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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

[विष्णुपर्व.] षड्विंशोऽध्यायः २९७


षड्विंशोऽध्यायः

अक्रूरका गोपोंके लिये कंसका आदेश सुनाना और वसुदेव-देवकीकी दयनीय दशा बताकर श्रीकृष्ण-बलरामको मथुरा चलनेके लिये प्रेरित करना, मार्गमें अक्रूरको यमुनाजीके जलमें आश्चर्यमय नागलोक एवं भगवान् अनन्त तथा उनकी गोदमें श्रीकृष्णका दर्शन

वैशम्पायन उवाच
स नन्दगोपस्य गृहं प्रविष्टः सहकेशवः।
गोपवृद्धान् समानीय प्रोवाचामितदक्षिणः॥ १ ॥
कृष्णं चैवाब्रवीत् प्रीत्या रौहिणेयेन सङ्गतम्।
श्वः पुरीं मथुरां तात गमिष्यामः सुखाय वै॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! श्रीकृष्णके साथ नन्दके गृहमें प्रवेश करके अनन्त दान-दक्षिणा देनेवाले अक्रूरने बड़े-बूढ़े गोपोंको बुलवाया और उनसे तथा बलरामसहित श्रीकृष्णसे प्रसन्नतापूर्वक यों कहा—‘तात! कल सबेरे हमलोग मथुरापुरीको चलेंगे। वहाँ चलकर तुम सुखी होओगे॥

यास्यन्ति च व्रजाः सर्वे गोपालाः सपरिग्रहाः।
कंसाज्ञया समुचितं करमादाय वार्षिकम्॥ ३ ॥

‘समस्त व्रजवासी गोप कंसकी आज्ञासे समुचित वार्षिक कर लेकर सपरिवार वहाँ चलेंगे॥ ३ ॥

समृद्धस्तत्र कंसस्य भविष्यति धनुर्महः।
तं द्रक्ष्यथ समृद्धं च स्वजनैश्च समेष्यथ॥ ४ ॥

‘वहाँ कंसका धनुर्यज्ञ बड़ी धूम-धामसे सम्पन्न होगा। उस समृद्धिशाली यज्ञको तुमलोग देखोगे और स्वजनोंसे भी मिलोगे॥ ४ ॥

पितरं वसुदेवं च सततं दुःखभाजनम्।
दीनं पुत्रवधभ्रान्तं युवामद्य समेष्यथः॥ ५ ॥

‘तुम दोनों भाई पुत्रोंके वधसे अत्यन्त दीन-दुर्बल होकर सदा दुःख ही भोगनेवाले अपने पिता वसुदेवजीसे वहाँ मिलोगे॥

सततं पीड्यमानं च कंसेनाशुभबुद्धिना।
दशान्ते शोषितं वृद्धं दुःखैः शिथिलतां गतम्॥ ६ ॥

‘अशुभ बुद्धिवाले कंसने उन्हें सदा ही पीड़ा दी है। इस बुढ़ापेमें उनके शरीरका रक्त-मांस सूख गया है। बूढ़े वसुदेव अनेक प्रकारके दुःखोंसे भी बहुत शिथिल हो गये हैं॥ ६ ॥

कंसस्य भयसंत्रस्तं भवद्भ्यां च विना कृतम्।
दह्यमानं दिवा रात्रौ सोत्कण्ठेनान्तरात्मना॥ ७ ॥

‘एक तो कंसका भय उन्हें आतङ्कित किये रहता है, दूसरे तुम दोनोंसे वे बिछुड़ गये हैं; अतः तुम्हारे लिये उत्कण्ठितचित्त होकर दिन-रात चिन्ताकी आगमें जलते रहते हैं॥ ७ ॥

तां च द्रक्ष्यसि गोविन्द पुत्रैरमृदितस्तनीम्।
देवकीं देवसंकाशां सीदन्तीं विहतप्रभाम्॥ ८ ॥
पुत्रशोकेन शुष्यन्तीं त्वद्दर्शनपरायणाम्।
वियोगशोकसंतप्तां विवत्सामिव सौरभीम्॥ ९ ॥

‘गोविन्द! तुम वहाँ चलकर अपनी माता देवकीका भी दर्शन करोगे, जिसके स्तनोंसे उसके पुत्रोंने कभी मुँह नहीं लगाया है। वह देवियों-जैसी नारी इस समय प्रभाहीन होकर दुःख भोग रही है। तुम्हारे दर्शनकी आशा लिये पुत्रशोकसे सूखती जा रही है। बिना बछड़ेकी गायके समान वह पुत्र-वियोगके शोकसे संतप्त रहती है॥ ८-९ ॥

उपप्लुतेक्षणां दीनां नित्यं मलिनवाससम्।
खर्भानुवदनग्रस्तां शशाङ्कस्य प्रभामिव॥ १० ॥

‘उस दुखियाके नेत्रोंमें निरन्तर आँसू भरे रहते हैं। उसके वस्त्र मैले हो गये हैं। वह राहुके मुखमें पड़ी हुई चन्द्रमाकी प्रभाके समान जान पड़ती है॥ १० ॥

त्वद्दर्शनपरां नित्यं तवागमनकाङ्क्षिणीम्।
त्वत्प्रवृत्तेन शोकेन सीदन्तीं वै तपस्विनीम्॥ ११ ॥

‘उसे सदा यही चिन्ता रहती है कि कब तुम्हारा दर्शन होगा। वह प्रतिदिन तुम्हारे शुभागमनकी अभिलाषा रखती है। वह तपस्विनी नारी तुम्हारे शोकसे शिथिल हो गयी है॥

त्वत्प्रलापेष्वकुशलां त्वया बाल्ये वियोजिताम्।
अरूपज्ञां तव विभो वक्त्रस्यास्येन्दुवर्चसः॥ १२ ॥

‘प्रभो! बाल्यावस्थामें ही वह तुमसे बिछुड़ गयी, अतः तुम्हारी मीठी-मीठी बातोंमें क्या रस है, इसको समझनेकी चतुरता उसमें नहीं आ सकी है। वह तुम्हारे रूपको नहीं जानती, चन्द्रमाके समान कान्तिमान् इस मुखके दर्शनसे भी वञ्चित रह गयी है॥ १२ ॥

यदि त्वां जनयित्वा सा देवकी तात तप्यते।
अपत्यार्थो नु कस्तस्या वरं ह्येवानपत्यता॥ १३ ॥

‘तात! यदि तुम्हें जन्म देकर देवकी इतना संताप सह रही है तो उसे संतानका क्या फल मिला? इससे तो उसका संतानहीन होना ही अच्छा था॥ १३ ॥

अपुत्राणां हि नारीणामेकः शोको विधीयते।
सपुत्रा त्वफले पुत्रे धिक्प्रजातेन तप्यते॥ १४ ॥

‘जिन नारियोंके पुत्र नहीं हुआ है, उन्हें एक ही शोक रहता है; परंतु जो पुत्रवती होकर भी पुत्रका फल न पा सके, वह उस धिक्कार पानेके योग्य संतानसे सदा ही संतप्त होती रहती है॥ १४ ॥

२९८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


त्वं तु शक्रसमः पुत्रो यस्यास्त्वत्सदृशो गुणैः ।
परेषामप्यभयदो न सा शोचितुमर्हति ॥ १५ ॥

'जिसके तुम्हारे समान गुणवान्, इन्द्रतुल्य तेजस्वी तथा दूसरोंको भी अभयदान देनेवाला पुत्र हो, उस माताको शोककी भागिनी नहीं होना चाहिये ॥ १५ ॥

वृद्धौ तवाम्बापितरौ परभृत्यत्वमागतौ ।
भर्त्सितौ त्वत्कृते नित्यं कंसेनाशुभबुद्धिना ॥ १६ ॥

'भैया ! तुम्हारे बूढ़े माता-पिता दूसरेके दासभावको प्राप्त हो गये हैं। पापपूर्ण विचार रखनेवाला कंस उन्हें प्रति-दिन तुम्हारे कारण डाँटता-फटकारता रहता है ॥ १६ ॥

यदि ते देवकी मान्या पृथिवीवात्मधारिणी ।
तां शोकसलिले मग्नामुत्तारयितुमर्हसि ॥ १७ ॥

'तुम्हारे शरीरको अपने गर्भमें धारण करनेवाली माता देवकी यदि लोकधारिणी पृथ्वीके समान माननीय है तो तुमने जैसे पृथ्वीका जलसे उद्धार किया था, उसी प्रकार शोक-सागरके जलमें डूबी हुई उस देवकीका भी तुम्हें उद्धार करना चाहिये ॥ १७ ॥

तं च वृद्धं प्रियसुतं वसुदेवं सुखोचितम् ।
पुत्रयोगेन संयोज्य कृष्ण धर्ममवाप्स्यसि ॥ १८ ॥

'श्रीकृष्ण ! जिन्हें अपने पुत्र बहुत ही प्रिय हैं तथा जो सुख भोगनेके योग्य हैं, उन बूढ़े वसुदेवको पुत्र-संयोगका सुख देकर तुम धर्मके भागी होओगे ॥ १८ ॥

यथा नागः सुदुर्वृत्तो दमितो यमुनाह्रदे ।
विमूलः स कृतः शैलो यथा वै भूधरस्त्वया ॥ १९ ॥
दर्पोत्सिक्तश्च बलवानरिष्टो विनिपातितः ।
परप्राणहरः केशी दुष्टात्मा च हयो हतः ॥ २० ॥
एतेनैव प्रयत्नेन वृद्धावुद्धृत्य दुःखितौ ।
यथा धर्ममवाप्नोषि तत् कृष्ण परिचिन्त्यताम् ॥ २१ ॥

'श्रीकृष्ण ! जैसे तुमने यमुनाके कुण्डमे रहनेवाले उस दुराचारी नागका दमन किया, जैसे गोवर्धन पर्वतको जड़से उखाड़ दिया, जिस प्रकार बलवान् एवं मदमत्त अरिष्टासुरको मार गिराया तथा जिस तरह दूसरोंके प्राण लेनेवाले अश्वरूप-धारी दुष्टात्मा केशीका वध किया, वैसे ही प्रयत्नके द्वारा उन दुखी एवं वृद्ध माता-पिताका उद्धार करके तुम जैसे भी धर्मके भागी हो सको, उस उपायको सोचो ॥ १९-२१ ॥

निर्भर्त्स्यमानो यैर्दृष्टः पिता ते कंससंसदि ।
ते सर्वे चक्रुरश्रूणि नेत्रैर्दुःखान्विता भृशम् ॥ २२ ॥

'जिन लोगोंने कंसकी सभामें तुम्हारे पितापर डाँट पड़ती देखी थी, वे सब-के-सब अत्यन्त दुखी होकर नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे थे ॥ २२ ॥

गर्भावकर्तनादीनि दुःखानि सुबहून्यपि ।
माता ते देवकी कृष्ण कंसस्य सहतेऽवशा ॥ २३ ॥

'कृष्ण ! तुम्हारी माता देवकी विवश होकर कंसके द्वारा दिये गये गर्भोच्छेद आदि बहुत-से दुःख सहती चली आ रही है ॥ २३ ॥

मातापितृभ्यां सर्वेण जातेन तनयेन वै ।
ऋणं वै प्रतिकर्तव्यं यथायोगमुदाहृतम् ॥ २४ ॥

'माता-पितासे उत्पन्न हुए सभी पुत्रोंको यथायोग्य सेवा करके उनके ऋणोंको उतार देना चाहिये, यह शास्त्रकी आज्ञा है ॥ २४ ॥

एवं ते कुर्वतः कृष्ण मातापित्रोरनुग्रहम् ।
परित्यजेतां तौ शोकं स्याच्च धर्मस्त्वानघ ॥ २५ ॥

'निष्पाप श्रीकृष्ण ! यदि इस प्रकार तुमने माता-पितापर अनुग्रह किया तो वे दोनों अपने बीते हुए शोकको त्याग देंगे और तुम्हें धर्मकी प्राप्ति होगी' ॥ २५ ॥

वैशम्पायन उवाच

कृष्णः सुविदितार्थो वै तमाहामितविक्रमम् ।
बाढमित्येव तेजस्वी न च क्रोधवशं गतः ॥ २६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! इन सब बातों-को अच्छी तरह जान लेनेपर तेजस्वी श्रीकृष्णने अमित-पराक्रमी अक्रूरसे कहा - 'बहुत अच्छा ! हमलोग आपके साथ चलेंगे।' वे क्रोधके वशीभूत नहीं हुए ॥ २६ ॥

ते च गोपाः समागम्य नन्दगोपपुरःसराः ।
अक्रूरवचनं श्रुत्वा चेलुः कंसस्य शासनात् ॥ २७ ॥

नन्द आदि सभी गोप वहाँ एकत्र हो अक्रूरजीकी बात सुनकर कंसकी आज्ञासे मथुरा चलनेको उद्यत हो गये ॥ २७ ॥

गमनाय च ते सज्जा बभूवुर्व्रजवासिनः ।
सज्जं चोपायनं कृत्वा गोपवृद्धाः प्रतस्थिरे ॥ २८ ॥

वे ब्रजवासी गोप यात्राके लिये सुसज्जित हो गये। भेंटकी सामग्रीको सजाकर बड़े-बूढ़े गोप वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २८ ॥

करं चानडुहः सर्पिर्महिषांश्चोपनायिकान् ।
यथासारं यथायूथमुपानीय पयो दधि ॥ २९ ॥
तं सञ्जयित्वा कंसस्य करं चोपायनानि च ।
ते सर्वे गोपपतयो गमनायोपतस्थिरे ॥ ३० ॥

वार्षिक कर, गाड़ीका बोझ ढोनेवाले बैल, भैंसें, घी, दूध और दही आदि उपहार-सामग्रियोंको अपनी-अपनी शक्ति और यूथके अनुसार लेकर एकत्र किया, फिर कंसकी उस उपायन-सामग्री और वार्षिक करको छकड़ेमें सजाकर वे सभी गोप सरदार यात्रा करनेके लिये नन्दके द्वारपर उपस्थित हुए ॥

अक्रूरस्य कथाभिश्च सह कृष्णेन जाग्रतः ।
रौहिणेयतृतीयस्य सा निशा व्यत्यवर्तत ॥ ३१ ॥

विष्णुपर्व ] षड्विंशोऽध्यायः २९९

श्रीकृष्णके साथ बातचीत करनेमें अक्रूरकी वह सारी रात जागते ही बीती। उनके साथ तीसरे व्यक्ति रोहिणीनन्दन बलरामजी थे ॥ ३१ ॥

ततः प्रभाते विमले पक्षिव्याहारसंकुले ।
नैशाकरे रश्मिजाले क्षणदाक्षयसंहृते ॥ ३२ ॥
नभस्यरुणसंस्तीर्णे पर्यस्ते ज्योतिषां गणे ।
प्रत्यूषपवनासारैः क्लेदिते धरणीतले ॥ ३३ ॥
क्षीणाकारासु तारासु सुप्तनिष्प्रतिभासु च ।
नैशमन्तर्दधे रूपमुद्गच्छति दिवाकरे ॥ ३४ ॥

तदनन्तर पक्षियोंके कलरवोंसे व्याप्त निर्मल प्रभातकाल उपस्थित हुआ। रात्रिकी समाप्तिके साथ ही चन्द्रदेवने अपने किरण-जालको समेट लिया। आकाशमें अरुणोदयकी लाली छा गयी। नक्षत्रोंका समुदाय अस्त हो गया। प्रातःकालकी वायुके साथ मिले हुए ओस-कणोंसे पृथ्वी गीली-सी हो गयी। तारिकाएँ क्षीण हो गयीं। वे सोयी हुईकी भाँति अपनी प्रभा खो बैठीं। सूर्योदय होनेके साथ ही निशाका रूप अदृश्य हो गया ॥ ३२-३४ ॥

शीतांशुः शान्तकिरणो निष्प्रभः समपद्यत ।
एको नाशयते रूपमेको वर्धयते वपुः ॥ ३५ ॥

शीतरश्मि चन्द्रमाकी किरणें शान्त हो जानेके कारण वे प्रभाहीन हो गये। एक (चन्द्रमा) अपने रूपको अदृश्य करने लगा और दूसरा (सूर्य) अपने तेजको बढ़ाने लगा ॥

गोभिश्च समकीर्णासु व्रजनिर्याणभूमिषु ।
मन्थानावर्तपूर्णेषु गर्जरेषु नदत्सु च ॥ ३६ ॥
दामभिर्दम्यमानेषु वत्सेषु तरुणेषु च ।
गोपैरापूर्यमाणासु घोषरथ्यासु सर्वशः ॥ ३७ ॥
तत्रैव गुरुकं भाण्डं शकटारोपितं बहु ।
त्वरिताः पृष्ठतः कृत्वा जग्मुः स्यन्दनवाहनाः ॥ ३८ ॥

व्रजसे बाहर जानेके मार्गोंकी भूमिपर गौएँ सब ओर फैल गयीं। मथानी घुमानेसे दहीके भरे मटकोंमें घर-घर ध्वनि होने लगी। नौजवान बछड़े रस्सियोंसे बाँधकर सधाये जाने लगे। व्रजकी गलियाँ सब ओरसे गोपोंद्वारा भर गयी थीं। ऐसे समयमें छकड़ेपर रखे गये दही-दूधके भारी-भारी भाण्डोंको पीछे करके गाड़ी हाँकनेवाले गोप तीव्र गतिसे चल दिये ॥ ३६-३८ ॥

कृष्णोऽथ रौहिणेयश्च स चैवामितदक्षिणः ।
त्रयो रथगता जग्मुस्त्रिलोकपतयो यथा ॥ ३९ ॥

श्रीकृष्ण, बलराम और अमित दक्षिणा देनेवाले दानपति अक्रूर—ये तीनों त्रिलोकपतियोंके समान रथपर बैठकर चल रहे थे ॥ ३९ ॥

अथाह कृष्णमक्रूरो यमुनातीरमाश्रितः ।
स्यन्दनं चात्र रक्षस्व यत्नं च कुरु वाजिषु ॥ ४० ॥

यमुनाजीके तटपर पहुँचकर अक्रूरने श्रीकृष्णसे कहा—'भैया ! रथको यहीं खड़ा रखो और घोड़ोंको काबूमें रखनेका प्रयत्न करो ॥ ४० ॥

हयेभ्यो यवसं दत्त्वा ह्यभाण्डे रथे तथा ।
प्रगाढं यत्नमास्थाय क्षणं तात प्रतीक्ष्यताम् ॥ ४१ ॥

'तात ! घोड़ोंको दान-घास देकर, इनके आभूषण और रथकी विशेष यत्नपूर्वक देख-भाल करते हुए एक क्षणतक मेरी प्रतीक्षा करो ॥ ४१ ॥

यमुनाया हृदे ह्यस्मिन् स्तोष्यामि भुजंगेश्वरम् ।
दिव्यैर्भागवतैर्मन्त्रैः सर्वलोकप्रभुं यतः ॥ ४२ ॥

'तबतक मैं यमुनाजीके इस कुण्डमें प्रवेश करके दिव्य भागवत मन्त्रोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्के स्वामी नागराज अनन्तकी स्तुति कर लूँ ॥ ४२ ॥

गुह्यं भागवतं देवं सर्वलोकस्य भावनम् ।
श्रीमत्स्वस्तिकमूर्द्धानं प्रणमिष्यामि भोगिनम् ।
सहस्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम् ॥ ४३ ॥

'वे गुह्यरूप भागवत देवता हैं, सम्पूर्ण लोकोंके उत्पादक एवं उन्नायक हैं। उनका मस्तक कान्तिमान् स्वस्तिक चिह्नसे अलंकृत है। वे सर्प-विग्रहधारी भगवान् अनन्त देव सहस्र सिरोंसे सुशोभित तथा नील वस्त्र धारण करनेवाले हैं। मैं उन्हें प्रणाम करूँगा ॥ ४३ ॥

धर्मदेवस्य तस्याथ यद् विषं प्रभविष्यति ।
सर्वं तदमृतप्रख्यमशिष्याम्यमरो यथा ॥ ४४ ॥
स्वस्तिकायतनं दृष्ट्वा द्विजिह्वं श्रीविभूषितम् ।
समाजस्तत्र सर्पाणां शान्त्यर्थं वै भविष्यति ॥ ४५ ॥

'स्वस्तिकके आश्रयभूत श्रीविभूषित नागराज शेषका दर्शन करके मैं उन धर्मदेवका जो विष होगा, उसे अमृतके समान मानकर पी जाऊँगा। ठीक उसी तरह, जैसे देवतालोग अमृत पीते हैं। वहाँ भगवान् शेषके समीप सर्पोंका समुदाय शान्तिके लिये उपस्थित होगा ॥ ४४-४५ ॥

आस्तां मां समुदीक्षन्तौ भवन्तौ सङ्गतावुभौ ।
निवृत्तो भुजगेन्द्रस्य यावदस्मि हृदोत्तमात् ॥ ४६ ॥

'मैं नागराजके इस उत्तम हृदसे लौटकर जबतक आ न जाऊँ, तबतक तुम दोनों भाई एक साथ मेरी राह देखते रहो '॥ ४६ ॥

तमाह कृष्णः संहृष्टो गच्छ धर्मिष्ठ मा चिरम् ।
आवां खलु न शक्तौ स्वस्त्वया हीनावुपासितुम् ॥४७॥

तब श्रीकृष्णने हर्षमें भरकर उनसे कहा—'धर्मिष्ठ महापुरुष ! जल्दी जाओ और लौटो। हम दोनों तुम्हारे बिना यहाँ (देरतक) नहीं बैठे रह सकेंगे' ॥ ४७ ॥

३०० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


स हृदे यमुनायास्तु ममज्जामितदक्षिणः।
रसातले स ददृशे नागलोकमिमं यथा ॥ ४८ ॥

तब अमित दक्षिणा देनेवाले अक्रूरने यमुनाजीके जलमें जाकर गोता लगाया । वहाँ उन्हें इसी लोककी भाँति रसातल-वर्ती नाग-लोकका स्पष्ट दर्शन होने लगा ॥ ४८ ॥

तस्य मध्ये सहस्रास्यं हेमतालोच्छ्रितध्वजम्।
लाङ्गलासक्तहस्ताग्रं मुसलोपाश्रितोदरम् ॥ ४९ ॥

उस लोकके मध्यभागमें सहस्र सिरोंसे सुशोभित शेषका दर्शन हुआ । उनके पास सुवर्णमय ताल-चिह्नसे युक्त ऊँची ध्वजा फहराती थी । उनके एक हाथका अग्रभाग हलसे सटा हुआ था और उदर मुसलसे टिका हुआ था ॥ ४९ ॥

असिताम्बरसंवीतं पाण्डुरं पाण्डुरासनम् ।
कुण्डलैकधरं मत्तं सुप्तमम्बुरुहेक्षणम् ॥ ५० ॥

उनका शरीर गौर और आसन श्वेत वर्णका था । उनके श्रीअङ्ग नील वस्त्रसे आवृत थे । उन्होंने एक ही कानमें एक कुण्डल धारण कर रखा था । वे मतवाले-से होकर सोये थे । उनके नेत्र विकसित कमल दलके समान मनोहर थे ॥ ५० ॥

भोगोत्करासने शुभ्रे स्वेन देहेन कल्पिते ।
स्वासीनं स्वस्तिकाभ्यां च वराहाभ्यां महीधरम् ॥ ५१ ॥

वे अपनी ही देहसे कल्पित सर्प-शरीरमय विस्तृत एवं शुभ्र आसनपर सुन्दर ढंगसे विराजमान थे । पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त दो स्वस्तिक एवं वराह-चिह्नसे विभूषित थे ॥ ५१ ॥

किंचित् सव्यापवृत्तेन मौलिना हेमचूलिना ।
जातरूपमयैः पद्मैर्मालयाच्छाद्यवक्षसम् ॥ ५२ ॥

उनके मस्तकपर सोनेकी कलँगीसे विभूषित मुकुट बायीं ओर कुछ झुका हुआ शोभा दे रहा था । वक्षःस्थल सुवर्णमय कमलोंकी मालासे आच्छादित था ॥ ५२ ॥

रक्तचन्दनदिग्धाङ्गं दीर्घबाहुमरिंदमम् ।
पद्मनाभसिताभ्राभं भाभिर्ज्वलिततेजसम् ॥ ५३ ॥

सारे अङ्गोंमें रक्त चन्दनका लेप लगा हुआ था । उनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं । वे शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ थे । उनकी अङ्गकान्ति श्वेत वर्णवाले विष्णुकी शुक्ल प्रभा तथा श्वेत बादलोंकी आभाके समान थी । अपने ही प्रकाशसे उनका तेज प्रज्वलित हो रहा था ॥ ५३ ॥

ददर्श भोगिनां नाथं स्थितमेकार्णवेश्वरम् ।
पूज्यमानं द्विजहेन्द्रैर्वासुकिप्रमुखैः प्रभुम् ॥ ५४ ॥

अक्रूरने देखा, एकार्णवके स्वामी तथा सर्पोंके रक्षक भगवान् शेष विराज रहे हैं और वासुकि आदि नागराज उन प्रभुकी पूजा कर रहे हैं ॥ ५४ ॥


कम्बलाश्वतरौ नागौ तौ चामरकरावुभौ ।
अवीजयेतां तं देवं धर्मासनगतं प्रभुम् ॥ ५५ ॥

कम्बल और अश्वतर नाग हाथोंमें चँवर लेकर धर्मासन-पर विराजमान भगवान् अनन्तदेवको हवा कर रहे थे ॥ ५५ ॥

तस्याभ्याशगतो भाति वासुकिः पन्नगेश्वरः ।
वृतोऽन्यैः सचिवैः सर्वैः कर्कोटकपुरःसरैः ॥ ५६ ॥

उनके निकट कर्कोटक आदि अन्य सर्पजातीय मन्त्रियोंसे घिरे हुए नागराज वासुकि सुशोभित हो रहे हैं ॥ ५६ ॥

तं घटैः काञ्चनैर्दिव्यैः पङ्कजच्छन्नमस्तकैः ।
राजानं स्नापयामासुः स्नातमेकार्णवाम्बुभिः ॥ ५७ ॥

उन्हें क्रमशः यह दिखायी दिया किसेवकोंने कमलसे ढके हुए मुखवाले दिव्य सुवर्णमय घटोंद्वारा एकार्णवके जलसे नहाये हुए नागराज शेषको पुनः नहलाया है ॥ ५७ ॥

तस्योत्सङ्गे घनश्यामं श्रीवत्साच्छादितोरसम् ।
पीताम्बरधरं विष्णुं सूपविष्टं ददर्श ह ॥ ५८ ॥

उन शेषजीकी गोदमें उन्होंने पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) को सुखपूर्वक विराजमान देखा । उनके श्रीअङ्गों-की कान्ति मेघके समान श्याम थी तथा उनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे आच्छादित था ॥ ५८ ॥

अपरं चैव सोमेन तुल्यसंहननं प्रभुम् ।
संकर्षणमिवासीनं तं दिव्यं विष्टरं विना ॥ ५९ ॥

वहीं चन्द्रमाके समान गौर विग्रहवाले दूसरे प्रभावशाली देवता दिखायी दिये, जो संकर्षणसे मिलते-जुलते थे । वे उस दिव्य विस्तरके बिना ही वहाँ बैठे थे ॥ ५९ ॥

स कृष्णं तत्र सहसा व्याहर्तुमुपचक्रमे ।
तस्य संस्तम्भयामास वाक्यं कृष्णः स्वतेजसा ॥ ६० ॥

अक्रूरने सहसा वहाँ श्रीकृष्णसे बातचीत करनेकी चेष्टा की, परंतु श्रीकृष्णने अपने तेजसे उनकी वाणीको स्तम्भित कर दिया ॥ ६० ॥

सोऽनुभूय भुजङ्गानां तं भागवतमव्ययम् ।
उदतिष्ठत् पुनस्तोयाद् विस्मितोऽमितदक्षिणः ॥ ६१ ॥

सर्पोंके स्वामी उन अविनाशी भागवत देवकी महिमाका अनुभव करके अमित दक्षिणा देनेवाले दानपति अक्रूर आश्चर्य-चकित होकर पुनः जलसे ऊपर उठे ॥ ६१ ॥

स तौ रथस्थावासीनौ तत्रैव बलकेशवौ ।
निरीक्ष्यमाणावन्योन्यं ददर्शाद्भुतरूपिणौ ॥ ६२ ॥

उठकर उन्होंने देखा कि बलराम और श्रीकृष्ण दोनों वहीं रथपर बैठे हैं और एक दूसरेकी ओर देख रहे हैं; उन दोनोंके रूप अद्भुत हैं ॥ ६२ ॥

अथामज्जत् पुनस्तत्र तदाक्रूरः कुतूहलात् ।
दृश्यते यत्र देवोऽसौ नीलवासाः सिताननः ॥ ६३ ॥

विष्णुपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ३०१


तब अक्रूरने पुनः कौतूहलवश वहाँ जलमें गोता लगाया और पुनः वे वहीं जा पहुँचे, जहाँ उज्ज्वल (गौर) मुखवाले नीलाम्बरधारी भगवान् अनन्तदेव पूजित हो रहे थे॥

तथैवासीनमुत्सङ्गे सहस्रास्यधरस्य वै।
ददर्श कृष्णमक्रूरः पूज्यमानं तदा प्रभुम् ॥ ६४ ॥

फिर उसी प्रकार उन सहस्र मुखधारी शेषनागकी गोदमें बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णको भी अक्रूरने देखा, जो उस समय पूजित हो रहे थे॥ ६४॥

भूयश्च सहसोत्थाय तं मन्त्रं मनसा जपन्।
रथं तेनैव मार्गेण जगामामितदक्षिणः ॥ ६५ ॥

तब मन-ही-मन उसी मन्त्रका जप करते हुए पुनः सहसा उठकर अमित दक्षिणा देनेवाले अक्रूर उसी मार्गसे रथके समीप चले गये॥ ६५॥

तमाह केशवो हृष्टः स्थितमक्रूरमागतम्।
कीदृशं नागलोकस्य वृत्तं भागवते ह्रदे ॥ ६६ ॥

तब हर्षमें भरे हुए श्रीकृष्ण वहाँ खड़े हुए अक्रूरके पास आये और पूछने लगे—'कहिये, उस भागवत ह्रदमें नागलोकका वृत्तान्त कैसा रहा ? ॥ ६६ ॥

चिरं च भवता कालो व्याक्षेपेण विलम्बितः।
मन्ये दृष्टं त्वयाश्चर्यं हृदयं ते यथाचलम् ॥ ६७ ॥

'आपने तो ध्यानके ही व्यासङ्गसे बहुत देर लगा दी। मैं समझता हूँ, आपको वहाँ कोई आश्चर्यकी बात दिखायी दी है, तभी आपका हृदय स्थिरभावसे ध्यानमें लगा रहा है' ॥

प्रत्युवाच स तं कृष्णमाश्चर्यं भवता विना।
किं भविष्यति लोकेषु स्थावरेषु चरेषु च ॥ ६८ ॥

तब अक्रूरने श्रीकृष्णसे उनकी बातका उत्तर देते हुए कहा—'इस चराचर जगत्में तुम्हारे सिवा दूसरा कौन-सा आश्चर्यका विषय होगा ? ॥ ६८ ॥

तत्राश्चर्यं मया दृष्टं कृष्ण यद् भुवि दुर्लभम्।
तदिहापि यथा तत्र पश्यामि च रमामि च ॥ ६९ ॥

'श्रीकृष्ण ! मैंने वहाँ वह आश्चर्य देखा है, जो भूतलपर दुर्लभ है। जैसा वहाँ देखा था, वैसा ही आश्चर्य यहाँ भी देखता हूँ और उसीमें रम रहा हूँ॥ ६९॥

संगतश्चापि लोकानामाश्चर्येणेह रूपिणा।
अतः परतरं कृष्ण नाश्चर्यं द्रष्टुमुत्सहे ॥ ७० ॥

'श्रीकृष्ण ! यहाँ तीनों लोकोंके मूर्तिमान् आश्चर्यसे मेरी भेंट हो गयी है। अब इससे बढ़कर कोई आश्चर्य मैं नहीं देख सकता ॥ ७० ॥

तदागच्छ गमिष्यामः कंसराजपुरीं प्रभो।
यावन्नास्तं व्रजत्येष दिवसान्ते दिवाकरः ॥ ७१ ॥

'अतः प्रभो ! अब आओ, कंसराजकी मथुरा नगरीमें चलें। ये सूर्यदेव दिनके अन्तमें जबतक अस्त न हों, तभीतक हमें वहाँ पहुँच जाना चाहिये' ॥ ७१ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अक्रूरकृतनागलोककथने षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अक्रूरद्वारा नागलोकके वृत्तान्तका कथनविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥


सप्तविंशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण और बलरामका मथुरामें प्रवेश, उनके द्वारा रजकका वध, मालीको वरदान, कुब्जापर कृपा और कंसके धनुषका भञ्जन

वैशम्पायन उवाच
ते तु युङ्क्त्वा रथवरं सर्व एवामितौजसः।
कृष्णेन सहिताः प्रायंस्तथा संकर्षणेन च ॥ १ ॥
आसेदुस्ते पुरीं रम्यां मथुरां कंसपालिताम्।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वे सभी अमित तेजस्वी यात्री अपने श्रेष्ठ रथको जोतकर श्रीकृष्ण और संकर्षणके साथ राजा कंसके द्वारा सुरक्षित रमणीय मथुरापुरीमें जा पहुँचे ॥ १½ ॥

विविशुस्ते पुरीं रम्यां काले रक्तदिवाकरे ॥ २ ॥
तौ तु स्वभवनं वीरौ कृष्णसंकर्षणावुभौ।
प्रवेशितौ बुद्धिमता ह्यक्रूरेणार्कवर्चसौ ॥ ३ ॥

संध्या-कालमें जब कि सूर्यदेव लाल हो गये थे, उन सबने उस रमणीय मथुरा नगरीमें प्रवेश किया। बुद्धिमान् अक्रूर सूर्यतुल्य तेजस्वी श्रीकृष्ण और संकर्षण दोनों वीरोंको पहले अपने घरमें ले गये ॥ २-३ ॥

तावाह वरवर्णाभौ भीतो दानपतिस्तदा।
त्यक्तव्या तात गमने वसुदेवगृहे स्पृहा ॥ ४ ॥

वे दोनों भाई उत्तम कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे। उस समय दानपति अक्रूरने कंससे भयभीत होकर उनसे कहा—'तात ! तुम दोनोंको अभी वसुदेवके घरमें जानेकी इच्छा त्याग देनी चाहिये ॥ ४ ॥

युवयोर्हि कृते वृद्धः कंसेन स निरस्यते।

३०२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


भर्त्स्यते च दिवा रात्रौ नेह स्थातव्यमित्यपि ॥ ५ ॥ 'क्योंकि तुम्हारे कारण ही कंस बूढ़े वसुदेवको घरसे निकालता है और 'तुम्हें यहाँ नहीं रहना चाहिये' ऐसा कह-कर उन्हें दिन-रात डाँटता रहता है ॥ ५ ॥

तद् युवाभ्यां हि कर्तव्यं पित्र्यर्थं सुखमुत्तमम्। यथा सुखमवाप्नोति तद् वै कार्यं हितान्वितम् ॥ ६ ॥ 'अतः तुम दोनोंको पिताके लिये उत्तम सुखकी व्यवस्था करनी चाहिये। जिस तरह उन्हें सुख मिले, जैसे उनका हित हो, वही कार्य करना चाहिये' ॥ ६ ॥

तमुवाच ततः कृष्णो यास्यावावामतर्कितौ। प्रेक्षन्तौ मथुरां वीर राजमार्गं च धार्मिक। तस्यैव तु गृहं साधो गच्छावो यदि मन्यसे ॥ ७ ॥ तब श्रीकृष्णने उनसे कहा—'धर्मनिष्ठ वीर ! साधुपुरुष ! यदि आप स्वीकार करें तो हम दोनों भाई मथुरा नगर और इसके राजमार्गको देखते हुए यहाँसे जायँ और अतर्कित रूपसे कंसके ही घर पहुँच जायँ' ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच

अक्रूरोऽपि नमस्कृत्य मनसा कृष्णमव्ययम्। जगाम कंसपार्श्वं तु प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अक्रूर भी मनसे ही अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करके प्रसन्न चित्तसे कंसके पास गये ॥ ८ ॥

अनुज्ञातौ च तौ वीरौ प्रस्थितौ प्रेक्षकावुभौ। आलानाभ्यामिवोन्मुक्तौ कुञ्जरौ युद्धकाङ्क्षिणौ ॥ ९ ॥ अक्रूरकी आज्ञा लेकर वे दोनों वीर श्रीकृष्ण और बलराम नगर देखनेके लिये वहाँसे इस तरह प्रस्थित हुए, मानो युद्ध-की इच्छा रखनेवाले दो गजराज आलान^१से छूट निकले हों ॥

तौ तु मार्गगतं दृष्ट्वा रजकं रङ्गकारकम्। अयाचेतां ततस्तौ तु वासांसि रुचिराणि वै ॥ १० ॥ उन दोनोंने रास्तेमें एक रजक (धोबी) को देखा, जो कपड़ोंमें रंग कर रहा था। उसे देखकर वे दोनों भाई उससे सुन्दर वस्त्र माँगने लगे ॥ १० ॥

रजकः स तु तौ प्राह युवां कस्य वनेचरौ। राजवासांसि यौ मौढ्याद् याचेथां निर्भयावुभौ ॥ ११ ॥ रजकने उन दोनोंसे कहा—'अरे ! तुम दोनों किसके (और कहाँके) वनेचर हो ? जो मूर्खतावश निर्भय होकर राजाके कपड़े माँग रहे हो ! ॥ ११ ॥

अहं कंसस्य वासांसि नानादेशोद्भवानि वै। कामरागाणि शतशो रञ्जयामि विशेषतः ॥ १२ ॥


^१. जिसमें हाथी बाँधा जाता है, उस खम्भेको आलान कहते हैं।


'मैं तो विभिन्न देशोंके बने हुए राजा कंसके सैकड़ों वस्त्रोंको रँगता हूँ और उन वस्त्रोंपर विशेषतः उनकी इच्छा-के अनुसार रंग देता हूँ ॥ १२ ॥

युवां कस्य वने जातौ मृगैः सह विवर्द्धितौ। जातरागाविदं दृष्ट्वा रक्तमाच्छादनं बहु ॥ १३ ॥ 'तुम दोनों किसके बेटे हो ? तुम तो वनमें पैदा हुए और वन्य पशुओंके साथ ही बढ़े हो। आज इन बहुत-से रंगीन कपड़ोंको देखकर तुम्हारे मनमें इनके प्रति लोभ उत्पन्न हो गया है ? ॥ १३ ॥

अहो वां जीवितं त्यक्तं यौ भवन्ताविहागतौ। मूर्खौ प्राकृतविज्ञानौ वासो याचितुमिच्छतः ॥ १४ ॥ 'अहो ! यह बड़े आश्चर्यकी बात है। जान पड़ता है, तुमने अपने जीवनका मोह त्याग दिया है, तभी तो यहाँ आ गये। तुम दोनों मूर्ख हो। तुम्हारी बुद्धि गवाँरों-जैसी है, इसीलिये तो राजाके कपड़े माँगनेकी इच्छा करते हो' ॥ १४ ॥

तस्मै चुकोप वै कृष्णो रजकायाल्पमेधसे। प्राप्तारिष्टाय मूर्खाय सृजते वाङ्मयं विषम् ॥ १५ ॥ यह सुनकर श्रीकृष्ण उस मन्दबुद्धि, अरिष्टग्रस्त, मूर्ख तथा जहरीली बात बोलनेवाले रजकपर कुपित हो उठे ॥

तलेनाशनिकल्पेन स तं मूर्द्धन्यताडयत्। स गतासुः पपातोर्व्यां रजको व्यस्तमस्तकः ॥ १६ ॥ उन्होंने उसके माथेपर एक तमाचा जड़ दिया। वह तमाचा क्या था, वज्र था। उसके लगते ही रजकका मस्तक फट गया और वह प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥

तं हतं परिदेवन्त्यो भार्यास्तस्य विचुक्रुशुः। त्वरितं मुक्तकेश्यश्च जग्मुः कंसनिवेशनम् ॥ १७ ॥ उसे मारा गया देख उसकी स्त्रियाँ चीखने-चिल्लाने लगीं। वे बाल खोले विलाप करती हुई तुरंत राजा कंसके दरबारमें गयीं ॥ १७ ॥

तावप्युभौ सुवसनौ जग्मतुर्माल्यकारणात्। वीथीमाल्यापणानां वै गन्धाघ्रातौ द्विपाविव ॥ १८ ॥ इधर वे दोनों भाई सुन्दर वस्त्र धारण करके फूलोंकी माला लेनेके लिये उस गलीमें गये, जहाँ मालाएँ बिकती थीं। वे ऐसे लगते थे, मानो दो गजराज उन फूलोंकी सुगन्ध पाकर वहाँ जा पहुँचे हों ॥ १८ ॥

गुणको नाम तत्रासीन्माल्यवृत्तिः प्रियंवदः। प्रभूतमाल्यापणवाँल्लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः ॥ १९ ॥ उस गलीमे गुणक नामसे प्रसिद्ध एक माली था, जो माला बेचकर ही जीविका चलाता था। उसकी बातें बड़ी प्रिय लगती थीं। उसकी दूकानमें बहुत-सी मालाएँ सजाकर

विष्णुपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ३०३

रखी गयी थीं। वह धनवान् होनेके साथ ही देखनेमें सुन्दर भी था ॥ १९ ॥

तं कृष्णः श्लक्ष्णया वाचा माल्यार्थमभिसूद्रया । देहीत्युवाच तत्काले मालाकारमकातरम् ॥ २० ॥

उस समय श्रीकृष्णने मालके लिये ही मुखसे निकली हुई अपनी मधुर वाणीद्वारा उस निर्भय मालाकारसे कहा—'हम दोनोंके लिये मालाएँ दे दो' ॥ २० ॥

ताभ्यां प्रीतो ददौ माल्यं प्रभूतं माल्यजीवनः । भवतोः स्वमिदं चेति प्रोवाच प्रियदर्शनौ ॥ २१ ॥

मालासे ही जीवन-निर्वाह करनेवाले उस मालीने प्रसन्न होकर उन दोनों भाइयोंको बहुत-सी मालाएँ अर्पित कीं। वे दोनों देखनेमें बड़े प्रिय लगते थे। मालीने उनसे कहा—'यह सब आपकी ही सम्पत्ति है' ॥ २१ ॥

प्रीतः सुमनसा कृष्णो गुणकाय वरं ददौ । श्रीस्त्वां मत्सम्भवा सौम्य धनौघैरभिपत्स्यते ॥ २२ ॥

उसकी बात सुनकर श्रीकृष्ण बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने संतुष्ट-चित्तसे गुणकको यह वर दिया—'सौम्य ! मेरी प्रसन्नता-से प्रकट होनेवाली लक्ष्मी तुम्हें धन-राशिसे सम्पन्न कर देगी'॥

स लब्ध्वा वरमव्यग्रो माल्यवृत्तिरधोमुखः । कृष्णस्य पतितो मूर्ध्ना प्रतिजग्राह तं वरम् ॥ २३ ॥

माली उस वरको पाकर शान्त-भावसे नतमस्तक हो गया। उसने श्रीकृष्णके चरणोंमें मस्तक रख दिया और उस वरको सादर शिरोधार्य किया ॥ २३ ॥

यक्षाविमाविति तदा स मेने माल्यजीवकः । स भृशं भयसंविग्नो नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ २४ ॥

उस समय मालीने यही समझा कि ये दोनों यक्ष हैं; उसने कंससे अत्यन्त भयभीत होकर उन्हें कुछ उत्तर नहीं दिया ॥ २४ ॥

वसुदेवसुतौ तौ च राजमार्गगतावुभौ । कुब्जां ददृशतुर्भूयः सानुलेपनभाजनाम् ॥ २५ ॥

तदनन्तर सड़कपर जाते हुए उन दोनों वसुदेव-पुत्रोंने कुब्जाको देखा, जो हाथोंमें अनुलेपन (अङ्गराग) का पात्र लिये हुए थी ॥ २५ ॥

तामाह कृष्णः कुब्जेति कस्येदमनुलेपनम् । नयस्यम्बुजपत्राक्षि क्षिप्राख्यातुमर्हसि ॥ २६ ॥

सस्मिता सम्मुखी भूत्वा प्रत्युवाचाम्बुजेक्षणम् । कृष्णं जलदगम्भीरं विद्युत्कुटिलगामिनी ॥ २७ ॥

उसे देखकर श्रीकृष्णने कहा—'कमलनयने कुब्जे ! तुम यह किसके लिये अनुलेपन लिये जा रही हो, शीघ्र बताओ !' यह सुनकर कुब्जा मुसकराती हुई उनके सामने हो गयी। वह बिजलीके समान कुटिल गतिसे चलनेवाली थी। उसने कमल-नयन श्रीकृष्णसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा—॥२६-२७॥

राज्ञः स्नानगृहं यामि तद् गृहाणानुलेपनम् । दृष्ट्वैव त्वारविन्दाक्ष विस्मितास्मि वरानन ॥ २८ ॥ यस्यमिच्छसि मे वीर त्वं गृहाणानुलेपनम् । स्थितास्म्यागच्छ भद्रं ते हृदयस्यासि मे प्रियः ॥ २९॥

'कमलनयन ! मनोहर मुखवाले वीर ! मैं तो राजाके स्नान-गृहको जा रही हूँ। तुम्हें अङ्गराग चाहिये तो ले लो। तुम्हें देखते ही मैं विस्मयसे विमुग्ध हो उठी हूँ। तुम्हें जैसा अङ्गराग चाहिये, वही ग्रहण करो। मैं तुम्हारे लिये ठहर गयी हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, आओ मेरे घर। तुम मेरे हृदय-वल्लभ हो ॥ २८-२९ ॥

कुतश्चागम्यते सौम्य यन्मां त्वं नावबुध्यसे । महाराजस्य दयितां नियुक्तामनुलेपने ॥ ३० ॥

'सौम्य ! तुम कहाँसे आते हो कि मुझे नहीं जानते। मैं तो महाराज कंसकी प्यारी दासी हूँ। उन्होंने मुझे अङ्गरागके ही कार्यमे लगा रखा है' ॥ ३० ॥

तामुवाच हसन्तीं तु कृष्णः कुब्जामवस्थिताम् । आवयोर्गात्रसदृशं दीयतामनुलेपनम् ॥३१॥ वयं हि देशातिथयो मल्लाः प्राप्ता वरानने । द्रष्टुं धनुर्महद् दिव्यं राष्ट्रे चैव महर्द्धिमत् ॥ ३२ ॥

वहाँ खड़ी होकर हँसती हुई कुब्जासे श्रीकृष्णने कहा—'सुमुखि ! तुम हम दोनों भाइयोंके शरीरके अनुरूप अङ्गराग दे दो। हम पहलवान हैं और इस देशमें अतिथिके रूपमें आये हैं। इस राज्यमें जो अत्यन्त समृद्धिशाली, विशाल दिव्य धनुष है, उसे ही देखनेके लिये हमलोगोंका यहाँ आना हुआ है' ॥ ३१-३२ ॥

प्रत्युवाचाथ सा कृष्णं प्रियोऽसि मम दर्शने । राजार्हमिदमव्यग्रं तद् गृहाणानुलेपनम् ॥ ३३ ॥

तब कुब्जाने श्रीकृष्णसे कहा—'मेरी दृष्टिमें तुम परम प्रिय हो, अतः शान्तभावसे यह राजोचित अङ्गराग ग्रहण करो ॥

तावुभावन्गुलिप्ताङ्गौ चारुगात्रौ विरेजतुः । तीर्थगौ पङ्कदिग्धाङ्गौ यमुनायां यथा वृषौ ॥ ३४ ॥

अङ्गोंमें अङ्गराग लग जानेपर मनोहर शरीरवाले वे दोनों भाई बड़ी शोभा पाने लगे। उस समय वे ऐसे प्रतीत होते थे, जैसे दो साँड़ यमुनाजीके जलमें गोता लगाकर सारे अङ्गोंमें कीचड़ लपेटे आ रहे हों ॥ ३४ ॥

तां च कुब्जां स्थगोर्मध्ये द्व्यङ्गुलेनाग्रपाणिना । शनैः सम्पीडयामास कृष्णो लीलाविधानवित् ॥ ३५॥

तदनन्तर लीलाविधिको जाननेवाले श्रीकृष्णने अपने

३०४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


हाथकी दो अँगुलियोंसे कुब्जाके कूबड़के मध्यभागमें धीरेसे दबाया (इससे कूबड़ सीधा हो गया) ॥ ३५ ॥

सा च मग्नं स्थगुं मत्वा स्वायताङ्गी शुचिस्मिता।
जहासोच्चैः स्तनतटी ऋजुयष्टिलता यथा ॥ ३६॥

मेरा कूबड़ बैठ गया, ऐसा जानकर सुन्दर एवं उन्नत अङ्गवाली कुब्जा पवित्र मुस्कानसे सुशोभित हो हँसने लगी। उसके स्तन प्रान्त उभरकर ऊँचे हो गये और वह सीधी लकड़ीपर चढ़ी हुई लताके समान शोभा पाने लगी ॥ ३६ ॥

प्रणयाच्चापि कृष्णं सा बभाषे मत्तकाशिनी।
क्व यास्यसि मया रुद्धः कान्त तिष्ठ गृहाण माम् ॥ ३७॥

फिर तो मतवाली-सी होकर वह श्रीकृष्णसे प्रेमपूर्वक बोली—'प्रियतम! अब तुम कहाँ जाओगे? मैंने तुम्हें रोक लिया, यहीं रहो और मुझे अंगीकार करो' ॥ ३७ ॥

तौ जातहासावन्योन्यं सतलाक्षेपमव्ययौ।
वीक्षमाणौ प्रहसितौ कुब्जायाः श्रुतविस्तरौ ॥ ३८ ॥

यह सुनकर उन्हें हँसी आ गयी। फिर तो वे अविनाशी बन्धु एक दूसरेकी ओर देखते हुए ताली पीट-पीटकर जोर-जोरसे हँसने लगे। कुब्जाके कानोंने उन दोनों भाइयोंके गुण विस्तारपूर्वक सुने थे ॥ ३८ ॥

कृष्णस्तु कुब्जां कामार्तां सस्मितं विससर्ज ह।
ततस्तौ कुब्जया मुक्तौ प्रविष्टौ राजसंसदम् ॥ ३९॥

श्रीकृष्णने मुस्कराते हुए कामपीड़ित कुब्जाको वहीं छोड़ दिया और उससे छूटकर वे दोनों बन्धु राज-भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ ३९ ॥

तावुभौ व्रजसंवृद्धौ गोपवेषविभूषितौ।
गूढचेष्टाननौ भूत्वा प्रविष्टौ नृपवेश्म तत् ॥ ४० ॥

व्रजमें बड़े होकर गोपवेषसे विभूषित हुए उन दोनों वीरोंने जब उस राजभवनमें प्रवेश किया, उस समय उनकी प्रत्येक चेष्टा गूप्तरूपसे होती थी। उनके मुखका भाव ही ऐसा गूढ़ था कि उससे आन्तरिक चेष्टाका पता नहीं लगता था ॥

धनुःशालां गतौ तत्र बालावपरितर्कितौ।
हिमवद्वनसम्भूतौ सिंहाविव मदोत्कटौ ॥ ४१ ॥

हिमालयके वनमें उत्पन्न हुए दो मदमत्त सिंहोंके समान वे दोनों बालक वहाँ धनुषशालामें जा पहुँचे। उस समय वहाँ उनके पहुँचनेकी सम्भावना किसीको नहीं थी ॥ ४१ ॥

दिदृक्षन्तौ महत्तत्र धनुरार्योगभूषितम्।
पप्रच्छतुश्च तौ वीरावायुधागारिकं तदा ॥ ४२ ॥

वे वहाँ रखे हुए विशाल धनुषको, जो पुष्पमालासे विभूषित था, देखना चाहते थे; अतः उन दोनों वीरोंने उस समय शस्त्रागारके संरक्षकसे पूछा— ॥ ४२ ॥

भोः कंसधनुषां पाल श्रूयतामावयोर्र्वचः।
कतरत् तद् धनुः सौम्य महोऽयं यस्य वर्तते ॥ ४३ ॥
आयोगभूतं कंसस्य दर्शयस्व यदीच्छसि।

'राजा कंसके धनुषोंकी रक्षा करनेवाले अस्त्र-संरक्षक ! तुम हम दोनोंकी बातें सुनो। सौम्य ! जिसका यह उत्सव होने जा रहा है, वह धनुष कौन-सा है? यदि तुम्हारी इच्छा हो तो कंसके इस उत्सवका जो प्रधान निमित्त है, उस धनुषका हमें दर्शन कराओ' ॥ ४३½ ॥

स तयोर्दर्शयामास तद् धनुः स्तम्भसंनिभम् ॥ ४४ ॥
अनारोप्यमसम्भेद्यं देवैरपि सवासवैः।

उसने उन दोनों भाइयोंको वह खम्भ-जैसा मोटा धनुष दिखा दिया। उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाना या उसे तोड़ना इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी असम्भव था ॥४४½॥

तद् गृहीत्वा तदा कृष्णस्तोलयामास वीर्यवान् ॥४५॥
दोर्भ्यां कमलपत्राक्षः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।

पराक्रमी कमलनयन श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्तसे दोनों हाथोंद्वारा उस धनुषको उठाकर तौला ॥ ४५½ ॥

तोलयित्वा यथाकामं तद् धनुर्दैत्यपूजितम् ॥ ४६ ॥
आरोपयामास बली नामयामास चासकृत्।
आनाम्यमानं कृष्णेन प्रकर्षादुरगोपमम् ॥ ४७ ॥
द्विधाभूतमभून्मध्ये धनुरार्योगभूषितम्।

दैत्योंद्वारा पूजित हुए उस धनुषको इच्छानुसार तौलकर बलवान् श्रीकृष्णने कई बार उसको झुकाया और उसके ऊपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी। श्रीकृष्णके द्वारा बहुत अधिक झुका दिये जानेके कारण वह पुष्पहारोंसे विभूषित सर्पाकार धनुष बीचसे टूटकर दो भागोंमें विभक्त हो गया ॥ ४६-४७½ ॥

भङ्क्त्वा तु तद् धनुः श्रेष्ठं कृष्णस्त्वरितविक्रमः।
निष्क्राम महावेगः स च संकर्षणो युवा ॥४८॥

उस श्रेष्ठ धनुषको तोड़कर श्रीकृष्ण तथा वे नवयुवक संकर्षण शीघ्रतापूर्वक कदम बढ़ाते हुए बड़े वेगसे उस भवनसे बाहर निकल गये ॥ ४८ ॥

धनुषो भङ्गनादेन वायुनिर्घोषकारिणा।
चचाचान्तःपुरं सर्वं दिशश्चैव पुपूरिरे ॥ ४९ ॥

उस धनुषके टूटनेसे जो धड़ाका हुआ, वह सहसा उठी हुई प्रचण्ड आँधीके समान गम्भीर घोष करनेवाला था। उससे सारा अन्तःपुर काँप उठा और सम्पूर्ण दिशाओंमें वह आवाज गूँज उठी ॥ ४९ ॥

निर्गम्य त्वायुधागाराज्जग्मतुर्गोपसंनिधौ।
वेगेनायुधपालस्तु गच्छन् सम्भ्रान्तमानसः ॥ ५० ॥
समीपं नृपतेर्गत्वा काकोच्छ्वासोऽभ्यभाषत।

विष्णुपर्व ] १ सप्तविंशोऽध्यायः ३०५ शस्त्रागारात्से निकलकर दोनों भाई ब्रजसे आये हुए गोपों- 'उस बालकने उस विशाल धनुषको लोहयन्त्रकी भाँति के निकट चले गये। इधर आयुधोंकी रक्षा करनेवाला वह बलात् हाथमें लेकर वेगपूर्वक उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और सिपाही मन-ही-मन घबरा उठा और बड़े वेगसे राजदरवारकी खेल-खेलमें ही उसे झुकाना आरम्भ किया॥ ५६॥ ओर चल दिया। राजाके निकट जाकर कौएकी तरह आकृष्यमाणं तत् तेन विव्राणं बाहुशालिना । चकित हो लम्बी साँस खींचता हुआ वह इस प्रकार मुष्टिदेशे विकूजित्वा द्विधाभूतमभज्यत ॥ ५७ ॥ बोला—॥ ५०३ ॥ 'उस बाहुशाली वीरके खींचनेपर वह बाणरहित धनुष श्रूयतां मम विज्ञाप्यमाश्चर्यं धनुषो गृहे ॥ ५१ ॥ मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे धड़ाकेके साथ टूटकर दो टूक हो निर्वृत्तमस्मिन् काले यज्जगतः सम्भ्रमोपमम् । गया ॥ ५७ ॥ 'महाराज ! मैं जो बात बताना चाहता हूँ, उसे ध्यान ततः प्रचलिता भूमिनैंव भाति च भास्करः । देकर सुनिये । इस समय धनुष-शालामें एक आश्चर्यजनक धनुषो भङ्गनादेन भ्रमतीव नभस्तलम् ॥ ५८ ॥ घटना घटित हुई है, जो सम्पूर्ण जगत्‌के प्रलयकी भाँति प्रतीत 'धनुष टूटनेकी आवाजसे धरती हिलने लगी, सूर्यकी होती है ॥ ५१३ ॥ प्रभा फीकी पड़ गयी और आकाश घूमता-सा प्रतीत नरौ कस्याप्यसदृशौ शिखाचिततमूर्द्धजौ ॥ ५२ ॥ होने लगा ॥ ५८ ॥ नीलपीताम्बरधरौ पीतश्वेतानुलेपनौ । तदद्भुतं महत् दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः । तावन्तःपुरमज्ञातौ प्रविष्टौ कामवेषिणौ ॥ ५३ ॥ भयाद् भयदशत्रुभ्यस्तदिहाख्यातुमागतः ॥ ५९ ॥ 'वहाँ दो मनुष्य आये थे, जिनकी तुलना किसीसे भी 'वह महान् अद्भुत दृश्य देखकर मैं अत्यन्त विस्मयमें नहीं हो सकती। उनके मस्तकके सभी बाल शिखा (चोटी) के पड़ गया और भयदायक शत्रुओंकी ओरसे भय प्राप्त होनेकी समान बड़े-बड़े थे। एकने नील वस्त्र पहन रखा था और दूसरे- आशङ्कासे आपको यह समाचार बतानेके लिये यहाँ आ ने पीला। एकके अङ्गोंमें पीला अङ्गराग था, तो दूसरेके अङ्गों- गया ॥ ५९ ॥ में श्वेत। वे दोनों इच्छानुसार वेष धारण करनेमे कुशल थे, न जानामि महाराज कौ तावमितविक्रमौ । सहसा अन्तःपुरमे घुस आये और किसीको पता न चला॥५२-५३ एकः कैलाससंकाश एकोऽञ्जनगिरिप्रभः ॥ ६० ॥ देवपुत्रोपमौ वीरौ बालाविब हुताशनौ । 'महाराज ! मैं नहीं जानता, वे दोनों अमित पराक्रमी स्थितौ धनुर्गृहे सौम्यौ सहसा खादिवागतौ । वीर कौन थे ? उनमेंसे एक तो कैलासपर्वतके समान श्वेत- मया दृष्टौ परित्यक्तं रुचिराच्छादनस्रजौ ॥ ५४ ॥ वर्णका था और दूसरा अञ्जनगिरिके समान श्याम ॥ ६० ॥ 'वे दोनों वीर देवकुमारोंके समान प्रतीत होते थे। उनकी स तु तच्चापरत्नं वै भङ्क्त्वा स्तम्भमिव द्विपः । आकृति बड़ी सौम्य थी। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, निष्पपातानिलगतिः सानुगोऽमितविक्रमः । मानो बालरूपधारी अग्नि सहसा आकाशसे आकर धनुषशाला- अगमत्तं द्विधा कृत्वा न जाने कोऽप्यसौ नृप ॥ ६१॥ में खड़े हो गये हों। उन दोनोंके वस्त्र और पुष्पहार बड़े 'हाथी बाँधनेके खम्भेकी भाँति अत्यन्त सुदृढ़ उस सुन्दर थे। मैंने उनको स्पष्टरूपसे देखा है ॥५४॥ धनुषरत्नको तोड़कर वह अमित पराक्रमी वीर अपने सहायकके तयोरेकस्तु पद्माक्षः श्यामः पीताम्बरस्रजः । साथ ही वायुके समान तीव्रगतिका आश्रय ले वहाँसे जग्राह तद् धनूरत्नं दुर्ग्राह्यं दैवतैरपि ॥ ५५ ॥ निकल गया। नरेश्वर ! न जाने वह कौन था, जो धनुषके 'उनमेंसे एककी आँखें कमलके समान सुन्दर थीं, शरीर- दो टुकड़े करके चला गया' ॥ ६१ ॥ का वर्ण श्याम था। उसके वस्त्र और हार पीले रंगके थे। जिसे श्रुत्वैव धनुषो भङ्गं कंसो विदितविस्तरः । हाथमें लेना देवताओंके लिये भी कठिन है, उसी धनुषरत्नको विसर्जयायुधपालं वै प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥ ६२ ॥ उस श्यामसुन्दर वीरने अनायास ही उठा लिया ॥ ५५ ॥ कंसको सब बातें विस्तारपूर्वक विदित थीं। उसने धनुष- तत् स बालो महच्चापं बलाद् यन्त्रमिवायसम् । भङ्गका समाचार सुनते ही शस्त्ररक्षकको विदा कर दिया और आरोपयित्वा वेगेन नामयामास लीलया ॥ ५६ ॥ स्वयं अपने उत्तम भवनमें प्रवेश किया ॥ ६२ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसधनुर्भङ्गे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसके धनुषका भङ्गविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥

३७६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

अष्टाविंशोऽध्यायः

कंसकी चिन्ता, उसका रंगशालाको देखना और उसे सुसज्जित करनेका आदेश देना, चाणूर एवं मुष्टिकको तथा कुवलयापीडके महावतको श्रीकृष्ण-बलरामके वधके लिये आज्ञा देना, महावत-से द्रुमिलके द्वारा अपनी उत्पत्तिकी कथा कहना—उसकी माताका सुयामुन पर्वतपर द्रुमिलके साथ समागम तथा उन दोनोंका परस्पर वरदान एवं शाप

वैशम्पायन उवाच

स चिन्तयित्वा धनुषो भङ्गं भोजविवर्धनः।
बभूव विमना राजा चिन्तयन् भृशदुःखितः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भोजवंशकी वृद्धि करनेवाला राजा कंस धनुषके टूटनेकी घटनापर विचार करके मन-ही-मन खिन्न हो उठा। वह ज्यों-ही-ज्यों उसका चिन्तन करता, त्यों-ही-त्यों अत्यन्त दुःखमें निमग्न होता जाता था ॥ १ ॥

कथं बालो विगतभीरवमत्य महाबलम्।
प्रेक्ष्यमाणस्तु पुरुषैर्धनुर्भङ्क्त्वा विनिर्गतः ॥ २ ॥

वह सोचने लगा, 'अहो! वह बालक कैसे निर्भय हो महाबली रक्षककी अवहेलना करके दूसरे लोगोंके देखते देखते धनुष तोड़कर निकल गया ॥ २ ॥

यस्यार्थे दारुणं कर्म कृतं लोकविगर्हितम्।
पितृष्वस्त्रात्मजान् धीरान् षडेवाहं न्यपोथयम् ॥ ३ ॥

'यह वही बालक है, जिसे मारनेके लिये मैंने लोक-निन्दित क्रूरतापूर्ण कर्म किया। अपनी चचेरी बहिनके छः वीर पुत्रोंको शिलापर दे मारा ॥ ३ ॥

दैवं पुरुषकारेण न शक्यमतिवर्तितुम्।
नारदोक्तं च वचनं नूनं मह्यमुपस्थितम् ॥ ४ ॥

'सचमुच ही पुरुषार्थसे दैवके विधानका उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता। नारदजीने मेरे लिये जो बात कही थी, वह अवश्य आकर उपस्थित हो गयी ॥ ४ ॥

एवं राजा विचिन्त्याथ निष्क्रम्य स्वगृहोत्तमात्।
प्रेक्षागारं जगामाशु मञ्चानामवलोककः ॥ ५ ॥

इस प्रकार चिन्ता करके राजा कंस अपने उत्तम भवनसे निकला और शीघ्र ही प्रेक्षागृह<sup></sup> (रङ्गशाला) मे वहाँ लगे हुए मञ्चोंका निरीक्षण करनेके लिये गया ॥ ५ ॥

स दृष्ट्वा सर्वानिर्यूहं प्रेक्षागारं नृपोत्तमः।
श्रेणीनां दृढनिर्यूहैर्मञ्चवाटैर्निरन्तरम् ॥ ६ ॥
सोत्तमागारयुक्ताभिर्बलभीभिर्विभूषितम् ।
छदीभिः सप्तषट्द्वाभिरेकस्तम्भैर्विभूषितम् ॥ ७ ॥

उस श्रेष्ठ नरेशने प्रेक्षागृहको सब प्रकारसे सम्पन्न हुआ देखा। वहाँ एकमात्र शिल्पसे जीवननिर्वाह करनेवाले शिल्पियों-ने लगातार बहुत-से मञ्चोंके बाड़े बना रखे थे। वे सब-के-सब दृढ़तापूर्वक बाँधे गये थे। उत्तमोत्तम गृहोंसे लगे हुए छज्जे भी बनाये गये थे। उन छज्जोंमें कहीं तो छः-छः खम्भे एक साथ लगे थे, जिनसे उनकी विशालता बढ़ गयी थी और कहीं-कहीं एक-एक संख्यावाले ही खम्भे लगाये गये थे। इन खम्भों, छजो और मञ्चवाटोने उस प्रेक्षागृहको विभूषित कर रखा था ॥ ६-७ ॥

सर्वतः सारनिर्यूहं स्वायतं सुप्रतिष्ठितम्।
उद्ग्राक्लिष्टसुक्लिष्टमश्वारोहणमुत्तमम् ॥ ८ ॥

वहाँ सब ओर दीवारोंमें मजबूत खूटियाँ लगी थीं। वह भवन बहुत विशाल बना था। उसकी अच्छी प्रकार प्रतिष्ठा की गयी थी। उसके भीतर मञ्चोंपर चढ़नेके लिये ऊँची असंकीर्ण (चौड़ी) तथा परस्पर सटी हुई सीढ़ियाँ बनी थीं। इससे वह रंगभवन बहुत ही उत्तम दिखायी देता था ॥

नृपासनपरिक्षिप्तं संचारपथसंकुलम्।
छन्नं तद् वेदिकाभिश्च मानुषौघभरक्षमम् ॥ ९ ॥

वहाँ राजाओंके बैठनेके लिये चारों ओर सिंहासन रखे गये थे। उस रङ्गशालामें सब ओर आने-जानेके लिये बहुत-से मार्ग थे। सारा भवन बहुसंख्यक वेदियोँसे व्याप्त था। उसमें मनुष्योंकी बहुत बड़ी भीड़को अपने भीतर सुगमतापूर्वक भर लेनेकी क्षमता थी ॥ ९ ॥

स दृष्ट्वा भूषितं रङ्गमाज्ञापयत बुद्धिमान्।
श्वः सचित्रः समाल्याश्च सपताकास्तथैव च ॥ १० ॥
सुवासिता वपुष्मन्त उपनीतोत्तरच्छदाः।
क्रियन्तां मञ्चवाटाश्च वलभ्यो वीथयस्तथा ॥ ११ ॥

बुद्धिमान् कंसने उस रङ्गभवनको सब प्रकारसे सजा हुआ देख कार्यकर्ताओंको इस प्रकार आज्ञा दी—'कल सबेरे यहाँके मञ्चवाटों, छज्जों तथा गलियोंको चित्रों, मालाओं और पताकाओंसे सजा दिया जाय; सुगन्धित जल छिड़ककर इन सबको सुवासित किया जाय, मनोहर रूप दिया जाय, मञ्चों-पर सुन्दर चाँदनी बिछा दी जाय ॥ १०-११ ॥

रङ्गवाटे करीषस्य कल्प्यन्तां राशयोऽन्यतः।
पटास्तरणशोभाश्च वलयश्चानुरूपतः ॥ १२ ॥


१. धनुर्यज्ञका उत्सव देखनेके लिये बना हुआ विशाल स्थान।

विष्णुपर्व ] अष्टविंशोऽध्यायः ३०७


स्थाप्यन्तां सुनिखाताश्च पानकुम्भा यथाक्रमम्।
उदभारसहाः सर्वे सकाञ्चनघटोत्तमाः ॥ १३ ॥
‘अखाड़ेमें गोमयचूर्णके अधिक-से-अधिक ढेर बिछा दिये जायँ। जिससे उनकी कमी न पड़े। जगह-जगह शोभाके लिये सुन्दर परदे लगा दिये जायँ। उनके अनुरूप खम्भे खड़े किये जायँ, जो भूमिमें खूब गहराई तक गड़े हों। क्रमशः पानकुम्भ स्थापित कि ये जायँ, वे सब-के-सब जलका भार सह लेनेमें समर्थ हों। उनपर जलपूर्ण सोनेके उत्तम घड़े रख दिये जायँ ॥ १२-१३ ॥

बल्यश्चोपकल्प्यन्तां कषायाश्चैव कुम्भशः।
प्राश्निकाश्च निमन्त्र्यन्तां श्रेण्यश्च सपुरोगमाः ॥ १४ ॥
‘उपहारकी वस्तुएँ भी एकत्र की जायँ, घड़ोंमें रस भर-भर कर रखे जायँ, मल्लयुद्धके नियमोंको जाननेवाले लोग निमन्त्रित किये जायँ, व्यवसायियों तथा कारीगरोंको उनके अगुओंसहित बुलाया जाय ॥ १४ ॥

आज्ञा च देया मल्लानां प्रेक्षकाणां तथैव च।
समाजे मञ्चशोभाश्च कल्प्यन्तां रूपकल्पिताः ॥ १५ ॥
‘मल्लों तथा प्रेक्षकों (युद्धमें हार-जीतके निर्णायकों) को ठीक समयसे आनेकी आज्ञा दे दी जाय। रङ्गशालामें स्थापित किये गये मञ्चोंकी शोभा बढ़ानेके लिये उन्हें अच्छी तरह सजाया जाय' ॥ १५ ॥

एवमाज्ञाप्य राजा स समाजविधिमुत्तमम्।
समाजवाटान्निष्क्रम्य विवेश स्वं निवेशनम् ॥ १६ ॥
इस प्रकार रंगशालाको अच्छी तरहसे सजानेकी उत्तम व्यवस्थाके लिये आज्ञा देकर राजा कंस वहाँसे निकला और अपने महलमें चला गया ॥ १६ ॥

आह्वानं तत्र संचक्रे तस्य मल्लद्वयस्य वै।
चाणूरस्याप्रमेयस्य मुष्टिकस्य तथैव च ॥ १७ ॥
वहाँ उसने अपने दो मल्लोंको बुलाया—एक तो अप्रतिम बलशाली चाणूर था और दूसरा मुष्टिक ॥ १७ ॥

तौ तु मल्लौ महावीर्यौ बलिनौ बाहुशालिनौ।
कंसस्याज्ञां पुरस्कृत्य हृष्टौ विविशतुस्तदा ॥ १८ ॥
अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले वे दोनों महा-पराक्रमी बलशाली मल्ल कंसकी आज्ञा शिरोधार्य करके बड़े हर्षके साथ उसके भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ १८ ॥

तौ समीपगतौ दृष्ट्वा मल्लौ जगति विश्रुतौ।
उवाच कंसो नृपतिः सोपन्यासमिदं वचः ॥ १९ ॥
उन दोनों विश्वविख्यात पहलवानोंको अपने समीप आया देख राजा कंसने यह युक्तियुक्त वचन कहा—॥१९॥

भवन्तौ मम विख्यातौ मल्लौ वीरध्वजोच्छ्रितौ।
पूजितौ च यथान्यायं सत्कारार्हौ विशेषतः ॥ २० ॥
‘तुम दोनों मेरे दरबारके विख्यात मल्ल हो और वीर-ध्वज (शौर्यसूचक सम्मान-चिह्न) प्राप्त करके मल्लोंमें उच्चतम स्थानपर प्रतिष्ठित हुए हो। तुम दोनों मेरे द्वारा विशेष सत्कार पानेके योग्य रहे हो, इसलिये मैंने सदा ही तुम्हारा यथोचित सम्मान किया है ॥ २० ॥

तन्मत्तो यदि सत्कारः स्मर्यते सुकृतानि च।
कर्तव्यं मे महत् कर्म भवद्भ्यां स्वेन तेजसा ॥ २१ ॥
‘अतः यदि तुम्हें मुझसे प्राप्त हुए सत्कारोंका स्मरण है, मेरे द्वारा किये गये उपकार और सद्व्यवहार भूले नहीं हैं तो आज तुम दोनोंको अपने तेज (बल-पराक्रम) से मेरा एक महान् कार्य सिद्ध करना होगा ॥ २१ ॥

यावेतौ मम संवृद्धौ व्रजे गोपालकावुभौ।
संकर्षणश्च कृष्णश्च बालावपि जितश्रमौ ॥ २२ ॥
‘ये जो मेरे व्रजमे पले हुए संकर्षण और कृष्ण नामक दो ग्वाले हैं, बालक होनेपर भी परिश्रमको जीत चुके हैं (कभी थकते नहीं हैं) ॥ २२ ॥

एतौ रङ्गगतौ युद्धे युध्यमानौ वनेचरौ।
निपातानन्तरं शीघ्रं हन्तव्यौ नात्र संशयः ॥ २३ ॥
‘ये दोनों वनेचर जब अखाड़ेमें उतरकर युद्धके समय तुमसे लड़ने लगें, तब तुम दोनो उन्हें नीचे गिराते ही शीघ्र मार डालना। इसमें कोई संशय नहीं मानना चाहिये ॥२३॥

बालाविमौ सुचपलावक्रियाविति सर्वथा।
नावज्ञा तत्र कर्तव्या कर्तव्यो यत्न एव हि ॥ २४ ॥
‘ये चञ्चल बालक हैं, इन्हें युद्धकी शिक्षा नहीं मिली है—सर्वथा ऐसा समझकर तुम उन दोनोंकी अवहेलना न करना। तुम्हें उन्हें मार डालनेके लिये पूरा-पूरा यत्न करना ही चाहिये ॥

ताभ्यां युधि निरस्ताभ्यां गोपाभ्यां रङ्गसंनिधौ।
आयत्यां च तदात्वे च श्रेयो मम भविष्यति ॥२५॥
‘यदि रंगस्थलके समीप युद्धमें वे दोनों गोप-बालक मार डाले जायँ तो वर्तमान और भविष्यमे भी मेरा कल्याण होगा'॥

नृपतेः स्नेहसंयुक्तैर्वचोभिर्हृष्टमानसौ।
ऊचतुर्युद्धसम्मत्तौ मल्लौ चाणूरमुष्टिकौ ॥ २६ ॥
राजा कंसके इन स्नेहयुक्त वचनोंसे उन दोनों मल्लोंके हृदयमे बड़ी प्रसन्नता हुई। युद्धके लिये सदा मतवाले रहने-वाले वे दोनों पहलवान चाणूर और मुष्टिक राजासे इस प्रकार बोले—॥ २६ ॥


१. पानीसे भरे घड़ों या माँटोंको रखनेके लिये काठकी बनी हुई चार या छह पायोंकी टेबुल-जैसी एक चीज, जिसे कुछ स्थानोंपर पल्हँडी कहते हैं। इसीका नाम पानकुम्भ है। नीलकण्ठने इसका पर्यायवाची शब्द घटोच्छ्रायिका बताया है।

An exact transcription of the Devanagari text from the image, line by line:

३०८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे यद्यावयोस्तौ प्रमुखे स्थास्येते गोपकिल्बिषौ । 'साथ ही ये जो-जो मूर्ख यादव श्रीकृष्णका भरोसा रखते हतावित्येव मन्तव्यौ प्रेतरूपौ तपस्विनौ ॥ २७ ॥ हैं, वे सब श्रीकृष्णको मारा गया देख हताश होकर विनाशके 'यदि वे दोनों गोपकुल-कलंक युद्धमें हमारे सामने खड़े गर्तमें गिर जायेंगे ॥ ३५ ॥ हो जायेंगे तो आप उन्हें मरा हुआ ही समझिये। वे कष्ट एतौ हत्वा गजेन्द्रेण मल्लैर्वा स्वयमेव वा । उठानेवाले प्रेतरूप ही हैं- ऐसा मानिये ॥ २७ ॥ पुरीं निर्यादवीं कृत्वा विचरिष्याम्यहं सुखी ॥ ३६ ॥ यद्यावां प्रतियोत्स्येते तावरिष्टपरिक्लुतौ । 'इन दोनोंको गजराज कुवलयापीड अथवा मल्लोंके द्वारा आवाभ्यां रोषयुक्ताभ्यां प्रमुखे तौ वनेचरौ ॥ २८ ॥ मरवाकर या स्वयं ही मारकर मथुरापुरीको यादवोंसे सूनी 'यदि किसी अरिष्ट-ग्रहसे ग्रस्त होकर वे दोनों हमलोगों- करके मैं सुखपूर्वक विचरूँगा ॥ ३६ ॥ से लड़ेंगे तो हम रोषमें भरकर सबके सामने उन दोनों पिता हि मे परित्यक्तो यादवानां कुलोद्वहः । वनेचरोंको अवश्य मार डालेंगे ॥ २८ ॥ शेषाश्च मे परित्यक्ता यादवाः कृष्णपक्षिणः ॥ ३७ ॥ एवं वाग्विषमुत्सृज्य तावुभौ मल्लपुङ्गवौ । 'मैंने यादवकुलका भार वहन करनेवाले अपने पिताको ही अनुज्ञातौ नरेन्द्रेण स्वे गृहे तौ प्रजग्मतुः ॥ २९ ॥ त्याग दिया । कृष्णका पक्ष लेनेवाले जो शेष यादव हैं, वे भी इस तरह वाणीरूप विषका वमन करके वे दोनों मल्ल- मेरे द्वारा परित्यक्त हो चुके हैं ॥ ३७ ॥ पुङ्गव राजा कंसकी आज्ञा ले अपने घर चले गये ॥ २९ ॥ न चाहमुग्रसेनेन जातः किल सुतार्थिना । महामात्रं ततः कंसो वभाषे हस्तिजीविनम् । मानुषेणाल्पवीर्येण यथा मामाह नारदः ॥ ३८ ॥ हस्ती कुवलयापीडः संमाजद्वारे तिष्ठतु ॥ ३० ॥ 'यथार्थ बात यह है कि पुत्रकी इच्छा रखनेवाले इस बलवान् मदलोलाक्षश्चपलः क्रोधनो नृषु । अल्पपराक्रमी मानव उग्रसेनके द्वारा मेरा जन्म नहीं हुआ दानोत्कटकटश्चण्डः प्रतिवारणरोषणः ॥ ३१ ॥ है, जैसा कि नारदजीने मुझे बताया है? ॥ ३८ ॥ स संनोदयितव्यस्ते तावुद्दिश्य वनौकसौ । महामात्र उवाच वसुदेवसुतौ वीरौ यथा स्यातां गतायुषौ ॥ ३२ ॥ त्वया चैव गजेन्द्रेण यदि तौ गोष्ठजीविनौ । कथमुक्तं नारदेन राजन् देवर्षिणा पुरा । आश्चर्यमेतत् कथितं त्वत्तः श्रुतमरिंदम ॥ ३९ ॥ भवेतां पतितौ रङ्गे पश्येयमहमुत्कटौ ॥ ३३ ॥ महावतने पूछा- राजन् ! पूर्वकालमें देवर्षि नारदने तत्पश्चात् कंसने हाथीकी परिचर्या से ही जीविका चलाने- कैसी बात बतायी थी? शत्रुदमन ! यह तो मैंने आपके मुख- वाले अपने महावतको बुलाकर कहा- 'कुवलयापीड नामक से बड़े आश्चर्यकी बात सुनी है ॥ ३९ ॥ हाथी रंगशालाके द्वारपर खड़ा रहे। वह बलवान्, मदसे चञ्चल नेत्रवाला, चपल तथा मनुष्योंके प्रति कुपित रहनेवाला कथमन्थेन जातस्त्वमुग्रसेनात् पितुर्विना । है। उसके गण्डस्थल मदकी धारासे उत्कट दिखायी देते हैं। तव मात्रा कथं राजन् कृतं कर्मेदमीदृशम् ॥ ४० ॥ वह किसी विपक्षी हाथीको देखते ही रोषसे भर जाता है यदि आपके पिता उग्रसेन नहीं हैं तो उनके बिना दूसरे- तथा स्वभावसे ही अत्यन्त क्रोधी है। वसुदेवके जो वनमें से आपका जन्म कैसे हुआ है? महाराज ! आपकी माताने रहनेवाले वीर पुत्र हैं, वे यदि द्वारपर आ जायँ तो तुम उनके यह ऐसा कुत्सित कर्म कैसे किया ? ॥ ४० ॥ ऊपर उस हाथीको हाँक देना, जिससे वहीं उनकी जीवन- अन्यापि प्राकृता नारी न कुर्याच्च जुगुप्सितम् । लीला समाप्त हो जाय। मैं चाहता हूँ कि गोष्ठमे जीनेवाले विस्तरं श्रोतुमिच्छामि ह्येतत् कौतूहलं हि मे ॥ ४१ ॥ उन दोनों मदमत्त बालकोंको तुम्हारे और गजराज कुवलया- दूसरी साधारण स्त्री भी ऐसा घृणित कार्य नहीं कर पीडके द्वारा रंगशालाके द्वारपर धराशायी किया हुआ देखूँ ॥ सकती है; फिर उन्होंने कैसे किया ? मै विस्तारपूर्वक इस ततस्तौ पतितौ दृष्ट्वा वसुदेवः सबान्धवः । प्रसङ्गको सुनना चाहता हूँ। इसे जाननेके लिये मेरे मनमे छिन्नमूलो निरालम्बः सभार्यो विनशिष्यति ॥ ३४ ॥ बड़ा कौतूहल है ॥ ४१ ॥ • उन दोनोंको पृथ्वीपर पड़ा देख वसुदेवकी तो जड़ ही कंस उवाच कट जायगी। वे पत्नी और बन्धु-बान्धवोंसहित निरालम्ब यथा कथितवान् विप्रो महर्षिनरदः प्रभुः । होकर स्वयं नष्ट हो जायेंगे ॥ ३४ ॥ तथाहं सम्प्रवक्ष्यामि यदि ते श्रवणे मतिः ॥ ४२ ॥ ये चेमे यादवा मूर्खाः सर्वे कृष्णपरायणाः । कंसने कहा महावत ! यदि तुम्हारा विचार इस विनशिष्यन्ति च्छिन्नाशा दृष्ट्वा कृष्णं निपातितम् ॥३५॥ रहस्यको सुननेका ही है तो प्रभावशाली महर्षि नारद बाबाने

[ विष्णुपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ३०९

मुझसे जैसा कहा था, उसी तरह मैं इस प्रसंगका वर्णन करूँगा ॥ ४२ ॥

आगतः शक्रसदनात् स वै शक्रसखो मुनिः ।
चन्द्रांशुशुक्लवसनो जटामण्डलमुद्वहन् ॥ ४३ ॥

वे मुनि नारद देवराज इन्द्रके सखा हैं। एक दिन चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत वस्त्र पहने और सिरपर जटा-मण्डलका भार धारण किये वे इन्द्रभवनसे मेरे यहाँ आये ॥

कृष्णाजिनोत्तरीयेण रुक्मयज्ञोपवीतवान् ।
दण्डी कमण्डलुधरः प्रजापतिरिवापरः ॥ ४४ ॥

उनके कंधेपर काले मृगचर्मकी चादर पड़ी थी। वे सुवर्णमय यज्ञोपवीतसे विभूषित थे और दण्ड-कमण्डलु धारण किये दूसरे प्रजापतिके समान जान पड़ते थे ॥ ४४ ॥

गाता चतुर्णां वेदानां विद्वान् गान्धर्ववेदवित् ।
स नारदोऽथ देवर्षिर्ब्रह्मलोकचरोऽव्ययः ॥ ४५ ॥

नारदजी वेदोंके विद्वान् तो है ही, गान्धर्ववेद (संगीत-विद्या) के भी पूर्ण पण्डित हैं, अतः चारो वेदोंका गान किया करते हैं। ब्रह्मलोकमे विचरनेवाले वे अविनाशी देवर्षि नारद ही मेरे यहाँ पधारे थे ॥ ४५ ॥

तमागतमृषिं दृष्ट्वा पूजयित्वा यथाविधि ।
पाद्यार्घ्यमासनं दत्त्वा सम्प्रवेश्योपवेश्य ह ॥ ४६ ॥

अपने यहाँ आये हुए उन महर्षिको देखकर मैने पाद्य-अर्घ्य और आसन समर्पित करके उनकी विधिपूर्वक पूजा की और महलके भीतर ले जाकर उन्हे बिठाया ॥ ४६ ॥

सुखोपविष्टोऽथ मुनिः पृष्ट्वा च कुशलं मम ।
उवाच च प्रीतमना देवर्षिर्भावितात्मवान् ॥ ४७ ॥

जब सुखपूर्वक बैठ गये, तब मुझसे कुशल-प्रश्न करनेके अनन्तर प्रसन्नचित्त हुए उन शुद्ध अन्तःकरणवाले देवर्षिने इस प्रकार कहा ॥ ४७ ॥

नारद उवाच
पूजितोऽहं त्वया वीर विधिवद्दृष्टेन कर्मणा ।
इदमेकं मम वचः श्रूयतां प्रतिगृह्यताम् ॥ ४८ ॥

नारदजी बोले— वीर ! तुमने शास्त्रीय विधिके अनुसार मेरा पूजन किया है; अतः मेरी यह एक बात सुनो और इसे ग्रहण करो ॥ ४८ ॥

गतोऽहं देवसदनं सौवर्णं मेरुपर्वतम् ।
सोऽहं कदाचिद् देवानां समाजे मेरुमूर्धनि ॥ ४९ ॥

सुवर्णमय मेरुपर्वत देवताओंका निवास-स्थान है। उस पर्वतके शिखरपर एक दिन देवताओका समाज जुटा हुआ था। उसीमें मैं भी गया था ॥ ४९ ॥

तत्र मन्त्रयतामेवं देवतानां मया श्रुतः ।
भवतः सानुगस्यैव वधोपायः सुदारुणः ॥ ५० ॥

वहाँ देवतालोग, अनुचरोंसहित तुम्हारे वधके अत्यन्त दारुण उपायपर विचार कर रहे थे। वहीं उनके मुखसे यह बात मैंने सुनी थी ॥ ५० ॥

तत्र यो देवकीगर्भो विष्णुर्लोकनमस्कृतः ।
योऽस्या गर्भोऽष्टमः कंस स ते मृत्युर्भविष्यति ॥ ५१ ॥

कंस ! इस देवकीका जो आठवाँ गर्भ है, उसमें विश्ववन्दित भगवान् विष्णु निवास करेंगे; अतः वह गर्भ तुम्हारी मृत्युका कारण होगा ॥ ५१ ॥

देवानां स तु सर्वस्वं त्रिदिवस्य गतिश्च सः ।
परं रहस्यं देवानां स ते मृत्युर्भविष्यति ॥ ५२ ॥

वे विष्णु ही देवताओंके सर्वस्व हैं। स्वर्गलोकके आश्रय हैं तथा देवगणोंके परम रहस्य है। वे ही तुम्हारी मृत्युमें कारण होंगे ॥ ५२ ॥

यत्नश्च क्रियतां कंस गर्भाणां पातनं प्रति ।
नावज्ञा रिपवे कार्या दुर्बले स्वजनेऽपि वा ॥ ५३ ॥

कंस ! तुम देवकीके गर्भोको मार गिरानेके लिये यत्न करो। शत्रु दुर्बल अथवा स्वजन हो तो भी उसके प्रति उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ॥ ५३ ॥

न चायमुग्रसेनः स पिता तव महाबलः ।
द्रुमिलो नाम तेजस्वी सौभस्य पतिरूर्जितः ॥ ५४ ॥

ये उग्रसेन तुम्हारे पिता नहीं हैं। सौभ विमानका स्वामी ओज और तेजसे सम्पन्न महाबली द्रुमिल तुम्हारा पिता है ॥

श्रुत्वाहं तद् वचस्तस्य किंचिद् रोषसमन्वितः ।
भूयोऽपृच्छं कथं ब्रह्मन् द्रुमिलो नाम दानवः ॥ ५५ ॥
मम मात्रा कथं तस्य ब्रूहि विप्र समागमः ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन ॥ ५६ ॥

नारदजीकी यह बात सुनकर मुझे कुछ रोष आ गया। मैने पुनः पूछा—'ब्रह्मन् ! द्रुमिल नामक दानव किस तरह मेरा पिता हुआ ? तपोधन विप्र ! बताइये, मेरी माताके साथ उसका समागम कैसे हुआ ? मैं यह सब विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ' ॥ ५५-५६ ॥

नारद उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु राजन् यथार्थतः ।
द्रुमिलस्य च मात्रा ते संवादं च समागमम् ॥ ५७ ॥

नारदजीने कहा—राजन् ! बहुत अच्छा, द्रुमिलका तुम्हारी माताके साथ जो संवाद और समागम हुआ था, वह सब मैं तुम्हें यथार्थ रूपसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ५७ ॥

सुयामुनं नाम नगं तव माता रजस्वला ।
प्रेक्षितुं सहिता स्त्रीभिर्गता वै सा कुतूहलात् ॥ ५८ ॥

एक समयकी बात है, तुम्हारी माता जब रजस्वला

३१० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

(होनेके पश्चात् स्नान कर चुकी) थी, कौतूहलवश दूसरी स्त्रियोंके साथ सुयामुन नामक पर्वतका दर्शन करनेके लिये गयी ॥ ५८ ॥

सा तत्र रमणीयेषु रुचिरद्रुमसानुषु ।
चचार नगशृङ्गेषु कन्दरेषु नदीषु च ॥ ५९ ॥
वह वहाँ पर्वतके रमणीय शिखरोंपर, जो मनोहर वृक्षोंसे सुशोभित थे, विचरने लगी। उसने वहाँकी कन्दराओंमें तथा नदियोंके तटोंपर भी भ्रमण किया ॥ ५९ ॥

किन्नरोद्गीतमधुराः प्रतिश्रुत्यभिनादिताः ।
शृण्वती कामजननीर्वाचः श्रोत्रसुखावहाः ॥ ६० ॥
वहाँ उसे कानोंको सुख देनेवाली कुछ ऐसी बातें सुननेको मिलीं, जो कामोद्दीपन करनेवाली थीं। वे बातें किन्नरोंके गाये हुए गीतोंके रूपमें उपलब्ध होनेके कारण बड़ी मधुर प्रतीत होती थीं और प्रतिध्वनिसे सब ओर गूँजती रहती थीं ॥ ६० ॥

वर्हिणां चैव विरुतं खगानां च विकूजितम् ।
अभीक्ष्णमभिशृण्वती स्त्रीधर्ममभिरोचयत् ॥ ६१ ॥
मयूरोंकी मधुर केकाध्वनि तथा विहंगमोंके कलरवोंको निरन्तर सुनती हुई तुम्हारी माताके मनमें स्त्रीधर्म (पुरुष-सहवास) की रुचि जाग्रत् हो उठी ॥ ६१ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वायुर्वनराजीविनिःसृतः ।
हृद्यः कुसुमगन्धाढ्यो ववौ मन्मथबोधनः ॥ ६२ ॥
इसी बीचमें वनश्रेणियोंसे निकलकर फूलोंकी सुगन्धसे भरी हुई मनोरम वायु चलने लगी, जो कामभावको जगानेवाली थी ॥ ६२ ॥

द्विरेफाभरणाश्चैव कदम्बा वायुघट्टिताः ।
मुमुचुर्गन्धमधिकं संततासारमूर्च्छिताः ॥ ६३ ॥
खिले हुए कदम्बोंपर भ्रमर छाये हुए थे, जो उनके आभूषणसे जान पड़ते थे। वायुके झोंके खाकर और निरन्तर गिरती हुई जलधाराओंसे मूर्च्छित-से होकर वे कदम्ब अधिकाधिक गन्ध छोड़ने लगे ॥ ६३ ॥

केसराः पुष्पवर्षैश्च ववृषुर्मदबोधनाः ।
नीपा दीपा इवाभान्ति पुष्पकण्टकधारिणः ॥ ६४ ॥
मदोन्मादको जगानेवाले नागकेसर अपने फूलोंकी वर्षा कर रहे थे। पुष्पमय कण्टक धारण करनेवाले नीप दीपके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ६४ ॥

मही नवतृणच्छन्ना शक्रगोपविभूषिता ।
यौवनस्थेव वनिता स्वं दधारार्तवं वपुः ॥ ६५ ॥
नयी-नयी घासोंसे ढकी और वीरबहूटीसे विभूषित हुई वसुधा नवयुवती नारीके समान मानो रजस्वला-रूप धारण किये हुए थी ॥ ६५ ॥

अथ सौभपतिः श्रीमान् द्रुमिलो नाम दानवः ।
भविष्यद्दैवयोगेन विधात्रा तत्र नीयते ॥ ६६ ॥
ऐसे समयमें सौभविमानका अधिपति द्रुमिल नामक दीप्तिमान् दानव भावी दैवयोगसे विधाताद्वारा प्रेरित होकर वहाँ आ पहुँचा ॥ ६६ ॥

कामगेन रथेनाशु तरुणादित्यवर्चसा ।
यदृच्छया गतस्तत्र सुयामुनदिदृक्षया ॥ ६७ ॥
इच्छानुसार चलनेवाला उसका विमान प्रभातकालके सूर्यकी भाँति तेजःपुञ्जसे प्रकाशित हो रहा था। उसके द्वारा वह वहाँ सुयामुन पर्वतकी शोभा देखनेकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक सहसा आ गया ॥ ६७ ॥

विहायसा कामगमो मनसोऽप्याशुगामिना ।
स तं प्राप्य पर्वतेन्द्रमवतीर्य रथोत्तमात् ॥ ६८ ॥
मनसे भी तीव्र गतिवाले उस विमानद्वारा आकाशमार्गसे इच्छानुसार चलनेवाला वह दानव पर्वतराज सुयामुनपर आकर उस श्रेष्ठ रथसे नीचे उतरा ॥ ६८ ॥

पर्वतोपवने न्यस्य रथं पररथारुजम् ।
अथासौ सूतसहितश्चचार नगमूर्धनि ॥ ६९ ॥
शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेवाले उस रथ (विमान) को उस पर्वतके उपवनमें खड़ा करके वह विमानचालकके साथ पर्वत-शिखरपर विचरण करने लगा ॥ ६९ ॥

ततो बहून्यपश्येतां काननानि वनानि च ।
सर्वर्तुगुणसम्पन्नं नन्दनस्येव काननम् ॥ ७० ॥
उन दोनोंने वहाँ बहुत-से वन और कानन देखे। वहाँकी वनस्थली नन्दनवनके समान सभी ऋतुओंके गुणोंसे सम्पन्न थी ॥ ७० ॥

चेरतुर्नगशृङ्गेषु कन्दरेषु नदीषु च ।
नानाधातुपिनद्धैश्च शृङ्गैर्र्बहुभिरुच्छ्रितैः ॥ ७१ ॥
नानारत्नविचित्रैश्च काञ्चनाञ्जनराजतान् ।
नानाकुसुमगन्धाढ्यान् नानासत्त्वगणैर्युतान् ॥ ७२ ॥
नानाद्विजगणैर्घुष्टान् नानापुष्पफलद्रुमान् ।
नानौषधिसमायुक्तान्नृपसिद्धानुसेवितान् ॥ ७३ ॥
वे दोनों उस पर्वतके शिखरोंपर, कन्दराओंमें और नदियोंके किनारे-किनारे घूमने लगे। उस पर्वतके बहुत-से ऊँचे-ऊँचे शिखर नाना प्रकारकी धातुओंसे आवृत्त थे। भाँति-भाँतिके रत्नोंसे उनकी विचित्र शोभा हो रही थी। उन दोनोंने देखा, पर्वतके विभिन्न शिखर सुवर्णमय, रजतमय तथा अञ्जनमय दिखायी दे रहे हैं। नाना प्रकारके फूलोंकी सुगन्ध वहाँ व्याप्त हो रही है। भाँति-भाँतिके जीव-जन्तुओंके समुदाय वहाँ निवास करते हैं। अनेक प्रकारके पक्षी अपने कलरवोंसे उन शिखरोंको कोलाहलपूर्ण कर रहे हैं। भाँति-भाँतिके पुष्प

विष्णुपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ३११

और फलोंसे सम्पन्न वृक्ष वहाँ लहलहा रहे हैं। नाना प्रकारकी ओषधियोंसे संयुक्त उन शिखरोंपर ऋषि और सिद्ध पुरुष निवास करते हैं ॥ ७१-७३ ॥

विद्याधरान् किम्पुरुषानृक्षवानरराक्षसान्। सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च महिषाञ्छरभाञ्छशान् ॥ सूमरांश्चमरान् न्यङ्कन् मातङ्गान् यक्षराक्षसान्। एवं बहुविधान् पश्यंश्चरमाणो नगोत्तमम् ॥ ७६ ॥

विद्याधर, किन्नर, रीछ, वानर, राक्षस, सिंह, व्याघ्र, वराह, भैंसे, शरभ, खरगोश, सूमर (मृगविशेष), चमर (चँवरी गाय), न्यङ्कु (बारहसिंगा), हाथी, यक्ष, निशाचर तथा ऐसे ही नाना प्रकारकी जातिके प्राणियोंको देखता हुआ वह दानव उस उत्तम पर्वतपर भ्रमण कर रहा था ॥ ७४-७५ ॥

दूराद् ददर्श नृपतिदेवीं देवसुतोपमाम्। क्रीडमानां सखीभिश्च पुष्पं चैव विचिन्वतीम् ॥ ७६ ॥

इसी समय उस दानवराजने दूरसे ही उग्रसेनकी रानीको देखा, जो सखियोंके साथ क्रीडा करती तथा फूल चुनती हुई देवकन्याके समान सुशोभित हो रही थी ॥ ७६ ॥

ततश्चरन्तीं सुश्रोणीं सखीभिः सह संवृताम्। दृष्ट्वा सौभपतिर्दूराद् विस्मयन् सूतमब्रवीत् ॥ ७७ ॥

सखियोंसे घिरी हुई उस सुन्दर कटिप्रदेशवाली रमणीको दूरसे ही वहाँ विचरती देख सौभ विमानका स्वामी द्रुमिल चकित हो उठा और अपने विमानचालकसे इस प्रकार बोला— ॥ ७७ ॥

कस्येयं मृगशावाक्षी वनान्तरविचारिणी। रूपौदार्यगुणोपेता मन्मथस्य रतिर्यथा ॥ ७८ ॥

'सूत ! इस वनके भीतर विचरनेवाली यह मृगनयनी बाला किसकी स्त्री है, जो रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न होकर कामपत्नी रतिके समान शोभा पा रही है ॥ ७८ ॥

शचीव पुरुहूतस्य उताहो वा तिलोत्तमा। नारायणोरुं निर्भिद्य सम्भूता वरवर्णिनी। ऐलस्य दयिता देवी योषिद्रत्नं किमुर्वशी ॥ ७९ ॥

'अहो ! क्या यह देवराज इन्द्रकी पत्नी शची है या तिलोत्तमा है अथवा जो भगवान् नारायणके ऊरुका भेदन करके प्रकट हुई और पुरूरवाकी प्यारी महारानी बनी थी, वह सुन्दर कान्तिवाली रमणीरत्न उर्वशी है ? ॥ ७९ ॥

क्षीरार्णवे मथ्यमाने सुरासुरगणैः सह। मन्थानं मन्दरं कृत्वामृतार्थमिति नः श्रुतम् ॥ ८० ॥ ततोऽमृतात् समुत्तस्थौ देवी श्रीर्लोकभाविनी। नारायणाङ्कललिता किं श्रीरेषा वराङ्गना ॥ ८१ ॥

'हमने सुना है—देवताओंने असुरोंके साथ मिलकर अमृतकी प्राप्तिके लिये मन्दराचलको मेथानी बनाकर जब क्षीरसागरका मन्थन किया था, उस समय उसके अमृतमय दुग्धसे लोकभाविनी लक्ष्मी देवीका प्रादुर्भाव हुआ था, जो भगवान् नारायणके अङ्कमें सुशोभित होती हैं, यह सुन्दरी अङ्गना वही लक्ष्मी देवी तो नहीं है ॥ ८०-८१ ॥

नीलमेघान्तरगता द्योतयन्त्यचिरप्रभा। तथा योषिद्गणान् मध्ये रूपं प्रद्योतयद् वनम् ॥ ८२ ॥

'जैसे थोड़ी-थोड़ी देरमें चमकनेवाली बिजली नील मेघके भीतर रहकर अपना प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार यह स्त्रियोंके बीचमें रहकर अपने रूप और वनको प्रकाशित करती हुई यहाँ विचर रही है ॥ ८२ ॥

अतीव सुकुमाराङ्गी सुप्रभेन्दुनिभानना। दृष्ट्वा रूपमनिन्दाङ्ग्या विभ्रान्तो व्याकुलेन्द्रियः ॥ ८३ ॥

'इसके अङ्ग बड़े ही सुकुमार हैं, मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर कान्तिसे उद्भासित हो रहा है। इस निर्दोष अङ्गोंवाली रमणीका रूप देखकर मैं पागल हो गया हूँ। मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठी हैं ॥ ८३ ॥

कामस्य वशमापन्नो मनो विह्वलतीव मे। भृशं कृन्तति मेऽङ्गानि सायकैः कुसुमायुधः। भित्त्वा हृदि शरान् पञ्च निर्दयं हन्ति मे मनः ॥ ८४ ॥

'मैं कामके अधीन हो गया हूँ। मेरा मन विह्वल-सा हो रहा है। पुष्पधन्वा कामदेव अपने सायकोंसे मेरे अङ्गोंको बड़े वेगसे छिन्न-भिन्न कर रहा है। मेरे हृदयमें अपने पाँचों बाणोंका प्रहार करके वह बड़ी निर्दयताके साथ उसे विदीर्ण कर रहा है ॥ ८४ ॥

हृदयाग्निर्वर्धयति आज्यसिक्त इवानलः। कथमद्य भवेत् कार्यं शमार्थं मन्मथाग्निना ॥ ८५ ॥ केनोपायेन किं कुर्मो भजेन्मां मत्तगामिनी।

'मेरे हृदयके भीतर कामाग्नि बढ़ रही है। वह घीकी आहुति पाकर बढ़ी हुई आगके समान प्रज्वलित हो उठी है। इस कामाग्निसे शान्ति पानेके लिये इस समय कैसे कौन-सा यत्न किया जाय ? अहो ! किस उपायसे हम क्या करें, जिससे यह मतवाली चालसे चलनेवाली रमणी मुझे अङ्गीकार कर ले' ॥ ८५ ॥

एवं बहु चिन्तयानो नोपलभ्य च दानवः ॥ ८६ ॥ सूतमाह मुहूर्त्तं तु तिष्ठस्व त्वमिहानघ। अहं यास्यामि तां द्रष्टुं कस्येयमिति योषितम् ॥ ८७ ॥

इस प्रकार बहुत सोचनेपर भी जब कोई उपाय नहीं सूझा, तब उस दानवने अपने सारथिसे कहा—'अनघ ! तुम दो घड़ी यहीं ठहरो, मैं स्वयं ही उसे देखने तथा यह किसकी स्त्री है, इस बातका पता लगानेके लिये जाता हूँ ॥ ८६-८७ ॥

प्रतीक्षमाणस्तिष्ठस्व यावदागमनं मम। श्रुत्वा तु वचनं तस्य तथास्त्विति वचोऽब्रवीत् ॥ ८८ ॥

३१२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'जबतक मैं लौटकर न आऊँ, तबतक तुम यहीं मेरी प्रतीक्षा करते हुए खड़े रहो।' द्रुमिलकी यह बात सुनकर उसके सारथिने कहा, 'बहुत अच्छा ! ऐसा ही होगा'॥ ८८॥

एवमुक्त्वा दानवेन्द्रो गमनाय मनो दधे।
वार्युपस्पृश्य बलवान् ध्यानमेवान्वचिन्तयत् ॥ ८९ ॥

सारथिसे उपर्युक्त बात कहकर बलवान् दानवराज द्रुमिल-ने उसके पास जानेका विचार किया। फिर उसने जलसे आचमन किया और ध्यान लगाकर उसके विषयमें चिन्तन करने लगा ॥

मुहूर्तं ध्यानमात्रेण दृष्टं ज्ञानबलात् ततः।
उग्रसेनस्य पत्नीति ज्ञात्वा हर्षमुपागतः ॥ ९० ॥

दो घड़ीतक ध्यान करनेमात्रसे उसने ज्ञानबलसे देख लिया कि यह राजा उग्रसेनकी पत्नी है। यह जानकर उसे बड़ा हर्ष हुआ ॥ ९० ॥

उग्रसेनस्य रूपं वै कृत्वा स्वं परिवर्त्य सः।
उपासर्पन्महाबाहुः प्रहसन् दानवेश्वरः ॥ ९१ ॥
स्वयमानम्रय शनकैर्जग्राहामितवीर्यवान् ।
उग्रसेनस्य रूपेण मातरं ते व्यधर्षयत् ॥ ९२ ॥

फिर तो उसने अपना रूप बदलकर उग्रसेनका रूप धारण कर लिया। तत्पश्चात् वह अमितपराक्रमी महाबाहु दानवराज हँसता हुआ उसके पास गया, फिर धीरे-धीरे मुसकराते हुए ही उसने उसे अपनी भुजाओंमें कस लिया। इस प्रकार उग्रसेनके ही रूपसे उसने तुम्हारी माताका सतीत्व भङ्ग किया ॥ ९१-९२ ॥

सा पतिस्निग्धहृदया तं भावेनोपसर्पती।
शङ्किता चाभवत् पश्चात् तस्य गौरवदर्शनात् ॥ ९३ ॥

पतिके प्रति हृदयमें अत्यन्त स्नेह रखनेके कारण वह देवी बड़े प्रेमसे उसकी सेवामें उपस्थित हुई। पीछे उसके शरीरके भारीपनका अनुभव करके वह शङ्कित हो उठी ॥

सा तमाहोत्थिता भीता न त्वं मम पतिर्ध्रुवम् ।
कस्य त्वं विकृताचारो येनास्मि मलिनीकृता ॥ ९४ ॥

उठकर भयभीत हो उसने उससे कहा—'निश्चय ही तू मेरा पति नहीं है; अतः बता, तू किसका दुराचारी पुत्र है, जिसने मुझे कलङ्कित कर दिया ? ॥ ९४ ॥

एकभर्तृव्रतमिदं मम संदूषितं त्वया।
पत्युर्मे रूपमास्थाय नीच नीचेन कर्मणा ॥ ९५ ॥

'नीच ! तूने मेरे पतिका रूप धारण करके अपने नीच कर्मसे मेरे पातिव्रत्यको दूषित कर दिया ॥ ९५ ॥

किं मां वक्ष्यन्ति रुषिता बान्धवाः कुलपांसनीम् ।
जुगुप्सिता च वत्स्यामि पतिपक्षैर्निराकृता ॥ ९६ ॥

'अब रोषमें भरे हुए मेरे बन्धु-बान्धव मुझ कुल-कलङ्किनीको क्या कहेंगे ? मुझे पतिपक्षके लोगोंसे निन्दित और तिरस्कृत होकर रहना पड़ेगा ॥ ९६ ॥

धिक्त्वामीदृशमक्षान्तं दुष्कुलं व्युत्थितेन्द्रियम् ।
अविश्वास्यमनार्यं च परदाराभिमर्शनम् ॥ ९७॥

'तू ऐसा असहनशील, दूषित कुलमें उत्पन्न, अजितेन्द्रिय, अविश्वसनीय, अनार्य तथा परस्त्रीको कलङ्कित करनेवाला है, तुझे धिक्कार है' ॥ ९७ ॥

स तामाह प्रसञ्जन्तीं क्षिप्तः क्रोधेन दानवः।
अहं वै द्रुमिलो नाम सौभस्य पतिरूर्जितः ॥ ९८ ॥
किं मां क्षिपसि रोषेण मूढे पण्डितमानिनि ।
मानुषं पतिमाश्रित्य नीचं मृत्युवशे स्थितम् ॥ ९९ ॥

जब इस प्रकार धिक्कार देती हुई वह उससे उलझ पड़ी, तब उसके आक्षेप सुनकर उस दानवने क्रोधपूर्वक कहा—'मूढ़ नारी ! तू अपनेको बड़ी विदुषी मानती है ? अरी ! मैं सौभ विमानका अधिपति ओजस्वी दानव द्रुमिल हूँ, तू मृत्युके वशमें रहनेवाले तुच्छ मानव पतिका आश्रय लेकर रोषपूर्वक मेरे ऊपर आक्षेप क्यों करती है ? ॥ ९८-९९ ॥

व्यभिचारान्न दुष्यन्ति स्त्रियः श्रीमानगर्विते ।
न ह्यासां नियता बुद्धिर्मानुषीणां विशेषतः ॥१००॥

'स्त्रीके सम्मानपर गर्व करनेवाली नारी ! (देवताओं और दानवोंके साथ) विवशतापूर्वक व्यभिचार घटित होनेसे स्त्रियाँ दूषित नहीं होती हैं। इन स्त्रियोंकी विशेषतः मानवी स्त्रियोंकी बुद्धि निश्चल नहीं होती ॥ १०० ॥

श्रूयन्ते हि स्त्रियो बह्व्यो व्यभिचारव्यतिक्रमैः।
प्रसूता देवसंकाशान् पुत्रान् निश्चलविक्रमान् ॥१०१॥

'सुननेमें आता है कि बहुतेरी स्त्रियाँ व्यभिचाररूप दोष बन जानेपर भी अविचल पराक्रमी देवोपम पुत्रोंकी जननी हुई हैं ॥ १०१ ॥

अतीव हि त्वं स्त्रीलोके पतिधर्मवती सती।
शुद्धा केशान् विधुन्वन्ती भाषसे यद्यदिच्छसि ॥१०२॥

'स्त्री-जगत्में एक तू ही तो बड़ी पतिधर्म-परायणा और दूधकी धोयी हुई शुद्ध सती है, जो अपने केश-कलापोंको कम्पित करती हुई जो-जो चाहती है, बकती चली जा रही है ॥१०२॥

कस्य त्वमिति यच्चाहं त्वयोक्तो मत्तकाशिनि ।
कंसस्तस्माद् रिपुध्वंसी तव पुत्रो भविष्यति ॥१०३॥

'मतवाली स्त्री ! तुमने जो मुझसे यह पूछा है कि—'कस्य त्वम्—तू किसका पुत्र है' इससे तुम्हें कंस नामक शत्रुनाशक पुत्र प्राप्त होगा' ॥ १०३ ॥

सा सरोषा पुनर्भूत्वा निन्दन्ती तस्य तं वरम्।
उवाच व्यथिता देवी दानवं धृष्टवादिनम् ॥ १०४॥

विष्णुपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः [ ३१३


यह सुनकर वह देवी पुनः रोषमें भरकर उसके उस वरकी निन्दा करने लगी और ढिठाईके साथ बात करनेवाले उस दानवसे व्यथित होकर बोली—॥ १०४॥

धिक् ते वृत्तं सुदुर्वृत्त यः सर्वा निन्दसि स्त्रियः।
सन्ति स्त्रियो नीचवृत्ताः सन्ति चैव पतिव्रताः ॥१०५॥

'दुराचारी दानव ! तेरे इस घृणित आचारको धिक्कार है, जो तू संसारकी सारी स्त्रियोंकी निन्दा कर रहा है। माना कि जगत्में नीच आचार-विचारवाली स्त्रियाँ भी हैं, परंतु पतिव्रताएँ भी कम नहीं हैं ॥ १०५ ॥

यास्त्वेकपत्न्यः श्रूयन्तेऽरुन्धतीप्रमुखाः स्त्रियः।
धृता याभिः प्रजाः सर्वा लोकाश्चैव कुलाधम ॥१०६॥

'कुलाधम ! अरुन्धती आदि जो पतिव्रता स्त्रियाँ सुनी जाती हैं, उनका स्मरण कर ! जिन्होंने समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण लोकोंको अपने सतीत्वके बलसे ही धारण किया है ॥ १०६ ॥

यस्त्वया मम पुत्रो वै दत्तो वृत्तविनाशनः।
न मे बहुमतस्त्वेवं शृणु चापि यदुच्यते ॥१०७॥

'तूने जो मुझे सदाचारनाशक पुत्र प्रदान किया है, इसके प्रति मेरे मनमे अधिक आदर नहीं है। इस विषयमें मैं जो कुछ कहती हूँ, उसे सुन ले ॥ १०७ ॥

उत्पत्स्यति पुमान् नीच पतिवंशे ममाद्य यः।
भविष्यति स ते मृत्युर्र्यश्च दत्तस्त्वया सुतः ॥१०८॥

'नीच ! अद्य मेरे पतिके कुलमें परमपुरुष परमेश्वर अवतार लेंगे, जो तेरी तथा तूने जो पुत्र दिया है, उसकी भी मृत्युके कारण होगे' ॥ १०८ ॥

द्रुमिलस्त्वेवमुक्तस्तु जगामाकाशमेव तु।
तेनैव रथमुख्येन दिव्येनाप्रतिगामिना ॥१०९॥

उसके ऐसा कहनेपर द्रुमिल उसी अनुपम गतिवाले दिव्य विमानद्वारा पुनः आकाशको ही चला गया ॥ १०९ ॥

जगाम च पुरीं दीना माता तदहरेव ते।
मामेवमुक्त्वा भगवान् नारदो मुनिसत्तमः ॥११०॥
दीप्यमानस्तपोवीर्यात् साक्षादग्निरिव ज्वलन्।
वल्लकीं वाद्यमानो हि सप्तस्वरविमूर्च्छिताम् ॥१११॥
गायनो लक्ष्यवीथीं स जगाम ब्रह्मणोऽन्तिकम्।

तुम्हारी माता अत्यन्त दीन होकर उसी दिन मथुरापुरीको चली गयीं ! महावत ! मुझसे इस प्रकार कहकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारद अपने तपोबलसे प्रकाशित तथा साक्षात् अग्निके समान देदीप्यमान हो, सात स्वरोंकी मूर्च्छनाका विस्तार करनेवाली वीणा बजाते और गाते हुए लक्ष्यवीथी (अथवा अलक्ष्यवीथी) देवयान मार्गसे ब्रह्माजीके पास चले गये ॥ ११०-१११½ ॥

शृणुष्वेदं महामात्र निबोध वचनं मम ॥११२॥
तथ्यं चोक्तं नारदेन त्रैलोक्यज्ञेन धीमता।

महावत ! मेरी वह बात सुनो और समझो। तीनों लोकोंकी बातें जाननेवाले बुद्धिमान् नारदने सब कुछ ठीक ही कहा था ॥ ११२½ ॥

अलं बलेन वीर्येण नयेन विनयेन च ॥११३॥
प्रमाणैर्वापि वीर्येण तेजसा विक्रमेण च।
सत्येन चैव दानेन नान्योऽस्ति सदृशः पुमान् ॥११४॥

अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता—बल, वीर्य, नय, विनय, प्रमाण, शक्ति, तेज, पराक्रम, सत्य और दानके द्वारा मेरी समानता करनेवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है॥११३-११४॥

विदित्वा सर्वमात्मानं वचनं श्रद्दधाम्यहम्।
क्षेत्रजोऽहं सुतस्तस्य उग्रसेनस्य हस्तिप ॥११५॥

महावत ! अपनेको सर्वथा इन गुणोंसे युक्त समझकर मै नारदजीकी बातपर श्रद्धा करता हूँ, इसमें संदेह नहीं कि मैं उग्रसेनका क्षेत्रज पुत्र ही हूँ ॥ ११५ ॥

मातापितृभ्यां संत्यक्तः स्थापितः स्वेन तेजसा।
उभाभ्यामपि विद्विष्टो बान्धवैश्च विशेषतः ॥११६॥

माता-पिताने तो मुझे त्याग ही दिया है। मैं अपने तेजसे ही इस सिंहासनपर बैठा हूँ। मेरे माता-पिता तथा विशेषतः सभी बन्धु-बान्धव मुझसे द्वेष रखते हैं ॥ ११६ ॥

एतानपि हनिष्यामि यादवान् कृष्णपक्षिणः।
तदिमौ घातयित्वा तु हस्तिना गोपकिल्बिषौ ॥११७॥

ये सभी यादव श्रीकृष्णके पक्षमें मिल गये हैं, अतः मैं इन दोनों गोपकुलकलंकोंको हाथीके द्वारा मरवाकर इन यादवोंका भी वध कर डालूँगा ॥ ११७ ॥

तद् गच्छ गजमारुह्य सांकुशप्रासतोमरः।
स्थिरो भव महामात्र समाजद्वारि मा चिरम् ॥११८॥

अतः महावत ! तुम जाओ ! कुवलयापीड़ हाथीपर आरूढ़ हो अंकुश, भाला और तोमर लिये रङ्गशालाके द्वारपर दृढ़तापूर्वक डट जाओ, विलम्ब न करो ॥ ११८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसवाक्येऽष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसका वाक्यविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥

३१४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

एकोनत्रिंशोऽध्यायः

नागरिकॉसे भरी रङ्गशालामें मञ्चों तथा प्रेक्षागृहोंकी शोभा, कंस तथा मल्लोंका आगमन, श्रीकृष्ण और बलरामका रङ्गद्वारपर पदार्पण, कुवलयापीड, महावत तथा हाथीके पादरक्षकोंका वध और दोनों बन्धुओंका रङ्गस्थलमें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन्नहनि निर्वृत्ते द्वितीये समुपस्थिते।
आपूर्यत महारङ्गः पौरैर्युद्धदिदृक्षुभिः॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! वह दिन समाप्त होकर जब दूसरा उपस्थित हुआ, तब युद्ध देखनेकी इच्छावाले पुरवासियोंसे वह महान् रङ्गस्थल भर गया॥ १ ॥

सचित्राष्टास्रिचरणाः सार्गलद्वारवेदिकाः।
सगवाक्षार्धचन्द्राश्च सुतल्पोत्तमभूषिताः॥ २ ॥

वहाँ जो मञ्च रखे गये थे, वे चित्रोंसे सुशोभित तथा आठ कोणवाले पायोंसे अलंकृत थे। जिन घरोंमें वे मञ्च थे, उनके द्वारोंपर वेदियाँ बनी थीं और कुण्डीके साथ किवाड़ें भी थीं। उनमें झरोखोंके रूपमें अर्धचन्द्राकार छिद्र रखे गये थे। वे मञ्च और मञ्चागार उत्तमोत्तम बिछौनोंसे विभूषित थे॥ २ ॥

प्राङ्मुखैश्चारुनिर्मुक्तैर्माल्यदामावतंसितैः।
अलंकृतैर्विराजद्भिः शारदैरिव तोयदः॥ ३ ॥
मञ्चागारैः सुनिर्यक्तैर्योद्धाय सुविभूषितैः।
समाजवाटः शुशुभे समेघौघ इवार्णवः॥ ४ ॥

उन मञ्चागारोंके द्वार पूर्वाभिमुख थे। वे सब-के-सब सुन्दर और खुले हुए थे (अथवा उनमें झीने सूतके मनोहर परदे लगे थे)। फूलोंकी मालाओं तथा मोती आदिकी लड़ियोंसे उन सबको सजाया गया था। वे शोभासम्पन्न एवं अलंकृत मञ्चागार शरद्-ऋतुके बादलोंके समान शोभा पाते थे। उनमें सुन्दर मल्ल आदि यथास्थान बैठे थे, जिन्हें युद्धके लिये भलीभाँति विभूषित किया गया था। उन सबके द्वारा वह समाजवाट या रङ्गस्थल मेघोंकी घटासे युक्त महासागरके समान शोभा पा रहा था॥ ३-४ ॥

स्वकर्मद्रव्ययुक्ताभिः पताकाभिर्निरन्तरम्।
श्रेणीनां च गणानां च मञ्चा भान्त्यचलोपमाः॥ ५ ॥

वहाँ एक ही शिल्पसे जीवननिर्वाह करनेवाले श्रेणी नामक कारीगरों तथा एक जातिके समुदायोंके लिये पृथक्-पृथक् मञ्च थे। उन मञ्चोंपर जो पताकाएँ निरन्तर फहराती रहती थीं, उनमें उन कारीगरोंके उपकरण-द्रव्यके चिह्न अङ्कित थे। उन पताकाओंसे वे मञ्च पर्वतोंके समान शोभा पाते थे॥ ५ ॥

अन्तःपुरचराणां च प्रेक्षागाराण्यनेकशः।
रेजुः काञ्चनचित्राणि रत्नज्वालाकुलानि च॥ ६ ॥

अन्तःपुरकी स्त्रियोंके लिये अनेक प्रेक्षागार सुशोभित हो रहे थे, जो सुवर्णसे चित्रित तथा रत्नोंकी प्रभासे व्याप्त थे॥ ६ ॥

तानि रत्नौघक्लृप्तानि ससानुप्रग्रहाणि च।
रेजुर्जवनिकाक्षेपैः सपक्षा इव खे नगाः॥ ७ ॥

रत्नराशिसे निर्मित उन प्रेक्षागारोंके ऊपरी भागमें पताकाएँ फहरा रही थीं और उनके निचले भागमें परदे पड़े हुए थे। इससे वे आकाशमें पंखयुक्त पर्वतके समान शोभा पाते थे॥ ७ ॥

तत्र चामरहारैश्च भूषणानां च सिञ्जितैः।
मणीनां च विचित्राणां विचित्राश्चेरुरर्चिषः॥ ८ ॥

उन प्रेक्षागारोंमें चामरों, हारों, झनकारते हुए भूषणों तथा विचित्र मणियोंकी चित्र-विचित्र प्रभाएँ सब ओर फैल रही थीं॥ ८ ॥

गणिकानां पृथङ्मञ्चाः शुभैरास्तरणाम्बरैः।
शोभिता वारमुख्याभिर्विमानप्रतिमौजसः॥ ९ ॥

गणिकाओंके लिये पृथक् मञ्च बने थे, जो सुन्दर बिछौनों और वस्त्रोंसे ढके हुए थे। वे सब-के-सब विमानके समान कान्तिमान् दिखायी देते थे और मुख्य-मुख्य वाराङ्गनाएँ उनकी शोभा बढ़ाती थीं॥ ९ ॥

तत्रासनानि ख्यातानि पर्यङ्काश्च हिरण्मयाः।
प्रकीर्णाश्च कुथाश्चित्राः सपुष्पस्तवकैर्वृताः॥ १० ॥

वहाँ विख्यात आसन, सोनेके पलंग तथा बिछे हुए विचित्र एवं पुष्पगुच्छोंसे युक्त कालीन सुशोभित थे॥ १० ॥

सौवर्णाः पानकुम्भाश्च पानभूम्यश्च शोभिताः।
फलावदंशपूर्णाश्च चाङ्गेर्यः पानयोजिताः॥ ११ ॥

वहाँ सोनेके घड़ोंमें पीनेके लिये जल रखे गये थे। जलपानके जो स्थान थे, उन्हें भी शोभासे सम्पन्न किया गया था। वहाँ फलके टुकड़ोंसे भरी हुई चँगेरियाँ (टोकरियाँ) रखी गयी थीं, जिन्हें जलपान या कलेवेके उपयोगके लिये वहाँ स्थापित किया गया था॥ ११ ॥

अन्ये च मञ्चा बहवः काष्ठसंचयबन्धनाः।
रेजुः प्रस्तरणास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः॥ १२ ॥

विष्णुपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः ३१५ और भी बहुत-से मञ्च थे, जो लकड़ियोंके ढेरसे आवद्ध थे। उनपर भी अच्छे बिछावन डाले गये थे। इस तरहके सैकड़ों-हजारों मञ्च वहाँ शोभा पा रहे थे ॥१२॥ उत्तमागारिकाश्चैव सूक्ष्मजालावलोकिनः । स्त्रीणां प्रेक्षागृहा भान्ति राजहंसा इवाम्बरे ॥ १३ ॥ घरोंके ऊपर जो घर थे, उनमें स्त्रियोंके लिये प्रेक्षागृह बने थे। उनके दरवाजोंपर महीन जालीदार परदा पड़ा था, जिससे वहाँ बैठे हुए लोग बाहरकी सारी वस्तुएँ देख सकते थे। वे प्रेक्षाभवन आकाशमें राजहंसोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १३ ॥ प्राङ्मुखश्चारुनिर्मुको मेरुशृङ्गसमप्रभः । रुक्मपत्रनिभस्तम्भश्चित्रनिर्यूहशोभितः ॥ १४ ॥ प्रेक्षागारः स कंसस्य प्रचकाशेऽधिकं श्रिया । शोभितो माल्यदामैश्च निवासकृतलक्षणः ॥ १५ ॥ कंसके लिये जो प्रेक्षागार (दृश्य देखनेका स्थान ) बना था, वह अधिक शोभासे प्रकाशित हो रहा था। उसका दरवाजा पूर्वकी ओर था। उसपर मनोहर जालीदार पर्दा पड़ा था। वह भवन मेरुपर्वतके शिखरके समान सुनहरी प्रभासे उद्भासित होता था। उसके खम्भे स्वर्णपत्रसे जटिल होनेके कारण विशेष शोभासे सम्पन्न थे तथा वह भवन चारु चित्रोंके संनिवेशसे सुशोभित था। मालाओंकी लड़ियोंसे भी उसे सजाया गया था। राजाकी बैठक या निवास-स्थानके लिये जो आवश्यक लक्षण होने चाहिये, उन सबसे वह सम्पन्न था ॥ १४-१५ ॥ तस्मिन् नानाजनाकीर्णे जनौघप्रतिनादिते । समाजवाटे संस्तब्धे कम्पमानाणर्वप्रभे ॥ १६ ॥ राजा कुवलयापीडः समाजद्वारि कुञ्जरः । तिष्ठत्विति समाज्ञाप्य प्रेक्षागारमुपाययौ ॥ १७ ॥ नाना प्रकारके मनुष्योंसे भरा-पूरा और जनसमुदायके शब्दोंसे प्रतिध्वनित होता हुआ वह समाजवाट या रङ्गस्थल चञ्चल लहरोंवाले विक्षुब्ध महासागरके समान प्रतीत होता था। थोड़ी ही देरमें वहाँ सन्नाटा छा गया और 'कुवलया- पीड नामक हाथी रङ्गशालाके द्वारपर खड़ा रहे'—यह आज्ञा देता हुआ राजा कंस अपने प्रेक्षागारमें आ पहुँचा ॥१६-१७॥ स शुक्ले वाससी बिभ्रच्छुक्लव्यजनचामरः । शुशुभे श्वेतमुकुटः श्वेताभ्र इव चन्द्रमाः ॥ १८ ॥ उसने दो श्वेत वस्त्र धारण कर रखे थे। उसपर श्वेत चँवर और व्यजन डुलाये जा रहे थे तथा उसके मस्तकपर श्वेत मुकुट प्रकाशित होता था, अतः वह श्वेत बादलोंसे युक्त चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ १८ ॥ तस्य सिंहासनस्थस्य सुखासीनस्य धीमतः । रूपमप्रतिमं दृष्ट्वा पौराः प्रोचुर्जयाशिषः ॥ १९ ॥ जब वह सिंहासनपर सुखपूर्वक विराजमान हुआ, उस समय उस बुद्धिमान् नरेशके अनुपम रूपको देखकर समस्त पुरवासी उसकी 'जय' बोलते हुए उसे आशीर्वाद देने लगे ॥ ततः प्रविविशुर्मल्ला रङ्गमावलिताम्बराः । तिस्रश्च भागशः कक्षाः प्राविशन् बलशालिनः ॥ २० ॥ तदनन्तर मल्लोंने रङ्गभूमिमें प्रवेश किया। उनके कपड़े फहरा रहे थे। वे बलशाली मल्ल अलग-अलग तीन कक्षाओं- में प्रविष्ट हुए ॥ २० ॥ ततस्तूर्यनिनादेन क्ष्वेदितास्फोटितेन च । वसुदेवसुतौ दृष्टौ रङ्गद्वारमुपस्थितौ ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् वाद्योंकी तुमुल ध्वनिके साथ मल्लोंके गर्जने और ताल ठोंकनेके शब्द सुनायी देने लगे। इसी समय हर्षमें भरे हुए दोनों वसुदेव-पुत्र रङ्गशालाके द्वारपर उपस्थित हुए ॥ २१ ॥ बल्लवौ वस्त्रसंवीतौ सुरचन्दनभूषितौ । ऊर्ध्वपीडौ स्रगापीडौ बाहुशस्त्रकृतौ यमौ ॥ २२ ॥ आस्फोटयन्तावन्योन्यं बाहू चैवार्गलोपमौ । वे दोनों बन्धु ग्वालवालोंके ही वेषमें थे। उनके अङ्ग सुन्दर वस्त्रोंसे आच्छादित एवं सुशोभित थे। वे दिव्य चन्दन (अङ्गराग) से विभूषित थे। सिरके ऊपर पुष्पमाला और गलेमें गजरे शोभा दे रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाओंको ही आयुध बना रखा था। वे दोनों जुड़वें-से जान पड़ते थे और एक दूसरेकी अर्गलाके समान मोटी बाँहोंपर ताल ठोंक रहे थे ॥ २२ ॥ तावापतन्तौ त्वरितौ प्रतिषिद्धौ वराननौ । तेन मत्तेन नागेन चोद्यमानेन वै भृशम् ॥ २३ ॥ वे दोनों सुन्दर मुखवाले वीर बड़ी उतावलीके साथ रङ्गशालाकी ओर आ रहे थे, किंतु महावतके द्वारा अत्यन्त प्रेरित किये गये उस मतवाले गजराजने उन्हें सहसा रोक दिया ॥ २३ ॥ स मत्तहस्ती दुष्टात्मा कृत्वा कुण्डलिनं करम् । चकार चोदितो यत्नं निहन्तुं बलकेशवौ ॥ २४ ॥ वह मदमत्त हाथी बड़ा ही दुष्ट था। महावतके हाँकने- पर उसने अपनी सूँड़को सिकोड़कर श्रीकृष्ण और बलरामको मार डालनेका प्रयत्न किया ॥ २४ ॥ ततः प्रहसितः कृष्णस्त्रास्यमानो गजेन वै । कंसस्य तन्मतं चैव जगर्हे स दुरात्मनः ॥ २५ ॥ उस हाथीके त्रास देनेपर श्रीकृष्ण हँस पड़े और दुरात्मा कंसके उस मनसूबेकी निन्दा करने लगे ॥ २५ ॥

३१६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

त्वरते खलु कंसोऽयं गन्तुं वैवस्वतक्षयम्।
यो मामनेन नागेन प्रधर्षयितुमिच्छति ॥ २६ ॥

वे बोले—'निश्चय ही जान पड़ता है कि यह कंस यमलोक-में जानेके लिये उतावला हो उठा है, इसीलिये इस हाथीके द्वारा वह मुझे कुचल देना चाहता है' ॥ २६ ॥

संनिकृष्टे ततो नागे गर्जमाने यथा घने।
सहसोत्पत्य गोविन्दश्चक्रे तालस्वनं प्रभुः ॥ २७ ॥

तदनन्तर मेघके समान गम्भीर गर्जना करता हुआ वह हाथी जब बहुत निकट आ गया, तब भगवान् गोविन्द सहसा उछलकर ताली पीटने लगे ॥ २७ ॥

क्ष्वेडितास्फोटितरवं कृत्वा नागस्य चाग्रतः।
करं ससीकरं तस्य प्रतिजग्राह वक्षसा ॥ २८ ॥

हाथीके सामने ही गर्जने और ताल ठोंकनेकी आवाज करके उन्होंने जलके फुहारे छोड़नेवाली उसकी सूँड़को अपनी छातीपर दबा लिया ॥ २८ ॥

विषाणान्तरगो भूत्वा पुनश्चरणमध्यगः।
बबाधे तं गजं कृष्णः पवनस्तोयदं यथा ॥ २९ ॥

फिर श्रीकृष्ण उसके दोनों दाँतोंके बीचसे होकर पैरोंके मध्यभागमें आ गये और जैसे हवा बादलोंको इधर-उधर उड़ाती रहती है, उसी प्रकार वे उस हाथीको सताने और व्याकुल करने लगे ॥ २९ ॥

स हस्ताग्राद् विनिष्क्रान्तो विषाणाग्राच्च दन्तिनः।
विमुक्तः पदमध्याच्च कृष्णो द्विपमपोधयत् ॥३०॥

वे उस हाथीकी सूँड़के अग्रभागसे निकलकर, दाँतोंके भी अग्रभागसे बचकर तथा पैरोंके भी बीचसे छूटकर बाहर आ गये। फिर श्रीकृष्णने उस हाथीको पीछेसे ऊँचाईकी ओर खींचकर घसीटना आरम्भ किया ॥ ३० ॥

सोऽतिकायस्तु संमूढो हन्तुं कृष्णमशक्नुवन् ।
गजः स्वेष्वेव गात्रेषु मथ्यमानो ररास ह ॥३१॥

वह विशालकाय हाथी व्याकुल हो उठा और श्रीकृष्णको मारनेमें असफल हो अपने ही अङ्गोंमें मथित होता हुआ जोर-जोरसे चिग्घाड़ने लगा ॥ ३१ ॥

पपात भूमौ जानुभ्यां दशनाभ्यां तुतोद च।
मदं सुस्राव रोषाच्च घर्मापाये यथा घनः ॥ ३२ ॥

फिर तो वह दोनों घुटनोंके बल गिर पड़ा, दोनों दाँत भूमिसे टकरा जड़से हिल गये, जिससे उसको बड़ी व्यथा हुई। वह रोषसे मदकी धारा बहाने लगा, मानो पावसमें मेघ पानी बरसा रहा हो ॥ ३२ ॥

कृष्णस्तु तेन नागेन क्रीडित्वा शिशुलीलया।
निधनाय मतिं चक्रे कंसद्विष्टेन चेतसा ॥ ३३ ॥

श्रीकृष्णने उस हाथीके साथ बालकोंके समान खिलवाड़ करके कंसके प्रति मनमें द्वेष लेकर कुवलयापीडको मार डालने का विचार किया ॥ ३३ ॥

स तस्य प्रमुखे पादं कृत्वा कुम्भादनन्तरम्।
दोर्भ्यां विषाणमुत्पाट्य तेनैव प्राहरत् तदा ॥ ३४ ॥

उन्होंने उसके ललाटमें कुम्भस्थलसे नीचे पैर लगाकर दोनों हाथोंसे एक दाँत उखाड़ लिया और उस समय उसीसे उसको पीटना आरम्भ किया ॥ ३४ ॥

स तेन वज्रकल्पेन स्वेन दन्तेन कुञ्जरः।
हन्यमानः शकृन्मूत्रं सुमोचार्तो ररास ह ॥ ३५॥

उस वज्रतुल्य दाँतसे पीटा जाता हुआ वह हाथी मल-मूत्र त्यागने और आर्तभावसे चीत्कार करने लगा ॥ ३५ ॥

कृष्णजर्जरिताङ्गस्य कुञ्जरस्यार्तचेतसः।
कटाभ्यामति सुस्राव वेगवद् भूरि शोणितम् ॥ ३६ ॥

श्रीकृष्णने जिसके अङ्गोंको पीट-पीटकर जर्जर बना दिया था, उस आर्तचित्त हाथीके दोनों गालोंसे वेगपूर्वक भूरि-भूरि रक्तकी धारा बहने लगी ॥ ३६ ॥

लाङ्गूलं चास्य वेगेन निष्प्रकर्ष हलायुधः।
शैलपृष्ठार्धसंलीने वैनतेय इवोरगम् ॥ ३७ ॥

इधर बलरामजी उसकी पूँछ पकड़कर बड़े वेगसे खींचने लगे, मानो शिलापृष्ठमें आधे शरीरसे छिपे हुए किसी सर्पको गरुड़ खींच रहे हों ॥ ३७ ॥

तेनैव गजदन्तेन कृष्णो हत्वा तु दन्तिनम्।
जघानैकप्रहारेण गजारोहणमुल्बणम् ॥ ३८ ॥

हाथीको मारकर श्रीकृष्णने उसके उसी दाँतसे एक प्रहार करके मतवाले महावतको भी मौतके मुखमें डाल दिया ॥ ३८ ॥

सोऽऽर्तनादं महत् कृत्वा विदन्तो दन्तिनां वरः।
पपात सहमामात्रो वज्रभिन्न इवाचलः ॥ ३९ ॥

तदनन्तर दाँतवाले हाथियोंमें श्रेष्ठ वह कुवलयापीड दन्तहीन हो महान् आर्तनाद करके वज्रसे विदीर्ण हुए पर्वतके समान महावतसहित गिर पड़ा ॥ ३९ ॥

ततस्तौ तोरणाङ्गानि प्रगृह्य रणकर्कशौ।
गजस्य पादरक्षांश्च जघ्नतुः पुरुषर्षभौ ॥ ४० ॥

फिर उन दोनों पुरुषप्रवर रणकर्कश वीरोंने फाटकके खम्भे आदि लेकर हाथीके पादरक्षकोंको भी मार डाला ॥४०॥

तांश्च हत्वा विविशतुर्मध्यं रङ्गस्य तावुभौ।
नासत्यावश्विनौ स्वर्गादवतीर्णाविवેચ્છया ॥ ४१ ॥

उन सबका संहार करके वे दोनों भाई रङ्गस्थलमें प्रविष्ट हुए, मानो दोनों अश्विनीकुमार इच्छानुसार स्वर्गसे भूतलपर उतर आये हों ॥ ४१ ॥