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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

समर्थ का अंग अथ समर्थता का अंग २१ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ दादू कर्त्ता करै तो निमष मैं, कीड़ी कुंजर होइ । कुंजर तैं कीड़ी करै, मेट सकै नहिं कोइ ॥ 2 ॥ दादू कर्त्ता करै तो निमष में, राई मेरु समान । मेरु को राई करै, तो को मेटै फरमान ॥ 3 ॥ दादू कर्त्ता करै तो निमष में, जल मांही थल थाप । थल मांही जलहर करै, ऐसा समर्थ आप ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21 दादू कर्त्ता करै तो निमष में, ठाली भरै भंडार। भरिया गह ठाली करै, ऐसा सिरजनहार ॥ 5 ॥ दादू धरती को अम्बर करै, अम्बर धरती होइ। निशि अँधियारी दिन करै, दिन को रजनी सोइ ॥ 6 ॥ मृतक काढ मसाण तैं, कहु कौन चलावै। अविगत गति नहिं जाणिये, जग आन दिखावै ॥ 7 ॥ दादू गुप्त गुण परगट करै, परगट गुप्त समाइ। पलक मांहि भानै घड़ै, ताकी लखी न जाइ ॥ 8 ॥ पोषपाल रक्षक दादू सोई सही साबित हुआ, जा मस्तक कर देइ। गरीब निवाजे देखतां, हरि अपना कर लेइ ॥ 9 ॥ सूक्ष्म मार्ग दादू सब ही मारग सांइयाँ, आगै एक मुकाम। सोई सन्मुख कर लिया, जाही सेती काम ॥ 10 ॥ पोष प्रतिपाल रक्षक मीरां मुझ सौं महर कर, सिर पर दीया हाथ। दादू कलियुग क्या करै, सांई मेरा साथ ॥ 11 ॥ ईश्वर समर्थाई दादू समर्थ सब विधि सांइयाँ, ताकी मैं बलि जाऊँ। अंतर एक जु सो बसै, औरां चित्त न लाऊँ ॥ 12 ॥ सूक्ष्म मार्ग दादू मार्ग महर का, सुखी सहज सौं जाइ। भवसागर तैं काढ कर, अपणे लिये बुलाइ ॥ 13 ॥ ईश्वर समर्थाई दादू जे हम चिन्तवैं, सो कछु न होवै आइ। सोई कर्त्ता सत्य है, कुछ औरै कर जाइ ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21

एकौं लेइ बुलाइ कर, एकौं देइ पठाइ। दादू अद्भुत साहिबी, क्यों ही लखी न जाइ ॥ 15 ॥ ज्यों राखै त्यों रहेंगे, अपने बल नांही। सबै तुम्हारे हाथ है, भाज कत जांही ॥ 16 ॥ दादू डोरी हरि के हाथ है, गल मांही मेरे। बाजीगर का बांदरा, भावै तहाँ फेरे ॥ 17 ॥ ज्यों राखै त्यों रहेंगे, मेरा क्या सारा। हुक्मी सेवक राम का, बन्दा बेचारा ॥ 18 ॥ साहिब राखै तो रहे, काया मांही जीव। हुक्मी बन्दा उठ चले, जब ही बुलावे पीव ॥ 19 ॥ पति पहचान खंड खंड प्रकाश है, जहाँ तहाँ भरपूर। दादू कर्त्ता कर रह्या, अनहद बाजै तूर ॥ 20 ॥ ईश्वर समर्थाई दादू दादू कहत हैं, आपै सब घट मांहि। अपनी रुचि आपै कहैं, दादू तैं कुछ नांहि ॥ 21 ॥ दादू हम तैं हुआ न होइगा, ना हम करणे जोग। ज्यों हरि भावै त्यों करै, दादू कहैं सब लोग ॥ 22 ॥ दादू दूजा क्यों कहै, सिर पर साहिब एक। सो हम कौं क्यों बीसरै, जे जुग जाहिं अनेक ॥ 23 ॥ समर्थ साक्षीभूत आप अकेला सब करै, औरों के सिर देइ। दादू शोभा दास को, अपना नाम न लेइ ॥ 24 ॥ आप अकेला सब करै, घट में लहरि उठाइ। दादू सिर दे जीव के, यों न्यारा ह्वै जाइ ॥ 25 ॥

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श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21 ईश्वर समर्थता ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी। जेती बाबा तैं कही, इन इक न मानी ॥ 26 ॥ दादू परचा माँगें लोग सब, कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ। समर्थ मेरा सांइयाँ, ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥ 27 ॥ दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ। ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥ 28 ॥ समर्थ साक्षीभूत समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ। घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥ 29 ॥ रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ। आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥ 30 ॥ कर्त्ता साक्षीभूत श्रम नहीं सब कुछ करै, यौं कल धरी बनाइ। कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥ 31 ॥ लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापै कोइ। दादू निश्चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥ 32 ॥ बिन गुण व्यापै सब किया, समर्थ आपै आप। निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥ 33 ॥ ईश्वर समर्थाई समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि। सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 34 ॥ पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ। हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 35 ॥ यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार। पंचों का रस नाद है, दादू बोलणहार ॥ 36 ॥

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श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21 पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ। सांई मेरे सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 37 ॥ है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ। हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 38 ॥ नहीं तहाँ तैं सब किया, आपै आप उपाइ। निज तत न्यारा ना किया, दूजा आवै जाइ ॥ 39 ॥ नहीं तहाँ तैं सब किया, फिर नांहीं ह्वै जाइ। दादू नांहीं होइ रहु, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 40 ॥ दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ। लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥ 41 ॥ देबे की सब भूख है, लेबे की कुछ नांहि। सांई मेरे सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 42 ॥ कस्तूत कर्म दादू जे साहिब सिरजै नहीं, तो आपै क्यों कर होइ। जे आप ही ऊपजै, तो मर कर जीवै कोइ ॥ 43 ॥ कर्म फिरावै जीव को, कर्मों को करतार। करतार को कोई नहीं, दादू फेरनहार ॥ 44 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य इक्कीसवां समर्थता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 21 ॥ साखी 44 ॥

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अथ शब्द का अंग २२ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ आत्म बोधक गुरु उपदेश शब्द की महिमा दादू शब्दैं बँध्या सब रहै, शब्दैं ही सब जाइ । शब्दैं ही सब ऊपजै, शब्दैं सबै समाइ ॥ 2 ॥ दादू शब्दैं ही सचु पाइये, शब्दैं ही संतोंख । शब्दैं ही सुस्थिर भया, शब्दैं भागा शोक ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22 दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान । शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥ 4 ॥ दादू शब्दैं ही मुक्ता भया, शब्दैं समझे प्राण । शब्दैं ही सूझे सबै, शब्दैं सुरझे जाण ॥ 5 ॥ सृष्टि क्रम दादू ओंकार तैं ऊपजै, अरस परस संजोग । अंकुर बीज द्वै पाप पुण्य, इहि विधि जोग रु भोग ॥ 6 ॥ ओंकार तैं ऊपजै, विनशै बहुत विकार । भाव भक्ति लै थिर रहै, दादू आतम सार ॥ 7 ॥ पहली किया आप तैं, उत्पत्ति ओंकार । ओंकार तैं ऊपजै, पंच तत्त्व आकार ॥ 8 ॥ पंच तत्त्व तैं घट भया, बहु विधि सब विस्तार । दादू घट तैं ऊपजै, मैं तैं वर्ण विकार ॥ 9 ॥ एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समर्थ सोइ । आगे पीछे तो करै, जे बलहीना होइ ॥ 10 ॥ निरंजन निराकार है, ओंकार आकार । दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥ 11 ॥ आदि शब्द ओंकार है, बोलै सब घट माँहि । दादू माया विस्तरी, परम तत्त यहु नांहि ॥ 12 ॥ ईश्वर समर्थाई पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ । हिक मत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 13 ॥ यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार । पंचों का रस नाद है, दादू बोलनहार ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22 पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ । सांई मेरे सब किया, बूझै विरला कोइ ॥ 15 ॥ दादू एक शब्द सौं ऊनवै, वर्षन लागै आइ । एक शब्द सौं बीखरै, आप आपको जाइ ॥ 16 ॥ दादू साधु शब्द सौं मिल रहै, मन राखै बिलमाइ । साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 17 ॥ दादू शब्द जरै सो मिल रहै, एक रस पूरा । कायर भाजै जीव ले, पग मांडै शूरा ॥ 18 ॥ शब्द विचारै करणी करै, राम नाम निज हिरदै धरै । काया मांहीं शोधै सार, दादू कहै लहै सो पार ॥ 19 ॥ दादू काहे कौड़ी खर्चिये, जे पैके सीझै काम । शब्दों कारज सिध भया, तो सुरम न दीजै राम ॥ 20 ॥ दादू राम हृदय रस भेलि कर, को साधु शब्द सुनाइ । जानो कर दीपक दिया, भ्रम तिमिर सब जाइ ॥ 21 ॥ दादू वाणी प्रेम की, कमल विकासै होहि । साधु शब्द माता कहैं, तिन शब्दों मोह्या मोहि ॥ 22 ॥ दादू हरि भुरकी वाणी साधु की, सो परियो मेरे शीश । छूटे माया मोह तैं, प्रेम भजन जगदीश ॥ 23 ॥ दादू भुरकी राम है, शब्द कहैं गुरु ज्ञान । तिन शब्दों मन मोहिया, उनमन लागा ध्यान ॥ 24 ॥ दादू वाणी ब्रह्म की, अनभै घट प्रकाश । राम अकेला रह गया, शब्द निरंजन पास ॥ 25 ॥ शब्दों माहिं राम धन, जे कोई लेइ विचार । दादू इस संसार में, कबहुं न आवे हार ॥ 26 ॥

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श्री दादूवाणी-शब्द का अंग 22

दादू राम रसायन भर धन्या, साधुन शब्द मंझार । कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥ 27 ॥ शब्द सरोवर सुभर भव्या, हरि जल निर्मल नीर । दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अख्रिल शरीर ॥ 28 ॥ शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया । आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥ 29 ॥ गुरुमुख कसौटी कारज को सीझै नहीं, मीठा बोलै बीर । दादू साचे शब्द बिन, कटै न तन की पीर ॥ 30 ॥ शब्द दादू गुण तजि निर्गुण बोलिये, तेता बोल अबोल । गुण गहि आपा बोलिये, तेता कहिये बोल ॥ 31 ॥ साचा शब्द कबीर का, मीठा लागै मोहि । दादू सुनतां परम सुख, केता आनन्द होहि ॥ 32 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य बाईसवां शब्द काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 22 ॥ साखी 32 ॥

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जीवत मृतक का अंग www.dadooram.org अथ जीवित मृतक का अंग २३ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥ धरती मत आकाश का, चंद सूर का लेइ । दादू पानी पवन का, राम नाम कहि देइ ॥ 2 ॥ दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार। सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥ 3 ॥ जीवित माटी मिल रहै, सांई सन्मुख होइ। दादू पहली मर रहै, पीछे तो सब कोइ ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 दीनता-गरीबी दादू आपा गर्ब गुमान तज, मत मत्सर अहंकार । गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥ 5 ॥ मद मत्सर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान । सपनै ही समझै नहीं, दादू क्या अभिमान ॥ 6 ॥ झूठा गर्व गुमान तज, तज आपा अभिमान । दादू दीन गरीब है, पाया पद निर्वाण ॥ 7 ॥ जीवित मृतक यही निशानी, दुर्बल देही निर्मल वाणी । दादू भाव भक्ति दीनता अंग, प्रेम प्रीति सदा तिहिं संग ॥ 8 ॥ तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार । यों दादू जीवित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 9 ॥ दादू राव रंक सब मरेंगे, जीवै नाहीं कोइ । सोई कहिये जीवता, जे मरजीवा होइ ॥ 10 ॥ दादू मेरा वैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोइ । मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होइ ॥ 11 ॥ वैरी मारे मरि गये, चित तैं बिसरे नाहिं । दादू अजहूँ साल है, समझ देख मन मांहि ॥ 12 ॥ उभै असमाव दादू तो तूं पावै पीव को, जे जीवित मृतक होइ । आप गँवाये पीव मिलै, जानत हैं सब कोइ ॥ 13 ॥ दादू तो तूं पावै पीव का, आपा कुछ न जान । आपा जिस तैं ऊपजै, सोई सहज पिछान ॥ 14 ॥ दादू तो तूं पावै पीव को, मैं मेरा सब खोइ । मैं मेरा सहजैं गया, तब निर्मल दर्शन होइ ॥ 15 ॥ मैं ही मेरे पोट सिर, मरिये ताके भार । दादू गुरु प्रसाद सौं, सिर तैं धरी उतार ॥ 16 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 मेरे आगे मैं खड़ा, ता तैं रह्या लुकाइ । दादू प्रकट पीव है, जे यहु आपा जाइ ॥ 17 ॥ सूक्ष्म-मार्ग दादू जीवित मृतक होइ कर, मारग मांही आव । पहली शीश उतार कर, पीछे धरिये पांव ॥ 18 ॥ दादू मारग साधु का, खरा दुहेला जान । जीवित मृतक ह्वै चलै, राम नाम नीशान ॥ 19 ॥ दादू मारग कठिन है, जीवित चलै न कोइ । सोई चलि है बापुरा, जो जीवित मृतक होइ ॥ 20 ॥ मृतक होवै सो चलै, निरंजन की बाट। दादू पावै पीव को, लंघै औघट घाट ॥ 21 ॥ जीवित मृतक दादू मृतक तब ही जानिये, जब गुण इंद्रिय नांहि । जब मन आपा मिट गया, तब ब्रह्म समाना मांहि ॥ 22 ॥ दादू जीवित ही मर जाइये, मर माँही मिल जाइ । सांई का संग छाड़ कर, कौन सहै दुख आइ ॥ 23 ॥ उभय निर्दोष दादू आपा कहा दिखाइये, जे कुछ आपा होइ । यहु तो जाता देखिये, रहता चीन्हों सोइ ॥ 24 ॥ दादू आप छिपाइये, जहाँ न देखै कोइ । पीव को देख दिखाइये, त्यों त्यों आनन्द होइ ॥ 25 ॥ आपा निर्दोष दादू अंतरगति आपा नहीं, मुख सौं मैं तैं होइ । दादू दोष न दीजिये, यों मिल खेलैं दोइ ॥ 26 ॥ जे जन आपा मेट कर, रहें राम ल्यौ लाइ । दादू सब ही देखतां, साहिब सौं मिल जाइ ॥ 27 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 दीनता गरीबी गरीब गरीबी गह रह्या, मसकीनी मसकीन । दादू आपा मेट करि, होइ रह्या लै लीन ॥ 28 ॥ उभय असमाव मैं हूँ मेरी जब लगै, तब लग विलसै खाइ । मै नाहीं मेरी मिटै, तब दादू निकट न जाइ ॥ 29 ॥ दादू मना मनी सब ले रहे, मनी न मेटी जाइ । मना मनी जब मिट गई, तब ही मिले खुदाइ ॥ 30 ॥ दादू मैं मैं जाल दे, मेरे लागो आग । मैं मैं मेरा दूर कर, साहिब के संग लाग ॥ 31 ॥ दादू मैं नांहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ । मैं तैं पड़दा मिटि गया, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥ 32 ॥ मनमुखी मान दादू खोई आपणी, लज्जा कुल की कार । मान बड़ाई पति गई, तब सन्मुख सिरजनहार ॥ 33 ॥ परचै करुणा बिनती नूर सरीखा कर लिया, बंदों का बंदा । दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गंदा ॥ 34 ॥ जीवत मृतक दादू सीख्यों प्रेम न पाइये, सीख्यों प्रीति न होइ । सीख्यों दरद न ऊपजै, जब लग आप न खोइ ॥ 35 ॥ कहबा सुनबा गत भया, आपा पर का नाश । दादू मैं तैं मिट गया, पूर्ण ब्रह्म प्रकाश ॥ 36 ॥ दादू सांई कारण मांस का, लोही पानी होइ । सूखे आटा अस्थि का, दादू पावै सोइ ॥ 37 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 तन मन मैदा पीसकर, छांण छांण ल्यौ लाइ । यों बिन दादू जीव का, कबहुँ साल न जाइ ॥ 38 ॥ पीसे ऊपर पीसिये, छांणे ऊपर छांण । तो आत्म कण ऊबरै, दादू ऐसी जाण ॥ 39 ॥ पहली तन मन मारिये, इनका मर्दै मान । दादू काढै जंत्र में, पीछे सहज समान ॥ 40 ॥ काटे ऊपर काटिये, दाधे को दौं लाइ । दादू नीर न सींचिये, तो तरुवर बधता जाइ ॥ 41 ॥ दादू सबको संकट एक दिन, काल गहैगा आइ । जीवित मृतक ह्वै रहै, ताके निकट न जाइ ॥ 42 ॥ दादू जीवित मृतक ह्वै रहै, सबको विरक्त होइ । काढ़ो काढ़ो सब कहैं, नाम न लेवै कोइ ॥ 43 ॥ जरणा सारा गहिला ह्वै रहै, अन्तरयामी जाणि । तो छूटै संसार तैं, रस पीवै सारंगपाणि ॥ 44 ॥ गूँगा गहिला बावरा, सांई कारण होइ । दादू दीवाना ह्वै रहै, ताको लखै न कोइ ॥ 45 ॥ जीवत मृतक जीवित मृतक साधु की, वाणी का परकास । दादू मोहे रामजी, लीन भये सब दास ॥ 46 ॥ दादू जे तूं मोटा मीर है, सब जीवों में जीव । आपा देख न भूलिये, खरा दुहेला पीव ॥ 47 ॥ आपा मेट समाइ रहु, दूजा धंधा बाद । दादू काहे पच मरै, सहजैं सुमिरण साध ॥ 48 ॥

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श्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 दादू आपा मेटे एक रस, मन हि स्थिर लै लीन। अरस परस आनन्द कर, सदा सुखी सो दीन ॥ 49 ॥ स्मरण नाम निस्संशय हम्हीं हमारा कर लिया, जीवित करणी सार। पीछे संशय को नहीं, दादू अगम अपार ॥ 50 ॥ मध्य निरपक्ष माटी मांहि ठौर कर, माटी माटी मांहि। दादू सम कर राखिये, द्वै पख दुविधा नांहि ॥ 51 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य तेईसवां जीवत मृतक काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 23 ॥ साखी 51 ॥

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शूरातन का अंग www.dadooram.org अथ शूरातन का अंग २४ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।। शूर सती साधु निर्णय साचा सिर सौं खेलहै, यह साधुजन का काम । दादू मरणा आसँधै, सोई कहैगा राम ।। 2 ।। राम कहैं ते मर कहैं, जीवित कह्या न जाइ । दादू ऐसैं राम कहि, सती शूर सम भाइ ।। 3 ।।

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 जब दादू मरबा गहै, तब लोगों की क्या लाज ? सती राम साचा कहै, सब तज पति सौं काज ॥ 4 ॥ शूरवीर कायर दादू हम काइर कड़बा कर रहे, शूर निराला होइ। निकस खड़ा मैदान में, ता सम और न कोइ ॥ 5 ॥ शूर सती साधु निर्णय मड़ा न जीवै तो संग जलै, जीवै तो घर आण। जीवन मरणा राम सौं, सोई सती करि जाण ॥ 6 ॥ जन्म लगै व्यभिचारणी, नख शिख भरी कलंक। पलक एक सन्मुख जली, दादू धोये अंक ॥ 7 ॥ स्वांग सती का पहर कर, करै कुटुम्ब का सोच। बाहर शूरा देखिये, दादू भीतर पोच ॥ 8 ॥ दादू सती तो सिरजनहार सौं, जलै विरह की झाल। ना वह मरै न जलि बुझै, ऐसे संगि दयाल ॥ 9 ॥ जे मुझ होते लाख सिर, तो लाखों देती वारि। सह मुझ दिया एक सिर, सोई सौंपै नारि ॥ 10 ॥ सती जल कोइला भई, मुये मड़े की लार। यों जे जलती राम सौं, साचे संग भर्तार ॥ 11 ॥ मुये मड़े सौं हेत क्या, जे जीव की जाणै नांहि। हेत हरि सौं कीजिये, जे अन्तरजामी मांहि ॥ 12 ॥ शूरवीर कायर शूरा चढ़ संग्राम को, पाछा पग क्यों देहि ? साहिब लाजै भाजतां, धृग् जीवन दादू तेहि ॥ 13 ॥ सेवक शूरा राम का, सोई कहेगा राम। दादू सूर सन्मुख रहै, नहिं कायर का काम ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 कायर काम न आवही, यहु शूरे का खेत। तन मन सौंपै राम को, दादू शीश सहेत ॥ 15 ॥ जब लग लालच जीव का, तब लग निर्भय हुआ न जाइ। काया माया मन तजै, तब चौड़े रहै बजाइ ॥ 16 ॥ दादू चौड़े में आनन्द है, नाम धज्या रणजीत। साहिब अपना कर लिया, अन्तरगत की प्रीति ॥ 17 ॥ दादू जे तुझ काम करीम सौं, तो चौहट चढ़ कर नाच। झूठा है सो जाइगा, निहचै रहसी साच ॥ 18 ॥ जीवत मृतक राम कहेगा एक को, जे जीवित-मृतक होइ। दादू ढूंढे पाइये, कोटि मध्ये कोइ ॥ 19 ॥ शूर सती साध निर्णय शूरा पूरा संत जन, सांई को सेवै। दादू साहिब कारणै, सिर अपना देवै ॥ 20 ॥ शूरा जूझै खेत में, सांई सन्मुख आइ। शूरे को सांई मिले, तब दादू काल न खाइ ॥ 21 ॥ मरबे ऊपरि एक पग, कर्ता करै सो होहि। दादू साहिब कारणै, तालाबेली मोहि ॥ 22 ॥ हरि भरोसा दादू अंग न खैंचिये, कहि समझाऊँ तोहि। मोहि भरोसा राम का, बंका बाल न होहि ॥ 23 ॥ बहुत गया थोड़ा रह्या, अब जीव सोच निवार। दादू मरणा मांड रहु, साहिब के दरबार ॥ 24 ॥ शूरवीर कायर जीवों का संशय पड़या, को काको तारै। दादू सोई शूरमा, जे आप उबारै ॥ 25 ॥

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 जे निकसे संसार तैं, सांई की दिशि धाइ। जे कबहुँ दादू बाहुड़े, तो पीछे माऱ्या जाइ ॥ 26 ॥ दादू कोई पीछे हेला जनि करै, आगे हेला आव। आगे एक अनूप है, नहिं पीछे का भाव ॥ 27 ॥ पीछे को पग ना भरै, आगे को पग देइ। दादू यहु मत शूर का, अगम ठौर को लेइ ॥ 28 ॥ आगा चल पीछा फिरै, ताका मुँह मा दीठ। दादू देखे दोइ दल, भागे देकर पीठ ॥ 29 ॥ दादू मरणां माँड कर, रहै नहिं ल्यौ लाइ। कायर भाजै जीव ले, आ-रण छाड़ै जाइ ॥ 30 ॥ शूरा होइ सु मेर उलंधै, सब गुण बँध्या छूटै। दादू निर्भय ह्वै रहे, कायर तिणा न टूटै ॥ 31 ॥ शूर सती साधु निर्णय सर्प केसरी काल कुंजर, बहु जोध मारग मांहि। कोटि में कोई एक ऐसा, मरण आसंघ जाहि ॥ 32 ॥ दादू जब जागै तब मारिये, वैरी जिय के साल। मनसा डायनि, काम रिपु, क्रोध महाबली काल ॥ 33 ॥ पंच चोर चितवत रहैं, माया मोह विष झाल। चेतन पहरै आपने, कर गह खड़ग संभाल ॥ 34 ॥ काया कबज कमान कर, सार शब्द कर तीर। दादू यहु सर सांध कर, मारै मोटे मीर ॥ 35 ॥ काया कठिन कमान है, खांचै विरला कोइ। मारै पंचों मृगला, दादू शूरा सोइ ॥ 36 ॥ जे हरि कोप करै इन ऊपर, तो काम कटक दल जांहि कहाँ। लालच लोभ क्रोध कत भाजैं, प्रगट रहे हरि जहाँ तहाँ ॥ 37 ॥

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 जीवित मृतक तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार । यों दादू जीव्वित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 38 ॥ शूरातन दादू तन मन काम करीम के, आवै तो नीका । जिसका तिसको सौंपिये, सोच क्या जी का ॥ 39 ॥ जे शिर सौंप्या राम को, सो शिर भया सनाथ । दादू दे ऊरण भया, जिसका तिसके हाथ ॥ 40 ॥ जिसका है तिसको चढै, दादू ऊरण होइ । पहली देवै सो भला, पीछे तो सब कोइ ॥ 41 ॥ सांई तेरे नाम पर, शिर जीव करूं कुर्बान । तन मन तुम पर वारणै, दादू पिंड पराण ॥ 42 ॥ अपने सांई कारणै, क्या क्या नहिं कीजे ? दादू सब आरम्भ तज, अपणा शिर दीजे ॥ 43 ॥ शिर के साटै लीजिये, साहिब जी का नांव । खेलै शीश उतार कर, दादू मैं बलि जांव ॥ 44 ॥ खेलै शीश उतार कर, अधर एक सौं आइ । दादू पावै प्रेम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 45 ॥ मरण भय निवारण दादू मरणे थीं तूं मत डरै, सब जग मरता जोइ । मिल कर मरणा राम सौं, तो कलि अजरावर होइ ॥ 46 ॥ दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा अंत निदान । रे मन मरणा सिरजिया, कहले केवल राम ॥ 47 ॥ दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा पहुँचा आइ । रे मन मेरा राम कह, बेगा बार न लाइ ॥ 48 ॥

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