी लगाकर लड़! यहाँ के हर जंगल को, पशु पक्षियों को, गरीब बच्चों को, प्रजा को मुक्ति दो'।" शम्भुराजा झट से नीचे झुके। बड़े महाराज के पैर छूकर कृतज्ञभाव से बोले- "पिताजी, आपके आशीर्वाद से मैं इधर का पर्वत भी उधर कर सकता हूँ।" शिवाजी महाराज मुस्कंराते हुए बोले, "बेटा! जूझना, लड़ना मनुष्य के हाथ में होताः है किन्तु नियति सम-विषम चाल और भाग्य की आड़ी-टेढ़ी रेखाओं पर मनुष्ट का वश नहीं होता। भविष्य में आपके और औरंगजेब के युद्ध के समय मैं रहूँ 156 :• सम्भाजी

या न रहूँ, परन्तु मेरे आशीर्वाद और पुण्य कर्म आपका साथ अवश्य निभाएँगे। दो लगभग तीन वर्ष बाद महाराज अपने ज्येष्ठ पुत्र से मिल रहे थे। जिस प्रकार पानी में लाठी मारने से पानी नहीं फटता ठीक उसी प्रकार आत्मीय माया और ममता भी अटूट होती है। अनुभव और अभ्यास से दोनों का दृढ़ मत बन गया था कि पुत्र को ऐसा असाधारण पिता दूसरा नहीं मिल सकता है और वैसे किसी भाग्यवान पिता को इससे अधिक होनहार पुत्र मिलना असम्भव है। इसलिए इन दोनों की दिनचर्या और उनके वार्तालाप को एक अलग ऊँचाई मिल जाती थी। उनकी समझ में नहीं आता था कितनी बात करें और कितनी न करें? प्रातःकाल ही पिता-पुत्र की पालकियाँ किले पर घूमने के लिए निकलती थीं। वे कभी भवानी मन्दिर में रुकते थे तो कभी राज्य की राजकीय गतिविधियों का निरीक्षण करते थे। शाम के समय तो ठंडी हवा खाने के लिए किसी-न किसी तटबन्दी के ऊपर से पालकियाँ निकलती ही थीं। आज शाम को पालकियाँ तीन दरवाजे के पास आकर रुकीं। पिता-पुत्र उस भव्य दरवाजे के ऊपरी छज्जे पर बैठकर पश्चिम दिशा के प्रदेश को देख रहे थे। उस ओर दूर-दूर तक गजापुर और विशालगढ़ के जंगल फैले थे। जैसे कोई भक्त भगवान की शरण में पूर्ण समर्पित होकर, कीर्तन भजन करने लगता है, आजकल उसी प्रकार शम्भूराजा शिवाजी के भक्त हो गये थे। आपस की गलतफहमियों वाली मोम की दीवारें कब की पिघल चुकी थीं। अपने तरुण और सुयोग्य पुत्र को समझदार पिता अपनी ममता की गरमाहट से कर्तव्यपरायणता की शिक्षा दे रहा था। शिवाजी महाराज ने कहा, "आप और छोटे राजाराम दोनों सगे भाई हैं। भाइयों के बीच आपसी लड़ाई का मराठी तरीका छोड़कर आपस में राजी-खुशी से मिलजुलकर रहो। माँ भवानी आप लोगों का कल्याण करेंगी।" "पिताजी! आपके चरणों के आशीर्वाद के अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। केवल दूधभात खाकर भी मैं आपकी और हिन्दवी स्वराज्य की सेवा करता रहूँगा।" शिवाजी महाराज किसी तीव्र विचार से प्रेरित होकर कहने लगे, "बेटे! सम्भाजी :: 157

घोषित करके, ललकारकर, नंगी तलवार हाथ में लेकर सामने से आक्रमण करने वाला शत्रु ठीक रहता है किन्तु अपने पल्लू में छिपे अंगार को ठंडा करने में बड़ी कठिनाई होती है। सामने आने वाले शत्रु को हम एकबार क्षमा कर सकते हैं क्योंकि वह हमारा शत्रु ही है, पर मराठों के इन जमींदारों को हम कभी भी क्षमा नहीं करेंगे।'' "हम समझे नहीं, पिताजी?" "इतनी जल्दी नहीं समझ पाओगे। हमें तो अपने जन्मकाल से ही इन लोगों की आग झेलनी पड़ी है। ये लोग शेखियाँ बघारते हुए हमेशा कहते थे कि इनका सूर्य कुल से रिश्ता है। ये लोग अपनी देहाती कोठियों में खड़े होकर मूँछों पर हाथ फेरते थे। अपने को राजा कहते थे। किन्तु इनकी सारी पीढ़ियाँ अहमदनगर के निजामशाह, बीजापुर के आदिलशाह और दिल्ली के यवनों की सेवा में ही जीवन बिता रही थीं। गाँव के इन लोमड़ों ने अपनी कोठियों की आड़ में गरीबों की बहू- बेटियों की इज्जत लूटी। मेहनत करने वाले किसानों की फसलें लूटकर अपनी जेबें भरीं। इसीलिए गाँवों की इन गढ़ियों (कोठियों) के साथ जमींदारी को दफन करके स्वराज्य के मन्दिर को खड़ा करना आवश्यक समझा। हमने कानून बनाया कि अपने गढ़ी या व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए कोई तटबन्दी नहीं बनाएगा। मैंने हिम्मत करके पुरानी गढ़ियों को नष्ट कर दिया। उस समय ये जमींदार जितना विरोध कर सकते थे, करते रहे।'' शिवाजी महाराज ये बातें बता रहे थे और शम्भूराजा बड़ी सावधानी से एकाग्र होकर सुन रहे थे। महाराज ने आगे कहा, "अरे यह राज्या का दुष्ट पाटिल कौन था? आज आपका सगा बहनोई फलटण का महादजी निंबालकर मुगलों की फौज में किसकी गुलामी कर रहा है? जावली के मोरे जैसे गद्दार देशद्रोही दूसरी जगह कहाँ मिलेंगे? शृंगारपुर के सुर्वे हों या हमारे दामाद गणोजी शिर्के, ये शरीर से स्वराज्य में रहते हैं किन्तु मन से वे मुगलों के ही साथ हैं।" "इस प्रकार के धोखेबाज स्वजनों के बीच रहते हुए भी आपने स्वराज्य खड़ा किया। पिताजी आप धन्य हैं।" शम्भूराजा ने कृतज्ञ भावना से कहा। "क्या बताऊँ शम्भू बेटे? दुश्मन को खून में नहलाते समय मेरी तलवार तेज से चमक जाती है किन्तु सम्बन्धियों एवं घर के गद्दारों और द्रोहियों पर उठते समय वह शर्म से पानी हो जाती है। इसीलिए कहता हूँ कि इन स्वार्थी मराठों और ब्राह्मण जागीरदारों से भविष्य में भी सावधान रहना।" सूर्य विशालगढ़ की दिशा में डूब रहा था। समुद्र में जैसे तूफान आ जाय और उसमें लहरों की अनेक पहाड़ियाँ बनकर एक-दूसरे से टकराने लगें वैसी ही हलचल महाराज के भीतर मची हुई थी। वे अपने पुत्र को बहुत-सी बातें समझा रहे

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थे। "शम्भू बेटे! राज्यशासन चलाते समय गरीब-से-गरीब प्रजा पर यहाँ तक कि गाय चराने वाले बच्चे से भी श्रद्धा रखो। उन्हें शक्ति दो। मैं अपनी जिन्दगी में यदि सँभल पाया तो इन्हीं लोगों के भरोसे। इन जमींदारों को तो मैंने हमेशा बगल में कंकड़ की तरह दबाकर रखा। गाय-भैंस चराने वालों को भी मैंने सैनिक बनाया। हल चलाने वाले किसानों को भी फौजी बनाया। उनके साहसी हाथों में भाले और तलवारें दीं। उनके भीतर छिपी चिनगारी को जागृत किया। उन्हीं में कोई तानाजी कोई मुरारबाजी पैदा हुआ। ये साधारण लोग ही स्वराज्य के साथ हमेशा निष्ठावान बने रहे।" बोलते बोलते शिवाजी महाराज कुछ क्षण के लिए रुके। फिर शम्भूमहाराज का हाथ अपने हाथ में लेकर उन्होंने कहा, "एक समय था जब सिंहगढ़ का हरा झंडा माताजी की आँखों में काँटे की तरह चुभता था। उसी तरह जंजीरे के किले की सिद्दीकी वहाँ उपस्थिति मेरे हृदय को घायल करती रहती थी। जंजीरे पर भगवा झंडा फहराने के लिए हम आठ बार लड़े, बार बार जूझे। किन्तु उस जलदुर्ग ने हमें सदैव ही धोखा दिया।" "जंजीरा क्या उतना महत्त्वपूर्ण है?" "महत्त्वपूर्ण ?" शिवाजी महाराज की मुद्रा कल्पनामात्र से जवाकुसुम की भाँति अरुणाभ हँसी में बदल गयी। अपने हाथ की मुट्ठियाँ बाँधते हुए ऊर्जस्वित स्वर में बोले, "बेटे, देश-विदेश की व्यापारिक नाड़ियों को अपने पैरों के नीचे दबाकर रखने वाला जंजीरा का वह जालिम किला एक बार अपने अधिकार में ले आइये, फिर देखिए कि अपने स्वराज्य की सीमा किस प्रकार गंगा-यमुना जाकर पहुँचती है?" पहले शम्भूमहाराज ने चार वर्ष तक रायगढ़ पर स्थानीय प्रशासन का कार्य सँभाला था। उनको प्रशासन की बारीकियों, शक्तिशाली बुर्जों, भूमिगत मार्गों की पूरी जानकारी थी। इसलिए अण्णाजी दत्तो जैसे राज्य कर्मचारी चाहते थे कि शम्भूमहाराज की जगह छोटे राजाराम गद्दी पर बैठें जिससे राजाराम को राजनीति सिखाने के बहाने वे अपना हित साध सकें और सत्ता का काजू आराम से खाते रहें। इसके विपरीत प्रजावर्ग और सेना को शम्भूमहाराज ही राजा के रूप में चाहिए थे। शम्भूमहाराज स्वार्थी राजकर्मचारियों के लिए संकट बन चुके थे। दरबारियों की राय थी कि शम्भूराजा को कर्नाटक का राज्य दे दिया जाय और रायगढ़ के साथ मराठी राज्य राजाराम की झोली में डाल दिया जाय। दरबारी ऐसा इसलिए चाहते थे कि उनकी प्रतिष्ठा और उनके राज्याधिकार सुरक्षित रहें। स्वराज्य के बँटवारे की बात सामने आते ही शिवाजी महाराज ने हँसते हुए कहा, "हमारा सम्भाजी :: 159

स्वराज्य किसी जमींदार की अपनी कमाई नहीं है। यह किसी की जागीर भी नहीं है। यह असंख्य लोगों के खून-पसीने से बना एक पवित्र मन्दिर है। दक्षिण की शक्ति, युक्ति और संस्कृति के प्रतीक इस मन्दिर को कैसे बाँटा जा सकता है, शम्भू बेटे?'' शिवाजी महाराज की बात सुनकर शम्भूराजा ने कातर स्वर में कहा, "पिताजी, सत्ता की प्यास मुझे कभी नहीं थी। आप मेरे हाथों में नारियल सुपारी रखेंगे तो भी मैं उसे आपका कृपा-प्रसाद मानकर ग्रहण करूँगा। आपके चरणों की पूजा करते हुए मैं दूध-भात पर भी अपने दिन काट लूँगा।'' गजापुर और विशालगढ़ की ओर सूर्य की सुनहरी किरणें सरक रही थीं। अस्ताचलगामी सूर्य की किरणों के आलोक में शम्भूराजा की मुखमुद्रा बड़ी लुभावनी लग रही थी। उनकी पेच में लगी रत्नमाला का एक छोर लटक रहा था। शिवाजी महाराज ने अपने हाथों से उसे उठाकर पगड़ी में लगा लिया और बोले, "शम्भू ! अपना रायगढ़ का सिंहासन कभी अच्छी तरह से देखा है क्या ?'' "बहुत बार।'' शम्भूमहाराज ने हँसते हुए कहा। "शम्भूराजा ! आज जानबूझकर ये बातें मैं तुम्हारे सामने ला रहा हूँ। पिता की गद्दी युवराज को उत्तराधिकार रूप में सारी दुनिया में मिल जाती होगी। किन्तु रायगढ़ की राजगद्दी दुनिया से अलग है।'' "इसका मतलब ? पिताजी !'' "वही कह रहा हूँ, शम्भू बेटे। उत्तराधिकार के हक से रकाब में पाँव रखकर घोड़ा दौड़ाने की उतावली बिल्कुल मत करो। रायगढ़ के सिंहासन के सामने एकबार पुनः जाकर खड़े हो जाओ। खुली आँखों से उस पवित्र सिंहासन को बार बार देखो। पाँच सीढ़ियों वाले सिंहासन का अच्छी तरह से दर्शन करो। "पहली सीढ़ी को ध्यान से देखोगे तो मोर के कलाप की तरह उस पर बहुत सी आँखें बनी दिखाई देंगी। ये आँखें हैं बारह मावलों और छत्तीस नेरों के किसानों और उनके पशुओं की। यदि ध्यान से उस पहले सोपान की आहट लोगे तो कृष्णा, भीमा, गोदावरी आदि पवित्र नदियों की कलकल ध्वनि और प्रवाही गति आपको सुनाई देगी। "दूसरे सोपान पर तुम पाँव रखोगे तो सह्याद्रि पर्वत, खाई में अथवा समुद्र के तल में बनाये गये साढ़े तीन सौ गढ़ों और दुर्गों के दर्शन होंगे। इन दुर्गों के पत्थरों को यदि समीप से और ध्यान से देखोगे तो वे वीर योद्धाओं के खून से रँगे दिखाई देंगे। "तीसरे सोपान पर तुम देखोगे जीजा माता और उनके साथ मावल की असंख्य बहू-बेटियों के चित्र। इन माँ बहनों ने स्वराज्य के लिए अपना सुहाग लुटा देने में ही गौरव माना। अपने बड़े बेटे को इन्होंने स्वराज्य के लिए प्रसन्नता से 160 :: सम्भाजी