ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
{llr | llr} क्रमांक & विषय & पृष्ठ & क्रमांक & विषय & पृष्ठ
४१ & सात्विक त्याग & ७२८ & ५६ & सोलहवे अध्यायकी समालोचना & ६६९
४२ & सात्विक दान & ६९४ & ५७ & स्वधर्म अनादि और अनिवार्य है & ८४
४३ & सात्विक धृतिके लक्षण & ७७५ & ५८ & स्वधर्ममें मृत्यू भी श्रेष्ठ है & ९९
४४ & सात्विक बुद्धिके लक्षण & ७७२ & ५९ & स्वधर्माचरणकी अपूर्व स्वर्णसंधि & ५३
४५ & सात्विक यज्ञका विवेचन & ६८५ & ६० & स्वभाववादियोंकी दृष्टिसे आत्मानात्म विवेक & ४३४
४६ & सात्विक श्रद्धावाला शास्त्रोंका अनुकरण करता है & ६७७ & ६१ & स्वरूप विस्मरण ही अज्ञान है & ४३६
४७ & सात्विक सुखका विवेचन & ७७९ & ६२ & स्वाध्याय & ६३३
४८ & साधना अधुरी रही तो & १९३ & ६३ & स्थितप्रज्ञके लक्षण & ६५
४९ & साधनावस्थाका विवेचन & ८०१ & ६४ & स्थितप्रज्ञताकी जिज्ञासा & ६४
५० & सुख दुःखका स्वरूप & ५०० & ६५ & स्थैर्य & ४७०
५१ & सुख भोगकेलिये पापसे धन संचय & ६५६ & ६६ & स्थैर्य & ६४१
५२ & सुन कर स्व-अज्ञान जन्य मोह दूर हुवा क्या ? & ८४६ & ६७ & स्वैराचार & ४८७
५३ & सूत्र रूपसे पिछले नौ अध्यायोंका उप संहर & ३०० & ६८ & हरिकृपाका वर्णन & ३९
५४ & सेवाका मूल्य प्रसाद दान & ८६८ & ६९ & हिंसा & ४८५
५५ & सोलहवे अध्यायका समारोप & ६७१ & ७० & हे आदि अनादि पुरुष क्षमा कर & ३८८
\begin{center} ❧ ॐ ❧ \end{center}
ज्ञानेश्वरीके विशेष अध्ययनके लिये विषय - विश्लेषण ❖❖❖❖❖ ज्ञानेश्वरीकी एक विषयसूचि पहले दी है। वह सामान्य विषयसूचि है। विशेष अध्येताओंके लिये दूसरी एक विषय सूचि यहां दी जाती है। इससे ज्ञानेश्वरीमें कौन कौन विषय किस अध्यायके किन ओवियोंमें आये हैं इसका पता चलेगा। इसमें १४० के करीब मुख्य विषय चुनकर फिर उनके उपविभाग किये गये हैं। विषयके जो अंक हैं वे काले-बोल्ड-टाइपमें अध्यायके और सादे-पायका-टाइपमें ओवियोंके हैं। जैसे 'अक्रोध' १६ : १२५-१२९ ओवी संख्या । ॐ \t अनिंदा १६ : १४१-१५२ नमन- १ : १, २-२० \t अभ्यासयोग- नामका उपयोग- १७ : १५७-१६७ \t -का सामर्थ्य ८ : ८१-८५, १२:१११-११३ ब्रह्मका नाम- ८ : ११८, १७ : ३४३ \t -का स्वरूप ६ : ४१९-४२६, १२:९७-११० अक्रोध- १६ : १२५-१२९ \t अमानित्व १३ : १८४-२०० १६ : २०५ अचापल्य- १६ : १८३-१८५ \t अमृत- अद्रोह- १६ : १९९-२०३ \t -का दुर्लभत्व २ : २४० अधिभूत- ८ : ३०-३२ \t -का परिणाम १ : ७७ 'अध्यात्म- \t -की उत्पत्ति १८ : १४७६-१४७७ -की महत्ता ११ : ४४-४७ \t परमामृत २ : ६७, १० : १९४-१९८ -की परिभाषा ८ : १८-१९ \t प्राकृत १० : २२०-२२५ -ज्ञाननित्यत्व १६ : ६१५-६२० \t अर्चिरामार्ग- -विद्या १० : २६६ \t -का स्वरूप और फल ८ : २२०-२२५ अध्यायसंबंध- \t अर्जुन- पहला और दूसरा १ : २७४-२७५ \t -का कृष्णसे सख्य १ : ५३७-५५४ दूसरा और तीसरा २ : ३७१-३७३ \t -का कृष्णसे समरसैक्य १०:२९३-२९४, तीसरा और चौथा ३ : २७४ \t १३ : ११४५ १५ : ४५५, १५ : ४५८, पांचवां और छटा ५ : १७७-१७८ \t १८ : १३४८ सातवां और आठवां ७ : १६९-२०५ \t -का निर्मोह, ११ : ४९-६८, १८ : नौंवां और दसवां १० : ४९ \t १५५८-१५६६ दसवां और ग्यारहवां १० : ३३०-३३५ \t -का पूछनेका चातुर्य ७ : २०३-२०४ ग्यारहवां और बारहवां ११ : ७०२-७०६ \t -का शौर्य १:२०१, २ : ८-११, ११ : तेरहवां और चौदहवां १४ : ३३-३८ \t ३८७, १८ : १२९५-१२९६ पंद्रहवां और सोलहवां १६ : ४९-६३ \t -की अनन्यभक्ति २ : ५८-६०, ३ : २१- सत्रहवां और अठारहवां १८ : ६०-७४ \t २९, ९ : २६३-२६२ १० : १८३-१८४ अध्यायसंगति १० : २४-२९, १८ : १४५५ १४५५ ३७ \t विषय-विश्लेषण
-की प्रशस्ति श्रीकृष्णसे १ : २२९, ४ : २८-३०, ६ : १४८-१५१ ९ : ३६-४१, १० : ५६-६१ १५ : ४४७-४५२ १५ : ५७७-५८१, १६ : २६९-२७० -संजयकी ओरसे ४ : ७-१५, ११ : १६५- १७५, ११ : ६४१-६४६, १७ : ४२७- ४३०, १८ : १४७०-१४७२ -ज्ञानेश्वरकी ओरसे ६ : १२०-१३०,८ : ८-१४,१८ : १६८६-१६८९ -की विरक्ति १० : १४५-१८४,११ : ५५५-६०८ -के विशेषण २ : ८-११, १२ : २०, १७ : ३१-३३ -मोहग्रस्त १।१७७-२०६, ११:४९-६१ से कृष्णका प्रेम १ : १४१-१४३, ५ : १६७-१७३, ६ : १४६, १० : ५३-६०, ११ : ३९-४३, १८ : २८२-२८५, १८ : १३४७-१३५१, १८ : १३६८-१३७८, १८ : १३८६-१३८३. १८ : १४१८-१४२५ अलोलुप्त्व १६ : १६३-१६७ अवतार- -का कारण ४ : ४९-५१, १० : २५२ -का कार्य ४ : ५२-५७, १० : २५३- २५४, -की पूर्वस्थिति ६ : ३२०-३२३, ११ : ८३-८५, ११ : १८०-१८१, ११ : ६१४-६१५, १३ : १०७२-१०७४, १३ : ११४०-११४१, १५ : ३१२-३१६ अवस्था- उन्मनी ६ : ३०९-३२०, १५ : ५३३-५४१, जागृती १ : २४६, १८ : ४०४-४०५, १८ : ११०४ निद्रा १८ : ३८१, १८ : ४०३,१२ : ५४०
सुषुप्ति १५ : ५२६ स्वप्न ५ : ५३-५४, ८ : ७३ असक्त बुद्धि-१३ : ५९३, १८ : ९५६-९५९ अहंकार- -का कार्य ३ : १७७-१७८, ३ : १८४- १८५, ७ : १६५-१७१ १८ : १०५१, १८ - १२७४-१२७७ -का स्वरूप १३ - ७७-८३, १३-७१४-७२७, -की उत्पति १४ : ९२, नाहंकृतिभाव ५ : ३८-६३, १८ : ४०१-४२१ निरहंकार १३ : ५२४-५३३, अहिंसा-१३ : २१७-३१०, १६ : ११४, अक्षर- प्रणव ८ : ११०-११८, ब्रह्म ८ : १५-१७, लक्षण ८ : १००-१०३, ८ : १८०-१८३, . अज्ञान-४ : ६८-७०, १४ : १२९-३३, -का कार्य १५ : १३८, १५ : ३४२, १६ : ४३-५१, १८ : ३२६, १८ : ४६०, १८ : ५४१, -का त्याग ५ : ८३; १८ : १३९०-१३९५, -का स्वरूप १४ : ७०-७९, १६ : २४६-५१, -के लक्षण १३ : ६५६-८५१, -परमात्म विषयक ५ : ८२, ९ : १५५-१७० आचार्योपासना-गुरुसेवा- आचार्य-वर्णन, १३ : ३७१-४५३, १४ : १ गुरुका प्रेम १३ : ४५५-४५७, १५ : १९-२६ गुरुका भजन ४ : १६५-१६७, १८ : १५६२-१५७५
ज्ञानेश्वरी ३८.
गुरुका सामर्थ्य- १ : ७७-७९, इच्छा- १८ : १७२३-१७३४ -का कार्य १३ : ९६८ गुरुकृपाका फल १ : ७५, ६ : ३२-३६, -का स्वरूप ७ : १६५-१६६, १८ : १७३४, १३ : १२२-१२५ गुरुकृपाकी आवश्यकता १० : १५३-१७२, इंद्रियां- गुरुके लक्षण १७ : २०८, कर्मेंद्रिय १३ : १००-१०२ गुरुसेवाका फल ४ : १६२, १३ : ३६९, -का दमन २ : ३५७, ३ : २६८, १५ : ९-१६, १८ : ७८५-७८७, १८ : ८३५, आत्मा- १८ : १०१७, अगम्य २ : २६८-२७५, -की आधीनता २ : १११-१२०, -का अकर्तृत्व १३ १०८२-११२८, १३ : १३९-१४२, १३ : २०२-२१२, १८ : २६८-२७५, १८ : ५१५-५१६, -की दृढता २ : ३१०-३१४, -का अनुभव २ : ७२-७६, २ : ३४८-३५० ६ : ३६९-३७२, -के लक्षण १८ : ५०६ -का उद्धार ६ : ६८-८१, -के विषय १३ : ११७-१२० -का स्वरूप २ : १२५-१७१, जितेंद्रिय २ : १२३-१२४, १३ : ११०६-११२०, २ : ३०१-३०९, २ : ३१५-३१६ -प्राप्तिके उपाय १८ : ३९७-४००, २ : ३५१-३५२, ६ : ६२, ६ : ९०-९१, प्राप्तिके रोडे ४ : १९-२६, ज्ञानेंद्रियां १३ : ९१-९९, -लाभ १८ : १२५९, ईश्वर- आत्मानात्मविचार-२ : १२६-१३३' -और भक्तका कार्य ६ : ३२४, १३ : १०३६-१०३८, ८ : १२७-१३०, १० : १३३-१४७, १३ : ११३५-११४२, १५ २९६, १२ : ८२-९५ १५ : ३८१-३९०, -और २ भक्त लंपटता १ : १४२-१४३, आप- ४ : १६४, ५ : १०५, ६ : १३१, १२ : १५६-१५७ ५ : ११०-११२, ६ : ७१, ८ : ६०, १२ : २१४-२२९, १२ : २३४-४०, १४ : ३१७, १५ : २६७, और भक्तका योगक्षेम ९ : ३३५-३४३ १५ : २७४, १८ : ८४२-८४३, कर्मकर्ता ३ : १६०-१६७, आर्जव- १३ : ३५४-३६६, १६ : ११३, का अकर्तृत्व ५ : ७६-८१ १८ : ८४२-८४३, -का अवतारकार्य ४ : ४९-५७, आहार- १० : २५२-२५४, -का महत्व १७ : ११२-११५ -का औदार्य ११ : ९८-१०७, -के प्रकार तामस १७ : १५३-१५९ -दुर्लभत्व ४ : ८-१३, ६ : १४६, राजस १७ : १३९-१५२, -का प्रसाद १८ : २१८-२२१, सात्विक १७ : १२५-३७ १८ : १६६९-१६७३ साधकका ६ : ३४९, १८ : १०२४-१०२७ १८ : १३२०-१३२२, अन्नका महत्व ३ : १३३-१३५ १८ : १३८३-१३८७, ३९ विषय-विश्लेषण
१८ : १४०९-१४१५, —का सगुण रूपवर्णन ११ : ६००-६०८ —का वर्णन १८ : १२९९-१३०४ —का स्तवन अर्जुनसे १० : १४४-१८४, ११ : ९८-१०९, —की अगम्यता ५ : १७४, १० : ६४-७१ —की व्यापकता १० : २१५-३०७ —के गुण २ : २९०, ३ : २८, ६ : ३७-३८ १२ : २३९-२४४, १७ : ४२३ —के विशेषण ९ : २७८-२९५ —प्राप्तिकी साधना ९ : ४३०, ९ : ४६५-४६६, ९ : ४७०-४७१, ९ : ५१६, १० : ७२-७३, ११ : ६८५-६८८, ११ : ६९६-६९८ १२ : ३५-३८, १२ : ४०-८१, १२ : ९८-१४०, १८ : ९१४-९२२, —शरणागति १८ : १३१९, १८ : १३९८-१४०० —साक्षीभूत ९ : १२९ —स्वरूपकी व्यापकता ७ : ३३-३९, ७ : १५९-१६४, ९ : २६५-३०२, १० : ८२-११४, १० : २६३-२६४, १० : ३१७, ११ : २७१-२७७ १४ : ३७३-३८०, १५ : ३९७-४२१, उपाधि— अक्षरपुरुष १५ : ५०२-५१९ निरुपाधिकतत्त्वके ज्ञानके लिये २ : १४८-१५०, ८ : १७९-१८१ ८ : १९४, १५ : ४६४-४७०, १५ : ५२५-५५७ एकांतसेवा ६ : १६४-१७९, १३ ; १९८-१९९, १३ : ५१८-५१९ १३ : ६१२-६१३, १८ : १०२२-१०२३, ऐश्वर्ययोग— ९ : ७१-९२, कर्ता— —का स्वरूप ३ : १७८, १८ : ३२१-३२६, —के प्रकार तामस १८ : ६६२-६८८ ” राजस १८ : ६६०-६६१ ” सात्विक १२ : ६३१-६४८ —ज्ञानी १८ : २१२-२१४ कर्म— —अपरिहार्य ३ : ५६-६३ कर्माकर्म विवंचना ४ : ८५-९८ काम्य— १८ : ९८-१०५ —का कारण और हेतु १८ : ३१५-३७६ का फल ३ : १५१, १८ : १२२-१२३, १८ : १३९, १८ : १५८-१६३, —का फलत्याग १८ : १२४-१२६, १८ : २५७-२६७, —का फलत्याग न करनेवाला ७ : १५१-१५८ —का योग-रूप साधन ६ : ५४-६०, —की प्रचोदना १८ : ४६१-४७७, —की व्याख्या ४ : ८९, ८ : २७-२९, १८ : ५०७-५१४, —कुशलता १७ : ३४६-३५२, १८ : १६४-१७७ —के विविध फल १८ : २३३-२५६, —तामस—१८ : ६११-६२६ नित्य—१८ : ११५-११७, निषिद्ध—४ : ९१ नैमित्तिक—१८ : ११०-१११ नैष्कर्म्य ४ : ९३-९८, १८ : १५४, १८ : ९७०-९८३, १८ : २२७-२३२. प्रायश्चित्त—१८ : १०१७. —फल ईश्वरार्पण १८ : २२७-२३२. फल हेतुरहित—२ : २६४-२७७, २ : २७८-२७९ ३ : ६८-७५. —बंध ३ : १८४-१८५, ८ : २०५ ज्ञानेश्वरी ५०
बिना नामकां- १७ : ४१४-४२२ ब्राह्मण- १८ : ८३३-८५४, मिथ्याचार ३ : ६४-६६ योग- ३ : ३७, ३ : ४४, ५ : १६-१७. राजस- १८ : ५९०-६१० लोकसंग्रहार्थ- ३ : १५४-१९५, ३ : १७३-१७६ विकर्म ४ : ९० विभूति-७ : ४६-५१ विहित-३ : ११८-१२६, १८ : १४९-१५३ वैश्य-१८ : ८८०-८८२ शास्त्रोक्त-१८ : ८८८-८९३ शूद्र-१८ : ८८३. -संग्रह १८ : ४७८-५१५ सात्विक-१८ : ५८६-५९३ क्षत्रिय-१८ : ८५६-८७८. कामक्रोध- -का परिणाम- ३ : २६०-२६२, १६ : ४४५-४५४. -का वर्णन ३ : २१-२८, ३ : २३९-२५९, १६ : ३२७-३४२ १६ : ३९५-३९६, १८ : १०५७-१०६१. -का सामर्थ्य ३ : २३२-२६६. -के त्यागका कारण १६ : ४२५-४३६ -के त्यागका फल १६ : ४३७-४४४ -को जीतनेका उपाय ३ : २६७-२७० कीर्तन- अप्राप्य ९ : २०६ -का फल ९ : १९५-२०५, ९ : २०७-२०९. -का स्वरूप ९ : २१०, १० : ११९-१२९, कुंडलिनी- -का परिणाम ६ : २६०-२९०, ९ : २१४ -का मार्ग १२ : ४८-५७ १८ : १०३६-१०४० -का स्वरूप ६ : २२२-२५० -की शक्ति ६ : २५१-२५९. कृतार्थता-३ : १४७-१४८, ७ : १११, ७ : १७६-१७७, १५ : १८५-१८७, १८ : १५६२-१५७१. क्रमयोग- १८ : १०११-११११ गणेश- १ : १-२०, १० : १२४, १३ : १, १७ : १-८. गीता- -और कर्म १८ : १४३७-१४३९. -और ज्ञान १८ : १४४६-१४५१ -का उपासनाकांड १८ : १४४०-१४४५ -का फल १८ : ४८, १८ :१६९६. -का माहात्म्य १ : ५०-५५, १८ : ३०-५९ १८ : १६६०-१६८९. -का संप्रदाय १८ : १४७५-१५०९. -की गहनता १ : ७०-७१, ११ : २६-२७, -की वेदोंसे तुलना १८ : १४५६-१४६२, १८ : १५१०-१५११. -के अधिकारी १ : ५६-६०, ६ : २२-३०, ९ : ३६-४० १२ : २३०-२३३, १५ : ५८१, १८ : १७४९ -के अनधिकारी ६ : १९४-१९६. -के विषय १८ : १२४३-१२४४. -वेदका मूल है १८ : १४२६-१४६६ गुण- -और बंध १४ : १४६-१४८, -और मरणोत्तर गति १४ : २५६-२५८, रज १४ : २७२-२७३, १४ : २३८-२४२ सत्व १४ : २१४-२२५, १४ : २७१. -और गुणातीत १४ : ३२७-३६९. -की उत्पत्ति : १४ १३९-१४५, तम-१४ : १७४-१९५, १४ : २५५-२५९. १५ : १६३-१७४. रज-१४ : १६०-१७३, १५ : १५५-१६२, सत्व-१४ : १४९ १५९, (4) ४१ विषय-विश्लेषण
१५ : १८४-२०५. —की वृद्धि— तम १४ : २४४-२५४ रज १४ : २२७-२३६ सत्व १४ : २०५-२१३, —की व्याप्ति १७ : ५६-६० १८ : ८१४-८१७ —से मुक्त होनेका मार्ग १४ : ३०१-३०८ १४ : ३७१-४०० चित्त— आत्म-रत ३ : १८३, ५ : ३४-३६, ५ : १४८ ईश्वर-रत १८ : १२६७-१२६९ —शुद्धि १८ : १५५-१६०. चिंता— ईश्वरविषयक—६ : ४४७. लौकिक १६ : ३३०-३३३. जगत्— —का स्वरूप १८ : २३८-२३९ —की उत्पत्ति १४ : ६६., १० : ९७-११६ जन्म-मृत्यु— —अनिवार्य है २ : १५९-१६०, १८ : १०१ —का अनुदर्शन १३ : ५३६-५५४, १६ : १७५-१८६ —का स्वरूप १८ : १२८०. जरा— अनुदर्शन १३ : ५५५-५८६ —का वर्णन १३ : ७५६-७६०. जीव— अविद्याग्रस्त—७ : ६०-६७. कर्ता—१८ : ४९०-५०५. —का पुनर्जन्म १५ : ३६१-३६७. —का स्वरूप १८ : ३२१-३२६, अलिप्तता १४ : ३४८-३५०. —स्त्रीके विषयमें १५ : ३६८-३७२. परमात्मासे ऐक्य प्राप्त—६ : ७१-८४, ६ : ४८०, १२ : १५३. प्रकृतितत्त्व—१५ : ३५२-३६०. तत्— —नामका उपयोग १७ : ३७०-३७३. तत्त्वज्ञानार्थदर्शन—१३ : ६२३-६३१. तप— —का स्वरूप ४ : ६५, १६ : १०५-११२, १८ : ८३७. —तामसिक १७ : २५४-२६२, —मानसिक १७ : २२७-२३७ राजसिक १७ : २४२-२५७ वाचिक—१७ : २१६-२३३ शारीरिक—१७ : २०२-२१४. सात्विक— १७ : २४०-२४१, तेज १६ : १८६-१९०, १८ : ८५८-८६० त्याग— —का स्वरूप १६ : १३१-१३५, १८ : ९२ तामसिक— १८ : १७८-१८३, राजसिक— १८ : १८४-१९८ सात्विक— १८ : १९९-२१६, दंभ— ३ : २५०, १३ : ६५८-६६०, १६ : २१७-२२३ —त्याग ( अदंभ ) १३ : २०२-२१५, दम— १६ : ८९-९३, १८ : ८३५-८३६, दया— १६ : १५४-१६२, दर्प— १६ : २२४-२२९, १६ : ३९३-३९४, १८ : १०५५-१०५७, दान— —दैवीगुण १६ : ८५-८८, —क्षत्रियोंमें १८ : ८६९-८७०, तामसिक १७ : २९४-३०७, —राजसिक १७ : २८४-२९३ —सात्विक १७ : २६६-२८३, दुःख— —का अनुदर्शन १३ : ५९०-५९१ —का कारण २ : १११-११९, ज्ञानेश्वरी ४२
५ : १२०-१२६ ७ : १६५-१७१, १५ : ११४-१२०, १८ : १२७० -का स्वरूप १३ : १३२-१३३, -के नाशके उपाय ६ : ३६९-३७२, देह- -का आत्मासे संबंध १३ : १०९५ ११०३, -का विचार २ : १०३-११०, २ : १५९ १६९ -का स्वरूप ८ : १४०-१५०, १३ : ११०४ १५ : ३०३-३७५ देहात्मवादी ३ : १२६-१२९, १६ : १९९-३०२, १८ : १८८-१९१, १८ : ३८१-३९४, देहात्मवादका परिणाम ७ : १६५-१७१, १८ : १२७४-१२८०, दैव- -का कार्य और लक्षण ६ : ३५४, १५ : २२, १८ : ४९६, १८ : १२९६-१२९८, १८ : १३४४, देवताके रूपमें ५ : ९०, १८ : ३४४-३५२, -प्रतिकूल ११ : ४१२, १८ : ७२५, -भाग्य आत्मलाभका १३ : ५२२ -भाग्य ज्ञानका १३ : १०६७, १३ : १०७८, द्वंद्व-
- का कारण ७ : १६७-१७०, -का कार्य १५ : २९१-२९५, -से मुक्त ७ : १७२-१७९, १२ : १६५-१६९, १४ : ३५०-३५७, धर्म- -का पालन ३ : ११९-१२५, १८ : ९०६-९१३ -का पालन न करनेवाला ३ : १०३-११७, ३ : १२७-१२९, -का फल ३ : ८०-८३, ३ : ९४-१०२, ३ : १५१-१५२,
-की रक्षाके लिये अवतार ४ : ४९-५७, १० : २५२-२५४, -की श्रेष्ठता २ : १८०-२००, ३ : २१९-२२९, १८ : ९२३-९३०, -सहेतुक धर्मपालन २ : २२४-२२५, धूम्रमार्ग-८ : २२६-२३६, धृति- -तामस १८ : ७४९-७६३ -दैवीगुण १३ : १४३-१४८, १६ : १९२-१९६, १८ : ७६३-७६५ -राजस १८ : ७४५-७४८, -सात्विक १८ : ७३३-७४४, -क्षत्रियकी १८ : ८६१, ध्यान-
- का फल १२ : १३८ -की श्रेष्ठता १२ : १४१ -योग १८ : १०३१-१०४१, नमन- ॐकार रूपको १ : २०, -गणेश रूपसे १३ : ९, १७ : १-७. -पित्र रूपसे ९ : १-३३. -प्रार्थना रूप ६ : ३१-३६. १० : १-२२, ११ : १-२४ १८ : १-२९ -मातृरूपसे १२ : १-१० -मानसपूजा १५ : १-१८ -सूर्यरूपसे १६ : १-१७ -हेतु १४ : १७. नरक- -का कारण १६ : ३७१-३७४ -का मार्ग १६ : ४३०-४३२ नाथपरंपरा-१८ : १७५१-१७५९. नाम-- -नामका सामर्थ्य १० : ३२१, १३ : ४०१-४०८, -का उपयोग १७ : ३५४-३९९ -की आवश्यकता १७ : ३४५-३५२. -की महिमा १० : २३२-२३३. -सात्विक कर्ममें सहायक १७ : ३१०-३४४
४३ विषय-विश्लेषण
-से अभेद १७ : ४०३ -स्मरण ९ : २०६-२१० निर्गुण १३ : १०७१-१०७४, १३ : ११०७-१११३, १७ : ३२९, १७ : ३६९. पंचमहाभूत-१३ : ७६, १३ : १४३-१४६. परिग्रह-१८ : १०६२-१०६६. पाप- -का परिणाम १ : ११९-१२४, १ : २४५-२६१. -की उत्पत्ति ३ : १२७-१२९, ३ : १४०, ३ : २३६ १३ : ३०-३१, -के नाशका उपाय २ : २२५, ३ : ११९-१२४, ४ : १७२-१७८, पारुष्य-१६ : २४३-२४५ पुनर्जन्म-८ : १५१-१६६ -का अंत २ : १७६, ७ : १७५-१७९, ८ : १९८-३०२ ९ : ४९, ९ : ४०४, १० : १९८, १२ : १३६, १३ : १०३३, १३ : १०४०, १३ : १०४५, १३ : १०७७, १५ : ३२० -के कारण ९ : ४०३. पुरुष-८ : १८२-१८९. -अधिदैव ८ : ३३-३६ -अधियज्ञ ८ : ३७ अव्यक्त ८ : १७९-१८१ -अक्षर १५ : ५०२-५२४. -ब्रह्म ८ : १००-१०३ -उत्तम १५ : ५२५-५५७ -क्षर १५ : ४७८-५०१ पुरुषार्थ- चौथा १४ : ४०१ पांचवा १२ : २१४, १ : २१९, १८ : ८३७ प्रकृति- अपरा ७ : १७-१८ -का कार्य ३ : १७७-१७८, ३ : १८४-१८५, ३ : १९४-१९६, ७ : १९ -का सामर्थ्य १८ : १२७८-१२९६. -का स्वरूप ७ : १५-१६, १३ : १८५-१९८ -की उत्पत्ति १३ : १०७९-१०८१. -की माया १३ : ९८७, १४ : ६०-७०. -पुरुष विचार १३ : ९५९-१०३५. -पुरुष संबंध १३ : ९७९-९८५. -विचार ९ : ९७-१२०. बुद्धि- -का स्वरूप १३ : ८३-८९, १८ : ६९०-६९३. -तामस १८ : ७२४-७२९, -दुर्बुद्धि २ : ३४३-३५५ -बुद्धिभेद ३ : १७२-१७६ -योग २ : २३१-२४२ -राजस १८ : ७१८-७२३. -सद्बुद्धि २ : २३६, २ : २४२, ५ : ८७ १६ : ८० सद्बुद्धिका मार्ग ७ : १२७. -सात्विक १८ : ६९९-७१७. स्थूल-देहबुद्धि ९ : १४१-१४५, ब्रह्म- आनंद- ५ : १३०-१३५, ऊर्ध्व- १५ : ७२-७९, -का स्वरूप ८ : १५-१७, ८ : ६८९, १३ : १०७२-१०७४, १३ : ११४०-११४१, १५ : २६७ -पद ८ : १००-१०३, १८ : १२५८-१२५९, १८ : १३२१-१३२२, परब्रह्म १८ : १००३, -प्राप्तिका उपाय ६ : २८, ८ : १०४-१०६, ८ : १११-११९ १३ : ११२८-११३९, १५ : २६८-३०५ -श्रीकृष्ण २ : २९०, १४ : ४०४, १७ : ३४, १४ : ४०३-४०८ ज्ञेय- १३ : ८६८-९३८, ब्रह्मचर्य- १७ : २११ ज्ञानेश्वरी ४४
महादेव- -का उपदेश ३ : ८५-१३६, -का तप १७ : ३३६-३४१, -की कालगणना ८ : १५४-१५९, को पुनरावर्तन है ८ : १५२, ८ : १६६, भक्ति- अद्वैत- १८ : ११३७-११५१, अंध- ७ : १३८-१५८, अनन्य- ८ : १२४-१२६, ८ : १९२, ९ : ३३५-३३८, ११ : ६९६-६९८, १२ : ३५-३८, १३ : ६०३-६१० अभेद- १० : ११२-११८, १४ : ३८१-३८७, अव्यभिचारी- १४ : ३७२-३८७, अज्ञान जन्य- ९ : १५५-१७१ -कर्ममें भक्ति ९ : ३९८-४०१, ११ : ७६-८१ -का अधिकार सबको ९ : ४४१-४७४, -का फल ४ : ६३-६६, ८ : १२७-१३९, ९ : ३३८-३४३, १० : १३०-१४३, १२ : ८३-९५ -का लक्षण ९ : ४११-४७४, -की आवश्यकता ९ : ४९०-५१६, कीर्तन- ९ : १९७-२१०, --के चार प्रकार ७ : १०९-१११ -के मुख्य कारण भाव ९ : ३६७-३९७, -कैसे करें ९ : ३५९-३६४, ९ : ५१७-५१९, १२ : ९७-१४० १८ : १३५३-१३६१, गहन- ९ : २१२-२१८, गुरुकी- ९ : २२०-२२७, नमन- ९ : २२१-२२९, परा- १८ : ११११-१११७, ( महात्माओंकी ) भजन-भक्ति ९ : १५९-१९६, १० : ११९-१२९, व्यभिचारी भक्ति १३ : ८०७-८२१ सहजभक्ति १८ : ११७३-११८४, ज्ञानयुक्तभक्ति ९ : २३९-२६१, ज्ञानी भक्ति ९ : १४४-२१४, भारत- -माहात्म्य १ : २८-४९ अमर- १ : २०१, ९ : ५८, -जीव १६ : ४, १८ : ७२९, १८ : १३०९ भ्रांति- -का स्वरूप २ : १३३. -निरास १३ : ११३५-११३९, १४ : ३०३-३०४. -परिणाम ६ : ६८, ६ : ७२-७९, ९ : ६०, मद- -तारुण्यका १३ : ७५५-७६०, -धनका १६ : २२७, मन- -का निग्रह १२ : ५०१-५०९, -स्वरूप ६ : ४११-४१७, १३ : १०६-११५ -की दौड-परमात्माकी ओर ८ : ८२-८३, १२ : ९७-१२०. -की दौड विषयोंकी ओर १५ : ३५५-३६०, -प्रसाद १७ : २२५-२३५, -संयम का उपाय ६ : १८४, ६ : ३८०-३८९, ६ : ४१९-४२०, ८ : १११-११३, १२ १०१७-१०१८, माया- -का परिणाम ७ : ६०-६७, -का वर्णन ७ : ६८-८२, १४ : ८८-८९, १४ : ९१-११३, १५ : ८०-८९, -का स्वरूप १४ : ६८-११५, -का सामर्थ्य १ : १०३, तरना कठिन ७ : ८३-९७. तरनेका उपाय ७ : ९७-१०२ मार्दव-१६ : १६८-१७४. मूढ-३ : १७८-१७९, ३ : १९८, ४ : २५, ९ : १४३-१४५. मृत्युलोक ९ : ४९०-५१५. ४५ विषय-विश्लेषण
मोह- —का परिणाम २ : ३२३-३२४, १६ : ३६९-३७०. —की उत्पत्ति ७ : २६७ —से ग्रस्त २ : ७१. मोक्ष- —का इच्छुक १५ : २७७-२७९. —का स्वरूप ६ : ६८-७० —के अधिकारी ६ : ३४२, १८ : ९८८-९९१ —के उपाय ३ : ७७-८३, १४ : ५०-५९, १५ : ३२, १५ : ३५, १७ : ३२७, १८ : १०४६ —बद्ध ३ : ६४-६६. मौन १० : २९८. यज्ञ- —के प्रकार तामस १७ : १८९-१९५, द्वादश ४ : १२३-१४८, १७ : ३६०-३६४. राजस १७ : १८५-१८८. —सात्विक १७ : १७१-१८४. —स्वधर्मरूप ३ : ८६-१३०. जपयज्ञ १० : २३२-२३३ —ज्ञानयज्ञ ९ : २३९-२५९. योग- —अभ्यासस्थान ६ : १६३-१८०. —आसन ६ : १८१-१८५. —का अधिकारी ६ : ३४६. ६ : ३४५-३५६. —का अनधिकारी ६ : ६४४-६४८ का फल ६ : २९३-३१०. —के अंग ६ : ५४-६०. —के कष्ट १२ : ५१-६४. —जीवपरमात्म १२ : १५३-१५५. नाथमतका योगसंकेत ६ : २९१. —योगभ्रष्टकी स्थिति ६ : ४३०-४३७, —योगारूढ ५ : १४८-१६०. ६ : ६२-६५. श्रेष्ठतम—६ : ४७४-४८५. संन्यास कर्मैक्य योग ६ : ३९-५३. सांख्य-५ : २९-३१ —बुद्धि २ : २७३-२७५. राजहंस —९ : ४४, १२ : १२७, १३ : ११४२, १८ : १७१३. राजा ९ : ४५, १० : २३९, १८ : ७३३, १८ : ८४९, १८ : १६३३. लज्जा १३ : ५३५-५४३, १६ : १७५-१८२ लोकसंग्रह— ३ : १५२-१५९, ६ : १६८-१७८, १६ : ४६८. विकार— —की उत्पत्ति १३ : ९६६-९६७ —देहके १४ : ३१५ —क्षेत्रके १३ : ७२-१६०. विभूति—१० : २१५-३०७. विवेक— —कार्य १ : २२, ५ : ८४-८५, ९ : १९०, १४ : २०६-२०८. —का स्वरूप १८ : १६३२. विश्वरूप— —का महत्त्व ११ : ६०९-६२१. —की दुर्लभता ११ : १६५-१७५ —दिखानेका उद्देश्य ११ : ४९७-४९८. —दिव्य दृष्टिकी आवश्यकता ११ : १५४- १६३. —सगुणसे श्रेष्ठ ११ : ६२३-६३७. विषय— —का त्याग वास्तविक २ : ३३१-३३७ —का त्याग मिथ्या ३ : ६४-६६ —कर्मेंद्रियके १३ : ११९-१२०. —का भोक्ता ५ : ११०-११२, १६ : २२१-२२६, —की उत्पत्ति १४ : ९३-९४, —की स्मृति ३ : ३१७-३३० —सुख ५ : ११३-१२०, —सुखका परिणाम ३ : २०१,
ज्ञानेश्वरी ४६
३ : २१०-२१६, विज्ञान ७ : ६, १८ : ८४७, वेद- -का मूल १८ : १४२६-१४३३, -की उत्पत्ति १ : ७२, ९ : २७६-२७७ -परमात्मस्वरूप वर्णनमें असमर्थ ९ : ३७१, १० : ६४, -श्रेष्ठ ९ : ३७० वैराग्य- -का फल १८ : ९०४, -का स्वरूप ८ : ३७३-३७७, १३ : ५१२-५२३, १५ : ३६-३९, १५ : २५६-२५७, १५ : २७७ १८ : ९१८-९२१, -की आवश्यकता १५ : ३९१-४६१, १८ : १०४३-१०४७, -की कठिनाई १८ : ७८२-७८९, -शंकरका १३ : २४-२५, १८ : ७८९ शम- १८ : ८३३-८३४, शरणता- -का फल ९ : ८८, १८ : १४०९-१४१५. -के प्रकार १८ : १३१९, १८ : १३९८-१४०५, १८ : १४१६. शांति- -का साधन ४ : १८९-१९१, ५ : ७१, ९ : ४२९, १८ : १३२०. -का स्वरूप १६ : १३१-१४० १७ : ४२४-४२६, १८ : १०८५. शास्त्र- १६ : २९५-२९७, १३ : ४५५-४६७, १८ : ८८८-८९३, १८ : १४५३. शौच १३ : ४६१-४८३, १६ : १९७-१९८, १८ : ८३९-४०. शौर्य १८ : ८५६-८५७. श्रद्धा- अश्रद्धा ४ : १९३-२०६, ९ : ५७-६१. -का लक्षण ४ : १८७-१९१, १६ : ४६०, १८ : ८४९-८५०. -की व्याप्ति १७ : ६१-७७. -तामस १७ : ७९-८२. -राजस १७ : ७८ -सात्विक १७ : ७६-७७. संजय- -का आनंद १४ : ४१३-४१४, १७ : ४२४-४३०, १८ : १६१३-१६२०. -का भाग्य वर्णन १८ : १५७९-१५८३. -के अष्टसात्विक भाव ९ : ५२५-५३०, १८ : १६०२-१६०६. -पर व्यास कृपा १८ : १६०८-१६१२. सत्- -नामका उपयोग १७ : ३७९-३८५. संत २ : १२६, ३ : ६८-७४, ४ : ९३-११४, ५ : ७३-७५, ५ : १०५-१०६, ९ : १८८-१९६, १४ : ३०८-३१८, १५ : २८४-३०५, १५ : ५५९-५६९, १८ : १३५६. -का संग १५ : ४२२, १८ : १६३२ -का स्तवन ५ : १३६-१४०, १८ : १७७०-१७९१. -स्थितप्रज्ञ २ : २९१-३६७. सत्य- १६ : ११५-१२४. सत्वशुद्धि- १६ : ७४-८०, १७ : २२५-३३५. संन्यास- -आश्रम ६ : ४९-५० -का महत्व १८ : ७०-७१ -का लक्षण ५ : १९-२५ -की व्याख्या १८ : ९२ -ज्ञानप्रधान १८ : २५७-२६७, १८ : १२६०-१२६५ संपत्ति- आसुरी-१६ : २१७-२६३. आसुरी मनुष्यकी-९ : १७२-१८३, १६ : २८१-३०४, आसुरी मनुष्यकी गति ९ : १८४-१८५, १६ : ४०५-४२२, आसुरी सं. का परिणाम १६ : २६२, दैवी-९ : १८८-१९४, -का महत्त्व १६ : २०७-२१२, का स्वरूप १६ : ५९, १६ : ६५-६७, -की परिभाषा १६ : ६६ समचित्तत्व-२ : २६७-२८४, १२ : १९७-२०४ ४७ विषय-विश्लेषण
१२ : २०७-२१०, १३ : ६००-६०१, १४ : ३४९-३६८, १८ : १०१-१२१. समदर्शन ५ : ८७-१०४, ६ : ९६-१००, ६ : ३९१-४१०. ७ : १३६, १३ : १०५६-१०७०. सरस्वती १ : २१, १ : ७८, १३ : ११६७. संसार ९ : ६२, १५ : ३४७ मिथ्या होता है ८ : १९७-१९८, १५ : २४, १५ : ४३, १७ : २०८. सांख्यशास्त्र १८ : ५१९-५२२. सुख- आंतरिक ५ : १३०-१३५ आत्यंतिक ६ : ३६५-३७२. की परिभाषा १३ : १२७-१३१, १८ : ७६७-७७७ के पिछलगू २ : २४४-२५५, ९ : ३०७-३१९ तामस-१८ : ८०६-८०९ राजसिक-१८ : ७९४-८०५ सात्विक-१८ : ७७८-७९३ स्वर्ग-८ : १६०-१६७, ९ : ३२०, १३ : ५९९. स्थैर्य १३ : ४८४-४९९. क्षमा- १३ : ३४०-३५३, १३ : १९१-१९५. क्षेत्र- कालवादका-१३ : ५८-६५ की व्याख्या १३ : ७ जीववादका-१३ : १७-३२. प्रकृतिवादका-१३ : ३३-३९ गीताका-१३ : ७२-१५० संकल्पवादका-१३ : ४०-५१ स्वभाववादका-१३ : ५२-५७. क्षेत्रज्ञ-१३ : ७-८. ज्ञान- अंध-९ : १५५-१७१, १५ : २४८-२५४, १५ : ३७३-३८०. का अधिकारी १५ : ३३-३६. का फल ३ : ४३, ४ : १६९-१७८, ४ : १८९-१९२, ४ : २०७-२०८, ५ : ८३-८५, ५ : ९३-१०२. १३ : १६८-१७३, १३ : १०७४-१०७८, १३ : ११३९-११४२, १४ : ४९-६०, १४ : ११४, १५ : ३०-३२. का सामर्थ्य १६ : ४५, १६ : ५०-५१. की महती ४ : १५८-१६४, ४ : १६९-१८३, ९ : ४७-५२ १४ : ४१-४८. के लक्षण १२ : १४४-२१४, १३ : १८४-२३१, १५ : २८५-३०४. तामस १८ : ५४९-५७८. निष्ठा ३ : ३६. पानेका उपाय ४ : १६५-१३८, ४ : १८७-१८८, ८ : ४८-५२. १३ : १६१-१६४, १३ : १०३६-१०४६, १३ : ११२८-११३८. यज्ञ ९ : २३९-२६१, राजस १८ : ५३८-५४८. विशेष ७ : ५, १३ : ९, १४ : ४८ सात्विक १८ : ५२९-५३७ ज्ञाता सामान्य १८ : ५६१-४६६ सामान्य १८ : ४६६-४७० ज्ञेय सामान्य १८ : ४७२-४७६. ज्ञानीके कर्म १८ : ४२२-४३६ ज्ञेय १३ : ८६२-९३८. ज्ञानेश्वर-ज्ञानेश्वरी- और काव्य ४ : २१२-१२४, ६ : १५-२०, ७ : १०७-२१०, ११ : २-६, १२ : ११-१४, १३ : ११५६-११६३. और गुरुभक्ति १ : २१-२७, १३ : ४५५-४५८, १५ : १७-२७. और तपस्या १६ : ३२-३३. और मातृभाषा ६ : १४, १० : ४२. ११ : ९, १२ : १६. का पसायदान १८ : १७९३-१८००. कालीन परिस्थिति १८ : १८०४. का लेखनस्थलकाल १८ : १८०२-१८०३, १८ : १८१०. की गीतासे तुलना १० : ४३-४७ १८ : १७३६-१७४१. की नम्रता १ : ७६, १ : ८०-८२, ९ : १०-१२, १८ : १७६४-१७६८, ग्रंथफल १८ : १७४२-१७४९. परिहार १८ : १७८१-१७९२. ॐ
ज्ञानेश्वरी १ अर्जुनविषादयोग ॐ नमो श्री आद्य । वेदप्रतिपाद्य । जय जय स्वयंवेद्य । आत्मरूप ॥१॥ देव तू ही श्री गणेश । सकल-मति प्रकाश । कहे निवृत्तिका दास । सुनियेजी ॥२॥ शब्द-ब्रह्म यह अशेष । वही है जो मूर्ति सुवेष । वहां वर्ण भी है निर्दोष । सजाया जो ॥३॥ स्मृति ही है ,अवयव । रेखायें अंगके भाव । लावण्य रूप वैभव । अर्थ शोभा ॥४॥ अष्टादश जो पुराण । वही हैं मणि-भूषण । पद पद्धति कोंदण । प्रमेय-रत्नका ॥५॥ पदबंध है वसन । रंगाया अति महीन । साहित्य शोभायमान । किनारी है ॥६॥ मानो है काव्य-नाटक । सोचनेसे स-कौतुक । पदकी क्षुद्रघंटिका । अर्थ-ध्वनि ॥७॥ अनेक तत्वोंका निरूपण । उसका नैपुण्य विलक्षण । उचित वचन सुलक्षण । दीखे रत्न-सम ॥८॥ १
व्यासादिकोंका शुद्धज्ञान । शोभता मेखला समान । उसकी दिशा है महीन । झलकती सदा ॥९॥ कहलाते जो षड्दर्शन । जैसे भुजदंड महान । तभी है असंगत-पूर्ण । आयुध करमें ॥१०॥ तर्क ही है परशु । नीति-भेद अंकुश । वेदांत महारस । शोभता मोदक ॥११॥ एक हाथमें हैं दन्त । स्वभावसे ही खंडित । जो बौद्धमत संकेत । वार्तिकोंका ॥१२॥ सहज सत्कारवाद । है पद्मकर वरद । धर्मप्रतिष्ठामें सिद्ध । अभयहस्त ॥१३॥ विवेकवंत सुविमल । वही शुंड-दंड सरल । है परमानंद केवल । महासुखका ॥१४॥ अजी संवाद है दशन । जो है समता शुभ्रवर्ण । देव उन्मेषसूक्ष्मेक्षण । विघ्नराज ॥१५॥ पूर्व उत्तर मीमांसा मान । उसके हैं दो श्रवणस्थान । मुनिमन बोधामृत पान । करते अमरसे ॥१६॥ प्रमेयप्रवालसुप्रभ । द्वैत अद्वैत हैं निकुंभ । तुल्यबल हैं जो सुलभ । मस्तक पर ॥१७॥ उस पर हैं दस उपनिषद् । जिसके उदार ज्ञान-मकरंद । मुकुट पर जो सुमन-सुगंध । सुहाते हैं ऐसे ॥१८॥ अकार चरण युगल । उकार उदर विशाल । मकार है महामंडल । मस्तकाकार ॥१९॥ जहां ये तीनो हुए एक । शब्दब्रह्म प्रकटा नेक । गुरु-कृपासे जाना देख । यह आदिबीज ॥२०॥ सरस्वती वंदन— अजी अभिनव वाग्विलासिनी । जो चातुर्य-अर्थ-कलाकामिनी । वह है शारदा विश्व-मोहिनी । नमस्कार मेरा ॥२१॥ ज्ञानेश्वरी २
गुरु-वंदन — मेरे हृदयमें श्री सद्गुरु। जिसने तारा संसार-पूर । इससे है विशेष आदर। विवेकपे ॥२२॥ जैसे अंजन पड़ा आखोंमें। फूटे नव-अंकुर दृष्टिमें । लगा टोह दस दिशाओंमें। महानिधिका ॥२३॥ अथवा चिंतामणि आया करमें। सदा विजयवृत्ति बसी मनमें । वैसे हूं पूर्ण-काम निवृत्तिमें। कहता ज्ञानदेव ॥२४॥ इसीसे श्रीगुरुको भजा जानके। उससे ही सतत-कृतार्थ होके । सींचनेसे जैसे मूलको वृक्षके। खिलते शाखा-पल्लव ॥२५॥ त्रिभुवनके तीर्थ जिसमें। डूबते हैं सदा सागरमें । या अमृतके रसास्वादमें। आते रस सकल ॥२६॥ वैसे आगे आगे जो रहता है। नमन किया जिसे श्रीगुरु है । अभिलषित मनकी रुचि है। पूर्ण करता जो ॥२७॥ महाभारतका वर्णन— सुनो अब कथा जो गहन। सब कौतुकका जन्मस्थान । अथवा अभिनव उद्यान । विवेक तरुका ॥२८॥ सभी सुखोंका जो है आदि। सब तत्वोंका महोदधि । नवरसोंका जो सुधाब्धि । है परिपूर्ण ॥२९॥ परमधाम प्रकट । विद्याओंका मूलपीठ । सभी शास्त्रोंमें जो श्रेष्ठ। अशेषका ॥३०॥ सभी धर्मोंका नैहर। सज्जनोंका है जिव्हार । लावण्य-रत्न भांडार । शारदाका ॥३१॥ , या प्रकटी है त्रिभुवनमें । भारती स्वयं कथा-रूपमें । स्फुरण होके व्यास -चित्तमें । जो है महामति ॥३२॥ या है यह काव्यराज । ग्रंथ-गुरुत्वका ताज । रसमें रसत्व आज । आया उमड़ ॥३३॥ सुनो एक और महता । शब्दोंमें आयी शास्त्रीयता । बढ़ी महाबोध मृदुता । इस ग्रंथसे ॥३४॥ ३ अर्जुनविषादयोग
दक्ष हुआ यहां चातुर्य । आया है प्रमेयमें माधुर्य । सुखका हुआ है ऐश्वर्य । परिपुष्ट ॥३५॥ माधुर्यमें मधुरता । श्रंगारमें सुरेखता । प्रथाओंकी सुरूपता । दीखती यहां ॥३६॥ कलामें आयी है कुशलता । वैसे ही पुण्यमें तेजस्विता । नष्ट हुये दोष स्वभावतः । जनमेजयके ॥३७॥ क्षणभर देखनेसे लगता । रंगमें बढ़ आयी सु-रंगता । गुणमें अंकुरायी सुजनता । सामर्थ्य रूप ॥३८॥ भानु-तेजसे धवल । त्रिलोक दीखे उज्ज्वल । व्यास-मतिके चंगुल । शोभता विश्वपे ॥३९॥ सु-क्षेत्रमें पड़ा हुआ बीज । अपने आप फैला सहज । भारतमें उमड़ा है तेज । पुरुषार्थका ॥४०॥ नगरमें बसा नागरिक । रहता है जैसा सविवेक । वैसे व्यासोक्तिसे हुआ नेक । सभी विश्व ॥४१॥ अथवा तारुण्यारंभमें जैसे । खिलती लावण्य कलिका वैसे । आता अंगनाके अंगांगमेंसे । नित नव बहार ॥४२॥ या वसन्तागमनसे उद्यानमें । आता है बहार प्रति पल्लवमें । सौंदर्यकी खान खुलती वनमें । वैसे ही जान ॥४३॥ अथवा घनीभूत सुवर्ण । देखनेमें है जो साधारण । दीखे भूषण असाधारण । उसी भांति ॥४४॥ व्यासोक्तिके अलंकारार्थ । इच्छित सौंदर्य प्राप्त्यर्थ । इतिहास है आश्रयार्थ । आया भारतके ॥४५॥ या अपनी प्रतिष्ठाके लिये । अल्पत्वको है स्वीकार किये । पुराण आख्यान रूप लिये । आये भारतमें ॥४६॥ तभी जो महा-भारतमें नहीं । नहीं है त्रिभुवनमें कहीं । कहते हैं सब ही तभी यही । व्यासोच्छिष्ट जगत्रय ॥४७॥ जगतमें कथा सरस ऐसी । परमार्थकी है जन्म-भूमि-सी । मुनि वाणिसे अमृतमय-सी । सुनी जनमेजयने ॥४८॥ ज्ञानेश्वरी ४
अद्वितीय औ' उत्तम । पवित्रैक निरुपम । परम मंगलधाम । सुनिये अब ॥ ४९ ॥ श्रीमद्भगवद्गीता महिमा- भारत कमल पराग । गीताख्यानका है प्रसंग । कहते हैं स्वयं श्रीरंग । अर्जुनसे ॥ ५० ॥ अथवा शब्द ब्रह्मान्धि । मथ लिया व्यास-बुद्धि । निचोड़ है निरवधि । नवनीत यह ॥ ५१ ॥ फिर ज्ञानाग्नि-संपर्कसे । तपाया तीव्र विवेकसे । हुवा पूर्ण परिपाकसे । सुगंधित घृत ॥ ५२ ॥ विरक्त उसकी अपेक्षा करते । संत उसका अनुभव करते । तथा पारंगत रमते रहते । सोऽहं भावमें ॥ ५३ ॥ सुनना उसे भक्तिमें । वंद्य है जो त्रैलोक्यमें । कहा है भीष्म-पर्वमें । श्रीहरिने ॥ ५४ ॥ उसको श्रीमद्भगवद्गीता कहते । ब्रह्मेश उसकी प्रशंसा करते । सनकादिक हैं सेवन करते । अति आदरसे ॥ ५५ ॥ जैसे शरद्चंद्रकलामें । होते सुधाकण साथमें । उठाते कोमल चोंचमें । चकोर-शावक ॥ ५६ ॥ उस पर भी सुन श्रोता । प्रतीत करो यह कथा । चितमें अति चेतनता । लाकरके तुम ॥ ५७ ॥ शब्दोंके बिन है बोलना । इंद्रियोंके बिन भोगना । बोलके बिन उलझना । प्रमेयोंसे ॥ ५८ ॥ भ्रमर जैसा पराग ले जाते । किंतु कमल दल न जानते । इस भांति अनुभव करते । ग्रंथको यहां ॥ ५९ ॥ अथवा अपना स्थान नहीं छोडते । आलिंगन करते चंद्रोदय होते । ऐसा प्रेम भोग भोगना है जानते । कुमुदिनि समान ॥ ६० ॥ ऐसी ही गंभीरतासे । स्थिर अन्तःकरणसे । जाने जो संपन्नतासे । युक्त मन हो ॥ ६१ ॥ ५ अर्जुनविषादयोग
जो हैं अर्जुनके साथ । बैठ सकते हैं सन्त । कृपया सुने ये बात। दत्त-चित्त हो ॥ ६२ ॥ श्रोताओंको नमन— आपका हृदय है अति कोमल । तभी निकले हैं ये प्रीतिके बोल । वैसे मेरी विनय अति सरल । चरण युगलमें ॥ ६३ ॥ जैसे स्वभाव माता-पिताका । तोतली बोली सुननेका । सानंद अपने आपत्यका । वैसे ही यहां ॥ ६४ ॥ वैसे किया मेरा स्वीकार । सज्जनोंने अपनाकर । कम अधिक क्षमाकर । उपेक्षासे ॥ ६५ ॥ कविकी नम्रता— किंतु दूसरे ही अपराधका । क्षमा प्रार्थी हूं मैं यहां आपका । गीतार्थ कथनके प्रयासका । सुनियेजी ॥ ६६ ॥ न सोचकर अपनी क्षमता । चित जो यह साहस करता । जैसे भानु-तेजमें चमकता । खद्योत जैसे ॥ ६७ ॥ अथवा जैसे टिटहर । सुखाना चाहता सागर । वैसे अल्पज्ञ यह भार । उठाता है ॥ ६८ ॥ यदि है आकाश लपेटना । उससे अधिक बडा होना । ऐसा है यह मेरा करना । विचारान्तमें ॥ ६९ ॥ ऐसी है गीतार्थकी महत्ता । शंभु स्वयं कथन करता । प्रश्न करती भवानी माता । चमत्कृत होके ॥ ७० ॥ शिव कहते हैं उमासे । अथाह तव रूप जैसे । भगवद्गीता तत्व वैसे । नित्य नूतन ॥ ७१ ॥ यह है वेदार्थ सागर । उस निद्रस्थका है घोर । कहता यह सर्वेश्वर । प्रत्यक्ष रूपसे ॥ ७२ ॥ ऐसा है जो अगाध । भ्रमते जहां वेद । वहां मैं मतिमंद । कहूंगा क्या ॥ ७३ ॥ ज्ञानेश्वरी ६
यह अपार कैसे लपेटेगा । महातेजको कैसे उजालेगा । आकाश कैसे मुट्ठीमें कसेगा । यह क्षुद्र जीव ॥ ७४ ॥ गुरु कृपाकी महिमा— किंतु यहां है एक आधार । उसीका है मुझे महा-धीर । अनुकूल है श्रीगुरुवर । कहता ज्ञानदेव ॥ ७५ ॥ नहीं तो मैं अति-मूर्ख । वैसे ही है अविवेक । सन्त-कृपाका दीपक । करता सोज्वल ॥ ७६ ॥ हो जाता है कनक लोहेका । सामर्थ्य है यह पारसका । मृतको जीवित करनेका । अमृतमें जैसे ॥ ७७ ॥ प्रकटती जब सरस्वती । गूंगेको भी है वक्ता करती । केवल वस्तु - सामर्थ्य-शक्ति । अचरज नहीं ॥ ७८ ॥ मैं गुरुकी कठपुतली हूं— कामधेनु है प्रसन्न जिसे । अप्राप्य नहीं है कछु उसे । नहीं तो प्रवृत्त होता कैसे । इस कार्यमें मैं ॥ ७९ ॥ अपूर्णको पूर्ण कर लेना । अधिकको न्यून मान लेना । ऐसे ही मुझे संभाल लेना । विनय है यह ॥ ८० ॥ अजी ! आप अब सुनियेगा । आप कहें सो तुतलाऊंगा । नचावे वैसा ही मैं नाचूंगा । सूत्रधार जो ॥ ८१ ॥ वैसे मैं अनुगृहीत । साधुओंसे निरूपित । आपसे हे अलंकृत । अपनत्वमें ॥ ८२ ॥ गुरु प्रसादकी सूचना — श्रीगुरु कहते अब । न कह तू यह सब । कर ग्रंथका प्रारंभ । तुरंत ही ॥ ८३ ॥ आज्ञांस निवृत्तिका दास । कहता हो परमोल्हास । देके मनको अवकाश । सुनो अब ॥ ८४ ॥ ७ अर्जुनविषादयोग