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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

रायगढ़ पर एक "बहुत दिनों से कोई लड़ाई नहीं हुई। इसलिए सारा शरीर शिथिल हो गया है।" ऐसा कहते हुए हंबीरराव ने ठंडे पानी का लोटा उठाया और मुँह से लगाकर गरारा किया। उन्होंने कोयना नदी के किनारे उन्होंने नीचे को देखा। सूर्योदय के साथ ही नदी के किनारे हंबीरराव की बैठक चल रही थी। पास ही किंजल वृक्षों का घना झुरमुट था। दूसरी ओर आधे कोस के फासले पर उनकी सेना का पड़ाव था। बहुत दिनों से एक ही जगह पर रुके रहने के कारण घोड़े, गधे, हाथी आदि सभी जानवर अलसाये हुए खड़े थे। कल रात बड़ी देर से हंबीरराव अपनी तलेबीड़ की हवेली से सेना में वापस लौटे थे। प्रतिदिन 2000 दंड बैठक निकाले बिना हंबीरराव के शरीर में स्फूर्ति नहीं आती थी। दंड निकालते समय उनका तरीका कुछ अलग ही था। जब दंड निकालते समय जमीन पर नाक रखकर शरीर को ऊपर उठाते थे तो कोई पन्द्रह सोलह वर्ष का लड़का उनकी दोनों एड़ियों पर खड़ा हो जाता था। दंड करते समय वह लड़का हंबीरराव की लँगोट के साथ बँधी चाँदी की करधनी को पकड़े रहता था। अपनी पीठ पर यह बोझ सँभाले घंटाभर दंड निकालते रहते थे। इस दीर्घ व्यायाम से जब उनका सीना फूल आता और उनके शरीर से पसीने की धार बहने लगती तब कहीं उन्हें हल्कापन अनुभव होता था। हंबीरराव ने अपनी तलवार के बल पर बड़ी प्रसिद्धि अर्जित की थी। उनके नाम के साथ एक कीर्ति वलय बन गया था। कृष्ण और कोयना के तट के दूध पर पले पुसे हंबीरराव सागौन के तने की तरह लम्बे थे। उनकी कड़ी ऐंठी मूंछें थीं, गर्दन मोटी और मजबूत थी। पूरा शरीर सशक्त था। उनका व्यक्तित्व रोबदार दिखाई पड़ता था। नेसरी की लड़ाई में प्रताप राव गुजर अपनी जिद के कारण अपने साथियों के साथ बहलोलखान के विशाल सेना सागर में कूदकर डूब गये थे। पीछे बच गये सम्भाजी 187

थे हंबीरराव। उन्होंने अपने सहयोगियों का साथ लिया। उन्होंने रूपाजी भोसले और आनन्दराव मकाजी को विशेष रूप से सावधान किया। प्रतापराव की मृत्यु के समाचार से वे निढाल हो गये थे। उन्होंने पीछे हट रही फौज को दृढ़ता से एकत्र किया। जिस तरह शिकारी जंगली सुअरों को आगे की ओर खदेड़ देते हैं, उसी तरह हंबीरराव ने बहलोलखान की सेना को बीजापुर की ओर खदेड़ दिया। शिवाजी महाराज के सौतले भाई ब्यंकोजी राजा ने साम्राज्य के साथ गद्दारी की थी। तब हंबीरराव ने बड़े साहस के साथ तंजौर की सीमा तक ब्यंकोजी का पीछा किया था और उन्हें पराजित किया था। हंबीरराव की प्रशंसा में शिवाजी महाराज कहा करते थे—"एक हंबीरराव के बदले में फिरंगी हमें किलों को ध्वस्त करने वाली पचास तोपें दें तो भी हम उन्हें अपने से अलग नहीं करेंगे।" इस समय सम्पूर्ण मराठी राज्य का ध्यान रायगढ़ के गृहकलह पर केन्द्रित हो गया था। ऐसे समय में हंबीरराव जैसे शक्तिशाली सेनापति के साथ होने या न होने से दोनों पक्षों में निर्णायक अन्तर पड़ने वाला था। इसलिए दोनों पक्षों से हंबीरराव के पास निवेदन के पत्र आ रहे थे। कल रात तलबीड की हवेली से बाहर निकलते समय हंबीरराव की पत्नी रखमाबाई ने साग्रह कहा था। विदाई के लिए एकत्र हुए सभी मित्रों और सम्बन्धियों की भावना को व्यक्त करते हुए रखमाबाई ने कहा था— "सोयराबाई का पत्र आ चुका है। खून का रिश्ता जन्मभर के लिए उपयोगी होता है। बालक राजाराम तो आपका भांजा ही है। राजाराम को गद्दी दिलाने के लिए आप उसके पीछे वटवृक्ष की तरह खड़े रहें।" यह आग्रह रखमाबाई बार बार दोहरा रही थीं। हंबीरराव के चेहरे पर मन्द मन्द मुस्कान बिखरी हुई थी। रात देर से जब हंबीरराव अपने पड़ाव पर लौटे उनके मुंशी ने पन्हालगढ़ से आया लिफाफा उनके सामने रखा। मशाल की लाल पीली रोशनी में हंबीरराव ने संभाजी राजा का पत्र पढ़ा- "क्षत्रिय कुलावतंस श्री राजा शम्भु छत्रपति की ओर से प्रधान सेनापति हंबीरराव मोहिते को दंडवत प्रणाम। मामा साहब रिश्ते में मैं भी आपका भांजा हूँ। भोसले और मोहिते घराने का सम्बन्ध तीन पीढ़ियों का है। पूज्य पिताजी ने प्रधान सेनापति का मुकुट आपके सिर पर क्यों रखा? सोयराबाई का भाई होने के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि महाप्रतापी प्रतापराव गूजर की खाली जगह भरने के लिए आप जैसे एक नर रत्न की आवश्यकता थी। अब पिताजी के चले जाने से हम लोग अनाथ हो गये हैं। जैसा योग्य समझें, निर्णय लें। आप स्वयं सक्षम हैं। मामा जी! और अधिक क्या लिखूँ। बस यही प्रार्थना है कि हमारे सम्बन्ध में कोई दरार न पड़ने पाये।" हंबीरराव का व्यायाम पूरा हो गया था। अब वे पचपन वर्ष के हो रहे थे किन्तु 188 .: संभाजी

उनका जोश और उत्साह यौवन की देहरी पर खड़े तरुणों को भी लज्जित करने वाला था। व्यायाम समाप्त होते ही उन्होंने नदी की ओर छलाँग लगाई। दस-पन्द्रह कदम वे दौड़ते हुए गये, फिर नदी के तट तीन-चार पोरसा गहरे पानी में मल्लाहों के बच्चों की तरह छलाँग लगा दी। नदी की धारा में आड़े तिरछे हाथ मारते हुए प्रसन्नता से तैरते रहे। फिर कछार चढ़कर गीले वस्त्रों में तट पर पहुँच गये। उनके मन में उठने वाली विचार तरंगें अभी भी शान्त नहीं हो रही थीं। उनके नौकर चाकर वस्त्र आदि लेकर खड़े थे। जैसे मेले में कोई पहलवान सजधज कर खड़ा होता है, उसी प्रकार उन्होंने वस्त्रालंकार धारण किया। उनका घोड़ा दुलकी चाल से दौड़ता हुआ पड़ाव पर आ पहुँचा। रास्ते में शिलेदारों और कर्मचारियों का अभिवादन स्वीकार करते हुए हंबीरराव बड़े रौब से अपने डेरे में प्रविष्ट हुए। रूपाजी भोसले और आनन्दराव मकाजी वहाँ बड़ी देर से प्रतीक्षा कर रहे थे। रूपाजी ने निवेदन किया, "सेनापति जी, रायगढ़ से अण्णाजी और मोरोपन्त कल रात में ही उंब्रज पहुँच चुके हैं।" "किसलिए ?'' हंबीरराव ने अनजान की तरह प्रश्न किया। "आप से मान मनौवल करने के लिए। आप के साथ पन्हाला जाकर शम्भुराजा बेडियाँ पहनाना चाहते हैं।" आनन्दराव ने उन लोगों की योजना की जानकारी दी। यह सुनकर हंबीरराव कुछ बोले नहीं। अपनी पहलवानी की नटखटी वे नदी के किनारे ही छोड़ आये थे। फौजी छावनी में समाचार पढ़ते हुए, सैनिकों को आदेश देते हुए उनमें एक अलग ही दबदबा दिखाई पड़ता था। हंबीरराव को इसके पहले लिखे गये शम्भुराजा के एक पत्र की याद आयी। उन्होंने पत्रों का बस्ता खोला। उनकी दृष्टि लिफाफे पर घूमने लगी। उन्होंने पत्र पढ़ा—"क्षत्रिय कुलावतंस श्री राजा शम्भू छत्रपति की ओर से राजश्री हंबीरराव मोहिते प्रधान सेनापति को। तीर्थरूप पिताजी का महानिर्वाण हो जाने से हमारे सिर पर तो आसमान ही टूट पड़ा। ऐसी महाविपत्ति के समय एक ही अच्छी बात हुई। मृत्यु के तीन महीने पूर्व पन्हालगढ़ पर पिताजी का लम्बा साहचर्य मिला। चार-पाँच दिन तक उनके साथ निरन्तर विचार-विमर्श होता रहा। मन में जो दुविधा या किन्तु-परन्तु था, वह मिट गया। मुगलों की ओर चले जाने से मेरे अविवेक को भी पिताजी ने क्षमा कर दिया। तीर्थ रूप पिताजी का मन पहाड़ जैसा विशाल था। उन्होंने मुझे क्षमा ही नहीं किया मुगलों के विरुद्ध नया मोर्चा खोलने का आदेश भी दिया। उन्होंने मेरी जिम्मेदारियाँ भी समझाईं। पिताजी के अचानक चले जाने का कष्ट तो असह्य है। स्मरण होते ही आँखें छलकने लगती हैं। किन्तु फिर भी माँ भवानी की कृपा से पुनः कमर कसकर खड़ा होने का मैंने दृढ़ संकल्प किया है। सम्भाजी :: 189

खेद है कि कुछ मन्त्री और अधिकारी तिरछी चाल चल रहे हैं। उनके दिल में कपट है। वे बालक राजाराम को गद्दी पर बिठाने का घातक विचार माताजी के सिर में भर रहे हैं। अपने स्वार्थ के कारण राजकुल में झगड़ा कराना चाहते हैं। मामाजी! मैं आप का सगा भांजा भले न होऊँ किन्तु हिन्दवी स्वराज्य के निर्माता शिवाजी महाराज का पुत्र तो हूँ। मैं एक दिन उस पापी औरंगजेब का काल अवश्य बनूँगा। बादशाह औरंगजेब बहुत उन्मत्त हो गया है। जजिया कर का हथियार हमारे सिर पर चलाना चाहता है। पिताजी के संकल्पों को पूरा करने की दिशा में हम अग्रसर हैं। इस अभियान में हमें आपके आशीर्वाद की अपेक्षा है।'' शम्भुराजा के संवेदनशील शब्दों ने उस दोपहर में हंबीरराव को बहुत प्रभावित किया था। इसी समय उन्हें समाचार मिला कि मराठी राज्य के महत्त्वपूर्ण प्रधान उनसे मिलने आये हैं। हंबीरराव ने खिड़की का पर्दा हटाकर बाहर झाँका। तपती धूप में एक धूप छाँही घोड़ा आगे बढ़ रहा था। उस पर सवार मोरोपन्त पेशवा बहुत थके दिखाई पड़ रहे थे। धूप में उनकी कनपटी और नाक कुछ अधिक लाल हो गयी थी। जबरदस्ती घोड़े पर बिठाये गये बच्चे की तरह वे बेचैन हो रहे थे। पीछे-पीछे काले कलूटे और गठीले शरीर वाले कहार दौड़ते आ रहे थे। अपने कन्धों पर रखी भारी भरकम पालकी के कारण वे बेदम हो रहे थे। पालकी में हृष्ट पुष्ट देह वाले अण्णाजी दत्तो बैठे थे। पालकी में अधिक समय से बैठे रहने के कारण वे भी उकता गये थे। हंबीरराव ने अपने डेरे से अपने विश्वासपात्र लोगों को भी हटा दिया। अब वहाँ पर अण्णाजी पन्त, मोरोपन्त पेशवा और सेनापति हंबीरराव के अतिरिक्त और कोई भी नहीं था। अण्णाजी और मोरोपन्त को लगा कि आरम्भ में ही कुछ गड़बड़ हो गयी है। इसलिए वे मूल विषय को आरम्भ नहीं कर रहे थे। यह स्थिति हंबीरराव की समझ में आ गयी। इसलिए हंबीरराव ने स्वयं ही आरम्भ किया—‘‘पन्त जिस उद्देश्य से बड़ी अपेक्षा लेकर आप लोग इस डेरे में आये हैं, मुझे नहीं लगता कि आपकी वह मनोकामना पूरी हो सकेगी।’’ आरम्भ में ही ऐसी स्पष्ट नकार मिलेगी, ऐसी तो उन दोनों ने कल्पना तक न की थी। लोग कहते हैं कि पहलवानों का दिमाग घुटने में होता है। इसलिए उन लोगों ने सोचा था कि दाव-पेंच लगाकर आरम्भ में ही हंबीरराव को चित्त कर देंगे। अपनी इच्छा के अनुसार उन्हें तैयार करके सेना के साथ पन्हालगढ़ की ओर भगा देंगे। परन्तु आरम्भ में ही उन्हें मुँह की खानी पड़ी तो उनका मुँह देखने लायक हो गया। अण्णाजी दत्तो ने क्रोध से कहा—‘‘ऐसा कैसे? आपने लिखित वचन दिया है 190 :: सम्भाजी

कि जहाँ हम जाएँगे वहीं आप भी जाएँगे। हंबीरराव हमारी बात सुनिए, आपका ही भांजा गद्दी का अधिकारी होगा। इसमें आपका भी हित है और हमारा भी।'' "नहीं, यह सम्भव नहीं है।" हंबीरराव ने दृढ़ता से कहा। अण्णाजी बहुत क्रुद्ध हुए। हंबीरराव पर दबाव डालते हुए पूछने लगे-"नहीं, नहीं का क्या मतलब? आप राजाराम के मामाजी हो या कंस मामा हो? अण्णाजी की इस उद्धंडता से हंबीरराव जरा भी नाराज नहीं हुए। उन्होंने शान्त स्वर में कहा- "देखिए, अण्णाजी! रिश्तेदारी की बात आपसे अधिक मेरे लिए लाभदायक है। आप तो सरस्वती के पुजारी हैं। आपको हमारे जैसा सिपाही क्या कहेगा। मुझ जैसे खुद्दार व्यक्ति की समझ में तो इतना ही आता है कि भगवान की पालकी के साथ लोग इसीलिए चलते हैं कि गुलाल के कुछ कण उन पर गिरें और वे पवित्र हो जाएँ। सच है न? किन्तु शिवाजी महाराज जैसे महापुरुष के साथ जन्मभर बने रहने पर हमने कुछ नहीं सीखा क्या? हमने अपना भांजा और अपना हित ही पहचाना? आज हमें सन्तुलित दिमाग से इस पर विचार करना चाहिए।" "क्या मतलब?" दोनों ने अपनी आँखें फैला दीं? हंबीरराव ने कहना आरम्भ किया-"आज शिवाजी महाराज जैसा हमारा तारणहार अचानक चला गया। धूल में गिरी उनकी तलवार हमें पुकार रही है। शिवाजी के सच्चे उत्तराधिकारी के रूप में उस तलवार की पवित्रता की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह कि भांजे को राजगद्दी और बहन के राजमाता पद की शहद लगी उँगली मुझे न चटाइए। हमारी बहन को किसी चीज की कमी नहीं पड़ेगी। यदि किसी चीज की आवश्यकता पड़ी तो उसके लिए थैलियाँ खुली रखने में उसका भाई निश्चित रूप से समर्थ है। किन्तु थोड़ी गहराई से विचार करें, अपने मन को साक्षी बनाकर सोचें तो आप स्वयं अनुभव करेंगे कि आज की इस बिगड़ी हुई परिस्थिति में यदि शिवाजी महाराज का नामोनिशान सुरक्षित रखना है तो संभाजी राजा को सिंहासन पर बिठाने के अतिरिक्त हमारे पास दूसरा विकल्प ही नहीं है।" न्यायाधीश अन्तिम फैसला सुनाने और उसके सत्य निर्णय को सुनने के बाद धूर्त लोगों की जैसी दशा होती है, वैसी ही दशा अण्णाजी और मोरोपन्त की हुई। वे निरुपाय बेचारों की तरह दिखाई देने लगे। अण्णाजी ने सिर की पगड़ी उतारकर गोद में रख ली। वे हंबीरराव को क्रुद्ध आँखों से देखने लगे। जैसे उन्हें डाँट रहे हों। मोरोपन्त भी अस्वस्थ हो गये। उन लोगों को कुछ सूझ नहीं रहा था। तब उनकी आँखों में झाँककर, अपनी आँखें वर्तुलाकार घुमाते हुए हंबीरराव कहने लगे-"आपने शंभूराजा को दरबार में अपने पिता के आगे सिर झुकाकर विनम्रता से बैठे हुए ही देखा है। किन्तु वही शंभूराजा जब ज्वालाओं का लिवास धारण कर उतरता है, तलवार लेकर शत्रु पर टूट पड़ता है तो उस अत्यन्त तेजस्वी सम्भाजी : 191

रूप को आप जैसे अभागों ने कभी देखा ही नहीं है। शिवाजी महाराज जब युद्ध के लिए निकलते थे तो दस हजार सैनिकों की टुकड़ी का नेतृत्व शम्भूराजा को सौंपते थे। शम्भूराजा भी ऐसे उपलब्ध अवसरों को गौरवान्वित करते थे। युद्ध क्षेत्र में उनकी उपस्थिति ही दस हजार सैनिकों के बगबर होती है। युद्ध क्षेत्र में जब वे घोड़े को ऐड़ लगाकर जोश में नचाते हैं, तो सामान्य सिपाही के शरीर में ही दस हजार हाथियों का बल पैदा हो जाता है। हाथी-घोड़े जैसे मूक जानवरों को भी बहादुरी के पंख लग जाते हैं। बड़े महाराज गुजर गये इसलिए हमारे शत्रुओं में जोश आ गया है। कल मराठी राज्य के दरवाजे पर औरंगजेब का आसमानी सुल्तानी संकट दस्तक देने लगा तो क्या होगा? ऐसे समय में रायगढ़ के सिंहासन पर ईश्वर की कृपा से प्राप्त शम्भूराजा जैसा वीर सिपाही ही राजा के रूप में चाहिए।" "क्या पागल जैसी बात करते हो, हंबीरराव ?" "अरे आपका भांजा रायगढ़ का राजा..." "छोड़िए अण्णाजी ! भांजा तो क्या, भांजा तो क्या, मेरा अपना बेटा भी होता तो उसे परे हटाकर इस मराठा मावले ने शम्भूराजा को ही सिर झुकाया होता।" इन दोनों को यह अनुमान कतई नहीं था कि हंबीरराव के मुख से शम्भूगजा की प्रशंसा में ऐसा पवाड़ा सुनने को मिलेगा। यही कारण था कि अण्णाजी को कुछ सूझ ही नहीं रहा था। उनका गला सूख गया। उन्होंने लोटे से गटागट पानी पिया। तब कुछ संतुलित हुए। और शान्त स्वर में हंबीरराव से कहा- "अपने दीवानजी को तत्काल मेरे सामने बुलवाइए।" अण्णाजी की इच्छानुसार दीवान रायभान सबनिस डेरे में प्रस्तुत हुए। अण्णाजी ने पुनः बड़ी सूक्ष्मता से हंबीरराव की ओर देखा। पन्त के मस्तिष्क में उठे भीषण तूफान को काबू में रख पाना उनके लिए कठिन हो रहा था। अण्णाजी ने गरजकर कहा-"फौज के दीवान! इस समय कानूनन राजाराम साहब मराठी राज्य के राजा हैं। उनके कानूनी मन्त्री की हैसियत से मैं अण्णाजी पन्त प्रभुणीकर और राज्य के पेशवा मोरोजी पन्त, हम दोनों आपको आदेश देते हैं कि राजद्रोह के अपराध में हंबीरराव मोहिते को हथकड़ी लगाओ। उनकी मुश्कें बाँधकर इसी वक्त खींचते हुए रायगढ़ के बन्दीगृह में ले जाओ।" अण्णाजी ने एक भयानक तोप को पलीता लगाया था। किन्तु वार खाली गया। उनके हुक्म की तामील करने के लिए दीवान अपनी जगह से हिला भी नहीं। इस पर अण्णाजी का चेहरा मिट्टी के बर्तन की तरह काला पड़ गया। अत्यन्त क्रुद्ध होकर मोरोपन्त के साथ वे बाहर निकल गये। उनके साथ रायगढ़ से आयी पाँच हजार की फौज बाहर खड़ी थी। किन्तु इस फौज के चारों ओर हंबीरराव की बीस हजार सेना का सागर फैला हुआ था। फिर भी अपनी सेना की ओर जाते हुए अण्णाजी गरजे- "चलो रे! डेरे में घुसकर हंबीरराव की मुश्कें बाँध लो।" तब तक हंबीरराव 192 :: सम्भाजी

दरवाजे पर आकर खड़े हो गये। अण्णाजी और मोरोपन्त का हुक्म बजाने एक भी सिपाही आगे नहीं बढ़ा। उन दोनों की स्थिति भरे बाजार में हाथ नचाने वाले पागल जैसी हो गयी। हंबीरराव ने उप सेनापतियों को अपने समीप बुलाया और धीमे स्वर में कहा, "रूपाजी! आनन्दराव! इन दोनों को पकड़ लीजिए। इन्हें लेकर आज रात तक पन्हाला पहुँच जाइए। शम्भूमहाराज के सामने यह उपहार प्रस्तुत कीजिए। उनसे कहिए की कल भोर में पहली किरण के साथ यह हंबीरराव पन्हाला पर उपस्थित हो जाएगा।"

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कार्यों के पहाड़ सामने खड़े थे। अनेक प्रकार के कार्यों का झमेला भी बहुत अधिक था। असहयोग के कारण स्वराज्य की बिगड़ी हुई अवस्था को पुनः ठीक करना था। शम्भूराजा पन्हाला पर बहुत सावधान रहते थे। उन्हें नींद नहीं आती थी। उनकी आँखें जलती मशाल की तरह लाल हो गयी थीं; वे अपने निजी महल में आधी रात तक व्यस्त थे। इसी बीच उनके सेवक गयाजी ने अन्दर आकर सूचना दी कि रूपाजी भोसले मिलने के लिए आये हैं। ऐसा कहकर रायाजी बाहर चला गया। शम्भूराजा ने अपना कमरबन्द ठीक किया। गले में पहिनी कौड़ियों की माला से खेलते हुए शम्भूराजा बाहर के दालान में आ गये। रूपाजी ने झट से उठकर शम्भूराजा का अभिवादन किया और बड़ी प्रसन्नता से ऊँची आवाज में बोले, "महाराज हम जीत गये। आपको कैद करने वालों के ही हाथों में बेड़ियाँ पड़ गयीं।" "मतलब ?" आज दोपहर अण्णाजी पन्त और मोरोपन्त को कराड के समीप हंबीररावजी ने कैद कर लिया। उनकी मुश्कें बाँधकर उन्हें ही कर पन्हालगढ़ आये हैं। कल सुबह तक हंबीरराव भी आपकी सेवा में उपस्थित होंगे। "उत्तम! बहुत अच्छा! कैदियों को बन्दीखाने में बन्द कर दो। उन पर कड़ी नजर रखो। बाकी सब कल देखेंगे।" शम्भूराजा ने बड़ी प्रसन्नता से कहा। रायगढ़ पर कहने के लिए कोई भी राजा हो किन्तु स्वराज्य की जनता शम्भूराजा को ही सच्चा उत्तराधिकारी मानती थी। इसलिए पन्हालगढ़ पर उनसे मिलने के लिए सवारों और सैनिकों का निरन्तर ताँता लगा रहता था। अभी-अभी मिला समाचार कुछ साधारण नहीं था। राजनीतिक दृष्टि से

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अण्णाजी पन्त और मोरोपन्त की गिरफ्तारी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। स्वराज्य के सेनापति शम्भूराजा से मिलने आ रहे थे। कल सारी सेना महाराज से आकर मिलेगी। इस एक घटना से भीतरी एवं सरहद पार के शत्रुओं को एक जबरदस्त झटका मिलने वाला था। अधिक सोच-विचार किये बिना शम्भूराजा ने येसूबाई को जगा दिया। पैरों को पेट में सिकोड़े भवानीबाई सोई थीं। उन्हें हल्के हाथों से अलग करके येसूबाई उठ गयीं। शम्भूराजा को अचानक देखकर उन्हें कुछ घबराहट हुई। राजा ने सुखद समाचार उन्हें सुनाया। समाचार सुनकर साम्राज्ञी तरोताजा हो गयीं। मन हल्का हो गया। उन्होंने धीरे से पूछा, "कल हंबीरराव राजा से कहाँ मिलेंगे?" "यहाँ, निजी महल में।" "ऐसा कैसे महाराज! हंबीरराव मामा का यथोचित स्वागत करने के लिए कल पन्हाला पर दरबार लगाइए।" "कल्पना तो अच्छी है। किन्तु येसू! अपना सिंहासन तो वहाँ रायगढ़ पर है।" "उसकी चिन्ता महाराज को नहीं करनी है। आपके जैसा बहादुर राजा जहाँ खड़ा हो जाता है, वहीं सिंहासन निर्मित हो जाता है।" रात को ही सभी को खबर भेज दी गयी दूसरे दिन पन्हाला पर एक छोटा- सा दरबार लगाया गया। सेनापति हंबीरराव युवराज के पक्ष में सम्मिलित हो रहे हैं। यह सुनकर चारों ओर आनन्द छा गया। दरबार सभी अधिकारी और कार्यकर्ता हंबीरराव के रास्ते में पलकें बिछाए खड़े रहे। इसी समय लम्बे शरीर वाले हट्टे-कट्टे हंबीरराव ने बड़ी शान से दरबार में प्रवेश किया। उनकी फौजी-पगड़ी में मणियों की माला चमक रही थी। उन्होंने बड़े आदर भाव से संभाजी महाराज को झुककर अभिवादन किया। महाराज भाव-विभोर हो गये। हंबीरराव ने झट से उनकी कलाई पकड़ ली। दोनों एक दूसरे के गले से लिपट गये। शम्भूराजा को भी पक्का विश्वास नहीं था कि राजाराम का पक्ष और अपनी सगी बहन का हठ ठुकराकर हंबीरराव शम्भूराजा से आकर मिलेंगे। अपने आचार- व्यवहार से युवराज और युवराज्ञी को लज्जित किया था। शम्भूराजा ने गद्गद होकर कहा, "मामा साहब आपके आने से हमें बेहद खुशी हुई है। इसके बाद भी मराठी राज्य के सुरक्षा की तलवार आपके ही हाथों में रहेगी।" "शम्भूराजा आप मेरी ओर केवल रिश्तेदारी दृष्टि से ही न देखें। शिवाजी महाराज मुझसे हमेशा कहते थे—'भोजन के आसपास जैसे रंगोली बनाई जाती है उतनी ही सीमा में रिश्तों को मर्यादा रखिए'।" हंबीरराव की आत्मीयता और निष्ठा से शम्भूमहाराज और येसूबाई दोनों अभिभूत हो गये। शम्भूराजा ने अपने गले का रत्नहार निकालकर हंबीरराव के गले 194 :• सम्भाजी

म डाल दिया। मूल्यवान वस्त्रालंकार भेंटकर उनका बड़ा सम्मान किया। उसी समय शम्भुराजा ने कहा, ‘‘मामाजी, आज के दरबार में एक अन्य बुजुर्ग व्यक्ति का सम्मान होना है। ’’ ‘‘कौन है ?’’ ‘‘मामा साहब, अपने हिरोजी फर्जन्द चाचा। वे आते ही होंगे। ’’ तरुणाई की मस्ती में हमसे कुछ भूलें न हो जाएँ, इसलिए आप जैसे अनुभवी बुजुर्गों की सलाह से ही आगे का रास्ता तय करना है। ऐसा हमने निश्चित किया है। हमारे सलाहकारों में फर्जन्द चाचा भी एक हैं। दरबार का काम-काज चल ही रहा था कि गोवा से पुर्तगालियों के वकील रामजी नाइक ठाकुर दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने पोर्चगीज वाइसराय रातांतियो पाईस द सांदे का पत्र शम्भूमहाराज को दिया। पुर्तगाली वाइसराय ने शिवाजी महाराज के आकस्मिक निधन पर शोक व्यक्त किया था। इसके बाद इच्छा प्रकट की थी कि गोवा के पुर्तगालियों और मराठों में भाईचारा बना रहे। पत्र पढ़ते हुए सागर की नीली-नीली लहरें शम्भुराजा की ओर संकेत करने लगीं। एक ओर गोवा का अधिक वर्षा वाला किनारा, दूसरी ओर टेढ़ी-मेढ़ी खाड़ियों, घने पेड़-पौधों से भरा कोंकण का तट। जिसमें पैरों में चुभने वाले साँपों के जहरीले काँटे। जैसे पैरों में गोखरू अटक जाता है, वैसे ही मूरुड के पास का जंजीरा शम्भुराजा को अस्वस्थ करने लगा। दरबार में हंबीरराव ने स्मरण दिलाया—‘‘महाराज ! आपका यहाँ पन्हाला पर अधिक समय गँवाना उचित नहीं है। शीघ्र से शीघ्र रायगढ़ जाकर वहाँ व्यवस्था देखना उचित होगा। ’’ ‘‘हंबीर मामा ! इतनी उतावली की आवश्यकता नहीं है। यहाँ सेना इकट्ठा करने का काम हो ही रहा है। आप देख ही रहे हैं, फ्रेंच, अंग्रेज, पोर्चगीज आदि देश-विदेश के पत्र यहीं आ रहे हैं। उन्हें भी थोड़ा समय देना चाहिए। ’’ दोपहर में मोरोजी पन्त और अण्णाजी दत्तो को शम्भूमहाराज के सामने प्रस्तुत किया गया। मोरोपन्त की कलाइयाँ सिर्फ डोरी से बँधी थीं किन्तु अण्णाजी दत्तो के हाथों में फौलादी बड़ी-बड़ी बेड़ियाँ पड़ी थीं। मोरोपन्त के चेहरे का रंग उड़ गया था। वे बहुत ही खिन्न और अपराधभाव से पीड़ित दिखाई पड़ रहे थे। शम्भुराजा ने बगल से पहरेदार सिपाही को संकेत से बुलाया। उन्होंने कहा, ‘‘मोरोपन्त की उम्र साठ-सत्तर वर्ष की है। उनकी कलाइयों को बाँधे नहीं। ’’ शम्भुराजा ने अण्णाजी दत्तो की ओर देखा। अण्णाजी ने शर्म से, अपराधभाव से या क्रोध से अपनी आँखें झुकाई नहीं। जंगली जानवर की तरह मगरूरी से खड़े रहे। देर तक न रोक पाने के कारण शम्भुराजा ही बोले— सम्भा 11 195

“अण्णाजी ! आप तो दगाबाजों के सुमेरु मणि हैं ? हमारे विरोध में आपके षड्यन्त्र और प्रचार का क्या कारण है ? आपको क्षमा करना या आपको छोड़ देना तो आत्मघात ही होगा।” बन्दी के रूप में जकड़े हुए होने पर भी अण्णाजी दत्तो पीछे हटने को तैयार नहीं थे। वे युवराज के सामने झल्लाते हुए कहने लगे— “शम्भूराजा ! कोई भी विचारवान मनुष्य आप जैसे व्यक्ति से किसी अच्छी बात की अपेक्षा ही क्यों करेगा ? बड़े महाराज चले गये और उनके साथ ही उनका बड़प्पन भी चला गया। उनके साथ सत्व भी गया और तत्व भी। इसके बाद अब गुंडागर्दी के अतिरिक्त मराठी राज्य के भाग्य में हो भी क्या सकेगा ?” “पन्त, राज्य की इतनी चिन्ता क्यों करते हो ? पहले अपने को देखो। ऐसा क्या कारण था कि आपने मेरे विरोध में इतना बवाल किया ?” “कहलवाना चाहते हो ? यदि आपकी शैतानी कम हो गयी हो और थोड़ी भी सभ्यता संस्कृति बची हो तो बता देता हूँ।” “सदाचार की भाषा किसी धोखेबाज लोमड़ी के मुँह से शोभा नहीं देती। बताइए, आपका क्या करें ?” अण्णाजी दत्तो ने गरजते हुए कहा, “पहले हमारे हाथों पैरों में जो भारी भरकम बेड़ियाँ डाली हैं उन्हें निकालो।” “पन्त राजद्रोह के गम्भीर अपराध के लिए यह सादा सा उपहार तो कुछ भी नहीं है।” “संभाजी राजा ! राजद्रोह का अपराध आप ही कर रहे हैं। आज रायगढ़ पर सच्चा राजा कौन है ? उन्हीं के हस्ताक्षर और मुहर वाला आदेश लेकर आये हैं हम। इसलिए इन बेड़ियों में आपको ही जकड़ा जाना चाहिए।” संभाजी राजा ने दीर्घ निःश्वास लेते हुए कहा, “क्या करें रस्सी जल गयी, पर ऐंठन नहीं गयी।” “शम्भूराजा ! आप पापी हैं, दुर्विनीत हैं और बदचलन भी।” शम्भूराजा की ओर हाथ उठा उठाकर जोर जोर से चिल्लाने लगे। येसूबाई के चेहरे पर विषाद का जाल फैल गया। शम्भूराजा ने हंबीरराव की ओर देखा। उसी समय हबीरराव ने पहरेदार से कहा, “ले जाओ यहाँ से इस बुड्ढे को। ले जाकर बन्दी खाने में फेंक दो।” मोरोपन्त उसी समय कच्चे कैदखाने में भेज दिया गया। अण्णाजी दत्तो को अँधेरी काल कोठरी में भेज दिया गया। बहुत देर तक दरबार का कामकाज चलता रहा। हिरोजी का कहीं पता न था। दीवान ने दरबार का समय समाप्त होने का संकेत किया। इसी बीच आठ दस सिपाहियों का जत्था अन्दर आया। सभी शम्भूराजा का अभिवादन करके भयभीत 196 :: सम्भाजी

अवस्था में शम्भूराजा के सामने खड़े हो गये। कई लोग एक साथ ही जोर जोर से कहने लगे, "महाराज? गजब हो गया, फर्जन्द भाग गये, फर्जद भाग गये।" "कौन फर्जन्द?" शम्भूराजा ने अवाक होकर मामने देखा। "हिरोजी बाबा फर्जन्द।" सिपाही कहने लगे। "अरे लेकिन उन्हें हमने कहाँ बन्दी खाने में डाल रखा था?" "भाग गये याने खजाना लेकर भाग गये। कोंकण की दिशा में भागे हैं।" संभाजी राजा बड़े असमंजस में पड़ गये—"क्या कह रहे हो?" "हाँ सरकार। रत्नों से भरे दो बड़े बड़े पिटारे लेकर वे भाग गये। उनके साथ पन्द्रह-बीस लोग और भी हैं।" हिरोजी के समान अनुभवी और जानकार व्यक्ति की दगाबाजी से हंबीरराव भी सम्भ्रमित हो गये थे। उन्होंने शम्भूराजा मे कहा, "फर्जन्द का पीछा शीघ्रता से करना चाहिए। सेना की एक टुकड़ी को उनकी खबर लेने भेजता हूँ।" "भेज दीजिए। ऐसे भागकर कितनी दूर भागे होंगे।" शम्भूराजा ने बड़े शान्त भाव से कहा। हंबीर मामा कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे। देर रात तक विचार विमर्श के लिए बैठना होगा। "जैसी आपकी मर्जी, महाराज!" रात में विचार-विमर्श आरम्भ हुआ। महालोजी घोडपड़े, हंबीरराव कृष्णाजी कंक, और प्रह्लाद निराजी बैठक में उपस्थित थे। शम्भूराजा की बगल में येसूबाई भी बैठी थीं। सभी की ओर देखते हुए शम्भूराजा ने कहा, "आज के हमारे उत्साह में हिरोजी काका ने कलंक लगा दिया। किन्तु उसकी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। जहाँ घर होगा वहाँ दो-चार चूहे तो घुसे ही होंगे। समय-समय पर उन्हें कुचलना होगा। परन्तु भविष्य में इस भूमि पर पापी औरंगजेब दौड़कर आएगा। उसके साथ मोर्चे की उचित तैयारी सेना की पुनर्रचना, पूरी तैयारी अभी से करनी होगी। पिताजी ने तीन चार महीने पहले हमें इस धोखे की याद दिलाई थी। दुनिया के तीन चार महाबलशाली राजाओं में औरंगजेब की गणना है। कहते हैं कि उसका एक एक सूबा हमारे स्वराज्य का दुगुना-चौगुना है।" "क्या कह रहे हैं?" प्रह्लाद निराजी ने आश्चर्य से पूछा। "हाँ प्रह्लाद पंत! किसी नदी की उमड़ती बाढ़ की तरह औरंगजेब की फौज हमारे राज्य की ओर आ रही है। ऐसा आभास मुझे हो रहा है। बड़े महाराज का स्वराज्य अगर बचाना है तो हर एक किले पर गोला बारूद और धनधान्य की पूरी तैयारी रखनी चाहिए।" "ठीक है महाराज! हम एक बार रायगढ़ पहुँच गये तो सबसे पहले यही काम हाथ में लेंगे।" प्रह्लाद ने गर्दन हिलाकर कहा। सम्भाजी :: 197

"तब से नहीं इसी पल से कार्य में लग जाइये। जंगलों में दावाग्नि सूचना देकर नहीं आती। संकट भी बताकर नहीं आते। तीन महत्त्वपूर्ण बातों पर सबसे पहले ध्यान दीजिए। गोले बारूद में कहीं आग न लग जाय, गढ़ का पानी न सूख जाय, कहीं भी अनाज और बारूद की कमी न पड़ जाय, इसके अतिरिक्त प्रत्येक किले का किलेदार कौन है? सबनिस, कारखानिस नाइक कौन है? इसकी विस्तृत सूची हमें चाहिए।" स्वराज्य में सोयराबाई और शम्भूमहाराज में से किसी के भी पक्ष में न होने वाले कुछ तटस्थ सरदार थे। कुछ सरदार रूठे हुए थे। ऐसे सरदारों की सूची शम्भूमहाराज ने दरबार में ही तैयार की। उन्हें तत्काल मिलने के लिए आत्मीयतापूर्ण पत्र भेजे गये। शम्भूराजा की व्यग्रता और उमंग देखकर म्हालोजी, प्रहलाद पंत और हंबीरराव जैसे पुराने लोगों का दिल भर आया। जोत्याजी और कृष्णाजी कंक जैसे तरुणों का सीना तन आया। महल से येसूबाई के साथ निकलते हुए शम्भूराजा ने अपने सहायकों की ओर देखा। उन्होंने बड़े अभिमान से कहा, "बता दीजिए उस औरंगजेब को। उसे बताइए कि हमारे दक्खिन देश का निर्माण अनेक शतकों के धधकते ज्वालामुखी में हुआ है। यहाँ के लोग फौलाद की छड़ की भाँति मजबूत हैं। हम तुम्हें ऐसी टक्कर देंगे कि आते समय तुम भले ही सोने की अंबारी में बैठकर बड़ी शान से आओ किन्तु शिवाजी के नाम पर यह सह्याद्रि तुम्हारी लाश को दिल्ली या आगरा पहुँचने नहीं देगा। तुम किसी नदी नाले की मिट्टी बन जाओगे, वह भी कोई जान नहीं पाएगा।" शम्भूराजा मंत्रस्त हो गये थे। वे युवराज्ञी से बोले- "येसू! ये लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं। ये लोग गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं। फर्जन्द चाचा का बर्ताव हमारे लिए एकदम अनपेक्षित और उलझन में डालने वाला है। परन्तु बालाजी आवजी चिटणीस जैसे जानकार और वरिष्ठ व्यक्ति के लिए क्या कहें?" "बालाजी चाचा से भूल?" शब्द येसूबाई के मुँह में अटक गये। "उनकी भूल आपकी समझ में कैसे आएगी? उठते-बैठते बहुरानी कहकर बुलाने का उनका अपनापा। उनके बेटे खंडोबा और निलोबा आपको अपने बेटे जैसे लगते हैं। परन्तु याद रखिये युवराज्ञी! केवल बाहरी प्रेम की आड़ में राजद्रोह की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसा करना भारी भूल होगी।" "महाराज अन्य कर्मचारियों की अपेक्षा बाला आवजी का स्थान बहुत ऊँचा है।" "ऐसा कुछ नहीं है, सभी एक ही माला के मोती हैं। यदि ऐसा न होता तो 198 :: सम्भाजी

वे पन्हालगढ़ के किलेदार को इस तरह का गुप्त पत्र भेजते?" "महाराज! हुकुमनामे की लिखावट चिटणीस की नहीं थी, वह उनके बेटे आवजी बाबा की थी।" येसूबाई का प्रतिवाद शम्भूराजा सहन न कर सके। उन्होंने कठोर दृष्टि से येसूबाई की ओर देखा। उन्होंने कहा, "बोलो मत! बालाजी काका की गैरहाजरी में आवजी के हस्ताक्षर और उनकी मुद्रा चलती है। यह बात स्वराज्य साढ़े तीन सौ गड़करियों और असंख्य कर्मचारियों को अच्छी तरह मालूम है।" "मेरा मन अभी भी यही कह रहा है कि इस हुक्मनामे में बालाजी चाचा की सम्मति नहीं होगी।" संभाजी का स्वभाव था कि वे जिससे प्रेम करते थे। पूरी भक्ति और निष्ठा के साथ करते थे। बालाजी आवजी और राजपरिवार में प्रगाढ़ स्नेह था। चिटणीस के साथ यह स्नेह सम्बन्ध शिवाजी महाराज और संभाजी ने अच्छी तरह निभाया था। ऐसी स्थिति में बालाजी का दिया गया धोखा संभाजी को बहुत अखर रहा था। कर्मचारियों के षड्यन्त्रों और असहयोग से राज्य का वातावरण बिगड़ गया था। इसलिए शम्भुमहाराज बहुत व्यथित थे। धीरे धीरे वातावरण बदल रहा था। साधारण सिपाहियों के लिए शम्भुमहाराज नाक के बाल थे। इस बीच राजधानी रायगढ़ पाचाण महाड पोलापुर से लेकर कोंकण पट्टी तक और घाटी में रहने वाली सामान्य जनता भी विद्रोह कर उठी थी। शिवाजी के पुत्र का प्रकृति प्रदत्त उत्तराधिकार नकारा जा रहा था। राज्य के कर्मचारी षड्यन्त्र रच रहे थे। राजा के अधिकारों को छीना जा रहा था। इसलिए प्रजा क्रुद्ध हो गयी थी। इतना ही नहीं सन्तप्त जनता ने 16 मई, 1680 के दिन मोरोपन्त और अण्णाजी दत्तो के घर धावा बोला। दोनों के घर लूट लिए। इन विद्रोहियों ने रायगढ़ पर क़ब्ज़ा करके संभाजी के पास पन्हालगढ़ पर सन्देश भेजा—'महाराज जल्दी आइए।' बदली हुई परिस्थिति ने शम्भुमहाराज में नया उत्साह और जोश भर दिया। उन्होंने एक ही समय में अनेक कार्यों को कर लेने की योजना बनाई। श्रृंगारपुर दूत भेजकर अपने ससुर पीलाजी को दस हजार की सेना लेकर रायगढ़ पहुँचने की प्रार्थना की। साथ ही हंबीरराव के नेतृत्व में पाँच हजार की नयी फौज तैयार की। अपनी फौज को दो महीने का अग्रिम वेतन दे दिया। मावल के चौबीस और नेरा छत्तीस गाँवों में शम्भूराजा का सन्देश गया। तबेलों से हिनहिनाते घोड़ों को बाहर निकालकर लोग भाले-तलवार नचाते हुए पन्हालगढ़ की ओर बढ़ने लगे। चिन्ताएँ मिट रही थीं। पेंच खुल रहे थे। रुकावटों के लिए नये निकल रहे थे, शम्भूराजा की गद्दी के सामने के उद्यान में भाँति भाँति के फूल खिल रहे थे। सम्भाजी :. 199

राजमहल में खेल रही नन्ही भवानी की पायल के घुँघरू छम-छम बज रहे थे। एक सुबह महारानी येसूबाई चौक के बड़े तुलसी चौरे में पानी डाल रही थीं। तुलसी का पौधा भी बड़ी समृद्धि के साथ पनप रहा था। पीछे से किसी पुरुष के पैर की आहट मिली। शम्भूमहाराज के चलने की शैली ऐसी नहीं थी। तो फिर बिना कोई सूचना भेजे अन्तःपुर प्रवेश करने का साहस किसने किया होगा? यह सोचकर येसूबाई झट से पीछे मुड़ीं तो देखा कि छः फीट लम्बे, दुबले पतले, साँवले, चौड़े मस्तक बड़ी बड़ी आँखों और घनी मूँछों वाले गणोजी शिर्के वहाँ हँसते हुए खड़े थे। येसूबाई ने पूजा शीघ्रता से समाप्त करके भाई का स्वागत किया। गणोजी वहीं चन्दनी झूले पर आराम से बैठ गये। झूले के झूलने से पतली जंजीरों की आवाज आने लगी। भविष्य में रायगढ़ की महारानी बनने वाली अपनी छोटी बहन को गणोजी बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे। शिवाजी का करोड़ों मुहरों वाला हिन्दवी स्वराज्य अब येसूबाई के चरणों के समीप पहुँचने वाला था। अपने भाई का स्वागत करते हुए येसूबाई ने कहा— "बड़े भाई साहब, यहाँ आने की बजाय आप सीधे रायगढ़ चले गये होते तो कितना अच्छा होता? वहाँ के कार्य, वहाँ की व्यवस्थाएँ " "कितनी चिन्ता करोगी येसू! तुम्हारी प्रतीक्षा के दिन अब समाप्त हो रहे हैं। तुम्हारा सौभाग्य छाया की तरह तुम्हारा पीछा कर रहा है। लेकिन येसू महारानी के वस्त्राभूषण धारण करने के बाद अपने इस भाई को भूल तो नहीं जाओगी?" "भाई साहब कितना मजाक उड़ाएँगे अपनी बहन का?" "वैसी बात नहीं है। हम गरीबों का तो बस इतना कहना है कि अब आप सब का भाग्य पूरी तरह खिल गया है, उसमें से थोड़ा प्रकाश अपने भाई की ओर भी आने दो।" येसूबाई ने सम्भ्रमित होकर कहा, "ऐसी पहेलियाँ क्यों बुझा रहे हो?" "पहेली क्या? साफ-साफ तो कह रहा हूँ। एक बार सत्ता के घोड़े पर सवार होकर राजा ने रकेब में पाँव जमा लिया तो अपने करीबी लोगों को भूल जाते हैं। इसलिए सोचा कि समय पर स्मरण दिला दूँ तो अच्छा रहेगा।" येसूबाई आश्चर्य से गणोजी की ओर देखने लगी। अपने हाथों की उँगलियाँ व्यग्रता से नचाते हुए गणोजी ने कहा, "जिस दिन रायगढ़ में महारानी के रूप में तुम्हारे सिर पर छत्र और चँवर सुशोभित होगा, उसी दिन अपने भाई के घर पर भी जागीर का एक छोटा-सा वन्दनवार तुम बाँधोगी तो बड़ा उपकार होगा?" "कौन-सी जागीर?" 200 :: सम्भाजी

“हम राजा शिर्के हैं। हमें कुछ नहीं चाहिए। पीढ़ी-दर-पीढ़ी से चली आ रही दाभोल की हमारी जागीर हमें दिला दीजिए।” येसूबाई अधीर हो गयीं। अपने बड़े भाई की कटूक्ति में किसी गम्भीर प्रकरण का आभास उनकी तीक्षण बुद्धि ने कर लिया। तब उन्होंने कहा, “राजमहल में कुछ काम धाम चल रहा है। महाराज अभी तक रायगढ़ नहीं पहुँचे हैं। अभी तक उन्होंने राज्य का सूत्र अपने हाथ में नहीं लिया है। थोड़ा धैर्य मे काम लेना है। फिर भी मैं महाराज से कह कर देखूँगी।” दो दिन बीत गये। शिर्के राजमहल में ही बने रहे। तीसरे दिन उन्होंने येसूबाई को फिर टोका—“‘येसू, तुम्हारे मायके की दाभोल वाली जागीर का क्या हुआ?” “हाँ भाई साहब, मैंने महाराज से कहा है। उन्होंने कुछ समय रुकने के लिए कहा।” “येसू, भोसले घराने की बहू बनकर राजा शिर्के के मूर्य कुल के खून को भूल गयी हो क्या?” “परन्तु भाई माहब मैं कहती हूँ कि इस समय इतना हठ करना उचित होगा। क्या?” “इसमें हमारा कोई अपराध नहीं है। तुम्हारे ससुर शिवाजी ने हम शिर्के लोगों पर अत्याचार किया है। परम्परा से चली आ रही दाभोल की हमारी जागीर को जबरदस्ती हड़प लिया।” दाँत चबाते हुए गणोजी ने कहा। “भाई साहब शिवाजी महाराज को क्यों दोष दे रहे हो? यह भूल गये क्या कि आप भी उन्हीं शिवाजी महाराज के दामाद हो?” “बड़ा छँटा हुआ आदमी था तुम्हारा ससुर। डाँट-डपट कर दहशत से हमारी जागीर दबोच ली। ऊपर शहद की उँगली चटाते हुए कहा कि जब गणोजी राव को पुत्ररत्न प्राप्त होगा तो जागीर वापस कर देंगे। वाह रे-वाह!” “देख येसू, दाभोल की जागीर से भोसले लोगों का कोई सम्बन्ध नहीं है। उसे बीजापुर के आदिलशाह ने हमें ईनामस्वरूप दिया था। हम तुमसे भीख नहीं, अपना हक माँग रहे हैं।” जब गणोजी शिर्के ने बहुत आफत मचाई और बड़े भाई के अधिकार से येसूबाई की नाक में दम कर दिया। तब येसूबाई ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जागीर जैसे नाजुक मामले में हम इस तरह उतावली में कैसे निर्णय ले सकते हैं? आप चाहें तो स्वयं महाराज से मिल लें।” गणोजी रूठ गये। तुरन्त जाने के लिए उठ खड़े हुए। विदा देते समय येसूबाई ने झुक कर उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने कहा, “भाई साहब इस छोटी-सी बात को मन में न लाएँ, क्रोध न करें। आपकी समस्या का समाधान अवश्य निकलेगा। और सम्भाजी :: 201

भाई साहब राजा के राज्यारोहण समारोह में आप रायगढ़ अवश्य पधारें। " येसूबाई पर नफरत भरी नजरों से देखते हुए गणोजी ने पूछा- "किसलिए ? आपके माथे पर झूलने वाले राजपद् के चँवर को देखने और अपने माथे पर अपमान और उपेक्षा का ईंट-पत्थर झेलने के लिए।" तीन शिवाजी महाराज के महानिर्वाण को दो महीने बीत चुके थे। अब अधिक समय राजधानी से बाहर रहना उचित नहीं था। कविराज भी सुझाव दे रहे थे-'महाराज को अधिक समय तक राजधानी से बाहर नहीं रहना चाहिए।' सारे अनिष्ट दूर हो गये हैं। गढ़ पर रसद पहुँचाने की योजना निश्चित हो गयी। उसी समय शम्भूराजा अपनी सेना के साथ कराड के रास्ते से रायगढ़ की ओर निकले । मार्ग में प्रतापगढ़ की भवानी का शम्भूराजा ने दूध-दही से अभिषेक किया। भवानी मन्दिर से चलकर महाराज एक बुर्ज के ऊपर खड़े हो गये। वहाँ से उन्हें सह्याद्रि की हरी भरी पहाड़ियों के दर्शन हुए। घने वृक्षों की पंक्तियाँ कहीं समानान्तर कहीं वक्र तो कहीं अर्धवर्तुलाकार दिखाई दे रही थीं। पंचमी को झिम्मा खेलने वाली सहेलियों की तरह वे एक-दूसरे के गले मिल रही थीं। नीचे की ओर सह्याद्रि की खंडित चोटियाँ और ढलानें दिखाई दे रही थीं। आसमान एकदम स्वच्छ था। इसलिए साठ सत्तर मील की दूरी पर रायगढ़ के भवानी मन्दिर का कलश स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा था। महाराज ने दाहिनी ओर महाबलेश्वर की चोटियों पर दृष्टि डाली। चैतमास के नये पल्लवों की हरी सजावट से सारा वन प्रदेश सज गया था। सौभाग्य से आन्तरिक विद्रोह की आग कुछ समय के लिए बुझ गयी थी। हंबीरराव की प्रभावी भूमिका के कारण सभी सेनाधिकारी और पूरी सेना संभाजी के साथ हो गये थे। रायगढ़ की जनता ने सरदार मालसावन्त को कैद कर लिया था। राज्य के सारे सूत्र शम्भूराजा की मुट्ठी में आ गये थे। एक बार जिम्मेदारी का बोझ सिर पर आ जाता है तो व्यक्ति श्रद्धालु और संवेदनशील बन जाता है। मार्ग में आते हुए शम्भूराजा कोरटी के सदानन्द और मल्हार गोसावी से मिले जैसे सन्त पुरुषों से मिले। उन्होंने उनका आशीर्वाद लिया। उनके मठों एवं अन्य धार्मिक कार्यों के लिए 202 :. सम्भाजी

आर्थिक सहायता पहले से दी जा रही थी। खबर मिल चुकी थी कि औरंगजेब राजपूताना के युद्ध में उलझा हुआ है। इसलिए शम्भूराजा प्रसन्न मन और निर्द्वन्द्व भाव से यात्रा कर रहे थे। राजा गढ़ उतर कर 'पार' नामक गाँव में पहुँचे। उसी समय पोलादपुर की घाटी की ओर से सेना की एक टुकड़ी दौड़ती हुई आती दिखाई पड़ी। टुकड़ी के समीप आते ही सेना में खलबली मच गयी। आवाज आने लगी—'हिरोजी पकड़े गये। हिरोजी फर्जन्द को कैद हो गयी।' चिवलून में महाराज के सैनिकों ने हिरोजी फर्जन्द बन्दी बना लिया था। उनके द्वारा चुराकर ले जायी गयी रत्नों की पेटियाँ और बचा हुआ खजाना जब्त कर लिया गया था। अपराध बहुत बड़ा था। किन्तु अपराधी भी कोई सामान्य व्यक्ति न था। इसलिए सभी के सामने फर्जन्द की पेशी लेना टाल दिया। पार के पाटिल की कोठी में फर्जन्द को राजा के सामने प्रस्तुत किया गया। साठ वर्ष की उम्र पार किये हिरोजी फर्जन्द के रोबदार शरीर की ओर शम्भूमहाराज चकित होकर देख रहे थे। उनकी शंक्वाकार ठोड़ी, गरुड़ जैसी नाक, लम्बी सुघर दाढ़ी, शिवाजी महाराज की जैसी बड़ी-बड़ी सतेज आँखें। अपने पिता का स्मरण करते हुए स्तम्भित होकर संभाजी महाराज फर्जन्द की ओर देख रहे थे। हिरोजी के चेहरे पर तेज नहीं दिख रहा था। उनका गोरा-चिट्टा चेहरा अपराधबोध के कारण लज्जित था। शम्भूराजा के सामने एक शब्द भी बोलना उनके लिए असम्भव हो गया था। हिरोजी के मुँह से कोई शब्द निकले उसके पहले उनकी आँखें छलछला उठीं। उनका गला भर आया। वे बड़ी कठिनाई से बोले—"शम्भू बेटे! मरे हुए को अब और अधिक न मारो।" "हिरोजी फर्जन्द मेरे बहादुर चाचा। आपका कैसा नाम? आपकी कितनी ख्याति ? बुढ़ापे में आपको यह क्या सूझी ? पिताजी चले गये। हमें ममता से गले लगाने की जगह, मौके का लाभ उठाकर आप चोर उचक्कों की तरह खजाना लेकर भागे ? फर्जन्द चाचा आपने यदि अपनी इच्छा प्रकट की होती तो आपके चरणों में पूरा राजकोष निछावर कर देता। आपने यह चोर-उचक्कों की राह क्यों पकड़ी ?" पास के दालान में जाकर संभाजी ने अपने सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श किया। महाराज ने कहा, "जाने दीजिए! जो कुछ हुआ उसे भूल जाएँगे। हिरोजी को क्षमा कर देंगे।" बीच में हस्तक्षेप करते हुए हंबीरराव ने कहा, "आपके मन का बड़प्पन हम सम्भाजी :: 203

समझ सकते हैं। परन्तु अब आप युवराज नहीं, राजा हैं। आपकी उदारता का गलत अर्थ निकालेंगे, गलत लाभ भी उठाएँगे। दंड का डर न होगा तो गुंडे और भी गुंडागर्दी मचाएँगे।" पूरी बात पर विचार करने के बाद शम्भूराजा ने निर्णय लिया कि हिरोजी को कुछ दिन और नजरबन्द रखा जायेगा। परन्तु उन पर बेड़ियाँ नहीं डाली जाएँगी। उनका किसी भी प्रकार का अपमान किये बिना, बाइज्जत रायगढ़ ले जाया जाएगा। शम्भूराजा ने अपने सैनिकों को इस प्रकार का आदेश दिया। शम्भूराजा के चेहरे पर विषाद छाया हुआ था। उन्हें चिन्तित देखकर कवि कलश ने पूछा—"राजन्! आप इतने चिन्ताग्रस्त क्यों हैं?" "कविराज! जब अपने विश्वासपात्र श्रेष्ठ जनों के षड्यन्त्र के ऐसे नाखून निकल रहे हैं। ऐसी स्थिति में मेरी बुद्धि तो कुछ काम नहीं करती।" "कुछ भी ठीक नहीं है, अनेकों के मत्सर, द्वेष, शाप और हाय के हम लक्ष्य बन चुके हैं।" सेना ने वीरवाड़ी पार की। महाड के समीप चाँभार की घाटी का चक्कर लगाकर सामने की घनी वृक्षावली में प्रविष्ट हो गयी। बीच बीच की छोटी छोटी पहाड़ियाँ कभी पाँव फैलाकर बैठे बैलों की तरह तो कभी शानदार हाथी की तरह दिखाई पड़ती थीं। सामने वृक्षों की संख्या कम हुई तो सामने आसन मारकर बैठे गरुड़ की तरह दिखाई देने लगा। गरूड़ जिस प्रकार सबसे ऊँचे टीले के शीर्ष पर अपना बसेरा बनाता है, वैसे शिवाजी महाराज ने रायगढ़ को चुना था। शम्भूराजा के भीतर अनेक भावनाओं की तरंगें हिलोरें ले रही थीं। यह कितना लम्बा वनवास था ? रायगढ़ के जिस परिसर में शम्भूराजा ने अपना बचपन बिताया था, पुष्प पल्लवों से संवाद करते हुए जहाँ किशोरावस्था को पार किया था। उसी रमणीय परिसर का दर्शन तीन वर्षों बाद हो रहा था। रायगढ़ ने नये राजेश्वर के स्वागत के लिए अपने पंचक्रोशी में नया रूप धारण कर लिया था। फूलों के भार से लदी मेहराबें झुक गयी थीं। ढोल, लेजिम, शहनाई नगाड़ा और तुरुहियों की ध्वनि के साथ शम्भूमहाराज का स्वागत हुआ। पाचाड़ के मैदान पर मानो मेला लग गया था। नीचे तलहटी में वाद्यों की तुमुल ध्वनि हो रही थी। गढ़ पर तोपों की धड़ाम धुडूम की आवाज उठने लगी थी। शिवाजी महाराज की असमय मृत्यु के कारण जो रायगढ़ काला पड़ गया था आन्तरिक षड्यन्त्रों के कारण पागल हो रहा था, वही अब फिर से सज सँवर गया था, उसमें नया जोश भर गया था। वह मंगलदाई दिखाई देने लगा था। गढ़ पर इससे पहले ही राहुजी सोमनाथ कान्होजी मांडवलकर और माल सावंत जैसे षड्यन्त्रकारियों को पकड़ लिया गया था। 204 सम्भाजी

पाचाड़ के सिंहद्वार पर शम्भूराजा के सम्मुख पिलाजीराव शिर्के स्वयं उपस्थित थे। उन्होंने गढ़ सभी महत्त्वपूर्ण जगहों पर पहरे बिठाकर सुरक्षा का उत्तम बन्दोबस्त किया था। अपना दामाद हिन्दवी स्वराज्य का दूसरा छत्रपति बन रहा है। इससे मिलने वाला आनन्द उनके चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था। येसूबाई अपने बड़े भाई गणोजी शिर्के की ओर आश्चर्य से देख रही थी। पन्द्रह दिन पहले वे यह कहकर गये थे—"जब तक मेरी जागीर का कार्य नहीं हो जाता मैं मुँह नहीं दिखाऊँगा।" किन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं। गणोजी शिर्के बड़े कुतूहल से येसूबाई की ओर देख रहे थे। महादजी निम्बालकर का प्रसन्न चेहरा भी महाराज से ओझल न था। जोत्याजी केसरकर महाराज के कान से लगकर कह रहे थे—"आपने सुना क्या महादजी ने मुगलों की नौकरी हमेशा के लिए छोड़ दी।" "ऐसा?" आश्चर्यचकित होकर शम्भूराजा ने कहा। "अपने सगे साले के छत्रपति बन जाने पर दूसरे की नौकरी कौन करेगा?" शम्भूराजा जीजा माता की समाधि के समीप गये। वे वहाँ पर नत मस्तक समाधि के खुरदुरे पत्थरों पर हाथ फेरा। उस स्पर्शमात्र से वे भाव विह्वल हो गये। उनकी आँखों में आँसू भर आये—दुख के भी और आनन्द के भी। यह दृश्य देखकर वहाँ उपस्थित लोगों का मन भर आया। सन्ध्या का समय था। रंगीन फेंटा और नये कम्बलों के साथ भोइयों का जत्था खड़ा था। सोने की पालकी सजाई गयी थी। संभाजी राजा बड़ी प्रसन्नता से पालकी में सवार हो गये। कला वन्तुओं को बगल करते अपनी बाईस वर्षीय तेजस्वी मुखमुद्रा से लोगों को आनन्दित करते हुए शम्भूमहाराज आगे निकल गये। पालकी आगे बढ़ने लगी। साथ की पालकियों में कवि कलश, येसूबाई, पिलाजी शिर्के, हंबीरराव जैसे लोग बैठे थे। जब पालकी चितदरवाजे के पास पहुँची तो शम्भूमहाराज ने कहारों को रोका और नीचे उतरकर एक अतिसामान्य व्यक्ति की तरह पत्थर पर पैर समेटकर बैठ गये। यह देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। यकायक शम्भूराजा का गला भर आया। वे पिलाजी राव से अत्यन्त पीड़ित स्वर में बोले, "मामा साहब! अब इस सूने गढ़ पर किसलिए जाना है? भगवान के बिना मन्दिर और शिवाजी महाराज के बिना रायगढ़ देखना एक जैसा ही है।" उनका गौर और सरल चेहरा लाल हो गया। बात करते करते संभाजी का कवि मन अत्यन्त भावुक हो उठा। शम्भूराजा भाव विभोर होकर कहने लगे—"मनुष्य कितने भी पुण्य अर्जित करे, चारों धामों की यात्राएँ करे ईश्वर का ध्यान लगाये, यह मेरे लिए व्यर्थ है। मथुरा, वृन्दावन, काशी और रामेश्वरम् किसके लिए हैं? केवल उस अभागे के लिए जिसने रायगढ़ न देखा हो।" सम्भाजी : 205

सहयोगियों ने शम्भूराजा को बहुत समझाया-बुझाया तब जाकर कहीं पालकी आगे बढ़ी। ऊपर महादरवाजे पर शम्भूराजा का धूम-धाम से स्वागत हुआ। वहाँ से वे जगदीश्वर का दर्शन करने गये। दरबार में कार्यकर्ताओं की भीड़ एकत्र थी। महाराज ने उनसे बातचीत की। उस रात टकमक नोंक किसी राक्षस के जबड़े की तरह भयानक दिखाई पड़ रहा था। वहाँ तूफानी हवा चल रही थी। ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से टकराती तेज हवा, सनसनाहट की आवाज से सीटी की तरह बजा रही थी। उस अँधेरी रात में विद्रोही गद्दारों की आँखों पर पट्टी बाँध दी गयी। उन्हें टकमक के ऊँचे सिरे से नीचे फेंक दिया गया। उनके शरीर ज्वारी के गट्ठे की तरह नीचे गिरते हुए पत्थरों से टकराते गये। वे गिद्धों और गीदड़ों का भोजन बन गये। एक दिन सुबह पाचाड़ के किले का दरवाजा खुला। वहाँ से अण्णाजी दत्तो और मोरोपन्त जैसे अव्वल दर्जे के कैदियों को बाहर निकाला गया। वे पहरेदारों के संरक्षण में पैदल ही गढ़ पर चढ़ने लगे। मोरोपन्त को अपने अपराध का बोध हो गया था। वे बहुत लज्जित थे। वे थके-हारे और गलित गात्र दिखाई पड़ रहे थे। किन्तु अण्णाजी दत्तो का मन कठोर हो गया था। वे आँखें उठाकर अगल-बगल की ऊँची तटबन्दी को देख रहे थे। अण्णाजी ने जब सुना कि विद्रोही गद्दारों को टकमक की चोटी से नीचे फेंक दिया गया तो उन्हें अनुभव हुआ कि उनका अपराध कितना गम्भीर है? किले पर चढ़ते-चढ़ते दोनों की दृष्टि बार-बार टकमक नोक की ओर जा रही थी। मोरोपन्त ने अण्णाजी से कहा, "अण्णाजी आपका साथ देकर हमने अपनी जिन्दगी नष्ट कर ली। सेवा में कलंक लगा और बाल बच्चों के बीच उपहास के पात्र बन गये।" "जाने दो मोरोपन्त! मैंने तो अब भविष्य के बारे में सोचना ही बन्द कर दिया।" उन्होंने दुखी स्वर में कहा, "मोरोपन्त यदि भाग्य ने साथ दिया तो आप को दंड में कुछ रियायत अवश्य मिल जाएगी। किन्तु मुझसे तो ऐसा कोई भी काम नहीं हुआ है कि शम्भूराजा मुझे जीवित छोड़ें।" उन दो राजबन्दियों को उन्हीं के राजमहलों में बन्द कर दिया गया था। दरवाजे पर सख्त पहरा बिठा दिया गया था। उसी दिन शम्भूराजा ने इन्दुलकर को सामने खड़ा किया। इन्दुलकर की आधी उम्र रायगढ़ के निर्माण में बीती थी। वे जीवन भर राजमहल गढ़िया, चौक और उद्यान बनाते रहे। शरीर को झुलसा देने वाली गर्मी में आषाढ़ की रचना करने में दिन-रात जुटे रहते थे। शिवाजी महाराज विनोद में उन्हें एक अभिमन्त्रित पिशाच कहते थे। यह सोचकर सभी दुखी थे कि ऐसा भला आदमी गद्दारों के साथ कैसे फँस गया? १०५ सम्भाजी