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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

महाराज को धूप से बचाने के लिए किलेदार ने वहीं चट्टान पर एक कनात खड़ी कर दी थी। उसमें बैठे शम्भूराजा की नजर सामने बुर्ज के निर्माण कार्य पर लगी हुई थी। पिछले तीन दिनों में मजदूरों और सिपाहियों ने विलक्षण पराक्रम दिखाया था। बुर्ज का अधिकांश निर्माण कार्य पूरा हो चुका था। परन्तु शेष कार्य आज की रात तक पूरा हो जाना चाहिए था। राजा ने पक्का बन्दोबस्त किया था। यदि मुगल सेना दूसरे दिन भी विशालगढ़ पर आक्रमण करती तो भी छह महीने तक के लिए रसद और गोला बारूद जमा कर लिया गया था। शम्भूराजा बोझिल स्वर में बोले, “कविराज संगमेश्वर के विचार विमर्श में दिशा निश्चित हो जाय, बस! फिर दुश्मन को महीना भर में गाड़ देंगे। चाहे कुछ भी हो जाये उस जालिम अजगर की फाँस से महाराष्ट्र को एक दो महीने में मुक्त कर लेने का हमारा पक्का इरादा है।” “बिल्कुल राजन!” “परन्तु कविराज, सात आठ वर्षों की लगातार लड़ाई से प्रजा की बड़ी दुर्गति हुई है। उन्हें बोने के लिए बीज दें। सरकार की ओर कुआँ-बावड़ी खोदने के लिए द्रव्य दें। किन्तु कविराज मुझे विश्वास है—” “किस बात का राजन?” “यही कि जैसे ही इस औरंग्या को हम समाप्त करेंगे, बहुत अच्छी वृष्टि हो जाएगी, एकदम मूसलाधार वर्षा होगी। आगामी दशहरा दीपावली में हमारे स्वराज्य में खेती की ऐसी उपज होगी कि हमारे खेत खलिहान अनाज से भर जाएँगे।” “अवश्य राजन! किन्तु आपको इतनी चिन्ता क्यों है?” शम्भूराजा ने ऊपर की ओर देखा। ऐसा लगा मानो उन्होंने सफेद बादलों को अपनी आँखों में भर लिया। वे गहरी साँस लेकर बोले, “कविराज! हम कभी भी चिन्तित या नाराज नहीं हुए। आज तक अनेक भयानक हमें निगलने के लिए आते रहे, किन्तु भवानी की कृपा से हम उनसे उबरते रहे। फिर भी आखिर मनुष्य ही हूँ, कभी-कभी ठिठककर रह जाता हूँ। मन में बार बार एक ही प्रश्न उठता है कि ईश्वर इस सम्भाजी के साथ हमेशा टेढ़ी चाल क्यों चलता है। कोई बड़ा निवाला मुँह में जाने से पहले ही नीचे क्यों गिर जाता है?” “राजन!” कहकर कविराज अभिभूत होकर शम्भूराजा की ओर देखते रह गये। एक ठंडी साँस लेकर शम्भूराजा फिर बोले, “कविराज याद है वह जंजीरा का घेराव? कोंडाजी बाबा जैसे स्वराज्य प्रेमियों ने अपने प्राणों को पूजा-पुण्य की तरह अर्पित कर दिया। अन्ततः प्रभु रामचन्द्र का नाम लेकर भरी खाड़ी में सेतु निर्माण का कार्य आरम्भ करना पड़ा। थोड़े समय का अवसर मिल गया होता तो हम आक्रमण 618 :: सम्भाजी

करके जंजीरा बुलन्द परकोटा ध्वस्त कर देते। किन्तु उसी समय महाराष्ट्र में मुगल सेना बाढ़ के पानी की तरह गरजती हुई पहुँच गयी। नतीजा यह हुआ कि हाथ में आयी सफलता से मुँह मोड़कर दूसरी ओर दौड़ना पड़ा। हमारे साथ अन्तिम क्षण में ऐसा क्यों घटित होता है? सफलता के मुट्ठी में आने पर भी हम खाली हाथ क्यों रह जाते हैं?" बात करते-करते शम्भुराजा की दृष्टि बुर्ज के कार्य की ओर जाती थी। उनकी दृष्टि के उस ओर जाते ही मजदूर, राजगीर, सिपाही सभी हड़बड़ा जाते थे। इसी समय कृष्णाजी कोंडा ने महाराज का अभिवादन करते हुए कहा, "महाराज! आज रात तक कार्य समाप्त करने की जिम्मेदारी हमारी है। किन्तु आपके यहाँ पर धरना देकर बैठे रहने से काम करने वाले नाहक ही बार-बार हड़बड़ाते रहते हैं। कल प्रातः संगमेश्वर की ओर आपके कूच करने के पहले वह कार्य पूरा हो जाएगा।" कविराज और शम्भुराजा ने हँसते हुए एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों कनात की छाया से बाहर निकले। राजा ने कहा, "कविराज! यहाँ आने के बाद से मन में एक बेचैनी है, पावन घाटी को एक बार देखने की बड़ी इच्छा हो रही है।" "अवश्य राजन् !" वे तत्काल मुढा दरवाजे से दाहिनी ओर गंजी के पठार की तरफ बढ़ गये। वहाँ से दो परिचित चेहरे गढ़ पर चढ़कर आते हुए दिखाई पड़े। उनके आगे-पीछे उनके नौकर-चाकर दौड़ रहे थे। राजा के कदम ठिठक गये। उन्होंने पुनः ढलान पर चढ़ते मेहमानों को घूर कर देखा। उन्होंने देखा कि अर्जोजी और गिरजोजी यादव आ रहे हैं। दोनों यादव बन्धुओं ने पाचाड़ के राजमन्दिर और स्वराज्य के अनेक निर्माण कार्य पूरे किये थे। इसलिए उनके प्रति राजपरिवार में बड़ी आत्मीयता थी। उन लोगों को अचानक आया देखकर शम्भुराजा ने मुस्कराकर पूछा, "यादवजी आप लोगों को कैसे पता चला कि यहाँ पर बुर्ज का निर्माण कार्य चल रहा है?" "महाराज आपके सभी कार्य पूरी निष्ठा और प्रयत्न के साथ पूरे किये हैं, किन्तु हमारा एक काम आपके पास वर्षों से अटका पड़ा है।" "कहिएऽऽ?" "पूजनीय बड़े महाराज के समय यह तय हो गया था कि कगड़ और औंध की जागीरदारी हमारे नाम कर दी जाएगी। किन्तु दुर्भाग्य से महाराज स्वर्गवासी हो गये और कागजात तैयार नहीं हो पाए।" अर्जोजी यादव ने निवेदन किया। "तो यादव ! इसमें ऐसी जल्दी की क्या बात है?" "क्षमा करें! ऐसी कोई भी बात नहीं है, सरकार ! गलती आपकी नहीं है, हमारी किस्मत ही खराब है। जब-जब हमारे काम का अवसर आता है तब कुछ न सम्भाजी :: 619

कुछ अप्रत्याशित घटित हो जाता है।" "कैसे?" "बड़े महाराज हमारे नाम से कागज तैयार करने वाले थे दुर्देव से बीमार पड़ गये और फिर कभी उठ नहीं पाए। इस समय भी वैसी ही परिस्थितियाँ हैं।" गिरजोजी के मुँह से निकल गया। किन्तु अपनी भूल का ध्यान आते ही उसने अपनी जीभ दबा ली। "आप कहना क्या चाहते हैं, यादव?" "ऐसा कुछ भी नहीं है। किन्तु शिर्के लोगों के नाते-रिश्ते के लोग भला बुरा कहते रहते हैं। वे कहते हैं कि राजा और राज्य सलामत है तब तक लिखा-पढ़ी करवा लो।" गिरजोजी ने कहा। शम्भूराजा यह सुनकर अवाक् रह गये। उन्होंने केवल इतना कहा, "कल रात या परसों प्रातःकाल में संगमेश्वर पहुँच जाइये। वहाँ खंडो बल्लाल भी आएँगे। उनकी उपस्थिति में आपका सारा काम निपटा देंगे।" दोपहर में राजा और कविराज घोड़ घाटी में जा पहुँचे। घोड़ घाटी पांढरपाणी और गजापुर के बीच में थी। 14 जुलाई, 1660 को वीर लड़ाकू बाजीप्रभु देशपाण्डे ने मूसलाधार वर्षा में इस घाटी की रक्षा करते हुए, अपने प्राण अर्पित किये थे। आक्रमणकारी सिद्दी जोहार को रोकने के लिए बहादुर बाजीप्रभु घोड़ घाटी में दीवार बनकर खड़े हो गये थे। अपने चुनिन्दा साथियों के साथ वह महायोद्धा अपने शत्रु से अन्तिम समय तक लड़ता रहा। शत्रु की सहायता के लिए दो बार सेना दस्ते आये किन्तु बाजीप्रभु अपनी जगह पर अडिग बना रहा। बाजी और उसका भाई फूलाजी दोनों अद्भुत पराक्रम से जूझते रहे। अन्त में जब शिवाजी महाराज के गढ़ में सुरक्षित पहुँचने की सूचना तोप की आवाज से मिली तब दोनों भाइयों ने अपने प्राण निछावर किये। वही ऐतिहासिक घोड़ घाटी अब पावनघाटी के नाम से जानी जाती है। वहीं करवी और करौंदे के जंगल में बाजी और फूलाजी की पत्थर की समाधियाँ बनाई गयी थीं। अट्ठाइस उन्तीस वर्ष पुरानी वह घटना शम्भूराजा के भीतर तरंगें उत्पन्न कर रही थी। उन प्रभु-देशपाण्डे बन्धुओं की समाधि पर पुष्प अर्पित करते हुए शम्भूराजा का मन भर आया। सूर्य पश्चिम की ओर झुकने लगा तब भरे मन से शम्भूराजा गढ़ की ओर लौटे। फिर गढ़ से उतरकर खाई को पार किया और चट्टान की चोटी पर चढ़ गये। उस ऊँचाई से आसपास की गहरी घाटियाँ दिखाई पड़ रही थीं। घाटियों में अँधेरा गहरा रहा था। शम्भूराजा की निगाह सामने के किले की ओर बरगद के पठार पर गयी। उस पठार की एक चट्टान नीचे की ओर झुकी थी। उसकी ओर शम्भूराजा ने 620 :: सम्भाजी

कवि कलश का ध्यान आकर्षित किया। वहाँ के बड़े पत्थरों और वहाँ ढलानदार चट्टानों ने भिन्न-भिन्न रूप धारण किये थे। एकदम सामने का कुछ हिस्सा घोड़ों के आकार का था। उसके पीछे की ढलान ने हाथी का आकार ले लिया था। पीछे की टूटी चट्टान ने कुछ मनुष्यों के आकार ले लिए थे। कहा जाता है कि बहुत पहले कभी किसी अज्ञात शक्ति ने वहाँ से एक पूरी बारात गायब कर दी थी। इसीलिए उस पर्वतीय जंगल की चट्टानों को हाथी, घोड़ों और ऊँटों का आकार प्राप्त हो गया था। लोगों ने उस टीले का नाम बारात टीला रख दिया था। अस्ताचलगामी सूर्य की कुछ किरणें बारात टीले के शरीर पर बकरी के छागलों के समान खेल-कूदकर लुप्त हो गयीं। आसपास के जंगल में घना अँधेरा छा गया था। शम्भुराजा की दृष्टि मुंढा दरवाजे की ओर गयी। वहाँ सैकड़ों मशालें और पलीते जल रहे थे। रात के अँधेरे में भी बुर्ज को जोड़ने का कार्य चल रहा था। शम्भुराजा के सधे कदम किले की ढाल पर चढ़ने लगे। उन्हें दूसरे दिन प्रातःकाल ही संगमेश्वर के लिए निकलना था। वहाँ आगे की राजनीति और नियोजन उनकी प्रतीक्षा में थे। पाँच भोजन का समय बहुत पहले बीत चुका था। सिपहसालार सो चुके थे। जानवर खूँटे से गर्दन खुजलाते या जुगाली करते निश्चिन्त पड़े थे। रात की हवा में विलक्षण गति थी। तम्बू-डेरों की रस्सियों में बहुत खिंचाव था। मुकर्रबखान को किसी भी करवट नींद नहीं आ रही थी। पिछले दो-तीन दिनों से गणोजी लगातार उसके पास चक्कर लगा रहा था। दोनों एक दूसरे के निकट घंटों बैठे रहते थे। खान अनेक प्रकार की शंकाओं-कुशंकाओं के सम्बन्ध में पूछता रहता था। गणोजी शिर्के शर्त लगाकर कहता था, "सियार मलकापुर से विशालगढ़ के बीच निश्चित रूप से कहीं है। वहाँ के किले का काम समाप्त करके वह जहाँ भी जाना चाहे, संगमेश्वर होकर ही जाएगा।" मुकर्रबखान ने गर्म उसाँसें भरते हुए पूछा, "रसद-पानी का क्या प्रबन्ध है?" "यह तो पहले से ही हमारा ही प्रदेश है। मैंने अपने सम्बन्धियों से पहले ही सन्देश भेजकर कह दिया है कि महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए तैयार रहो।" गणोजी खान को खबरें देता और बदले में खान से द्रव्यों की थैलियाँ लेकर सम्भाजी :: 621

जाता। गणोजी धीरे-धीरे बता रहा था, "आज या कल, शाम में या दिन में किसी भी समय निकलना होगा।" सारी बातों को याद करके खान ने बेचैनी से करवट ली। उसने कनात की खिड़की से बाहर देखा। बाहर की खिड़की से चाँदनी में पन्हालगढ़ की पहाड़ी दिख रही थी। वह आँखों में सालने लगी, इसलिए उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं। आँखें बन्द हुईं तो उसे पहले कभी भी न देखी हुई सम्भाजी राजा की निर्भीक और निर्द्वन्द्व दिनचर्या आँखों में नाचने लगी। उसके मन को न शान्ति थी और न ही शरीर को विश्राम। इसी समय खान की छावनी के बाहर घोड़ों की टापें सुनाई पड़ने लगीं। मुकर्रबखान तुरन्त उठकर अपने डेरे के दरवाजे के बाहर देखने लगा। सामने से दो हरकारे दौड़ते हुए उसके पास पहुँचे। बोलने में जरा भी समय नष्ट न करके हरकारों ने एक लिफाफा खान के सुपुर्द किया। मशाल के प्रकाश में खड़े-खड़े ही पत्र का वाचन किया गया। पत्र का आशय समझते ही खान के सिर के बाल खड़े हो गये। वजीरे आजम असदखान के पत्र को खान ने एक बार पुनः पढ़ा- "प्यारे शेख निजाम मुकर्रबखान। बादशाह सलामत का आपके लिए अतिआवश्यक सन्देश है। इसे शीघ्रता से भेजा जा रहा है। आपकी आँखों में हमेशा धूल झोंकने वाला वह जागीरदार रायगढ़ छोड़कर विशालगढ़ में घूम रहा है। यह पक्की खबर बादशाह को मिल चुकी है। वह बहुत लापरवाह है। भविष्य के हमलों के लिए अपने किले की बुर्जों की मरम्मत कराने में व्यस्त है। उसके साथ फौज भी बहुत कम है। अतः यह पैगाम मिलते ही शीघ्रता से निकल पड़ो। आपके हाथों अल्लाहताला की खिदमत होना निश्चित है। इसलिए अपनी जान की परवाह न करके थोड़ा साहस दिखाएँ। उस दुष्ट जमींदार को तत्काल गिरफ्तार कर लें। उस काफिर से किसी भी तरह प्रतिशोध लेना है। मुकर्रबखान आपकी बहादुरी और अल्लाहताला की मेहरबानी की ओर बादशाह की रात-दिन उम्मीद बँधी है। इस बात को आप एक क्षण के लिए भी न भूलें।" इस साहसी अभियान की कल्पना मात्र से ही मुकर्रबखान की मुद्रा मशाल की तरह चमक उठी। आवेश में आकर वह पागल की तरह अपनी छावनी की भेड़- बकरियों से लिपटने लगा। बेचैन होकर वहीं पर चहलकदमी करने लगा। उसने अपने सभी बहादुर सिपहसालारों को एकत्र होने का हुक्म दिया। खान की उम्र पचपन वर्ष की थी, किन्तु उसका शरीर चुस्त, मजबूत और छरहरा था। अपने पेट और पार्श्वभाग पर उसने चर्बी नहीं चढ़ने दी थी। उसने अपने को सबल और फुर्तीला बनाये रखा था। वह तत्काल डेरे से बाहर निकल पड़ा। दबी हुई किन्तु 622 :: सम्भाजी

स्पष्ट आवाज में दूसरों को जगाने लगा, "जागोऽऽ, जागो।" थोड़े ही समय में इखलासखान के साथ मुकर्रब के सभी बेटे, सिपहसालार, यार दोस्त, रिश्तेदार, फौजी सब मिलकर लगभग तीन हजार की भीड़ मुकर्रब के डेरे के सामने एकत्र हो गयी। गणोजी शिर्के और नागोजी माने को अन्दर बुलाया गया। मुकर्रबखान ने गणोजी को बाँहों में भरते हुए, प्रेमपूर्वक व्यग्रता से कहा, "गणोजी तुम हमारे भाई बन्धु ही लगते हो। तुम्हारी खबर पक्की है। बादशाह का पत्र भी आ चुका है। मेरे गुप्तचरों ने भी खबर दी है। चलोऽ! आज रात में ही आक्रमण कर दें।" थोड़ी देर में ही विचार-विमर्श कर लिया गया। मुकर्रबखान ने नागोजी से कहा, "नागो मराठा, आप अभी, इसी वक्त शीघ्रता से कराड़ की ओर कूच करो। कराड़ के थानेदार को जगाओ और वहाँ आसपास की सारी चौकियों की फौज एकत्र करो। कम से कम दस से पन्द्रह हजार की फौज तैयार रखो। समय सूचना देकर नहीं आता।" इस स्थिति में मुकर्रबखान के चेहरे पर सफलता की कल्पना से प्रसन्नता झलक रही थी। मुकर्रब ने अपने सभी प्रमुख सरदारों को शामियाने के अन्दर बुला लिया। सभी को वजीरे आजम के पत्र की जानकारी दी। उसने बड़ी अधीरता से कहा, "यारोऽ अब नींद, अन्न-पानी के जैसी सारी बातों को भूल जाओ। अब मेरे साथ तुरन्त चल पड़ो। वक्त बुरा है। रास्ता तो बहुत ही कठिन है। अन्दर की नदी की धारा में बड़े बड़े मगरमच्छ नंगा नाच कर रहे हैं। इस बात की पूरी जानकारी होते हुए भी हमें जानबूझकर उफनती नदी में छलांगें लगानी हैं।" "खान साहब, जोश में होश मत खोइये-" एक जोरदार भारी भरकम आवाज कानों में पड़ी। "कौन? कौन है वह?" मुकर्रब भड़क उठा। बीजापुर का एक अनुभवी सरदार उठकर खड़ा हो गया और खान से स्पष्ट शब्दों में कहने लगा, "खानसाहब, आपकी बहादुरी और बुलन्द इरादों के बारे में हममें से किसी को कोई शक नहीं है। किन्तु बीजापुर वालों की चाकरी में रहते हुए इधर की पहाड़ियों में मैंने अनेक बार सफर किया। जिस समय पन्हाला से शिवाजी का पीछा करते हुए सिद्दी जौहर की फौज विशालगढ़ तक गयी थी, तब मैं एक अदना सा घुड़सवार सिपाही था। उस समय मेरी उम्र केवल बीस वर्ष थी। मैंने उस भयानक पहाड़ी को अपनी आँखों से देखा है।" "आप कहना क्या चाहते हैं?" "इतना ही कि यह पहाड़ी नहीं पाताल है।" वह बूढ़ा सरदार बताने लगा, "खान साहब उस रास्ते में आंबा घाटी के पास मे जाने वाली ढालू चट्टान और टीले सम्भाजी 623

के बीच रास्ता इतना संकरा है कि वहाँ पर घनी झाड़ियों और टीलों की ओट लेकर तीस-चालीस मराठे भी यदि आ जायें तो लाखों की फौज को भी श्मशान घाट दिखा सकते हैं।" "सरदार ये झूठी और पागलपन की कहानियाँ बन्द करो।" मुकर्रब चिल्लाया। "मुकर्रब आप नहीं जानते! इसी पहाड़ी प्रदेश में उंबरघाटी नाम की एक और घाटी है, वहाँ पर उस पापी शिवा ने...." मुकर्रब झट से उठकर खड़ा हो गया। वह जोर से दहाड़ा, "बस! अब इसके आगे कोई एक लफ्ज भी नहीं निकालेगा।" मुकर्रब थोड़ा पीछे हटकर एक टीले पर चढ़ गया। वहाँ से अपनी सेना को हाँक देते हुए ललकारने लगा, "मेरे दोस्तो! इस साहसिक अभियान में जीने के लिए नहीं मरने के लिए निकलना है। जिसका मुझ पर और अल्लाह पर भरोसा है वही मेरे साथ चलेगा। जिनका कलेजा भेड़-बकरी का हो वे यहीं पर डेरे में निश्चिन्त होकर ऐशोआराम करते रहें।" उसी समय मुकर्रबखान हवा के झोंके की तरह शामियाने से बाहर निकल गया। सामने खम्भे से बँधे अपने ऊँचे और बलशाली घोड़े की पीठ पर उछलकर सवार हो गया। उसके साथ ही इखलासखान और गणोजी के घोड़े भी आगे दौड़ने लगे। इस समय किसी के भी लिए रुकने को मुकर्रब तैयार नहीं था। वह एक कट्टर, तेजस्वी और दृढ़प्रतिज्ञ योद्धा था। अपनी फौज में उसने हमेशा सख्त अनुशासन रखा था। वह अपने सिपहसालारों और जानवरों को भी तरोताजा रखता था। इसलिए मुकर्रबखान के साथ उसके दो हजार घुड़सवार अँधेरे को चीरते हुए तेज गति से आगे बढ़ रहे थे। साथ में एक हजार पैदल सेना भी थी। बहुत पीछे न छूट जायें इसलिए पैदल सिपाही घोड़ों के पीछे दौड़ रहे थे। मध्यरात्रि में ही फौज बाघविल की घाटी चढ़कर ऊपर पहुँच गयी। गणोजी के मन में यह सोचकर गुदगुदी हो रही थी कि यदि सम्भाजी पकड़ में आ जाये तो आनन्द आ जाय। यह सोचकर गणोजी के मन में लड्डू फूट रहे थे। दाईं ओर ज्योतिबा का पहाड़ खड़ा था। उसी दिशा में देखते हुए गणोजी ने घोड़े पर से ही ज्योतिबा का स्मरण किया। उसने मन्नत मानते हुए कहा, "हे केदारी राय, किसी तरह उस नालायक सम्भा को पकड़वा दो। मैं एक सौ इक्यावन तोले का सोने का हार आपके गले में पहनाऊँगा।" मुकर्रबखान का नसीब अच्छा था। रास्ता दिखाने के लिए चाँदनी का हल्का प्रकाश था। उस उजाले में फौज आगे बढ़ रही थी। नावली के पास मराठी सेना का पड़ाव था। वहाँ से पन्हाला की तलहटी समीप ही थी। तीन हजार की फौज यदि 624 :: सम्भाजी

किसी गाँव से गुजरती तो कुत्ते भौंकने लग जाते और पन्हाला की तलहटी तत्पर शम्भूराजा के सैनिकों को आक्रमण की गन्ध मिल जाती। इसलिए गणोजी बहुत सावधानी बरत रहा था। उसने नावली की दूसरी ओर दो कोस दूर से देवाले गाँव के जंगल से मुकर्रबखान की फौज को बड़ी सावधानी से आगे बढ़ा दिया। मुकर्रब ने कुशल और साहसी तीरन्दाजों का दल आगे भेज दिया। ताकि यदि गाँव की बस्तियों में यदि कुत्ते भौंकने लग जायँ तो उन्हें अपना निशाना बना लें। अर्थात् भौंकते कुत्तों के जबड़ों को अपने बाणों से बन्द कर दें। अब मरने का निश्चय करके निकला हुआ मुकर्रब होश में आ गया था। उसने अपने कुशाग्र मस्तिष्क का उपयोग किया। आगे बढ़ती हुई फौज तत्काल रोक दी। मुकर्रब ने अपने चचेरे भाई से कहा, "सूर्योदय से पहले छावनी में वापस जाओ। तुम मेरे शामियाने में मेरे ही बिस्तर पर सो जाओ। चार दिन तक वैद्य और हकीम को बुलाते रहो। ऐसा माहौल निर्माण करो कि हमारी फौज कराड़ चली गयी है और मुकर्रबखान बीमार पड़ गया है। मैं कहीं किसी शिकार पर निकल चुका हूँ, इसकी खबर हवा-पानी, मनुष्य किसी को भी नहीं होनी चाहिए।" घोड़े और मनुष्य फिर से आगे की ओर दौड़ने लगे। सवेरा होते-होते सुपात्रे, बांबवड़े आदि गाँव पार हो चुके थे। घोड़ों की गति इतनी तेज थी कि सूर्योदय होने के साथ ही सारी फौज बहिरेबाड़ी की घाटी पार करके वहाँ के पहाड़ी टीले पर पहुँच गयी थी। आसपास घने वृक्षों से भरा जंगल था। किन्तु ऊँची चोटी से सात आठ कोस की दूरी पर बसा मलकापुर गाँव दिखाई दे रहा था। गणोजी वहाँ से महादेवखड़ी नामक पहाड़ी की ओर सिरपिटाया-सा देख रहा था। उसकी चिन्तित मुख मुद्रा देखकर मुकर्रबखान उससे सटकर खड़ा हो गया। गणोजी के कन्धे पर प्यार से हाथ रखकर मुकर्रब ने पूछा, "क्यों गणोजी राजा, क्या बात है?" "खान साहब एक बहुत बड़ी समस्या है। मलकापुर के पास के इस सीधे रास्ते से जाने पर कठिन और ढालू चट्टानों वाला आंबा घाट आता है। खुदा की मेहरबानी से यदि उसे हम पार कर लें तो हम सीधे संगमेश्वर के पास कोंकण में उतर सकते हैं।" "तो चलिए न—" गणोजी के कदम वहीं ठिठक गये। वह हाँफते हुए बोला, "इस सीधे रास्ते के अतिरिक्त एक दूसरा भी जंगली रास्ता है। बायें हाथ से कुछ दूर लगने वाला अणुस्कुरा घाट है, वहाँ से भी हम लोग कोंकण में उतर सकते हैं। किन्तु इस रास्ते से जाने में एक रात और एक दिन का समय और लगेगा।" "तब तो सीधी मलकापुर वाली राह ही ठीक है।" "मैं वही कह रहा हूँ, खान साहब! यह रास्ता सीधा तो है किन्तु सुगम नहीं है।" चिन्तित होकर लम्बी साँस लेते हुए गणोजी ने कहा, "इसी मलकापुर के सम्भाजी :: 625

पास कवि कलश की विख्यात घुड़साल है। मलकापुर और आंबा घाट के बीच अभी भी कवि कलश के उच्चकोटि के सात हजार घोड़े गश्त लगाते रहते हैं। हम लोग कवि कलश को दुष्ट, बदफैली, चरित्रहीन कहकर चाहे लाखों इल्जाम लगाएँ, किन्तु गंगा के किनारे के उस ब्राह्मण ने एक बहुत ही साहसी और मजबूत फौज खड़ी कर दी है। उसने विशेष रूप से जंगली गड़ेरियों के मजबूत और फुर्तीले लड़कों को ही भरती किया है। ये लड़के शरीर से इतने मजबूत, चुस्त और फुर्तीले होते हैं कि वे बन्दरों की तरह एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर सहज रूप से छलाँग लगा सकते हैं। बाढ़ के समय उफनती नदी में आसानी से तैर सकते हैं। जिन ढालू चट्टानों पर गोहें भी नहीं चढ़ पाती हैं वहाँ ये लड़के आसानी से चढ़ जाते हैं। इसके अतिरिक्त खान साहब वह सम्भा हमारा दुश्मन जरूर है, लेकिन मूर्ख नहीं है।" "गणोजी! कहना क्या चाहते हो?" "खान साहब सम्भाजी को मलकापुर की इसी फौज का बहुत बड़ा विश्वास है। मान लीजिये कि हम किसी प्रकार छिपते-छिपाते इसी रास्ते से आगे बढ़ने का निश्चय करें और दुर्देव से किसी तरह मलकापुर की फौज को हमारे आने की भनक मिल जाये तो हमारी इस तीन हजार की फौज में से एक भी जीवित नहीं बचेगा जो औरंगजेब के पास जाकर सूचना दे सके।" "क्या इतने हट्टे-कट्टे रणबाँकुरे हैं, ये फौजी?" "बता तो रहा हूँ खान साहब! इस जंगल के छोकरे इतने तेज और फुर्तीले हैं कि तीन हजार की तो बात ही क्या? तीस हजार की फौज की नाक में दम कर सकते हैं। इन्हीं के भरोसे सम्भाजी पन्हाला और कोल्हापुर के सम्बन्ध में निश्चिन्त रहते हैं। मुकर्रबखान ने कुछ सोचकर गणोजी से पूछा, "तो क्या उस सम्भा को अणुस्कुरा की घाटी का पता नहीं है?" "है, उस रास्ते की भी उस मूर्ख को पूरी जानकारी है। घाटी की तलहटी में निश्चित रूप से उसका गश्ती दस्ता तैयार होगा। किन्तु उस ओर कोंकण के देसाई दलवी जैसे जागीरदार हमारे मित्र हैं। इसलिए खान साहब यही रास्ता हमें भरोसेमन्द लगता है।" "वह कैसे?" "आँखों के सामने का आंबा घाट छोड़कर, अणुस्कुरा का लम्बा रास्ता कोई क्यों चुनेगा? जानबूझकर कोई स्वयं चौबीस घंटे का प्रवास क्यों बढ़ाएगा? इतनी सीधी बात तो कोई भी सोच सकता है। इसके अतिरिक्त अणुस्कुरा घाट की ढलान भी बहुत कठिन है। वहाँ के जंगलों में दिन के समय भी उतरने में राहगीर घबराते हैं। इसलिए वहाँ से कोई फौज उतर सकती है, ऐसी कल्पना सम्भा स्वप्न में भी 626 :: सम्भाजी

नहीं कर सकता। और खान साहब मैं पिछले कई महीनों से बादशाह से और आपलोगों से भी हाथ जोड़कर कह रहा हूँ कि सम्भाजी पर सामने से आक्रमण करने का सपना मत देखिए। यह तुम्हारे बाप से भी सम्भव नहीं होगा।" "तो फिर क्या करना होगा?" "खान साहब! हमारा इतिहास गवाह है कि शूर-वीर मराठों की छाती सामने से किये गये तलवार के वार से कभी नहीं कटती। किन्तु उनकी पीठ में भोंका गया गद्दारी का खंजर बहुत गहरे गड़ जाता है। वह खंजर यदि अपने आत्मीय जनों द्वारा चलाया गया हो तो मिलने वाली सफलता बहुत बड़ी होती है।" "याने कि?" "अब कुछ भी सोच-विचार न कीजिए। सामने का आंबा घाट का रास्ता भूल जाइये। मेरे पीछे-पीछे आइये। साहसपूर्वक अणुस्कुरा घाट से नीचे उतरेंगे। उस दुष्ट सम्भा को पता भी नहीं चलेगा और हम उसकी पीठ तक पहुँच जाएँगे।" दोनों रास्तों की लाभ-हानि को गणोजी ने अच्छी तरह समझा दिया। खान के साथियों ने भी पेड़ के नीचे खड़े-खड़े ही मसलहत कर ली। सभी सहमत हो गये। मुकर्रबखान की फौज के लिए आंबा घाट सचमुच मौत का मुँह था। मलकापुर की सात हजार फौज स्वप्न में भी मुगलों को घाट न उतरने देती। अणुस्कुरा की ओर की घाटियाँ और रास्ते बहुत ही कष्टकर थे। सम्भव था कि इस घाटी को उतरते समय पैर फिसलने के कारण मरते। किन्तु उस ओर से आने पर सफलता की आशा सभी को आकर्षित कर रही थी। मुकर्रबखान अपने घोड़े से नीचे उतरा। अत्यन्त भावविह्वल होकर वह गणोजी से लिपट गया। उसने गणोजी को चार-पाँच बार चूम लिया। अश्रुपूरित आँखों से गणोजी को अपनी बाँहों में लिये वह कहने लगा, "गणोजी राजा! लोग कहते हैं कि तुम उस शिवाजी महाराज के जमाई हो। उस सम्भा के साले हो। सच हो सकता है किन्तु मुझे उससे क्या मतलब? किन्तु खुदा की कसम खाकर कहता हूँ, गणोजी पिछले जन्म में तुम निश्चय ही मेरे सगे भाईजान ही रहे होगे।" छह सम्भाजी :: 627

मुँह अँधेरे में जैसे ही बुर्ज का निर्माण कार्य समाप्त हुआ, मजदूरों और सैनिकों में जोश उमड़ पड़ा। माँ भवानी और शिवाजी, और शम्भुराजा की जयकार से विशालगढ़ की घाटियाँ गूँजने लगीं। शम्भुराजा और कविराज की आँखों में भी रातभर नींद नहीं आयी थी। ठहरने का समय नहीं था। राजा की आँखों से तो आज कल रोज नींद गायब रहती थी। बहुत सबेरे ही शम्भुराजा, मल्हार रंगनाथ और कृष्णाजी कोंडा साथ साथ गढ़ की मस्जिद में पहुँचे। इस घने जंगल में तीन सौ वर्ष पूर्व मलिक उत्तुजार को उसके सात हजार सैनिकों के साथ कंठस्नान कराया गया था। बहमनी साम्राज्य के सेनापति उत्तुजार की खौफनाक चीख किसी ने भी नहीं सुनी थी। लावारिस मलिक का कोई भी लगा सगा नहीं बचा था। किन्तु उसकी मृत्यु के बाद इन्हीं घाटियों और दर्रों के लोग दौड़कर आगे आये। जो पत्थर मलिक के खून से रंग गया था उसे लोग श्रद्धापूर्वक उठाकर ले आये। उसी पर एक मस्जिद खड़ी कर दी। मलिक को लोग पीरबाबा कहकर स्मरण करने लगे। उसके दर्शन को हिन्दू मुसलमान दोनों विशालगढ़ आने लगे। उसके लिए मुर्गियों का ढेर लगने लगा। हर साल उसका उर्स सजने लगा, वह दीन दुखियों की मन्नतें पूरी करने लगा। पुत्र प्राप्त करना हो, घर में खुशहाली ले आनी हो, चरवाहों को अपने जानवरों की रक्षा करनी हो आदि की जिम्मेदारी उस क्षेत्र में पीरबाबा की ही थी। शम्भुराजा ने श्रद्धापूर्वक पीरबाबा की पूजा की। वे गढ़ के पीछे काल दरवाजे से पिछले प्रचंड दर्रे से पहाड़ी उतरने लगे। उनके साथ उनका लाडला अश्व पाखरू भी चल रहा था। कविराज भी साथ थे। बेर करौंदे की घनी झाड़ियों के कठिन रास्ते से लगभग एक हजार की सेना कोंकण की ओर तेज गति से बढ़ रही थी। रास्ते में स्थान स्थान पर कमर तक ऊँची घास थी। घास की नुकीली किरणें शम्भुराजा के लम्बे अँगरखे में चुभ रही थीं। पौ फटने लगी थी। अँधेरे की दह में डूबी पहाड़ी अपनी गर्दन बाहर निकालने लगी थी। ढाल पर उतरते उतरते कवि कलश ने कहा, "राजन! हमने सुना है कि येसू भाभी भी रायगढ़ से संगमेश्वर की ओर निकल पड़ी हैं।" शम्भू महाराज दिलेरी से हँसते हुए बोले, "जाने भी दो कविराज! आखिर वे हैं तो स्त्री ही। कुछ अवसरों पर वे अस्तित्व से मैदान मार ले जाती हैं। यहाँ की पहाड़ी को उठाकर वहाँ रख देती हैं। किन्तु यदि पति को हल्का सा ज्वर भी हो जाये तो एकदम छुई-मुई बन जाती हैं।" "समझा नहीं राजन?" "जो हमारे ध्यान में भी नहीं होता वही उनके मन में निवास करता है। इन 628 :: सम्भाजी

दिनों तो हमारी येसू के मतानुसार जहाँ कहीं दो नदियाँ आपस में मिलती हैं, वहीं पर हमारा भाग्य नया मोड़ लेता है। अब औरंगजेब के साथ हमारी अन्तिम लड़ाई शीघ्र ही आरम्भ होने वाली है। ऐसे समय में संगम के महादेव की महापूजा सम्पन्न की जाय, ऐसी उनकी हार्दिक इच्छा है। इसके अतिरिक्त हमारे विशिष्ट साथियों के साथ विचार विमर्श भी वहाँ होना है। यह कारण भी उनके लिए महत्त्वपूर्ण है। "किन्तु किसी संगम पर आपके जीवन में मोड़ आता है। यह आप कैसे कह सकते हैं?" "देखिए न! कृष्णा और वेष्णा का माहुली के पास संगम है। उस समय हमारे शरीर में यौवन का उफान था। उल्टा मुल्टा दुस्साहस दिखाकर, मुगलों के पेट में घुसकर, उनकी पालकी का फुँदना हमें उड़ा ले जाना था। हम कुछ दुर्लभ करिश्मा करके अपने पिताजी को प्रसन्न करना चाहते थे। इसी उन्मादी जोश में हम माहुली संगम पर दिलेरखान से जा मिले। किन्तु मेरे साथ जो धोखा हुआ उसका बोध हमें बहादुरगढ़ के पास हुआ। बहादुरगढ़ भी भीमा और सरस्वती नदियों का संगम है।" कविराज भावविभोर सम्भाजी को देखते रह गये। शम्भूराजा ने आगे कहा, "संगमेश्वर, अर्थात् अलकनन्दा और वरुणा नदियों का दूसरा संगम। हमारी महारानी की इच्छा है कि वहाँ पर हम महादेव का दूध-दही से अभिषेक करें। उससे हमारे जीवन में कुछ तो महत्त्वपूर्ण घटित होगा, कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आएगा, अलाएँ बलाएँ टल जाएँगी।" येसूबाई की इस पवित्र भावना की कवि कलश ने मुस्कराकर दाद दी। इसी समय शम्भूराजा फिर बोल पड़े, "सच कहूँ, कविराज ! अब इस अन्ध श्रद्धा, पूजा- पाठ और अनुष्ठानों पर मेरा तनिक भी विश्वास नहीं है। किन्तु जब मनुष्य ही दानव की तरह व्यवहार करने लगे और मनुष्य का मनुष्य पर से विश्वास उठ जाता है तो हारे हुए मनुष्य का मन झुँझलाकर कोई अवलम्ब खोजने लगता है।" कवि कलश किसी प्रकार मुस्कराये और बोले, "राजन! सच कहूँ, आपके निकट साहचर्य में इतने दिन रहने के बाद आपके विषय में कुछ दृष्टिकोण बन गया है। आपको अपने ही सगे सम्बन्धियों ने अपनी दुष्टता से बहुत-सी बाधाएँ और कठिनाइयाँ पहुँचाई हैं। ऐसे लोगों के सामने तो श्मशान के भूत भी पीछे रह जाएँगे।" सम्भाजी की आधी फौज पहाड़ी उतरकर नीचे पहुँच चुकी थी। उस फिसलनभरी ढलान पर से घोड़े पर चढ़कर नीचे उतरना सम्भव नहीं था इसलिए घोड़े सैनिकों के साथ कोतल चल रहे थे। शम्भूराजा का लाडला घोड़ा पाखर सम्भाजी :: 629

शम्भुराजा के बार-बार लाग-लपेट कर रहा था। उनके शरीर से वह बार-बार सट रहा था, अपना शरीर रगड़ रहा था। वह बेजुबान प्राणी क्या कहना चाहता है? यह शम्भुराजा की समझ में नहीं आ रहा था। वे बार-बार पाखर का मुँह प्रेम से अपने सीने से लगाते थे। अब दिन अच्छी तरह निकल आया था। कवि कलश आँखों की कोर से शम्भुराजा की ओर देख रहे थे। अपनी बात कहें या न कहें, कवि कलश इस दुविधा में थे। किन्तु अन्ततः वे धीमे किन्तु स्पष्ट स्वर में बोले, "राजन! क्षमा करें। इससे पहले मैंने कभी भी आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया है। किन्तु........" "क्यों इस तरह बीच में रुक गये?" शम्भुराजा हड़बड़ा गये। उन्होंने कवि कलश की ओर देखा। कविराज ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "आज मेरी आत्मा कह रही है कि आज आप मुझे अपने साथ न ले जायें।" "क्यों? इस प्रकार बीच में ही रुक जाने का निर्णय आपने क्यों लिया?" "कविराज! महारानी संगमेश्वर आने वाली हैं। वहाँ पर महादेव का अभिषेक भी होना है। आपके जैसे धर्म-कर्म के विशेषज्ञ का साथ तो अच्छा ही रहेगा न?" "राजन! क्या आप भूल गये हैं? आपके आदेशानुसार तीन-चार महीना पहले इस कनौजिया ब्राह्मण ने अपनी चोटी में गाँठ लगाई है। हाथ में तलवार पकड़ ली है। ब्राह्मण के धर्म-कर्म को भूलकर केवल क्षात्र-धर्म धारण कर लिया है।" "फिर भी कविराज?" "नहीं महाराज! आंबा घाट की सुरक्षा का दायित्व आपने मेरे कन्धों पर दिया है। उसी को मैं पूरा करना चाहता हूँ। अच्छा-बुरा समय सूचना देकर नहीं आता। पिछले दिनों पन्हाला पर आक्रमण के समय जब अचानक आवश्यकता आ पड़ी थी, तब मलकापुर की अश्वशाला से तीन हजार घोड़े लेकर हम उस ओर दौड़ पड़े थे न? हमारी अनवधानता में वैसा ही कोई संकट आ पड़े तो क्या होगा? इसीलिए मुझे अपनी सेना के साथ यहीं रहने दीजिए।" कवि कलश की सद्भावना देखकर राजा के मन में कुतूहल जागा। उन्होंने कहा, "कविराज! आपकी तत्परता और निष्ठा का ज्ञान मुझे है, किन्तु वैसी कोई बात इस समय है नहीं। आंबा घाट तो पूरी तरह सुरक्षित है। उस पार अणुस्कुरा घाटी उतरने पर, गोवा के रास्ते में, राजापुर के पास हमारी पाँच हजार की सेना निरन्तर गश्त लगा रही है। दूसरी ओर मालेघाट, तिवरा, आंबा आदि सभी पहाड़ियों पर अपनी चौकियों के पहरे हैं। इतना ही नहीं, जयदुर्ग, दंडराजपुरी, हरिहरेश्वर जैसे समुद्र के तटीय प्रदेशों पर भी सुरक्षा की अच्छी व्यवस्था है। यहाँ के किलों के सम्बन्ध में तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यहाँ जंगलों, दर्रों, घाटियों में तो हमारे भय से गरूड़ भी नीचे उतरने में खौफ खाते हैं। फिर चील, गिद्धों की तो बिसात ही 630 :: सम्भाजी

क्या?'' देखते-देखते फौज ने काजली नदी पार कर ली। कुछ दूरी पर साखरपा गाँव दिखाई देने लगा। शम्भूराजा के अंग-अंग से उमड़ने वाला उत्साह देखकर कविराज का मन खिल उठा। उन्होंने कहा, "फिर भी राजन!" "रहने दीजिए कविराज! आपकी चिन्ता भी ठीक है। संगमेश्वर की पूजा- अर्चना जैसी बातें बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। औरंगजेब ने अकलूज के पास पड़ाव डाल रखा है। सह्याद्रि के हरे-भरे जंगल में अब शीघ्र ही धमाका होने वाला है। उसकी तैयारी के सम्बन्ध में अन्तिम विचार-विमर्श करने के लिए ही तो हमलोग संगमेश्वर में केवल आधे दिन के लिए मिलने वाले हैं। वहाँ भी आपके समान अनुभवी और जानकार व्यक्ति की उपस्थिति आवश्यक है। आपके कुशाग्र मस्तिष्क मे नयी कल्पनाएँ आती हैं, तो हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं। "जैसी आपकी आज्ञा, राजन!" कविराज ने कहा। सात संगमेश्वर का वातावरण अत्यन्त प्रसन्न और आह्लादकारक था। किसी समय रामक्षेत्र के नाम से विख्यात यह छोटी सी नगरी हरे-भरे वृक्षों के बीच बसी हुई थी। इस नगरी के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पुराने वृक्ष खड़े थे। जगह-जगह पर नारियल, सुपारी के बाग लहलहा रहे थे। बहुत दिनों के बाद सम्भाजी राजा के महल में सवेरे से ही भीड़-भाड़ और लोगों की आवाजाही दिखाई दे रही थी। राजा के साथ लगभग दो हजार की फौज आस पास छावनी डाले थी। गत वर्ष गर्मी के मौसम में राजा के ठहरने का प्रबन्ध ऊपर कस्बे में किया गया था। उस समय इस महल की मरम्मत की जा रही थी। इसीलिए सम्भाजी ने रगोबा सरदेसाई की लकड़ी की प्रशस्त कोठी में निवास किया था। किन्तु उस समय का-सा उत्साह आज आंशिक रूप में भी दिखाई नहीं दे रहा था। युद्ध समीप था। इसलिए आगे की तैयारी और व्यूह-रचना आवश्यक थी। शम्भूराजा भी बहुत उतावली मे थे। संगमेश्वर के ऊपरी हिस्से में, कस्बे के पीछे महादेव का एक छोटा-सा मन्दिर था। वहाँ पर एक ओर शृंगारपुर की दिशा से वरुणा नदी प्रवाहित थी तो सम्भाजी 631

दूसरी ओर से अलकनन्दा नदी आकर वहाँ मिलती थी। पहाड़ी चट्टानों से कूदते- फाँदते, दौड़ते, चट्टानों से टकराकर कल-कल निनाद करते, शुभ्र और शीतल जल, संगमेश्वर के ऐश्वर्य में वृद्धि कर रहा था। इसकी विपरीत दिशा में जयगढ़ की ओर से अरब सागर की एक पतली खाड़ी संगमेश्वर से मिलती थी। ज्वार का जोश इतना जोरदार होता था कि दोनों नदियों का जल पेट में भरकर ज्वार की तूफानी लहरें गरजती हुई बढ़ती थीं। वेगवान खारा पानी नदियों के मीठे पानी को पेट में भरकर दौड़ता हुआ महादेव मन्दिर की सीढ़ियों तक पहुँच जाता था। एक ओर नावड़ी बन्दरगाह पर आज बहुत भीड़ भाड़ थी किनारे पर अनेक छोटी किश्तियाँ और छोटी बड़ी नावें दिख रही थीं। सागर से अन्दर आकर दो बड़े जलपोत लंगर डालकर खड़े थे। शरीर पर लाल कुर्ते और सिर पर फूलवाली टोपियाँ पहने मछुआरे इधर-उधर भाग दौड़ कर रहे थे। पक्की काछ बाँधे और कमर पर मछलियों से भरी टोकरियाँ लिए मछुआरिनें जल्दी जल्दी जा रही थीं। मछुआरों ने अपने लाडले राजा के लिए मछलियों से भरे टोकरे राजमहल में भेज दिये थे। वहीं किनारे पर लगभग सौ सवारों का एक दस्ता गश्ती के लिए खड़ा था। इस दल के सभी सिपाही सावधान और चौकन्ने थे। नदी के किनारे ही नावली और कस्बे के बीच राजा की प्रशस्त हवेली थी। वह हरे-भरे पेड़ों के बीच छिपी सी रहती थी। कवि कलश ने स्वयं अपनी देख रेख में इस हवेली का कार्य पूरा करवाया था। हवेली के बाहर बड़े बड़े गुलाबों से भरा एक उद्यान था। कल दोपहर से ही हवेली की गति तेज हो गयी थी। रायगढ़ से महारानी येसूबाई और कवि कलश की पत्नी तेजसबाई एक दिन पहले ही दोपहर में वहाँ पहुँच चुकी थीं। वे दोनों जल्दी ही महादेव के मन्दिर में पहुँच गयीं। उन्होंने अभिषेक की पूरी तैयारी कर ली थी। शास्त्री उपाध्याय और उनके साथ पधारे स्वामी रामदास के शिष्य रंगनाथ स्वामी की सहायता से पूजा विधि की सम्पूर्ण तैयारी की गयी थी। इस धार्मिक अनुष्ठान के कारण महाराज के राजधर्म में कोई व्यवधान उपस्थित न हो, इसका पूरा ध्यान येसूबाई रख रही थीं। कल मध्य रात्रि में जब शम्भू महाराज अपनी हवेली के सामने उतरे तो उनकी अगवानी में स्वयं महारानी येसूबाई, सेनापति म्हालोजी घोरपड़े, खंडो बल्लाल, धनाजी सन्ताजी-मानाजी आदि सभी लोग खड़े थे। सभी लोग लगभग एक महीने बाद महाराज को देख रहे थे। पिछले कुछ दिनों से निरन्तर जागरण का प्रभाव शम्भुराजा के चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था। उसके साथ ही कष्टसाध्य यात्रा ने उन्हें तोड़कर रख दिया था। उनकी आँखें लाल और चढ़ी हुई दिखाई पड़ रही थीं थकान से चूर-चूर हुए महाराज को लग रहा था कि सीधे जाकर अपने को बिछौने में झोंक दें। किन्तु अपनी प्रतीक्षा में सारे दिन बैठे साथियों से चार शब्द बोलना भी अनिवार्य 632 :: सम्भाजी

था। आसन पर बैठते ही राजा का ध्यान सबसे पहले सेनापति म्हालोजी घोडपड़े की ओर आकर्षित हुआ। घोडपड़े काका (शिवाजी महाराज के समय के अनुभवी बुजुर्ग) अपनी उम्र के सत्तर वर्ष पार करने पर भी शरीर से स्वस्थ और बलिष्ठ थे। वे पूरी तरह आत्मविश्वासी दिखाई पड़ रहे थे। निश्चिन्त भाव से शम्भूराजा ने कहा, "म्हालोजी काका! आपको और आपके साथ सभी लोगों को यहाँ देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। पिछले आठ वर्षों मे निरन्तर लडता और जूझता रहा। अब बादशाह पर एक अन्तिम हमला करना है। बस एक बार जोर लगाना है।" "महाराज ! जिस प्रकार मगरमच्छों और घड़ियालों से भरी नदी में पैर रखने की हिम्मत नहीं होती उसी प्रकार यहाँ के दरों में, पहाड़ियों में, घाटियों में उतरने की हिम्मत उस औरंग्या ने नहीं की। यह आपकी बहादुरी का ही नतीजा है।" सन्ताजी, धनाजी और खंडो बल्लाल जैसे युवकों की हार्दिक इच्छा थी कि इतने दिनों बाद मिले अपने राजा से देर तक बातें करें किन्तु राजा की चढ़ी हुई आँखों और थकी हुई मुख-मुद्रा को देखकर इन युवकों ने अपनी इच्छा को भीतर ही दबा लिया। सेनापति घोडपड़े ने महाराज की ओर चिन्तित होकर देखा। उन्होंने येसूबाई से कहा, "महाराज को अब आराम करने दीजिए। कल बहुत काम है।" महाराज उठे और शयन कक्ष की ओर चल दिए। बिस्तर पर बैठकर उन्होंने येसूबाई की गोरी कलाई अपने हाथों में ले ली। उनका मन कर रहा था कि अपनी लाडली रानी से खूब बातें करें। किन्तु पिछले अनेक दिनों के निरन्तर परिश्रम और जागरण के कारण शरीर विद्रोह पर उतर आया था। बात करते समय भी उनकी आँखें मूँदी जा रही थीं। शरीर पसीने से चीकट हो गया था। स्नान करने के बाद ही सोने की इच्छा थी। किन्तु वे एक क्षण के लिए ही पलँग पर लेटे थे कि उन्हें नींद आ गयी। इतनी गहरी नींद से स्नान के लिए उठाने की इच्छा येसूबाई की नहीं हुई। उन्होंने आगे बढ़कर महाराज के गले से पन्ने की माला की रेशमी गाँठें धीरे-से खोल लीं। किमखाब का कमरबन्द भी निकाल लिया। जब उन्होंने सहज भाव से महाराज के शरीर पर हाथ फेरा तो वे चौंक गयीं। वह किसी राजा का मुलायम शरीर नहीं था बल्कि नित्य मिट्टी से जूझने वाले किसी मजदूर की खुरदुरी काया थी। महाराज के शरीर में हल्का सा ज्वर भी था। येसूबाई ने तत्काल वैद्य को बुलवाया। महाराज को थोड़ा-सा जगाया और उन्हें औषधि पिलाई। महाराज पुनः नींद के अधीन हो गये। शयनकक्ष का चिराग बुझाकर महारानी येसूबाई हल्के कदमों से बाहर की ओर गयीं। वहाँ पर म्हालोजी घोडपड़े और कवि कलश अभी भी बैठे थे। महारानी सम्भाजी :: 633

ने कहा, "कविराज ! महाराज बहुत थके हुए दिखाई दे रहे हैं।" "भाभीजी! महाराज इन दिनों अनिद्रा से बहुत परेशान हो गये हैं। ऊपर से वे बहुत उत्साही और प्रसन्न दिखाई देते हैं। उनके चेहरे का तेज रंचमात्र भी कम नहीं हुआ है। किन्तु अनन्त चिन्ताओं के कारण वे भीतर से खोखले होते जा रहे हैं। कभी-कभी दायें कन्धे का जोड़ बहुत दर्द करता है। खाँसी से भी परेशान हो उठते हैं।" बाहर गहराते अँधेरे की ओर देखते हुए येसूबाई ने कहा, "कविराज ! घोड़े की पीठ पर लदा हुआ महाराज का सिंहासन और कितने दिनों तक घोड़े की पीठ पर ही लदा रहेगा ?" "भाभीजी चिन्ता न करें। थोड़े ही दिनों में यह अरिष्ट समाप्त हो जाएगा। सब कुछ क्षेम होगा।" "कर्नाटक की लड़ाई में महाराज ने खन्दक की दूसरी ओर घोड़ा कुदा दिया था। वह जानवर तो बेचारा वहीं पर प्राण त्याग गया। किन्तु महाराज की कन्धे से गर्दन तक की हड्डी ठीक नहीं हो पायी। वह कभी-कभी बहुत तकलीफ देती है। असहनीय वेदना होती है उन्हें।" "खैर, भाभीजी। कल का विचार विमर्श एक बार पूरा हो जाय, फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा। भाभी जी ! अब उस पागल बादशाह के पास केवल दो पर्याय ही बचे हैं। या तो उसे चुपचाप दिल्ली की ओर कूच करना होगा या फिर यहीं पर आत्महत्या करके अल्लाह को प्यारा होना होगा।" "बहुत सहा है इस लड़के ने। हमारे बड़े महाराज पर बड़े-बड़े संकट आये और गये। किन्तु इतना लम्बा अरिष्ट शिवाजी महाराज ने कभी नहीं देखा था।" म्हालोजी बाबा ने देखा। येसूबाई ने माँ भवानी का स्मरण करते हुए आँखें मूँद लीं। उन्होंने धीमे से कहा, "माँ! किसी तरह यह संकट दूर कर दे।" येसूबाई ने आगे कहा, "कल हम यहाँ के संगमेश्वर मे अपनी रक्षा की प्रार्थना करेंगे। उनकी शरण में अपने को समर्पित करेंगे। हमारे महाराज को कब सुख मिलेगा ? कितना काँटों भरा जीवन और कितना कंटकाकीर्ण यह राजयोग ? माँ शब्द का अर्थ जानने के पहले ही माँ का स्वर्गवास हो गया, असीम प्यार करने वाली जीजामाता भी जल्दी ही परलोक सिधार गयीं। महाराज मुगलों से जा मिले। गलतफहमियों की काली घटायें घिरीं और छँट भी गयीं। ईश्वर की कृपा से ही बड़े महाराज के साथ पन्हालगढ़ पर राजा की भेंट हुई। यह अच्छा हुआ कि इस भेंट पे बड़े महाराज की सारी गलतफहमियाँ जलकर खाक हो गयीं। उसके बाद केवल चार महीने में ही बड़े महाराज चल बसे। उसके बाद खानदान में घोर कलह, भाई-भाई की दुश्मनी, गृहयुद्ध, मुंशी-मुहर्ररों 634 सम्भाजी

का विद्रोह, और पिछले आठ वर्षों में उस शैतान बादशाह के साथ निरन्तर टक्कर। इस प्रकार की कितनी परीक्षाएँ? कैसा तूफानी जीवन ? संकट, बाधाएँ, कपट, धोखा, षड्यन्त्र, अपयश, प्रवाद, जैसे कितने ही एक के बाद एक विष का प्याला महाराज ने पिया और पचाया। कितनी प्रचंड शक्ति और हिम्मत है उनके सीने में?'' बोलते बोलते येसूबाई का गला भर आया। उन्होंने कहा, "उनका परिश्रम और साहस विशाल पर्वत के समान है किन्तु उनकी सफलता मात्र एक छोटी टेकरी के समान है।" दूसरे दिन शम्भू महाराज बहुत जल्दी ही जाग गये। महाराज और महारानी ने संगमेश्वर महादेव को पंचामृत अभिषेक कराया। धर्मशास्त्र का ठीक-ठीक पालन हो रहा है या नहीं, इसका ध्यान स्वामी रामदास के शिष्य स्वामी रंगनाथ और कवि कलश कर रहे थे। पूजा विधि में येसूबाई बड़े मनोयोग से भाग ले रही थीं। भोर से ही चल रहा अभिषेक और उसके साथ के अन्य धार्मिक अनुष्ठान नाश्ते के समय तक समाप्त हो गये। येसूबाई और शम्भूराजा की पालकियाँ हवेली की ओर लौट पड़ीं। रंगोबा सरदेसाई अपनी हवेली के सामने खड़े थे। उनके परिवार ने महाराज और महारानी का रास्ता रोक लिया। रंगोबा और विशेष रूप से उनकी माताजी, श्रीमती कृष्णाबाई के आग्रह को महाराज टाल न सके। दही और शक्कर के निमित्त से ही सही, महाराज और महारानी को वहाँ कुछ देर रुकना पड़ा। सरदेसाई की दुमंजिली हवेली इतनी सुन्दर थी कि लोग आँखें फाड़कर देखते रह जाते थे। हवेली के पीछे से ही शास्त्री नदी बहती थी इस समय खाड़ी में ज्वार का पानी नहीं था। इसलिए घुटनों तक की गहराई का मीठा पानी कल-कल करता हुआ बह रहा था। शम्भूराजा ने हवेली के भव्य मन्दिर में जाकर श्री गजानन के दर्शन किये। पास में ही श्री कर्णेश्वर का मन्दिर था। यह बहुत पुराना मन्दिर था। महाराज और महारानी ने मन्दिर में जाकर, शीघ्रता से दर्शन किया। राजा का पूरा दल भी शीघ्रता से हवेली पर लौट गया। मावल और कोंकण घाटी के कुछ चुनिन्दा सरदारों और अधिकारियों को महाराज ने विचार विमर्श के लिए आमन्त्रित किया था। दुश्मन राज्य की सीमा पर पहुँच चुका था इसलिए महत्त्वपूर्ण किलों और चौकियों के सरदारों को महाराज ने सूचित कर दिया था कि अपने अपने स्थानों पर पहरे और गश्त को तेज कर दें। बहुत दिनों के बाद पिछली रात में महाराज की तीन घंटे की नींद हुई थी। विशालगढ़ के सुदीर्घ जागरण का प्रभाव अभी समाप्त नहीं हुआ था। उनके शरीर में हल्का सा ज्वर अभी भी था। किन्तु इन सारी बातों को भूलकर उनकी तेज नजर अपने सहयोगियों का भेद ले रही थी। सम्भाजी 635

परामर्श के लिए एकत्र बुजुर्गों की ओर आदरपूर्वक देखते हुए शम्भूराजा ने कहा, "आप जैसे बुजुर्गों के आशीर्वाद और पिताजी के पुण्य के बल पर ही हम पिछले आठ वर्षों से औरंगजेब जैसे शक्तिशाली शत्रु का सामना कर रहे हैं। कभी सिर पर बर्फ का ठंडा गोला रखकर टक्कर दी तो कई बार दुश्मन की लाखों की सेना को विनष्ट करने के लिए हवा के घोड़े पर सवार हुए। बुरहानपुर बागलाण से कारवार-गोवा तक और नीचे कर्नाटक-जिंजी तक भाग दौड़ करते हुए अनेक बार मुठभेड़ हुई। कई बार तो दुर्दैव से ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि जैसे पानी का भयंकर सैलाब आकर दम घोंट रहा हो। किन्तु मामा हंबीरराव, कोंडाजी, मानाजी, रूपाजी जैसे बहादुर साथियों और आपलोगों के बलबूते हम अनेक बार मुगल सेना को मात देने में सफल हुए हैं।" सेनापति म्हालोजी घोडपड़े ने कहा, "महाराज आपकी बहादुरी और दृढ़ निश्चयी संकल्पशक्ति की कोई तुलना ही नहीं है।" "सच है घोडपड़े काका! इतनी बड़ी सेना जो इस भूभाग में आती है, इतने वर्ष जूझती रहती है। उसका मुकाबला करने के लिए ये पगड़ी और फटे कम्बल वाले लोग दृढ़ निश्चय के साथ खड़े हो जाते हैं। गोला बारूद न होने पर हाथ में चट्टानों के पत्थर ले लेते हैं, दर्रे घाटियों में साहसपूर्वक शत्रु का सामना करते हैं। इस प्रकार के कटु और सुदीर्घ जुझारूपन के उदाहरण विश्व के इतिहास में कम ही होंगे।" बोलते-बोलते शम्भू महाराज थक गये। उन्होंने एक लम्बी साँस ली और फिर निश्चिन्त स्वर में बोले, "किन्तु अब दिन बहुत बदल गये हैं। इतनी लड़ाइयाँ लड़ने पर भी हमारे हिस्से में थोड़ा भी यश नहीं आया। निराशा के गर्त में गोता लगाता बादशाह अब पूरी तरह से पागल हो गया है। अगले कुछ ही दिनों में वह सीधा दौड़कर हमारे ऊपर आ गिरेगा। चाहे अगले दरवाजे से आये या पिछले दरवाजे से, किन्तु पिंजरे में बन्द बिलाव की तरह वह बिना झपट्टा मारे नहीं रहेगा।" "सच है महाराज।" म्हालोजी घोडपड़े ने कहा। "इसी बीच पूरे तीन वर्षों से महाराष्ट्र भयंकर अकाल से पीड़ित है। पानी और चारे के अभाव में जनता और पशु दोनों बेहाल हो गये हैं। पिछले तीन वर्षों में सेना में नयी भर्ती भी नहीं हुई है। अनेक अच्छे घोड़ों के अस्तबल ध्वस्त होने की स्थिति में आ गये हैं। घरों के भीतर कलह है तो दरवाजे के बाहर अकाल की तपती धूप। पानी के अभाव में धरती में दरारें पड़ गयी हैं और आकाश भी मानो कुपित हो गया है। किन्तु दोस्तो! हमारे पास दो ऐसे अग्नि अस्त्र हैं कि उनसे हम बादशाह का नशा बड़ी सहजता से उतार सकते हैं।" शम्भूराजा की बातें सुनकर युवा धनाजी, सन्ताजी, खंडो बल्लाल आदि का 636 :: सम्भाजी

ध्यान अगला शब्द सुनने के लिए आकर्षित हुआ। महारानी येसूबाई भी सँभलकर बैठ गयीं। भावविभोर होकर शम्भू महाराज ने कहा, "हमारा पहला अस्त्र है, हमारे शिवप्रभु अर्थात हमारे पूज्य पिता का पुण्य और दूसरा अस्त्र है सह्याद्रि की पर्वत श्रेणियों में बने हमारे पहाड़ जैसे मजबूत दुर्ग। मान लीजिए कि वह उनसे बच जाता है या सँभल जाता है और सह्याद्रि की घाटियों और दरों में घुसने की उसे दुर्बुद्धि आ जाती है तो यहाँ के पाषाणी दुर्ग, ढालू चट्टानें उसे दौड़ा-दौड़ा कर भगाएँगी।" बैठक में जमा लोगों पर एक आदेशात्मक और तेज नजर डालते हुए शम्भू महाराज बोले, "मित्रो! साधन-सामग्री की दृष्टि से यह औरंगजेब सचमुच आलमगीर है। यद्यपि वह पिछले अनेक वर्षों से दक्षिण में लड़ाइयाँ लड़ रहा है तथापि उसका साम्राज्य विस्तार बहुत बड़ा है। काबुल-कन्दहार से लेकर बंगाल आसाम तक और दक्षिण में मालवा तक उसका साम्राज्य फैला हुआ है। वहाँ से वह करोड़ों रुपये की लगान वसूल करता है। उसकी तुलना में अपना स्वराज्य एकदम छोटा सा है। बादशाह द्वारा शासित लगभग अठारह प्रदेशों में से एकाध किसी आधे सूबे जितना, बस! आमदनी भी उसी अनुपात में कम। बड़े महाराज की जमापूँजी या उनका खजाना मैंने कहीं भी फिजूलखर्ची में बर्बाद नहीं किया। बल्कि उस खजाने को बड़ी सूझ बूझ से मैं उपयोग में लाया हूँ। इसीलिए आठ-नौ वर्षों तक हमने दुश्मन के फौजी महासागर का मुकाबला किया है। दुर्भाग्य से पिछले तीन वर्षों के अकाल ने राज्य की कमर तोड़कर रख दी है। फिर भी मेरे रणबाँकुरो, जिस साहस और संकल्प के साथ आप जूझ रहे हैं, उसका कोई भी जोड़ नहीं है। अपने महाराष्ट्र के अतिरिक्त, अन्य कोई भी प्रदेश ने उस पागल बादशाह को कभी भी इस तरह परेशान नहीं किया।" शम्भुराजा की आँखें नम हो गयीं। अपने जरीदार रेशमी दुशाले से आँखें पोंछते हुए वे बोले, "आज मैंने इस आपातकालीन विचार विमर्श की बैठक के लिए आपको यहाँ बुलाया है। इसमें म्हालोजी और सूर्याजी जैसे वरिष्ठ लोग भी हैं और जिनकी मसें अभी अभी भीगी हैं ऐसे धनाजी, सन्ताजी और खंडो बल्लाल जैसे तरुण भी हैं। म्हालोजी काका, कविराज और महारानी जी हम आपसे शपथपूर्वक कह सकते हैं कि धनाजी सन्ताजी जैसे हट्टे कट्टे मजबूत जवान ही कल हमारे स्वराज्य की बागडोर सँभालने वाले हैं। मित्रोऽऽ, आज तक आप सबने यहाँ की धरती और इस राजा के प्रति जो निष्ठा दिखाई है, उसके लिए हम आपका लाख-लाख आभार मानते हैं।" शम्भुराजा का स्वर कातर हो गया था। म्हालोजी घोडपड़े अपनी जगह पर उठकर खड़े हो गये। वे भी भावुक हो गये थे। उन्होंने कहा, "शम्भू महाराज ! हम सम्भाजी :: 637