छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
"जी हाँ, तब तक कल्याण और पनवेल को ध्वस्त करते हुए हसन अलीखान भी उस ओर से पहुँच जाएँगे। मुझे लगता है कि परसों तक हमारी तलवारें रायगढ़ के सीने तक पहुँच जाएँगी।" कीमती शराब के प्याले खाली करते हुए सिद्दी बन्धुओं ने आनन्द मनाया। दूसरे दिन प्रातःकाल अपने सात मंजिला शीश महल में कासिम की नींद टूटी। सैनिक अभियान पर प्रातः काल ही जाना था। उसने पर्दा हटाकर बाहर देखा। यह सुबह कुछ विचित्र लग रही थी। काले बादल नीले पानी में उतर आये थे। खाड़ी दिखाई देने वाला पहाड़ भी कुछ विचित्र लग रहा था। जलाशय से उठकर उसकी दृष्टि पहाड़ पर जा टिकी। वह उसी क्षण चकित होकर बिस्तर पर जा गिरा। सामने का दृश्य रोंगटे खड़े करने वाला था। पहाड़ के दायें-बायें सिरे पर भगवे झंडे फहरा रहे थे। एक रात में ही मराठों ने उस किनारे पर क़ब्ज़ा जमा लिया था और शक्तिशाली तोपों को यथास्थान व्यवस्थित कर रहे थे। पिछले दिन भागी हुई प्रजा अपने-अपने घरों में आ चुकी थी। मराठे दृढ़ थे और पैर जमाकर खड़े थे। मराठों ने सिद्दियों को अपने राज्य में पैर फैलाने का अवसर नहीं दिया। उन्होंने सिद्दियों से पहले ही आक्रमण कर दिया। नीचे की झाड़ियों में शम्भूराजा का घोड़ा खड़ा था और मुरुड और मांदाड़ खाड़ी की ओर से मराठा सैनिक जंजीरे पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ रहे थे। मराठों की योजना बहुत शक्तिशाली थी। तट पर तैनात हब्शी सैनिक भाग खड़े हुए। वे जंजीरे की बिल में चूहों की तरह दुबककर बैठ गये। राजपुरी पहाड़ की बगल में एक समतल भू भाग पर मराठों का शाही डेरा खड़ा किया गया था। अपने तंबू के सामने शम्भूराजा शान से खड़े थे। उनकी तीक्ष्ण दृष्टि समुद्र पर मंडरा रही थी। उनके एक ओर कवि कलश, जोत्याजी, केसकर और अनुभवी दरिया सारंग खड़े थे और दूसरी ओर शहजादा अकबर और दुर्गादास। बगल की एक खाट पर अरब सेनानी जंगेखान बैठे थे। रंगबिरंगी लुंगियाँ और चमड़े के कुर्ते पहने, घने जंगल-सी दाढ़ी बढ़ाए अरबी सैनिक मराठों की अपेक्षा विचित्र दिख रहे थे। पिछले कुछ दिनों से शम्भूराजा को अरबों से उच्च कोटि का बारूद मिलने लगा था। इस वजह से सिद्दी बहुत व्यथित था। जंजीरे की प्राचीरों की जोड़ाई बहुत मजबूत थी। अनेक वर्षों से लहरों के थपेड़े खाते हुए भी उसमें कहीं कोई दरार नहीं थी। प्राचीर को सशक्त बनाने वाले चूने और गिट्टी के मसाले को रंच मात्र भी क्षति नहीं हुई थी। पानी में डूबी किले की सीढ़ियों पर ज्वार-भाटे की लहरें टकराती थीं। वहाँ पर बुर्जों पर चलने वाली तेज हवा और लहरों के साथ हमेशा अठखेलियाँ होती रहती थीं। 358 :: सम्भाजी
शहजादा अकबर की ओर देखकर कवि कलश बोले, "जंजीरे के सिद्दी खैरियत खान और कासिम पक्के हैवान हैं। पैसे की लालच में ये किसी भी व्यक्ति को नोच डालने में संकोच नहीं करेंगे।" "कुछ दिन पहले श्रीबाग और पेण के कुछ अमीर मुसलमान व्यापारियों को भी पकड़कर ले गये। उन्हें उंदेरी के किले में बाँधकर खूब पीटा। हमारे लोग ही नहीं अंग्रेजों के वकीलों ने भी बीच बचाव किया। किन्तु अठारह हजार नकद लेने के बाद ही उन्हें छोड़ा।" शम्भूराजा ने कहा। इसी तरह का एक और कारनामा हब्शियों ने पिछले महीने किया था। उनकी अत्याचारी सेना ने पनवेल से लेकर चौल तक के सारे मराठी प्रदेश को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था। उसका बदला लेने के लिए शम्भूराजा ने स्वयं जंजीरे पर आक्रमण किया था। उनके साथ बीस हजार की फौज और छोटी बड़ी कुल तीन सौ नौकाएँ थीं। शिवाजी महाराज के स्वर्गवास का समाचार पाकर सिद्दी खैरियत और सिद्दी कासिम ने पूरे दस दिन तक जंजीरे पर उत्सव मनाया था। अपने साथ अपनी फौज को भी खूब शराब पिलाई थी। यह सोचकर सिद्दी पागल हो उठे थे कि शिवाजी के स्वर्गवास के बाद मराठा शक्ति का अन्त हो गया है और अब उन्हें कोई भी रोक नहीं सकता। किन्तु थोड़े दिनों में शम्भूराजा ने उंदेरी पर आक्रमण करके सिद्दियों का घमंड तोड़ दिया। राजपुरी के पीछे के पहाड़ पर मराठों ने अपनी पाँच हजार की फौज तैनात की थी। ऊपर पहाड़ से नीचे पानी में देखने से पानी में तैरती नावें कुछ विचित्र दिखाई पड़ती थीं। ऐसा लगता था जैसे राजपुरी के दोनों ओर से बच्चों ने कागज की नावें छोड़ रखी हैं। किन्तु वह मराठों की असली सेना थी। शिवाजी महाराज की मृत्यु के केवल एक वर्ष में ही शम्भूराजा उनसे पाँच कदम आगे निकल गये थे। सुसज्ज सेना संगठित करके पश्चिमी तट पर शासन करने वाले और कुछ शतकों से जमे हुए सिद्दियों को उन्होंने ललकारा था। तीन सौ नौकाओं का बेड़ा लेकर शम्भूराजा स्वयं जंजीरे के समुद्र में उतरे थे। सिद्दी खैरियत और कासिम अनेक बार किले के बुर्ज पर आकर खड़े होते और भयभीत नजरों से दूरबीन की सहायता से पानी की ओर देखते। राजपुरी से लेकर मुरुड गाँव के तट पर और वहाँ से पद्मदुर्ग की ओर लगभग एक मील तक देखने पर लगभग सौ नौकाएँ तैरती नजर आती थीं। उनका नेता प्रसिद्ध नाविक दरिया सारंग था। इस दिशा से अनेक बार तोप के गोले आकर जंजीरे से टकराते थे। राजपुरी से आगरदांडा और दीघी तक के परिसर में लगभग सवा सौ नावें खड़ी थीं। सम्भाजी :: 359
इस तरफ का नेतृत्व भयानक भंडारी के हाथ में था। इसके अतिरिक्त मांदाड़ की खाड़ी में सत्तर नावों का बेड़ा तैयार खड़ा था। मराठा जहाजों पर भगवा झंडा फहराते देख सिद्दी बन्धुओं को पसीना छूटता था। सिद्दियों को इस बात का अनुमान हो गया था कि वे सेना के बल पर शम्भूराजा के सामने एक दिन भी नहीं टिक पाएँगे। जंजीरे की अजेय फौलादी तटबन्दी ही उनका एकमात्र आधार था। यह किला यदि उनके पास न होता तो उन्हें अपने पूर्वजों की तरह अफ्रीका को जाने कब लौटना पड़ गया होता। राजपुरी के पास समुद्र में दोनों ओर तरांडी, ताखे, गुरबा, पगार, शिबाड़ी जैसी अनेक जाति की जहाजें पानी पर तैर रही थीं। उन पर जंबुरे, बन्दुका, कड़ाबिन जैसी अनेक छोटी-बड़ी तोपें रखकर दोनों ओर से सेनाएँ तैयार थीं। बीच-बीच में गोले दागे जाते थे और फिर रोक दिये जाते थे। रसद और उच्च कोटि के गोला- बारूद लेकर पाँच हजार मराठा नाविक पानी में उतरे थे। जंजीरा किले पर फहराता हरा झंडा भयभीत दृष्टि से मराठा सेना की ओर देख रहा था। इस प्रकार का सुनियोजित और बलशाली आक्रमण जंजीरे पर पहली बार हो रहा था। ऐसे समय में कोंडाजी फर्जन्द जैसे वीर पुरुष का शत्रु से मिलना और उनका सिद्दियों की गुलामी करना, अपना स्वाभिमान भूल जाना मराठी सेना को बहुत बुरा लगता था। इसलिए यदि कोई भूल से भी कोंडाजी का नाम ले लेता तो मराठा सैनिक उसे घूरकर देखते थे और जंजीरे की ओर देखकर थूक देते थे। कोंडाजी को अपनी ओर करके सिद्दी ने मानो मराठों का एक हाथ तोड़ दिया था। किन्तु शम्भूराजा भी इस प्रकार के दाँव-पेंच में कम न थे। उन्होंने जंजीरे के एक वीर सिद्दी संबल के बेटे—सिद्दी मिस्त्री को अपनी ओर मिला लिया था। अपने साथ दो सौ नाविक दल लेकर वह सम्भाजी मे मिल गया था। सिद्दी मिस्त्री के साथ बैठकर शम्भूराजा जंजीरे से सम्बन्धित जानकारी लेते तो उधर कोंडाजी का कान पकड़कर सिद्दी बन्धु मराठों की शक्ति का अनुमान लगाते। युद्ध की स्थिति अपने चरम आवेश में थी। प्रातःकाल का समय था। सर्दी बहुत थी। रात की नींद से अलसाया हुआ कुहरा धीरे-धीरे जल की सतह से ऊपर उठ रहा था। घने कुहरे के बावजूद अपनी सेना सजग और उत्साहित देखकर शम्भूराजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। परन्तु उसी समय जंजीरे के मध्य भाग में, ऊँचाई पर चाँद सितारों वाला झंडा फहराता दिखाई पड़ा। यह शम्भूराजा के हृदय में भाले की नोंक की तरह चुभ रहा था। दुर्गादास और शाहजादा अकबर के साथ शम्भूराजा की जब भी बात होती थी, औरंगजेब का जिक्र निकल ही आता था। शम्भूराजा ने पूछा- “दुर्गादास ! अब 360 :: सम्भाजी
कहाँ तक पहुँच गये हैं शाहंशाह ?'' "उन्हें अजमेर से बुरहानपुर आये पूरे दो महीने हो गये। '' "वे किसी भी समय महाराष्ट्र में पहुँच सकते हैं। " शहजादे अकबर ने अपनी राय व्यक्त की। शहजादे की बात सुनकर शम्भूराजा कुछ सोचते हुए गम्भीर हो गये। तब जल दुर्ग की ओर संकेत करते हुए दुर्गादास ने उनसे कहा— "शिवाजी महाराज जैसे अनुभवी राजा का ध्यान इस किले की ओर बहुत पहले जाना चाहिए था। '' "दुर्गादास जी, आपको क्या पता कि इस किले पर कब्जा करने के लिए शिवाजी महाराज ने क्या-क्या नहीं किया। पर क्या करते ? यह सामने आते आते ओझल हो जाता था।" "वह कैसे ?" "अब यही देखिए न ! अपने श्रीबाग का लाय पाटिल नाम का एक बड़ा कुशल नौसैनिक था। जाति का कोली। जमीन पर चलने की अपेक्षा पानी में तैरते हुए उसने अपनी उम्र गुजारी थी। एक बार हमारे मोरोपन्त पेशवा की सलाह से उसने एक योजना बनायी। दोनों के द्वारा किये गये निश्चय के अनुसार अमावस्या की अँधेरी रात में छावनी से सीढ़ियाँ लेकर भूत की तरह जंजीरे के पिछले दरवाजे के पास पहुँच गया। वहाँ सीढ़ियाँ लगाकर पेशवों की प्रतीक्षा करता रहा किन्तु रात में झाड़ियों में पेशवे रास्ता भूल गये या उन्हें रास्ता मिला ही नहीं। अन्तत. सीढ़ियाँ उतारकर उसे वापस लौटना पड़ा। लाय पाटिल का यह साहस साधारण नहीं था। उसकी प्रशंसा में पिताजी ने उसे पालकी का सम्मान दिया था। परन्तु उसने बड़ी विनम्रता से इस सम्मान को अस्वीकार कर दिया। उसने महाराज से कहा, 'महाराज जब किला जीता ही नहीं गया तो मैं पालकी में बैठकर क्या करूँ ?' "कुल मिलाकर सब की यह राय बन गयी थी कि इस किले पर किसी भूत- प्रेत की छाया है। अन्यथा उसे प्राप्त करने के लिए सभी इतने पागल क्यों होते। उस कब्जा न कर पाने से शिवाजी महाराज और उनके साथ अन्य लोगों के मन में ऐसी टीस क्यों बनी रहती ?" शम्भूराजा को राजपुरी के किनारे डेरा जमाये दो सप्ताह बीत चुके थे। सम्भाजी जिस दिन वहाँ पहुँचे थे उसी दिन से दोनों ओर से तोपों की छुट-पुट गोलाबारी होती रही थी। किसी जहाज में आग लगती तो लगता कि पानी में लगी आग से आकाश की ओर धुआँ उठ रहा है। कभी-कभी दोनों सेनाओं में सामना भी होता किन्तु शम्भूराजा को इस आक्रमण में कोई उत्साह नहीं था। शम्भूराजा आक्रमण क्यों नहीं कर रहे थे? इसका रहस्य उनके निकट सहयोगियों को भी नहीं पता था। सम्भाजी :: 361
राजपुर की ओर नावों पर लगी तो तोपें बेताब हो रही-थीं तो उधर जंजीरे के सिंहद्वार के ऊपर लगी बाँगड़ी व्याघ्रमुखी और लांडा कासम जैसी पंच धातुओं से बनी अजेय तोपें पूरी तरह तैयार थीं। सिद्दी का विदेशों से बड़ा व्यापारिक सम्बन्ध था। इसका लाभ उठाकर उसने पेरिस, इस्ताम्बूल से लेकर पुर्तगाल तक के सुदूर देशों से उच्च कोटि का तोपखाना बना लिया था। इन तोपों को महत्त्वपूर्ण बुर्जों पर लगा दिया गया है। शम्भूराजा के सहकारी मुख्य आक्रमण के सम्बन्ध में उनसे घुमा-फिराकर पूछते रहते थे। शम्भूराजा इन प्रश्नों से ऊब गये थे। शम्भूराजा ने अपनी बाईं ओर खड़े शहजादा अकबर की ओर देखा किन्तु शहजादा वहाँ से उठकर पीछे चला गया था। वह अस्वस्थ दिखाई पड़ रहा था। उसकी ओर देखते हुए शम्भूराजा ने पूछा— "क्या बात है दुर्गादास ?" "शहजादे का लड़ाई में ध्यान ही नहीं है, और क्या ?" "कहाँ गायब हो गये हैं? कहाँ?" अन्य सहयोगियों के अलग चले जाने पर दुर्गादास शम्भूराजा के पास आकर धीरे से बोले, "रूपकुँवरि नाम की एक वेश्या है। उसका चौल के बाजार में कोठा है। उसकी अपनी कोठी है। शहजादे उसी के पास हमेशा जाया करते हैं। पिछले कई दिनों से अपने कद्रदान शहजादे के उधर न जाने से वह उदास हो गयी और दो दिन पहले यहाँ चली आयी। उसने मुरुड की बंजर भूमि पर अपना डेरा डाला है। कल से दो बार उमका शागिर्द शहजादे से मिल चुका है। तभी से अकबर बहुत अस्वस्थ हो गये हैं।" दुर्गादास की बात सुनकर शम्भूराजा हँसे और सेवक को भेजकर शहजादा अकबर को अपने पास बुला लिया। उसे छेड़ते हुए बोले— "अकबर, इसमें इतना शरमाने की क्या बात है? हम भी जाने-माने रसिक हैं। दिल्ली के शहजादे का दिल चुराने वाली वह नृत्यांगना कौन है? जरा हम भी तो देखें।" उस शाम शम्भूराजा अपने डेरे से बाहर निकले। यह देखकर शहजादा बहुत प्रसन्न हुआ कि उसकी दिलरुबा का नृत्य देखने के लिए शम्भूराजा सचमुच आ रहे हैं। उस रात मुरुड की बंजर भूमि पर एक शाही तम्बू में नृत्य की महफ़िल सजी थी। रूपकुँवरि जन्म से हिन्दू थी किन्तु उसकी माँ का विवाह एक सिद्दी सरदार से हुआ था। गाना-बजाना उसका पेशा था। स्वयं शम्भूराजा के महफिल में उपस्थित होने के कारण रूपकुँवरि के घुंघरुओं ने विलक्षण लय और गति पकड़ ली थी। वह मोरनी-सी नाच रही थी, हँस रही थी। अपनी मीठी आवाज में गाते हुए गर्दन को झटके दे रही थी। 362 :: सम्भाजी
रूपकुँवरि नाचते-नाचते शहजादा अकबर और शम्भूराजा के सामने आ रही थी। उसके मलमल के कुर्ते पर एक रत्नहार बहुत चमक रहा था। वे रत्न इतने उच्च कोटि के थे कि पास रखे चिरागों का प्रकाश उन पर से परावर्तित हो रहा था। उस दुर्लभ प्रकाश से पूरी रंगशाला प्रकाशित हो रही थी। शम्भूराजा का ध्यान उस रत्न हार पर गया। उन्होंने उँगली से संकेत करके रूपकुँवरि को अपने पास बुलाया और उसके गले का वह रत्नहार शीघ्रता से खींच लिया। हार में लगे रत्न चमकते हुए चारों ओर बिखर गये। शम्भूराजा के इस हस्तक्षेप से संगीत रुक गया। शम्भूराजा की क्रुद्ध मुद्रा देखकर रूपकुँवरि दस कदम पीछे हट गयी। उसके साज़ी भी डरकर दूर खड़े हुए। शम्भूराजा के उस परिवर्तन से शहजादा अकबर भी घबरा गया। शम्भूराजा ने क्रोधावेश में पूछा- "शहजादे, यह रत्नहार किसका है?" "आपने ही मुझे भेंट किया था।" अकबर ने उत्तर दिया। "वह मैंने एक राजा को भेंट किया था किसी नर्तकी को नहीं।" शहजादा अकबर कुछ लज्जित हुआ। फिर भी शम्भूराजा की बात का उत्तर देते हुए बोला, "सम्भाजी महाराज, यहाँ पर हम अपनी मर्जी के शहंशाह हैं। हमे जैसा उचित लगेगा वैसा करेंगे।" अकबर के इस व्यवहार से शम्भूराजा भयंकर रूप से क्रोधित हुए। वे गरजकर बोले, "ऐसा है तो पहले मेरी आँखों के सामने से दूर हो जाओ और अपने मनोराज्य या दिल्ली में बादशाह बनकर बैठो।" शम्भूराजा का यह रुद्र रूप देखकर शहजादा अकबर भयाक्रान्त होकर स्तब्ध रह गया। जो कुछ हो चुका उससे अधिक अप्रिय प्रसंग न घटित हो इसलिए दुर्गादास शहजादे को लेकर बाहर चले गये। महफिल अधूरी ही रह गयी। शम्भूराजा कवि कलश के साथ बाहर जाने लगे। इसी समय साहस करके रूपकुँवरि सामने आ गयी। शम्भूराजा का पैर पकड़ते हुए वह गिड़गिड़ाकर बोली, "महाराज, राजा-महाराजाओं की भाँति ही हम नृत्यांगनाओं की भी एक दुनिया होती है।" "क्या कहना चाहती हो?" "अब इसके अधिक किसको, कैसे और किस मुख से बताएँ?" कहते- कहते रूपकुँवरि की आँखें छलछला उठीं। वह रुँधे हुए स्वर में बोली- "अब सभी जगह यही बेइज्जती होगी कि रूपकुँवरि की महफिल से महाराज बीच में ही उठकर चले गये। कोई कहेगा कि अब रूपकुँवरि को पहले जैसा नाचना ही नहीं आता। कोई कहेगा कि वह अब बूढ़ी हो गयी है। इसलिए महाराज, मैं आपके सामने आँचल फैलाकर न्याय माँगती हूँ। इस नाचीज नर्तकी पर दया करें। इस प्रकार आधी महफिल छोड़कर न जाएँ।" रूपकुँवरि की बात सुनकर शम्भूराजा ने कवि कलश की ओर देखा। कलश सम्भाजी .. 363
कुछ भी बोलने की मनःस्थिति में नहीं थे। इतने में ही शहजादे को दूर हटाकर दुर्गादास शम्भूराजा से माफी माँगने के लिए वहाँ पहुँचे। शम्भूराजा ने रूपकुँवरि के दुखी चेहरे की ओर देखा। अपनी कमर में बँधी सोने की मुहरों वाली थैली उसके हाथ में पकड़ाते हुए वे बोले, "कोई पूछे तो कह देना कि महाराज को कोई बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य था, इसलिए चले गये। पर जाते समय इतना धन इनाम में दे गये हैं जो दस महफिलों के बराबर है।" रूपकुँवरि ने बड़ी विनप्रता से इनाम स्वीकार किया और सलाम करके बगल में हट गयी। शम्भूराजा जब अपने घोड़े की ओर बढ़ने लगे तब मौका पाकर दुर्गादास अत्यन्त विनीत स्वर में कहने लगे—"महाराज, आप इस शहजादे का बचपना इतने दिनों से देखते आ रहे हैं। उसके लिए इतना बुरा क्यों मानना चाहिए।" अनेक प्रकार के विचारों के मन्थन से शम्भूराजा की मुखमुद्रा बदल गयी थी। उन्होंने कहा, "नहीं दुर्गादास, अब इससे अधिक एक पल भी हम इस महफिल में नहीं रुक सकते। सच कहूँ तो मैं बड़ी रसिकता से इस महफिल में आया था। पर आपसे कैसे बताऊँ कि जब यहाँ तबले पर थाप पड़ती थी तो मुझे कानों के पर्दे फाड़कर कलेजे को दहला देने वाले तोपों के धमाके सुनाई पड़ते थे। अब यहाँ पर एक क्षण भी रुकना मेरे लिए अपराध होगा।" सात "कविराज, कर्नाटक में इक्करी के नायक और गोलकुंडा के कुतुबशाह को सन्देश भेज दिया गया?" "हाँ, उसी दिन।" कलश ने मुस्कराते हुए राजा की ओर देखा। शम्भूराजा की प्रश्नार्थक मुद्रा को देखते हुए कवि कलश तुरन्त बोले, "कमाल है आपका महाराज, जंजीरे की इस युद्ध भूमि पर अपने तम्बू के आसपास आग बरस रही है। ऐसे समय में भी आपको कर्नाटक की राजनीति का ध्यान बराबर बना हुआ है?" "कविराज, औरंगजेब पाँच लाख की सेना लेकर हमारे स्वराज्य की ओर बढ़ रहा है। इसका ध्यान तो है न आपको? इतनी विशाल सेना कुछ वर्षों तक युद्ध भूमि में जूझती रहेगी। औरंगजेब के साथ यह हमारी आखिरी लड़ाई होगी। उस समय 364 :: सम्भाजी
रसद और बारूद की बड़ी आवश्यकता पड़ेगी। जिंजी तंजौर जैसे दक्षिण के प्रदेशों से ही हमें वह प्राप्त हो सकेगी। "इसीलिए तो हमने हरजी जैसा बलशाली योद्धा कर्नाटक में नियुक्त किया है।" "वह तो बलशाली है ही, किन्तु मैसूर का राजा चिक्कदेव राय उसकी अपेक्षा कई गुना पराक्रमी है। पहले से ही वह मराठों से खार खाये बैठा है। उसके प्रदेश में जाकर उसे पराजित करना और औरंगजेब के विरुद्ध खड़ा करना अकेले हरजी के बूते की बात नहीं है।" कविराज ने शम्भुराजा से पूछा, "इसका मतलब कर्नाटक पर महागज आक्रमण ?" "हाँ, क्यों नहीं?" शम्भुराजा ने कहा, "उसकी तैयारी करनी है। चिक्केराय स्वार्थी है। वह औरंगजेब से हाथ मिलाने में भी विलम्ब नहीं करेगा। कविराज, न चुकाया गया कर्ज, अनबुझी आग और बचे हुए शत्रु ये तीनों चीजें बढ़ती ही जाती हैं और अन्ततः घातक सिद्ध होती हैं। ऋणशेषाग्निशेषः शत्रुशेषस्तथैव च। पुनः पुनः प्रवर्धन्ते तस्माच्छेषं न रक्षयते ।। "इसलिए चिक्कदेव राय को भी अपना हाथ दिखाना आवश्यक है।" "वाह !" "कल अगर औरंगजेब के घातक आक्रमण को रोकना है तो सम्पूर्ण दक्षिण प्रदेश को एकत्र संगठित करना होगा। इसीलिए हम कुतुबशाह, आदिलशाह जैसे लोगों को बार बार सन्देश भेज रहे हैं।" कर्नाटक जैसी अनेक समस्याओं का समाधान खोजना है किन्तु उन सबसे पहले जंजीरे की उलझन सुलझानी है। सामने जंजीरे की ओर देखते हुए शम्भुराजा स्वप्न में खोये हुए से प्रतीत हो रहे थे। विगत महीने भर में उन्होंने जंजीरे के असंख्य अनोखे रूप देखे थे। ज्वार के समय ऊँची लहरें जंजीरे को चारों ओर से घेर लेतीं तो वह समुद्र में तैरते काले जहाज सा दिखाई देता। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय किरणे जब चमकती हुई पानी में उतरती तो वह किसी जादूनगरी के जादुई महल सा दिखाई पड़ता। ज्वार के समय जब तेज लहरें जंजीरे की तटबन्दी के साथ ऊपर उठतीं तो लगता जैसे समुद्र देवता इस महादुर्ग का जलाभिषेक कर रहे हैं। और जब पानी तेजी से नीचे उतरता था तथा तटबन्दी के आसपास की जगह निकल आती थी तब जंजीरे का स्वरूप कुछ और ही हो जाता था। ऐसे लगता था जैसे कोई कुशल तैराक अपने एक हाथ में मन्दिर उठाये पानी को चीरते हुए चला आ रहा है। सम्भाजी 365
जंजीरे के भव्य आवास में रहने वाले सिद्दी खैरियत खान और कासिम खान बहुत व्यथित हो गये थे। वहाँ की तटबन्दी ने इससे पहले कभी ऐसी स्थिति का अनुभव नहीं किया था। ज्वार के आते ही उन्मुक्त लहरें जोर-जोर से तटबन्दी से टकराती थीं। लगता था आधे बुर्ज को पानी ने निगल लिया है। नौ-दस फीट गहरी राजापुर के पास की खाड़ी आन्दोलित हो गयी थी। ज्वार के बाद पानी उतरते समय किले की सीढ़ियों पर पानी मेंढक की तरह उछलता हुआ नीचे आता था। किन्तु फिर भी खाड़ी का पानी अपनी निश्चित सीमा से नीचे नहीं आता था। अभी भी शम्भूराजा पूरी शक्ति के साथ युद्ध के लिए पानी में उतर नहीं रहे थे, किन्तु वे शान्त भी नहीं थे। अनेक प्रकार की योजनाएँ बनाने में व्यस्त थे। जंजीरे से आकर मिले सिद्दी मिस्त्री ने जंजीरे की एक मोम की प्रतिकृति तैयार की थी। शम्भूराजा ने उसे बीच की चौरंगी पर रख दिया था। इसी को दृष्टि में रखकर अनेक साहसी योजनाओं पर चर्चा की जा रही थी। अँधेरी रात में जंजीरे पर सीढ़ियाँ लगाने वाले लाय पाटिल की प्रशंसा की जाती थी। दादजी प्रभु देशपांडे, दरिया सारंग, भयानक का भाई रायनाक भंडारी, काथें जैसे लोग शम्भूराजा को घेरकर बैठते। आक्रमण सम्बन्धी विचार करते-करते मशाल का तेल समाप्त हो जाता किन्तु उनकी ललाई ज्यों की त्यों बनी रहती। एक दिन सुबह दादजी देशपाण्डे लाठी के सहारे लँगड़ाते हुए शम्भूराजा के अभिवादन के लिए आ गये। उनके साथ हुजरे भी थे। वे एक बोरी भरकर मीठे शहाले ले आये थं। कोयते से काटकर हुजरे ने सभी के हाथ में दिया। शम्भूराजा ने दादजी की ओर देखा। उंदेरी के आक्रमण के लिए उत्साहपूर्वक निकलने वाले दादजी का पुष्ट शरीर उनकी आँखों के सामने सगुण साकार हो गया। दुर्भाग्य से उसमें दादजी को सफलता नहीं मिली। उल्टे सिद्दी सेना मे लड़ते हुए वे तटबन्दी मे गिर गये और उनका एक पैर टूट गया। मात्र लाठी और शम्भूराजा के प्रेम के सहारे फिर से मैदान में खड़े थे। चर्चा के दौरान सिद्दी मिस्त्री ने कोंडाजी की बात छेड़ी। उसने कहा, “दलरुबा नाम की उस ईरानी युवती के मोह में फँसकर अपना मराठा मर्द बुरी तरह बर्बाद हो गया।" शम्भूराजा कुछ विचित्र तरह से मुस्कराये। बबूल सा ऊँचा और मजबूत तने सा कोंडाजी का साँवला शरीर उनकी आँखों के मामने साकार हो गया। उनके साथ हरे लिबास और नीली आँखों वाली दिलरुबा की उन्होंने कल्पना की। इसी समय कवि कलश ने उन्हें स्मरण दिलाया— "महाराज, कोंडाजी का आवास और घर द्वार जब्त करने का आदेश कब दे रहे हैं? गद्दार को सजा मिलनी ही चाहिए।" 366 सम्भाजी
"क्यों नहीं कविराज, एक बार यह सामने वाला जंजीरा जीत लिया तो हमें तुरन्त स्मरण दिलाइये, उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर लेंगे।" उसी बैठक में दादजी, कवि कलश, दुर्गादास और भयानक भंडारी की नजरें एक दूसरे से मिलीं। उन बेचैन नजरों की अभिव्यक्ति दादजी के मुख से बाहर आयी-"महाराज सेना की तैयारी ठीक-ठाक हो गयी है। इस झूठ-मूठ की लड़ाई से तो शरीर की ठंडक भी दूर नहीं होती। हाँ महाराज शिवराय का बेटा शत्रु पर किस प्रकार आक्रमण करता है, यह देखने के लिए हमारी सेना बहुत उत्सुक है।" कविराज ने कहा। सम्भाजी कहने लगे-"कभी-कभी यह जंजीरा ही हमें अद्भुत लगता है। इस दंडराजपुरी के मैदान में शिवाजी महाराज जैसे महान राजा ने आठ बार आक्रमण किये। तलवारबाजों की तलवार की धार को कुंठित और बुद्धिमानों की तेज बुद्धि पर जंग चढ़ा देने वाला यह किला पता नहीं कि मुहूर्त में बनाया गया होगा ?" शम्भूराजा इस चर्चा गोष्ठी से यकायक उठकर खड़े हो गये। अपने तम्बू में जाते-जाते रुके और पीछे मुड़कर कवि कलश से बोले, "देखो कविराज पंचांग लो, अपनी तंत्र विद्या का भी उपयोग करो। एक बार इस रहस्य का उद्घाटन अवश्य होना चाहिए कि आखिर यह किला किस मुहूर्त में खड़ा किया गया था?" उस दिन कविराज का मन बहुत उद्विग्न हो गया था। राजा के उस कठिन प्रश्न का उत्तर खोजने का उन्होंने निर्णय लिया। आसपास के क्षेत्रों का दौरा किया, बड़े बूढ़ों से चर्चा की, लोगों से पूछताछ की और रात को प्रसन्नचित्त होकर युद्ध भूमि में लौटे। वे बड़े उत्साह से कहने लगे-"राजन, आखिर भेद खुल ही गया। जब इस जलदुर्ग की नींव डाली गयी थी उस समय अमृतयोग था।" "क्या कह रहे हैं कविराज ?" "हाँ, मैं इस रहस्य की जड़ तक पहुँच चुका हूँ। जिस समय हब्शियों ने यह किला बनाने का निश्चय किया उस समय पास के नादगाँव में गणेश पंडित नाम के एक जोशी बाबा रहते थे। पंचांग से मुहूर्त निकालने में उन्हें महारत हासिल थी। यह खबर जब हब्शियों को मिली तो उनके घोड़े जोशी बाबा के दरवाजे पर जा खड़े हुए। परन्तु जब उनकी छोटी बेटी ने बताया कि वे घर पर नहीं हैं तो हब्शी घुड़सवार उदास हो गये। वह छोटी बच्ची दरवाजे से बाहर आकर उनके आने का प्रयोजन पूछा। सवारों ने बताया कि नींव डालने के लिए मुहूर्त पूछना था। लड़की हँसते हुए बोली-'बस इतना ही काम था? बाबा के पास बैठकर मैंने पंचांग देखना सीखा है। मैं बता देती हूँ आपको अच्छा मुहूर्त'। "जोशी बाबा ने अपने दरवाजे से हब्शियों के घोड़े लौटते हुए देखे तो घर आकर बेटी से सारा समाचार पूछा। बेटी ने सारी घटना कह सुनाई। उसने अपने द्वारा सम्भाजी :: 367
निकाले गये मुहूर्त को भी पिता से बताया। पिताजी बहुत नाराज हुए। बेटी ने डरते हुए पूछा—'पिताजी, मुहूर्त का गणित ठीक नहीं हुआ क्या'?' "बेटी गणित तो ठीक हुआ है पर निर्णय गलत हो गया।" "वह कैसे?" "पागल बच्ची! गाय कहाँ गयी है, यह कोई कसाई को बताएगा क्या?" 'शत्रुओं को मुहूर्त अवश्य बतानी चाहिए पर वह कुछ निम्न कोटि की होनी चाहिए। अमृतयोग की तरह अचूक नहीं'। कविराज के इस रहस्योद्घाटन से शम्भूराजा का अच्छा मनोरंजन हुआ। किन्तु शीघ्र ही उन्हें एक चिन्ता सताने लगी। जंजीरे में सिद्दी अपने किले को बड़े अभिमान से 'जंजीरे मेहरूब' कहते थे। शम्भूराजा की आँखों के सामने समुद्र में पलीते की तरह धधकते उस चन्द्रकोर की ओर बार बार देख रहे थे। उन्हें लगा कि वहाँ पर पचीस गज ऊँची तटबन्दी नहीं बल्कि पूरी चन्द्रकोर है जो उनके कलेजे में घुसकर भयंकर वेदना दे रही थी। उस दिन की सुबह बड़ी विलक्षण थी। शम्भूराजा ने अपने सभी नौसैनिकों और अधिकारियों को एकत्र बुलाया था। उन सभी को सम्बोधित करते हुए शम्भूराजा बोले, "मित्रो! जिस दिन आप इस जंजीरे पर विजय प्राप्त कर लेंगे उस दिन इस कठिन लड़ाई जीतने के उपलक्ष्य में सभी सैनिकों के हाथ में सोने का कड़ा पहनाएँगे और प्रत्येक के आँगन में आधा सेर सोना डालकर उसका गौरव करेंगे।" शम्भूराजा ने इनाम की अग्रिम घोषणा की तो सेना को विश्वास हो गया कि अब किसी भी क्षण जोरदार आक्रमण का आरम्भ हो जाएगा। वह दिन इसी तरह बीत गया। सन्ध्या समय, सूर्य का लाल गोला समुद्र में कूद गया। अगल बगल के परिसर में नारियल वनों और पहाड़ों से अँधेरा नीचे उतरने लगा। उस सन्ध्या बेला में कुछ समुद्री पक्षी उड़े। वे अशुभ चीत्कार करते हुए तट से समुद्र की ओर उड़ान भरने लगे। उनकी इस अशुभ चीत्कार से शम्भूराजा का मन कुछ विचलित हुआ। दूसरे दिन शम्भूराजा ने शहजादा अकबर के सम्बन्ध में दुर्गादास से पूछताछ की। तब शम्भूराजा को ज्ञात हुआ कि शहजादा रूठकर पाली के पास अपनी छोटी सी छावनी में लौट गया है। सेना आगे के आदेश की प्रतीक्षा कर रही थी। घोड़े भी एक ही तरह का चारा खाते-खाते ऊब चुके थे। शम्भूराजा के डेरे के सामने रखी मोम की जंजीरे की प्रतिकृति उदास लग रही थी। उसकी चमक नष्ट हो चुकी थी। तीसरे दिन शम्भूराजा अपने सहयोगियों के साथ सुबह की खिली धूप में बैठे थे। उस मोम की प्रतिकृति का पुनर्निरीक्षण कर रहे थे। बीच-बीच में वे उस जलदुर्ग पर दृष्टि डालते तो कभी ऊँचे पहाड़ की दाईं ओर निचले हिस्से में खाड़ी की ओर देखते। वार्तालाप के बीच ही उनकी नजर नीचे की खाड़ी की ओर गयी। 368 .. सम्भाजी
वहाँ कुछ हलचल सी मची थी। आठ दस मराठे एक राउत से उलझे हुए दिखाई पड़ रहे थे। वह अपरिचित सा दिखने वाला वह राउत रेत और कीचड़ से सना हुआ था। उसकी काँख में एक कसी हुई पोटली दिखायी दे रही थी। रास्ता रोकने वाले सिपाहियों से वह चिल्ला-चिल्लाकर झगड़ रहा था। "छोड़ोऽऽ, छोड़ो मुझे. मुझे ऊपर जाने दो, मुझे महाराज से मिलने दो।" वह राउत अपनी पोटली के साथ आगे को सरक रहा था। किन्तु मराठा सैनिक उसे उसी प्रकार रोके हुए थे जैसे चतुराई से भागते हुए साँप को भाले की नोंक से रोका जाता है। यह देखकर कि उसे छोड़ने के लिए कोई तैयार नहीं है, वह घबरा गया। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा। "इस तरह मेरी राह न रोको। सिर्फ एक बार एक बार ही मुझे महाराज से मिलने दो। इस भयानक बाढ़ में एक लकड़ी के टुकड़े से साँप की तरह चिपककर किसी प्रकार यहाँ तक पहुँच पाया हूँ। एक लकड़ी के टुकड़े के सहारे रातभर यह सामने का समुद्र तैरता रहा हूँ।" यह कोलाहल सुनकर शम्भूराजा ने ऊपर से आवाज दी—"छोड़ दो उसकी राह। उसे लेकर हमारे पास आओ।" कोई नहीं समझ पा रहा था कि अब यह कौन-सी नयी समस्या पैदा हो गयी। महाराज की छावनी के सामने वाले सरदार या रक्षक ही नहीं स्वयं कवि कलश भी सम्भ्रांत थे। इतने में बड़े-बड़े डग भरते रास्ते के पत्थरों को पार करते हुए वह राउत महाराज के सामने आ खड़ा हुआ। इस बीच महाराज अपनी छावनी के सामने अस्वस्थ मन से टहल रहे थे। उन्होंने रेत और कीचड़ सने उस शक्तिशाली मराठा मर्द की ओर देखा। उस आदमी की आँखों में उतर आयी अमावस्या को देखकर शम्भूराजा के रोंगटे खड़े हो गये। उसने शम्भूराजा को नमन किया और बोरे की पोटली उनके पैरों के पास रख दी। महाराज के संकेत करते ही उसने उस गठरी को खोला। आँखों के सामने का दृश्य देखकर सभी को पसीना आ गया। उस गठरी में किसी का आधा जला हुआ सिर था। वह भयानक दृश्य देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गये। वह व्यक्ति शम्भूराजा के पैरों पर गिर पड़ा और दुखी स्वर में बोला, "यह सिर कोंडाजी बाबा का ही हैऽऽ।" यह समाचार स्पष्ट होते ही मराठा सवारों और सैनिकों में आनन्द की लहर दौड़ गयी। उन्होंने आपस में मिठाइयाँ बाँटीं। गद्दारों की दुर्दशा ऐसी ही होगी। सभी एक स्वर में आनन्दातिरेक में चिल्लाने लगे—"हर-हर महादेव! हर-हर महादेव।" वह खबरी 'रुको, रुको,' कहकर अपनी रुआँसी आवाज में कुछ कहने का प्रयास कर रहा था। किन्तु उसकी बात सुनने के लिए कोई तैयार ही नहीं था। इसी सम्भाजी 369
समय शम्भूराजा झट से उठकर खड़े हो गये। उन्होंने म्यान खींचकर तलवार बाहर निकाल ली। सामने हो हल्ला मचाने वाली भीड़ को शस्त्र दिखाते हुए वे चिल्लाये- "शान्ति रखो नहीं तो एक-एक के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा।" महाराज की उस गर्जना से सभी स्तब्ध हो गये। हताश महाराज वहीं पर घुटनों के बल बैठ गये। जिस प्रकार पुजारी भगवान की मूर्ति को बड़े भक्ति भाव से हाथ में लेता है उसी प्रकार शम्भूराजा ने कोंडाजी के सिर को अपने हाथ में ले लिया। दूसरे ही क्षण उन्होंने दिल दहला देने वाली दर्द भरी चीत्कार की- "कोंडाजी बाबाऽऽ! कैसे हुआ यह ?" निराश भाव महाराज ने उस आगन्तुक की ओर देखा। वह वीर पूरी तरह विचलित हो गया था। उसकी दोनों आँखें छलछलाने लगीं। उन्हें किसी प्रकार सँभालते हुए उद्विग्न व्यक्ति की तरह कहने का प्रयास करने लगा- "महाराज, आप और कोंडाजी के द्वारा बनाई गयी गुप्त योजना के अनुसार ही सब कुछ हो रहा था। उस योजना को कार्यान्वित करने के लिए हम बारह जन हब्शियों के गढ़ में घुसे थे। वहाँ हम सबों ने तेरह-चौदह महीने किस तरह काटे इसे हमारा जी ही जानता है।" "अरे, लेकिन यह धोखा हुआ कैसे?" शम्भूराजा ने प्रश्न किया। "महाराज, कुदरत ने और खुदा ने थोड़ी मेहरबानी कर दी होती तो कल रात ही जंजीरे के सभी बारूदखाने जलकर खाक हो गये होते। आसमान में उठने वाली लपटों ने कल रात ही हमारा अभिनन्दन किया होता।" "लेकिन हमारे कोंडाजी बाबा कितने बली और बुद्धिमान वीर थे!" "क्या बताऊँ महाराज ? विगत चौदह महीनों हम बारह व्यक्तियों ने अपनी योजना के सम्बन्ध में रंचमात्र भी संशयात्मक स्थिति नहीं पैदा होने दी। वे सिद्दी बन्धु और उनकी फौज के सभी कालसर्प पूरी तरह असावधान थे। कोंडाजी ने आपसे भीषण झगड़ा करके चले आने के बाद बड़ी-बड़ी कहानियाँ सुनायी थीं। एक नम्बर के बहुरूपी कासिम का बाबा पर इतना विश्वास हो गया था मानो उसे बाबा के रूप में कई जन्मों का मित्र मिल गया हो। अपनी प्रिय रक्षिता ईरानी सुन्दर युवती दिलरुबा को कासिम ने कोंडाजी बाबा को समर्पित कर दिया। दिलरुबा भी बाबा पर जान देने लगी थी। कोंडाजी और ग्यारह जन जंजीरे किसलिए प्रविष्ट हुए हैं इसका उस स्त्री को पिछले महीने तक कुछ भी पता न था।" "चलोऽऽ इसका मतलब उसी ने अन्त में धोखा किया।" "नहीं, नहीं, महाराज, वैसा नहीं...." "तो फिर?" "कल रात तक हमारी सारी योजना ठीक थी। जंजीरे के आठ बड़े बारूदखानों में एक ही समय आग लगाकर उड़ा देने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। 370 :: सम्भाजी
वहाँ के कुछ लोगों को अधिक धन देकर बाबा ने अपनी ओर कर लिया था। कल की आधी रात के समय सभी बारूदखानों को भस्म करने का मुहूर्त था। किले के पिछले दरवाजे के पास एक नाव तैयार खड़ी थी। कार्य सफल होने के बाद जो सौभाग्य से बच जाते उन्हें पिछले दरवाजे से आकर नाव में बैठकर इस ओर निकल आना था। लेकिन ऐन समय पर दिलरुबा साथ आने के लिए हठ करने लगी। वह प्रार्थना करने लगी—"मुझे भी अपने मुल्क मे साथ ले चलो।" "ठीक है, फिर?" "दिलरुबा को अपने साथ ले आना कोंडाजी ने स्वीकार कर लिया। किन्तु उसकी जायरा नाम की एक प्रिय दासी थी। उसके बिना दिलरुबा पानी का घूँट भी नहीं लेती थी। इसलिए अन्तिम समय में दिलरुबा ने उस दासी को भी साथ ले आने का निश्चय किया। बारूदखानों को आग लगाने के एक घंटा पहले दिलरुबा ने जायरा को बता दिया कि कहाँ जाने की तैयारी है। जायरा ने कहा कि मैं अपने कपड़े लेकर शीघ्रता से वापस आती हूँ। ऐसा कहते हुए वह तेजी मे निकली और सीधे खैरियत खान के महल में पहुँच गयी।" "अरे रे!" सारी कहानी सुनकर शम्भूराजा के सभी साथी चिल्ला पडे। कितनो ने तो अपना मुँह पीट लिया। वह मराठा वीर आगे कहने लगा—"दासी से बगावत का समाचार पाते ही किले पर खतरे का घंटा बजने लगा। देखते देखते दो तीन हजार सैनिक हम बारह जनों के पीछे लग गये। हममें से तीन जनों ने बुर्ज के नीचे की ओर छलाँग लगाई, जिनमें दो तो वहीं पर चकनाचूर हो गये। कोंडाजी के साथ आठ जन एक पंक्ति में खड़े किये गये और सपासप तलवार से काट दिये गए। दिलरुबा का गला कासिम ने अपने हाथों से काटा। संयोग से एक दीवार के खड्ढे में मुझे थोड़ी सी जगह मिल गयी और मैं बच गया। अपने सभी बहादुरों के शव को कासिम के कुत्तों ने पैर पकड़कर घसीटते हुए एक जगह इकट्ठा किया। पिछले दरवाजे के बाहर एक चबूतरे पर लकड़ी जलाकर उसी में शवों और सिरों को डाल दिया। वे कुत्ते विजय के नशे में नाचते-नाचते किले की ओर निकल गये। "उसी नशे में उनकी पीठ पीछे का पहरा ढीला पड़ गया और मैं कुछ जंगली लताओं का सहारा लेकर किसी तरह रेंगते हुए नीचे उतरा। वहीं पर मुझे कोंडाजी बाबा का अधजला सिर दिखाई पड़ा। उसी सिर ने एक बार फिर से मेरे शरीर में शक्ति का संचार कर दिया। महाराज, बड़ी कठिनाई से मैं यहाँ तक पहुँचा। मुझे पता था कि आप हमारी राह देखते किले की ओर आँख लगाए बैठे होंगे। यदि मैं यहाँ न पहुँच पाता तो कोंडाजी बाबा और उनके साथियों की वीरता की कहानी आपको कौन सुनाता? आप को तो किसी बात का पता भी न चलता।" यह करुण कहानी सुनते सुनते सभी की आत्माएँ कराह उठीं। अपने कीमती सम्भाजी 371
राजसी लिबास की चिन्ता न करते हुए शम्भूराजा नें दुख के आवेग में कीचड़ और मिट्टी से सने उस मराठा वीर को बाँहों में भर लिया। तैरकर आया हुआ वह वीर अभी रोते हुए कह रहा था—"जब भी हम एकान्त में बैठते थे तो कोंडाजी बाबा हमसे कहते थे—'केवल चौंसठ मावले वीरों को लेकर मैंने पन्हाला किले को जीता था और फूल की तरह शिवाजी महाराज के चरणों में चढ़ा दिया था। उसी तरह जंजीरा नाम के इस बदतमीज किले को हमें प्राप्त करना है और अपने युवराज के चरणों में चढ़ाना है। दोस्तो, इसीलिए कहता हूँ कि आखिरी रात यहाँ बारूदखानों के जलने से ऐसा धमाका होना चाहिए कि उसी धमाके से यह किला पानी में चला जाये और उसी धमाके के चमत्कार से मेरा शरीर भी उड़कर समुद्र पार पर्वत पर मेरी प्रतीक्षा कर रहे शम्भूराजा के चरणों में गिरना चाहिए। मेरी जिन्दगी की यही सबसे बड़ी सार्थकता है।'" इस करुण कथा को सुनकर सभी के कलेजे फट गये। शम्भूराजा के हृदय को बहुत ही गहरा आघात पहुँचा। किन्तु उस सेनानायक ने अपने को सँभाला। आक्रोश के सैलाब को बड़ी कठिनाई से रोकते हुए उन्होंने बाबा के सिर को बड़े सम्मान से पालकी में रखा, उसे ताजे फूलों से ढक दिया। उन्होंने अपने गले से रत्नमाला को खींचकर उसके सारे रत्न कोंडाजी बाबा के सिर के अगल बगल हल्के मे रख दिया। करंजा और जांभुल के औषधीय पत्तों को सिर के चारों ओर रख दिया गया। पालकी उठा ली गयी। सभी राजदूत कोंडाजी बाबा के जन्मस्थान की ओर चल पड़े। जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए शम्भूराजा आगे आये। उसे ऊँचे पहाड़ से अपनी जीभ से पानी चाट रहे जालिम जंजीरे को वे देखते रह गये। दुर्गादास राठौड़ कवि कलश का हाथ पकड़कर एक ओर ले गये और धीरे से पूछा—"क्यों जी, तेरह महीने पूर्व निश्चित की गयी इतनी गम्भीर योजना के सम्बन्ध में आपने हमें एक शब्द भी नहीं बताया?" "नहीं जी, मुझे भी कहाँ पता था?" कवि कलश ने अपना सम्भ्रम प्रकट किया। थोड़ी देर पहले जब वह मराठा जवान इस कहानी को सुना रहा था तभी आपके साथ ही मैंने भी पहली बार सुना।" आठ दूसरे दिन की सुबह तोपों के जोरदार धमाकों के साथ हुई। दंडा राजपुरी के परिसर 372 :: सम्भाजी
में घुडूमधम, घुडूमधम, कड़ाडधूमऽऽऽऽऽऽ जैसी कान फाड़ने वाली आवाजों से सारा वन प्रदेश भर गया। तोपों के गोलों से किनारों पर धुओं की लहर उठने लगी। जंजीरे की तटबन्दी पर गिरने वाले तोप के 'गोलों' से वहाँ के पत्थर और चूने चिथड़े होकर पानी में गिरने लगे। परिसर के पंछी भी कहीं दूर अपना घोंसला बनाने के लिए भाग गये। वह तोप का धमाका इतना भयंकर था कि राजपुरी और आगरदांडा में बचे- खुचे लोग भी घबराकर अपना-अपना गाँव छोड़कर भागने लगे। सामानों से भरे छकड़ों, बोरों से लदे बैलों और ऊँटों को निकल जाने के लिए मराठा सैनिकों ने सहायता की। शम्भूराजा द्वारा जंजीरे पर किया गया आक्रमण बहुत भयंकर था। युद्ध भूमि विकराल हो उठी थी। यहाँ तक कि आसपास की मस्जिदों में अजान बन्द थी और मन्दिरों की ओर जाने का किसी में साहस नहीं था। इतने दिनों से पानी में रेंगती हुई नौकाएँ अब आलस छोड़कर पूरी तरह सजग हो गयी थीं। जहाजों पर चढ़ाई गयी तोपों और छोटी-मोटी नौकाओं में गोले बारूद ठूंस ठूंसकर भर दिये गये थे। शम्भूराजा की क्रुद्ध सेना आवेश में बाहर निकली। तांडेल नाविक दल सजग हो गया। काले घने बालों वाले मध्यम ऊँचाई के हब्शी सैनिक मराठों के निशाने पर आने लगे। छोटी मोटी नावों ने जंजीरे के चारों ओर से शिकंजा कसने की शुरुआत की। मराठों द्वारा भयंकर आक्रमण करने का समाचार सवेरे ही हब्शियों को मिल चुका था। सिद्दी खैरियत खान और सिद्दी कासिम खान प्रतिकार की भावना से किले पर नाचने लगे। बारूद भरी तोपों को आगे खींचने में उन्होंने जरा भी प्रतीक्षा नहीं की। हब्शियों का तोपखाना भी उच्चकोटि का था। ये तोपें जहाजों पर अचूक निशाना साधने लगीं। हब्शियों के गोलों-बारूदों से पानी में मराठों की नावें जलने लगीं। जहाजें डूबने लगीं। मराठा नौसैनिक अपने जलते हुए कपड़ों के साथ पानी में कूदने लगे। जिस तरह भी सम्भव बन पड़ा अपने प्राणों की रक्षा का प्रयास करने लगे। मराठों और हब्शियों के बीच एक जल रेखा और एक अग्निरेखा खिंच गयी थी। उस रेखा को दोनो सैन्य दल किसी को पार नहीं करने दे रहे थे। यह देखकर कि किले के आसपास का घेरा नहीं टूट रहा है, शम्भूराजा ने अपनी चाल बदली। उन्होंने फूल पत्तों में छुपाई गयी अपनी सशक्त तोपों को बाहर निकाला। अब मराठों का यह विशिष्ट तोपखाना अपनी आग की जीभ से किले को चाटने लगा। जंजीरे के तट से टकराने वाला एक-एक गोला पौने चार सेर वजन का था। जब निशाना चूककर ये गोले पानी में गिरते तो समुद्र के पेट से पानी की धार वेग से ऊपर उठती सम्भाजी .: 373
और आकाश की ओर मुँह किये पानी में फौवारे नाचते दिखाई पड़ते। जंजीरे के बुर्जों में लगे बड़े-बड़े पत्थर टूटकर नीचे पानी में गिरने लगे। किले का फौलादी किनारा टूटने लगा। तोपों के भयंकर धमाकों से किले के अन्दर धरती हिलने लगी। किले के भीतर बने साठ सत्तर घरों को आग लग गयी। सिद्दी का सुन्दर शीश महल तो चकनाचूर हो गया। छोटे-छोटे रंगीन टुकड़े महल में फैल गये। धुएँ और आग के बीच मचे कोलाहल से हबशी घबरा गये। जिस समय सामने का कमान धराशायी हुई और नगारखाने की दिशा बिगड़ी उसी दिन हब्शियों के जनानखाने में हलचल मच गयी। बेगमें, बच्चे, रक्षिताएँ किला छोड़कर पिछले दरवाजे से बाहर निकले। जो भी जहाज या नाव मिली उसमें बैठकर बाहर भागने लगे। कासिमखान और खैरियत खान डूबते हुए किले को बचाने की हर सम्भव कोशिश करने लगे। किले के सिंहद्वार से उनकी शक्तिशाली तोपें— लांडा कासिम, कलाल बागड़ी और व्याघ्रमुखी आग उगलने लगीं, उन तोपों से होने वाला प्रहार प्रचंड था। मराठों के बड़े जहाजों को भी उन्होंने जलाना आरम्भ किया। इन तोपों से हब्शियों को कुछ राहत अवश्य मिली, किन्तु शम्भुराजा रुकने को तैयार नहीं थे। इस भीषण आक्रमण से सिद्दी बन्धु निराश हो चुके थे। खैरियत खान ने कासिम से कहा "यह सम्भाजी हमारी इतनी हालत खराब करेगा, यदि हम जानते तो मुगलों के मांडलिक बनते ही क्यों ? मराठों की शरण में गये होते तो कम से कम प्राण तो बचते।" जंजीरे के किले का मुख्य आधार सामने वाली खाड़ी के किनारे पर फैला हुआ हब्शियों का अधिकृत प्रदेश था। पृष्ठभाग का यह क्षेत्र रोहा की खाड़ी से लेकर बाणकोट की खाड़ी तक कई कोस में फैला हुआ था। मुरुड, तळा, म्हसला, हरिहरेश्वर, दिवेआगार दिघी जैसा सारा भूभाग हब्शियों के अधिकार में था। बाहर से रसद की आवश्यकता पड़ने पर यह प्रदेश ही हब्शियों के लिए अन्न का भंडार था। इसीलिए सिद्दियों पर दबाव बनाने के लिए शम्भुराजा ने दिघी और आगरदांडा की ओर से जंजीरे की ओर के सभी यातायात को पूरी तरह से रोक दिया था। उस ओर से मराठों की गश्ती नावें और जहाजें किसी को भी जंजीरे की ओर जाने नहीं देते थे। इस प्रकार हब्शियों की पूरी तरह नाकेबन्दी कर दी गयी थी। डेढ़ मील की परिधि के जंजीरे के बीचोबीच पहाड़ी की तरह एक ऊँचा हिस्सा था। उसी पर हब्शियों के किले का ध्वज फहराता रहता था। जब समुद्र की ओर से मराठों ने गोलाबारी शुरू की तो दोनों सिद्दी बन्धु अपनी बचीखुची सेना लेकर उसी बीच वाले पहाड़े की बगल में जा छुपे थे। वहीं गोला बारूद भण्डार 174 सम्भाजी
अपने बचाव की लड़ाई लड़ रहे थे। किन्तु अब तक हब्शियों की असीम हानि हो चुकी थी। इतना होने पर भी वे किला छोड़कर जाने के लिए तैयार न थे। क्योंकि यह अजेय जंजीरा और उसकी कृपा से प्राप्त यह समुद्री हुकूमत हब्शियों के गंडस्थल के समान था। उसके फूटने से सिद्दी हमेशा के लिए मिट्टी में मिल जाने वाले थे। इसीलिए उन्होंने अल्लाह और औरंगजेब की शरण ली थी। इतनी दुर्दशा होने पर भी सिद्दी किला छोड़ नहीं रहा था। यह देखकर शम्भुराजा बेचैन हो गये। उन्होंने कवि कलश से कहा, "समझ में नहीं आता कि किस भूत ने घेर रखा है इस किले को ? आधा किला पानी में गिर चुका है फिर भी सिद्दी न तो आत्मसमर्पण करता है और न किला ही छोड़ता है।" जंजीरे का किला अजेय है, इसलिए हब्शी कभी भी पराजित नहीं होंगे। हब्शियों की प्रजा में इस प्रकार का विश्वास दृढ़ हो गया था। यही कारण था कि कोंकण के लोग हब्शियों से बहुत घबराते थे। लेकिन प्रजा ने जब शम्भुराजा को हब्शियों की आँखें सफेद करते देखा तो उनमें साहस आ गया और वे बाहर आने लगे। नादगाँव और नागाँव के लोगों ने शम्भुराजा के पैर छूते हुए कहा, "हमें इन हब्शियों के बन्धन से मुक्त करायें। हाँ महाराज, यदि कुछ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ी तो हम भी उस गिलहरी की तरह निभाएँगे।" गाँव के लोग आकर मिले किन्तु अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण शम्भुराजा बहुत सन्त्रस्त थे। इसी बीच ग्रामीणों के मुख से निकला 'गिलहरी' शब्द उनके मस्तिष्क मे चक्कर काटने लगा। एकाएक उनके भीतर एक ज्योति फूटी। बचपन में श्रृंगारपुर के केशव पंडित और रमाजी पंडित से सुनी हुई रामायण की एक कथा याद आयी। लंका में जाने के लिए प्रभु रामचन्द्र द्वारा वानर सेना के साथ निर्माण किया गया वह सेतु और थोड़ी थोड़ी रेत लाकर दरारों को भरने वाली वह गिलहरी याद आयी। शम्भुराजा का मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने ताली बजायी। रात में विचार विमर्श करते समय शम्भुराजा ने प्रश्न किया- "कविराज, दादजी सामने के इस समुद्र में ही रास्ता तैयार किया जाये तो ?" "क्या ? क्या कह रहे हैं आप ? कहाँ से महाराज ?" "समुद्र मे !" शम्भुराजा धीमे स्वर में गरजे। "क्यों नहीं ? क्या यह असम्भव है? प्रभु रामचन्द्र ने लंका जीतने के लिए जिस तरह सेतु का निर्माण किया था वैसे इस जंजीरे को पराजित करने के लिए हम भी सेतु का निर्माण करेंगे।" शम्भुराजा के सभी सहयोगी घबराये, विचलित हुए, किन्तु राजाज्ञा को कौन नकार सकता था ? शम्भुराजा अपनी सेना के लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय थे। शम्भुराजा कवि हृदय ही नहीं सचमुच कवि थे। किन्तु उनकी इस प्रकार की कल्पना सम्भाजी ३75
के पंखों को पानी पर कैसे उतारा जाये? इन हिंसक लहरों के आघात में सेतु टिकेगा कैसे? शम्भुराजा अपने निर्णय से हटने को तैयार नहीं थे। तलवार चलाने वालों ने अपने शस्त्र अलग रखकर हाथों में कुल्हाड़ी उठा ली। दूसरे दिन ही राजपुरी की पहाड़ी की बगल के बड़े-बड़े वृक्ष कटकर गिरने लगे। जंजीरे के बुर्ज पर हब्शी सैनिकों की भीड़ एकत्र हो गयी थी। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उन्हें लगा मराठों का राजा कहीं पागल तो नहीं हो गया? उस दिन बहुत से सैनिक, घुड़सवार, सरदार और अधिकारी इस कार्य में जुटे थे। इनमें कामाठियों और बेलदारों ने बहुत परिश्रम किया। दिनभर परिश्रम करने के कारण उनका शरीर थक गया था। शम्भुराजा भी दोपहर की कड़ी धूप में समुद्र के किनारे खड़े थे। 'चलो, उठाओ, ढकेल दो।' ऐसी हिदायत दे रहे थे। कभी कभी स्वयं भी वे वृक्ष के तने या बड़े पत्थर को ढकेलने के लिए हाथ लगाते थे। शारीरिक परिश्रम और मानसिक त्रास से शम्भुराजा बहुत थक गये थे। उन्होंने रात को तम्बू के अन्दर बिस्तर में अपना शरीर झोंक दिया। बाहर जल रहे अलाव का प्रकाश बहुत दूर तक फैला था। अलाव के पास बैठे कविराज कलश, दुर्गादास, भायनाक, दादजी देशपांडे, गोविन्दराव काथे सभी चुप थे। बीच बीच में एक दूसरे की ओर चोर नजरों से देख लेते थे। सारांशतः शम्भुराजा का जो नया अभियान चल रहा था उस पर उन लोगों का भरोसा नहीं था। उस समूह में अरबी सूबेदार जंगेखान भी सम्मिलित था। मराठों की चोर नजरें उससे छिपी नहीं थीं। "कहाँ रामायण के सपने और कहाँ शरीर को भस्म करने वाली शत्रुओं की तोपें? दोनों में कोई मेल नहीं।" दादजी बोले। जंगेखान हँसते हुए बोला, "देखो भाई, जो जाति से ही युद्धवीर होता है, उसने यदि एक बार टक्कर देना निश्चित कर लिया तो उसके लिए पर्वत क्या और पानी क्या?" "खान साहब तुम्हारे लोग भी काम पर गये हैं शायद?" गोविन्दराव ने पूछा। "गोविन्दराव, भायनाक! तुम्हारे रामायण में क्या सच है? क्या झूठ है? मुझे कुछ भी पता नहीं है किन्तु वहाँ पश्चिम में एक जंग बहादुर समुद्र पर सेतु बाँधकर अपने मकसद में कामयाब हुआ था। इसका मुझे पक्का पता है।" "कौन? कौन था वह?" बहुत देर से सिर नीचे झुकाए सब की बातें सुन रहे कवि कलश एकदम उनक' खड़े हो गये "सिकन्दर! अलेक्झाइंडर द ग्रेट' 'डे हजार वर्ष पहले की बात है। न्यू 376 :: सम्भाजी
टायर नाम टापू को जीतने के लिए उसने इसी तरह समुद्र में सेतु बाँधकर पराक्रम दिखाया था और युद्ध जीता था।'' अरब सूबेदार ने सिकन्दर का उदाहरण दिया तो सरदारों और राजाओं का भी उत्साह बढ़ा। हर रोज सामने वाली खाड़ी आठ सौ गज की दूरी पाटने के लिए बड़े बड़े पेड़ और पत्थर डाले जाते रहे। कपास से उन्हें जोड़े रखने का प्रयास किया गया। किन्तु समुद्र की क्रुद्ध लहरें पेड़ों और पत्थरों को निगल जाती थीं। पानी में डाला गया वृक्षों और पत्थरों का ढेर दूसरे दिन अपनी जगह पर दिखाई ही नहीं पड़ता था। घोर परिश्रम से किया गया कार्य पानी में बह जाता था। किन्तु शम्भुराजा अपने संकल्प को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। धीरे धीरे आसपास के गाँवो के लोग इस कठिन कार्य में सहभागी होने लगे। देखते देखते आधा सेतु तैयार हो गया। पानी की गहराई अधिक होने के कारण, बहुत से बड़े बड़े पत्थर अन्दर चले गये। किन्तु संकल्प और उत्साह की कोई सीमा नहीं थी। आधा सेतु बनते ही शम्भूराजा का उत्साह दुगुना हो गया। किन्तु दूसरी ओर से कलाल बांगड़ी और लांडा कासिम तोपें सेतु पर गोले फेंकने लगीं। शम्भूराजा ने भयानक और दादजी को आदेश दिया। पानी में दाई और बाई ओर फैली हुई जहाजों को इकट्ठा किया गया। ये समुद्री जहाज एक ओर शत्रु की तोपो का सामना कर रही थीं तो दूसरी ओर सैनिको और मजदूरों के लिए सुरक्षा कवच बन रही थीं। अब सिद्दी बन्धुओं ने सारी आशाएँ छोड़ दी थीं। किले में से सिद्दी का खजाना बाहर निकाला गया। उसके मूल्यवान वस्त्रों और आभूषणों को पेटियों में भरा गया। अब तक बहती हवा का रुख हब्शी सैनिकों को ज्ञात हो गया था। वे भीतर ही भीतर बहुत घबरा गये थे। दो तीन दिनों में ही किला गिरने वाला था। जजीरे की तटबन्दी पर मराठों की शहनाई और नगाड़े बजने वाले थे। शम्भूराजा की विजय के अन्तिम सोपान पर पहुँचने का समाचार आसपास के गाँवो में पहुँचने लगा था। गाँवों के लोग बड़े उत्साह से आगे आ रहे थे। प्रसन्नता की लहर खेतों और सिवानों में फैल रही थी। केवल दो दिन पहले सुबह सुबह कुछ सैनिक जंजीरे के पिछवारे से किले पर आये। उन्हें देखकर ठंडे पड़े हब्शियों में उत्साह आ गया। मराठों को लगा कि उनके पास कुछ रसद और गोला बारूद आ गया है। किन्तु शम्भूराजा की बेचैनी बहुत बढ़ गयी थी। शत्रु दल का यह उत्साह तात्कालिक नहीं था। उसमें किसी गम्भीर रहस्य का आभास मिल रहा था। उसी रात पन्द्रह बीस घोड़े हिनहिनाते हुए राजपुरी के तट पर पहुँचे। कोथलागढ के किलेदार ने राजा को आधी रात में जगाया। वह बडी घबराहट के सम्भाजी :: 377