भारतकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

| अ० ३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५४५ | | :--- | :--- |

| पातालपर्वतेभ्यश्च समाहूय वरान्वरान्।<br>दानवान्मम सैन्येशान्कुर्वन्तु त्वरिताश्चराः॥ ४३ | हे गुप्तचरो! पातालमें तथा पर्वतोंपर रहनेवाले बड़े-बड़े दानव-वीरोंको तत्काल यहाँ बुलाकर उन्हें मेरी सेनाओंका अध्यक्ष बना दो॥ ४३॥ | | एकोऽहं सर्वदेवान्किजेतुं दानवाः क्षमः।<br>शोभार्थं वः समाहूय नयामि सुरसङ्गमे॥ ४४ | हे दानवो! मैं तो अकेला ही समस्त देवताओंको जीतनेमें समर्थ हूँ, फिर भी शोभा बढ़ानेकी दृष्टिसे आप सबको भी बुलाकर देवताओंके साथ होनेवाले संग्राममें ले चलूँगा॥ ४४॥ | | शृङ्गाभ्यां च खुराभ्यां च हनिष्येऽहं सुरान्किल।<br>न मे भयं सुरेभ्यश्च वरदानप्रभावतः॥ ४५ | मैं अपनी सींगों तथा खुरोंसे देवताओंको निश्चितरूपसे मार डालूँगा। वरदानके प्रभावसे मुझे देवताओंसे भय नहीं है॥ ४५॥ | | अवध्योऽहं सुरगणैरसुरैर्मानवैस्तथा।<br>तस्मात्सज्जा भवन्त्वद्य देवलोकजयाय वै॥ ४६ | देवता, दानव तथा मनुष्य—सभीसे मैं अवध्य हूँ, अतः आप सब देवलोकपर विजय प्राप्त करनेके लिये अब तैयार हो जायँ॥ ४६॥ | | जित्वा सुरालयं दैत्या विहरिष्यामि नन्दने।<br>मन्दारकुसुमापीडा देवयोषित्समन्विताः॥ ४७<br>कामधेनुपयोत्सिक्ताः सुधापानप्रमोदिताः।<br>देवगन्धर्वगीतादिनृत्यलास्यसमन्विताः ॥ ४८ | हे दैत्यो! देवलोकको जीतकर मैं नन्दनवनमें विहार करूँगा। मन्दारपुष्पकी मालाएँ धारण करके आपलोग देवांगनाओंके साथ रहेंगे, कामधेनुके दुग्धका सेवन करेंगे, प्रसन्नतापूर्वक अमृत-पान करेंगे और देवताओं तथा गन्धर्वोंके गीतों तथा मनमोहक हाव-भाव-युक्त नृत्योंका आनन्द लेंगे॥ ४७-४८॥ | | उर्वशी मेनका रम्भा घृताची च तिलोत्तमा।<br>प्रम्लोचा महासेना मिश्रकेशी मदोत्कटा॥ ४९<br>विप्रचित्तिप्रभृतयो नृत्यगीतविशारदाः।<br>रञ्जयिष्यन्ति वः सर्वान्नानासवनिषेवणैः॥ ५० | उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा, प्रम्लोचा, महासेना, मिश्रकेशी, मदोत्कटा, विप्रचित्ति आदि नृत्य तथा गायन-कलामें अति निपुण अप्सराएँ विविध प्रकारके मद्य पिलाकर आप सभीका मनोरंजन करेंगी॥ ४९-५०॥ | | सर्वे सज्जा भवन्त्वद्य रोचतां गमनं दिवि।<br>संग्रामार्थं सुरैः सार्धं कृत्वा मङ्गलमुत्तमम्॥ ५१ | देवताओंके साथ युद्ध करनेके लिये देवलोकके लिये प्रस्थान करना यदि आपलोगोंको उचित लगे तो आप सब उत्तम मंगलाचार सम्पन्न करके आज ही चलनेके लिये तैयार हो जाइये॥ ५१॥ | | रक्षणार्थं च सर्वेषां भार्गवं मुनिसत्तमम्।<br>समाहूय च सम्पूज्य स्थाप्य यज्ञे गुरुं परम्॥ ५२ | समस्त दानवोंकी रक्षाके लिये मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्यको बुलाकर उनका पूजन करके उन परम गुरुको यज्ञ-कार्यमें नियुक्त कीजिये॥ ५२॥ | | व्यास उवाच<br>इति संदिश्य दैत्येन्द्रान्महिषः पापधीस्तदा।<br>जगाम त्वरितो राजन्भवनं स्वं मुदान्वितः॥ ५३ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार दानववीरोंको आदेश देकर वह पापबुद्धि महिषासुर प्रसन्नताके साथ शीघ्र ही अपने भवनको चला गया॥ ५३॥ |

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इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
भगवतीमाहात्म्ये दैत्यसैन्योद्योगो नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 18 A

अथ चतुर्थोऽध्यायः

५४६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४

अथ चतुर्थोऽध्यायः

इन्द्रका देवताओं तथा गुरु बृहस्पतिसे परामर्श करना तथा बृहस्पतिद्वारा जय-पराजयमें दैवकी प्रधानता बतलाना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
गते दूते सुरेन्द्रोऽपि समाहूय सुरानथ।<br>यमवायुधनाध्यक्षवरुणानिदमूचिवान् ॥ १हे राजन्! दूतके चले जानेपर इन्द्रने भी यम, वायु, कुबेर तथा वरुण—इन देवताओंको बुलाकर यह बात कही॥ १॥
महिषो नाम दैत्येन्द्रो रम्भपुत्रो महाबलः।<br>वरदर्पमदोन्मत्तो मायाशतविचक्षणः॥ २रम्भका पुत्र महाबली दैत्यराज महिषासुर इस समय वरदानके अभिमानमें मदोन्मत्त हो गया है। वह सैकड़ों प्रकारकी माया रचनेमें पारंगत है॥ २॥
तस्य दूतोऽद्य सम्प्राप्तः प्रेषितस्तेन भोः सुराः।<br>स्वर्गकामेन लुब्धेन मामुवाचेदृशं वचः॥ ३हे देवताओ! स्वर्ग-प्राप्तिकी कामना करनेवाले उस लोभी महिषासुरके द्वारा भेजा गया दूत आज ही यहाँ आया था। उसने मुझसे इस प्रकारकी बात कही—॥ ३॥
त्यज देवालयं शक्र यथेच्छं व्रज वासव।<br>सेवा वा कुरु दैत्यस्य महिषस्य महात्मनः॥ ४हे शक्र! तुम तत्काल देवलोक छोड़ दो और अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ जाना चाहो, वहाँ चले जाओ; अथवा हे वासव! महान् महिषासुरका सेवकत्व स्वीकार कर लो॥ ४॥
दयावान्दानवेन्द्रोऽसौ स ते वृत्तिं विधास्यति।<br>नतेषु भृत्यभूतेषु न कुप्यति कदाचन॥ ५वे दैत्यराज महिषासुर बड़े दयालु हैं। वे आपके लिये किसी जीविकाका प्रबन्ध अवश्य कर देंगे। विनम्र सेवकोंपर वे कभी भी क्रोध नहीं करते हैं॥ ५॥
नोचेद्युद्धाय देवेश सेनोद्योगं कुरु स्वयम्।<br>गते मयि स दैत्येन्द्रस्त्वरितः समुपेष्यति॥ ६हे देवेश! यदि आपको यह स्वीकार नहीं है तो युद्धके लिये सेनाके संगठनमें जुट जाइये। मेरे वहाँ पहुँचते ही वे दैत्येन्द्र महिषासुर [देवलोकपर आक्रमणके लिये] यहाँ शीघ्र आ पहुँचेंगे॥ ६॥
इत्युक्त्वा स गतो दूतो दानवस्य दुरात्मनः।<br>किं कर्तव्यमतः कार्यं चिन्तयध्वं सुरोत्तमाः॥ ७ऐसा कहकर दुष्टात्मा दानव महिषासुरका वह दूत यहाँसे चला गया। हे श्रेष्ठ देवगण! आपलोग विचार कीजिये कि अब क्या करना चाहिये?॥ ७॥
दुर्बलोऽपि न चोपेक्ष्यः शत्रुर्वलवता सुराः।<br>विशेषेण सदोद्योगी बलवान्बलदर्पितः॥ ८हे देवताओ! स्वयं बलवान् होते हुए भी अत्यन्त दुर्बल शत्रुको भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। अपने बलका अभिमान करनेवाले, बलशाली तथा सदा उद्यमशील शत्रुको तो विशेषरूपसे उपेक्षा नहीं करनी चाहिये॥ ८॥
उद्यमः किल कर्तव्यो यथाबुद्धि यथाबलम्।<br>दैवाधीनो भवेन्नूनं जयो वाथ पराजयः॥ ९अतः हमलोगोंको अपने बल तथा विवेकके अनुसार पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिये। जीत अथवा हार तो दैवके अधीन रहती है॥ ९॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 18 B

अ० ४ ]पञ्चम स्कन्ध५४७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सन्धियोगो न चात्रास्ति खले सन्धिर्निरर्थकः।<br>सर्वथा साधुभिः कार्यं विचार्य च पुनः पुनः॥ १०इस परिस्थितिमें सन्धिकी भी सम्भावना नहीं है; क्योंकि नीचके साथ की गयी सन्धि व्यर्थ सिद्ध होती है। अतएव बार-बार विचार करके केवल सज्जनोंके साथ ही सन्धि करनी चाहिये॥ १०॥
यानमप्यधुना नैव कर्तव्यं सहसा पुनः।<br>प्रेक्षकाः प्रेषणीयाश्च शीघ्रगाः सुप्रवेशकाः॥ ११<br><br>इङ्गितज्ञाश्च निःसङ्गा निःस्पृहाः सत्यवादिनः।<br>सेनाभियोगं प्रस्थानं बलसंख्यां यथार्थतः॥ १२<br><br>वीराणां च परिज्ञानं कृत्वायान्तु त्वरान्विताः।<br>ज्ञात्वा दैत्यपतेस्तस्य सैन्यस्य च बलाबलम्॥ १३<br><br>करिष्यामि ततस्तूर्णं यानं वा दुर्गसंग्रहम्।<br>विचार्य खलु कर्तव्यं कार्यं बुद्धिमता सदा।<br>सहसा विहितं कार्यं दुःखदं सर्वथा भवेत्॥ १४<br><br>तस्माद्विमृश्य कर्तव्यं सुखदं सर्वथा बुधैः।<br>नात्र भेदविधिर्न्याय्यो दानवेषु च सर्वथा॥ १५इस समय अचानक आक्रमण करना भी उचित नहीं है। अतएव सर्वप्रथम शीघ्रगामी तथा सुगमतासे प्रवेश करनेमें दक्ष गुप्तचर वहाँ भेजे जाने चाहिये, जो शत्रुओंके अभिप्राय समझनेमें समर्थ, किसीके साथ अधिक भावासक्ति न रखनेवाले, निर्लोभी तथा सत्यवादी हों। वे गुप्तचर शत्रु-सेनाकी गतिविधि, प्रस्थान, सेनाकी ठीक-ठीक संख्या और शत्रुदलके वीरोंकी वास्तविक जानकारी करके शीघ्रतापूर्वक वापस आ जाएँ। इस प्रकार दैत्यपति महिषासुरकी सेनाके बलाबलको भलीभाँति जान लेनेके पश्चात् मैं शीघ्र ही आक्रमण अथवा किलेबन्दी करनेका प्रबन्ध करूँगा। सर्वदा भलीभाँति सोच-समझकर बुद्धिमान् मनुष्यको कार्य करना चाहिये; क्योंकि बिना विचार किये अचानक किया गया कार्य हर तरहसे दुःखदायक ही होता है। अतएव बुद्धिमान् मनुष्योंको सम्यक् रूपसे विचार-विमर्श करके ऐसा कार्य करना चाहिये, जो सुखकर हो॥ ११—१४ १/२ ॥
एकचित्तेषु कार्येऽस्मिंस्तस्माच्चारा व्रजन्तु वै।<br>ज्ञात्वा बलाबलं तेषां पश्चान्नीतिर्विचार्य च॥ १६<br><br>विधेया विधिवत्तज्ज्ञैस्तेषु कार्यपरेषु च।<br>अन्यथा विहितं कार्यं विपरीतफलप्रदम्॥ १७<br><br>सर्वथा तद्भवेन्नूनमज्ञातमौषधं यथा।दानवोंमें मतभेद पैदा करनेवाली भेदनीतिका आश्रय लेना भी उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि उनमें पूर्ण मतैक्य है। अतएव इस कार्यके लिये पहले गुप्तचर भेजे जाएँ। उनके द्वारा उन दानवोंके बलाबलको जाननेके पश्चात् श्रेष्ठ नीतिविदोंसे भलीभाँति विचार करके उन कार्योंके लिये नीति निर्धारित की जानी चाहिये। नीतिसे हटकर किया गया कार्य अज्ञात औषधिके सेवनसे उत्पन्न होनेवाले कष्टकी भाँति विपरीत फल देनेवाला होता है॥ १५—१७ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य तैः सर्वैः प्रणिधिं कार्यवेदिनम्॥ १८**व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार उन सभी देवताओंसे विचार-विमर्श करके देवराज इन्द्रने शत्रुपक्षके रहस्योंकी जानकारीके उद्देश्यसे एक कार्यकुशल गुप्तचर भेजा॥ १८ १/२ ॥
प्रेषयामास देवेन्द्रः परिज्ञानाय पार्थिव।<br>दूतस्तु त्वरितो गत्वा समागम्य सुराधिपम्॥ १९उस दूतने तत्काल पहुँचकर शत्रुपक्षके सैन्य-बलाबलकी जानकारी प्राप्त की और पुनः इन्द्रके पास वापस आकर उनको सब कुछ बता दिया। शत्रुसेनाकी

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—18 C

५४८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
निवेदयामास तदा सर्वसैन्यबलाबलम्।<br>ज्ञात्वा तद्बलमुद्योगं तुराषाडतिविस्मितः॥ २०<br>देवानचोदयत्तूर्णं समाहूय पुरोहितम्।<br>मन्त्रं मन्त्रविदां श्रेष्ठं चकार त्रिदशेश्वरः॥ २१<br>उवाचाङ्गिरसश्रेष्ठं समासीनं वरासने।तैयारीके विषयमें जानकर इन्द्रको महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने देवताओंको तैयारीमें लगनेकी आज्ञा दे दी। तत्पश्चात् मन्त्रविदोंमें श्रेष्ठ पुरोधा देवगुरु बृहस्पतिको बुलाकर इन्द्र उनके साथ परामर्श करने लगे। उत्तम आसनपर विराजमान श्रेष्ठ अंगिरापुत्र बृहस्पतिसे इन्द्रने कहा॥ १९—२१ १/२॥
इन्द्र उवाच<br>भो भो देवगुरो विद्वन्किं कर्तव्यं वदस्व नः॥ २२<br>सर्वज्ञोऽसि समुत्पन्ने कार्ये त्वं गतिरद्य नः।<br>दानवो महिषो नाम महावीर्यो मदान्वितः॥ २३<br>योद्धुकामः समायाति बहुभिर्दानवैर्वृतः।<br>तत्र प्रतिक्रिया कार्या त्वया मन्त्रविदाधुना॥ २४<br>तेषां शुक्रस्तथा त्वं मे विघ्नहर्ता सुसंयतः।इन्द्र बोले—हे देवगुरो! हे विद्वन्! हमलोगोंको क्या करना चाहिये, हमें बताइये। आप सर्वज्ञ हैं। आज उत्पन्न इस विषम परिस्थितिमें एकमात्र आप ही हमारे अवलम्ब हैं। महाबली तथा मदोन्मत्त दानव महिषासुर बहुतसे दानवोंको अपने साथ लेकर हम सबसे युद्ध करनेके लिये यहाँ आ रहा है। आप मन्त्रणाविद् हैं, अतएव इस समय कोई प्रतिक्रियात्मक युक्ति बतानेकी कृपा करें। जैसे शुक्राचार्य दानवोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार हम देवताओंके कष्टका निवारण करने हेतु आप सदा उद्यत रहते हैं॥ २२—२४ १/२॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं प्राह तुरासाहं बृहस्पतिः॥ २५<br>विचिन्त्य मनसा कामं कार्यसाधनतत्परः।व्यासजी बोले—यह वचन सुनकर अपने मनमें भलीभाँति सोचकर सदा कार्यसिद्धिके लिये तत्पर रहनेवाले बृहस्पति इन्द्रसे कहने लगे॥ २५ १/२॥
गुरुरुवाच<br>स्वस्थो भव सुरेन्द्र त्वं धैर्यमालम्ब्य मारिष॥ २६<br>व्यसने च समुत्पन्ने न त्याज्यं धैर्यमाशु वै।<br>जयाजयौ सुराध्यक्ष दैवाधीनौ सदैव हि॥ २७<br>स्थातव्यं धैर्यमालम्ब्य तस्माद् बुद्धिमता सदा।<br>भवितव्यं भवत्येव जानन्नेव शतक्रतो॥ २८<br>उद्यमः सर्वथा कार्यो यथापौरुषमात्मनः।<br>मुनयोऽपि हि मुक्त्यर्थमुद्यमैकरताः सदा॥ २९<br>दैवाधीनं च जानन्तो योगध्यानपरायणाः।<br>तस्मात्सदैव कर्तव्यो व्यवहारोदितोद्यमः॥ ३०गुरु बोले—हे देवेन्द्र! आप निश्चिन्त हो जाइये। हे महानुभाव! धैर्य धारण कीजिये, विषम परिस्थिति आ जानेपर सहसा धैर्य नहीं खोना चाहिये। हे सुराध्यक्ष! हार तथा जीत सदा दैवाधीन होती हैं, अतएव बुद्धिमान् प्राणीको चाहिये कि वह सदैव धैर्य धारण करके स्थित रहे। हे शतक्रतो! होनी होकर रहती है, ऐसा समझते हुए मनुष्यको अपनी सामर्थ्यके अनुसार सदा उद्यम करना चाहिये। सब कुछ दैवके अधीन है—यह जानते हुए भी योगध्यानपरायण मुनिगण भी मुक्ति-प्राप्ति हेतु निरन्तर उद्यमशील रहते हैं। अतएव मनुष्यको अपने सामर्थ्यानुसार सदैव उद्योग करते रहना चाहिये॥ २६—३०॥
सुखं भवतु वा मा वा दैवे का परिदेवना।<br>विना पुरुषकारेण कदाचित्सिद्धिमाप्नुयात्॥ ३१सुख मिले अथवा न मिले—इस दैवाधीन विषयमें चिन्ताकी क्या आवश्यकता? बिना पुरुषार्थ किये ही संयोगसे सिद्धि मिल जाय—ऐसा मानकर अन्धे तथा

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—18 D

अ० ४ ] पञ्चम स्कन्ध ५४९

अ० ४ ] पञ्चम स्कन्ध ५४९

अन्धवत्पङ्गुवत्कामं न तथा मुदमावहेत्।<br>कृते पुरुषकारेऽपि यदि सिद्धिर्न जायते॥ ३२<br><br>न तत्र दूषणं तस्य दैवाधीने शरीरिणि।<br>कार्यसिद्धिर्न सैन्येऽस्ति न मन्त्रे न च मन्त्रणे॥ ३३लँगड़ेकी भाँति अकर्मण्य होकर प्रसन्नतापूर्वक पड़े रहना उचित नहीं है। पुरुषार्थ करनेपर भी यदि सिद्धि नहीं मिलती है तो इसमें उस व्यक्तिका कोई अपराध नहीं है; क्योंकि प्रत्येक शरीरधारी सदा दैवके अधीन रहता है। कार्यकी सिद्धि न सेनासे, न मन्त्रसे, न मन्त्रणासे, न रथसे और न तो आयुधसे ही मिलती है। हे सुरेन्द्र! सफलता तो निश्चितरूपसे दैवके अधीन रहती है॥ ३१—३३ १/२॥
न रथे नायुधे नूनं दैवाधीना सुराधिप।<br>बलवान्क्लेशमाप्नोति निर्बलः सुखमश्नुते॥ ३४<br><br>बुद्धिमाञ्क्षुधितः शेते निर्बुद्धिर्भोगवान्भवेत्।<br>कातरो जयमाप्नोति शूरो याति पराजयम्॥ ३५<br><br>दैवाधीने तु संसारे कामं का परिदेवना।<br>उद्यमे योजयेन्नूनं भवितव्यं सुराधिप॥ ३६[ऐसा भी देखा जाता है कि] बलशाली कष्ट पाता है तथा बलहीन सुखोपभोग करता है, बुद्धिमान् भूखा ही सो जाता है तथा बुद्धिहीन अनेक उत्तम भोज्य पदार्थोंका सेवन करता है, कायर व्यक्तिकी जीत हो जाती है तथा वीर पराजित हो जाता है। हे सुराधिप! यह समस्त जगत् ही दैवके अधीन है, तो फिर चिन्ताकी आवश्यकता ही क्या? ऐसा दृढ़ विश्वास करके भाग्यको उद्योगके साथ संयोजित कर देना चाहिये॥ ३४—३६॥
दुःखदे सुखदे वापि तत्र तौ न विचिन्तयेत्।<br>दुःखे दुःखाधिकान्पश्येत्सुखे पश्येत्सुखाधिकम्॥ ३७उद्योग करनेके बाद सुख प्राप्त हो अथवा दुःख—इन दोनोंके विषयमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। दुःख आनेपर अपनेसे अधिक दुःखीजनोंको तथा सुख आनेपर अधिक सुखी व्यक्तिको देखना चाहिये॥ ३७॥
आत्मानं हर्षशोकाभ्यां शत्रुभ्यामिव नार्पयेत्।<br>धैर्यमेवावगन्तव्यं हर्षशोकोद्भवे बुधैः॥ ३८अपने आपको शत्रुतुल्य हर्ष तथा शोकको अर्पित नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषोंको हर्ष या शोकके उपस्थित होनेपर धैर्यका अवलम्बन करना चाहिये॥ ३८॥
अधैर्याद्यादृशं दुःखं न तु धैर्येऽस्ति तादृशम्।<br>दुर्लभं सहनत्वं वै समये सुखदुःखयोः॥ ३९अधीर हो जानेसे जैसा दुःख प्राप्त होता है, वैसा दुःख धैर्य धारण करनेसे कभी नहीं होता। किंतु सुख तथा दुःखके अवसरपर सहनशील बने रहना अति दुर्लभ है॥ ३९॥
हर्षशोकोद्भवो यत्र न भवेद् बुद्धिनिश्चयात्।<br>किं दुःखं कस्य वा दुःखं निर्गुणोऽहं सदाव्ययः॥ ४०जब हर्ष अथवा शोक उत्पन्न हों तब अपनी बुद्धिसे निश्चय करके उनसे अप्रभावित बने रहना चाहिये। वैसी परिस्थितिमें सोचना चाहिये कि दुःख क्या है; और यह दुःख किसे होता है? मैं तो सदा

५५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४ ]


चतुर्विंशातिरिक्तोऽस्मि किं मे दुःखं सुखञ्च किम्।<br>प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे मनसः शोकमूर्च्छने॥ ४१<br><br>जरामृत्यू शरीरस्य षडूर्भिरहितः शिवः।<br>शोकमोहौ शरीरस्य गुणौ किं मेऽत्र चिन्तने॥ ४२गुणोंसे रहित और अविनाशी हूँ। मैं तो चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न आत्मतत्त्व हूँ, तब सुख अथवा दुःखसे मेरा क्या प्रयोजन? भूख तथा प्यासका सम्बन्ध प्राणसे, शोक तथा मोहका सम्बन्ध मनसे एवं जरा तथा मृत्युका सम्बन्ध शरीरसे है। मैं तो इन छहों ऊर्मियोंसे रहित कल्याणस्वरूप हूँ। शोक तथा मोह शरीरके गुण हैं; इनके विषयमें सोचनेकी मुझे क्या आवश्यकता?॥ ४०—४२॥
शरीरं नाहमथवा तत्सम्बन्धी न चाप्यहम्।<br>सप्तैकषोडशादिभ्यो विभिन्नोऽहं सदा सुखी॥ ४३<br><br>प्रकृतिर्विकृतिर्नाहं किं मे दुःखं सदा पुनः।<br>इति मत्वा सुरेश त्वं मनसा भव निर्ममः॥ ४४<br><br>उपायः प्रथमोऽयं ते दुःखनाशे शतक्रतो।<br>ममता परमं दुःखं निर्ममत्वं परं सुखम्॥ ४५मैं न शरीर हूँ और न तो इससे मेरा कोई सम्बन्ध है। मैं तो महदादि सात विकृतियों, एक प्रकृति तथा सोलह विकारोंसे पृथक् रहनेवाला सदा सुखस्वरूप हूँ। मैं न प्रकृति हूँ और न तो विकृति हूँ; तब मुझे दुःख किस बातका? हे देवेश! अपने मनमें ऐसा निश्चय करके आप ममतारहित हो जाइये। हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र! आपके दुःखनाशका यही प्रधान उपाय है; क्योंकि ममता सबसे बड़ा दुःख है तथा निर्ममता सबसे बड़ा सुख है॥ ४३—४५॥
सन्तोषादपरं नास्ति सुखस्थानं शचीपते।<br>अथवा यदि न ज्ञानं ममत्वनाशने किल॥ ४६<br><br>ततो विवेकः कर्तव्यो भवितव्ये सुराधिप।<br>प्रारब्धकर्मणां नाशो नाभोगाल्लक्ष्यते किल॥ ४७हे शचीपते! सन्तोषसे बढ़कर सुखका कोई भी स्थान नहीं है। अथवा हे देवराज! यदि आपके पास ममताको नष्ट करनेवाले ज्ञानका अभाव हो तो प्रारब्धके विषयमें विवेकका आश्रय लेना परमावश्यक है। बिना भोगके प्रारब्ध कर्मोंका नाश कभी नहीं हो सकता॥ ४६-४७॥
यद्भावि तद्भवत्येव का चिन्ता सुखदुःखयोः।<br>सुरैः सर्वैः सहायैर्वा बुद्ध्या वा तव सत्तम॥ ४८हे आर्य! सभी देवता आपके सहायक हों अथवा केवल आपकी बुद्धि सहायक बने—जो होना है वह होकर रहेगा, तब सुख अथवा दुःखके विषयमें चिन्ता क्या?॥ ४८॥
सुखं क्षयाय पुण्यस्य दुःखं पापस्य मारिष।<br>तस्मात्सुखक्षये हर्षः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः॥ ४९हे महाभाग! सुखके उपभोगसे पुण्यका क्षय होता है और दुःख भोगनेसे पापका नाश होता है। अतएव बुद्धिमान् पुरुषोंको सुख-क्षयकी स्थितिमें हर प्रकारसे प्रसन्नताका अनुभव करना चाहिये॥ ४९॥
अथवा मन्त्रयित्वाद्य कुरु यत्नं यथाविधि।<br>कृते यत्ने महाराज भवितव्यं भविष्यति॥ ५०अथवा हे महाराज! यदि आपकी इच्छा हो तो विधिवत् परामर्श करके आप यत्न करनेमें तत्पर हो जाइये। प्रयत्न करनेपर भी जो होना होगा, वही होगा॥ ५०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भयात्तुरेन्द्रादिदेवैः सुरगुरुणा सह परामर्शवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥ $\sim\sim\circ\sim\sim$

अ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५१

अ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५१


अथ पञ्चमोऽध्यायः

इन्द्रका ब्रह्मा, शिव और विष्णुके पास जाना, तीनों देवताओंसहित इन्द्रका युद्धस्थलमें आना तथा चिक्षुर, बिडाल और ताम्रको पराजित करना

व्यास उवाच
इति श्रुत्वा सहस्राक्षः पुनराह बृहस्पतिम्।<br>युद्धोद्योगं करिष्यामि हयारेर्नाशनाय वै॥ १<br><br>नोद्यमेन विना राज्यं न सुखं न च वै यशः।<br>निरुद्यमं न शंसन्ति कातरा न च सोद्यमाः॥ २व्यासजी बोले— हे महाराज! यह सुनकर सहस्रनेत्र इन्द्रने बृहस्पतिसे कहा कि मैं महिषासुरके विनाशके लिये अब युद्धकी तैयारी अवश्य करूँगा; क्योंकि उद्योगके बिना न राज्य, न सुख और न तो यशकी ही प्राप्ति होती है। उद्यमहीनकी प्रशंसा न तो कायर लोग करते हैं और न उद्योगपरायण॥ १-२॥
यतीनां भूषणं ज्ञानं सन्तोषो हि द्विजन्मनाम्।<br>उद्यमः शत्रुहननं भूषणं भूतिमिच्छताम्॥ ३संन्यासियोंका आभूषण ज्ञान है तथा ब्राह्मणोंका आभूषण सन्तोष है; किंतु अपनी उन्नतिकी आकांक्षा रखनेवाले लोगोंके लिये उद्योगपरायण रहते हुए शत्रुसंहारका कार्य ही आभूषण है॥ ३॥
उद्यमेन हतस्त्वाष्ट्रो नमुचिर्बल एव च।<br>तथैनं निहनिष्यामि महिषं मुनिसत्तम॥ ४हे मुनिश्रेष्ठ! उद्यमका आश्रय लेकर ही मैंने वृत्रासुर, नमुचि तथा बल आदि दैत्योंका संहार किया था; उसी प्रकार मैं महिषासुरका भी वध करूँगा॥ ४॥
बलं देवगुरुस्त्वं मे वज्रमायुधमुत्तमम्।<br>सहायस्तु हरिनूंनं तथोमापतिरव्ययः॥ ५आप देवगुरु बृहस्पति तथा श्रेष्ठ आयुध वज्र मेरे महान् बलके रूपमें सुलभ हैं। साथ ही भगवान् विष्णु तथा अविनाशी शिवजी मेरी सहायता अवश्य करेंगे॥ ५॥
रक्षोघ्नान्यथ मे साधो करोम्यद्य समुद्यमम्।<br>स्वसैन्याभिनिवेशञ्च महिषं प्रति मानद॥ ६हे मानद! अब मैं महिषासुरके साथ युद्ध करनेके लिये सेनाकी तैयारीके उद्योगमें लग रहा हूँ। हे साधो! अब आप मेरे कल्याणार्थ रक्षोघ्न मन्त्रोंका पाठ कीजिये॥ ६॥
व्यास उवाच
इत्युक्तो देवराजेन वाचस्पतिरुवाच ह।<br>सुरेन्द्रं युद्धसंरक्तं स्मितपूर्वं वचस्तदा॥ ७व्यासजी बोले— हे राजन्! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर युद्धके लिये सर्वथा तत्पर उन सुरेन्द्रसे मुसकराकर बृहस्पतिने यह वचन कहा—॥ ७॥
बृहस्पतिरुवाच
प्रेर्यामि न चाहं त्वां न च निवारयाम्यहम्।<br>सन्दिग्धेऽत्र जये कामं युध्यतश्च पराजये॥ ८बृहस्पति बोले— इस समय मैं आपको युद्धके लिये न तो प्रेरित करूँगा और न तो इससे आपको रोकूँगा ही; क्योंकि युद्ध करनेवालेकी हार तथा जीत दोनों ही अनिश्चित रहती हैं॥ ८॥
न तेऽत्र दूषणं किञ्चिद्भवितव्ये शचीपते।<br>सुखं वा यदि वा दुःखं विहितं च भविष्यति॥ ९हे शचीपते! इस होनहारके विषयमें आपका कोई दोष नहीं है। जो भी सुख-दुःख पूर्वतः निर्धारित है, वह तो अवश्य ही प्राप्त होगा॥ ९॥
५५२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न मया तत्परिज्ञातं भावि दुःखं सुखं तथा।<br>यद्भार्याहरणे प्राप्तं पुरा वासव वेत्सि हि॥ १०भविष्यमें आपको प्राप्त होनेवाले सुख या दुःखके विषयमें मुझे कोई भी ज्ञान नहीं है; क्योंकि हे वासव ! आप यह बात भलीभाँति जानते हैं कि पूर्व समयमें अपनी भार्याके हरणके अवसरपर मुझे बहुत ही कष्ट उठाना पड़ा था॥ १०॥
शशिना मे हृता भार्या मित्रेणामित्रकर्शन।<br>स्वाश्रमस्थेन सम्प्राप्तं दुःखं सर्वसुखापहम्॥ ११हे शत्रुनिषूदन! चन्द्रमाने मेरी पत्नीका हरण कर लिया था, जिसके फलस्वरूप अपने आश्रममें रहते हुए मुझे सभी सुखोंका विनाश करनेवाला महान् कष्ट झेलना पड़ा॥ ११॥
बुद्धिमान्सर्वलोकेषु विदितोऽहं सुराधिप।<br>क्व मे गता तदा बुद्धिर्यदा भार्या हृता बलात्॥ १२हे सुराधिप ! मैं सभी लोकोंमें परम बुद्धिमान्‌के रूपमें विश्रुत हूँ; किंतु जब मेरी भार्याका बलपूर्वक हरण कर लिया गया था तो उस समय मेरी बुद्धि कहाँ चली गयी थी?॥ १२॥
तस्मादुपायः कर्तव्यो बुद्धिमद्भिः सदा नरैः।<br>कार्यसिद्धिः सदा नूनं दैवाधीना सुराधिप॥ १३अतएव हे सुराधिप ! बुद्धिमान् लोगोंको सदा यत्नपरायण होना चाहिये। कार्यकी सिद्धि तो निश्चितरूपसे सदा दैवके ही अधीन रहती है॥ १३॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं सत्यं गुरोः सार्थं शचीपतिः।<br>ब्रह्माणं शरणं गत्वा नत्वा वचनमब्रवीत्॥ १४व्यासजी बोले— गुरु बृहस्पतिका यह सत्य तथा अर्थयुक्त वचन सुनकर इन्द्र ब्रह्माजीकी शरणमें जाकर उन्हें प्रणाम करके बोले—॥ १४॥
पितामह सुराध्यक्ष दैत्यो महिषसंज्ञकः।<br>ग्रहीतुकामः स्वर्गं मे बलोद्योगं करोत्यलम्॥ १५हे पितामह ! हे देवाध्यक्ष ! इस समय महिषासुर नामक दैत्य मेरे स्वर्गलोकपर अपना अधिकार स्थापित करनेकी कामनासे सैन्यबलकी तैयारी कर रहा है॥ १५॥
अन्ये च दानवाः सर्वे तत्सैन्यं समुपस्थिताः।<br>योद्धुकामा महावीर्याः सर्वे युद्धविशारदाः॥ १६अन्य दानव भी उसकी सेनामें सम्मिलित हो रहे हैं। वे सब-के-सब सदा युद्धके लिये आतुर रहनेवाले, महान् पराक्रमी तथा युद्धकलामें अत्यन्त प्रवीण हैं॥ १६॥
तेनाहं भीतभीतोऽस्मि त्वत्सकाशमिहागतः।<br>सर्वज्ञोऽसि महाप्राज्ञ साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ १७उस दानवसे भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें यहाँ आया हूँ। हे महाप्राज्ञ ! आप तो सर्ववेत्ता हैं तथा मेरी सहायता करनेमें पूर्ण समर्थ हैं॥ १७॥
ब्रह्मोवाच<br>गच्छामः सर्व एवाद्य कैलासं त्वरिता वयम्।<br>शङ्करं पुरतः कृत्वा विष्णुं च बलिनां वरम्॥ १८<br><br>ततो युद्धं प्रकर्तव्यं सर्वैः सुरगणैः सह।<br>मिलित्वा मन्त्रमाधाय देशं कालं विचिन्त्य च॥ १९<br><br>बलाबलमविज्ञाय विवेकमपहाय च।<br>साहसं तु प्रकुर्वाणो नरः पतनमृच्छति॥ २०ब्रह्माजी बोले— हमलोग इसी समय शीघ्रतापूर्वक कैलास चलें और वहाँसे शंकरजीको आगे करके बलवानोंमें श्रेष्ठ विष्णुभगवान्‌के पास चलें। तत्पश्चात् सभी देवगणोंके साथ परस्पर मिलकर देश-कालके सम्बन्धमें भलीभाँति विचार करके एक समुचित निर्णय लेकर ही युद्ध करना चाहिये। अपनी शक्ति तथा निर्बलताका सम्यक् ज्ञान किये बिना विवेकका त्याग करके दुःसाहसपूर्ण कार्य करनेवाला व्यक्ति पतनको प्राप्त होता है॥ १८-२०॥
अ० ५ ]पञ्चम स्कन्ध५५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तन्निशम्य सहस्राक्षः कैलासं निर्जगाम ह।<br>ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा लोकपालसमन्वितः॥ २१ ॥व्यासजी बोले—यह सुनकर इन्द्र ब्रह्माजीको आगे करके समस्त लोकपालोंके साथ कैलासकी ओर चल पड़े॥ २१॥
तुष्टाव शङ्करं गत्वा वेदमन्त्रैर्महेश्वरम्।<br>प्रसन्नं पुरतः कृत्वा ययौ विष्णुपुरं प्रति॥ २२ ॥कैलास पहुँचकर इन्द्रने वेदमन्त्रोंके द्वारा शिवजीकी स्तुति की। तत्पश्चात् [स्तुतिगानसे] अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त भगवान् शंकरको आगे करके वे विष्णुलोक गये॥ २२॥
स्तुत्वा तं देवदेवेशं कार्यं प्रोवाच चात्मनः।<br>महिषात्तद्भयं चोग्रं वरदानमदोद्धतात्॥ २३ ॥उन देवाधिदेव भगवान् विष्णुकी स्तुति करके उन्होंने वहाँ अपने आनेका उद्देश्य बताया तथा वरदान पानेके कारण गर्वोन्मत्त महिषासुरसे उत्पन्न उग्र भयके बारेमें उनसे कहा॥ २३॥
तदाकर्ण्य भयं तस्य विष्णुर्देवानुवाच ह।<br>करिष्यामो वयं युद्धं हनिष्यामस्तु दुर्जयम्॥ २४ ॥उनके भयको सुनकर भगवान् विष्णुने देवताओंसे कहा कि हम देवगण युद्ध करेंगे और उस दुर्जयका वध कर डालेंगे॥ २४॥
व्यास उवाच<br>इति ते निश्चयं कृत्वा ब्रह्मविष्णुहरीश्वराः।<br>स्वानि स्वानि समारुह्य वाहनानि ययुः सुराः॥ २५ ॥व्यासजी बोले—ऐसा निश्चय करके ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा इन्द्र आदि देवता अपने-अपने वाहनोंपर चढ़कर चल पड़े॥ २५॥
ब्रह्मा हंससमारूढो विष्णुर्गरुडवाहनः।<br>शङ्करो वृषभारूढो वृत्रहा गजसंस्थितः॥ २६ ॥<br>मयूरवाहनः स्कन्दो यमो महिषवाहनः।<br>कृत्वा सैन्यसमायोगं यावत्ते निर्ययुः सुराः॥ २७ ॥<br>तावद्दैत्यबलं प्राप्तं दृप्तं महिषपालितम्।<br>तत्राभूत्तुमुलं युद्धं देवदानवसैन्ययोः॥ २८ ॥ब्रह्माजी हंसपर चढ़े, विष्णुभगवान्‌ने गरुडको अपना वाहन बनाया, शंकरजी वृषभपर सवार हुए, इन्द्र ऐरावत हाथीपर बैठे, स्वामी कार्तिकेय मोरपर चढ़े और यमराज महिषपर आरूढ़ हुए। इस प्रकार अपनी सैन्य तैयारी करके देवता लोग ज्यों ही आगे बढ़े, तभी उन्हें महिषासुरके द्वारा पालित मदोन्मत्त दानवी-सेना सामने मिल गयी। इसके बाद वहींपर देवताओं तथा दानवोंकी सेनामें भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया॥ २६—२८॥
बाणैः खड्गैस्तथा प्रासैर्मुसलैश्च परश्वधैः।<br>गदाभिः पट्टिशैः शूलैश्चक्रैश्च शक्तितोमरैः॥ २९ ॥<br>मुद्गरैर्भिन्दिपालैश्च हलैश्चैवातिदारुणैः।<br>अन्यैश्च विविधैरस्त्रैर्निजघ्नुस्ते परस्परम्॥ ३० ॥वे एक-दूसरेपर बाण, तलवार, भाला, मूसल, परशु, गदा, पट्टिश, शूल, चक्र, शक्ति, तोमर, मुद्गर, भिन्दिपाल, हल तथा अन्य अति भयंकर शस्त्रोंसे प्रहार करने लगे॥ २९-३०॥
सेनानीश्चिक्षुरस्तस्य गजारूढो महाबलः।<br>मघवन्तं पञ्चभिस्तैः सायकैः समताडयत्॥ ३१ ॥महिषासुरके सेनापति महाबली चिक्षुरने हाथीपर चढ़कर इन्द्रपर पाँच बाणोंसे प्रहार किया॥ ३१॥
तुराषाडपि तांश्छित्त्वा बाणैर्बाणांस्त्वरान्वितः।<br>हृदये चार्धचन्द्रेण ताडयामास तं कृती॥ ३२ ॥युद्धकुशल इन्द्रने भी तत्काल अपने बाणोंसे उसके बाणोंको काटकर अपने अर्धचन्द्र नामक बाणसे उसके हृदय-स्थलपर आघात किया॥ ३२॥
बाणाहतस्तु सेनानीः प्राप मूर्च्छां गजोपरि।<br>करिणं वज्रघातेन स जघान करे ततः॥ ३३ ॥उस बाणसे आहत होकर सेनानायक चिक्षुर हाथीपर बैठे-बैठे ही मूर्च्छित हो गया। इसके बाद इन्द्रने हाथीकी सूँडपर वज्रसे प्रहार किया॥ ३३॥

५५४ श्रीमद्देवीभागवत [अ० ५

५५४ श्रीमद्देवीभागवत [अ० ५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तद्वज्राभिहतो नागो भग्नः सैन्यं जगाम ह।<br>दृष्ट्वा तं दैत्यराट् क्रुद्धो बिडालाख्यमथाब्रवीत्॥ ३४<br><br>गच्छ वीर महाबाहो जहीन्द्रं मदगर्वितम्।<br>वरुणादीन्यरान्देवान्हत्वागच्छ ममान्तिकम्॥ ३५उस वज्रके आघातसे हाथीकी सूँड कट गयी और वह सेनाके बीच भाग खड़ा हुआ। उसे देखकर दानवराज महिषासुर कुपित हो गया और उसने बिडाल नामक दानवसे कहा—हे महाबाहो! हे वीर! तुम जाओ और बलके अभिमानमें चूर इन्द्रको मार डालो, साथ ही वरुण आदि अन्य देवताओंका भी वध करके शीघ्र ही मेरे पास लौट आओ॥ ३४-३५॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य बिडालाख्यो महाबलः।<br>आरुह्य वारणं मत्तं जगाम त्रिदशाधिपम्॥ ३६व्यासजी बोले—उसकी बात सुनकर वह महाबली बिडाल एक मतवाले हाथीपर सवार होकर युद्धके लिये इन्द्रकी ओर चल पड़ा॥ ३६॥
वासवस्तं समायान्तं दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः।<br>जघान विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः॥ ३७उसे अपनी ओर आते देखकर इन्द्रने कुपित होकर विषधर सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे बिडालपर प्रहार किया॥ ३७॥
स तु छित्त्वा शरांस्तूर्णं स्वशरैश्चापनिःसृतैः।<br>पञ्चाशद्भिर्जघानाशु वासवञ्च शिलीमुखैः॥ ३८उस बिडालने शीघ्र ही अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे इन्द्रके बाण काटकर पुनः तत्काल अपने पचास बाणोंसे इन्द्रपर आघात किया॥ ३८॥
तथेन्द्रोऽपि च तान्बाणांश्छित्त्वा कोपसमन्वितः।<br>जघान विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः॥ ३९तब इन्द्रने भी क्रुद्ध होकर उसके उन बाणोंको काटकर अपने सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे उसपर प्रहार किया॥ ३९॥
स तु छित्त्वा शरांस्तूर्णं स्वशरैश्चापनिःसृतैः।<br>गदया ताडयामास गजं तस्य करोपरि॥ ४०अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे उसके बाणोंको काटकर इन्द्रने अपनी गदासे उसके हाथीकी सूँडपर प्रहार किया॥ ४०॥
स्वकरे निहतो नागश्चकारार्तस्वरं मुहुः।<br>परिवृत्य जघानाशु दैत्यसैन्यं भयातुरम्॥ ४१अपनी सूँडपर गदाके आघातसे वह हाथी बार-बार आर्तनाद करने लगा और पीछे घूमकर भागता हुआ वह दैत्य-सेनाको ही कुचलने लगा, जिससे दानवोंकी सेना भयाकुल हो उठी॥ ४१॥
दानवस्तु गजं वीक्ष्य परावृत्य गतं रणात्।<br>समाविश्य रथे रम्ये जगामाशु सुरान् रणे॥ ४२तत्पश्चात् हाथीको युद्धभूमिसे भागा देखकर वह दानव बिडाल लौटकर चला गया और पुनः एक सुन्दर रथपर सवार होकर देवताओंके समक्ष रणमें उपस्थित हो गया॥ ४२॥
तुराषाडपि तं वीक्ष्य रथस्थं पुनरागतम्।<br>अहनद्विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः ॥ ४३इन्द्रने बिडालको रथपर सवार होकर पुनः समरांगणमें आया हुआ देखकर अपने सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे उसपर आघात करना आरम्भ कर दिया॥ ४३॥
सोऽपि क्रुद्धश्चकारोग्रां बाणवृष्टिं महाबलः।<br>बभूव तुमुलं युद्धं तयोस्तत्र जयैषिणोः॥ ४४वह महाबली बिडाल भी अत्यन्त कुपित होकर भयंकर बाण-वृष्टि करने लगा। इस प्रकार विजयके इच्छुक उन दोनोंके बीच भीषण युद्ध होने लगा॥ ४४॥

अ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५५

इन्द्रस्तु बलिनं दृष्ट्वा कोपेनाकुलितेन्द्रियः।<br>जयन्तमग्रतः कृत्वा युयुधे तेन संयुतः॥४५क्रोधके प्रभावसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले इन्द्रने बिडालको विशेष बलवान् देखकर जयन्तको अपना अग्रणी बना लिया और अब उसके साथ मिलकर वे युद्ध करने लगे॥४५॥
जयन्तस्तु शितैर्बाणैस्तं जघान स्तनान्तरे।<br>पञ्चभिः प्रबलाकृष्टैरसुरं मदगर्वितम्॥४६जयन्तने धनुषपर चढ़ाकर प्रबलतापूर्वक खींचे गये पाँच तीक्ष्ण बाणोंसे मदोन्मत्त उस दानव बिडालके वक्षःस्थलपर आघात किया॥४६॥
स बाणाभिहतस्तावन्निपपात रथोपरि।<br>अतिवाह्य रथं सूतो निर्जगाम रणाजिरात्॥४७उन बाणोंके आघातसे मूर्च्छित होकर बिडाल रथपर गिर पड़ा, तब उसका सारथि तत्काल रथ लेकर रण-भूमिसे बाहर निकल गया॥४७॥
तस्मिन्निर्गते दैत्ये बिडालाख्येऽथ मूर्च्छिते।<br>जयशब्दो महानासीद्दुन्दुभीनां च निःस्वनः॥४८उस बिडालके मूर्च्छित होकर युद्धभूमिसे बाहर चले जानेपर देवसेनामें महान् विजय-घोष तथा दुन्दुभियोंकी ध्वनि होने लगी॥४८॥
सुराः प्रमुदिताः सर्वे तुष्टुवुस्तं शचीपतिम्।<br>जगूर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥४९सभी देवता प्रसन्न होकर इन्द्रकी स्तुति करने लगे, गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराएँ नाचने लगीं॥४९॥
चुकोप महिषः श्रुत्वा जयशब्दं सुरैः कृतम्।<br>प्रेषयामास तत्रैव ताम्रं परमदापहम्॥५०तत्पश्चात् देवताओंके द्वारा किये गये उस विजय-घोषको सुनकर महिषासुर कुपित हो उठा। उसने शत्रुओंके अभिमानको चूर-चूर कर देनेवाले ताम्र नामक दानवको युद्धक्षेत्रमें भेजा॥५०॥
ताम्रस्तु बहुभिः सार्धं समागम्य रणाजिरे।<br>शरवृष्टिं चकाराशु तडित्वानिव सागरे॥५१ताम्र बहुत-से सैनिकोंके साथ समरांगणमें आकर इस प्रकार वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करने लगा मानो मेघ समुद्रमें जल बरसा रहा हो॥५१॥
वरुणः पाशमुद्यम्य जगाम त्वरितस्तदा।<br>यमश्च महिषारूढो दण्डमादाय निर्ययौ॥५२उस समय वरुणदेव पाश लेकर तथा यमराज हाथमें दण्ड धारण करके महिषपर चढ़कर [युद्धभूमिमें] शीघ्र ही पहुँच गये॥५२॥
तत्र युद्धमभूद् घोरं देवदानवयोरिथः।<br>बाणैः खड्गैश्च मुसलैः शक्तिभिश्च परश्वधैः॥५३अब देवताओं तथा दानवोंमें परस्पर बाणों, तलवारों, मुसलों, बछियों तथा फरसोंसे भीषण संग्राम होने लगा॥५३॥
दण्डेन निहतस्ताम्रो यमहस्तोद्यतेन च।<br>न चचाल महाबाहुः संग्रामाङ्गणतस्तदा॥५४यमराजके द्वारा अपने हाथसे फेंके गये दण्डसे ताम्र आहत हो गया, किंतु वह महाबाहु ताम्र समरांगणसे हिलातक नहीं॥५४॥
चापमाकृष्य वेगेन मुक्त्वा तीव्राञ्छिलीमुखान्।<br>इन्द्रादीनहनत्तूर्णं ताम्रस्तस्मिन् रणाजिरे॥५५ताम्र उस संग्रामभूमिमें वेगपूर्वक धनुषको खींच-खींचकर अति तीक्ष्ण बाण छोड़कर इन्द्र आदि देवताओंपर शीघ्रतासे प्रहार करने लगा॥५५॥
तेऽपि देवाः शरैर्दिव्यैर्निशितैश्च शिलाशितैः।<br>निजघ्नुर्दानवान्क्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चुक्रुशुः॥५६वे देवता कुपित होकर पत्थरपर घिसकर नुकीले बनाये गये तीक्ष्ण दिव्य बाणोंसे दानवोंको मारने लगे और 'ठहरो-ठहरो' कहकर चिल्लाने लगे॥५६॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे दैत्यसैन्यपराजयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

५५६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ६

| निहतस्तैः सुरैर्दैत्यो मूर्च्छामप रणाङ्गणे ।<br>हाहाकारो महानासीद्दैत्यसैन्ये भयातुरे ॥ ५७ | उन देवताओंके प्रहारसे घायल होकर दैत्य ताम्र युद्धभूमिमें मूर्च्छित हो गया। तब भयाक्रान्त दैत्यसेनामें महान् हाहाकार मच गया ॥ ५७ ॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे दैत्यसैन्यपराजयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


अथ षष्ठोऽध्यायः

भगवान् विष्णु और शिवके साथ महिषासुरका भयानक युद्ध

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
ताम्रेऽथ मूर्च्छिते दैत्ये महिषः क्रोधसंयुतः ।<br>समुद्यम्य गदां गुर्वीं देवानुपजगाम ह ॥ १इस प्रकार दानव ताम्रके मूर्च्छित हो जानेपर महिषासुर कुपित हो गया और एक विशाल गदा लेकर देवताओंके समक्ष जा डटा ॥ १ ॥
तिष्ठन्त्वद्य सुराः सर्वे हन्म्यहं गदया किल ।<br>सर्वे बलिभुजः कामं बलहीनाः सदैव हि ॥ २<br><br>इत्युक्त्वासौ गजारूढं सम्प्राप्य मदगर्वितः ।<br>जघान गदया तूर्णं बाहुमूले महाभुजः ॥ ३हे देवताओ! तुम सब ठहरो; मैं अभी अपनी गदासे तुम सभीको मार डालूँगा। बलिभाग (हविष्य) खानेवाले तुम सब तो सदासे बलहीन रहे हो—ऐसा कहकर अभिमानके मदमें चूर वह महाबाहु महिषासुर हाथीपर बैठे हुए इन्द्रके पास पहुँचकर उसने उनके बाहुमूलपर अपनी गदासे तीव्र आघात किया ॥ २-३ ॥
सोऽपि वज्रेण घोरेण चिच्छेदाशु गदाञ्च ताम् ।<br>प्रहर्तुकामस्त्वरितो जगाम महिषं प्रति ॥ ४इन्द्रने अपने भयंकर वज्रसे उस गदाको तुरंत काट दिया और वे महिषासुरको मारनेकी इच्छासे बड़ी शीघ्रतापूर्वक उसकी ओर बढ़े ॥ ४ ॥
हयारिरपि कोपेन खड्गमादाय सुप्रभम् ।<br>ययाविन्द्रं महावीर्यं प्रहरिष्यन्निवान्तिकम् ॥ ५तत्पश्चात् वह महिषासुर भी कुपित होकर अपने हाथमें चमचमाती हुई तलवार लेकर प्रहार करते हुए महाबली इन्द्रके सामने पहुँच गया ॥ ५ ॥
बभूव च तयोर्युद्धं सर्वलोकभयावहम् ।<br>आयुधैर्विविधैस्तत्र मुनिविस्मयकारकम् ॥ ६तब उन दोनोंमें नानाविध आयुधोंके द्वारा समस्त प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाला तथा मुनिजनोंको भी विस्मित कर देनेवाला भीषण युद्ध छिड़ गया ॥ ६ ॥
चकाराशु तदा दैत्यो मायां मोहकरीं किल ।<br>शाम्बरीं सर्वलोकघ्नीं मुनीनामपि मोहिनीम् ॥ ७तत्पश्चात् दैत्य महिषासुरने सम्पूर्ण जगत्‌को नष्ट कर देनेवाली तथा मुनियोंको भी मोहित कर देनेवाली मोहकारिणी शाम्बरी मायाका तत्काल प्रयोग किया ॥ ७ ॥
कोटिशो महिषास्तत्र तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ।<br>ददृशुः सायुधाः सर्वे निघ्नन्तो देववाहिनीम् ॥ ८उस मायाके प्रभावसे महिषासुरके ही रूपवाले तथा उसीके समान पराक्रमी करोड़ों महिषासुर अनेक प्रकारके आयुध लेकर देवसेनाका संहार करते हुए दिखायी पड़े ॥ ८ ॥

अ० ६ ] पञ्चम स्कन्ध ५५७

मघवा विस्मितस्तत्र दृष्ट्वा तां दैत्यनिर्मिताम् ।<br>बभूवातिभयोद्विग्नो मायां मोहकरीं किल ॥ ९तब दैत्य महिषासुरद्वारा उत्पन्न की गयी उस मोहकरी मायाको देखकर इन्द्र विस्मयमें पड़ गये तथा भयसे बहुत व्याकुल हो उठे ॥ ९ ॥
वरुणोऽपि सुसन्त्रस्तस्तथैव धननायकः ।<br>यमो हुताशनः सूर्यः शीतरश्मिर्भयातुरः ॥ १०<br><br>पलायनपराः सर्वे बभूवुर्मोहिताः सुराः ।<br>ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्मरणं चक्रुरुद्यताः ॥ ११वरुण, कुबेर, यम, अग्नि, सूर्य तथा चन्द्रमा भी भयभीत हो गये और सभीके मनमें त्रास छा गया। सभी देवगण माया-विमोहित होकर भाग खड़े हुए और वे सावधान होकर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवका स्मरण करने लगे ॥ १०-११ ॥
तत्राजग्मुश्च काजेशाः स्मृतमात्राः सुरोत्तमाः ।<br>हंसतार्क्ष्यवृषारूढास्त्रातुकामा वरायुधाः ॥ १२स्मरण करते ही उनकी रक्षाकी कामनासे श्रेष्ठ आयुध धारण करके सुरश्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश अपने-अपने वाहन हंस, गरुड तथा वृषभपर आरूढ होकर वहाँ आ गये ॥ १२ ॥
शौरिस्तां मोहिनीं दृष्ट्वा सुदर्शनमथोज्ज्वलम् ।<br>मुमोच तत्तेजसैव माया सा विलयं गता ॥ १३मोहकारिणी उस आसुरी मायाको देखकर भगवान् विष्णुने अपना तेजोमय सुदर्शन चक्र चला दिया, जिसके प्रचण्ड तेजसे वह माया समाप्त हो गयी ॥ १३ ॥
वीक्ष्य तान्महिषस्तत्र सृष्टिस्थित्यन्तकारिणः ।<br>योद्धुकामः समादाय परिघं समुपाद्रवत् ॥ १४तदनन्तर सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले उन देवताओंको देखकर उनसे युद्ध करनेकी इच्छासे वह महिषासुर परिघ लेकर उनकी ओर दौड़ा ॥ १४ ॥
महिषाख्यो महावीरः सेनानीश्चिक्षुरस्तथा ।<br>उग्रास्यश्चोग्रवीर्यश्च दुद्रुवुर्युद्धकामुकाः ॥ १५<br><br>असिलोमात्रिनेत्रश्च बाष्कलोऽन्धक एव च ।<br>एते चान्ये च बहवो युद्धकामा विनिर्ययुः ॥ १६इसके बाद महावीर महिषासुर, सेनाध्यक्ष चिक्षुर, उग्रास्य, उग्रवीर्य, असिलोमा, त्रिनेत्र, बाष्कल तथा अन्धक—ये दानव एवं इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से दानव युद्धकी अभिलाषासे निकल पड़े ॥ १५-१६ ॥
सन्नद्धा धृतचापास्ते रथारूढा मदोद्धताः ।<br>परिवव्रुः सुरान्सर्वान्वृका इव सुवत्सकान् ॥ १७उन कवचधारी, धनुष धारण करनेवाले, रथारूढ तथा मदोन्मत्त दानवोंने सभी देवताओंको उसी प्रकार घेर लिया, जिस प्रकार भेड़िये अत्यन्त कोमल बछड़ोंको घेर लेते हैं ॥ १७ ॥
बाणवृष्टिं ततश्चक्रुर्दानवा मदगर्विताः ।<br>सुराश्चापि तथा चक्रुः परस्परजिघांसवः ॥ १८तदनन्तर एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छावाले वे मदोन्मत्त दानव तथा देवता बाण-वृष्टि करने लगे ॥ १८ ॥
अन्धको हरिमासाद्य पञ्चबाणाञ्छिलाशितान् ।<br>मुमोच विषसन्दिग्धान्कर्णाकृष्टान्महाबलान् ॥ १९इसी बीच अन्धकासुरने भगवान् विष्णुके समक्ष पहुँचकर सानपर चढ़ाये गये, विषमें दग्ध किये गये तथा कानतक खींचे गये अत्यन्त शक्तिशाली पाँच बाण छोड़े ॥ १९ ॥
वासुदेवोऽप्यसंप्राप्तानविशिखानाशुगैस्तदा ।<br>चिच्छेद तान्पुनः पञ्च मुमोच रिपुनाशनः ॥ २०शत्रुदमन भगवान् विष्णुने भी बड़ी तत्परताके साथ अपने तीव्रगामी बाणोंसे अन्धकासुरके उन बाणोंको दूरसे ही काट डाला और फिर उसके ऊपर पाँच बाण छोड़े ॥ २० ॥
५५८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ६

| तयोः परस्परं युद्धं बभूव हरिदैत्ययोः।<br>बाणासिचक्रमुसलैर्गदाशक्तिपरश्वधैः ॥ २१ | इस प्रकार विष्णु तथा अन्धकासुर—उन दोनोंमें बाण, तलवार, चक्र, मूसल, गदा, बर्छी तथा फरसोंसे भीषण युद्ध होने लगा॥ २१॥ | | महेशान्धकयोर्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम्।<br>पञ्चाशद्दिनपर्यन्तं बभूव च परस्परम्॥ २२ | इसी प्रकार महेश्वर तथा अन्धकासुरके बीच भीषण रोमांचकारी युद्ध निरन्तर पचास दिनोंतक होता रहा॥ २२॥ | | इन्द्रबाष्कालयोस्तद्वन्महिषासुररुद्रयोः ।<br>यमत्रिनेत्रयोस्तद्वन्महाहनुधनेशयोः ॥ २३<br><br>असिलोमवरुणयोर्युद्धं परमदारुणम्।<br>गरुडं गदया दैत्यो जघान हरिवाहनम्॥ २४<br><br>स गदापातखिन्नाङ्गो निःश्वसन्नवतिष्ठत।<br>शौरिस्तं दक्षिणेनाशु हस्तेन परिसान्त्वयन्॥ २५<br><br>स्थिरं चकार देवेशो वैनतेयं महाबलम्।<br>समाकृष्य धनुः शार्ङ्गं मुमोच विशिखान्बहून्॥ २६ | उसी तरह इन्द्र तथा बाष्कल, महिषासुर तथा भगवान् रुद्र, यमराज तथा त्रिनेत्र, महाहनु तथा कुबेर एवं असिलोमा तथा वरुणके बीच महाभीषण युद्ध हुआ। इसी बीच अन्धकासुरने अपनी गदासे भगवान् विष्णुके वाहन गरुडपर प्रहार किया। गदाके प्रहारसे घायल अंगोंवाले गरुड लम्बी साँस खींचते हुए स्थित हो गये। तत्पश्चात् देवाधिदेव विष्णुने अपने दाहिने हाथसे सहलाकर महाबली गरुडको सान्त्वना प्रदान करते हुए उन्हें स्वस्थचित्त किया। तब भगवान् विष्णुने अन्धकका संहार करनेके विचारसे अपना शार्ङ्गधनुष खींचकर उसके ऊपर बहुत-से बाण छोड़े॥ २३—२६ १/२॥ | | अन्धकोपरि कोपेन हन्तुकामो जनार्दनः।<br>दानवोऽपि च तान्बाणांश्छिच्छेद स्वशरैः शितैः॥ २७<br><br>पञ्चाशद्भिर्हरिं कोपाज्जघान च शिलाशितैः।<br>वासुदेवोऽपि तांस्तूर्णं वञ्चयित्वा शरोत्तमान्॥ २८<br><br>चक्रं मुमोच वेगेन सहस्रारं सुदर्शनम्।<br>त्यक्तं सुदर्शनं दूरात्स्वचक्रेण न्यवारयत्॥ २९ | दानव अन्धकने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और इसके बाद सानपर चढ़ाकर तेज बनाये गये पचास बाण भगवान् विष्णुके ऊपर कुपित होकर एक ही साथ छोड़े। भगवान् विष्णुने भी उन उत्तम बाणोंको तत्क्षण निष्फल करके अपना हजार अरोंवाला सुदर्शन चक्र अन्धकासुरके ऊपर वेगपूर्वक चलाया। तब अन्धकासुरने भगवान् विष्णुद्वारा छोड़े गये सुदर्शन चक्रको अपने चक्रसे काफी दूरसे ही विफल कर दिया। हे महाराज [जनमेजय]! इसके बाद देवताओंको सम्मोहित करते हुए उसने भीषण गर्जना की॥ २७—२९ १/२॥ | | ननाद च महाराज देवान्सम्मोहयन्निव।<br>दृष्ट्वा तु विफलं जातं चक्रं देवस्य शार्ङ्गिणः॥ ३०<br><br>जग्मुः शोकं सुराः सर्वे जहर्षुर्दानवास्तथा।<br>वासुदेवोऽपि तरसा दृष्ट्वा देवान्छुचावृतान्॥ ३१<br><br>गदां कौमोदकीं धृत्वा दानवं समुपाद्रवत्।<br>तं जघानातिवेगेन मूर्ध्नि मायाविनं हरिः॥ ३२<br>स गदाभिहतो भूमौ निपपातातिमूर्च्छितः। | तत्पश्चात् शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णुके सुदर्शन चक्रको विफल हुआ देखकर सभी देवता शोकाकुल हो उठे तथा दानवगण हर्षित हो गये। तब भगवान् विष्णु भी देवताओंको चिन्तामग्न देखकर अपनी कौमोदकी गदा लेकर दानव अन्धकपर झपट पड़े। श्रीहरिने बड़े वेगसे उस मायावीके मस्तकपर गदासे प्रहार किया। वह दैत्य गदाके प्रहारसे पूर्णरूपसे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३०—३२ १/२॥ |

अ० ६ ] पञ्चम स्कन्ध ५५९

अ० ६ ] पञ्चम स्कन्ध ५५९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तं तथा पतितं वीक्ष्य ह्यारिरतिकोपनः ॥ ३३<br><br>आजगाम रमानाथं त्रासयन्नतिगर्जितैः ।<br>वासुदेवोऽपि तं दृष्ट्वा समायान्तं क्रुधान्वितम् ॥ ३४<br><br>चापज्यानिनादं चोग्रं चकार नन्दयन्सुरान् ।<br>शरवृष्टिं चकाराशु भगवान्महिषोपरि ॥ ३५<br><br>सोऽपि चिच्छेद बाणौघैस्ताञ्छरानागनेरितान् ।<br>तयोर्युद्धमभूद्राजन् परस्परभयावहम् ॥ ३६उसे इस प्रकार गिरा हुआ देखकर महिषासुर अत्यन्त क्रोधित हो उठा और अपनी घोर गर्जनासे भयभीत करता हुआ भगवान् विष्णुके सामने आ गया। भगवान् विष्णुने भी उस महिषासुरको कुपित होकर अपने समक्ष आया देखकर देवताओंको आनन्दित करते हुए अपने धनुषकी प्रत्यंचासे भयानक टंकार उत्पन्न की। तत्पश्चात् भगवान् विष्णु महिषासुरके ऊपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंकी बौछार करने लगे। उसने भी अपने बाणसमूहोंसे उन आते हुए बाणोंको आकाशमें ही काट डाला। हे राजन्! इस प्रकार उन दोनोंमें परस्पर अति भीषण युद्ध हुआ॥ ३३-३६॥
गदया ताडयामास केशवो मस्तकोपरि ।<br>स गदाभिहतो मूर्ध्नि पपातोर्व्यां सुमूर्च्छितः ॥ ३७<br><br>हाहाकारो महानासीत्सैन्ये तस्य सुदारुणः ।<br>स विहाय व्यथां दैत्यो मुहूर्तादुत्थितः पुनः ॥ ३८<br><br>गृहीत्वा परिघं शीर्षे जघान मधुसूदनम् ।<br>परिघेणाहतस्तेन मूर्च्छामप जनार्दनः ॥ ३९<br><br>मूर्च्छितं तमुवाहाशु जगाम गरुडो रणात् ।<br>परावृत्ते जगन्नाथे देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥ ४०भगवान् विष्णुने गदासे महिषासुरके मस्तकपर प्रहार किया। मस्तकपर उस गदाके आघातसे मूर्च्छित होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। [यह देखकर] उसकी सेनामें अति भीषण हाहाकार मच गया। कुछ ही क्षणोंमें अपनी वेदनाको भूलकर वह दैत्य फिर उठकर खड़ा हो गया। उसने तत्काल एक परिघ लेकर मधुसूदन श्रीविष्णुके सिरपर प्रहार किया। उस परिघके प्रहारसे आहत होकर भगवान् विष्णु मूर्च्छाको प्राप्त हो गये। तब गरुड मूर्च्छाको प्राप्त उन भगवान् विष्णुको युद्धस्थलसे लेकर बाहर चले गये। इस प्रकार जगत्पति विष्णुके समरांगणसे लौट जानेपर इन्द्र आदि प्रधान देवता भयभीत हो गये और दुःखसे पीड़ित होकर युद्धभूमिमें चीखने-चिल्लाने लगे॥ ३७-४० १/२॥
भयं प्रापुः सुदुःखातार्श्चक्रुशुश्च रणाजिरे ।<br>क्रन्दमानान्सुरान्वीक्ष्य शङ्करः शूलभृत्तदा ॥ ४१<br><br>महिषं तरसाभ्येत्य प्राहरद्रोषसंयुतः ।<br>सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ शङ्करस्योरसि स्फुटम् ॥ ४२<br><br>जगर्ज स च दुष्टात्मा वञ्चयित्वा त्रिशूलकम् ।<br>शङ्करोऽपि तदा पीडां न प्रापोरसि ताडितः ॥ ४३<br><br>तं जघान त्रिशूलेन कोपादरुणलोचनः ।तत्पश्चात् शूलधारी भगवान् शंकरने देवताओंको इस प्रकार करुण क्रन्दन करते हुए देखकर अत्यन्त क्रोधके साथ महिषासुरके पास द्रुतगतिसे पहुँचकर उसपर भीषण प्रहार किया। उस महिषासुरने भी भगवान् शंकरके वक्षःस्थलपर अपनी शक्ति (बर्छी)-से तेज प्रहार किया और उनके त्रिशूलप्रहारको विफल करके उस दुष्टात्माने बड़ी तेज गर्जना की। वक्षपर प्रहार होनेपर भी भगवान् शंकरको कोई पीड़ा नहीं हुई और क्रोधसे आँखें लाल करके उन्होंने उसपर अपने त्रिशूलसे प्रहार किया॥ ४१-४३ १/२॥
५६०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ६
संस्कृतहिन्दी
संलग्नं शङ्करं दृष्ट्वा महिषेण दुरात्मना ॥ ४४<br><br>आजमाम हरिस्तावत्त्यक्त्वा मूर्च्छां प्रहारजाम् ।<br>महिषस्तु तदा वीक्ष्य सम्प्राप्तौ हरिशङ्करौ ॥ ४५<br><br>युद्धकामौ महावीर्यौ चक्रशूलधरौ वरौ ।<br>कोपयुक्तो बभूवासौ दृष्ट्वा तौ समुपागतौ ॥ ४६<br><br>जगाम सम्मुखस्तावत्संग्रामार्थं महाभुजः ।<br>माहिषं वपुरास्थाय धुन्वन्पुच्छं समुत्कटम् ॥ ४७<br><br>चकार भैरवं नादं त्रासयन्नमरानपि ।<br>धुन्वञ्शृङ्गे महाकायो दारुणो जलदो यथा ॥ ४८<br><br>शृङ्गाभ्यां पर्वताञ्छृङ्गांश्चिक्षेप भृशमुत्कटान् ।इसी बीच दुष्टात्मा महिषासुरके साथ भगवान् शंकरको इस प्रकार युद्धरत देखकर प्रहारजनित मूर्च्छाका त्याग करके वहाँ भगवान् विष्णु आ गये। उस समय युद्धके लिये उत्सुक महापराक्रमी विष्णु तथा शिवको श्रेष्ठ सुदर्शन चक्र तथा त्रिशूल धारण करके लड़नेके लिये अपने समक्ष उपस्थित देखकर वह महाबली महिषासुर अत्यन्त कुपित हो उठा। तत्पश्चात् वह विशालबाहु दैत्य उन दोनों देवताओंको अपने समीप आया हुआ देखकर महिषका रूप धारण करके पूँछ हिलाता हुआ युद्ध करनेके लिये उनके समक्ष पहुँच गया। देवताओंको आतंकित करते हुए उस विशालकाय तथा भयावह महिषासुरने अपनी सींगें फटकारते हुए मेघकी भाँति भीषण गर्जना की तथा वह अपनी सींगोंसे पर्वतोंकी बड़ी-बड़ी चट्टानें उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगा ॥ ४४-४८ ½ ॥
दृष्ट्वा तौ तु महावीर्यौ दानवं देवसत्तमौ ॥ ४९<br><br>चक्रतुर्बाणवृष्टिं च दानवोपरि दारुणाम् ।<br>कुर्वाणौ बाणवृष्टिं तौ दृष्ट्वा हरिहरौ हरिः ॥ ५०<br><br>चिक्षेप गिरिशृङ्गं तु पुच्छेनावृत्य दारुणम् ।<br>आपतन्तं गिरिं वीक्ष्य भगवान्सात्वतां पतिः ॥ ५१<br><br>विशिखैः शतधा चक्रे चक्रेणाशु जघान तम् ।<br>हरिचक्राहतः संख्ये मूर्च्छामाप स दैत्यराट् ॥ ५२<br><br>उत्तस्थौ च क्षणान्नूनं मानुषं वपुरास्थितः ।<br>गदापाणिर्महाघोरो दानवः पर्वतोपमः ॥ ५३<br><br>मेघनादं ननादोच्चैर्भीषयन्नमरानपि ।उस दानवको देखकर महापराक्रमी देवश्रेष्ठ विष्णु तथा शंकर उसके ऊपर भीषण बाण-वृष्टि करने लगे। भगवान् विष्णु तथा शिवको अपने ऊपर बाण-वृष्टि करते हुए देखकर महिषासुरने अपनी पूँछमें एक भयानक पर्वतशिखर लपेटकर उनके ऊपर फेंका। उस पर्वत-शिखरको आते देखकर भगवान् विष्णुने अपने बाणोंसे उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये और फिर सुदर्शन चक्रसे उसके ऊपर शीघ्रतासे प्रहार किया। भगवान् विष्णुके चक्रसे आहत होकर वह दैत्यराज महिषासुर युद्धमें मूर्च्छित हो गया। किंतु थोड़ी ही देरमें वह मनुष्यका शरीर धारण करके उठ खड़ा हुआ। पर्वतके समान शरीरवाला वह महाभयानक दैत्य हाथमें गदा धारणकर देवताओंको भयभीत करता हुआ मेघके समान जोर-जोरसे गरजने लगा ॥ ४९-५३ ½ ॥
तच्छ्रुत्वा भगवान्विष्णुः पाञ्चजन्यं समुज्ज्वलम् ॥ ५४<br><br>पूरयामास तरसा शब्दं कर्तुं खरस्वरम् ।<br>तेन शब्देन शङ्खस्य भयत्रस्ताश्च दानवाः ।<br>बभूवुर्मुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ५५उस नादको सुनकर भगवान् विष्णुने तीव्रतर ध्वनि उत्पन्न करनेके लिये बड़ी तेजीसे अपना देदीप्यमान पांचजन्य नामक शंख बजाया। शंखकी उस ध्वनिसे समस्त दानव भयभीत हो गये और तपोधन ऋषिगण तथा देवता आनन्दमग्न हो गये ॥ ५४-५५ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरस्येन्द्रादिदेवैः सह युद्धवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

अ० ७] पञ्चम स्कन्ध ५६१

अ० ७] पञ्चम स्कन्ध ५६१

अथ सप्तमोऽध्यायः

महिषासुरको अवध्य जानकर त्रिदेवोंका अपने-अपने लोक लौट जाना, देवताओंकी पराजय तथा महिषासुरका स्वर्गपर आधिपत्य, इन्द्रका ब्रह्मा और शिवजीके साथ विष्णुलोकके लिये प्रस्थान

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
असुरान्महिषो दृष्ट्वा विषण्णमनसस्तदा।<br>त्यक्त्वा तन्माहिषं रूपं बभूव मृगराडसौ॥ १[हे महाराज जनमेजय!] महिषासुरने समस्त दानवोंको खिन्नमनस्क देखकर महिषका वह रूप छोड़कर तत्काल सिंहका रूप धारण कर लिया॥ १॥
कृत्वा नादं महाघोरं विस्तार्य च महासटाम्।<br>पपात सुरसेनायां त्रासयन्नखदर्शनैः॥ २तत्पश्चात् भयानक गर्जन करके गर्दनके बाल (अयाल) फैलाकर अपने तीक्ष्ण नख दिखाकर देवताओंको भयभीत करता हुआ वह देवसेनापर टूट पड़ा॥ २॥
गरुडञ्च नखाघातैः कृत्वा रुधिरविप्लुतम्।<br>जघान च भुजे विष्णुं नखाघातेन केसरी॥ ३उसने गरुड़के ऊपर अपने नाखूनोंसे आघात करके उन्हें रक्तसे लथपथ कर दिया। पुनः सिंहरूपधारी उस दानवने विष्णुकी भुजापर अपने नखोंसे प्रहार किया॥ ३॥
वासुदेवोऽपि तं दृष्ट्वा चक्रमुद्यम्य वेगवान्।<br>हन्तुकामो हरिः काममवापाशु क्रुधान्वितः॥ ४भगवान् विष्णुने उसे देखकर कुपित हो तत्काल अपना सुदर्शन चक्र लेकर उस दैत्यको मार डालनेकी इच्छासे बड़े वेगसे उसपर चला दिया॥ ४॥
यावद्वयरिपुं वेगाच्चक्रेणाभिजघान तम्।<br>तावत्सोऽतिबलः शृङ्गी शृङ्गाभ्यां न्यहनद्धरिम्॥ ५भगवान् विष्णुने उस महिषासुरपर ज्यों ही अपने चक्रसे तेज प्रहार किया त्यों ही वह महान् शक्तिशाली महिषका रूप धारणकर भगवान् विष्णुको अपनी सींगोंसे मारने लगा॥ ५॥
वासुदेवो विषाणाभ्यां ताडितोरसि विह्वलः।<br>पलायनपरो वेगाज्जगाम भुवनं निजम्॥ ६वक्षःस्थलपर सींगके आघातसे व्याकुल होकर भगवान् विष्णु बड़े वेगसे भागकर अपने लोक चले गये।
गतं दृष्ट्वा हरिं कामं शङ्करोऽपि भयान्वितः।<br>अवध्यं तं परं मत्वा ययौ कैलासपर्वतम्॥ ७विष्णुको पलायित देखकर शंकरजी भी बहुत भयभीत हो गये और उसे सर्वथा अवध्य मानकर कैलासपर्वतपर चले गये।
ब्रह्मापि च निजं धाम त्वरितः प्रययौ भयात्।<br>मघवा वज्रमालम्ब्य तस्थावाजौ महाबलः॥ ८ब्रह्माजी भी उसके डरसे तत्काल अपने लोक चले गये॥ ६-७ १/२॥<br>महाबली इन्द्र वज्र धारण किये हुए समरांगणमें डटे रहे।
वरुणः शक्तिमालम्ब्य धैर्यमालम्ब्य संस्थितः।<br>यमोऽपि दण्डमादाय यत्तः समरतत्परः॥ ९वरुणदेव अपना पाशास्त्र लेकर धैर्यपूर्वक खड़े रहे। यमराज अपना दण्ड धारण किये युद्ध करनेके लिये सावधान होकर खड़े थे।
ततो यक्षाधिपः कामं बभूव रणतत्परः।<br>पावकः शक्तिमादाय तत्राभूद्युद्धमानसः॥ १०यक्षाधिपति कुबेर युद्ध करनेके लिये पूर्णरूपसे उद्यत थे और अग्निदेव बर्छी लेकर युद्ध करनेके विचारसे स्थित थे।
नक्षत्राधिपतिः सूर्यः समवेतौ स्थितावुभौ।<br>वीक्ष्य तं दानवश्रेष्ठं युद्धाय कृतनिश्चयौ॥ ११नक्षत्रोंके नायक चन्द्रमा तथा भगवान् सूर्य—दोनों एक साथ युद्ध करनेके लिये खड़े हो गये और उस दानवश्रेष्ठ महिषासुरको देखकर उन्होंने युद्ध करनेका निश्चय कर लिया॥ ८—११॥
श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ७ ]
५६२
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धं दैत्यसैन्यं समभ्यगात्।<br>विसृजन्बाणजालानि क्रूराहिसदृशानि च॥ १२इतनेमें क्रूर सर्पोंके समान बाण-समूहोंकी वर्षा करती हुई क्रुद्ध दानवी सेना वहाँ आ गयी॥ १२॥
कृत्वा हि माहिषं रूपं भूपतिः संस्थितस्तदा।<br>देवदानवयोधानां निनादस्तुमुलोऽभवत्॥ १३वह दानवराज महिषका रूप धारण करके खड़ा था। उस समय देवता तथा असुर-पक्षके योद्धाओंका भीषण गर्जन होने लगा॥ १३॥
ज्याघातश्च तलाघातो मेघनादसमोऽभवत्।<br>संग्रामे सुमहाघोरे देवदानवसेनयोः॥ १४देवताओं तथा दानवोंके बीच हो रहे महाभयानक संग्राममें धनुषकी टंकार तथा ताल ठोंकनेकी ध्वनि मेघ-गर्जना जैसी प्रतीत हो रही थी॥ १४॥
शृङ्गाभ्यां पर्वताञ्छृङ्गांश्चिक्षेप च महाबलः।<br>जघान सुरसङ्घांश्च दानवो मदगर्वितः॥ १५अभिमानमें चूर महाबली दैत्य महिषासुर अपनी सींगोंसे पर्वत-शिखर फेंक-फेंककर देवसमूहपर प्रहार कर रहा था॥ १५॥
खुराघातैस्तथा देवान्युच्छस्य भ्रमणेन च।<br>स जघान रुषाविष्टो महिषः परमाद्भुतः॥ १६क्रोधमें भरे हुए उस परम अद्भुत महिषासुरने अपने खुरोंके आघातसे तथा पूँछ घुमाकर बहुत-से देवताओंपर प्रहार किया॥ १६॥
ततो देवाः सगन्धर्वा भयमाजग्मुरुद्यताः।<br>मघवा महिषं दृष्ट्वा पलायनपरोऽभवत्॥ १७तत्पश्चात् लड़नेके लिये उद्यत देवता तथा गन्धर्व भयभीत हो गये और महिषासुरको देखकर इन्द्र भी भाग गये॥ १७॥
सङ्गरं सम्परित्यज्य गते शक्रे शचीपतौ।<br>यमो धनाधिपः पाशी जग्मुः सर्वे भयातुराः॥ १८संग्राम छोड़कर शचीपति इन्द्रके भाग जानेपर यमराज, धनाध्यक्ष कुबेर तथा वरुणदेव—ये सब भी भयभीत होकर भाग चले॥ १८॥
महिषोऽपि जयं मत्वा जगाम स्वगृहं ततः।<br>ऐरावतं गजं प्राप्य त्यक्तमिन्द्रेण गच्छता॥ १९<br>तथोच्चैःश्रवसं भानोः कामधेनुं पयस्विनीम्।<br>स्वसैन्यसंवृतस्तूर्णं स्वर्गं गन्तुं मनो दधे॥ २०महिषासुर भी अपनी जीत मानकर अपने घर चला गया। इन्द्रके भाग जानेके बाद उनके द्वारा त्यक्त ऐरावत हाथी, सूर्यका उच्चैःश्रवा घोड़ा तथा दूध देनेवाली कामधेनु गौको उसने हस्तगत कर लिया। तत्पश्चात् उसने शीघ्र ही सेनाको साथमें लेकर स्वर्ग जानेका मनमें निश्चय किया॥ १९-२०॥
तरसा देवसदनं गत्वा स महिषासुरः।<br>जग्राह सुरराज्यं वै त्यक्तं देवैर्भयातुरैः॥ २१इसके बाद शीघ्र ही देवलोक पहुँचकर महिषासुरने भयाक्रान्त देवताओंके द्वारा पहलेसे ही छोड़ दिये गये उनके राज्यपर आधिपत्य कर लिया॥ २१॥
इन्द्रासने तथा रम्ये दानवः समुपविशत्।<br>दानवान्स्थापयामास देवानां स्थानकेषु सः॥ २२इसके बाद उस रमणीय इन्द्रासनपर महिषासुर आसीन हुआ और उसने राज्य-संचालनार्थ देवताओंके स्थानपर दानवोंको स्थापित कर दिया॥ २२॥
एवं वर्षशतं पूर्णं कृत्वा युद्धं सुदारुणम्।<br>अवापैन्द्रपदं कामं दानवो मदगर्वितः॥ २३इस प्रकार पूरे सौ वर्षतक भीषण युद्ध करके अभिमानमें चूर उस दैत्यने इन्द्रपद प्राप्त किया॥ २३॥
निर्जरा निर्गता नाकात्तेन सर्वेऽतिपीडिताः।<br>एवं बहूनि वर्षाणि बभ्रमुर्गिरिगह्वरे॥ २४सभी देवता उस महिषासुरसे प्रताड़ित होकर स्वर्गसे निकल गये और बहुत वर्षोंतक पर्वतकी गुफाओंमें घूमते-फिरते रहे॥ २४॥
अ० ७ ]पञ्चम स्कन्ध५६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रान्ताः सर्वे तदा राजन् ब्रह्माणं शरणं ययुः।<br>प्रजापतिं जगन्नाथं रजोरूपं चतुर्मुखम्॥ २५<br>पद्मासनं वेदगर्भं सेवितं मुनिभिः स्वजैः।<br>मरीचिप्रमुखैः शान्तैर्वेदवेदाङ्गपारगैः॥ २६<br>किन्नरैः सिद्धगन्धर्वैश्चारणोरगपन्नगैः।<br>तुष्टुवुर्भयभीतास्ते देवदेवं जगद्गुरुम्॥ २७हे राजन्! तब थके हुए सभी देवतागण ब्रह्माजीकी शरणमें गये। उस महिषासुरके भयसे त्रस्त वे सभी देवता समस्त वेद-वेदांगोंके पारगामी विद्वान्, शान्त स्वभाववाले और स्वयं ब्रह्माके मनसे उत्पन्न मरीचि आदि प्रमुख मुनियों एवं सिद्धों, किन्नरों, गन्धर्वों, चारणों, उरगों तथा पन्नगोंद्वारा निरन्तर सेवित, रजोगुणसे सम्पन्न, चार मुखवाले, जगन्नाथ, प्रजापति, वेदगर्भ, कमलके आसनपर विराजमान तथा समस्त संसारके गुरु देवाधिदेव ब्रह्माजीकी स्तुति करने लगे॥ २५—२७॥
देवा ऊचुः<br>धातः किमेतदखिलार्तिहराम्बुजन्म<br>जन्माभिवीक्ष्य न दयां कुरुषे सुरान् यत्।<br>सम्पीडितान् रणजितानसुराधिपेन<br>स्थानच्युतान् गिरिगुहाकृतसन्निवासान्॥ २८देवता बोले—हे सम्पूर्ण दुःख दूर करनेवाले पद्मयोनि ब्रह्माजी! इस समय सभी देवता संग्राममें दानवेन्द्र महिषासुरसे पराजित होकर गिरि-कन्दराओंमें कालक्षेप कर रहे हैं। स्थानच्युत हो जानेके कारण उन्हें महान् कष्ट उठाना पड़ रहा है। हमारी ऐसी दशा देखकर भी क्या आपको दया नहीं आती, यह कैसी विचित्र बात है!॥ २८॥
पुत्रान्विता किमपराधशतैः समेता-<br>न्सन्त्यज्य लोभरहितः कुरुतेऽतिदुःखान्।<br>यस्त्वं सुरांस्तव पदाम्बुजभक्तियुक्ता-<br>न्दैत्यार्दितांश्च कृपणान् यदुपेक्षसेऽद्य॥ २९क्या निर्लोभी पिता सैकड़ों अपराधोंसे युक्त अपने पुत्रोंको त्यागकर उन्हें कष्टमें पड़े रहना देख सकता है? तब फिर दैत्योंद्वारा सताये गये असहाय देवताओंकी, जो आपके चरणकमलकी भक्तिमें लगे रहते हैं, उपेक्षा आज आप क्यों कर रहे हैं?॥ २९॥
अमरभुवनराज्यं तेन भुक्तं नितान्तं<br>मखहविरपि योग्यं ब्राह्मणैराददाति।<br>सुरतरुवरपुष्पं सेवतेऽसौ दुरात्मा<br>जलनिधिनिधिभूतां गामसौ सेवते ताम्॥ ३०[दुष्ट] महिषासुर देवलोकका साम्राज्य भोग रहा है। ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञमें दी हुई पवित्र हविको वह स्वयं ले लेता है। वह दुष्टात्मा असुर स्वर्गके पारिजातपुष्पोंको अपने उपभोगमें लाता है तथा समुद्रकी निधिस্বরূপा उस कामधेनु गौका भी उपयोग कर रहा है॥ ३०॥
किं वा गृणीमः सुरकार्यमद्भुतं<br>जानासि देवेश सुरारिचेष्टितम्।<br>ज्ञानेन सर्वं त्वमशेषकार्यवि-<br>त्तस्मात्प्रभो ते प्रणताः स्म पादयोः॥ ३१हे देवेश! हमलोग देवताओंकी विषम स्थितिका वर्णन कहाँतक करें? आप तो अपने ज्ञानसे दैत्योंकी सारी कुचेष्टा जानते हैं; आप सम्पूर्ण कार्योंको जाननेवाले हैं। अतः हे प्रभो! हम सभी देवता आपके चरणोंमें आ पड़े हैं॥ ३१॥
यत्रापि कुत्रापि गतान्सुरानसौ<br>नानाचरित्रः खलु पापमानसः।<br>पीडां करोत्येव स दुष्टचेष्टित-<br>स्त्रातासि देवेश विधेहि शं विभो॥ ३२हे देवेश! देवता जहाँ कहीं भी जाते हैं [वहीं पहुँचकर] विविध चरित्रोंवाला, पापमय विचारोंवाला तथा दुष्ट आचरणवाला वह महिषासुर उन्हें पीड़ित करने लगता है। हे विभो! अब आप ही हमारे रक्षक हैं; हमारा कल्याण कीजिये॥ ३२॥
५६४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ७

| नो चेदद्यं दावमहाग्निपीडिताः<br>कं शान्तिकर्तारमनन्ततेजसम्।<br>यामः प्रजेशं शरणं सुरेष्टं<br>धातारमाद्यं परिमुच्य कं शिवम्॥ ३३ | यदि आप हमारी रक्षा नहीं करेंगे तो दैत्योंके भीषण अत्याचाररूपी दावानलसे पीड़ित हमलोग आप सदृश शान्तिदाता, अनन्त तेजस्वी, प्रजापति, देवताओंके पूज्य, आदिपिता तथा कल्याणकारी प्रभुको छोड़कर किसकी शरणमें जायँ? ॥ ३३ ॥ | | व्यास उवाच<br>इति स्तुत्वा सुराः सर्वे प्रणेमुस्तं प्रजापतिम्।<br>बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे विषण्णवदना भृशम्॥ ३४<br>तांस्तथा पीडितान्दृष्ट्वा तदा लोकपितामहः।<br>उवाच श्लक्ष्णया वाचा सुखं सञ्जनयन्निव॥ ३५ | व्यासजी बोले—इस प्रकार स्तुति करके सम्पूर्ण देवता हाथ जोड़कर प्रजापति ब्रह्माको प्रणाम करने लगे। उन सबके मुखपर अत्यन्त उदासी छायी हुई थी। तब उन्हें इस प्रकार दुःखी देखकर लोकपितामह ब्रह्माजी उन्हें सुख पहुँचाते हुए मधुर वाणीमें कहने लगे—॥ ३४-३५ ॥ | | ब्रह्मोवाच<br>किं करोमि सुराः कामं दानवो वरदर्पितः।<br>स्त्रीवध्योऽसौ न पुंवध्यो विधेयं तत्र किं पुनः॥ ३६<br>व्रजामोऽद्य सुराः सर्वे कैलासं पर्वतोत्तमम्।<br>शङ्करं पुरतः कृत्वा सर्वकार्यविशारदम्॥ ३७<br>ततो व्रजाम वैकुण्ठं यत्र देवो जनार्दनः।<br>मिलित्वा देवकार्यञ्च विमृशामो विशेषतः॥ ३८ | ब्रह्माजी बोले—हे देवताओ! मैं क्या करूँ? वर पानेके कारण वह दैत्य अभिमानी हो गया है। उसका वध कोई स्त्री ही कर सकती है, पुरुष नहीं। ऐसी परिस्थितिमें मैं क्या कर सकता हूँ? ॥ ३६ ॥<br>हे देवताओ! हम सबलोग पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर चलें। [वहाँ विराजमान] सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता भगवान् शंकरको आगे करके वहाँसे वैकुण्ठधामको चलें, जहाँ भगवान् विष्णु रहते हैं। उनसे मिलकर हमलोग देवताओंके कार्यके विषयमें विशेषरूपसे विचार करेंगे॥ ३७-३८ ॥ | | इत्युक्त्वा हंसमारुह्य ब्रह्मा कार्यसमुच्चये।<br>देवांश्च पृष्ठतः कृत्वा कैलासाभिमुखो ययौ॥ ३९ | ऐसा कहकर ब्रह्माजी हंसपर सवार होकर कार्यसिद्धिके लिये देवताओंको साथ लेकर कैलासकी ओर चल पड़े॥ ३९ ॥ | | तावच्छिवोऽपि तरसा ज्ञात्वा ध्यानेन पद्मजम्।<br>आगच्छन्तं सुरैः सार्धं निर्गतः स्वगृहाद् बहिः॥ ४० | तभी शिवजी अपने ध्यानयोगसे सभी देवताओंसहित ब्रह्माजीको आता हुआ जानकर अपने भवनसे बाहर निकल आये॥ ४० ॥ | | दृष्ट्वा परस्परं तौ तु कृताभिवादनौ भृशम्।<br>प्रणतौ च सुरैः सर्वैः सन्तुष्टौ सम्बभूवतुः॥ ४१ | एक-दूसरेको देखकर उन्होंने परस्पर प्रणाम किया। उन सभी देवताओंने भी भगवान् शंकर तथा ब्रह्माको प्रणाम किया और वे दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ ४१ ॥ | | आसनानि पृथग्दत्त्वा देवेभ्यो गिरिजापतिः।<br>उपविष्टेषु तेष्वेव निषसादासने स्वके॥ ४२<br>कृत्वा तु कुशलप्रश्नं ब्रह्माणं वृषभध्वजः।<br>पप्रच्छ कारणं देवान्कैलासागमने विभुः॥ ४३ | शिवजी वहाँ सभी देवताओंको पृथक्-पृथक् आसन देकर सबके यथास्थान बैठ जानेपर स्वयं भी अपने आसनपर बैठ गये। तब ब्रह्माजीसे कुशल-प्रश्न करके भगवान् शिवने देवताओंसे कैलास आनेका कारण पूछा॥ ४२-४३ ॥ |