छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
मिला। फिरंगी सैनिकों का उत्साह बढ़ गया। वे खुशी से नाचने लगे। किले के चारों ओर गहरी खाई खोदी गयी थी। उसके कारण भीतर जाना कठिन था। फिरंगी मजदूरों ने ईंट-पत्थर आदि डालकर उस खाई को पाटने का कार्य आरम्भ किया। देखते ही देखते उस खाई पर रास्ता तैयार हो गया। उस रास्ते से फिरंगी आगे बढ़े फिर भी भीतर की ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला। फिरंगी बन्दरों की तरह सीढ़ियों पर चढ़ने लगे। इसी समय किले के भीतर 'हर हर महादेव' की गर्जना सुनाई दी। अपने हाथ में दुधारी तलवार नचाते हुए येसाजी कंक दहाड़ते हुए शेर की तरह आगे बढ़े। वृद्ध येसाजी के शरीर में कमाल की शक्ति आ गयी थी। येसाजी सीढ़ियों पर चढ़ रहे फिरंगियों को सपासप काटना आरम्भ किया। उनका नौजवान बेटा कृष्णाजी सीढ़ियों को पीछे फेंकने लगा। घबराये हुए फिरंगी खाई में गिरने लगे। किले में छः सौ मराठा सैनिक हाथ में नंगी तलवारें खड़े थे। बाहर जंगले में हुए दो सौ मराठों के हाथ भी युद्ध के लिए आतुर हो रहे थे। भीतर और बाहर दोनों ओर से फिरंगी सेना पर जोरदार आक्रमण हुआ। फोंडा किले पर क़ब्ज़ा करने के लिए फिरंगियों ने हर सम्भव प्रयास किया। पाँच दिन तक लगातार तोपें दागते रहे। तीन तगह से किले की दीवार तोड़ दी। किन्तु मराठा वीरों ने उन्हें अन्दर नहीं आने दिया। तेज बारिश और मराठा सैनिकों के तीव्र प्रतिरोध से वाइसराय पूर्णतया हताश हो गया दुलबा नाईक ने साहब को समझाते हुए बोला, "सरकार, लड़ाई बहुत हो गयी। अब हमें पीछे हटना ही होगा।'' "‘सात समुद्र पार पुर्तगाल से हम यहाँ किसलिए आये हैं? इन मामूली मरगठों से मार खाने?'' वाइसराय पीछे हटने को तैयार नहीं था। पीछे हटने से होने वाला अपमान उसे सत्य नहीं था। एक दिन सात-आठ फिरंगियों को टोली तलवार भाँजते हुए एक बड़ी सुराख से भीतर घुस आयी। अचानक उनकी घुसपैठ से सामने का मराठी दल कमजोर पड़ने लगा। इस स्थिति को कृष्णाजी कंक ने देख लिया। क्रोध से उनका खून खौल उठा। उसी आवेश में वे दीवार से नीचे कूद पड़े। उनके पैर में मोच आ गयी। किन्तु शरीर में समाया हुआ युद्ध-ज्वर उन्हें शान्त बैठने नहीं दे रहा था। अपने दुख रहे पैर को घसीटते हुए वे फिरंगियों पर टूट पड़े। वह अपनी तलवार को चारों ओर घुमा रहे थे। लड़ते लड़ते उनके मुख से झाग आने लगा, फिर भी वे पीछे नहीं हटे। उनके पेट और पीठ पर अनेक गहरे घाव लग गये थे। उनके शरीर से खून की धाराएँ बह रही थीं। उन्होंने दस बारह फिरंगियों को तलवार के घाट उतारा किन्तु सुराख से आने वाले फिरंगियों की संख्या बढ़ती जा रही थी। 468 :: सम्भाजी
कृष्णाजी पर हो रहे आक्रमण पर येसाजी की दृष्टि गयी। उनके मुख से उद्घोष निकला, "बेटा"। फिरंगियों का सामना करने के लिए वे हथेली पर जान लेकर आगे बढ़े। उन पिता-पुत्र की सहायता के लिए लगभग सौ सैनिकों का एक दल वहाँ पहुँच गया। घमासान युद्ध हुआ। मराठों के तेज प्रहार के सामने फिरंगी भागने लगे। येसाजी और उनके बहादुर सैनिकों ने सभी फिरंगियों को बाहर खदेड़ दिया। अनेक घावों से घायल कृष्णाजी गिर पड़े थे। शरीर खून मे लथपथ था और वस्त्र रक्त से भीग गये थे। मराठों ने कृष्णाजी को पालकी में बिठाकर पीछे के डेरे में पहुँचा दिया। वहाँ पर अनेक वैद्य कृष्णाजी के शरीर पर औषधियों का प्रयोग करने लगे। किन्तु घाव इतने गहरे थे कि खून का बहना बन्द ही नहीं हो रहा था। अपने बेटे की यह दशा देखकर येसाजी का हृदय चूर चूर हो रहा था। पालकी पर झुककर येसाजी अपने पुत्र के मुँह पर हाथ फेर रहे थे। उसका धैर्य का प्रयत्न कर रहे थे। किन्तु अभी-अभी समाप्त हुए युद्ध में येसाजी के पैर में गहरा घाव लग गया था। घाव मे बहते खून को सैनिकों ने देख लिया। उस घाव की ओर येसा का ज़रा भी ध्यान नहीं था। सेवकों ने उनके पैर को बाँध दिया। कृष्णाजी का रक्तस्राव रुक नहीं रहा था। इसलिए निश्चित किया गया कि पीछे बांदा भेज दिया जाय। येसाजी को समझाते हुए मानाजी मोरे ने कहा, "बाबाजी, आप अपने बच्चे पर ध्यान दीजिए। पालकी के साथ आप भी चले जाइये। यहाँ पर लड़ाई का सब काम हम देख लेंगे।" "ऐसा कैसे हो सकता है मेरे बच्चे? इन फिरंगियों की आँतों को बाहर खींचने का मैंने शम्भूमहाराज को वचन दिया है। मैं युद्धभूमि से हट कैसे सकता हूँ?" दूसरे दिन का सूरज निकला। सवेरे सवेरे रणभूमि कुछ शान्त रही। अपमान के बोध से वाइसराय बन्दर की तरह नाच रहा था। एक बड़ी टक्कर देकर किले तबाह कर देने का उसने निश्चय किया था। इसके लिए फिरंगियों ने तट के बाहर ऊँची ऊँची सीढ़ियाँ इकट्ठी करनी आरम्भ कर दी थीं। कमर में डोर से सामान बाँधकर फिरंगी सैनिक तैयार हो गये। आगे की बहादुरी दिखाने के उत्साह में वे अपनी जगह पर ही भेड़ की तरह नाचने लगे। उसी समय नदी की ओर नारियल और सुपारी के वनों में किसी भयंकर तूफान के आने का एहसास हुआ। 'हर हर महादेव' 'शिवाजी महाराज की जय' जैसे नारों से आकाश गूँज उठा। उसके बाद दोनों में शोरगुल शुरू हुआ। किले के अन्दर किले के भीतर से 'आयेऽऽ आयेऽऽ, सम्भाजी महाराज आयेऽऽ' महाराज आये महाराज आये हाथ में नंगी तलवारें झंडे की तरह लहराते हुए मराठा सैनिक एक स्वर में चिल्लाने लगे। देखते देखते शम्भू सम्भाजी 469
महाराज की फौज किले के पास पहुँच गयी। इस समाचार से ही फिरंगियों का जोश ठंडा पड़ गया। 'चलो, आगे बढ़ो' की ललकार हुई किन्तु फिरंगियों की दशा भीगी हुई भेड़, बकरियों जैसी हो गयी थी। दूसरी ओर शम्भूराजा के आगमन से प्रत्येक मराठा सैनिक में तूफान की शक्ति आ गयी थी। सम्भाजी महाराज का घोड़ा किले के द्वार पर पहुँच गया। उन्होंने किले के द्वार पर अपने श्वेत अश्व को नचाना आरम्भ किया। उनके पीछे पीछे खंडो बल्लाल का घोड़ा भी मध्यम चाल में उछलते हुए वहीं पर आ गया। लड़ाई की स्थिति समझकर शम्भू महाराज ने अपने आठ सौ सैनिकों में से सौ सैनिक किले के चारों ओर लगा दिए। कांट साहब ने चिल्लाते हुए अपने सैनिकों को बन्दूक चलाने के लिए विवश किया। किन्तु युद्ध के लिए मदोन्मत्त मराठों के घोड़े फिरंगियों की गोलियों को जरा भी महत्त्व नहीं दे रहे थे। मराठों का बढ़ता जोश देखकर एक कैप्टन ने वाइसराय के कानों में बोला, "झट से पीछे मुड़ जाएँगे, नहीं तो हमारे पीछे सम्भाजी के सैनिक नदी में उतर जाएँगे। नदी में फँसकर हमारी मौत होगी। द पाथ ऑफ रिट्रीट बिल बी कम्प्लीटली लास्ट।" वाइसराय ने अभी तक हिम्मत नहीं हारी थी। किन्तु उसकी सेना का साहस छूट चुका था। भाग्य ही उसका साथ नहीं दे रहा था। उसने अपने आँसुओं को रोकते हुए सेना को पीछे मुड़ने का आदेश दे दिया। आदेश मिलते ही पिछले दस दिनों से बारिश की मार और मराठों के तीव्र प्रतिरोध से जर्जर फिरंगी जान बचाकर पीछे भागने लगे। फिरंगियों की बची हुई फौज दूसरे दिन दुर्भाट की खाड़ी के पास पहुँच गयी। आगे की पहाड़ियों पर मराठों का एक दल छुपकर बैठा था। बुरी तरह अपमानित वाइसराय कांट में एक बार फिर 'वीरत्व जागृत हुआ। उसने पहाड़ी पर छिपी मराठों की सेना को समाप्त कर देने का आदेश दिया। पराजय स्वीकारने का बहाना बनाकर मराठों का दल पीछे हट गया। उन्होंने फिरंगियों को ठीक जगह पर सुविधा से आने दिया और फिर एकाएक उन पर टूट पड़े। फिरंगियों ने गोलियाँ दागनी शुरू कीं किन्तु मराठों ने उन्हें अपनी ढालों पर रोका। कभी घोड़े की आड़ से चकमा देकर उन पर आक्रमण किया। थोड़ी ही देर में फिरंगी सैनिक घोड़ों की टापों के नीचे कुचलकर मरने लगे। लड़ाई हार जाने पर भी वाइसराय का जोश कम नहीं हुआ था। एक मराठा वीर आगे बढ़कर अपनी धारदार तलवार से कांट साहब के सिर पर वार किया। यद्यपि तलवार वाइसराय के चमड़े के कोट से नीचे सरक गयी फिर भी तलवार की तेज नोंक उनकी पसलियों में घुस ही गयी। इस प्रकार एक बार नहीं दो बार कांट अपने भाग्य से बच गये। बचे हुए सौ-सवा सौ फिरंगियों ने अपनी जान बचाने के लिए मांडवी नदी का सहारा लिया। जिन्हें तैरने का अभ्यास नहीं था वे डूब गये। 170 सम्भाजी
जिन्हें तैरना आता था वे घबराकर कीचड़ में धँस गये। जो कुछ बचकर बाहर आये उन्हें कांट ने लाठी से पीटना शुरू किया। उन्होंने फिर से युद्ध में लौटने का असफल प्रयास किया। लड़ाई हाथ से छूट गयी थी। लाल चमड़ी का वाइसराय कीचड़ और मिट्टी में बुरी तरह सन गया था। आँसुओं से उसकी आँखों में बाढ़ आ गयी थी। वाइसराय की तीन हजार की सेना को सम्भाजी महाराज के वीरों ने विनष्ट कर दिया था। बहती हुई मांडवी नदी उसका साक्ष्य दे रही थी। पाँच अभी केवल दस दिन पहले शम्भू महाराज ने फिरंगियों को करारी शिकस्त दी थी। उनके घाव अभी सूखे नहीं थे। वाइसराय की पसलियों का घाव भी अभी भरा नहीं था। फिर भी वह दिखावा कर रहा था कि फिरंगियों का साम्राज्य किस प्रकार अजेय है। इस प्रदर्शन के लिए उसने 25 अक्टूबर, 1683 की रात को चुना। फिरंगियों के इतिहास में इस दिन का बड़ा महत्त्व था। कुछ दशकों पूर्व इसी तिथि को उन्होंने गोवा पर अधिकार किया था। इस शुभ दिन पर पणजी नगर में विजयोत्सव मनाने का सरकारी आदेश दिया गया था। उसी रात राजभवन में शहर के अमीर उमराओं के मनोरंजन के लिए नाच गाने का आयोजन किया गया था। यद्यपि यह सब दिखावा हो रहा था परन्तु कांट दी आल्होर मन ही मन बहुत डर रहा था। पहले उसे मराठों की वीरता और उनकी युद्ध पद्धति का पूर्ण ज्ञान नहीं था। साथ ही उसे अपनी फौजों पर अत्यधिक विश्वास था। एक और बड़ी बात हो गयी थी। शहजादा अकबर का एक वकील अपने मालिक के लिए एक जहाज की माँग करके चला गया था। इस चालाक वकील ने जाते जाते यह सलाह भी दे दी कि, "सम्भाजी की फौज में सभी भगोड़े सिपाहियों का ही जमघट है। उसे अधिक महत्त्व देने की आवश्यकता नहीं है।" कांट अनुभवी और शातिर दिमाग वाला था। इससे पहले उसने स्पेन की लड़ाई में अपनी तलवार का करिश्मा दिखाया था। वहाँ आने से पहले किसी मंगोल नामक स्थान पर उसने गर्वनर का कार्यभार भी सँभाला था। पणजी नगर के चारों ओर पत्थरों से बनी रक्षा दीवार थी। जगह जगह पर मजबूत बुर्ज बने थे। उसके पास गोला बारूद का बड़ा भंडार था। नदी के पास आग्वाद, मूरगाव, काबू रेश द सम्भाजी . 471
मागोश जैसे मजबूत किले भी थे। फिर भी मराठों के हाथ उसकी जो दुर्दशा हुई थी। कोंडा में मराठों ने उसका जो हाल किया था उससे कांट अन्दर ही अन्दर टूटता जा रहा था। वाइसराय जितना कुशल प्रशासक था उतना ही चालाक भी। लाभ की बातों का वह स्वयं निर्णय लेता था। कहीं पर हानि की सम्भावना होती थी तो गोवा के राज्य सलाहकार की सहायता लेता था। कल रात को उसने गोवा के अमीर उमराओं अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की एक बैठक किले में आयोजित की थी। इस बैठक में उसने लड़ाई के खर्च के लिए लोगों से तीन लाख अशर्फियों की माँग की थी। बड़े मीठे स्वर और व्याकुल भाव से उसने कहा- "सम्भाजी सेना ने हमारे राज्य में चारों ओर उपद्रव मचा रखा है। उसकी अश्वसेना और थल सेना उत्तर में बसई, दमण, रेवदांडा से लेकर गोवा के पास इस्तेहांव, साष्टी से बार देश तक लूटमार मचा रखी है। हमारे पास पर्याप्त जनशक्ति नहीं है। बार-बार प्रार्थना करने पर भी पुर्तगाल से कोई सहायता नहीं आ रही है। औरंगजेब जैसा कोई मित्र हमारी सहायता करेगा, इसकी भी कोई सम्भावना नहीं दिख रही है। हमारे कुछ फिरंगी सैनिक बड़ी कठिनाई से किलों की रक्षा कर रहे हैं। अपने राज्य को बचाये रखना है तो सेना, शस्त्र और वस्त्र पर धन खर्च करना होगा। इसलिए कृपा करके हमारी सहायता कीजिए।" उस रात बहुत सारा धन एकत्र हुआ। राज्य सलाहकार मंडल ने निर्णय लेकर लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा, "कांट सर के लिए सेना सम्भव हो सके तैयार करो। गोवा के कैदखाने के कैदियों को मुक्त करके उनके हाथों में बन्दूकें पकड़ाओ मराठों के घोड़े मांडवी नदी के पानी में उतरने न पाएँ।" उस रात गुप्तचरों ने समाचार दिया था कि आसपास के जंगलों में कुछ मराठा घुड़सवार छुपते-छुपाते देखे गये हैं। इस खबर से कांट बहुत चिन्तित था। जब नगर में उत्सव चल रहा था, उसी समय गोवा के उत्तर में केवल दो मील की दूरी पर, पूर्वोत्तर दिशा में एक अलग नाटक चल रहा था। पुराने गोवा के उत्तर में मांडवी नदी की दो धारायें बन जाती हैं। उसकी एक धारा के किनारे जुबे द्वीप पर पुर्तगालियों का इस्तेहांव किला था। किले की तटबन्दी प्राचीर ऊँची और बहुत मजबूत थी। पिछली रात से ही शम्भूराजा की फौज आसपास की झाड़ियों, नारियल-सुपारी के बगीचों में छुपकर बैठी थी। घोड़े पर बैठे हुए शम्भू महाराज किले की तटबन्दी की ओर बड़ी उत्सुकता से आँखें फाड़कर देख रहे थे। "महाराज अभी कुछ ही दिन पहले फोंडा किले पर हुई मुठभेड़ में हमने फिरंगियों को दिन में ही तारे दिखा दिये थे। फिर भी उन्हें अकल नहीं आयी ?" 472 :: सम्भाजी
खंडो बल्लाल ने पूछा। “उन्हें हमसे क्या सीखना है? वह तो वे स्वयं निश्चित करेंगे। किन्तु खंडोबा, हाल ही में सूरत से अनाज से लदे कई जहाज गोवा में उतार गये हैं। फिरंगियों की रसद पर मुगल मदमस्त होकर हमारे राज्य को निगल जाना चाहते हैं।” “यह बात तो एकदम सच है, महाराज!” “इसीलिए कह रहा हूँ, इन फिरंगियों पर एक बार और भीषण प्रहार करके इनकी पसलियों को तोड़े बिना, ये चुप नहीं बैठेंगे।” घोड़े की लगाम खींचकर उसकी गर्दन जोर से थपथपाते हुए शम्भू महाराज ने कहा। रात दस बजे समुद्र में भाटा शुरू हुआ। मांडवी का पाट खुल रहा था। उसी का लाभ उठाते हुए शम्भू महाराज तूफान के वेग से घोड़े पर आगे बढ़े। नदी पार करते समय मराठा दल बहुत सावधान था। किसी को कानोंकान मालूम न पड़ सके, इसलिए वे दबे पाँव चल रहे थे। किसी के हाथ में मामूली मशाल तक न थी। नदी के किनारे शम्भू महाराज अपने घोड़े को दुलारते हुए खड़े थे। शम्भू महाराज ने खंडो बल्लाल को आगे बढ़ने का संकेत किया। उसी समय चालीस मराठा घुड़सवार सावधानी से नदी में उतर पड़े। नदी पार करके उन्होंने मध्य रात्रि में ही इस्तेहांव किले को घेर लिया। किले की तटबन्दी ऊँची थी, उस पर चढ़ना बहुत कठिन था। किन्तु मराठा वीर उन पर सहसा टूट पड़े। खंडो बल्लाल की तलवार कलम की तरह तेजी से चलने लगी। फिरंगियों के सिर कटने लगे। आधे घंटे के भीतर ही मराठा वीरों ने किले पर अधिकार कर लिया। खंडो बल्लाल के दल ने किले की एक तोप को दाग दिया। उसकी धुडुमधामऽऽ, धुडुमधाम आवाज सुनकर शम्भूराज प्रसन्न हो गये। विजय का संकेत मिलते ही घने जंगलों में बाहर छुपी मराठा फौज ने उद्घोष किया। तटबन्दी से तोपों की तेज आवाज और उसके साथ 'हर हर महादेव' की गर्जना से गोवा के भीतर हाहाकार मच गया। जगह-जगह पर उत्सव के लिए एकत्र हुए पादरी, ईसाई जिधर से भी रास्ता मिला भागने लगे। तोपों की आवाज से जो सोये हुए थे, वे जग गये। 'आ गये आ गये ..मराठों ने गोवा पर आक्रमण कर दिया है।'-ऐसा चिल्लाते हुए फिरंगी अँधेरे में इधर-उधर टकराने और गिरने लगे। गोवा का हृदय भय से थर्रा उठा। समुद्र तट की सफेद बालू भी भय से काँपने लगी। खाड़ी से बहने वाली हवा शान्त हो गये थी, समुद्री लहरों का नर्तन थम गया था। आस-पास के पेड़-पौधे भेड़-बकरियों की तरह गुमसुम खड़े थे। खतरे का संकेत देने वाली चर्च की घंटियाँ बजने लगीं, नगाड़े भी बजने लगे। सम्भाजी :: 473
फिरंगी अत्यन्त भयभीत होकर चर्चों में दबी जबान से यीसू का नाम जपने लगे। शहर में घरों की खिड़कियाँ-दरवाजे बन्द होने लगे। हाथों में शस्त्र लिए कुछ लोग शहर के तट की ओर दौड़ पड़े। इनमें कांट द आल्होर सबसे आगे था! 'सर थोड़ा धीरज रखें' ऐसा उसके सहयोगी कह रहे थे। किन्तु एक दिन में दूसरा किला भी मराठों के अधिकार में चले जाने से वाइसराय पागल हो उठा। दूसरे दिन सवेरे- सवेरे अपने सहयोगियों के साथ-साथ शान्त इस्तेहांव के किले की तटबन्दी से भिड़ गया। फिरंगियों की डेढ़ सौ सैनिकों की टुकड़ी ने किले को घेरने का प्रयास किया। उसी समय शम्भू महाराज के नेतृत्व में मराठा सैनिक 'हर हर महादेव' की गर्जना के साथ फिरंगियों पर टूट पड़े। उनका जोश और आवेश ऐसा था कि उनके घोड़े को देखते ही फिरंगी भागने लगे। भागकर मांडवी नदी में कूदने लगे। मराठों का एक तीव्रगामी दल कांट आल्होर का पीछा करते हुए उसके पास पहुँच गया। उनकी नंगी तलवारें देखकर कांट के पैरों के तले की जमीन खिसकने लगी। इसी बीच उसके कुछ घुड़सवार आकर उसे बचाकर लेकर भागे। मांडवी के पानी में बाढ़ आ रही थी। दोनों किनारों पर पानी चढ़ रहा था। किन्तु मराठा वीर फिरंगियों का पीछा करना नहीं छोड़ रहे थे। मराठा वीरों को प्रोत्साहित करते हुए शम्भूमहाराज अपना घोड़ा आगे बढ़ा रहे थे। 'काटो-काटो, मारो-मारो' की गर्जना करते हुए वे मांडवी के बढ़ते रूप को निहार रहे थे। फिरंगी घुड़सवार वाइसराय को खींचते हुए पानी के अन्दर लिए जा रहे थे। बाद में कुछ ऐसी भाग-दौड़ शुरू हुई कि हर फिरंगी अपने शस्त्रों वस्त्रों की चिन्ता किये बिना अपने प्राणों को बचाने में लग गया। सभी फिरंगी नदी की ओर भागे। अनेक फिरंगी कीचड़ में फँस गये। उनमें से अनेक मराठों के बाणों और गोलियों के शिकार हो गये। कुछ पानी में डूबकर मर गये। जैसे मधुमक्खियों ने उनका पीछा करके बुरी तरह काटना शुरू किया हो। उसी तरह मराठों ने फिरंगियों को सताना आरम्भ किया। वाइसराय का भाग्य अच्छा था। उसे एक छोटी किश्ती का सहारा मिल गया। उस छोटी नाव में बैठकर भय से काँपता हुआ वाइसराय आधी नदी को पार कर चुका था। उसी समय मांडवी के दूसरे तट पर पहुँचे कुछ फिरंगी पानी से लबालब भरे बाँध को काटने लगे। परिणामस्वरूप नदी का पानी वेग से बढ़ने लगा। पानी से उठने वाली खलखलाहट की आवाज बाहर भी सुनी जा रही थी। पानी बढ़ता जा रहा था। शम्भूराजा निराश भाव से वाइसराय की आगे बढ़ती नाव को देख रहे थे। शिकार हाथ से निकला जा रहा था। शम्भूराजा को जीवित रूप में बादशाह औरंगजेब के हवाले करने की योजना बनाने वाला शत्रु उन्हें चकमा देकर भाग रहा था। शम्भू महाराज का मन उद्विग्न होने लगा। उनकी दृष्टि नदी के उस ओर गोवा पर पड़ी। 474 :: सम्भाजी
वहाँ के चर्चों की ऊँची लाल आकृतियाँ, सुन्दर कमानें शम्भू महाराज के वीर हृदय को पुकारने लगीं। फिरंगी भीतर से टूट चुके थे। आगे बढ़कर गोवा पर अधिकार करने का यही सुअवसर था। गोवा हिन्दुस्तान के विदेश व्यापार की कुंजी थी। यह कुंजी कई बार शिवाजी महाराज के हाथ से निकल चुकी थी। इस अवसर को खोना वस्तुतः मूर्खता ही कही जाती। नदी के एक तट पर महाराज खड़े थे। उनके हाथ युद्ध के लिए बेचैन हो रहे थे। वीरत्व के आवेश से हृदय की धड़कन बढ़ गयी थी। अपनी सबल हथेली से उन्होंने घोड़े का कन्धा थपथपाया। घोड़े के एड़ लगाकर उन्होंने गर्जना की "चलो।" घोड़े के मुँह में लगाम के काँटे चुभने लगे। घोड़ा जोर-जोर से हिनहिनाने लगा। उसने सामने का भयंकर जल प्रवाह देख लिया था। इसलिए वह किनारे पर ही खड़ा हो गया था। दूसरे क्षण महाराज ने उसके पुट्ठे पर प्रहार किया। लगाम को उन्होंने इतने जोर से खींचा की घोड़े के मुख को गहरा आघात लगा और वह कराह उठा। उसे एक प्राणान्तक छींक आयी। अपने मालिक के आदेश का पालन करने के लिए वह बहादुर अश्व पानी में कूद पड़ा। पानी की पर्वताकार लहरों में घोड़े ने प्रवेश किया। पानी इतना अधिक और वेगवान था कि घोड़े का पैर टिकना असम्भव हो गया। पैर टिकते नहीं थे और ऊपर उड़ने के लिए पंख तो थे नहीं। तेज लहरों के कारण उसका तैरना भी कठिन हो गया। फिर भी शम्भू महाराज ने घोड़े को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने अपने दोनों पैरों से घोड़े को दबाकर रखा था। उस पर जोर जोर से प्रहार करते हुए 'चल चल' की गर्जना कर रहे थे। परन्तु पानी के बढ़ते वेगवान प्रवाह के आगे घोड़े की एक न चल पायी। घोड़े की नाक में पानी घुसने लगा। ऊँची ऊँची लहरों के तेज आघात भी उसे झेलने पड़ रहे थे। जैसे कोई सूखी लकड़ी पानी के बहाव में उलट पुलट होती है उसी प्रकार वह घोड़ा भी पानी में पलटी मारकर एक ओर झुक गया। शम्भू महाराज अपने को घोड़े से अलग करने का प्रयास करने लगे। वे हाथ-पाँव मारकर ऊपर आते थे और उसी वेग से गोता लगा लेते थे। किनारे पर खड़े सैनिक यह दृश्य देखकर जोर जोर से चिल्ला रहे थे। शम्भूमहाराज का दुर्भाग्य यह था कि उनका एक पैर रिकेब में फँस गया था। किनारे पर हाहाकार मच गया। भीड़ से आगे आकर खंडो बल्लाल ने यह दृश्य देखा। मराठों के परमप्रिय, शिवपुत्र और रामगढ़ के राजेश्वर को काल उनकी आँखों के सामने से लिए जा रहा था। यह दृश्य देखकर खंडोजी की धमनियों में प्रवाहित स्वामिभक्ति का खून खौल पड़ा—'महाराज, महाराज, शम्भूमहाराज' चिल्लाते हुए अपने पाखर घोड़े के सम्भाजी · 475
साथ वे नदी के कूद पड़े। जब उनके घोड़े के भी पैर उखड़ गये तो खंडोजी ने पानी में छलाँग लगा दी। पानी में रास्ता बनाते हुए खंडोजी महाराज की ओर बढ़ रहे थे। इस समय तक महाराज ने कई गोते खा लिए थे। वे अव्वल दर्जे के तैराक थे। शेर से भी लड़ जाने की उनमें शक्ति थी। किन्तु उनका घोड़ा अर्धमृत अवस्था में तैर रहा था और महराज का पैर रिकेब में फँस गया था। मुँह और नाक में अनेक बार पानी चले जाने के कारण उनकी आँखें सफेद हो चुकी थीं। महाराज ने खंडोजी को जोश के साथ अपनी ओर बढ़ते देख लिया। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "अरे खंडो, रिकेब की डोर काट दो उसमें मेरा पैर अटक गया है। खंडोजी ने तत्काल कमर से छुरी निकाली और उछलकर आगे बढ़े। पानी में डूबकर रिकेब की डोर काटते हुए उन्होंने भी दो-तीन गोते लगाए। सौभाग्य से सफलता हाथ लगी। खंडोजी ने महाराज को सहारा दिया। लहरों का सामना करते हुए खंडोजी के घोड़े की लगाम का सहारा लेकर बड़ी कठिनाई से दोनों किनारे पहुँचे। शम्भूमहाराज और खंडोजी अत्यधिक थकी हुई अवस्था में किनारे की बालू तक पहुँचे और शरीर से टपकते पानी के साथ वहीं बैठ गये। बहुत देर तक उनकी साँसें तेजी से चलती रहीं। पानी के भीतर चल रहे उस युद्ध को देखकर सभी घुड़सवार और घोड़े भी सकते में आ गये थे। यहाँ तक कि पंछी भी अपने पंखों को समेटकरु नीड़ों में छुप गये थे। मराठों के अधिकार में आया सांत इस्तेहांव का किला रात की शीतल हवाओं से भरे अँधेरे में गुमसुम खड़ा था। क़िले में शम्भूमहाराज और उनके साथी रुके हुए थे। बीच के आँगन में कुछ परिचारकों ने आग जला रखी थी। रायप्पा ने आग में बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ डाल रखी थीं। आग में लकड़ी रह-रह कर धधक उठती थी। उसका गेरूआ प्रकाश अपनी ऊष्णता के साथ चारों ओर फैल रहा था। गरम और कशीदाकारी की हुई शाल लपेटे शम्भू महाराज आग के पास बैठे थे। उनके साथ ही कवि कलश, जोत्याजी केसकर आदि भी थे किन्तु उन्होंने खंडोजी बल्लाल को अपने बहुत करीब बैठाया था। समुद्र के खारे पानी में गोते खाते हुए अनेक बार उनके मुँह और नाक में पानी गया था। परिणामस्वरूप उनका सिर भारी हो रहा था। आग और ऊष्णता की उन्हें अत्यधिक आवश्यकता थी। महाराज ने वहीं पर भोजन ग्रहण किया। उनके साथियों का भोजन भी हो चुका था। शम्भू महाराज ने उठकर खंडो बल्लाल का मस्तक अपनी गोद में ले लिया। उसकी पीठ पर प्यार की थपकी देते हुए बोले- "खंडोबा आज मराठों का राजकलश पानी में नहीं समुद्र के तल में पहुँच गया था। अपने प्राणों की चिन्ता न करते हुए आपने पानी में छलाँग लगाई। आपके 476 :: सम्भाजी
इस दुर्लभ जयकार के सामने मैं नतमस्तक हूँ। आपकी योग्यता को पहचानकर हिंदवी स्वराज्य सम्मानित चिटणीस पद तो हम आपको पहले ही दे चुके थे। और कुछ चाहिए तो बताइये।" स्वाभिमान खंडो बल्लाल ने उठकर शम्भूमहाराज के पैर पकड़ लिए। उन्होंने कहा, "आपके चरणों में मेरा जो स्थान है, उसे अबाधित बनाए रखें। इससे अधिक मुझे कुछ नहीं चाहिए।" खंडोजी ने उसी समय अपना पाखर घोड़ा शम्भूमहाराज को देने का आग्रह किया। इस बात से शम्भूमहाराज उन पर पूरी तरह रीझ गय। उन्होंने कहा, "अरे खंडोबा, हमें और कितना लज्जित करना चाहते हो? क्या जन्म-जन्मान्तर तक के लिए उपकार का बोझ मेरे सिर पर रखकर पुरस्कार भी मुझे ही देना चाहते हो?" भावना के आवेश में शम्भूमहाराज के नेत्र चमक रहे थे। शब्दों में मन्दिर के घंटा नाद का प्रभाव आ गया था। खंडो बल्लाल को अपनी बाँहों में भरते हुए शम्भूमहाराज ने कहा, "हमारे पिताजी हर किले के जमादारखाने की चाभियाँ प्रभु जमात के लोगों को सौंपकर चिन्तामुक्त हो जाते थे। उसका सही कारण मैं आज समझ पाया हूँ। मराठा हो या ब्राह्मण, शिवाजी और सम्भाजी के समय में महाराष्ट्र की धरती ने अनेक जातियाँ और उपजातियाँ देखी हैं, उनके रंग पहचाने हैं। अनेक बार ये जातियाँ अपने जातीय गुण के अनुसार ही व्यवहार करती हैं। खंडोबा आपके पिता की, बालाजी चिटणीस की राजनिष्ठा तो हीरे मोती की तरह प्रकाशवान है ही, किन्तु गजापुर खंडहर में अपने स्वामी के लिए खून से नहाने वाला बाजी प्रभु, पुरन्दर का वीर सेनानी मुरारबाजी अथवा समुद्र के गर्भ को चीरकर, शेषनाग की चोटी खींचकर पाताल लोक से सम्भाजी जैसे अपने स्वामी को ले जाने वाला खंडोजी बल्लाल हो, सभी राजनिष्ठा के बेजोड़ उदाहरण हैं। आपकी प्रभु जाति ने 'राजनिष्ठा' शब्द को इतनी ऊँचाई प्रदान कर दी है कि ऊपर के उस प्रभु ने भी आपको हजार बार वन्दन किया तो अत्युक्ति न होगी। ऐसी विलक्षण आपकी योग्यता है।" छह गोवा का समुद्र तट और वन प्रदेश निस्तब्ध था। युद्ध के बाद की भयावह शान्ति चारों ओर छायी थी। घने जंगल की आड़ में पणजी शहर किसी गुमसुम बैठे जानवर की तरह लग रहा था। शम्भूमहाराज का पड़ाव डिचोली में था। दो हजार सैनिकों सम्भाजी :: 477
की फौज वहाँ से फोंडा की तटबन्दी के पास पहुँची शम्भूमहाराज ने सूबेदार को तटबन्दी के पुनर्निमाण का आदेश दिया। आदेश पाते ही बेलदार और कामाठियों का दल अपने काम पर जुट गया। शम्भूमहाराज का घोड़ा तट के पास से आगे बढ़ रहा था उनके पीछे-पीछे येसाजी कंक और खंडो बल्लाल के घोड़े चल रहे थे। पुर्तगालियों का वकील साराइव्ह द अल्बुकर्क सवेरे से ही महाराज की प्रतीक्षा करते बैठा था। शम्भू महाराज जानबूझकर उसकी उपेक्षा कर रहे थे। साथ-साथ चल रहे येसा से महाराज ने पूछा— "येसाजी काका, कृष्णाजी का स्वास्थ्य अब कैसा है?" "कल ही गाँव से खबर आयी थी। घाव अभी भी भरे नहीं हैं। अभी भी खतरा टला नहीं है।" "तो फिर येसाजी काका आप इतना हठ क्यों कर रहे हैं?" घोड़े का मुँह घुमाते हुए शम्भूमहाराज ने पूछा। "महाराज आपको संकट में कैसे छोड़ूँ? कभी आधा पेट खाकर उठ जाना सम्भव हो सकता है किन्तु लड़ाई को आधे में छोड़ देना बहुत खतरनाक होता है, महाराज।" येसाजी का आशय समझकर महाराज चुप हो गये। आगे बढ़ते हुए वे कार्य का निरीक्षण कर रहे थे। उसी समय किले के दूसरे छोर पर कुछ शोरगुल सुनाई पड़ा। महाराज का संकेत पाकर खंडो बल्लाल उसी ओर आगे बढ़ गये। थोड़े ही समय में लौटकर कहने लगे—'महाराज उधर चलिए। वहाँ बड़ा हंगामा हो रहा है। सैनिक और वहाँ के निवासी मेरी बात सुनने के लिए तैयार नहीं है।" "वहाँ ऐसा क्या हो रहा है?" "वहाँ पर ईसाइयों की माता 'लेडी वर्जिन' की मूर्ति है, उस मूर्ति को कुछ लोग तोड़ना चाहते हैं और वहाँ पर जो छोटा-सा चर्च है, उसमें आग लगाने की तैयारी कर रहे हैं।" यह समाचार सुनते ही शम्भूमहाराज चिन्तित हो गये। वे घोड़े को एड़ लगाकर जल्दी से आगे बढ़े। आगे का बुर्ज पार करके वे आगे बढ़े। लोगों की सन्तप्त भीड़ चर्च को आग लगाने की तैयारी कर रही थी। एक ओर से आग लगाई भी जा चुकी थी। उसी समय शम्भू महाराज का घोड़ा वहाँ पहुच गया। उन्होंने कड़कती आवाज में डाँटते हुए कहा, "अपने हाथों को सँभालो। पहले आग को बुझाओ, नहीं तो एक-एक के टुकड़े करके रख दूँगा।" शम्भू महाराज के सहयोगी भी वहाँ पहुँच गये। आग बुझाते समय कई सैनिकों के हाथ जल गये। गोवा के कई हिन्दू वहाँ पर दिखाई पड़ रहे थे। उन्होंने ही शम्भू महाराज के सैनिकों को 478 :: सम्भाजी
भड़काया था। आग तो बुझ गयी किन्तु वहाँ की जनता अभी तक शान्त नहीं हो पा रही थी। उन्हीं में से एक मूर्ख आदमी महाराज से कहने लगा, “महाराज आपको क्या पता कि हम हिन्दू लोग यहाँ पर किस तरह का जीवन जी रहे हैं?'' “चुप रहो। किसी भी तरह की गड़बड़ मत करो।'' महाराज ने डाँटते हुए कहा, “शिवाजी का नाम लेकर आप ऐसा शैतानी खेल बिलकुल नहीं खेल सकते।'' “पर शम्भू महाराज। हम पर जो अत्याचार हुआ .?'' “एक ने यदि गाय को मारा तो दूसरे को उसके बछड़े को मारना चाहिए क्या ? अपने पूर्वजों को याद कीजिए मराठा देवी-देवता, सदाचार और नीति धर्म के पुजारी रहे हैं। वे मूर्ति भंजक और डाकू कभी नहीं रहे हैं।'' साष्टी, बारदेश और गोवा के दूसरे क्षेत्रों से दंगे के समाचार आ रहे थे। शम्भूमहाराज के आक्रमण को देखकर हिन्दुओं में जोश आ गया था। पिछले कुछ दशकों में ईसाइयों के अन्याय और अत्याचार से पीड़ित जनता प्रतिकार के लिए उठ खड़ी हुई थी। उनमें कुछ धर्मान्ध, स्थिति का फायदा उठाकर कहीं कहीं चर्चों को जला रहे थे। शम्भू महाराज ने फोंडा से आदेश दिया कि “किसी के भी धर्मस्थान को कोई हानि मत पहुँचाओ।'' किन्तु लोगों की बढ़ती उत्तेजना से वे स्वयं निराश हो रहे थे। महाराज एक बार फिर अपने डिचोली के पड़ाव पर पहुँच गये। घायल सैनिकों और घोड़ा का वहाँ उपचार किया जा रहा था। गोवा और कोंकण की सीमा पर स्थित डिचोली महाराज का प्रिय स्थान बन गया था। वहाँ की लाल मिट्टी, वहाँ के नारियल और सुपारी के बगीचे, छोटे-छोटे खपरैलों वाले पर, गाँव के छोटे-छोटे तालाब सब कुछ नयनाभिराम थे। वहीं पर महाराज ने अपने और कवि कलश के लिए महल बनवा लिए थे। वाइसराय सोचता था कि फोंडा पर अधिकार कर लेने के बाद महाराज पन्हालगढ़ की ओर लौट जाएँगे। किन्तु शम्भूमहाराज ने पूरी सफलता प्राप्त करने और फिरंगियों को नेस्तनाबूद कर देने का संकल्प ले रखा था। तटवर्ती क्षेत्र में फिरंगियों के साथ अनेक स्थानों पर लड़ाई चल रही थी। रायगढ़ से नित्यप्रति समाचार आ रहे थे। सभी सैन्य दलों और राजधानी रायगढ़ के साथ महाराज का पत्राचार चल रहा था। पत्रवाहक हरकारे समाचारों के साथ सभी ओर भाग रहे थे। डिचोली पहुँचकर महाराज ने शिविर की प्रदक्षिणा की, सभी घायल सैनिकों से पूछताछ की। वहाँ से वे अपने महल में बैठक के लिए आ गये। उन्होंने बीजापुर के आदिलशाह को पत्र लिखा, “आजकल औरंगजेब इस ओर है। इसमें प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं है, कल वह आपकी ओर भी पहुँच जाएगा। यह भी सोचो सम्भाजी :: 479
कि यदि मराठे हार गये तो आप भी बच नहीं पाएँगे। इस स्थिति पर गम्भीरता से विचार करो और साथ देने का वचन दो। " उसी समय महाराज ने हैदराबाद के दीवान मादण्णा को भी पत्र लिखवाया- "आपके कुतुबशाह जितनी समृद्धि, संत्ति हमारे पास होती तो हम सीधे दिल्ली पर आक्रमण करके उस औरंगजेब को यमुना में डुबो-डुबोकर समाप्त कर देते। घर में शान्त बैठकर वास्तविक शान्ति का अनुभव न करो। अन्दर छिप जाने से बाहर का तूफान शान्त नहीं होगा।" दोपहर को एक हरकारा डिचोली पहुँचा। वह एक दुखद समाचार लेकर आया था। उस समाचार से शम्भूराजा के साथ सभी के हृदय दहल गये। गाँव में कृष्णाजी कंक के घाव फूट गये। वे भगवान को प्यारे हो गये। वह समाचार सुनकर येसाजी अपने को सँभाल नहीं पाये। वे जोर-जोर से रोने लगे। शम्भूमहाराज की आँखों से भी अश्रुपात होने लगा। उन्होंने येसाजी को अपनी बाँहों में भरकर उन्हें सांत्वना देने का प्रयास किया। "महाराज जो कुछ हुआ वह सब प्रभु की लीला थी। किन्तु मुझे एक ही बात का दुख है।" येसाजी ने कहा, "मैं तो सूखा हुआ पीला पत्ता हूँ। आपकी सेवा में कभी भी टूट कर गिरूँगा और धन्य हो जाऊँगा। किन्तु आपके कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ने के लिए हमारे कृष्णाजी को रहना चाहिए था।" उस रात डिचोली में अनेक मराठा घुड़सवार एकत्र हुए थे। शम्भूमहाराज ने येसाजी को अपने समीप ही बिठाया था। उन्होंने येसाजी के हाथ को अपने सीने मे लगाया। आकाश की ओर देखते हुए उन्होंने कहा, "येसाजी, आपका कृष्णाजी अब कभी वापस आने वाला नहीं है। इसलिए अब अधिक दुखी न हों। स्वराज्य की सेवा में जो अपने प्राण अर्पित करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। वह एक सितारा बन जाता है। और ध्रुवतारे की भाँति चमकता रहता है। कृष्णाजी भी अब आकाश का एक सितारा बन गया है।" शम्भूमहाराज ने कवि कलश और अन्य कर्मचारियों को पहले ही बुला लिया था। महाराज ने कृष्णाजी के तीन वर्ष के पुत्र के नाम एक सूबा लिख दिया। कंकवंश के लिए उन्होंने प्रत्येक वर्ष पर्याप्त धन मिलने की व्यवस्था कर दी। शम्भूमहाराज के इस तात्कालिक निर्णय और असीम औदार्य से सामान्य सैनिक भी दंग रह गये। येसाजी ने रोते रोते ही शम्भू महाराज को अपनी बाँहों में भर लिया और कहा, "सच कहूँ महाराज! आपके साथ रहने से हमें यह भान ही नहीं होता कि शिवाजी महाराज हमें छोड़कर चले गये हैं।" 480 :: सम्भाजी
सात गोवा की उस लाल धरती पर जोरदार लड़ाई चल रही थी। माष्टी और बारदेश में मराठा फौज डटकर लड़ रही थी। नारियल सुपारी के वनों से धुआँ उठ रहा था। अपने बलवान और बहादुर सैनिकों को महाराज ने पणजी के चारों ओर फैला दिया था। एक महीने के बाद भी मराठा फौज डटकर लड़ रही थी उधर बेंगुर्ला मे औरंगजेब ने अपनी जहाजो का लंगर डाल दिया था। गोवा के समुद्र में रसद उतारने की अनुमति उन्हें वाइसराय कांट नहीं दे रहा था। जिन मुगलों के साथ उन्होंने समझौता किया था उनसे भी फिरंगी डरने लगे थे। मराठों का शक्तिशाली विरोध देखकर उन्होंने मुगलों की सहायता का आश्वासन दिया था। परन्तु वे यह भी सोचते थे कि परिस्थिति का लाभ उठाकर मुगलों ने ही गोवा पर कब्जा कर लिया तो क्या होगा ? शम्भूमहाराज बहुत अस्वस्थ दिख रहे थे। पाखरा घोड़े पर वे मांडवी के दोनो ओर चक्कर लगाते रहते थे। पणजी की तटबन्दी उसके बड़े बुर्ज बुर्जो पर लगी बड़ी-बड़ी तोपें, समुद्र और खाडी में निरन्तर गश्त लगाती जहाजें वे निरन्तर देखते रहते थे। पणजी पर अधिकार करने का उत्साह उनमें बार-बार आता था। साथ-साथ चलने वाले कवि कलश, दुर्गादास, शहजादा अकबर से वे कहते थे- "कुछ भी कीजिए। कोई-न-कोई योजना बनकर हमें पणजी को अपने अधिकार में लेना ही है। यदि शहर में हमारे पाँच सात सौ लोग घुसकर उपद्रव मचा सकें तो बाद में बाहर कैसे सहायता की जाये तो काम बन सकता है इसे हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं।" शहजादा अकबर का वाइसराय आल्होर के साथ पत्राचार चल रहा था। शहजादा अकबर ने पणजी के पास एक जहाज के निर्माण की अनुमति माँगी थी। फिरंगियों से अनुमति मिलते ही, इस ओर के तट पर लुहार-बढ़ई आदि की आवाजाही आरम्भ हो गयी। उनकी संख्या बढ़ती देखकर वाइसराय को आशंका हुई। उसने इस भीड़ और भीड़ के पणजी में आवास पर प्रतिबंध लगा दिया। समझौता करने के उद्देश्य से अकबर एक बार अपने छः सौ सैनिकों के साथ निकला। उस समय फिरंगियों ने उनका विरोध किया। एक ओर शम्भूमहाराज गोवा को अपने अधिकार में लेने के लिए बेचैन हो रहे थे तो दूसरी ओर वाइसराय अपने राज्य की रक्षा का जी-जान से प्रयास कर रहा था। महाराज आज कुछ तनावग्रस्त दिखाई पड़ रहे थे। दो दिन पहले ही उनकी सम्भाजी 481
दो हजार की स्थल सेना और एक हजार की अश्व सेना मड़गाँव मे प्रवेश कर चुकी थी। महाराज ने गोवा के अपने सभी सेनानायकों और अधिकारियों को आदेश भेजा, "पुर्तगालियों की सम्पत्ति अवश्य लूटो किन्तु किसी भी व्यक्ति को आघात पहुँचाने का कोई उपयोग नहीं है। चर्चों के साथ सभी धर्मों के प्रार्थना स्थलों का सम्मान करो।" डिचोली के महल में शम्भूमहाराज फिरंगियों पर किये आक्रमण का समाचार ले रहे थे। उसी समय कवि कलश ने महाराज से पूछा—"पणजी पर किया गया आक्रमण अभी और कितने दिन चालू रखना है? पुर्तगालियों का वकील साराइव्ह् दे अल्बुकर्क, सुलह के लिए आपके पास बहुत चक्कर काट रहा है।" "उससे कहिये कि सूरत से औरंगजेब ने तो रसद भेजी है उसकी आधी रसद हमारे हवाले कर दो फिर समझौते की शतरंज बिछाओ।" कवि कलश दिल खोलकर हँसे। उन्होंने बड़े उत्साह से कहा, "राजन! एक दूसरी बात के लिए आपकी जितनी प्रशंसा की जाये उतनी ही कम है।" "हुआ क्या? हमें भी तो कुछ बताइये।" "गोवा पर अपने जोरदार हमले से वाइसराय इतना डर गया है कि राजधानी पणजी को पीछे मार्मा गोवा ले जाने का निर्णय ले लिया। अपना खजाना और काग़जपत्र भी वहीं ले जाकर रख रहा है।" शम्भूमहाराज ने प्रसन्न होकर कहा, "कविराज इतने से काम नहीं चलेगा। अगले दो-चार दिनों में हम साष्टी और बारदेश पर पूर्ण अधिकार कर लेंगे। उसके बाद मांडवी को पार करके गोवा के शिखर पर अपना भगवा ध्वज फहराएँगे।" यह चर्चा चल ही रही थी कि बाहर किसी के चिल्लाने की आवाज आयी। वह कह रहा था—"महाराज न्याय कीजिए। हमारी व्यथा-कथा सुनिये।" एक ही ताल-सुर में असंख्य आवाजें एक साथ भीतर आने लगीं। बाहर हजार पाँच सौ लोग एकत्र हो गये थे। कार्य में व्यस्त होने के कारण महाराज ने कवि कलश की ओर संकेत किया। कवि कलश तत्काल उठकर बाहर चले गये। शम्भूमहाराज आक्रमण सम्बन्धी किसी कागज को पढ़ रहे थे। किन्तु बाहर का शोर बढ़ता ही जा रहा था। महाराज ने अपने एक कर्मचारी से पूछा, "इतना हो हल्ला किसलिए हो रहा है?" "ये लोग साष्टी से आये हैं, महाराज! वहाँ के उत्साही लोग हाथ में मशालें लेकर वहाँ की चर्च को जलाने का प्रयत्न कर रहे हैं। किन्तु हमारे अधिकारी राणोजी मोरे ने उन्हें पीट-पीटकर भगा दिया। इसी कारण से वे लोग बहुत रुष्ट हैं और किसी भी बात सुनने को तैयार नहीं हैं।" यह समाचार सुनते ही महाराज उठकर उन लोगों के पास पहुँचे। महाराज को देखते ही चिल्ला रहे लोग शान्त हो गये। कुछ समय तक लोग आँखें फाड़कर 482 :: सम्भाजी
महाराज को देखते रहे। उसके बाद उनके कंठ फूटे— “महाराज आपने फिरंगियों का जो दुर्दशा की उसे देखकर हमें अत्यन्त आनन्द हुआ। किन्तु आज भी उनका गुरूर कम नहीं हुआ है।” एक बूढ़ा आगे आकर अपने हाथों को नचाते हुए बोला, “वहाँ रायगढ़ पर रहकर आप क्या जान पाएँगे कि हम हिन्दू इन फिरंगियों के शासन में कैसे जीते हैं ? हमारे मन्दिरों में देवता अब नहीं रह गये है। फिरंगियों ने बलपूर्व हिन्दुओं को धर्मान्तरण के लिए विवश किया। हिन्दू देवताओं की मूर्तियाँ तालाबों में फेंक दीं। इन लोगों ने कुँओं की जगत पर सामान्य पत्थर के रूप में मूर्तियों को गाड़ रखा है। पानी खींचते हुए रस्सियों की रगड़ से ये मूर्तियाँ अब टूटने लगी हैं। आप स्वयं ही चलकर देख लें।” “मुझे सब पता है। गोवा में शान्ता, दुर्गा, महालक्ष्मी, मंगेशी जैसे देवस्थलों को भी अपने चारों ओर तटबन्दी और लोहे के मजबूत दरवाजों की आवश्यकता होती है। फिरंगियों के अत्याचार से यहाँ के देवी देवताओं को भी पसीना छूटता है।” “वही हम भी कह रहे हैं, महाराज ! जब हमारे देवताओं की ऐसी दशा है तो हम लोगों की क्या होगी ? फिरंगियों से बदला लेने का यही अच्छा अवसर है, आप हमें रोके नहीं।” पाँच-छः लोग एक साथ बोल उठे। सामने जमी भीड़ में लोग अपने भाले और लाठियाँ ऊपर उठाकर अपना आवेश व्यक्त करने लगे। किन्तु शम्भूमहाराज ने डाँटते हुए कहा— “खामोश ! किसी तरह का शोरगुल न करो। इस बात को कभी न भूलो कि गोवा पर आक्रमण शिवाजी के पुत्र का हो रहा है, औरंगजेब के किसी शहजादे का नहीं।” महाराज की कठोर वाणी से सभी लोग सन्न रह गये, तब महाराज ने कहा, “आप लोगों की पीड़ा को मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ। हिन्दुओं का राजा होने के नाते आप मेरे सामने अपनी हर माँग रख सकते हैं। हम आपकी हर माँग पूरी करेंगे। किन्तु इस बात का हमेशा स्मरण रखो कि किसी के द्वेष की नींव पर बनाए गये हमारे मन्दिर टिकने वाले नहीं हैं।” कवि कलश को महाराज ने कुछ नये आदेश तैयार करने के लिए बुलाया। उन्होंने जिन हिन्दू मन्दिरों को फिरंगियों ने ध्वस्त कर दिया था, उनके लिए अपने खजाने से धन देने की व्यवस्था की जिससे उनका पुनर्निर्माण हो सके। धर्म की रक्षा के लिए कुछ योजनाएँ भी बनाई गयीं।” सभी लोग प्रसन्न हो गये। किन्तु मडगाँव का वह वृद्ध जो अभी-अभी महाराज से बातें कर रहा था, सन्तुष्ट नहीं लग रहा था। महाराज ने उसे छेड़ते हुए उसके सामने हाथ जोड़ दिये। उसने बड़े प्रेम से कहा, “सरकार आपने हमारे सम्भाजी :: 483
बारदेश के चारों किलों पर अपना अधिकार कर लिया। फिरंगियों के शासन से हमें मुक्त किया। पर महाराज आपसे एक और प्रार्थना है। " "कहिए।" "महाराज यहाँ के पादरी हम पर बहुत अत्याचार करते रहे हैं। आपका कहना है कि किसी की धार्मिक भावना पर ठेस न लगने दें। परन्तु महाराज, ये पादरी यीसु का नाम लेकर हमारे साथ जानवरों जैसा बर्ताव करते हैं। धर्मान्तरण कराने के लिए इन्होंने हमारे घर-परिवार को जलाकर रख दिया। ईसाइयों के इन पादरियों का चरित्र भी कहाँ ठीक है? यीशु का नाम लेकर इन पादरियों ने बहुत धन इकट्ठा किया है। इनके सफेद वस्त्रों में मोमबत्तियाँ नहीं, धारदार कटारियाँ रखी हैं।" "बाबा! आपको क्या चाहिए?" "हम किसी को उँगली से भी नहीं छुयेंगे। पर कल मडगाँव के अत्याचारी पादरियों के चोंगे उतारकर उनके सिर पर बाँधेंगे और उनका जुलूस निकालेंगे। बस और कुछ नहीं।" बूढ़े व्यक्ति की यह माँग सुनकर महाराज के साथ सभी लोग जोर-जोर से हँसने लगे। महाराज ने उनके आक्रोश को ठीक-ठीक समझा। मडगाँव में सचमुच धर्म के नाम पर बहुत अत्याचार हुआ था। महाराज ने जुलूस की अनुमति दे दी। किन्तु अनुमति देने के साथ ही उन्होंने कवि कलश को आदेश दिया— "इस खतरे की जवाबदारी आप पर है। जुलूस के साथ सेना की एक विशेष टुकड़ी भेजिए। किसी चर्च की इमारत अथवा किसी धर्मगुरु के प्राणों की कोई क्षति नहीं होनी चाहिए।" लोग सन्तुष्ट होकर वहाँ से चले गये। दूसरे दिन समाचार आया कि मडगाँव के पादरियों ने मराठों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। चर्चों के साथ ही उन्होंने सम्पत्ति को भी मराठों के हवाले कर दिया। चर्च पर क़ब्ज़ा लेते समय चर्च के बाहर कम से कम दो हजार फिरंगी वहाँ एकत्र हुए थे। मराठों ने सभी को शान्तिपूर्वक बाहर जाने दिया। आठ वाइसराय की पसलियों का घाव अब भी उसे पीड़ित कर रहा था। मांडवी के दूसरे किनारे पर 'हरऽ हरऽ महादेव' के नारे गूँज रहे थे। उस किनारे पर शम्भूमहाराज का घोड़ा निरन्तर घूम रहा था। रात में मराठा घुड़सवारों की तलवारें नारियल और सुपारी 484 . : सम्भाजी
के बगीचों में चमकती दिखती थीं। कांट द आल्होर के साथ सम्पूर्ण पणजी शहर दहशत में आ गया था। पुर्तगाली सेना की भूख-प्यास बन्द हो गयी थी। पादरी भीतर ही भीतर बहुत भयभीत हो गये थे। वाइसराय की स्थिति ऐसी हो गयी थी जैसे कोई सियार अपनी माँद में बैठकर शिकारियों का हांका और शिकारी कुत्तों की आवाज सुनकर भय के मारे भीतर ही भीतर मरा जा रहा हो। थोड़ी-सी सेना और उससे कहीं अधिक अपनी कुशाग्र बुद्धि के बल पर उसने अब तक पणजी पर अपना अधिकार जमा रखा था। किन्तु पणजी वासियों का दबाव निरन्तर बढ़ रहा था। इसकी सूचना वाइसराय ने पुर्तगाल को भी दे दी थी। हिन्दुस्तान में पुर्तगालियों का शासन समाप्ति पर आ रहा था। चारों ओर वाइसराय और उसकी नीतियों को अन्यायपूर्ण ठहराया जा रहा था। थाना से लेकर गोवा तक फिरंगियों की प्रत्येक चौकी पर मराठों के आक्रमण हो रहे थे। उसी बीच चौल के गवर्नर फ्रांसिस द कोश्त का सन्देश आया— "यहाँ पर अँग्रेजों ने खुलेआम सम्भाजी की सहायता करनी आरम्भ कर दी है। वे मराठों को बन्दूकें तोपें, गोले, बारूद सब कुछ दे रहे हैं। दुगुना दाम देने पर भी हमें चुटकी भर भी बारूद नहीं मिल रही है। यदि समय से हमारी सहायता न की गयी तो हम मारे जायेंगे।" वाइसराय की पसलियों का घाव अभी भी भरा नहीं था। शम्भूमहाराज के भय से पणजी छोड़कर भाग रहे थे। वाइसराय और उसकी सेना से फिरंगियों का विश्वास उठ गया था। उस रात कांट ने दूरबीन से देखा। डरे हुए लोग बड़ी संख्या में दूसरी दिशा की ओर जा रहे थे। उसने अपने सचिव से पूछा, "मूर्खों की तरह वे लोग कहाँ जा रहे हैं?" "बॉमगेसू चर्च की ओर।" "इतनी रात को?" "जी सर, सेंट जेवियर पर इनकी अगाध श्रद्धा है। इनका विश्वास है कि इस भयानक संकट से इन्हें सेंट जेवियर ही बचा सकते हैं। सर मुझे भी लगता है..." सचिव कुछ डर गया। उसका वाक्य अधूरा ही छूट गया। "क्या?" "आप भी वहाँ जाकर सेंट जेवियर के सामने अपनी झोली फैलाएँ। सेंट जेवियर से की गयी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाएगी।" इस समय सेंट जेवियर की पुरानी चर्च फिरंगियों की शरणस्थली बन गयी थी। वहाँ पर एकत्र लोग दबी आवाज में सेंट जेवियर का नाम जप रहे थे। रात-दिन प्रार्थनाएँ चल रही थीं। फिरंगियों की आँखों के साथ मोमबत्तियाँ जल रही थीं। सम्भाजी :: 485
प्रार्थना के बीच-बीच में साष्टी और बारदेश से समाचार भी आ रहे थे। कभी 'शापोरा' किले के हाथ से जाने की तो कभी पुर्तगालियों के 'जिये' और 'पिये' किलों पर मराठों के जोरदार आक्रमण के समाचार आ रहे थे। आक्रमणों के समाचार सुनकर वहाँ के लोग और भी भयभीत हो रहे थे। एक दिन सवेरे सवेरे राजभवन के काले घोड़े चर्च के परिसर में आकर रुके। शाही घोड़ागाड़ी से कांट साहब नीचे उतरे। उनकी हालत बहुत शोचनीय थी। रात में जागते रहने से आँखें लाल हो गयी थीं। आँखों के नीचे काले धब्बे पड़ गये थे। दाढ़ी कुछ अधिक सफेद लग रही थी। शरीर उत्साहहीन होने के कारण चाल में शिथिलता आ गयी थी। इस दशा में इस सद्गृहस्थ को वाइसराय के रूप में पहचानना कठिन था। उसे देखकर लगता था जैसे वह चोर डाकुओं से लुटा हुआ और बहुत मार खाया हुआ मुसाफिर हो। कांट आल्होर के साथ फ्रांसिस द साँज, आर्क बिशप, प्रिमज दौ मान्युअल, मिगेल द आल्मेदा, जैसे शहर के अनेक पादरी और उमराव वहाँ पर एकत्र हुए थे। भयत्रस्त उन सभी अधिकारियों एवं वरिष्ठ लोगों ने मशालें जला लीं। बगल की अँधेरी सीढ़ियों से मशाल के सहारे नीचे उतरे। उस तलघर में सेंट जेवियर का शव रखा गया था। वहाँ के पत्थर के चबूतरे से एक बड़ी पेटी बाहर निकाली गयी। सेंट जेवियर का शव एकदम सुरक्षित था। इसे भी एक चमत्कार माना जा रहा था। सभी ईसाई सेंट जेवियर के नाम का जाप करने लगे। वे सभी रो रोकर कहने लगे-“सम्भाजी की आफत से हमें मुक्त करो।” उस महापुरुष के दर्शन-से वाइसराय भी चकित हो गया था। मोमबत्ती के पिघलते मोम की तरह वाइसराय के आँसू उसके लाल कपोलों पर लगातार गिर रहे थे। उसने सेंट जेवियर के सामने पूर्णतया समर्पण कर दिया। भारत में पुर्तगाली शासन के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि के रूप में उसने एक प्रार्थनापत्र लिखा। उस प्रार्थना के साथ एक आदेशपत्र भी सेंट जेवियर के पैरों के पास रख दिया। वह पुर्तगाल के राजा द्वारा वाइसराय के रूप में नियुक्त होने का असली दस्तावेज था। कांट की आँखों से धारासार अश्रुपात हो रहा था। उसने अपने हाथ की स्वर्ण खड्ग, अपना मुकुट, राजदण्ड जैसी सभी महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ और राजचिह्न सेंट जेवियर के पैरों के पास रख दिया। रोते हुए उसने कहा- "फादर जेवियर, आज से मैं यहाँ का गवर्नर नहीं आपका गुलाम हूँ। अपना हिन्दुस्तान का राज्य हम आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। हे दया सागर, हे महामानव ! हमारी रक्षा करनी है या नहीं ? इसका निर्णय अब आप ही करें।" वाइसराय, सारे पादरी और प्रजाजन कई दिनों तक उसी तरह प्रार्थना करते रहे। वहीं पर सोना और जो कुछ मिल जाये भोजन वहीं पर होता रहा। 486 .. सम्भाजी
एक दिन वाइसराय ने अपने सचिव से कहा, "बन्दीखाने के दरवाजे खोल दो। मराठों के उस वकील येसाजी गम्भीरराव को मुक्त कर दो। उसे सम्भाजी के पास भेज दो। सम्भाजी को सन्देश भेजो कि 'सन्धि की शर्तों को आप स्वयं निश्चित करें, जैसा चाहें मसौदा तैयार कर लें। हम उस पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं। परन्तु हमें इस विपत्ति से छुटकारा देने की कृपा करें। अब हमें और अधिक न सताएँ'।" गोवा पर शम्भू महाराज का दबाव बढ़ता जा रहा था। माष्टी और बारदेश पर मराठों का अधिकार हो गया था। इसके साथ आग्वाद, रोशमाग़ोश, शापूरा जैसे फिरंगियों के छोटे मोटे किले भी मराठों के अधिकार में आ गये थे। मडगाँव में मराठों की एक हजार की थल सेना प्रवेश कर गयी थी। सांमिगेल और सांत क्रिस्टोहांव आदि सभी किलों पर आक्रमण हो रहे थे। गोवा की चर्चों में अब मोमबत्तियों की भी कमी होने लगी थी। वाइसराय आने वाले एक एक दिन को गिन गिन कर काट रहा था। किसी प्रकार से इस विपत्ति से मुक्त होने के लिए वह छटपटा रहा था। फिरंगियों के वकील बार बार आकर अपने लम्बे हाथों से शम्भू महाराज को सलाम कर रहे थे। किन्तु महाराज किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं थे। बाईस दिन बीत चुके थे। फिरंगियों की कमर टूट चुकी थी। सेंट जेवियर चर्च में बैठे बैठे वाइसराय का दम घुटने लगा था। उसकी पसलियों का घाव अब कुछ कुछ भर गया था। परेशान होकर कांट द आल्होर ने अपने राजा को आखिरी सन्देश भेजा, "प्रलय की स्थिति बन गयी है। हमारा इससे उबर पाना असम्भव है। तोपों को चलाने वाले बहादुर सैनिक बच नहीं पाये और गोला बारूद भी लगभग समाप्त हो चुका है। जिस प्रकार टूटा हुआ जहाज पानी में गोते लगाता है, उसी तरह फिरंगीराज हिन्दुस्तान में अपनी अन्तिम साँसें गिन रहा है।" एक दिन चमत्कार हुआ। सबेरे सबेरे चर्च में समाचार आया कि रात में मराठों ने अपना मोर्चा उठा लिया। किसी को बिना कोई हानि पहुँचाए वे अपनी फौज के साथ एकाएक चले गये। यह समाचार सुनते ही सभी लोग सेंट जेवियर के चरणों में अपना माथा झुकाने लगे। आनन्दातिरेक से सभी फिरंगी नाचने लगे। फिर भी फिरंगियों के मन में मराठों का डर बना हुआ था। 10 जनवरी, 1684 को गोवा राज्य सलाहकार मंडल की बैठक बुलाई गयी। गोवा पर मराठों के आक्रमण की सम्भावना से उन्होंने अपनी राजधानी को मार्मा गोवा में स्थानान्तरित कर दिया। शम्भू महाराज को मिला हुआ समाचार सच था। शहजादा मुअज्जम एक लाख की फौज लेकर रामदरा घाट पार करते हुए आगे बढ़ रहा था। फौज गोवा के सम्भाजी :: 487