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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 67. परिचय हैरान । नटताल ऐसो खेल बन्यो मेरी माई, कैसे कहूँ कछु जान्यो न जाई ॥ टेक ॥ सुर नर मुनिजन अचरज आई, राम-चरण को भेद न पाई ॥ 1 ॥ मंदिर माहिं सुरति समाई, कोऊ है सो देहु दिखाई ॥ 2 ॥ मनहिं विचार करहु ल्यौ लाई, दिवा समान कहाँ ज्योति छिपाई ॥ 3 ॥ देह निरंतर शून्य ल्यौ लाई, तहं कौण रमे कौण सूता रे भाई ॥ 4 ॥ दादू न जाणै ये चतुराई, सोइ गुरु मेरा जिन सुधि पाई ॥ 5 ॥ 68. निज घर परिचय । पंचम ताल भाई रे घर ही में घर पाया । सहज समाइ रह्यो ता मांही, सतगुरु खोज बताया ॥ टेक ॥ ता घर काज सबै फिर आया, आपै आप लखाया । खोल कपाट महल के दीन्हें, स्थिर सुस्थान दिखाया ॥ 1 ॥ भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया । पिंड परे जहाँ जिव जावै, ता में सहज समाया ॥ 2 ॥ निश्चल सदा चलै नहिं कबहुँ, देख्या सब में सोई । ताही सौं मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥ 3 ॥ आदि अनन्त सोई घर पाया, अब मन अनत न जाई । दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥ 4 ॥ 69. मानस तीर्थ । पंचम ताल इत है नीर नहावन जोग, अनत हि भ्रम भूला रे लोग ॥ टेक ॥ तिहिं तट न्हाये निर्मल होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ ॥ 1 ॥ सुघट घाट अरु तिरबो तीर, बैठे तहाँ जगत-गुरु पीर ॥ 2 ॥ दादू न जाणै तिन का भेव, आप लखावै अंतर देव ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 70. पंजाबी त्रिताल ऐसा ज्ञान कथो मन ज्ञानी, इहि घर होइ सहज सुख जानी ॥ टेक ॥ गंग जमुन तहँ नीर नहाई, सुषमन नारी रंग लगाई ॥ 1 ॥ आप तेज तन रह्यो समाइ, मैं बलि ताकी देखूँ अघाइ ॥ 2 ॥ वास निरन्तर सो समझाइ, बिन नैनहुँ देखूँ तहाँ जाइ ॥ 3 ॥ दादू रे यहु अगम अपार, सो धन मेरे अधर अधार ॥ 4 ॥ 71. परिचय सत्संग । पंजाबी त्रिताल अब तो ऐसी बन आई, राम-चरण बिन रह्यो न जाई ॥ टेक ॥ साँई को मिलबे के कारण, त्रिकुटी संगम नीर नहाई । चरण-कमल की तहँ ल्यौ लागै, जतन जतन कर प्रीति बनाई ॥ 1 ॥ जे रस भीना छावर जावै, सुन्दरी सहजैं संग समाई । अनहद बाजे बाजन लागे, जिह्वाहीणैं कीरति गाई ॥ 2 ॥ कहा कहूँ कुछ वरणि न जाई, अविगति अंतर ज्योति जगाई । दादू उनको मरम न जानै, आप सुरंगे बैन बजाई ॥ 3 ॥ 72. राज मृगांक ताल नीके राम कहत है बपुरा । घर मांही घर निर्मल राखै, पंचों धोवै काया कपरा ॥ टेक ॥ सहज समर्पण सुमिरण सेवा, तिरवेणी तट संजम सपरा । सुन्दरी सन्मुख जागण लागी, तहँ मोहन मेरा मन पकरा ॥ 1 ॥ बिन रसना मोहन गुण गावै, नाना वाणी अनुभव अपरा । दादू अनहद ऐसे कहिये, भक्ति तत्त यहु मारग सकरा ॥ 2 ॥ 73. मनसा गायत्री। राज मृगांक ताल अवधू ! कामधेनु गहि राखी, वश कीन्हीं तब अमृत स्रवै, आगै चार न नाखी ॥ टेक ॥

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 पोषंतां पहली उठ गरजै, पीछें हाथ न आवै । भूखी भलै दूध नित दूणा, यों या धेनु दुहावै ॥ 1 ॥ ज्यों ज्यों खीण पड़े त्यों दूझै, मुक्ता मेल्यां मारै । घाटा रोक घेर घर आणैं, बांधी कारज सारै ॥ 2 ॥ सहजैं बांधी कदे न छूटै, कर्म बंधन छुट जाई । काटै कर्म सहज सौं बांधै, सहजैं रहै समाई ॥ 3 ॥ छिन छिन मांहि मनोरथ पूरै, दिन दिन होइ अनन्दा । दादू सोई देखतां पावै, कलि अजरावर कंदा ॥ 4 ॥ 74. परिचय । कहरवा जब घट परगट राम मिले । आत्म मंगलाचार चहुँ दिशि, जन्म सुफल कर जीत चले ॥ टेक ॥ भक्ति मुक्ति अभय कर राखे, सकल शिरोमणि आप किये । निर्गुण राम निरंजन आपै, अजरावर उर लाइ लिये ॥ 1 ॥ अपने अंग संग कर राखे, निर्भय नाम निशान बजावा । अविगत नाथ अमर अविनाशी, परम पुरुष निज सो पावा ॥ 2 ॥ सोई बड़भागी सदा सुहागी, परगट प्रीतम संग भये । दादू भाग बड़े वर वर कर, सो अजरावर जीत गये ॥ 3 ॥ 75.पराभक्ति प्रार्थना । कहरवा रमैया ! यहु दुख सालै मोहि । सेज सुहाग न प्रीति प्रेम रस, दर्शन नांहीं तोहि ॥ टेक ॥ अंग प्रसंग एक रस नांही, सदा समीप न पावै । ज्यों रस में रस बहुरि न निकसै, ऐसैं होइ न आवै ॥ 1 ॥ आत्मलीन नहीं निशिवासर, भक्ति अखंडित सेवा । सन्मुख सदा परस्पर नाहीं, तातें दुख मोहि देवा ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 मगन गलित महारस माता, तूँ है तब लग पीजै । दादू जब लग अंत न आवै, तब लग देखन दीजै ॥ ३ ॥ 76. लांबी (अधीरता अस्थिरता) । दादरा गुरुमुख पाइये रे, ऐसा ज्ञान विचार । समझ समझ समझ्या नहीं, लागा रंग अपार ॥ टेक ॥ जांण जांण जांण्यां नहीं, ऐसी उपजै आइ । बूझ बूझ बूझया नहीं, ढोरी लागा जाइ ॥ 1 ॥ ले ले ले लीया नहीं, हौंस रही मन मांहि । राख राख राख्या नहीं, मैं रस पीया नांहि ॥ 2 ॥ पाय पाय पाया नहीं, तेजैं तेज समाइ । कर कर कछु किया नहीं, आतम अंग लगाइ ॥ 3 ॥ खेल खेल खेल्या नहीं, सन्मुख सिरजनहार । देख देख देख्या नहीं, दादू सेवक सार ॥ 4 ॥ 77. गुरु अधीन ज्ञान । दादरा बाबा ! गुरुमुख ज्ञाना रे, गुरुमुख ध्याना रे ॥ टेक ॥ गुरुमुख दाता गुरुमुख राता, गुरुमुख गवना रे । गुरुमुख भवना, गुरुमुख छवना, गुरुमुख रवना रे ॥ 1 ॥ गुरुमुख पूरा, गुरुमुख शूरा, गुरुमुख वाणी रे । गुरुमुख देणा, गुरुमुख लेणा, गुरुमुख जाणी रे ॥ 2 ॥ गुरुमुख गहबा, गुरुमुख रहबा, गुरुमुख न्यारा रे । गुरुमुख सारा, गुरुमुख तारा, गुरुमुख पारा रे ॥ 3 ॥ गुरुमुख राया, गुरुमुख पाया, गुरुमुख मेला रे । गुरुमुख तेजं, गुरुमुख सेजं, दादू खेला रे ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 78. निज स्थान निर्णय । दीपचन्दी मैं मेरे में हेरा, मध्य मांहिं पीव नेरा ॥ टेक ॥ जहाँ अगम अनूप अवासा, तहँ महापुरुष का वासा। तहँ जानेगा जन कोई, हरि मांहि समाना सोई ॥ 1 ॥ अखंड ज्योति जहाँ जागै, तहँ राम नाम लयौ लागै। तहँ राम रहै भरपूरा, हरि संग रहै नहिं दूरा ॥ 2 ॥ तिरवेणी तट तीरा, तहँ अमर अमोलक हीरा। उस हीरे सौं मन लागा, तब भरम गया भय भागा ॥ 3 ॥ दादू देख हरि पावा, हरि सहजैं संग लखावा। पूरण परम निधाना, निज निरखत हौं भगवाना ॥ 4 ॥ 79. दीपचन्दी मेरा मन लागा सकल करा, हम निशदिन हिरदै सो धरा ॥ टेक ॥ हम हिरदै मांही हेरा, पीव परगट पाया नेरा। सो नेरे ही निज लीजै, तब सहजैं अमृत पीजै ॥ 1 ॥ जब मन ही सौं मन लागा, तब ज्योति स्वरूपी जागा। जब ज्योति स्वरूपी पाया, तब अन्तर मांही समाया ॥ 2 ॥ जब चित्त हि चित्त समाना, हम हरि बिन और न जाना। जाना जीवन सोई, अब हरि बिन और न कोई ॥ 3 ॥ जब आतम एकै बासा, पर आतम मांहि प्रकाशा। परकाशा पीव पियारा, सो दादू मिंत हमारा ॥ 4 ॥ (इति राग गौड़ी सम्पूर्णः ॥ 1 ॥ पद 79 ॥ ) (गावै राग गौड़ी, रोटी आवै दौड़ी।)

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राग माली गौड़ www.dadooram.org अथ राग माली गौड़ 2 (गायन समय संध्या 6 से रात्रि 9 बजे तक) ४०. नाम महिमा । झपताल गोविन्द ! नाम तेरा, जीवन मेरा, तारण भवपारा । आगे इहि नाम लागे, संतन आधारा ।। टेक ।। कर विचार तत्त्व सार, पूरण धन पाया । अखिल नाम अगम ठाम, भाग हमारे आया ।। 1 ।। भक्ति मूल मुक्ति मूल, भव-जल निस्तरना । भरम कर्म भंजना भय, किल्विष सब हरना ।। 2 ।। सकल सिद्धि नव निधि, पूरण सब कामा । राम रूप तत्त अनूप, दादू निज नामा ।। 3 ।।

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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 ४1. करुणा । झपताल गोविन्द ! कैसे तरिये । नाव नांही खेव नाहीं, राम विमुख मरिये ॥ टेक ॥ ज्ञान नांही ध्यान नांही, लै समाधि नांही । विरहा वैराग नांही, पंचों गुण मांही ॥ 1 ॥ प्रेम नांही प्रीति नांही, नांव नांही तेरा । भाव नांही भक्ति नांही, कायर जीव मेरा ॥ 2 ॥ घाट नांही बाट नांही, कैसे पग धरिये । वार नांही पार नांही, दादू बहु डरिये ॥ 3 ॥ ४2. विरह । शंखताल पीव ! आव हमारे रे, मिलि प्राण पियारे रे, बलि जाऊँ तुम्हारे रे ॥ टेक ॥ सुन सखी सयानी रे, मैं सेव न जानी रे, हौं भई दिवानी रे ॥ 1 ॥ सुन सखी सहेली रे, क्यों रहूँ अकेली रे, हौं खरी दुहेली रे ॥ 2 ॥ हौं करूँ पुकारा रे, सुन सिरजनहारा रे, दादू दास तुम्हारा रे ॥ 3 ॥ ४3. शंख ताल वाल्हा सेज हमारी रे, तूँ आव हौं वारी रे, हौं दासी तुम्हारी रे ॥ टेक ॥ तेरा पंथ निहारूं रे, सुन्दर सेज सँवारूं रे, जियरा तुम्ह पर वारूं रे ॥ 1 ॥ तेरा अंगड़ा पेखूं रे, तेरा मुखड़ा देखूं रे, तब जीवन लेखूं रे ॥ 2 ॥ मिल सुखड़ा दीजे रे, यहु लाहड़ा लीजे रे, तुम देखें जीजे रे ॥ 3 ॥ तेरे प्रेम की माती रे, तेरे रंगड़े राती रे, दादू वारणै जाती रे ॥ 4 ॥ ४4. फारसी । शूलताल दरबार तुम्हारे दरदवंद, पीव पीव पुकारे । दीदार दरूने दीजिये, सुन खसम हमारे ॥ टेक ॥ तनहाँ के तन पीर है, सुन तूँ ही निवारे ।

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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 करम करीमा कीजिये, मिल पीव पियारे ॥ 1 ॥ शूल सुलाको सो सहूँ, तेग तन मारे । मिल सांई सुख दीजिये, तूँ ही तूँ संभारे ॥ 2 ॥ मैं शुहदा तन सोखता, विरहा दुख जारे । जिय तरसै दीदार को, दादू न विसारे ॥ 3 ॥ ४5. शंखताल (फारसी) संइयां तूँ है साहिब मेरा, मैं हूँ बन्दा तेरा ॥ टेक ॥ बन्दा वरदा चेरा तेरा, हुकमी मैं बेचारा । मीरां मेहरबान गुसांई, तूँ सिरताज हमारा ॥ 1 ॥ गुलाम तुम्हारा मुल्ला जादा, लौंडा घर का जाया । राजिक रिजक जीव तैं दिया, हुकम तुम्हारे आया ॥ 2 ॥ शादील बै हाजिर बंदा, हुकम तुम्हारे मांही । जब ही बुलाया तब ही आया, मैं मेवासा नांही ॥ 3 ॥ खसम हमारा सिरजनहारा, साहिब समर्थ सांई । मीरां मेरा मेहर मया कर, दादू तुम ही तांई ॥ 4 ॥ ४6. करुणा । शंखताल मुझ थीं कुछ न भया रे, यहु योंही गया रे, पछतावा रह्या रे ॥ टेक ॥ मै शीश न दीया रे, भर प्रेम न पीया रे, मैं क्या कीया रे ॥ 1 ॥ हौं रंग न राता रे, रस प्रेम न माता रे, नहिं गलित गाता रे ॥ 2 ॥ मैं पीव न पाया रे, कीया मन का भाया रे, कुछ होइ न आया रे ॥ 3 ॥ हौं रहूँ उदासा रे, मुझे तेरी आशा रे, कहै दादू दासा रे ॥ 4 ॥ ४7. वैराग्य उपदेश । निसारुक ताल मेरा मेरा छाड़ गँवारा, सिर पर तेरे सिरजनहारा ।

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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 अपने जीव विचारत नांहीं, क्या ले गइला वंश तुम्हारा ॥ टेक ॥ तब मेरा कृत करता नांही, आवत है हंकारा। काल चक्र सौं खरी परी रे, विसर गया घरबारा ॥ 1 ॥ जाइ तहाँ का संजम कीजै, विकट पंथ गिरिधारा। दादू रे तन अपना नांहीं, तो कैसे भया संसारा ॥ 2 ॥ ४४. निसारुक ताल दादू दास पुकारे रे, सिर काल तुम्हारे रे, सर सांधे मारे रे ॥ टेक ॥ जम काल निवारी रे, मन मनसा मारी रे, यहु जन्म न हारी रे ॥ 1 ॥ सुख नींद न सोई रे, अपना दुख रोई रे, मन मूल न खोई रे ॥ 2 ॥ सिर भार न लीजी रे, जिसका तिसको दीजी रे, अब ढील न कीजी रे ॥ 3 ॥ यहु औसर तेरा रे, पंथी जाग सवेरा रे, सब बाट बसेरा रे ॥ 4 ॥ सब तरुवर छाया रे, धन जौबन माया रे, यहु काची काया रे ॥ 5 ॥ इस भ्रम न भूली रे, बाजी देख न फूली रे, सुख सागर झूली रे ॥ 6 ॥ रस अमृत पीजी रे, विष का नाम न लीजी रे, कह्या सो कीजी रे ॥ 7 ॥ सब आतम जाणी रे, अपणा पीव पिछाणी रे, यहु दादू वाणी रे ॥ 8 ॥ ४९. भक्ति उपदेश । त्रिताल पूजूं पहली गणपति राइ, पड़िहौं पावों चरणों धाइ। आगै ह्वै कर तीर लगावै, सहजैं अपने बैन सुनाइ ॥ टेक ॥ कहूँ कथा कुछ कही न जाई, इक तिल में ले सबै समाइ ॥ 1 ॥ गुण हु गहीर धीर तन देही, ऐसा समरथ सबै सुहाइ ॥ 2 ॥ जिस दिशि देखूं ओही है रे, आप रह्या गिरि तरुवर छाइ ॥ 3 ॥ दादू रे आगै क्या होवै, प्रीति पिया कर जोड़ लगाइ ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 ९०. परिचय । पंचम ताल नीको धन हरि कर मैं जान्यौं, मेरे अखई वोही। आगे पीछे सोई है रे, और न दूजा कोई ॥ टेक॥ कबहूँ न छाडूँ संग पिया को, हरि के दर्शन मोही। भाग हमारे जो हौं पाऊँ, शरणै आयो तोही ॥ 1 ॥ आनन्द भयो सखी जिय मेरे, चरण कमल को जोई। दादू हरि को बावरो, बहुरि वियोग न होई ॥ 2 ॥ ९१. (फारसी) हित उपदेश । पंचम ताल बाबा मर्दे मर्दां गोइ, ये दिल पाक कर्दम धोइ ॥ टेक॥ तर्क दुनियाँ दूर कर दिल, फर्ज फारिग होइ। पैवस्त परवरदिगार सौं, आकिलां सिर सोइ ॥ 1 ॥ मनी मुरदः हिर्स फानी, नफ्स रा पामाल। बदी रा बरतरफ करदः, नाम नेकी ख्याल ॥ 2 ॥ जिंदगानी मुरदः बाशद, कुंजे कादिर कार। तालिबां रा हक, हासिल, पासबाने यार ॥ 3 ॥ मर्दे मर्दां सालिकां सर, आशिकां सुलतान। हजूरी होशियार दादू, इहै गो मैदान ॥ 4 ॥ ९२. ईश्वर चरित । त्रिताल ये सब चरित तुम्हारे मोहना, मोहे सब ब्रह्माण्ड खंडा। मोहे पवन पानी परमेश्वर, सब मुनि मोहे रवि चंदा ॥ टेक॥ साइर सप्त मोहे धरणी धरा, अष्ट कुली पर्वत मेरु मोहे। तीन लोक मोहे जगजीवन, सकल भुवन तेरी सेव सोहे ॥ 1 ॥ शिव बिरंचि नारद मुनि मोहे, मोहे सुर सब सकल देवा। मोहे इन्द्र फणीन्द्र पुनि मोहे, मुनि मोहे तेरी करत सेवा ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 अगम अगोचर अपार अपरम्परा, को यहु तेरे चरित न जानैं । ये शोभा तुमको सोहे सुन्दर, बलि बलि जाऊँ दादू न जानैं ॥ ३ ॥ ९३. गुरु ज्ञान। त्रिताल ऐसा रे गुरु ज्ञान लखाया, आवै जाइ सो दृष्टि न आया ॥ टेक॥ मन थिर करूँगा, नाद भरूँगा, राम रमूँगा, रस माता ॥ १ ॥ अधर रहूँगा, करम दहूँगा, एक भजूंगा, भगवंता ॥ २ ॥ अलख लखूँगा, अकथ कथूँगा, एक मथूँगा, गोविन्दा ॥ ३ ॥ अगह गहूँगा, अकह कहूँगा, अलह लहूँगा, खोजन्ता ॥ ४ ॥ अचर चरूंगा, अजर जरूंगा, अतिर तिरूंगा, आनन्दा ॥ ५ ॥ यहु तन तारूं, विषय निवारूं, आप उबारूं, साधन्ता ॥ ६ ॥ आऊँ न जाऊँ, उनमनि लाऊँ, सहज समाऊँ, गुणवंता ॥ ७ ॥ नूर पिछाणूं, तेजहि जाणूं, दादू ज्योतिहि देखन्ता ॥ ८ ॥ ९४. तत्व उपदेश। पंचम ताल बंदे हाजिरां हजूर वे, अल्लह आली नूर वे । आशिकां रा सिदक साबित, तालिबां भरपूर वे ॥ टेक॥ वजूद में मौजूद है, पाक परवरदिगार वे । देख ले दीदार को, गैब गोता मार वे ॥ १ ॥ मौजूद मालिक तख्त खालिक, आशिकां रा ऐन वे । गुदर कर दिल मग्ज भीतर, अजब है यहु सैन वे ॥ २ ॥ अर्श ऊपर आप बैठा, दोस्त दाना यार वे । खोज कर दिल कब्ज कर ले, दरूने दीदार वे ॥ ३ ॥ हुशियार हाजिर चुस्त करदा, मीरां मेहरवान वे । देख ले दर हाल दादू, आप है दीवान वे ॥ ४ ॥

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श्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 95. वस्तु निर्देश। चौताल निर्मल तत्त निर्मल तत्त निर्मल तत्त ऐसा। निर्गुण निज निधि निरंजन, जैसा है तैसा ॥ टेक॥ उतपत्ति आकार नांही, जीव नांही काया। काल नांही कर्म नांही, रहिता राम राया ॥ 1 ॥ शीत नांही घाम नांही, धूप नांही छाया। बाव नांही वर्ण नांही, मोह नांही माया ॥ 2 ॥ धरणी आकाश अगम, चंद सूर नांही। रजनी निशि दिवस नांही, पवना नहीं जांही ॥ 3 ॥ कृत्रिम घट कला नांही, सकल रहित सोई। दादू निज अगम निगम, दूजा नहीं कोई ॥ 4 ॥ इति राग माली गौड़ सम्पूर्ण ॥ 2 ॥ पद 26 ॥

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अथ राग कल्याण ३ (गायन समय संध्या 6 से 9 रात्रि) 96. उपदेश चेतावनी। त्रिताल मन मेरे कछु भी चेत गँवार ! पीछे फिर पछतावेगा रे, आवे न दूजी बार ॥ टेक ॥ काहे रे मन भूल्यो फिरत है, काया सोच विचार। जिन पंथों चलना है तुझ को, सोई पंथ सँवार ॥ 1 ॥ आगै बाट बिषम जो मन रे, जिमि खांडे की धार। दादू दास सांई सौं सूत कर, कूड़े काम निवार ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग कल्याण 3 97. परिचय । त्रिताल जग सौं कहा हमारा, जब देख्या नूर तुम्हारा ॥ टेक ॥ परम तेज घर मेरा, सुख सागर माहिं बसेरा ॥ 1 ॥ झिलमिल अति आनन्दा, तहँ पाया परमानन्दा ॥ 2 ॥ ज्योति अपार अनन्ता, खेलें फाग बसन्ता ॥ 3 ॥ आदि अंत अस्थाना, जन दादू सो पहचाना ॥ 4 ॥ इति राग कल्याण सम्पूर्णः ॥ 3 ॥ पद 2 ॥

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अथ राग कान्हड़ा 4 (गायन समय रात्रि 12 से 3 बजे तक) 94. विरह विनती । वर्ण भिन्नताल दे दर्शन देखन तेरा, तो जिय जक पावै मेरा ॥ टेक ॥ पीव तूँ मेरी वेदन जानै, हौं कहाँ दुराऊं छानै, मेरा तुम देखे मन मानै ॥ 1 ॥ पीव करक कलेजे मांही, सो क्योंही निकसै नांही, पीव पकर हमारी बांही ॥ 2 ॥ पीव रोम रोम दुख सालै, इन पीरों पिंजर जालै, जीव जाता क्यों ही बालै ॥ 3 ॥ पीव सेज अकेली मेरी, मुझ आरति मिलणै तेरी, धन दादू वारी फेरी ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4 99. वर्ण भिन्न ताल आव सलौने देखन दे रे, बलि बलि जाऊँ बलिहारी तेरे ॥ टेक ॥ आव पिया तूँ सेज हमारी, निसदिन देखूं बाट तुम्हारी ॥ 1 ॥ सब गुण तेरे अवगुण मेरे, पीव हमारी आह न ले रे ॥ 2 ॥ सब गुणवंता साहिब मेरा, लाड़ गहेला दादू केरा ॥ 3 ॥ 100. पंचम ताल आव पियारे मींत हमारे, निशदिन देखूं पाँव तुम्हारे ॥ टेक ॥ सेज हमारी पीव सँवारी, दासी तुम्हारी सो धन वारी ॥ 1 ॥ जे तुझ पाऊँ अंग लगाऊँ, क्यों समझाऊँ वारणें जाऊँ ॥ 2 ॥ पंथ निहारूं बाट सँवारूं, दादू तारूं तन मन वारूं ॥ 3 ॥ 101. (सिंधी) । पंचम ताल आ वे सजणां आव, शिर पर धर पाँव। जानी मैंडा जिन्द असाडे, तूँ रावैंदा राव वे, सजणां आव ॥ टेक ॥ इत्थां उत्थां जित्थां कित्थां, हूँ जीवां तो नाल वे। मीयां मैंडा आव असाडे, तूँ लालों सिर लाल वे, सजणां आव ॥ 1 ॥ तन भी देवाँ, मन भी देवाँ, देवाँ पिंड पराण वे। सच्चा सांई मिल इत्थांईं, जिन्द करां कुरबाण वे, सजणां आव ॥ 2 ॥ तूँ पाकों शिर पाक वे, सजणां, तूँ खूबों शिर खूब। दादू भावे सजणां आवे, तूँ मिट्ठा महबूब वे, सजणां आव ॥ 3 ॥ 102. विनती । राज विद्याधर ताल दयाल अपनै चरणनि मेरा चित्त लगावहु, नीकें ही करी ॥ टेक ॥ नखशिख सुरति सरीर, तूँ नांव रहौं भरी ॥ 1 ॥ मैं अजाण मतिहीण, जम की पाश तैं रहत हूँ डरी ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4 सबै दोष दादू के दूर कर, तुम ही रहो हरी ॥ 3 ॥ 103. तर्क चेतावनी । राज विद्याधर ताल मन मतिहीण धरै, मूरख मन कछु समझत नाहीं, ऐसैं जाइ जरै ॥ टेक ॥ नाम बिसार अवर चित राखै, कूड़े काज करै । सेवा हरि की मनहुँ न आणै, मूरख बहुरि मरै ॥ 1 ॥ नाम संगम कर लीजे प्राणी, जम तैं कहा डरै । दादू रे जे राम संभारै, सागर तीर तिरै ॥ 2 ॥ 104. संत सहाय रक्षा । राज मृगांक ताल पीव तैं अपने काज सँवारे । कोई दुष्ट दीन कों मारन, सोई गहि तैं मारे ॥ टेक ॥ मेरु समान ताप तन व्यापै, सहजैं ही सो टारे । संतन को सुखदाई माधो, बिन पावक फँद जारे ॥ 1 ॥ तुम थैं होइ सबै विधि समर्थ, आगम सबै विचारे । संत उबार दुष्ट दुख दीन्हा, अंध कूप में डारे ॥ 2 ॥ ऐसा है सिर खसम हमारे, तुम जीते खल हारे । दादू सौं ऐसे निर्बहिये, प्रेम प्रीति पिव प्यारे ॥ 3 ॥ 105. माया । मल्लिका मोद ताल काहू तेरा मर्म न जाना रे, सब भये दीवाना रे ॥ टेक ॥ माया के रस राते माते, जगत भुलाना रे । को काहू का कह्या न मानै, भये अयाना रे ॥ 1 ॥ माया मोहे मुदित मगन, खानखाना रे । विषिया रस अरस परस, साच ठाना रे ॥ 2 ॥ आदि अंत जीव जन्त, किया पयाना रे । दादू सब भ्रम भूले, देखि दाना रे ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4 106. अनन्य शरण। मल्लिका मोद ताल तूँ ही तूँ गुरुदेव हमारा, सब कुछ मेरे नाम तुम्हारा ॥ टेक॥ तुम हीं पूजा, तुम हीं सेवा, तुम हीं पाती, तुम हीं देवा ॥ 1 ॥ योग यज्ञ तूँ साधन जाप, तुम हीं मेरे आपै आपं ॥ 2 ॥ तप तीरथ तूँ व्रत स्नाना, तुम हीं ज्ञाना तुम हीं ध्याना ॥ 3 ॥ वेद भेद तूँ पाठ पुराणा, दादू के तुम पिंड पराणा ॥ 4 ॥ 107. गजताल तूँ ही तूँ आधार हमारे, सेवक सुत हम राम तुम्हारे ॥ टेक॥ माई बाप तूँ साहिब मेरा, भक्ति-हीण मैं सेवक तेरा ॥ 1 ॥ मात पिता तूँ बान्धव भाई, तुम ही मेरे सजन सहाई ॥ 2 ॥ तुम हीं तातं तुम ही मातं, तुम ही जातं, तुम्ह ही न्यातं ॥ 3 ॥ कुल कुटुम्ब तूँ सब परिवारा, दादू का तूँ तारणहारा ॥ 4 ॥ 108. परिचय विनती । भंग ताल नूर नैन भरि देखन दीजे, अमी महारस भर भर पीजे ॥ टेक॥ अमृत धारा, वार न पारा, निर्मल सारा तेज तुम्हारा ॥ 1 ॥ अजर जरंता, अमी झरंता, तार अनंता बहु गुणवंता ॥ 2 ॥ झिलमिल सांई, ज्योति गुसांई, दादू मांही नूर रहांई ॥ 3 ॥ 109. परिचय । भंगताल ऐन एक सो मीठा लागै, ज्योति स्वरूपी ठाढ़ा आगे ॥ टेक॥ झिलमिल करणां, अजरा जरणां, नीझर झरणां, तहँ मन धरणां ॥ 1 ॥ निज निरधारं, निर्मल सारं, तेज अपारं, प्राण अधारं ॥ 2 ॥ अगहा गहणां, अकहा कहणां, अलहा लहणां, तहँ मिल रहणां ॥ 3 ॥ निरसंध नूरं, सब भरपूरं, सदा हजूरं, दादू सूरं ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग कान्हड़ा 4 110. निस्पृहता । प्रतिताल तो काहे की परवाह हमारे, राते माते नाम तुम्हारे ॥ टेक ॥ झिलमिल झिलमिल तेज तुम्हारा, परगट खेलै प्राण हमारा ॥ 1 ॥ नूर तुम्हारा नैनों मांही, तन मन लागा छूटै नांही ॥ 2 ॥ सुख का सागर वार न पारा, अमी महारस पीवनहारा ॥ 3 ॥ प्रेम मगन मतवाला माता, रंग तुम्हारे दादू राता ॥ 4 ॥ इति राग कान्हड़ा सम्पूर्ण ॥ 4 ॥ पद 13 ॥

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अथ राग अडाणा 5 (गायन समय मध्य रात्रि 12 से 3 बजे) 111. समर्थ गुरु महिमा । त्रिताल भाई रे ऐसा सतगुरु कहिये, भक्ति मुक्ति फल लहिये ॥ टेक ॥ अविचल अमर अविनाशी, अठ सिधि नव निधि दासी ॥ 1 ॥ ऐसा सतगुरु राया, चार पदारथ पाया ॥ 2 ॥ अमी महारस माता, अमर अभय पद दाता ॥ 3 ॥ सतगुरु त्रिभुवन तारे, दादू पार उतारे ॥ 4 ॥ 112. गुरुमुख कसौटी । ललित ताल भाई रे, भानै घड़ै गुरु मेरा, मैं सेवक उस केरा ॥ टेक ॥ कंचन कर ले काया, घड़ घड़ घाट निपाया ॥ 1 ॥

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