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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

( २६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने ] पित्तके क्षयरोगमें मंदाग्नि, अरुचि, जड़ता ये रोग होते हैं और खांसी, श्वास, थुकथुकी, शोफ, मन्दचेष्टा ये उपद्रव होते हैं ॥ ११ ॥ अथ पित्तक्षयकी चिकित्सा । स्वेदाभ्यङ्गान्नपानानि दीपनानि प्रयोजयेत् ॥ जाङ्ग्लानि रसान्नानि सेवयेत्पित्तकृत्क्षये ॥ १२ ॥ स्वेद, मालिस, दीपन अर्थात् जठराग्निको दीप्त करनेवाले अन्नपान, इनको प्रयुक्त करे और पित्तसे उपजे क्षयरोगमें जांगल देशके जीवोंके मांसका रस हित है ॥ १२ ॥ अथ कफक्षयका कारण । व्यायामे च व्यवाये च रूक्षान्नाहारसेवनैः ॥ सन्तापक्रोधनश्चैव जायते कफसम्भवः ॥ १३ ॥ कसरत करनेसे, मैथुन, रूखा अन्नका भोजन, क्रोध, इनके सेवनसे कफका क्षयरोग बढता है ॥ १३ ॥ अथ कफक्षयका लक्षण । तन दाहोऽथवा पाण्डुः शोफो निःश्वसन भ्रमः ॥ विनिद्रता क्षुत्तृषा च स्त्रीसङ्गेनापि नन्दति ॥ १४ ॥ उससे दाह अथवा पांडुरोग, शोजा, श्वासरोग, भ्रम, निद्राका नाश, क्षुधा, स्त्रीसंगसे प्रसन्नता ये लक्षण होते हैं ॥ १४ ॥ अथ कफक्षयकी चिकित्सा । तस्य शीतान्नपानानि कन्दशाकादिकै रसैः ॥ अनूपदधिदुग्धैर्वा सेवनं च समीहितम् ॥ १५ ॥ उसके शीतल अन्नपान, कंदशाकआदिकोंके रस, अनूपदेशके जीवोंका मांस, दही, दूध, इनका सेवन हित है ॥ १५ ॥ अथ त्रिदोषजक्षयकी चिकित्सा । त्रिभिर्दोषैः क्षयं प्राप्तैस्तदा हि मरणं ध्रुवम् ॥ साधारणा क्रिया तस्य प्रयोक्तव्या महामते ॥ १६ ॥ जब त्रिदोषसे उपजा हुआ क्षयरोग होता है तब निश्चय मरण होजाता है । हे हारीत महामते ! उसकी साधारण चिकित्सा कही है ॥ १६ ॥

अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २६७ ) अथ धातु--रस-आदि सात ७ प्रकारकें क्षयरोगकें लक्षण ! अथ धातुक्षयं वक्ष्ये हारीत शृणु साम्प्रतम् ॥ रसरक्तमेदमांसानां प्रत्येकं क्षयलक्षणम् ॥ १७ ॥ हे हारीत ! अब धातुके क्षयरोगको कहते हैं सुन । रस, रक्त, मांस,मेद, इन सबोंके एक २ के लक्षणको कहते हैं ॥ १७ ॥ अथ रसक्षयका लक्षण ! रसक्षयेऽतिशोषश्च मन्दाग्नित्वं च वेपथुः॥ शिरोरुङ्मन्दचेष्टत्वं जायते च क्लमभ्रमौ ॥ १८ ॥ रक्तक्षये क्षयः पाण्डुर्मन्दचेष्टो भवेन्नरः ॥श्वासो निष्ठीवनं शोषो मन्दाग्नित्वं च जायते॥१९॥ रसके क्षय होनेमें अत्यंत शोष हो, मंद अग्नि हो, कंपना हो,शिरमें पीडा हो,मंदचेष्टा हो, ग्लानि हो, भ्रम हो ॥ १८ ॥ रक्तक्षय होनेमें क्षयरोग होवे तो पांडुरोग हो जावे, मंद- चेष्टा हो जावे, श्वास हो, थुकथुकी हो, शोष हो, मंदाग्नि हो ॥ १९ ॥ मांसक्षयका लक्षण । मांसक्षयेऽतिकृशता चेष्टनं चाङ्गभङ्गता ॥ निद्रानाशोऽतिनिद्रास्य विसंज्ञो लघुविक्रमः ॥ २० ॥ मासके क्षय होनेमें दुबलापन हो,देह चमकने लगे,देहमें दर्द हो,निद्राका नाश हो अथवा इसको अत्यंत निद्रा आवे और संज्ञा नहीं रहे, अल्पबल रहे ॥ २० ॥ अथ मेदःक्षयका लक्षण । मेदःक्षये मन्दबलो विसंज्ञता पारुष्यमङ्गस्य च भङ्गता स्यात्॥ श्वासातिकामारुचिताग्निमान्द्यंगतिर्विशोषश्च तथैव जायते२१ मेदके क्षय होनेमें मंदबल रहे, संज्ञा नहीं रहे, अंगभंग हो, कठोरता रहे और श्वास, अत्यन्त खांसी, अरुचि, मन्दाग्नि,गमन और शरीरमें शोष हो ये उपद्रव होते हैं ॥२१॥ अथ अस्थिक्षयका लक्षण । अस्थिक्षये स्यादतिमन्दचेष्टा वीर्यस्य मान्द्यं किल मेदसः क्षयः॥विसंज्ञता कम्पनता च कार्श्यता तथाङ्गभंगो वमनं कठोरता ॥२२॥दोषस्य शैथिल्यमथापि शोषिता विकम्पन शोषरुजश्च जायते ॥ लिङ्गैरथैभिः परिवेद्मज्जाक्षयोऽधिका कम्पनतैव चात्र ॥ २३ ॥

( २६८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अस्थिक्षयमें अतिमन्द चेष्टा हो, वीर्यमन्द हो जावे, मोटापा नाश हो जावे, संज्ञा नहीं रहे, माडा- पन हो, कंपना रहे, अंगभंग हो, वमन हो, कठोरता हो ॥ २२ ॥ और शोष हो वातआदिक दोषोंकी शिथिलता हो, शोजा हो, कंपना हो, रूक्षता हो और मज्जाके क्षयमें भी यही अस्थिक्ष- यके लक्षण होते हैं, केवल इसमें कंपनता अधिक होती है ॥ २३ ॥ अथ वीर्यक्षयका लक्षण । भ्रमः क्लमः स्यादतिमन्दचेष्टः शोफो निशाजागरणं च तन्द्रा ॥ मन्दज्वरः शोषसमो मनुष्ये शुक्रक्षये चाङ्गविचेष्टितानि ॥ २४ ॥ रौक्ष्यं रमणीद्वेषः रोषः शोफो भ्रमिश्च कम्पनता ॥ विरूपता वैकल्यं सन्धिषु शोषस्तथा याति ॥ २५ ॥ भ्रम हो, ग्लानि हो, मन्दचेष्टा हो, शोजा हो, रात्रिमें निद्रा नहीं आवे, तन्द्रा रहे, मन्दज्वर हो, शोष हो ये लक्षण हैं, और मनुष्यके वीर्यक्षय होनेमें अंग बेचैनीसे हिला करें ॥ २४ ॥ रूखापन, स्त्रियोंसे द्वेष, क्रोध, सूजन, भ्रम और कँपकपी, कुरूपता, विकलता और सन्धियोंमें सूजन वीर्यके क्षयमें होती है ॥ २५ ॥ अथ रसरक्तवृद्धिकारक औषध । इदानीं संप्रवक्ष्यामि भेषजानि यथाक्रमम् ॥ स्नेहनं रूक्षणं चैव तथा विम्लापनं हितम् ॥ २६ ॥ जाङ्ग्लानि च मांसानि भोज- नानि च सेवेयेत् ॥ गुडूची शृङ्गवेरञ्च यवानीकथितं जलम् ॥ २७ ॥ मरिचः कथितं दुग्धं पाने रात्रौ प्रशस्यते ॥ तेन रसानां वृद्धिः स्याच्छीघ्रं तस्माद्विमुच्यते ॥ २८ ॥ रसानां वृद्धिकरणं गोधूमयवशालिनाम् ॥ कथितानि भिषक्श्रेष्ठैर्जाङ्ग- लानि विशेषतः ॥ २९ ॥ अब यथाक्रमसे औषधोंको कहते हैं कि स्नेहन, रूक्षण, विम्लापन ये कर्म करने हित हैं ॥ २६ ॥ और जांगलदेशके जीवोंका मांस भोजनमें हित है और गिलोय, अदरख, अजवायन इनके क्वाथका जल हित है ॥ २७ ॥ मिरचोंमें पकाया हुआ दूध रात्रिमें पीना हित है इससे रसोंकी वृद्धि होती है और शीघ्रही क्षयरोगसे छूट जाते हैं ॥ २८ ॥ गेहूँ, जव, शालिसंज्ञक चावल, जांगलदेशके जीवोंका मांस ये रसके बढ़ानेवाले और वैद्योंकरके श्रेष्ठ कहे गये हैं ॥ २९ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० ९ ] भाषाटीकासमेता। ( २६९ ) अथ रक्तवृद्धिकारक औषध । घृतदुग्धसिताक्षौद्रमरीचानि च पिप्पली ॥ पानं शस्तं मनुष्याणां रक्तवृद्धिकरं परम् ॥ ३० ॥ घृत, दूध, मिश्री, शहद, मिर्च और पीपल इनका पीना हित है। मनुष्योंके रक्तकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ३० ॥ अथ मेदोवृद्धिकारक औषध । अनूपानि च धान्यानि लघुनामानि कल्पयेत्॥कल्यांश्च घृत- दुग्धादीन्सेवयेन्मधुराणि च ॥ ३१ ॥ रसांश्च जाङ्ग्लानि स्युः सेवनार्थे भिषग्वर ॥३२॥ सितोपलादिकं चूर्णमजाक्षीरं सको- लकम् ॥ हितं पानं क्षये चैव कल्यंमप्रातराशनम् ॥ ३३ ॥ अनूपदेशके जीवोंका मांस, हल्के अन्न, घृत, दूध, कल्यसंज्ञक मदिरा, मधुरपदार्थ इनका सेवन हित है ॥ ३१ ॥ और हे वैद्योंमें श्रेष्ठ ! जांगलदेशके जीवोंका रस सेवना हित है ॥३२॥और सितोपला आदि चूर्ण और पीपलीसे संयुक्त किया हुआ बकरीका दूध पीना हित है। सायंकालमें भोजनके समय और कल्प कहिये प्रभातकालमें करे ॥ ३३ ॥ अथ अस्थिवृद्धिकारक औषध । पक्वानि घृतशस्तानि क्षीराणि विविधानि च ॥ चन्दनानि च द्राक्षादिचूर्णानि च भिषग्वर ॥ ३४ ॥ जांगलानि च सर्वाणि सेवनीयानि पुत्रक ॥ अन्नानि च मधुराणि सर्वाणि च प्रयो- जयेत् ॥ ३५ ॥ पके हुए घृत और अनेकप्रकारके दूध ये श्रेष्ठ हैंऔर हे उत्तम वैद्य ! चन्दन और द्राक्षादिक चूर्ण हित है ॥ ३४ ॥ और हे पुत्र ! सब प्रकारके जांगलदेशके जीवोंके मांस सेवनेमें हित हैं सब प्रकारके मीठे अन्न सेवनेमें हित हैं ॥ ३५ ॥ अथ शुक्रवृद्धिकारक औषध । शुक्रक्षये प्रपाकानि रसानि च विशेषतः॥ नवनीतं तथा क्षीरं मधुराणि च सेवयेत् ॥ ३६ ॥ कर्कटीमुलपयसा विदारीकन्द- शाल्मली ॥ सितान्व्यपानं च हितं शस्यन्ते मधुराणि च ॥३७॥ अग्रे चूर्णानि वक्ष्यन्ते शुक्रवृद्धिकराण्यर्थ ॥ ३८ ॥ १कल्यमप्रातराशनं कल्यं मधु अप्रातराशने प्रातःकालातिरिक्तसमये अशनंभोजनमित्यर्थः। आङ्पूर्वकंमशनम् आशनम्।

( २७० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- शुक्रके क्षयमें अच्छीतरह पकाये हुए रस देने हित हैं और नौनीतघृत, दूध, मधुर पदार्थ, इनका सेवन करे ॥ ३६ ॥ काकडीकी जड़ विदारीकंद, शालवन,इनको दूधके संग मिश्री मिला पान करना हित है और मीठे पदार्थ हित हैं॥३७॥ अब आगे वीर्यकी वृद्धि करनेवाले चूर्णोंको कहेंगे ॥ ३८ ॥ अथ बलादि चूर्ण । बला विदारी लघुपञ्चमूली पञ्चव क्षीरद्रुमत्वक् प्रयोज्या ॥ पुनर्नवामेघतुगायुतं स्यात्सजीवनीयैर्मधुकैः समांशैः ॥ ३९ ॥ अक्षप्रमाणानि समानि तानि सर्वाणि चैतानि विचूर्णयित्वा ॥ विमिश्रयेत्तत्र कणाशतानि यवान्नगोधूमयवांश्च पिष्ट्वा ॥ ४० ॥ तुगासमांशं सिततण्डुलानां सेयं सुशृङ्गारकमिश्रितं तु॥ प्राकर्ण- कार्डेन वियोजनीयं सर्वांशकेनापि सिता प्रयोज्या ॥ ४१ ॥ विभावयेच्चामलकीरसेन वारत्रयं गोपयसा विभाव्य॥ ततोऽस्य सर्वैश्च सशर्करैर्वा घृतेन चैवं पुनरेव भाव्यम्॥४२॥ तं भक्षये- त्क्षौद्रयुतं पलार्द्धं जीर्णे च भोज्यं कटुकाम्लवर्जम् ॥ क्षीरं घृतं वा सितशर्करां वा यवान्नगोधूमकशालिभक्ष्यान् ॥ ४३ ॥ ज्ञात्वाग्निपाकं जठरे नरस्य देयो विधिज्ञैः क्षयरोगशान्त्यै ॥ पथ्यक्षये श्रान्तचिराभितापसंपीडितानां च तथा शिरोऽर्ती ॥४४॥ पित्तातुराणां रुधिरक्षयाणां श्रमाध्वसंपीडितकामला- नाम्॥श्वासातुराणां मधुमेहिनां च क्षीणेन्द्रियाणां बलकारि शस्तम्॥४५॥ गर्भो गृहीतश्च यया स्त्रिया च तस्याः प्रशस्तं तु बलादिचूर्णम् ॥ ४६ ॥ इति बलादिचूर्णम् ॥ खैरहटी, विदारीकंद, लघुपंचमूल अर्थात् सालवन, पिठवन,कटेहली, बडी कटेहली, गोखरू पीपल,वड, गूलर, पिलखन, आंव इन पांच वृक्षोंकी छाल प्रयुक्त करनी चाहिये और सूंठ, नागरमोथा, वंशलोचन और जीवनीआदिक गण औषध मुलहटी इन सबोंको समान भाग ॥ ३९ ॥ एक २ तोला प्रमाण ले फिर इन सबोंका चूर्ण बना उसमें सौ १०० पीपली मिला और जव, गेहूं ॥ ४० ॥ उत्तम सफेद चावल इनको वंशलोचनके समान

· अ० ९ ·] भाषाटीकासमेता । (२७१)

भाग ले पीसके मिलादेवे और पीछे कहीहुई प्रकरणकी सब औषधोंसे आधाभाग भंगरा और इन सबोंके समान मिश्री मिला ॥ ४१ ॥ फिर इस चूर्णको आंवलेके रसमें भावना दे पीछे तीनवार गौके दूधमें भावना दे फिर इस सबचूर्णके समान खांड मिला फिर घृतमें भावनादे ॥ ४२ ॥ २ तोला प्रमाण उस चूर्णको शहदके संग खावे और यह चूर्ण जरजावे तब भोजन करे और चर्चरा तथा खट्टा भोजन नहीं करे और दूध, घृत, सफेद खांड, जव, गेहूं, शालिसंज्ञकचावल इनका भोजन करे ॥ ४३ ॥ मनुष्यके जठराग्निपाकको जानके विधिके जाननेवाले वैद्योंको क्षयरोगकी शांतिके वास्ते देना कहा है और मार्गमें क्षीणहुआ, हाराहुआ, बहुतकालसे संतापवाला इनोंसे पीड़ित हुए पुरुषोंको और शिरकी पीड़ामें ॥ ४४ ॥ और पित्तसे आतुर, रुधिरक्षयवाले, श्रम, मार्ग इनसे पीड़ित, कामलारोगवाले, श्वासरोगवाले, मधुमेहवाले, क्षीणइंद्रियवाले इन पुरुषोंको यह चूर्ण श्रेष्ठ कहा है ॥ ४५ ॥ और जिस स्त्रीके गर्भ ठहररहाहो उसको यह बलादिचूर्ण श्रेष्ठ कहा है ॥ ४६ ॥ अथ च्यवनप्राशननामक अवलेह । बिल्वाग्निमन्थस्योनाकाः काश्मरी पाटली तथा ॥ शालिपर्णी पृश्निपर्णी श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयम् ॥४७॥ शृङ्गी शीता चामलकी जयन्ती पुष्कराह्वयम्॥द्राक्षाभयामृता मेदा चन्दनागुरुपद्म- कम् ॥ ४८ ॥ बलाह्वयास्तु कर्णे द्वे जीवकर्षभकावुभौ ॥ काकोली क्षीरकाकोली विदार्याः कन्दमांसकम् ॥ ४९ ॥ सर्वेषां पलिका मात्रा योजयेद्भिषजां वरः॥धात्रीफलं पञ्चशतं सुपक्वरससंयुक्तम् ॥ ५० ॥ जलद्रोणे विपक्तव्यं चतुर्भागे च शोषितम् ॥ तथा निर्वाप्य मतिमान्कलकानि समुद्धरेत् ॥५१॥ तत्क्वाथं कलकयेत्तावद्यावद्दर्वीप्रलेपकः ॥ पुनस्तैलेन वाज्येन पक्त्वा चामलकीफलान् ॥५२॥पाचितांश्चूर्णितान्सर्वान्समश- र्करया युतान्॥चतुष्पलातुगाक्षीरैर्योजयेद्भिषजांवरः॥ ५३ ॥ पिप्पलीनां सहस्रैकं त्वगेलापत्रकं तथा॥एषां द्विपलिकां मात्रां विदध्यात्तत्रसत्तमः॥५४॥सव प्राक्वथिते लेहे योजयेच्च विचू- र्णितम्॥आदरेण समं लिह्यान्नराणां च रसायनम् ॥ ५५ ॥ श्वासकासक्षयपाण्डुकामलानां विशोषणम् ॥ क्षीणक्षतानां बालानां वृद्धानां देहलक्षणम् ॥५६॥ स्वरसङ्गपिपासानां हृद्रोगे

(२७२) हारीतसंहिता। [ तृतीयस्थाने- पित्तशोणितम्॥शुक्रदोषं शिरोरोगं पीनसं चापकर्षति ॥५७॥ जीर्णज्वरञ्च मन्दाग्निं कुष्ठं दुष्टं भगन्दरम्॥मेहं कृच्छ्राश्मरीं हन्ति तथा रोचनवारणम्॥५८॥हृद्रोगशूलमानाहं नाशयत्य- विसंशयम्॥वन्ध्यानां पुत्रजननं वृद्धानामल्परेतसाम् ॥५९॥ षण्ढोऽपि जायते चैव सदा ऋतुकरः परः॥मेधा स्मृती तथा तेजो वर्द्धयत्याशु निश्चितम् ॥६०॥ सौख्यसौभाग्यदर्शी च वृद्धोऽपि तरुणायते॥क्षयरोगविनाशाय कथितं चात्रिणा महत् ॥६१॥ च्यवनप्राशनं नाम कृष्णात्रेयविभाषितम् ॥६२॥इति च्यवनप्राशननामावलेहः ॥ बेलगिरी, अरणी, सोनापाठा, खंबारी, शालवन, पिठवन, गोखरू, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली ॥ ४७ ॥ भांग, गंगेरन, भूमि आंवला, जयंती अर्थात् अरणीभेद, बड़ीअरणी, पोहकरमूल, दाख, हरडैं, गिलोय, मेदा, चंदन, अगर, पद्माक ॥ ४८ ॥ खरैंटी, दोभाग दालचीनी, जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीरकाकोली, विदारीकंद ॥ ४९ ॥ इन सबोंको वैद्यजन चार २ तोला प्रमाण लेवे और पकेहुए रसके आंवले पांचसौ लेके ॥ ५० ॥ पीछे इन सब औषधोंको एकहजार चौसठ १०६४ तोले जलमें पकावे फिर चतुर्थांश बाकी रहे तब बुद्धिमान् पुरुष उन औषधोंको निकाल आंवलोंकी गुठली निकालके उनकी कली करलेवे और पीसके पीठीसी करले ॥ ५१ ॥ फिर पूर्वोक्त क्वाथ डालके पकावे फिर कडछी चपकने लगे तब उतारे और तेलमें अथवा घृतमें तिन आंवलोंकी पीठीको सेंकले ॥ ५२ ॥ पीछे पकाये हुए तिस चूर्णमें बराबरकी खांड मिलावे और १६ सोलह तोले वंशलोचन मिलावे ॥ ५३ ॥ उत्तम वैद्य इसी कहेहुए अवलेहमें हजार पीपली, दालचीनी ८ तोले, तेजपात ८ तोले, इनका चूर्ण मिलादेवे ॥ ५४ ॥ पीछे यह लेह मनुष्योंको आदरसे चाटना चाहिये । यह मनुष्योंको रसायन कहा है ॥ ५५ ॥ और श्वास, खांसी, पांडुरोग, कामला, इन रोगोंको नाशता है और क्षीणरोगसे क्षत हुए बालक, वृद्धजन, इनके देहकी रक्षा करने- वाला है ॥ ५६ ॥ स्वरभंग, पिपासा, हृदयरोग, पित्तरक्त, शुक्रदोष, शिरोरोग, पीनस इन रो- गोंको दूर करता है ॥ ५७ ॥ जीर्णज्वर, मंदाग्नि, दुष्ट कुष्ठ, भगंदर, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, अरुचि इन रोगोंको दूर करता है ॥ ५८ ॥ हृदयरोग, शूल, अफारा इनको नाशता है इसमें संदेह नहीं । यह चूर्ण वंध्यास्त्रियोंको पुत्रको देनेवाला और अल्पवीर्यवाले वृद्ध ॥५९॥ नपुंसक इनके वीर्यको बढ़ानेवाला है और बुद्धि, स्मृति, तेज इनको शीघ्र ही निश्चय बढ़ाता है ॥६०॥

अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २७३ ) इसके खानेसे वृद्धपुरुष भी सुख सौभाग्यको देखता है और जवानकी तरह आचरण करता है। यह महान् चूर्ण क्षयरोगोंके विनाशके वास्ते कृष्णात्रेयजी महाराजने कहा है॥६१॥१ यह कृष्णात्रेयमुनिने च्यवनप्राशनामक अवलेह कहा है ॥ ६२ ॥ अथ अगस्तिहरीतकीपाक । भार्ङ्गीपुष्करमूलचित्रककणामूलं गजाद्वा शटी शङ्खाह्वादशमूल- चित्रकबलायासात्मगुप्तास्तथा॥ एतेषां द्विपलांशकी वरभिषक्१ प्रोक्ता च पञ्चाढके पथ्यानां शतकं विपाच्य बहुधा मन्दाग्निना संततम् ॥६३॥ निर्बाप्यं पुनरेव पूतसरसं चोद्धृत्य पथ्याशतं संशुष्यामतिशीतले सुभवनक्वाथः प्रशस्तः पुनः॥दत्त्वा जीर्ण- गुडस्य चैकतुलया कुडवञ्च क्षौद्रं घृतं स्नेहस्यार्द्धमथाक्षकेण मगधा योज्यं शतं पञ्चकम् ॥६४॥ चूर्णं तत्र निधापयेत्पुनरपि संघट्टयेदुच्चकं पथ्ये द्वे मधुना सहातिहितकृत्सर्व्वामयच्छेदन्ः ॥ पाण्डुंकासहलीमकंपुदरुजो हृद्रोगहिक्काभ्रमान् हन्यात्पीनसमे- हपित्तमसृजं कुष्ठं ग्रहण्यामयम् ॥६५॥ पुष्पं चैव तनोति शोफ- मरुचिंगुल्मात्तिराजक्षयमेहानाहविबंधरोगशमनं क्षीणेन्द्रियाणां हितम् ॥ मन्दाग्नेः प्रशमं करोति वडवातुल्योऽरुचिंबन्धकं नाशं वा विदधाति देहसुखदागस्तिप्रणीताभया ॥६६ ॥ भारंगी, पोहकरमूल, चीता, पीपलामूल, गजपीपली, कचूर, शंखपुष्पी, दशमूल, चीता, खरैहंटी, जवासा, कौंच इनको आठ आठ तोला प्रमाण लेवे और सौ १०० हरडें लेवे पीछे इनको १२८० तोले जलमें मंद २ अग्निसे अच्छे प्रकारसे पकावे ॥ ६३ ॥ फिर पकजावे तब पूर्णरसवाली पहले कही हुई सौ १०० हरडोंको निकाललेवें और शीतलहुए क्वाथसे उनहरडोंको निकाल फिर ४०० चारसौ तोले पुराणा गुड, १६ तोले शहद और १६ तोले अथवा ८ तोले घृत मिलावे और चतुरवैद्यको पांचसौ ५०० पीपली मिलानी चाहिये ॥ ६४ ॥ इन सब औषधोंके चूर्णको एकजगह कूटके मिलादेवे फिर शहदके संग दोहरडे खानेसे संबरोगोंका नाश होता है। पांडुरोग, खांसी, हलीमक, गुदाका रोग, हृदयरोग, हिचकी, भ्रम इन रोगोंका नाश होता है और पीनस, प्रमेह, रक्तपित्त, कुष्ठ, संग्रहणी इन रोगों को नाशता है ॥ ६५ ॥ स्त्रीके पुष्पको बढ़ाता है, शोजा, अरुचि, गुल्म, राजयक्ष्मा, १ वरश्चासौ भिषक् तत् सम्बुद्धौ । १८

( २७४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- मूत्ररोग, आनाह, मलका बंधा इन रोगोंको नाशता है और क्षीणइंद्रियवालोंको यह हरीतकी- पाक हित है और मन्दाग्निको शांत करता है और अरुचिरोगके नाशके वास्ते अग्निके समान कहा है और अगस्तिकृषिसे कहाहुआ यह हरीतकीपाक देहको सुख देनेवाला है ॥ ६६ ॥ अथ बलाक्वाथ । बलाद्वयं गोक्षुरकौ बृहत्यौ निष्क्वाथ्य दुग्धेन कणासमेतम् ॥ पानं हितं स्यान्मधुना सिताह्वयं विनाशनं कामलकं क्षयं वा॥ मेहस्य तृष्णाशयनाशकारिक्षीणोन्द्रियाणां बलमातनोति॥६७॥ खरैहंटी, गोखरू, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, पीपली, इनका दुग्धमें क्वाथवना फिर शहद और मिश्री मिला पीना पथ्य है । कामला, क्षयरोग, प्रमेह, तृषा, इन रोगोंका नाश होता है और क्षीणइन्द्रियवाले पुरुषोंके बलको बढ़ानेवाला है ॥ ६७ ॥ अथ पिप्पलीवर्द्धमानम् । पिप्पलीं वर्द्धमानं वा कारयेद्दुग्धसर्पिषा॥आद्यः पञ्च पुनः सप्त पुनरेव नव क्रमात् ॥६८ ॥ एकादशत्रयोदशः पञ्चदशस्तथा सप्तदशः स्मृतः॥एकोनविंश एकविंशः पृथक्पृथग्यथाक्रमम् ॥ ॥ ६९ ॥ एवं क्रमेण वृद्धिः स्यात्कारयेच्छतमात्रया ॥ ततः क्रमेण पुनः पश्चाद्यावच्छेषं च पञ्चकम् ॥ ७० ॥ भोजयेत्षष्टि- कान्नं तु मुद्गेन सर्पिषा युतम्॥एवं बालश्च वृद्धश्च नरो नागबलो भवेत् ॥ ७१ ॥ पिप्पली वर्द्धमाना तु ज्वरे जीर्णे प्रशस्यते ॥ मन्दाग्नौ पीतमेवाथ गुदजे वा तथा पुनः ॥ ७२ ॥ इति पिप्पलीवर्द्धमानम् ॥ दुग्ध और घृतके संग पिप्पली वर्द्धमान बनाया जाता है उसको कहते हैं, क्रमसे पहले पांच फिर सात फिर नव पीपलोंको दूधमें पका घृत मिला पान करना चाहिये ॥६८॥ और पिछले दिन ग्यारह फिर १३ पीछे १५ पीछे १७ पीछे १९ पीछे २१ ऐसे बढ़ती हुई ॥ ६९ ॥ ऐसे दिन दिन प्रति दो बढ़ती हुई सौ पीपलोंतक बढ़ा लेनी चाहिये पीछे क्रमसे घटती हुई जबतक पांच शेष रहें तबतक सेवन करे ॥७०॥ इसपै सांठी चावलोंको मूंग और घृतके संग भोजन करे । बालक अथवा वृद्धजन इस प्रकार इसका पान करताहुआ हस्तीके समान पराक्रमवाला हो जाता है ॥ ७१ ॥ यह पीपली वर्द्धमान जीर्णज्वरमें श्रेष्ठ कहा है और मन्दा- ग्निमें तथा गुदाके रोगमें पीना हित है ॥ ७२ ॥

अ० ९] भाषाटीकासमेता । ( २७५ ) अथ शिलाजतुचूर्ण । द्वे पले मार्कवं धातु माक्षिकं च पुनर्नवा॥ तुगा पृक्का शालि- पर्णी वासकं च दुरालभा ॥ ७३ ॥ चूर्णार्द्धन समं योज्यं त्रिगन्धं मरिचानि च ॥ तालीस मगधा चैव तदर्द्धेन शिलो- द्भवम् ॥७४॥ शिलाभेदं तदर्द्धेन सर्वं चैकत्र मिश्रयेत् ॥समेन तिलचूर्णं तु शर्करायाः समायुतम् ॥ ७५ ॥ भक्षयेत्क्षीर- पानं वा शस्यते घृतसंयुक्तम् ॥ तेन क्षयो राजयक्ष्मा कामला च विनश्यति ॥ ७६ ॥ अपस्मारं जयत्याशु बलवीर्या- धिको भवेत् ॥ शाम्यन्ति च महारोगाः शुक्राढ्यो जायते नरः ॥ ७७ ॥ इति शिलाजतुचूर्णम् ॥ भंगरा ९ तोले, सोनामांखी ९ तोले, सांठी ९ तोले, वंशलोचन ९ तोले, पृक्कासंज्ञक वृक्षकी छाल ८ तोले, वांसा ८ तोले, शालपर्णी ८ तोले, जवासा ८ तोले ॥७३॥ ४ तोले त्रिगन्ध अर्थात् इलायची, दालचीनी, तेजपात, मिरच ४ तोले और तालीसपत्र, पीपली, शिलाजीत ये दो दो तोले ॥ ७४ ॥ पाषाणभेद २ तोला ऐसे इन औषधोंको मिला चूर्ण बना लेवे और इस चूर्णके समान तिलोंका चूर्ण और खांड़ मिलावे ॥ ७५ ॥ पीछे इस चूर्णको घृतके संग भोजन करे अथवा इसके ऊपर दूधको पीवे । इस चूर्णसे क्षयीका रोग, राजयक्ष्मा, कामला इन रोगोंका नाश होता है ॥ ७६ ॥ और मृगीरोगको शीघ्र ही दूर करता है, बल, वीर्य, इनको बढ़ाता है और महारोग शांत हो जाते हैं और इसके खानेसे मनुष्य वीर्यसे युक्त होजाता है ॥ ७७ ॥ अथ जीवंत्यादि घृत । जीवन्तिकावत्सकयष्टिकानां सपौष्करं गोक्षुरकं बले द्वे॥नीलो- त्पलं चामलकी यवासं सत्रायमाणा मगधा च कुष्ठम् ॥७८॥ द्राक्षामलक्या रसप्रस्थमेकं प्रस्थद्वयं छागलकं पयश्च ॥ दध्नश्च प्रस्थं च घृतस्य प्रस्थं पाने प्रशस्तं पचितं शुभाग्नौ ॥७९॥ नस्ये १ 'मरुन्माला तु पिशुना स्पृक्का देवी लता लघुः । समुद्रांता वधूः कोटिवर्षा लंकापिकैत्यपि' इत्यमरः क्रोशंगंतस्पृक्कायां हारीतपृक्कायां च कोऽपि न भेदो यतः पृषोदरादित्वात् सलोपे पृक्का भवति । वाचस्पतिर- प्यत्राह । स्पृक्का तु ब्राह्मणी देवी मरुन्माला लता लघुः । समुद्रान्ता वधूः कोटिवर्षा लंकापिका मरुत् । सुनिर्मात्यवती माला मोहना कुटिला लता॥ केचित् पिंड़कापि स्पृक्का ।

( २७६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- च वस्तावपि योजयेत्तद्दिनाशमेत्याशु च राजयक्ष्मा ॥ हली- मकः कामलपांडुरोगो मूर्च्छा भ्रमः कम्पशिरोऽर्त्तिशूलम्॥८०॥ महाश्मरी वा गुदकीलकुष्ठं शिरोगतो नाशमुपैति रोगः॥तस्य प्रदानेन वियोजितेन पानेन पाण्ड्वामयराजयक्ष्मा ॥८१॥ नाशं शमं याति हलीमको वा बस्तिप्रदानेन गुदोद्भवाश्च॥रोगो विनाशं समुपैति पुंसां विसर्पविस्फोटकमोक्षणेन ॥ ८२ ॥ गिलोय, कूडाकी छाल, मुलहटी, पोहकरमूल, गोखरू, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, नीला कमल, भूमिआंवला, जवासा, त्रायमाण, पीपली, कूट ॥ ७८ ॥ दाख, इनको समान भाग ले फिर आंवलोंका रस ६४ तोले, बकरीका दूध १२८ तोले, दही ६४ तोले, घृत ६४ तोले इनमें मिला अग्निसे पकावे । यह घृत पानमें और भोजनमें हित कहा है ॥ ७९ ॥ नस्यमें तथा वस्तिकर्ममें भी युक्त करना हित कहा है और राजयक्ष्मा, हलीमक, कामला, पांडुरोग, मूर्च्छा, भ्रम, कंपरोग, शिरकी पीड़ा, शूल इन रोगोंको नाशता है ॥ ८० ॥ महापथरी, गुदकील, कुष्ट, शिरका रोग इनका नाश होता है और इस घृतका पान करनेसे पांडुरोग, राजयक्ष्मा ॥ ८१ ॥ हलीमक, इन रोगोंका नाश होता है और इस घृतको वस्तिकर्ममें वर्त्तनेसे गुदाके रोग दूर होते हैं और इस घृतके मोक्षण अर्थात् शरीरपै छिड़कनेसे विसर्प,विस्फोटक इन रोगोंका नाश होता है ॥ ८२ ॥ अथ पिप्पली आदि घृत । कणा पयःपञ्चगुणे पलाश आद्यं घृतं वै विपचेत्समांशम् ॥ पानेऽथवा भोजनके प्रशस्तं देयं च राजक्षयनाशहेतोः ॥८३ ॥ पीपली, केशू, इनको समान भाग ले इनसे पांचगुना दूधमें इन औषधोंके समानभाग, गौके घृतको और इन औषधोंको पकावे । यह घृत पानमें और भोजनमें श्रेष्ठ है और राजयक्ष्मा,क्षय- रोग इनका नाश करता है ॥ ८३ ॥ अथ पञ्चकोलआदि घृत । पञ्चकोलं यवाग्रञ्च क्षीरं दध्ना घृतं पुनः॥समांशेन तु योज्यानि भार्गी कुष्ठं तु पौष्करम् ॥८४॥ शतं तत्र हरीतक्या जले चैव चतुर्गुणे ॥ क्वाथं चैकत्रयं योज्यं क्वाथयेन्मृदुवह्निना ॥ ८५ ॥ मृदुपाकं घृतं सिद्धं पाने नस्ये च बस्तिषु ॥ गुणाधिक्यं भवे-

अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २७७ ) नृणां पाण्डुरोगे हलीमके॥८६॥राजयक्ष्मणि क्षये चैव शस्तं चोक्तं भिषग्वर ॥ ८७ ॥ पञ्चकोल अर्थात् पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, जवाखार; दूध, दही, घृत, भारंगी कूठ, पोहकरमूल ॥ ८४ ॥ इन सबोंको समान भाग ले और सौ १०० हरडें ले फिर इन औषधोंसे चौगुने जलमें मन्द मन्द अग्निसे काथ बनावे। मन्द मन्द अग्निसे पकाया हुआ ॥८५॥ यह घृत पानमें, नस्यमें और बस्तिकर्ममें युक्त करना श्रेष्ठ है और पांडुरोग, हलीमक ॥ ८६ ॥ इन रोगोंमें मनुष्योंके अधिक गुण करनेवाला है और हे उत्तम वैद्य ! राजयक्ष्मा रोगमें यह घृत श्रेष्ठ है ॥ ८७ ॥ अथ पाराशर घृत । यष्टी बला गुडूची च पञ्चमूलं समांशकम् ॥ क्वाथेन सदृशं धात्रीरसं चेक्षुरसं तथा ॥ ८८ ॥ विदार्य्याश्च रसं चैव घृतं च समभागिकम्॥क्षीरं दधिसमं चात्र नवनीतं तु तत्समम्॥८९॥ द्राक्षातालीशसंयुक्तं यथालाभेन योजयेत्॥सिद्धं घृतं च पानाय नस्ये वस्तौ प्रदापयेत् ॥९०॥ जयति राजयक्ष्माणं पाण्डुरोगं सुदारुणम् ॥ हलीमकं चार्शसं च रक्तपित्तनिवारणम् ॥९१॥ लेपेन दुष्टवैसर्पपित्तदग्धव्रणापहम् ॥ ९२ ॥ मुलहटी, खरेहटी, गिलोय, पंचमूल इनको समान भाग ले काथ बनावे और काथके समान आंवलाका रस और ईखका रस ॥ ८८ ॥ और विदारीकंदका रस मिलावे। इन औषधोंके समानभाग घृत और दूध, दही, नौनी घृत इन सबोंकों समानभाग ले ॥ ८९ ॥ दाख, तालीसपत्र इनको अनुमानमुवाफिक मिला फिर इस घृतको सिद्ध कर पानमें नस्यमें और बस्तिकर्ममें देना श्रेष्ठ है ॥ ९० ॥ यह राजयक्ष्मा, पांडुरोग, हलीमक, बवासीर, रक्तपित्त इनको नाशता है ॥ ९१ ॥ इस घृतका लेप करनेसे दुष्टविसर्परोग, पित्तरोग, दग्ध, व्रण इनका नाश होता है ॥ ९२ ॥ अथ बलाआदि घृत । बला श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयं च पर्णीद्वयं गोक्षुरकं स्थिरा चा॥पटो- लनिम्बस्य दलानि मुस्तं सत्रायमाणा च दुरालभा च॥९३ ॥ कृत्वा कषायं च यदावशेषं पूतीकृते चूर्णमिदं प्रयुंज्यात्॥द्राक्षा शटी पुष्करमूलधात्री तमालकी दुग्धसमं कषायम् ॥ ९४ ॥

( २७८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- सर्पिःप्रयुक्तं नवनीतकं च सर्पिस्तदर्द्धेन नियोजनीयम् ॥ सिद्धं घृतं पानमथैव बस्तौ नस्ये तथाभ्यञ्जनभोजनेन॥९५॥जवन्य- कासक्षयकामलानां राजक्षये क्षीणबलेन्द्रियाणाम् ॥ शतेषु शोषेषु व्रणेषु शस्तं शिरोऽर्त्तिपाश्र्वार्त्तिगुदामयघ्नम् ॥ ९६ ॥ खरैहटी, बडा गोखरू, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, माषपर्णी, मूंगपर्णी, छोटा गोस्वरू और बड़ा गोखरू, शालपर्णी, परवल, नींवके पत्ते, नागरमोथा, त्रायमाण, जवासा ॥ ९३ ॥ इनका काथ बना जब चतुर्थांश बाकी रहे तब उतार वस्त्रसे छान पीछे दाख, कचूर, पोहकर- मूल, आंवला, भूमिआंवला, इनका चूर्ण मिलावे और इस काथके समान दूध मिला ॥ ९४ ॥ नूनीघृतसे आधा और घृत मिला पीछे इस घृतको उस काथमें पकावे फिर यह घृत पीनेमें, वस्तिकर्ममें, नस्यमें, मालिसमें, भोजनमें बर्त्तना श्रेष्ठ कहा है ॥ ९५ ॥ अत्यंत खांसी, क्षय- रोग, कामला, राजयक्ष्मा इन रोगोंको नाशता है और क्षीण इंद्रियोंवाले तथा क्षीण बलवाले पुरुषोंको हित कहा है। क्षतरोग, शोजा, व्रण, शिरकी पीडा, पसलीकी पीडा, गुदाका रोग इनको नाश करता है ॥ ९६ ॥ अथ चन्दनादि तैल । चन्दनं सरलं दारु यष्ट्येला वालकं शटी।। नलशैलेयकं पृक्का पद्मकं वनकेसरम् ॥९७॥ कङ्कोलंकं मुरामांसी शैरियं द्वहरी- तकी॥रेणुकात्वक्कुङ्कुमंच सारिवे द्वे तिक्तागरुः ॥९८॥ नलि- काबले तथा द्राक्षा कषायं सुपरिस्रुतम्॥तैलमस्तु तथा लाजा रसेन समभागिकम् ॥९९॥ मन्दाग्निना पचेत्तैलं सिद्धं पाने च बस्तिषु॥ नस्ये चाभ्यञ्जने चैव योजयेत्तद्भिषग्वरः ॥ १०० ॥ हन्ति पाण्डुक्षयं कासं ग्रहगं बलवर्णकृत्॥मन्दज्वरमपस्मारकुष्ठ- पामाहरं पुनः ॥ १०१ ॥ करोति बलपुष्ट्योजो मेधाप्रज्ञायुर्व- र्द्धनम् ॥रूपसौभाग्यदं प्रोक्तं सर्वभूतयशस्करम् ॥१०२॥ चन्दन, सरल, देवदार, मूलहटी, इलायची, नेत्रवाला, कचूर, नल, शिलारस, पृक्कासंज्ञक वृक्ष, पद्माक, वनकेशर, ॥ ९७ ॥ कंकोल, मुरामांसी, लोबान, दोनों प्रकारकी हरडें, रेणुका, दालचीनी, केशर, दोनों प्रकारकी सारिवा, अनंतमूल, कुटकी, अगर ॥ ९८ ॥ नाड़ीशाक, खरैहटी, दाख इनका काथ बनावे और पीछे उस काथमें तेल, दहीका पानी, धानकी खीलोंका, रस इनको समान भाग ले मिलावे ॥९९॥ इस तेलको मन्द मन्द अग्निसे पकावे सिद्ध किया

अ० ९] भाषाटीकासमेता। (२७९) हुआ यह तैल वैद्यजनोंको पीनेमें, वस्तिकर्ममें, नस्यमें तथा मालिसमें बर्ताना चाहिये॥१००॥ यह तैल पांडुरोग, क्षयरोग, खांसी, ग्रहदोष इनको नाशता है और बल वर्ण इनको करता है, मन्द- ज्वर, अपस्मार, कुष्ठ, पामा इन रोगोंको नाशता है ॥ १०१ ॥ बल, पुष्टि, पराक्रम, मेधा, बुद्धि, वायु इनको बढ़ाता है, रूप सौभाग्य इनको करता है, सम्पूर्ण भूतपीडाको दूर करता है १०२. अथ राजयक्ष्मारोगका निदान । स्वामिभार्याभिगमने गुरुपत्न्यभिलाषणात्॥ राजस्वहेमचौ- र्याद्वा राजयक्ष्मा भवेद्गदः ॥१०३॥ अथवा दुष्टरोगेण जायते शृणु पुत्रक॥चतुर्भिर्हेतुभिर्यक्ष्मा जायते शृणु साम्प्रतम् १०४॥ व्यायामयानसुरतागतिपीडिताङ्गरोगेण वा व्रणनिपीडितक्षीण- देहात् ॥ क्रोधातिशोकभयलङ्घनतोऽनभक्षात् सञ्जायते च मनुजस्य महागदोऽयम् ॥ १०५ ॥ वार्द्धक्याद्यो भवति नितरां ज्याधनुःकर्षणेन भारात्यर्थं भवति हननोत्पातबन्धेन युद्धात्॥ दूराध्मानात्कदशनवशाच्चिन्तयातिव्यवायात्सम्भूतिः स्यान्मनुजबृहद्राजयक्ष्मेतिसंज्ञः ॥ १०६ ॥ स्वामीकी स्त्रीसे संग करनेसे और गुरुकी स्त्रीसे अभिलाषा करनेसे, राजाका द्रव्य और सुवर्ण- की चोरी करनेसे राजयक्ष्मा रोग होता है ॥ १०३ ॥ अथवा दुष्टरोगसे होता है सो हे पुत्र ! चार हेतुओंकरके यह राजयक्ष्मा रोग होता है सो सुन ॥ १०४ ॥ कसरत, असवारी, मैथुन, गमन इनसे पीड़ित अंग होनेसे, रोगसे, व्रणसे पीडित होनेसे, क्षीण देह होनेसे, क्रोध, अतिशोक, लंघन करना, भय, व्रत इनसे मनुष्यके यह महान् रोग होता है ॥ १०५ ॥ निरन्तर धनुष्यके खींचनेसे बुढ़ापा हो जाता है उससे और अत्यन्त भार उठानेसे चोर आदिके उत्पातसे, युद्धसे, दूरसे अग्निको धमानेसे, बुरा भोजन करनेसे, चिंता करनेसे, अति मैथुनसे, मनुष्यके बलको हरनेवाला राजयक्ष्मासंज्ञक रोग हो जाता है ॥ १०६ ॥ अथ राजयक्ष्माके लक्षण । क्षतक्षयाच्छूष्माद्वापि सहसोपप्लवादपि॥व्यवायातिप्रसङ्गेन तथा रूक्षातिसेवनात्॥१०७॥तेन संक्षीयते गात्रं ज्वरो मन्दश्च जा- यते॥ज्वरान्ते जायते शोफो मलविद् चातिमूत्रता १०८॥अति- सारश्च भवति भक्षणेनातिशेषते॥ कासते ष्ठीवतेऽत्यर्थं शोषं च Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( २८० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- कुरुते भृशम् ॥ १०९॥ स्त्रियोऽभिलाषतात्यर्थं वार्त्तायाद्विषता पुनः ॥ राजयक्ष्मेति विज्ञेयो गदः साध्यो न विद्यते ॥ ११०॥ सुप्तौ पादौ भवेतां तु ग्रासं च बहु मन्यते॥शब्दे च पडुता यस्य राजयक्ष्मा न जीर्य्यति ॥ १११ ॥ उरःक्षतसे, क्षय होनेसे अथवा श्रमसे एक बार जोरसे कूदनेसे, अत्यंत स्त्रीसंग करनेसे, रूखा भोजन सेवनेसे॥ १०७॥शरीर क्षीण हो जाता है और मन्दज्वर हो जाता है, ज्वरके अंतमें शोजा होजाता है, मैल और विष्ठा मूत्र अत्यन्त उतरता है॥१०८॥अतिसार होता है, भोजन किया हुआ जरता नहीं है, अत्यन्त खांसता है और अत्यन्त थूकता है, बहुतसा शोष हो जाता है॥१०९॥ स्त्रीकी अभिलाषा अत्यन्त रहती है और वार्ता नहीं सुनी जाती है ऐसा यह राजयक्ष्मा रोग कहाता है, यह साध्य नहीं कहा है ॥११०॥ जिसके पैर शून्य हो जावे और एक ग्रास भोजन- को भी बहुत माने और जिसकी बोली नम्रहो ऐसे पुरुषका राजयक्ष्मा रोग शांत नहीं होता है१११ अथ राजयक्ष्माका इलाज । यदन्नं यत्समाहारं यादृशं प्रतियाचते ॥ तत्तस्य च प्रदातव्यं मधुरं घनमेव च ॥११२॥ यद्यदाहारमिच्छेद्रा नरं वा राजय- क्ष्मिणम्॥तस्य तस्यास्य लाभेन क्षीयन्ते नास्य धातवः११३॥ यदा सरक्ताः शोफाः स्युः पाकतां यांति मानवे॥तदा पुनर्नवा- क्वाथः सलेशः प्रविधीयते ॥ ११४ ॥ जो अन्न अथवा जो पदार्थ राजयक्ष्मारोगवालेको देवे वही उसको मधुर और कड़ा देना चाहिये ॥११२॥ राजयक्ष्मारोगवालेको जिस जिस भोजनकी इच्छा होती है उसी उसी भोजनसे इसकी धातु क्षीण नहीं होती है॥११३॥जो यदि राजयक्ष्मारोगवाले पुरुषके रक्तसहित शोजा होवे और पक जावे तो सांठीका क्वाथ किंचित्मात्र देना चाहिये ॥ ११४ ॥ अथ राजयक्ष्मावालेंकी आयुष्यमर्यादा । सजीवेच्चतुरो मासान्षण्मासं वा बलाधिकः॥उत्कृष्टैश्च प्रतीकारैः सहस्राहं तु जीवति ॥ ११५ ॥ सहस्रात्परतो नास्ति जीवितं राजयक्ष्मिणः ॥ गतप्राणौजोषीर्य्यश्च क्षीणश्च विकलेन्द्रियः ॥११६॥ न भवेत्पुनरुच्छ्रायो याप्यरोगश्च मुञ्चति॥ यस्तदाया- ससम्पन्नो भूयोऽपि कासना भवेत् ॥११७॥तस्य प्राणापहारी

अ० ९] भाषाटीकासमेता । ( २८१ ) स्याद्राजयक्ष्मातिदारुणः ॥ त्रिभिर्मासैश्च षण्मासैर्वर्षैश्चापि त्रिभिः पुनः ॥ ११८ ॥ राजयक्ष्मारोगवाला पुरुष चारमहीनोंतक जीता है और बल अधिक होवे तो छःमहीनों- तक जीता है और अत्यंत इलाज होते रहें तो हजारदिनोंतक जीता है ॥ ११५ ॥ राज- यक्ष्मारोगवाले पुरुषका जीना हजारदिनोंसे उपरांत नहीं होता है और प्राण, बल, वीर्य इनसे हीन होजाता है, क्षीण होजाता है, इंद्रिय विकल होजाती हैं ॥ ११६ ॥ जो रोग फिर नहीं बढ़ाता है वह याप्यरोग छुटजाता है और जो उस रोगके परिश्रमसे युक्त हुआ फिर खांसीसे युक्त होजाता है ॥ ११७ ॥ उस पुरुषका तीन महीनोंमें अथवा छःमहीनोंमें प्राणोंका नाश होता है ॥ ११८ ॥ अथ अमृतप्राशनघृत । शतमूलीरसे प्रस्थं गुडूचीकल्कप्रस्थकम्॥हरीतकीशतानां च कुटजस्य त्वचा तुलाम् ॥ ११९ ॥ निष्क्वाथ्य च पृथक्त्वेन पूतनांश्चैकत्र मिश्रयेत्॥दार्वीप्रलेपनं कृत्वा गुडानां शतपञ्चकम् ॥१२०॥सिता चामलकीचूर्णं त्वगेला चित्रकं शटी ॥ द्राक्षा कुष्ठं शिलाजित्व शिलाभेदस्तु तालकम् ॥ १२१ ॥ योज्यं तत्राक्षमानेन भक्षयेच्छुद्धसर्पिषा ॥ तस्योपरि पिबेत्क्षीरं भोजनञ्च ततः परम् ॥ १२२ ॥ राजयक्ष्मी लभेत्सौख्यं पाण्डुकामलकाञ्जयेत् ॥ अतीसारं विनश्यति बले नागबलो भवेत् ॥ १२३ ॥ शतावरीका रस ६४ तोले, गिलोयका कल्क ६४ तोले, बडी सौ १०० हरडोंकी छाल और कुड़ाकी छाल ४०० तोले ॥ ११९ ॥ इनका जुदा २ काढा बना फिर छानिके एक जगह मिलावेवे पीछे अग्निपर पकावे जब कडछीके चपकने लगजावे तब ५०० पानसौ गुड़ डाल, ॥ १२० ॥ मिसरी, आंवलाका चूर्ण, दालचीनी, इलायची, चीता, कचूर, दाख, कूट शिलाजीत, शिलाभेद, शुद्धमारित हरताल॥ १२१॥इनको एक २ तोला प्रमाण गेरै पीछे इसको अच्छे घृतके संग खावे इसके उपर दूध पीवे पीछे भोजन करे ॥ १२२ ॥ इसके खानेसे राजय- क्ष्मारोगवाला पुरुष सुखको प्राप्त होताहै और पांडुरोग, कामला, अतिसार इनका नाश होता है हस्तीके समान बल होजाता है ॥ १२३ ॥

( २८२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने. अथ तालकाभ्रातक। तालकं च शिलाभेदस्तथा चैव शिलाजतुः॥क्षीरके द्वे समङ्गा च कुष्ठ नागबला बला ॥ १२४ ॥ एलापत्रकतालीसं तमालं हरिचन्दनम्॥ मुस्ता द्राक्षा च रास्ना च मुण्डी शैलेयकं पुरः ॥१२५॥सुरसा चैव संयोज्या तिलाः कृष्णा द्विभागिकाः ॥ चूर्णं सूक्ष्मं प्रयुञ्जीत गुडेन मधुना युतम् ॥ १२६ ॥ पश्चाद्गो- क्षीरपानं स्यात्क्षीरेण सह भोजनम् ॥राजयक्ष्मादिभिः क्षीणा. ग्रहणीपीडिताश्च ये ॥१२७॥ धातुक्षीणबला ये च तेषां संयो- जयेद्भृशम्॥वृद्धोऽपि तरुणो भूत्वा नरो नार्य्यामिनन्दति १२८॥ वन्ध्यापि लभते पुत्रं षण्ढोऽपि पुरुषायते ॥ तालकाभ्रातकं नाम कृष्णात्रेयविभाषितम् ॥ १२९ ॥ शुद्ध और मारित हरताल, पाषाणभेद, शिलाजीत, काकोली, क्षीरकाकोली, मंजीठ, कूठ, बडीखरैंहटी, खरैंहटी ॥ १२४ ॥ इलायची, तेजपात, तालीसपत्र, तमालपत्र, लालचंदन, नागरमोथा, दाख, रास्ना, गोरखमुंडी, लोवान, गूगल ॥ १२५ ॥ तुलसी और कालेतिल दो भाग, इनका सूक्ष्म चूर्ण बना तिसमें गुड़ और शहद मिला भक्षण करे ॥ १२६ ॥ और पीछे गौके दूधको पीवे और दूधके सगही भोजन करे, जो पुरुष राजयक्ष्माआदि रोगोंसे पीडित है और जो ग्रहणी रोगसे पीड़ित है ॥ १२७ ॥ धातुक्षीणरोगवाले इनको यह चूर्ण देना चाहिये और इसके खानेसे वृद्धपुरुष भी जवान होके स्त्रीके संग रमण करता है ॥१२८॥ वंध्या स्त्री पुत्रको प्राप्त होजाती है और नपुंसक भी पुरुषकी तरह आचरण करता है यह तालकाभ्रातकनामवाला औषध कृष्णात्रेयजीने कहा है ॥ १२९ ॥ अथ गुडूच्यादिचूर्ण । गुडूची च बले द्वे च धात्री च मरिचानि च ॥ चूर्ण गुडेन संयुक्तं राजयक्ष्मापहं नृणाम् ॥ १३०॥ गिलोय, दोनों प्रकारकी खरैंहटी, आंवला, मिरच, इनका चूर्ण गुड़में मिला खानेसे राजयक्ष्मारोगका नाश होता है ॥ १३० ॥ अथ क्षयरोगपर पथ्यापथ्य । शालिषष्टिकगोधूमवास्तुकं जाङ्ग्लानि च ॥ मुद्गांश्च गोपयश्चैव शशकैणकुरङ्गिणाम् ॥ १३१ ॥ तित्तिरकौञ्चलवानां वार्त्ताक-

पिच्छकच्छागलानां हि ॥ कथितानि मांसादीनि प्रलेपकानि जगति च ॥१३२॥विभोजयेत्क्षीरसर्पिः क्षये वा राजयक्ष्मणः॥ क्षाराम्लकटुकं तीक्ष्णं तैलं सौवीरकं सुरा ॥राजिकावर्जिताश्चैते क्षये वा राजयक्ष्मणः ॥ १३३ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने क्षयरोगचिकित्सा नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ शालीसंज्ञक तथा सांठीचावल, गेहूँ, बथुआका शाक, जांगलदेशके जीवोंका मांस, मूंग, गौका दूध और शूस़ा, काला हिरन, हिरन ॥ १३१ ॥ तीतर, कूंजि, लावा, बत्तक, मोर, वर्करा इन्होंका मांस, इन सबोंका भोजन करना श्रेष्ठ कहा है ॥ १३२ ॥ और राजयक्ष्मा रोगमें तथा क्षयरोगमें दूध और घृतका भोजन करना श्रेष्ठ कहा है और खारा, खट्टा, चर्रचरा, तीक्ष्ण ऐसा पदार्थ, तैल, कांजी, मदिरा, राई ये क्षयमें तथा राजयक्ष्मा रोगमें वर्ज देने चाहिये ॥१३३॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने- क्षयरोगचिकित्सानाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

अथ दशमोऽध्यायः १०. ❖ अथ रक्तपित्तका निदान और चिकित्सा । अतिघर्मतयावापि तीक्ष्णोष्णकटुसेवनात्॥क्षाराम्लसेवनाद्वापि मद्यपानादिसेवनात् ॥ १॥ अतिव्यवायाच्छीतेन शुष्कशाका- दिसेवनात् ॥ एतैस्तु कुपितं पित्तं रक्तेन सह मूर्च्छितम् ॥ २ ॥ पुत्रस्तु संशयापन्नः पप्रच्छ पितरं पुनः ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-अत्यंत घामसे और तीक्ष्ण तथा गरम वस्तुके सेवनेसे और खारे खट्टे पदार्थके सेवनेसे तथा मदिराके सेवनेसे ॥ १ ॥ अत्यंत मैथुनके सेवनेसे, शीतल पदार्थके सेवनेसे, सूखे शाकादिके सेवनेसे कुपित हुआ पित्त रक्तके संग मूर्च्छाको प्राप्त हो जाता है ॥२॥ ऐसे सुन संशयमें युक्त हुआ हारीत आत्रेयजीसे पूछता है ॥ ३ ॥ हारीत उवाच॥ कथं पित्तं प्रकुपितं केन वापि प्रचाल्यते ॥ तद्द्रक्तं प्रकुपितं जायते केन हेतुना ॥ ४ ॥ युगपद्दृश्यते केन कथं वापि प्रवर्त्तते ॥ एवं पृष्टो महाचार्य्यः प्रोवाच मुनिपुङ्गवः५

(२८४) हारीतसंहिता। [ तृतीयस्थाने- हारीत कहते हैं-पित्त कैसे कुपित होता है और किस प्रकार चलायमान होता है और रक्तका कोप किस कारणसे होता है ? ॥४॥ एक बार दोनों मिले किस हेतुसे दीखते हैं और कैसे प्रवृत्त होते हैं ? ऐसे पूछे हुए महाचार्य उत्तम मुनि कहते भये ॥ ५ ॥ आत्रेय उवाच ॥ शृणु प्राज्ञ महातेजश्चिकित्सागमपारग ॥ येनैव कुप्यते पित्तं रक्तं तेनैव कुप्यते ॥ ६ ॥ तावत्प्रकुपिते कोष्ठे वायुर्दारयते भृशम् ॥ ऊर्ध्वं च नयते प्राणश्चापानोऽपान- मीरति ॥ ७ ॥ मध्ये समानः कुरुते रक्तपित्तस्य कोपनम् ॥ एवं युगपत्पित्तञ्च रक्तेन सह कुप्यति ॥ ८ ॥ चतुर्द्धा दृश्यते कोपो गतिश्चास्य द्विधा मता ॥ ऊर्ध्वश्लेष्मणि संसृष्टं नासास्ये कर्णरन्ध्रयोः ॥ ९ ॥ रक्तं प्रवृत्तत यस्य साध्यास्तु विजिगी- षुणा ॥ अधोयातेन संसृष्टं गुदेनापि प्रवर्त्तते ॥ १० ॥ स ज्ञेयो रक्तपित्तस्तु कृच्छ्रेण सिद्धिमिच्छति ॥ उभाभ्यामथऊर्ध्वाभ्यां वातश्लेष्मणि वर्त्तते ॥ ११ ॥ तमसाध्यं विजानीयात्कृच्छ्रेण यदि सिध्यति ॥१२॥ एकमार्गबलतो वा नाभिवेगेन चोत्थि- तः ॥ रक्तपित्तः सुखेनापि साध्यः स्यान्निरुपद्रवः ॥ १३ ॥ एकदोषानुगः साध्यो द्विदोषो याप्य उच्यते ॥ असाध्यस्तु त्रिदोषेषु रक्तपित्तः प्रवर्त्तते ॥ १४ ॥ ऊर्ध्वगरक्तपित्तेषु विरेक कारयेत्सुधीः ॥ अधोभागगत रक्ते तदास्य वमनं हितम् ॥ १५॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे प्राज्ञ ! महातेजवाले ! वैद्यकशास्त्रके पारको जाननेवाले ! सुनो जिस कारणसे पित्त कुपित होता है उसी कारणसे रक्तपित्त कुपित होता है ॥ ६ ॥ पहले कोष्ठस्थानमें पित्त कुपित होके वायुको अत्यंत फाड देता है,प्राणवायु ऊपरको प्राप्त हो जाता है और अपानवायु गुदाके स्थानमें कुपित हो जाता है ॥७॥ मध्यनाभिमें स्थित हुआ समान वायु रक्तपित्तको कोप कर देता है इसी तरह एकही बार पित्त रक्तके संग कुपित हो जाता है ॥ ८ ॥ रक्तपित्तका कोप चार प्रकारसे दीखता है और इसकी गति दो प्रकारकी कही हैं जिसके कफ मुखके ऊर्ध्वभागमें प्राप्त हो और नासिकाके तथा कानोंके छिद्रोंमें ॥ ९ ॥ रक्त प्रवृत्त होजावे वह साध्य कहा है और जिसके अधोमार्गमें रक्तकोप हो जाता है उसके गुदाके द्वारा रक्त निकसता है ॥ १० ॥ वह रक्तपित्त कष्टसाध्य कहा है और जो ऊर्ध्वमार्गमें प्राप्त हो तथा अधोमार्गमें प्राप्त हो और वात कफ अधिक वर्तते हों ॥ ११ ॥ वह

अ०[१०] भाषाटीकासमेता । ( २८५ ) असाध्य जानना अथवा कष्टसे सिद्ध होता है ॥ १२ ॥ एक मार्गसे उठा हुआ अथवा नाभिके देशसे उठा हुआ रक्तपित्त साध्य है और उपद्रवोंसे रहित है ॥ १३ ॥ एकदोषसे उत्पन्नहुआ साध्य होता है, दो दोषोंसे उत्पन्न हुआ याप्यरोग होता है और तीन दोषोंसे उत्पन्न हुआ रक्तपित्त असाध्य कहाता है ॥ १४ ॥ और जब रक्तपित्त ऊर्ध्व भागमें प्राप्त होवे तब जुलाब दिवावे और जब रक्त अधोभागमें स्थित हो तब वमन कराना चाहिये ॥ १५ ॥ अथ रक्तपित्तके उपद्रव । रोगक्षीणे छविविकले हीनदौर्बल्यकाये मन्दाग्निर्वा क्षवथुरथवा पाण्डुता दाहशोषः॥तृष्णा छर्दिः श्वसनमधृतिर्भक्तविद्वेषमोहो हृत्पीडा स्याद्ग्रममथ भवेद्रक्तपित्तोपसर्गात् ॥१६॥ अष्टादश इमे प्रोक्ता रक्तपित्तउपद्रवाः ॥ उपद्रवैर्विना साध्योऽसाध्यः सोपद्रवस्तथा ॥१७॥ रक्तनिष्ठीवनोपेतो रक्तनेत्रो भ्रमातुरः ॥ रक्तमूत्रश्च वमते रक्तमूत्री न जीवति ॥ १८ ॥ रोगसे क्षीण होजावे और कांतिसे रहित होजावे, शरीर हीन होजावे और दुर्बल होजावे,मन्द अग्नि होजावे, छींकहो, पांडरोगहो, दाहहो, शोषहो, तृषाहो, छर्दिहो, श्वासहो, धीरज नहीं रहे, भोजनसे बैर रहे, मोह रहे, हृदयमें पीडा रहे, रक्त और पित्तके उपसर्गसे भ्रमहो, ऐसे ये ॥ १६ ॥ अठारह रक्तपित्तके उपद्रव कहे हैं । उपद्रवोंसे रहित रक्तपित्त रोग साध्य कहा है और उपद्रवोंसे संयुक्त रक्तपित्त असाध्य कहा है ॥ १७ ॥ रक्तके थूकनेसे युक्त हो, रक्तनेत्र हो, भ्रमसे आतुर हो और रक्तमूत्रवाला पुरुष वमन करता है, वह जीता नहीं है ॥ १८ ॥ अथ रक्तपित्तका लक्षण । एवं प्रोक्तो निदानार्थस्ततो वक्ष्यामि भेषजम्॥सुलक्षणसमायुक्तं रक्तपित्तं सुखावहम् ॥१९॥ यस्यारुणं पवनफेनयुतं च तावत्पि- त्तात्तिकृष्णमथ पीतकुसुम्भकाभम् ॥ पित्तेन पित्तमिति तं प्रव- दन्ति धीराः सान्द्रं सपाण्डुरतिजं सघनं कफेन ॥२०॥ इस प्रकार निदान तो कहदिया है अब औषध कहेंगे । सुंदरलक्षणोंसे युक्त रक्तपित्त सुख- साध्य कहा है॥१९॥जो झागों सहित और लाल थूके वह वातसे उपजा रक्तपित्त जानना और पित्त अधिक हो तो काला और कसुंभाके डहलके समान थूके उसको पित्तसे उपजा रक्तपित्त कहते हैं और कफसे होवे तो कडा और पीला सफेद चिकना ऐसा थूके ॥ २० ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu