छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
दिया, इसका मुझे भी पता नहीं। आगे स्वार्थी कर्मचारियों ने कहना शुरू किया कि शम्भुराजा दुष्ट हैं, व्यसनी हैं, वही झूठी अफवाह मैंने अपने मन में बिठा ली। क्योंकि रायगढ़ की महारानी बनने के बाद यहाँ की राजमाता बनने की मेरी इच्छा बलवती हो गयी थी।" हंबीरराव इधर उधर देखते हुए पूछने लगे— "राजाराम साहब कहाँ हैं? कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं?" "हंबीरराव, शम्भुराजा के यहाँ गढ़ पर रहने पर राजाराम को भूख-प्यास भी नहीं लगती। हमारे पास रुकना तो दूर की बात है।" सोयराबाई ने कातर स्वर में कहा, "अब हमें राजाराम की कोई चिन्ता नहीं है। हमारे साथ इतना कुछ हो गया किन्तु राजाराम के प्रति शम्भुराजा का वात्सल्य रंच मात्र भी कम नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि बड़े महाराज की जगह शम्भुराजा ने ली है। उनकी कमी पूरी कर दी है। येसू भी राजाराम का इतना ध्यान रखती हैं कि मुझे लगता है कि राजाराम को अपनी माँ की भी कोई आवश्यकता नहीं है।" "नहीं दीदी, आप ऐसे कहेंगी तो कैसे चलेगा?" "हंबीरराव, आप हमारे छोटे भाई हैं इसलिए कह रही हूँ। मुझसे अनजाने में नहीं, जानबूझकर इतने अपराध हुए हैं कि अब जीने की भी इच्छा नहीं होती। पालकी में बैठकर जगदीश्वर के दर्शन करने जाने में भी लज्जा आती है। लोग मुझे स्वार्थी और कपटी स्त्री के रूप में देखते हैं।" "दीदीजी, आप इतना सोच विचार क्यों करती हैं? आपका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है। कृपा करके अब आप आराम करें।" "नहीं हंबीरराव, कभी-कभी पश्चाताप से हमारा हृदय साफ होता है। मनुष्य की स्वार्थबुद्धि की भी कोई सीमा होनी चाहिए। एक ओर औरंगजेब जैसा हमारी तीन-तीन पीढ़ियों का शत्रु स्वराज्य पर आक्रमण कर रहा है। ऐसे समय में माता होने के नाते शम्भुराजा को सान्त्वना और प्रोत्साहन देना हमारा प्रथम कर्तव्य था। परन्तु ऐसे समय में कपटी और दुष्ट कर्मचारियों के साथ लगकर हम शम्भू बेटे को नष्ट करने पर तुले थे। मैं भी उन कुटिल षड्यन्त्रकारियों के साथ हो गयी थी। इससे हमें अत्यधिक लज्जा का अनुभव होता है।" बोलते-बोलते सोयराबाई का स्वर कातर हो गया। उनकी आँखों में आँसू उमड़ आए। उनके गले में जोर का ठसका बैठा। एक दासी ने तुरन्त पानी का पात्र उनके हाथ में पकड़ाया। उनकी यह दशा देखकर हंबीरराव ने कहा, "दीदी अब अपने को और अधिक कष्ट न दें, विश्राम करें, सब ठीक हो जाएगा।" शरीर पर शाल को लपेटते हुए सोयराबाई दासी की सहायता से भीतर जाने लगीं। किन्तु तभी उन्होंने हंबीरराव को पुनः अपने समीप बुलाया। उन्होंने धीरे से 316 सम्भाजी
किन्तु कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा, "येसूबाई से मेरा निश्चित सन्देश दीजिए कि हमें अब किसी की बात की चिन्ता नहीं है। तुम्हारे आँचल की छाया में हमारा बेटा राजाराम सुखी और सुरक्षित रहेगा।" अश्विन शुक्ल 11 शक सम्वत् 1603, दिनांक 27 अक्टूबर 1681 का दिन था। सप्तमहल की ओर से रोने की आवाज आने लगी। दासियाँ जोर जोर से रो रही थीं। सोयराबाई का मृत शरीर बिस्तर पर पड़ा था। शम्भूराजा और येसूबाई दौड़ते हुए वहाँ आये। सफेद शुभ्र वस्त्रों में सोयराबाई का शरीर काला दिखाई पड़ रहा था। तत्काल राजवैद्य को बुलाया गया। वैद्य ने निदान करके बताया कि पिछली रात को ही महारानी ने हीरे का टुकड़ा खाकर आत्महत्या की है। शम्भूराजा ने काले हौद की बगल में, बड़े महाराज के अन्तिम संस्कार के स्थान के पास सोयराबाई को मुखाग्नि दी। साथ ही भट भिक्षु, दीन दुर्बल, राही बटोही को दान दक्षिणा दी। राजाराम साहब का वे बहुत ध्यान रख रहे थे। क्रिया कर्म का कार्यक्रम समाप्त हो गया। पूरा राजमहल रिश्तेदारों से भरा था। सोयराबाई की याद में शम्भूराजा की आँखें भर आयीं। उन्होंने कहा, "अपने पुत्र के मोह में हमें बन्दी बनाने से लेकर मारने तक का उपाय उन्होंने किया था। लेकिन यह मानवी स्वार्थ का एक प्रकार है। किन्तु पिताजी की जवानी में राजगढ़ के हमारे बचपन में इन्हीं ने हम दोनों को संभाला था। उनके उस प्यार को हम कभी भूल नहीं सकते। अपनी इन्हीं माताजी पर यह अभियोग लगा कि उन्होंने बड़े महाराज को विष दिया था। किन्तु ऐसा लांछन लगाकर उनके पतिव्रत धर्म की पवित्रता को कलंकित करना है। वे स्फटिक सी शुभ्र और पारदर्शी थीं।" पाँच "सम्भाजी महाराज आज औरंगजेब ने पूरे हिन्दुस्तान में उपद्रव मचा रखा है। उत्तर भारत में बहुत से शक्तिशाली हिन्दू और राजपूत सरदार हैं। परन्तु वे सभी उस बादशाह के अधीन पशु की भाँति विवश हैं।" "ऐसा?" "तो क्या उन्हें देश की, धर्म की, किसी को कोई चिन्ता नहीं है? आपने भी सुना होगा कि औरंगजेब ने हिन्दुओं पर जजिया नाम का अन्यायपूर्ण कर लगाया है। सम्भाजी :: 317
उसने सामान्य लोगों का जीना हराम कर दिया है। ऐसे पापी और धर्मोन्मादी बादशाह की नाक में नकेल डालने की तरकीब और ताकत हिंदुस्तान में केवल आपके पास है। " "सच है राजन, दिल्ली और राजपूताना छोड़कर मैं और शहजादा अकबर बड़े भरोसे के साथ आपके आश्रय में आये हैं।" भावुक होकर दुर्गादास राठौड़ ने कहा। कल सवेरे ही शम्भूराजा अपने सहयोगियों के साथ सुधागढ़ पहुँचे थे। वे गढ़ पर सबनिम के महल में रुके थे। कल ही किले के नीचे धोड़से नामक गाँव में उनकी और शहजादा अकबर की पहली भेंट हुई थी। कल की इस शाही मुलाकात में ही दोनों ने एक-दूसरे को हीरे जवाहरात, मूल्यवान वस्त्र, अरबी तुर्की घोड़े आदि दिए थे। इस अवसर पर शम्भूराजा ने दुर्गादास और शहजादा अकबर की बड़ी प्रशंसा की थी। इन्हें धन्यवाद भी दिया— "अच्छा हुआ आपके निमित्त से हमारे अधिकारियों की बगावत का पर्दा उठा।" "कर्मचारियों के उस पत्र ने उल्टे हमारा बड़ा उपकार किया, राजन!" शहजादा अकबर ने हँसते हुए कहा, "पिछले चार-पाँच महीने से आपने हमें इस पाली की भयंकर बरसात में भिगोते हुए अटका रखा है। हो सकता है कि हमारे उद्देश्य के बारे में आपके मन में सन्देह हो।" शहजादे की बात सुनकर शम्भूराजा दिल खोलकर हँसे। आगत स्वागत उत्तम रीति से हुआ। अगली बैठक के लिए ऊपर सुधागढ़ किले की जगह निश्चित की गयी। उस समय शम्भूराजा ने शहजादे की ओर ध्यान से देखा। थोड़ा स्थूल शरीर, मध्यम ऊँचाई का तेजस्वी शहजादा देखने में आकर्षक लग रहा था। उससे शम्भूराजा ने कहा, "चलिए आज हमारे साथ किले पर ठहरिये। वहीं पर विस्तार से बातें होंगी।" "राजन, चाहिए तो दुर्गादास को साथ ले जाइये। मैं कल सवेरे पहुँचूँगा।" अकबर ने कहा। "आज क्यों नहीं?" "राजन, यहाँ की भयंकर बरसात की मार से तो अपने को किसी तरह बचाया, लेकिन किले पर की सर्दी नहीं झेल पाऊँगा।" दुर्गादास के साथ किले पर की राजा की बातचीत उत्तम रीति से सम्पन्न हुई। सवेरे शम्भूराजा और दुर्गादास ने पूजा समाप्त की। दोनों की पालकियाँ मोराई देवी के मन्दिर पहुँचीं। देवी के दर्शन करके शम्भूराजा पूर्व दिशा के बुर्ज के पास टहलने लगे। साथ में उत्साही दुर्गादास थे ही। ऊँचे कद, साँवले रंग, राजपूत शैली की 318 :: सम्भाजी
दाढ़ी रखने वाले दुर्गादास का व्यक्तित्व बड़ा विलोभनीय था। दोनों मिलकर बगल के तैलबैल किले, पीछे के घने वृक्षों और आसपास की निसर्ग शोभा को देखने लगे। दुर्गादास की बोलचाल से उनकी निष्ठा प्रकट हो रही थी। दुर्गादास अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए बता रहे थे कि राजपूताना के सभी राजाओं को एक झंडे के नीचे एकत्र करके अपने देश और धर्म पर संकट स्वरूप औरंगजेब को गद्दी से उतार कर शहजादा अकबर को गद्दी पर बिठाने की उनकी योजना थी। यह बताते समय राजपूताना के प्रति उनका प्रेम, शहजादे पर उनकी निष्ठा और सम्भाजी के प्रति असीम आदर की स्पष्ट अभिव्यक्ति हो रही थी। जोधपुर के राजा जसवंत सिंह जीवनभर मुगलों के नमक के प्रति निष्ठावान बने रहे। औरंगजेब को प्रसन्न करने के लिए उसका आदेश मानकर काबुल और कधहार तक धावा बोला था। युद्ध भूमि में उन्होंने वीरता दिखाई किन्तु खैबर दर्रे के पास उनका आकस्मिक निधन हो गया। उनके जैसे एकनिष्ठ सेवक की मृत्यु पर बादशाह को दुखी होना चाहिए था। किन्तु उनकी मृत्यु से औरंगजेब प्रसन्न हो गया। औरंगजेब ने सोचा कि एक और हिन्दू राज्य अपने अधिकार में लेने का अवसर अपने आप मिल जाएगा। किन्तु उस समय जसवन्त सिंह की पत्नी गर्भवती थी। प्रसूति हो जाने पर उत्तराधिकार की परम्परा के अनुसार राजपूतों ने नवजात शिशु अजित सिंह को गद्दी पर बिठाने की माँग की। इस माँग को लेकर दुर्गादास ने बादशाह से भेंट की। उन्होंने आग्रह किया— "हुजूर, उत्तराधिकार के अधिकार के अनुसार अजित सिंह को जोधपुर का राजा बनाएँ।" "जरूर क्यों नहीं?" औरंगजेब ने हँसते हुए कहा, "कल ही हम आपके राजा को राजसी वस्त्र दे देंगे। लेकिन एक शर्त पर ।" "कौन सी शर्त, जहाँपनाह ?" "कल अजित सिंह और उनकी माँ इस्लाम धर्म स्वीकार करें और राज करें।" बादशाह के इस अमानवीय उत्तर से दुर्गादास थर्रा गये। उसी समय दुर्गादास ने सौगन्ध ली—'मेरा मृत शरीर श्मशान की ओर जाये उससे पहले मैं औरंगजेब को अवश्य ही रास्ते पर लगाऊँगा।' उसी क्षण से दुर्गादास आलमगीर के विरुद्ध धधक उठे थे। उस घटना का स्मरण आते ही दुर्गादास का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उन्होंने कहा, "अकबर और मानसिंह के समय से हमारी तीन-तीन पीढ़ियाँ दिल्ली की मुगल सल्तनत की रक्षा करती रही हैं, अपना रक्त बहाती रही हैं। किन्तु, यह सम्भाजी 319
धर्म विक्षिप्त औरंगजेब उन सभी बातों को भूलकर दूसरी ओर पलट गया। हिन्दू प्रजा पर उसने जजिया कर लगा दिया और उसकी वसूली के लिए अकल्पनीय अत्याचार किया।'' "किन्तु उत्तर की प्रजा ने ऐसी अधम बादशाहत के विरुद्ध विद्रोह क्यों नहीं किया ?'' शम्भूराजा ने जानना चाहा। "सब कुछ हुआ। औरंगजेब के जामा मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए जाते समय हिन्द प्रजा ने उन्हें रोका, उनसे प्रार्थना की किन्तु बादशाह का कठोर हृदय नहीं पिघला। उन गरीबों पर उसने मदोन्मत्त हाथी नचाया। फिर भी औरंगजेब का इरादा नहीं बदला। इन्हीं घटनाओं के परिणामस्वरूप राजपूताना में विद्रोह हुआ।'' दुर्गादास विद्रोह की कहानी सुना रहे थे। राजस्थान की रेतीली भूमि पर भड़के उस विद्रोह को जानने के लिए औरंगजेब स्वयं वहाँ दौड़कर आया था। उसने दक्षिण से मुअज्जम और बंगाल से आजम को बुला लिया था। राजपूताना शान्त नहीं हो रहा था। किन्तु एक बार बादशाह द्वारा अपमानित शहजादा अकबर को दुर्गादास ने बड़ी कुशलता से अपनी ओर कर लिया था। उसके दिमाग में विद्रोह का बीज बोया। परन्तु दुर्गादाम और शहजादा अकबर दोनों दुर्भाग्य के शिकार हुए। अकबर ने केवल बगावत का झंडा ही नहीं ऊँचा किया था, बल्कि स्वयं को नया शाहंशाह घोषित करके खुतबा पढ़ा था। अपने पिता से युद्ध करने का गुनाह किया था। इस तरह का शहजादा कहीं भी चला जाये वह बादशाह बिना उसका प्रतिशोध लिए नहीं रह सकता। इसका अनुमान दुर्गादास और अकबर दोनों को था। इसीलिए उन्हें सह्याद्रि के सिंह की फौलादी गुफा भरोसे की लगी। दुर्भाग्य के अनेक थपेड़े खाते हुए दोनों चार महीने की कष्टकर यात्रा करके महाराष्ट्र के पठार पर पहुँचे थे। जजिया कर का विषय निकलते ही शम्भूराजा बोल पड़े, "बादशाह द्वारा अपनी हिन्दू प्रजा पर यह कर लगाने का समाचार हमारे पिताजी को मिला था। उस समय उनकी बेचैनी को हमने बहुत निकट से देखा था। उन्होंने औरंगजेब से स्पष्ट शब्दों में कहा था। अपने इस व्यवहार से आपने अपने श्रेष्ठ तुर्क वंश को कलंकित किया है। प्रजा राजा की सन्तान जैसी होती है। उसमें हिन्दू और मुसलमान जैसा अन्तर नहीं करना चाहिए। हमारे पिताजी ने इस प्रकार का भेद कभी नहीं किया। हिन्दवी स्वराज्य खड़ा करते समय उन्होंने बीजापुर की आदिलशाही से सात हजार पठान अपनी सेना में भर्ती किये थे। आज भी दौलतखान और दरियाखान जैसे नरवीर हमारी सेना में हैं।" दुर्गादास ने दुख से कहा, "कहाँ शिवाजी और कहाँ औरंगजेब ? केवल भौगोलिक सीमा के विस्तार से कोई राज्य बड़ा नहीं होता। राजा के मन की 320 :: सम्भाजी
विशालता महत्त्वपूर्ण होती है। शहजादा अकबर ने वचन दिया था कि वे उगते सूर्य की किरणों के साथ ही किले पर पहुँच जाएँगे। किन्तु दोपहर हो जाने पर भी उनका कहीं पता नहीं था। इसलिए दुर्गादास और सम्भाजी चिन्तित हो गये थे। अन्त में बड़ी देर से शहजादे की पालकी गढ़ पर पहुँची।'' अपने क्षोभ को भीतर ही दबाते हुए शम्भुराजा ने कहा, "शहजादे, नीचे की तलहटी से किले के ऊपर आने में यदि आपको इतना समय लग गया तो इस गति से आप दिल्ली पर आक्रमण कैसे करेंगे ?'' शम्भुराजा की बात सुनकर दुर्गादास हँसने लगे। शहजादे की धीमी गति को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा, "क्या बताऊँ शम्भू महाराज, शहजादे के इसी ऐशो-आराम ने हमें पीछे रोक लिया, नहीं तो हम बादशाह औरंगजेब की दस महीने पहले ही छुट्टी कर दिये होते।'' "क्या कह रहे हैं?'' "हाँ महाराज ! इस शहजादे के लिए खुदा ने स्वर्ण अवसर का दरवाजा खोल दिया था। औरंगजेब इतना अकेला पड़ गया था कि उस समय उसके पास दस- बारह हजार की फौज भी नहीं बची थी। और इस शहजादे के झंडे के नीचे हम एक लाख राजपूत खड़े थे। अब विजय हमारी है और दिल्ली की गद्दी भी अपनी। इस विचार की खुमारी में ये महाशय इतने मशगूल हो गये कि एक सौ बीस मील की दूरी तय करने में इन्हें पन्द्रह दिन लग गये। इस बीच के समय में कभी नया सिंहासन बनाने के लिए बढ़इयों को बुलाना कभी शाही वस्त्र तैयार करने के दर्जियों की फौज एकत्र करना जैसे व्यर्थ के कामों में शहजादे ने स्वर्ण अवसर गँवा दिया। हमारी इस मूर्खता भरी दीर्घसूत्रता का फायदा उस बूढ़े ने उठाया और कपट नीति से कटार भोंककर शहजादे को अक्षरशः खानाबदोश बना दिया।'' महल में खुली चर्चा चल रही थी। उसमें कवि कलश भी आकर सम्मिलित हो गये थे। दुर्गादास के बताने पर शहजादे को भी वह बुरा दिन याद आया। उसने स्पष्ट रूप से अपनी भूल स्वीकारते हुए कहा, "उस समय मेरी नालायकी ही आड़े आ गयी। इसमें कोई सन्देह नहीं। किन्तु मेरा बाप औरंगजेब है उस्तादों का उस्ताद।'' "वह कैसे ?'' "क्या कहूँ राजन ! अकारण ही मैं अन्धश्रद्ध हो गया था। हमारी तख्तपोशी को किसी की नजर न लगे इसलिए रोज कितने मील चलना चाहिए, इसकी सलाह एक ज्योतिषी से लेता था। मेरे अब्बाजान ने चोरी चोरी उस ज्योतिषी को रिश्वत भेज दी थी। वह बदमाश आदमी मुझे दूर का मुहूर्त बताने लगा।'' दुर्गादास यकायक बहुत गम्भीर हो गये। उन्होंने कहा, "शम्भू महाराज ! सम्भाजी 321
आपने अपनी जिन्दगी में मनुष्यों के बीच अनेक देव और दानव देखे होंगे। किन्तु औरंगजेब की तरह का कपटी, धोखेबाज और सियार से भी बढ़कर धूर्त व्यक्ति कोई दूसरा आपने नहीं देखा होगा। शहजादे के इतनी देर से आने के बावजूद हम लोग उस रात विजय की देहरी तक पहुँच गये थे। उस समय बादशाह का तहव्वूरखान नाम का एक बहादुर सरदार भी हमारे साथ आ गया था। दूसरे दिन युद्ध आरम्भ होने वाला था। दोनों ही फौजें एक दूसरे से भिड़ने वाली थीं। बीच में केवल एक रात का झीना पर्दा बचा था। किन्तु दुर्भाग्य से तहव्वूरखान का ससुर इनायत खान और तहव्वूरखान की बीबी और उसके बच्चे बादशाह के कब्जे में थे। उस रात बादशाह ने तहव्वूरखान के पास एक गुप्त सन्देश भेजा- तुम भले ही हमारी सेना में सम्मिलित न हो फिर भी विचार-विमर्श के लिए चुपचाप मेरे डेरे में आ जाओ। यदि तू नहीं आया तो तुम्हारे बच्चों को गुलामों के बच्चों की तरह कुत्तों से भी कम दाम पर बेच दिया जाएगा। तुम्हारी खूबसूरत बीबी को नंगी करके फौजी बाजार में इज्जत लुटाने के लिए छोड़ दिया जाएगा। उस पत्र से तहव्वूरखान डगमगा गया। हममें किसी को बिना कोई सूचना दिये वह घबराया हुआ बादशाह के पास चला गया। आखिर जो होना था वही हुआ। बादशाह ने उस रात उसका कत्ल करके उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये।" "इस प्रकार की कपटी और धोखेबाज चाल केवल औरंगजेब चल सकता है।" कवि कलश ने कहा। "कविराज, उस रात बादशाह की कपटी चाल का कमाल अभी आगे है। उस धूर्त बादशाह ने एक दूसरा गुप्तपत्र अपने इस शहजादे के नाम लिखा। उसने ऐसी व्यवस्था की कि वह पत्र हमारे राजपूतों के हाथ लगे। आधी रात को मेरे नौकर ने मुझे सोते से उठाया। वह भयंकर पत्र मेरे हाथ में दिया। उसमें लिखा था-'बेटे अकबर! अपने गुप्त समझौते के मुताबिक तुमने तो कमाल कर दिया। मारे राजपूत युद्धवीरों को इकट्ठा करके मौत के सामने खड़ा कर दिया। क्या कहना? अब बस कल सुबह होने की देर है-सामने से मेरी फौज और पीछे से तुम्हारी फौलादी फौज। अपने दोनों के बीच राजपूतों का सर्वनाश करना है।' उस भयानक पत्र से मेरे होश उड़ गये थे। मैं अपने सोने के कपड़ों में ही बाहर निकला। उस पत्र के स्पष्टीकरण के लिए इस शहजादे के डेरे पर दौड़ता गया। किन्तु अपने इस महान शहजादे से हमारी भेंट ही नहीं हो पायी।" "क्यों ?" शम्भूराजा ने आश्चर्य से पूछा। "क्योंकि इस शहजादे ने अपने सेवकों को आदेश दिया था कि कुछ भी हो जाये पर मेरी नींद खराब नहीं करना। मैं उस समय बहुत चिल्लाया। पर शहजादे से भेंट नहीं हो पायी। वे उठने को तैयार ही नहीं थे। तब तहव्वूरखान के डेरे की ओर 322 सम्भाजी
भागा। वहाँ खान साहब भी अपनी जगह पर नहीं थे। वहाँ हमें सूचना मिली कि खान साहब पहले ही चुपचाप बादशाह के डेरे में चले गये हैं। सभी राजपूत योद्धा मुझसे नाराज हो गये। सभी ने विचार किया कि इन कपटी बाप बेटे के बीच अपनी बलि चढ़ाने से जीव बचाकर भाग जाना अच्छा है। नतीजा यह हुआ कि भोर में ही हम सभी राजपूत अपने डेरे-डंडे समेटकर अपने प्राण बचाने के लिए दूर भाग गये। क्या बताऊँ शम्भू महाराज, म्यान से तलवार निकाले बिना इस औरंगजेब नाम के व्यक्ति ने हमारी एक लाख की फौज को भगा दिया और शहजादे के लिए कब्र खोद दी।'' दुर्गादास के मुँह से सारी घटना को सुनकर सभी लोग सन्न रह गये। परिस्थिति को भाँपकर शम्भूराजा ने प्रश्न किया- "लोग तो कहते हैं कि आप बादशाह के सबसे प्रिय शहजादे थे। ऐसा भी कहते हैं कि आज भी आपको वापस बुलाने के लिए सन्देश पर सन्देश आते हैं?" "हाँ राजन, शाहंशाह के पत्रों में बड़े आत्मीय और प्रेम भरे शब्द होते हैं। किन्तु मैं कभी भूल नहीं सकता कि वह एक चालाक और बदमाश गीदड़ का नाटक है।" बोलते-बोलते अकबर बहुत भावुक हो गया। वह कातर स्वर में कहने लगा- "मेरे चाचाजान दारा कितने बड़े संस्कृत पंडित, विद्वान और योग्य व्यक्ति थे। वे दिल्ली की गरीब-गुर्बा हिन्दू और इस्लामी प्रजा के सहारे थे। हमारे दादाजान शाहजहान साहब के वे सबसे प्रिय शहजादे थे। उस दाराशुकोह को हमारे अब्बाजान ने धोखे से मार दिया था। अपने बचपन का वह दिन आज भी मुझे याद है। हमारे अब्बाजान औरंगजेब हम सभी को साथ लेकर राजमहल की तीसरी मंजिल पर बैठे थे। उसी समय नीचे रास्ते से भिखारियों से भी गंदा दिखने वाले एक व्यक्ति का जुलूस जा रहा था। उसके आगे पीछे शहनाई, झाँझ और तुरुहियाँ बज रहे थे। पीछे चलने वाले सभी लोग शाही दरबार के दिखाई पड़ रहे थे। "सभी के बीच में कीचड़ और गोबर से सनी एक रुग्ण हथनी चल रही थी। उसकी पीठ के हौदे में कोई मूलतः गौरांग किन्तु किस्मत की मार से काला हो गया एक तरुण बैठा था। उसके शरीर के शाही लिबास चिथड़े-चिथड़े कर दिया गया था। उसके शरीर पर सूखे रक्त के धब्बे थे। किसी ने उसे बेदम करके मारा था। फटे कपड़ों में सिर नीचा किये बैठे उस अभागे व्यक्ति के पीछे एक चौदह वर्ष का लड़का खड़ा था। वह लड़का भयभीत बकरी की तरह चारों ओर देख रहा था। उस पर मेरी नजर पड़ते ही मैं चौंक गया। बादशाह से चिल्लाक बोला- "अब्बाजान, आपने हाथी पर बैठे उम लड़के को देखा? वह तो अपना सिफीर है।" 'जी हाँ, जानता हूँ। वह अभागा आदमी तुम्हारा बेवकूफ चाचा दारा है और सम्भाजी 323
उसके साथ उसका बदनसीब बेटा सिफीर है।' "मैं एकदम से चिल्लाया और नाराजी से अब्बाजान से पूछा—मेरे चाचाजान और सिफीर भैया की ऐसी बुरी हालत किसने बनाई? कौन है वह मूर्ख मनुष्य? कहाँ है वह? इस पर मेरे अब्बाजान ने मेरी नाक पर ऐसा घूँसा मारा कि मैं चक्कर खाकर बगल में गिरकर कुछ समय के लिए बेहोश हो गया। दो दिनों के बाद मैंने उसी दुर्बल हथिनी की पीठ पर चाचाजान की सूखी लाश देखी थी। कुछ दिनों के बाद हमारा पाठशाला में पढ़ने वाले सरदारों के बच्चों ने मुझे एक हकीकत बतायी—मरने के पहले हमारे चाचाजान और सिफीर को एक अँधेरी कोठरी में रखा गया। एक रात जब बादशाह के जल्लाद उस कोठरी में घुसे, मशाल के उजाले में कत्ल करने वालों की डरावनी सूरत को छोटे सिफीर ने देखा तो वह छिपकली की तरह अपने पिता से लिपट गया। वह गाय के बछड़े की तरह रँभाने लगा। वह उन दुष्टों से प्रार्थना कर रहा था—नहीं, हमें आपका तख्त नहीं चाहिए, ताज नहीं चाहिए। हम दोनों यह देश छोड़कर चले जाते हैं। किसी दूसरे देश में जाकर, हाथ में कटोरा लेकर अल्लाह के नाम पर भीख माँगेंगे। लेकिन हमारे अब्बाजान को मत मारो। जैसे किसी के कपड़े फाड़कर उसके टुकड़े फेंक देते हैं उसी प्रकार उन दुष्टों ने छोटे सिफीर को खींचकर अलग फेंक दिया। उस समय चाचाजान भी अत्यन्त दीन स्वर में कह रहे थे—'मेरे छोटे भाई औरंगजेब को मेरा सन्देश दो—तुम्हारा तख्त और ताज तुम्हें मुबारक हो। हमें भिखारियों के कटोरे दे दो। किन्तु हम बाप बेटे को जीने दो।' "उन राक्षसों ने सिफीर को बगल की कोठरी में बन्द कर दिया। बकरा काटने वाला भी पहले बकरे को काटता है फिर उसकी खाल उतारता है। किन्तु उन दुष्ट जल्लादों ने हमारे चाचाजान के जीते हुए पहले उनके हाथ पैर काटे। अन्त में सिर कलम किया। बन्दीखाने की दीवार तोड़ देने वाली अपने पिता की चीख सिफीर ने सुनी थी। हिन्दुस्तान की तख्तपोशी करके सिंहासन पर बैठने का सपना अपने पिता के लिए जिस सिफीर ने देखा था, वही सिफीर अपने उस अभागे पिता के करुण अन्त का गवाह बना। "इसके बाद सिफीर को अब्बाजान राजमहल में ले आये। किन्तु उस मानसिक आघात से वह पागल हो गया था। शहजादा होने की हैमियत से ऐशोआराम भोगते हुए मुझे उस चचेरे भाई की मासूम सूरत मेरी आँखों के सामने हमेशा बनी रही। आज भी मुझे उसकी याद पागल कर देती है। अपने फायदे के लिए अपने घरवालों की हत्या करने वाला यह मेरा बाप मुझे तो शाही लिबास में लहराने वाला जहरीला साँप ही लगता है।" अपने पिता की दुष्टता का पहाड़ा पढ़ते पढ़ते शहजादा अकबर भावाविष्ट हो 324 सम्भाजी
गया था। वह कुछ देर तक चुपचाप बैठा रहा। उसे लज्जा का अनुभव हो रहा था। तब शम्भूराजा ने उसे सान्त्वना देने के उद्देश्य से कहा- “और जो भी कहो, आपके अब्बाजान हैं बड़ी धार्मिक वृत्ति के। मन से पवित्र। दूसरों की स्त्रियों का आदर करने वाले एक नेक इनसान।” शम्भूराजा के ऐसा कहने पर शहजादा विषादपूर्ण हँसी हँसा। अपने बाप के आचरण की मीमांसा करते हुए उसने कहा, “हमारे अब्बाजान हमारे दादाजान शाहजहान जैसे रंगीले तो नहीं थे किन्तु रसिक तो थे ही।” “शहजादे! ऐसा क्यों कह रहे हो? आपके दादा ने भी तो अपनी बेगम की याद में इतना भव्य ताजमहल बनवाया। संसार के कला प्रेमियों के लिए एक आदर्श उपस्थित किया।” सम्भाजी ने कहा। “किन्तु ताजमहल बनाने के बाद हमारे दादाजान छब्बीस वर्ष तक जिन्दा रहे। इस बात को आप भूल रहे हैं क्या राजन?” शहजादा अकबर कहने लगा, “एक ओर ताजमहल खड़ा करके उन्होंने सारे संसार को बताया कि अपनी बेगम मुमताज महल से उन्हें कितनी मुहब्बत थी। दूसरी ओर हमारे दादाजान ने सरदारों की खूबसूरत औरतों को ही नहीं उस बुड्ढे ने दरबार की दासियों तक को नहीं छोड़ा। मुमताज महल की बहन फर्जाना बेगम को भी अपने बिस्तर पर खींचकर ले जाने मे सकोच नहीं किया। दादाजान के इसी दोगले व्यवहार से हमारे अब्बाजान को बहुत क्रोध आता था।” “यह सच है कि आपके पिता अपने पिता शाहजहाँ की तरह आचरण नहीं करते थे। उन्होने पराई स्त्रियों की ओर देखा तक नहीं।” कवि कलश ने कहा। “कविराज! ऐसा समझना भी ठीक नहीं है।” अपने को न रोक पाने के कारण अकबर कहने लगा, “आपको क्या पता? हमारे अब्बाजान की आज की लाडली बेगम उदयपुरी वास्तव में दाराचाचा की बेगम थीं। परन्तु चाचाजान की हत्या करने के बाद हमारे आलमगीर ने एक महीना भी नहीं बीतने दिया और उदयपुरी के साथ शादी कर ली। दारा चाचा की एक और बेगम थीं, रामादिल। उनके लिए भी हमारे अब्बाजान पागल हो गये थे। किन्तु यह बात अलग है कि उसने इनकी दाल नहीं गलने दी।” बोलते-बोलते शहजादा अकबर अपनी स्मृतियों में खो गया। वह बताने लगा, “एक बार मध्य एशिया से कुछ लोग अब्बाजान से मिलने आये थे। उस समय उन लोगों ने अब्बा जान को एक खूबसूरत दासी भेंट की थी। उस तुर्की दासी को अब्बाजान ने चुपचाप अपनी रखैल बनाकर जनानखाने मे रख लिया। उससे पैदा हुआ यत्लंगतोश खान नामक बेटा मुगल उमरावों के बीच घूमता दिखाई देगा।” कुछ आश्चर्य व्यक्त करते हुए कवि कलश ने कहा, “अकबर जी! गुस्ताखी सम्भाजी 325
माफ हो, हम सभी आपके पिताजी को अत्यन्त पाक-साफ और पवित्र मानते थे।'' "जाने दीजिए कविराज ! माना कि मेरे अब्बाजान एक पापी आदमी हैं। परन्तु अपने जन्मदाता बाप की कितनी बुराई की जाये ? इसकी भी कोई सीमा है कि नहीं ?'' बोलते बोलते शहजादा अकबर बहुत गम्भीर होने लगा—"हमारे अब्बाजान के असली और नकली रूप को तो अल्लाह ही जाने, किन्तु वे अल्लाह और इस्लाम की सेवा का अभिनय खूब करते हैं। दिन-रात नमाज पढ़ते हैं, मुल्ला-मौलवियों की सभा में सिर ऊँचा करके बैठते हैं, कुरान की प्रतियाँ बनाते हैं, उसमें चित्र निकालते हैं, टोपियाँ सिलते हैं और उससे प्राप्त धन को किसी मस्जिद को दान कर देते हैं। सच कहें तो मुझे कुछ और ही लगता है। हमारे अब्बाजान ने जीवनभर पाप किया, अपने भाइयों का सिर काटा, उनके शहजादों को कुचलकर मार डाला, अपने बूढ़े बाप के साथ छल किया। उनके पापों के पिशाच रात को ही नहीं दिन में भी उनकी आँखों के आगे नाचते रहते होंगे।'' 326 :: सम्भाजी
जंजीरा ! जंजीरा ! एक ब्रिटिश वकील हेनरी आक्सीडेन ने एक बार रायगढ के किले पर शम्भुराजा से कहा था—'अच्छा हुआ जो आपके पिताजी नाविक के रूप में पैदा नहीं हुए नहीं तो जमीन के साथ साथ इस विशाल समुद्र के भी मालिक बन गये होते।' हेनरी के इस कथन को शम्भुराजा कभी भूलते नही थे। जब जब समुद्र का नीला विस्तार उनके सामने आता, उनकी भावनाएँ तीव्र हो उठतीं। कभी कभी वे अपना घोड़ा लेकर समुद्र के किनारे जाते और देर-देर तक खड़े होकर उसे देखते रहते। समुद्र में उठती ऊँची लहरों को देखकर वे विभोर हो जाते थे। दो दो पोरसा ऊँची उठती लहरों को देखकर शम्भुराजा उन्मत्त हो उठते थे। उनके फेफड़ों में हवा प्रविष्ट होकर एक नया तूफान पैदा कर देती थी। ऊपर सूरत से लेकर नीचे कारवार तक सम्पूर्ण समुद्री किनारे को अपने अधिकार में करना शिवाजी महाराज का चिरपोषित स्वप्न था। उस स्वप्न को पूरा करने के लिए शम्भुराजा का चित्त व्यथित और व्यग्र हो उठता था। एक बार शिवाजी महाराज ने शम्भुराजा को अत्यन्त सरल शब्दों में बताया था—"खेत में फसल के तैयार होते ही जंगली सुअर नाक उठाकर उसकी ओर देखने लगते हैं, फसलों पर आक्रमण करते हैं। ये पुर्तगाली, अँग्रेज सिद्दी आदि भी पानी के सुअर हैं। जब कोई जंगली सुअर किसी मनुष्य पर आक्रमण करता है तो एकदम सीधी रेखा में दौड़ता है। उसकी नाक के पास के दोनों दाँत तेंदुओं के काँटो से भी अधिक तीक्ष्ण और धारदार होते हैं। उनके वार से मनुष्य घायल होने से बच नहीं सकता। समुद्र के तीनों पशु समूह उन सुअरों की भाँति ही हमारे स्वराज्य को प्यासी नजरों से घूरते रहते हैं।" शम्भुराजा अपने पराक्रमी पिता को बार बार स्मरण करते। गुप्तचर ने खबर दी कि नागवणे और रोह्या के कुछ किसान शम्भुराजा से सम्भाजी 327
तत्काल मिलना चाहते थे। उस समय शम्भूराजा अपने विश्वस्त सहकारियों और कर्मचारियों के साथ विचार-विमर्श कर रहे थे। उन्होंने कुछ खिन्नता के स्वर में कहा, ‘‘अब शाम हो गयी है। उन्हें कल सुबह ही मिलने को कहो।’’ ‘‘जी! जैसी आपकी आज्ञा।’’ गुप्तचर अभिवादन करके चला गया। किन्तु शम्भूराजा ने तुरन्त उस जासूस को रोककर कहा, ‘‘ऐसा करो, उन बेचारों को अभी भेज दो। नहीं तो किले के दरवाजे बन्द हो जाएँगे और उन बेचारों को नाहक रुकना पड़ेगा।’’ शम्भूराजा के सामने आते ही उन साधारण किसानों के गले रुँध गये। वे राजा के पैरों में गिरकर रो-रोकर अपना दुखड़ा सुनाने लगे—‘‘महाराज उन हैवान सिद्दियों ने हमारे गाँव के पचीस युवकों का अपहरण कर लिया है।’’ ‘‘उनमें हमारे नागोण्णे के व्यापारियों के लड़के भी हैं।’’ एक व्यापारी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। ‘‘कविराज! सिद्दी इन तरुणों को कहाँ ले जाता है ? क्या करता है उनका ?’’ शम्भूराजा ने पूछा। ‘‘मुम्बई, अँग्रेज अच्छी खासी रकम देकर इन तरुणों को खरीदते हैं और उन्हें गुलाम बनाते हैं। मुम्बई में गुलामों का व्यापार अधिकांशतः हमारे प्रदेश के बच्चों से ही चलता है।’’ कवि कलश ने सूचित किया। शम्भूराजा बहुत गम्भीर हो गये। उन्होंने सरकारी खजाने से इन ग्रामीणों को कुछ धन दिया। उनके कष्ट को कम करने की हर सम्भव कोशिश की। उन्होंने प्रजा को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘हम शीघ्र ही इन सिद्दियों की कोई न कोई व्यवस्था करेंगे।’’ किसानों को कुछ राहत मिली। शम्भूराजा ने तत्काल कवि कलश को पत्र लिखने के लिए कहा, ‘‘कविराज, मुम्बई के अँग्रेज वार्ड साहब को बताइये कि हमारे राज्य में जवानों की गुलामों की तरह नीलामी करोगे तो ठीक नहीं होगा। यह जानो कि नारियल और आदमी के सिर में अन्तर होता है। न्यायपूर्ण ढंग से रहो अन्यथा हम तुम्हें तुम्हारी गोदियों से बाहर नहीं निकलने देंगे।’’ इस पत्र के बाद ही शम्भूराजा ने चौलबन्दर के सूबेदार को आदेश दिया— ‘‘समुद्र पर पहरा बैठा दो। अँग्रेजों के मुम्बई की ओर जाने वाले अनाज से भरे जहाजों को रोको और लूट लो। हमारे प्रदेश का एक भी अनाज उन गोरे बदमाशों को नहीं मिलना चाहिए।’’ पत्र तुरन्त भेजे गये। विशालकाय समुद्र भँवर में फँसकर जैसे कोई चीज गोल मोल घूमती रहती है, उसी प्रकार शम्भूराजा का मस्तिष्क समुद्र के सम्बन्ध में 328 :: सम्भाजी
सोचते हुए उलझकर घूमने लगा। उन्होंने कवि कलश से कहा, "जमीन पर खड़े ये गिरिशिखर जिस प्रकार स्वाभिमानी मनुष्य को चुनौती देते रहते हैं, उसी प्रकार सागर की विशालता, उसकी गहराई, उत्ताल लहरों की गर्जना, उसकी उद्दाम गति हमें चुनौती देती रहती है। पन्हाला किले पर शिवाजी के साथ आखिरी भेंट शम्भूराजा के लिए अमूल्य निधि बन गयी थी। उसी अवसर पर महाराज ने अपने लाड़ले शम्भूराजा को समुद्र सम्बन्धी अनेक महत्त्वपूर्ण सूचनायें दी थीं। समुद्री नीति से उन्हें भली-भाँति अवगत कराया था। जब शम्भूराजा मात्र 14 वर्ष के थे। उस समय सन् 1671 में होली की रात में रायगढ़ पर विलक्षण घटना घटी। उस भयानक रात को शम्भूराजा कभी भूल नहीं पाये। आधी रात के बाद विस्फोटों की प्रचंड आवाज सुनाई पड़ी। उस भयानक आवाज से रायगढ़ अजगर की तरह जाग उठा। किले पर घुड़सवार राऊतों की भाग- दौड़ शुरू हो गयी। पहरेदारों की चीख-पुकार आने लगी। शिवाजी महागज शम्भूराजा के महल के पास भागते हुए आये। वहीं से वे अपनी ऊँची आवाज में कर्मचारियों को आदेश दे रहे थे। उस भयंकर कोलाहल के बाद जीजामाता शीघ्रता से शम्भूराजा के शयनकक्ष में आयीं। पीछे-पीछे शिवाजी महाराज भी वहीं पहुँचे। तब तक कर्मचारियों ने सूचित किया कि कानों के पर्दे फाड़ देने वाला वह श्रृंखलाबद्ध विस्फोट रायगढ़ पर नहीं हुआ था। आसपास के किलों पर घाटी में भी कुछ नहीं हुआ था। शिवाजी महाराज ने बड़े प्यार से अपने लाडले की पीठ पर हाथ फेरा। उनकी वह चकित मुद्रा को देखकर जीजामाता का भी दिल बैठ गया। उनके बोलने के पहले ही शिवाजी महाराज ने कहा, "उधर जंजीरे पर कुछ विशेष घटित हुआ है।" महाराज के स्पष्ट करने पर भी जीजामाता सम्भ्रमित थीं। रायगढ़ से जंजीरा लगभग चालीस मील दूर था। इतनी दूर से विस्फोटों की इतनी तेज आवाज कैसे पहुँच सकती थी ? महाराज से चिपकते हुए शम्भूराजा ने कहा, "पिताजी, आराम करने के लिए हम आपके महल में चलें ?" "क्यों ? हम यहीं बैठे रहेंगे। हमें तो पूरी रात जागकर बिताना है, युवराज ! जब तक हमारे गुप्तचर पूरी जानकारी लेकर नहीं आते तब तक नींद कैसी ? और चैन कैसा ?" उसके बाद शिवाजी महाराज और जीजामाता बहुत समय तक चर्चा करते रहे। अपनी माताजी को चिन्तित देखकर महाराज ने कहा, "माताजी ! यदि धरती के साम्राज्य को बनाए रखना है तो जलस्तर पर शासन करने की व्यवस्था करनी होगी। समय तीव्रगति से बदल रहा है। एक न एक दिन जंजीरे की अभेद्य दीवारों पर अपना सम्भाजी . 329
भगवा फहराने के अतिरिक्त दूसरा कोई चारा नहीं है।" जीजामाता ने धीर गम्भीर आवाज में पूछा—"शिवा! और कितनी बार जंजीरे पर आक्रमण करोगे? जंजीरा जीतने के लिए कितनी कीमत चुकानी पड़ी? कितने लोग मारे गये? और उस जल देवता को अभी और कितनों की बलि चाहिए?" शिवाजी महाराज ने कुछ विचित्र ढंग से मुस्कराते हुए कहा, जंजीरे के हबशी बहुत जिद्दी और कट्टर हैं। दस साल हुए होंगे, वर्षा ऋतु के होते हुए हमने जंजीरे के किनारे की दंडा और राजपुरी चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया था। जंजीरा हाथ नहीं आ रहा था इसलिए समीप की पहाड़ियों पर चले आये। वहीं पर पद्मदुर्ग किला बनाकर आसपास के जलपोतों पर नियन्त्रण करने लगे। हमने अनेक बार जंजीरे का सामना किया। उस पर आक्रमण किया। उसके लिए क्या क्या नहीं किया? किन्तु वर्षों की प्रतीक्षा के बाद भी जंजीरा हमारे हाथ नहीं आया। उस रात शिवाजी महाराज बहुत देर तक अपनी माता के साथ चर्चा करते रहे। जिस प्रकार चक्रव्यूह भेदन का ज्ञान अभिमन्यु ने जिस तत्परता और सावधानी से ग्रहण किया था उसी निष्ठा से शम्भूराजा ने शिवाजी की सागरीनीति को अपने कानों में और मस्तिष्क में संचित किया। महाराज जीजामाता मे कह रहे थे—"माताजी ! समुद्र यात्रा को हिन्दू अधर्म वा पाप मानते हैं किन्तु यदि हमें अपने राज्य का विस्तार करना है तो सागरी यात्रा को धर्म या पुण्य का कार्य मानना होगा। अपनी नौ सेना को अधिक समृद्ध करना होगा। पर्वतों की तलहटी में कूदने वाले धनगर जवान, मधुमक्खियों के छत्तों में हाथ डालने वाले, बन्दरों से भी अधिक तेजी से पेड़ों पर चढ़ने वाले कोली जवान, हमारे भावल के पर्वतों के साहसी जवान यदि समुद्र की उत्ताल लहरों पर फेंक दिये जायें तो मछलियों की तरह तैरने लगेंगे। उसके बाद दूसरा दिन बहुत ही त्रासदायक था। समस्याओं के नुकीले रास्तों पर चलते हुए और अपने जख्मी हाथों से साम्राज्य के शिल्प को माकार करने वाले अपने पिता को बहुत समीप से देखा था। किन्तु उस दिन जैस गमगीन चेहरा शम्भूराजा ने दुबारा कभी नहीं देखा। उसके पहले दिन होली का त्यौहार था। दांडा और राजपुरी के किनारे की चौकियों पर तैनात मराठा सैनिक कुछ असावधान थे। उसी रात सिद्दी कासिम और उसका भाई खैर्यात पाँच सौ हबशी सैनिकों को लेकर आक्रमण किये। वे अपनी सेना को दो भागों में बाँटकर नौकाओं से इस पार उतर आये। जब इस पार होली का हंगामा मचा हुआ था। तब पानी के रास्ते छुपकर आये शत्रु ने सामने वाले बुर्ज पर सीढ़ियाँ लगाकर दोनों ओर से एक साथ आक्रमण किया। मराठों का शिविर बीच में फँस गया। शिवाजी महाराज ने भविष्य को ध्यान 330 :• सम्भाजी
में रखते हुए आगामी युद्ध के लिए किनारे पर कई बारूद से भरे गोदाम बनाए थे। दुश्मनों ने उन्हीं गोदामों में आग लगा दी थी। इन्हीं गोदामों से प्रचंड विस्फोट हुए थे। विस्फोट की भीषण आवाज से आसपास के गाँववालों के कानों के पर्दे फट गये। इस दुखद समाचार को सुनकर शिवाजी महाराज रायगढ़ में बहुत व्यथित हुए थे। वे अत्यन्त बुझे स्वर में अपने सहकर्मियों को बता रहे थे—"पिछले सात-आठ वर्षों में अथक परिश्रम से मुरुड के किनारे जो कुछ कमाया था वह सब कुछ अग्निदेवता ने छीन लिया। " यह पुराना इतिहास शम्भूराजा अपने सहयोगियो को बता रहे थे उसी समय कवि कलश ने पूछा—"शिवाजी महाराज ने जजीरे पर पहला आक्रमण कब किया था?" "बहुत पहले, अपनी जवानी के दिनों मे। अफजल खान को मारने के पहले से ही जजीरे न उनकी नींद हराम कर रखी थी। सबसे पहले व्यंकोजी पन्त और उसके बाद मोरोपन्त पेशवा ने जजीरे पर आक्रमण किया था। मराठों के पहले आक्रमण से सिद्दी खैर्यात की आँखें सफेद हो गयी। अपनी जान बचाने के लिए उसने समझौता कर लिया। किनोर की भागरदडा, राजपुरी और अन्य चौकियाँ उसने मराठो को दे दीं। अब बाकी बचा था केवल जजीरा। पिताजी की दृष्टि जंजीरे की ओर टकटकी लगाये देख रही थी। उसी समय पिताजी ने जजीरे पर आक्रमण किया होता किन्तु दूसरी ओर से बीजापुर का अफजल खान बहुत बड़ी सेना लेकर तूफान की तरह बढ़ता आ रहा था। आक्रमण उसकी ओर से हुआ था इसलिए न चाहते हुए भी पिताजी को जंजीरे पर आक्रमण अधूरा छोड़कर लौटना पडा।" "फिर ?" "फिर क्या? दस साल बाद पिताजी ने एक बार फिर सिद्दियों पर आक्रमण किया। जजीरे वालों के ध्यान मे आया कि मराठे अब हार नहीं मानने वाले हैं। तब भयभीत सिद्दी दिल्ली के बादशाह औरंगजेब की शरण मे जा गिरा। वह मुगलों का मांडलिक बना दिया गया। उसे मुगलों से सेना, अनाज, बारूद आदि की सहायता मिलने लगी। इस तरह वह बच गया।" यह चर्चा जोरों पर थी कि शम्भूराजा ने निश्चय कर लिया है कि जंजीरे पर वे हर हालत में अपनी विजय पताका फहराएँगे। इसीलिए उन्होंने उस बैठक में दर्या सारंग, भयानक भंडारी और सागरी अभियान के अनुभवी तांडेलों को भी सम्मिलित किया था। उन्होंने जंजीरा, अली बाग से मुम्बई तक के सागर तट को दिखाने वाला मानचित्र सामने रखा। समुद्र के किनारे पर अंकित एक स्पष्ट बिन्दु की ओर संकेत करते हुए शम्भूराजा ने कहा, "यह देखो। यह मुम्बई बन्दरगाह है। यह मूलतः पुर्तगालियों के सम्भाजी :. 331
अधिकार में था। किन्तु अपनी बेटी के विवाह में पुर्तगाल-राजा ने अपने अँग्रेज दामाद को भेंट कर दिया। तब से मुम्बई पर अँग्रेजों का अधिकार है। जंजीरे के सिद्दी और अँग्रेज दोनों ही बहुत चालाक और धूर्त हैं। वे केवल अपना लाभ देखते हैं और हमारे स्वराज के लिए संकट पैदा करते रहते हैं। किसी की बाँह में छुरा भोंक देने से वह बेकाम की हो जाती है, उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है। उसी तरह मुम्बई की बगल में थल गाँव के पास यह जो छोटा टापू है। उसी पर पिताजी ने नया किला बनाने का निश्चय किया था। किन्तु धूर्त अँग्रेजों ने समझ लिया था कि मराठों की सेना का यहाँ तक पहुँच जाना बगल में छुरा भोंकने जैसा ही है। मराठों के बढ़ते समुद्री प्रभाव का सीधा मतलब था सिद्दियों के खात्मे का खतरा। यह बात सिद्दी भी अच्छी तरह जानते थे। इसीलिए एक दिन सिद्दियों की तोपें इस किनारे पर गोले उगलने लगीं। आग उँगलती तोपों की अग्नि वर्षा के कारण पिताजी ने किले का निर्माण स्थगित कर दिया। " बैठक में सभी ने शिवाजी महाराज की दूर दृष्टि की प्रशंसा की। बोलते बोलते शम्भूराजा ने खंदेरी के पास का एक छोटा बिन्दु दिखाया। और कहा, "यह उंदेरी है जो खंदेरी से केवल दो मील की दूरी पर है। अँग्रेजों ने मराठों का मुकाबला करने के लिए सिद्दियों की बहुत सहायता की। इसी से सिद्दियों ने मराठों का सामना करने के लिए उंदेरी पर अपना किला बनाया।" इस बैठक के दौरान शम्भूराजा बहुत भावुक हो उठे थे। उन्होंने कहा, "हमारे पिताजी ने इस जंजीरे को जीतने के लिए बहुत कोशिश की थी। मृत्यु के दो वर्ष पूर्व भी इस जंजीरे को जीतने की पूरी कोशिश की थी। उस समय अपने प्राणों और सेना की रक्षा के लिए सिद्दी कासिम अँग्रेजों की शरण में मुम्बई भाग गया था। इस पर भी पिताजी जरा भी विचलित नहीं हुए थे। मुम्बई के मझगाँव बन्दरगाह में सिद्दी कासिम की जो युद्ध सामग्री रखी गयी थी उसे ही जला देने की उन्होंने योजना बनाई। इस कार्य के लिए उन्होंने अपने पचास विश्वसनीय, वीर और साहसी सैनिकों को भेजा था। किन्तु अचानक सावधान हुए सिद्दी ने उन सभी की निर्मम हत्या कर दी। इस प्रकार महाराज का जंजीरा अभियान अन्तिम बार अटक गया।" "ऐसे कितने आक्रमण किये थे महाराज ने जंजीरा पर?" उदासीनता भरी हँसी के साथ शम्भूराजा ने कहा, "लगातार चौबास वर्षों तक यह नासूर महाराज के मस्तिष्क को पीड़ा पहुँचाता रहा। छोटे-बड़े कुछ आठ आक्रमण महाराज ने जंजीरे पर किये।" इस पूरी घटना का वर्णन शम्भूराजा बड़े लगाव के साथ कर रहे थे। इससे यह 332 :: सम्भाजी
भी सभी अनुभव कर रहे थे कि उनके मन में कुछ उथल-पुथल चल रही है। अपने मित्रों और बहादुर सहयोगियों से विदा लेते समय अत्यन्त भाव विह्वल स्वर में कहने लगे—‘‘जंजीरा और उसके आसपास का समुद्र तट आयात निर्यात और सामरिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मेरे पिताजी ने एक बार मुझसे कहा था— बेटा शम्भू! अगर आप जंजीरे पर भगवा झंडा फहराने में सफल हो गये तो हमारे हिन्दवी स्वराज की सीमा को गंगा यमुना तक पहुँचने में देर नहीं लगेगी।’’ दो पहाड़ों पर अँधेरे का साम्राज्य घटने लगा था। वृक्षों और छोटी पहाड़ियों के आकार स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। पंछियों और झरनों का कलरव स्पष्टतः सुनाई दे रहा था। इस भोर में ही शम्भुराजा का खासा और कवि कलश का तुर्की घोड़ा तेज गति से दौड़ रहे थे। उनके पीछे ईमानी रायप्पा का घोड़ा था और उनके पीछे चार सौ सवारों की सेना दौड़ रही थी। पिछली रात शम्भुराजा ने पाचाड़ कोट में पड़ाव डाला था और आज मुँह अँधेरे से ही दौड़ शुरू हो गयी थी। देखते-देखते पहाड़ का रमणीय प्राकृतिक परिसर आ गया। चारों ओर पहरेदारों की तरह चौकस खड़े पहाड़ और बीच में दूर तक फैली बाणकोट की खाड़ी दिखाई दे रही थी। दौड़ते-दौड़ते घोड़ों के मुँह के झाग निकल रहे थे। प्रातःकाल की आनन्ददायक सर्दी में भी ये जानवर पसीने के तर बतर हो रहे थे। उनके घुटनों तक लाल मिट्टी की परत चढ़ गयी थी। पूँछ के बालों में तमाम किरचें अटकी हुई थीं। वाणकोट खाड़ी के किनारे दूर से ही अनेक तम्बू और छोलदारियाँ दिखाई दे रहे थे। शम्भुराजा का नाविक दल पास आया। बाई ओर की पर्वत श्रृंखला को देखते हुए शम्भुराजा घोड़े से नीचे उतरे। उनके घोड़े की लगाम पकड़ने के लिए पाँच छ· कर्मचारी एक साथ आगे बढ़े। अभी भी हवा काफी सर्द थी। शरीर पर शाल ओढ़े और घोड़ों पर कपड़े बिछाये वृद्ध भायनाक भंडारी, दर्या सारंग, गोविन्दराव काँथे, सन्ताजी पावला, सिद्दी मिस्त्री जैसे नौसेना के अधिकारियों ने शम्भुराजा को घेर लिया। फूल मालाओं से उनका स्वागत किया। भायनाक को तो अपने राजा पर अत्यधिक गर्व सम्भाजी ३३३
था। वह उत्साह भरे शब्दों में कहने लगा—"वाह राजन! सूर्य निकलने के पहले ही आप यहाँ पहुँच गये। तबीयत बाग-बाग हो गयी।" "देर तो नहीं हुई?" शम्भूराजा ने पूछा। "नहीं नहीं, अभी तो सुतार कमाठी भी नहीं पहुँचे।" सन्ताजी पावला प्रशंसा के स्वर में बोले। शम्भूराजा खाड़ी के किनारे खड़े हो गये। खाड़ी के दोनों ओर अनेक छोटे- बड़े आवास और यन्त्रशालाएँ दिखाई दीं। पश्चिम की ओर से आने वाली विस्तृत खाड़ी से होकर आ रही थीं। हवा पानी के साथ अठखेलियाँ कर रही थी। पानी में खड़ी गुराब, पाल, तरांडी, माचवे जैसी अनेक छोटी बड़ी जहाजें अपनी जगह पर ही हिचकोले खा रही थीं। उन पर बँधे हुए भगवे झंडे तेज हवा के साथ फहरा रहे थे। शम्भूराजा वहीं पर स्वप्न के खोये में खड़े रहे। वे जल की सतह पर एकटक देख रहे थे। राजा की स्तब्धता से बाकी लोग भी शान्त थे। कविराज दो कदम आगे बढ़े और धीरे से कहा, "राजन?" "हाँ कविराज, यही वह बाणकोट की खाड़ी है। पिताजी को समुद्र स्नान का बड़ा शौक था। वे अनेक बार मन भर तैरने के लिए यहाँ आया करते थे। हमने तैरना कहाँ सीखा, पता है?" "कहाँ?" "यहीं, इसी बाणकोट की खाड़ी में। पिताजी की पीठ का सहारा लेकर हमने पानी में हाथ पैर चलाना सीखा। उसी समय पिताजी ने एक बार मुझसे पूछा था— 'बताओ शम्भू! मछली के बच्चे तैरना कब सीखते हैं?' मैंने आँखें बन्द किये हुए तुरन्त उत्तर दिया—'अपनी माँ के गर्भ से बाहर निकलते ही।' मेरा उत्तर सुनकर महाराज ने मुझे गले से लगा लिया और कहने लगे—'तुम्हें भी अब जीवन के समुद्र में हाथ पाँव चलाना सीखना चाहिए, हर समय सहाग देने के लिए बैठे थोड़े ही रहेंगे।' तब से प्रतिदिन मैं किले मे उतरकर रायगढ़वाड़ी की अठारह यन्त्रशालाओं का घूम-घूमकर निरीक्षण करता रहा। कभी समुद्रतट पर, कभी पहाड़ी किलों की ऊँची मीनारों पर घूम-घूम कर अपने निरीक्षण से सीखता रहा।" अपने नौकादल के लोगों और कर्मचारियों के साथ आगे बढ़े। तब तक दिन निकल आया था। सूरज की किरणें धीरे धीरे पानी में उतरने लगी थीं। इसी समय दादजी रघुनाथ देशपांडे का भूरा घोड़ा खाड़ी के तट पर पहुँचा। अपने से पहले शम्भूराजा को वहाँ पहुँचा देखकर अधिकारियों के होश उड़ गये। जहाज बनाने वाले कामाठी, भिश्ती आदि जल्दी-जल्दी पानी में उतर चुके थे। छोटी नौकाओं के सहारे अपने गुराबों पर या बड़ी नावों के ऊपर उछलकर चढ़ रहे थे। 334 :: सम्भाजी
सामने की नीली खाड़ी आँखों को लुभा रही थी। आगे पीछे, दाहिने-बायें धान के खेत फैले थे। सूर्य की कोमल किरणों से नहाई धान की बालें सुनहरी हो गयी थीं। धान की फसल पक कर तैयार हो गयी थी। कुछ जगहो पर कटाई का काम चल रहा था। किन्तु खेतों में केवल स्त्रियाँ और बच्चे ही दिखाई दे रहे थे। पुरुष अपने बाल-बच्चों को छोड़कर राजा के कार्य में लगे थे। कोली, भंडारी आगरी जैसे अनेक साहसी और लड़ाकू जाति के लोग शिवाजी महाराज की भाँति शम्भूराजा पर भी प्राण निछावर करते थे। शम्भूराजा के पैरों को विश्राम नहीं था। वे ताखे से आगे बढ़ते हुए शीघ्रता से सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे और बड़ी जहाजों के कार्य का निरीक्षण कर रहे थे। एक एक जहाज पर पन्द्रह-बीस बड़ी तोपें चढ़ाई जा रही थीं। उन्हें उचित जगह पर स्थिर किया जा रहा था। चिकनी, काली कलूटी काया तथा बलिष्ठ भुजाओं वाले चालीस चालीस नाविक बड़ी जहाजों को चलाने के लिए तैयार हो रहे थे। शम्भूराजा ने जहाज पर से किनारे की ओर देखा। बैलों की बीस-बीस जोड़ियाँ रस्सियों और जंजीरों से बाँधकर वृक्षों के तनों को खींचकर ला रही थीं। पास सैकड़ों बढ़ई तेजी से अपना काम कर रहे थे। काटने, तरासने और जोड़ने का कार्य तत्परता से चल रहा था। भायनाक भंडारी का मजबूत पंजा अपने हाथों में लेते हुए शम्भूराजा ने प्रशंमा भरे शब्दों में कहा, "इस बार दस बीस नये बड़े जहाज पानी में तैरने चाहिए। इस महाड़ बन्दरगाह पर ऐसा काम करके दिखाओ कि लोग यह कहना भूल जायें कि केवल कल्याण में ही अच्छे जहाज बनाये जा सकते हैं।" "महाराज आप यहाँ की चिन्ता न करें। महाड़ में ही नहीं नीचे जैतापुर और गजापुर में भी बहुत अच्छा काम चल रहा है।" शम्भूराजा की गरुड़ दृष्टि बाण को चीरते हुए, समुद्र को पार करते हुए जंजीरे पर जा टिकी। शम्भूराजा के दीर्घ निःश्वास छोड़ते ही दरियासारंग ने पीड़ा भरे स्वर मे कहा, "कोंडाजी बाबा जैसे आदमी से ऐसी उम्मीद नहीं थी उन्होंने बहुत गलत किया।" "जो चले गये उनका मातम न मनाओ। यह सोचो कि जो बचे हैं उनमें हाथी की ताकत कैसे भरी जाये।" शम्भूराजा गरजे। टहलते टहलते शम्भूराजा अधिकारियों को जो परामर्श दे रहे थे उसे सभी बड़े ध्यान से सुन रहे थे। नाविक अधिकारियों की ओर घूमकर वे कहने लगे- "साथियो! क्या आप जानते हैं कि मेरे पिताजी ने सिंधु दुर्ग किस तरह बनवाया? पानी के नीचे समतल पत्थरों में छिद्र करके उनमें पिघला लोहा डलवाया और उसके ऊपर जोड़ाई का काम करवाया। सैंकड़ों वर्षो तक समुद्र की तूफानी लहरें उससे टकराती रहें तो भी वह हिलने वाला नहीं है। इसी प्रकार उन्होंने सम्भाजी 335