सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
अपरंपार पार नहिं आवै, आथि न टूटै रे ॥ टेक॥ तस्कर लेइ न पावक जालै, प्रेम न छूटै रे ॥ 1 ॥ चहुंदिशि पसरयो बिन रखवाले, चोर न लूटै रे ॥ 2 ॥ हरि हीरा है राम रसायन, सरस न सूखै रे ॥ 3 ॥ दादू और आथि बहुतेरी, तुस नर कूटै रे ॥ 4 ॥ 50. तत्व उपदेश । राज मृगांक ताल तूँ है तूँ है तूँ है तेरा, मैं नहीं मैं नहीं मैं नहीं मेरा ॥ टेक॥ तूँ है तेरा जगत उपाया, मैं मैं मेरा धंधै लाया ॥ 1 ॥ तूँ है तेरा खेल पसारा, मैं मैं मेरा कहै गँवारा ॥ 2 ॥ तूँ है तेरा सब संसारा, मैं मैं मेरा तिन सिर भारा ॥ 3 ॥ तूँ है तेरा काल न खाइ, मैं मैं मेरा मर मर जाइ ॥ 4 ॥ तूँ है तेरा रह्या समाइ, मैं मैं मेरा गया विलाइ ॥ 5 ॥ तूँ है तेरा तुम्हीं मांहिं, मैं मैं मेरा मैं कुछ नांहिं ॥ 6 ॥ तूँ है तेरा तूँ ही होइ, मैं मैं मेरा मिल्या न कोइ ॥ 7 ॥ तूँ है तेरा लंघे पार, दादू पाया ज्ञान विचार ॥ 8 ॥ 51. संजीवनी । पंचम ताल राम विमुख जग मर मर जाइ, जीवैं संत रहैं लयौ लाइ ॥ टेक॥ लीन भये जे आतम रामा, सदा सजीवन कीये नामा ॥ 1 ॥ अमृत राम रसायन पीया, तातैं अमर कबीरा कीया ॥ 2 ॥ राम राम कह राम समाना, जन रैदास मिले भगवाना ॥ 3 ॥ आदि अंत केते कलि जागे, अमर भये अविनासी लागे ॥ 4 ॥ राम रसायन दादू माते, अविचल भये राम रंग राते ॥ 5 ॥ 52. पंचम ताल निकटि निरंजन लाग रहे, तब हम जीवित मुक्त भये ॥ टेक॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
मर कर मुक्ति जहाँ जग जाइ, तहाँ न मेरा न पतियाइ ॥ 1 ॥ आगे जन्म लहैं अवतारा, तहाँ न मानै मना हमारा ॥ 2 ॥ तन छूटे गति जो पद होइ, मृतक जीव मिले सब कोइ ॥ 3 ॥ जीवित जन्म सुफल करि जाना, दादू राम मिले मन माना ॥ 4 ॥ 53. हैरान प्रश्न। वर्ण भिन्न ताल कादिर कुदरत लखी न जाइ, कहाँ तैं उपजै कहाँ समाइ ॥ टेक ॥ कहाँ तैं कीन्ह पवन अरु पानी, धरणि गगन गति जाइ न जानी ॥ 1 ॥ कहाँ तैं काया प्राण प्रकासा, कहाँ पंच मिल एक निवासा ॥ 2 ॥ कहाँ तैं एक अनेक दिखावा, कहाँ तैं सकल एक ह्वै आवा ॥ 3 ॥ दादू कुदरत बहु हैरानां, कहाँ तैं राख रहे रहमाना ॥ 4 ॥ साखी उत्तर की रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ । आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥ 1 ॥ श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ । कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥ 2 ॥ दादू शब्दैं बँध्या सब रहै, शब्दैं ही सब जाइ । शब्दैं ही सब ऊपजै, शब्दैं सबै समाइ ॥ 3 ॥ 54. स्वरूप गति हैरान। वर्ण भिन्न ताल ऐसा राम हमारे आवै, वार पार कोई अन्त न पावै ॥ टेक ॥ हलका भारी कह्या न जाइ, मोल माप नहीं रह्या समाइ ॥ 1 ॥ कीमत लेखा नहीं परिमाण, सब पच हारे साधु सुजाण ॥ 2 ॥ आगो पीछो परिमित नांहिं, केते पारिख आवहिं जाहिं ॥ 3 ॥ आदि अन्त मधि कहै न कोइ, दादू देखै अचरज होइ ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 55. प्रश्न । गजताल कौण शब्द कौण परखणहार, कौण सुरति कहु कौण विचार ॥ टेक ॥ कौण सुज्ञाता कौण गियान, कौण उन्मनी कौण धियान ॥ 1 ॥ कौण सहज कहु कौण समाध, कौण भक्ति कहु कौण आराध ॥ 2 ॥ कौण जाप कहु कौण अभ्यास, कौण प्रेम कहु कौण पियास ॥ 3 ॥ सेवा कौण कहो गुरुदेव, दादू पूछे अलख अभेव ॥ 4 ॥ उत्तर की साखी कौण शब्द ? दादू शब्द अनाहद हम सुन्या, नख शिख सकल शरीर । सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥ 1 ॥ कौण परखणहार ? प्राण जौहरी पारिखू, मन खोटा ले आवै । खोटा मन के माथे मारै, दादू दूर उड़ावै ॥ 2 ॥ कौण सुरति ? दादू सहजैं सुरति समाइ ले, पारब्रह्म के अंग । अरस परस मिल एक है, सन्मुख रहिबा संग ॥ 3 ॥ कौण विचार ? सहज विचार सुख में रहै, दादू बड़ा विवेक। मन इन्द्री पसरै नहीं, अंतर राखै एक ॥ 4 ॥ कौण सुज्ञाता ? दादू सो ही पंडित ज्ञाता, राम मिलण की बूझै ॥ 5 ॥ कौण गियान ? हंस गियानी सो भला, अंतर राखै एक। विष में अमृत काढ ले, दादू बड़ा विवेक ॥ 6 ॥ कौण उन्मनी ? मन लवरू के पंख हैं, उनमनि चढ़ै आकाश । पग रहि पूरे सांच के, रोपि रह्या हरि पास ॥ 7 ॥ कौण धियान ? जहँ विरहा तहँ और क्या, सुधि बुधि नाठे ज्ञान । लोक वेद मारग तजे, दादू एकै ध्यान ॥ 8 ॥ कौण सहज ? सहज रूप मन का भया, जब द्वै द्वै मिटी तरंग । ताता सीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 9 ॥ कौण समाधि ? सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि । लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 10 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 कौण भक्ति ? योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव। मुक्ता-द्वारा महल का, इहि भक्ति का भाव ॥ 11 ॥ कौण आराध ? आत्मदेव आराथिये, विरोथिये नहीं कोइ। आराधे सुख ऊपजै, विरोधे दुख होइ ॥ 12 ॥ कौण जाप ? सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरति सौं पोइ। बिना हाथों निशदिन जपै, परम जाप यों होइ ॥ 13 ॥ कौण अभ्यास ? दादू धरती ह्वै रहै, तजि कूड़ कपट अहंकार। साँई कारण शिर सहै, ताकों प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥ 14 ॥ कौण प्रेम ? प्रेम लहर की पालकी, आतम बैसे आइ। दादू खेलै पीव सौं, सो सुख कह्या न जाइ ॥ 15 ॥ कौण पियास ? दादू कोई बांछै मुक्ति फल, कोई अमरापुरीवास। कोई बांछै परमगति, दादू राममिलन की प्यास ॥ 16 ॥ सेवा कौण ? तेज पुंज को विलसना, मिल खेलैं इक ठाम। भर-भर पीवै राम रस, सेवा इसकानाम ॥ 17 ॥ आपा गर्व गुमान तज, मद मत्सर अहंकार। गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥ 18 ॥ सार मत कौण ? आपा मेटै हरि भजै, तन मन तजै विकार। निर्वैरी सब जीव सौं, दादू यहु मतसार ॥ 19 ॥ 56. प्रश्न । पंचम ताल मैं नहिं जानूं सिरजनहार, ज्यों है त्योंहि कहो करतार ॥ टेक ॥ मस्तक कहाँ कहाँ कर पाइ, अविगत नाथ कहो समझाइ ॥ 1 ॥ कहं मुख नैनाँ श्रवणां साँई, जानराइ सब कहो गुसाँई ॥ 2 ॥ पेट पीठ कहाँ है काया, पड़दा खोल कहो गुरु राया ॥ 3 ॥ ज्यों है त्यों कह अन्तरजामी, दादू पूछै सतगुरु स्वामी ॥ 4 ॥ उत्तर की साखी
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 दादू सबै दिशा सो सारिखा, सबै दिशा मुख बैन। सबै दिशा श्रवणहुँ सुनै, सबै दिशा कर नैन ॥ 1 ॥ सबै दिशा पग शीश हैं, सबै दिशा मन चैन। सबै दिशा सन्मुख रहै, सबै दिशा अंग ऐन ॥ 2 ॥ ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात। सभूमिं सर्वतः वत्वा अत्र तिष्ठ दशांगुलम् ॥ 57. प्रश्न । पंजाबी त्रिताल अलख देव गुरु ! देहु बताइ, कहाँ रहो त्रिभुवनपति राइ ॥ टेक ॥ धरती गगन बसहु कैलास, तिहूँ लोक में कहाँ निवास ॥ 1 ॥ जल थल पावक पवनां पूर, चंद सूर निकट कै दूर ॥ 2 ॥ मंदिर कौण, कौण घरबार, आसण कौण कहो करतार ॥ 3 ॥ अलख देव ! गति लखी न जाइ, दादू पूछै कहि समझाइ ॥ 4 ॥ उत्तर की साखी दादू मुझ ही मांहीं मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार। मुझ ही मांहीं मैं बसूं, आप कहै करतार ॥ 1 ॥ दादू मैं ही मेरा अर्श में,मैं ही मेरा स्थान। मैं ही मेरी ठौर में, आप कहै रहमान ॥ 2 ॥ दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार। मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥ 3 ॥ दादू मैं ही मेरी जाति में, मैं ही मेरा अंग। मैं ही मेरा जीव में, आप कहै प्रसंग ॥ 4 ॥ 58. रस त्रिताल राम रस मीठा रे, कोई पीवै साधु सुजाण। सदा रस पीवै प्रेम सौं, सो अविनाशी प्राण ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 इहि रस मुनि लागे सबै, ब्रह्मा विष्णु महेश । सुर नर साधू संतजन, सो रस पीवै शेष ॥ 1 ॥ सिध साधक योगी जती, सती सबै शुकदेव । पीवत अंत न आवही, ऐसा अलख अभेव ॥ 2 ॥ इहि रस राते नामदेव, पीपा अरु रैदास । पीवत कबीरा ना थक्या, अजहूँ प्रेम पियास ॥ 3 ॥ यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही मांहि समाइ । मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥ 4 ॥ 59. त्रिताल मन मतवाला मधु पीवै, पीवै बारम्बारो रे । हरि रस रातो राम के, सदा रहै इकतारो रे ॥ टेक ॥ भाव भक्ति भाठी भई, काया कसणी सारो रे । पोता मेरे प्रेम का, सदा अखंडित धारो रे ॥ 1 ॥ ब्रह्म अग्नि जौबन जरै, चेतन चितहि उजासो रे । सुमति कलाली सारवै, कोई पीवै विरला दासो रे ॥ 2 ॥ प्रीति पियाले पीवही, छिन-छिन बारंबारो रे । आपा धन सब सौंपिया, तब रस पाया सारो रे ॥ 3 ॥ आपा पर नहिं जाणिये, भूलो माया जालो रे । दादू हरि रस जे पिवै, ताको कदे न लागै कालो रे ॥ 4 ॥ 60. पंचम ताल रस के रसिया लीन भये, सकल शिरोमणि तहाँ गये ॥ टेक ॥ राम रसायन अमृत माते, अविचल भये नरक नहीं जाते ॥ 1 ॥ राम रसायन भर भर पीवै, सदा सजीवन जुग जुग जीवै ॥ 2 ॥ राम रसायन त्रिभुवन सार, राम रसिक सब उतरे पार ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 दादू अमली बहुरि न आये, सुख सागर ता मांहि समाये ॥ 4 ॥ 61. भेष । पंचम ताल भेष न रीझे मेरा निज भर्तार, तातें कीजै प्रीति विचार ॥ टेक ॥ दुराचारिणी रच भेष बनावै, शील साच नहिं पिव को भावै ॥ 1 ॥ कंत न भावै करै श्रृंगार, डिंभपणैं रीझै संसार ॥ 2 ॥ जो पै पतिव्रता ह्वै है नारी, सो धन भावै पियहिं पियारी ॥ 3 ॥ पीव पहचानें आन नहिं कोई, दादू सोई सुहागिनी होई ॥ 4 ॥ 62. विरह । घट ताल सब हम नारी एक भर्तार, सब कोई तन करैं श्रृंगार ॥ टेक ॥ घर घर अपने सेज सँवारैं, कंत पियारे पंथ निहारैं ॥ 1 ॥ आरत अपने पीव को धावैं, मिलै नाह कब अंग लगावैं ॥ 2 ॥ अति आतुर ये खोजत डोलैं, बान परी वियोगिनि बोलैं ॥ 3 ॥ सब हम नारी दादू दीन, दे सुहाग काहू संग लीन ॥ 4 ॥ 63. आत्मार्थी भेष । घट ताल सोई सुहागिनी साच श्रृंगार, तन मन लाइ भजै भर्तार ॥ टेक ॥ भाव भक्ति प्रेम ल्यौ लावै, नारी सोई सार सुख पावै ॥ 1 ॥ सहज संतोंष शील सब आया, तब नारी नाह अमोलक पाया ॥ 2 ॥ तन मन जौबन सौंप सब दीन्हा, तब कंत रिझाइ आप वश कीन्हा ॥ 3 ॥ दादू बहुरि वियोग न होई, पीव सौं प्रीति सुहागिनी सोई ॥ 4 ॥ 64. समता । वर्ण भिन्न ताल तब हम एक भये रे भाई, मोहन मिलि सांची मति आई ॥ टेक ॥ पारस परस भये सुखदाई, तब दुतिया, दुर्मति दूर गँवाई ॥ 1 ॥ मलियागिरि मरम मिल पाया, तब वंश वरण कुल भ्रम गँवाया ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 हरि जल नीर निकट जब आया, तब बूँद बूँद मिल सहज समाया ॥ 3 ॥ नाना भेद भ्रम सब भागा, तब दादू एक रंगै रंग लागा ॥ 4 ॥ 65. वर्ण भिन्न ताल अलह राम छूटा भ्रम मोरा । हिंदू तुरक भेद कछु नांही, देखूं दर्शन तोरा ॥ टेक ॥ सोई प्राण पिंड पुनि सोई, सोई लोही मांसा । सोई नैन नासिका सोई, सहजैं कीन्ह तमासा ॥ 1 ॥ श्रवणों शब्द बाजता सुणिये, जिह्वा मीठा लागै । सोई भूख सबन को व्यापै, एक जुगति सोई जागै ॥ 2 ॥ सोई संधि बंध पुनि सोई, सोई सुख सोई पीरा । सोई हस्त पाँव पुनि सोई, सोई एक शरीरा ॥ 3 ॥ यहु सब खेल खालिक हरि तेरा, तैं ही एक कर लीना । दादू जुगति जान कर ऐसी, तब यहु प्राण पतीना ॥ 4 ॥ 66. नटताल भाई रे ऐसा पंथ हमारा, द्वै पख रहित पंथ गह पूरा,अवरण एक अधारा ॥ टेक ॥ वाद-विवाद काहू सौं नांहीं, माहीं जगत तैं न्यारा । सम दृष्टि स्वभाव सहज में, आप ही आप विचारा ॥ 1 ॥ मैं तैं मेरी यहु मति नाहीं, निर्वैरी निरकारा । पूरण सबै देख आपा पर, निरालंब निरधारा ॥ 2 ॥ काहु के संग मोह न ममता, संगी सिरजनहारा । मनही मन सौं समझ सयाना, आनन्द एक अपारा ॥ 3 ॥ काम कल्पना कदे न कीजे, पूरण ब्रह्म पियारा । इहि पथ पहुँच पार गह दादू, सो तत सहज संभारा ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 67. परिचय हैरान । नटताल ऐसो खेल बन्यो मेरी माई, कैसे कहूँ कछु जान्यो न जाई ॥ टेक ॥ सुर नर मुनिजन अचरज आई, राम-चरण को भेद न पाई ॥ 1 ॥ मंदिर माहिं सुरति समाई, कोऊ है सो देहु दिखाई ॥ 2 ॥ मनहिं विचार करहु ल्यौ लाई, दिवा समान कहाँ ज्योति छिपाई ॥ 3 ॥ देह निरंतर शून्य ल्यौ लाई, तहं कौण रमे कौण सूता रे भाई ॥ 4 ॥ दादू न जाणै ये चतुराई, सोइ गुरु मेरा जिन सुधि पाई ॥ 5 ॥ 68. निज घर परिचय । पंचम ताल भाई रे घर ही में घर पाया । सहज समाइ रह्यो ता मांही, सतगुरु खोज बताया ॥ टेक ॥ ता घर काज सबै फिर आया, आपै आप लखाया । खोल कपाट महल के दीन्हें, स्थिर सुस्थान दिखाया ॥ 1 ॥ भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया । पिंड परे जहाँ जिव जावै, ता में सहज समाया ॥ 2 ॥ निश्चल सदा चलै नहिं कबहुँ, देख्या सब में सोई । ताही सौं मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥ 3 ॥ आदि अनन्त सोई घर पाया, अब मन अनत न जाई । दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥ 4 ॥ 69. मानस तीर्थ । पंचम ताल इत है नीर नहावन जोग, अनत हि भ्रम भूला रे लोग ॥ टेक ॥ तिहिं तट न्हाये निर्मल होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ ॥ 1 ॥ सुघट घाट अरु तिरबो तीर, बैठे तहाँ जगत-गुरु पीर ॥ 2 ॥ दादू न जाणै तिन का भेव, आप लखावै अंतर देव ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 70. पंजाबी त्रिताल ऐसा ज्ञान कथो मन ज्ञानी, इहि घर होइ सहज सुख जानी ॥ टेक ॥ गंग जमुन तहँ नीर नहाई, सुषमन नारी रंग लगाई ॥ 1 ॥ आप तेज तन रह्यो समाइ, मैं बलि ताकी देखूँ अघाइ ॥ 2 ॥ वास निरन्तर सो समझाइ, बिन नैनहुँ देखूँ तहाँ जाइ ॥ 3 ॥ दादू रे यहु अगम अपार, सो धन मेरे अधर अधार ॥ 4 ॥ 71. परिचय सत्संग । पंजाबी त्रिताल अब तो ऐसी बन आई, राम-चरण बिन रह्यो न जाई ॥ टेक ॥ साँई को मिलबे के कारण, त्रिकुटी संगम नीर नहाई । चरण-कमल की तहँ ल्यौ लागै, जतन जतन कर प्रीति बनाई ॥ 1 ॥ जे रस भीना छावर जावै, सुन्दरी सहजैं संग समाई । अनहद बाजे बाजन लागे, जिह्वाहीणैं कीरति गाई ॥ 2 ॥ कहा कहूँ कुछ वरणि न जाई, अविगति अंतर ज्योति जगाई । दादू उनको मरम न जानै, आप सुरंगे बैन बजाई ॥ 3 ॥ 72. राज मृगांक ताल नीके राम कहत है बपुरा । घर मांही घर निर्मल राखै, पंचों धोवै काया कपरा ॥ टेक ॥ सहज समर्पण सुमिरण सेवा, तिरवेणी तट संजम सपरा । सुन्दरी सन्मुख जागण लागी, तहँ मोहन मेरा मन पकरा ॥ 1 ॥ बिन रसना मोहन गुण गावै, नाना वाणी अनुभव अपरा । दादू अनहद ऐसे कहिये, भक्ति तत्त यहु मारग सकरा ॥ 2 ॥ 73. मनसा गायत्री। राज मृगांक ताल अवधू ! कामधेनु गहि राखी, वश कीन्हीं तब अमृत स्रवै, आगै चार न नाखी ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 पोषंतां पहली उठ गरजै, पीछें हाथ न आवै । भूखी भलै दूध नित दूणा, यों या धेनु दुहावै ॥ 1 ॥ ज्यों ज्यों खीण पड़े त्यों दूझै, मुक्ता मेल्यां मारै । घाटा रोक घेर घर आणैं, बांधी कारज सारै ॥ 2 ॥ सहजैं बांधी कदे न छूटै, कर्म बंधन छुट जाई । काटै कर्म सहज सौं बांधै, सहजैं रहै समाई ॥ 3 ॥ छिन छिन मांहि मनोरथ पूरै, दिन दिन होइ अनन्दा । दादू सोई देखतां पावै, कलि अजरावर कंदा ॥ 4 ॥ 74. परिचय । कहरवा जब घट परगट राम मिले । आत्म मंगलाचार चहुँ दिशि, जन्म सुफल कर जीत चले ॥ टेक ॥ भक्ति मुक्ति अभय कर राखे, सकल शिरोमणि आप किये । निर्गुण राम निरंजन आपै, अजरावर उर लाइ लिये ॥ 1 ॥ अपने अंग संग कर राखे, निर्भय नाम निशान बजावा । अविगत नाथ अमर अविनाशी, परम पुरुष निज सो पावा ॥ 2 ॥ सोई बड़भागी सदा सुहागी, परगट प्रीतम संग भये । दादू भाग बड़े वर वर कर, सो अजरावर जीत गये ॥ 3 ॥ 75.पराभक्ति प्रार्थना । कहरवा रमैया ! यहु दुख सालै मोहि । सेज सुहाग न प्रीति प्रेम रस, दर्शन नांहीं तोहि ॥ टेक ॥ अंग प्रसंग एक रस नांही, सदा समीप न पावै । ज्यों रस में रस बहुरि न निकसै, ऐसैं होइ न आवै ॥ 1 ॥ आत्मलीन नहीं निशिवासर, भक्ति अखंडित सेवा । सन्मुख सदा परस्पर नाहीं, तातें दुख मोहि देवा ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 मगन गलित महारस माता, तूँ है तब लग पीजै । दादू जब लग अंत न आवै, तब लग देखन दीजै ॥ ३ ॥ 76. लांबी (अधीरता अस्थिरता) । दादरा गुरुमुख पाइये रे, ऐसा ज्ञान विचार । समझ समझ समझ्या नहीं, लागा रंग अपार ॥ टेक ॥ जांण जांण जांण्यां नहीं, ऐसी उपजै आइ । बूझ बूझ बूझया नहीं, ढोरी लागा जाइ ॥ 1 ॥ ले ले ले लीया नहीं, हौंस रही मन मांहि । राख राख राख्या नहीं, मैं रस पीया नांहि ॥ 2 ॥ पाय पाय पाया नहीं, तेजैं तेज समाइ । कर कर कछु किया नहीं, आतम अंग लगाइ ॥ 3 ॥ खेल खेल खेल्या नहीं, सन्मुख सिरजनहार । देख देख देख्या नहीं, दादू सेवक सार ॥ 4 ॥ 77. गुरु अधीन ज्ञान । दादरा बाबा ! गुरुमुख ज्ञाना रे, गुरुमुख ध्याना रे ॥ टेक ॥ गुरुमुख दाता गुरुमुख राता, गुरुमुख गवना रे । गुरुमुख भवना, गुरुमुख छवना, गुरुमुख रवना रे ॥ 1 ॥ गुरुमुख पूरा, गुरुमुख शूरा, गुरुमुख वाणी रे । गुरुमुख देणा, गुरुमुख लेणा, गुरुमुख जाणी रे ॥ 2 ॥ गुरुमुख गहबा, गुरुमुख रहबा, गुरुमुख न्यारा रे । गुरुमुख सारा, गुरुमुख तारा, गुरुमुख पारा रे ॥ 3 ॥ गुरुमुख राया, गुरुमुख पाया, गुरुमुख मेला रे । गुरुमुख तेजं, गुरुमुख सेजं, दादू खेला रे ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 78. निज स्थान निर्णय । दीपचन्दी मैं मेरे में हेरा, मध्य मांहिं पीव नेरा ॥ टेक ॥ जहाँ अगम अनूप अवासा, तहँ महापुरुष का वासा। तहँ जानेगा जन कोई, हरि मांहि समाना सोई ॥ 1 ॥ अखंड ज्योति जहाँ जागै, तहँ राम नाम लयौ लागै। तहँ राम रहै भरपूरा, हरि संग रहै नहिं दूरा ॥ 2 ॥ तिरवेणी तट तीरा, तहँ अमर अमोलक हीरा। उस हीरे सौं मन लागा, तब भरम गया भय भागा ॥ 3 ॥ दादू देख हरि पावा, हरि सहजैं संग लखावा। पूरण परम निधाना, निज निरखत हौं भगवाना ॥ 4 ॥ 79. दीपचन्दी मेरा मन लागा सकल करा, हम निशदिन हिरदै सो धरा ॥ टेक ॥ हम हिरदै मांही हेरा, पीव परगट पाया नेरा। सो नेरे ही निज लीजै, तब सहजैं अमृत पीजै ॥ 1 ॥ जब मन ही सौं मन लागा, तब ज्योति स्वरूपी जागा। जब ज्योति स्वरूपी पाया, तब अन्तर मांही समाया ॥ 2 ॥ जब चित्त हि चित्त समाना, हम हरि बिन और न जाना। जाना जीवन सोई, अब हरि बिन और न कोई ॥ 3 ॥ जब आतम एकै बासा, पर आतम मांहि प्रकाशा। परकाशा पीव पियारा, सो दादू मिंत हमारा ॥ 4 ॥ (इति राग गौड़ी सम्पूर्णः ॥ 1 ॥ पद 79 ॥ ) (गावै राग गौड़ी, रोटी आवै दौड़ी।)
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राग माली गौड़ www.dadooram.org अथ राग माली गौड़ 2 (गायन समय संध्या 6 से रात्रि 9 बजे तक) ४०. नाम महिमा । झपताल गोविन्द ! नाम तेरा, जीवन मेरा, तारण भवपारा । आगे इहि नाम लागे, संतन आधारा ।। टेक ।। कर विचार तत्त्व सार, पूरण धन पाया । अखिल नाम अगम ठाम, भाग हमारे आया ।। 1 ।। भक्ति मूल मुक्ति मूल, भव-जल निस्तरना । भरम कर्म भंजना भय, किल्विष सब हरना ।। 2 ।। सकल सिद्धि नव निधि, पूरण सब कामा । राम रूप तत्त अनूप, दादू निज नामा ।। 3 ।।
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 ४1. करुणा । झपताल गोविन्द ! कैसे तरिये । नाव नांही खेव नाहीं, राम विमुख मरिये ॥ टेक ॥ ज्ञान नांही ध्यान नांही, लै समाधि नांही । विरहा वैराग नांही, पंचों गुण मांही ॥ 1 ॥ प्रेम नांही प्रीति नांही, नांव नांही तेरा । भाव नांही भक्ति नांही, कायर जीव मेरा ॥ 2 ॥ घाट नांही बाट नांही, कैसे पग धरिये । वार नांही पार नांही, दादू बहु डरिये ॥ 3 ॥ ४2. विरह । शंखताल पीव ! आव हमारे रे, मिलि प्राण पियारे रे, बलि जाऊँ तुम्हारे रे ॥ टेक ॥ सुन सखी सयानी रे, मैं सेव न जानी रे, हौं भई दिवानी रे ॥ 1 ॥ सुन सखी सहेली रे, क्यों रहूँ अकेली रे, हौं खरी दुहेली रे ॥ 2 ॥ हौं करूँ पुकारा रे, सुन सिरजनहारा रे, दादू दास तुम्हारा रे ॥ 3 ॥ ४3. शंख ताल वाल्हा सेज हमारी रे, तूँ आव हौं वारी रे, हौं दासी तुम्हारी रे ॥ टेक ॥ तेरा पंथ निहारूं रे, सुन्दर सेज सँवारूं रे, जियरा तुम्ह पर वारूं रे ॥ 1 ॥ तेरा अंगड़ा पेखूं रे, तेरा मुखड़ा देखूं रे, तब जीवन लेखूं रे ॥ 2 ॥ मिल सुखड़ा दीजे रे, यहु लाहड़ा लीजे रे, तुम देखें जीजे रे ॥ 3 ॥ तेरे प्रेम की माती रे, तेरे रंगड़े राती रे, दादू वारणै जाती रे ॥ 4 ॥ ४4. फारसी । शूलताल दरबार तुम्हारे दरदवंद, पीव पीव पुकारे । दीदार दरूने दीजिये, सुन खसम हमारे ॥ टेक ॥ तनहाँ के तन पीर है, सुन तूँ ही निवारे ।
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 करम करीमा कीजिये, मिल पीव पियारे ॥ 1 ॥ शूल सुलाको सो सहूँ, तेग तन मारे । मिल सांई सुख दीजिये, तूँ ही तूँ संभारे ॥ 2 ॥ मैं शुहदा तन सोखता, विरहा दुख जारे । जिय तरसै दीदार को, दादू न विसारे ॥ 3 ॥ ४5. शंखताल (फारसी) संइयां तूँ है साहिब मेरा, मैं हूँ बन्दा तेरा ॥ टेक ॥ बन्दा वरदा चेरा तेरा, हुकमी मैं बेचारा । मीरां मेहरबान गुसांई, तूँ सिरताज हमारा ॥ 1 ॥ गुलाम तुम्हारा मुल्ला जादा, लौंडा घर का जाया । राजिक रिजक जीव तैं दिया, हुकम तुम्हारे आया ॥ 2 ॥ शादील बै हाजिर बंदा, हुकम तुम्हारे मांही । जब ही बुलाया तब ही आया, मैं मेवासा नांही ॥ 3 ॥ खसम हमारा सिरजनहारा, साहिब समर्थ सांई । मीरां मेरा मेहर मया कर, दादू तुम ही तांई ॥ 4 ॥ ४6. करुणा । शंखताल मुझ थीं कुछ न भया रे, यहु योंही गया रे, पछतावा रह्या रे ॥ टेक ॥ मै शीश न दीया रे, भर प्रेम न पीया रे, मैं क्या कीया रे ॥ 1 ॥ हौं रंग न राता रे, रस प्रेम न माता रे, नहिं गलित गाता रे ॥ 2 ॥ मैं पीव न पाया रे, कीया मन का भाया रे, कुछ होइ न आया रे ॥ 3 ॥ हौं रहूँ उदासा रे, मुझे तेरी आशा रे, कहै दादू दासा रे ॥ 4 ॥ ४7. वैराग्य उपदेश । निसारुक ताल मेरा मेरा छाड़ गँवारा, सिर पर तेरे सिरजनहारा ।
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 अपने जीव विचारत नांहीं, क्या ले गइला वंश तुम्हारा ॥ टेक ॥ तब मेरा कृत करता नांही, आवत है हंकारा। काल चक्र सौं खरी परी रे, विसर गया घरबारा ॥ 1 ॥ जाइ तहाँ का संजम कीजै, विकट पंथ गिरिधारा। दादू रे तन अपना नांहीं, तो कैसे भया संसारा ॥ 2 ॥ ४४. निसारुक ताल दादू दास पुकारे रे, सिर काल तुम्हारे रे, सर सांधे मारे रे ॥ टेक ॥ जम काल निवारी रे, मन मनसा मारी रे, यहु जन्म न हारी रे ॥ 1 ॥ सुख नींद न सोई रे, अपना दुख रोई रे, मन मूल न खोई रे ॥ 2 ॥ सिर भार न लीजी रे, जिसका तिसको दीजी रे, अब ढील न कीजी रे ॥ 3 ॥ यहु औसर तेरा रे, पंथी जाग सवेरा रे, सब बाट बसेरा रे ॥ 4 ॥ सब तरुवर छाया रे, धन जौबन माया रे, यहु काची काया रे ॥ 5 ॥ इस भ्रम न भूली रे, बाजी देख न फूली रे, सुख सागर झूली रे ॥ 6 ॥ रस अमृत पीजी रे, विष का नाम न लीजी रे, कह्या सो कीजी रे ॥ 7 ॥ सब आतम जाणी रे, अपणा पीव पिछाणी रे, यहु दादू वाणी रे ॥ 8 ॥ ४९. भक्ति उपदेश । त्रिताल पूजूं पहली गणपति राइ, पड़िहौं पावों चरणों धाइ। आगै ह्वै कर तीर लगावै, सहजैं अपने बैन सुनाइ ॥ टेक ॥ कहूँ कथा कुछ कही न जाई, इक तिल में ले सबै समाइ ॥ 1 ॥ गुण हु गहीर धीर तन देही, ऐसा समरथ सबै सुहाइ ॥ 2 ॥ जिस दिशि देखूं ओही है रे, आप रह्या गिरि तरुवर छाइ ॥ 3 ॥ दादू रे आगै क्या होवै, प्रीति पिया कर जोड़ लगाइ ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 ९०. परिचय । पंचम ताल नीको धन हरि कर मैं जान्यौं, मेरे अखई वोही। आगे पीछे सोई है रे, और न दूजा कोई ॥ टेक॥ कबहूँ न छाडूँ संग पिया को, हरि के दर्शन मोही। भाग हमारे जो हौं पाऊँ, शरणै आयो तोही ॥ 1 ॥ आनन्द भयो सखी जिय मेरे, चरण कमल को जोई। दादू हरि को बावरो, बहुरि वियोग न होई ॥ 2 ॥ ९१. (फारसी) हित उपदेश । पंचम ताल बाबा मर्दे मर्दां गोइ, ये दिल पाक कर्दम धोइ ॥ टेक॥ तर्क दुनियाँ दूर कर दिल, फर्ज फारिग होइ। पैवस्त परवरदिगार सौं, आकिलां सिर सोइ ॥ 1 ॥ मनी मुरदः हिर्स फानी, नफ्स रा पामाल। बदी रा बरतरफ करदः, नाम नेकी ख्याल ॥ 2 ॥ जिंदगानी मुरदः बाशद, कुंजे कादिर कार। तालिबां रा हक, हासिल, पासबाने यार ॥ 3 ॥ मर्दे मर्दां सालिकां सर, आशिकां सुलतान। हजूरी होशियार दादू, इहै गो मैदान ॥ 4 ॥ ९२. ईश्वर चरित । त्रिताल ये सब चरित तुम्हारे मोहना, मोहे सब ब्रह्माण्ड खंडा। मोहे पवन पानी परमेश्वर, सब मुनि मोहे रवि चंदा ॥ टेक॥ साइर सप्त मोहे धरणी धरा, अष्ट कुली पर्वत मेरु मोहे। तीन लोक मोहे जगजीवन, सकल भुवन तेरी सेव सोहे ॥ 1 ॥ शिव बिरंचि नारद मुनि मोहे, मोहे सुर सब सकल देवा। मोहे इन्द्र फणीन्द्र पुनि मोहे, मुनि मोहे तेरी करत सेवा ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 अगम अगोचर अपार अपरम्परा, को यहु तेरे चरित न जानैं । ये शोभा तुमको सोहे सुन्दर, बलि बलि जाऊँ दादू न जानैं ॥ ३ ॥ ९३. गुरु ज्ञान। त्रिताल ऐसा रे गुरु ज्ञान लखाया, आवै जाइ सो दृष्टि न आया ॥ टेक॥ मन थिर करूँगा, नाद भरूँगा, राम रमूँगा, रस माता ॥ १ ॥ अधर रहूँगा, करम दहूँगा, एक भजूंगा, भगवंता ॥ २ ॥ अलख लखूँगा, अकथ कथूँगा, एक मथूँगा, गोविन्दा ॥ ३ ॥ अगह गहूँगा, अकह कहूँगा, अलह लहूँगा, खोजन्ता ॥ ४ ॥ अचर चरूंगा, अजर जरूंगा, अतिर तिरूंगा, आनन्दा ॥ ५ ॥ यहु तन तारूं, विषय निवारूं, आप उबारूं, साधन्ता ॥ ६ ॥ आऊँ न जाऊँ, उनमनि लाऊँ, सहज समाऊँ, गुणवंता ॥ ७ ॥ नूर पिछाणूं, तेजहि जाणूं, दादू ज्योतिहि देखन्ता ॥ ८ ॥ ९४. तत्व उपदेश। पंचम ताल बंदे हाजिरां हजूर वे, अल्लह आली नूर वे । आशिकां रा सिदक साबित, तालिबां भरपूर वे ॥ टेक॥ वजूद में मौजूद है, पाक परवरदिगार वे । देख ले दीदार को, गैब गोता मार वे ॥ १ ॥ मौजूद मालिक तख्त खालिक, आशिकां रा ऐन वे । गुदर कर दिल मग्ज भीतर, अजब है यहु सैन वे ॥ २ ॥ अर्श ऊपर आप बैठा, दोस्त दाना यार वे । खोज कर दिल कब्ज कर ले, दरूने दीदार वे ॥ ३ ॥ हुशियार हाजिर चुस्त करदा, मीरां मेहरवान वे । देख ले दर हाल दादू, आप है दीवान वे ॥ ४ ॥
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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 95. वस्तु निर्देश। चौताल निर्मल तत्त निर्मल तत्त निर्मल तत्त ऐसा। निर्गुण निज निधि निरंजन, जैसा है तैसा ॥ टेक॥ उतपत्ति आकार नांही, जीव नांही काया। काल नांही कर्म नांही, रहिता राम राया ॥ 1 ॥ शीत नांही घाम नांही, धूप नांही छाया। बाव नांही वर्ण नांही, मोह नांही माया ॥ 2 ॥ धरणी आकाश अगम, चंद सूर नांही। रजनी निशि दिवस नांही, पवना नहीं जांही ॥ 3 ॥ कृत्रिम घट कला नांही, सकल रहित सोई। दादू निज अगम निगम, दूजा नहीं कोई ॥ 4 ॥ इति राग माली गौड़ सम्पूर्ण ॥ 2 ॥ पद 26 ॥
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