श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- धारण करूँगा। तब विराट् स्वरूपधारी उन विनायकने | प्रकार दैत्य दुरासदपर विजय प्राप्त करके देव विनायकने अपने एक हाथसे उस दुरासदको पकड़ लिया ॥ २७ ॥ | समस्त जगत्को आनन्दित कर दिया ॥ ३२ ॥ वे एक पैरसे काशीमें स्थित हुए ताकि बलपूर्वक | उन वक्रतुण्ड विनायकपर पुष्पोंकी वर्षा करके उन्हें उस नगरीकी रक्षा कर सकें और दूसरा पैर उन्होंने उस | प्रणाम करके और उनका भलीभाँति पूजन करके सभी दैत्यके सिरपर रखा। विनायक उस दैत्यसे बोले—अरे | देवता अपने-अपने स्थानोंको गये और मुनिगण भी दैत्य! भगवान् शिवके वरदानके प्रभावसे तुम्हारी मृत्यु | अपने-अपने आश्रमोंकी ओर चले गये ॥ ३३ ॥ नहीं हो रही है, अतः तुम इस काशीनगरीमें पर्वतके | अन्य जो-जो भी मनुष्य उन विनायककी पूजा करते समान निश्चल होकर रहो ॥ २८-२९ ॥ | हैं, उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस प्रकार तुम इस नगरीके द्वारके समान बनकर स्थित रहो, | काशीमें विनायकदेव छप्पन मूर्तियोंसे युक्त विख्यात हुए। ताकि यहाँ आनेवालोंकी दृष्टि सबसे पहले तुमपर ही पड़े। | वे विनायक अपने विराट् रूपको अन्तर्धान करके तुण्डन तुम यहाँ दुष्टजनोंको निरन्तर पीड़ा पहुँचाते रहो। तुम्हें | नामक पुरमें भी 'एकपाद विनायक' नामसे स्थित हुए और मेरी नित्य सन्निधि प्राप्त होगी। उस दैत्य दुरासदने भी | वहाँ वे सभीकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ३४-३५ ॥ परम भक्तिभावपूर्वक उसी वरकी याचना की ॥ ३०१/२ ॥ | जो भक्तिमान् पुरुष इस श्रेष्ठ आख्यानका श्रवण दैत्य दुरासद बोला— [हे विनायक !] आप इसी | करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाओंको प्राप्त कर प्रकारसे मेरे मस्तकपर पैर रखकर सदा स्थित रहें ॥ ३१ ॥ | लेता है और अन्तमें गणेशजीके धामको प्राप्त होता है। मुनि बोले—उस दैत्यसे 'ऐसा ही होगा' इस | वह सर्वत्र विजय प्राप्त करता है और पुष्टि तथा आरोग्य प्रकार कहकर विनायक काशीमें स्थित हो गये। इस | प्राप्त करता है ॥ ३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दुरासदपर विजयका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय देवताओं तथा मुनियोंद्वारा ढुण्ढिराज गणेश तथा छप्पन विनायकोंकी स्तुति तथा पूजाका वर्णन गृत्समद बोले—गणेशजीद्वारा उस दैत्य दुरासदपर | भी आप ही हैं ॥ ४ ॥ विजय प्राप्त कर लेनेके अनन्तर आठों दिक्पाल, | आप नाना प्रकारके अर्थोंकी गवेषणा करते हैं और मुनिगण, चन्द्रमा, सूर्य, देवगुरु बृहस्पति तथा शुक्राचार्य— | प्राणियोंको उन-उन कर्मोंमें नियुक्त करते हैं। मनीषियोंके ये सभी दुरासदके शत्रु प्रभु देवाधिदेव विनायककी | द्वारा ढुण्ढि (ढुन्ध्) धातुका प्रयोग गवेषण अर्थमें किया महिमाका इस प्रकार गान करने लगे— [हे प्रभो!] | गया है। इसलिये आपकी 'ढुण्ढि' यह संज्ञा है और आपने दैत्य दुरासदका दमन करके श्रुति-स्मृतिविहित | ढुण्ढिके अनन्तर 'राज' पदके प्रयोगसे आपको 'ढुण्ढिराज' मार्गकी स्थापना की है। दुरासदको पराजित करनेमें सब | कहा जाता है ॥ ५१/२ ॥ प्रकारसे अशक्त हम देवताओंको अपने अपने-अपने | आपका दर्शन, पूजा, ध्यान तथा स्मरण धर्म-अर्थ- पदपर प्रतिष्ठित किया है। आप ही इस विश्वकी सर्जना | काम तथा मोक्ष इस चतुर्विध पुरुषार्थका साधन है और करते हैं और आप ही कर्मफलोंको प्रदान करनेवाले | पुत्र-पौत्रको प्रदान करनेवाला है ॥ ६१/२ ॥ हैं ॥ १–३॥ | ऐसा कहकर उन सभी देवता आदिने मन्दार पुष्पों, आप समस्त प्राणियोंमें समान दृष्टि रखते हैं। आप | शमीपत्रों, हरित वर्णके दूर्वांकुरों तथा श्वेत पुष्पों और कर्मोंमें लिप्त नहीं होते। ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि चारों वर्ण | नाना प्रकारके पक्वान्नोंके नैवेद्यों और बहुत प्रकारके आपके ही आश्रयमें रहते हैं और सभी प्राणियोंके आधार | फलोंके द्वारा उन ढुण्ढिराजका पूजन किया ॥ ७-८ ॥
क्री०ख०-अ०४४ ] * मुनि गृत्समदद्वारा रानी कीर्तिसे विनायकदेवकी महिमाका कथन * ३७३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
साथ ही रत्नोंकी महान् राशि अर्पित करके तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन विनायकको सन्तुष्ट किया। इसी प्रकार उन्होंने [अविमुक्तेश्वर श्रीकाशी विश्वनाथजीके बाहर] सातों आवरणोंमें स्थित सभी छप्पन विनायकोंका भी पूजन किया ॥ ९॥
तबसे वे सभी छप्पन विनायक वाराणसी नगरीकी रक्षा करनेके लिये वहीं स्थित हो गये। उनसे अतिरिक्त पाँच मुखवाले एक पंचमुखी विनायक भगवान् विश्वनाथके द्वारपर स्थित हो गये ॥ १० ॥
अन्य सभी छप्पन विनायक भिन्न-भिन्न नामोंसे वाराणसीमें व्याप्त होकर (सातों आवरणोंमें) स्थित हो गये। भगवान् विश्वेश्वरके वाराणसीमें स्थित हो जानेपर वे सभी भी वहीं स्थित हो गये ॥ ११॥
तबसे सूर्य तथा चन्द्रमाके स्थित रहनेतक ब्रह्मा आदि सभी देवता तथा सभी मुनिजन अपने-अपने अधिकारोंमें स्थित हो गये। सभी लोग उसी प्रकार सभी धर्म-कर्मोंको करने लगे, जैसा कि वे पूर्वमें करते थे ॥ १२ ॥
हे कीर्ते ! जिस प्रकार तुमने पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया है। ढुण्ढिराज गणेशके अवतारकी कथाका श्रवण धर्म [-अर्थ], काम तथा सुख (मोक्ष) प्रदान करनेवाला है। अब मैं तुम्हें काशीके राजा दिवोदासके राज्यसे बाहर चले जानेकी कथा बताऊँगा ॥ १३॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'ढुण्ढिराजाख्यान' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥
चौवालीसवाँ अध्याय
मुनि गृत्समदद्वारा रानी कीर्तिसे विनायकदेवकी महिमाका कथन, काशीमें राजा दिवोदासके राज्य-शासनका वर्णन
कीर्ति बोली— [हे मुने!] आपने दैत्य दुरासदके वधके लिये तथा तीनों लोकोंके पालनके लिये अवतरित हुए शक्तिपुत्र ढुण्ढिराजकी कथाका वर्णन किया। मैंने आपसे यह सुना कि वे विनायक एक पैरसे तुण्ड[न] नगरमें स्थित हुए और दूसरे पैरसे दैत्य दुरासदके मस्तकको आक्रान्तकर वाराणसीमें स्थित हुए; तो दो पैरोंसे एक बारमें दो अलग-अलग स्थानोंपर रहना कैसे सम्भव है? हे ब्रह्मन् ! आप सब कुछ जाननेवाले हैं, अतः मेरे इस संशयका निवारण करें ॥ १–३॥
मुनि गृत्समद बोले— [हे कीर्ते!] विश्वरूप, विश्वके कर्ता, समस्त विश्वकी रक्षा करनेवाले तथा समस्त विश्वमें व्याप्त रहनेवाले विश्वेश्वर ढुण्ढिराज गणेशके शासनमें क्या असम्भव है ! ॥ ४॥
जो जगत्के अन्तर्यामी हैं, पर हैं, विश्वका संहार करनेवाले हैं, सातों पाताल ही जिनके चरण हैं, स्वर्गलोकतक जिनके केश व्याप्त हैं, जिनके हाथ-पैर सब ओर हैं, सभी ओर जिनके कान और नेत्र हैं, जो मनसे, वेदोंसे, ब्रह्मा आदि देवताओंसे तथा योगियोंके लिये भी यथार्थरूपसे अगम्य हैं। जो वायु, पृथिवी तथा जलस्वरूप हैं, जो हजारों सूर्योंके सदृश तेजोमय हैं, सूर्य, चन्द्रमा, आकाश आदि जिनका ही स्वरूप हैं, जो चराचर जगत्के गुरु हैं और स्वयं चराचरात्मा भी हैं। जिनके रोमकूपोंमें करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड उसी प्रकार भ्रमण करते रहते हैं, जिस प्रकार कि हवाके द्वारा लाये गये पतंगे आकाशमें घूमते रहते हैं, अतः हे मात: ! ऐसे उन देव विनायकके विषयमें कोई भी संशय अथवा तर्क-वितर्क नहीं किया जा सकता ॥ ५–९॥
वे प्रभु विनायक अनेक स्वरूपवाले हैं और चराचर विश्वकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं। हे राज्ञि! उनकी इच्छासे अमृत भी विषरूप तथा विष भी अमृतरूप हो जाता है, अतः उनके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। उन भगवान् गजाननके अवतारकी विचित्र गति कही गयी है ॥ १०-११ ॥
उन विनायकके कितने अवतार हुए, कब हुए और कहाँ हुए, इसे जाननेमें शेषनागसहित समस्त देवता भी कभी भी समर्थ नहीं हुए ॥ १२ ॥
अतः सभी धर्मोंको जाननेवाली हे कीर्ते ! इस प्रकारके संदेहोंका परित्यागकर मेरे द्वारा कही जानेवाली
३७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
कथाको सुनो, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो | आज्ञाका पालन करनेवाली थी ॥ २०-२१ ॥ जाता है ॥ १३ ॥ | राजा दिवोदास आचार, व्यवहार अथवा प्रायश्चित्त- प्राचीन कालकी बात है, सूर्यवंशमें दिवोदास | सम्बन्धी बातोंका निर्णय पण्डितजनोंसे करवाते थे, वे नामके एक राजा हुए, जो बहुत बड़े दानी, स्वाभिमानसे | किसीको भी राजदण्ड नहीं देते थे। उस समय सभी भरे हुए, सम्पूर्ण भूमण्डलमें मान-सम्मानको प्राप्त, | देवता शंकरजीके साथ मन्दराचल-पर्वतपर चले गये थे। देवगुरु बृहस्पतिके समान वक्ता, सर्वज्ञ, सर्वदा सभीका | राजा दिवोदासके काशीमें शासन करनेपर न तो किसीकी कल्याण करनेवाले, वेद-शास्त्रों तथा पुराणोंके ज्ञाता, | अपमृत्यु होती थी, न किसीको कोई शोक ही होता था और विद्वज्जनोंके अत्यन्त प्रिय थे ॥ १४-१५ ॥ | और न किसी प्रकारका दुःख ही था ॥ २२-२३ ॥ वे अपनी सुन्दर आकृतिसे स्त्रियोंको मोहित करनेवाले | उनके द्वारा शासित राज्यमें तीनों प्रकारके उत्पात होनेपर भी जितेन्द्रिय थे। वे निरन्तर उपकार-परायण, | (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) नहीं होते थे। वर्षा न दूसरेसे द्रोह करनेसे दूर रहनेवाले, पराये धनकी तनिक | होनेके कारण पशु-पक्षी तथा मनुष्योंमें जो महान् भी अभिलाषा न रखनेवाले, दूरदृष्टि रखनेवाले और | हाहाकार हो रहा था, वह अब शान्त हो गया था। वर्षा अत्यन्त पराक्रमसम्पन्न थे ॥ १६ १/२ ॥ | हो जानेके कारण खेतोंमें बहुत प्रकारके सस्य (धान्यादि) उन राजा दिवोदासकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर | उत्पन्न होने लगे। उन्हीं धान्यादिपर प्राणिमात्रका जीवन लोकोंपर उपकार करनेवाले ब्रह्माजीने वृष्टि न होनेके | आधारित रहता है ॥ २४-२५ ॥ कारण अकालग्रस्त काशीपुरीका उत्तम राज्य उन्हें प्रदान | पूर्व समयमें जिस प्रकारसे स्वाहाकार, स्वधाकार किया। सभी देवताओंको बहिष्कृत करनेपर ही उन | तथा वषट्कार (अर्थात् देवपूजन, यज्ञ-यागादि, श्राद्ध बुद्धिमान् राजा दिवोदासने काशीका राज्य स्वीकार किया | तथा तर्पण आदि) होता था, वह सब फिरसे होने लगा। था ॥ १७-१९॥ | जिन देवताओंने पूर्वमें उन राजाकी प्रार्थना की थी, वे तदनन्तर राजा दिवोदास स्वयं ही सूर्य, इन्द्र, अग्नि, | सुखी हो गये। ब्रह्माजीके कथनानुसार सभी देवताओंने वायु तथा चन्द्रमा बनकर धर्मपूर्वक उस काशीपुरीका | राजा दिवोदासकी स्तुति की, उन राजा दिवोदासने भी परिपालन करने लगे। उनकी सुशीला नामकी पत्नी थी, | देवोंका दर्शन प्राप्तकर विविध प्रकारसे उनकी बहुत जो पतिव्रता, धर्माचरणपरायण, दानशील तथा पतिकी | स्तुति की ॥ २६-२७॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दिवोदासके उपाख्यानमें' चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥
पैंतालीसवाँ अध्याय शंकरजीका सभी देवताओंको लेकर मन्दरगिरिपर जाना, राजा दिवोदासका काशीमें राज्य करना, भगवान् शिवका दिवोदासके विकार देखनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंको काशी भेजना, किंतु दिवोदासको निर्विकार देखकर उन सभीका काशीमें स्थित हो जाना, फलस्वरूप शिवका काशीदर्शनके लिये चिन्तित होना
कीर्ति बोली- हे मुने ! सभी देवता मन्दराचल | कृपा करें ॥ १ १/२ ॥ पर्वतपर क्यों चले गये और भगवान् शिवने उस रमणीय | मुनि गृत्समद बोले- एक बार जब बारह वर्षोंतक पुरी वाराणसीका क्यों परित्याग किया ? हे महामुने ! हे | लगातार वृष्टि नहीं हुई, तो सम्पूर्ण चराचर जगत् विनष्ट देवर्षे ! मुझे इस विषयमें संशय है, इसे आप दूर करनेकी | होने लगा, पृथ्वीपर स्वाहाकार-स्वधाकार तथा वषट्कार
क्री०ख०-अ०४५ ] * श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-तीन * ३७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 श्रीगणेश-परिवार श्रीशिव-परिवार
[क्रीडाखण्ड अ० ४५]
३७६ * श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-चार * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 भगवान् शिवद्वारा सूर्यदेवको काशीपुरी भेजना [क्रीडाखण्ड अ० ४५] भगवान् वामनको राजा बलिद्वारा भूदान [क्रीडाखण्ड अ० ३१]
क्री०ख०-अ०४५ ] * शंकरजीका सभी देवताओंको लेकर मन्दरगिरिपर जाना * ३७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] होना बन्द हो गया। तब उस समय ब्रह्माजीके वचनोंसे प्रेरित होकर देवताओंने भगवान् शंकरकी प्रार्थना की ॥ २-३ ॥ देवता बोले—हे महादेव ! हे जगन्नाथ ! हे करुणानिधान ! हे शंकर ! महर्षि मरीचि मन्दराचलपर स्थित होकर दस वर्षोंसे तपस्या कर रहे हैं। हे देव ! आप उन्हें वर प्रदान करनेके लिये वहाँ जायें ॥ ४१/२ ॥ मुनि गृत्समद बोले— [हे कीर्ते !] इस प्रकारसे देवताओंद्वारा प्रार्थना किये गये करुणासागर भगवान् महेश्वर अग्नि, चन्द्रमा, अर्यमा (सूर्य), आदि सभी देवताओंके साथ उन महामुनि मरीचीजीको वर प्रदान करनेके लिये मन्दरगिरिपर गये ॥ ५-६ ॥ भगवान् शिवने देखा कि वे अस्थिमात्र शेष रह गये हैं, कदाचित् वे उस समय वहाँ न पहुँचते तो महर्षि मरीचि अपने प्राणोंका परित्याग कर देते ॥ ७ ॥ उनके उत्कट तपसे पार्वतीपति भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपना पद प्रदान किया तथा विमानमें बैठकर वाद्योंकी ध्वनि करते हुए अपने गणोंके साथ शीघ्र ही अपने लोकमें पहुँचाया। तभीसे सभी देवगणोंके साथ भगवान् शम्भु अत्यन्त कल्याणकारी पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलमें रहने लगे ॥ ८-९ ॥ जब भगवान् सदाशिवने राजा दिवोदासमें कोई भी दोष नहीं देखा तो उन्होंने बड़ी ही उत्सुकतापूर्वक उनके दोषोंको देखनेके लिये देवताओंको वाराणसी पुरीमें भेजा। जो-जो देवता काशी जाते और राजा दिवोदासमें कोई भी दोष नहीं देख पाते, तो वे अपने नामसे वहाँ काशीमें शिवलिंग स्थापित करके वहीं स्थित हो जाते ॥ १०-११ ॥ राजा दिवोदासके राज्यमें ब्राह्मण आदि सभी चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने वर्ण एवं आश्रम-धर्मोंका परिपालन करते थे। सभी द्विजाति अपने आश्रममें स्थित होकर शास्त्रोंमें बताये गये आचारका पालन करते थे। शिष्य गुरुजनोंकी सेवा करते थे, स्त्रियाँ पतिव्रताएँ थीं और [सम्पूर्ण प्रजा] धर्माचरण करनेवाली, दानपरायण और व्रत-उपवास आदिके नियमोंका पालन करनेमें तत्पर
[दायाँ स्तम्भ] रहती थी ॥ १२-१३ ॥ संन्यासी तीनों समय (प्रातः, मध्याह्न तथा सायं) स्नानादि [संन्यासोचित] आचारोंका पालन करते थे, वानप्रस्थाश्रमी होम, मौनादिका आचरण करनेवाले थे। सभी गृहस्थाश्रम-धर्मका पालन करनेवाले, स्नान, सन्ध्या, जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजन, अतिथिसत्कार, बलिवैश्वदेव—इन आठ कर्मोंको निष्पाप रहकर बड़े ही श्रद्धा-भक्तिपूर्वक स्वयं ही करते थे ॥ १४-१५ ॥ इसी कारण वहाँ धर्मकी बड़ी वृद्धि हुई और उत्तम वृष्टि हुई। उस समय स्वर्गस्थित देवता अत्यन्त आनन्दित रहते थे और पितरोंको स्वधाकार (श्राद्ध-तर्पण आदि) प्राप्त होता था ॥ १६ ॥ उस समय काशीमें न तो कोई स्त्री वन्ध्या थी, न कोई मासिकधर्मसे विहीन, न कोई स्त्री विधवा थी और न कोई स्त्री ऐसी थी, जिसके बच्चे पैदा होते ही मर जाते हों। न तो अवर्षण होता था, न अतिवृष्टि होती थी, न तो कोई राजद्रोह था और न किसी शत्रुका भय था। तोतों, टिड्डियों तथा चूहोंसे खेतीको कहीं कोई भय नहीं था और भलीभाँति कृषिकी उपज निर्विघ्न सम्पन्न होती थी ॥ १७-१८ ॥ नृपश्रेष्ठ दिवोदास यह डिण्डिम घोष नित्य ही करवाते थे कि जो कोई भी व्यक्ति विश्वेश्वर, विन्दुमाधव, ढुंढिराज गणेश, भैरव, दण्डपाणि, कार्तिकेय, मणिकर्णिका एवं भवानी (अन्नपूर्णा)-का दर्शन किये बिना तथा मणिकर्णिका एवं गंगामें बिना स्नान किये भोजन करेगा, वह निश्चित ही दण्डनीय होगा ॥ १९-२० ॥ ऐसे राजश्रेष्ठ दिवोदासके राज्य करते समय वहाँ लेशमात्र भी पाप नहीं था। बिना किसी दोषके रहते भगवान् सदाशिव उस काशीके राज्यको लेना नहीं चाहते थे। उस समय वाराणसीसे दूर मन्दरगिरिमें रहनेके कारण वहाँ (काशी)-के वियोगसे भगवान् शिव अत्यन्त दुखी हो गये थे। तब उन्होंने विघ्न उपस्थित करनेके लिये आठ भैरवों (असितांग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण और संहारभैरव)-को काशीमें भेजा ॥ २१-२२ ॥
३७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ] भगवान् शिवने उनसे कहा—आपलोग राजा दिवोदासके राज्य काशीमें अणुमात्र (यत्किंचित्) पाप करायें। ऐसा होनेपर मैं दिवोदाससे काशीका राज्य ले लूँगा। इसमें कोई संशय नहीं है। हे भद्रे! भगवान् सदाशिवसे आज्ञा प्राप्तकर उन सभी भैरवोंने शीघ्र ही काशीके लिये प्रस्थान किया। वाराणसीका दर्शनकर, स्नान करनेके अनन्तर वे विश्राम करने लगे ॥ २३-२४ ॥ उन काशीराज दिवोदासका कोई भी पापकर्म न देखकर वे अष्ट भैरव वहीं काशीमें निवास करने लगे। उन भैरवोंके वहाँसे वापस न आनेपर शिवजी अत्यन्त चिन्तित हो उठे ॥ २५ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवने उन राजा दिवोदासके छिद्रोंको देखनेके लिये द्वादश आदित्योंको काशीमें भेजा, किंतु वे भी राजा दिवोदासके पुण्यकर्मोंको देखकर अत्यन्त आनन्दित हो काशीमें ही स्थित हो गये। वे द्वादश आदित्य कहने लगे—'हमने भगवान् शिवका कार्य तो किया नहीं और यह पुरी भी त्याज्य नहीं है।' तदनन्तर भगवान् शिवने चौंसठ योगिनियोंको राजाका छिद्र ज्ञात करनेके लिये काशीपुरीमें प्रेषित किया ॥ २६-२७ ॥ उन योगिनियोंने [जब] दिवोदासका अणुमात्र भी दोष नहीं देखा तो वे भी उन अविनाशी महेश्वरका यजन-पूजन करते हुए वहीं वाराणसीपुरीमें निवास करने लगीं। तदनन्तर महेश्वरने दुःखका विनाश करनेवाली भगवती दुर्गाको काशी भेजा, किंतु राजाका कोई भी पाप न देखकर वे दुर्गाजी भी काशी ग्राम (पुरी)-से बाहर स्थित हो गयीं। उन्होंने ध्यानयोगके द्वारा भगवान् शिवको प्रसन्न किया और सम्पूर्ण अभिलाषाओंको पूर्णकर मानवोंको सन्तुष्ट किया ॥ २८-२९१/२ ॥ इसके पश्चात् भगवान् शम्भुने शीघ्र ही आठों दिक्पालोंको काशी भेजा, वाराणसीमें गये हुए उन दिक्पालोंने भी राजा दिवोदासके रंचमात्र भी पापकर्मको
[दायाँ स्तम्भ] नहीं देखा। तब वे आठों दिक्पाल अपने-अपने नामसे वहाँ लिंग स्थापितकर प्रसन्नतापूर्वक वहीं काशीमें निवास करने लगे ॥ ३०-३११/२ ॥ तदनन्तर शंकरजीने अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक ऋषियोंको वहाँ भेजा। भगवान् शिवके द्वारा विशेष रूपसे प्रेरित किये जानेपर वे प्रसन्न मनसे त्वरापूर्वक वहाँ गये ॥ ३२ ॥ वाराणसीमें जाकर वे तीर्थस्नान आदिकी विधि सम्पन्न करके राजा दिवोदासको आशीर्वाद देनेके लिये उनके पास जा-जाकर उनकी चेष्टाओंको ध्यानसे देखने लगे। राजा दिवोदासने भक्तिपूर्वक उन सभीको धन तथा वस्त्र आदि प्रदानकर पूजा की, किंतु उन्होंने उस धनको राजप्रतिग्रह समझकर ग्रहण नहीं किया। परंतु ऋषियोंको भी राजा दिवोदासमें स्वल्प भी दोष दिखायी नहीं दिया ॥ ३३-३४ ॥ वे ऋषिगण भी वहाँ काशीमें अपने-अपने नामसे शिवलिंग स्थापित करके परम तप करने लगे। तदनन्तर शिवजीने अपने कार्यको सिद्ध करनेके लिये सभी देवताओंको काशी भेजा ॥ ३५ ॥ उन्होंने भी धर्माचरण करनेवाले उन दिवोदासका कोई भी दुष्कर्म नहीं देखा। जब वे देवता भी नहीं लौटे तो भगवान् शिव सोचने लगे कि जिस-जिसको भी मैंने काशी भेजा, वहाँसे कोई भी लौटकर नहीं आया ॥ ३६ ॥ तब चिन्तापरायण भगवान् रुद्र कुछ भी निश्चय नहीं कर सके। वे मन-ही-मन सोचने लगे कि कब मैं उस काशीपुरीको देखूँगा ॥ ३७ ॥ राजा दिवोदासके राज्यमें जब कोई पापकर्म होगा, तभी मेरे द्वारा काशीमें जाना होगा, ऐसा न होनेपर मुझे काशी कभी प्राप्त नहीं हो सकेगी ॥ ३८ ॥ ढुण्डिराज तथा माधवको छोड़कर सभी देवता विफल हो गये हैं। वे देवता वापस नहीं लौट रहे हैं और ध्यानपरायण होकर वहीं स्थित हो गये हैं ॥ ३९ ॥
[अन्तिम पंक्ति] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें दिवोदासके उपाख्यानमें पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥
छियालीसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०४६ ] * भगवान् शिवद्वारा ढुण्ढिराज गणेशसे काशी जानेकी प्रार्थना करना * ३७९ छियालीसवाँ अध्याय भगवान् शिवद्वारा ढुण्ढिराज गणेशसे काशी जानेकी प्रार्थना करना, ढुण्ढिराजका एक मायावी ज्योतिषीके रूपमें काशी जाना तथा वहाँके स्त्री-पुरुषों एवं राजा दिवोदासको भी अपनी भविष्यवाणियोंसे मोहित करना मुनि गृत्समद बोले—अविमुक्तक्षेत्र काशीके वियोगसे अत्यन्त सन्तप्त भगवान् शिवने सब प्रकारके अर्थोंका अन्वेषण करनेवाले ढुण्ढिराजको प्रणाम करके बड़े ही कातरभावसे उनसे प्रार्थना की ॥ १ ॥ भगवान् शिव बोले—[हे ढुण्ढे!] आप पृथ्वी, जल, तेज आदि पाँच महाभूतोंके कारणोंके भी कारण हैं। आप चिदानन्दघन, विश्वके द्वारा ध्येय तथा वेदान्तके द्वारा गोचर होनेवाले हैं। आप ही प्रधान (प्रकृति) भी हैं और आप ही पुरुष भी हैं। सत्त्वादि तीनों गुणोंमें विभाग करनेवाले आप ही हैं। आप समस्त विश्वमें व्याप्त रहनेवाले हैं, आप ही विश्वके निधि तथा विश्वकी रक्षा करनेमें तत्पर रहते हैं॥ २-३॥ आप नाना प्रकारके अवतार धारण करते हैं और पृथ्वीके भारको हलका करनेके लिये उद्यत रहते हैं। आप देवताओंकी रक्षा, दैत्योंके निधन तथा द्विजों, धर्मों, दुखिजनों और शरणागतोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। ब्रह्मस्वरूप आपने अपनी इच्छासे ही मेरी पुत्रताको स्वीकार किया है। फिर आपको छोड़कर काशीके विरहसे दुखित मैं अन्य किसकी शरणमें जाऊँ ? ॥ ४-५ १/२ ॥ ढुण्ढिराज बोले—हे सदाशिव ! आप सर्वविद्या- विशारद देवादिको ही वहाँ क्यों भेजते हैं? आप तो सर्वदर्शी हैं, फिर भी आप मोहको प्राप्त हो रहे हैं! ॥ ६ १/२ ॥ शिव बोले—हे गजानन ! राजा दिवोदासके कार्योंमें विघ्न उपस्थित करनेके लिये तथा मेरे कार्यकी सिद्धिके लिये आप इसी समय अविमुक्तक्षेत्र काशीमें जायें और वहाँ जाकर लोगोंको मोहित करें, जिससे राजाका पुण्य क्षीण हो जाय ॥ ७-८ ॥ ढुण्ढि बोले—हे महादेव ! मैं शीघ्र ही जाता हूँ, आप चिन्ता न करें। मैं आपका कार्य सिद्ध करूँगा। काशीनिवासी जनोंके पापके भागी बने राजा दिवोदासको मैं काशीसे बाहर करूँगा, जिससे आप शीघ्र ही अपनी पुरीका दर्शन कर सकेंगे ॥ ९ १/२ ॥ मुनि गृत्समद बोले—इस प्रकार कह करके सम्पूर्ण विद्याओं तथा कलाओंके निधान, विभु, ढुण्ढिराज गजाननने भगवान् शिव, पार्वती, कार्तिकेय, देवर्षि नारद तथा गुरुको प्रणाम करके और उनकी प्रदक्षिणा करके काशीके लिये प्रस्थान किया ॥ १०-११ ॥ वाराणसी पहुँचकर ढुण्ढिराजने सर्वत्र दिवोदासका पुण्य ही. देखा। तब उनका कोई भी पाप न देखकर उन्होंने शीघ्र ही एक ज्योतिषीका रूप धारण कर लिया। उस समय उनकी कान्ति चमकते हुए स्वर्णकी भाँति थी। देह अत्यन्त दिव्य थी। वे मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित थे। उन्होंने नाभिमें महान् रत्नोंसे सुशोभित करधनी पहनी हुई थी ॥ १२-१३ ॥ उन्होंने पीले वस्त्रोंका परिधान धारण कर रखा था। शरीरपर दिव्य गन्धोंका अनुलेपन किया हुआ था। उनका शरीर कामदेवसे भी अधिक सुन्दर था और वे कामिनियोंको मोहित करनेवाले थे ॥ १४ ॥ वहाँ जो पतिव्रता स्त्रियाँ थीं, वे भी उन ज्योतिर्विद् द्विजके प्रति आकृष्ट हो गयी थीं। ज्योतिर्विद् बने वे ढुण्ढिराज सबके द्वारा मनमें चिन्तित बातको बतला देते थे। अतएव पतिव्रता स्त्रियाँ अपने बालकों, पतियों, भाइयों तथा अन्य सुहृज्जनोंको छोड़कर [अकेले ही] अपना प्रश्न पूछनेके लिये उनके समीपमें आयीं ॥ १५-१६ ॥ वे लोगोंको अपनी मायाके प्रभावसे स्वप्न दिखलाते थे और फिर उनका उत्तर भी बतला देते थे। वे अपनी सेवा करनेवाले जनोंको बहुत-से उत्तम वर प्रदान कर देते थे। उनके वरदानके प्रभावसे असाध्य कुष्ठ भी नष्ट हो जाता था और पूर्णरूपसे वन्ध्या स्त्रियाँ भी वरकी
३८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- सामर्थ्यसे पुत्रवती होने लगीं ॥ १७-१८ ॥ हाथ देखकर वे लोगोंके भाग्य तथा उनके कर्मोंको बता देते थे। जिस-जिसके द्वारा जो-जो भी भोजन किया हुआ रहता था और जो-जो वह आगे खायेगा; वह सब वे सही-सही तत्क्षण बता देते थे ॥ १९ ॥ उन्हें देखकर काशीनगरीके सभी लोग आश्चर्य- चकित और अत्यन्त प्रसन्नतासे भरे हुए थे। वे परस्पर यह कहते थे कि इस प्रकारका ब्राह्मण हमने नहीं देखा, जो कि सब कुछ जाननेवाला हो और गुणोंका खजाना हो। लोग उनके विषयमें यह कहते थे कि ऐसा व्यक्ति न कोई पहले हुआ और न कोई भविष्यमें होगा ॥ २० १/२ ॥ उनपर पूर्ण विश्वास करके लोग धन तथा रत्नोंद्वारा उनकी पूजा करने लगे। मुट्ठीमें बन्द वस्तुओंके विषयमें वे तत्क्षण ही बता देते थे। प्रश्न पूछनेके लिये आये हुए धनहीन तथा पुरुषार्थरहित व्यक्तिके मनकी बातको वे जान जाते थे और उससे कहते कि तुम तीन दिनके अन्दर ही धनवान् व्यक्ति हो जाओगे और फिर सचमें ऐसा ही होता भी था ॥ २१-२३ ॥ दूर गयी हुई तथा खोयी हुई वस्तुके विषयमें वे जैसा कहते थे, ठीक वैसा ही होता था। विप्ररूपधारी उन ढुण्ढिराज गजाननके इस प्रकारकी भविष्यवाणियाँ करनेकी बातको लोगोंद्वारा कहते हुए जब दो-तीन महीने बीत गये तो यह समाचार राजा दिवोदासके कानोंतक भी पहुँचा ॥ २४ १/२ ॥ राजाकी रानियाँ तथा अन्य भी पतिव्रतपरायणा स्त्रियाँ, जो कि अभीतक पतिके अतिरिक्त अन्य किसी देवताको भी नहीं मानती थीं, वे भी अब पतिकी आज्ञा लिये बिना ही 'हमारे पुत्र होगा या कन्या होगी' इस विचारको जाननेके लिये उन ज्योतिर्विद् ब्राह्मणको देखनेके लिये निकल पड़ीं। सखियोंने उन्हें यह कहकर रोका कि वे ज्योतिषी ढुण्ढि यहीं आ जायँगे ॥ २५-२७ ॥ तदनन्तर उन रानियोंने उन ज्योतिषीको बुलवाया और उन्हें वे एकान्त स्थानमें ले गयीं। उन्हें रमणीय आसनपर बैठाकर राजपत्नियोंने उनका भलीभाँति पूजन किया। उनके दर्शनसे अत्यन्त विह्वल हुई उन रानियोंने उनके दोनों चरणोंको प्रक्षालित किया और उनके शरीरपर कस्तूरी चन्दनका भलीभाँति विलेपन किया ॥ २८-२९ ॥ उनके समीप जाकर किसी रानीने उन्हें स्वयं अपने हाथोंसे पानका बीड़ा दिया। उन रानियोंने उनसे बहुत- से प्रश्न पूछे और उन्होंने उन सभी प्रश्नोंका सही-सही उत्तर दिया। इस प्रकार उनपर विश्वास हो जानेपर वे सभी अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं। वे घरके कामोंको करना छोड़कर तत्पर होकर प्रतिदिन उनका दर्शन-पूजन करने लगीं ॥ ३०-३१ १/२ ॥ 'इस प्रकारका भूत, वर्तमान तथा भविष्यका ज्ञाता ज्योतिषी हमने इससे पूर्व कभी नहीं देखा।' इस प्रकार कहती हुई वे सभी उन श्रेष्ठ ज्योतिर्विद्की प्रशंसा करने लगीं। तदनन्तर राजा दिवोदासके उठकर वहाँ पहुँचनेसे पहले उन सभीने क्षणभरमें शीघ्र ही उन्हें विदा कर दिया ॥ ३२-३३ ॥ वे स्त्रियाँ पतिभावका परित्याग करके उन्हीं ज्योतिर्विद्का सदा चिन्तन किया करती थीं। राजा दिवोदासने भी उन ज्योतिषीके विषयमें जानकर उनको बुलाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ३४ ॥ अपने राजसिंहासनपर उन्हें विराजमानकर विष्टर आदिसे उनकी पूजा की और बड़े ही आदरपूर्वक उन्हें गौ, अर्घ्य, धन तथा वस्त्र समर्पित किये ॥ ३५ ॥ राजाने उनसे जो-जो भी बात पूछी, उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक वह सब ठीक-ठीक बता दिया। अब तो राजा दिवोदास अपने अभीष्ट देवको भूल गये और उनका ही स्मरण-ध्यान करने लगे ॥ ३६ ॥ राजाने एकान्तमें उनसे अनेकों प्रकारके प्रश्न पूछे। तब विश्वास हो जानेपर उनसे आदरपूर्वक प्रार्थना की कि [हे ब्रह्मन् !] मैं आपको अनेकों ग्राम, धन-धान्य प्रदान करूँगा, आप मेरे समीप ही ठहरिये; क्योंकि मैंने आपके बहुत-से चमत्कारोंको देखा है ॥ ३७-३८ ॥ तदनन्तर प्रपंचसे अर्थात् राजाद्वारा दिये गये प्रलोभनोंसे रहित होकर ढुण्ढिने कहा - मैं स्त्री, पुत्र कन्या तथा मकान आदिको छोड़कर वाराणसी आया हूँ। मेरी ग्राम,
क्री०ख०-अ०४७ ] * भगवान् विष्णुद्वारा बौद्धरूप धारणकर काशीवासियोंको उपदेश देना * ३८१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 धन-धान्यमें कोई रुचि नहीं है, मैं सर्वथा आसक्तिरहित | आप बिना कुछ विचार किये कर लें ॥ ४१ ॥ हूँ। मैं एक बात आपको बताता हूँ, उसे आप अपने मनमें | हे राजन् ! इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा, इसमें बैठा लें ॥ ३९-४० ॥ | संशय नहीं है। इस बातसे ही आप समझ लें कि मैंने आजसे सत्रहवें दिन जो कोई भी पुरुष आपके पास | आपके द्वारा देनेयोग्य ग्रामों, धन-धान्य तथा धन- आयेगा और वह आपसे जो कुछ भी कहे, उस बातको | सम्पत्तिको प्राप्त कर लिया ॥ ४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'काशिराजका वशीकरण' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥ सैंतालीसवाँ अध्याय भगवान् विष्णुद्वारा बौद्धरूप धारणकर काशीनिवासियोँको उपदेश प्रदान करना, काशीमें अधर्माचरणकी वृद्धि, भगवान् विष्णुका अपने चतुर्भुजरूपमें दिवोदासको दर्शन देना और अनेक वर प्रदान करना तथा शिवके काशी-आगमनके लिये दूतद्वारा सन्देश भेजना, दिवोदासद्वारा काशीका राज्य त्यागकर तपस्यामें निरत होना राजा दिवोदास बोले- हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपके | हैं। यज्ञ-यागादिमें हवन करनेके लिये वृक्षोंका काटना वचनका अवश्य पालन करूँगा। मैं भगवान् शिवकी | तथा यज्ञमें पशुओंकी हिंसा करना व्यर्थ ही है। दूसरेको शपथ लेकर कहता हूँ कि जैसा आपने कहा है, मैं वैसा | दान देना अथवा दक्षिणा देना अपने धनको नष्ट करना ही करूँगा। उससे अन्यथा कुछ नहीं करूँगा ॥ १॥ | है ॥ ६-७ ॥ गृत्समद बोले- इस प्रकार ज्योतिषीका वेश | शरीरके नष्ट हो जानेपर पृथ्वी आदि पाँचों भूत धारण किये उन ढुंढिराजने भूत, भविष्य, वर्तमान तथा | पाँचों भूतोंमें लीन हो जाते हैं। अतः प्रसन्नताके साथ दूरकी बातोंकी सत्य-सत्य भविष्यवाणियाँ करते हुए | घृतसहित पक्वान्न अकेले ही खाना चाहिये। नाना काशीमें निवास करनेवाले सभी जनोंको अपने वशमें कर | प्रकारके भोगोंके द्वारा तथा विविध सुखोंका आनन्द लेते लिया। वे लोग अपने सभी कर्मोंको छोड़कर उन्हींकी | हुए इस शरीररूपी आत्माकी ही सेवा करना चाहिये। सेवामें लग गये। तदनन्तर काशीके पंचक्रोशीक्षेत्रसे बाहर | ऐसा उपदेश सुनकर वहाँके सभी लोग अपने-अपने स्थित होकर भगवान् विष्णु बौद्धका अवतार धारणकर | आचार-विचारका परित्यागकर जैसा बुद्धने कहा था, काशीमें आकर सभी लोगोंको अपनी मायासे मोहित | उसी प्रकारका आचरण करने लगे ॥ ८-९ ॥ करने लगे। उन्होंने सनातनधर्मरूपी वृषसे द्वेष करते हुए | वे ब्राह्मणोंतकको भोजन न कराकर स्वयं ही उत्तम श्रुति-स्मृतिके विरुद्ध मतका वहाँके निवासियोंको पाठ | भोगोंका उपभोग करने लगे। उन (बौद्ध)-की पत्नीका पढ़ाया ॥ २-४॥ | नाम कमला था। उसने भी वाराणसीमें स्थित होकर वहाँ उन्होंने भी अपने वचनोंके द्वारा काशीके सभी | निवास करनेवाली सभी स्त्रियोंके मनोरथोंको पूर्ण करते बड़े-बड़े लोगोंको अपने वशमें कर लिया। उन्होंने | हुए उन सभीको व्यामोहमें डाल दिया। वह उन्हें प्रतिदिन भगवान्के साकार भजन अर्थात् मूर्तिपूजाको सर्वांशमें | कुमार्गमें चलनेको प्रेरित करती थी ॥ १०-११ ॥ बड़े ही समारोहपूर्वक दूषित बताया ॥ ५ ॥ | इस प्रकार उन दोनोंके वचनोंसे काशीपुरी तथा उन्होंने कहा कि सभी लोग मूर्ख बुद्धिवाले हैं; | वहाँके ग्रामोंमें निवास करनेवालोंकी बुद्धियाँ नष्ट-भ्रष्ट क्योंकि परमात्माके हृदयमें स्थित होनेपर भी न जाने क्यों | हो गयीं। जो परमात्मा अपने शरीरमें तथा पतिके शरीरमें वे मिट्टी तथा धातु आदिसे निर्मित मूर्तियोंकी पूजा करते | स्थित है, वही दूसरेके शरीरमें भी स्थित है ॥ १२ ॥
३८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] जिस प्रकारसे व्यक्ति मुख, नाक, हाथ आदि विभिन्न अंगोंके भिन्न होनेपर भिन्न नहीं होता। उसी प्रकारसे यह आत्मा भी जरायुज, स्वेदज आदि चार प्रकारके प्राणियोंमें अलग-अलग नहीं होता अर्थात् एक समान रूपसे स्थित रहता है। इस प्रकारसे प्रलोभनमें डाली गयी वे स्त्रियाँ परपुरुषोंके साथ भी सम्पर्क करने लगीं। ब्राह्मणोंका अग्निहोत्र तथा अन्य यज्ञोंके प्रति आदर शिथिल हो गया ॥ १३-१४॥ व्रतमें, दानमें, होममें, देवताओं तथा ब्राह्मणोंके पूजनमें और यज्ञीय पशुओंके आलभनमें लोग संशय करने लगे। [ब्राह्मणोंको न बुलाकर] लोग परस्पर एक-दूसरेके घरोंमें जाकर श्राद्ध-सम्बन्धी तथा व्रतोपवास-सम्बन्धी उत्तम भोजनको स्वयमेव ही करने लगे ॥ १५-१६ ॥ इस प्रकार वहाँ [वैदिक] धर्मका लोप होने लगा और पापकी वृद्धि हो गयी। तदनन्तर बौद्धरूप विष्णु शीघ्र ही राजा दिवोदासके भवनमें गये। राजा दिवोदासने अपने शुभ आसनपर बैठाकर परम भक्तिभावसे उनका पूजन किया। तदनन्तर बोलनेमें अत्यन्त कुशल बौद्धने दिवोदाससे यह वचन कहा- ॥ १७-१८ ॥ बौद्ध बोले— हे राजन् ! सुनिये, मैं आपके हितकी बात बताता हूँ, उसे सुनकर आप आदरपूर्वक उसका पालन करें। इस वाराणसी नगरीका त्रिशूलधारी भगवान् शंकरने अपने तेजसे निर्माण किया है। प्रलयकालमें भी वे सभी प्राणियोंके साथ इस वाराणसीपुरीको अपने त्रिशूलके अग्रभागमें धारण किये रहते हैं। इस नगरीमें पुण्यात्माजनों तथा मरनेके अनन्तर मोक्ष चाहनेवाले लोगोंके द्वारा ही निवास किया जाना चाहिये ॥ १९-२० ॥ पापात्मा जनोंको भैरवद्वारा इस नगरीसे बाहर कर दिया जाता है और पुण्यात्मा जनोंकी रक्षा भगवान् शिव तथा भैरव यहाँ करते रहते हैं। आपका पुण्य जबतक था, तबतक तो आप काशीमें राज्य करते हुए यहाँ स्थित रहे, किंतु अब आप वैसे पुण्यात्मा नहीं रहे। हे राजन् ! आपके राज्यमें नरकको प्राप्त करानेवाला पाप प्रवृत्त हो चुका है ॥ २१-२२१/२॥ राजा दिवोदास बोले— आपने मुझसे ठीक ही
[दायाँ स्तम्भ] कहा है, मैं आपके वचनोंका पालन करूँगा। ज्योतिर्विद् ढुंढिराजने पहले जो कहा, वह सत्य ही हो रहा है। हे पुरुषोत्तम ! यदि मैं आपके यथार्थ स्वरूपको जान सकूँ तो आप मुझे बतायें कि आप कौन हैं? जो मेरा हित करनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ २३-२४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर दयाके वशीभूत होकर उन्होंने राजा दिवोदासको अपना शंख, चक्र एवं गदाधारी चतुर्भुजरूप दिखाया। उन्होंने अपना विराट् एवं व्यष्टिरूपात्मक चित्स्वरूप उन्हें दिखलाया ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर राजा दिवोदासने अत्यन्त हर्षपूर्वक उन्हें नमस्कार करके उनका पूजन किया। उनके दर्शनोंसे आह्लादित हुए राजा परम भक्तिपूर्वक नृत्य करने लगे ॥ २७ ॥ वे उनसे बोले—हे अनघ ! आज मैं अपने पितरोंसहित धन्य हो गया। पहले मैंने राज्यका त्यागकर बहुत-सा तप किया था। ब्रह्माजीने जबरदस्ती यह काशीका उत्तम राज्य मुझे सौंपा था। आज आपका दर्शन कर लेनेसे मेरे जन्म तथा मरण—दोनोंका बन्धन छूट गया है, इसमें कोई संशय नहीं है। मैं आपके शरणागत हूँ और आपसे यही वरदान माँगता हूँ ॥ २८-२९१/२ ॥ मुनि (गृत्समद) बोले— ऐसा कहे जानेपर वे परमात्मा उन नृपश्रेष्ठ दिवोदाससे बोले—हे श्रेष्ठ राजन् ! भगवान् विश्वेश्वरकी कृपासे आपको भी परम मुक्ति प्राप्त होगी, इस समय आप काशीके राज्यका परित्यागकर सुखी हो जायँ ॥ ३०-३१ ॥ यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो भैरव और दण्डपाणि आपको काशीसे बाहर कर देंगे। उनका इस प्रकारका वचन सुनकर राजा दिवोदास अत्यन्त चिन्तित हो उठे। तदनन्तर उनके कथनके कारणपर ध्यान लगाकर तथा विचार करके राजाने वह सब कुछ जान लिया कि ज्योतिषीके रूपमें वे ढुंढिराज गणेश थे। बौद्ध बनकर ये मायावी विष्णु ही यहाँ आये हुए हैं ॥ ३२-३३ ॥ तदनन्तर उन्होंने सिर झुकाकर भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और उनसे कहा—आप कौन हैं? तब वे महाविष्णु भी उनकी भावनाको समझ करके अपने वास्तविक रूपमें [पुनः] प्रकट हो गये। उस समय वे
क्री०ख०-अ०४८ ] * ढुण्ढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना * ३८३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रभु चतुर्भुजरूपमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये थे। उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था और वे सभी लोकोंके परम आश्रयस्वरूप थे॥ ३४-३५॥ तब राजा दिवोदास उनसे बोले—हे पूज्य! आज मैं धन्य हो गया तथा मेरे पूर्वज भी धन्य हो गये, जो कि मैंने अपने पुण्यके प्रभावसे मोक्ष प्रदान करनेवाले आपके चरणयुगलका दर्शन किया है। आप मुझे परम मोक्ष प्रदान करें और इस मुद्राको ग्रहण करें, जिसे कि ब्रह्माजीने मुझे हठात् प्रदान किया था। अब आजसे यहाँ भगवान् शिव अपना राज्य शासन करें। तब भगवान् विष्णुने उनसे कहा—भगवान् शिव आपको मुक्ति प्रदान करेंगे॥ ३६-३७१/२॥ ब्रह्माजी बोले—राजा दिवोदाससे ऐसा कहकर महायोगेश्वर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये और पुनः बौद्धरूप धारणकर अपने आश्रमको चले गये। तत्पश्चात् उन्होंने भगवान् शिवके वहाँ आगमनके लिये दूतको भेजा। [दूतने भगवान् शिवसे कहा—] 'ज्योतिर्विद् ढुण्ढिराज गणेशने और मैंने राजा दिवोदासके राज्यमें बहुत प्रकारसे अधर्मकी वृद्धि की है और राजा दिवोदासने आपके लिये काशीके राज्यका परित्याग कर दिया है। अतः हे विश्वेश्वर! आप शीघ्र ही अपनी वाराणसीपुरीमें आयें'॥ ३८-४०१/२॥
इधर राजा दिवोदासने राजाके चिह्नोंका परित्याग करके महान् तप किया। उन्होंने एक अत्यन्त सुन्दर मन्दिरमें अपने नामसे एक अत्यन्त विख्यात शिवलिंग (दिवोदासेश्वर)-की स्थापना की, वह लिंग सकाम उपासना करनेवालोंकी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाला है और मोक्षार्थियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है। वे राजा दिवोदास सभी प्रकारके पुरुषार्थों (धर्म- अर्थ-काम तथा मोक्ष)-को प्रदान करनेवाले भगवान् शंकरके दर्शनकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ४१-४२॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें '[दिवोदासके] राज्य-त्यागका वर्णन' नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४७॥
अड़तालीसवाँ अध्याय ढुण्ढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना, भगवान् शिवका काशीमें आकर ढुण्ढिराजकी स्तुति करना तथा ढुण्ढिराजकी महिमाका प्रतिपादन करना, रानी कीर्तिका काशी आकर ढुण्ढिराजकी भक्ति करना, ढुण्ढिराजका प्रत्यक्ष दर्शन देकर उसे तथा उसके पुत्रको अनेक वर प्रदानकर कीर्तिपुत्रका 'पर्शुबाहु' नामकरण करना
मुनि गृत्समद बोले—राजा दिवोदासने काशीका राज्य छोड़ दिया है—ऐसा जानकर ढुण्ढिराज गणेश ज्योतिषीका रूप छोड़कर पुनः अपने वास्तविक स्वरूपमें आ गये और सभी लोगोंको सब प्रकारका अभिलषित पदार्थ देनेवाले बनकर ढुण्ढिविनायक नामसे काशीमें स्थित हो गये॥ १॥ तदनन्तर आनन्दमें निमग्न हुए महाबुद्धिमान् ढुण्ढिराजने भगवान् शिवके पास यह सन्देश कहकर दूत
३८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- भेजा कि आप शीघ्र ही काशीमें चले आयें ॥ २ ॥ भगवान् शिव वृषभपर आरूढ़ होकर दिव्य वाद्योंके घोषके साथ अपने गणोंसे घिरे हुए रहकर वाराणसीकी ओर चल पड़े। वहाँ निराहार रहकर महर्षि जैगीषव्य, जो तपस्या करते-करते दीमककी बाँबीके समान हो गये थे, उनपर कृपा करके भगवान् शिव ढुण्ढिविनायकको प्रणाम करके उनसे बोले- ॥ ३-४॥ भगवान् शिव बोले- हे विश्वेश्वर! आप ही विश्वरूप हैं, हे देव! आप ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। आप ही इसकी रक्षा करते हैं और आप ही इसका संहार करते हैं। हे गणेश! आप जीवोंके शुभ एवं अशुभ कर्मोंके द्रष्टा हैं और उन्हें तदनुरूप विविध प्रकारका सुख-भोग प्रदान करनेवाले हैं ॥ ५ ॥ इस चराचर जीव-जगत्का आप संहार करनेवाले हैं और आप ही सत्त्वादि तीन गुणोंमें विभेद करनेवाले हैं। आपके ही कृपाप्रसादसे भगवान् विष्णु, पद्मयोनि ब्रह्मा और भगवान् शिव अपने-अपने कर्मोंको करनेमें समर्थ होते हैं। आपके बिना वेदोंका विधि-विधान व्यर्थ हो जाता है और आपकी ही कृपाशक्तिसे देवताओंके शत्रु असुरोंका विनाश होता है ॥ ६-७॥ पूर्वकालमें अनन्तशक्तिसम्पन्न प्रकृतिस्वरूपा महिषासुरमर्दिनी दुर्गाने आपका ही पूजन करके महिषासुरका वध किया था और उस समय महिषासुरके द्वारा छोड़ी गयी श्वासवायुके द्वारा उड़ाये गये पर्वतोंके गिरनेके भयसे भयभीत इस समस्त विश्वकी रक्षा भी की थी ॥ ८ ॥ आप अप्रमेय हैं, सम्पूर्ण लोकके साक्षीस्वरूप हैं, आप अविनाशी हैं, आप कारणोंके भी कारण हैं, सम्पूर्ण वेदराशि आपका वर्णन करनेमें कुण्ठित हो जाती है। आपकी उपासनाके बलपर ही शेषनाग इस पृथ्वीको धारण करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ९ ॥ सन्त-महात्माजन आपको ही प्रणाम करके आपकी भलीभाँति पूजा करते हैं और मनसे आपका ही स्मरण करते हुए यजन करते हैं। निष्कामीजन भी आपकी ही भक्ति करते हुए आवागमनसे रहित मुक्तिपदको प्राप्त करते हैं ॥ १० ॥ आप अनेक स्वरूपवाले हैं, आप अनेकों पैर, अनेकों नेत्र, अनेकों सिर, अनेकों कान, अनेकों बाहु और अनेकों जिह्वावाले हैं। आप अनन्तविज्ञानघन हैं, अनेकों ब्रह्माण्डोंके कारणरूप हैं और परम प्रकाशमान हैं। हे अखिलेश्वर! आपकी कृपाके फलस्वरूप ही चिरकालतक प्रयत्न करनेके पश्चात् मैं इस अविमुक्तक्षेत्र काशीका दर्शन कर पाया हूँ ॥ ११ ॥ मुनि गृत्समद बोले- इस प्रकार उन ढुण्ढि- विनायककी स्तुति करके और उनकी पूजा करके भगवान् शंकर उनसे प्रार्थना करते हुए बोले- [हे प्रभो!] काशीपुरीको पाकर अब काशीकी विरहजन्य मेरी पीड़ा दूर हो गयी है। अब आप मेरे भक्तों तथा इस काशीपुरीकी सदा रक्षा करते रहें, बिना आपकी कृपाके काशीमें निवास करना किसी प्रकार सम्भव न हो ॥ १२-१३॥ दण्डपाणि भैरव और आप ढुण्ढिविनायककी जिसपर कृपा होगी, उसीको मैं उसके मृत्युकालमें तारक ब्रह्मका उपदेश दूँगा, इसके अतिरिक्त और किसीको भी नहीं दूँगा। माघमासकी [कृष्णपक्षकी] चतुर्थी तिथिमें मंगलवारके दिन चन्द्रोदय होनेपर जो व्यक्ति पुओं, मोदकों तथा अन्य उपचारोंद्वारा आपका पूजन करेगा और जो इस स्तोत्रके पाठसे आपका स्तवन करेगा, उसके भी कष्टोंको दूर करके आप उसके समस्त मनोरथोंको पूर्ण करें और अनेक प्रकारकी धन-सम्पत्ति उसे प्रदान करें ॥ १४- १६ ॥ प्रातःकाल उठकर जो तीनों कालोंमें अथवा एक समय भक्तिपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसे भोग तथा मोक्ष प्राप्त होगा। यहाँ आप अन्वेषण करके मनुष्योंको सभी पदार्थोंको प्रदान करते हैं, अतः आप 'ढुण्ढि' इस नामसे तीनों लोकोंमें विख्यात होंगे ॥ १७-१८ ॥ आपका 'ढुण्ढि' यह नाम मोक्ष प्रदान करनेवाला तथा सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला है। साथ ही इस नामका स्मरण करनेसे यह सभी कार्योंमें सिद्धि प्रदान करनेवाला होगा ॥ १९ ॥
क्री०ख०-अ०४८ ] * ढुण्ढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना * ३८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 **मुनि बोले—**ऐसा कहकर महादेव भगवान् शंकरने अत्यन्त रमणीय बने हुए मन्दिरमें गण्डकी नदीसे प्राप्त (शालग्राम) शिलासे निर्मित ढुण्ढिविनायककी मूर्तिको स्थापित किया॥ २०॥ तदनन्तर भगवान् शिव अपने भवनमें तथा अन्य सभी देवता भी अपने-अपने स्थानोंको गये। उन भगवान् शंकरने अपने भक्त दिवोदासको मुक्ति प्रदान की॥ २१॥ **गृत्समद बोले—**इस प्रकार उन ढुण्ढिविनायक तथा बौद्धरूपी विष्णुने अपनी मायाद्वारा राजा दिवोदासको मोहित किया और परिणाममें उनका कल्याण किया। हे देवि कीर्ते ! इस प्रकार मैंने ढुण्ढिराजद्वारा किये गये कार्यों तथा उनके सामर्थ्यको तुमसे पूर्ण रूपसे कहा, इस प्रकारके प्रभाववाले उन ढुण्ढिके वरदानसे ही तुम्हारा पुत्र जीवित हुआ है॥ २२-२३॥ **ब्रह्माजी बोले—**इस प्रकार प्रियव्रतकी रानी कीर्तिसे उन ढुण्ढिराजके समस्त कार्योंका वर्णन करके मुनि गृत्समद उनसे विदा लेकर शीघ्र ही अपने आश्रम- स्थलको चले गये॥ २४॥ तदनन्तर उसी समय रानी कीर्ति अपने पुत्रको लेकर उस पुण्यदायिनी वाराणसीपुरीको गयी, जो कि वहाँ मृत्यु होनेपर मुक्ति प्रदान करनेवाली है॥ २५॥ वहाँ पहुँचकर वह ढुण्ढिके मन्दिरमें गयी, और वहाँ नर-नारियोंद्वारा किये जा रहे महोत्सवको देखकर अत्यन्त हर्षित होकर रानी कीर्तिने ढुण्ढिविनायकको प्रणाम किया। उस दिन माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथि और मंगलवारका दिन था॥ २६ १/२ ॥ वहाँ नृत्य एवं गीतमें पारंगत भक्तजनोंद्वारा अनेक स्वर्णपात्रोंमें रखे गये पक्वान्नों तथा खीरके नैवेद्य आदिके द्वारा ढुण्ढिका पूजन किया गया था। उन्हें विविध प्रकारके अलंकारोंद्वारा सुसज्जित किया गया था। दिव्य माला तथा वस्त्र उन्हें पहनाये गये थे। वे नाना प्रकारकी मणियोंसे समन्वित थे। विविध प्रकारकी मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित थे और भक्तोंद्वारा दक्षिणाके रूपमें सुवर्ण तथा रत्न उन्हें निवेदित किये गये थे॥ २७-२९॥ वह निष्पाप कीर्ति देव ढुण्ढिके मुखका दर्शन न हो पानेसे अत्यन्त चिन्तित हो उठी। वह यह भी सोच रही थी—कि मुझ अकिंचनके द्वारा इन्हें क्या निवेदित किया जाय ? ॥ ३०॥ उसने मार्गमें चलते समय एकत्र किये गये दूर्वांकुरों, शमीपत्रों तथा मन्दारके पुष्पोंसे अत्यन्त श्रद्धाभक्तिपूर्वक उन ढुण्ढिविनायकका पूजन किया और उनसे पुत्रके अभ्युदयकी प्रार्थना की॥ ३१॥ वे ढुण्ढि उसके तथा उसके पुत्रद्वारा शमीपत्र, मन्दार पुष्प एवं दूर्वांकुरोंसे की गयी पूजासे जितने प्रसन्न हुए, उतने प्रसन्न तो अन्य भक्तोंद्वारा की गयी सुवर्णादि विभिन्न उपचारोंकी पूजासे भी नहीं हुए॥ ३२॥ तदनन्तर वे सभी भक्तजन अत्यन्त उल्लसित होकर अपने-अपने घरोंको चले गये और माता तथा पुत्र वे दोनों उन ढुण्ढिराजकी सन्निधिमें स्थित रह गये॥ ३३॥ उन दोनोंके उपवाससे और श्रद्धा-भक्तिभावसे अत्यन्त प्रसन्न भगवान् महोत्कट ढुण्ढिराज उस मूर्तिमेंसे उनके समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट हो गये॥ ३४॥ वे दोनों बोले— [हे भगवन् ! ] मुनि गृत्समदने महेश्वर ढुण्ढिराजका जो स्वरूप बतलाया था, वही अत्यन्त प्रकाशमान स्वरूप आज हमें बड़े ही पुण्य- संचयोंके फलस्वरूप साक्षात् दिखायी दिया है, जो कि सभी प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत है, मस्तकपर मुकुटसे सुशोभित है, दस भुजाओंवाला है, अत्यन्त सुन्दर नेत्रकमलोंसे शोभायमान है, अत्यन्त मूल्यवान् रत्नों एवं मोतियोंसे बनी श्रेष्ठतम मालाको धारण किये हुए है, उसने पीताम्बर धारण कर रखा है, और अत्युत्तम दाँतसे सुशोभित है॥ ३५-३७॥ इस प्रकारके परम स्वरूपका दर्शनकर वे दोनों माता-पुत्र आनन्दके सागरमें इतना निमग्न हो गये कि उनका पूजन करना तथा उन्हें नमस्कार करना भी वे भूल गये॥ ३८॥ तदनन्तर भगवान् ढुण्ढि बोले—हे सुव्रते ! वर
३८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उनचासवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०४९] * कीर्तिके पुत्रका राज्याभिषेक * ३८७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनचासवाँ अध्याय कीर्तिके पुत्रका राज्याभिषेक, ब्रह्माजीद्वारा विनायकलोकका तथा उसकी महिमाका वर्णन, विनायकके भक्तोंको विनायकलोककी प्राप्ति ब्रह्माजी बोले-ढुंढिविनायकसे इस प्रकार वरदान प्राप्त की हुई कीर्तिने शेष रात्रि व्यतीत करके उषाकालमें स्नान किया और वह उन विनायककी मूर्तिकी भलीभाँति पूजा करके अपने पुत्रके साथ अपने नगरके लिये निकल पड़ी। यद्यपि वह बहुत हर्षित थी, किंतु विनायकदेवके विरहसे दुखित भी थी। वह नगर नाना प्रकारकी ध्वजाओं और पताकाओंसे अलंकृत था। जलके छिड़काव एवं धूप आदिसे सुवासित था॥ १-२॥ राजपत्नी कीर्ति और उसका पुत्र—दोनों ही 'ढुंढि' नामका जप कर रहे थे। राजा प्रियव्रतको जब यह ज्ञात हुआ कि पत्नी तथा पुत्र आ रहे हैं तो वे अपनी सेना एवं वाद्योंकी ध्वनिके साथ उन दोनोंको लानेके लिये गये और शीघ्र ही अत्यन्त विख्यात कर्णपुर नामक नगरमें उन्हें ले आये। उन्होंने शीघ्र ही अपने पुत्रका मस्तक सूँघा और अत्यन्त सम्मानके साथ उसका आलिंगन किया॥ ३-४॥ परम प्रसन्नताको प्राप्त राजाने आनन्दविभोर होकर गद्गद वाणीमें कहा- 'हे पुत्र! क्षिप्रप्रसादन ! तुम बहुत दिनोंसे थके हुए हो ॥ ५ ॥ तुम्हें देखकर मुझे अत्यन्त आह्लाद प्राप्त हो रहा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मुझे अमृतकी प्राप्ति हो गयी है।' तदनन्तर राजाने वहाँ उपस्थित सभी लोगोंको वस्त्र तथा दक्षिणा देकर विदा किया॥ ६॥ इसके अनन्तर रानी कीर्ति और राजाने परस्पर वार्तालाप किया। रानी कीर्तिने सम्पूर्ण वृत्तान्त राजाको पूर्णरूपसे बताया ॥ ७॥ तदनन्तर उन दोनोंने परस्पर दाम्पत्योचित प्रीति व्यवहारके साथ हास्य एवं विनोद किया। हर्षपूर्वक एक-दूसरेको ताम्बूल खिलाया और संकोचका परित्यागकर सहशयन सम्पन्न किया ॥ ८ ॥ तदनन्तर कुछ दिन बीत जानेके अनन्तर जब राजाने यह जान लिया कि मेरा पुत्र सभी गुणोंसे सम्पन्न है, विनयी है, सभी धर्मोंका ज्ञाता है और नीतिशास्त्रमें अत्यन्त पारंगत है, तो उन्होंने राज्याभिषेकमें प्रयुक्त होनेवाली समस्त सामग्रियोंको एकत्र कराकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको, मित्रोंको तथा सभी राजाओंको बुलाकर शुभ मुहूर्तमें, उत्तम लग्नमें, सातों ग्रहोंके अभीष्ट स्थानमें विद्यमान रहनेपर पुत्रका राज्याभिषेक कर दिया॥ ९-१०१/२ ॥ राजाने स्वस्तिवाचन करानेके अनन्तर आभ्युदयिक श्राद्ध करके विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेदके मन्त्रों और विविध प्रकारके द्रव्योंसे समन्वित जलोंके द्वारा पुत्रका अभिषेक कराया ॥ ११-१२॥ तदनन्तर राजाने ब्राह्मणों तथा अन्य जनोंको दक्षिणा तथा रत्न प्रदानकर सन्तुष्ट किया और उन सबसे पूछकर वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश होनेकी दीक्षा ग्रहण की। तत्पश्चात् सभी राजाओंको विदा करके वे अपने अभीष्टके साधनमें संलग्न हो गये ॥ १३१/२ ॥ तदनन्तर राजकुमार परशुबाहु इस पृथ्वीपर शासन करने लगे। धर्मशास्त्रमें प्रतिपादित नीतिके अनुसार राज्य-संचालनसे और अपनी उदारतासे उन्होंने महान् यश अर्जित किया। वे अपने पराक्रमके बलपर तीनों लोकोंमें विख्यात हुए। उन्होंने मन्दारवृक्षके काष्ठकी ढुंढि-विनायककी प्रतिमा बनवाकर उसे अपने कण्ठमें धारण किया। वे शमी तथा दूर्वाके बिना कभी भी उनकी पूजा नहीं करते थे ॥ १४-१६॥ उन्होंने धर्ममार्गका पालन करते हुए विविध प्रकारके सुख-भोगोंको भोगा तथा अनेक रानियोंके साथ जीवन बिताने लगे। अनेक पुत्रोंको उत्पन्नकर एवं विविध प्रकारके दानोंको देकर एक हजार वर्षपर्यन्त राज्य किया,
३८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तदनन्तर पुत्रको राज्य सौंपकर वे स्वर्गलोकको गये। भगवान् ढुंढिविनायकका सारूप्य प्राप्तकर वे अनेक कल्पोंतक स्वर्गलोकमें स्थित रहे ॥ १७-१८ ॥ [ ब्रह्माजी बोले— ] हे मुने! इस प्रकारसे मैंने शमीके प्रभावका, उसके द्वारा विनायकके पूजनसे प्राप्त होनेवाले पुण्यका तथा मन्दारकी महिमाका भी वर्णन संक्षेपमें आपसे निरूपित किया। इसलिये आपके द्वारा भी शमी एवं मन्दारके द्वारा विनायकका पूजन किया जाना चाहिये, भक्तिभावपूर्वक उन इष्टदेवके लिये समर्पित किया गया पत्र-पुष्प उन्हें अमृततुल्य प्रिय प्रतीत होता है ॥ १९-२० ॥ तत्तद् देवताके लिये निषिद्ध पत्र-पुष्प अर्पित करनेवाला नरक प्राप्त करता है। जिसका जो मुख्य आराध्य देवता होता है, उसके लिये विहित पत्र-पुष्पादि अर्पण करनेवाला अथवा अन्य देवोंको अपने अभीष्ट देवकी बुद्धिसे पत्र- पुष्पोंको अर्पित करनेवाला भक्त दोषको प्राप्त नहीं होता है, इस प्रकार गणेश, दुर्गा, शिव, विष्णु एवं सूर्य—इन पंचदेवोंकी आराधनासे व्यक्ति अपने अभीष्ट देवको प्राप्त होता है ॥ २१-२२ ॥ सात्त्विक पूजा करनेवाला सात्त्विक भक्त अपने अभीष्ट देवका तादात्म्य प्राप्त करता है, राजस पूजा करनेवाला देवताका सारूप्य प्राप्त करता है, सतोगुणी उपासना एवं रजोगुणी उपासना—इन दोनों भावोंसे [मिश्रित] उपासना करनेवाला भक्त देवताके सामीप्यको प्राप्त करता है और तामसी स्वभाववाला तामसी उपासनाके द्वारा देवताके लोकको प्राप्त करता है। इस प्रकार सात्त्विक, राजस एवं तामस—तीनों प्रकारकी भक्ति निष्फल नहीं होती ॥ २३ १/२ ॥ व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन्! विनायकका लोक किस लोकमें स्थित है, मेरे इस संशयको आप इस समय दूर करें, हे प्रभो! सब कुछ जाननेवाले आपको छोड़कर मैं अन्य किससे पूछूँ? ॥ २४-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] इस विषयमें मैंने देवर्षि नारदजीको बतलाया था, उन्होंने महर्षि मुद्गलको बताया, महर्षि मुद्गलने विनायकके उस मांगलिक लोकके विषयमें काशिराजको बतलाया ॥ २६ ॥ प्राचीन समयमें उन विनायकने अपनी कामदायिनी शक्तिसे स्वयं ही उस लोकका निर्माण किया और उन्होंने 'निजलोक' यह उसका नाम रखा ॥ २७ ॥ काशिराजने अपने चर्मचक्षुओंसे उस विनायकलोकका विमानमें स्थित रहकर दर्शन किया था, जिसे प्राप्त करके स्त्री अथवा पुरुष—कोई भी हो, वह न तो दुःख प्राप्त करता है और न काम-क्रोधादि द्वन्द्वोंसे बाधित होता है ॥ २८ ॥ उस निजलोकमें व्यक्ति ज्योतिर्मय स्वरूपको प्राप्तकर ब्रह्माजीके कल्पपर्यन्त निवास करता है और [अमृतोपम रससे पूर्ण] उस इक्षुसागरका आनन्द लेता है, जो कि वहींपर अवस्थित है ॥ २९ ॥ वह विनायकलोक महाप्रलयकी वेलामें भी विद्यमान रहता है, वह अविनाशी लोक है और उन विनायकदेवका सनातन पीठ एवं निद्रास्थान है ॥ ३० ॥ वहाँ सिद्धि तथा बुद्धि नामकी उनकी दो पत्नियाँ उनकी सेवा करती रहती हैं, सामवेद अपनी सामध्वनियोंके द्वारा उनकी महिमाका गान करते रहते हैं। मनुष्यके द्वारा जिस-जिस भी वस्तुकी कामना की जाती है, वहाँ स्थित कल्पवृक्ष वह सब उन्हें प्रदान करता है ॥ ३१ ॥ उस कल्पवृक्षके प्रभावसे वहाँ अकल्पनीय वस्तुएँ भी प्राप्त हो जाती हैं। मैंने कई बार सभी लोकोंका विविध प्रकारसे वर्णन किया है, किंतु गणेशजीके निजलोकका वर्णन करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। इसलिये मैंने संक्षेपमें वर्णन किया है, अब आप आगे क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ३२-३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शमीपत्र एवं मन्दारपुष्पसमर्पणके फलका वर्णन' नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥
पचासवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०५० ] * मुद्गलद्वारा काशिराजको विनायक-लोकका परिचय बताना * ३८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पचासवाँ अध्याय महर्षि मुद्गलद्वारा काशिराजको विनायकके लोक 'स्वानन्दभुवन' का परिचय बताना तथा सदैव वहाँ विद्यमान रहनेवाले विनायकके स्वरूपका निरूपण करना, मुद्गलजीके उपदेशसे काशिराजद्वारा गणेशोपासना और अन्तमें विनायक-लोकको प्राप्त करना
[बायाँ स्तम्भ] व्यासमुनि बोले— [हे ब्रह्मन् !] काशिराजने महर्षि मुद्गलजीके उपदेशसे किस प्रकार विनायकके उस उत्तम स्थानको प्राप्त किया, इसे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—तीर्थयात्राके प्रसंगसे एक बार महर्षि मुद्गल काशिराजके पास गये। राजाने उनका आतिथ्य- सम्मान करके उन सर्वज्ञ मुनि मुद्गलसे पूछा— ॥ २ ॥ राजा बोले—विनायकका लोक कौन-सा है? और मेरेद्वारा उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? ॥ २१/२ ॥ मुद्गल बोले— [हे राजन् !] स्वानन्दभुवन तथा निजलोक—ये दो अत्यन्त प्रसिद्ध नाम विनायकलोकके हैं। जब देवान्तक तथा नरान्तक नामके दो दैत्य उत्पन्न होंगे, तब विनायक भी उनके वधके लिये मनुष्यरूपमें अवतरित होंगे ॥ ३–४१/२ ॥ वे पराक्रमी विनायक अपनी इच्छाके अनुसार इस मनुष्यलोकमें बालकरूपसे अद्भुत पराक्रमशाली लीला करेंगे। हे राजन् ! जब आप अपने पुत्रके विवाहके उद्देश्यसे उन्हें अपने घर लायेंगे, तो उस समय वे [अपना लोकोत्तर] पुरुषार्थ प्रदर्शित करेंगे और [लीलावश] भगवद्भक्त निर्धन 'शुक्ल' नामक ब्राह्मणके घरमें भोजन करके उन्हें देवराज इन्द्रके लिये भी दुर्लभ अमोघ लक्ष्मी प्रदान करेंगे [तथा और भी बहुत-सी लीलाएँ करेंगे], हे काशिराज ! हे महाबाहु! तब (उसी समय) आप उनकी भक्तिके प्रभावसे विनायकके निजलोकको प्राप्त करेंगे ॥ ५-८ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर मुनि मुद्गलके चले जानेपर महान् बुद्धिमान् काशिराज गणेशजीकी भक्ति करते हुए समयकी प्रतीक्षा करने लगे। तदनन्तर बहुत दिन बीत जानेपर लीलाके लिये विग्रह धारण करनेवाले वे प्रभु विनायक कश्यपके घरमें अवतीर्ण हुए ॥ ९-१० ॥ उन्होंने अनेकों दैत्योंका वध किया और नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ कीं। शुक्ल ब्राह्मणके घरमें भोजन करके उन्होंने
[दायाँ स्तम्भ] शीघ्र ही उसके दारिद्र्यका हरण कर लिया। तदनन्तर वे काशिराजके भवनमें [पुनः लौट] गये। उन्होंने [उसी अवतारकालमें] देवान्तक तथा नरान्तक नामक महाबलशाली दो दैत्योंका वध किया ॥ ११-१२ ॥ तत्पश्चात् वे विनायकदेव क्षीरसागरके मध्य स्थित अपने 'स्वानन्दभुवन' नामक लोकको चले गये। तबसे काशिराज विनायकके विरहसे दुखी होकर सदा उनका स्मरण-ध्यान किया करते थे ॥ १३ ॥ वे अपनी राजसभाके मध्य किसी पुरुषको यह समझकर आलिंगन कर लेते थे कि यही विनायक है। वे सम्पूर्ण जगत्को विनायकरूप समझते थे ॥ १४ ॥ वे दिन-रात ध्यानमें उनका दर्शन करते हुए विनायकमय ही हो गये थे। कभी वे निराहार ही रह जाते थे। उन दिनों कभी वे अपनी रुचिके अनुसार एक ग्रासमात्र ही भोजन करते, कभी वे हँसने लगते तो कभी नाचने लगते ॥ १५-१६ ॥ स्वप्नमें वे उन विनायकका दर्शन करके बहुत समयतक सोते ही रह जाते थे। राजाकी इस प्रकारकी अन्यमनस्कताकी स्थिति देखकर उनके मन्त्रीगण अत्यन्त चिन्तित हो उठे ॥ १७ ॥ वे यह सोचने लगे कि यदि लोग राजाकी इस प्रकारकी मनःस्थितिके विषयमें जान जायँगे तो शत्रुओंकी सेना आक्रमण कर सकती है। इस प्रकारकी चिन्ता करते हुए जब मन्त्रीगण राजाके दरबारमें उपस्थित थे, तो उसी समय महर्षि मुद्गल अपना ध्यान भंगकर राजाके पास आये। उन मुनिके दर्शनसे चेतनाको प्राप्त हुए राजाने उन्हें प्रणाम किया ॥ १८-१९ ॥ उन्हें आसनपर बैठाकर राजाने यथाविधि उनका पूजन किया और फिर हाथ जोड़कर कहने लगे—'हे मुने! आपके दर्शनसे आज मेरा वंश धन्य हो गया, मेरा
जन्म लेना सफल हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरा भवन धन्य हो गया और मेरे नेत्र धन्य हो गये। जिनकी कृपासे मनुष्योंको संसारसे तारनेवाला परम स्थान प्राप्त होता है और जिनकी अवमाननासे महान् दुःखोंकी प्राप्ति होती है, उन्हीं आपका मैंने बड़े ही पुण्यके प्रभावसे आज दर्शन किया है।' तदनन्तर उनकी वाणीसे परम सन्तुष्ट होकर वे ब्राह्मण मुद्गल उनसे बोले- ॥ २०-२२॥ मुद्गल बोले - [हे राजन्!] आप-जैसा विनीत स्वभाववाला व्यक्ति न तो मैंने देखा है और न आप- जैसे व्यक्तिके विषयमें कुछ सुना ही है। आपके द्वारा किये गये पूजनसे मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ। मैं आपके मनोरथको पूर्ण करूँगा ॥ २३ ॥ ब्रह्माजी बोले- महर्षि मुद्गलके वचनसे परम सन्तुष्टिको प्राप्त काशिराज उनसे बोले- 'हे मुने! मैं इसी शरीरसे विनायकके धाम स्वानन्दभुवनको प्राप्त करना चाहता हूँ और वहाँ चिरकालतक रहना चाहता हूँ। मुझे अन्य किसी सम्पदाकी आवश्यकता नहीं है।' तदनन्तर महर्षि मुद्गल उनसे बोले- 'मैं आपकी वाणीसे सन्तुष्ट हूँ। हे राजन्! आप अपने इसी पांचभौतिक जड़ देहसे विनायकजीके 'स्वानन्दभुवन' नामक उस लोकको प्राप्त करेंगे, जो जन्म-मरणके बन्धनसे सर्वथा रहित है। वहाँ पाँच हजार वर्षोंतक अनेक प्रकारकी सम्पदाओंका उपभोग करनेके अनन्तर आप ब्रह्माजीके एक कल्पपर्यन्त परम आनन्दको प्राप्त करेंगे' ॥ २४-२७ ॥ राजा बोले - मुने! विनायकका वह लोक कैसा है? उसका क्या नाम है? आप सत्य-सत्य बतायें। उस लोकमें किस पुण्यके द्वारा जाना होता है। मैंने अन्य लोकोंके विषयमें तो बहुत कुछ सुन रखा है, पर इस लोकको मैं नहीं जानता ॥ २८ ॥ मुद्गलजी बोले - हे राजन्! सुनिये, मैंने महर्षि कपिलजीके मुखसे उस लोककी महिमाको सुना है। आपने जिन लोकोंके विषयमें सुना है, वे सामान्यतः प्रसिद्ध हैं ॥ २९ ॥ हे भूपते! इस गणेशलोककी गति अत्यन्त गहन है। इस स्वानन्दभुवन लोकका एक नाम दिव्यलोक है और दूसरा नाम निजलोक है। हे महामते! उस लोकमें भगवान् विनायक कामदायिनी नामक पीठमें विराजमान रहते हैं, वह पाँच हजार योजनके विस्तारवाला है। वहाँकी भूमि रत्नमयी तथा सुवर्णमयी है। वहाँ वे विनायक दिशाओंको प्रकाशित करते हुए सुशोभित होते हैं। स्वानन्दभुवन नामका वह दिव्य लोक इक्षुसागरके मध्यमें स्थित है ॥ ३०-३२ ॥ न वेदोंके पारायणसे, न दानसे, न व्रत-यज्ञ और जपसे, न ही विविध प्रकारकी तपस्याओंके द्वारा कभी भी वह लोक प्राप्त किया जा सकता है। भगवान् विनायककी कृपा और उनकी निरन्तर भक्तिसे ही वह प्राप्त होता है। विघ्नराट् विनायक वहाँ समष्टि तथा व्यष्टिरूपसे निरन्तर विद्यमान रहते हैं ॥ ३३-३४ ॥ वे विनायक अपने पैरोंसे सातों पातालोंको व्याप्त करके स्थित हैं। वे शेषनागके सहस्र सिरोंको तथा जलमें स्थित कूर्मको [आक्रान्त किये हुए हैं।] उन्होंने कानोंके द्वारा सभी दिशाओंको व्याप्त कर रखा है। बालोंके द्वारा आकाशमण्डलको धारण करके वे आधारकमलपर विद्यमान हैं। पुण्यात्माजन भ्रूमध्यमें स्थित अग्निचक्रमें विद्यमान द्विदल कमलमें उनका ध्यान करते हैं ॥ ३५-३६ ॥ खेचरी मुद्रासे समन्वित सिद्ध साधक ही उनका ध्यान कर सकता है, दूसरा और कोई ध्यानमें समर्थ नहीं हो पाता। प्रभासे सुशोभित सहस्र दलोंवाला जो ब्रह्माण्डकमल है, उस ब्रह्माण्डकमलमें वे विनायक तेजोरूपसे स्थित रहते हैं। इसी प्रकार हृदयमें स्थित द्वादशदल कमलमें, नाभिचक्रमें स्थित दशदल कमलमें, लिंगदेशमें स्थित शुभ षड्दल कमलमें और कण्ठदेशमें स्थित षोडशदल कमलमें वे विघ्नराट् तेजःस्वरूपमें देदीप्यमान होकर उसी तरह सर्वत्र विद्यमान रहते हैं, जैसे कि सत्यलोकमें ब्रह्मा विद्यमान रहते हैं ॥ ३७-३९ ॥ द्वादशदल कमल वैकुण्ठ है, वहाँ भगवान् विष्णु सदा विद्यमान रहते हैं, कण्ठमें स्थित षोडशदल कमलमें पंचवक्त्र भगवान् शिव अपने गणोंके साथ उसी प्रकार निवास करते हैं, जैसे कि कैलासमें रहते हैं ॥ ४० ॥ चन्द्रमा, सूर्य तथा अग्नि-ये विनायकके तीन नेत्र
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[बायाँ स्तम्भ] हैं। सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डल उनका उदरदेश है। वे विनायक इक्कीस स्वर्गोंमें व्याप्त हैं। औषधियाँ उनके रोम हैं। नदियाँ तथा सागर उनके पसीनेकी बूँदके रूपमें भासित होते हैं। उनके प्रत्येक रोमके अन्तर्गत [अनन्तानन्त] ब्रह्माण्ड धूलिकणोंके समान अवस्थित हैं ॥ ४१-४२ ॥ तैंतीस करोड़ देवता और जो हजारों प्रकारके जीव हैं, वे उनके प्रत्येक रोमकूपमें उसी प्रकार आभासित होते हैं, जैसे कि गूलरमें बैठे हुए मच्छर ॥ ४३ ॥ हे राजन् ! अब मैं विनायकके उस लोककी रचनाके विषयमें संक्षेपमें बताता हूँ। मेरुपर्वतका जो उच्च शिखर है, वह कैलासशिखरके समान है। वह हजार योजन ऊँचा है। वह जनशून्य तथा श्रेष्ठ मुनिजनोंके लिये भी अगम्य है। वहाँपर एक उच्च शक्ति है, जिसका नाम भ्रामिका है ॥ ४४-४५ ॥ उस शक्तिके चारों ओर विशुद्ध तेजवाले भ्रमर गुंजन करते रहते हैं। उस भ्रामिका शक्तिके ऊपर पद्मासनपर आधारशक्ति स्थित है, जो स्वर्णिम आभावाली है। उस आधारशक्तिके मस्तकपर कामदायिनी नामक शक्ति है, उसकी आभा करोड़ों सूर्योंके समान है, उसीके मस्तकपर बृहत्तम गणपतिपीठ अवस्थित है ॥ ४६-४७ ॥ वह अत्यन्त विकराल जटाओंके भारको धारण किये रहती है तथा [वैसे ही विकराल मुखसे युक्त है।] वह हजारों सूर्योंके समान प्रकाशमान है और अपनी आभासे दसों दिशाओंको द्योतित करती रहती है। उस (पीठ) का विस्तार दस हजार योजन है, उतनी ही उसकी चौड़ाई भी है। उस पीठके मध्यमें एक योजन चौड़ा स्वानन्दभुवन नामक लोक है, जो असंख्यों सूर्योंके समान आभावाला है। वहाँपर स्वर्ण तथा रत्नोंसे निर्मित असंख्य गृह हैं, जो गज- मुक्ताके समान प्रभासे सम्पन्न हैं। वह स्वानन्दभुवन नामक विनायकधाम दुःख तथा मोहसे रहित है, उन विनायककी कृपासे ही वह लोक प्राप्त हो सकता है। उस स्वानन्दभुवनसे उत्तर दिशामें श्रेष्ठ इक्षुसागर है ॥ ४८-५१ ॥ उस इक्षुसागरके मध्यमें सहस्रदलकमलसे समन्वित एक मंगलमयी पद्मिनी (पुष्करिणी) है, उस (पुष्करिणी)- के मध्यमें सहस्र दलोंवाला एक कमल उसी प्रकार
[दायाँ स्तम्भ] सुशोभित होता है, जिस प्रकार कि चन्द्रमा [आकाशमण्डल- में] शोभित होता है। उस सहस्रदल कमलकी कर्णिकामें एक शय्या है, जो रत्नों तथा स्वर्णसे निर्मित है। हे राजन् ! उसी तल्पमें दिव्य वस्त्रोंको धारण किये हुए भगवान् विनायक शयन करते हैं ॥ ५२-५३ ॥ उनकी सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो पत्नियाँ बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक सदैव उनके चरणोंको दबाया करती हैं। सामवेद मूर्तिमान् विग्रह धारणकर भक्तिपूर्वक उनकी महिमाका गान करते रहते हैं। सभी शास्त्र मूर्तिमान् होकर उनका स्तवन करते रहते हैं। सभी पुराण उनके सद्गुणोंका वर्णन करते रहते हैं ॥ ५४-५५ ॥ उस स्वानन्दभुवनमें सहस्रदलकी कर्णिकामें स्थित तल्पके ऊपर भगवान् विनायक बालरूप धारणकर विराजमान रहते हैं। वे अपनी सूँड़से सुशोभित रहते हैं। उनके सभी अंग अत्यन्त कोमल हैं। उनकी आभा अरुणवर्णकी है। उनके नेत्र विशाल हैं। वे दाँतवाले हैं। उन्होंने मुकुट तथा कुण्डल धारण कर रखे हैं। उनके मस्तकपर कस्तूरीका तिलक सुशोभित है। स्वतः प्रकाशमान वे विनायक दिव्य मालाओं तथा वस्त्रोंको धारण किये हुए हैं, उनके शरीरपर दिव्य गन्धोंका अनुलेपन लगा हुआ है ॥ ५६-५७ ॥ वे मोतियों तथा मणियोंकी माला धारण किये हैं, जिसमें अनेक रत्न लगे हुए हैं। वे विनायक अनन्त कोटि सूर्योंके समान ओजसे सम्पन्न हैं और उनके मस्तकपर अर्धचन्द्र सुशोभित है। वे विनायक भगवान् स्मरणमात्र करनेसे मनुष्योंके पापोंको उसी प्रकार तत्क्षण विनष्ट कर देते हैं, जैसे कि गंगाजी करती हैं। हे राजन् ! उनकी शय्याके दोनों ओर तेजोवती तथा ज्वालिनी नामक दो शक्तियाँ सदैव स्थित रहती हैं, जो सहस्रों सूर्योंके समान प्रभावाली हैं ॥ ५८-५९१/२ ॥ उस स्वानन्दभुवन नामक लोकमें न तो शीत है, न वृद्धावस्था है, न थकावट है, न स्वेद है और न तन्द्रा ही है। वहाँ भूख एवं प्यास तथा दुःख कभी भी नहीं होता है। अपने पुण्यके प्रभावसे जो व्यक्ति वहाँ निवास करते हैं, वे सदा ही आनन्द-सरोवरमें निमग्न रहते हैं; क्योंकि वहाँ विश्वमें व्याप्त रहनेवाले, बालकका स्वरूप