सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा आज कि काल । मरणा मरणा क्या करै, बेगा राम सँभाल ॥ 49 ॥ दादू मरणा खूब है,निपट बुरा व्यभिचार । दादू पति को छाड़ कर, आन भजै भरतार ॥ 50 ॥ दादू तन तैं कहाँ डराइये, जे विनश जाइ पल बार । कायर हुआ न छूटिये, रे मन हो हुसियार ॥ 51 ॥ दादू मरणा खूब है, मर माहीं मिल जाइ । साहिब का संग छाड़ कर, कौन सहै दुख आइ ॥ 52 ॥ दादू माहीं मन सौं जूझ कर, ऐसा शूरा वीर । इंद्रिय अरि दल भान सब, यों कलि हुआ कबीर ॥ 53 ॥ सांई कारण शीश दे, तन मन सकल शरीर । दादू प्राणी पंच दे, यों हरि मिल्या कबीर ॥ 54 ॥ सबै कसौटी शिर सहै, सेवक सांई काज । दादू जीवन क्यों तजै, भाजे हरि को लाज ॥ 55 ॥ सांई कारण सब तजै, जन का ऐसा भाव । दादू राम न छाड़िये, भावै तन मन जाव ॥ 56 ॥ पतिव्रत निष्काम दादू सेवक सो भला, सेवै तन मन लाइ । दादू साहिब छाड़ कर, काहू संग न जाइ ॥ 57 ॥ पतिव्रता निज पीव को, सेवै दिन अरु रात । दादू पति को छाड़ कर, काहू संग न जात ॥ 58 ॥ शूरातन दादू मरबो एक जु बार, अमर झुकेड़े मारिये । तो तिरिये संसार, आतम कारज सारिये ॥ 59 ॥ दादू जे तूं प्यासा प्रेम का, तो जीवन की क्या आस । शिर के साटे पाइये, तो भर भर पीवै दास ॥ 60 ॥
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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 कायर मन मनसा जीते नहीं, पंच न जीते प्राण। दादू रिपु जीते नहीं, कहैं हम शूर सुजान ॥ 61 ॥ मन मनसा मारे नहीं, काया मारण जांहि। दादू बांबी मारिये, सर्प मरै क्यों मांहि ॥ 62 ॥ शूरातन दादू पाखर पहर कर, सब को झूझण जाइ। अंग उघाड़ै शूरवां, चोट मुँहैं मुँह खाइ ॥ 63 ॥ जब झूझै तब जाणिये, काछ खड़े क्या होइ। चोट मुँहैं मुँह खाइगा, दादू शूरा सोइ ॥ 64 ॥ शूरातन सहजैं सदा, साच सेल हथियार। साहिब के बल झूझतां, केते लिये सु मार ॥ 65 ॥ दादू जब लग जिय लागैं नहीं, प्रेम प्रीति के सेल। तब लग पिव क्यों पाइये, नहिं बाजीगर का खेल ॥ 66 ॥ दादू जे तूं प्यासा प्रेम का, तो किसको सेतैं जीव। शिर के साटै लीजिये, जे तुझ प्यारा पीव ॥ 67 ॥ दादू महा जोध मोटा बली, सो सदा हमारी भीर। सब जग रूठा क्या करै, जहाँ तहाँ रणधीर ॥ 68 ॥ दादू रहते पहते राम जन, तिन भी माँड्या झूझ। साचा मुँह मोड़ै नहीं, अर्थ इता ही बूझ ॥ 69 ॥ हरि भरोसा दादू काँधे सबल के, निर्बाहेगा और। आसन अपने ले चल्या, दादू निश्चल ठौर ॥ 70 ॥ दादू क्या बल कहा पतंग का, जलत न लागै बार। बल तो हरि बलवंत का, जीवै जिहिं आधार ॥ 71 ॥
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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
राखणहारा राम है, शिर ऊपर मेरे। दादू केते पच गये, बैरी बहुतेरे ॥ 72 ॥ शूरातन विनती दादू बल तुम्हारे बापजी, गिनत न राणा राव। मीर मलिक प्रधान पति, तुम बिन सब ही बाव ॥ 73 ॥ दादू राखी राम पर, अपणी आप संवाह। दूजा को देखूं नहीं, ज्यों जाणें त्यों निर्वाह ॥ 74 ॥ तुम बिन मेरे को नहीं, हमको राखणहार। जे तूं राखै सांइयां, तो कोइ न सकै मार ॥ 75 ॥ सब जग छाड़ै हाथ तैं, तो तुम जनि छाड़हु राम। नहिं कुछ कारज जगत सौं, तुमहीं सेती काम ॥ 76 ॥ शूरातन दादू जाते जीव तैं तो डरूं, जे जीव मेरा होइ। जिन यहु जीव उपाइया, सार करेगा सोइ ॥ 77 ॥ दादू जिन को सांई पाधरा, तिन बंका नांही कोइ। सब जग रूठा क्या करै, राखणहारा सोइ ॥ 78 ॥ दादू साचा साहिब शिर ऊपरै, तती न लागै बाव। चरण कमल की छाया रहै, किया बहुत पसाव ॥ 79 ॥ विनती दादू कहै-जे तूं राखै सांइयां, तो मार सकै ना कोइ। बाल न बांका कर सकै, जे जग बैरी होइ ॥ 80 ॥ दादू राखणहारा राखै, तिसे कौन मारै। उसे कौन डुबोवे, जिसे सांई तारै ॥ बाकी कौन बिगारै, जाकी आप सुधारै। कहै दादू सो कबहूँ न हारै, जे जन सांई संभारै ॥ 81 ॥
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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 निर्भय बैठा राम जप, कबहुँ काल न खाइ । जब दादू कुंजर चढै, तब सुनहाँ झख जाइ ॥ 82 ॥ कायर कूकर कोटि मिलि, भौंके अरु भागैं । दादू गरवा गुरुमुखी, हस्ति नहीं लागैं ॥ 83 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य चौबीसवां शूरातन कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 24 ॥ साखी 83 ॥ दादूराम सत्यराम
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काल का अंग www.dadooram.org अथ काल का अंग २५ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।। काल न सूझै कंध पर, मन चितवै बहु आश । दादू जीव जाणै नहीं, कठिन काल की पाश ॥ 2 ॥ दादू काल हमारे कंध चढ, सदा बजावै तूर । कालहरण कर्त्ता पुरुष, क्यों न सँभाले शूर ॥ 3 ॥ जहाँ जहाँ दादू पग धरै, तहाँ काल का फंध । सर ऊपर सांधे खड़ा, अजहुँ न चेते अंध ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 दादू काल गिरासन का कहै, काल रहित कह सोइ। काल रहित सुमिरण सदा, बिना गिरासन होइ ॥ 5 ॥ दादू मरिये राम बिन, जीजे राम सँभाल। अमृत पीवै आत्मा, यों साधू बंचै काल ॥ 6 ॥ दादू यहु घट काचा जल भरा, बिनशत्त नाहीं बार। यहु घट फूटा जल गया, समझत नहीं गँवार ॥ 7 ॥ फूटी काया जाजरी, नव ठाहर काणी। तामें दादू क्यों रहै, जीव सरीषा पाणी ॥ 8 ॥ बाव भरी इस खाल का, झूठा गर्व गुमान। दादू विनशै देखतां, तिसका क्या अभिमान ॥ 9 ॥ दादू हम तो मूये मांहि हैं, जीवण का रू भरम। झूठे का क्या गर्वबा, पाया मुझे मरम ॥ 10 ॥ यहु वन हरिया देखकर, फूल्यो फिरै गँवार। दादू यहु मन मृगला, काल अहेड़ी लार ॥ 11 ॥ सब ही दीसैं काल मुख, आपा गह कर दीन्ह। विनशै घट आकार का, दादू जे कुछ कीन्ह ॥ 12 ॥ काल कीट तन काठ को, जरा जन्म को खाइ। दादू दिन दिन जीव की, आयु घटंती जाइ ॥ 13 ॥ काल गिरासे जीव को, पल पल श्वासैं श्वास। पग पग मांहि दिन घड़ी, दादू लखै न तास ॥ 14 ॥ पाव पलक की सुधि नहीं, श्वास शब्द क्या होइ। कर मुख मांहि मेलतां, दादू लखै न कोइ ॥ 15 ॥ दादू काया कारवीं, देखत ही चल जाइ। जब लग श्वास शरीर में, राम नाम ल्यौ लाइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 दादू काया कारवीं, मोहि भरोसा नांहि। आसन कुंजर शिर छत्र, विनश जाहिं क्षण मांहि ॥ 17 ॥ दादू काया कारवीं, पड़त न लागै बार। बोलणहारा महल में, सो भी चालणहार ॥ 18 ॥ दादू काया कारवीं, कदे न चालै संग। कोटि वर्ष जे जीवना, तऊ होइला भंग ॥ 19 ॥ कहतां, सुनतां, देखतां, लेतां, देतां प्राण। दादू सो कतहूँ गया, माटी धरी मसाण ॥ 20 ॥ सींगी नाद न बाजहि, कत गये सो जोगी। दादू रहते मढी में, करते रस भोगी ॥ 21 ॥ दादू जियरा जायगा, यहु तन माटी होइ। जे उपज्या सो विनश है, अमर नहीं कलि कोइ ॥ 22 ॥ दादू देही देखतां, सब किसही की जाइ। जब लग श्वास शरीर में, गोविन्द के गुण गाइ ॥ 23 ॥ दादू देही पाहुणी, हंस बटाऊ मांहि। का जाणूं कब चालसी, मोहि भरोसा नांहि ॥ 24 ॥ दादू सबको पाहुणा, दिवस चार संसार। औसर औसर सब चले, हम भी इहै विचार ॥ 25 ॥ भयमय पंथ बिख्रमता सबको बैठे पंथ सिर, रहे बटाऊ होइ। जे आये ते जाहिंगे, इस मारग सब कोइ ॥ 26 ॥ बेग बटाऊ पंथ सिर, अब विलम्ब न कीजे। दादू बैठा क्या करे, राम जप लीजे ॥ 27 ॥ संझ्या चलै उतावला, बटाऊ वन-खंड मांहि। बरियाँ नांहीं ढील की, दादू बेगि घर जांहि ॥ 28 ॥
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३. साखी भाग (उत्तरार्ध): समर्थ, उपदेश, चेतावनी, बेली व उपसंहार अंग
श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 दादू करह पलाण कर, को चेतन चढ जाइ। मिल साहिब दिन देखतां, सांझ पड़े जनि आइ ॥ 29 ॥ पंथ दुहेला दूर घर, संग न साथी कोइ। उस मारग हम जाहिंगे, दादू क्यों सुख सोइ ॥ 30 ॥ लंघण1 के लकु2 घणा, कपर3 चाट4 डीन्ह। अलह पांधी5 पंथ6 में, बिहंदा7 आहीन8 ॥ 31 ॥ काल चितावणी दादू हसतां रोतां पाहुणा, काहू छाड़ न जाइ। काल खड़ा सिर ऊपरै, आवणहारा आइ ॥ 32 ॥ दादू जोरा बैरी काल है, सो जीव न जानै। सब जग सूता नींदड़ी, इस तानै बानै ॥ 33 ॥ दादू करणी काल की, सब जग परलै होइ। राम विमुख सब मर गये, चेत न देखै कोइ ॥ 34 ॥ साहिब को सुमिरै नहीं, बहुत उठावै भार। दादू करणी काल की, सब परलै संसार ॥ 35 ॥ सूता काल जगाइ कर, सब पैसैं मुख मांहि। दादू अचरज देखिया, कोई चेतै नांहि ॥ 36 ॥ सब जीव बिसाहैं काल को, कर कर क ोटि उपाइ। साहिब को समझैं नहीं, यों परलै ह्वै जाइ ॥ 37 ॥ दादू कारण काल के, सकल संवारैं आप। मीच बिसाहैं मरण को, दादू शोक संताप ॥ 38 ॥ दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ। जीव बिसाहै काल को, मूढा मर मर जाइ ॥ 39 ॥ निर्मल नाम विसार कर, दादू जीव जंजाल। नहीं तहाँ तैं कर लिया, मनसा मांहीं काल ॥ 40 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 सब जग छेली, काल कसाई, कर्द लिये कंठ काटै । पंच तत्त्व की पंच पंसुरी, खंड-खंड कर बांटै ॥ 41 ॥ काल झाल में जग जलै, भाज न निकसै कोइ । दादू शरणैं साच के, अभय अमर पद होइ ॥ 42 ॥ सब जग सूता नींद भर, जागै नाहीं कोइ । आगे पीछे देखिये, प्रत्यक्ष परलै होइ ॥ 43 ॥ आसक्ति मोह ये सज्जन दुर्जन भये, अंत काल की बार । दादू इनमें को नहीं, विपति बटावनहार ॥ 44 ॥ संगी सज्जन आपणां, साथी सिरजनहार । दादू दूजा को नहीं, इहि कलि इहि संसार ॥ 45 ॥ काल चितावणी ये दिन बीते चल गये, वे दिन आये धाइ । राम नाम बिन जीव को, काल गरासै जाइ ॥ 46 ॥ जे उपज्या सो विनश है, जे दीसै सो जाइ । दादू निर्गुण राम जप, निश्चल चित्त लगाइ ॥ 47 ॥ जे उपज्या सो विनश है, कोई थिर न रहाइ । दादू बारी आपणी, जे दीसै सो जाइ ॥ 48 ॥ दादू सब जग मर मर जात है, अमर उपावणहार । रहता रमता राम है, बहता सब संसार ॥ 49 ॥ संजीवन दादू कोई थिर नहीं, यहु सब आवै जाइ । अमर पुरुष आपै रहै, कै साधु लयौ लाइ ॥ 50 ॥ काल चितावणी यहु जग जाता देखकर, दादू करी पुकार । घड़ी महूरत चालनां, राखै सिरजनहार ॥ 51 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 दादू विषै सुख मांहि खेलतां, काल पहुँचा आइ। उपजै विनशै देखतां, यहु जग यों ही जाइ ॥ 52 ॥ राम नाम बिन जीव जे, केते मुये अकाल। मीच बिना जे मरत हैं, तातैं दादू साल ॥ 53 ॥ कठोरता सर्प सिंह हस्ती घणा, राक्षस भूत प्रेत। तिस वन में दादू पड़या, चेतै नहीं अचेत ॥ 54 ॥ पूत पिता थैं बीछुट्या, भूलि पड़या किस ठौर। मरै नहिं उर फाट कर, दादू बड़ा कठोर ॥ 55 ॥ काल चेतावनी जे दिन जाइ सो बहुरि न आवै, आयु घटै तन छीजै। अंतकाल दिन आइ पहुंता, दादू ढील न कीजै ॥ 56 ॥ दादू अवसर चल गया, बरियाँ गई बिहाइ। कर छिटके कहँ पाइये, जन्म अमोलक जाइ ॥ 57 ॥ दादू गाफिल है रह्या, गहिला हुवा गँवार। सो दिन चित्त न आवई, सोवै पांव पसार ॥ 58 ॥ दादू काल हमारा कर गहै, दिन दिन खैंचत जाइ। अजहुं जीव जागै नहीं, सोवत गई बिहाइ ॥ 59 ॥ सूता आवै सूता जाइ, सूता खेले सूता खाइ। सूता लेवै सूता देवै, दादू सूता जाइ ॥ 60 ॥ दादू देखत ही भया, श्याम वर्ण तैं सेत। तन मन यौवन सब गया, अजहुँ न हरि सौं हेत ॥ 61 ॥ दादू झूठे के घर देख कर, झूठे पूछे जाइ। झूठे झूठा बोलते, रहे मसाणों आइ ॥ 62 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 दादू प्राण पयाना कर गया, माटी धरी मसाण । जालणहारे देखकर, चेतैं नहीं अजाण ॥ 63 ॥ दादू केई जाले केई जालिये, केई जालण जांहि । केई जालन की करैं, दादू जीवन नांहि ॥ 64 ॥ केई गाड़े केई गाड़िये, केई गाडण जांहि । केई गाड़ण की करैं, दादू जीवन नांहिं ॥ 65 ॥ दादू कहै-उठ रे प्राणी जाग जीव, अपना सजन संभाल । गाफिल नींद न कीजिये, आइ पहुंचा काल ॥ 66 ॥ समर्थ का शरणा तजै, गहै आन की औट । दादू बलवंत काल की, क्यों कर बंचै चोट ॥ 67 ॥ सजीव अविनाशी के आसरे, अजरावर की ओट । दादू शरणैं सांच के, कदे न लागै चोट ॥ 68 ॥ काल चेतावनी मूसा भागा मरण तैं, जहाँ जाइ तहाँ गोर । दादू स्वर्ग पयाल में, कठिन काल का शोर ॥ 69 ॥ सब मुख मांही काल के, मांड्या माया जाल । दादू गोर मसाण में, झंखे स्वर्ग पयाल ॥ 70 ॥ दादू मड़ा मसाण का, केता करै डफान । मृतक मुर्दा गोर का, बहुत करै अभिमान ॥ 71 ॥ राजा राणा राव मैं, मैं खानों सिर खान । माया मोह पसारै एता, सब धरती आसमान ॥ 72 ॥ पंच तत्त्व का पूतला, यहु पिंड सँवारा । मंदिर माटी मांस का, बिनशत नहिं बारा ॥ 73 ॥ हाड़ चाम का पिंजरा, बिच बोलणहारा । दादू तामें पैस कर, बहुत किया पसारा ॥ 74 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 बहुत पसारा कर गया, कुछ हाथ न आया। दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछताया ॥ 75 ॥ माणस जल का बुदबुदा, पानी का पोटा। दादू काया कोट में, मैं वासी मोटा ॥ 76 ॥ बाहर गढ निर्भय करै, जीबे के तांहीं। दादू मांहीं काल है, सो जाणै नांहीं ॥ 77 ॥ चित्त कपटी दादू साचे मत साहिब मिलै, कपट मिलेगा काल। साचे परम पद पाइये, कपट काया में साल ॥ 78 ॥ काल चितावणी मन ही मांही मीच है, सारों के शिर साल। जे कुछ व्यापै राम बिन, दादू सोई काल ॥ 79 ॥ दादू जेती लहर विकार की, काल कँवल में सोइ। प्रेम लहर सो पीव की, भिन्न-भिन्न यों होइ ॥ 80 ॥ दादू काल रूप मांही बसै, कोई न जानै ताहि। यह कूड़ी करणी काल है, सब काहू को खाइ ॥ 81 ॥ दादू विष अमृत घट में बसैं, दोन्यों एकै ठाँव। माया विषय विकार सब, अमृत हरि का नाँव ॥ 82 ॥ दादू कहाँ मुहम्मद मीर था, सब नबियों सिरताज। सो भी मर माटी हुवा, अमर अलह का राज ॥ 83 ॥ केते मर मांटी भये, बहुत बड़े बलवन्त। दादू केते ह्वै गये, दाना देव अनन्त ॥ 84 ॥ दादू धरती करते एक डग, दरिया करते फाल। हाकों पर्वत फाड़ते, सो भी खाये काल ॥ 85 ॥ दादू सब जग कंपै काल तैं, ब्रह्मा विष्णु महेश। सुर नर मुनिजन लोक सब, स्वर्ग रसातल शेष ॥ 86 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25 चंद, सूर, धर, पवन, जल, ब्रह्मांड खंड प्रवेश। सो काल डरै करतार तैं, जै जै तुम आदेश ॥ 87 ॥ पवना, पानी, धरती, अंबर, विनशै रवि, शशि, तारा। पंत तत्त्व सब माया विनशै, मानुष कहा विचारा ॥ 88 ॥ दादू विनशैं तेज के, माटी के किस मांहि। अमर उपावणहार है, दूजा कोई नांहि ॥ 89 ॥ प्राण पवन ज्यों पतला, काया करैं कमाइ। दादू सब संसार में, क्यों हि गह्या न जाइ ॥ 90 ॥ नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यों होइ। दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥ 91 ॥ स्वकीयमित्र शत्रुता मन ही मांही ह्वै मरै, जीवै मन ही मांहि। साहिब साक्षीभूत है, दादू दूषण नांहि ॥ 92 ॥ आपै मारै आपको, आप आप को खाइ। आपै अपना काल है, दादू कहि समझाइ ॥ 93 ॥ आपै मारै आपको, यहु जीव विचारा। साहिब राखणहारा है, सो हितू हमारा ॥ 94 ॥ अग्नि रूप पुरुष इक कहहिं, संगति देह सहज ही दहहिं। दीसे माणस प्रत्यक्ष काल, ज्यों कर त्यों कर दादू टाल ॥ 95 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य पच्चीसवां कलि का अंग सम्पूर्ण ।। अंग 25 ।। साखी 95 ।।
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सजीवन का अंग www.dadooram.org अथ सजीवन का अंग २६ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥ दादू जे तूं जोगी गुरुमुखी, तो लेना तत्त्व विचार । गह आयुध गुरु ज्ञान का, काल पुरुष को मार ॥ 2 ॥ नाद बिंदु सौं घट भरै, सो जोगी जीवै । दादू काहे को मरै, राम रस पीवै ॥ 3 ॥ साधु जन की वासना, शब्द रहै संसार । दादू आतम ले मिलै, अमर उपावनहार ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26 राम सरीखे ह्वै रहें, यहु नांही उनहार । दादू साधू अमर हैं, विनशै सब संसार ॥ 5 ॥ जे कोई सेवे राम को, तो राम सरीखा होइ । दादू नाम कबीर ज्यों, साखी बोलै सोइ ॥ 6 ॥ अर्थ न आया सो गया, आया सो क्यों जाइ । दादू तन मन जीवतां, आपा ठौर लगाइ ॥ 7 ॥ जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव । उलट समाने आप में, अन्तर नांही पीव ॥ 8 ॥ दया विनती दादू कहै-सब रंग तेरे तैं रंगे, तूं ही सब रंग मांहि । सब रंग तेरे तैं किये, दूजा कोई नांहि ॥ 9 ॥ सजीवन काटै फन्द तो छूटै द्वन्द, छूटै द्वन्द तौ लागै बंद । लागै बन्द तो अमर कंद, अमर कंद दादू आनन्द ॥ 10 ॥ प्रश्न कहँ जम जोरा भंजिये, कहाँ काल कौ दंड । कहाँ मीच को मारिये, कहाँ जरा सत खंड ॥ 11 ॥ अमर ठौर अविनाशी आसन, तहाँ निरंजन लाग रहे । दादू जोगी जुग जुग जीवै, काल ब्याल सब सहज गये ॥ 12 ॥ रोम रोम लै लाइ धुनि, ऐसे सदा अखंड । दादू अविनाशी मिले, तो जम को दीजे दंड ॥ 13 ॥ दादू जरा काल जामण मरण, जहाँ जहाँ जीव जाइ । भक्ति परायण लीन मन, ताको काल न खाइ ॥ 14 ॥ मरणा भागा मरण तैं, दुःखैं नाठा दुःख । दादू भय सौं भय गया, सुःखैं छूटा सुःख ॥ 15 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26 जीवन मरण जीवित मिले सो जीवते, मूये मिल मर जाइ । दादू दोन्यों देखकर, जहाँ जानैं तहँ लाइ ॥ 16 ॥ सजीवन दादू साधन सब किया, जब उनमन लागा मन । दादू सुस्थिर आत्मा, यों जुग जुग जीवैं जन ॥ 17 ॥ रहते सेती लाग रहु, तो अजरावर होइ । दादू देख विचार कर, जुदा न जीवै कोइ ॥ 18 ॥ जेती करणी काल की, तेती परिहर प्राण । दादू आतमराम सौं, जे तूं खरा सुजाण ॥ 19 ॥ विष अमृत घट में बसै, विरला जानै कोइ । जिन विष खाया ते मुये, अमर अमी सौं होइ ॥ 20 ॥ दादू सब ही मर रहे, जीवै नांही कोइ । सोई कहिये जीवता, जे कलि अजरावर होइ ॥ 21 ॥ देह रहै संसार में, जीव राम के पास । दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥ 22 ॥ काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि । दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥ 23 ॥ दादू तज संसार सब, रहे निराला होइ । अविनाशी के आसरे, काल न लागे कोइ ॥ 24 ॥ जागहु लागहु राम सौं, रैन बिहानी जाइ । सुमिर सनेही आपणा, दादू काल न खाइ ॥ 25 ॥ दादू जागहु लागहु राम सौं, छाड़हु विषय विकार । जीवहु पीवहु राम रस, आतम साधन सार ॥ 26 ॥ मरै तो पावै पीव को, जीवत बंचै काल । दादू निर्भय नाम ले, दोनों हाथ दयाल ॥ 27 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26 दादू मरणे को चला, सजीवन के साथ । दादू लाहा मूल सौं, दोनों आये हाथ ॥ 28 ॥ करुणा दादू जाता देखिये, लाहा मूल गँवाइ । साहिब की गति अगम है, सो कुछ लखी न जाइ ॥ 29 ॥ सजीवन साहिब मिलै तो जीविये, नहीं तो जीवै नांहि । भावै अनंत उपाय कर, दादू मूवों मांहि ॥ 30 ॥ सजीविन साधै नहीं, तातैं मर मर जाइ । दादू पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 31 ॥ दिन दिन लहुड़े होंहि सब, कहैं मोटा होता जाइ । दादू दिन दिन ते बढ़ें, जे रहैं राम ल्यौ लाइ ॥ 32 ॥ न जाणूं हाँजी, चुप गह, मेट अग्नि की झाल । सदा सजीवन सुमिरिये, दादू बंचै काल ॥ 33 ॥ जीवन मुक्ति दादू जीवित छूटै देह गुण, जीवित मुक्ता होइ । जीवित काटै कर्म सब, मुक्ति कहावै सोइ ॥ 34 ॥ दादू जीवित ही दुस्तर तिरे, जीवित लंघे पार । जीवित पाया जगद्गुरु, दादू ज्ञान विचार ॥ 35 ॥ जीवित जगपति को मिलै, जीवित आत्मराम । जीवित दर्शन देखिये, दादू मन विश्राम ॥ 36 ॥ जीवित पाया प्रेम रस, जीवित पिया अघाइ । जीवित पाया स्वाद सुख, दादू रहे समाइ ॥ 37 ॥ जीवित भागे भ्रम सब, छूटे कर्म अनेक। जीवित मुक्त सद्गति भये, दादू दर्शन एक ॥ 38 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26 जीवित मेला ना भया, जीवित परस न होइ। जीवित जगपति ना मिले, दादू बूड़े सोइ ॥ 39 ॥ जीवित दुस्तर ना तिरे, जीवित न लंघे पार। जीवित निर्भय ना भये, दादू ते संसार ॥ 40 ॥ जीवित प्रकट ना भया, जीवित परिचय नांहि। जीवित न पाया पीव को, बूड़े भवजल मांहि ॥ 41 ॥ जीवित पद पाया नहीं, जीवित मिले न जाइ। जीवित जे छूटे नहीं, दादू गये विलाइ ॥ 42 ॥ दादू छूटे जीवतां, मूवाँ छूटे नांहि। मूवाँ पीछे छूटिये, तो सब आये उस मांहि ॥ 43 ॥ मूवाँ पीछे मुक्ति बतावैं, मूवाँ पीछे मेला। मूवाँ पीछे अमर अभय पद, दादू भूले गहिला ॥ 44 ॥ मूवाँ पीछे वैकुंठ वासा, मूवाँ स्वर्ग पठावैं। मूवाँ पीछे मुक्ति बतावैं, दादू जग बोरावैं ॥ 45 ॥ मूवाँ पीछे पद पहुँचावैं, मूवाँ पीछे तारैं। मूवाँ पीछे सद्गति होवै, दादू जीवित मारैं ॥ 46 ॥ मूवाँ पीछे भक्ति बतावैं, मूवाँ पीछे सेवा। मूवाँ पीछे संयम राखैं, दादू दोजख देवा ॥ 47 ॥ सजीवन दादू धरती क्या साधन किया, अंबर कौन अभ्यास ? रवि शशि किस आरंभ तैं ? अमर भये निज दास ॥ 48 ॥ साहिब मारे ते मुये, कोई जीवै नांहि। साहिब राखे ते रहे, दादू निज घर मांहि ॥ 49 ॥ जे जन राखे राम जी, अपने अंग लगाइ। दादू कुछ व्यापै नहीं, जे कोटि काल झख जाइ ॥ 50 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26 इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरू-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य छब्बीसवां सजीवन का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 26 ॥ साखी 50 ॥
दादूराम सत्यराम
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पारिख का अंग www.dadooram.org अथ पारिख का अंग २७ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ साधुत्व परीक्षा दादू मन चित आतम देखिये, लागा है किस ठौर? जहँ लागा तैसा जाणिये, का देखै दादू और ॥ 2 ॥ दादू साधु परखिये, अन्तर आतम देख । मन मांहि माया रहै, कै आपै आप अलेख ॥ 3 ॥ दादू मन की देख कर, पीछे धरिये नांव । अन्तरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥ 4 ॥
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