सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-राग केदार 6 कंथा पहरूँ, भस्म लगाऊँ, वैरागिनि ह्वै ढूँढूँ, रे राम ॥ 1 ॥ गिरिवर वासा, रहूँ, उदासा, चढ़ि सिर मेरु पुकारूँ, रे राम ॥ 2 ॥ यहु तन जालूूँ, यहु मन गालूँ, करवत शीश चढ़ाऊँ, रे राम ॥ 3 ॥ शीश उतारूँ, तुम्ह पर वारूँ, दादू बलि बलि जाऊँ, रे राम ॥ 4 ॥ 119. विनती । गजताल अरे मेरा अमर उपावणहार रे खालिक! आशिक तेरा ॥ टेक ॥ तुम सौं राता, तुम सौं माता, तुम सौं लागा रंग, रे खालिक ॥ 1 ॥ तुम सौं खेला, तुम सौं मेला, तुम सौं प्रेम स्नेह, रे खालिक ॥ 2 ॥ तुम सौं लेना, तुम सौं देणा, तुम्हीं सौं रत होइ, रे खालिक ॥ 3 ॥ खालिक मेरा, आशिक तेरा, दादू अनत न जाइ, रे खालिक ॥ 4 ॥ 120. स्तुति । गजताल अरे मेरे समर्थ साहिब रे अल्लह! नूर तुम्हारा ॥ टेक ॥ सब दिशि देवै, सब दिश लेवै, सब दिशि वार न पार, रे अल्लह ॥ 1 ॥ सब दिशि कर्त्ता, सब दिशि हर्त्ता, सब दिशि तारणहार, रे अल्लह ॥ 2 ॥ सब दिशि वक्ता, सब दिशि श्रोता, सब दिशि देखणहार, रे अल्लह ॥ 3 ॥ तूँ है तैसा, कहिये ऐसा, दादू आनन्द होइ, रे अल्लह ॥ 4 ॥ 121. (सिंधी) विरह विलाप । मल्लिका मोद ताल हाल असां जो लालड़े, तो के सब मालूमड़े ॥ टेक ॥ मंझे खामा मंझि बराला, मंझे लागी भाहिड़े । मंझे मेड़ी मुच थईला, कै दरि करियां धाहड़े ॥ 1 ॥ विरह कसाई मुं गरेला, मंझे बढ़े माइहड़े । सीखों करे कवाब जीला, इयें दादू जो ह्याहड़े ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग केदार 6 122. विनती । मल्लिका मोद ताल पीवजी सेती नेह नवेला, अति मीठा मोहि भावे रे । निशदिन देखौं बाट तुम्हारी, कब मेरे घर आवे रे ॥ टेक ॥ आइ बनी है साहिब सेती, तिस बिन तिल क्यों जावे रे । दासी कों दर्शन हरि दीजे, अब क्यों आप छिपावे रे ॥ 1 ॥ तिल तिल देखूं साहिब मेरा, त्यों त्यों आनन्द अंग न मावे रे । दादू ऊपर दया मया करि, कब नैनहुँ नैन मिलावे रे ॥ 2 ॥ 123. (गुजराती भाषा) । राज मृगांक ताल पीव घर आवे रे, वेदन मारी जाणी रे । विरह संताप कौण पर कीजे, कहूँ छूं दुख नी कहाणी रे ॥ टेक ॥ अंतरजामी नाथ मारा, तुज बिण हूँ सीदाणी रे । मंदिर मारे केम न आवे, रजनी जाइ बिहाणी रे ॥ 1 ॥ तारी बाट हूँ जोइ थाकी, नैण निखूट्या पाणी रे । दादू तुज बिण दीन दुखी रे, तूं साथी रह्यो छे ताणी रे ॥ 2 ॥ 124. (गुजराती) विरह विनती । राज मृगांक ताल कब मिलसी पीव गृह छाती, हौं औराँ संग मिलाती ॥ टेक ॥ तिसज लागी तिसही केरी, जन्म जन्म नो साथी । मीत हमारा आव पियारा, ताहरा रंग नी राती ॥ 1 ॥ पीव बिना मने नींद न आवे, गुण ताहरा ले गाती । दादू ऊपर दया मया करि, ताहरे वारणे जाती ॥ 2 ॥ 125. विरह (गुजराती) । राज विद्याधर ताल म्हारा रे वाहला ने काजे, हृदये जोवा ने हौं ध्यान धरूं। आकुल थाये प्राण मारा, कोने कही पर करूं ॥ टेक ॥ संभार्यो आवे रे वाहला, वेहला एहों जोई ठरूं।
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श्री दादूवाणी-राग केदार 6 साथीजी साथे थइ ने, पेली तीरे पार तरूं ॥ 1 ॥ पीव पाखे दिन दुहेला जाये, घड़ी बरसां सौं केम भरूं। दादू रे जन हरि गुण गाता, पूरण स्वामी ते वरूं ॥ 2 ॥ 126. विरह विलाप । झपताल मरिये मीत विछोहे, जियरा जाइ अंदोहे ॥ टेक ॥ ज्यों जल विछुरे मीना, तलफ तलफ जिय दीन्हा, यों हरि हम सौं कीन्हा ॥ 1 ॥ चातक मरै पियासा, निशदिन रहै उदासा, जीवै किहि बेसासा ॥ 2 ॥ जल बिन कमल कुम्हलावै, प्यासा नीर न पावै, क्यों कर तृषा बुझावै ॥ 3 ॥ मिल जनि बिछुरो कोई, बिछुरे बहु दुख होई, क्यों कर जीवै जन सोई ॥ 4 ॥ मरणा मीत सुहेला, बिछुरन खरा दुहेला, दादू पीव सौं मेला ॥ 5 ॥ 127. त्रिताल पीव ! हौं कहा करूँ रे, पाइ परूं के प्राण हरूं रे, अब हौं मरणे नांहि डरूं रे ।। टेक ।। गाल मरूं कै, जालि मरूं रे, कै हौं करवत शीश धरूं रे ।। 1 ।। खाइ मरूं कै घाइ मरूं रे, कै हौं कतहूँ जाइ मरूं रे ।। 2 ।। तलफ मरूं कै झूरी मरूं रे, कै हौं विरही रोइ मरूं रे ।। 3 ।। टेरि कह्या मैं मरण गह्या रे, दादू दुखिया दीन भया रे ।। 4 ।। 128. गुजराती भाषा । त्रिताल वाहला हौं जाणूं जे रंग भर रमिये, मारो नाथ निमिष नहिं मेलूँ रे । अंतरजामी नाह न आवे, ते दिन आव्यो छैलो रे ।। टेक ।। वाहला सेज हमारी एकलड़ी रे, तहँ तुजने केम न पामों रे। आ दत्त हमारो पूरबलो रे, तेतो आव्यो सामों रे ।। 1 ।। वाहला मारा हृदया भीतर केम न आवै, मने चरण विलम्ब न दीजे रे।
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श्री दादूवाणी-राग केदार 6 दादू तो अपराधी तारो, नाथ उधारी लीजे रे ॥ 2 ॥ 129. (गुजराती) । पंचम ताल तूँ छे मारो राम गुसांई, पालवे तारे बाँधी रे । तुज बिना हूँ आंतरे र-वल्यो, कीधी कमाई लाधी रे ॥ टेक ॥ जीवूं जेटला हरि बिना रे, देहड़ी दुःखे दाधी रे । अेणे अवतारे कांई न जाण्यूं, माथे टक्कर खाधी रे ॥ 1 ॥ छूटको मारो क्यारे थाशे, शक्यों न राम अराधी रे । दादू ऊपर दया मया कर, हूँ तारो अपराधी रे ॥ 2 ॥ 130. (गुजराती) विनती । पंचमताल तूँ ही तूँ तनि माहरे गुसांई, तूँ बिना तूँ केने कहूँ रे । तूँ त्यां तूँ ही थई रह्यो रे, शरण तुम्हारी जाय रहूँ रे ॥ टेक ॥ तन मन मांहि जोइये त्यां तूँ, तुज दीठां हौं सुख लहूँ रे । तूँ त्यां जेटली दूर रहूँ रे, तेम तेम त्यां हौं दुःख सहूँ रे ॥ 1 ॥ तुम बिन माहरो कोई नहीं रे, हौं तो ताहरा वैण बहूँ रे । दादू रे जण हरि गुण गाता, मैं मेलूँ माहरो मैं हूँ रे ॥ 2 ॥ 131. केवल विनती । त्रिताल हमारे तुम ही हो रखपाल । तुम बिन और नहीं को मेरे, भव-दुख मेटणहार ॥ टेक ॥ वैरी पंच निमष नहिं न्यारे, रोक रहे जम काल । हा जगदीश ! दास दुख पावै, स्वामी करहु सँभाल ॥ 1 ॥ तुम्ह बिन राम दहैं ये द्वन्दर, दसौं दिशा सब साल । देखत दीन दुखी क्यों कीजे, तुम हो दीन-दयाल ॥ 2 ॥ निर्भय नाम हेत हरि दीजे, दर्शन पर्सन लाल ।
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श्री दादूवाणी-राग केदार 6 दादू दीन लीन कर लीजे, मेटहु सब जंजाल ॥ 3 ॥ 132. विनती । त्रिताल ये मन माधो बरजि बरजि । अति गति विषिया सौं रत, उठत जु गरजि गरजि ॥ टेक ॥ विषय विलास अधिक अति आतुर, विलसत शंक न मानैं । खाइ हलाहल मगन माया में, विष अमृत कर जानैं ॥ 1 ॥ पंचन के संग बहत चहूँ दिशि, उलट न क बहूँ आवै । जहाँ जहाँ काल ये जाइ तहँ तहँ, मृग जल ज्यों मन धावै ॥ 2 ॥ साध कहैं गुरु ज्ञान न मानै, भाव भजन न तुम्हारा । दादू के तुम सजन सहाई, कछू न बसाइ हमारा ॥ 3 ॥ 133. मन उपदेश । पंचम ताल हां, हमारे जियरा ! राम गुण गाइ, एही वचन विचारी मान ॥ टेक ॥ केती कहूँ मन कारणैं, तूं छाड़ि रे अभिमान । कह समझाऊँ बेर-बेर, तुझ अजहुँ न आवै ज्ञान ॥ 1 ॥ ऐसा संग कहाँ पाइये, गुण गावत आवै तान । चरणों सौं चित राखिये, निसदिन हरि को ध्यान ॥ 2 ॥ वे भी लेखा देहिंगे, आप कहावैं खान । जन दादू रे गुण गाइये, पूरण है निर्वाण ॥ 3 ॥ 134. काल चेतावनी । पंचम ताल बटाऊ ! चलना आज कि काल । समझि न देखे कहा सुख सोवे, रे मन राम संभाल ॥ टेक ॥ जैसे तरुवर वृक्ष बसेरा, पंखी बैठे आइ ।
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श्री दादूवाणी-राग केदार 6 ऐसैं यहु सब हाट पसारा, आप आपको जाइ ॥ 1 ॥ कोइ नहिं तेरा सजन संगाती, जनि खोवे मन मूल । यहु संसार देखि जनि भूलै, सब ही सैंबल फूल ॥ 2 ॥ तन नहिं तेरा धन नहिं तेरा, कहा रह्यो इहि लाग । दादू हरि बिन क्यों सुख सोवे, काहे न देखे जाग ॥ 3 ॥ 135. तर्क चेतावनी । प्रतिपाल जात कत मद को मातो रे । तन धन जोबन देख गर्वानो, माया रातो रे ॥ टेक ॥ अपनो हि रूप नैन भर देखै, कामिनी को संग भावै रे । बारम्बार विषय रत मानैं, मरबो चित्त न आवै रे ॥ 1 ॥ मैं बड़ आगे और न आवे, करत केत अभिमाना रे । मेरी मेरी करि करि फूल्यो, माया मोह भुलानां रे ॥ 2 ॥ मैं मैं करत जन्म सब खोयो, काल सिरहाणे आयो रे । दादू देख मूढ़ नर प्राणी, हरि बिन जन्म गँवायो रे ॥ 3 ॥ 136. हितोपदेश । त्रिताल जागत को कदे न मूसै कोई । जागत जान जतन कर राखै, चोर न लागू होई ॥ टेक ॥ सोवत साह वस्तु नहिं पावे, चोर मूसै घर घेरा । आस पास पहरे को नाहीं, वस्ते कीन नबेरा ॥ 1 ॥ पीछे कहु क्या जागे होई, वस्तु हाथ तैं जाई । बीती रैन बहुरि नहिं आवै, तब क्या करि है भाई ॥ 2 ॥ पहले ही पहरे जे जागै, वस्तु कछू नहिं छीजे । दादू जुगति जान कर ऐसी, करना है सो कीजे ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग केदार 6 137. उपदेश । त्रिताल सजनी ! रजनी घटती जाइ । पल पल छीजै अवधि दिन आवै, अपनो लाल मनाइ ॥ टेक॥ अति गति नींद कहा सुख सोवै, यहु अवसर चलि जाइ । यहु तन विछुरैं बहुरि कहँ पावै, पीछे ही पछिताइ ॥ 1 ॥ प्राण-पति जागे सुन्दरि क्यों सोवे, उठ आतुर गहि पाइ । कोमल वचन करुणा कर आगे, नख शिख रहु लपटाइ ॥ 2 ॥ सखी सुहाग सेज सुख पावै, प्रीतम प्रेम बढ़ाइ । दादू भाग बड़े पीव पावै, सकल शिरोमणि राइ ॥ 3 ॥ 138. प्रश्न उत्तर । दादरा कोई जानै रे, मर्म माधइये केरो ? कैसे रहे ? करे का ? सजनी प्राण मेरो ॥ टेक॥ कौन विनोद करत री सजनी, कवननि संग बसेरो ? संत साधु गम आये उनके, करत जु प्रेम घणेरो ॥ 1 ॥ कहाँ निवास ? वास कहँ ? सजनी गवन तेरो । घट घट मांहि रहै निरन्तर, ये दादू नेरो ॥ 2 ॥ 139. विरह विनती । त्रिताल मन वैरागी राम को, संगि रहै सुख होइ हो ॥ टेक॥ हरि कारण मन जोगिया, क्योंहि मिलै मुझ सोइ । निरखण का मोहि चाव है, क्यों आप दिखावै मोहि हो ॥ 1 ॥ हिरदै में हरि आव तूँ, मुख देखूं मन धोहि । तन मन में तूँ ही बसै, दया न आवै तोहि हो ॥ 2 ॥ निरखण का मोहि चाव है, ये दुख मेरा खोइ । दादू तुम्हारा दास है, नैन देखन को रोइ हो ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग केदार 6 140. (गुजराती) अधीर उलाहन । त्रिताल धरणीधर बाह्या धूतो रे, अंग परस नहिं आपे रे । कह्यो अमारो कांई न माने, मन भावे ते थापे रे ॥ टेक ॥ वाही वाही ने सर्वस लीधो, अबला कोइ न जाणे रे । अलगो रहे येणी परि तेड़े, आपणड़े घर आणे रे ॥ 1 ॥ रमी रमी रे राम रजावी, केन्हों अंत न दीधो रे । गोप्य गुह्य ते कोई न जाणै, एह्वो अचरज कीधो रे ॥ 2 ॥ माता बालक रुदन करतां, वाही वाही ने राखे रे । जेवो छे तेवो आपणपो, दादू ते नहिं दाखै रे ॥ 3 ॥ 141. समर्थाई । राजमृगांक ताल सिरजनहार तैं सब होइ । उत्पत्ति परलै करै आपै, दूसर नांहीं कोइ ॥ टेक ॥ आप होइ कुलाल करता, बूँद तैं सब लोइ । आप कर अगोचर बैठा, दुनी मन को मोहि ॥ 1 ॥ आप तैं उपाइ बाजी, निरखि देखै सोइ । बाजीगर को यहु भेद आवै, सहज साँज समोइ ॥ 2 ॥ जे कुछ किया सु करै आपै, येह उपजै मोहि । दादू रे हरि नाम सेती, मैल कश्मल धोइ ॥ 3 ॥ 142. परिचय । राजमृगांक ताल देहुरे मंझे देव पायो, वस्तु अगोचर लखायो ॥ टेक ॥ अति अनूप ज्योति-पति, सोई अन्तर आयो । पिंड ब्रह्माण्ड सम, तुल्य दिखायो ॥ 1 ॥ सदा प्रकाश निवास निरंतर, सब घट मांहि समायो । नैन निरख नेरो, हिरदै हेत लायो ॥ 2 ॥ पूरव भाग सुहाग सेज सुख, सो हरि लैन पठायो ।
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४. पद भाग: विभिन्न रागों में रचित भक्ति, विरह एवं ज्ञान-पद संग्रह
श्री दादूवाणी-राग केदार 6 देव को दादू पार न पावै, अहो पै उन्हीं चितायो ॥ ३ ॥ इति राग केदार सम्पूर्ण ॥ ६ ॥ पद २६ ॥
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राग मारू www.dadooram.org अथ राग मारू 7 (गायन समय सायंकाल 6 से 9 रात्रि) 143. उपदेश । झपताल मना ! जप राम नाम लीजे, साधु संगति सुमिर सुमिर, रसना रस पीजै ॥ टेक ॥ साधू जन सुमिरन कर, केते जप जागे । अगम निगम अमर किये, काल कोइ न लागे ॥ 1 ॥ नीच ऊँच चिन्त न कर, शरणागति लीये । भक्ति मुक्ति अपनी गति, ऐसैं जन कीये ॥ 2 ॥ केते तिर तीर लागे, बन्धन भव छूटे । कलि मल विष जुग जुग के, राम नाम खूटे ॥ 3 ॥ भरम करम सब निवार, जीवन जप सोई । दादू दुख दूर करण, दूजा नहिं कोई ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7 144. झपताल मना, जप राम नाम कहिये । राम नाम मन विश्राम, संगी सो गहिये ॥ टेक॥ जाग जाग सोवे कहा, काल कंध तेरे । बारम्बार कर पुकार, आवत दिन नेरे ॥ 1 ॥ सोवत सोवत जन्म बीते, अजहूँ न जीव जागे । राम सँभार नींद निवार, जन्म जुरा लागे ॥ 2 ॥ आस पास भरम बँध्यो, नारी गृह मेरा । अंत काल छाड़ चल्यो, कोई नहिं तेरा ॥ 3 ॥ तज काम क्रोध मोह माया, राम राम करणा । जब लग जीव प्राण पिंड, दादू गहि शरणा ॥ 4 ॥ 145. विरह । अङ्गुताल क्यों विसरै मेरा पीव पियारा, जीव की जीवन प्राण हमारा ॥ टेक॥ क्यों कर जीवै मीन जल बिछुरै, तुम्ह बिन प्राण सनेही । चिन्तामणि जब कर तैं छूटै, तब दुख पावै देही ॥ 1 ॥ माता बालक दूध न देवै, सो कैसे कर पीवै । निर्धन का धन अनत भुलाना, सो कैसे कर जीवै ॥ 2 ॥ बरषहु राम सदा सुख अमृत, नीझर निर्मल धारा । प्रेम पियाला भर भर दीजे, दादू दास तुम्हारा ॥ 3 ॥ 146. अत्यन्त विरह (गुजराती भाषा) । अङ्गुताल कोई कहो रे मारा नाथ ने, नारी नैण निहारे बाट रे ॥ टेक॥ दीन दुखिया सुन्दरी, करुणा वचन कहे रे । तुम बिन नाह विरहणी व्याकुल, केम कर नाथ रहे रे ॥ 1 ॥ भूधर बिन भावे नहिं कोई, हरि बिन और न जाणे रे ।
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7 देह गृह हूँ तेने आपूं, जे कोई गोविन्द आणे रे ॥ 2 ॥ जगपति ने जोवा ने काजे, आतुर थई रही रे । दादू ने देखाड़ो स्वामी, व्याकुल होई गई रे ॥ 3 ॥ 147. विरह विलाप । पंजाबी त्रिताल कबहुँ ऐसा विरह उपावै रे, पीव बिन देखे जीव जावै रे ॥ टेक ॥ विपति हमारी सुनहु सहेली, पीव बिन चैन न आवै रे । ज्यौं जल भिन्न मीन तन तलफै, पीव बिन वज्र बिहावै रे ॥ 1 ॥ ऐसी प्रीति प्रेम की लागै, ज्यौं पंखी पीव सुनावै रे । त्यूं मन मेरा रहै निसवासर, कोइ पीव कूं आण मिलावै रे ॥ 2 ॥ तो मन मेरा धीरजधरही, कोइ आगम आण जनावे रे । तो सुख जीव दादू का पावै, पल पिवजी आप दिखावे रे ॥ 3 ॥ 148. (गुजराती भाषा) पंजाबी त्रिताल अमे विरहणिया राम तुम्हारड़िया । तुम बिन नाथ अनाथ, कांइ बिसारड़िया ॥ टेक ॥ अपने अंग अनल परजाले, नाथ निकट नहिं आवे रे । दर्शन कारण विरहनि व्याकुल, और न कोई भावे रे ॥ 1 ॥ आप अपरछन अमने देखे, आपणपो न दिखाड़े रे । प्राणी पिंजर लेइ रह्यो रे, आड़ा अन्तर पाड़े रे ॥ 2 ॥ देव देव कर दरशन माँगे, अन्तरजामी आपे रे । दादू विरहणी वन वन ढूँढ़े, ये दुख कांइ न कापे रे ॥ 3 ॥ 149. विरह प्रश्न । राज विद्याधर ताल पंथीड़ा बूझै विरहणी, कहिनैं पीव की बात, कब घरआवै कब मिलूँ, जोऊँ दिन अरु रात, पंथीड़ा ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7 कहाँ मेरा प्रीतम कहाँ बसै, कहाँ रहै कर वास? कहँ ढूँढूँ कहँ पाइये, कहाँ रहे किस पास, पंथीड़ा ॥ 1 ॥ कवन देश कहँ जाइये, कीजे कौन उपाय ? कौन अंग कैसे रहे, कहा करै, समझाइ, पंथीड़ा ॥ 2 ॥ परम सनेही प्राण का, सो कत देहु दिखाइ । जीवनि मेरे जीव की, सो मुझ आनि मिलाइ, पंथीड़ा ॥ 3 ॥ नैन न आवै नींदड़ी, निशदिन तलफत जाइ । दादू आतुर विरहणी, क्यूं करि रैन विहाइ, पंथीड़ा ॥ 4 ॥ 150. समुच्चय उत्तर । राज विद्याधर ताल पंथीड़ा पंथ पिछाणी रे पीव का, गहि विरहै की बाट । जीवत मृतकह्वै चले, लंघे औघट घाट, पंथीड़ा ॥ टेक ॥ सतगुरु सिर पर राखिये, निर्मल ज्ञान विचार । प्रेम भक्ति कर प्रीत सौं, सन्मुख सिरजनहार, पंथीड़ा ॥ 1 ॥ पर आतम सौं आत्मा, ज्यों जल जलहि समाइ । मन हीं सौं मन लाइये, लै के मारग जाइ, पंथीड़ा ॥ 2 ॥ तालाबेली ऊपजै, आतुर पीड़ पुकार । सुमिर सनेही आपणा, निशदिन बारम्बार, पंथीड़ा ॥ 3 ॥ देखि देखि पग राखिये, मारग खांडे धार । मनसा वाचा कर्मणा, दादू लंघे पार, पंथीड़ा ॥ 4 ॥ 151. अनुक्रम से उत्तर । राज मृगांक ताल साध कहैं उपदेश विरहणी ! तन भूले तब पाइये, निकट भया परदेश, विरहणी ॥ टेक ॥ तुम ही माहैं ते बसैं, तहाँ रहे कर वास । तहँ ढूँढ़े पीव पाइये, जीवन जीव के पास, विरहणी ॥ 1 ॥
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7 परम देश तहँ जाइये, आतम लीन उपाइ। एक अंग ऐसे रहै, ज्यों जल जलहि समाइ, विरहणी ॥ 2 ॥ सदा संगाती आपणा, कबहूँ दूर न जाइ। प्राण सनेही पाइये, तन मन लेहु लगाइ, विरहणी ॥ 3 ॥ जागै जगपति देखिये, प्रकट मिल है आइ। दादू सन्मुख ह्वै रहै, आनन्द अंग न माइ, विरहणी ॥ 4 ॥ 152. विरह विनती । गुजराती मकरन्द ताल गोविन्दा ! गाइबा दे रे, आडड़ी आन निवार, गोविन्दा गाइबा दे रे। अनुदिन अंतर आनन्द कीजे, भक्ति प्रेम रस सार रे ॥ टेक ॥ अनभै आत्म अभै एक रस, निर्भय कांइ न कीजै रे। अमी महारस अमृत आपै, अम्हे रसिक रस पीजे रे ॥ 1 ॥ अविचल अमर अखै अविनाशी, ते रस कांइ न दीजे रे। आतम राम अधार अम्हारो, जन्म सुफल कर लीजे रे ॥ 2 ॥ देव दयाल कृपाल दमोदर, प्रेम बिना क्यों रहिये रे। दादू रंग भर राम रमाड़ो, भक्त-बछल तूँ कहिये रे ॥ 3 ॥ 153. (गुजराती भाषा) । मकरन्द ताल गोविन्दा जोइबा देरे, जे बरजे ते वारी रे । गोविन्दा जोइबा दे रे। आदि पुरुष तूँ अच्छय अम्हारो, कंत तुम्हारी नारी रे ॥ टेक ॥ अंगै संगै रंगै रमिये, देवा दूर न कीजे रे। रस मांही रस इम थई रहिये, ये सुख अमने दीजे रे ॥ 1 ॥ सेजड़िये सुख रंग भर रमिये, प्रेम भक्ति रस लीजे रे। एकमेक रस केलि करतां, अम्हे अबला इम जीजे रे ॥ 2 ॥ समर्थ स्वामी अन्तरजामी, बार बार कांइ बाहे रे।
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7 आदैं अन्तैं तेज तुम्हारो, दादू देखे गाये रे ॥ 3 ॥ 154. (गुजराती भाषा) । शूल ताल तुम्ह सरसी रंग रमाड़ । आप अपरछन थई करी, मने मा भरमाड़ ॥ टेक ॥ मन भोलवे कांइ थई वेगलो, आपणपो देखाड़ । केम जीवूं हौं एकली, बिरहणिया नार ॥ 1 ॥ मने बाहिश मा अलगो थई, आत्मा उद्धार । दादू सूं रमिये सदा, येणे परें तार ॥ 2 ॥ 155. काल चेतावनी । तुरंग लील ताल जाग रे, किस नींदड़ी सूता, रैण बिहाई सब गई, दिन आइ पहूँता ॥ टेक ॥ सो क्यों सोवे नींदड़ी, जिस मरणा होवे रे । जोरा वैरी जागणा, जीव तूँ क्यों सोवे रे ॥ 1 ॥ जाके सिर पर जम खड़ा, शर सांधे मारे रे । सो क्यों सोवे नींदड़ी, कहि क्यूं न पुकारे रे ॥ 2 ॥ दिन प्रति निशि काल झंपै, जीव न जागे रे । दादू सूता नींदड़ी, उस अंग न लागे रे ॥ 3 ॥ 156. तुरंग । लील ताल जाग रे सब रैण बिहाणी, जाइ जन्म अंजलि को पाणी ॥ टेक ॥ घड़ी घड़ी घड़ियाल बजावै, जे दिन जाइ सो बहुरि न आवै ॥ 1 ॥ सूरज चंद कहैं समझाइ, दिन दिन आयु घटती जाइ ॥ 2 ॥ सरवर पाणी तरवर छाया, निशिदिन काल गिरासै काया ॥ 3 ॥ हंस बटाऊ प्राण पयाना, दादू आतम राम न जाना ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
- चौताल आदि काल अंत काल, मध्य काल भाई। जन्म काल जुरा काल, काल संग सदाई ॥ टेक ॥ जागत काल सोवत काल, काल झंपै आई। काल चलत काल फिरत, कबहूँ ले जाई ॥ 1 ॥ आवत काल जावत काल, काल कठिन खाई। लेत काल देत काल, काल ग्रसै धाई ॥ 2 ॥ कहत काल सुनत काल, करत काल सगाई। काम काल क्रोध काल, काल जाल छाई ॥ 3 ॥ काल आगै काल पीछैं, काल संग समाई। काल रहित राम गहित, दादू ल्यौ लाई ॥ 4 ॥
- हित उपदेश । त्रिताल तो को केता कह्या मन मेरे । क्षण इक मांही जाइ अनेरे, प्राण उधारी ले रे ॥ टेक ॥ आगे है मन खरी विमासणि, लेखा मांगै दे रे। काहे सोवे नींद भरी रे, कृत विचारे तेरे ॥ 1 ॥ ते परि कीजे मन विचारे, राखै चरणहु नेरे। रती इक जीवन मोहि न सूझै, दादू चेत सवेरे ॥ 2 ॥
- (गुजराती) । त्रिताल मन वाहला रे, कछू विचारी खेल, पड़सी रे गढ़ भेल ॥ टेक ॥ बहु भाँति दुख देइगा वाहला, ज्यों तिल माँ लीजे तेल। करणी ताहरी सोधसी रे, होसी रे सिर हेल ॥ 1 ॥ अब ही तैं कर लीजिये रे वाहला, सांई सेती मेल। दादू संग न छाड़ि पीव का, पाई है गुण की बेल ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7 160. उदीक्षण । ताल मन बावरे हो, अनत जनि जाइ, तो तूँ जीवै अमीरस पीवै, अमर फल काहे न खाइ ॥ टेक ॥ रहु चरण शरण सुख पावै, देखहु नैन अघाइ। भाग तेरे पीव नेरे, थीर थान बताइ ॥ 1 ॥ संग तेरे रहै घेरे, सहजैं अंग समाइ। शरीर मांही शोध सांई, अनहद ध्यान लगाइ ॥ 2 ॥ पीव पास आवै सुख पावै, तन की तप्त बुझाइ। दादू रे जहाँ नाद ऊपजै, पीव पास दिखाइ ॥ 3 ॥ 161. भ्रम विध्वंसन । उदीक्षण ताल निरंजन अंजन कीन्हा रे, सब आतम लीन्हा रे ॥ टेक ॥ अंजन माया अंजन काया, अंजन छाया रे । अंजन राते अंजन माते, अंजन पाया रे ॥ 1 ॥ अंजन मेरा अंजन तेरा, अंजन मेला रे । अंजन लीया अंजन दीया, अंजन खेला रे ॥ 2 ॥ अंजन देवा अंजन सेवा, अंजन पूजा रे । अंजन ज्ञाना अंजन ध्याना, अंजन दूजा रे ॥ 3 ॥ अंजन वक्ता अंजन श्रोता, अंजन भावै रे । अंजन राम निरंजन कीन्हा, दादू गावै रे ॥ 4 ॥ 162. निज वचन । महिमा चौताल ध्रुपद में ऐन बैन चैन होवै, सुणतां सुख लागै रे । तीन गुण त्रिविधि तिमिर, भरम करम भागै रे ॥ टेक ॥ होइ प्रकास अति उजास, परम तत्व सूझै । परम सार निर्विकार, विरला कोई बूझै ॥ 1 ॥
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परम थान सुख निधान, परम शून्य खेलै । सहज भाइ सुख समाइ, जीव ब्रह्म मेलै ॥ 2 ॥ अगम निगम होइ सुगम, दुस्तर तिर आवै । आदि पुरुष दरस परस, दादू सो पावै ॥ 3 ॥ 163. साधु साँई हेरे त्रिताल कोई राम का राता रे, कोई प्रेम का माता रे ॥ टेक ॥ कोई मन को मारे रे, कोई तन को तारे रे, कोई आप उबारे रे ॥ 1 ॥ कोई जोग जुगंता रे, कोई मोक्ष मुकंता रे, कोई है भगवंता रे ॥ 2 ॥ कोई सद्गति सारा रे, कोई तारणहारा रे, कोई पीव का प्यारा रे ॥ 3 ॥ कोई पार को पाया रे, कोई मिलकरआया रे, कोई मन को भाया रे ॥ 4 ॥ कोई है बड़भागी रे, कोई सेज सुहागी रे, कोई है अनुरागी रे ॥ 5 ॥ कोई सब सुख दाता रे, कोई रूप विधाता रे, कोई अमृत खाता रे ॥ 6 ॥ कोई नूर पिछाणैं रे, कोई तेज कों जाणैं रे, कोई ज्योति बखाणैं रे ॥ 7 ॥ कोई साहिब जैसा रे, कोई सांई तैसा रे, कोई दादू ऐसा रे ॥ 8 ॥ 164. साधु लक्षण । दीपचन्दी सद्गति साधवा रे, सन्मुख सिरजनहार । भौजल आप तिरैं ते तारैं, प्राण उधारनहार ॥ टेक ॥ पूरण ब्रह्म राम रंग राते, निर्मल नाम अधार । सुख संतोष सदा सत संजम, मति गति वार न पार ॥ 1 ॥ जुग जुग राते, जुग जुग माते, जुग जुग संगति सार । जुग जुग मेला, जुग जुग जीवन, जुग जुग ज्ञान विचार ॥ 2 ॥ सकल शिरोमणि सब सुख दाता, दुर्लभ इहि संसार । दादू हंस रहैं सुख सागर, आये पर उपकार ॥ 3 ॥
श्री दादूवाणी-राग मारू 7 165. परिचय उत्साह मंगल । दीपचन्दी अम्ह घर पाहुणां ये, आव्या आतम राम ॥ टेक ॥ चहुँ दिशि मंगलाचार, आनन्द अति घणा ये। वरत्या जै जैकार, विरुद वधावणां ये ॥ 1 ॥ कनक कलश रस मांहिं, सखी भर ल्यावज्यो ये। आनन्द अंग न माइ, अम्हारे आवज्यो ये ॥ 2 ॥ भावै भक्ति अपार, सेवा कीजिये ये। सन्मुख सिरजनहार, सदा सुख लीजिये ये ॥ 3 ॥ धन्य अम्हारा भाग, आव्या अम्ह भणी ये। दादू सेज सुहाग, तूँ त्रिभुवन धणी ये ॥ 4 ॥ 166. फरोदस्त ताल गावहु मंगलाचार, आज बधावणां ये। सुपनों देख्यो साँच, पीव घर आवणां ये ॥ टेक ॥ भाव कलश जल प्रेम का, सब सखियन के शीश। गावत चली बधावणां, जै जै जै जगदीश ॥ 1 ॥ पदम कोटि रवि झिलमिलै, अंग अंग तेज अनन्त। विगसि वदन विरहनी मिली, घर आये हरि कंत ॥ 2 ॥ सुन्दरि सुरति सिंगार कर, सन्मुख परसे पीव। मो मंदिर मोहन आविया, वारूं तन मन जीव ॥ 3 ॥ कवल निरन्तर नरहरी, प्रकट भये भगवंत। जहाँ विरहनी गुण वीनवे, खेले फाग बसन्त ॥ 4 ॥ वर आयो विरहनी मिली, अरस परस सब अंग। दादू सुन्दरी सुख भया, जुगि जुगि यहु रस रंग ॥ 5 ॥ इति राग मारू सम्पूर्ण ॥ 7 ॥ पद 24 ॥
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अथ राग रामकली ४ (गायन समय प्रभात 3 से 6 ) 167. सद्गुरु शब्द महिमा । दादरा शब्द समाना जो रहै, गुरु बाइक बीधा । उनही लागा एक सौं, सोई जन सीधा ॥ टेक ॥ ऐसी लागी मर्म की, तन मन सब भूला । जीवत-मृतक है रहै, गह आत्म मूला ॥ 1 ॥ चेतन चितहि न बीसरे, महारस मीठा । शब्द निरंजन गह रह्या, उन साहिब दीठा ॥ 2 ॥ एक शब्द जन ऊधरे, सुनि सहजैं जागे । अंतर राते एक सौं, सर सन्मुख लागे ॥ 3 ॥ शब्द समाना सन्मुख रहै, पर आतम आगे । दादू सीझै देखतां, अविनाशी लागे ॥ 4 ॥
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