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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

दूसरेकी करनेसे दासता । आई हुई पराधीन श्रेष्ठता । उपाधि उच्छिष्टका है क्या होता । बखाननेसे ॥ २२ ॥ तब तू आत्मा एक समान । ऐसे कहनेसे भी श्रीमान् । दृश्यादृश्यको बाहर मान । ढकेलता हुवा ॥ २३ ॥ मौन भूषणादिसे गुरु पूजन— तभी करनेमें तेरा वर्णन । नहीं मिलता योग्य विशेषण । तब मौन बिन अन्य भूषण । नहीं चढाता मैं ॥ २४ ॥ स्तवन है कुछ भी न बोलना । पूजा है कुछ भी न करना । सन्निधिमें कुछ भी न होना । तेरे पास ॥ २५ ॥ किंतु जैसे कोई भ्रम-ग्रस्त । करता है प्रलाप बहुत । वैसे मैं वर्णन गुरु-मात । कहता सहले तू ॥ २६ ॥ अब दे अपना स्वाक्षर । हुवा जो गीतार्थ विस्तार । जिससे हो यह स्वीकार । सज्जनोंमें ॥ २७ ॥ कहते हैं श्रीनिवृत्तिनाथ यह । बार बार पूछता क्यों वह । कह तू पारसपे घिसते क्यों लोह । बार बार ॥ २८ ॥ ज्ञानदेव तब विनयकर । आपका प्रसाद है गुरुवर । सुनना जी अब चित्त देकर । ग्रंथ संवाद ॥ २९ ॥ गीत-रत्न प्रासादका कलशाध्याय— अजी ! यह गीता-रत्न-प्रासादका । कलशही है अर्थ चिंतामणिका । अथवा है सभी गीता-दर्शनका । है पथ-दीप ॥ ३० ॥ लोगोंमें रही है यह मान्यता । जब दूरसे कलश दीखता । तब तो सहज दर्शन होता । देवताका भी ॥ ३१ ॥ अजी ! उसी भांति है यहां । एक ही अध्यायमें जहां । पूर्ण-दर्शन होता है यहां । गीतागमका ॥ ३२ ॥ कलश है यह इसी कारण । अध्याय यह बादरायण । अठारहवा जो सकारण । रचते हैं ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१२

कलशके बाद कुछ भी कहीं । मंदिरका काम रहता नहीं । यह बात अष्टादशमें यहीं । दीखती स्पष्ट ॥ ३४ ॥ व्यास सहज सशक्त सूत्रकार । उसने निगम-रत्नाचल पर । उपनिषदार्थके पठार पर । किया खनन ॥ ३५ ॥ वहां जो त्रिवर्गका असार । मिला माटी कंकड़ादि अपार । उससे महा-भारत प्राकार । रचा चतुर्दिक ॥ ३६ ॥ आत्म-ज्ञानका वहां अखंड । मिला जो सुंदर शिला-खंड । रची पार्थ-कृष्णकी अखंड । संवाद कलाकृति ॥ ३७ ॥ निवृत्ति-सूत्रका अधिष्ठान । सर्व-शास्त्रार्थका है भरण । आकार लाया बादरायण । मोक्ष-रेखाका ॥ ३८ ॥ करनेमें ऐसा यह निर्माण । पंद्रह अध्यायका है सदन । हुए हैं पंद्रह अंतस्त मान । इस प्रासादके ॥ ३९ ॥ षोडश अध्याय ऊपर । ग्रीवा घंटाका जो आकार । तथा कलश-पीठाकार । सप्तदश जो ॥ ४० ॥ उस पर यह अष्टादश । अपने आप हुवा कलश । ऊपर गीताविकमें व्यास । लगाता है ध्वज ॥ ४१ ॥ पिछले सभी अध्याय । चढते भूमिका आय । पूर्णता दिखाते जाय । अपनेसे ॥ ४२ ॥ हुए कार्यमें रही जो अपूर्णता । कलशमें होगी वह पूर्णता । वैसे अष्टादश विचार कहता । साद्यंत गीताका ॥ ४३ ॥ व्यास बडा कारीगर । रचा गीताका मंदिर । किया महा उपकार । प्राणि मात्रका ॥ ४४ ॥ कोई है परिक्रमा जपकी । करते बाहरसे इसकी । कोई श्रवणार्थ हैं छायाकी । धरते अपेक्षा ॥ ४५ ॥ तथा अवधानका संपूर्ण । देकर कोई दक्षिणा-धन । पैठते अंतर्गृहमें तत्क्षण । अर्थ ज्ञानके ॥ ४६ ॥ ७१३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

फिर पाते निज-बोधसे तत्काल । आत्म-रूप हरि-दर्शनका फल । ऐसे मोक्ष प्रासादमें है सकल । पाते हैं प्रसाद ॥ ४७ ॥ जैसे समर्थोंका पंक्ति भोजन । देता सबको एकसा पकवान । श्रवण पठन अर्थ-चिंतन । मोक्ष देता इसका ॥ ४८ ॥ गीता यह ऐसा वैष्णव-प्रासाद । अठारहवा कलश है विशद । मैंने कहा है जानेका यह भेद । इस स्थान पे ॥ ४९ ॥ सत्रहवे और अठारहवे अध्यायका संबंध— समाप्त होता है सत्रहवां अध्याय । वहां होता कैसे अठारहवां उदय कहूंगा यह प्रत्यक्ष-सा दृश्य । आंखमें दीखे वैसे ॥ ५० ॥ न तोडके दोनों आकार । बनाया है एक शरीर । है अर्धनारी नटेश्वर- । रूपमें जैसे ॥ ५१ ॥ या गंगा-यमुनाका उदक । प्रवाहमें भिन्न है जो देख । तथा पानी रूपसे एक । दीखता सदैव ॥ ५२ ॥ अथवा शुक्ल-पक्षमें जैसे । नाना चंद्रकला दीखती वैसे । पूर्णमासीका पूर्ण चंद्र जैसे । दीखता एक ॥ ५३ ॥ जैसे भिन्न होनेसे सब पद । श्लोकके होते हैं श्लोकावछेद । अध्यायके होते अध्याय भेद । इसी भांति ॥ ५४ ॥ किंतु कहते हैं एक ही प्रमेय । मिलकर ये अष्टादश अध्याय । नाना रत्नोंको पिरोती साभिप्राय । जैसे एकही डोरी ॥ ५५ ॥ अनेक मोतियां मिलकर । होता जैसा एकावली हार । किंतु शोभा दीखती सुंदर । एकही अखंड ॥ ५६ ॥ गिन सकते हैं वृक्षके सभी फूल । सौरभपे उंगली न पडे सरल । अध्यायोंमें श्लोक हैं वैसे ही अचल । जानना यहां ॥ ५७ ॥ यहां है जो सात शत श्लोक । अष्टादश अध्यायमें लेख । किंतु देव बोलता है एक । दूसरा नहीं ॥ ५८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१४

तथा मैने भी यह तजकर । नहीं किया है ग्रंथका बिस्तार । यहांपे भी कहता सविस्तर । निरूपणमें एक ॥ ५९ ॥ जहां सत्रहका अध्याय । कहते अंतके समय । कहता देव साभिप्राय । इस प्रकार ॥ ६० ॥ ब्रह्म नाममें श्रद्धा रखकर । किये जाते जितने व्यवहार । होते वह सब व्यर्थ आखर । निश्चित जान ॥ ६१ ॥ सुनकर यह श्रीहरिका बोल । डुलता है मनमें पार्थ निर्मल । कहता कर्म-निष्ठोंका है सकल । बना निम्न रूप ॥ ६२ ॥ अज्ञानसे अंध जो कर्म-जड़ । ईशको न देख सकता मूढ़ । उसके नाम श्रद्धादि जो गूढ़ । जानेगा कैसे ॥ ६३ ॥ तथा रज और तमोगुण । नहीं तजता अंतःकरण । तब होती है जो श्रद्धा क्षीण । जुडती कैसे ब्रह्मसे ॥ ६४ ॥ फिर शस्त्र-नोकसे गले लगना । तथा खडी डोरीपे दौड़ते जाना । अथवा मानो नागिनसे खेलना । होंगे कम धातुक ॥ ६५ ॥ कर्म ज्ञान-फलका सुक्षेत्र कैसे होगा ? अठारहवेका सूत्र— ऐसे कर्म अति कठिन । देते हैं पुनः पुनः जनन । इस भांति कुयोग-पूर्ण । होते हैं जो ॥ ६६ ॥ होता यदि कर्म सांग संपूर्ण । बनता है ज्ञानके ही समान । नहीं तो देता नरक महान । यही कर्म ॥ ६७ ॥ कर्ममें हैं इस प्रकार । आते हैं दोष बार बार । तब कहां मोक्षका द्वार । खुलेगा कर्मठको ॥ ६८ ॥ मिटाना है यदि कर्म-संग । करके उसका पूर्ण त्याग । स्वीकार करना जो अव्यंग । संन्यास यहां ॥ ६९ ॥ कर्म-बाधाकी जो कहीं । भयकी बातही नहीं । वह आत्म-ज्ञान यहीं । होता हस्तगत ॥ ७० ॥ ७१५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

ज्ञानका आवाहन-मंत्र । ज्ञान फलनेका सु-क्षेत्र । तथा ज्ञानाकर्षक-सूत्र । तंतु ही जो ॥ ७१ ॥ यह दोनों संन्यास और त्याग । आचरनेसे छूटता जग । तब इस बातमें हो सजग । पूछना स्पष्ट ॥ ७२ ॥ ऐसे विचार कर अर्जुन । त्याग संन्यासका पक्व ज्ञान । जान लेनेमें करता प्रश्न । इस स्थानपे ॥ ७३ ॥ उसके उत्तरमें श्रीकृष्ण । करता है जो यहां कथन । उससे व्यक्त हुवा संपूर्ण । अष्टादशाध्याय ॥ ७४ ॥ एवं यहां ले जन्य-जनक भाव । होता अध्यायसे अध्याय प्रसव । अब प्रश्न किया वह सावयव । सुनलें सब ॥ ७५ ॥ कृष्णार्जुन-प्रेमका वर्णन— वहां जो श्रीकृष्णका कथन । समाप्त होता देख अर्जुन । अपने मनमें होता खिन्न । जिस समय ॥ ७६ ॥ वैसे आत्म-तत्वमें निश्चित । बन गया था उसका मत । श्रीहरिका न करना बात । न भाया उसे ॥ ७७ ॥ बछडा होने पर भी तृप्त । गाय रहती पास सतत । अनन्य प्रीतकी यह रीत । चलती आयी है ॥ ७८ ॥ बिन कारण भी उनका बोलना । देख कर भी फिर फिर देखना । प्रिय-वस्तुके भोगसे होता दूना । भोग-भाव ॥ ७९ ॥ ऐसी है प्रेमकी यह रीति । तथा पार्थ है उसकी पूर्ति । तभी करती उसकी मति । चिंता मौनकी ॥ ८० ॥ तथा है संवादके निमित्तसे । व्यवहारकी जो वस्तु है उसे । भोगा जाता है सहज ही जैसे । दर्पण रूप ॥ ८१ ॥ फिर जब संवाद रुकता । तब यह सुख भंग होता । इसको फिर कैसे सहता । अभ्यस्त इसका ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१६

इसलिये वह संन्यास । पूछनेका करके मिस । खोलता है पर विशेष । गीता तत्वका ॥ ८३ ॥ अठारहवा अध्याय एकाध्यायी गीता है— अठारहवा अध्याय यही नहीं । समग्र एकाध्यायी गीता है यही । दुहता है जब स्वयं बछडा ही । तब कैसा अकाल ॥ ८४ ॥ संवाद रुकनेका समय आया । पुनरपि गीता प्रारंभ कराया । गुरु-शिष्यके संवादमें अशक्य क्या । होता है कब ॥ ८५ ॥ यह सब रहने दें अब । अर्जुन पूछता सुने सब । कहता यह विनय अब । सुनले देव ॥ ८६ ॥ अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥ त्याग और संन्यासका अर्थ भिन्नत्व— अजी ! संन्यास और त्याग । एक ही अर्थके दो अलग । जैसे संघात और संग , है समुदायके ॥ ८७ ॥ त्याग तथा संन्याससे । त्याग ही कहना ऐसे । जान लिया है मनसे । यहां मैंने ॥ ८८ ॥ इसमें है यदि अर्थ-भेद । करें देव इसको विशद । तब कहता वह मुकुंद । ये दोनों हैं भिन्न ॥ ८९ ॥ अर्जुनने कहा कैसे संन्यासका तत्व तथा है त्यागका कहो । जानना चाहता हूं मैं कह तूं भिन्न भिन्न जो ॥ १ ॥ ७१७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

वैसे तेरा जो चिंतन । त्याग संन्यास अर्जुन । एक ही ऐसा निदान । वह भी सत्य ॥ ९० ॥ इन दोनोंका एक अर्थ । त्याग कहलाता निश्चित । भेदका कारण जो पार्थ । रहता ही है ॥ ९१ ॥ तजना कर्मको जो मूलता । वह है संन्यास कहलाता । तथा कर्म-फल जो तजता । वह है त्याग ॥ ९२ ॥ तब है कोई कर्मका फल । तजता कोई कर्म सकल । कहता हूँ यह मैं निर्मल । सुन तू चित्त देकर ॥ ९३ ॥ जैसे वनमें या पर्वत पर । वृक्ष उगते सहज अपार । वैसे उद्यान खेत धनुर्धर । नहीं उगते ॥ ९४ ॥ घास उगता यदि नहीं भी बोते । वैसे कभी धानादि नहीं उगते उसमें प्रयत्न करने पडते । उसी भांति ॥ ९५ ॥ या अंगांग सहज होते । भूषण बनाने पडते । नदी नाले सहज होते । कूए नहीं ॥ ९६ ॥ वैसे जो नित्य नैमित्तिक । कर्म होते हैं स्वाभाविक । किंतु नहीं होते कामिक । निरिच्छासे ॥ ९७ ॥ भगवान उवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥ संन्यासकी परिभाषा काम्य-कर्मका त्याग— कामनाओंके समुदाय । उभारते हैं धनंजय । अश्वमेधादि स-समय । काम्य-कर्म ॥ ९८ ॥ श्रीभगवानने कहा त्यजना काम्य-कर्मोंको ज्ञानी संन्यास जानते । कहते सब कर्मोंके फलका त्याग त्याग है ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१८

कूप सरोवर आराम । अग्रहारादि महाप्राम । व्रत समारोहादि कर्म । अन्य अनेक ॥ ९९ ॥ ऐसे इष्ट-पूर्तिके जो सकल । कामना होती है जिसका मूल । भोगना पड़ता इसका फल । बंधकर ही ॥ १०० ॥ करते हैं सब देह-धारण । भोगने पड़ते जनन-मरण । इसको अ-स्वीकारना अर्जुन । असंभव जैसे ॥ १ ॥ अथवा ललाट लिखित जैसे । कभी नहीं मिटाया जाता वैसे । तथा काला गोरापन धोनेसे । मिटता नहीं ॥ २ ॥ वैसे काम्य-कर्म फल पार्थ । भोगना पड़ता है निश्चित । धरना दे बैठता है नित । ऋणदाता समान ॥ ३ ॥ या कामना नहीं करते । सहज रूपमें कर्म होते । रणभूमिमें बाण लगते । न लड़ते भी जैसे ॥ ४ ॥ अजानपनसे गूड़ खाता । फिर भी वह मीठा लगता । राख मानकर पैर देता । जलाती आग ॥ ५ ॥ काम्य-कर्ममें जो यह एक । सामर्थ्य होता है स्वाभाविक । इसीलिये मुमुक्षुको देख । नहीं चाहना उसे ॥ ६ ॥ वास्तवमें पार्थ ऐसे । काम्य कर्म होता उसे । तज देना विष जैसे । उगलकर ॥ ७ ॥ देख कर फिर यह त्याग । संन्यास कहता है सारा जग । तथा देखता जो अंतरंग । सर्वदृष्टा ॥ ८ ॥ इस काम्य-कर्मको तजना । कामनाको जैसे उखाडना । धन-त्याग कर मिटा देना । भयको जैसे ॥ ९ ॥ नित्य-नैमित्तिक कर्मका विवेचन— चंद्र-सूर्यके जो ग्रहण । बनाते पर्वणी अर्जुन । या माता-पिताका मरण । निश्चित दिवस ॥ ११० ॥ ७१९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

अथवा अतिथि जब आता । तब जो जो करना पडता । ऐसे कर्मको जानना पार्थ । नैमित्तिक कर्म ॥ ११ ॥ वर्षासे क्षुब्ध होता गगन । वसंतमें खिलता है वन । देहको शृंगारता यौवन । जिस भांति ॥ १२ ॥ या सोमकांत सोम स्रवता । सूर्यसे है कमल खिलता । मूलमें जो था वही विकसता । जैसे यहां ॥ १३ ॥ वैसे नित्यका जो होता कर्म । वही नैमित्तिक यह नियम । जब वह दृढ-सा होता नाम । नैमित्तिक ॥ १४ ॥ तथा सायं प्रात और मध्यान्ह । करना होता जो प्रतिदिन । जैसी दृष्टि होती है लोचन-। को नहीं भारी ॥ १५ ॥ नहीं आती है जिस भांति गति । चरणोंमें वह सहज होती । अथवा दीपमें होती है दीप्ति । पांडुकुमार ॥ १६ ॥ बिन पुटके जैसे चंदन । सुगंध देता है निशिदिन । अधिकारका वैसे अर्जुन । वही है रूप ॥ १७ ॥ नित्य-कर्म ऐसे है जन । बोलते हैं वह तू जान । नित्य-नैमित्तिक अर्जुन । दिखाये ऐसे ॥ १८ ॥ यही है नित्य नैमित्तिक । करना है जो आवश्यक । इसीलिये कहते देख । निष्फल इसको ॥ १९ ॥ किंतु जैसे भोजनमें सतत । भूख मिटकर होता तृप्त । वैसे नित्य-नैमित्तिकका पार्थ । अंगभूत है फल ॥ १२० ॥ हीन कस सोना आगमें पड़ता । हीनता तज कर तेज चढ़ता । इन कर्मोंका वैसा ही फल होता । जानना यहां ॥ २१ ॥ इससे दोष सब मिटते । स्वाधिकार सतत बढ़ते । तथा सद्गति ओर बढ़ते । अहर्निश ॥ २२ ॥ इतना यह सब रसाल । नित्य-नैमित्तिकका है फल । किंतु तजते मूलका बल । वैसे तजना इसे ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७२०

त्यागवृत्तिका रहस्य, संन्यास और त्यागका फल— वन सारा खिल उठता । आम्र-वृक्ष भी महकता । न छूकर ही छोड़ जाता । वसंत जैसे ॥ २४ ॥ वैसे न कर कर्म-सीमा उल्लंघन । सदा कर नित्य-नैमित्तिकाचरण । तजना उसकी फल-आशा संपूर्ण । उच्छिष्ट जैसे ॥ २५ ॥ कर्म-फलका जो यही त्याग । ज्ञानियोंसे कहलाता त्याग । वैसे संन्यास और त्याग । कहा है तुझसे ॥ २६ ॥ जब यह संन्यास संभवता । काम्य-कर्म नहीं बांध सकता । निषिद्ध स्वभावसे छूट जाता । जो है निषिद्ध ॥ २७ ॥ तथा जो नित्यादिक होता । फल-त्यागसे है नाशता । जैसे अवयवोंका होता । सिर काटनेसे ॥ २८ ॥ फल पाकसे सस्य सूखता । वैसे सब कर्म है छूटता । आपसे आप खोजता आता । आत्म-ज्ञान ॥ २९ ॥ इस भांति यह दो अर्जुन । त्याग संन्यासका आचरण । देते हैं हृदय-सिंहासन । आत्म ज्ञानको ॥ १३० ॥ कर्म-त्यागकी यह कुशलता । छूट कर कर्मका त्याग जब होता । उस त्यागसे त्यागी है फंसता । जालमें अधिक ॥ ३१ ॥ नहीं करके रोगका निदान । औषध दिया विष होता जान । भूखके समय न खाया अन्न । ने मारती क्या भूख ॥ ३२ ॥ त्याग करना जहां नहीं उचित । वहां त्याग करना अनुपयुक्त । तथा जिसका त्यागना है उचित । नहीं करना लोभ ॥ ३३ ॥ त्यागका यह मर्म भूलकर । बना लेते हैं त्यागका भी भार । नहीं देखते वहां धनुर्धर । कभी वीतराग ॥ ३४ ॥ (85) ७२१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥ फलाशा जो न छोड सकता । कर्मको वह बद्ध कहता । जैसे आप नग्न हो कहता । जग झगड़ालू ॥ ३५ ॥ जिव्हा-लंपट रोगी जैसे । अन्नको दोष देता वैसे । या कोढी चिढे मक्खियोंसे । उसी भांति ॥ ३६ ॥ जो हैं फल-काम दुर्बल । कहते हैं कर्म ही मल । फिर मत देते केवल । कर्म हैं त्याज्य ॥ ३७ ॥ कहता कोई यज्ञादिक । करना अति आवश्यक । उसके बिना न शोधक । दूसरा कुछ है ॥ ३८ ॥ यदि है चित्त-शुद्धिका मार्ग । चलना चाहे कोई सवेग । देता है कर्म उसमें वेग । उसे तजना नहीं ॥ ३९ ॥ यदि सुवर्णको शुद्ध करना । उसको जैसे आगमें तपाना । या लोह-दर्पण स्वच्छ करना । जमाना है रज ॥ १४० ॥ या कपडोंको स्वच्छ करना । ऐसी होती है मनोकामना । धोबीकी भट्टी गंदी करना । ऐसे होगा ॥ ४१ ॥ वैसे दुःख दायक कर्म जात । ऐसे मान उन्हे 'तजना नित । रसोईका क्लेश मान पार्थ । मिलेगा क्या अन्न ॥ ४२ ॥ सुन कर ऐसे ऐसे शब्द । कर्म-रत होते हैं सुबुद्ध । ऐसे त्याग विषयमें विशुद्ध । हुवा न निर्णय ॥ ४३ ॥ तमी न मिटे इसका निर्णय । त्यागके विषयमें हो निर्णय । ऐसे कहता हूं मैं धनंजय । ध्यानसे सुन तू ॥ ४४ ॥ छोड़ना कहते कोई कर्म हैं दोष रूप जो । न छोड़ कहते कोई यज्ञ दान तपादिक ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७२२

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्रः त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥ ४ ॥ त्याग भी तीन प्रकारका है— त्याग जो सो यहां अर्जुन । तीन प्रकारका है जान । इन प्रकारका वर्णन । कहूंगा अब ॥ ४५ ॥ त्यागके तीन प्रकार । होते हैं यदि गोचर । इनका इत्यर्थ सार । जान तू इतना ॥ ४६ ॥ मुझ सर्वज्ञ बुद्धिको जंचता । वह निश्चित मत मैं कहता । उसको जान तू पहले पार्थ । इस स्थान पे ॥ ४७ ॥ चाहता जो संसारसे छुटकार । तथा इसमें सावध धनुर्धर । उसके लिये हैं सब ही प्रकार । करणीय हैं ये ॥ ४८ ॥ यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥ आत्म-ज्ञानका निश्चय न होने तक कर्म अनिवार्य है— जैसे यज्ञ दान तपादिक । कर्म करना है आवश्यक । न छोडे कभी उन्हे पथिक । डग भरना जैसे ॥ ४९ ॥ खोया हुवा जब नहीं मिलता । उसका भाग नहीं तजा जाता । या जब तक तृप्त नहीं होता । न छोड़ते थाली ॥ १५० ॥ तट पाने तक न तजते नांव । फलने तक केला न काटे पांडव । रखा हुवा मिले तब तक सदैव । रखते हैं दीप ॥ ५१ ॥ वैसे आत्म-ज्ञानका विषय । न होता जब तक निश्चय । न होना कर्ममें धनंजय । उदासीन ॥ ५२ ॥ तभी तू इसमें मेरा सुन निश्चित निर्णय । कहते जिसको त्याग वह भी तीन भांतिका ॥ ४ ॥ तप यज्ञ तथा दान अवश्य करना नित । होते पावन ज्ञानीको तजना न इन्हे कभी ॥ ५ ॥ ७२३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

सत्कर्मके तीर्थसे उज्वल होनेसे सत्व-शुद्धि होती है— किंतु स्वाधिकारानुरूप । करना यज्ञ दान तप । अनुष्ठान करें आक्षेप । किये बिना ॥ ५३ ॥ चलनेमें जो वेग बढ़ता । विश्रांतिकाही कारण होता । वैसे कर्मातिशयमें आता । नैष्कर्म्य पास ॥ ५४ ॥ पथ्यमें जैसे नियमित । होता जाता है वैसे पार्थ । रोगसे हठता निश्चित । उसी प्रकार ॥ ५५ ॥ वैसे कर्म होते जो आवश्यक । करनेसे कुशलतापूर्वक । झड़ते हैं रज तम निरर्थक । पूर्ण-रूपसे ॥ ५६ ॥ या क्षारसे जैसे सतत । पुट देते स्वर्णको पार्थ । निर्मल हो जाता तुरंत । सुवर्ण जैसे ॥ ५७ ॥ वैसे निष्ठासे किया हुवा कर्म । धोता जाता है सदा रज तम । तथा सत्व-शुद्धिका पुण्य-धाम । दृष्टिमें आता ॥ ५८ ॥ इसीलिये जान तू पार्था । सत्व-शुद्धि जो है चाहता । उसको कर्म मानो तीर्थ- । समान जान ॥ ५९ ॥ तीर्थसे होता बाह्य मल-क्षालन । कर्मसे अभ्यंतर उजला जान । ऐसे निर्मल तीर्थ जान अर्जुन । सत्कर्मको ही ॥ १६० ॥ तृषार्तको जैसे मरु-भूमिके । अमृत-वर्षा साथ तपनेके । या नयनमें आ बैठे अंधेके । स्वयं भास्कर ॥ ६१ ॥ डूबनेवालेकी रक्षामें नदी आयी । गिरनेवालेके लिये धरणी आयी । मरनेवालेको मृत्युने ही बढ़ायी । आयू उसकी ॥ ६२ ॥ वैसे है कर्म-बद्धता । मुमुक्षुको छुड़ाती पांडुसुता । विष जैसे रसायन बनता । उपाय बलसे ॥ ६३ ॥ वैसे कर्म-कुशलता । देती बद्धको मुक्तता । बद्धको छुड़ानेमें पार्थ । आती काम ॥ ६४ ॥ ज्ञानेश्वरी ७२४

तुझे अब वह कुशलता । कहता सुंदरतासे पार्था । कर्मसे कर्मही है मिटता । जिससे यहां ॥ ६५ ॥ एतान्यापि तु कर्माणि संगंत्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥ कर्म-नाशकी कर्म-कुशलता— महा यागादि सब प्रमुख । कर्म-संपन्न होते हैं नेक । कर्तापनकी अहंता देख । रहती नहीं ॥ ६६ ॥ जैसे जो मूल्यसे यात्रा करता । उसको यात्राका गर्व न होता । उसको हृदयमें नहीं होता । यात्राका आनंद ॥ ६७ ॥ अथवा जो राजाकी आज्ञासे । लड़ता रहता है राजासे । अभिमान नहीं होता उसे । जीतता मैं राजाको ॥ ६८ ॥ अन्योंकी सहायतासे जो तरता । उसको तरनेका गर्व न होता । अथवा पुरोहित न धरता । दातृत्वका गर्व ॥ ६९ ॥ वैसे कर्तृत्वका अहंकार । नहीं लेते यथा अवसर । कर्म-मात्र सभी धनुर्धर । करना पूर्ण ॥ १७० ॥ तथा कर्म किया अर्जुना । इससे है फलका आना । ऐसी अपेक्षा न धरना । मनमें कभी ॥ ७१ ॥ फलकी आशा छोड़कर । कर्म करना धनुर्धर । पराया बच्चा निरंतर । देखती धात्री जैसे ॥ ७२ ॥ बिना किये ही फलकी आशा । तुलसीमें पानी देते जैसा । वैसे ही हो फलमें निराशा । करना कर्म ॥ ७३ ॥ न करके दूधकी आशा ग्वाल । करता गांवके पशु संभाल । उसी भांति मान कर्मका फल । करना कर्म ॥ ७४ ॥ किंतु पुण्य-कर्म भी ये ममत्व-फल छोड़के । करना योग्य है मेरा जान उत्तम निर्णय ॥ ६ ॥ ७२५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

इस भांति कर्म-कुशलता । साधकर जो कर्म करता । अपने आप दर्शन पाता । सहजमें जो ॥ ७५ ॥ तभी फल आशा छोड कर । तथा तज देह अहंकार । कर्म करना है धनुर्धर । यह मेरा संदेश ॥ ७६ ॥ जीव जो बंधसे थका हुवा । भक्तिकी चाह करता हुआ । उसे मैं कहता हूं पांडव । नहीं अन्य मार्ग ॥ ७७ ॥ नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥ तामसिक कर्म-त्याग— अंधारमें नहीं दीखता । इसलिये आंखें फोडता । वैसे कर्म-द्वेषसे करता । कर्मका त्याग ॥ ७८ ॥ उसका है जो कर्मका तजना । कहता हूं मैं तामस अर्जुना । आधासीसीके क्रोधसे फोड़ना । कपाल जैसे ॥ ७९ ॥ पथ है यह अति कठिन । तो भी पार करेंगे चरण । उन्हीका करना क्या खंडण । मार्गापराधसे ॥ १८० ॥ भूखेके सम्मुख आया आहार । उसको अति उष्ण मानकर । करके अनशनका विचार । उसे तजना सा ॥ ८१ ॥ वैसे कर्मका बाधक कर्म । निस्तार करना यह मर्म । न जानता तामस सभ्रम । मत्त होकर ॥ ८२ ॥ स्वाभाविक जो भागमें आता । उस कर्मको जो तज देता । ऐसे तामस त्यागसे पार्थ । रहना दूर ॥ ८३ ॥ राजस कर्म-त्याग— अथवा स्वाधिकार जो जानता । अपना विहित कर्म सूझता । किंतु काया-क्लेश मान तजता । आलस्यसे जो ॥ ८४ ॥ न होता साध्य संन्यास कभी नियत कर्मका । करनेसे स-सम्मोह कहाता त्याग तामस ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ७२६

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्याग फलं लभेत् ॥ ८ ॥ कार्यारंभका जो उगम । कष्टकर होता प्रथम । लगता ढोना भारी काम । पाथेय जैसे ॥ ८५ ॥ कडुआ लगता है नीम । कशैला हर्रा प्रथम । प्रारंभमें वैसे काम । लगता सदैव ॥ ८६ ॥ गायका दोष है सींग । सेवंतीका कंटकांग । भोजन सुख महंगा । पकानेमें ॥ ८७ ॥ होता वैसे प्रारंभमें कर्म । आरंभमें होता है विषम । इसीलिये करनेमें श्रम । मानता है वह ॥ ८८ ॥ आरंभता है कर्म समस्त । वैसे यह जो शास्त्र - सम्मत । किंतु आंच आते ही व्यथित । हो तजता सब ॥ ८९ ॥ कहता संपत्ति शरीर जैसी । मिली है अतीव भाग्यसे ऐसी । कर्मादिकमें यह व्यर्थ वैसी । खपाना है पाप ॥ १९० ॥ किया हुवा कर्म कभी देगा फल । किंतु मिला है यह सुंदर फल । इसको अभी भोगनेमें कुशल । नहीं है क्या ? ॥ ९१ ॥ इस भांति शरीर - क्लेशसे । भीत हो तजता कर्म जैसे । कहलाता है सुन तू इसे । राजस त्याग ॥ ९२ ॥ इसमें भी होता है कर्म-त्याग । किंतु न मिलता त्यागका योग । अपनेसे गिर होता है त्याग । उसी भांति ॥ ९३ ॥ अथवा प्राण गये डूबकर । "अधोदकमें समाधि पाकर” । ऐसे नहीं कहते धनुर्धर । वह दुर्मरणही ॥ ९४ ॥ ऐसे शरीरका लोभ । तजाता है कर्म जब । नहीं मिलता है लाभ । कर्म-त्यागका ॥ ९५ ॥ कष्ट कारण जो कर्म तजता तन चोरके । त्याग राजस जो व्यर्थ न देखें अपना फल ॥ ८ ॥ ७२७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद मोग

वास्तवमें जब अपना । ज्ञानोदय होता अर्जुन । जैसे उदय-काल जान । निगलता है तारे ॥ ९६ ॥ वैसे सकारण क्रिया-जात । खो जाते हैं सहजही पार्थ । कर्मत्याग तब लाता नित । मोक्षका फल ॥ ९७ ॥ मोक्षका फल यह अज्ञान- । त्यागको न मिलता अर्जुन । इसीलिये तू त्याग न मान । जो है राजस ॥ ९८ ॥ किंतु देता है कैसा त्याग । घरमें मोक्ष-फल-भाग । सुन अब यह प्रसंग । कहता हूं मैं ॥ ९९ ॥ कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥ सात्विक-त्याग— तब स्वाधिकारानुसार । आता जो सहज होकर । विधि-गौरवसे आचर । भूषण मान ॥ २०० ॥ किंतु यह मैं करता हूं ऐसे । स्मरण भी तज कर मनसे । फलाशा तज संपूर्ण-रूपसे । करना है जो ॥ १ ॥ किंतु अवज्ञा और कामना । माताके विषयमें अर्जुन । करनेसे होता है पतन । हेतु जो जैसे ॥ २ ॥ सो इन दोनोंको तजना । माता मान कर भजना । मुख अशुद्ध सो अर्जुन । तजना क्या गाय ॥ ३ ॥ अपने प्रिय फलमें धनुर्धर । छिलका और बीज जो असार । इसलिये तजते क्या फल सारा । कभी कोई ॥ ४ ॥ वैसे ही है कर्तृत्वका मद । तथा कर्म-फलका आस्वाद । इन दोनोंका नाम है बंध । कर्मका जो ॥ ५ ॥ कर्तव्य मानके कर्म करना जो नियोजित । ममत्व फलको छोड़ त्याग तू मान सात्विक ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७२८

इन दोनोंके विषयोंका जब । पिता-पुत्रका संबंध-सा सब । कर्तव्य मान निभाते हैं तब । बद्ध न होता कर्म ॥ ६ ॥ अजी ! यह है त्याग तरुवर । मोक्ष फल देता है धनुर्धर । सात्विक ऐसे हैं जो मशहूर । विश्वमें सब ॥ ७ ॥ जलकर बीज जैसे । होता है निर्वंश वैसे । फल तज कर्म वैसे । तजा मान ॥ ८ ॥ पारसका स्पर्श जब होता । लोहका जंग मल मिटता । चित्तका रज-तम मिटता । सत्वसे ऐसे ॥ ९ ॥ फिर वह शुद्ध सत्व-गुण । खोलता आत्म-बोध नयन । मृग-जल त्रास जो अर्जुन । मिटता सांझमें जैसे ॥ २१० ॥ बुद्धि आदिके सम्मुख जैसे । रहता है विश्वाभास वैसे । न देख सकेंगे कोई जैसे । कभी गगन ॥ ११ ॥ न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥ समदृष्टिसे कर्म करना— आदि यदि प्रारब्ध बलसे । शुभ अशुभ कर्म जो वैसे । लय होते आकाशमें जैसे । बादल सारे ॥ १२ ॥ सदा जैसे उसकी दृष्टिसे । कर्म होते ब्रह्म-रूप वैसे । इसी लिये है सुख-दुःखसे । होता अछूता ॥ १३ ॥ जिसे शुभ-कर्म जानता । उसको हर्षसे करता । जिसको अशुभ मानता । उससे नहीं द्वेष ॥ १४ ॥ इस विषयमें उसको कहीं । संदेहका कभी काम भी नहीं । जैसे स्वप्नका सुख दुःख नहीं । जगने पर ॥ १५ ॥ शुभ अशुभ कर्मोंसे न रखे राग-द्वेष जो । सत्वमें जो पगा त्यागी ज्ञानसे छेद संशय ॥ १० ॥ ७२९ सार्थ गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

इस लिये कर्म और कर्ता । इस द्वैत-भावकी जो वार्ता । न जानता वह पांडुसुता । सात्विक त्याग ॥ १६ ॥ इस भांति वह कर्म-पार्था । तजे तो छूट जाते सर्वथा । अधिक बांधते है अन्यथा । तजे तो कर्म ॥ १७ ॥ न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥ देह-धारीको कर्म अनिवार्य है— वैसे ही जो पांडुकुमार । देहकी मूर्ति बनकर । रहता कर्मसे ऊबकर । वह है अनाडी ॥ १८ ॥ उकताकर मृत्तिकासे । रहेगा कहो घडा कैसे । तथा कपडा तंतुओंसे । कैसे रहे दूर ॥ १९ ॥ जैसे अग्नि अपनी उष्णता । त्यजेगा कैसे कह तू पार्थ । अथवा कैसे करेगी जोत । प्रकाशसे द्वेष ॥ २२० ॥ द्वेष कर अपनी उग्रतासे । सुगंध लायेगा हींग कहांसे । अथवा द्रवत्व छोड़के कैसे । रहेगा पानी ॥ २१ ॥ वैसे लेकर शरीरका आकार । करता रहता है सभी व्यवहार । तब कैसे है उन्माद धनुर्धर । कर्म-त्यागका ॥ २२ ॥ अपना लगाया हुवा तिलक । पुनः पुनः पोंछते स-कौतुक । किंतु निकालकर क्या मस्तक । लगा सकते हैं ॥ २३ ॥ वैसे विहित जो स्वयं स्वीकृत । सहज तज सकते हैं पार्थ । किंतु जो देह बन आया साथ । वह कर्म तजे कैसे ॥ २४ ॥ चलता जो श्वासोच्छ्वास । नींदमें भी रात-दिवस । न करना सा अहर्निश । चलता कर्म ॥ २५ ॥ अशक्य देहधारीको सर्वथा कर्म छोडना । इसीलिये फल-त्यागी त्यागी वह कहा गया ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ७३०

An exact transcription of the page in Devanagari script:

इस शरीरके निमित्त । लगा जो कर्म सतत । तन हो जीवित या मृत । न छूटेगा कभी ॥ २६ ॥ इस कर्म-त्यागका प्रकार । एक ही है यहां धनुर्धर । न बनो फलाशाका आहार । कर्ममें कभी ॥ २७ ॥ कर्म-फल करो ईश्वरार्पण । तत्प्रसादसे बोध उद्दीपन । तब हो रज्जु-ज्ञान विलोपन । व्याल-शंका ॥ २८ ॥ इस भांति आत्म-बोधसे पार्थ । अविद्या सह कर्म-नाश होता । तथा ऐसा त्याग जो कहलाता । कर्म-त्याग ॥ २९ ॥ तभी जो इस प्रकार त्याग करता । उसको मैं सही कर्म-त्यागी मानता । रोगमें मूर्छाको विश्रांति कहा जाता । वैसे हैं अन्य त्याग ॥ २३० ॥ ऐसे एक कर्ममें जो थकता । दूसरेमें जा विश्रांति खोजता । तथा झांपड पर जो है खाता । सोटोंकी मार ॥ ३१ ॥ रहने दे यह वाग्विस्तार । त्रिलोकमें त्यागी है धनुर्धर । फल-त्यागसे है निष्कृती पर । ले जाता कर्म ॥ ३२ ॥ अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥ वैसे तो सुन यह धनंजय । त्रिविध कर्म-फल कहा गया । समर्थ वही है जान निश्चय । न छोडते फलाशा ॥ ३३ ॥ तीन प्रकारके कर्म-फल- जन्म देकरके आप दुहिता । "इदं न मम" कह माता पिता । छूट जाते दान लेके फंसता । दामाद आप ॥ ३४ ॥ बोकर जैसे विषका खेत । सुखसे लाभ लेते हैं पार्थ । किंतु खर्च कर होते मृत । उसको खाकर ॥ ३५ ॥ तेहरा फल कर्मोंका मधुर कटु मिश्रित । उससे मुक्त संन्यासी पाते हैं त्याग-हीन जो ॥ १२ ॥ ७३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग