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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

छप्पनवाँ अध्याय

४०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 छप्पनवाँ अध्याय नरान्तकका काशीपुरीपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान ब्रह्माजी बोले—तदुपरान्त वे दोनों दूत रौद्रपुर | नामक असुर बालकको मारनेके लिये खड़े थे, बालकने नामक नगरमें स्थित नरान्तकके सभाभवनमें जा पहुँचे। | उन दोनोंको [वहाँ] भूतलपर पीस डाला॥ १०॥ वह मनोहर सभाभवन मणि-मुक्ता आदिसे विभूषित और | तदुपरान्त विशाल हाथीका रूप धारण करके हजारों स्तम्भोंसे शोभायमान था। उसकी लम्बाई-चौड़ाई | कुण्डिन्य (कुण्ड) नामक असुर वहाँ रास्ता रोककर खड़ा सौ-सौ योजनकी थी। उस नाना आश्चर्योंसे परिपूर्ण | हो गया तो उस बलशाली कुमारने कुण्डासुरका गण्डस्थल रमणीक सभाभवनमें अनेक शूर-वीर बैठे थे॥ १-२॥ | विदीर्णकर उसे क्षणभरमें मार डाला॥ ११ १/२ ॥ वहाँ विविध प्रकारकी मणियोंसे जटित सुन्दर | इसके बाद [विनायकको] मारनेके लिये जृम्भिणी आसनपर वह नरान्तक बैठा था और उसीके समीप उत्तम | (नामक राक्षसी) धर्मदत्तके घर पहुँची, वहाँ (स्थित) आसनोंपर उसके दो मन्त्री बैठे थे। जो कि बलवानोंमें | विनायकने उसके सिरपर नारियलसे प्रहार किया, तो वह श्रेष्ठ और [शरीरकी विशालताके कारण] गगनचुम्बी | भी मर गयी। फिर ज्वालासुर, व्याघ्रतुण्डासुर और तीसरा मस्तकोंवाले थे। तभी वे शूर और चपल नामक दूत | विदारणासुर—ये तीनों बालकको मारनेके लिये आये। नरान्तक [-के निकट गये और उस]-को प्रणामकर | तब पहले असुर ज्वालने उस पुरीको जलाना आरम्भ [उसके] बहुत-से गुणोंका वर्णन करने लगे॥ ३-४॥ | किया और तीसरा असुर विदारण वायुरूप धारणकर दूतोंने कहा—[हे महाराज!] दूतको चाहिये कि | ज्वालासुरकी सहायता करने लगा॥ १२-१४॥ वह जो कुछ भी अच्छा-बुरा विवरण हो, उसे बतलाये, | [उन तीनोंमें दूसरा जो] व्याघ्रतुण्ड था, वह सभी ऐसा न करनेपर वह अपराधी होता है और उसे स्वामीके | प्राणियोंका भक्षण करनेको उद्यत था। तब अनन्त दारुण कोपका भाजन बनना पड़ता है। दूतकी बातको | मायाओंवाले उस बालकने तीनोंको मार डाला॥ १५॥ सुनकर स्वामीको विचारपूर्वक अपना परम हित सिद्ध | तदुपरान्त ज्योतिषीके रूपमें मेघनाद नामक असुर करना चाहिये॥ ५ १/२ ॥ | आया तो विनायकने उसको अंगूठीसे प्रहार करके मार हम लोग [आपके आदेशानुसार] विनायकका | डाला। यह बड़े आश्चर्यकी बात थी। फिर कूप और अपकार करनेके लिये उस नगरमें गये और अत्यन्त गुप्त | कन्दर नामवाले दो मायावी असुर भी बलपूर्वक मारे रीतिसे बालक विनायक [-का वध करनेहेतु अवसर]- | गये। तत्पश्चात् बालकको मारनेके लिये अम्भ, अन्धक की प्रतीक्षा करते हुए रहने लगे॥ ६ १/२ ॥ | तथा तुंग नामक असुर आ पहुँचे। एक (अन्धक)-ने तब सर्वप्रथम विघण्ट और दन्तुर, जो बालकके | अँधेरा फैला दिया, दूसरा (अम्भ) मूसलाधार वर्षा करने रूपमें थे तथा विनायकको मारना चाह रहे थे; उन्होंने | लगा और तीसरा (तुंग) ऊँची चोटीवाला पहाड़ बनकर विनायकका आलिंगन किया तो उसने दोनोंको भस्म कर | बालकके ऊपर कूद पड़ा॥ १६-१८॥ दिया। तदुपरान्त बालकको उड़ाकर मारनेके उद्देश्यसे | तब विशाल पक्षीका रूप धारण करके [उस पतंग और विधूल वायुरूप धारणकर जा पहुँचे, तो | विनायकने] तीनोंको ही बहुत दूर फेंक दिया। फिर उन विनायकने उनका मस्तक फोड़कर वध कर दिया। तब | असुरोंका बदला लेनेके लिये भ्रमरा नामकी एक राक्षसी शिलाके रूपमें प्रबलासुर आया तो विनायकने उसके | सुन्दर युवतीके रूपमें आयी। वह बालकको खाना सैकड़ों टुकड़े कर डाले॥ ७-९॥ | चाहती थी। तब उस विघ्नराजने राक्षसीके वक्षपर आरूढ़ मार्गमें गधेका रूप धारणकर काम और क्रोध | होकर उसके प्राण हर लिये॥ १९-२०॥

क्री०ख०-अ०५६ ] * नरान्तकका काशीपुरीपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान * ४०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तत्पश्चात् विद्युत्-रूप धारणकर हम दोनों बालकको मारनेकी इच्छासे उसके पास गये तो उस बलिष्ठने अपने हाथोंसे हमें पकड़ लिया। फिर सारी कार्ययोजनाको पूछकर उस दयालुने हमें छोड़ दिया। उसको सारा वृत्तान्त बताकर हमलोग स्वामी (आप)-के समीप उपस्थित हुए हैं॥ २१-२२॥ एक बार उस नगरमें सभी लोगोंने अकेले विनायकको भोजनके लिये [एक ही साथ] निमन्त्रित किया और उसी समय निर्धन शुक्लने भी निमन्त्रण दिया। तब सर्वप्रथम उन विभुने द्रवीभूत वह भात तेल मिलाकर खा लिया और फिर वे अनन्त स्वरूप बनाकर सबके घरोंमें भोजन करने गये ॥ २३-२४॥ वे प्रत्येक घरमें काशिराजके साथ भोजन करते रहे, परंतु मोहवश काशिराज उनकी लीलाको समझ नहीं सके। हे स्वामिन्! इस प्रकारकी सामर्थ्य तो न कहीं देखी गयी है और न सुनी ही गयी है। अतः इस समय जो आपके लिये हितकर हो, उसीको भलीभाँति सम्पन्न किया जाय। हमको तो यही जान पड़ता है कि विनायकको जीतनेवाला [कोई] पुरुष तीनों लोकोंमें है ही नहीं ॥ २५-२६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन दोनोंकी ऐसी बातें सुनकर नरान्तक [क्रोधके कारण] जलने लगा। संसारको मानो खा जानेके लिये फैलाये हुए अपने मुखसे वह आग उगलने लगा और भयानक भृकुटिको टेढ़ी करके नरान्तक बोला—बन्दर कितना ही उछल-कूद करता हो, पर वह सिंहका कभी अनिष्ट नहीं कर पाता। अजगरमें निगलनेकी शक्ति तो होती है, परंतु वह भूमिको नहीं निगल सकता ॥ २७-२९॥ हमें तो आपकी बातें सुनकर मनमें आश्चर्य-सा हो रहा है। जुगनू तभीतक चमकता है, जबतक कि चन्द्रमा नहीं दीखता और चन्द्रमा भी तभीतक प्रकाशित होता है, जबतक सूर्य नहीं दृष्टिगत होता। सूर्यका तेज भी तभीतक ही है, जबतक कि राहु नहीं दीख पड़ता ॥ ३०-३१॥ [वैसे ही] यह बालक भी तभीतक महान् है, जबतक कालरूप मुझको वह नहीं देख लेता। अब तुम

[दायाँ स्तम्भ] लोग काशिराजके साथ उस बालकको मरा हुआ ही जानो। वह वहीं जानेवाला है, जहाँ उसके द्वारा मारे गये दैत्य गये हैं॥ ३२ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर वह उठ खड़ा हुआ और दिशाओंको गुँजाते हुए गरजने लगा॥ ३३॥ नरान्तकके गर्जनकी ध्वनिसे पूरित सारी पृथ्वी काँप उठी। इसके बाद उसने सभी वीरोंको आज्ञा दी कि 'तैयार हो जाओ। कवच धारण करके [मैं स्वयं भी] काशिराजकी नगरी जा रहा हूँ।' उसके इस प्रकार कहते ही [लड़नेके लिये] तैयार सेना आ गयी ॥ ३४-३५॥ वह चतुरंगिणी सेना अत्यन्त भीषण, ध्वजोंसे समन्वित तथा [शत्रुओंका] सर्वविध [पराक्रम] शमन करनेवाली थी। उस समय सेनाके [प्रयाणसे उठी हुई] धूलसे सारा दिग्-दिगन्त आच्छादित-सा हो गया ॥ ३६॥ सूर्यके [धूलसे] ढँक जानेके कारण कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। सिन्दूर लगानेसे रक्ताभ ललाटवाले, संख्यातीत पैदल सैनिक उछल-उछलकर दौड़ते हुए युद्धाभ्यास कर रहे थे। खुले हुए बालोंवाले कुछ दूसरे सैनिक हाथोंमें खड्ग तथा भुशुण्डी लिये हुए थे। [विनायकके हाथों] मारे गये दैत्योंका प्रिय करनेकी इच्छावाले कुछ दैत्य हाथोंमें भिन्दिपाल तथा मुसल लिये थे। कुछ सैनिक हाथोंमें ढाल, शिलाखण्ड, वृक्ष, खट्वांग, शक्ति तथा पाश लिये हुए [चल रहे] थे॥ ३७-३९ १/२ ॥ [पैदल सैनिकोंके पीछे-पीछे] उस समय घण्टा- ध्वनिसे शोभायमान गजसेना चल रही थी। [हाथियोंका वह समूह] सिन्दूरसे अरुणिम गण्डस्थलवाला तथा दाँतों और झूल आदिके आवरणसे युक्त होनेके कारण शोभायमान था। वह चलता हुआ ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो भाँति-भाँतिकी धातुओं (गेरू, शिलाजतु आदि)-से समन्वित पर्वतोंका समूह जा रहा हो ॥ ४०-४१॥ चिंग्घाड़ते और अपने दाँतोंको बजाते हुए वे हाथी मानो पहाड़ोंको छिन्न-भिन्न-सा करना चाह रहे थे। यदि [उनको नियन्त्रित करनेवाले] महावत न रहते तो वे सबका विध्वंस ही कर डालते। उस समय

४०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- गण्डस्थलसे बहते हुए] मदजलने [दिशाओंको ढक | बाणोंसे समन्वित, छोटी-छोटी घण्टियोंसे सज्जित और लेनेवाली] धूलको शान्त कर दिया ॥ ४२१/२ ॥ | सुवर्णनिर्मित धुरी, ध्वज तथा विशाल पहियोंसे युक्त तदुपरान्त [नरान्तककी सेनाके] घुड़सवार निकले। | था ॥ ४७-४८ ॥ उनके सिर मुकुटकी भाँति शोभायमान शिरस्त्राणोंसे युक्त | वह नरान्तक स्वर्णभूषण, मौक्तिकमालिका, अँगूठी, थे और उनके हाथोंमें चाकू, ढाल, कृपाण, धनुष तथा | तथा खड्गादिसे विभूषित था। उसकी विशाल काया बाण शोभा पा रहे थे। [नरान्तककी सेनाके हाथियोंकी] | कृष्णवर्णकी थी और उसके हाथमें वीरोचित विजयकंकण चिंघाड़ और [घोड़ोंकी] हिनहिनाहटने आकाशको | बँधा हुआ था। विशाल मुकुटसे शोभायमान नरान्तकके अतिशय गुणयुक्त कर दिया अर्थात् आकाश उन शब्दोंसे | कानोंमें कुण्डल झिलमिला रहे थे और उसने अपने भर-सा गया ॥ ४३-४४ ॥ | शरीरमें केसर, अगुरु, कस्तूरी तथा कर्पूरसे युक्त सुगन्धित वे सैनिक कवच, शिरस्त्राण, त्रिशूल [आदि | लेप लगा रखा था ॥ ४९-५० ॥ युद्धोपकरणों]-से समन्वित थे और उन्होंने अपने हाथोंमें | उसने पवित्र होकर उन अस्त्रोंका स्मरण किया, जिनका गदा, मुद्गर, पट्टिश, विशाल फरसा आदि आयुधोंको | कहीं भी प्रयोग नहीं किया गया था। वीरोचित आवेशके धारण कर रखा था। कुछ सैनिक हाथोंमें चक्र, तोमर, | कारण उसका शरीर वैसे ही फूल गया, जैसे [वातप्रकोप भाला, तलवार, पाश, अंकुश आदि लिये हुए थे। उनके | आदि] रोगके कारण रोगीका शरीर फूल जाता है। नाना घोड़े नानाविध अलंकारों और चामरोंसे अलंकृत थे। उन | प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे दिशाओं और दिक्कोणोंको अश्वोंमें वायुकी-सी तीव्रता और मनके समान गतिशीलता | गुंजित करते हुए अनेकों वीर सैनिक विनायकको जीतनेके थी, उनकी चेष्टाओंसे जान पड़ता था कि वे मानों | लिये गरजते हुए दीख रहे थे ॥ ५१-५२ ॥ आकाशको ही आक्रान्त कर लेंगे ॥ ४५-४६१/२ ॥ | हाथियोंके चिंघाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, सैनिकोंकी इसके पश्चात् अपने मन्त्रियोंको साथ लेकर रथारूढ़ | ललकार और रथोंके पार्श्वभागकी घर्घरहाटसे बड़ा महारथी नरान्तकने प्रस्थान किया। उसका रथ स्वर्ण, | भीषण नाद हुआ, उसे सुनकर भयभीत देवगण पर्वत- रजत तथा मुक्तामणियोंसे जटिल, अनेकों अलंकृत घोड़ोंसे | कन्दराओंमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकारसे वह नरान्तक युक्त, नानाविध आयुधोंसे पूर्ण, सैकड़ों धनुषों और | काशिराजके नगरमें जा पहुँचा ॥ ५३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'नरान्तकका निर्गमन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥ सत्तावनवाँ अध्याय काशिराजकी पराजय और नरान्तकका उन्हें बन्दी बना लेना ब्रह्माजी बोले-जब उस दैत्यराजने युद्धहेतु | बचानेके लिये दसों दिशाओंमें भागते जा रहे थे ॥ ३ ॥ प्रयाण किया तो प्राग्गुल्मों (राज्यकी सीमावर्ती चौकियों)- | [यह दशा देखकर] राजाने भोजन त्याग दिया में स्थित लोग भागकर राजाके समीप आये और भोजन | और वायुके समान (वेगपूर्वक) उठ खड़े हुए। सर्वप्रथम करते हुए राजासे कहने लगे कि चतुरंगिणी सेनाके साथ | उन्होंने युद्धोचित वेषभूषा धारण की और फिर लोगों वह दैत्यराज नरान्तक आ गया है। इधर नगरनिवासी भी | (सैनिकों)-को आदेश दिया कि 'युद्धके लिये तैयार हो युद्ध-वाद्योंकी ध्वनि सुनकर जोर-जोरसे चिल्लाने | जाओ।' ऐसा कहकर राजाने रणभेरी बजवायी ॥ ४१/२ ॥ लगे ॥ १-२ ॥ | बलवान् नरेशने खड्ग, ढाल, तरकस, धनुष, नगरमें लोगों (-के चीखने-चिल्लाने)-के कारण | कवच तथा शिरस्त्राण धारण किया और उन विनायककी अत्यधिक कोलाहल हो रहा था। लोग अपने प्राण | पूजा की, 'विनायक! आपकी जय हो'-ऐसा कहकर

क्री०ख०-अ०५७ ] * काशिराजकी पराजय और नरान्तकका उन्हें बन्दी बना लेना * ४०९


[बायाँ स्तम्भ] प्रणाम किया और उनका स्मरण करते हुए अश्वपर आरूढ हुए ॥ ५-६ ॥ उनके भेरीरवको सुनकर सभी सैनिक [युद्धके लिये] तैयार हो गये और अत्यन्त उत्साहमें भरकर शीघ्रतापूर्वक पैदल तथा अश्व, गज, रथादिमें आरूढ़ हो चल पड़े। वे योद्धागण त्रिलोकीको निगलनेकी सामर्थ्यवाले थे। [इन सभी सैनिक वीरोंके साथ] वे नरेश नगरके पूर्वभागमें विद्यमान एक वेदीमें स्थित हो गये ॥ ७-८॥ राजाने मन्त्रियों तथा सभी सैनिकोंको धन-वस्त्रादिसे सन्तुष्ट किया और कहा कि आपलोग पराक्रम दिखलाइये, आज उसका अवसर आया है ॥ ९ ॥ यद्यपि विनायककी अनुकम्पासे हमें कहीं भी भय नहीं है, तथापि दैत्य बड़ा ही बलवान् है, इसने अपने पराक्रमसे सारी पृथ्वीको जीत लिया है ॥ १० ॥ विजयमें कोई नियम नहीं होता (कि इसकी ही विजय होगी) और मनुष्य प्रारब्धके अधीन होते हैं। मैं यह बात इसीलिये कह रहा हूँ, कि अपनी सेना शत्रुसेनाके लाखवें भागके भी बराबर नहीं है ॥ ११ ॥ कहाँ सागर और कहाँ घड़ाभर पानी, कहाँ सूर्य और कहाँ जुगुन्यू! सामनीतिका आश्रय लेनेवाले हम लोग तो राजलक्ष्मीके साथ उन (विनायक)-के द्वारा ही सुरक्षित रहे हैं। उन विनायकने कितने ही दैत्योंका वध किया था, जिसका अपराध अब बादमें हम लोगोंके सिरपर आया है। आज वह (नरान्तक) सामनीतिको त्यागकर युद्ध करने आया है, अतः जिससे हित हो, वैसा विचार करना चाहिये ॥ १२-१३ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-तब वहाँ स्थित महामन्त्रीने भयविह्वल राजासे कहा—'हे राजन्! बुद्धिशील चार लोगोंके साथ आप दैत्यराज नरान्तककी शरणमें चले जाइये; क्योंकि अपना काम बनानेके लिये नीचोंका आश्रय लेना भी कल्याणकारी है। हे राजेन्द्र ! आपको मैं बृहस्पतिका मत बता रहा हूँ, उसे सुनिये और सुनकर वैसा ही कीजिये, तो अवश्य ही कल्याण होगा' ॥ १४-१६ ॥ बृहस्पति कहते हैं— [आपत्तिग्रस्त पुरुषको चाहिये कि] वह कन्यादान, सहभोजन, वस्त्रादिका उपहार,


[दायाँ स्तम्भ] मधुर बातें, प्रणिपात, प्रीतिभाव, सहयात्रा, यशोगान, शत्रुके विश्वासपात्र जनोंका समर्थन आदि मुख्य उपायोंसे शत्रुओंका संहार कर दे ॥ १७ ॥ महामात्य बोला—[राजन् !] यदि वह [बदलेमें] विनायकको माँग ले तो उसे विनायकको भी सौंपकर राज्यकी रक्षा कर लेनी चाहिये। मुझे तो यही उचित जान पड़ता है, जिसमें आपका हित हो, उसीका निश्चय कीजिये ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले—तब सभी लोग राजासे बोले— 'हे नृप! वैरशान्तिके लिये महामात्यने सर्वथा उचित बात कही है, वही ठीक है, वही समर्थनीय है' ॥ १९ ॥ वे लोग इस प्रकार विचार ही कर रहे थे कि तभी उन अत्यन्त बलशाली सभी दैत्योंने टिड्डियोंके समान सेनाओंके द्वारा नगरको घेर लिया ॥ २० ॥ जब नगरवासी लोग [छिपनेके लिये] नगरके बीचमें गये तो उन पापियोंने उस नगरको ही जलाना आरम्भ किया। दसों दिशाओंमें प्रचण्ड अग्नि धधक उठी। धुएँके कारण सूर्यमण्डल आच्छादित हो गया, जिससे कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो संसारमें अति भयानक प्रलय ही आ गया हो ॥ २१-२२ ॥ जो लोग आगसे घबराकर बाहर निकल रहे थे, उनको शत्रु पकड़ लेते थे। [वे पापी नगरमें रहनेवाली] कुमारियों और युवतियोंको कुत्सित चेष्टाओंके द्वारा शीलभ्रष्ट कर रहे थे। [इस घृणित व्यवहारसे] अत्यधिक लज्जित कुछ स्त्रियाँ तत्काल प्राण त्याग दे रही थीं। कुछने नगरद्वारसे गिरकर आत्महत्या कर ली ॥ २३-२४ ॥ कुछ अन्य महिलाओंने विषभक्षण, शस्त्रघात तथा फाँसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। [दैत्यराजके] अनुचरोंने [बहुत-सी] सुन्दर स्त्रियोंको पकड़कर उन्हें अपने स्वामीके समीप पहुँचा दिया ॥ २५ ॥ नरान्तकने उन स्त्रियोंके साथ दुराचार करके उन्हें अपनी राजधानी भिजवा दिया। इस प्रकारकी विनाशलीलाको देखकर राजाने अपने मन्त्रियोंसे कहा- ॥ २६ ॥ यदि हम लोगोंके देखते-देखते स्त्रियोंको ये दुरात्मा

४१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- पापी ले जा रहे हैं, तो यह हमारे लिये बड़ी बदनामीकी बात होगी, अतः हम असुरोंसे युद्ध करेंगे। ऐसा कहकर उत्साहपूर्वक युद्ध करनेवाले उन नरेशने अपने अश्वको चलनेका संकेत किया और तत्काल धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर बाणवर्षा करने लगे ॥ २७-२८ ॥ काशिराजने धनुषसे वैसे ही बाण बरसाना आरम्भ किया, जैसे बादल जल बरसाते हैं। [उस बाणवर्षासे] सूर्य आच्छादित हो गया और दैत्य किंकर्तव्यविमूढ हो गये। उन बाणोंसे दैत्यवृन्द विनष्ट होने लगा। कुछ दैत्य मर गये, कुछ खण्ड-खण्ड हो गये और कुछ दैत्योंके चरण छिन्न-भिन्न हो गये ॥ २९-३० ॥ कुछ दैत्योंके पेट फट गये, कुछकी भुजाएँ कट गयीं, कुछकी आँखें फूट गयीं और कुछ दैत्योंकी जंघाएँ विदीर्ण हो गयीं। सेनाके साथ मन्त्रिगण काशिराजका अनुगमन कर रहे थे। उन सभीने मिलकर खड्ग, परशु आदि आयुधोंसे उन शत्रुसैनिकोंका संहार कर डाला ॥ ३१-३२ ॥ युद्धभूमिमें उनके प्रहारोंसे कुछ दैत्य मर गये और कुछ भूतलपर गिर पड़े। इधर वे दैत्य भी [राजाके पक्षके] सैनिकोंका महान् शस्त्रोंके द्वारा संहार करने लगे। सेनाके चक्र्रमणके कारण उठी हुई धूलसे भीषण अन्धकार छा गया, जिसके कारण वे सैनिक बिना पहचानके, अपने और पराये पक्षके योद्धाओंको शस्त्रोंसे मारने लगे तथा एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे मल्लयुद्ध करने लगे ॥ ३३-३४१/२ ॥ [उस समय] अश्वारोही अश्वारोहियोंसे, गजारोही गजारोहियोंसे, पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंसे तथा रथारोही रथारोहियोंसे [भाँति-भाँतिके] शस्त्रों, बाणों आदिके द्वारा युद्ध कर रहे थे। इस रीतिसे सैनिकवीरोंका वह भीषण संग्राम हो रहा था ॥ ३५-३६ ॥ [राजासे पराभूत हुई] दैत्यसेना तितर-बितर हो गयी और भागने लगी। तब विजयी काशिराजने उच्च स्वरसे सिंहके समान गर्जना की। तदुपरान्त युद्धोत्सुक हाथीके समान उत्साहपूर्वक वे विभिन्न सैन्य-समूहोंमें जा-जाकर, प्रमुख-प्रमुख योद्धाओंको मारते रहे, तथा उस महाभीषण सेनाको तितर-बितर करते हुए उन्होंने दैत्यसेनाके एक लाख वीरोंका संहार कर डाला ॥ ३७-३८१/२ ॥ इस प्रकारसे [सेनाका] विनाश करनेमें लगे उन नरेशको देखकर शत्रुसैनिकोंने [यत्नपूर्वक] रोका और 'यही काशिराज हैं' ऐसा निश्चय करके उन्हें सबने घेर लिया तथा राजाकी प्रबल बाणवर्षाको [किसी प्रकार] सहन करते हुए उनको शत्रुओंने बलपूर्वक बन्दी बना लिया ॥ ३९-४० ॥ मन्त्रिपुत्रोंके साथ राजाके बन्दी बना लिये जानेपर राजसैनिक उच्च स्वरसे 'राजा पकड़ लिये गये हैं' ऐसा कहते हुए चीत्कार करने लगे ॥ ४१ ॥ तदुपरान्त दैत्योंने कुछ राजसैनिकोंको पकड़ लिया, कुछ भाग निकले, कुछ मर गये, कुछ घायल हो गये और कुछ सैनिक दैत्योंके शरणापन्न हो गये। जैसे घनघोर जंगलमें बलशाली भेड़िये हृष्ट-पुष्ट बैलको पकड़ लेते हैं, वैसे ही नरान्तकके दूत मन्त्रिपुत्रोंके साथ राजाको [पकड़कर उन्हें] नरान्तकके समीप ले गये ॥ ४२-४३ ॥ अवरुद्ध न होनेयोग्य दैत्यसैनिकोंके द्वारा वह पूरा नगर जला दिया गया, तदुपरान्त नरान्तकने अपने शूर- वीर योद्धाओंसे कहा— हे वीरो ! जिस कार्यके लिये हम लोग आये थे, वह सम्पन्न हो चुका है। इस समय वह मुनिपुत्र विनायक मेरे लिये नगण्य ही है। जब राजा ही जीत लिया गया तो सेना भी पराजित है, किलेपर अधिकार हो जानेपर नगरको भी विजित ही मानना चाहिये। काशिराजके पराजित हो जानेसे निश्चय ही बालक विनायक भी पराजित हो चुका है ॥ ४४-४६ ॥ यह राजा विवश होकर अभी बालकको ले आयेगा—ऐसा कहकर [विजयसूचक] बाजे बजवाता हुआ नरान्तक अपनी राजधानीकी ओर चल पड़ा ॥ ४७ ॥ उस समय यशोगान करनेवाले बन्दीजन नरान्तकका स्तवन कर रहे थे, काशिराजको उसने अपने आगे कर रखा था और वह यशोगायक बन्दीजनोंको [वांछित] वस्तुएँ तथा ब्राह्मणोंको [दान] देता हुआ जा रहा था ॥ ४८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'राजनिग्रह' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५७ ॥

अट््ठावनवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०५८] * काशिराजकी पत्नीका विलाप करना * ४११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अट््ठावनवाँ अध्याय काशिराजकी पत्नीका विलाप करना और विनायककी सिद्धि नामक शक्तिका विशाल सेना और क्रूर नामक कालपुरुषको प्रकट करना, कालपुरुषद्वारा नरान्तककी सेनाका भक्षणकर उसे विनायकके पास ले आना ब्रह्माजी बोले- इधर नरान्तक हर्षपूर्वक आधा ही मार्ग तय कर पाया था कि तबतक काशिराजकी पत्नीको यह सूचना प्राप्त हो गयी कि राजाको बन्दी बनाया गया है। राजपत्नी इस बातसे अतिशय शोकाकुल हो गयी और [असुरोंके द्वारा किये गये विनाशसे] जो बच निकले थे, वे नागरिक भी शोकमग्न हो गये। जलहीन सरोवरमें स्थित मछलियोंकी भाँति व्याकुल उन लोगोंने अत्यधिक क्रन्दन किया ॥ १-२ ॥ शत्रुओंके द्वारा पतिको बन्दी बनाये जानेसे व्याकुल हुई महारानी वायुवेगसे गिरे कदलीवृक्षकी भाँति भूतलपर गिर पड़ीं। उन्हें मूर्च्छा आ गयी और उनकी कान्ति नष्ट हो गयी। [कुछ समयके पश्चात् जब उन्हें चेतना हुई तो] वे सखियोंके साथ विलाप करने लगीं और रोती हुई बोलीं- ॥ ३१/२ ॥ अम्बा [राजभार्या] बोलीं-जो शत्रुओंका मर्दन करनेवाले, गजसेनाके संहारक और सिंहके सदृश वीरतापूर्ण चेष्टाओंवाले थे, वे काशिराज कैसे शृगालतुल्य दैत्यके द्वारा बलपूर्वक बन्दी बनाये गये ? दैत्यसमूहके विनाशक एवं मदमत्त हजारों हाथियोंके समान बलशाली मेरे स्वामीका बल कहाँ चला गया ? भगवान् महेश्वर मुझपर किसलिये रुष्ट हो गये ? कब मैं अपने पतिको देख सकूँगी ? ॥ ४-६॥ अब मैं किस देवताका आश्रय लूँ, जो उनको शीघ्र ही मुक्त करा सके ? कश्यपपुत्र विनायकके कारण राजाने प्रबल संग्राम किया। राजाका वह सब (शरणागतरक्षणका भाव) व्यर्थ हो गया। वे [कर्तव्याकर्तव्यके विषयमें] मोहग्रस्त हो गये और बालककी बातोंमें आकर व्यर्थमें ही प्रबल वैरियाँसे विरोध कर बैठे ॥ ७-८॥ पतिको बन्दी बना लेनेवाले उस महादैत्य नरान्तकको सबके बिना अर्थात् बिना सभी साधनोंसे सम्पन्न हुए कौन जीत सकेगा? आज तो मुझ मन्दभागिनीके लिये यह प्रलयकाल ही आ गया है। मुझको और पृथिवीको [अकारण ही] वैधव्य क्यों प्राप्त हुआ है ? उन (राजा)-के जैसा कोई करुणासागर कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता, जो हमें शरण दे सके ॥ ९-१० ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारके राजपत्नीके शोकपूर्ण उद्गार सुनकर बलवान् कश्यपपुत्र विनायकने बड़े जोरसे गर्जना की। वह गर्जनघोष ब्रह्माण्डको फाड़ देनेवाला जान पड़ता था ॥ ११ ॥ उनकी गर्जनासे प्रतिध्वनित आकाश और दिशाएँ भी गरज उठीं, जिससे पर्वतों और वनोंकी आधारभूमि सारी पृथ्वी काँप उठी। पक्षीगण गिर पड़े और मरने लगे तथा मनुष्योंमें विह्वलता छा गयी ॥ १२१/२ ॥ तदुपरान्त क्रोधसे विकृत नेत्रोंवाले विनायकने सिद्धि नामक शक्तिकी ओर देखकर कहा- 'अरे ! उस भीषण संग्रामके अवसरपर तू कहाँ चली गयी थी?' तब सिद्धिने विनायकके मनोभावको जानकर विविध प्रकारकी सेनाओंको प्रकट किया ॥ १३-१४॥ [सिद्धिद्वारा] प्रादुर्भूत हुए वे हजारों वीर भयानक मुखोंवाले थे। उनके दाँत हलके समान, जिह्वाएँ सर्प-जैसी और मस्तक पर्वतोंके समान विशाल थे ॥ १५ ॥ वे वीर इस प्रकारसे मुखोंको फैलाये थे, मानो एकाएक भूमण्डलको ही निगलना चाह रहे हों। उन महाबली पुरुषोंके सैकड़ों नेत्र थे और वे मुखसे अग्नि- ज्वालाएँ उगल रहे थे। उनके नथुनोंमें प्रविष्ट होकर बड़े-बड़े हाथी भी ओझल हो जाते थे और जिनके श्वासवेगसे चन्द्रमा और सूर्य भी भूतलपर गिर जाते थे ॥ १६-१७ ॥ जिनकी जटाएँ सम्पूर्ण पृथिवीको बुहार देती थीं और जिनके हाथ हजार योजन लम्बे तथा पैर दो हजार

४१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- योजनकी दीर्घतावाले थे ॥ १८ ॥ उन वीरोंका स्वामी क्रूर विनायकके समीप आकर पूछने लगा- 'हे प्रभो ! मेरे लिये क्या कर्तव्य है ? प्रभो ! मैं भूखा हूँ, अतः सर्वप्रथम आप मुझे तृप्ति देनेवाला भक्ष्य प्रदान कीजिये।' इस प्रकारसे निवेदन करते हुए उस वीरपुरुषसे विनायकने कहा- ॥ १९-२० ॥ 'नरान्तकके द्वारा भलीभाँति संरक्षित इस विशाल सेनाका तुम भक्षण करो और उस नरान्तकको मारकर शीघ्र ही उसका मस्तक मेरे पास ले आओ। अगर तुम उसकी सेनाको खाकर तृप्त न हो सके तो तुमको खानेके लिये कुछ और दूँगा।' कश्यपात्मज विनायकसे इस प्रकारकी आज्ञा प्राप्त करके [उसने] उनको प्रणाम किया और घोर गर्जन करके नरान्तकके समीप जा पहुँचा ॥ २१-२२१/२ ॥ उसकी घोर गर्जना और वैसे [भयावह] रूपके कारण नरान्तक तथा उसके सैनिक भयभीत हो गये और वे दसों दिशाओंमें भागने लगे। [तब वह क्रूर] उन सभी सैनिकोंको हाथमें ले-लेकर मुखमें डालने लगा। उस समय भूतलसे उठती धूलके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा था। उस घनघोर अँधेरेमें नरान्तकके सैनिक मशालोंके सहारे कुछ देख पा रहे थे ॥ २३-२५ ॥ उस भयानक पुरुषको देखकर कुछ सैनिकोंने प्राण त्याग दिये। जो मर चुके थे और जो जीवित थे, उन सभीको वह वेगपूर्वक खाता जा रहा था ॥ २६ ॥ इस प्रकार समस्त सेनाका विनाश होते देख नरान्तक अपने मनमें सोचने लगा कि' [अरे !] यह तो कालका भी काल आया हुआ है। अब मुझे क्या करना चाहिये, यह तो बड़ा ही बलवान् जान पड़ता है।' ऐसा कहते हुए उसने देखा कि आधी सेना तो खायी जा चुकी है ॥ २७-२८ ॥ [नरान्तक सोचने लगा कि अरे !] 'यह तो प्रलयाग्निके समान सेनाका बलपूर्वक संहार करनेमें लगा है। [यदि इसे रोका न गया तो] यह इस (सेना)-को वैसे ही निश्शेष कर देगा, जैसे महर्षि अगस्त्यने समुद्रको किया था' ॥ २९ ॥ उस समय सभी दैत्य सैनिक भयानक चीत्कार कर रहे थे। कुछ योद्धा खा लिये गये थे और कुछ चरणोंके आघातसे पीस डाले गये थे। कुछ उसकी श्वासवायुके आघातसे मर गये, तो कुछने केवल उसके भयसे ही प्राण त्याग दिये। [भागते हुए] सैनिक एक-दूसरेपर गिरते जा रहे थे ॥ ३०-३१॥ वे उस नरान्तकको चीखते हुए बुला रहे थे कि 'आइये, यहाँ आइये और हमें बचा लीजिये।' उधर वह (विनायकका गण) हाथके प्रहारसे सैनिकोंको मार- मारकर तत्काल ही उनको खाता जा रहा था ॥ ३२ ॥ असंख्य सैनिकोंको खा लेनेपर भी उसकी जठराग्नि शान्त नहीं हो पा रही थी। हे मुने ! उस गणने [इस प्रकारसे] अश्वारोहियों, गजारोहियों, रथारोहियों और पैदल सैनिकोंको खाया तथा हाथी आदि बहुतसे वाहक पशुओंको मार डाला ॥ ३३१/२ ॥ तब इस प्रकारके कोलाहलको सुनकर उस नरान्तकने धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ायी और भूतलपर अपने घुटने टेक करके दोनों [कन्धोंमें बँधे तरकसों]-से बाण निकालकर धनुषको खींचा तथा बाणवर्षा करने लगा ॥ ३४-३५ ॥ तब बाणवर्षाके कारण अँधेरा छा गया और [आकाशमें उड़ते] पक्षी तथा बहुत-से राजसैनिक भूतलपर गिरने लगे। दैत्यराज नरान्तकके द्वारा छोड़े गये बाणोंको वह पुरुष (विनायकका गण) निगलता जा रहा था। उसके रोमकूपोंमें असंख्य बाण प्रविष्ट होते जा रहे थे और उन (रोमकूपों)-से रुधिर बह रहा था। इसपर भी उसे अणुमात्र वेदना नहीं हो रही थी। तदुपरान्त नरान्तकने अपने सामर्थ्यसे [बहुत-सारे] अस्त्रोंको उत्पन्न किया ॥ ३६-३८ ॥ तब उस गणने उन सभी अस्त्रोंको वैसे ही निगल लिया, जैसे आजगरी (मादा अजगर) अण्डे निगल लेती है। नरान्तकके अस्त्र कुण्ठित हो गये, शस्त्र नष्ट हो गये और उसका बाणसंग्रह भी समाप्त हो चुका था। तब वह बलहीन दैत्यराज भाग निकला। उसके पीछे-पीछे वह कालपुरुष भी दौड़ने लगा ॥ ३९-४० ॥ भूतलपर दौड़ते-भटकते उस दैत्यने जब पीछा करते

क्री०ख०-अ०५९] * काशिराजकी नरान्तकसे मुक्ति * ४१३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उस कालपुरुषको देखा, तो उसके भयवश त्वरित गतिसे नरान्तक स्वर्ग जा पहुँचा। जब वहाँ भी उसने अपने पीछे आते हुए [उस] कालपुरुषको देखा तो वह धरातलपर कूद पड़ा और पातालमें प्रविष्ट हो गया। पातालमें जाते हुए नरान्तकको उस कालपुरुषने बाल पकड़कर वैसे ही खींच लिया, जैसे बिलमें प्रवेश करते हुए अतीव बलवान् सर्पको गरुड़ खींच लेते हैं ॥ ४१-४३ ॥ तदुपरान्त उस बलशाली कालपुरुषने नरान्तकसे कहा—'नरान्तक! कहाँ जाओगे, तुम तो मेरे सामने ही दीख रहे हो। अरे महापापी! तूने शिवके वरदानसे मदमत्त होकर देवताओं और ऋषियोंको सताया है तथा इतने मनुष्योंका संहार किया है, जिसकी कोई संख्या नहीं है ॥ ४४-४५ ॥ अरे दुष्ट! तेरा ही संहार करनेके लिये विनायकदेव अवतीर्ण हुए हैं। इसलिये समग्र अभिमानका त्यागकर उनकी शरणमें चला जा। उनके चरणकमलका अवलोकन करते ही तेरे सारे पाप विनष्ट हो जायेंगे' ॥ ४६ १/२ ॥ ऐसा कहकर वह कालपुरुष दैत्यराज नरान्तकको बलपूर्वक विनायकके समीप ले आया और फिर स्वामी विनायकदेवको प्रणाम करके कहने लगा— ॥ ४७-४८ ॥ 'हे विनायक! हे विभो! आपके आदेशानुसार मैंने विशाल दैत्यसेनाका पूर्णरूपसे भक्षण कर लिया है। इस नरान्तकने भी मुझे अत्यधिक पीड़ा पहुँचायी है, मैं इसे पकड़कर आपके पास ले आया हूँ। अब मुझे थकावट दूर करनेके लिये कोई शयनयोग्य स्थान प्रदान कीजिये और सबको सुखी करनेके लिये इसको मोक्ष दीजिये' ॥ ४९-५० ॥ कालपुरुषके ऐसे कथनको सुनकर उससे विभु विनायकने कहा—'तुम मेरे मुखके भीतर प्रविष्ट हो जाओ और इच्छानुरूप निद्रासुख प्राप्त करो।' विनायकके मुखसे निकली इस प्रकारकी उत्तम बात सुनकर वह पुरुष उनके मुखमें प्रविष्ट हुआ और उन्हींके स्वरूपमें विलीन हो गया। जैसे पृथिवीसे उद्भूत गन्ध उसीमें लीन हो जाती है, वैसे ही विनायकसे समुत्पन्न वह पुरुष उन्हींमें लीन हो गया ॥ ५१-५३ ॥ जो मनुष्य इस आदरणीय उत्तम आख्यानका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह निश्चय ही कामनाओंको सिद्ध करके अन्तमें मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'नरान्तकनिग्रह' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥ उनसठवाँ अध्याय काशिराजकी नरान्तकसे मुक्ति मुनि बोले—बालरूपधारी विनायकने उस पुरुषको कैसे उत्पन्न किया था, जिसने नरान्तककी सेनाका भक्षण किया और जो नरान्तकको [विनायकके समीप] ले आया था। यह बात मुझे स्पष्ट रूपसे बतलाइये, इस विषयमें मुझे अत्यधिक सन्देह हो रहा है ॥ १ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—जो परब्रह्म गुणोंसे परे है, वही ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मक विनायकके रूपमें सगुण-साकार होकर भास रहा है। वे विनायकदेव पृथ्वीका भार हरने, दुष्टोंका विनाश करने और स्वधर्म अर्थात् वेदानुमोदित धर्ममर्यादाके रक्षणके लिये अनन्तानन्त रूपोंको धारण करते हैं ॥ २-३ १/२ ॥ वे ही अपनी शक्तिसे विश्वकी रचना करते हैं, पालन करते हैं और संहार करते हैं। वे [यद्यपि स्वतन्त्र हैं, तथापि] लोक [-व्यवहारकी सिद्धि]-के लिये [उत्पत्ति- विनाशादिकी] निमित्तभूता पराशक्ति नियतिका अनुवर्तन करते हैं। इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये, क्योंकि वे विभु अनेकानेक मायाओंके आश्रय हैं ॥ ४-५ ॥ उनकी ही इच्छासे इस जगत्‌की सर्वविध प्रवृत्तियाँ होती हैं। अब मैं उनकी मायाका तुमसे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा ॥ ६ ॥ नरान्तकके द्वारा बन्दी बनाये गये मन्त्रिपुत्र और काशिराज जबतक राजधानी पहुँचते, उतने समयतक वह कालपुरुष दैत्यराजके द्वारा संरक्षित उस सेनाका भक्षण करता रहा। तदुपरान्त जब विनायकने उस कालपुरुषको

४१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

मुखमें रख लिया तो उसी समय राजा और मन्त्रिपुत्र भी विनायकके मुखमें चले गये। उन सबने विनायकदेवके उदरदेशमें समस्त विश्वका अवलोकन किया॥ ७-९॥ विनायकदेवके उदरमें भ्रमण करते हुए उन लोगोंने पर्वत, वृक्ष, सरिता, सागर, वापी तथा तडागोंसे समन्वित, मनुष्योंसे भरी हुई सप्तद्वीपवती पृथिवीको देखा। देवता, गन्धर्व, मुनिजन, सिद्धगण, यक्ष, निशाचर, सर्प और अप्सराओंसे शोभायमान स्वर्गादि ऊर्ध्ववर्ती लोकोंको देखा और पाताल आदि सात अधोलोकोंको भी उस समय देखा ॥ १०-१११/२ ॥ इस प्रकार विनायकके उदरदेशमें स्थित विविध कोष्ठों (उदरके अन्तराल)-में भाँति-भाँतिके ब्रह्माण्ड- समूहोंको उन्होंने देखा। उनका चित्त विस्मयाविष्ट हो गया था। तदुपरान्त उन्होंने उद्विग्न होकर देवदेव विनायककी शरण ली और मनोयोगपूर्वक वे विनायकदेवसे प्रार्थना करने लगे- 'हे कृपानिधे ! उद्विग्न चित्तसे भटकते हुए हमलोगोंपर आप अनुग्रह कीजिये' ॥ १२-१४॥ तब बालरूपधारी विभु विनायकने [उनके अन्तःकरणमें प्रकट होकर] काशिराज और मन्त्रिपुत्रोंको मार्ग दिखलाया। फिर रोमांचित हुए विनायकदेवके रोमकूपोंसे वे लोग बाहर निकल आये तथा पूर्वकी भाँति काशिराजने अपने नगरको सर्वथा सुरक्षित देखा। राजाने बालरूपमें क्रीड़ा करते हुए कश्यपपुत्र उन विनायकको देखकर और उन्हींकी अनुकम्पासे विचार-सामर्थ्य प्राप्त करके बड़ी ही प्रसन्नतासे उनका स्तवन किया - ॥ १५-१६१/२ ॥ राजा बोले- हे नाथ! मैंने आपके कुक्षिदेशमें स्थित होकर आपकी परम मायाका परिचय पा लिया है। आप ही देवता, मनुष्य, दिशा, [विविध प्रकारके] स्वर्गों, सरिताओं और पाताल आदि अधोलोकोंको उत्पन्न करनेवाले हैं; क्योंकि आपके रोमकूपोंमें कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड विद्यमान है। [आपके उदरदेशमें] भटकते हुए मैंने आपके अनुग्रहसे उन सबको देखा है ॥ १७-१९॥ हे विश्वकर्ता! आपके आश्चर्यजनक क्रियाकलाप मैंने बहुत बार देखे हैं। मैं युद्ध करनेके लिये गया था और [उस युद्धभूमिमें मेरे साथ] सेना भी आयी थी। मेरी सेनाने नरान्तकके सैन्यबलको शीघ्र ही जीत लिया था और बादमें मन्त्रिपुत्रोंके साथ मैंने नरान्तकको संकटापन्न कर दिया, किंतु उसने एकाएक मेरी सेनाको परास्त करके क्षणभरमें मुझे भी बन्दी बना लिया ॥ २०-२११/२॥ तदुपरान्त मैंने अपने समस्त नगरको दग्ध होते देखा और बादमें उस कालपुरुषको भी देखा, जिसने नरान्तककी अनेक प्रकारकी सेनाको क्षणभरमें खा लिया था। वह पुरुष नरान्तकको पकड़कर आपके समीप आया और इसके पश्चात् वह कालपुरुष और हम सभी लोग आपके उदरमें प्रविष्ट हो गये। हे प्रभो! मैंने वहाँ भी आपका दर्शन किया। वहींपर हमने समग्र विस्तारके साथ सम्पूर्ण जम्बूद्वीपका भी दर्शन किया था ॥ २२-२४॥ हे जगदीश्वर ! ऐसे ही हमने उदरके दूसरे अन्तरालमें विस्तृत भूमण्डलको देखा। इस [विश्वप्रपंचको देखने]- के कारण उद्विग्न हम लोग आपके शरणापन्न हुए॥ २५॥ तदुपरान्त आपकी आज्ञासे रोमांचद्वार अर्थात् स्वाभाविक आनन्दवश उद्घाटित रोमकूपोंसे हम बाहर निकल आये। तदुपरान्त [बाहर भी] हमें अपना विशाल प्रासाद और बालरूपधारी आप दृष्टिगोचर हुए॥ २६॥ हे देव ! हे विभो ! यह कैसा आश्चर्यजनक मायाजाल है? वह पुरुष कौन है, जिसने [नरान्तककी] विशाल सेनाका भक्षण किया था? वह दैत्य नरान्तक किसके द्वारा पकड़ा गया था और किसने दैत्यको बचाया था तथा हम लोगोंको [बाहर] निकलनेके लिये किसने रोमांचद्वार दिखलाया था? हे देव ! मुझ भक्तके इस प्रकारके सन्देहको आप यत्नपूर्वक दूर कीजिये ॥ २७-२८१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-जब इस प्रकारका प्रश्न उन बुद्धिमान् नरेशने किया तो विनायकदेवने कृपापूर्वक उनके मस्तकपर अपना करतल रखा। तत्काल ही राजा दिव्यज्ञानसे सम्पन्न हो गये और उन काशिराजने बड़े ही भक्तिभावसे देवदेव विनायकका स्तवन किया - ॥ २९-३०१/२ ॥ राजा बोले- हे कश्यपात्मज ! आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा सूर्य हैं। पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, दिशाएँ, पर्वतोंसहित वृक्षराशि, सिद्धगण, गन्धर्वगण, यक्ष-राक्षसादि, मुनिगण और मनुष्य ये सभी आपका ही

क्री०ख०-अ०६० ] * भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध * ४१५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

स्वरूप हैं। हे सर्वदेवेश्वर ! आप ही चेतनाचेतनात्मक | प्रभाव है, जो कि हमलोग आपके चरणकमलका दर्शन स्थावर-जंगम-जगद्रूप हैं। जन्म-जन्मान्तरकी पुण्यराशिके | कर पा रहे हैं। विनायककी मायाने हमें मोहित कर लिया कारण ही आप दृष्टिगोचर हुए हैं ॥ ३१-३३१/२ ॥ | था और उसीके प्रभावसे हम मुक्त भी हो सके ॥ ३९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- जब काशिराज ऐसा कह रहे थे, | जब सभी लोग लौट गये तो काशिराज वहाँसे तभी विनायकने उनको पुनः मोहित कर दिया। तब वे | अपनी धर्मपत्नी महारानी अम्बाके निकट गये और हर्षसे नरेश [पुनः वात्सल्यविवश हो गये और युद्धसे सकुशल | गद्गद वाणीसे कहने लगे- ॥ ४०१/२ ॥ लौटे,] वेदना आदिसे शून्य उन विनायकका अभिनन्दन | राजा बोले- दैत्यने हमे बन्दी बना लिया था, करने लगे। तभी राजाके दर्शनार्थ हर्षोल्लाससे भरे | [जिसके कारण] हम बड़े संकटमें पड़ गये थे, परंतु इन नगरवासी भी [वहाँ] आ पहुँचे ॥ ३४-३५ ॥ | विनायकने अपनी मायासे हमें मुक्त कराया और अपने नगरवासियोंने राजाको पुनः-पुनः प्रणाम करके | नगरमें पहुँचा दिया ॥ ४११/२ ॥ [उपहारके रूपमें] वस्त्र और आभूषण अर्पित किये तथा | ब्रह्माजी बोले- विविध प्रकारके वाद्योंके घोषसे, राजाने भी वस्त्र आदि विविध उपहार उनको दिलवाये॥ ३६॥ | भाँति-भाँतिकी पताकाओंसे, नानाविध महोत्सवोंसे और उन सभी नागरिकोंको विदा करके राजा अपनी | विनायकदेवकी सामर्थ्यके कारण [नरान्तकके चंगुलसे माताके समीप उपस्थित हुए [और उनसे बोले-] हे | छूटकर राजधानी] लौटे हुए सभी [स्त्री-पुरुषादि] मातः ! आपके अनुग्रहसे ही आपके चरणयुगलका दर्शन | लोगोंसे वह नगर शोभायमान हो रहा था ॥ ४२-४३ ॥ कर पा रहा हूँ। मुझे तो दैत्यराजने बन्दी बना लिया था, | कुमार, कुमारियाँ, विवाहित स्त्रियाँ, उनके पति, पर देवदेव विनायकने बचा लिया। तब हर्षित जननीने | पिता, माताएँ, पुत्रगण और भाई - ये सभी परस्पर दीर्घकालके उपरान्त आये हुए [अपने पुत्र] उन नरेशको | मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और एक-दूसरेको हृदयसे हृदयसे लगा लिया ॥ ३७-३८ ॥ | लगाने लगे। उन्होंने [इस अवसरपर] अनेकविध दान- तदुपरान्त दोनों अमात्यों (मन्त्रिपुत्रों)-ने उन | पुण्य किये। वे सभी [उल्लासपूर्वक] खान-पान, दर्शन- राजमाताको प्रणाम करके कहा- आपके ही पुण्योंका | भाषणादि करने लगे ॥ ४४-४५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'राजमोक्षण' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥ -------------------❖-------------------

साठवाँ अध्याय भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध

ब्रह्माजी बोले- तदुपरान्त (कालपुरुषके द्वारा | दर्शन भी किया ॥ ३ ॥ पकड़े जानेपर) विनायकके [पराक्रमपूर्ण] क्रिया-कलाप | इससे यह बात निश्चित हो जाती है कि यह मुझे देखकर नरान्तक बुद्धिसे सोचने लगा कि मैंने [आज] | भोग और मोक्ष दोनों दे सकता है। [इसलिये विनायकसे इसका अद्भुत तेज देख लिया है ॥ १ ॥ | विरोध करना भी कल्याणकारी है,] अतएव मैं इसका वध जब काशिराज पकड़े गये तो इसने कालपुरुषको | करूँगा, अथवा [यदि मैं इसे न मार सका तो] यह मुझे उत्पन्न किया और उसने सब प्रकारसे मेरी समस्त | मार डालेगा। [दोनों ही दशाओंमें मेरा लाभ है] ऐसा सेनाका भक्षण कर डाला ॥ २ ॥ | निश्चय करके वह विनायकसे कहने लगा - ॥ ४१/२ ॥ [बादमें] मन्त्रिपुत्रोंके साथ काशिराज इसके उदरमें | दैत्य बोला- तुमने इन्द्रजालका चमत्कार अनेक प्रविष्ट हुए और बिना दैहिक क्षति हुए सकुशल बाहर | प्रकारसे मुझे दिखाया है, किंतु मैं नरान्तक उससे नहीं लाये गये। राजाने [इसके उदरदेशमें समग्र] विश्वका | डरता; क्योंकि मैं स्वयं ही मायावी हूँ। जिसके निःश्वासमात्रसे

४१.६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] बड़े-बड़े पहाड़ गिर जाते हैं, [उस] मुझ नरान्तकके केवल भृकुटि-विक्षेपसे ब्रह्माण्ड अत्यधिक काँपने लगता है। जिसके करतलके प्रहारसे [समूचे] भूमण्डलके दो भाग हो जाते हैं, उसके साथ तुझ बालकका संग्राम किस प्रकार हो सकेगा? जो बाघके सामने जाय, वह सुखी कैसे हो सकेगा?॥५-८॥ ब्रह्माजी बोले—नरान्तककी ऐसी बातें सुनकर वे बालरूपधारी परमात्मा विनायक कहने लगे—॥९॥ विनायक बोले—अरे मूढ़! तू किसलिये डींग हाँक रहा है। जिस पराक्रमका तू बार-बार वर्णन कर रहा है, वह उस समय कहाँ गया था, जब तेरी सम्पूर्ण सेना खायी जा रही थी॥१०॥ शूर-वीर तो शौर्य दिखलाते हैं, वे शत्रुके पराक्रमकी निन्दा करनेवाली बातें नहीं कहते और [जो तुमने यह कहा कि मैं बालक हूँ, तो ऐसी बात नहीं है,] छोटा-सा बिच्छू भी क्षणभरमें सिंहको मार डालता है। छोटा-सा दीपक भी घनघोर अँधेरेको नष्ट कर देता है और एक छोटे-से अंकुशसे मतवाला हाथी नियन्त्रित हो जाता है। [वास्तवमें] जिसकी मृत्यु निकट होती है, वह इसी प्रकार सन्निपातग्रस्तके सदृश भाषण करता है॥११-१२ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—विनायकदेवकी ऐसी बातें सुनकर दैत्यराज अत्यधिक भयसे काँप उठा [फिर उसने अपने चित्तको सुस्थिर किया] और बादलोंके जैसी घोर गर्जना करने लगा। वह अपने गर्जनघोषसे भूमण्डलको डराता, रुलाता और कँपाता हुआ विनायकको मारनेकी इच्छासे अतिशय आवेशमें आकर वैसे ही दौड़ा, जैसे कोई पतंगा दीपककी लौको बुझानेके लिये शीघ्रतासे दौड़ने लगे॥१३-१५॥ उसकी भृकुटी तीन स्थानोंपर टेढ़ी हो गयी थी और वह मुखसे आग उगल रहा था। नरान्तकको इस प्रकारसे आते देख काशिराजने त्वरापूर्वक अपने धनुषकी प्रत्यंचा चढ़ायी और कानतक बाण खींचकर, बन्धनसे छुड़ाये गये उस निर्लज्ज दैत्यसे शान्तिपूर्वक बोले—॥१६-१७॥ दैत्येन्द्र ! प्राणोंका त्याग मत करो। जीवित रहोगे

[दायाँ स्तम्भ] तो अपना अभ्युदय देख सकोगे। तुम यहाँसे लौट जाओ, अन्यथा मारे जाओगे॥१८॥ ब्रह्माजी बोले—राजाके इन वचनोंको सुनकर क्रोधसे जलता हुआ दैत्य कहने लगा—'तुम जैसे लोगोंका भक्षण करनेके कारण ही मुझे नरान्तक कहा जाता है। यदि जीना चाहते हो तो इसी समय मेरी शरणमें आ जाओ'॥१९ १/२॥ तब राजाने मरनेकी इच्छावाले उस नरान्तकसे फिर कहा—'अरे मूढ़! विनाशकालमें बुद्धि विपरीत हो जाती है। जब समय विपरीत होता है तो मित्र भी शत्रु बन जाते हैं। वरप्राप्तिके अभिमानवश तुमने अनेकों बार पापपूर्ण कृत्य किये हैं और वरदानके ही प्रभावसे तुमने वज्रको भी कुछ नहीं समझा॥२०-२२॥ इस समय तुम जैसे पापियोंका वध करने और प्रबल भूभारका हरण करनेके लिये ही ये कश्यपपुत्र विनायक अवतीर्ण हुए हैं। तुम्हारी पापराशिके कारण वरदानका जो पुण्यबल था, वह शिथिल हो चुका है।' [राजाकी] ऐसी बात सुनकर दैत्यराज मन-ही-मन काँप उठा॥२३-२४॥ [तदुपरान्त] उसने दौड़कर राजाके हाथसे धनुष- बाण छीन लिया और बलपूर्वक भूतलपर पटक दिया, जिससे उसके सैकड़ों खण्ड हो गये। फिर नरान्तकने मुष्टिकासे राजापर प्रहार किया, जिससे वे वैसे ही भूतलपर गिर पड़े, जैसे वज्रके प्रहारसे पर्वत गिर जाता है॥ २५-२६॥ यह देखकर अपने गर्जनघोषसे सम्पूर्ण आकाश- मण्डल एवं दसों दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए महाबली विनायक अंकुश लेकर दौड़े। उस समय समस्त भूमण्डल काँप उठा और सभीके नेत्रोंको दृष्टिहीन बना देनेवाले परशुके तेजसे सारी दिशाएँ मानो धधकने लगीं। उन्होंने उस परशुसे दैत्यके मस्तकपर वैसे ही तीव्र प्रहार किया, जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्राघात करते हैं। उनके आघात करते ही दैत्यराज भूतलपर गिर पड़ा॥२७-२९॥ जैसे शिलाके आघातसे मर्मस्थलके विदीर्ण होनेसे

क्री०ख०-अ०६० ] * भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध * ४१७ व्यक्तिको मूर्च्छा होती है, वैसी ही प्रबल मूर्च्छा उसको परशुके आघातसे हुई। कुछ कालके बाद वह दैत्य उठ खड़ा हुआ और दोनों हाथोंमें दो पर्वतोंको उठाकर विनायकको मारनेकी इच्छासे उनपर फेंक दिया। तब उन विनायकने सुखपूर्वक पर्वतोंको परशुके आघातसे सैकड़ों खण्डकर चूर-चूर कर दिया ॥ ३०-३१॥ इसके पश्चात् दैत्यराज मायासे विविध रूप धारण करने लगा। वह जो-जो रूप धारण करता, विनायक भी तत्काल उसी-उसी रूपमें प्रकट हो जाते और उन रूपोंके द्वारा शीघ्रतासे महादैत्यके अहंकारको चूर्ण कर देते। असुरके द्वारा प्रयुक्त शस्त्रोंका उन्हीं शस्त्रोंसे और नानाविध अस्त्रोंका वैसे ही अस्त्रोंसे विनायकदेव निवारण कर रहे थे ॥ ३२-३३ ॥ तदुपरान्त उन दोनोंमें परस्पर मल्लयुद्ध होने लगा। वे चरणोंसे चरणोंको, हाथोंसे हाथोंको, घुटनोंसे घुटनोंको और वक्षःस्थलसे वक्षःस्थलको आहत करते हुए [रक्तरंजित हो गये और उस दशामें वे] फूलोंसे लदे पलाशवृक्ष- से जान पड़ते थे। [इस प्रकार द्वन्द्वयुद्ध करते-करते] वे भूतलपर गिर पड़े ॥ ३४-३५॥ तदुपरान्त वे दोनों बली योद्धा उठकर एक-दूसरेको कोहनीसे मारने लगे। फिर रक्तसे लथपथ होकर उन्होंने पृष्ठभागसे पृष्ठभागको, ललाटसे ललाटको और टखनोंसे टखनोंको आहत किया ॥ ३६ १/२ ॥ इसके पश्चात् नरान्तकने भगवान् शिवका स्मरण करके [पर्वतोंसहित] वृक्षोंकी [मायामयी] सृष्टि की और वृक्षोंसे भरे वे पर्वत विनायकको मारनेकी इच्छासे उनपर फेंके, किन्तु उनको समीप आनेसे पहले ही उन विनायकने छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ३७-३८॥ [वृक्षोंसे युक्त] उन पर्वतोंको जब विनायकने कमल, पाश, अंकुश और प्रचण्ड प्रहार करनेवाले परशुसे ध्वस्त कर दिया तो उस दैत्यने एक दूसरी वैसी ही पर्वत-वर्षा की। उसके निवारित होनेपर पुनः वर्षा की और जब दैत्यने फिर [मायामयी पर्वत-] वर्षा की तो विनायकने उसे भी निरस्त कर दिया। इधर काशिराज विनायकको मरा जानकर दूर चले आये ॥ ३९-४० ॥ तब [लीलावश] विनायक व्यथित हो उठे और मनमें सोचने लगे कि इस दैत्यके पराक्रमकी तो कोई सीमा ही नहीं है तथा इसपर विजय पानेका कोई उपाय भी नहीं दीखता ॥ ४१ ॥ कब देवगण शत्रुहीन होकर अपने-अपने लोकोंको प्राप्त करेंगे। यह नरान्तक तो आज देवान्तक अर्थात् देवताओंका भी विनाशक बना हुआ है। जब विनायक इस प्रकार बारम्बार चिन्ता कर रहे थे, तभी उनके तरकसमें [एकाएक] कालदण्डके समान प्रचण्ड बाण आ-आकर गिरने लगे और उनके समक्ष स्वर्णनिर्मित पिनाक नामक धनुष भी आ गिरा, जो अपने तेजसे दिशाओं और विदिशाओं (ईशान आदि कोणों)-को उद्भासित कर रहा था ॥ ४२-४४ ॥ छिटकती हुई कान्तिवाले उस शैव धनुषको देखकर वे हर्षयुक्त हो गये और उन्होंने देवताओंके मनोरथको सिद्ध तथा दैत्यको पराजित समझा। विनायकने उच्चस्वरसे प्रचण्ड घोष करके धनुष और बाणोंको ग्रहण कर लिया और पिनाकको [अपनी बहुरूपी तुलामें] तौला। तदुपरान्त उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी ॥ ४५-४६॥ विनायकदेवने दोनों ओर [अपने कन्धोंमें] तरकस व्यवस्थित किये और भूमिपर घुटने टिकाकर धनुषकी टंकार [की, जिसे] सुनकर तीनों लोक काँप उठे। अपने बायें और दायें दोनों हाथोंसे [धनुषपर बाण रखकर] उन्होंने धनुषको खींचा और दैत्यको लक्ष्य करके दोनों बाण छोड़ दिये। चिनगारियाँ बरसाते, आकाशको चमकाते, प्राणिसमूहका संहार करते और गरजते हुए वे बाण सहसा दैत्यकी भुजाओंके ऊपर जा गिरे ॥ ४७-४९ ॥ उन बाणोंने दैत्यकी भुजाओंको वैसे ही गिरा दिया, जैसे उल्काने वृक्षको गिराया हो अथवा इन्द्रने वज्रके आघातसे पर्वतशिखरोंको ढहा दिया हो ॥ ५० ॥ उन विशाल भुजाओंमें-से एक तो नरान्तकके दरवाजेपर जा गिरी और दूसरी बरतनोंको तोड़ती-

४१८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- फोड़ती उसके पिताके दरवाजेपर। [भुजाओंको काट देनेके बाद] विनायकने दैत्यके दो और भुजाएँ देखीं। फिर वह दैत्य मुँहको फैलाये हुए कालकी भाँति [उनकी ओर] दौड़ा। उसने हाथों और पैरोंसे बहुत सारे वृक्ष विनायकपर फेंके और बादमें तो वह घनघोर वृक्षवर्षा ही करने लगा ॥ ५१-५३ ॥ उस समय सघन अन्धकार छा गया, जिसके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा रहा था। तब दैत्यराजकी ऐसी शक्ति देख विनायक उससे कहने लगे ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'विनायक और नरान्तकके युद्धका वर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥ इकसठवाँ अध्याय भगवान् विनायकद्वारा नरान्तकका वध विनायक बोले- [अहो दैत्य!] मैंने इससे पहले इतना बलवान् योद्धा नहीं देखा, तुम तो परम पराक्रमी हो। इस समय मुझ बालकके पराक्रमपूर्ण युद्धव्यापारका अवलोकन करो ॥ १ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने तरकससे एक बाण निकाला और कानतक धनुष खींचकर उस बाणको नरान्तकपर छोड़ दिया। वह बाण आकाशमण्डलको उद्भासित, [ब्रह्माण्डको] कम्पित तथा [पृथ्वीके] वृक्षोंको गिराता हुआ वैसे ही नरान्तकके पास आ पहुँचा, जैसे [ग्रहणकालमें] सूर्य-चन्द्रमाके निकट [राहु] जा पहुँचता है ॥ २-३ ॥ उस बाणने नरान्तकके पैरोंको काट दिया, जिससे वह गिर पड़ा। जब कटे हुए आधे शरीरवाला नरान्तक गिरा तो विनायक गरजने लगे। नरान्तकके पैर आकाशमार्गसे जाते और बहुत सारे लोगोंको कुचलते हुए देवान्तकके विशाल भवनमें जा गिरे ॥ ४-५ ॥ आधे शरीरवाला वह दैत्यराज भयानक रूपसे मुख फैलाकर बलपूर्वक विनायककी ओर दौड़ा। वह ऐसा प्रतीत होता था, मानो तीनों लोकोंको ही निगल लेगा। तदुपरान्त मायाके प्रभावसे दैत्यराजके चरण पूर्ववत् हो गये और तब वह विनायकके निकट आकर कहने लगा - ॥ ६-७ ॥ तुमने मेरे शरीर (हाथ-पैर)-को काटकर जैसा पुरुषार्थ दिखलाया है, मैं भी वैसे ही तुम्हारे अंगोंको काटने जा रहा हूँ, अब तुम मेरा पुरुषार्थ देखो ॥ ८ ॥ उसकी बात सुनकर उन विनायकने फिर गर्जना की और दैत्यराजपर वे प्रचण्ड बाणवर्षा करने लगे ॥ ९ ॥ महाबली दैत्यराज उन असंख्य बाणोंको भी निगल गया तो विनायकने एक विशाल बाणको अभिमन्त्रित किया तथा कानतक [धनुषकी] प्रत्यंचाको खींचकर अग्निसे युक्त अग्रभागवाले, सोनेके पंखोंवाले और गरजते हुए उस भयानक बाणको दैत्यके मस्तकको लक्ष्य करके छोड़ दिया। वह बाण वृक्षोंको गिराता, पक्षियोंको मारता और पर्वतोंको विदीर्ण-सा करता हुआ वायुवेगसे चल पड़ा ॥ १०-१२॥ उसके घोषको सुनकर सेना दसों दिशाओंमें पलायित हो गयी। वह दैत्यके कण्ठमें वैसे ही गिरा, जैसे पर्वतशिखरपर वज्र गिरता है। उसके आघातसे नरान्तकका भयानक मस्तक [कटकर] पक्षीकी भाँति आकाशमें उड़-सा गया और चीत्कार करता हुआ उसके पिताके घरमें जा गिरा ॥ १३-१४॥ इसके पश्चात् नरान्तकके [कबन्धमें] पहलेके सिरकी भाँति एक अन्य सिर उत्पन्न हो गया और ऐसा प्रतीत होता था कि सिर कभी कटा ही नहीं। तदुपरान्त दैत्यराजने भी क्रोधपूर्वक उच्च स्वरसे गर्जना की। उससे पक्षिगण, सभी मनुष्य और देवता भयभीत हो उठे ॥ १५ १/२ ॥ नरान्तक पुनः विनायकपर पर्वतोंकी भयानक वर्षा करने लगा, किन्तु विनायकने बड़ी सहजतासे बाणवर्षा करके उस समस्त पर्वत-वर्षाको मध्यमें ही निरस्त कर दिया। पर्वतों और बाणोंका यह अभिनव संग्राम एक दिन-रात चलता रहा ॥ १६-१७॥

क्री०ख०-अ०६१ ] * भगवान् विनायकद्वारा नरान्तकका वध * ४१९

[इस युद्धके कारण लीलावश] वे विनायक थकानका अनुभव करने लगे और वह महाबली दैत्य भी थक गया। विनायकदेव अत्यधिक चिन्तित हो उठे और [अमर्षजन्य] तेजसे जलने लगे ॥ १८ ॥ तदुपरान्त उन बलीने ज्वालावलीसे समन्वित परशु उठा लिया और जब वे [भुजारूपी तराजूपर मानो] तौलने लगे तो धरती काँप उठी। तब देवगण विमानोंमें आरूढ़ होकर युद्ध देखने आ पहुँचे और रसातलमें शेषनाग भयभीत होकर काँपने लगे ॥ १९-२० ॥ विनायकने दैत्यराजपर वह परशु छोड़ दिया और उसने तत्काल नरान्तकका मस्तक काट डाला। [सिरके कटते ही] फिरसे मुकुट-कुण्डलादिसे युक्त एक अन्य सुन्दर सिर उत्पन्न हो गया। क्रुद्ध हुए विनायकने उसे पुनः काट डाला। उसके कटते ही फिरसे सिर उत्पन्न हो गया। वे बार-बार मस्तक काटते रहे और नरान्तकके बार-बार मस्तक उत्पन्न होते रहे। इस प्रकार उन विभुने सैकड़ों-हजारों मस्तक काट डाले। [जब सिरोंके उत्पन्न होनेका क्रम नहीं रुका तो] फिर उन्होंने दैत्यकी मृत्युके कारण अर्थात् उपायका अनुसन्धान किया ॥ २१-२३ ॥ [उपाय ज्ञात होते ही] उन्होंने शिवके वरदानसे गर्वित बलशाली उस नरान्तकको सहसा मायासे मोहित कर लिया। तब वह दैत्य अपने और परायेको जान पानेमें असमर्थ हो गया। क्षणभरमें उसे [दिनमें] रात्रि जान पड़ने लगी और दूसरे ही क्षण [रात्रिमें] वह दिन समझने लगा ॥ २४-२५ ॥ वह क्षणभरमें कभी स्वर्ग, कभी पृथ्वीतल और कभी पाताल देखने लगा। उसे क्षण-क्षणमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीया (ब्रह्मीभूत पुरुषोंकी सहजावस्था) दशाओंका आभास होने लगा ॥ २६ ॥ वह विनायकदेवको देखकर भ्रमवश निश्चय नहीं कर पा रहा था कि वे देवता हैं, या मनुष्य हैं, नर हैं या नारी हैं अथवा गुह्यक, सिद्ध, यक्ष या राक्षस हैं। वे अपने हैं या पराये हैं। पिता हैं या माता हैं, सजीव हैं अथवा निर्जीव हैं ॥ २७-२८ ॥ वह गहन चिन्तामें डूब गया और मनमें सोचने लगा कि त्रिशूलधारी शंकरने मुझे कुछ ऐसा ही वर प्रदान किया था [कि जब तुम्हें भ्रमवश विविध विकल्प प्रतीत होने लगें तो समझना कि अब मृत्यु आ चुकी है।] और वह समय उपस्थित है, अतः अब मेरी अवश्य ही मृत्यु हो जायगी ॥ २९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे नरान्तक सोच ही रहा था कि तबतक उसने अपने समक्ष विराट्‌रूपधारी विनायकको देखा। उनका मस्तक ऊपर आकाशको छू रहा था, चरण पातालतक फैले थे, दिशाएँ ही कान थीं और वृक्ष ही उनके रोंये थे। रोमकूपोंमें ब्रह्माण्ड भ्रमण कर रहे थे और समुद्र ही उनके स्वेदबिन्दु थे। उनके नखके अग्रभागमें तैंतीस कोटि देवगण विराजमान थे और उनके उदरके एक भागमें चौदह भुवन अवस्थित थे ॥ ३०-३२१/२ ॥ तदुपरान्त [विराड्रूपधारी उन] विनायकने अपने चरणांगुष्ठके नखके अग्रभागसे तत्काल ही दैत्यको वैसे ही मसल दिया, जैसे खटमलको कोई बालक मसल दे। तब अत्यन्त हर्षित देवताओं और मुनियोंने बारम्बार जयघोष करते हुए भक्तिपूर्वक उनका स्तवन किया और फूल बरसाये ॥ ३३-३४१/२ ॥ जब उन विभुने अपने विराड्रूपको छिपा लिया तो उसके अनन्तर पृथ्वीदेवी उन देवेश्वरके समीप आयीं और प्रणामकर बोलीं- '[आपने] मेरा आधा भार तो दूर कर दिया है। जब समग्र भार नष्ट हो जायगा तो मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी। इसलिये आगे भी [आप मेरा भारहरण] करते रहें' ॥ ३५-३६ ॥ जब [ऐसा कहकर] पृथ्वीदेवी अन्तर्धान हो गयीं तो इसके अनन्तर विनयावनत काशिराजने विनायकदेवकी पूजा की और प्रसन्न मनसे कहने लगे- 'हे विभो ! मैंने अतिशय आश्चर्यजनक [आपके लीलाविलासका] दर्शन किया है, जो न वाणीसे कहा जा सकता है और न ही जिसे मनसे जाना जा सकता है। पृथिवीका भार हरण करनेके लिये आप अवतीर्ण हुए और आपने वह सम्पन्न भी किया है ॥ ३७-३८ ॥ तैंतीस कोटि देवताओंसे भी जो न मारा जा सका,

४२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ]

उसे आपने [अकेले ही] मार डाला। हे सुरेश्वर! हम लोगोंके पुण्य अत्यधिक थे, इसीलिये हम आपके विराट् स्वरूपको देख सके' ॥ ३९ ॥ ब्रह्माजी बोले—जब काशिराज इस प्रकार कह रहे थे, तभी पुरवासी भी कहने लगे—'हे विभो! आप धन्य हैं। अहो! आप बालकका रूप धारण करके हम सभीको भ्रमित करते रहे। आपने अपनी कीर्तिका विस्तार करनेके लिये ये सभी कृत्य किये हैं।' [ऐसा कहकर] पुरवासियोंने परमभक्तिसे उन विभुका पूजन किया और


[दायाँ स्तम्भ]

इस प्रकार प्रार्थना करने लगे— ॥ ४०-४१ ॥ 'हे देव! हमें आप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये और कभी भी आपका हमसे वियोग न हो—ऐसा कीजिये।' तदुपरान्त उन नागरिकों और काशिराजने ब्राह्मणोंको भाँति-भाँतिके दान किये और उनसे प्रार्थना की कि ऐसे ही हमारी विजय होती रहे। उस समय नगरवासियोंने काशिराजको उपहार अर्पित किये और काशिराजने भी उन्हें उपहारादिसे सन्तुष्ट किया ॥ ४२-४३ ॥


॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'दैत्यदमन एवं विराड्दर्शन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥


बासठवाँ अध्याय

नरान्तकके सिरको लेकर उसके माता-पिताका देवान्तकके पास जाना और देवान्तकका

काशिराजकी नगरीपर आक्रमण करना


[बायाँ स्तम्भ]

ब्रह्माजी बोले—रौद्रकेतु विप्रकी भार्या, जिसका नाम शारदा था, वह अपनी सखियोंके साथ कौतूहलपूर्वक वितर्दी (आँगनमें बने चबूतरे)-पर बैठी हुई थी ॥ १ ॥ अचानक उन सबके साथ उसने आँगनमें गिरे हुए नरान्तकके सिरको देखा, जिसके दोनों कानोंमें कुण्डल सुशोभित हो रहे थे ॥ २ ॥ उस सिरके गिरनेसे वहाँ पर्वतशिखरके गिरनेके सदृश ध्वनि हुई, जिससे वह सम्पूर्ण नगर गूँज उठा। वह सिर उसी प्रकार श्यामल और शोभाहीन हो गया था, जैसे हिमपातसे प्रभावित कमल ॥ ३ ॥ उस आघातसे व्याकुल शारदा और रौद्रकेतु दोनों भयभीत हो गये, तदनन्तर सावधान होनेपर नरान्तकके सिरको देखकर वे दोनों अत्यन्त रुदन करने लगे ॥ ४ ॥ वे दोनों अपनी छाती पीटते हुए धरतीपर लोटने लगे और मूर्च्छित हो गये। तदनन्तर एक मुहूर्तके बाद जब वे पुनः चेतनायुक्त हुए तो माता शारदा उस सिरको अपने हृदयसे लगाकर अत्यन्त शोकाकुल हो उठी। वह विह्वल होकर वैसे ही करुण क्रन्दन करने लगी, जैसे मृतवत्सा गौ क्रन्दन करती है ॥ ५-६ ॥


[दायाँ स्तम्भ]

शारदा कहने लगी— [हे पुत्र!] तुम्हारा शरीर वीरोचित शोभासे परिपूर्ण रहता था, तुम सदैव युद्धके लिये उत्सुक रहते थे। [युद्धमें जाते समय] तुमने मुझसे कुछ कहा भी नहीं। अब तो कुछ बोलो ॥ ७ ॥ [हे वत्स!] तुम्हारा पूरा शरीर कहाँ गया ? तुम तो केवल सिरमात्रसे ही आये हो। तुम अकेले क्यों आये हो ? तुम्हारी महान् सेना कहाँ है ? तुम्हारे साथ जल लेकर चलनेवाले और छत्र तथा चँवर धारण करनेवाले कहाँ गये ? जिसे देखकर श्रेष्ठ सुन्दरियाँ विरहरूपी अग्निसे [संतप्त होकर] म्लान हो जाया करती थीं; तुम्हारा वह रूप अस्ताचलगामी सूर्यकी भाँति म्लान कैसे हो गया ? ॥ ८-९ १/२ ॥ मेरे द्वारा अथवा तुम्हारे पुत्रवत्सल पिताद्वारा तुम्हारा क्या अपराध किया गया है ? रुदन करते हुए हम दोनोंके आँसुओंको पोंछकर तुम हमसे क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ १० १/२ ॥ हे पुत्र! तुम [कभी तो] अत्यन्त मूल्यवान् बिस्तरसे युक्त पलंगपर शयन करते थे और इस समय कहाँ सो रहे हो—यह देखकर मेरा मन अत्यन्त खिन्न

क्री०ख०-अ०६२ ] * नरान्तकके सिरको लेकर उसके माता-पिताका देवान्तकके पास जाना * ४२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हो रहा है। तुम्हारे बिना हम दोनों किसीको मुँह दिखानेयोग्य भी नहीं रह गये हैं ॥ ११-१२ ॥ ब्रह्माजी बोले-शारदाके शोकपूर्ण वचनोंको सुनकर रौद्रकेतु भी शोकाकुल हो उठे और कहने लगे- 'हे प्रिय पुत्र ! तुम अपने विषयमें कुछ बताये बिना कहाँ चले गये ? ॥ १३ ॥ प्रतिदिन जो होता था और जो भविष्यकी योजना होती थी-उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको तथा अपने स्थानके विषयमें हमें तुम बताया करते थे; इस समय क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ १४॥ यदि तुम युद्धमें [शत्रुके] सम्मुख लड़ते हुए रक्त- धाराओंसे पवित्र होकर स्वर्गलोकको चले गये हो तो बिना मुझसे पूछे और मुझे त्यागकर क्यों चले गये ? तुम्हारा तो अपने माता-पिताके प्रति पुत्रभाव था, उसे शत्रुतामें कैसे परिणत कर दिया ? ॥ १५१/२ ॥ जब तुम सेवकके हाथसे अपने हाथमें तलवार ग्रहण करते थे, तो पर्वतों और काननोंसहित पृथ्वी और स्वर्ग काँपने लगते थे; ऐसे तुमको किसने [पृथ्वीपर] गिरा दिया, कालकी इस विपरीत गतिको हम नहीं जानते ॥ १६-१७ ॥ लोकमें प्रारब्ध ही बलवान् है, पुरुषार्थ निरर्थक है। मेरे वंश और इस लोकका आभूषणरूप नरान्तक न जाने कहाँ चला गया ? जो कालके लिये भी काल, शत्रुरूपी हाथीके लिये सिंह और राजाओंरूपी रूईका दाह करनेके लिये अग्निके समान था; जिसका प्रताप सूर्यके समान था-ऐसे तुम दात्र (लकड़ी काटनेका उपकरण)-से काटे गये वृक्षकी भाँति दो खण्डोंमें कैसे विभक्त हो गये ?' ॥ १८-१९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी !] इस तरह अनेक प्रकारसे शोक करके रौद्रकेतु और शारदा नरान्तकके सिरको लेकर देवान्तकके पास गये ॥ २०१/२ ॥ उन दोनों (माता-पिता)-को उस स्थितिमें देखकर देवान्तक त्वरापूर्वक भद्रासनसे उठकर उनके गले लगकर छोटे भाईकी मृत्युपर रुदन करने लगा। तब उसके परिवारके जो काल और यमके समान [दुर्धर्ष] दैत्य थे, वे भी नरान्तकके सिरको देखकर उच्च स्वरसे विलाप करने लगे ॥ २१-२२१/२ ॥ देवान्तक माताके हाथसे नरान्तकका सिर लेकर उसे अपने हृदयसे लगाकर भ्रातृस्नेहसे दुखी होकर कुररी पक्षीके समान क्रन्दन करने लगा ॥ २३१/२ ॥ देवान्तक कहने लगा-हम दोनों साथ-साथ भोजन करते थे, एक साथ जल पीते थे, साथ-साथ खेलते थे और एक साथ सोते तथा एक साथ उठते थे। हम दोनोंने साथ-साथ तप किया, साथ-साथ जप किया, [अब] तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गये ? ॥ २४१/२ ॥ जिस तुम्हें देखकर मनुष्य और देवता दसों दिशाओंमें पलायन कर जाते थे, वही तुम किस बलवान् दुष्टद्वारा मार डाले गये ? मैंने तो पृथ्वी और रसातलका ही राज्य तुम्हें निवेदित किया था, तो भी हे भ्रातृवत्सल (भाईके प्रति प्रेम रखनेवाले) ! तुम मुझे छोड़कर स्वर्ग कैसे चले गये ? ॥ २५-२६१/२ ॥ जिसके धनुषके टंकारकी ध्वनिसे सम्पूर्ण जड़- चेतन काँपने लगते थे, असंख्य राजागण जिसके भवनके द्वारदेशमें [किंकरोंकी भाँति] शोभा पाते थे; वही तुम माता-पिता और सुन्दर स्त्रीको छोड़कर कैसे चले गये ? ॥ २७-२८ ॥ देवान्तकका इस प्रकारका क्रन्दन श्रवणकर वीर लोग वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने बलपूर्वक उसका हाथ पकड़कर तर्कोंद्वारा समझाते हुए उसे क्रन्दन करनेसे रोका ॥ २९ ॥ लोगोंने कहा-हे राजन् ! किसी वीरके युद्धमें मारे जानेपर वीर लोग शोक नहीं करते हैं, अपितु वह जिसके द्वारा मारा गया है, उसके पास जाकर उसका बलपूर्वक वध करते हैं ॥ ३० ॥ सम्पूर्ण प्राणियोंके देहधारणके साथ ही उनकी मृत्यु भी प्रादुर्भूत होती है। हे राजन् ! वह मृत्यु आज हो या सौ वर्ष बाद; अपनी हो या दूसरेकी, परन्तु होगी अवश्य, इसमें सन्देह नहीं है। फिर ऐसी स्थितिमें क्या शोक करना है ? ॥ ३११/२ ॥ तब वह धर्मज्ञ असुर देवान्तक उन लोगोंके

४२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- प्रकारके] वचन सुनकर सावधानचित्त होकर माता- पितासे बोला- 'आप दोनों शोक न करें। मैं अपने उस शत्रुको ग्रास बनानेके लिये जा रहा हूँ। बताओ, जिसने मेरे भाईको मारा है, वह कहाँ रहता है? या तो मैं उसको मारकर सुखका अनुभव करूँगा अथवा स्वयं मरकर भाईके पास चला जाऊँगा ॥ ३२-३४ ॥ हे माता ! हे पिता ! मेरी भौंहोंके टेढ़े होनेमात्रसे त्रिभुवन कम्पायमान हो जाता है, फिर मेरे क्रोधित हो जानेपर तीनों लोकोंकी रक्षा कौन कर सकता है?' ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब देवान्तककी बात सुनकर वे दोनों (शारदा और रौद्रकेतु) आश्वस्त हो गये। शोकसागरमें डूबे हुए उन दोनोंका उसके वचनोंसे उद्धार हो गया ॥ ३६ ॥ ज्येष्ठ पुत्रके पूछनेपर रौद्रकेतुने विस्तारपूर्वक सारी बात कही-काशिराज नामसे विख्यात एक परम धार्मिक राजा है। उसके घरमें विवाह-सम्बन्धी महान् उत्सवका आयोजन था। उसमें सभी लोगोंके साथ 'विनायक' नामसे विख्यात कश्यपजीका पुत्र भी आमन्त्रित था। वह बालक होते हुए भी अत्यन्त बलवान् माना जाता है। हे पुत्र ! उसने रास्तेमें ही मेरे भाई धूम्राक्षको मार डाला। उसका बदला लेनेके लिये मैंने पाँच सौ निशाचर वीरोंको भेजा था, वे सब दौड़ते हुए वहाँ गये, परंतु उस सप्त- वर्षीय मुनिपुत्र [विनायक]-द्वारा वे सभी मार डाले गये। उनका प्रतिशोध लेनेके लिये नरान्तक स्वयं गया। उसके साथ अनेक शस्त्रोंसे युक्त चतुरंगिणी सेना थी; किंतु उनमेंसे एक भी वापस नहीं लौटा। अकस्मात् यह नरान्तकका [कटा हुआ] सिर दिखायी दिया, तो हम लोग शोकाकुल होकर उसके सिरको लेकर तुम्हारे सम्मुख आये हैं ॥ ३७-४२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-रौद्रकेतुका इस प्रकारका वचन सुनकर देवान्तक [क्रोधसे] काँपने लगा, उसके नेत्र लाल हो गये। वह [अपने आसनसे] उठ खड़ा हुआ। उस समय ऐसा लगता था, मानो वह तीनों लोकोंको निगल जायगा। अहंकार और अज्ञानके वशवर्ती होकर वह अपने पितासे कहने लगा- 'मैं सबको मारनेवाले कालको भी मार डालूँगा, पृथ्वीको उलटकर अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे क्षणभरमें ब्रह्माण्डको भस्म कर डालूँगा' ॥ ४३-४५ ॥ इस प्रकार अपने क्रोधपूर्ण वचनोंसे पृथिवीको कम्पित-सा करते हुए उसने उन सभी दैत्योंको बुलाया, जो देवताओंके अधिकारोंपर प्रतिष्ठित थे ॥ ४६ ॥ तदनन्तर देवान्तकने माता-पिताको प्रणामकर कहा- 'अब मैं शीघ्र ही उस मुनिकुमार [विनायक]-को लाऊँगा और उसके साथ ही [नरान्तकके इस] सिरका अग्नि-संस्कार करूँगा' ॥ ४७१/२ ॥ ऐसा कहकर देवान्तक तथा उसके साथी असंख्य दैत्योंने शीघ्रगामी पक्षियोंकी भाँति बलपूर्वक उड़कर और काशिराजकी नगरीमें पहुँचकर उसे चारों ओरसे घेर लिया ॥ ४८-४९ ॥ उस समय [काशीपुरीमें] महान् कोलाहल होने लगा और दिशाएँ धूलसे भर गयीं; [जिससे] सूर्यका प्रकाश भी वहाँ नहीं आ पा रहा था। [यह देखकर] पुरवासी अत्यधिक चीत्कार करने लगे ॥ ५० ॥ [वे कहने लगे-] नरान्तकको मरे तो अभी दो- तीन दिन भी नहीं हुए, तो फिर यह जनसंहारकारी प्रलय पुनः कैसे आ गया ? ॥ ५१ ॥ यह देखनेमें अत्यन्त कठिन भयंकर शरीरवाला कौन आ गया, यह तो कालको भी कवलित और तीनों लोकोंको भक्षण कर जानेमें समर्थ है ॥ ५२ ॥ इससे पहले भेजे गये दैत्यवीरोंका तो उस विनायकने वध कर डाला था, परंतु अब पुनः दैत्योंकी एक परिखा (खाईं)-सी बन गयी है, जिसके कारण अब बाहर जानेका मार्ग भी नहीं है ॥ ५३ ॥ जब पुरजन इस प्रकार कह रहे थे, तभी देवान्तकके आने (आक्रमण)-का समाचार काशिराजको बतलाने उसके दूत आ गये ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'नगरीनिरोध' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६२ ॥

तिरसठवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०६३ ] * अणिमादि सिद्धियोंकी सेनाका देवान्तककी सेनासे युद्ध * ४२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिरसठवाँ अध्याय अणिमादि सिद्धियोंकी सेनाका देवान्तककी सेनासे युद्ध दूतोंने कहा—हे राजन्! कालको भी भयभीत | विनायकने सिद्धिसे कहा कि [इस सेनापर विजय पाना] कर देनेवाले तथा नभःस्पर्शी मस्तकवाले अनेक प्रकारके | अकेलेके लिये साध्य नहीं है, अतः इस दैत्यपर विजय असंख्य भयंकर दैत्योंसे घिरे हुए महाभयंकर दैत्य | पानेके लिये तुम मेरी आज्ञासे अनेक प्रकारकी अपनी देवान्तकने आपकी नगरीको घेर लिया है। उसे देखकर | सेनाका निर्माण करो ॥ १११/२ ॥ हम लोग घबराकर आपके पास चले आये हैं। अब | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] तब सिद्धिने आपको जो करना हो, वह करें ॥ १-२ ॥ | परमात्मा विनायकके चरणकमलोंमें नमस्कार करके ब्रह्माजी कहते हैं—[हे मुने!] दूतके मुखसे | देवान्तकसे युद्ध करनेके लिये प्रस्थान किया और ऐसी [नरान्तकके आक्रमणका] सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर राजा | गर्जना की, जिसकी अनुगूँज सम्पूर्ण प्राणियों और काँपने लगे। वे अत्यन्त म्लान होकर शिशुओंके मध्य | दैत्योंके लिये भयदायिनी थी ॥ १२-१३ ॥ खेल रहे बालक विनायकके पास गये और उनसे सारा | उसके उस गर्जनकी महान् ध्वनि और उसके वृत्तान्त कहा— ॥ ३१/२ ॥ | प्रत्येक शब्दकी अनेक प्रतिध्वनियोंसे पर्वत और वृक्ष- राजा बोले—लीलापूर्वक मनुष्य शरीर धारण | समूहोंसहित [पृथ्वीको धारण करनेवाले] शेषनाग तथा करनेवाले हे परमात्मन्! आपको नमस्कार है। अनेक | द्युलोक भी चलायमान हो गये ॥ १४ ॥ प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले हे जड़-चेतनात्मक जगत्के | तदनन्तर सिद्धिने अष्ट सिद्धियोंका स्मरण किया, गुरु! आपको नमस्कार है। बालस्वरूप धारण किये हुए | वे सब भी वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आ गयीं। सबसे पहले आपके द्वारा हम सबकी अनेक बार रक्षा हुई है; हे प्रभो! | अणिमा [नामक सिद्धि] आयी, तदनन्तर गरिमा और इस समय भी आप हमारी इस देवान्तकसे रक्षा | उसके बाद महिमा एवं लघिमा [सिद्धियाँ] भी वहाँ कीजिये ॥ ४-५१/२ ॥ | आयीं। तत्पश्चात् प्राप्ति, प्राकाम्य और वशित्व सिद्धियाँ ब्रह्माजी कहते हैं—काशिराजद्वारा इस प्रकार | भी वहाँ आयीं। उसके बाद ईशित्व [नामक सिद्धि] प्रार्थना किये जानेपर बालक [विनायक]-ने विशाल | वहाँ आयी, तदनन्तर हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकोंके स्वरूप बनाकर हाथमें धनुष लेकर सिद्धि-बुद्धिसहित | अनेक यूथों (समूहों)-से युक्त उनकी [विशाल] सेना सिंहपर आरूढ़ होकर गर्जना की, जिससे पर्वतोंकी | वहाँ प्रकट हो गयी ॥ १५-१७ ॥ गुफाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं ॥ ६-७ ॥ | जिस प्रकार वर्षाकालमें नदियाँ सभी ओरसे [बहती अपने तेजसे सूर्यको तिरोभूत करते हुए तथा मुखसे | हुई] समुद्रमें जाती हैं, उसी प्रकार युद्धकी लालसावाली अग्निकणोंका वमन करते हुए उन्होंने अपने हाथोंमें | वह सेना दसों दिशाओंसे वहाँ आ रही थी ॥ १८ ॥ बाण, खड्ग, परशु और धनुषको धारण किया ॥ ८ ॥ | वह सेना अगणित [रण-] वाद्योंकी ध्वनि और तदनन्तर वे [बालकरूपधारी भगवान्] विनायक | वीरोंकी गर्जनासे अत्यन्त गुंजायमान हो रही थी। आकाशमार्गसे नगरके बाहर आये और उन्होंने अपने | भूमण्डलको ग्रास बना लेनेके लिये उत्सुक कालसदृश सिंहनादसे दैत्योंके मनको परिकम्पित कर दिया ॥ ९ ॥ | उन वीरोंको युद्धके लिये आया देखकर देवान्तकने अपने वहाँ उन्होंने दुर्धर्ष [दैत्य] देवान्तकको तथा उस | मनमें विचार किया कि मैं तो यह सोच करके आया था दुष्टकी सेनाको देखा। उस समय वहाँपर टिड्डियोंकी | कि क्षणमात्रमें इस बालकको पकड़ ले जाऊँगा, परंतु भाँति असंख्य दैत्य भ्रमण कर रहे थे ॥ १० ॥ | अचानक यह इस प्रकारकी सेना कहाँसे निकल आयी! उस अनेक प्रकारकी सेनाको देखकर विघ्नराज | मैं इसकी अद्भुत सामर्थ्य देख रहा हूँ। [अवश्य ही] इस

४२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बालकने मायासे यह सब किया है ॥ १९-२१ ॥ 'अब मैं या तो स्वयं मर जाऊँगा या इसे मार डालूँगा; क्योंकि जीवनका त्याग तो किया जा सकता है, परंतु यशका नहीं।' दैत्येन्द्रके इस प्रकार कहनेपर उसके सेनापतियोंने कहा- 'हम लोग सेनाके अग्रभागमें रहकर युद्ध करेंगे, आप सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करें, विजय हमारी ही होगी।' तब उनके वचनरूपी अमृतका पानकर हर्षित हुए देवान्तकने कहा- 'हे महावीरो! आप लोगोंने उचित बात कही है। [अब] आप लोग युद्धके लिये प्रस्थान करें, मैं भी आता हूँ। मेरा आशीर्वाद है कि आप सब पुण्य कर्म करनेवालोंकी विजय होगी' ॥ २२-२४ ॥ [तदनन्तर] देवान्तकसे आशीष ग्रहणकर और उसे नमस्कारकर कर्दम नामक दैत्य रथकी आकृतिवाले व्यूहका भेदन करनेके लिये गया। गरिमा [नामक सिद्धि]-के प्रधान वीरोंद्वारा निर्मित, वीरोंको मोहित करनेवाले अत्यन्त दुर्भेद्य चक्रव्यूहका भेदन करनेके लिये दीर्घदन्त [नामक दैत्य] गया ॥ २५-२६ ॥ प्रथिमाद्वारा रक्षित व्यूहका भेदन करनेके लिये तालजंघ [नामक दैत्य] प्रसन्नतापूर्वक गया। महिमाद्वारा निर्मित व्यूहके भेदनके लिये यक्ष्मा नामका दैत्य गया। प्राप्तिद्वारा विरचित व्यूहके भेदनहेतु महान् [दैत्य] घण्टासुर गया और बलशाली रक्तकेश प्राकाम्यरचित व्यूहका भेदन करने गया ॥ २७-२८ ॥ वशितारचित श्रेष्ठ व्यूहका भेदन करनेके लिये कालान्तक गया और दुर्जय नामक बलवान् दैत्य ईशिताद्वारा रचित व्यूहका भेदन करने गया ॥ २९ ॥ इन सबकी सामर्थ्यका वाणीसे वर्णन करना सम्भव नहीं है। वे आठों महाबलवान् दैत्य आठों सिद्धियोंद्वारा निर्मित [सैन्य] व्यूहोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३० ॥ [उस समय] दोनों ओरके सैनिक दूसरे पक्षको अत्यन्त दुर्जय मानते हुए परस्पर एक-दूसरेको मार रहे थे। वे इस प्रकार बाणवर्षा कर रहे थे, जैसे बादल मूसलाधार वर्षा करते हैं ॥ ३१ ॥ वीरगण अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे शत्रुओंके सिर काट रहे थे। उस समय वहाँ मारे गये हाथियों, घोड़ों और वीरोंकी कटी हुई जंघाओं, घुटनों, हाथोंके कारण पृथ्वी [चलनेमें] अत्यन्त दुर्गम हो गयी थी। कुछ वीर ढालको आगे करके शत्रुओंके पैर तोड़ दे रहे थे ॥ ३२-३३ ॥ कुछ वीर उछलकर पर्वतकी भाँति शत्रुओंपर गिरकर उन्हें चूर्ण कर डालते थे। धूलसे इतना अन्धकार छा गया था कि अपने ही पक्षके सैनिक परस्पर अपनोंको नहीं जान पा रहे थे। तभी अचानक देवताओंद्वारा मारे गये बहुत-से दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े और वैसे ही दैत्योंके द्वारा मारे गये देवगण भयानक चीत्कार करते हुए गिर पड़े ॥ ३४-३५ ॥ वहाँ (उस रणभूमिमें) शिरविहीन धड़ युद्ध कर रहे थे, जिसे देखकर अप्सराएँ प्रसन्न हो रहीं थीं। शस्त्रप्रहारसे रक्तस्राव होनेके कारण वीर योद्धा पुष्पित पलाश वृक्षोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३६ ॥ शुक्राचार्य मरे हुए दैत्योंको अपनी [संजीवनी] विद्यासे पुनः जीवित कर दे रहे थे, इससे आठों व्यूहोंके बलवान् देवसैनिक चिन्तित हो उठे। तदनन्तर शुक्राचार्यकी इस चेष्टाको उन सबने ईशितासे कहा। तब उसके क्रोधावेशित होनेपर उसके मुखसे एक कृत्या निकलकर उसके सामने आ खड़ी हुई। ईशिताने उसे आँखके संकेतसे आज्ञा दी, तब वह कृत्या भार्गव शुक्राचार्यको अपने गुह्यांगमें रखकर अन्तर्धान हो गयी और उन्हें ले जाकर बर्बरदेशमें छोड़ दिया। इसीलिये मनीषी लोग उन्हें बर्बरदेशीय कहते हैं ॥ ३७-३९१/२ ॥ तदनन्तर (शुक्राचार्यके रणक्षेत्रसे दूर चले जानेपर) देवता प्रसन्न हो गये और बलान्वित होकर (उत्साहपूर्वक) युद्ध करने लगे। तब उनके द्वारा मारे जाते हुए दितिपूत्र (दैत्यगण) भागने लगे। उनमेंसे कुछ दैत्य उनकी शरणमें चले गये और कुछ अणिमादि सिद्धियोंद्वारा प्रादुर्भूत देवताओं एवं गन्धर्वोंसे 'रक्षा करो, रक्षा करो'- ऐसा कहने लगे ॥ ४०-४११/२ ॥ उस युद्धमें कभी दैत्यगण विजयी होते थे और कभी देवताओंकी विजय होती थी। एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे वे युद्धमें संलग्न थे। तदनन्तर अस्त्र- शस्त्रोंके युद्धसे उपरत होकर उनमें भयंकर मल्लयुद्ध होने लगा ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'शुक्रत्याग' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥

चौंसठवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०६४ ] * देवान्तकसे युद्धमें सिद्धिसेनाकी पराजय * ४२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चौंसठवाँ अध्याय देवान्तकसे युद्धमें सिद्धिसेनाकी पराजय ब्रह्माजी कहते हैं— [हे मुने!] कालान्तक दैत्य | मुष्टिकाका कठोर प्रहार किया, जिससे वे भी भूमिपर और प्राकाम्यका परस्पर युद्ध हो रहा था और जब | गिर गये और सैकड़ों खण्डोंमें विभक्त होकर चूर-चूर कालान्तक प्राकाम्यपर विजय पाने ही वाला था, तभी | हो गये॥ १२-१३॥ वशित्वने वेगपूर्वक वहाँ पहुँचकर प्राकाम्यकी सहायता | तब वे सभी अपनी शक्तिसे विजय प्राप्त करके की और अपने हाथकी फुर्तीसे कालान्तकके मस्तकपर | गर्जना करने लगीं। 'विनायक विजयी हुए'—ऐसा वे एक पर्वत-शिखरसे प्रहार किया। उस [प्रहार]-से | सब कहने लगीं। अन्य अल्प बलवाले भी बहुतसे कालान्तक सहसा भूमिपर गिर पड़ा॥ १-२१/२॥ | दैत्य उनके द्वारा विनष्ट कर दिये गये, तब पुनः तब कालान्तकको रक्तसे लथपथ और दो भागोंमें | सभी श्रेष्ठ दैत्यवीर एकत्र होकर सिद्धिसेनाका विनाश विभाजित देखकर दैत्यसेनामें महान् हाहाकार फैल | करने लगे॥ १४-१५॥ गया। तदनन्तर मुसल नामक दैत्यपति और भल्ल नामका | उस समय दोनों सेनाओंमें मारो, मार डालो, बाँध एक अन्य असुर प्राकाम्य [नामक सिद्धि] एवं महिमा | लो, सावधान हो जाओ—इस प्रकारका महान् कोलाहल नामवाली सिद्धि—ये चारों उत्साहपूर्वक युद्धहेतु उद्यत | होने लगा। तदनन्तर शस्त्रोंके आपसमें टकरानेसे अग्नि हो गये। उस समय शस्त्रसे प्रहार करनेवाले अनेक दैत्य | उत्पन्न गयी। योद्धा शस्त्रोंके टूट जानेपर क्रोधित होकर प्राकाम्यसे युद्ध करने लगे॥ ३-५॥ | मल्लयुद्ध करने लगे॥ १६-१७॥ उस युद्धमें असंख्य देवता मरकर टूटे हुए वृक्षकी | पुनः एक-दूसरेका विनाश करनेवाला, अनियन्त्रित भाँति गिर पड़े। रक्तरूपी जलको प्रवाहित करनेवाली | और भयंकर युद्ध होने लगा। तभी सूर्य अस्त हो गये। वहाँ सहस्रों नदियाँ बहने लगीं॥ ६॥ | महान् अन्धकारसे चारों ओर सभी दिशाएँ व्याप्त हो तब ईशिता, वशिता और विभूति [नामक सिद्धियाँ] | गयीं, तब [अग्निगर्भा] दिव्य [प्रकाशमान] औषधियोंको वहाँ आ गयीं और युद्धमें उस प्राकाम्यकी सहायता करने | हाथमें ग्रहणकर वे परस्पर प्रहार करने लगे॥ १८-१९॥ लगीं। उन सिद्धियोंने उन चारों दैत्योंपर चार पर्वत | वह भयंकर युद्ध तीन दिन-रात लगातार चलता गिराये, जिससे वे चूर-चूर हो गये और उन्होंने अत्यन्त | रहा। उस समय दसों दिशाओंमें वीरोंको बहा ले दुर्लभ स्वर्गको प्राप्त किया॥ ७-८॥ | जानेवाली रक्तकी नदियाँ बहने लगीं॥ २०॥ युद्धमें अणिमाने बलपूर्वक कर्दमकी चोटी पकड़कर | वे नदियाँ ढालरूपी कछुओं, खड्गरूपी मछलियों, सहसा उसे पटक दिया, जिससे वह सौ टुकड़ोंमें विभक्त | हाथीरूपी मगरमच्छों, शवरूपी काष्ठों, शिररूपी कमलों होकर चूर-चूर हो गया। उसके मुखसे रक्तका स्राव होने | और केशरूपी शैवालोंसे सुशोभित हो रही थीं। वे लगा तथा उसने भूमिपर लुढ़कते हुए प्राण त्याग दिये। | कायरोंको भय देनेवाली और वीरोंके महान् हर्षको तदनन्तर महिमा, लघिमा और गरिमाने यक्षमासुर, तालजंघ | विशेषरूपसे बढ़ानेवाली थीं॥ २११/२॥ तथा दीर्घदन्तपर वृक्षसमूहोंसे प्रहार किया॥ ९-१०१/२॥ | तब बलवान् देवताओंके सदा विजयी होनेपर तब घण्टासुर, रक्तकेश और दुर्जय नामवाले | देवान्तक चिन्ता करते हुए अपने मनमें विचार करने लगा महाबलशाली दैत्य लम्बी साँस लेते हुए अपनी सम्पूर्ण | कि मैंने अपने पराक्रमसे समस्त देवसमूहोंपर विजय प्राप्त सेनाओंके साथ आये॥ १११/२॥ | की, फिर इस बालककी जन-सामान्यको मोहित करनेवाली उन [दैत्यों]-के द्वारा अपनी सेनाको मारा जाता | तुच्छ माया मेरे समक्ष क्या है? मैं अभी अष्टसिद्धियों देखकर वशिता आदि सिद्धियोंने उनके मस्तकपर अपनी | और उनकी सम्पूर्ण सेनाका नाश कर डालूँगा और इस