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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

शम्भुराजा ने कर्णेश्वर मन्दिर में सपत्नीक जाकर दर्शन किया। युवराज ने नगर की बगल में एक कुछ ऊँची जगह देखी। इसके चारों ओर सुपारी और नारियल के पेड़ थे। पीछे ही ओर पास ही कल कल निनादनी नदी थी। चारों ओर पहरेदारों की तरह खड़े घने वृक्षों से घिरी यह हरी पहाड़ी थी। शम्भुराजा ने कहा, "कविराज, यह जगह मुझे बहुत पसन्द आयी है। यहीं पर हमारे लिए एक सुन्दर सा घर बनवाइए। यहाँ पर प्रकृति का साहचर्य मिलेगा साथ ही गोवा और कोल्हापुर से आने वाले रास्ते की अच्छी निगरानी भी रख सकेंगे।" रात्रि भोजन के लिए युवराज को शृंगारपुर के महल में वापस जाना था। इसके लिए शम्भुराजा और येसूबाई ने पालकियों को छोड़कर मजबूत कद काठी वाले अरबी घोड़ों पर सवारी की। युवराज ने घोड़े की लगाम खींचकर शृंगारपुर की ओर दौड़ाया। उस समय अगल बगल ताड़वृक्षों से घिरी घाटियों और खाइयों में अँधेरा उतर रहा था। झरनों और नालों के बीच से राह दिखाने वाले मशालची आगे-पीछे दौड़ने लगे। शम्भुराजा नगर की सीमा पार कर रहे थे, उसी समय अचानक दो तीन सौ किसानों और कोलियों का झुंड युवराज के रास्ते में आकर खड़ा हो गया। तभी संगमेश्वर में नियुक्त पहरेदारों ने 'चलो ! पीछे चलो, पीछे हटो।' कहकर उन्हें ढकेलना आरम्भ किया। किन्तु उसी समय 'ओ युवराज, ओ मालिक, ओ माई बाप, थोड़ा रुक जाओ' ऐसी चीख युवराज के कानों में पड़ी। इस व्याकुल और आर्त चीख को सुनते ही युवराज ने अपने घोड़े की लगाम खींचकर उसे पीछे की ओर घुमाया। युवराज को रुकता देखकर, पहरेदारों के बिना कोई चिन्ता किये, उन गरीब श्रमजीवियों ने चीखना-चिल्लाना शुरू किया- "माई बाप, सरकार हमको बचाओ।" संभाजी राजा को किसी गम्भीर प्रसंग की आशंका हुई। वे घोड़े से उतर गये। उनके पीछे कवि कलश भी घोड़े से उतरे। उन दोनों को किसानों ने घेर लिया। एक बूढ़ा किसान दहाड़ मारकर चिल्लाया- "माई बाप, सरकार, हम कैसे जियें ? ये जप्ती के हुकुमनामे देखिये।" "किसने भेजे हैं इन्हें ?" "देखिये सीधे रायगढ़ से आये हैं।" दुबले पतले दो तीन किसान एक साथ बोल पड़े। "कविराज देखिए तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है।" शम्भुराजा व्यग्र होकर बोले, "यहाँ प्रभावली की सूबेदारी महाराज ने मुझे दी है। ऐसी स्थिति में बिना मुझसे पूछे ये हुकुमनामे रायगढ़ से कैसे आये ?" 78 :: सम्भाजी

उन घबराये हुए किसानों के हाथ से कविराज ने हुकुमनामा लिया। वे धीमी आवाज में बोले, "बहुत सालों से लगान न भरने के कारण ये हुकुमनामे भेजे गये होंगे।" "किन्तु, उस पर हस्ताक्षर किसके हैं?" "राहुजी सोमनाथ के। अण्णाजी दत्तोपन्त के कहने पर ये हुकुमनामे भेजे गये हैं, ऐसा इसमें स्पष्ट उल्लेख है।" पीठ से पेट चिपके किसानों में भय की लहर पुनः उमड़ पड़ी। आठ दस लोगों ने शम्भूराजा और येसूबाई के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दिया। वे दहाड़ें मारकर शिकायत करने लगे—"हम भी क्या कर सकते हैं मालिक? पिछले छह- सात सालों में अनाज कुछ पैदा ही नहीं हुआ। कितने ही लोगों ने निराश होकर आत्महत्या कर ली। हम पर दया करो, माई-बाप हमें न्याय दो।" उन श्रमजीवियों के दुबले पतले निष्प्राण शरीर को देख लेने पर किसी दूसरे गवाह की आवश्यकता ही नहीं थी। फिर भी युवराज ने संगमेश्वर के थानेदार को पास बुलाया और किसानों की बदहाली की पक्की जाँच की। उन्होंने कविराज को तत्काल आदेश दिया—"कलशजी, इन सभी को लिखकर माफीनामा का हुक्म दे दो।" युवराज ने उसी जगह पर तत्काल न्याय व्यवस्था की। यह देखकर मेहनती कुनबी वहीं पर आनन्द से नाचने लगे। उन किसानों ने युवराज को बहुत बहुत आशीर्वाद दिया। युवराज की सेना पुनः श्रृंगारपुर की ओर चल पड़ी। रात में कवि कलश ने हल्के से संकेत करने वाले शब्दों में शम्भूराजा से कहा, "आपके हुक्म की तामील कल प्रातः ही कर दूँगा। माफीनामा कल ही विशेष दूत से संगमेश्वर भेज दूँगा। परन्तु राजन! आपकी कार्यवाही की एक प्रति सूचनार्थ रायगढ़ को भी भेज देता हूँ।" "हमारे हुक्मनामे के सम्बन्ध में कुछ सन्देह हो रहा है क्या?" गरम तवे पर तेल पड़ने से जैसे छनछनाहट की आवाज आती है, वैसे ही शम्भूराजा उखड़े— "कविराज! हम प्रभावली के बाकायदा सूबेदार हैं। अपने अधिकार से हम यह निर्णय ले सकते हैं और हिन्दवी स्वराज्य के युवराज हैं, खेत खड़ा किया गया धोखा नहीं हैं। किसी कारण से दुखी, लाचार और जरूरतमन्द प्रजा के लिए तत्काल निर्णय लेने का अधिकार युवराज के रूप में मुझे है।" कवि कलश धीरे-से हँसे, और उतने ही शान्त स्वर में बोले, "राजन! आपके अधिकार के सम्बन्ध में प्रश्न करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। किन्तु एक प्रिय मित्र के नाते मुझे यह अवश्य कहना पड़ेगा कि जहाँ राजा होता है वहाँ दरबार होता है। दरबार की दीवारें षड्यन्त्रकारी कारनामों से खोखली होती हैं, सम्भाजी :: 79

महत्त्वाकांक्षा की भूख मे बेचैन होती हैं। यह खेल बहुत पुराने जमाने से चला आ रहा है। आगे पीछे कोई समस्या न उत्पन्न हो इसलिए रायगढ दूत भेजकर सूचना दे देनी चाहिए, ऐसा मेरा विचार है। " छह आसमान मे उड़ने वाले सफेद बादलों की तरह दिन तेजी से गुजर रहे थे। श्रृंगारपुर की दिनचर्या मे कोई विशेष अन्तर नही आया था। इसी बीच एक दिन दोपहर के समय बालाजी आवजी चिटणीस की पालकी महल के दरवाजे पर आ पहुँची। पतले शरीर, गहरे गोरे रंग, मजबूत काठी वाले साठ वर्षीय बालाजी पालकी से उतरे। बीस वर्षीय तरुण की भाँति तेजी से महल की पचीस सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आये। बालाजी बीच के चौक पर आये तो येसूबाई ने सामने आकर उनका स्वागत किया। शम्भूराजा भी बालाजी के अचानक आगमन से चौंक गये। दोनो एक-दूसरे की बाँहों में समा गये। शम्भूराजा ने हँसते हुए पूछा, "बालाजी काका एकदम बिना सूचना के कैसे आ गये?" "शम्भूराजा! गढ़ पर अब मन नहीं लगता। महाराज का कर्नाटक गये कई महीने हो गये। सोचा कम से कम युवराज के ही साहचर्य मे दो दिन बिता लें।" स्वराज्य की स्थापना करते समय शिवाजी महाराज ने अपने आसपास बहुत से नर रत्नों का समूह एकत्र कर रखा था। उनमें से तानाजी बाजीप्रभु देशपांडे शिवा काशीद जैसे अनेक रत्न शहीद हो चुके थे। कुछ वृद्धावस्था के कारण समाप्त हो गये थे। इस समय राजदरबार में हबीरराव, येसाजी कंक हिरोजी फर्जन्द, अण्णाजी दत्तो, मोरोपन्त पिंगले, राहुजी सोमनाथ जैसे उँगलियों पर गिने जा सकने वाले लोग ही पुराने समय के बचे थे। उन्हीं मे बालाजी आवजी चिटणीस का समावेश था। चिटणीस खानदान का स्वराज्य की सेवा में प्रवेश एक दुर्घटना और योगायोग का परिणाम था। बालाजी के कर्मठ पिता आवजी हरि चित्रे जंजीरा के सिद्दी के यहाँ दीवान थे। मराठी प्रदेश पर भयानक अत्याचार करने के लिए सिद्दी कुख्यात था। किन्तु अपनी कार्यकुशलता और निष्ठा के कारण आवजी हरि सिद्दी के दीवान बने रहे। आवजी की दिनोंदिन बढ़ती समृद्धि और प्रगति से अनेक मुसलमान कर्मचारी ४० सम्भाजी

और सरदार स्वभावतः ईर्ष्या करने लगे थे। जेजुरी के खंडोबा आवजी हरि के पूज्य देवता थे। एक बार उनके सपने में मल्हारी मार्तंड के आने की घटना घटी। तभी अपनी सेवा के अनुशासन को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने बीमार मालिक के सामने नियमानुसार प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। अवकाश लेकर वे जेजुरी गये और खंडोबा की पूजा करके जंजीरा वापस लौट आये। इसके पश्चात् सिद्दी बाबशीखान की तबीयत और भी खराब हो गयी। आवजी हरि से ईर्ष्या करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों को अच्छा अवसर मिल गया। उन्होंने षड्यन्त्र रचकर यह कहना शुरू किया कि आवजी ने जेजुरी जाकर मालिक पर कुछ जादू टोना किया है। वे एक ही बात दोहराते थे-‘आवजी ने सुल्तान पर भयानक जादू टोना किया है। वह राज्य को डुबाना चाहता है।‘' संयोग बाबशीखान मर गया। गद्दी पर कम उम्र का नया सिद्दी बैठा। कर्मचारियों ने उससे भी शिकायत करनी आरम्भ की कि आवजी ही सुल्तान की मृत्यु का कारण है। नये सिद्दी ने शिकायत को सच मान लिया। आवजी ने हाथ पैर जोड़कर सुल्तान से स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने की प्रार्थना की किन्तु सिद्दी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत नये सिद्दी ने जहर का प्याला आवजी के हाथ में देकर उसे पीने के लिए सख्त आदेश दिया। आवजी और उनके भाई खण्डोजी को बोरे में बाँधकर समुद्र में फेंक दिया गया। हब्शी लोगों ने आवजी हरि का घर लूट लिया। उन्होंने आवजी के बालाजी चिमणाजी और श्यामजी तीनों पुत्रों को गुलाम के बच्चे मानकर ईरान इराक में बेचने का निश्चय किया। एक रात आवजी की पत्नी रखमाबाई के भाग्य फूट गये। उस समय बालाजी केवल ग्यारह वर्ष के थे। अभागी माता के साथ तीनों बच्चे नाव पर चीख-चिल्ला रहे थे। भरे समुद्र और आसमान को देख देखकर भाग्य और भगवान से सहायता की प्रार्थना कर रहे थे। भाग्य का फेर था या कुछ और स्वयं प्रकृति ही उनकी सहायता के लिए दौड़ पड़ी। नाव राजापुर के किनारे तक पहुँची थी तभी अचानक हवा उल्टी दिशा में बहने लगी। विवश होकर नाविकों को किनारे की ओर जाना पड़ा। यह योगायोग ही था कि रखमाबाई के भाई विसाजी शंकर राजापुर में व्यापार करते थे। वे ऐन मौके पर बहन की सहायता के लिए दौड़ पड़े। नाविकों और कर्मचारियों से बहुत-बहुत प्रार्थना करके और बहुत-सा धन उनकी झोली में डालकर विसाजी ने अपनी बहन और भांजों को मुक्त करा लिया। एक बार बालाजी ने अपने मोतियों जैसे सुन्दर अक्षरों में शिवाजी महाराज को एक पत्र लिखा-‘महाराज! हिन्दवी स्वराज्य के एक सिपाही के रूप में सेवा करने से मैं स्वयं को धन्य समझूँगा।’ सम्भाजी :: 81

संयोग से शिवाजी महाराज कुछ समय बाद राजापुर की लड़ाई पर आये। उन्होंने एक जौहरी की भाँति हीरे को पहचाना। उन्होंने रखमाबाई से कहा कि वे बालाजी को स्वराज्य की सेवा में ले रहे हैं। अपने परिवार के साथ घटित हादसे से वे अभी तक उबर नहीं पायी थीं। उनके करुण रुदन से महाराज का हृदय द्रवित हो उठा। महाराज ने बालाजी की माता को अभयदान देते हुए कहा, ‘‘माताजी आपके तीन पुत्र हैं। मुझे आप अपना चौथा पुत्र मानिए। आपका सुपुत्र स्वराज्य की चिन्ता करेगा, मैं आपकी चिन्ता करूँगा।’’ अपनी ईमानदारी, परिश्रम और कार्य कौशल से बालाजी पन्त राजसत्ता की एक एक सीढ़ी चढ़ते ऊपर गये। स्वराज्य के ब्राह्मण प्रधानों के प्रच्छन्न विरोध की अनदेखी करके महाराज ने बालाजी को सचिव (चिटणीस) बना दिया और राज्य के सभी किलों और गढ़ों का कार्यभार उन्हें सौंप दिया। बालाजी पन्त ने प्रत्येक किले पर अपनी प्रभु जाति के योग्य और कर्मठ व्यक्तियों को नियुक्त किया। उन्हें महत्त्वपूर्ण पद दिये। अष्टप्रधानों में दो दल बन गये थे। एक ओर बालाजी आवजी चिटणीस तो दूसरी ओर अण्णाजी दत्तो और मोरोपन्त पिंगले थे। प्रभु और ब्राह्मण जाति में आश्चर्यजनक आन्तरिक बैर था। किन्तु शिवाजी महाराज के कठोर अनुशासन और निर्णायक दृष्टि के सम्मुख किसी की कुछ न चलती थी। बालाजी आवजी को शम्भुराजा से पहले से ही बहुत स्नेह था। शम्भुराजा मातृ विहीन पुत्र और बड़े महाराज हमेशा अपने राज-काज में व्यस्त रहते थे। ऐसी स्थिति में पहले राजगढ़ में और बाद में रायगढ़ में शम्भुराजा की हित चिन्ता करने वाले जो इने गिने लोग थे उनमें बालाजी आवजी एक थे। सागौन का वृक्ष जिस गति से बढ़ता है, शम्भुराजा भी उसी गति से दिनोंदिन हृष्ट-पुष्ट होते जा रहे थे। राज्याभिषेक के पूर्व बड़े महाराज ने रायगढ़ और स्थानीय राज्य का कार्यभार सँभालने के लिए कहा था। शम्भुराजा ने बड़े उत्साह और बड़ी कुशलता से चार वर्षों तक यह कार्य सफलतापूर्वक सँभाला। कर्नाटक की कोलार और चिक्कबालापुर की जागीर भी स्वयं सँभाली थी। आगे अथणी, रायबाग गोलकुंडा से लेकर हुबली, फोंडा और अकोला तक कर्नाटक और गोवा की सीमा तक धावा बोला था। कुतुब शाह के दीवान मादण्णा से मित्रता करके बहुत सा धन लूटकर रायगढ़ ले आये थे। शम्भुराजा के इस वीरता भरे उत्साह से बालाजी पन्त बहुत प्रभावित हुए थे। कुछ समय बाद बालाजी पन्त शम्भुराजा के साथ भोजन कर रहे थे। सुस्वादु भोजन से उनका मन बहुत प्रसन्न था। परन्तु भोजन करते-करते यकायक जैसे मुँह में कोई पत्थर का टुकड़ा आ गया। बालाजी ने क्रुद्ध स्वर में पूछा- ‘‘वह अघोरघट कपालिक कहाँ है?’’ 82 सम्भाजी

" 'कौन अघोरघट और कौन कापालिक ?' ' इस नये प्रसंग को लेकर बालाजी पन्त की मुद्रा अपना लुभावनापन छोड़कर क्रोधावेश में भयानक हो गयी। वे चिल्लाए- " 'जो हमेशा तुम पर अपना जादू चलाता है। जिसने अपनी पापी बुद्धि मे तुम्हें पागल बना दिया है। जो भैंसे की गीली पीठ पर सवारी करता है, जो काले जादू के काले-कारनामे करता है।' ' " 'मगर है कौन ?' ' " 'जो अघोरी कार्य के लिए बैतालों के झुंड बुलाता है।' ' संभाजी ने मुस्कराते हुए येसूबाई की ओर देखा। फिर दानों जोर से हँसने लगे। अपनी हँसी को रोकते हुए शम्भूराजा ने कहा, " 'औरों की तरह आपको भी संशय और ईर्ष्या के साँप ने डस लिया है क्या ? इसीलिए कविराज आपको पराये लगने लगे हैं क्या ?' ' " 'सच कहूँ युवराज ! इस सन्दर्भ में मैं अपने अष्टप्रधानों को जरा भी दोष नहीं देता। यह कलुष के रूप में शिवाजी महाराज के स्वराज्य में कलि प्रविष्ट हो गया है। यह पूरी तरह मच है। यदि ऐसा नहीं होता तो आपके जैसा कर्तव्यपरायण राजकुमार ने इतनी भयंकर चाल न चली होती।' ' " 'कैसी चाल ? बालाजी काका !' ' " 'किसी अच्छे व्यक्ति के बुरी संगति में पड़ने से बुराइयों का प्रभाव पड़ता ही है। इस श्रृंगारपुर के परिसर में मांस मच्छी खाने वाले, जादू-टोना करने वाले अधर्मी शाक्तपन्थियों ने उत्पात मचा रखा है। आप जैसा विद्वान युवराज उनका अन्धा शिकार हो जाय, यह बड़ा दुर्भाग्य है।' ' " 'बालाजी काका मनुष्य के आचरण की शुद्धता के लिए ही प्रत्येक धर्म और पथ प्रयत्न करते हैं। कालान्तर में लोग धर्म को वशवर्ती बनाकर अनुचित मार्ग को अपनाते हैं। किन्तु धर्म का विकृत रूप वास्तविक धर्म नहीं होता। यह मानना भी ठीक नहीं होगा कि केवल शाक्त पन्थियों में ही सारी बुराइयाँ हैं और वैदिक धर्म इससे पूर्णतया मुक्त हैं।' ' शम्भूराजा ने आगे कहा, " 'शाक्त पंथ को हम कुछ अन्य नहीं समझते। वह तो वस्तुतः जगदम्बा की, शक्ति की ही पूजा है। उसमें हमारे भोसले खानदान की कुलदेवी तुलजा भवानी भी हैं। वे शस्त्रधारिणी और दुष्टों का नाश करने वाली हैं। उसे भोग लगता है तो उसी रक्त मांस का," बोलते-बोलते शम्भूराजा क्षणभर के लिए रुके फिर भरे हुए गले से बोले, " 'आज हमारा कोई अपराध न होने पर भी बहुतों की उपहास करने वाली दुष्ट दृष्टि हमें शाप देती है। बहुत से लोगों के द्वेष के, शाप के और उनकी गालियों के हम शिकार होते हैं। ऐसी दुष्ट प्रवृत्ति का सामना करने के लिए किसी शक्ति के आशीर्वाद और वरदान की आवश्यकता तो पड़ेगी ही, बालाजी काका।' ' सम्भाजी • 83

"शम्भूराजा ! बड़े महाराज ने ऐसा सहारा कहाँ ढूँढ़ा था ?" "आपके जैसे व्यक्ति को क्या बताएँ चिटणीस काका ?" शम्भूराजा आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोले, "गागाभट्ट से पिताजी ने अपना राज्याभिषेक करवाया था। किन्तु उसमें कुछ दोष रह गये थे, कुछ अपूर्णताएँ थीं। यह ध्यान में आने पर पिताजी ने फिर दुबारा निश्चल गिरि गोसावी से तान्त्रिक अभिषेक करवाया था। आप इस बात को भूल गये क्या? यहीं पर महाराज ने निश्चल गिरि के लिए आश्रम बनवाया था और उनके लिए हर प्रकार की सुविधा करके दी थी। आपको इसे नहीं भूलना चाहिए।" बालाजी कुछ नरम पड़े किन्तु तत्काल उन्होंने पूछा- "मुझे यह नहीं मालूम था कि तुम्हें राजा बनने की इतनी जल्दी पड़ी है।" "काका, आप यह क्या कह रहे हैं? अपने पिताजी राजगद्दी पर बैठे हैं तो राजपद के हम क्यों उतावले होंगे? इस तरह का आचरण करने वाले क्या हम आपको किसी सुल्तान या मुसलमान के दुष्ट शहजादे लग रहे हैं? "यदि ऐसा नहीं था तो वह महाभयंकर अभिषेक क्यों करवाये ?" "कौन सा ?" "वह कलशाभिषेक था क्या ?" आँखें सिकोड़ते हुए बालाजी ने पूछा। "हाँ, वह किया मैंने।" शम्भूराजा ने स्पष्ट शब्दों में कहा। "अरे यह क्या किया शम्भूराजा आपने ?" बालाजी आवजी व्याकुल हो गये। उनका चेहरा उतर गया। "क्या करते बालाजी काका ? कद काठी का मजबूत तगड़ा घोड़ा दौड़ते दौड़ते अचानक ठोकर लगने से मर कैसे जाता है ? हमारे महल के आगे पीछे हल्दी कुमकुम लगे नींबू, सुई से गुदे हुए भल्लातक, काली जादू टोने की गुड़ियाँ जैसी अशुभ वस्तुएँ कहाँ से आकर भरी पड़ी रहती हैं ?" "परन्तु इसके लिए कलशाभिषेक ?" बालाजी आवजी ने आँखें मटकायीं। "दूसरा करते भी क्या काका ? अन्तःपुर में, दरबार में घोड़ों के तबेलों में कहीं भी शान्ति नहीं, बहनोई गणोजी अलग नाराज। जिन्दगी को शर्मनाक बना देने वाली दरबारियों द्वारा की गयी बदनामी, व्यभिचार के गन्दे आरोप, मुझे हमेशा नीचा दिखाने की ताक में बैठे अष्टप्रधान और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह कि सारी दुनिया के लिए पहाड़ जैसा आधार देने वाले किन्तु मुझसे निरन्तर दूर होते जा रहे मेरे पिताजी, इन सारी परेशानियों का कटु अनुभव करते हुए सोचा एक बार शान्ति कर डालूँ।" "शान्ति ? इस प्रकार की शान्ति ?" बालाजी आवजी संकुचित हुए। उनकी पुतलियाँ तेजी से गोल-गोल घूमने लगीं। उनका गला भर आया। वे व्याकुल स्वर 84 : सम्भाजी

में चीखे- "इसका मतलब यह है युवराज कि जिन शिवाजी महाराज ने इस महाराष्ट्र का निर्माण किया उनको हमेशा के लिए शान्त करने को निकले हैं आप।" बालाजी पन्त ने जो निष्कर्ष निकाला था उसकी कल्पना मात्र से शम्भूराजा के प्राण सूख गये। ऐसा लगा जैसे किसी ने तेज छुरी उनके कलेजे में उतार दी। आसन से उठकर वे दरी पर बैठ गये और अत्यन्त भयभीत स्वर में बोले, "कितनी भयंकर बात कर रहें है काका आप? "युवराज! कलशाभिषेक फिर दूसरा अभिप्राय क्या है?" बालाजी पन्त दहाड़ें मारकर रोने जैसे स्वर में बोले, "एक राजा के गद्दी पर रहते दूसरा राजा उस गद्दी पर नहीं बैठ सकता। जिसको राजसत्ता प्राप्त करने की उतावली रहती है वही कलश जैसे धूर्त मात्रिकों को एकत्र करता है और तन्त्र-मन्त्र की अघोरी विद्या के बल पर जीवित राजा का नाश करता है। दिवंगत राजा के श्राद्ध के दिन ही नये राजा का सिंहासनाारोहण होता है। इसी के साथ कलशाभिषेक की पूर्णाहुति होती है। शास्त्रज्ञ पंडितों का ऐसा ही मानना है।" शम्भूराजा की आँखों में धारासार आँसू गिरने लगे। उन्होंने बालाजी से तत्काल पूछा, "कलशाभिषेक अनुष्ठान यह भयंकर आशय आपको किसने बताया?" "अजी अब बताना किसको रह गया है। रायगढ़ से लेकर पन्हालगढ़ तक हर जगह यह बात फैल गयी है। आपके इस भयंकर कृत्य का समाचार राज्य के कुछ कर्मचारियों ने महाराज के पास कर्नाटक भी भेजा है। अण्णाजी दत्तो और राहुजी सोमनाथ की शिष्यमंडली, उनके भांजे-भतीजे, स्वयं आपकी सौतेली माता सोयराबाई रानी सभी हर किसी से आपके इस कृत्य का वर्णन करते हैं। बच्चे बूढ़े सभी इस चर्चा में लिप्त हैं। बालाजी आवजी ने कपड़े से अपना चेहरा पोंछा। बालाजी के मुँह से निकले धक्का देने वाले प्रत्येक शब्द को सुनकर युवराज और युवराज्ञी दोनों आश्चर्यचकित रह गये। अपनी आँसुओं और रुलाई के वेग को रोकते हुए शम्भूराजा ने कहा, "जिन नीच और दुष्ट लोगों के विकृत मस्तिष्क से ऐसे विषैले विचार निकलते हैं, कल उनके मुँह में राख भरने में गधे भी पाप कर्म का अनुभव करेंगे। अच्छा हुआ, आपने इतनी दूर आकर हमें सावधान किया।" मरणासन्न, घायल मराठा सरदार की तरह शम्भूराजा नीचे गिर गये। जैसे किसी ने कलेजे पर गरम सरिया रख दिया हो। ऐसी पीड़ा से वे छटपटाये। "बालाजी काका! जिस जीजा माता ने मेरी माँ के मरने के बाद मुझे पाल पोस कर छोटे से बड़ा किया उसी जीजा माता के पुत्र की मृत्यु का सपना संभाजी देखता होगा; ऐसा आप सोच कैसे सकते हैं?" "नहीं-नहीं, एकदम असम्भव।" बालाजी पराजित स्वर में बोले। सम्भाजी · ४९

संभाजी का हृदय घायल हो चुका था। इसलिए बालाजी पन्त भी कुछ लज्जित हुए। मन की बात को स्पष्ट रूप से कह देना सब के साथ सठता और उदंड के साथ उद्दंडता करना, सज्जनों के साथ विनम्र होना संभाजी का स्वभाव था। उनके स्वभाव की वह विशेषता बालाजी पन्त को अच्छी तरह ज्ञात थी। इतना ही नहीं, संभाजी का सारा बचपन बालाजी के सामने गुजरा था। इसलिए वे संभाजी के साफ मन को अच्छी तरह ज्ञात थी। इतना ही नहीं, संभाजी का सारा बचपन बालाजी के सामने गुजरा था। इसलिए वे संभाजी के साफ मन को अच्छी तरह जानते थे। वे बोले, "नहीं युवराज! लोग आपको दोष नहीं देते। उनकी दृष्टि में आपका कवि कलश ही सारी दुरावस्था का कारण है।" "ऐसा बिलकुल नहीं है। इन अष्टप्रधानों और सरकारी अधिकारियों के लिए माध्यम कलश रहते किन्तु उनका निशाना मेरी ओर ही होता है। मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ कि इसे न पहचान सकूँ।" "जाने दो युवराज! इन अधिकारियों के आक्रमण अथवा व्यर्थ की बातों से आप कभी भी विचलित नहीं होना। आज भी स्वयं को उच्च वंश का ब्राह्मण समझने वाले और मराठा लोग शिवाजी महाराज को क्षत्रिय मानने के लिए तैयार नहीं हैं। इससे पहले ही उन्होंने महाराज के राज्याभिषेक का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से विरोध ही किया था। "मतलब?" संभाजी ने आश्चर्य के साथ पूछा। इन लोगों का कहना है कि परशुराम ने सारी धरती को क्षत्रिय विहीन कर दिया था। धरती पर कोई क्षत्रिय नहीं बचा था तो फिर शिवाजी कैसे क्षत्रिय कुल के हो सकते हैं? जब इन महानुभावों ने इस प्रकार का विवाद खड़ा किया था तब यह सिद्ध करने के लिए कि शिवाजी महाराज मूल में राजस्थान सिसोदिया वंश के हैं, यही बालाजी आवजी चिट्रे राजस्थान गया था और सबूत जुटाकर ले आया था।" बालाजी ने संभाजी को यह विवरण दिया। "ऐसा है क्या? तो ये बातें अण्णाजी दत्तो को समझाओ न!" युवराज ने कहा। "अण्णाजी कार्यकुशल तो हैं ही। किन्तु कार्यकुशल होने पर भी उनकी प्रवृत्ति ठीक नहीं है। मराठा और प्रभुजाति कोई भी क्षत्रिय नहीं है, ऐसा मानने वालों में अण्णाजी प्रमुख हैं। युवराज और युवराज्ञी के साथ बालाजी ने गम्भीर चर्चा की। शिवाजी महाराज के कर्नाटक से लौटने के पहले शम्भूराजा को अधिक से अधिक बदनाम करने की विरोधियों की योजना थी। इसीलिए उन्होंने कवि कलश का बड़ा भूत खड़ा किया था। उनका विश्वास था कि जितना कवि कलश बदनाम होंगे उतना संभाजी राजे भी बदनाम होंगे। विचारमग्न शम्भूराजा के गम्भीर चेहरे पर अचानक हँसी खिल उठी। ४६ सम्भाजी

उन्होंने बालाजी से पूछा—"काका, आपने पहले क्या कहा, कवि कलश बाघ की खाल पर बैठकर जादू टोना करते हैं?" "बाघ नहीं युवराज! भैंसे की गीली खाल पर बैठकर।" बालाजी आवजी के वाक्य पूरा होने के पहले ही युवराज जोर से हँस पड़े। उन्होंने कहा—"काका, मरे हुए चूहे की दुर्गन्ध से जिसकी धोती पीली हो जाती है उससे भैंसे की खाल की दुर्गन्ध कैसे सहन होगी?" "इनमें से कोई गया था क्या कवि कलश को देखने के लिए? इस प्रकार का भयंकर कार्य यदि हमारे कवि कलश करते तो गाय चराने वाले बच्चे भी उन्हें पत्थर मारते। आरोप लगाने वालों को क्या इतना भी नहीं समझ में आता?" "जाने दीजिए युवराज! इन सभी बातों का मतलब एक ही है। आपको बदनाम करने और अपयश देने के लिए रायगढ़ के आसपास बहुत से कारखाने रात दिन चल रहे हैं।" बालाजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा। पन्त दो दिन श्रृंगारपुर में रुके रहे। अनेक मुद्दों पर युवराज के साथ उनकी गम्भीर चर्चा हुई। उसी समय कुछ स्मरण करते हुए बालाजी ने कहा, "युवराज, आजकल आप राज्य का आर्थिक हित भूलते जा रहे हैं। कर डुबाने वाले श्रमजीवियों और किसानों को तत्काल माफीनामा लिखकर दे देते हैं। गुंडों का अभयदान देकर कर्तव्यपरायण कर्मचारियों को बार बार अपमानित करते हैं। राहुजी सोमनाथ ने इसी प्रकार शोर राजधानी में मचा रखा है।" "किस चीज का माफीनामा, बालाजी काका?" शम्भूराजा को संगमेश्वर के किसानों का प्रसंग स्मरण हो आया। वे दुखी होकर बोले, "वे नावड़ी के परिश्रमी लोग हैं। पिछले आठ वर्षों में अतिवृष्टि और बाढ़ के कारण वहाँ कोई फसल पैदा ही नहीं हुई। लिए कर्ज को चुकाने के लिए साहूकारों ने भी उन्हें सताया। ऐसी दुखी प्रजा के आँसू पोंछने का यदि मुझे अधिकार नहीं है तो हमारे इन हाथों को उखाड़कर फेंक देने में क्या बुराई है?" शम्भूराजा ने क्रोध के आवेश में पूछा। बालाजी पन्त रायगढ़ के लिए निकले तो उनके बिदा करते समय शम्भूराजा को बहुत दुख हुआ। वे अधीर स्वर में बोले, "बालाजी काका इस बदली हुई परिस्थिति का हमें सचमुच कोई अनुमान नहीं था। इन षड्यन्त्रकारियों ने मुझे अपने प्रिय पिता के साथ दक्षिण की लड़ाई में नहीं जाने दिया। युवराज होने पर भी रायगढ़ के किसी कोने में जगह नहीं दी। मुझ पर अभद्र आरोप लगाया कि मैंने अपने महल में पर स्त्री के साथ वसन्त पंचमी के दिन व्यभिचार किया। एक के बाद एक होने वाले आघातों से संभाजी कभी डगमगाया नहीं। परन्तु ।" बाढ़ के गहरे पानी में फँसी नाव की तरह शम्भूराजा की साँस अटक गयी। गरम आहें भरते हुए वे बोले "परन्तु बालाजी काका जब हमारे विरोधियों ने यह सम्भाजी 87

आरोप लगाया कि राजगद्दी के लोभ में मैं अपने जन्मदाता शिवाजी महाराज जैसे युग प्रर्वतक पिता की जान का दुश्मन बन गया तो मेरे हृदय के टुकड़े टुकड़े हो गये। " " रहने दें युवराज, आप शान्त रहें।" "पिताजी की जान लेने का नीच विचार तो छोड़ ही दें, किन्तु कभी समय आने पर पिताजी के सपनों के लिए, उनके राष्ट्रधर्म के लिए और भगवान के लिए यह संभाजी अपने शरीर के फूल को काल की खाई में चढ़ाये बिना नहीं रहेगा। सात बड़े महाराज की याद आ गयी। याद आते ही शम्भूराजा की आँखों के सामने दुर्गम रायगढ़ आडा तिरछा खड़ा हो गया। वे गहरी साँस लेकर बोले "युवराज्ञी, कितना विचित्र है यह मानव स्वभाव ? समय के साथ लोग किस तरह बदल जाते हैं ? इसी रायगढ़ ने यह दृश्य भी देखा है जब युवराज के साथ खेलते हुए माता सोयराबाई बच्चों से भी बच्चा बन जाती थी। कभी कभी शम्भूराजा के लिए सोयराबाई जीजा माता से भी झगड़ पड़ती थीं। किन्तु ..।" "किन्तु क्या?" • "जब से राजमहल में राजाराम का रोना सुना तब से राजमहल की दीवारों का रंग बदल गया। "युवराज, मुझे तो ससुरजी साहब के राज्याभिषेक का वह भव्य समारोह याद आता है, जब ससुर जी ने आपको हिन्दवी स्वराज्य के युवराज अर्थात् भविष्य के उत्तराधिकारी के रूप में सम्मानित किया था। तब पटरानी के रूप में वहाँ बैठी थीं तब बुवा साहब ने कोई रुकावट पैदा नहीं की थी। "युवराज्ञी, आपने अच्छा स्मरण दिलाया।" वह प्रसंग अपनी आँखों के आगे प्रत्यक्ष करते हुए शम्भूराजा बोले, "आप कहें तो मैं सौगन्धपूर्वक कह सकता हूँ कि राज्याभिषेक के उस समारोह के बाद हमारी इन माताजी ने कभी भी पहले की तरह दिल खोलकर हँसी या बोलीं हों ऐसा मुझे स्मरण नहीं है।" येसूबाई ने युवराज की हथेली पर अपनी कोमल उँगलियों को घुमाते हुए और युवराज को धीरज बँधाते हुए कहा, "आप इस तरह निराश और रुष्ट क्यों होते ४४ सम्भाजी

हैं? जो ससुरजी मेरी जैसी पराये घर की लड़की को इतना प्यार देते हैं वे आप जैसे अपने होनहार पुत्र को कैसे भूल सकते हैं?'' "नहीं येसू, इस शम्भू के लिए अपने पिता के राज्य में न्याय नहीं है। उल्टे यह राज्य के बहुत से लोग उसके चेहरे पर कलंक के काले दाग लगाने का प्रयत्न कर रहे हैं। हमारे शत्रु मुझे एक दुष्ट, मद्यप, उदंड, अहंकारी युवराज सिद्ध करने की होड़ में लगे हैं।" "युवराज भगवान पर भरोसा रखें।" "हम बहुत से देवी-देवताओं की पूजा रोज करते हैं किन्तु सच्चे मन से शिवाजी महाराज नामक देवता के अतिरिक्त संभाजी ने न किसी देवता को अपने हृदय के मन्दिर में बिठाया और न ही पूजा की। उन्हें एक विशाल वटवृक्ष मानकर हम उनकी छाया के लिए व्यग्र हैं। किन्तु कुछ विरोधी शक्तियाँ इस महावृक्ष को मेरी जिन्दगी से दूर ले जाकर, मुझे जड़ से उखाड़ देने का प्रयास कर रही हैं।" कोमल बिछौने पर भी शम्भुराजा को चैन की नींद नहीं आ रही थी। उनका जागना, मछली की तरह तड़पना, गरम और गहरी साँसें लेना आदि येसूबाई निकट से अनुभव कर रही थीं। उन्होंने धीरे से कहा- "युवराज, राज्य के इन अधिकारियों ने भी स्वराज्य का निर्माण करने के लिए अपने जीवन को समर्पित किया है। आप स्वयं उनके साथ बात क्यों नहीं करते? आप स्वयं जाकर अण्णाजी से क्यों नहीं मिलते?'' "क्या करेंगे उनसे मिलकर? उस अभागी हंसा ने आत्महत्या की और उसका सारा दोष मुझ पर लगाया गया। उसी समय वह गोदू आयी, वह अण्णाजी के साढ़ू की लड़की निकली। यहाँ सारी परिस्थिति ने ही ऐसा विचित्र मोड़ लिया है कि समझदारी अँधेरे में अपना मुँह छुपा रही है।" पुरानी पीड़ादायक स्मृतियाँ शम्भुराजा का पीछा नहीं छोड़ रही थीं। युवराज और युवराज्ञी सारी रात जागते रहे। दूसरे दिन शम्भुराजा कुछ विलम्ब से बैठक में गये। कवि कलश पहले से ही उनकी प्रतीक्षा में वहाँ खड़े थे। उनके साथ संगमेश्वर का थानेदार भी खड़ा था। सवेरे-सवेरे देर तक दौड़कर आने के कारण वह पसीने से तर हो रहा था। वह युवराज से मिलने के लिए उपस्थित हुआ था। शम्भुराजा उससे कुछ पूछें उससे पहले वही विनम्र शब्दों में निवेदन करने लगा- "युवराज! सब कुछ गड़बड़-घोटाला हो गया है। कल रायगढ़ से एक सेना की टुकड़ी आयी। सैनिकों ने गरीब किसानों के बर्तन-भाँड़े जब्त कर लिये। दूध देने वाली गायों और भैंसों को भी सरकारी क़ब्ज़े में ले लिया।" सम्भाजी . ४१

"जप्ती! मगर किस लिए?" आश्चर्यचकित शम्भूराजा ने कवि कलश की ओर देखा। कविराज भी क्रुद्ध मुद्रा में नजरें झुकाए नीचे की ओर देख रहे थे। शम्भूराजा के मस्तिष्क में बात कौंधी। उन्होंने दाँत पीसते हुए कहा, "मैंने गरीब और मेहनती प्रजा को माफीनामा लिखकर दिया सम्भवतः इसीलिए इन बेचारे पर यह विपत्ति आयी है।" "हाँ! हाँ सरकार।" थानेदार डरते हुए बोला, "मैंने उनको बहुत समझाया, उनसे कहा कि यह निर्णय स्वयं युवराज ने लिया है और किसानों की हालत वास्तव में बहुत खराब है। मगर उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे बोले बोले " "बताओ, बताओ, कुछ भी छुपाओ नहीं, साफ साफ बोलो।" "उनका कहना है मतलब सैन टुकड़ी के साथ आया हुआ राहुजी सोमनाथ का कार्य व्यापार सँभालने वाला कह रहा था कि शम्भूराजा अभी तो गद्दी पर बैठे नहीं हैं जब बैठेंगे तब कर लेना मुजरा।" "रुक क्यों गये? बोलो बोलो !" "वे कर्मचारी कहते थे कि यहाँ महाराज के जाने के बाद युवराज का हुक्म चलाना था तो महाराज ने कर्नाटक जाते समय रायगढ़ का कार्यभाग शम्भूराजा को न दिया होता? उन्हें कंकड की तरह अलग करके शृंगारपुर के जंगलों में थोडे ही फेका होता?" थानेदार किसी प्रकार घटित घटना का विवरण देकर मुक्त हो गया। शम्भूराजा की मुख मुद्रा वेदनायुक्त और सम्भ्रमित बनी रही। किन्तु येसूबाई और कवि कलश के चेहरे उतर गये थे। युवराज के अपमान से दोनों बहुत क्रुद्ध हो गये थे। शम्भूराजा कुछ अधिक नहीं कह पाये। उन्होंने धीमी किन्तु कठोर आवाज में कवि कलश से कहा, "कविराज साथ में एक हजार सैनिक ले लो और इसी वक्त संगमेश्वर की ओर कूच करो। राहुजी सोमनाथ के कार्यभागी के साथ रायगढ़ के उन हृदयहीन गुंडों को गिरफ्तार करके यहाँ लेकर आओ और शृंगारपुर के कारागार में बन्द कर दो।" उसी दिन सूर्यास्त के पूर्व ही कवि कलश ने अपने मालिक के हुक्म की तामील कर दी। जब कविराज ने शम्भूराजा को आकर अभिवादन किया तो युवराज ने कहा "उन बदमाशों को चार दिन तक भूखे प्यासे रखो। उनको खूब पीटो।" शम्भूराजा की इस कार्यवाही से शृंगारपुर उनकी ख्याति फैल गयी। इससे पहले जावली प्रान्त के सूबेदार स्वयं अण्णाजी दत्तो ही थे। उनके कार्यकाल में वसूली करने वाले कर्मचारियों ने अनेक स्थानों पर अकारण किसानों को सताना आरम्भ कर दिया था। ऐसे लोगों को सबक सिखाने वाला कोई मिला था, इसलिए प्रभावली प्रान्त के परिश्रमी किसान बहुत प्रसन्न थे। ९० सम्भाजी

रात को शम्भुराजा ने येसूबाई से कहा, "येसू परसों बालाजी काका चिटणीम जो बताकर गये उसमें कुछ भी झूठ नहीं था। हवा का रुख बदल रहा है।" येसूबाई ने अपने सात महीने के पेट पर शम्भुराजा का हाथ रखा। वे भरे गले से बोलीं, "युवराज! हवा के इस रुख से हमें अकारण ही भय लग रहा है। इसलिए थोड़ा धीरज रखें। मसूरजी के कर्नाटक से वापस आ जाने तक कोई भी साहसी कदम न उठाइए।"

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बगावत एक रणुबाई आक्का की पालकियाँ कुछ ही दिन पहले वाई से आकर शृंगारपुर पहुँची थीं। राणुबाई को इस बात की बड़ी प्रसन्नता थी कि उनके छोटे भाई के घर झूला झूलने वाला है। शम्भुराजा को अपनी माँ का प्यार नहीं मिला था। युवराज केवल दो वर्ष के थे तभी उनकी माँ भगवान को प्यारी हो गई थीं। किन्तु संभाजी राजा पर तीनों बहनों की स्नेह छाया थी। बड़ी बहन सकवार बाई उर्फ सखूबाई फलटण के निम्बालकर से ब्याही गयी थीं। बीच वाली राणुबाई वाई के जाधव के यहाँ दी गयी थीं। सबसे छोटी अम्बिकाबाई तारला के हरजी महाडिक से ब्याही गयी थीं। तीनों बहने शम्भुराजा से बड़ी थीं। सबसे छोटी अम्बिकाबाई पर युवराज की असीम ममता थी। किन्तु शम्भुराजा पर सर्वाधिक प्राण निछावर करनेवाली थीं रणुबाई। शम्भुराजा अपने महल में जिस समय पहुँचे, बाहर घना अँधेरा घिर आया था। महल के चौक चिराग जल रहे थे। वे बीच के कमरे में आये। वहाँ पर येसूबाई ने हँसकर उनका स्वागत किया। बगल वाले मन्दिर की ओर संकेत करके वे बोलीं— "युवराज! आज अपने यहाँ कौन मेहमान आये हैं आपने देखा नहीं क्या?" शम्भुराजा ने मन्दिर की ओर देखा। एक स्त्री भगवान के सामने बैठी थी। शम्भुराजा सहजभाव से चार कदम आगे गये। उनकी आहट पाते ही उस स्त्री ने अपना चेहरा ऊपर करके उनकी ओर देखा। उसे देखते ही शम्भुराजा कुछ झेंप गये। गोदू सचमुच बहुत बदल गयी थी। उसके सुन्दर शरीर और पीठ पर लोटती काले घने बालों की नागिन जैसी चोटी में कोई अन्तर नहीं आया था। किन्तु उसका शोख बचपना खो गया था। आँखों के चारों ओर हल्का सा काला रंग चढ़ने लगा था। कोई चिन्ता उसे अन्दर से खाये जा रही थी। युवराज के कुछ कहने के पहले ही गोदू कहने लगी, "महाराज! आपने यहाँ जब से वसूली करने वाले कर्मचारियों को कैद किया है तब से वहाँ किले पर आपके विरुद्ध हर तरह के षड्यन्त्र रचे जा रहे हैं। अधिकारियों ने बहुत ऊधम मचा रखा है।" 92 सम्भाजी

“जाने दो गोदू! ये कलम बहादुर मेग क्या बिगाड़ लेंगे?” “युवराज! अण्णाजी काका की मदद मे राहूजी पन्त और अन्य लोगों ने मिलकर शिवाजी महाराज को एक विशेष सन्देश भेजा है। मरकारी वसूली और राज्य के कार्य व्यापार में बाधा डालने के लिए आपको अपराधी ठहराकर आपको कैद किया जाय। यह भी प्रस्ताव है कि यदि महाराज युवराज को गिरफ्तार करने की आज्ञा नहीं देते तो जब तक महाराज के वापस लौटने तक के लिए उन्हें युवराज पद से हटा देना चाहिए। आपके विरोध में कार्यवाही की जाएगी। युवराज, इम प्रकार के कम से कम तीन प्रम्ताव भेजे गये हैं।” इन सभी घटनाओं पर युवराज ने युवराज्ञी येसूबाई के माथ विचार विमर्श किया। चिन्तित युवराज को धैर्य बँधाती हुई येसूबाई बोलीं- “युवराज, आपके पिताजी की बुद्धिमानी औग हृदय की विशालता का ज्ञान मुझे आपसे भी ज्यादा है। वे राम्ता चलते व्यक्ति को भी न्याय देते हैं तां अपने पुत्र को न्याय मे वंचित करेंगे?” दूमरे दिन युवराज और कवि कलश शास्त्री नदी के पार के गाँवों में गये। वहाँ के किसानों ने आम के नये बगीचे लगाए थे। दोपहरी में युवराज और कवि कलश, परिश्रमी किसानों के माथ घुल मिलकर एक कुएँ के पास बैठे, किसानों के साथ चावल की गेटी, मक्खन औग हरी मिर्च खायीं। शम्भुराजा औग कवि कलश के घोड़े श्रृंगारपुर की ओर लांट रहे थे, तभी युवराज की दृष्टि नदी की सूखी धारा के बीच मे गुजरती शाही पालकी पर पड़ी। पालकी राजमहल की ही थी। येसूबाई के आदेश से कहार गोदू को लेकर मारवट गाँव की ओर जा रहे थे। पालकी को शम्भुराजा ने रोका। अन्दर बैठी गोदू तो क्या नदी की धारा को भी कुछ समझ में नहीं आया। कविराज भी अपना घोड़ा लेकर नदी के पार जाकर रुके। कहार भी थोड़ी दूर जाकर खड़े हो गये। युवराज गोदू की ओर देख रहे थे। व्यावहारिक जगत के कठोर आघात से उसका चेहरा मुरझा गया था। “गोदू तुम्हार पति और ससुर...?” महाराज, वे दोनों मेरे लिए जिन्दा नहीं हैं। उन्होंने जिम दिन स्वराज के विरुद्ध विद्रोह किया, मेरे लिए उसी दिन मर गये।” शम्भुराजा कुछ रुक रुक कर बोले, “गोदू तू एक बार फिर से विवाह क्यों नहीं कर लेती?” “विवाह करूँगी न! किन्तु सिर्फ एक ही व्यक्ति के साथ।” गोदू की आँखें चमक उठीं। गोदू ऐसे बोली थी जैसे स्वप्न में बोल रही हो। “कोई भी हो, किन्तु गोदू समय से विवाह कर ले। तेरे दिल की भाषा तेरे सम्भाजी :: 93

दिलवर की समझ में नहीं आती क्या?" "वह तो भगवान को मालूम होगा।" गोदू धीमे स्वर में बोली, "मेरी समझ में तो इतना ही आता है कि उसकी पत्नी साक्षात् माता लक्ष्मी है। उसे दुखी करने का साहस मैं नहीं कर सकती।" एक ओर तो रायगढ़ में दोषपूर्ण ढंग से शम्भूराजा के विरोध में योजनाबद्ध रूप से अफवाह फैलाई जा रही थी। इससे वे दुखी हो रहे थे। किन्तु दूसरी ओर उनका तन-मन कर्नाटक की लड़ाई की ओर लगा रहता था। प्रतिदिन विजय के समाचार उनके कानों तक आते थे। शिवाजी महाराज के स्वागत में पूरा भागानगर (हैदराबाद) रास्ते पर उतर आया था। गोलकोंडा के कुतुबशाह ने उनका खूब स्वागत किया था। कुतुबशाह के प्रमुख प्रधान की समझ में ही नहीं आ रहा था कि महाराज को कहाँ रखें कहाँ नहीं। सुदूर जिंजी के बुर्ज पर घोड़ों को चढ़ाकर मराठा सैनिकों ने हिन्दुस्तान का दक्षिणी दरवाजा अपने घोड़ों की टाप के नीचे कर लिया था। खुशी की ये खबरें सुनकर युवराज प्रसन्नचित हो जाते थे। गोदू जिस दिन वापस गयी उसी दिन येसूबाई ने शम्भूराजा से कहा, "युवराज का गुस्सा ऐसा है जैसे गरजते गरजते बरस जाने वाली लहर। वह जितने वेग से आती है उसी गति से नष्ट हो जाती है।" "नहीं, नहीं ऐसा कुछ नहीं है।" शम्भूराजा ने उत्तर दिया। ऐसा नहीं है तो रायगढ़ के जिन वसूली कर्मचारियों को आप महीने भर की यातनापूर्ण सजा देने वाले थे, उन्हें दो दिन में ही मुक्त क्यों कर दिया? उल्टे कविकलाश को हुक्म दिया कि उनके भोजन और आने-जाने की व्यवस्था करें।" इस बात पर शम्भूराजा अपनी हँसी रोक नहीं पाये। दो ही दिन में दिलेर खान के जासूस नया सन्देश लेकर, गुप्त रूप से श्रृंगारपुर में दाखिल हुए। कवि कलश ने वह सन्देश पत्र युवराज के सम्मुख प्रस्तुत किया। युवराज ने क्रुद्ध होकर कहा— "क्या पागल हो गया है, वह बुड्ढा खान?" उनकी दृष्टि तेजी से सन्देश पत्र की पंक्तियों पर दौड़ने लगी। "रुस्तम ए दख्खन संभाजी महाराज!" मेहरबानी करो। हमारे पास आ जाओ। पातशाह औरंगजेब गाजी है। उसे सह्याद्रि के साथ पूरा दख्खन देश जीतना है। गुस्ताखी माफ। हमें आपके शाही खानदानी मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं हैं। मगर फिर भी हम आपके दिल का दर्द जानते हैं। आपके पिता की सच्ची मोहब्बत सोयराबाई और राजाराम से है। दरबार के मारे कारकून आपके जैसे स्वाभिमानी मर्द को दुश्मन की निगाह से 94 सम्भाजी

देखते हैं। इसीलिए तुम्हें रियासत के एक टुकड़े का शहजादा बनकर अपमान से रहना पड़ रहा है। इससे तो अच्छा आप आलमगीर के पास जाओ। हमारी दोस्ती का हाथ थाम लो। आज नहीं तो कल आलमगीर साहब दक्खन में आएँगे ही तुम्हारी और हमारी किस्मत रोशन हो जाएगी।'' अपनी आँखों के सामने से सन्देश पत्र को हटाते हुए शम्भुराजा ने कहा— ‘‘कविराज ! दिलेर को लगे हाथ जवाब दो। उसका खत बिना जवाब के नहीं रहना चाहिए।’’ ‘‘राजन ! इसका क्या अभिप्राय है ?’’ ‘‘हमारे चुप रहने का अर्थ वह हमारी मौन सहमति न लगा ले।’’ शम्भुराजा के मुख से शब्द निकलने लगे। वहीं पर पैर मोड़कर, लिखने की मेज पर कागज रखकर कवि कलश उत्तर लिखने लगे— ‘‘खान साहेब, हमें अपना मानकर, हमारे विषय में जो चिन्ता प्रकट करते हो उसके लिए हमें अल्लाह का शुक्रगुजार होना चाहिए। हमारे राजपरिवार में गृह- भेद, दरार पड़ने की खबर आपने जो सुनी है वह सच है। मगर उससे आपको जरा भी आनन्दित होने की आवश्यकता नहीं है। यह वतन हम सभी के हाथों में सौंपकर मेरे पिताजी कितने विश्वास से दूसरे प्रदेश में चले गये है। क्या आपका कहना है कि उनके पीछे हम गद्दारी करके राज्य को अपनी झोली में डाल लेंगे ? हमारे हाथ से ऐसा कुछ घटित होने का मतलब होगा, मेरे प्यारे दिलेर भाई रावण की मदद के लिए श्रीराम का दशरथ से बगावत करना। शिवाजी महाराज जैसा पिता दैवी कृपा से मिला है उस वटवृक्ष की शीतल छाया छोड़कर तुम्हारी सोने की लंका का हमें क्या करना ?’’ खत की इबारत बोलते-बोलते संभाजी राजा की आँखें भर आयीं। उनका अपने पिता और स्वराज के प्रति प्रेम देखकर कवि कलश भी गद्गद हो गये। इसी बीच मन में कुछ सोचकर युवराज एकाएक रुके और पत्र को थैली में बाँधते हुए कवि कलश से बोले, ‘‘रुको, मुझे लगता है कि इस पत्र में कुछ और जोड़ दें।’’ ‘‘जैसी आज्ञा।’’ दोनों फिर से नीचे बैठ गये। युवराज ने पुनः बोलना आरम्भ किया— ‘‘दिलेर जी, यदि तुम्हें और तुम्हारे पातशाह को सचमुच हमारा पराक्रम बहुत पसन्द है तो हम दोनों एक हो जाएँ और दूसरा कोई देश जीतकर पातशाह को भेंट कर दें।’’ ‘‘किन्तु राजन ! जिससे हाथ नहीं मिलाना है उसमे हाथ क्यों मिलाएँ ?’’ कवि कलश आवेश में पूछने लगे। सम्भाजी . 95

शम्भूराजा का मुख उतर गया। बनावटी मुस्कान के साथ, लम्बी साँस छोड़ते हुए बोले, "कविराज ! मनुष्य की जिन्दगी में समय पूछकर नहीं आता।" दो राजमहल के अलिन्द पर येसूबाई खड़ीं थीं। वे संगमेश्वर की ओर ध्यान से देख रही थीं। उन्हें घने जंगलों के बीच एक दल तेजी से दौड़ता दिखाई दिया। येसूबाई ने पैर उठाकर और ध्यान से देखा। यह घुड़सवारों का दल था। येसूबाई ने देखा कि सामने से आ रहे घुड़सवारों के हाथ में भगवा झंडा था। येसूबाई को तत्काल बड़े महाराज का स्मरण हो आया। उनके मन की कली खिल गयी। लगभग पौने दो वर्ष बाद शिवाजी महाराज पन्हालगढ़ लौटे थे। चार ही दिन पहले उनके आने का समाचार युवराज और युवराज्ञी के कानों तक पहुँचा था। तभी से दोनों के कान पन्हालगढ़ की ओर लगे थे कि कब वहाँ से बुलावा आ जाय। पन्हाला से शृंगारपुर आये सवारों की खबर तुरन्त फैल गयी। कवि कलश तत्काल अपने आवास से दरबार में आ गये। शिवाजी महाराज का समाचार जानने के लिए मानो सारा चराचर उत्सुक हो उठा। दरबार में सरदार विश्वनाथ, कवि कलश, राणूबाई युवराज पर प्राण निछावर करने वाले अन्य साथी इकट्ठा हो गये थे। स्वास्थ्य ठीक न होने पर भी बूढ़े पिताजी शिर्के भी कपड़े ठीक ठाक करके उसी समय शम्भूराजा दरबार में आ गये थे। सभी के मन में उत्सुकता भरी थी। उसी समय शम्भूराजा दरबार में हाजिर हुए। सभी ने उनका अभिवादन किया। उनके पीछे ही येसूबाई आयीं और सामने वाले आसन पर प्रसन्न मुद्रा में बैठ गयीं। महत्त्वपूर्ण पत्र को कवि कलश ही पढ़ेंगे ऐसी दरबार की प्रथा बन गयी थी। उनकी ओर संकेत करके सम्भाजी राजा बोले, "कविराज चलो पढ़ो।" "प्रिय शंभो ! कर्नाटक अभियान में विजयी होकर हम प्रतिदिन बड़ी तेजी से दौड़े चले आ रहे थे। हम कितने उत्सुक थे कि वायु वेग से आकर हम आपको बाँहों में लेकर, गले से लगाकर मिलेंगे। किन्तु " कवि कलश भयभीत होकर वहीं रुक गये। उन्होंने लम्बी साँस ली। सुनने वालों ने अपने मन को समझाया कि 'किन्तु' शब्द का प्रयोग कवि कलश ने अपने मन से किया होगा। "किन्तु आपके आपके " कविराज भय से काँप उठा। इसी समय युवराज की धीर गम्भीर वाणी दरबार 96 • सम्भाजी

में गूँज उठी, "कलश जो भी हो पढ़कर सुनाओ।" अपने को किसी प्रकार सँभालते हुए कविराज धीमी गति से एक-एक शब्द पढ़ने लगे— "परन्तु आपके एक-एक कारनामे हमारे कानों तक आये और हम धन्य हो गये। युवराज! आप कोई बच्चे नहीं हैं, इक्कीस-बाइस वर्ष के जवाँमर्द हो चुके हैं। हमारी पीठ पीछे आपने न केवल कर डुबाने वालों को माफी दी बल्कि हमारे कर्मचारियों को बार-बार अपमानित किया। हमारे अष्टप्रधानों को आपने समझ क्या रखा है? विगत पचीस-पचीस तीस-तीस वर्षों से हमारे साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर स्वराज के हित में रात-दिन काम करने वाले, हमारे लिए प्राणों की बाजी लगाने वाले वे हमारे अभिन्न साथी हैं। उनकी आयु उनके अनुभव और उनकी सेवा का लिहाज न करके आपने सदैव ही उनका अपमान किया है और उन्हें सताया है। आप मुझसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक हैं, ऐसा मैं समझता हूँ। किन्तु इसके बाद अपना मुँह दिखाने का कष्ट न करें। पत्र को विराम देते हैं।" कवि कलश भय दुःख और आश्चर्य से मौन हो गये । उनका हाथ थरथराने लगा। दरबार में उपस्थित शम्भूराजा के सम्बन्धी हित मित्र सभी पत्थर की भाँति जड़ हो गये। कविराज ने शम्भूराजा की ओर दुखभरी दृष्टि फेरी। वे दुख की आग में जल रहे थे। फिर भी शम्भूराजा ने पत्र को आगे पढ़ने का संकेत किया। इतने में येसूबाई ने कड़े शब्दों में कहा, "रुक जाओ"। भरी सभा में लोगों के सामने अपना दुखड़ा रोने या बताने की उनकी इच्छा नहीं थी। फिर भी उनकी आँखें भर आयीं। येसूबाई ने फिर कहा, "बस! बस! कविराज । अब आगे एक भी शब्द हमसे सुना नहीं जाएगा।" "कविराज! रुक जाना ही ठीक है।" राणूबाई ने कहा। "क्यों? क्यों नहीं सुना जाएगा? ये शब्द अपने शिवप्रभु के ही हैं। कविराज रुको नहीं। क्योंकि आधा-अधूरा पत्र सुनकर लोग चले गये तो कल इससे भी अधिक अफवाहों के बुलबुले उठेंगे। उससे तो यही अच्छा है कि जो भी है वह लोगों के कानों तक जाए।" कवि कलश पत्र आगे पढ़ने लगे— "अभी भी यदि भूले बिसरे आपमें कुछ विवेक बुद्धि बची हो तो हमारा सुझाव है कि मुझसे मिलने पन्हाला आने के बदले आप सज्जनगढ़ चले जाइए। वहाँ श्री रामदास स्वामी के सत्संग में कुछ समय रहिए। कुछ सदाचार और सद्व्यवहार सीखिए। समय से पहले समझदार हो जाइए। स्वामीजी का प्रसाद लेकर जीवन भर सुखी रहिए।" यह पत्र सुनकर सारा दरबार अवाक रह गया। बिना कुछ कहे लोग धीरे-धीरे निकल गये। पिलाजी शिर्के भी बहुत दुखी मन से बाहर निकले। युवराज्ञी की ओर सम्भाजी . 97