देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ३ ] तृतीय स्कन्ध २४९
अ० ३ ] तृतीय स्कन्ध २४९
| झटित्येवागतं तत्र विमानं गगनाच्छुभम्।<br>सोवाचास्मिन्सुराः कामं विशध्वं गतसाध्वसाः॥ ३७ | उसी समय वहाँ आकाशसे एक रमणीक विमान आ पहुँचा। तत्पश्चात् उन भगवतीने कहा—हे देवताओ! आप लोग निर्भीक होकर इस विमानमें इच्छानुसार बैठ जायँ॥ ३७॥ | | विमाने ब्रह्मविष्ण्वीशा दर्शयाम्यद्य चाद्भुतम्।<br>तन्निशम्य वचस्तस्या ओमित्युक्त्वा पुनर्वयम्॥ ३८<br><br>समारुह्योपविष्टाः स्मो विमाने रत्नमण्डिते।<br>मुक्तादामसुसंवीते किंकिणीजालशब्दिते॥ ३९<br><br>सुरसद्मनिभे रम्ये त्रयस्तत्राविशंकिताः।<br>सोपविष्टांस्ततो दृष्ट्वा देव्यस्मान्विजितेन्द्रियान्॥ ४०<br><br>स्वशक्त्या तद्विमानं वै नोदयामास चाम्बरे॥ ४१ | हे ब्रह्मा, विष्णु और शिव! मैं आपलोगोंको आज इस विमानमें एक अद्भुत दृश्य दिखाऊँगी। उनका यह वचन सुनकर हम तीनों उनकी बात स्वीकार करके रत्नजटित, मोतियोंकी झालरोंसे शोभायमान, घंटियोंकी ध्वनिसे गुंजित तथा देव-भवनके तुल्य उस रमणीक विमानपर संशयरहित भावसे चढ़कर बैठ गये। तब भगवतीने हम जितेन्द्रिय देवताओंको बैठा हुआ देखकर उस विमानको अपनी शक्तिसे आकाशमण्डलमें उड़ाया॥ ३८—४१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विमानेन ब्रह्मादीनाङ्गतिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
ब्रह्मा, विष्णु और महेशका विभिन्न लोकोंमें जाना तथा अपने ही सदृश अन्य ब्रह्मा, विष्णु और महेशको देखकर आश्चर्यचकित होना, देवीलोकका दर्शन
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजी बोले— |
|---|---|
| विमानं तन्मनोवेगं यत्र स्थानान्तरे गतम्।<br>न जलं तत्र पश्यामो विस्मिताः स्मो वयं तदा॥ १ | मनके समान वेगसे उड़नेवाला वह विमान जिस स्थानपर पहुँचा, वहाँ जब हमने जल नहीं देखा तब हमलोगोंको महान् आश्चर्य हुआ॥ १॥ |
| वृक्षाः सर्वफला रम्याः कोकिलारावमण्डिताः।<br>मही महीधराः कामं वनान्युपवनानि च॥ २ | उस स्थानके वृक्ष सभी प्रकारके फलोंसे लदे हुए और कोकिलोंकी मधुर ध्वनिसे गुंजायमान थे। वहाँकी भूमि, पर्वत, वन और उपवन—ये सभी सुरम्य दृष्टिगोचर हो रहे थे॥ २॥ |
| नार्यश्च पुरुषाश्चैव पशवश्च सरिद्वराः।<br>वाप्यः कूपास्तडागाश्च पल्वलानि च निर्झराः॥ ३ | उस स्थानपर स्त्रियाँ, पुरुष, पशु, बड़ी नदियाँ, बावलियाँ, कुएँ, तालाब, पोखरे तथा झरने इत्यादि विद्यमान थे॥ ३॥ |
| पुरतो नगरं रम्यं दिव्यप्राकारमण्डितम्।<br>यज्ञशालासमायुक्तं नानाहर्म्यविराजितम्॥ ४ | वहाँ भव्य चहारदीवारीसे घिरा हुआ एक मनोहर नगर था, जो यज्ञशालाओं तथा अनेक प्रकारके दिव्य महलोंसे सुशोभित था॥ ४॥ |
| प्रत्यभिज्ञा तदा जाताप्यस्माकं प्रेक्ष्य तत्पुरम्।<br>स्वर्गोऽयमिति केनासौ निर्मितोऽस्ति तदाद्भुतम्॥ ५ | तब उस नगरको देखकर हमलोगोंको ऐसी प्रतीति हुई, मानो यही स्वर्ग है और फिर हम लोगोंकी यह जिज्ञासा हुई कि इस अद्भुत नगरका निर्माण किसने किया है, उस समय हमलोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ!॥ ५॥ |
२५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजानं देवसङ्काशं व्रजन्तं मृगयां वने।<br>अस्माभिः संस्थिता दृष्टा विमानोपरि चाम्बिका॥ ६ | हमलोगों ने आखेटके उद्देश्यसे वनमें जाते हुए एक देवतुल्य राजाको देखा। उसी समय हमलोगोंको जगदम्बा भगवती भी विमानपर स्थित दिखायी पड़ीं॥ ६॥ |
| क्षणाच्चचाल गगने विमानं पवनेरितम्।<br>मुहूर्ताद्वा ततः प्राप्तं देशे चान्ये मनोहरे॥ ७ | थोड़ी ही देर बाद हमारा विमान वायुसे प्रेरित होकर आकाशमें पुनः उड़ने लगा और मुहूर्तभरमें वह पुनः एक अन्य सुरम्य देशमें पहुँच गया॥ ७॥ |
| नन्दनं च वनं तत्र दृष्टमस्माभिरुत्तमम्।<br>पारिजाततरुच्छायासंश्रिता सुरभिः स्थिता॥ ८ | वहाँपर हमलोगोंको अत्यन्त रमणीक नन्दनवन दृष्टिगत हुआ, जिसमें पारिजातवृक्षकी छायाका आश्रय लिये हुए कामधेनु स्थित थी॥ ८॥ |
| चतुर्दन्तो गजस्तस्याः समीपे समवस्थितः।<br>अप्सरसां तत्र वृन्दानि मेनकाप्रभृतीनि च॥ ९<br>क्रीडन्ति विविधैर्भावैर्गाननृत्यसमन्वितैः।<br>गन्धर्वाः शतशस्तत्र यक्षा विद्याधरास्तथा॥ १०<br>मन्दारवाटिकांमध्ये गायन्ति च रमन्ति च।<br>दृष्टः शतक्रतुस्तत्र पौलोम्या सहितः प्रभुः॥ ११ | कामधेनुके समीप ही चार दाँतोंवाला ऐरावत हाथी विद्यमान था और वहाँ मेनका आदि अप्सराओंके समूह अपने नृत्यों तथा गानोंमें विविध भाव-भंगिमाओंका प्रदर्शन करते हुए अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ कर रहे थे। वहाँ मन्दार-वृक्षकी वाटिकाओंमें सैकड़ों गन्धर्व, यक्ष और विद्याधर गा रहे थे और रमण कर रहे थे। वहाँपर इन्द्रभगवान् भी इन्द्राणीके साथ दृष्टिगोचर हुए॥ ९-११॥ |
| वयं तु विस्मिताश्चास्म दृष्ट्वा त्रैविष्टपं तदा।<br>यादःपतिं कुबेरं च यमं सूर्य विभावसुम्॥ १२<br>विलोक्य विस्मिताश्चास्म वयं तत्र सुरान्स्थितान्।<br>तदा विनिर्गतो राजा पुरात्तस्मात्सुमण्डितात्॥ १३ | स्वर्गमें निवास करनेवाले देवताओंको देखकर हमें परम विस्मय हुआ। वहाँपर वरुण, कुबेर, यम, सूर्य, अग्नि तथा अन्य देवताओंको स्थित देखकर हम आश्चर्यचकित हुए। उसी समय उस सुसज्जित नगरसे वह राजा निकला॥ १२-१३॥ |
| देवराज इवाक्षोभ्यो नरवाह्यावनौ स्थितः।<br>विमानस्था वयं तच्च चचाल तरसागतम्॥ १४ | देवताओंके राजा इन्द्रकी भाँति पराक्रमी वह राजा धरातलपर पालकीमें बैठा था। वह विमान हमलोगोंको लेकर द्रुत गतिसे आगे बढ़ा॥ १४॥ |
| ब्रह्मलोकं तदा दिव्यं सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>तत्र ब्रह्माणमालोक्य विस्मितौ हरकेशवौ॥ १५ | तदनन्तर हमलोग अलौकिक ब्रह्मलोकमें पहुँच गये। वहाँपर सभी देवताओंसे नमस्कृत ब्रह्माजीको विद्यमान देखकर भगवान् शंकर एवं विष्णु विस्मयमें पड़ गये॥ १५॥ |
| सभायां तत्र वेदाश्च सर्वे साङ्गाः स्वरूपिणः।<br>सागराः सरितश्चैव पर्वताः पन्नगोरगाः॥ १६ | वहाँ ब्रह्माजीकी सभामें सभी वेद अपने-अपने अंगोंसहित मूर्तरूपमें विराजमान थे। साथ ही समुद्र, नदियाँ, पर्वत, सर्प एवं नाग भी उपस्थित थे॥ १६॥ |
| मामूचतुश्चतुर्वक्त्र कोऽयं ब्रह्मा सनातनः।<br>ताववोचमहं नैव जाने सृष्टिपतिं पतिम्॥ १७ | तत्पश्चात् भगवान् विष्णु और शंकरने मुझसे पूछा—हे चतुर्मुख! ये दूसरे सनातन ब्रह्मा कौन हैं? तब मैंने उनसे कहा कि मैं सबके स्वामी तथा सृष्टिकर्ता इन ब्रह्माको नहीं जानता॥ १७॥ |
| अ० ३ ] | तृतीय स्कन्ध | २५१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कोऽहं कोऽयं किमर्थं वा भ्रमोऽयं मम चेश्वरौ।<br>क्षणादथ विमानं तच्चाचालाशु मनोजवम् ॥ १८ | हे ईश्वरो! मैं कौन हूँ, ये कौन हैं और हम दोनोंका क्या प्रयोजन है? इसमें मैं भ्रमित हूँ। थोड़ी ही देरमें वह विमान पुनः मनके सदृश वेगसे आगेकी ओर बढ़ा॥ १८॥ |
| कैलासशिखरे प्राप्तं रम्ये यक्षगणान्विते।<br>मन्दारवाटिकारम्ये कीरकोकिलकूजिते ॥ १९<br><br>वीणामुरजवाद्यैश्च नादिते सुखदे शिवे।<br>यदा प्राप्तं विमानं तत्तदैव सदनाच्छुभात् ॥ २०<br><br>निर्गतो भगवान्छम्भुर्वृषारूढस्त्रिलोचनः।<br>पञ्चाननो दशभुजः कृतसोमार्थशेखरः ॥ २१ | तत्पश्चात् वह विमान यक्षगणोंसे सुशोभित, मन्दार-वृक्षकी वाटिकाओंके कारण अति सुरम्य, शुक और कोयलोंकी मधुर ध्वनिसे गुंजित, वीणा और मृदंग आदि वाद्य-यन्त्रोंकी मधुर ध्वनिसे निनादित, सुखदायक तथा मंगलकारी कैलास-शिखरपर पहुँचा॥ १९ १/२ ॥<br><br>उस शिखरपर जब वह विमान पहुँचा; उसी समय वृषभपर आरूढ, पंचमुख, दस भुजाओंवाले, मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये हुए भगवान् शंकर अपने दिव्य भवनसे बाहर निकले॥ २०-२१॥ |
| व्याघ्रचर्मपरीधानो गजचर्मोत्तरीयकः।<br>पार्ष्णिरक्षौ महावीरो गजाननषडाननौ ॥ २२ | उस समय वे व्याघ्रचर्म पहने हुए तथा गजचर्म ओढ़े हुए थे। महाबली गजानन (श्रीगणेश) तथा षडानन (कार्तिकेय) उनके अंगरक्षकके रूपमें विद्यमान थे॥ २२॥ |
| शिवेन सह पुत्रौ द्वौ व्रजमानौ विरेजतुः।<br>नन्दिप्रभृतयः सर्वे गणपाश्च वराश्च ते ॥ २३<br><br>जयशब्दं प्रयुञ्जाना व्रजन्ति शिवपृष्ठगाः।<br>तं वीक्ष्य शङ्करं चान्यं विस्मितास्तत्र नारद ॥ २४<br><br>मातृभिः संशयाविष्टस्तत्राहं न्यवसं मुने।<br>क्षणात्तस्माद् गिरेः शृङ्गाद्विमानं वातरंहसा ॥ २५<br><br>वैकुण्ठसदनं प्राप्तं रमारमणमन्दिरम्।<br>असम्भाव्या विभूतिश्च तत्र दृष्टा मया सुत ॥ २६ | भगवान् शंकरके साथ चल रहे उनके दोनों पुत्र अतीव सुशोभित हो रहे थे। नन्दी आदि सभी प्रधान शिवगण जयघोष करते हुए भगवान् शिवके पीछे-पीछे चल रहे थे। हे नारद! वहाँ अन्य लोगों तथा शंकरको मातृकाओंसहित देखकर हमलोग विस्मयमें पड़ गये और हे मुने! मैं संशयग्रस्त हो गया। थोड़ी ही देरमें वह विमान उस कैलास-शिखरसे वायुगतिसे लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुके वैकुण्ठलोकमें जा पहुँचा। हे पुत्र! मैंने वहाँ अद्भुत विभूतियाँ देखीं॥ २३-२६॥ |
| विसिष्मिये तदा विष्णुर्दृष्ट्वा तत्पुरमुत्तमम्।<br>सदनाग्रे ययौ तावद्धरिः कमलोचनः ॥ २७ | उस अति रमणीक नगरको देखकर भगवान् विष्णु विस्मयमें पड़ गये। उसी समय कमलोचन भगवान् विष्णु अपने भवनसे बाहर निकले॥ २७॥ |
| अतसीकुसुमाभासः पीतवासाश्चतुर्भुजः।<br>द्विजराजाधिरूढश्च दिव्याभरणभूषितः ॥ २८<br><br>वीज्यमानस्तदा लक्ष्म्या कामिन्या चामरैः शुभैः।<br>तं वीक्ष्य विस्मिताः सर्वे वयं विष्णुं सनातनम् ॥ २९ | उनका वर्ण अलसीके पुष्पकी भाँति श्याम था, वे पीताम्बर धारण किये हुए थे, उनकी चार भुजाएँ थीं, वे पक्षिराज गरुडपर आरूढ़ थे और दिव्य अलंकारोंसे विभूषित थे। भगवती लक्ष्मी उन्हें शुभ चँवर डुला रही थीं। उन सनातन भगवान् विष्णुजीको देखकर हम सभीको महान् आश्चर्य हुआ॥ २८-२९॥ |
| २५२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
|---|
| परस्परं निरीक्षन्तः स्थितास्तस्मिन् वरासने।<br>ततश्चचाल तरसा विमानं वातरंहसा ॥ ३०<br><br>सुधासमुद्रः सम्प्राप्तो मिष्टवारिमहोर्मिमान्।<br>यादोगणसमाकीर्णश्चलद्वीचिविराजितः ॥ ३१ | तदनन्तर परस्पर एक-दूसरेको देखते हुए हमलोग अपने-अपने श्रेष्ठ आसनोंपर बैठे रहे। इसके बाद वह विमान वायुसदृश द्रुत गतिसे पुनः चल पड़ा। कुछ ही क्षणोंमें वह विमान मधुर जलवाले, ऊँची-ऊँची लहरोंवाले, नानाविध जल-जन्तुओंसे युक्त तथा चंचल तरंगोंसे शोभायमान अमृत-सागरके तटपर पहुँच गया॥ ३०-३१॥ | | मन्दारपारिजाताद्यैः पादपैरतिशोभितः।<br>नानास्तरणसंयुक्तो नानाचित्रविचित्रितः ॥ ३२<br><br>मुक्तादामपरिक्लिष्टो नानादामविराजितः।<br>अशोकबकुलाख्यैश्च वृक्षैः कुरुबकादिभिः॥ ३३<br><br>संवृतः सर्वतः सौम्यैः केतकीचम्पकैर्वृतः।<br>कोकिलारावसंघुष्टो दिव्यगन्धसमन्वितः ॥ ३४ | उस सागरके तटपर विभिन्न पंक्तियोंमें नाना प्रकारके विचित्र रंगोंवाले मन्दार एवं पारिजात आदि वृक्ष शोभायमान थे। वहाँ मोतियोंकी झालरें तथा अनेक प्रकारके पुष्पहार शोभामें वृद्धि कर रहे थे। समुद्रके सभी ओर अशोक, मौलसिरी, कुरबक आदि वृक्ष विद्यमान थे। उसके चारों ओर चित्ताकर्षक केतकी तथा चम्पक पुष्पोंकी वाटिकाएँ थीं, जो कोयलोंकी मधुर ध्वनियोंसे गुंजित तथा नाना प्रकारकी दिव्य सुगन्धिसे परिपूर्ण थीं॥ ३२-३४॥ | | द्विरेफातिररणत्कारैरञ्जितः परमाद्भुतः।<br>तस्मिन्द्वीपे शिवाकारः पर्यङ्कः सुमनोहरः ॥ ३५<br><br>रत्नालिखितोऽत्यर्थं नानारत्नविराजितः।<br>दृष्टोऽस्माभिर्विमानस्थैर्दूरतः परिमण्डितः॥ ३६ | उस स्थलपर भौंरे गुंजार कर रहे थे। इस प्रकार वहाँका दृश्य परम अद्भुत था। उस द्वीपमें हमलोगोंनें दूरसे ही विमानपर बैठे-बैठे शिवजीके आकारवाला एक मनोहर तथा अत्यन्त अद्भुत पलंग देखा, जो रत्नमालाओंसे जड़ा हुआ था और नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित था॥ ३५-३६॥ | | नानास्तरणसंछन्न इन्द्रचापसमन्वितः।<br>पर्यङ्कप्रवरे तस्मिन्नुपविष्टा वराङ्गना ॥ ३७ | उस पलंगपर अनेक प्रकारके रंगोंवाली आकर्षक चादरें बिछी थीं, जिससे वह पलंग इन्द्रधनुषके समान सुशोभित हो रहा था। उस भव्य पलंगपर एक दिव्यांगना बैठी हुई थी॥ ३७॥ | | रक्तमाल्याम्बरधरा रक्तगन्धानुलेपना।<br>सुरक्तनयना कान्ता 'विद्युत्कोटिसमप्रभा ॥ ३८<br><br>सुचारुवदना रक्तदन्तच्छदविराजिता।<br>रमाकोट्यधिका कान्त्या सूर्यबिम्बनिभाखिला ॥ ३९ | उस देवीने रक्तपुष्पोंकी माला तथा रक्ताम्बर धारण किया था। उसने अपने शरीरमें लाल चन्दनका लेप कर रखा था। लालिमापूर्ण नेत्रोंवाली वह देवी असंख्य विद्युत्की कान्तिसे सुशोभित हो रही थी। सुन्दर मुखवाली, रक्तिम अधरसे सुशोभित, लक्ष्मीसे करोड़ोंगुना अधिक सौन्दर्यशालिनी वह स्त्री अपनी कान्तिसे सूर्यमण्डलकी दीप्तिको भी मानो तिरस्कृत कर रही थी॥ ३८-३९॥ | | वरपाशाङ्कुशाभीष्टधरा श्रीभुवनेश्वरी।<br>अदृष्टपूर्वा दृष्टा सा सुन्दरी स्मितभूषणा ॥ ४० | वर, पाश, अंकुश और अभय मुद्राको धारण करनेवाली तथा मधुर मुसकानयुक्त वे भगवती भुवनेश्वरी हमें दृष्टिगोचर हुईं; जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया था॥ ४०॥ |
| अ० ३ ] | तृतीय स्कन्ध | २५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ह्रींकारजपनिष्ठैस्तु पक्षिवृन्दैर्निषेविता।<br>अरुणा करुणामूर्तिः कुमारी नवयौवना॥ ४१ | ह्रींकार बीजमन्त्रका जप करनेवाले पक्षियोंका समुदाय उनकी सेवामें निरन्तर रत था। नवयौवनसे सम्पन्न तथा अरुण आभावाली वे कुमारी साक्षात् करुणाकी मूर्ति थीं॥ ४१॥ |
| सर्वशृङ्गारवेषाढ्या मन्दस्मितमुखाम्बुजा।<br>उद्यत्पीनकुचद्वन्द्वनिर्जिताम्भोजकुङ्मला ॥ ४२<br><br>नानामणिगणाकीर्णभूषणैरुपशोभिता ।<br>कनकाङ्गदकेयूरकिरीटपरिशोभिता ॥ ४३<br><br>कनकच्छ्रीचक्रताटङ्कविटङ्कवदनाम्बुजा ।<br>हृल्लेखा भुवनेशीति नामजापपरायणैः॥ ४४<br><br>सखीवृन्दैः स्तुता नित्यं भुवनेशी महेश्वरी।<br>हृल्लेखाद्याभिरमरकन्याभिः परिवेष्टिता॥ ४५<br><br>अनङ्गकुसुमाद्याभिर्देवीभिः परिवेष्टिता।<br>देवी षट्कोणमध्यस्था यन्त्रराजोपरि स्थिता॥ ४६ | वे सभी प्रकारके शृंगार एवं परिधानोंसे सुसज्जित थीं और उनके मुखारविन्दपर मन्द मुसकान विराजमान थी। उनके उन्नत वक्षःस्थल कमलकी कलियोंसे भी बढ़कर शोभायमान हो रहे थे। नानाविध मणियोंसे जटिल आभूषणोंसे वे अलंकृत थीं। स्वर्णनिर्मित कंकण, केयूर और मुकुट आदिसे वे सुशोभित थीं। स्वर्णनिर्मित श्रीचक्राकार कर्णफूलसे सुशोभित उनका मुखारविन्द अतीव दीप्तिमान् था। उनकी सखियोंका समुदाय 'हृल्लेखा' तथा 'भुवनेशी' नामोंका सतत जप कर रहा था और अन्य सखियाँ उन भुवनेशी महेश्वरीकी अनवरत स्तुति कर रही थीं। 'हृल्लेखा' आदि देवकन्याओं तथा 'अनंगकुसुमा' आदि देवियोंसे वे घिरी हुई थीं। वे षट्कोणके मध्यमें यन्त्रराजके ऊपर विराजमान थीं॥ ४२-४६॥ |
| दृष्ट्वा तां विस्मिताः सर्वे वयं तत्र स्थिताभवन्।<br>केयं कान्ता च किं नाम न जानीमोऽत्र संस्थिताः॥ ४७ | उन भगवतीको देखकर वहाँ स्थित हम सभी आश्चर्यचकित हो गये और कुछ देरतक वहीं ठहरे रहे। हमलोग यह नहीं जान पाये कि वे सुन्दरी कौन हैं और उनका क्या नाम है?॥ ४७॥ |
| सहस्रनयना रामा सहस्रकरसंयुता।<br>सहस्रवदना रम्या भाति दूरादसंशयम्॥ ४८ | दूरसे देखनेपर वे भगवती हजार नेत्र, हजार मुख और हजार हाथोंसे युक्त अति सुन्दर लग रही थीं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है॥ ४८॥ |
| नाप्सरा नापि गन्धर्वी नेयं देवाङ्गना किल।<br>इति संशयमापन्नास्तत्र नारद संस्थिताः॥ ४९ | हे नारद! हम सोचने लगे कि ये न तो अप्सरा, न गन्धर्वी और न देवांगना ही दीखती हैं, तो फिर ये कौन हो सकती हैं? हम इसी संशयमें पड़कर वहाँ खड़े रहे॥ ४९॥ |
| तदासौ भगवान्विष्णुर्दृष्ट्वा तां चारुहासिनीम्।<br>उवाचाम्बां स्वविज्ञानात्कृत्वा मनसि निश्चयम्॥ ५०<br><br>एषा भगवती देवी सर्वेषां कारणं हि नः।<br>महाविद्या महामाया पूर्णा प्रकृतिरव्यया॥ ५१ | तब उन सुन्दर हासवाली देवीको देखकर भगवान् विष्णुने अपने अनुभवसे मनमें निश्चित करके हमसे कहा—ये साक्षात् भगवती जगदम्बा हम सबकी कारणस्वरूपा हैं। ये ही महाविद्या, महामाया, पूर्णा तथा शाश्वत प्रकृतिरूपा हैं॥ ५०-५१॥ |
| दुर्ज्ञेयाल्पधियां देवी योगगम्या दुराशया।<br>इच्छा परात्मनः कामं नित्यानित्यस्वरूपिणी॥ ५२ | अल्प बुद्धिवाले गम्भीर आशयवाली इन भगवतीको सम्यक् रूपसे नहीं जान सकते, केवल योगमार्गसे ही ये ज्ञेय हैं। ये देवी परमात्माकी इच्छास्वरूपा तथा नित्यानित्य-स्वरूपिणी हैं॥ ५२॥ |
| २५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
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| दुराराध्याल्पभाग्यैश्च देवी विश्वेश्वरी शिवा।<br>वेदगर्भा विशालाक्षी सर्वेषामादिरीश्वरी॥ ५३ | ये विश्वेश्वरी कल्याणी भगवती अल्पभाग्यवाले प्राणियोंके लिये दुराराध्य हैं। ये वेदजननी विशालनयना जगदम्बा सबकी आदिरूपा ईश्वरी हैं॥ ५३॥ | | एषा संहृत्य सकलं विश्वं क्रीडति संक्षये।<br>लिङ्गानि सर्वजीवानां स्वशरीरे निवेश्य च॥ ५४ | ये भगवती प्रलयावस्थामें समग्र विश्वका संहार करके सभी प्राणियोंके लिंगरूप शरीरको अपने शरीरमें समाविष्ट करके विहार करती हैं॥ ५४॥ | | सर्वबीजमयी ह्येषा राजते साम्प्रतं सुरौ।<br>विभूतयः स्थिताः पार्श्वे पश्यतां कोटिशः क्रमात्॥ ५५ | हे देवो! ये भगवती इस समय सर्वबीजमयी देवीके रूपमें विराजमान हैं। देखिये, इनके समीप करोड़ों विभूतियाँ क्रमसे स्थित हैं॥ ५५॥ | | दिव्याभरणभूषाढ्या दिव्यगन्धानुलेपनाः।<br>परिचर्यापराः सर्वाः पश्यतां ब्रह्मशङ्करौ॥ ५६ | हे ब्रह्मा एवं शंकरजी! देखिये, दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत तथा दिव्य गन्धानुलेपसे युक्त ये सभी विभूतियाँ इन भगवतीकी सेवामें मनोयोगसे संलग्न हैं॥ ५६॥ | | धन्या वयं महाभागाः कृतकृत्याः स्म साम्प्रतम्।<br>यदत्र दर्शनं प्राप्तं भगवत्याः स्वयं त्विदम्॥ ५७ | हमलोग धन्य, सौभाग्यशाली तथा कृतकृत्य हैं, जो कि हमें इस समय यहाँ भगवतीका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ॥ ५७॥ | | तपस्तप्तं पुरा यत्नात्तस्येदं फलमुत्तमम्।<br>अन्यथा दर्शनं कुत्र भवेदस्माकमादरात्॥ ५८ | पूर्वकालमें हमलोगोंने बड़े प्रयत्नसे जो तपस्या की थी, उसीका यह उत्तम परिणाम है; अन्यथा भगवती हमलोगोंको स्नेहपूर्वक दर्शन कैसे देतीं?॥ ५८॥ | | पश्यन्ति पुण्यपुञ्जा ये ये वदान्यास्तपस्विनः।<br>रागिणो नैव पश्यन्ति देवीं भगवतीं शिवाम्॥ ५९ | जो उदार हृदयवाले पुण्यात्मा तथा तपस्वीलोग हैं, वे ही इनके दर्शन प्राप्त करते हैं, किंतु विषयासक्तलोग इन कल्याणमयी भगवतीके दर्शनसे सर्वथा वंचित रहते हैं॥ ५९॥ | | मूलप्रकृतिरेवैषा सदा पुरुषसङ्गता।<br>ब्रह्माण्डं दर्शयत्येषा कृत्वा वै परमात्मने॥ ६० | ये ही मूलप्रकृतिस्वरूपा भगवती परमपुरुषके सहयोगसे ब्रह्माण्डकी रचना करके परमात्माके समक्ष उसे उपस्थित करती हैं॥ ६०॥ | | द्रष्टासौ दृश्यमखिलं ब्रह्माण्डं देवताः सुरौ।<br>तस्यैषा कारणं सर्वा माया सर्वेश्वरी शिवा॥ ६१ | हे देवो! यह पुरुष द्रष्टामात्र है और समस्त ब्रह्माण्ड तथा देवतागण दृश्यस्वरूप हैं। महामाया, कल्याणमयी, सर्वव्यापिनी सर्वेश्वरी ये भगवती ही इन सबका मूल कारण हैं॥ ६१॥ | | क्वाहं वा क्व सुराः सर्वे रम्भाद्याः सुरयोषितः।<br>लक्षांशेन तुलामस्या न भवामः कथञ्चन॥ ६२ | कहाँ मैं, कहाँ सभी देवता और कहाँ रम्भा आदि देवांगनाएँ! हम सभी इन भगवतीकी तुलनामें उनके लक्षांशके बराबर भी नहीं हैं॥ ६२॥ | | सैषा वराङ्गना नाम वै दृष्टा या महार्णवे।<br>बालभावे महादेवी दोलयन्तीव मां मुदा॥ ६३ | ये वे ही महादेवी जगदम्बा हैं, जिन्हें हमलोगोंने प्रलयसागरमें देखा था और जो बाल्यावस्थामें मुझे प्रसन्नतापूर्वक पालनेमें झुला रही थीं॥ ६३॥ |
अ० ४ ] तृतीय स्कन्ध २५५
अ० ४ ] तृतीय स्कन्ध २५५
| शयानं वटपत्रे च पर्यङ्के सुस्थिरे दृढे।<br>पादाङ्गुष्ठं करे कृत्वा निवेश्य मुखपङ्कजे ॥ ६४<br><br>लेलिहन्तञ्च क्रीडन्तमनैकैर्बालचेष्टितैः।<br>रममाणं कोमलाङ्गं वटपत्रपुटे स्थितम् ॥ ६५ | उस समय मैं एक सुस्थिर तथा दृढ़ वटपत्ररूपी पलंगपर सोया हुआ था और अपने पैरका अँगूठा अपने मुखारविन्दमें डालकर चूस रहा था। अत्यन्त कोमल अंगोंवाला मैं उस समय अनेक बालसुलभ चेष्टाएँ करता हुआ उसी वटपत्रके दोनेमें पड़े-पड़े खेल रहा था॥ ६४-६५॥ |
| गायन्ती दोलयन्ती च बालभावान्मयि स्थिते।<br>सेयं सुनिश्चितं ज्ञानं जातं मे दर्शनादिव ॥ ६६ | उस समय गाती हुई ये भगवती बालभावमें स्थित मुझे झूला झुलाती थीं। इन्हें देखकर मुझे यह सुनिश्चित ज्ञान हो गया है कि वे ही यहाँ विराजमान हैं॥ ६६॥ |
| कामं नो जननी सैषा शृणु तं प्रवदाम्यहम्।<br>अनुभूतं मया पूर्वं प्रत्यभिज्ञा समुत्थिता ॥ ६७ | निश्चितरूपसे ये भगवती मेरी जननी हैं। आप सुनें, मुझे पूर्व अनुभवकी स्मृति जग गयी है, जो मैं आपसे कहता हूँ॥ ६७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विमानस्थैर्हरादिभिर्देवीदर्शनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः
भगवतीके चरणनखमें त्रिदेवोंको सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन होना, भगवान् विष्णुद्वारा देवीकी स्तुति करना
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः पुनराह जनार्दनः।<br>वयं गच्छेम पार्श्वेऽस्याः प्रणमन्तः पुनः पुनः॥ १<br><br>सेयं वरा महामाया दास्यत्येषा वरान् हि नः।<br>स्तुवामः सन्निधिं प्राप्य निर्भयाश्चरणान्तिके॥ २<br><br>यदि नो वारयिष्यन्ति द्वारस्थाः परिचारकाः।<br>पठिष्यामश्च तत्रस्थाः स्तुतिं देव्याः समाहिताः ॥ ३ | ब्रह्माजी बोले—हे नारद! ऐसा कहकर जनार्दन भगवान् विष्णुने पुनः कहा—हमलोग बार-बार प्रणाम करते हुए उनके पास चलें। वे वरदायिनी महामाया हमें अवश्य वरदान देंगी। अतः निर्भय होकर हमें उनके चरणोंके निकट चलकर उनकी स्तुति करनी चाहिये। यदि उनके द्वारपाल हमें वहाँ रोकेंगे तो हमलोग ध्यानपूर्वक वहीं बैठकर देवीकी स्तुति करने लगेंगे॥ १—३॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्ते हरिणा वाक्ये सुप्रहृष्टौ सुसंस्थितौ।<br>जातौ प्रमुदितौ कामं निकटे गमनाय च ॥ ४<br><br>ओमित्युक्त्वा हरिं सर्वे विमानात्त्वरितास्त्रयः।<br>उत्तीर्य निर्गता द्वारि शङ्कमाना मनस्यलम् ॥ ५<br><br>द्वारस्थान् वीक्ष्य तान्सर्वान्देवी भगवती तदा।<br>स्मितं कृत्वा चकाराशु तांस्त्रीन्स्त्रीरूपधारिणः ॥ ६ | ब्रह्माजी बोले—भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर मैं तथा शिव—हम दोनों प्रसन्नतासे गद्गद होकर शीघ्र उनके निकट जानेको उत्सुक हो गये। विष्णुसे ‘ठीक है’—ऐसा कहकर हम तीनों शीघ्रतापूर्वक विमानसे उतरकर मन-ही-मन अनेक तर्क-वितर्क करते हुए भगवतीके द्वारपर ज्यों ही पहुँचे, त्यों ही द्वारपर स्थित हम सभीको देखकर मन्द मुसकान करके उन भगवतीने हम तीनोंको स्त्रीरूपमें परिणत कर दिया॥ ४—६॥ |
| २५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वयं युवतयो जाताः सुरूपाश्चारुभूषणाः।<br>विस्मयं परमं प्राप्ता गतास्तत्सन्निधिं पुनः॥ ७ | हमलोग नाना प्रकारके भूषणोंसे अलंकृत रूपवती युवती बन गये और अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर उन महामाया भगवतीके पास पुनः गये॥ ७॥ |
| सा दृष्ट्वा नः स्थितांस्तत्र स्त्रीरूपांश्चरणान्तिके।<br>व्यलोकयत चार्वङ्गी प्रेमसम्पूर्णया दृशा॥ ८ | स्त्रीके वेषमें हमलोगोंको अपने चरणोंके निकट देखकर अत्यन्त मनोहर रूपवाली उन देवीने हमलोगोंके ऊपर कृपादृष्टि डाली॥ ८॥ |
| प्रणम्य तां महादेवीं पुरतः संस्थिता वयम्।<br>परस्परं लोकयन्तः स्त्रीरूपाश्चारुभूषणाः॥ ९ | उस समय महामाया भगवतीको प्रणाम करके स्त्री-वेषधारी तथा दिव्य वस्त्राभरण धारण किये हम तीनों परस्पर एक दूसरेको देखते हुए उनके सामने खड़े रहे॥ ९॥ |
| पादपीठं प्रेक्षमाणा नानामणिविभूषितम्।<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशं स्थितास्तत्र वयं त्रयः॥ १० | विविध प्रकारके मणिजटित एवं करोड़ों सूर्यके समान देदीप्यमान देवीके पादपीठको देखते हुए हम तीनों वहीं स्थित रहे॥ १०॥ |
| काश्चिद्रक्ताम्बरास्तत्र सहचर्यः सहस्रशः।<br>काश्चिन्नीलाम्बरा नार्यस्तथा पीताम्बराः शुभाः॥ ११ | उन महादेवीकी हजारों सेविकाओंमेंसे कुछने रक्त वस्त्र, कुछने नीले वस्त्र और कुछने सुन्दर पीत वस्त्र धारण कर रखे थे॥ ११॥ |
| देव्यः सर्वाः शुभाकारा विचित्राम्बरभूषणाः।<br>विरेजुः पार्श्वतस्तस्याः परिचर्यापराः किल॥ १२ | वहाँ उपस्थित सभी देवियाँ सुन्दर स्वरूपकी थीं और विचित्र वस्त्र एवं आभूषणोंसे सुसज्जित थीं। वे सब जगदम्बाकी विभिन्न सेवाओंमें तत्पर थीं॥ १२॥ |
| जगुश्च ननृतुश्चान्याः पर्युपासन्त ताः स्त्रियः।<br>वीणामारुतवाद्यानि वादयन्त्यो मुदान्विताः॥ १३ | उनमेंसे कुछ गा रही थीं, कुछ नाच रही थीं और कुछ स्त्रियाँ हर्षके साथ वीणा तथा मुखवाद्य बजाती हुई अन्य सेवाओंमें संलग्न थीं॥ १३॥ |
| शृणु नारद वक्ष्यामि यद् दृष्टं तत्र चाद्भुतम्।<br>नखदर्पणमध्ये वै देव्याश्चरणपङ्कजे॥ १४<br><br>ब्रह्माण्डमखिलं सर्वं तत्र स्थावरजङ्गमम्।<br>अहं विष्णुश्च रुद्रश्च वायुरग्निर्यमो रविः॥ १५<br><br>वरुणः शीतगुस्त्वष्टा कुबेरः पाकशासनः।<br>पर्वताः सागरा नद्यो गन्धर्वाप्सरसस्तथा॥ १६<br><br>विश्वावसुश्चित्रकेतुः श्वेतश्चित्राङ्गदस्तथा।<br>नारदस्तुम्बुरुश्चैव हाहाहूहूस्तथैव च॥ १७<br><br>अश्विनौ वसवः साध्याः सिद्धाश्च पितरस्तथा।<br>नागाः शेषादयः सर्वे किन्नरोरगराक्षसाः॥ १८ | हे नारदजी! वहाँ मैंने भगवतीके चरणकमलके नखरूपी दर्पणमें जो अद्भुत दृश्य देखा, उसे बताता हूँ, आप सुनें। वहाँ मुझे समस्त स्थावर-जंगमात्मक ब्रह्माण्ड, मैं (ब्रह्मा), विष्णु, शिव, वायु, अग्नि, यम, सूर्य, वरुण, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, कुबेर, इन्द्र, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, गन्धर्व, अप्सराएँ, विश्वावसु, चित्रकेतु, श्वेत, चित्रांगद, नारद, तुम्बुरु, हाहा-हूहू, दोनों अश्विनीकुमार, अष्टवसु, साध्य, सिद्धगण, पितर, शेष आदि नाग, सभी किन्नर, उरग और राक्षसगण दिखायी दे रहे थे॥ १४-१८॥ |
| वैकुण्ठो ब्रह्मलोकश्च कैलासः पर्वतोत्तमः।<br>सर्वं तदखिलं दृष्टं नखमध्यस्थितं च नः॥ १९<br><br>मज्जन्मपङ्कजं तत्र स्थितोऽहं चतुराननः।<br>शेषशायी जगन्नाथस्तथा च मधुकैटभौ॥ २० | वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक तथा पर्वतश्रेष्ठ कैलास—इन सबको हमने उनके पद-नखमें विराजमान देखा। उसीमें मेरा जन्मस्थान कमल भी था और मैं चतुरानन उस कमलकोशमें बैठा हुआ था। मधु-कैटभ नामके दोनों दानव तथा शेषशायी महाविष्णु भी उसीमें विराजमान थे॥ १९-२०॥ |
| अ० ४ ] | तृतीय स्कन्ध | २५७ | | :--- | :--- |
| ब्रह्मोवाच | **ब्रह्माजी बोले—**इस प्रकार परमेश्वरीके चरण- | | एवं दृष्टं मया तत्र पादपद्मनखे स्थितम्।<br>विस्मितोऽहं ततो वीक्ष्य किमेतदिति शङ्कितः॥ २१ | कमलके नखमें स्थित यह सारा दृश्य मुझे दिखायी दिया, जिसे देखकर मैं चकित रह गया और मन-ही-मन सोचने लगा—‘यह क्या है?’॥ २१॥ | | विष्णुश्च विस्मयाविष्टः शङ्करश्च तथा स्थितः।<br>तां तदा मेनिरे देवीं वयं विश्वस्य मातरम्॥ २२ | मेरे ही समान विष्णु और शिव भी वहाँ आश्चर्य-चकित होकर खड़े थे। उस समय हम तीनोंने समझ लिया कि समस्त जगत्की जननी ये ही महादेवी हैं॥ २२॥ | | ततो वर्षशतं पूर्णं व्यतिक्रान्तं प्रपश्यतः।<br>सुधामये शिवे द्वीपे विहारं विविधं तदा॥ २३ | इस प्रकार अमृतमय एवं कल्याणमय उस द्वीपमें अनेक प्रकारके अद्भुत दृश्य देखते हुए हमारे सौ वर्ष व्यतीत हो गये॥ २३॥ | | सख्य इव तदा तत्र मेनिरेऽस्मानवस्थितान्।<br>देव्यः प्रमुदिताकारा नानाभरणमण्डिताः॥ २४<br><br>वयमप्यतिरम्यत्वाद् बभूविम विमोहिताः।<br>प्रहृष्टमनसः सर्वे पश्यन्भावान्मनोरमान्॥ २५ | वहाँकी प्रसन्नवदना एवं विचित्र अलंकारोंसे अलंकृत देवियाँ हम तीनोंको अपनी सखियाँ समझती थीं और हमलोग भी उनके स्नेहपूर्ण सद्व्यवहारसे मुग्ध थे तथा उनके मनोरम भावोंको देखकर अतीव प्रसन्न थे॥ २४-२५॥ | | एकदा तां महादेवीं देवीं श्रीभुवनेश्वरीम्।<br>तुष्टाव भगवान्विष्णुर्युवतीभावसंस्थितः॥ २६ | एक बार नारीरूपमें स्थित भगवान् विष्णु महादेवी भगवती श्रीभुवनेश्वरीकी स्तुति करने लगे—॥ २६॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नमः।<br>कल्याण्यै कामदायै च वृद्ध्यै सिद्ध्यै नमो नमः॥ २७<br><br>सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणये नमः।<br>पञ्चकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नमः॥ २८ | **श्रीभगवान् बोले—**प्रकृति एवं विधात्रीदेवीको मेरा निरन्तर नमस्कार है। कल्याणी, कामप्रदा, वृद्धि तथा सिद्धिदेवीको बार-बार नमस्कार है। सच्चिदानन्द-रूपिणी तथा संसारकी योनिसस्वरूपा देवीको नमस्कार है। आप पंचकृत्य* विधात्री तथा श्रीभुवनेश्वरीदेवीको बार-बार नमस्कार है॥ २७-२८॥ | | सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नमः।<br>अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नमः॥ २९ | समस्त संसारकी एकमात्र अधिष्ठात्री तथा कूटस्थरूपा देवीको बार-बार नमस्कार है। अर्धमात्राकी अर्थभूता एवं हृल्लेखादेवीको बार-बार नमस्कार है॥ २९॥ | | ज्ञातं मयाखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं<br>त्वत्तोऽस्य सम्भवलयावपि मातरद्य।<br>शक्तिश्च तेऽस्य करणे विततप्रभावा<br>ज्ञाताधुना सकललोकमयीति नूनम्॥ ३० | हे जननि! आज मैंने जान लिया कि यह समस्त विश्व आपमें समाहित है तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी सृष्टि एवं संहार भी आप ही करती हैं। इस ब्रह्माण्डके निर्माणमें आपकी विस्तृत प्रभाववाली शक्ति ही मुख्य हेतु है, अतः मुझे यह ज्ञात हो गया कि आप ही सम्पूर्ण लोकमें व्याप्त हैं। इस सत् एवं |
* सृष्टि, स्थिति, संहार, निग्रह, अनुग्रह।
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—9 A
| २५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| Sanskrit Shloka | Hindi Meaning |
|---|---|
| विस्तार्य सर्वमखिलं सदसद्विकारं<br>सन्दर्शयस्यविकलं पुरुषाय काले।<br>तत्त्वैश्च षोडशभिरेव च सप्तभिश्च<br>भासीन्द्रजालमिव नः किल रञ्जनाय॥ ३१ | असत् सम्पूर्ण जगत्का विस्तार करके उस चिद्ब्रह्म पुरुषको यथासमय आप इसे समग्ररूपसे प्रस्तुत करती हैं। अपनी प्रसन्नताके लिये सोलह तत्त्वों तथा महदादि अन्य सात तत्त्वोंके साथ आप हमें इन्द्रजालके समान प्रतीत होती हैं॥ ३०-३१॥ |
| न त्वामृते किमपि वस्तुगतं विभाति<br>व्याप्यैव सर्वमखिलं त्वमवस्थितासि।<br>शक्तिं विना व्यवहृतो पुरुषोऽप्यशक्तो<br>वम्भण्यते जननि बुद्धिमता जनेन॥ ३२ | हे जननि! आपसे रहित यहाँ कोई भी वस्तु दिखायी नहीं देती, आप ही समस्त जगत्को व्याप्त करके स्थित रहती हैं। बुद्धिमान् पुरुषोंका कथन है कि आपकी शक्तिके बिना वह परमपुरुष कुछ भी करनेमें असमर्थ है॥ ३२॥ |
| प्रीणासि विश्वमखिलं सततं प्रभावैः<br>स्वैस्तेजसा च सकलं प्रकटीकरोषि।<br>अत्स्येव देवि तरसा किल कल्पकाले<br>को वेद देवि चरितं तव वैभवस्य॥ ३३ | आप अपने कृपाप्रभावसे संसारका कल्याण करती हैं। हे देवि! आप ही अपने तेजसे सृष्टिकालमें सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करती हैं तथा प्रलयकालमें इसका शीघ्र ही संहार कर डालती हैं। हे देवि! आपके वैभवके लीला-चरित्रको भलीभाँति जाननेमें कौन समर्थ है?॥ ३३॥ |
| त्राता वयं जननि ते मधुकैटभाभ्यां<br>लोकाश्च ते सुवितताः खलु दर्शिता वै।<br>नीताः सुखस्य भवने परमां च कोटिं<br>यद्दर्शनं तव भवानि महाप्रभावम्॥ ३४ | हे जननि! मधु-कैटभ नामक दोनों दानवोंसे आपने हमारी रक्षा की है, आपने ही हमलोगोंको अपने अनेक विस्तृत लोक दिखाये तथा अपने-अपने भवनमें हमें परमानन्दका अनुभव कराया। हे भवानि! यह आपके दर्शनका ही महान् प्रभाव है॥ ३४॥ |
| नाहं भवो न च विरिञ्चि विवेद मातः<br>कोऽन्यो हि वेत्ति चरितं तव दुर्विभाव्यम्।<br>कानीह सन्ति भुवनानि महाप्रभावे<br>ह्यस्मिन्भवानि रचिते रचनाकलापे॥ ३५ | हे माता! जब मैं (विष्णु), शिव तथा ब्रह्मा भी आपके अपूर्व चरित्रको जाननेमें समर्थ नहीं हैं, तब अन्य कोई कैसे जान सकेगा? हे महिमामयी भवानि! आपके रचे हुए इस ब्रह्माण्ड-प्रपंचमें न जाने कितने ब्रह्माण्ड भरे पड़े हैं!॥ ३५॥ |
| अस्माभिरत्र भुवने हरिरन्य एव<br>दृष्टः शिवः कमलजः प्रथितप्रभावः।<br>अन्येषु देवि भुवनेषु न सन्ति किं ते<br>किं विद्म देवि विततं तव सुप्रभावम्॥ ३६ | हमलोगोंने आपके इस लोकमें अद्भुत प्रभाववाले दूसरे विष्णु, शिव तथा ब्रह्माको देखा है। हे देवि! क्या वे देवता अन्यान्य लोकोंमें नहीं होंगे? हमलोग आपकी इस अद्भुत महिमाको कैसे जान सकते हैं?॥ ३६॥ |
| याचेऽम्ब तेऽङ्घ्रिकमलं प्रणिपत्य कामं<br>चित्ते सदा वसतु रूपमिदं तवैतत्।<br>नामापि वक्त्रकुहरे सततं तवैव<br>संदर्शनं तव पदाम्बुजयोः सदैव॥ ३७ | हे जगदम्ब! हमलोग आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर यही याचना करते हैं कि आपका यह दिव्य स्वरूप हमारे हृदयमें सदा विराजमान रहे, हमारे मुखसे सदा आपका ही नाम निकले और हमारे नेत्र प्रतिदिन आपके चरणकमलोंके दर्शन पाते रहें॥ ३७॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]-9 B
अ० ४] तृतीय स्कन्ध २५९
अ० ४] तृतीय स्कन्ध २५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भृत्योऽयमस्ति सततं मयि भावनीयं<br>त्वां स्वामिनीति मनसा ननु चिन्तयामि।<br>एषावयोरविरता किल देवि भूया-<br>द्व्याप्तिः सदैव जननीसुतयोरिवार्ये॥ ३८ | हे माता! आपकी यह भावना हमारे प्रति सर्वदा बनी रहे कि ये सब हमारे सेवक हैं और हम भी सर्वथा आपको मनसे अपनी स्वामिनी समझते रहें। हे आर्ये! इस प्रकार हमारा और आपका माता-पुत्रका अनन्य सम्बन्ध सर्वदा बना रहे॥ ३८॥ |
| त्वं वेत्सि सर्वमखिलं भुवनप्रपञ्चं<br>सर्वज्ञता परिसमाप्तिनितान्तभूमिः।<br>किं पामरेण जगदम्ब निवेदनीयं<br>यद्युक्तमाचर भवानि तवेङ्गितं स्यात्॥ ३९ | हे जगदम्बिके! आप समस्त ब्रह्माण्ड-प्रपंचको पूर्ण रूपसे जानती हैं; क्योंकि जहाँ सर्वज्ञताकी समाप्ति होती है, उसकी अन्तिम सीमा आप ही हैं। हे भवानि! मैं पामर कह ही क्या सकता हूँ? आपको जो उचित लगे, आप वह करें; क्योंकि सब कुछ तो आपहीके संकेतपर होता है॥ ३९॥ |
| ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरुमापतिश्च<br>संहारकारक इयं तु जने प्रसिद्धिः।<br>किं सत्यमेतदपि देवि तवेच्छया वै<br>कर्तुं क्षमा वयमजे तव शक्तियुक्ताः॥ ४० | जगत्में ऐसी प्रसिद्धि है कि ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और रुद्र संहार करते हैं, किंतु हे देवि! क्या यह बात सत्य है? हे अजे! सच्चाई तो यह है कि आपकी इच्छासे तथा आपसे शक्ति प्राप्तकर हम अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ हो पाते हैं॥ ४०॥ |
| धात्री धराधरसुते न जगद् बिभर्ति<br>आधारशक्तिरखिलं तव वै बिभर्ति।<br>सूर्योऽपि भाति वरदे प्रभया युतस्ते<br>त्वं सर्वमेतदखिलं विरजा विभासि॥ ४१ | हे गिरिजे! यह पृथ्वी इस जगत्को धारण नहीं करती है अपितु आपकी आधारशक्ति ही इस समस्त जगत्को धारण करती है। हे वरदे! भगवान् सूर्य भी आपके ही आलोकसे युक्त होकर प्रकाशमान हैं। इस प्रकार आप विरजारूपसे इस सम्पूर्ण जगत्के रूपमें सुशोभित हो रही हैं॥ ४१॥ |
| ब्रह्माहमीश्वरवरः किल ते प्रभावा-<br>त्सर्वे वयं जनियुता न यदा तु नित्याः।<br>केऽन्ये सुराः शतमखप्रमुखाश्च नित्या<br>नित्या त्वमेव जननी प्रकृतिः पुराणा॥ ४२ | ब्रह्मा, मैं (विष्णु) तथा शंकर हम सब आपके ही प्रभावसे उत्पन्न होते हैं। जब हम नित्य नहीं हैं तो फिर इन्द्र आदि प्रमुख देवता कैसे नित्य हो सकते हैं? समस्त चराचर जगत्की जननी तथा सनातन प्रकृतिरूपा आप ही नित्य हैं॥ ४२॥ |
| त्वं चेद्भवानि दयसे पुरुषं पुराणं<br>जानेऽहमद्य तव सन्निधिगः सदैव।<br>नोचेदहं विभुरनादिरनीह ईशो<br>विश्वात्मधीरिरिति तमःप्रकृतिः सदैव॥ ४३ | हे भवानि! आपकी सन्निधिमें आनेपर आज मुझे ज्ञात हो गया कि आप मुझ पुराणपुरुषपर सर्वदा दयाभाव बनाये रखती हैं; अन्यथा मैं अपनेको सर्वव्यापी, आदिरहित, निष्काम, ईश्वर तथा विश्वात्मा मान बैठता और अहंकारयुक्त होकर सदाके लिये तमोगुणी प्रकृतिवाला हो जाता॥ ४३॥ |
| विद्या त्वमेव ननु बुद्धिमतां नराणां<br>शक्तिस्त्वमेव किल शक्तिमतां सदैव।<br>त्वं कीर्तिकान्तिकमलामलतुष्टिरूपा<br>मुक्तिप्रदा विरतिरेव मनुष्यलोके॥ ४४ | आप निश्चय ही सदासे बुद्धिमान् पुरुषोंकी विद्या तथा शक्तिशाली पुरुषोंकी शक्ति हैं। आप इस मनुष्य-लोकमें कीर्ति, कान्ति, कमला, निर्मला तथा तुष्टिस्वरूपा हैं तथा प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली विरक्तिस्वरूपा हैं॥ ४४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—9 C
| २६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
|---|
| गायत्र्यसि प्रथमवेदकला त्वमेव<br>स्वाहा स्वधा भगवती सगुणार्धमात्रा।<br>आम्नाय एव विहितो निगमो भवत्या<br>सञ्जीवनाय सततं सुरपूर्वजानाम्॥ ४५ | आप वेदोंकी प्रथम कला गायत्री हैं। आप ही स्वाहा, स्वधा, सगुणा तथा अर्धमात्रा भगवती हैं। आपने ही देवताओं और पूर्वजोंके संरक्षणके लिये आगम तथा निगमकी रचना की है॥ ४५॥ | | मोक्षार्थमेव रचयस्यखिलं प्रपञ्चं<br>तेषां गताः खलु यतो ननु जीवभावम्।<br>अंशा अनादिनिधनस्य कलानघस्य<br>पूर्णार्णवस्य वितता हि यथा तरङ्गाः॥ ४६ | जिस प्रकार पूर्ण महासमुद्रकी विस्तृत तरंगें उस समुद्रका ही अंश होती हैं, उसी प्रकार आदि-अन्तसे हीन निष्कलंक ब्रह्मके जीवरूपी अंशोंको मोक्ष प्राप्त करानेके उद्देश्यसे ही आपने सम्पूर्ण जगत्-प्रपंचका निर्माण किया है॥ ४६॥ | | जीवो यदा तु परिवेत्ति तवैव कृत्यं<br>त्वं संहरस्यखिलमेतदिति प्रसिद्धम्।<br>नाट्यं नटेन रचितं वितथेऽन्तरङ्गे<br>कार्ये कृते विरमसे प्रथितप्रभावा॥ ४७ | जीवको जब यह विदित हो जाता है कि सम्पूर्ण विश्वप्रपंच आपहीका कृत्य है, तब अमित प्रभाववाली आप उसका उपसंहार कर देती हैं और अपने द्वारा किये गये मिथ्या, किंतु रहस्यपूर्ण कार्यपर उसी प्रकार प्रमुदित होती हैं जिस प्रकार मनोहारी नाटककी रचनापर सफल नट सन्तुष्ट होता है॥ ४७॥ | | त्राता त्वमेव मम मोहमयाद्भवाब्धे-<br>स्त्वामम्बिके सततमैमि महार्तिदे च।<br>रागादिभिर्विरचिते वितथे किलान्ते<br>मामेव पाहि बहुदुःखकरे च काले॥ ४८ | हे अम्बिके! आप ही इस मोहमय भव-सागरसे मेरी रक्षा कर सकती हैं। राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंके कारण अत्यन्त कष्टदायक तथा दुःखप्रद मिथ्या अन्तकालमें मेरी रक्षा कीजियेगा, मैं आपके शरणागत हूँ॥ ४८॥ | | नमो देवि महाविद्ये नमामि चरणौ तव।<br>सदा ज्ञानप्रकाशं मे देहि सर्वार्थदे शिवे॥ ४९ | हे देवि! आपको नमस्कार है। हे महाविद्ये! मैं आपके चरणोंमें नमन करता हूँ। हे सर्वार्थदात्री शिवे! आप ज्ञानरूपी प्रकाशसे मेरे हृदयको आलोक प्रदान कीजिये॥ ४९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
विष्णुना कृतं देवीस्तोत्रं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
~~ ० ~~
अथ पञ्चमोऽध्यायः
ब्रह्मा और शिवजीका भगवतीकी स्तुति करना
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा विरते विष्णौ देवदेवे जनार्दने।<br>उवाच शंकरः शर्वः प्रणतः पुरतः स्थितः॥ १ | ब्रह्माजी बोले— [हे नारद!] इस प्रकार देवदेव जनार्दन भगवान् विष्णुके स्तुति कर लेनेके उपरान्त भगवान् शिवशंकर विनीतभावसे देवीके सम्मुख स्थित होकर कहने लगे॥ १॥ | | शिव उवाच<br>यदि हरिस्तव देवि विभावज-<br>स्तदनु पद्मज एव तवोद्भवः।<br>किमहमत्र तवापि न सद्गुणः<br>सकललोकविधौ चतुरा शिवे॥ २ | शिवजी बोले— हे देवि! यदि भगवान् विष्णु आपके प्रभावसे प्रादुर्भूत हुए तथा उनके बाद ब्रह्माजी भी आपसे उत्पन्न हुए तो क्या मुझ तमोगुणीकी आपसे उत्पत्ति नहीं हुई है? हे शिवे! आप तो समग्र लोककी रचनामें चतुर हैं॥ २॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—9 D
| अ० ५ ] | तृतीय स्कन्ध | २६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वमसि भूः सलिलं पवनस्तथा<br>खमपि वह्निगुणश्च तथा पुनः।<br>जननि तानि पुनः करणानि च<br>त्वमसि बुद्धिमनोऽप्यथ हंकृतिः॥ ३ | पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि आप ही हैं। हे माता! आप ही इन्द्रियरूपिणी तथा आप ही बुद्धि, मन और अहंकारस्वरूपा हैं॥ ३॥ |
| न च विदन्ति वदन्ति च येऽन्यथा<br>हरिहराजकृतं निखिलं जगत्।<br>तव कृतास्त्रय एव सदैव ते<br>विरचयन्ति जगत्सचराचरम्॥ ४ | ब्रह्मा, विष्णु और शंकरने अखिल जगत्की रचना की है—ऐसा जो लोग अन्यथा बोलते हैं, वे कुछ भी नहीं जानते। आपने ही सदासे इन तीनोंकी सृष्टि की है, जो [आपकी ही प्रेरणासे] चराचर जगत्का सृजन-पालन-संहार करते हैं॥ ४॥ |
| अवनिवायुखवह्निजलादिभिः<br>सविषयैः सगुणैश्च जगद् भवेत्।<br>यदि तदा कथमद्य च तत्स्फुटं<br>प्रभवतीति तवाम्ब कलामृते॥ ५ | यदि पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि, जल आदि महाभूतोंके गुणों तथा विषयोंसे ही जगत्का निर्माण सम्भव हो तो भी हे अम्ब! आपकी [चिन्मयी] कलाके बिना वह कैसे व्यक्त हो सकता है?॥ ५॥ |
| भवसि सर्वमिदं सचराचरं<br>त्वमजविष्णुशिवाकृतिकल्पितम् ।<br>विविधवेषविलासकुतूहलै-<br>र्विरमसे रमसेऽम्ब यथारुचि॥ ६ | हे अम्ब! आपने ब्रह्मा, विष्णु और महेशद्वारा निर्मित इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है। आप अनेक प्रकारके वेष धारण करके कुतूहलपूर्ण क्रीड़ाएँ करती हुई यथेच्छ विहार करती हैं और पुनः शान्त भी हो जाती हैं॥ ६॥ |
| सकललोकसिसृक्षुरहं हरिः<br>कमलभूश्च भवाम यदाऽम्बिके।<br>तव पदाम्बुजपांसुपरिग्रहं<br>समधिगम्य तदा ननु चक्रिम॥ ७ | हे अम्बिके! जब मैं (शिव), विष्णु और ब्रह्मा सृष्टिकालमें इस ब्रह्माण्डकी रचना करनेकी इच्छा करते हैं, तब निश्चित ही आपके चरणकमलोंका रजकण प्राप्त करके ही हमलोग अपने-अपने कार्य करनेमें समर्थ होते हैं॥ ७॥ |
| यदि दयार्द्रमना न सदाम्बिके<br>कथमहं विहितश्च तमोगुणः।<br>कमलजश्च रजोगुणसम्भवः<br>सुविहितः किमु सत्त्वगुणो हरिः॥ ८ | हे अम्बिके! यदि आप सदा दयालु चित्तवाली न होतीं तो मैं तमोगुणयुक्त, ब्रह्मा रजोगुणसम्पन्न और विष्णु सत्त्वगुणयुक्त कैसे बनते?॥ ८॥ |
| यदि न ते विषमा मतिरम्बिके<br>कथमिदं बहुधा विहितं जगत्।<br>सचिवभूपतिभृत्यजनावृतं<br>बहुधनैरधनैश्च समाकुलम्॥ ९ | हे अम्बिके! यदि आपकी वैविध्यपूर्ण बुद्धि न होती तो यह संसार इतना विविधतापूर्ण कैसे होता, जिसमें मन्त्री, राजा, सेवक, धनी और निर्धन भरे पड़े हैं॥ ९॥ |
| तव गुणास्त्रय एव सदा क्षमाः<br>प्रकटनावनसंहरणेषु वै।<br>हरिहरद्रुहिणाश्च क्रमात्तया<br>विरचितास्त्रिजगतां किल कारणम्॥ १० | इस ब्रह्माण्डकी सृष्टि, स्थिति और संहार करनेमें आपके तीनों गुण (सत्-रज-तम) ही सर्वथा समर्थ हैं; फिर भी आपने हम ब्रह्मा, विष्णु और महेशको क्रमशः इन कार्योंको सम्पन्न करनेके लिये तीनों लोकोंके कारणरूपमें उत्पन्न किया है॥ १०॥ |
| परिचितानि मया हरिणा तथा<br>कमलजेन विमानगतेन वै।<br>पथिगतैर्भुवनानि कृतानि वा<br>कथय केन भवानि नवानि च॥ ११ | विमानमें बैठा हुआ मैं, ब्रह्मा तथा विष्णु—हमलोग इन भुवनोंसे पूर्णरूपेण परिचित हो गये हैं। हे भवानि! मार्गमें स्थित इन नवीन भुवनोंको किसने बनाया? इसे आप बतायें॥ ११॥ |
२६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
२६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
| सृजसि पासि जगजगदम्बिके<br>स्वकलया कियदिच्छसि नाशितुम्।<br>रमयसे स्वपतिं पुरुषं सदा<br>तव गतिं न हि विद्म वयं शिवे॥ १२ | हे जगदम्बिके! आप अपनी कलासे जगत्की रचना तथा पालन करती हैं और जब चाहती हैं तब उसका संहार कर देती हैं। आप सदा अपने पति परमपुरुषको रमण कराती रहती हैं। हे शिवे! आपकी इस लीलाको हम नहीं जान सकते॥ १२॥ | | जननि देहि पदाम्बुजसेवनं<br>युवतिभावगतानपि नः सदा।<br>पुरुषतामधिगम्य पदाम्बुजा-<br>द्विरहिताः क्व लभेम सुखं स्फुटम्॥ १३ | हे जननि! नारीभावको प्राप्त हमलोगोंको सदा अपने चरणकमलोंकी सेवा करनेका अवसर दें; क्योंकि कालान्तरमें पुनः पुंस्त्व प्राप्त होनेपर आपके चरणकमलोंसे पृथक् रहकर हमलोगोंको वह प्रत्यक्ष सुख कहाँ प्राप्त होगा!॥ १३॥ | | न रुचिरस्ति ममाम्ब पदाम्बुजं<br>तव विहाय शिवे भुवनेष्वलम्।<br>निवसितुं नरदेहमवाप्य च<br>त्रिभुवनस्य पतित्वमवाप्य वै॥ १४ | हे अम्ब! हे शिवे! आपके चरणकमलोंको त्यागकर यह नरदेह प्राप्त करके तीनों लोकोंका स्वामित्व प्राप्त करके भी समस्त लोकोंमें कहीं भी रहनेकी मेरी रुचि नहीं है—चाहे मुझे त्रिभुवनका स्वामित्व ही क्यों न मिल जाय॥ १४॥ | | सुदति नास्ति मनागपि मे रति-<br>र्युवतिभावमवाप्य तवान्तिके।<br>पुरुषता क्व सुखाय भवत्यलं<br>तव पदं न यदीक्षणगोचरम्॥ १५ | हे सुदति! आपके सांनिध्यमें स्त्रीभावको प्राप्त कर लेनेपर अब पुरुषभावमें मेरी थोड़ी भी रुचि नहीं है। जिसे पाकर आपके चरणारविन्दके दर्शनका सौभाग्य न मिले, वह पुरुषता कैसे सुख प्रदान कर सकती है?॥ १५॥ | | त्रिभुवनेषु भवत्वियमम्बिके<br>मम सदैव हि कीर्तिरनाविला।<br>युवतिभावमवाप्य पदाम्बुजं<br>परिचितं तव संसृतिनाशनम्॥ १६ | हे अम्बिके! स्त्रीका रूप पाकर मैं भवबन्धनसे मुक्त करनेवाले आपके चरणकमलोंसे परिचित हो गया हूँ। आपकी कृपासे तीनों लोकोंमें मेरा सुयश स्थिर रहे॥ १६॥ | | भुवि विहाय तवान्तिकसेवनं<br>क इह वाञ्छति राज्यमकण्टकम्।<br>त्रुटिरसौ किल याति युगात्मतां<br>न निकटं यदि तेऽङ्घ्रिसरोरुहम्॥ १७ | इस संसारमें ऐसा कौन प्राणी होगा, जो आपके सांनिध्यका सेवन छोड़कर निष्कण्टक राज्य करना चाहेगा? क्योंकि जिसे आपके चरणकमलका सांनिध्य प्राप्त नहीं होता, उसके लिये क्षणांश भी युगके समान प्रतीत होता है॥ १७॥ | | तपसि ये निरता मुनयोऽमला-<br>स्तव विहाय पदाम्बुजपूजनम्।<br>जननि ते विधिना किल वञ्चिताः<br>परिभवो विभवे परिकल्पितः॥ १८ | हे जननि! जो शुद्ध चित्तवाले मुनि आपके चरण-कमलकी सेवा त्यागकर केवल तपश्चर्यामें लगे रहते हैं, वे निश्चितरूपसे विधाताके द्वारा ठगे गये हैं और अपनी हानिको ही लाभ समझते हैं॥ १८॥ | | न तपसा न दमेन समाधिना<br>न च तथा विहितैः क्रतुभिर्यथा।<br>तव पदाब्जपरागनिषेवणा-<br>द्भवति मुक्तिरजे भवसागरात्॥ १९ | हे अजे! आपके पदारविन्दके परागकी सेवासे जैसी मुक्ति इस संसार-सागरसे प्राप्त होती है, वैसी मुक्ति तपस्या, इन्द्रियदमन, समाधि तथा विभिन्न वेदविहित यज्ञोंसे भी नहीं होती॥ १९॥ |
| अ० ५ ] | तृतीय स्कन्ध | २६३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुरु दयां दयसे यदि देवि मां<br>कथय मन्त्रमनाविलमद्भुतम्।<br>समभवं प्रजपन्सुखितो ह्यहं<br>सुविशदं च नवार्णमनुत्तमम् ॥ २० | हे देवि! यदि आप मेरे प्रति दयालु हैं तो मुझपर दया कीजिये और अपना निर्मल, अद्भुत, सर्वश्रेष्ठ एवं विशद नवार्ण मन्त्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) मुझे प्रदान कीजिये, जिससे उसका निरन्तर जप करके मैं सर्वदाके लिये सुखी हो जाऊँ॥ २०॥ |
| प्रथमजन्मनि चाधिगतो मया<br>तदधुना न विभाति नवाक्षरः।<br>कथय मां मनुमद्य भवार्णवा-<br>ज्जननि तारय तारय तारके ॥ २१ | पूर्वजन्ममें मैंने नवार्ण मन्त्रकी दीक्षा पायी थी; परंतु वह मुझे अब स्मरण नहीं रह गया है। इसलिये हे तारके! हे जननि! आज पुनः वह मन्त्र मुझे प्रदान कीजिये और भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये॥ २१॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्ता सा तदा देवी शिवेनाद्भुततेजसा।<br>उच्चचाराम्बिका मन्त्रं प्रस्फुटं च नवाक्षरम्॥ २२<br>तं गृहीत्वा महादेवः परां मुदमवाप ह।<br>प्रणम्य चरणौ देव्यास्तत्रैवावस्थितः शिवः॥ २३ | ब्रह्माजी बोले—[हे नारद!] अद्भुत तेजस्वी शिवजीके ऐसा कहनेपर जगदम्बाने स्पष्ट शब्दोंमें नवाक्षर मन्त्रका उच्चारण किया। उस मन्त्रको ग्रहण करके शिवजी बहुत प्रसन्न हो गये और भगवतीके चरणोंमें प्रणाम करके वहींपर स्थित हो गये॥ २२-२३॥ |
| जपन्नवाक्षरं मन्त्रं कामदं मोक्षदं तथा।<br>बीजयुक्तं शुभोच्चारं शङ्करस्तस्थिवांस्तदा ॥ २४ | उस समय सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ, मुक्तिप्रदायक तथा शुभ उच्चारणसे सम्पन्न उस बीजयुक्त नवाक्षर मन्त्रका जप करते हुए शंकरजी वहाँ विराजमान रहे॥ २४॥ |
| तं तथावस्थितं दृष्ट्वा शङ्करं लोकशङ्करम्।<br>अवोचं तां महामायां संस्थितोऽहं पदान्तिके॥ २५ | संसारका कल्याण करनेवाले शिवजीको इस प्रकार बैठा देखकर मैं उन महामायाके चरणोंके समीप बैठ गया और उनसे कहने लगा॥ २५॥ |
| न वेदास्त्वामेवं कलयितुमिहासन्नपटवो<br>यतस्ते नोचुस्त्वां सकलजनधात्रीमविकलाम्।<br>यदा स्वाहाभूता सकलमखहोमेषु विहिता<br>तदा त्वं सर्वज्ञा जननि खलु जाता त्रिभुवने ॥ २६ | हे जननि! वेद सभी लोगोंको धारण करनेवाली तथा सनातनी आप भगवतीकी कल्पना करनेमें अकुशल हैं—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि साधारण कार्योंमें उन्होंने आप भगवतीकी चर्चा नहीं की है। यदि वे आपको न जानते तो सभी यज्ञों तथा हवन-कार्योंमें आपको ही स्वाहादेवीके रूपमें प्रतिष्ठित कैसे करते? इसलिये आप तीनों लोकोंमें सर्वज्ञाके रूपमें विख्यात हुईं॥ २६॥ |
| कर्ताहं प्रकरोमि सर्वमखिलं ब्रह्माण्डमत्यद्भुतं<br>कोऽन्योऽस्तीह चराचरे त्रिभुवने मत्तः समर्थः पुमान्।<br>धन्योऽस्म्यत्र न संशयः किल यदा ब्रह्मास्मि लोकातिगो<br>मग्नोऽहं भवसागरे प्रवितते गर्वाभिवेशादिति ॥ २७ | मैं स्रष्टा हूँ, मैं अत्यन्त अद्भुत सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका निर्माण करता हूँ, इस चराचर त्रिभुवनमें मुझसे बढ़कर समर्थ दूसरा पुरुष कौन है, मैं निस्संदेह धन्य हूँ, मैं लोकोत्तर ब्रह्मा हूँ—इस मिथ्या अहंकारके कारण मैं सर्वदा इस विस्तृत संसारसागरमें निमग्न रहता हूँ; तथापि आज आपके चरण-कमलोंकी पराग-प्राप्तिके |
२६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
२६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अद्याहं तव पादपङ्कजपरागादानगर्वेण वै<br>धन्योऽस्मीति यथार्थवादनिपुणो जातः प्रसादाच्च ते।<br>याचे त्वां भवभीतिनाशचतुरां मुक्तिप्रदां चेश्वरीं<br>हित्वा मोहकृतं महार्त्तिनिगडं त्वद्भक्तियुक्तं कुरु ॥ २८ | गर्वसे मैं वस्तुतः धन्य हो गया हूँ और आपकी कृपासे ही आज मैं यथातथ्यके ज्ञानमें निपुण हो गया हूँ। सांसारिक भयका नाश करनेमें दक्ष, मुक्तिदायिनी आप परमेश्वरीसे मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि मोहनिर्मित महादुःखदायी भवबन्धनसे मुक्त करके आप मुझे अपनी भक्तिसे समन्वित कीजिये॥ २७-२८॥ |
| अतोऽहञ्च जातो विमुक्तः कथं स्यां<br>सरोजादमेयात्त्वदाविष्कृताद्वै ।<br>तवाज्ञाकरः किङ्करोऽस्मीति नूनं<br>शिवे पाहि मां मोहमग्नं भवाब्धौ ॥ २९ | आपसे ही निर्मित अद्भुत कमलसे मैं आविर्भूत हुआ हूँ और मैं आपका आज्ञाकारी सेवक हूँ, अतः मैं कैसे मुक्त हो सकूँगा? हे शिवे! इस भवसागरमें पड़े हुए मुझ मोहमग्नकी रक्षा कीजिये॥ २९॥ |
| न जानन्ति ये मानवास्ते वदन्ति<br>प्रभुं मां तवाद्यं चरित्रं पवित्रम्।<br>यजन्तीह ये याजकाः स्वर्गकामा<br>न ते ते प्रभावं विदन्त्येव कामम्॥ ३० | इस संसारमें जो लोग आपके सनातन पवित्र चरित्रको नहीं जानते, वे लोग मुझे ही ईश्वर कहते हैं और जो यज्ञकर्ता स्वर्गकी इच्छासे [इन्द्र आदि देवताओंका] यजन करते हैं, वे भी सर्वथा आपके प्रभावको नहीं जानते॥ ३०॥ |
| त्वया निर्मितोऽहं विधित्वे विहारं<br>विकर्तुं चतुर्धा विधायादिसर्गम्।<br>अहं वेद्मि कोऽन्यो विवेदादिमाये<br>क्षमस्वापराधं त्वहङ्कारजं मे ॥ ३१ | हे आदिमाये! सर्वप्रथम सृष्टिको चार भागों [अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और पिण्डज—जरायुज]—में विभक्त करनेके लिये ही आपने मुझे ब्रह्माके पदपर बैठाया, परंतु [मैंने यह समझ लिया कि] मैं ही सब कुछ जानता हूँ, दूसरा कौन जान सकता है—मेरे इस अहंकारजन्य अपराधको आप क्षमा कीजिये॥ ३१॥ |
| श्रमं येऽष्टधा योगमार्गे प्रवृत्ताः<br>प्रकुर्वन्ति मूढाः समाधौ स्थिता वै।<br>न जानन्ति ते नाम मोक्षप्रदं वा<br>समुच्चारितं जातु मातर्मिषेण॥ ३२ | जो लोग अष्टांगयोगका आश्रय लेते हैं और समाधि लगाकर व्यर्थ श्रम करते हैं, वे अज्ञानी हैं। हे माता! वे यह नहीं जानते कि किसी भी बहाने आपके नामोच्चारणमात्रसे ही उन्हें मुक्ति प्राप्त हो सकती है॥ ३२॥ |
| विचारे परे तत्त्वसंख्याविधाने<br>पदे मोहिता नाम ते संविहाय।<br>न किं ते विमूढा भवाब्धौ भवानि<br>त्वमेवासि संसारमुक्तिप्रदा वै॥ ३३ | कुछ लोग (सांख्यवादी) तो आपके नामका आश्रय छोड़कर विमोहित हो तत्त्वोंकी संख्याके फेरमें पड़ जाते हैं; क्या वे इस भवसागरमें मूर्ख नहीं हैं? हे भवानि! संसारसे मुक्ति प्रदान करनेवाली तो आप ही हैं॥ ३३॥ |
| परं तत्त्वविज्ञानमाद्यैर्जनैयै-<br>रजे चानुभूतं त्यजन्त्येव ते किम्।<br>निमेषार्धमात्रं पवित्रं चरित्रं<br>शिवा चाम्बिका शक्तिरीशेति नाम॥ ३४ | हे अजे! जिन विष्णु-शिव आदिने परम तत्त्वज्ञानका अनुभव कर लिया है, वे क्या आधे निमेषमात्रके लिये भी आपके पवित्र चरित्र तथा शिवा, अम्बिका, शक्ति, ईश्वरी आदि नामोंको विस्मृत करते हैं?॥ ३४॥ |
| अ० ५ ] | तृतीय स्कन्ध | २६५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न किं त्वं समर्थासि विश्वं विधातुं<br>दृशैवाशु सर्वं चतुर्था विभक्तम्।<br>विनोदार्थमेवं विधिं मां विधाया-<br>दिसर्गे किलेदं करोषीति कामम्॥ ३५ | क्या आप विश्वकी रचना करनेमें समर्थ नहीं हैं? हे आदिसर्गे! आपके दृष्टिनिक्षेपमात्रसे ही यह सम्पूर्ण विश्व चार प्रकारके (अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज, पिण्डज—जरायुज) जीवोंके रूपमें शीघ्र ही विभक्त हुआ है। इस प्रकार मुझ ब्रह्माकी सृष्टि तो आप अपने मनोविनोदके लिये करके पुनः स्वतन्त्र भावसे जो चाहती हैं, वह करती हैं॥ ३५॥ |
| हरिः पालकः किं त्वयासौ मधोर्वा<br>तथा कैटभाद्रक्षितः सिन्धुमध्ये।<br>हरः संहृतः किं त्वयासौ न काले<br>कथं मे भ्रुवोर्मध्यदेशात्स जातः॥ ३६ | [महाप्रलयकी स्थितिमें] यदि महासागरमें आप मधु-कैटभसे विष्णुकी रक्षा न करतीं तो वे सृष्टि-पालक कैसे बन पाते और यदि आप सबके संहारक शिवका संहार न करतीं तो वे मेरे भ्रूमध्यसे कैसे प्रकट होते?॥ ३६॥ |
| न ते जन्म कुत्रापि दृष्टं श्रुतं वा<br>कुतः सम्भवस्ते न कोऽपीह वेद।<br>किलाद्यासि शक्तिस्त्वमेका भवानि<br>स्वतन्त्रैः समस्तैरतो बोधितासि॥ ३७ | आपका जन्म कहाँ हुआ—इसे न तो किसीने देखा और न सुना और कोई यह भी नहीं जान पाया कि आपकी उत्पत्ति कहाँ हुई? हे भवानि! एकमात्र आप ही आद्या शक्ति हैं, अतएव वेदोंने इसी रूपमें आपका वर्णन किया है॥ ३७॥ |
| त्वया संयुतोऽहं विकर्तुं समर्थो<br>हरिस्त्रातुमम्ब त्वया संयुतश्च।<br>हरः सम्प्रहर्तुं त्वयैवेह युक्तः<br>क्षमा नाद्य सर्वे त्वया विप्रयुक्ताः॥ ३८ | हे अम्ब! आपकी ही शक्तिसे प्रेरित होकर मैं सृष्टि करनेमें, विष्णु पालन करनेमें तथा शिव संहार करनेमें समर्थ होते हैं। आपकी शक्तिसे विलग रहकर अब हमलोग कुछ भी करनेमें सक्षम नहीं हैं॥ ३८॥ |
| यथाहं हरिः शङ्करः किं तथान्ये<br>न जाता न सन्तीह नो वाभविष्यन्।<br>न मुह्यन्ति केऽस्मिंस्तवात्यन्तचित्रे<br>विनोदे विवादास्पदेऽल्पाशयानाम्॥ ३९ | जिस प्रकार मैं (ब्रह्मा), विष्णु और शिव उत्पन्न हुए हैं, उसी प्रकार क्या अन्य प्राणी उत्पन्न नहीं हुए, अथवा विद्यमान नहीं हैं या उत्पन्न नहीं होंगे? किंतु अल्प बुद्धिवाले प्राणियोंके लिये विवादास्पद तथा अत्यन्त विचित्र आपके इस लीलाविनोदसे कौन भ्रमित नहीं हो जाते?॥ ३९॥ |
| अकर्ता गुणस्पष्ट एवाद्य देवो<br>निरीहोऽनुपाधिः सदैवैकलश्च।<br>तथापीश्वरस्ते वितीर्णं विनोदं<br>सुसम्पश्यतीत्याहुरेवं विधिज्ञाः॥ ४० | वे आदिदेव ईश्वर अकर्ता, गुणोंसे स्फुट होनेवाले, निष्काम, उपाधिरहित तथा निर्गुण हैं, फिर भी वे आपके विस्तृत लीला-विनोदको भलीभाँति देखते रहते हैं—ज्ञानीजन ऐसा ही कहते हैं॥ ४०॥ |
| दृष्टादृष्टविभेदेऽस्मिन्प्राक्तत्त्वो वै पुमान्परः।<br>नान्यः कोऽपि तृतीयोऽस्ति प्रमेये सुविचारिते॥ ४१ | मूर्त और अमूर्त भेदोंसे युक्त इस संसारमें आपसे पूर्व वे ही परमपुरुष थे; ज्ञान-तत्त्वपर सम्यक् प्रकारसे विचार करनेपर यह सर्वथा सिद्ध होता है कि अन्य तीसरा कोई भी नहीं है॥ ४१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे हरब्रह्मकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
| २६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
|---|
| न मिथ्या वेदवाक्यं वै कल्पनीयं कदाचन।<br>विरोधोऽयं मयात्यन्तं हृदये तु विशङ्कितः ॥ ४२<br><br>एकमेवाद्वितीयं यद् ब्रह्म वेदा वदन्ति वै।<br>सा किं त्वं वाप्यसौ वा किं सन्देहं विनिवर्तय ॥ ४३ | [यह सिद्धान्त है कि] वेद-वाक्यको कभी मिथ्या नहीं समझना चाहिये। वेद ब्रह्मको अद्वितीय और एक बताते हैं; तो फिर आप क्या हैं और वह ब्रह्म क्या है? यह विरोध मेरे हृदयमें महान् शंका उत्पन्न करता है। आप मेरे इस सन्देहका निवारण करें ॥ ४२-४३ ॥ | | निःसंशयं न मे चेतः प्रभवत्यविशङ्कितम्।<br>द्वित्वैकत्वविचारेऽस्मिन्मग्नं क्षुल्लकं मनः ॥ ४४ | इस प्रकार द्वैत-अद्वैतके इस विचारमें डूबा हुआ मेरा क्षुद्र मन निश्चितरूपसे शंकारहित नहीं हो पा रहा है ॥ ४४ ॥ | | स्वमुखेनापि सन्देहं छेत्तुमर्हसि मामकम्।<br>पुण्ययोगाच्च मे प्राप्ता सङ्गतिस्तव पादयोः ॥ ४५ | अब आप ही स्वयं अपने मुखसे मेरी इस शंकाका निवारण करनेकी कृपा करें; क्योंकि [अनेक जन्मोंके] पुण्ययोगसे ही आपके चरणोंका यह सांनिध्य मुझे प्राप्त हुआ है ॥ ४५ ॥ | | पुमानसि त्वं स्त्री वासि वद विस्तरतो मम।<br>ज्ञात्वाहं परमां शक्तिं मुक्तः स्यां भवसागरात् ॥ ४६ | आप पुरुष हैं अथवा स्त्री—यह मुझे विस्तारपूर्वक बतायें, जिससे मैं आप परम शक्तिको जानकर भवसागरसे मुक्त हो जाऊँ ॥ ४६ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे हरब्रह्मकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
भगवती जगदम्बिकाद्वारा अपने स्वरूपका वर्णन तथा ‘महासरस्वती’, ‘महालक्ष्मी’ और ‘महाकाली’ नामक अपनी शक्तियोंको क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिवको प्रदान करना
| ब्रह्मोवाच<br>इति पृष्टा मया देवी विनयावनतेन च।<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णमाद्या भगवती हि सा॥ १ | **ब्रह्माजी बोले—**अत्यन्त नम्र भावसे मेरे पूछनेपर वे आद्या भगवती मधुर वचन कहने लगीं ॥ १ ॥ | | देव्युवाच<br>सदैकत्वं न भेदोऽस्ति सर्वदैव ममास्य च।<br>योऽसौ साहमहं योऽसौ भेदोऽस्ति मतिविभ्रमात् ॥ २ | **देवी बोलीं—**मैं और परब्रह्म सदा एक ही हैं; कोई भेद नहीं है; क्योंकि जो वे हैं, वही मैं हूँ, और जो मैं हूँ, वही वे हैं। बुद्धिभ्रमसे ही हम दोनोंमें भेद दिखायी पड़ता है ॥ २ ॥ | | आवयोरन्तरं सूक्ष्मं यो वेद मतिमान्हि सः।<br>विमुक्तः स तु संसारान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ३ | इसलिये हम दोनोंमें विद्यमान सूक्ष्म अन्तरको जो बुद्धिमान् जानता है, वह संसारके बन्धनसे छूटकर सदाके लिये मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥ | | एकमेवाद्वितीयं वै ब्रह्म नित्यं सनातनम्।<br>द्वैतभावं पुनर्याति काल उत्पित्सुसंज्ञके ॥ ४ | ब्रह्म अद्वितीय, एक, नित्य एवं सनातन है; केवल सृष्टि-रचनाके समय वह पुनः द्वैतभावको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ |
| अ० ६ ] | तृतीय स्कन्ध | २६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यथाद्दीपस्तथोपाधेर्योगत्सञ्जायते द्विधा।<br>छायेवादर्शमध्ये वा प्रतिबिम्बं तथावयोः॥ ५ | जिस प्रकार एक ही दीपक उपाधिभेदसे दो प्रकारका दिखायी देता है अथवा दर्पणमें पड़ती हुई छाया दर्पणभेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है, उसी प्रकार मैं और ब्रह्म एक होते हुए भी उपाधिभेदसे अनेक हो जाते हैं॥ ५॥ |
| भेद उत्पत्तिकाले वै सर्गार्थं प्रभवत्यज।<br>दृश्यादृश्यविभेदोऽयं द्वैविध्ये सति सर्वथा॥ ६ | हे अज! जगत्का निर्माण करनेके लिये सृष्टिकालमें भेद दिखता ही है। तब दृश्यादृश्यकी प्रतीति होना अनिवार्य ही है; क्योंकि बिना दोके सृष्टि होना असम्भव है॥ ६॥ |
| नाहं स्त्री न पुमांश्चाहं न क्लीबं सर्गसंक्षये।<br>सर्गे सति विभेदः स्यात्कल्पितोऽयं धिया पुनः॥ ७ | सृष्टिके प्रलयकालमें मैं न स्त्री हूँ, न पुरुष हूँ और न ही नपुंसक हूँ। परंतु जब पुनः सृष्टि होने लगती है, तब पूर्ववत् यह भेद बुद्धिके द्वारा उत्पन्न हो जाता है॥ ७॥ |
| अहं बुद्धिरहं श्रीश्च धृतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा।<br>श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा॥ ८<br><br>कान्तिः शान्तिः पिपासा च निद्रा तन्द्रा जराजरा।<br>विद्याविद्या स्पृहा वाञ्छा शक्तिश्चाशक्तिरेव च॥ ९<br><br>वसा मज्जा च त्वक्चाहं दृष्टिर्वागनृतानृता।<br>परा मध्या च पश्यन्ती नाड्योऽहं विविधाश्च याः॥ १० | मैं ही बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शान्ति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वाञ्छा, शक्ति, अशक्ति, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि, सत्यासत्य वाणी, परा, मध्या, पश्यन्ती आदि वाणीके भेद और जो विभिन्न प्रकारकी नाड़ियाँ हैं—वह सब मैं ही हूँ॥ ८-१०॥ |
| किं नाहं पश्य संसारे मद्वियुक्तं किमस्ति हि।<br>सर्वमेवाहमित्येवं निश्चयं विद्धि पद्मज॥ ११ | हे पद्मयोने! आप यह देखिये कि इस संसारमें मैं क्या नहीं हूँ और मुझसे पृथक् कौन-सी वस्तु है? इसलिये आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि सब कुछ मैं ही हूँ॥ ११॥ |
| एतैर्मे निश्चितै रूपैर्विहीनं किं वदस्व मे।<br>तस्मादहं विधे चास्मिन्सर्गे वै वितताभवम्॥ १२ | हे विधे! मेरे इन निश्चित रूपोंके अतिरिक्त यदि कुछ हो तो मुझे बतायें, अतः इस सृष्टिमें सर्वत्र मैं ही व्याप्त हूँ॥ १२॥ |
| नूनं सर्वेषु देवेषु नानानामधरा ह्यहम्।<br>भवामि शक्तिरूपेण करोमि च पराक्रमम्॥ १३<br><br>गौरी ब्राह्मी तथा रौद्री वाराही वैष्णवी शिवा।<br>वारुणी चाथ कौबेरी नारसिंही च वासवी॥ १४<br><br>उत्पन्नेषु समस्तेषु कार्येषु प्रविशामि तान्।<br>करोमि सर्वकार्याणि निमित्तं तं विधाय वै॥ १५ | निश्चित ही मैं समस्त देवताओंमें भिन्न-भिन्न नामोंसे विराजती हूँ तथा शक्तिरूपसे प्रकट होती हूँ और पराक्रम करती हूँ। मैं ही गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, कौबेरी, नारसिंही और वासवी शक्तिके रूपमें विद्यमान हूँ। सब कार्योंके उपस्थित होनेपर मैं उन देवताओंमें प्रविष्ट हो जाती हूँ और देवविशेषको निमित्त बनाकर सब कार्य सम्पन्न कर देती हूँ॥ १३-१५॥ |
| जले शीतं तथा वह्नावौष्ण्यं ज्योतिर्दिवाकरे।<br>निशानाथे हिमा कामं प्रभवामि यथा तथा॥ १६ | जलमें शीतलता, अग्निमें उष्णता, सूर्यमें प्रकाश और चन्द्रमामें ज्योत्स्नाके रूपमें मैं ही यथेच्छ प्रकट होती हूँ॥ १६॥ |
२६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मया त्यक्तं विधे नूनं स्पन्दितुं न क्षमं भवेत्।<br>जीवजातं च संसारे निश्चयोऽयं ब्रुवे त्वयि॥ १७<br><br>अशक्तः शङ्करो हन्तुं दैत्यान्किल मयोज्झितः।<br>शक्तिहीनं नरं ब्रूते लोकश्चैवातिदुर्बलम्॥ १८ | हे विधे! इस संसारका कोई भी जीव मुझसे रहित होकर स्पन्दन भी करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। यह मेरा निश्चय है। इसे मैं आपको बता दे रही हूँ। इसी प्रकार यदि मैं शिवको छोड़ दूँ तो वे शक्तिहीन होकर दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। इसीलिये तो संसारमें भी अत्यन्त दुर्बल पुरुषको लोग शक्तिहीन कहते हैं॥ १७-१८॥ |
| रुद्रहीनं विष्णुहीनं न वदन्ति जनाः किल।<br>शक्तिहीनं यथा सर्वे प्रवदन्ति नराधमम्॥ १९<br><br>पतितः स्खलितो भीतः शान्तः शत्रुवशं गतः।<br>अशक्तः प्रोच्यते लोके नारुद्रः कोऽपि कथ्यते॥ २० | लोग अधम मनुष्यको विष्णुहीन या रुद्रहीन नहीं कहते बल्कि उसे शक्तिहीन ही कहते हैं। जो गिर गया हो, स्खलित हो गया हो, भयभीत हो, निश्चेष्ट हो गया हो अथवा शत्रुके वशीभूत हो गया हो—वह संसारमें अरुद्र नहीं कहा जाता, अपितु अशक्त ही कहा जाता है॥ १९-२०॥ |
| तद्विद्धि कारणं शक्तिर्यथा त्वं च सिसृक्षसि।<br>भविता च यदा युक्तः शक्त्या कर्ता तदाखिलम्॥ २१ | [हे ब्रह्मन्!] आप ही जब सृष्टि करना चाहते हैं तब उसमें शक्ति ही कारण है, ऐसा जानिये। जब आप शक्तिसे युक्त होते हैं तभी सृष्टिकर्ता हो पाते हैं॥ २१॥ |
| तथा हरिस्तथा शम्भुस्तथेन्द्रोऽथ विभावसुः।<br>शशी सूर्यो यमस्त्वष्टा वरुणः पवनस्तथा॥ २२ | इसी प्रकार विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, यम, विश्वकर्मा, वरुण और वायुदेवता भी शक्ति-सम्पन्न होकर ही अपना-अपना कार्य सम्पादित करते हैं॥ २२॥ |
| धरा स्थिरा तदा धर्तुं शक्तियुक्ता यदा भवेत्।<br>अन्यथा चेदशक्ता स्यात्परमाणोश्च धारणे॥ २३<br><br>तथा शेषस्तथा कूर्मो येऽन्ये सर्वे च दिग्गजाः।<br>मद्युक्ता वै समर्थाश्च स्वानि कार्याणि साधितुम्॥ २४ | पृथ्वी भी जब शक्तिसे युक्त होती है, तब स्थिर होकर सबको धारण करनेमें समर्थ होती है। यदि वह शक्तिहीन हो जाय तो एक परमाणुको भी धारण करनेमें समर्थ न हो सकेगी। शेषनाग, कच्छप एवं दसों दिग्गज मेरी शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्य सम्पन्न करनेमें समर्थ हो पाते हैं॥ २३-२४॥ |
| जलं पिबामि सकलं संहरामि विभावसुम्।<br>पवनं स्तम्भयाम्यद्य यदिच्छामि तथाचरम्॥ २५ | यदि मैं चाहूँ तो सम्पूर्ण संसारका जल पी जाऊँ, अग्निको नष्ट कर दूँ और वायुकी गति रोक दूँ; मैं जैसा चाहती हूँ, वैसा करती हूँ॥ २५॥ |
| तत्त्वानां चैव सर्वेषां कदापि कमलोद्भव।<br>असतां भावसन्देहः कर्तव्यो न कदाचन॥ २६<br><br>कदाचित्प्रागभावः स्यात्प्रध्वंसाभाव एव वा।<br>मृत्पिण्डेषु कपालेषु घटाभावो यथा तथा॥ २७ | हे कमलोद्भव! सभी तत्त्वोंके अभावका सन्देह अब आप कभी न कीजिये; क्योंकि कभी-कभी किसी वस्तुविशेषका प्रागभाव (जिसका आदि न हो, पर अन्त हो) तथा प्रध्वंसाभाव (जिसका आदि हो, किंतु अन्त न हो) उसी प्रकार हो जाता है, जिस प्रकार मिट्टीके पिण्डोंमें और कपालोंमें घटाभाव प्रतीत होता है॥ २६-२७॥ |