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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् विकल्पा एव। ते च तत्त्वावबोधवन्ध्यतया स्फुरेयुरपि, अत एव 'आचक्षीरन्' इत्यादयोऽत्र सम्भावनाविषया लिङ्प्रयोगा अतीतपरमार्थे पर्यवस्यन्ति। यथा— यदि नामास्य कायस्य यदन्तस्तद्बहिर्भवेत्। दण्डमादाय लोकोऽयं शुनः काकांश्च वारयेत्॥ इत्यत्र। यद्येवं कायस्य दृष्टता स्यात्तदैवमवलोकयेतेति भूतप्राणतैव। यदि न स्यात्ततः किं स्यादित्यत्रापि, किं वृत्तं यदि पूर्ववन्न भवनस्य सम्भावनेत्यय- मेवार्थ इत्यलमप्रकृतेन बहुना। तत्र समयोपेक्षेण शब्दोऽर्थप्रतिपादक इति कृत्वा वाच्यव्यतिरिक्तं नास्ति व्यङ्ग्यम्, सदपि वा तदभिधावृत्त्याक्षिप्तं शब्दा- वगताथर्बलाकृष्टत्वाद्भाक्तम्, तदनाक्षिप्तमपि वा न वक्तुं शक्यं कुमारीष्विव भर्तृसुखमतद्वित्सु इति त्रय एवैते प्रधानविप्रतिपत्तिप्रकाराः। तत्राभावविकल्पस्ये जिस कारण यह सम्भावना होगी अपितु विकल्प ही हैं। और, वे (विकल्प) तत्त्व के ज्ञान के न होने के कारण ही स्फुरित होते हैं, अतएव 'आचक्षीरन्' इत्यादि यहाँ सम्भावनाविषयक लिङ् के प्रयोग अतीतपरमार्थ में पर्यवसित होते हैं। जैसे— 'यदि इस शरीर के जो भीतर है वह बाहर हो जाय तो यह संसार डंडा लेकर कुत्तों और कौओं को ही डुलाता रहे।' इस स्थल में। यदि शरीर इस प्रकार दृष्टिगोचर होता तो ऐसा देखा जाता— इस प्रकार (यहाँ भी) अतीतपरमार्थता ही है। 'यदि न होता तो क्या होता' इस स्थल में भी; क्या होता यदि पहले की तरह (बाहर) नहीं होने की सम्भावना है (इस प्रकार निषेध पक्ष में भी) यही अर्थ है। बहुत अप्रकृत चर्चा व्यर्थ है। समय (संकेत) की अपेक्षा से शब्द अर्थ का प्रतिपादक होता है, इस कारण वाच्य से अतिरिक्त कोई व्यङ्ग्य नहीं है, होता हुआ भी वह अभिधावृत्ति से आक्षिप्त होकर, शब्द से अवगत अर्थ के बल से आकृष्ट होने के कारण भाक्त (गौण) है, वह आक्षिप्त न हुआ भी किसी प्रकार वाणी से कहा नहीं जा सकता, क्वारियों के लिये पति के सुख के संबंध में कुछ कहना संभव नहीं, इस प्रकार तीन ही ये विप्रतिपत्ति के प्रधान जब कि 'ध्वनि' के विरुद्ध पक्ष सम्भव हैं तब उनमें दोष दिखाना ठीक नहीं होगा, इस आशङ्का के उत्तर में वृत्तिकार 'विकल्प' शब्द का प्रयोग करते हैं। जैसा कि लोचनकार कहते हैं : 'उस प्रकार की वस्तु सम्भव नहीं जिससे सम्भावना होगी, अपितु विकल्प ही (सम्भव) हैं' इसका तात्पर्य यह है कि प्रस्तुत में जो वस्तु सम्भावना से सम्भावित है वह यहाँ अभिप्रेत नहीं, बल्कि वह अभिप्रेत है जो तत्त्वज्ञान के अभाव में उभर आई है, अर्थात् 'विकल्प' रूप वस्तु यहाँ सम्भावना कर के दूषणीय हैं और उन्हें ही यहाँ 'सम्भव' कहा गया है--वह तो दूषणीय हो ही सकती हैं। १. 'जगदुः' का व्याख्यान 'आचक्षीरन्' इस लिङ् के प्रयोग से करने से प्रतीत होता है कि सम्भावना के रूप में बुद्ध्यारोपित रूप अतीत (भूत) के तात्पर्य में उन (लिङ् प्रयोगों) का पर्यवसान है। अर्थात् 'ऐसा कुछ लोगों ने कहा हो' ऐसी सम्भावना को बुद्धि में आरोपित करते हैं। इस प्रकार अतीत परमार्थ में लिङ्-प्रयोगों के पर्यवसान में इस विचार का लोचनकार एक उदाहरण देते हैं—यदि इस०—। यहाँ अतीतपरमार्थता इस कारण है कि शरीर के भीतरी भाग के बहिर्भाव को सम्भावना का विषय करके बुद्धि में आरोपित किया गया है और यह निर्विवाद ही

प्रथम उद्योतः १५ लोचनम् त्रयः प्रकाराः-शब्दार्थगुणालङ्काराणामेव शब्दार्थशोभाकारित्वाल्लोकशास्त्रातिरि- क्तसुन्दरशब्दार्थमयस्य काव्यस्य न शोभाहेतुः कश्चिदन्योऽस्ति योऽस्माभिर्न गणित इत्येकः प्रकारः, यो वा न गणितः स शोभाकार्येव न भवतीति द्वितीयः, अथ शोभाकारी भवति तर्ह्यस्मदुक्त एव गुणे वाऽलङ्कारे वाऽन्तर्भवति, नामान्त- रकरणे तु कियदिदं पाण्डित्यम् । अथाप्युक्तेषु गुणेष्वलङ्कारेषु वा नान्तर्भावः, तथापि किंचिद्विशेषलेशमाश्रित्य नामान्तरकरणमुपमाविच्छित्तिप्रकाराणामसंख्यत्वात् । तथापि गुणालङ्कारव्यति- रिक्तत्वाभाव एव । तावन्मात्रेण च किं कृतम् ? अन्यस्यापि वैचित्र्यस्य शक्यो- प्रकार हैं। उनमें अभाव-विकल्प के तीन प्रकार हैं-शब्दगुण और अर्थगुण एवं शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कारों के ही शब्द और अर्थ के शोभाकारी होने से लोक और शास्त्र से अतिरिक्त शब्दार्थमय काव्य का शोभाहेतु कोई दूसरा नहीं है, जिसकी हमने गणना नहीं की है, यह (अभाव-विकल्प का) एक प्रकार है; और जिसकी (हमने) गणना नहीं की है वह शोभाकारी ही नहीं होगा, यह दूसरा (विकल्प) है; और वह शोभाकारी होता है तो हमारे कहे हुए ही गुण अथवा अलङ्कार में अन्तर्भूत हो जाता है। केवल दूसरा नाम बदल देने में यह कितना पाण्डित्य है ! माना कि उक्त गुणों अथवा अलङ्कारों में अन्तर्भाव नहीं है, तथापि कुछ विशेष के लेशमात्र को आश्रयण करके नामान्तरकरण है; क्योंकि उपमा के ही वैचित्र्य- (विच्छित्ति-) प्रकार ही असंख्य हैं। तथापि गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्तत्व (उस शोभाकारी तत्त्व का) नहीं बनता। और उतने मात्र से क्या होता है ! क्योंकि है कि जो वस्तु बुद्ध्यारोपित कर ली जाती है उसमें अतीतत्व आ ही जाता है। लोचनकार इस प्रकार विधिरूप से अतीतपरमार्थत्व का निर्देश करके निषेधरूप से भी निर्देश करते हुए लिखते हैं-‘यदि न होता तो भी क्या होता'; अर्थात् उस प्रकार शरीर के भीतरी भाग के बाहर होने की सम्भावना न होती तो भी क्या होता, तात्पर्य यह कि तथापि शरीर जुगुप्सा और घृणा का पात्र बना ही रहता। सर्वथा शरीर के प्रति आसक्ति के निषेध में इस पद्य का पार्यन्तिक तात्पर्य निहित है। इस प्रकार यहाँ विधि और निषेध दोनों प्रकारों से 'लिङ्' का अर्थ सम्भावना है। 'लिङ्' के सम्भावना रूप अर्थ का प्रतिपादन प्रस्तुत ग्रन्थ के मूल विषय से कोई सम्बन्ध नहीं रखता। यह केवल लिट्प्रयोग का लिङ्प्रयोग से आचार्य द्वारा किए गए व्याख्यान के समर्थन में लोचनकार ने प्रपञ्चित किया है, अतः स्वयं यह कहते हुए विरत होते हैं कि बहुत अप्रस्तुत चर्चा व्यर्थ है। १. यहाँ लोचनकार ने ध्वनि के सम्बन्ध में मूल कारिकाग्रन्थ में निर्दिष्ट तीन विकल्पों का संक्षेप में पहले इस प्रकार निर्देश किया है :-प्रथम अभाववादी विकल्प-इसके अनुसार 'ध्वनि' कोई तत्त्व नहीं; क्योंकि शब्द से उसी अर्थ का प्रतिपादन होता है जो संकेतित होता है, अर्थात् समय या संकेत के बल या सहकार से ही शब्द अर्थ का प्रतिपादक होता है और वह अर्थ 'वाच्य' कहलाता है। इसके अतिरिक्त जब शब्द का कोई अर्थ नहीं होता तब एक 'व्यङ्ग्य अर्थ' की कल्पना गलत पक्ष होगा। इस प्रकार सर्वथा 'ध्वनि' कोई तत्त्व नहीं। द्वितीय भाक्तवादी विकल्प- इसके अनुसार किसी प्रकार तथाकथित 'व्यङ्ग्य' अर्थ मान भी लिया जाय तो यह कहना होगा

१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् त्प्रेक्षत्वात्। चिरन्तनैर्हि भरतमुनिप्रभृतिभिर्यमकोपमे एव शब्दार्थालङ्कारत्वेनेष्टे, तत्प्रपञ्चदिक्प्रदर्शनं त्वन्यैरलङ्कारकारैः कृतम्। तद्यथा-'कर्मण्यण्' इत्यत्र कुम्भ- काराद्युदाहरणं श्रुत्वा स्वयं नगरकारादिशब्दा उत्प्रेक्ष्यन्ते, तावता क आत्मनि बहुमानः। एवं प्रकृतेऽपीति तृतीयः प्रकारः। एवमेकस्त्रिधा विकल्पः, अन्यौ च द्वाविति पञ्च विकल्पा इति तात्पर्यार्थः। दूसरे वैचित्र्य की भी तो उत्प्रेक्षा हो सकती है? जैसा कि प्राचीन भरतमुनि प्रभृति आचार्यों ने यमक और उपमा को ही शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार के रूप में माना है, उनके प्रपंच की दिशा का प्रदर्शन तो दूसरे अलङ्कारकारों ने किया। वह जैसे— 'कर्मण्यण्' इस सूत्र में 'कुम्भकार' आदि उदाहरण को सुनकर स्वयं 'नगरकार' आदि शब्दों की उत्प्रेक्षा कर ली जाती है, केवल उतने से, कौन अपने में बहुत गौरव की बात है? इस प्रकार प्रस्तुत में भी, यह (अभाव-विकल्प का) तीसरा प्रकार' है। इस प्रकार एक विकल्प तीन प्रकार का और दूसरे दो विकल्प मिलकर पाँच विकल्प हैं, यह तात्पर्यार्थ है। अभिधावृत्ति से आक्षिप्त ('बालप्रिया' टिप्पणी के अनुसार अभिधा की पुच्छभूत वृत्ति अर्थात् लक्षणा से आक्षिप्त) होता है। इस प्रकार शब्द से अवगत अर्थ के बल से आकृष्ट होने के कारण 'भाक्त' (या गौण) है। तृतीय अलक्षणीयतावादी विकल्प—किसी प्रकार ('तुष्यतु दुर्जनः' इस न्याय से) उस व्यङ्ग्य अर्थ को लक्षणाशक्ति से आक्षिप्त न भी माना जाय, तथापि उसे शब्द से कहना सम्भव नहीं, वह उस प्रकार जैसे कुमारियों के लिए पति का सुख कहना सम्भव नहीं। १. अब यहाँ अभाव-विकल्प के वृत्तिग्रन्थ में निर्दिष्ट तीन प्रकारों का संक्षेप में लोचनकार ने उपर्युक्त ढंग से निर्देश किया है। अभाव विकल्प के प्रथम प्रकार में यह कहा जाता है कि काव्यशरीर शब्दार्थमय होता है और गुण तथा अलंकार शब्द-और अर्थ के शोभाकारी तत्त्व के रूप में निर्दिष्ट किए गए हैं। इनके अतिरिक्त कोई ऐसा शोभाकारी तत्त्व ही नहीं सम्भव है जिसकी हमने गणना नहीं की है। अभाव विकल्प के दूसरे प्रकार में यह कहते हैं कि जिसकी हमने गणना नहीं की है वह किसी प्रकार शोभाकारी ही नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में, गुण और अलंकार के अतिरिक्त किसी अन्य तत्त्व की चर्चा करने का यहाँ कोई अर्थ ही नहीं निकलेगा। अभाव विकल्प के तृतीय प्रकार के अनुसार यदि ऐसा कोई शोभाकारी तत्त्व मान भी लिया जाय, तब भी उसका गुण तथा अलङ्कार में ही अन्तर्भाव हो जायगा, यदि लेशमात्र भिन्न कुछ विशेषता के कारण उक्त गुण तथा अलङ्कार में उस शोभाकारी तत्त्व का अन्तर्भाव न हुआ तो हम यह स्वीकार करेंगे उपमा आदि के असङ्ख्य विच्छित्ति-प्रकारों में यह भी होगा। फिर ऐसी स्थिति में कोई प्रश्न नहीं उठता जिसके समाधानार्थ किसी भिन्न ही शोभाकारी तत्त्व की कल्पना की जाय। यही क्या, बहुत से अन्य वैचित्र्यों की भी कल्पना की जा सकती है। जैसा कि प्राचीन आलङ्कारिक आचार्यों ने किया भी है। सबसे प्राचीन भरत मुनि प्रभृति आचार्यों ने यमक और उपमा को ही शब्द और अर्थ के अलङ्कार रूप से स्वीकार किया था, और फिर बाद में अन्य आलङ्कारिकों ने इस विषय को और भी प्रपञ्चित करके निर्दिष्ट किया। किसी ने अभी तक किसी भिन्न नये तत्त्व की उद्भावना का डिण्डिमघोष नहीं किया है, जैसा कि यहाँ 'ध्वनि' को लेकर किया जा रहा है। यह तो कुछ वैसी ही बात हुई कि किसी 'सूत्र' के निर्दिष्ट उदाहरण के आधार पर कोई दूसरा उदाहरण बना लिया गया (जैसे 'कुम्भकार' को देखकर नगरकार आदि)। इस

प्रथम उद्योतः १७ ध्वन्यालोकः तत्र केचिदाचक्षीरन्—शब्दार्थशरीरन्तावत्काव्यम् । तत्र च शब्द- गताश्चारुत्वहेतवोऽनुप्रासादयः प्रसिद्धा एव । अर्थगताश्चोपमादयः । वर्णसंघटनाधर्माश्च ये माधुर्यादयस्तेऽपि प्रतीयन्ते । तदनतिरिक्तवृत्तयो वृत्तयोऽपि याः कैश्चिदुपनागरिकाद्याः प्रकाशिताः, ता अपि गताः श्रवणगोचरम् । रीतयश्च वैदर्भीप्रभृतयः । तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनि- र्नामेति । वहाँ कुछ लोग कहें—काव्य का शरीर तो शब्द और अर्थ है, और, उसमें शब्दगत चारुत्वहेतु अनुप्रास आदि प्रसिद्ध ही हैं और अर्थगत उपमा आदि ( प्रसिद्ध ही हैं ) । और, वर्णसंघटनधर्म जो माधुर्य आदि ( गुण ) हैं वे भी प्रतीत होते हैं । उन ( अलंकार और गुणों ) से अभिन्न रहने वाली वृत्तियाँ भी, जो किन्हीं के द्वारा उपनागरिका आदि ( नामों से ) प्रकाशित की गई हैं, वे भी सुनने में आई हैं और वैदर्भी प्रभृति रीतियाँ भी ( सुनने में आई हैं ) । उनके अतिरिक्त कौन यह ‘ध्वनि’ नाम का ( नया पदार्थ ) है ? लोचनम् तानेव क्रमेणाह—शब्दार्थशरीरं तावदित्यादिना । तावद्ग्रहणेन कस्याप्यत्र न विप्रतिपत्तिरिति दर्शयति । तत्र शब्दार्थौ न तावद् ध्वनिः, यतः संज्ञामात्रेण उन्हीं ( विकल्पों ) को क्रम से कहते हैं—काव्य का शरीर शब्द और अर्थ है इत्यादि द्वारा । ( मूल-वृत्तिग्रन्थ में ) ‘तावत्’ इस शब्द के ग्रहण से दिखाते हैं कि यहाँ किसी की भी विप्रतिपत्ति ( विरुद्ध आशङ्का ) नहीं १ है । शब्द-अर्थ ध्वनि नहीं है, क्योंकि संज्ञामात्र २ से क्या लाभ ? यदि शब्द और अर्थ का चारुत्व ध्वनि है !; मात्र से यह गौरव का अनुभव करना कि हमने नई कल्पना की, अत्यन्त उपहसनीय बात है । यहाँ लोचनकार ने ‘विच्छित्ति’ और ‘वैचित्र्य’ का प्रयोग किया है, ये शब्द एक ही अर्थ के द्योतक हैं, अलङ्कारों का भेद-निर्णय विशेष रूप से विच्छित्ति या वैचित्र्य के आधार पर ही साहित्य-शास्त्र में किया गया है । १. अर्थात् सभी लोग इस सिद्धान्त के पक्षपाती हैं कि शब्द और अर्थ ही काव्य के शरीर हैं लोचनकार का कहना है कि यह तात्पर्य वृत्तिग्रन्थ में प्रयुक्त ‘तावत्’ शब्द से प्रकट होता है । यह भिन्न बात है कि आगे चलकर किसी आचार्य ने विशिष्ट शब्द को ही काव्य माना है और किसी ने विशिष्ट अर्थ को । कुछ आचार्यों ने शब्द-अर्थ उभय को काव्य माना है । इस प्रकार काव्य-स्वरूप के सम्बन्ध में विभिन्न मतवादों के बावजूद भी, प्रायः काव्य के शरीर के रूप में शब्द और अर्थ को सभी ने स्वीकार किया है । २. ध्वनि या व्यङ्ग्य तत्त्व का प्रतिपादन सर्वथा काव्य के आत्मा के रूप में अभीष्ट है अतः काव्य के शरीरभूत शब्द और अर्थ तो किसी प्रकार ‘ध्वनि’ नहीं कहला सकते, क्योंकि यह पक्ष स्वयं ध्वनिवादी आचार्य के अपने सिद्धान्त के विरुद्ध होगा । ऐसी स्थिति में भी यदि ‘ध्वनि’ के २ ध्व०

· १८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् हि को गुणः ? अथ शब्दार्थयोश्चारुत्वं स ध्वनिः । तथापि द्विविधं चारुत्वम्— स्वरूपमात्रनिष्ठं संघटनाश्रितं च । तत्र शब्दानां स्वरूपमात्रकृतं चारुत्वं शब्दालङ्कारेभ्यः, संघटनाश्रितं तु शब्दगुणेभ्यः । एवमर्थानां चारुत्वं स्वरूप- मात्रनिष्ठमुपमादिभ्यः । संघटनापर्यवसितं त्वर्थगुणेभ्य इति न गुणालङ्कारव्य- तिरिक्तो ध्वनिः कश्चित् । संघटनाधर्मा इति । शब्दार्थयोरिति शेषः । यद्गुणालङ्कारव्यतिरिक्तं तच्चा- तथापि, चारुत्व' दो प्रकार का होता है—स्वरूपमात्रनिष्ठ और संघटनाश्रित । शब्दों का स्वरूपमात्रकृत चारुत्व शब्दालङ्कारों से और संघटनाश्रित (चारुत्व) शब्दगुणों से (होता है)। इस प्रकार अर्थों का स्वरूपमात्रनिष्ठ चारुत्व उपमादि (अर्थालङ्कारों) से और संघटना में पर्यवसित (चारुत्व) अर्थगुणों से (होता है), इस प्रकार गुण और अलङ्कार से अतिरिक्त कोई ध्वनि नहीं है । संघटनाधर्म—। 'शब्द और अर्थ के' यह शेष है । जो गुण और अलङ्कार से सद्भाव के प्रति श्रद्धाजाड्य के कारण शब्द-अर्थ को ही 'ध्वनि' संज्ञा देते हों तो यह प्रयास भी व्यर्थ होगा, अर्थात् क्योंकि आत्मा को शरीर का रूप देकर कब तक आत्मा के सच्चे अस्तित्व का समर्थन किया जा सकता है ? १. जब शब्द-अर्थ ध्वनि नहीं है तो शब्द-अर्थ का जिससे 'चारुत्व' हो वह (अर्थात् चारुत्व का हेतु) ध्वनि हो ही सकता है यह पक्ष अभ्युपगम करके अभाववादी का कहना है कि ऐसी स्थिति में चारुत्व-हेतु ध्वनि तत्त्व निर्दिष्ट शब्दालङ्कार-अर्थालङ्कार एवं शब्दगुण-अर्थगुण के अतिरिक्त कोई तत्त्व नहीं सिद्ध होता, क्योंकि शब्द और अर्थ के चारुत्व का विभाजन दो ही भागों में किया जा सकता है एक तो स्वरूप के दृष्टिकोण से, दूसरा सङ्घटना के आधार पर । इसे इस प्रकार समझ सकते हैं— चारुत्व | ┌────────────────────────┴────────────────────────┐ स्वरूपमात्रनिष्ठ सङ्घटनाश्रित ┌───────────┴───────────┐ ┌───────────┴───────────┐ शब्द का चारुत्व अर्थ का चारुत्व शब्द का चारुत्व अर्थ का चारुत्व ( शब्दालङ्कारों से ) ( अर्थालङ्कारों से ) ( शब्दगुणों से ) ( अर्थगुणों से ) [ उपर्युक्त लोचन में जहाँ 'अथ शब्दार्थयोश्चारुत्वं स ध्वनिः' लिखा है वहाँ सामान्यतः अनुवाद यही होगा कि 'यदि शब्द और अर्थ का चारुत्व ध्वनि है !' परन्तु ऐसा ही समझ लेने पर यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि जब शब्द-अर्थ ध्वनि नहीं है तो शब्द-अर्थ का चारुत्व ध्वनि हो सकता है । इस भ्रम से गड़बड़ी यह होती है कि जब इस चारुत्व को यहाँ ध्वनि स्वीकार कर लेते हैं तब आगे चलकर अलङ्कार और गुण, जो स्वयं चारुत्व न होकर चारुत्व के हेतु हैं, उनमें अन्तर्भाव विज्ञात चारुत्व रूप ध्वनि का करने लग जाते हैं । यह न तो मूल का अभीष्ट है न लोचनकार का । इस प्रकार इस भ्रम के निवारणार्थ, जैसा कि 'बालप्रिया' में भी लिखा है, 'लोचन' के उपर्युक्त वाक्य 'अथ शब्दार्थयोश्चारुत्वं स ध्वनिः' में 'यतश्चारुत्वम्, अर्थात् यश्चारुत्वहेतुः,

प्रथम उद्योतः १९ लोचनम् रुत्वकारि न भवति, नित्यानित्यदोषा असाधुदुःश्रवादय इव । चारुत्वहेतुश्च ध्वनिः, तन्न तद्व्यतिरिक्त इति व्यतिरेकी हेतुः । ननु वृत्तयो रीतयश्च यथा गुणालङ्कारव्यतिरिक्ताश्चारुत्वहेतवश्च, तथा ध्वनिरपि तद्व्यतिरिक्तश्च चारुत्व- हेतुश्च भविष्यतीत्यसिद्धो व्यतिरेक इत्यनेनाभिप्रायेणाह—तदनतिरिक्तवृत्तय इति । नैव वृत्तिरीतीनां तद्व्यतिरिक्तत्वं सिद्धम् । तथा ह्यनुप्रासानामेव दीप्तम- सृणमध्यमवर्णनीयोपयोगितया परुषत्वललितत्वमध्यमत्वस्वरूपविवेचनाय वर्गत्रयसम्पादनार्थं तिस्रोऽनुप्रासजातयो वृत्तय इत्युक्ताः, वर्तन्तेऽनुप्रासभेदा आस्विति । यदाह— व्यतिरिक्त है वह चारुत्वकारी नहीं है, जैसे असाधु और दुःश्रव आदि नित्य-अनित्य दोष । और, ध्वनि चारुत्व का हेतु है अतः वह उनसे व्यतिरिक्त नहीं, यह व्यतिरेकी हेतु¹ है। शङ्का करते हैं कि वृत्तियाँ और रीतियाँ जैसे गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त हैं और साथ ही चारुत्व के हेतु हैं, उसी प्रकार ध्वनि भी गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त और चारुत्व का हेतु होगा । इस प्रकार व्यतिरेक असिद्ध है, इस अभिप्राय से कहते हैं—उनसे अभिन्न रहने वाली—। वृत्तियों और रीतियों का उनसे व्यतिरिक्तत्व सिद्ध² नहीं है । जैसा कि अनुप्रासों के ही दीप्त, मसृण और मध्यम वर्णनीयों की उपयोगिता के अनुसार परुषत्व, ललितत्व और मध्यमत्व ! स्वरूप के विवेचन के लिए तीन वर्गों के सम्पादनार्थ तीन अनुप्रास³-जातियां 'वृत्तियां' कही गई हैं, अर्थात् 'वर्तमान हैं अनुप्रास के भेद इनमें' । क्योंकि कहते हैं— स ध्वनिः' इतना बढ़ाकर पहले ही संगतार्थ कर लेना चाहिए । इस प्रकार चारुत्व-हेतु रूप ध्वनि का चारुत्व-हेतु रूप गुण तथा अलङ्कारों में अन्तर्भाव बन जाता है, जो अभाववादी का पक्ष है ] । १. अभाववादी अपने उपर्युक्त मत की पुष्टि के लिए 'केवलव्यतिरेकी अनुमान' का यहाँ प्रयोग करता है । अनुमान के प्रसङ्ग में तीन प्रकार के लिङ्ग या हेतु न्यायशास्त्र में बताये गये हैं—अन्वय- व्यतिरेकी, केवलान्वयी और केवलव्यतिरेकी । जहाँ केवल व्यतिरेक से व्याप्तिग्रह होता है वह केवलव्यतिरेकी हेतु होता है । जैसे, 'पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्' यहाँ कहा जायगा—'यद् इतरेभ्यो न भिद्यते न तद् गन्धवत्, यथा जलम् ।' इस प्रकार यहाँ व्यतिरेकदृष्टान्त जल होता है । 'यद् गन्धवत् तदितरभिन्नम्' यहाँ अन्वयदृष्टान्त नहीं प्राप्त हो सकता । इसी प्रकार प्रस्तुत में भी अनुमान-प्रयोग इस प्रकार होगा, जैसा कि मेरे पूज्यपाद गुरुजी ( पं० महादेव शास्त्रीजी ) ने अपनी 'दिव्याञ्जना' टिप्पणी में निर्देश किया है—'ध्वनिः गुणालङ्कारव्यतिरिक्तत्वाभाववान्, चारुत्वहेतुत्वात्, यो हि गुणालङ्कारव्यतिरिक्तो भवति स चारुत्वहेतुर्न भवति, यथा असाधुत्वदुःश्रवत्वादिको दोषः ।' २. जैसा कि व्यतिरेक बताया गया कि ऐसा कोई चारुत्व का हेतु नहीं जो गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त है इसके विरुद्ध यह शङ्का है कि उपनागरिका प्रभृति वृत्तियाँ और वैदर्भी प्रभृति रीतियाँ तो अवश्य हैं जो गुण एवं अलङ्कार से भिन्न हैं एवं चारुत्व-हेतु हैं । इस परिस्थिति में उपर्युक्त व्यतिरेक कहाँ सिद्ध होता है ? इस आशङ्का के निवारणार्थ कहते हैं वृत्तियाँ और रीतियाँ गुण एवं अलङ्कार से भिन्न नहीं हैं। वह कैसे ? इसे स्वयं लोचनकार आगे की पंक्तियों में स्पष्ट करते हैं । ३. जैसा कि मूल वृत्तिग्रन्थ में वृत्तियों एवं रीतियों को अलङ्कार एवं गुण से अनतिरिक्तवृत्ति

२० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् सरूपव्यञ्जनन्यासं तिसृष्वेतासु वृत्तिषु । पृथक्पृथगनुप्रासमुशन्ति कवयः सदा ॥ इति ॥ पृथक्पृथगिति । परुषानुप्रासा नागरिका । मसृणानुप्रासा उपनागरिका, ललिता । नागरिकाया विदग्धया उपमितेति कृत्वा । मध्यममकोमलपरुष- मित्यर्थः । अत एव वैदग्ध्यविहीनस्वभावासुकुमारापरुषग्राम्यवनितासादृश्यादियं 'इन तीन वृत्तियों में सजातीय (समानरूप) व्यञ्जनों के उपनिबन्ध (के रूप में) पृथक् पृथक् अनुप्रास को सदा कवि लोग चाहते हैं।' पृथक् पृथक्- । परुष¹ अनुप्रास वाली (वृत्ति) नागरिका है, मसृण अनुप्रास वाली वृत्ति उपनागरिका या ललिता है। नागरिका या विदग्धा से उपमित, यह करके । मध्यम अर्थात् अकोमल एवं अपरुष । अत एव वैदग्ध्य से विहीन स्वभाव वाली होने के कारण असुकुमार एवं अपरुष ग्राम्य वनिता के सादृश्य से यह (तृतीया वृत्ति) अर्थात् इन्हें छोड़कर न टिकने वाली बताया है, उन्हीं में पहले यह सिद्ध करते हैं कि किस प्रकार वृत्तियाँ अनुप्रास अलङ्कार की आश्रयभूत जातियाँ हैं। वर्णनीय या वर्णन के विषय अपने स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार के होते हैं—दीप्त (तीव्रता या तीखापन लिए हुए, रौद्र आदि रस में), मसृण (अर्थात् मधुर, जैसे शृङ्गार आदि रस में), मध्यम (दोनों निर्दिष्ट स्वभाव के बीच के स्वभाव का वर्णनीय, जैसे हास्य आदि रस में)। इस प्रकार दीप्त के परुषत्व स्वरूप, मधुर के ललितत्व-स्वरूप एवं मध्यम के मध्यमत्व-स्वरूप के विवेचन के लिए अनुप्रास की तीन जातियाँ बताई गई हैं। इस प्रकार अनुप्रास इन वृत्तियों का आधारित अलङ्कार हैं। इसी कारण 'अनुप्रास' शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए लिखते हैं—'वर्तन्ते अनुप्रासभेदा आसु' अर्थात् वर्तमान हैं अनुप्रास के भेद इनमें। इस तथ्य को लोचनकार ने आचार्य उद्भट के 'काव्यालङ्कार सारसंग्रह' से वचन (१. ८) उद्धृत करके प्रमाणित किया है। आचार्य उद्भट के अनुसार अनुप्रास में वृत्तियों के अनुसार सजातीय (समानरूप) व्यञ्जनों का उपनिबन्धन पृथक्-पृथक् रूप से कवियों का अभिप्रेत होता है, अर्थात् कवि लोग वर्णनीय वस्तु के स्वभाव के अनुसार शब्दचयन करने का प्रयत्न करते हैं। इसी प्रसङ्ग में आचार्य उद्भट ने अपने ग्रन्थ में तीन वृत्तियों में किस-किस प्रकार के सजातीय व्यञ्जन प्रयुक्त होते हैं, इसका निर्देश किया है— शषाभ्यां रेफसंयोगैष्टवर्गेण च योजिता । परुषा नाम वृत्तिः स्याद् ल्हह्लाद्यैश्च संयुता ॥ सरूपसंयोगयुतां मूर्ध्नि वर्गान्त्ययोगिभिः । स्पर्शैर्युतां च मन्यन्त उपनागरिकां बुधाः ॥ शेषैर्वर्णैर्यथायोगं कथितां कोमलाख्यया । ग्राम्यां वृत्तिं प्रशंसन्ति काव्येष्वादृतबुद्धयः ॥ (१. ५-७) इसके अनुसार वृत्तियों में निम्न प्रकार के व्यञ्जनों का प्रयोग होता है— परुषा—श, ष, रेफ के संयोग, टवर्ग, ल्ह, ह्ल, ह्य आदि । उपनागरिका—समानरूप वर्णों के संयोग, वर्ग के अन्त्य अक्षर से शिरोभाग में युक्त स्पर्श वर्ण (क से लेकर म तक के वर्ण)। कोमला अथवा ग्राम्या—यथायोग शेष वर्ण। १. निर्दिष्ट तीन प्रकार की वृत्तियों के नामकरण की सार्थकता का निर्देश करते हैं। वह वृत्ति 'नागरिका' कहलाती है जो परुष वर्णों से आरब्ध होने के कारण परुष अनुप्रास से युक्त होती है। 'परुषा' वृत्ति ही 'नागरिका' कहलाती है। मसृण या स्निग्ध वर्णों के अनुप्रास वाली वृत्ति 'उप- नागरिका' कहलाती है। इसे 'ललिता' भी कहते हैं। 'उपमिता नागरिकया उपनागरिका' इस

प्रथम उद्योतः २१ लोचनम् वृत्तिर्ग्राम्येति । तत्र तृतीयः कोमलानुप्रास इति वृत्तयोऽनुप्रासजातय एव । न चेह वैशेषिकवद् वृत्तिर्विवक्षिता, येन जातौ जातिमतो वर्तमानत्वं न स्यात्, तदनुग्रह एव हि तत्र वर्तमानत्वम् । यथाह कश्चित्— लोकोत्तरे हि गाम्भीर्ये वर्तन्ते पृथिवीभुजः । इति । तस्माद् वृत्तयोऽनुप्रासादिभ्योऽनतिरिक्तवृत्तयो नाभ्यधिकव्यापाराः । अत एव व्यापारभेदाभावान्न पृथगनुमेयस्वरूपा अपीति वृत्तिशब्दस्य व्यापारवा- चिनोऽभिप्रायः । अनतिरिक्तत्वादेव वृत्तिव्यवहारो भामहादिभिर्न कृतः । ग्राम्या है । वहाँ, तीसरा कोमलानुप्रास है । इस प्रकार वृत्तियां अनुप्रास की जातियां ही हैं । यहां वैशेषिक मत की भाँति वृत्ति (वर्तन, आधेयत्वरूप) विवक्षित नहीं है, जिससे जाति में जातिमान् का वर्तमानत्व न होगा, बल्कि उस (वृत्ति रूप जाति) द्वारा अनुग्रह ही वहां वर्तमानत्व है । जैसा किसी ने कहा है— 'लोकोत्तर गाम्भीर्य में राजा लोग रहते हैं' । इसलिए वृत्तियां अनुप्रासादि से अतिरिक्त होकर रहने वाली नहीं हैं एवं अधिक व्यापार वाली नहीं हैं। अत एव व्यापार के भेद के न होने के कारण पृथक् अनुमेय स्वरूप नहीं हैं, यह 'व्यापार' के वाची 'वृत्ति' शब्द का अभिप्राय है । अतिरिक्त न होने के कारण ही भामह आदि आचार्यों ने वृत्ति का व्यवहार नहीं किया । उद्भट आदि प्रकार इसकी संज्ञा अन्वर्थ है । 'मध्यमा' नाम की तृतीया वृत्ति 'ग्राम्या' इसलिए कहलाती है कि ग्राम्य वनिता की भाँति यह भी वैदग्ध्य-विहीन होती है, इसमें न तो सुकुमारता होती है और न परुषता ही । भट्ट उद्भट के अनुसार ग्राम्या वृत्ति की कोमल-संज्ञा भी है जो रूढ है । १. जैसा कि पहले ही से यह कहते आ रहे हैं कि वृत्तियाँ अनुप्रास की जातियाँ हैं और वृत्तियों के लक्षण में वृत्तियों को अनुप्रासों का आश्रय बनाया है; जैसे, जो वृत्ति परुष अनुप्रास को रखती है अर्थात् उसका आश्रयभूत है वह परुषा या नागरिका कहलाती है आदि और 'वर्तमान' हैं अनुप्रास के भेद इनमें' यह भी 'वृत्ति' का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ किया है । ऐसी स्थिति में, वैशेषिक- मत, जो जाति में जातिमान् का वर्तमानत्व नहीं स्वीकार करता, से स्पष्ट विरोध होता है (क्यों कि वृत्ति रूप जाति में जातिमान् अनुप्रास का वर्तमानत्व उपपन्न नहीं है) । इस पर लोचनकार लिखते हैं कि प्रस्तुत में वृत्ति या आधेयत्व रूप वर्तन वैशेषिकमतानुसार विवक्षित ही नहीं है बल्कि वहाँ वर्तमानत्ववृत्तिरूप-जातिकर्तृक अनुग्रह ही है। वृत्तियों को 'जाति' इसी लिए कहा है कि वे गवादि से गोत्वादि जातियों की भाँति परुषत्वादि-विशिष्ट अनुप्रासों से अभिव्यक्त होती हैं। 'वृत्ति रूप जाति के द्वारा अनुग्रह' का स्पष्टीकरण यह है कि वृत्तियों के कारण ही अनुप्रास में परुषत्वादिभेदक धर्म एवं रसाभिव्यञ्जन की सामर्थ्य उत्पन्न होती है। इस प्रकार वृत्तियाँ अनुप्रासों के प्राणभूत तत्त्व हैं, अतः वे अनुप्रास की जातियाँ करके मानी गई हैं। यह अनुग्रह उसी प्रकार का है जैसे, 'लोकोत्तर गाम्भीर्य में राजाओं का वर्तमान होना' है। यहाँ गाम्भीर्यकर्तृक अनुग्रह है, बिना 'गाम्भीर्य' के राजा लोग कोई काम नहीं कर सकते। 'गाम्भीर्य' वह भाव है, जिसके प्रभाव से कोई विकार नहीं उत्पन्न होता । इस प्रकार पार्यन्तिक वक्तव्य यह है कि जो रसाभिव्यञ्जनविषयक व्यापार अनुप्रास आदि का है वही वृत्तियों का है। ऐसी स्थिति में वृत्तियों का पृथक् रूप से पूर्वोक्त अनुमान सिद्ध नहीं होता है ।

२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम् उद्भटादिभिः प्रयुक्तेऽपि तस्मिन्नार्थः कश्चिदधिको हृदयपथमवतीर्ण इत्यभि- प्रायेणाह—गताः श्रवणगोचरमिति । रीतयश्चेति । तदनतिरिक्तवृत्तयोऽपि गताः श्रवणगोचरमिति सम्बन्धः । तच्छब्देनात्र माधुर्यादयो गुणाः, तेषां च समु- चितवृत्त्यर्पणे यदन्योन्यमेलनक्षमत्वेन पानक इव गुडमरिचादिरसानां सङ्घात- रूपतागमनं दीप्तललितमध्यमवर्णनीयविषयं गौडीयवैदर्भपाञ्चालदेशहेवाकप्रा- चुर्यदृशा तदेव त्रिविधं रीतिरित्युक्तम् । जातिर्जातिमतो नान्या, समुदायश्च समुदायिनो नान्य इति वृत्तिरीतयो न गुणालङ्कारव्यतिरिक्ता इति स्थित आचार्यों द्वारा प्रयुक्त होने पर भी कोई अधिक अर्थ हृदयपथ पर अवतीर्ण नहीं होता, इस अभिप्राय से कहते हैं—सुनने में आई हैं—। और रीतियाँ—। उससे अतिरिक्त होकर न रहने वाली ( रीतियाँ ) भी सुनने में आई हैं, यह सम्बन्ध है । यहाँ 'उस' ( तत् ) शब्द से माधुर्यादि गुण अभिप्रेत हैं; और उन¹ ( माधुर्यादि गुणों ) का समुचित वृत्ति में अर्पण होने पर, जो परस्पर मिलाने की क्षमता होने के कारण, पानक रस की भांति, गुड़, मरिचादि रसों का संघात ( मिलित ) रूप में आना है, दीप्त, ललित और मध्यम वर्णनीय विषय रूप, गौडीय, वैदर्भ और पाञ्चाल देश के स्वभाव ( हेवाक ) की प्रचुरता की दृष्टि से वही त्रिविध होकर 'रीति' कहा गया है । जाति जातिमान् से अन्य नहीं है और समुदाय समुदायी से अन्य नहीं है; इस प्रकार वृत्ति-रीतियाँ गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त नहीं हैं; इस लिए वह व्यतिरेकी² हेतु तदवस्थ ही रहा ।

१. जिस प्रकार ऊपर वृत्तियों की गतार्थता अनुप्रासों से बताई गई, उसी प्रकार अब रीतियों की गतार्थता को माधुर्य आदि गुणों से अभिहित करते हैं । आचार्य वामन, जो रीति-सिद्धान्त के प्रतिष्ठापक आचार्य हैं, के अनुसार 'विशिष्ट पदरचना' ही 'रीति' है, यहाँ 'वैशिष्ट्य' गुणों के द्वारा आहित होता है (विशिष्टा पदरचना रीतिः, विशेषो गुणात्मा-वामन) इसी 'रीति' को लोचन- कार ने 'समुचित वृत्ति में गुणों का अर्पण अर्थात् संघातरूपतागमन' कहा है और गुड-मरिचादि के रसों का संघात होने पर पानक रस का उदाहरण दिया है । 'समुचित वृत्ति' से तात्पर्य है दीप्त आदि वर्णनीय के औचित्य से युक्त वर्णरचना' (जैसा कि 'बालप्रिया' में निर्देश है )। ऐसी वर्णरचना में 'गुण' आकर 'रीति' का रूप धारण कर लेते हैं । प्राचीन आचार्यों ने दीप्त, ललित और मध्यम वर्णनीय विषयों के अनुसार 'रीति' के गौडीय, वैदर्भ और पाञ्चाल, ये तीन दैशिक भेद किए हैं । माधुर्य आदि गुण समुचित वर्णरचना के साथ संहत या समूहताप्राप्त हो जाते हैं तब उनकी स्थिति 'रीति' के रूप में हो जाती है । इस प्रकार यह भी निश्चय हुआ कि रीतियाँ गुणों से व्यतिरिक्त तत्त्व नहीं हैं । २. व्यतिरेकी हेतु—पहले जो यह कह चुके हैं कि निर्दिष्ट गुण और अलङ्कारों के अतिरिक्त कोई तत्त्व नहीं जो चारुत्वहेतु है, इसी प्रसंग में चारुत्वहेतु के रूप में प्राप्त वृत्ति और रीति की गतार्थता अलङ्कार और गुण में बताई गई । इस प्रकार 'ध्वनिः, गुणालङ्कारव्यतिरिक्तत्वाभाववान्, चारुत्वहेतुत्वात्, यो हि गुणालङ्कारव्यतिरिक्तो भवति स चारुत्वहेतुर्न भवति' यह केवलव्यतिरेकी हेतु अपने रूप में अखण्डित रहा । और फिर वह बात अभाव वादी पक्ष के अनुसार फिर सामने आई कि आखिर यह 'ध्वनि' क्या है ?

प्रथम उद्योतः २३ ध्वन्यालोकः अन्ये ब्रूयुः—नास्त्येव ध्वनिः । प्रसिद्धप्रस्थानव्यतिरेकिणः काव्यप्रकारस्य काव्यत्वहानेः सहृदयहृदयाह्लादिशब्दार्थमयत्वमेव काव्यलक्षणम् । न चोक्तप्रस्थानातिरेकिणो मार्गस्य तत्सम्भवति । न च तत्समतान्तःपातिनः सहृदयान् कांश्चित्परिकल्प्य तत्प्रसिद्ध्या ध्वनौ काव्यव्यपदेशः प्रवर्तितोऽपि सकलविद्वन्मनोग्राहितामवलम्बते । अन्य लोग कहें—नहीं है ध्वनि, क्योंकि प्रसिद्ध प्रस्थान से व्यतिरिक्त काव्य के प्रकार (भेद) में काव्यत्व की हानि है । सहृदयहृदयाह्लादिशब्दार्थमयत्व ही काव्य का लक्षण है । उक्त प्रस्थानों से अतिरिक्त मार्ग का वह सम्भव नहीं है । और उस सम्प्रदाय के (मानने वालों के) अन्तर्गत ही कुछ सहृदयों को तैयार करके उनके द्वारा प्रसिद्ध कर दिए जाने से ध्वनि में काव्य का व्यवहार प्रवृत्त किया भी जाय तब भी सभी विद्वानों का मनोग्राही नहीं हो सकता । लोचनम् एवासौ व्यतिरेकी हेतुः । तदाह—तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरिति । नैष चारु- त्वस्थानं शब्दार्थरूपत्वाभावात् । नापि चारुत्वहेतुः, गुणालङ्कारव्यतिरिक्त- त्वादिति । तेनाखण्डबुद्धिसमास्वाद्यमपि काव्यमपोद्धारबुद्ध्या यदि विभज्यते, तथाप्यत्र ध्वनिशब्दवाच्यो न कश्चिदतिरिक्तोऽर्थो लभ्यत इति नामशब्देनाह । ननु मा भूदसौ शब्दार्थस्वभावः, मा च भूत्तच्चारुत्वहेतुः, तेन गुणालङ्कार- व्यतिरिक्तोऽसौ स्यादित्याशङ्क्य द्वितीयमभाववादप्रकारमाह—अन्य इति । उसे कहते हैं—उनसे व्यतिरिक्त कौन यह अतिरिक्त ध्वनि नाम १ का (नया) पदार्थ है ? —। यह (ध्वनि) चारुत्व का स्थान नहीं हो सकता, क्योंकि न तो यह शब्द रूप है और न अर्थरूप । और यह चारुत्व का हेतु भी नहीं है, क्योंकि यह गुण तथा अलङ्कार से व्यतिरिक्त है (उनकी सीमा में नहीं आता) । इसलिए अखण्ड बुद्धि द्वारा समास्वादन के योग्य भी काव्य का विभाग (-अपोद्धार) बुद्धि से यदि विभाग (खण्ड) करते हैं तथापि यहां 'ध्वनि' शब्द का वाच्य कोई अतिरिक्त अर्थ उपलब्ध नहीं होता, वह (वृत्ति ग्रन्थ में) 'नाम' शब्द से कहा है । यह (ध्वनि) शब्द-अर्थ के स्वभाव का न हो और चारुत्व का हेतु भी न हो, १. कोऽयं ध्वनिर्नामेति—यह पंक्ति अभाववाद के प्रथम विकल्प का निर्णीतार्थ व्यक्त करती है । इस पक्ष में ध्वनि को चारुत्व का स्थान या चारुत्व का हेतु मान कर ध्वनि के अस्तित्व को स्वीकार करने की बात उठी थी, परन्तु इसके विरुद्ध इस पक्ष ने सबल तर्क यह उपस्थित किया कि ध्वनि चारुत्व-स्थान तभी हो सकता था जब कि यह शब्द रूप या अर्थ रूप होता और दूसरे, यह चारुत्वहेतु भी तभी हो सकता था जब कि गुण अथवा अलङ्कार से व्यतिरिक्त होता । न तो यह शब्दार्थ रूप है और न तो यह गुणालङ्कार व्यतिरिक्त है, इस कारण यह स्पष्ट है कि 'ध्वनि' कोई पदार्थ या तत्त्व नहीं । इतना तात्पर्य उपर्युक्त 'किं' शब्द से द्योतित होता है ।

२४ | सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् भवत्वेवम् ; तथापि नास्त्येव ध्वनिर्यादृशस्तव लिलक्षयिषितः । काव्यस्य ह्यसौ कश्चिदुक्तव्यः । न चासौ नृत्तगीतवाद्यादिस्थानीयः काव्यस्य कश्चित् । कवनीयं काव्यं, तस्य भावश्च काव्यत्वम् । न च नृत्तगीतादि कवनीयमित्युच्यते । प्रसिद्धेति । प्रसिद्धं प्रस्थानं शब्दार्थौ तद्गुणालङ्काराश्चेति, प्रतिष्ठन्ते परम्परया व्यवहरन्ति येन मार्गेण तत्प्रस्थानम् । काव्यप्रकारस्येति । काव्य- प्रकारत्वेन तव स मार्गोऽभिप्रेतः, 'काव्यस्यात्मा' इत्युक्तत्वात् । ननु कस्मात्त- त्काव्यं न भवतीत्याह—सहृदयेति । मार्गस्येति । नृत्तगीताक्षिनिकोचनादिप्राय- स्येत्यर्थः । तदिति । सहृदयेत्यादिकाव्यलक्षणमित्यर्थः । ननु ये तादृशमपूर्वं इससे वह गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त तो होगा ! यह आशङ्का करके अभाव-वाद के दूसरे प्रकार¹ को कहते हैं—अन्य—। हो ऐसा; तथापि जैसा कि तुम्हें लक्षणयुक्त बनाना अभिलषित है वैसा ध्वनि तो है ही नहीं (क्योंकि) वह (ध्वनि) काव्य का कोई कहा जायगा । और, वह नृत्त, गीत, वाद्य आदि स्थानीय कुछ तो नहीं है ! कवनीय काव्य होता है, उसका भाव काव्यत्व है। नृत्त, गीत आदि 'कवनीय' नहीं कहे जाते । प्रसिद्ध—। प्रसिद्ध प्रस्थान, अर्थात् शब्द और अर्थ एवं उनके गुण और अलङ्कार । प्रतिष्ठित होते हैं, परम्परा से जिस मार्ग से व्यवहार करते हैं वह 'प्रस्थान' है। काव्य के प्रकार में—। काव्य के प्रकार के रूप में वह मार्ग तुम्हें अभिप्रेत है, क्योंकि 'काव्य का आत्मा' यह कहा है । शङ्का है कि कैसे वह काव्य नहीं हो सकता, इस पर कहते हैं—सहृदय०—। मार्ग का—। अर्थात् नृत्त, गीत, आँखों का मींचना आदि के सदृश (मार्ग का) । वह—। अर्थात् सहृदय० इत्यादि काव्य का लक्षण । जो उस अब लोचनकार ने मूल वृत्तिग्रन्थ के 'नाम' शब्द का तात्पर्य इस प्रकार निकाला है—ध्वनि तत्त्व किसी प्रकार सिद्ध नहीं होता, अग्रत्या अखण्ड बुद्धि द्वारा समास्वाद्य भी काव्य को अपोद्धार या विभाग की बुद्धि से विभक्त करते हैं तब भी 'ध्वनि' शब्द का वाच्य कोई अतिरिक्त अर्थ नहीं प्राप्त होता है। ऐसी स्थिति में ध्वनि का अभाव ही मानना चाहिए। १. अभाववाद के प्रथम विकल्प में यही निर्णय हुआ कि ध्वनि न तो शब्द अथवा अर्थ के रूप में माना जा सकता और न तो चारुत्व के हेतु के रूप में स्वीकार किया जा सकता, इस लिए ध्वनि है ही नहीं। इस पर प्रतिपक्षी की ओर से यह शङ्का होती है कि क्यों न ध्वनि को गुण और अलङ्कार से अतिरिक्त कोई तत्त्व स्वीकार किया जाय । इस पर अभाववाद के दूसरे विकल्प में जोर देकर यह खण्डन उपस्थित किया गया है कि माना कि गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त ही कोई ध्वनि है, लेकिन ऐसे 'ध्वनि' को मानने से लाभ क्या होगा ? क्यों कि 'ध्वनि' को काव्य का ही तत्त्व होना चाहिए, वहीं प्रस्तुत में लक्षणीय हो सकता है। और जब काव्य के रूप शब्द-अर्थ और चारुत्वहेतु गुण और अलङ्कार से ध्वनि को पृथक् कर देते हैं तब तो निश्चय ही ध्वनि काव्य का कोई तत्त्व नहीं हो सकता, नृत्त, गीत, वाद्य आदि के समान ही कोई तत्त्व हो सकता है जिसका काव्य से कोई सम्बन्ध नहीं। काव्य 'कवनीय' (कवि के प्रयत्न का साध्य) होता है और नृत्त-गीतादि कवनीय नहीं, उसी प्रकार ध्वनि की स्थिति है।

प्रथम उद्योतः २५ लोचनम् काव्यरूपतया जानन्ति, त एव सहृदयाः । तदभिमतत्वं च नाम काव्यलक्षण- मुक्तप्रस्थानातिरेकिण एव भविष्यतीत्याशङ्कयाह - न चेति । यथा हि खड्गलक्षणं करोमीत्युक्त्वा आतानवितानात्मा प्राव्रियमाणः सकलदेहाच्छादकः सुकुमार- श्चित्रतन्तुविरचितः संवर्तनविवर्तनसहिष्णुरच्छेदकः सुच्छेद्य उत्कृष्टः खड्ग इति ब्रुवाणः, परैः पटः खल्वेवंविधो भवति न खड्ग इत्ययुक्ततया पर्यनुयुज्यमान एवं ब्रूयात्—ईदृश एव खड्गो ममाभिमत इति तादृगेवैतत् । प्रसिद्धं हि लक्ष्यं भवति न कल्पितमिति भावः । तदाह - सकलविद्वदिति । विद्वांसोऽपि हि तत्समयज्ञा एव भविष्यन्तीति शङ्कां सकलशब्देन निराकरोति । एवं हि कृतेऽपि न किञ्चि- त्कृतं स्यादुन्मत्तता परं प्रकटितेति भावः । यस्त्वत्राभिप्रायं व्याचष्टे - जीवितभूतो ध्वनिस्तावत्तवाभिमतः, जीवितं च नाम प्रसिद्धप्रस्थानातिरिक्तमलंकारकारैरनुक्तत्वाच्च न काव्यमिति लोके प्रकार के अपूर्व को काव्य के रूप से जानते हैं, वे ही- 'सहृदय' हैं और उन (सहृदयों) का जो अभिमत है वह काव्यलक्षण कहे हुए प्रस्थानों के अतिरिक्त का ही होगा, यह आशङ्का करके कहते हैं—उस ध्वनि-। क्योंकि जैसे, 'खड्ग का लक्षण करता हूँ' यह कह कर, 'आतान-वितान के स्वभाव वाला, प्रावरण किया जाता हुआ, सकल शरीर को ढँक देने वाला, सुकुमार, रंग-बिरंगे तन्तुओं से बना हुआ, संकोच और विकास को सह लेने वाला, सुख से छेदन के योग्य उत्कृष्ट खड्ग है' यह कहता हुआ, दूसरों के द्वारा 'ऐसा तो कपड़ा होता है खड्ग नहीं' इस प्रकार अयुक्त होने के कारण, पूछा गया (वह व्यक्ति) इस प्रकार कहे ऐसा ही खड्ग मेरा अभिमत है उसी तरह का यह है। भाव यह कि लक्ष्य प्रसिद्ध होता है, कल्पित नहीं। उसे कहते हैं—सकल विद्वानों के—। विद्वान् भी उस (ध्वनि) के समय (सङ्केत) के जानने वाले ही होंगे, इस शङ्का को 'सकल' शब्द से (वृत्तिकार) निराकरण करते हैं। मतलब यह कि ऐसा करने पर भी कुछ नहीं किया, केवल पागलपन¹ ही प्रकट किया। जो व्यक्ति यह (इस) अभिप्राय की व्याख्या² करता है—'तुम्हारा अभिमत है कि ध्वनि (काव्य का) जीवितभूत (अनुप्राणक) तत्त्व है और जीवित रूप (ध्वनि) प्रसिद्ध प्रस्थानों से अतिरिक्त है और इसे आलङ्कारिकों ने नहीं कहा है अतः वह १. ध्वन्यभाववादी का दूसरा विकल्प संक्षेप में यह है कि ध्वनि चूंकि परम्परा से व्यवहृत मार्गों में नहीं आता, अतः काव्य के आत्मा या प्रकार के रूप में उसे स्वीकृत नहीं किया जा सकता। दूसरे 'सहृदयाह्लादकारिशब्दार्थमयत्व' रूप काव्य-लक्षण उसमें संघटित भी नहीं होता। अगर कुछ सहृदय एकवाक्य होकर ध्वनि को हृदयाह्लादी मान कर 'काव्य' नाम दे भी दें तब भी यह सकल विद्वज्जन-मनोग्राह्य तत्त्व नहीं हो सकता। इस प्रकार ध्वनि के सम्बन्ध में यह सब कुछ 'पागलपन' के अतिरिक्त कुछ नहीं । २. लोचनकार ने द्वितीय अभाववादी के अभिप्राय को कुछ भिन्न रीति से बताने वाले का यह खण्डन किया है। उसके अनुसार अभिप्राय यह है कि पहले आलङ्कारिकों ने ध्वनि को आत्मा या जीवित रूप में स्वीकार नहीं किया है और यह 'जीवित'भूत ध्वनि तत्त्व प्रसिद्ध प्रस्थानों से

२६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः पुनरपरे तस्याभावमन्यथा कथयेयुः—न सम्भवत्येव ध्वनिनार्- मापूर्वः कश्चित् । कामनीयकमनतिवर्तमानस्य तस्योक्तेष्वेव चारुत्वहेतु- ष्वन्तर्भावात् । तेषामन्यतमस्यैव वा अपूर्वसमाख्यामात्रकरणे यत्कि- ञ्चन कथनं स्यात् । फिर अन्य लोग उस (ध्वनि) का अभाव अन्य प्रकार से कहें—'ध्वनि नाम का कोई अपूर्व सम्भव ही नहीं हैं, क्योंकि वह कामनीयक का अतिवर्तन नहीं करता, (इसलिए) उसका कहे गए चारुत्व के हेतुओं में ही अन्तर्भाव है । अथवा उन्हीं में से एक की अपूर्व समाख्या (नामकरण) की जाय तो जो-कुछ (तुच्छ) कथन होगा । लोचनम् प्रसिद्धमिति । तस्येदं सर्वं स्ववचनविरुद्धम् । यदि हि तत्काव्यस्यानुप्राणकं तेनाङ्गीकृतं पूर्वपक्षवादिना तच्चिरन्तनैरनुक्तमिति प्रत्युत लक्षणार्हमेव भवति । तस्मात्प्राक्तन एवात्राभिप्रायः । ननु भवत्वसौ चारुत्वहेतुः शब्दार्थगुणालङ्कारान्तर्भूतश्च, तथापि ध्वनिरि- त्यमुया भाषया जीवितमित्यसौ न केनचिदुक्त इत्यभिप्रायमाशङ्क्य तृतीयम- भाववादमुपन्यस्यति-पुनरपर इति । कामनीयकमिति कमनीयस्य कर्म । चारुत्व- धीहेतुतेति यावत् । (जीवितभूत ध्वनि) काव्य नहीं है, 'लोक में प्रसिद्ध है।' यह सब कथन उस (व्यक्ति) के अपने ही कथन के विरुद्ध ठहरता है, क्योंकि यदि उस पूर्वपक्षवादी ने यह स्वीकार कर लिया कि (ध्वनि) काव्य का अनुप्राणक (जीवितभूत) है तो प्राचीनों द्वारा उक्त न होने के कारण प्रत्युत वह लक्षणार्ह ही होगा । इस लिए पहला ही यहाँ अभिप्राय (ठीक) है। माना कि वह (ध्वनि चारुत्व का हेतु है और शब्द-अर्थ के गुण और अलङ्कारों के अन्तर्भूत (भी) है; तथापि 'ध्वनि' इस भाषा के द्वारा (अर्थात् यह कहकर) 'जीवित' ऐसा वह किसी के द्वारा नहीं कहा गया है इस अभिप्राय की आशङ्का करके तीसरे अतिरिक्त है। अतः यह काव्य की श्रेणी में नहीं आ सकता । इसे अभाववादी के अनुसार लोक में प्रसिद्ध होना चाहिए, जैसे शब्द, अर्थ, गुण, अलङ्कार लोक में प्रसिद्ध हैं। लोचनकार का कहना है कि इस व्याख्याकार का यह सब कथन 'स्ववचनविरुद्ध' है। क्योंकि, जबकि यह स्वयं पूर्वपक्षवादी (ध्वन्यभाववादी) ने स्वीकार कर लिया कि ध्वनि काव्य का जीवित या अनुप्राणक तत्त्व है तब तो उसे 'काव्य' होना ही चाहिए। उसे इस कारण न मानना कि प्राचीन किसी आलङ्कारिक ने उसे नहीं कहा है, यह कहाँ की दलील है। बल्कि, वह तो सर्वथा 'लक्षणार्ह' अर्थात् लक्ष बनाने के योग्य (लक्षयितव्य) है। अतः उपर्युक्त व्याख्यान स्वीकार्य नहीं। पूर्व व्याख्यान ही द्वितीय अभाववादी के अभिप्राय को ठीक व्यक्त करता है।

प्रथम उद्योतः २७ ध्वन्यालोकः किञ्च वाग्विकल्पानामानन्त्यात् सम्भवत्यपि वा कस्मिंश्चित् काव्य- लक्षणविधायिभिः प्रसिद्धैरप्रदर्शिते प्रकारलेशे ध्वनिध्वनिरिति यदेत- दलीकसहृदयत्वभावनामुकुलितलोचनैर्नृत्यते, तत्र हेतुं न विद्मः। सहस्रशो हि महात्मभिरन्यैरलङ्कारप्रकाराः प्रकाशिताः प्रकाश्यन्ते च। न च तेषामेषा दशा श्रूयते। तस्मात् प्रवादमात्रं ध्वनिः। न त्वस्य क्षोदक्षमं तत्त्वं किञ्चिदपि प्रकाशयितुं शक्यम्। तथा चान्येन कृत एवात्र श्लोकः— और भी, वाग्विकल्पों के अनन्त होने के कारण प्रसिद्ध काव्य-लक्षणकारों द्वारा अप्रदर्शित किसी प्रकार लेश के सम्भव होने पर भी, ‘ध्वनि-ध्वनि’ यह जो, सहृदयता की भावना से आंखें मूंद कर (ध्वनिवादी) नाच रहे हैं उसमें हेतु हम नहीं जानते। अन्य महात्माओं (विद्वानों) ने हजारों अलङ्कारों के भेद बताए हैं और बताते हैं उनको यह स्थिति नहीं सुनाई पड़ती। अतः ध्वनि प्रवादमात्र है। इसका कुछ भी विचारयोग्य तत्त्व प्रकाशित नहीं किया जा सकता है। जैसा कि अन्य ने यहाँ श्लोक बनाया ही है— लोचनम् ननु विच्छित्तीनामसंख्यत्वात्काचित्तादृशी विच्छित्तिरस्माभिर्दृष्टा, या नानुप्रासादौ, नापि माधुर्यादावुक्तलक्षणेऽन्तर्भवेदित्याशङ्कयाभ्युपगमपूर्वकं परिहरति—वाग्विकल्पानामिति। वक्तीति वाक् शब्दः। उच्यत इति वागर्थः। अभाववाद का उपन्यास करते हैं—फिर अन्य लोग—। 'कामनीयक' १ अर्थात् कमनीय का कर्म, मतलब कि चारुत्व बुद्धि का हेतुत्व। विच्छित्तियों (वैचित्र्यों) के असंख्य होने के कारण कोई उस प्रकार की विच्छित्ति हमने देखी है जो न अनुप्रास आदि अलङ्कारों में और न माधुर्य आदि गुणों में, जैसा कि उसके लक्षण कहे गए हैं, अन्तर्भूत हो, यह आशङ्का करके अभ्युपगमपूर्वक (इसे स्वीकार १. तृतीय अभाववाद के अवतरण में लोचनकार का कहना है कि ध्वनिवादी का यहाँ यह पक्ष होगा कि ध्वनि को चारुत्व का हेतु मान कर गुण और अलङ्कार के अन्तर्भूत मान लेते हैं, किन्तु इतना तो मानना ही होगा कि अब तक किसी ने ‘ध्वनि’ का नाम लेकर उसे 'काव्य का जीवित' (काव्यस्यात्मा) बनाने का प्रयास किया हो अतः यह एक अभूतपूर्व बात है, इस प्रकार ध्वनि को स्वीकार करना चाहिए। इस पर अभाववाद के पक्ष से यह कहना है कि किसी प्रकार ध्वनि उस सीमा का अतिक्रमण नहीं कर सकता जिसमें कमनीयता या चारुता को उत्पन्न करते हैं, अर्थात् ध्वनि चारुत्वहेतु ही अन्ततः सिद्ध होकर रह जाता है। ऐसी स्थिति में उन्हीं चारुत्वहेतुओं में अन्तर्भूत एक तत्त्व को

२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम्

उच्यतेऽनयेति वागभिधाव्यापारः । तत्र शब्दार्थवैचित्र्यप्रकारोऽनन्तः । अभि- धावैचित्र्यप्रकारोऽनन्तः । अभिधावैचित्र्यप्रकारोऽप्यसंख्येयः । प्रकारलेश इति । स हि चारुत्वहेतुर्गुणो वालङ्कारो वा । स च सामान्यलक्षणेन संगृहीत एव । यदाहुः—‘काव्यशोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः, तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः’ इति । तथा ‘वक्राभिधेयशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलङ्कृतिः’ इति । ध्वनिर्ध्वनिरिति वीप्सया सम्भ्रमं सूचयन्नादरं दर्शयति—नृत्यत इति । तल्लक्षणकृद्भिस्तद्युक्तका- व्यविधायिभिस्तच्छ्रवणोद्भूतचमत्कारैश्च प्रतिपत्तृभिरिति शेषः । ध्वनिशब्दे कोऽत्यादर इति भावः । एषा दशेति । स्वयं दर्पः परैश्च स्तूयमानतेत्यर्थः । वाग्विकल्पाः वाक्प्रवृत्तिहेतुप्रतिभाव्यापारप्रकारा इति वा । तस्मात्प्रवादमात्रमिति । सर्वेषामभाववादिनां साधारण उपसंहारः । यतः शोभाहेतुत्वे गुणालङ्कारेभ्यो करते हुए ) परिहार¹ करते हैं—वाग्विकल्पों के—। ( 'वाक्' की तीन व्युत्पत्तियों के अनुसार ) 'वक्तीति वाक्', जिसे कहता है वह वाक्, अर्थात् शब्द, 'उच्यत इति वाक्' जो कहा जाता है, अर्थात् अर्थ और 'उच्यतेऽनया', जिससे कहा जाता है अर्थात् अभिधा व्यापार ( ये तीन अर्थ गृहीत होते हैं ) । उनमें शब्द और अर्थ के वैचित्र्य का प्रकार अनन्त है । अभिधा के वैचित्र्य प्रकारों की भी कोई संख्या नहीं । प्रकारलेश—। वह चारुत्व का हेतु गुण हो अथवा अलङ्कार हो, वह सामान्य लक्षण के द्वारा संगृहीत ही ( हो जायगा ) । जैसा कि ( वामन ) कहते हैं—'काव्य के शोभाकारी धर्म गुण हैं, और उस ( काव्य की शोभा ) के अतिशयकारी हेतु अलङ्कार हैं' । तथा 'वक्र ( विचित्र ) अभिधेय ( अर्थ ) और शब्द की उक्ति वाणियों की अलङ्कृति है ।' 'ध्वनि-ध्वनि' इस दो बार ( वीप्सा ) के कथन से ( ध्वनिवादियों का ) सम्भ्रम ( हड़बड़ी ) सूचित करते हुए ( उनका ध्वनि में ) आदर दर्शाते हैं—नाचते हैं—। शेष यह कि ( ध्वनि ) का लक्षण करने वाले; उससे युक्त काव्य का निर्माण करने वाले; उसके सुनने मात्र से उत्पन्न चमत्कार वाले प्रतिपत्तृजन । भाव यह कि 'ध्वनि' इस शब्द मात्र में आदर का क्या मतलब ? ऐसी दशा—। अर्थात् स्वयं तो दर्प तथा दूसरों से स्तूयमान होना । वाग्विकल्प अर्थात् अथवा वाक्प्रवृत्ति के हेतुभूत प्रतिभा व्यापार के प्रकार । इसलिए प्रवाद मात्र—। समस्त अभाव-वादियों का यह सामान्य रूप से उपसंहार है । अर्थात् आपने एक अपूर्व नाम से 'ध्वनि' के नाम से अभिहित कर दिया तो यह कोई महत्त्व का कथन नहीं कहा जा सकता । १. ऐसा भी सम्भव है 'ध्वनि' कोई ऐसी विच्छित्ति या वैचित्र्य को लेकर कहा गया है जिसका अन्तर्भाव न किसी गुण में होता है और न किसी अलङ्कार में । ऐसी स्थिति में 'ध्वनि' को स्वीकार करना आवश्यक हो जाता है । यह पूर्वपक्षी की आशङ्का को सर्वथा अभाववादी मान लेता है और अपने पक्ष का समर्थन करते हुए कहता है कि पूर्वाचार्यों द्वारा अनन्त प्रकारों में से किसी अप्रदर्शित प्रकार को लेकर इतना प्रपञ्च खड़ा नहीं किया जा सकता । यह सर्वथा उपहसनीय बात होगी ।

प्रथम उद्योतः २९ ध्वन्यालोकः यस्मिन्नस्ति न वस्तु किञ्चन मनः प्रह्लादि सालंकृति व्युत्पन्नै रचितं च नैव वचनैर्वक्रोक्तिशून्यं च यत् । काव्यं तद्ध्वनिना समन्वितमिति प्रीत्या प्रशंसञ्जडो नो विद्मोऽभिदधाति किं सुमतिना पृष्टः स्वरूपं ध्वनेः ॥ भाक्तमाहुस्तमन्ये । अन्ये तं ध्वनिसंज्ञितं काव्यात्मानं गुण- वृत्तिरित्याहुः । जिसमें अलङ्कारयुक्त, मन को आह्लादित करने वाला कोई अर्थ (वस्तु) नहीं है, जिसे व्युत्पन्न वचनों से नहीं रचा गया है और जो वक्रोक्ति से शून्य है, उस काव्य की 'ध्वनि से समन्वित' यह (मानकर) प्रेम से प्रशंसा करता हुआ जड़ (मूर्ख ध्वनिवादी) सुमति जन द्वारा ध्वनि का स्वरूप पूछे जाने पर, क्या कहता है, हम नहीं जानते । अन्य लोग उसे 'भाक्त' कहते हैं; अन्य लोग उस 'ध्वनि' नामक काव्यात्मा को 'गुणवृत्ति' कहते हैं । लोचनम् न व्यतिरिक्तः, यतश्च व्यतिरिक्तत्वे न शोभाहेतुः, यतश्च शोभाहेतुत्वेऽपि नादरास्पदं तस्मादित्यर्थः । न चेयमभावसम्भावना निर्मूलैव दूषितेत्याह— तथा चान्येनेति । ग्रन्थकृत्समानकालभाविना मनोरथनाम्ना कविना । यतो न सालङ्कृति, अतो न मनःप्रह्लादि । अनेनार्थालङ्काराणामभाव उक्तः । व्युत्पन्नै रचितं च नैव वचनैरिति शब्दालङ्काराणाम् । वक्रोक्तिः उत्कृष्टा संघटना, तच्छून्यमिति शब्दार्थगुणानाम् । वक्रोक्तिशून्यशब्देन सामान्यलक्षणाभावेन क्योंकि (यदि ध्वनि) शोभा का हेतु है (तो) गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त नहीं है, और क्योंकि (यदि) वह गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त है तो वह शोभा का हेतु नहीं है, और क्योंकि (यदि वह शोभा का हेतु है (तो भी) आदरास्पद नहीं है, इस कारण । यह नहीं कि बिना किसी मूल के (यहाँ) अभाव की सम्भावना है, कहते हैं—जैसा कि दूसरे ने—। अर्थात् ग्रन्थकार के समसामयिक 'मनोरथ' नाम के कवि ने । क्योंकि (वह) अलङ्कारयुक्त नहीं, अतः (वह) मन को आह्लादित करने वाला नहीं है, इससे अर्थालङ्कारों का अभाव कहा है। और व्युत्पन्न वचनों द्वारा रचित भी नहीं—इससे शब्दालङ्कारों का (अभाव कहा है) । वक्रोक्ति अर्थात् उत्कृष्ट सङ्घटना, उससे शून्य—इससे शब्द और अर्थ के गुणों का (अभाव कहा है)। कुछ लोग कहते हैं कि 'वक्रोक्तिशून्य' शब्द से (अलङ्कारों के इस 'वक्रोक्ति' रूप) १. मनोरथ कवि—लोचनकार ने वृत्ति ग्रन्थ में उद्धृत अभाववाद के अनुकूल श्लोक को किसी 'मनोरथ' कवि, जो ग्रन्थकार का समसामयिक था, का कहा है । 'मनोरथ' के नाम से न

३० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् सर्वलङ्काराभाव उक्त इति केचित् । तैः पुनरुक्तत्वं न परिहृतमेवेत्यलम् । प्रीत्येति । गतानुगतिकानुरागेणेत्यर्थः । सुमतिनेति । जडेन पृष्टो भ्रूभङ्गकटा- क्षादिभिरेवोत्तरं ददत्तत्स्वरूपं काममाचक्षीतेति भावः । एवमेतेऽभावविकल्पाः शृङ्खलाक्रमेणागताः, न त्वन्योन्यासम्बद्धा एव । तथा हि तृतीयाभावप्रकारनिरूपणोपक्रमे पुनःशब्दस्यायमेवाभिप्रायः, उपसं- हारैक्यं च सङ्गच्छते । अभाववादस्य सम्भावनाप्राणत्वेन भूतत्वमुक्तम् । भाक्तवादस्त्वविच्छिन्नः पुस्तकेष्वित्यभिप्रायेण भाक्तमाहुरिति । नित्यप्रवृत्तवर्त- मानापेक्षयाभिधानम् । भज्यते सेव्यते पदार्थेन प्रसिद्धतयोत्प्रेक्ष्यत इति सामान्य लक्षण के न होने के कारण समस्त अलङ्कारों का अभाव कहा है । उन (व्याख्याकारों ने) पुनरुक्ति का परिहार नहीं किया है, अतः (उनका कथन) ठीक नहीं। बड़े प्रेम से—। अर्थात् गतानुगतिक (लकीर के फकीर होने के प्रति) अनुराग के कारण । सुलझी बुद्धि वालों द्वारा—। अगर कोई मूर्ख उनसे प्रश्न करता तो वे भौं हिला कर और आंख मटका कर ही उस (ध्वनि) के स्वरूप को पूरा कह डालते— यह मतलब है । इस प्रकार ये अभाव-वाद के विकल्प शृङ्खला के क्रम से प्राप्त हैं, न कि परस्पर असम्बद्ध¹ हैं, जैसा कि तीसरे अभाव-प्रकार के निरूपण के उपक्रम में 'पुनः' (फिर) शब्द का यही अभिप्राय है, और उपसंहार का एकत्व (साधारण्य) भी संगत होता है । अभाववाद के सम्भावना पर आधारित होने के कारण (उसमें) भूतकाल का प्रयोग किया है। किन्तु भाक्तवाद पुस्तकों में अविच्छिन्न रूप से चला आ रहा है, इस अभिप्राय से 'भाक्तमाहुः'² ('भाक्त' कहते हैं) यह नित्य-प्रवृत्त वर्तमान की अपेक्षा से अभिधान है । भज्यते = सेव्यते, अर्थात् प्रसिद्ध होने के कारण उत्प्रेक्षित होता है जो कोई ग्रन्थ का पता चलता है और न कोई सङ्केत ही मिलता है । 'राजतरङ्गिणी' में कश्मीर के राजा जयापीड (अष्टम शताब्दी) के सभापण्डितों में 'मनोरथ' का उल्लेख है । और मनोरथ के कुछ श्लोकों को आचार्य क्षेमेन्द्र ने 'औचित्य-विचार-चर्चा' में उद्धृत किया है । सम्भव है तीनों 'मनोरथ' किसी एक 'कवि' से सम्बद्ध हों । १. अभाववाद के उपर्युक्त तीन विकल्प परस्पर असम्बद्ध नहीं, बल्कि एक शृङ्खलित रूप में प्रस्तुत किए गए हैं, इसी लिए सभी अभाववादियों के मतों का साधारण उपसंहार करते हुए वृत्तिग्रन्थ में आचार्य लिखते हैं—'इसलिए ध्वनि प्रवादमात्र है।' इस प्रकार तीनों विकल्पों की परस्पर सम्बद्धता का संकेत तृतीय अभाव-विकल्प के आरम्भ में 'पुनः' शब्द का प्रयोग स्पष्ट रूप से देता है । २. अभाववाद चूंकि सम्भावना पर आधारित था इस लिए ग्रन्थकार ने 'जगदुः' यह भूतार्थक प्रयोग किया था किन्तु प्रस्तुत भाक्तवाद अलङ्कार-शास्त्र के ग्रन्थों में अविच्छिन्न रूप से स्मरण किया गया है इसलिए उसके लिए 'आहुः' इस नित्यप्रवृत्त वर्तमान के अर्थ में आचार्य ने प्रयोग किया है। भाक्तवाद को प्राचीनों ने विशेष रूप से 'गुणवृत्ति' शब्द से अभिहित किया है, जो

प्रथम उद्योतः ३१ लोचनम् भक्तिर्धर्मोऽभिधेयेन सामीप्यादिः, तत आगतो भाक्तो लाक्षणिकोऽर्थः । यदाहुः— अभिधेयेन सामीप्यात्सारूप्यात्समवायतः । वैपरीत्यात्क्रियायोगाल्लक्षणा पञ्चधा मता ॥ इति ॥ गुणसमुदायवृत्तेः शब्दस्यार्थभागस्तैक्ष्ण्यादिर्भक्तिः, तत आगतो गौणोऽर्थो भाक्तः । भक्तिः प्रतिपाद्ये सामीप्यतैक्ष्ण्यादौ श्रद्धातिशयः, तां प्रयोजनत्वेनो- द्दिश्य तत आगतो भाक्त इति गौणो लाक्षणिकश्च । मुख्यस्य चार्थस्य भङ्गो भक्तिरित्येवं मुख्यार्थबाधा, निमित्तं, प्रयोजनमिति त्रयसद्भाव उपचारबीज- वह 'भक्ति' है; अभिधेय के द्वारा (तटादि का) सामीप्यादि धर्म (उत्प्रेक्षित होता है), उस (सामीप्यादि निमित्त) से आगत (प्रतीत) लाक्षणिक अर्थ (लक्ष्य अर्थ) 'भाक्त' है। जैसा कि कहते हैं— 'अभिधेय के द्वारा सामीप्य, सारूप्य, समवाय, वैपरीत्य और क्रियायोग रूप सम्बन्ध से लक्षणा पांच प्रकार की मानी गई है।' गुणों के समुदाय में वृत्ति वाले शब्द का अर्थांश तैक्ष्ण्यादि ('सिंहो माणवकः' इस स्थल में) 'भक्ति' है उससे आगत (प्रतीत) गौण अर्थ 'भाक्त' है [सामीप्य] और तैक्ष्ण्य आदि प्रतिपाद्य अर्थ में श्रद्धातिशय 'भक्ति' है। उस (श्रद्धातिशय रूप भक्ति) को प्रयोजन के रूप में उद्देश्य करके उससे आगत 'भाक्त' है, इस प्रकार (भाक्त) गौण और लाक्षणिक है। मुख्य अर्थ का भङ्ग 'भक्ति' है। इस प्रकार मुख्यार्थ की बाधा, निमित्त और प्रयोजन इन तीनों का सद्भाव उपचार का बीज' है, यह बात 'लक्षणा' ही है। प्राचीनों में विवरणकार उद्भट लिखते हैं—'शब्दानामभिधानं अभिधाव्यापारो मुख्यो गुणवृत्तिश्च।' आचार्य वामन लिखते हैं—'सादृश्याल्लक्षणा वक्रोक्तिः।' इस प्रकार आचार्य ने नित्य प्रवृत्त वर्तमान के अर्थ को सूचित करने वाला 'आहुः' इस लट् लकार का सार्थक प्रयोग किया है। १. 'भक्ति' शब्द की व्युत्पत्तियाँ—यहाँ 'भक्ति' शब्द से आलंकारिकों की 'लक्षणा' (शुद्धा और गौणी) दोनों ग्राह्य हैं। जिस 'लक्षणा' को आलंकारिकों ने सादृश्येतर सम्बन्ध से शुद्धा और सादृश्य सम्बन्ध से गौणी माना है उसमें मीमांसकों ने केवल 'गौणी' को लक्षणा से भिन्न वृत्ति स्वीकार किया है। मीमांसक लोग 'गौणी' को एक अलग वृत्ति ही मानते हैं जो 'लक्षणा' से अतिरिक्त है। इस लिए 'भक्ति' शब्द से दोनों लक्षणा और गौणी (अर्थात् शुद्धा लक्षणा और गौणी) दोनों अभिहित होते हैं। लक्षणा या गौणी के लिए एक दूसरा शास्त्रीय शब्द 'उपचार' भी प्रसिद्ध है। जब कि उपचार 'लक्षणा' के ये तीन बीज-मुख्यार्थ की बाधा, निमित्त और प्रयोजन—जहाँ होंगे वहीं लक्षणा होगी, और प्रस्तुत 'भक्ति' भी चूंकि 'लक्षणा' ही है तो सामान्यतः 'भक्ति' शब्द भी 'लक्षणा' के उक्त बीजों में संगत होना चाहिए, इस अभिप्राय से लोचनकार ने 'भक्ति' शब्द की व्युत्पत्तियाँ लक्षणा-बीज के अनुकूल की हैं। (क) 'निमित्त' परक व्युत्पत्ति—भज्यते सेव्यते पदार्थेन प्रसिद्धतयोत्प्रेक्ष्यत इति भक्तिः । (ख) 'प्रयोजन' परक व्युत्पत्ति—भक्तिः प्रतिपाद्ये सामीप्यतैक्ष्ण्यादौ श्रद्धातिशयः ।

३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् मित्युक्तं भवति । काव्यात्मानं गुणवृत्तिरिति । सामानाधिकरण्यस्यायं भावः— यद्यप्यविवक्षितवाच्ये ध्वनिभेदे 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्यादावुपचारोऽस्ति, कही गई। काव्यात्मा (ध्वनि) को 'गुणवृत्ति' (कहते हैं) - । सामानाधिकरण्य¹ का भाव यह है—यद्यपि 'अविवक्षितवाच्य' नामक ध्वनि के एक भेद 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' (ग) 'मुख्यार्थबाध' परक व्युत्पत्ति—मुख्यार्थस्य भङ्गो भक्तिः। इन तीनों की हिन्दी 'लोचन' के प्रस्तुत हिन्दी-अनुवाद में अक्षरशः कर दी गई है। साथ ही लोचनकार ने मीमांसकों के अनुसार अलग से 'गौणी' के लिए भी 'भक्ति' की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है— गुणसमुदायवृत्तेः शब्दस्यार्थभागस्तैक्ष्ण्यादिर्भक्तिः । इस प्रकार 'भक्ति' शब्द से 'लक्षणा' और 'गौणी' दोनों वृत्तियाँ ग्राह्य हैं। और, 'तत आगतः' इस पाणिनीय नियम के अनुसार इस प्रकार की लक्षणारूप या गौणीरूप 'भक्ति' से प्रतीत होने वाला लाक्षणिक या गौण अर्थ प्रस्तुत में 'भाक्त' कहा गया है। यही है 'भाक्तमाहुस्तमन्ये', अर्थात् अन्य लोग उस ध्वनि को भाक्त अर्थात् लाक्षणिक या गौण अर्थ कहते हैं। शुद्ध लक्षणा का प्रचलित उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' है तथा 'गौणी' का प्रसिद्ध उदाहरण है 'अग्निर्मााणवकः'। कहा जा चुका है 'उपचार' वहीं होता है जहाँ उपर्युक्त 'बीज' हों। गङ्गा में घोष इसलिए सम्भव नहीं कि गङ्गा एक जल का प्रवाह है, नदी है, इसलिए प्रवाह में घोष (गाँव या बथान) नहीं रह सकता, यह मुख्यार्थ की बाधा है। चूंकि गङ्गा के समीप गङ्गा का तट है और उस पर घोष रह सकता है इसलिए 'गङ्गा' का सामीप्यरूप निमित्त से तट अर्थ ग्रहण किया गया इस 'तट' रूप अर्थ के ग्रहण से वक्ता के 'प्रयोजन' रूप शैत्य और पावनत्व की सिद्धि होती है अर्थात् 'गङ्गायां घोषः' इसके वक्ता का प्रयोजन यह प्रतीत होता है कि गङ्गा के बिलकुल किनारे घोष है जिससे गङ्गा के सभी शैत्य, पावनत्व आदि गुण 'तट' में ही प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यहाँ लाक्षणिक या लक्ष्य अर्थ 'तट' माना गया। यही स्थिति 'गौणी' में भी होती है। उदाहरण है—'अग्निर्मााणवकः' अर्थात् बालक अग्नि है। यहाँ मुख्यार्थबाध होता है कि बालक अग्नि कैसे है ? तब 'गौणी' द्वारा 'तीक्ष्णतारूप गुण' 'अग्नि' के अर्थभाग के रूप में माना गया (यहाँ यह स्वीकार करना पड़ता है कि अग्नि का गुणरूप अर्थ 'आक्षेप' से नहीं बल्कि 'गौणी' शक्ति से प्रतीत होता है। यहाँ 'तैक्ष्ण्य' रूप गुण 'प्रयोजन' है, जिसकी सिद्धि के लिए 'अग्नि' यह प्रयोग किया गया है। साहित्य-शास्त्र में प्रसिद्ध 'मुखं चन्द्रः' यह रूपक अलङ्कार का उदाहरण भी इस 'गौणी' का ही विषय है। ऊपर कहा जा चुका है कि यह मीमांसकों के अनुसार ही भिन्न वृत्ति है, अन्यथा इसे 'लक्षणा' का ही एक भेद साहित्य में माना गया है। [ ] इस चिह्न से अङ्कित 'सामीप्य' शब्द 'लोचन' के विचारकों के अनुसार 'प्रामाणिक' पाठ है। यह लेखक-प्रमाद के कारण सर्वत्र मुद्रित मिलता है। पण्डितों का कहना है कि 'सामीप्य' लक्षणा के प्रसिद्ध स्थल 'गङ्गायां घोषः' में किसी प्रकार 'प्रतिपाद्य' या प्रयोजन नहीं हो सकता। क्योंकि उपर्युक्त कारिका को उद्धृत करते हुए लोचनकार ने स्वयं 'सामीप्य' आदि को 'निमित्त' ही माना है। कुछ लोगों ने इस 'सामीप्य' को भी 'पावनत्व' के अर्थ में घसीटने का प्रयत्न किया है जो अस्वाभाविक लगता है। इसके साथ का दूसरा प्रयोग 'तैक्ष्ण्य' गौणी के उदाहरण 'अग्निर्मााणवकः' का प्रयोजन बन जाता है, अतः ठीक है। १. 'भाक्तमाहुस्तमन्ये' इस मूल ग्रन्थ का व्याख्यान वृत्तिग्रन्थ में 'अन्ये तं ध्वनिसंज्ञितं काव्या-

: प्रथम उद्योतः ३३ लोचनम् तथापि न तदात्मैव ध्वनिः, तद्व्यतिरेकेणापि भावात्, विवक्षितान्यपरवाच्य- प्रभेदादौ । अविवक्षितवाच्येऽप्युपचार एव न ध्वनिरिति वक्ष्यामः । तथा च वक्ष्यति— भक्त्या बिभर्ति नैकत्वं रूपभेदादयं ध्वनिः । अतिव्याप्तेरथाव्याप्तेर्न चासौ लक्ष्यते तथा ॥ इति ॥ कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम् । इति च । गुणाः सामीप्यादयो धर्मास्तैक्ष्ण्यादयश्च । तैरुपायैर्वृत्तिरर्थान्तरे यस्य; तैरुपायैर्वृत्तिर्वा शब्दस्य यत्र स गुणवृत्तिः शब्दोऽर्थो वा । गुणद्वारेण वा वर्तनं गुणवृत्तिरमुख्योऽभिधाव्यापारः । एतदुक्तं भवति—ध्वनतीति वा, ध्वन्यत इति वा, ध्वननमिति वा यदि ध्वनिः, तथाप्युपचरितशब्दार्थव्यापा- इत्यादि स्थल में 'उपचार' है, तथापि ध्वनि उपचारात्मा ही नहीं है, क्योंकि उपचार के अभाव में भी ( ध्वनि ) होता है । और विवक्षितान्यपरवाच्य रूप ध्वनि के प्रभेद आदि में । अविवक्षितवाच्य ध्वनि में भी उपचार ही होता है ध्वनि नहीं, यह हम कहेंगे । और उस प्रकार ( मूलकार ) कहेंगे— 'यह ध्वनि रूपभेद के कारण भक्ति के साथ एकत्व प्राप्त नहीं करता । अतिव्याप्ति और अव्याप्ति के कारण उस प्रकार यह लक्षित नहीं होता । हां, ध्वनि के किसी भेद का वह ( भक्ति ) उपलक्षण हो सकती है ।' सामीप्यादि धर्म और तैक्ष्ण्यादि धर्म गुण हैं । उन निमित्त रूप उपायों द्वारा अर्थान्तर में जिसकी वृत्ति हो, अथवा उन उपायों द्वारा वृत्ति हो, शब्द की जहाँ, वह 'गुणवृत्ति' शब्द अथवा अर्थ है । गुण के द्वारा वर्तन गुणवृत्ति, अमुख्य अभिधा व्यापार है । यह बात कही गई—यदि ध्वनन करता है ( ध्वनतीति ), अथवा ध्वनित होता है ( ध्वन्यत इति ), अथवा ध्वनन, यह ध्वनि है तथापि उपचरित शब्द, अर्थ और व्यापार के अतिरिक्त वह कुछ नहीं है । मुख्यार्थ में तो अभिधा ही होती है और अन्त में त्मानं गुणवृत्तिरित्याहुः' इन शब्दों में किया गया है । यहाँ प्रश्न उठता है कि 'ध्वनि' और गुण- वृत्ति दोनों का सामानाधिकरण्य बताया गया है । इसका यह तात्पर्य समझना चाहिए कि जहाँ गुणवृत्ति होती है वहाँ ध्वनि होता है, इसका यह तात्पर्य नहीं कि गुणवृत्ति रूप ही ध्वनि है अर्थात् जहाँ गुणवृत्ति है वहाँ ध्वनि है । प्रस्तुत ग्रन्थ में आगे चल कर ध्वनि के दो भेद बताये गये हैं—अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य । अविवक्षितवाच्य ध्वनि का उदाहरण दिया गया है—'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्यादि । यहाँ तो उपचार या गुणवृत्ति है, अर्थात् यहाँ ध्वनि के साथ गुणवृत्ति का सामानाधिकरण्य ( एक ही अधिकरण में उपस्थिति ) बन जाता है किन्तु इस सामानाधिकरण्य का यह अर्थ नहीं कि ध्वनि को कोई उपचारात्मा ही कह डाले । कारण कि ध्वनि वहाँ भी होता है जहाँ उपचार बिलकुल नहीं होता, जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के प्रभेद आदि में । इस प्रकार ध्वनि का गुणवृत्ति के साथ सामानाधिकरण्य तो बन सकता है तादात्म्य या एकरूपता नहीं बन सकती । इसी बात को 'भक्त्या बिभर्ति०' इत्यादि कारिका ग्रन्थ से भी निर्देश किया है । यह विषय आगे और भी स्पष्ट होगा । ३ ध्व०