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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (२०९) रौद्रब्राह्मणपीडितः ॥ तस्य स्नानं जपं होमं कृत्वा शान्तिः प्रपद्यते ॥ २२६ ॥ तीक्ष्ण वेगवाला, भूखसे युक्त, पवित्र, वैरको करनेवाला, व्रतमें प्यार करनेवाला, केशूके रंगके समान मूत्रको उतरनेवाला, पाठमें अभ्यासवाला और अत्यंत बोलनेवाला ॥ २२५ ॥ बहुत श्वासोंको लेनेवाला, तृषासे आक्रांत हुआ ऐसा मनुष्य रौद्रसंज्ञक ब्राह्मणवर्णवाले ज्वरसे पीड़ित जानना । उसकी शांति स्नान, जप, होमादिसे करे ॥ २२६ ॥ अथ क्षत्रियज्वरका लक्षण और शांति । तीक्ष्णज्वरोऽतितृष्णश्च रक्तमूत्रश्च मूत्र्यते ॥ कुरुते युद्धवार्त्ताश्च उत्तिष्ठति बलातुरः॥२२७॥तप्तनेत्रो महाश्वासः क्षुधया पीडि- तस्तथा॥मधुगन्धो मुखे स्वेदो माहेन्द्रक्षत्रियार्दितः॥२२८॥ तस्यादौ ग्रहहोमं तु देवतास्तवनं शुचिः ॥ दानैर्जपादिभिः कार्य्यैः प्राप्यते सिद्धिसङ्गमः ॥ २२९ ॥ तीक्ष्णज्वर हो, अत्यंत तृषा लगे, लालमूत्र उतरे, युद्धकी बातको करे, बलसे पीड़ितहुआ भी उठ खडा हो ॥२२७॥ गर्वितनेत्रोंवाला हो, महाश्वाससे संयुक्त हो, सबका- लमें क्षुधासे पीड़ित हो, मधुसरीखे गंधसे युक्त हो और मुखपर पसीनेसे संयुक्त हो ऐसा मनुष्य माहेंद्रसंज्ञक क्षत्रियवर्णवाले ज्वरसे पीड़ित जानना ॥ २२८ ॥ इसकी शांतिके लिये आदिमें ग्रहोंका होम, देवताकी स्तुति, दान, जप इन्होंका होना जरूरी है ॥ २२९॥ अथ वैश्यज्वरका लक्षण और शांति । मध्यवेगः पीतगात्रः स्वप्नशीलोऽरुचिस्तथा॥शीतपवनहृदुष्णः कण्ठस्वेदोऽतिविह्वलः ॥ २३० ॥ बहुमूत्री भक्तियुक्तो मौनी पीतान्तलोचनः॥नातितृष्णातुरः स्निग्धः स विज्ञेयो ज्वरेश्वरः ॥ २३१ ॥ तत्र स्वस्त्ययनातिथ्यं द्विजदैवतपूजनम् ॥ जपहो- मादिकं सर्वं कर्त्तव्यं शान्तिहेतुना ॥ २३२ ॥ मध्यमवेगवाला, पीले शरीरवाला, शयनको करनेवाला और अरुचिसे युत हुआ, शीतलपवनको वर्जनेवाला, गरमस्वभाववाला, कंठमें पसीनासे संयुक्तहुआ और अत्यंत विह्वल हुआ ॥ २३० ॥ बहुतसे मूत्रको उतारनेवाला, भक्तिसे युक्त और मौनी और नेत्रोंके अंतमें पीलेपनसे संयुक्त और अत्यंत तृषासे नहीं पीडित हुआ, चिकना शरीरवाला ऐसा १४

( २१० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- मनुष्य ज्वरेश्वरसंज्ञक वैश्यवर्णवाले ज्वरसे पीडित जानना ॥ २३१ ॥ इसमें शांतिके लिये कल्याणके कर्म, अतिथिकी सेवा, ब्राह्मण और देवतोंकी पूजा, जप, होम, इन सबोंका करना जरूरी है ॥ २३२ ॥ अथ शूद्रज्वरका लक्षण और शांति । हृच्छूलश्वातिसारी वा मत्स्यगन्धाङ्गलेपनः ॥ उन्मादी चाति- तृप्ताक्षो रतेषु विकलेन्द्रियः ॥ २३३ ॥ प्रणयी त्वध्वनौ भीरुर्मासं नैवाभिकाङ्क्षया ॥ कालभृङ्गारकेणापि शूद्रे सिद्धिर्न जायते ॥ २३४ ॥ हृदयमें शूलवाला, अतीसारसे संयुक्त हुआ, मछलीके गंधके समान गंधवाला और अंगोंपर लेप करनेवाला, उन्मादसे संयुक्त और अतितृप्तहुए नेत्रोंवाला और भोगमें विकलहुई इंद्रियोंवाला ॥ २३३ ॥ नम्रतासे युक्त हुआ और रस्तेमें चलनेसे डरनेवाला और इच्छासे ग्रासको नहीं लेनेवाला और भृंगरा सरीखे रूपवाला ऐसा मनुष्य शूद्रज्वरसे पीड़ित होता है इसमें सिद्धि होती नहीं ॥ २३४ ॥ अथ सर्वरोगोंपर उपचार । स्नानं दानजपं सुरार्चनविधिर्होमादयः प्रीतता भूतानाञ्च विशेष- णेन बहुधा तृप्तिं च कुर्यात्ततः ॥ गोभूमिं कनकान्नपानवि- धिना दानेन शान्तिर्भवेत्सर्वेषां च रुजां विनाशनमिदं शंसन्ति सत्यव्रताः ॥ २३५ ॥ इस ज्वरकी शांतिके लिये स्नान,दान, जप, देवतोंकी पूजा, होम आदिको करना और मनु- ष्योंको प्रसन्नता और भोजनसे तृप्त करना, गाय, पृथिवी, सोना, अन्न, पानी इनका दान करना, ऐसे करनेसे सब रोगोंकी शांति होती है ऐसे सत्यव्रतवाले मुनि कहते हैं ॥ २३५ ॥ अथ ज्वरवालेको पथ्यआहारादि । वेगं कृत्वा विषं यद्वदाशये लीयते बलम् ॥ कुप्यते प्रबलं भूयः काले दोषो विषं तथा ॥२३६॥ शालिषष्टिकभक्तानां यूषं मुद्गा- ढकीषु च ॥ पूर्वोक्तानि च शाकानि वातघ्नानि भवन्ति हि ॥ ॥ २३७ ॥ शतपुष्पा च जीवन्ती तण्डुलीय़कवास्तुकम् ॥ घृतेन भाजिका सिद्धा शाकपत्राण्यमूनि च ॥ २३८॥ लाव- तित्तिरमांसादिवात्तकािनां तथातुरे॥ मृगच्छिकरिकाद्यानि जाङ्ग-

॰अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (२११) लानि प्रयोजयेत् ॥२३९॥ कोशातकी पटोलं च शुण्ठीकं च हितं भवेत् ॥ जैसे विषवेगको करके आशयमें लीन होके फिर समयपर अत्यंत कुपित होता है तैसे ही दोष भी समयपर फिर कुपित होता है ॥ २३६ ॥ शालिचावल, सांठीचावल, मूंग और अरहरका यूष और पूर्वोक्त शाक ये सब वातको नाशते हैं ॥२३७॥ सौंफ, जीवंती, चौलाई, बथुवा, इन्होंकी भाजीको घृतमें सिद्धकर प्रयुक्त करे ॥ २३८ ॥ लावा, तीतर, बत्तक, मृग, छिक्कर इन आदि जांगलदेशके जीवोंके मांसोंको भी रोगीको देवे ॥ २३९ ॥ तोरी, परवल, सूंठ ये भी हित हैं ॥ अथ ज्वरवालेकूं अपथ्य । वर्जयेद्विदलान्नानि विदाहीनि गुरूणि च ॥ २४०॥ न पिच्छ- लानि तैलानि तथाम्लानि च वर्जयेत् ॥ दधिमस्तुविशालानि क्षुद्रान्नानि भिषग्वरः ॥ २४१ ॥ बहूदकञ्च ताम्बूलं घृतं वापि सुरामपि ॥ २४२ ॥ क्रोधं शोकञ्च त्यक्त्वा वै सदा सौख्यं विभुञ्जते ॥ न कुर्याज्जागरं रात्रौ दिवास्वप्नञ्च वर्जयेत्॥२४३॥ शकटवाजिकरिद्विपिवाहनं प्रबलं परिवर्जयेत्तु सततम्॥ ज्वरि- णमाशु सुखं बुभुजे सुधीः शुभविधाननिधान उपस्थितः २४४॥ विदलसंज्ञक और दाहको करनेवाले और भारी ऐसे अन्नोंको त्यागे ॥ २४० ॥ कफकारी तेल सेवने हुए और खट्टे ऐसे शाकोंको भी वर्जे, दही,दहीका पानी, रसाला, क्षुद्रअन्न ॥२४१॥ बहुत पानी, नागरपान, घृत, मदिरा ॥ २४२ ॥ क्रोध, शोक इन्होंको त्यागके रोगी सबका- लमें सुखको प्राप्त होता है, रात्रिमें जागे नहीं और दिनमें सोवे नहीं ॥ २४३ ॥ गाडी, घोड़ा, हस्ती, गेंडा इन्होंकी सवारीको रोगी निरंतर त्यागे एसे त्यागनेसे ज्वरवालेको सुख उपजता है ॥२४४ ॥ अथ ज्वरमुक्तोंका वर्तना । व्यायामं च व्यवायं च अशनं रात्रिजागरम् ॥ ज्वरमुक्तो न सेवेत तदा सम्पद्यते सुखम् ॥२४५॥इति आत्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे तृतीयस्थाने ज्वरचिकित्सानाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ ज्वरसे मुक्त हुआ मनुष्य कसरत, स्त्रीसंग, अति भोजन, रात्रिको जागना इन्होंको नहीं सेवे,

( २१२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- तब सुखको प्राप्त होता है ॥ २४९ ॥ इति बेरीनिवासिवुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनु- वादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने ज्वरचिकित्सानाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः ३. अथातिसारचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अथातीसारविज्ञानं भेषजं शृणु पुत्रक ॥ ज्वरजो वातिसारश्च भेषजं चोपदिष्यते॥१॥ दोषसंशमनं कि- ञ्चित् किञ्चिच्च धातुदूषणम्॥स्वस्थवृत्तौ मतं किञ्चिद्द्रव्यंत्रिविध- मुच्यते ॥ २ ॥तच्च दैवपथाश्रयं युक्तिपथाश्रयं सत्त्वावजयञ्च॥ मन्त्रौषधमणिमंगलबल्युपहारहोमनियमप्रायश्चित्तोपवासस्व-- स्त्ययनप्रणिधानादीति दैवपथाश्रयम् ॥ आहारव्यवहारौषधद्र- व्याणां योजनेति युक्तिपथाश्रयम् ॥ अहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनो- निग्रह इति सत्त्वावजयञ्च ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--हे पुत्र! अतीसारविज्ञान और औषधको सुन--ज्वरातिसार हो अथवा अतीसार हो तहां औषधका उपदेश कियाजाता है ॥ १ ॥ दोषको शमन करनेवाला कोई औषध है और धातुको दूषित करनेवाला कोई औषध है और स्वस्थवृत्तिमं कोई औषध माना है ऐसे औषध तीन प्रकारके हैं ॥ २ ॥ दैवपथाश्रय, युक्तिपथाश्रय, सत्त्वावजय ऐसे औषध तीन प्रकारके हैं। मन्त्र, औषध, मणि, मंगल, वलि, भेट, होम, नियम, प्रायश्चित्त, व्रत, स्वस्त्ययन, प्रणिधान आदि दैवपथाश्रय अर्थात् देवके मार्गसे आश्रित हुआ औषध कहाता है. आहार, व्यवहार, औषध इन्होंकी योजना की जावे वह युक्तिपथाश्रय अर्थात् युक्तिके मार्गसे आश्रित हुआ ओषध कहाता है. अहित अर्थोंसे मनका निग्रह होना यह सत्त्वावजय ओषध कहाता है ॥ ३ ॥ अथ अतिसारका लक्षण । स्निग्धातिशीतगुरूशीतलपिच्छलान्नं दुष्टाशनातिविषमाशनपा- नभक्ष्यम्।अद्यादजीर्णमथ शोकविषैर्भयैर्वा शोकार्त्तिदुष्टपयसा तु विपर्य्ययेषु ॥४॥ दौर्बल्यतां विषमभोजनकेन चाप्सु संभि- द्यते मलमजीर्णं निहन्ति चाग्निः॥सञ्जायते हि मनुजस्य तदा- तिसारो हत्वोदरानिं मनुजस्य तदातिसारः ॥ ५ ॥ सञ्जायते

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( २१३ ) स तु पुनर्बहलो मलेन स्यात्पञ्चधा निगदितो मुनिभिर्विधिज्ञैः॥ रक्ष्ये समासत उदीर्णरुजस्य नाशः क्वाथादिकैर्भवति पाचनकैश्च पूर्वम् ॥ ६ ॥ चिकना, अत्यन्त शीतल, भारी, शीतल, कफकारी, दुष्ट ऐसे भोजन और अत्यन्त भोजन, विषम भोजन और विषमपान और अजीर्णमें भोजन इन्होंने और शोक, विष, भय इन्होंने और शोककारिके दुष्ट हुए दूधसे अथवा शयनादिके विपरीतपनेसे ॥४॥ दुर्बल मनुष्यका विषम भोजन- से अपक्व मल जलमें फैलकर अग्निको शांत कर देता है उसी समय मनुष्यके अतीसार होता है ५॥ वह मलसे अत्यंत बढ़ा होता है और विधिको जाननेवाले मुनियोंने वह पांच प्रकारका कहा है । बढ़े हुए रोगके नाशको प्रथम क्वाथ आदि और पाचनकरके रक्षित करना ॥ ६ ॥ अथ ज्वरातिसार । युगपज्जायते यस्य ज्वरश्चैवातिसारकैः॥ज्वरातिसारो घोरोऽसौ कष्टसाध्यो मनीषिणाम् ॥ ७॥ न पित्तेन विना सोऽपि जायते शृणु पुत्रक ॥ तस्य नो लंघनं प्रोक्तं ज्वरे चैवातिसारके ॥८॥ जिस रोगीके एककालमें ज्वर और अतीसार उपजे वह घोररूप ज्वरातिसार कहाता है। यह बुद्धिमानोंको भी कष्टसाध्य है ॥७ ॥ हे पुत्र ! सुन पित्तके बिना ज्वरातिसार नहीं होता है इसवा- त ज्वरातिसारमें लंघन नहीं कहा है ॥ ८ ॥ अथ अतीसारकी चिकित्सा । सुवर्चलमतिविषांहिंगुपथ्याकलिङ्गकैः ॥ शुण्ठी वामातिसारघ्नी शूलघ्नी ग्राहिपाचनी ॥९॥पथ्यादारुवचामुस्तानागरातिविषा- युतैः॥ आमातिसारनाशाय क्वाथमेभिः पिबेन्नरः ॥ १० ॥ काला नमक, अतीस, हींग, हरड़ै, इंद्रजव, सोंठ इन्होंकी गोली आमातीसार, शूल, इनको नाशती है पाचन है और कब्जको करती है ॥ ९ ॥ हरड़े, देवदार, वच, नागरमोथा, सोंठ, अतीस इन्होंका क्वाथ आमातीसारको नाशता है ॥ १० ॥ अथ ज्वरातिसारके ऊपर उत्पलषङ्क । उत्पलं धान्यकं शुण्ठी पृश्निपर्णी बलायुतम्॥बालबिल्वं गवां तक्रेणात्युष्णेन च पेषयेत् ॥११ ॥ तेन लाजाकृतं मण्डं देय- मानीय शीतलम्॥ ज्वरातिसारशमनं हुताशनबलप्रदम् ॥१२॥ नीला कमल, धनियां, सोंठ, पिठवन, खरैहंटी, बेलगिरीका गूदा इनको गायके तक्रसे पीसे Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( २१४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- ॥ ११ ॥ पीछे उसमें धानकी खीलोंका मड बना शीतल कर पीवे । यह ज्वरातीसारको शांत करता है और जठराग्निको बल देता है ॥ १२ ॥ अथ शुण्ठ्यादि क्वाथ । शुण्ठीविषातलधरामृतवत्सकानां तिक्ताह्वयं कनकशीतलकः कषायः ॥ पाने विधेयमधुना प्रतिसाधितस्तु ज्वरातिसारशम- नाय सदा प्रदेयः ॥ १३ ॥ सोंठ, अतीस, कलौंजी, जीरा, गिलोय, इन्द्रजव, कुटकी, पीला कमल, चन्दन इन्होंका काथ पीना । यह सब कालमें ज्वरातीसारको नाशता है ॥ १३ ॥ अथ पाठादि क्वाथ । पाठेन्द्रभूनिम्बघनामृतानां सपर्पटः क्वाथ इह प्रशस्तः ॥ आमातिसारं च जयेद्द्रुतं वा ज्वरेण युक्तं सहजं च तीव्रम् ॥ १४ ॥ श्योनापाठा, इन्द्रजव, चिरायता, नागरमोथा, गिलोय, पित्तपापडा, इन्होंका काथ आमाती- सारको और ज्वरातीसारको जीतता है इसवास्ते श्रेष्ठ है ॥ १४ ॥ अथ शुंठादि पाचन । शुण्ठी बालकमुस्ता बिल्वं पाठा विषा च धान्यानि ॥ पाचनमरुचौ छर्दिज्वरातिसारं विनाशयति ॥ १५ ॥ सोंठ, नेत्रवाला, नागरमोथा, बेलगिरी, श्योनापाठा, अतीस, धनियां इन्होंका काथ पाचन है । अरुचि, छर्दि और ज्वरातीसारको नाशता है ॥ १५ ॥ अथ वत्सकादि क्वाथ । वत्सकश्च सुरदारुरोहिणीधान्यबिल्वमगधात्रिकण्टकम् ॥ निम्बबीजगजपिप्पलीवृकीक्वाथ एवमतिसारभेषजम् ॥ १६ ॥ इन्द्रजव, देवदार, हरडं, धनियां, बेलगिरी, पीपल, गोखुरू, गल्ला, गजपीपल, काश्मीरी पाठा इन्होंका काथ अतिसारमें अति उत्तम औषध है ॥ १६ ॥ अथ पञ्चमूली क्वाथ । पञ्चमूलीबलाबिल्वगुडूचीमुस्तनागरैः ॥ पाठाभूनिम्बह्रीबेरकुट- जत्वक्फलैर्भृतः ॥ १७॥ इति सर्वानतीसारान्वमिश्र्वासज्वरार्द्दि- तान् ॥ सशूलोपद्रवांश्चासौ हन्याच्चासुरदारुणम् ॥ १८ ॥ पञ्च-

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता ( २१५ ) मूल्पतिसामान्या योज्या पित्ते कनीयसी ॥ महती पञ्चमूली तु वातश्लेष्मज्वरे हिता ॥ १९ ॥ पञ्चमूल, खरैहंटी, बेलगिरी, गिलोय, नागरमोथा, सोंठ, श्योनापाठा, चिरायता, नेत्रवाला, कूड़े- की छाल, इन्द्रजव इन्होंका क्वाथ ॥ १७ ॥ सबप्रकारके अतीसार, छर्दि, श्वास्ररोग, ज्वर शूल, इन्होंको नाशता है ॥ १८ ॥ पित्तदोषमें लघुपञ्चमूल वर्तना। वात और कफदोषमें बृहत्प- ञ्चमूल वर्तना ॥ १९ ॥ अथ उत्पलादिपाचन । उत्पलं दाडिमत्वक्च केशरं तथा मधु पद्मकम् ॥ धात्री पिष्टा तण्डुलतोयैः पाचनं ज्वरातिसारघ्नम् ॥ २०॥ नीला कमल, अनारकी छाल, केशर, कमल, मौरेठी आंवला इन्होंको चावलोंके पानीसे पीस शहद मिला पीवे । यह पाचन ज्वरातिसारको नाशता है ॥२० ॥ अथ उशीरादि क्वाथ । उशीरं धान्यकं मुस्तं सबिल्वं बालकं बला ॥ तथा च धातकी- पुष्पं कषायस्य प्रशस्यते ॥२१ ॥ ज्वरातिसारशमनं सहशो- णितपैत्तिकम् ॥निहन्ति शोफं सकलं रुचिप्रदविपाचनम्॥२२॥ खश, धनियां, नागरमोथा, बेलगिरी, नेत्रवाला, खरैहंटी, धवके फूल इन्होंका क्वाथ श्रेष्ठ है ॥ २१ ॥ ज्वरातिसार, रक्तातिसार, पित्तातिसार, सब प्रकारका शोजा इन्होंको शांत करता है और रुचिको देता है और पाचन है ॥ २२ ॥ विगतामातिसारं चिरोत्थितं रक्तसहितमतिवृद्धम्॥ मधुना सहितः शमयत्यरलुः पुटपाकनिर्यासितः॥२३॥ श्योनापाठाको पुटपाककी विधिसे पकाके रसको निचोड़ उसमें शहद मिला पीवे यह पक्कातिसार और पुराना अतीसार और बढे हुए रक्तातिसारको भी नाशता है ॥ २३ ॥ जम्ब्वादिस्रवरस । जम्बूवटोदुम्बरप्लक्षको हि नागश्च प्रपौण्डरिकं शमी च॥गुन्द्रः सचूतोऽम्बुदजीविकाया आसां हि पुत्रञ्च सदा विदध्यात्२४॥ प्रस्थद्वयेन प्रपिबेद्वि तावद्यावद्विशेषांशमिदं प्रजायते ॥पुनः कटाहे विपचेच्च सम्यग्दार्वाप्रलेपः स्वरसश्च यावत् ॥ २५ ॥ उत्तार्य नूनं भिषगुत्तमेन क्षौद्रेण मिश्रं हरतेऽतिसारम्॥२६॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( २१६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- जामुन, बड़, गूलर, पकरिया, नागकेशर, कमल, जाठी, मोथा, तृण, आंब, नागरमोथा, जीवंती इन्होंने फूलोंको सबकालमें लेवे ॥ २४ ॥ पीछे १२८ तोले पानीमें पकावे । जब चौथाईभाग शेष रहे तब छानके फिर कढ़ाईमें घालि फिर पकावे जब कड़छीपर चेपनेलगे ॥ ॥ २५ ॥ तब उतार उत्तमवैद्यको निश्चय शहद मिला रोगीको देना चाहिये यह अतिसारको हरता है ॥ २६ ॥ काकमाचीका प्रयोग । हारीतेन तथा प्रोक्ता काकमाची सुपूजिता ॥ आलोक्यानेकशास्त्राणि आत्रेयेणापि पूजिता ॥ २७ ॥ जैसे अनेक शास्त्रोंको देख आत्रेयजीने काकमाची अर्थात् भोलणीनामसे प्रसिद्ध मकोह- विशेष ओषधी पूजित की है तैसे ही हारीतने भी यही ओषधी पूजी है अर्थात् अतिसारमें श्रेष्ठ समझी है ॥ २७ ॥ जंबृत्वगादिका अवलेह । जम्बूत्वचं वत्सकवल्कलं च निष्क्वाथ्य नूनं सलिले समीरणम्॥ चतुर्विभागेष्वपि शोषितेषु उत्तार्य्य वस्त्रेष्वथ गालयेच्च ॥ २८ ॥ पुनः कटाहै विपचेच्च सम्यग्दार्वांप्रलेपः स्वरसस्तु यावत् ॥ उत्तार्य्य शीते मधुना विमिश्रं लीढं हरेदप्यतिसारमुग्रम् ॥२९॥ जामनकी छल, कुड़ाकी छाल, इनका पानीमें क्वाथ बना जब चौथाई भाग शेष रहे तब उतारि वस्त्रसे ॥ २८ ॥ छान फिर कड़ाहीमें घाल अच्छीतरह पकावे । जब कड़छीपै चिपकने लगे और स्वरसरूप रहे तब अग्निसे उतार शीतलकर शहद मिला चाटे । यह दारुण अतीसारको हरता है ॥ २९ ॥ अतिसारका पूर्वरूप । कुक्षौ दरे वक्षसि नाभिदेशे पायुप्रदेशे सततं निरुद्धे ॥ वातस्य रोधश्च शकृद्विभङ्गो भवन्ति सर्वेष्वतिसारकेषु॥३०॥ सर्व अतिसाररोगमें कुक्षि,उदर, छाति,नाभिदेश,गुदामण्डल, ये सब स्थान रुकंकर अधोवा- युका रोध और विष्ठाका भंग होता है ॥ ३० ॥ अथ वातातिसारका लक्षण और चिकित्सा । सफेनिलं पिच्छलमेव रूक्षमल्पं शकृदामसशब्दशूलम् ॥कृष्णं भवेद्गात्रविचेष्टनञ्च वातातिसारे प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ ३१ ॥

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता । (२१७) तस्यादौ लङ्घनं चैकमल्पे वा नैव लंघनम्॥ तस्माद्देयं कषायं तु पानभोजनमेव च ॥ ३२ ॥ झागोंसे मिलाहुआ गाढा और रूखा मल उतरे और थोड़ा वारवार आमसहित आवे और दिशाजानेके समय शब्द और शूलको उपजावे और शरीर आदि कृष्णवर्ण होजावे उसको वातातीसार कहते हैं ॥ ३१ ॥ उसके आदिमें एक लंघन करना और अल्पस्वरूप वाताति- सारमें लंघन नहीं करना उससे क्वाथ, पान, भोजन ये देने चाहिये ॥ ३२ ॥ अतिसारका पाचक कल्क । उदीच्यधान्यस्य जलेन कल्कं पाने हितं पाचयेतेऽतिसारम्॥ तृष्णापहं दाहविनाशनञ्च सशूलहिक्कासु विनाशनं स्यात्३३॥ नेत्रवाला, धनियां इनको पानीमें पीस कल्क बना खानेसे अतिसारको पकाता है और तृषा, दाह, शूल, हिचकी इनको नाशता है ॥ ३३ ॥ वालकादि कल्क । वालकद्वयमोचहरीतकीपर्पटेन सहितं जलेन च ॥ क्वाथपान- मिदमेवातिसारे नाशमाशु कुरुते च विट्छान्तिम् ॥ ३४ ॥ नेत्रवाला, खश, मोचरस, हरड़े, पित्तपापड़ा, इनका पानीमें क्वाथ बना अतीसार रोगी पीवे । यह विष्ठाको शांत करता है ॥ ३४ ॥ शालिपर्ण्यादिपानक । शालिपर्णी पृश्निपर्णी बृहती कण्टकारिका॥बालाश्वदंष्ट्रा बिल्वा- नि पाठा नागरधान्यकम् ॥३५॥एतदाहारसंयोगे हितं सर्वा- तिसारिणाम् ॥ शालवन, पिठवन, बडी कटेहली, छोटी कटेहली, नेत्रवाला, गोखरू, बेलगिरी, श्योनापाठा, -सोंठ, धनियां ॥ ३५ ॥ यह द्रव्य भोजनके संयोगमें अतीसार रोगियोंको हित हैं ॥ तिंदुकादिरसपानक । तिन्दुकत्वचमाहृत्य काश्मरीपत्रवेष्टिताम्॥३६॥मृदा विलिप्य विधिवद्दहेन्मृद्वग्निना भिषक् ॥ रसं गृहीत्वा मधुसंयुक्तं पानं सर्वातिसारघ्नञ्च ॥ ३७ ॥ और तेंदूआवृक्षकी छालको ले कंभारीके पत्तोंसे वेष्टित करे ॥ ३६॥ पीछे माटीसे विधिपू- र्वक लीपा कोमल अग्निसे दग्ध करे पीछे रस निकाल शहदसे संयुक्त कर पीवे यह सबप्रकारके अतीसारोंको नाशता है ॥ ३७ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( २१८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- कुटजपुटपाक । तुलामथार्द्रागिरिमल्लिकायाः संकुट्य कर्षञ्च समादधीत॥ तस्मि- न्सपूते पलसंसितञ्च देयञ्च पिष्ट्वा सह शाल्मलेन॥ ३८॥ पाठा समङ्गातिविषा समुस्ता बिल्वञ्च पुष्पाणि च धातकीनाम् ॥ प्रक्षिप्य भूयो विपचेच्च तावद्दर्वीप्रलेपः स्वरसस्तु यावत्॥ ३९॥ पीतस्त्वसौ कालविदा जलेन मण्डेन वाजापयसाऽथवापि ॥ निहन्ति सर्वमतिसारमुग्रं कृष्णं सितं लोहितपीतकञ्च ॥४०॥ दोषं ग्रहण्यां विविधं च रक्तपित्तं तथार्शांसि सशोणितानि ॥ असृग्दरं चैवमसाध्यरूपं निहन्त्यवश्यं कुटजाष्टकोऽयम्॥४१॥ कूड़ाकी गीली छालको ४०० तोलेभर ले और कूट पानीमें अग्निपै पकावे जब चौथाई- भाग शेष रहे तब वस्त्रमें छान फिर अग्निपै धर मोचरस ॥ ३८ ॥ श्योनापाठा, मँजीठ, अतीरा, नागरमोथा, बेलगिरी, धवके फूल, ये सब चार-चार तोले भर ले पूर्वोक्तमें मिलाके पकावे जब कड़छीपै चिपने लगे और स्वरस ही हो तब उतारै ॥ ३९ ॥ पीछे कालको जाननेवाले रोगीने मंड, बकरीका दूध, इनके संग पीनी । यह-कृष्ण, सफेद, लाल, पीला, ऐसे वर्णके सब अतिसारोंको नाशता है ॥ ४० ॥ और ग्रहणी दोष, अनेक प्रकारकी रक्तकी बवासीर और असाध्यरूप प्रदर रोग इनको निश्चय हरता है । इसको 'कुटजाष्टक' कहते हैं ॥ ४१ ॥ अथ पित्तातिसारका लक्षण और चिकित्सा । घर्मेण चोष्णान्नविभोजनेन घर्मेण तप्तोदकसेवनेन ॥ शोकेन तापेन रुषा कटुत्वे क्षारेण पित्तासृक्सारकः स्यात्॥४२॥तेनारुणं पीतमथातिनीलं दुर्गन्धशोषज्वरपाण्डुयुक्तम् ॥ भ्रमारर्त्तिमूर्च्छा च तृषाङ्गदाहः पित्तातिसारस्य च लक्षणानि ॥ ४३ ॥ घामसे और गरम अन्नके भोजनसे और घामसे तप्तहुए जलके सेवनेसे शोक और तापसे क्रोधसे कडुआ और क्षाररस सेवनेसे पित्तातिसार उपजता है ॥ ४२ ॥ लाल, पीला, अत्यंतनीला, ऐसा मल उतरे और दुर्गंध, शोष, ज्वर, पांडुरोग, भ्रम, मूर्च्छा, तृषा, ये उपजें और अंगोंमें दाह हो उसको पित्तातीसार जानिये ॥ ४३ ॥ १ यही हा० सं० पृ० २२२ में कुटजाष्टकके नामसे है। वहां “संकुट्य पत्त्वा रसमाददीत” का पाठभेद है ।

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( २१९) अथ शालिपर्ण्यादिपान । शालिपर्णीपृश्निपर्णीबलाबिल्वैस्तु साधितः ॥ दाडिमाम्लो हितः पेयः पित्तातीसारशान्तये॥ ४४ ॥ शालवन, पिठवन, खरेंहटी, बेलगिरी, इनसे बनायी अनारकी कांजीको पीना यह पित्तातीसारकी शांतिमें हित है ॥ ४४ ॥ अथ तृणमूलका क्वाथ । कुशकाशेक्षुमूलानां शालीनलभवेर्जलैः ॥ मूलानां क्वाथमाहृत्य शस्तं पित्तातिसारिणाम् ॥४५॥ कुश, काश, ईख, इनकी जडोंका चावल और कमलके पानीमें क्वाथ बना पीवे यह पित्तातीसारियोंको श्रेष्ठ है ॥ ४५ ॥ अथ धान्यपञ्चकादिक्वाथ । धान्यपञ्चकमूलानां क्वाथः पित्तातिसारिणाम् ॥४६॥ धनियाँ और पंचमूलका क्वाथ पित्तातिसारियोंको हित है ॥ ४६ ॥ अथ शाल्मलीमूलकल्क । शाल्मलीमूलत्वग्गुडदुग्धपेषितं च ॥ पानं पित्तातिशमनं सरक्तदाहशोषहरम् ॥ ४७ ॥ सभलकी जड और छाल, गुड़ इनको दूधमें पीस पीवे । यह पित्तातिसार, रक्त, दाह, शोष इनको हरता है ॥ ४७ ॥ अथ कफातिसारलक्षण । दुःस्वप्नादिश्रमाद्वै सहजजडतया शीतसंसेवनेन स्निग्धाहाराति- भोज्यात्सतिलपलगुडैश्चेक्षुखण्डैर्गुरूणाम् ॥ शीतातिस्नानलौ- ल्यात्पयसि दधियुताहारसंसेवनाच्च जातः श्लेष्मातिसारो जठर- हुतभुजं हंति पुंसामपाकः ॥ ४८॥ तेन श्लेष्मा शुष्कभेदारुचिः स्यात्सान्द्रं विस्रं जाड्यता रोमहर्षः ॥ मन्दाग्नित्वं मन्दवेगो विशिष्टः सालस्योऽपि विद्धि सारः कफोत्थः ॥ ४९ ॥ दुःस्वप्न अर्थात् बुरीतरह शयन आदिसे, परिश्रमसे,स्वाभाविक जड़पनेसे, शीतलपदार्थके सेवनेसे चिकने भोजनको और अत्यन्तभोजनके करनेसे और तिल, गुड़, मांस, ईखका गांड़ा, भारीपदार्थ इनके सेवनेसे और शीतलपानीमें अत्यंत स्नान और चंचलता करनेसे और Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( २२० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- दहीसे युक्तहुये भोजनके सेवनसे कफातीसार उपजता है और जो आप नहीं पक्ता है पेटकी अग्निको नाशता है ॥ ४८ ॥ जिसका मल चिकना और सफेद गाढ़ा दुर्गंधिलिये शीतल,थोड़ी पीड़ासहित उतरे और शरीर भारी रहे और भोजनमें अरुचि हो उसको कफातिसार कहते हैं ॥ ४९ ॥ अथ कफातिसारकी चिकित्सा । तस्यादौ लंघनं प्रोक्तं ज्ञात्वा देहबलाबलम् ॥ पाचनं च विधातव्यं त्र्यूषणाद्यं भिषग्वर ॥ ५० ॥ तिसकी आदिमें देहके बल और अबलको जानके वक्ष्यमाण पाचनको देवे ॥ ५० ॥ अथ त्र्यूषणादिक पाचन । त्र्यूषणमभया हिङ्गु चातिविषा रुचकं वचायुक्तम् ॥ मधुसहितं लेहनं नृणां गङ्गामपि वाहिनीं रुन्ध्यात् ॥ ५१ ॥ सोंठ, मिर्च, पीपल, हरड़ै, हींग, अतीस, कालानमक, वच इन्होंके चूर्णमें शहद मिला चाटे यह मनुष्योंके गंगाके समान बहतेहुये अतीसारको रोकता है ॥ ५१ ॥ अथ कालिङ्गादि कल्क । कालिङ्गपाठातिविषा बला च सोदीच्यमुस्तामरिचानि शुण्ठी ॥ गुडेन क्षौद्रेण प्रशस्तकल्को रक्तातिसारे कफजे शमाय ॥ ५२॥ इन्द्रयव, श्योनापाठा, अतीस, खरैंहटी, नेत्रवाला, नागरमोथा, मिर्च, सोंठ इन्होंके कल्कमें गुड़ और शहद मिला खावे,यह रक्तातिसारमें और कफातिसारमें हित है ॥ ५२ ॥ अथ वत्सकादि क्वाथ । वत्सकातिविषबिल्वमुस्तकं वालकेन सहितं जले न तु ॥ क्वाथपानमतिशूलरक्तपूयनाशं ज्वरयुतेऽतिसारके ॥ ५३ ॥ कूड़ा, अतीस, बेलगिरी, नागरमोथा, नेत्रवाला, इन्होंका पानीमें क्वाथ बना पीवे यह अत्यंतशूल, रद, ज्वर, कफ, इनसे युक्त हुए अतिसारमें हित है ॥ ५३ ॥ अथ रक्तातिसारका लक्षण । यस्तु रक्तं च शुद्धं विरेचने शोषदाहमतिरिञ्चेत् ॥ रक्तातिसार इति ज्ञेयो वैद्यैर्महामतिभिः ॥ ५४ ॥ जो रोगी मल उतरनेके समय शुद्ध रक्त शोष और दाहसे युक्त छोड़े वह रक्तातिसारी है ऐसे समझदार वैद्योंको जानना चाहिये ॥ ५४ ॥

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( २२१ ) अथ धान्यादि क्वाथ । धान्यनागरमुस्ता च वालकं बालविल्वकम् ॥ बला नागबला चेति क्वाथो रक्तातिसारिणाम् ॥ ५५ ॥ धनियां, सोंठ, नागरमोथा, नेत्रवाला, कच्ची वेलगिरी, खरेंहटी, वडी खरेंहटी इनका क्वाथ रक्तातिसारवालोंको हित है ॥ ५५ ॥ अथ दाडिमादिक्वाथ । दाडिमं च कपित्थं च पथ्याजंब्वाम्रपल्लवान् ॥ पिष्ट्वा देया मस्तुयुक्ता रक्तातीसारवारणाः ॥ ५६ ॥ अनार, कैथ, हर्रैं, जामुन और आंबके पत्तोंको पीसकर दहीके पानीमें देवे । यह क्वाथ रक्तातिसारको नाशता है ॥ ५६ ॥ अथ गुडबिल्वादियोग । गुडेन पक्वं दातव्यं बिल्वं रक्तातिसारिणे ॥ दध्ना वा मधुना पथ्या रक्तातीसारनाशिनी ॥ ५७ ॥ पकाहुआ बेलगिरीका फल गुड़के साथ रक्तातिसारवालेको देना अथवा हर्र शहदके अथवा दहीके साथ देना इससे रक्तातिसारका नाश होता है ॥ ५७ ॥ अथ वत्सकावलेह । वत्सकातिविषानागराभयामस्तुसंयुतः ॥ लेहः शस्तोऽस्ति मधुना रक्तातीसारनाशनः ॥ ५८ ॥ कूडा, अतिश, सोंठ, हरड़ें इन्होंको पीस शहद और दहीके पानीमें मिला पीवे यह रक्ता- तिसारको दूर करता है ॥ ५८ ॥ अथ कुटजादिचूर्ण । कुटजत्वक्च पाठा च विश्वं बिल्वं च धातकी ॥ मधुना सहितं चूर्णं देयं रक्तातिसारनुत् ॥ ५९ ॥ कूडाकी छाल, पाठा, सूंठ, बेलगिरी, धवके फूल, इनके चूर्णको शहदमें मिला देवे । यह रक्तातिसारको हरता है ॥ ५९ ॥ अथ सन्निपातके अतिसारका लक्षण और चिकित्सा । वराहवासाससदृशं तिलाभं मांसधावनाभासम् ॥ पक्वजम्बूफलसदृशं सन्निपातः प्रवहताम् ॥ ६० ॥

( २२२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- शूकरकी वसाके समान और तिलोंके समान कांतिवाला और मांसके धोवनके समान प्रकाशित और पके हुए जामनके फलके समान ऐसा मल उतरे तिसको सन्निपातका अती- सार जानिये ॥ ६० ॥ अथ कुटजाष्टक । तुलामथाद्र्रांगिरिमल्लिकायाः संकुट्य पक्त्वा रसमाददीत ॥ तस्मिन्सुपूते पलसंमिते च देयं च पिष्ठा सह शाल्मलेन ॥६१॥ पाठा समंगातिविषा समुस्ता बिल्वं च पुष्पाणि च धातकी- नाम्॥प्रक्षिप्य भूयो विपचेच्च तावद्दार्वीप्रलेपः सरसस्तु यावत् ॥ ६२ ॥ पीतस्ततः कालविदा जलेन मण्डेन च क्षौद्रयुतेन वापि ॥ निहन्ति सर्वमतिसारमुग्रं कृष्णं सितं लोहितपीतकं च ॥ ६३ ॥ दोषं ग्रहण्यां विविधं च रक्तं पित्तस्य चार्शांसि स- शोणितानि॥ असृग्दरं चैवमसाध्यरूपं निहन्त्यवश्यं कुटजा- ष्टकोऽयम् ॥ ६४ ॥ सफेद कूड़ाका गीला फूल अथवा छाल, एक तुलाभर ले कूटकर उसका रस निकाल कर छान ले फिर उसमें मोचरस !। ६१ ॥ सोनापाठा, मँजीठ, अतीश, नागरमोथा, बेलगिरी, धायका फूल, इन औषधोंको डारके चुल्हेपर पकावे, जब कड़छाको लेप होनेलगे, तब उतार रक्खे ॥ ६२ ॥ जब पीनेका समय आवे, तब पानीके साथ अथवा मंडके साथ किंवा शहद- दके साथ पिलावे यह कुटजावलेह भयंकर काला, सफेद, लाल, पीला ऐसे अतिसारको नष्ट करता है ॥ ६३ ॥ तथा ग्रहणीके अनेक दोष, रक्त, पित्त, रक्तके बवासीर और असाध्य असृग्दर इन रोगोंको अवश्य नष्ट करदेता है ॥ ६४ ॥ अथ अमृतवटक । पथ्यापञ्चमूलक्वाथश्चतुर्भागावशेषतः॥ तत्र क्वाथे पुनश्चूर्णमि- मानि चौषधानि तु॥६५॥ शृङ्गवेरं तथा लाक्षा पिप्पली कटु- रोहिणी ॥ दाडिमफलत्वक्चूर्णं दार्वी सवत्सकं विषम् ॥६६ ॥ आटरूषकचूर्णानि संक्षिप्यात्र निघट्टयेत् ॥ आजं दुग्धं तदर्द्धेन घृतं चाष्टांशकं क्षिपेत्॥६७॥ दार्व्या विलेपितं ज्ञात्वा गुडस्य षोडशानि तु ॥ पलानि मिश्रितं तत्र देयमप्रातराशने ॥ ६८ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० ३] भाषाटीकासमेता । ( २२३ ) त्रिदोषसन्निपातोत्थश्चातिसारश्च दारुणः॥ शूलमूर्च्छाभ्रमाना- हकामलानां विपाचनः॥६९॥ क्षतक्षीणक्षयाणां तु हितोऽयम- मृतो वटः ॥ ७० ॥ हरड़े, शालवन, पिठवन, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, गोखरू इनको पानीमें उबाल चौथा हिस्सा शेष रहे ऐसा क्वाथ बनावे ॥ ६५ ॥ पीछे अदरख, लाख, पीपल, कुटकी, अनारदाना, अनारकी छाल, दारुहलदी, कूडाकी छाल, अतीश ॥ ६६ ॥ वांसा, इन सबोंका चूर्ण बना पूर्वोक्तमें मिलावे और क्वाथसे आधा हिस्सा बकरीका दूध और आठवां हिस्सा घृतको मिला पकावे ॥ ६७ ॥ जब कड़छीपै चिपकने लगे तब जान १६ तोले गुड़ मिलाय सायंकालके भोजनमें देवे ॥ ६८ ॥ इससे सन्निपातका दारुण अतिसार, शूल, मूर्च्छा, भ्रम अफारा, कामला, ये शांत होते हैं ॥ ६९ ॥ क्षतक्षीण और क्षयरोगी इनको यह अमृतवटक हित है ॥ ७० ॥ अथ बिल्वादिचूर्ण । एकबिल्वागुरुरोध्रचूर्णं मध्वादियोजितम् ॥ रक्तातिसारशमनं बालानां क्षीणधातुकम् ॥ ७१ ॥ एक १ बेलगिरी, अगर, लोध, इनके चूर्णमें शहद मिला बालकको चटावे यह धातुओंको क्षीण करनेवाले रक्तातिसारको नाशता है ॥ ७१ ॥ अथ गुदाके निकसनेकों ( काँच ) बन्द करनेकी चिकित्सा । यदा गुह्यं निरस्येत्तु तदा कुर्य्यात्क्रियामिमाम् ॥ सहचर्य्या- बलानां च रसो ग्राह्यो घृतं पुनः॥७२॥ पक्वघृतेन लेपः स्या- त्तस्य चेदं प्रशस्यते ॥ अरणीपल्लवक्वाथो वाप्यं लोष्टं सचन्द- नम् ॥७३॥ प्रतप्तमथवाग्निनिभं तथा नरस्य निर्वाप्य काञ्जि- कमथ विदधीत तद्वत् ॥ सौख्यं च सम्यग्गुदसेचनकं प्रशस्त संवेश्य मध्यतो गुदं दृढबन्धनं स्यात् ॥ ७४ ॥ जब गुदाकी कांच निकसे तब यह क्रिया करनी, पीला कुरंटा और खरैहटीके रसमें घृतको पका लेप करना श्रेष्ठ है ॥ ७२ ॥ अरनीके पत्तोंके क्वाथमें चुल्हाकी माटी और चन्दनको गर- मकर बुझावे अथवा इसीरीतिसे कांजीको बनावे इनसे अच्छीतरह गुदाको सेचे ॥७३॥ और कांचको गुदाके बीचमें प्रवेश कर दृढबन्धन करना ॥ ७४ ॥

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( २२४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ अतिसारविशेषता । लशुनकुणपगन्धं पूयगन्धं घनं वा पललजलसमानं पक्वजम्बू- निभं वा ॥ घृतमधुपयसाभं तैलशैवालनीलं सघनदधिसवर्णं वर्जयेच्चातिसारसम् ॥७५॥ भ्रममदनमथार्शः शूलमूर्च्छाविदाहं श्वसनमतिविवर्णं छर्द्दिमूर्च्छातृडार्त्तम् ॥ विकलमतिशयेन सौ- ख्यशोफज्वरार्त्तः स परिहरतु दूरं सद्भिधाता न दृष्टः ॥ ७६ ॥ शोफं शूलं ज्वरं तृष्णां श्वासं कासमरोचकम्॥ छर्दिं मूर्च्छां च हिक्कां च दृष्ट्वातीसारिणं त्यजेत् ॥ ७७ ॥ दृष्ट्वा शोफं तथाध्मानं हिक्कां छर्द्दिमरोचकम् ॥ तथा च पाण्डुरोगात्तर्मतिसारयुतं त्यजेत् ॥ ७८ ॥ लहसनकी गन्धके समान गन्धवाला और मुरदाके समान गन्धवाला और रादके गन्धकके समान गंधवाला, कठिन और मांसके पानीके समान तेल और शिवालके समान नीला और करड़ी दहीके समान वर्णवाला ऐसे अतिसारको वर्जे ॥ ७५ ॥ भ्रम, उन्माद, बवासीर, शूल, मूर्च्छा, दाह, श्वास, इनसे संयुक्त छर्दि और तृषासे पीड़ित अतिशय करके विकल शोजा और ज्वरसे पीड़ित ऐसा अतिसार वर्ज देना ॥ ७६ ॥ शोजा, शूल, ज्वर, तृषा, श्वास, खांसी, अरुचि, छर्दि, मूर्च्छा, हिचकी इनसे संयुक्त हुए अतिसाररोगीको त्यागे ॥ ७७ ॥ और शोजा, अफारा, हिचकी, छर्दि, अरुचि, पांडुरोग इनसे पीडित हुए अतिसाररोगीको त्यागे ॥ ७८ ॥ अथ अतिसारके भेद संग्रहणीरोगका निदान और चिकित्सा । यदल्पमल्पं क्रमशॊ निषेवितं मलं भगाधारगतं च नित्यम् ॥ हत्वान्तराग्निं कुरुते नरस्य विकारमाहुर्ग्रहणीति संज्ञाम्॥७९॥ निर्वृत्ते चातिसारे शमयति दहनं भूयसा दोषिताऽपि भुक्त्वा नाश्य मलांशं बहुदिनमनिशं सञ्चयित्वा निसर्त्ति ॥ वारं वारं विगृह्य सहजमसरलं पक्वमानं घनं वा दुर्व्याधिचौररूपो मनुज- रुजकरः स्यात्तथा ग्रहणीति ॥ ८० ॥ जो अल्प अल्प मल नीचेकी अंत्रोंमें प्राप्त हो नित्यप्रति उतरे और दोष शरीरकी अग्निको नष्टकर विकारको उपजावे उसको ग्रहणीरोग कहते हैं ॥ ७९ ॥ अतिसारके निवृत्त होनेके

पश्चात् दोषोंसे युक्त हुई ग्रहणी पेटकी अग्निको शांत करे और भोजन करके संचित हुआ मलका अंश बहुत दिनोंतक नित्यप्रति निसरे और बारंबार कब्ज करके पका हुआ और कठिन मल उतरे तिसको ग्रहणीदोष कहते हैं । यह घोररूप दुष्ट रोग मनुष्योंको पीडा देता है ॥ ८० ॥ • अथ ग्रहणीके प्रकार । लक्षयेच्चातिसारे च विज्ञेयं ग्रहणीगदम् ॥ वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम्॥८१॥ नैव चैकेन दोषेण जायते ग्रह- णीगदः ॥ तेन संक्षीयते देहमन्तर्दाहो विपाकता ॥ ८२ ॥ अतिसारमें ग्रहणीरोगको जानना, वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज ऐसे ग्रहणीरोग होता है ॥ ८१॥ एक दोष करके ग्रहणीरोग नहीं उपजता । उसकरके मनुष्यका शरीर छीजता है और शरीरके भीतर दाह होती है और अन्न नहीं पचता ॥ ८२ ॥ अथ ग्रहणीका उपद्रव तथा गुल्मादिकोंकी संप्राप्ति । तिक्तः कषायकटुकाम्लविदाहिरूक्षः शीताल्पभोजनपरैः श्रम- मैथुनैश्च॥भाराध्वहस्तिरथवाहनधावनेन संक्रुद्धवायुहननेऽनल- वेगमेनम् ॥ ८३ ॥ कडुआ, कसैला, चरचरा, खट्टा, दाह करनेवाला, रूखा, शीतल, थोडा, ऐसे भोजनोंको नित्यप्रति सेवनेसे, परिश्रम और मैथुनके अत्यंत सेवनेसे और बोझ, मार्गमें ज्यादा चलनेसे, हस्ती, रथ, घोडा इनमें बैठके भागनेसे क्रुद्ध हुआ वायु अधोवातके वेगको नाशता है ॥ ८३ ॥ तस्मात्तद्ग्रमनिलेन च छिद्यमानं रक्तेन युक्तमनिले परिपाक- मेति ॥ संजायतेऽपि मनुजस्य तथा तृतीयं गुल्मेति नाम स च पञ्चविधो बभूव ॥ ८४ ॥ प्लीहा यकृज्जठरकण्डुमलस्य बन्धो- ऽष्ठीला क्रिमिर्जठररोगभवोऽथ षष्ठः ॥ एते भवंति ग्रहणीपरि- वर्त्तमाना घोरास्तथा दुःखदाश्च मनुजस्य चित्ते ॥ ८५ ॥ उससे रुके हुए वायु करके छिद्यमान हुआ रक्त परिपाकको प्राप्त होता है तब मनुष्यके एक गोला उपजता है, ऐसे पांच प्रकारका ग्रहणी दोष जानना ॥ ८४ ॥ तिल्लीरोग, यकृद्रोग, उदररोग, खाज, मलबन्ध, कृमिरोग इनसे संयुक्त ग्रहणीरोग छठा भी होता है । ये सब घोररूप रोग मनुष्यको दुःखके देनेवाले ग्रहणीके ही विकारसे होते हैं ॥ ८५ ॥ १५

(२३६) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ गुल्मसंज्ञक ग्रहणीरोगका लक्षण । शोषो गलस्य तिमिरं किल पार्श्वशूलं नाभौ तथातिकृशताति- विषूचिका च॥ कर्णे स्वनोऽतिवमनं क्लमशूलमोहः श्वासेन गुल्म- मिति लक्षणमेव विद्धि॥८६॥ यस्यैतानि च लिङ्गानि गुल्मिनं तं विदुर्बुधाः॥ग्रहणी नाम साध्यो यस्तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ८७ कण्ठका शोष हो, अंधेरी आवे, पसली और नाभिमें शूल हो, शरीर अत्यन्त कृश हो जावे और अत्यन्त विषूचिका रोग उपजे, कानमें शब्द हो, अत्यन्त छर्दि आवे और ग्लानि, शूल, मोह, श्वास, गुल्मरोग ये उपजें ॥ ८६ ॥ ये जिसके लक्षण हों उसके गुल्मसंज्ञक ग्रहणीरोग जानना, ग्रहणीरोग साध्य है उसके लक्षण कहता हूँ ॥ ८७ ॥ अथ वातकी संग्रहणीका लक्षण । चित्रं सशब्दं सृजतेऽत्र वर्चःशोफोऽनिलो वर्चमतीव रूक्षम् ॥ श्वासार्त्तियुक्तं तनुशैथिलं च स्रावो ग्रहण्यानिलकोपतःस्यात् ८८ चित्र और शब्दसहित मल उतरे, वह मल अत्यन्त रूखा हो, वातसे शोजा उपजे, श्वासरोग और शरीरमें शिथिलपना और स्राव हो ये लक्षण हों तब वातकी संग्रहणी जानिये ॥ ८८ ॥ अथ पित्तकी संग्रहणीका लक्षण । विदाहि शीर्णं सरुजं तृषार्त्तं दुर्गन्धपीतारुणनीलकालम् ॥ संसृज्यते यस्य मलो विमिश्रः पित्तोद्भवा सा ग्रहणीति संज्ञा ८९ दाह, शूल, तृषा, दुःख इन्होंसे युक्त रोगी होवे, दुर्गन्धसे मिला हुआ और पीला, लाल, नीला, काला इन रंगोंसे मिला हुआ मल उतरे ये लक्षण होवें तब पित्तकी संग्रहणी जाननी ८९ अथ कफकी संग्रहणीका लक्षण । हृल्लासछर्दी श्वसनं च शोफः कासो जडत्वं च सशीतता च ॥ वैरस्यमास्ये गुरुगात्रता स्यादरोचकं शंखशकृद्ग्रहस्तु ॥९०॥ थुकथुकी हो, छर्दि आवे और श्वास, शोजा, खांसी, जडपना, शीतलता ये उपजें और मुखमें विरसपना हो, शरीरका भारीपना हो, अरुचि हो और गुदाकी आंठीमें मलकी कब्ज हो उसको कफकी संग्रहणी जानना ॥ ९० ॥ अथ सन्निपातकी संग्रहणीका लक्षण । त्रिभिः समेतं गदितं च चिह्नमेतस्य कोपो मधुरास्यता वा ॥ दाहोऽथ मूर्च्छा श्वसनं जडत्वं स सन्निपातग्रहणीगदः स्यात् ९१

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( २२७ ) ये पूर्वोक्त तीनों प्रकारकी संग्रहणियोंके लक्षण मिलें और मुखमें मधुर स्वाद आवे और दाह, मूर्च्छा, श्वास, जड़पना ये उपर्जे उसको सन्निपातकी ग्रहणी जानिये ॥ ९१ ॥ अथ वातग्रहणीका पाचन । दारुनागरनिशा सवासका कुण्डली मगधजा शटी घनम् ॥ रास्ना सबाङ्गी सरलाह्वपुष्करं पाचनं भवति वातिकग्रहे ॥९२ देवदारु, सोंठ, हलदी, वांसा, गिलोय, पीपल, कचूर, नागरमोथा, रास्ना, भारंगी, सालवृक्ष, पोहकरमूल इन्होंका पाचन वातकी संग्रहणीमें हित है ॥ ९२ ॥ अथ पित्तग्रहणीका पाचन । नलवेणुकुशानां च काशेक्षूणां च मूलकम् ॥ क्वाथपानं हितं वास्य पाचनं पैत्तिके ग्रहे ॥ ९३ ॥ नरशल, बांस, डाभ, कांस, ईख इन्होंकी जड़को पानीमें औटावे । यह पाचन पित्तकी संग्रहणीमें हित है॥ ९३ ॥ अथ कफग्रहणीकी औषध । व्याघ्रीग्रन्थिकचव्यसुरसा शुण्ठी दाडिमम् ॥ रजनी घनचित्रकमेवं हिक्काघ्नं कफग्रहणीं हन्ति॥९४॥ कटेहली, पीपलामूल, चव्य, तुलसी, सोंठ, अनारकी छाल, हलदी, नागरमोथा, चीता इन्होंका क्वाथ हिचकी और कफकी संग्रहणीको हरता है ॥ ९४ ॥ अथ शुण्ठ्याद्यमृतप्राशन । शुण्ठी कणा द्विरजनी च घनं तथा च योज्यः पुनः प्रतिविषं त्रिफला विडङ्गः ॥ सिन्धूत्थवह्नित्रिकटुं त्रिसुगन्धियुक्तं चूर्णं पुनर्गुडयुतं घृतमिश्रितं च ॥ ९५ ॥ कृत्वा बिडालपदमात्रक- मोदकांश्च भक्षयथा जलमपि ग्रहणीगदे च॥ अर्शोभगन्दरमरो- चकगुल्ममेहाञ्छूलाश्मरीकृमिरोगहरं च पाण्डुम् ॥९६॥ श्रेष्ठं रसायनमिदं बलिनाशनंस्याद्दृष्यं बलं विदधतेऽतिकृशत्वदोषम् वर्णेन्द्रियसकलदीप्तिकरं रुजोध्नं कुष्ठभ्नापापहरणं कुरुते सदैव ९७ सूंठ, पीपल, हलदी, दारुहलदी, नागरमोथा, अतीश, हरड़ै, बहेडा, आंवला, वायविडंग, सेंधानमक, चीता, सोंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, इलायची, तेजपात इनके चूर्णमें घृत और गुड़ मिला ॥९५॥ एक एक तोलेभरकी गोलियां बनाके पानीके साथ खावें ये गोलिय् Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( २२८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- ग्रहणीरोग, बवासीर, भगंदर, अरोचक, गुल्मरोग, प्रमेह, शूल, पथरी, कृमिरोग, पांडुरोग, इनको हरती हैं ॥ ९६ ॥ श्रेष्ठ रसायन हैं, वलियोंको नाशती हैं, वीर्य और बलको देती हैं, वर्ण और इंद्रियोंको प्रकाशित करती हैं, दुःखको नाशती हैं, और सबकालमें कुष्ठको और भ्रमको नाशती हैं ॥ ९७ ॥ अथ अभयाद्यवलेह । हरीतकीपञ्चशतानि धीमान् द्रोणेन गोमूत्रशतेन पाच्यम् ॥ मृद्व- ग्निना यावदशेषमेव मूत्रं विजीर्णे विधिवद्विहिज्ञः ॥ ९८ ॥ नि- र्वाप्य चूर्णे प्रतिशोष्यशीतं छायाविशुष्कान् प्रविदार्य चाष्टीः ॥ चूर्णं च शुण्ठीमगधाविषाश्च सुगन्धिमूर्वाचविकान्विताश्च॥९९॥ निष्क्काथ्य कल्कः कुटजस्य तावद्द्व्योपलेपी भवतीति यावत् ॥ तस्यार्द्धभागेन गुडं विमथ्यात्क्षीरं तदर्द्धेन गवाऽजकं वा ॥१००॥ निर्वापितं तं घृतभाजने च संस्थापितं प्राङ्मुदितेन तेन॥सिन्धू- त्थवह्नित्रिकटुं त्रिसुगन्धियुक्तं चूर्णं पुनर्गुडयुतं घृतमिश्रितं च ॥ १०१ ॥ चूर्णेन तेन सकलग्रहणीयपाण्डुशोषाश्मरी कृमि- जगुल्ममथातिसारान् ॥ प्लीहायकृच्छ्वासिषु मानवेषु विषूचिका पीनसमस्तकार्त्तिम् ॥ १०२ ॥ विनाशनःसद्यस्तथा ज्वराणा- मध्वश्रमक्षीणबलोदराणाम् ॥ ऐकाहिकादिज्वरनाशनःस्याल्ले- होऽभयाद्योऽमृतवन्नराणाम् ॥ १०३ ॥ इत्यभयाद्योऽवलेहः ॥ ५०० बड़ी हरड़ोंको १०० द्रोण गोमूत्रमें पकावे, कोमल अग्निसे पकनेमें जब चौथाई भाग शेष रहे ॥ ९८ ॥ तब अग्निसे उतार उन हरड़ोंको छायामें सुखाके चीर गुठलियोंको दूर करे, पीछे सूंठ, पीपल, अतीश, सफेद चंदन, मरोडफली, चव्य इनके चूर्णको यथायोग्य मिला ॥ ९९ ॥ फिर अग्निपै पकावे और कडछीसे चलावे, जब कड़छीपे चिपने लगे तब उस संपूर्ण औषधके समान गायका अथवा बकरीका दूध मिला ॥ १०० ॥ अग्निसे उतार घीके चिकने वर्त्तनमें स्थापन करे, फिर सेंधानमक, चीता सूंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, इलायची, तेजपात, गुड़, घृत इन्होंको मिलाके खावे ॥ १०१ ॥ यह सब प्रकारकी संग्रहणी, पांडु- रोग, शोषरोग, पथरीरोग, कृमिरोग, पेटका गोला, सबप्रकारके अतिसार, तिल्लीरोग, जिगर- रोग, श्वास, हैजा, जुखाम, पीनस, मस्तकरोग इनको नाशता है ॥ १०२ ॥ और सबप्रकारके ज्वरवाले मार्गमें गमन करनेसे क्षीण बलवाले और उदररोगियोंको हित है और ऐका- हिकआदि ज्वरोंको नाशता है । यह अभयाद्यवलेह मनुष्योंको अमृतके समान है ॥ १०३ ॥