भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
३७८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आर्तस्तनितसंनादे रुधिराम्बुह्रदाकुले।
अन्तकाक्रीडसदृशे नागदेहैः समावृते॥ ४९॥
आर्त प्राणियोंकी चीख—पुकारका शब्द सब ओर फैला हुआ था। रक्तके कितने ही कुण्ड बन गये थे। हाथियोंकी लाशोंसे ढकी हुई वह युद्धस्थली कालकी क्रीडाभूमिके समान प्रतीत होती थी॥ ४९॥

अपास्तैर्बाहुभिर्योधैस्तुरगैश्च विदारितैः।
कङ्कैश्च वलगृध्रैश्च नादितैः प्रतिनादिते॥ ५०॥
कहीं योद्धाओंकी बाँहें कटकर गिरी थीं। कहीं बहुत-से योद्धा ही मरे पड़े थे और कहीं विदीर्ण हुए घोड़ोंकी लाशें बिछी हुई थीं। बड़े-बड़े बगुलों, कौओं और गीधोंकी बोलियोंसे वह समराङ्गण गूँज रहा था॥ ५०॥

निपाते पृथिवीशानां मृत्युसाधारणे रणे।
कृष्णः शत्रुवधं कर्तुं चचारान्तकदर्शनः॥ ५१॥
जहाँ बड़े-बड़े भूमिपाल धराशायी हो रहे थे और मृत्यु एक साधारण-सी बात हो गयी थी, उस रणभूमिमें कालके समान दिखायी देनेवाले श्रीकृष्ण शत्रुओंका वध करनेके लिये विचर रहे थे॥ ५१॥

युगान्तार्कप्रभं चक्रं कालीं चैवायसीं गदाम्।
गृह्य सैन्यावनिगतो बभाषे केशवो नृपान्॥ ५२॥
प्रलयकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाले चक्र और लोहेकी बनी हुई काली गदाको हाथमें लेकर भगवान् श्रीकृष्ण सेनाके मध्यकी भूमिमें खड़े हो राजाओंसे इस प्रकार बोले—॥

किन्न युद्ध्यत वै शूरा हस्त्यश्वरथसंयुताः।
किमिदं गम्यते शूराः कृतास्त्रा दृढनिश्चयाः।
अहं सपूर्वजः संख्ये पदातिः प्रमुखे स्थितः॥ ५३॥
'हाथी, घोड़े और रथोंसे युक्त शूरवीरो! अब युद्ध क्यों नहीं करते हो? अस्त्रोंके विद्वान् तथा युद्धका दृढ़ निश्चय रखनेवाले वीरो! क्यों इस प्रकार पलायन करते हो? मैं तो युद्धमें अपने बड़े भाईके साथ तुम्हारे सामने पैदल ही खड़ा हूँ॥ ५३॥

अदृष्टदोषेण रणे भवन्तो येन पालिताः।
स इदानीं जरासंधः किमर्थं नाभिवर्तते॥ ५४॥
'युद्धमें जिसने दोष नहीं देखा है तथा जिसके द्वारा तुम लोग पालित हुए हो, वह जरासंध अब हमारे सामने क्यों नहीं आ रहा है?'॥ ५४॥

एवमुक्ते तु नृपतिर्दरदो नाम वीर्यवान्।
रामं हलाग्रोग्रभुजं प्रत्ययात् सैन्यमध्यगम्॥ ५५॥
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पराक्रमी राजा दरद सेनाके मध्यमें खड़े हुए तथा हलके अग्रभागसे उग्र भुजावाले बलरामके सामने आया॥ ५५॥

बभाषे स तु ताम्राक्षमुक्षाणमिव सेचनी।
एहोहि राम युध्यस्व मया सार्द्धमरिंदम॥ ५६॥
जैसे किसान बैलसे बात करता है, उसी प्रकार उसने लाल नेत्रोंवाले बलरामजीसे इस प्रकार कहा—'शत्रुदमन राम! आओ, आओ। मेरे साथ युद्ध करो'॥ ५६॥

तद् युद्धमभवत् ताभ्यां रामस्य दरदस्य च।
मृधे लोकवरिष्ठाभ्यां कुञ्जराभ्यामिवौजसा॥ ५७॥
बलराम और दरद—दोनों जगत्के श्रेष्ठ वीर थे। युद्धस्थलमें उन दोनोंका बलपूर्वक संग्राम होने लगा, मानो दो हाथी आपसमें लड़ रहे हों॥ ५७॥

योजयित्वा ततः स्कन्धे रामो दरदमाहवे।
हलेन बलिनां श्रेष्ठो मुसलेनावपोथयत्॥ ५८॥
तब बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामने युद्धस्थलमें दरदके कंधेसे हल फँसाकर उसे मुसलसे मार डाला॥ ५८॥

स्वकायगतमूर्धा वै मुसलेनावपोथितः।
पपात दरदो भूमौ दारिताद्रि रिवाचलः॥ ५९॥
मुसलसे मारे गये दरदका मस्तक उसके शरीरमें ही घुस गया और वह विदीर्ण हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ५९॥

रामेण निहते तस्मिन् दरदे राजसत्तमे।
जरासंधस्य राज्ञस्तु रामेणासीत् समागमः॥ ६०॥
महेन्द्रस्येव वृत्रेण दारुणो लोमहर्षणः।
राजाओंमें श्रेष्ठ दरदके बलरामद्वारा मारे जानेपर राजा जरासंधका उनके साथ अत्यन्त भयंकर एवं रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा। मानो देवराज इन्द्रका वृत्रासुरके साथ संग्राम हो रहा हो॥ ६०१/२॥

गदे गृहीत्वा विक्रान्तावन्योन्यमभिधावतः॥ ६१॥
कम्पयन्तौ भुवं वीरौ तावुद्यतमहागदौ।
ददृशाते महात्मानौ गिरी सशिखराविव॥ ६२॥
वे दोनों पराक्रमी वीर गदाएं हाथमें लेकर पृथ्वीको कम्पित करते हुए एक दूसरेकी ओर दौड़े। दो विशाल गदाएँ उठाये हुए वे दोनों महामनस्वी योद्धा शिखरोंसे युक्त दो पर्वतोंके समान दिखायी देते थे॥ ६१-६२॥

व्युपरमन्त युद्धानि प्रेक्ष्य तौ पुरुषर्षभौ।
संरम्भाविव धावन्तौ गदायुद्धेषु विश्रुतौ॥ ६३॥
उन दोनों पुरुषप्रवर वीरोंको युद्ध करते देख दूसरोंके युद्ध बंद हो गये। गदायुद्धोंमें विख्यात जरासंध और बलराम रोषावेशमें भरे हुए-से एक दूसरेपर धावा करते थे॥ ६३॥

तावुभौ परमाचार्यौ लोके ख्यातौ महाबलौ।
मत्ताविव महानागावन्योन्यं समधावताम्॥ ६४॥

विष्णुपर्व ] त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ३७९

वे दोनों महाबली वीर संसारमें गदायुद्धके उत्तम आचार्य कहे जाते थे। वे दो मदमत्त विशालकाय हाथियोंके समान परस्पर आक्रमण करते थे ॥ ६४ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । यक्षाश्चाप्सरसश्चैव समाजग्मुः सहस्रशः ॥ ६५ ॥

उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध, महर्षि, यक्ष तथा सहस्रों अप्सराएँ वह युद्ध देखनेके लिये आ गयीं ॥ ६५ ॥

तद्देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलंकृतम् । शुशुभेऽभ्यधिकं राजन् नभो ज्योतिर्गणैरिव ॥ ६६ ॥

राजन् ! देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों और महर्षियोंसे अलंकृत हुआ वहाँका आकाश नक्षत्रोंसे आवृत्त हुआ-सा अधिक शोभा पाने लगा ॥ ६६ ॥

अभिदुद्राव रामं तु जरासंधो नराधिपः । सव्यं मण्डलमाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम् ॥ ६७ ॥

राजा जरासंध बायीं ओरसे पैंतरा देकर बलरामजीपर टूट पड़ा और बलदेवजीने दाहिनी ओरसे उसपर धावा किया ॥ ६७ ॥

तावन्योन्यं प्रजह्राते गदायुद्धविशारदौ । दन्ताभ्यामिव मातङ्गौ नादयन्तौ दिशो दश ॥ ६८ ॥

गदायुद्धमें निपुण वे दोनों वीर एक दूसरेपर प्रहार करने लगे। जैसे दो मतवाले हाथी अपने दाँतोंसे परस्पर चोट करते हों, उसी प्रकार गदाओंसे आघात करते हुए वे दसों दिशाओंको निनादित करने लगे ॥ ६८ ॥

गदानिपातो रामस्य शुश्रुवेऽशनिनिःस्वनः । जरासंधस्य च रणे पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ ६९ ॥

रणभूमिमें बलरामजीकी गदाके आघातका शब्द वज्रपातके समान सुनायी पड़ता था तथा जरासंधके गदाघातकी ध्वनि फटते हुए पहाड़के समान प्रतीत होती थी ॥ ६९ ॥

न स्म कम्पयते रामं जरासंधकरच्युता । गदा गदाभृतां श्रेष्ठं विन्ध्यं गिरिमिवानिलः ॥ ७० ॥

जरासंधके हाथसे छूटी हुई गदा गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीको उसी प्रकार कम्पित नहीं कर पाती थी, जैसे वायु विन्ध्यगिरिको नहीं हिला सकती है ॥ ७० ॥

रामस्य तु गदावेगं राजा स मगधेश्वरः । सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोथयत् ॥ ७१ ॥

बलरामजीकी गदाका वेग मगधराज जरासंध बड़े धैर्यसे सहन करता और शिक्षा-कौशलसे उसको विफल भी कर देता था ॥ ७१ ॥

ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुखरा लोकसाक्षिणी । "न त्वया राम वध्योऽयमलं खेदेन मानद ॥७२॥ विहितोऽस्य मया मृत्युस्तस्मात् साधु व्युपरम । अचिरेणैव कालेन प्राणांस्त्यक्ष्यति मागधः ॥७३॥"

उस समय आकाशमें सब लोगोंके समक्ष सुस्पष्ट स्वरमें दैवी वाणी सुनायी दी—'दूसरोंको मान देनेवाले बलराम ! जरासंधका वध तुम्हारे हाथोंसे होनेवाला नहीं है, अतः खेद न करो। इसकी मृत्युका विधान मेरे द्वारा बना दिया गया है, अतः तुम इस युद्धसे विरत हो जाओ। थोड़े ही समयमें मगधराजको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा' ॥७२-७३॥

जरासंधस्तु तच्छ्रुत्वा विमनाः समपद्यत । न प्राहरत् ततस्तस्मै पुनरेव हलायुधः । तौ व्युपरमतां युद्धाद् वृष्णयस्ते च पार्थिवाः ॥ ७४ ॥ दीर्घकालं महाराज निजघ्नुरितरेतरम् । पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ । विविक्तमभवत् सैन्यं परावृत्तमहारथम् ॥ ७५ ॥

वह आकाशवाणी सुनकर जरासंधका मन उदास हो गया। तदनन्तर बलरामने उसपर पुनः प्रहार नहीं किया। वे दोनों वीर युद्धसे विरत हो गये। महाराज ! इसके पहले ये वृष्णिवंशी योद्धा और वे राजा लोग दीर्घकालतक एक दूसरेपर प्रहार करते रहे। जब राजा जरासंध पराजित होकर पलायन करने लगा, तब उसकी सारी सेना खाली हो गयी। उसके विशाल रथ पीछेकी ओर लौट गये ॥७४-७५॥

ते नृपाश्वोदितैर्नागैः स्यन्दनैस्तुरगैस्तथा । दुद्रुवुर्भीतमनसो व्याघ्राघ्राता मृगा इव ॥ ७६ ॥

वे राजा व्याघ्रके सूंघे हुए मृगोंके समान मन-ही-मन बहुत डरे हुए थे, अतः अपने हाथी, घोड़े और रथोंको हाँकते हुए रणभूमिसे भाग चले ॥ ७६ ॥

तन्नरेन्द्रैः परित्यक्तं भग्नदर्पैर्महारथैः । घोरं क्रव्यादबहुलं रौद्रमायोधनं वभौ ॥ ७७ ॥

जिनका घमंड चूर-चूर हो गया था, उन महारथी नरेशोंद्वारा परित्यक्त हुए उस घोर युद्धस्थलमें अधिकतर मांसभक्षी जीव-जन्तु ही रह गये थे। इससे वह बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ७७ ॥

द्रवत्सु रथमुख्येषु चेदिराजो महाद्युतिः । स्मृत्वा यादवसम्बन्धं कृष्णमेवान्ववर्तत ॥ ७८ ॥

जब मुख्य-मुख्य रथी भाग चले, तब महातेजस्वी चेदिराज दमघोषने यादवोंके साथ अपने सम्बन्धको स्मरण करके श्रीकृष्णका ही अनुसरण किया ॥ ७८ ॥

वृतः कारूषसैन्येन चेदिसैन्येन चानघ । सम्बन्धकामो गोविन्दमिदमाह स चेदिराट् ॥ ७९ ॥

निष्पाप जनमेजय ! करूष और चेदिदेशकी सेनासे घिरे हुए चेदिराज श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध बढ़ानेकी इच्छासे उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ७९ ॥

३८० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

अहं पितृष्वसुर्भर्ता तव यादवनन्दन । सबलस्त्वामुपावृत्तस्त्वं हि मे दयितः प्रभो ॥ ८० ॥

‘यादवनन्दन ! मैं तुम्हारी बूआका पति हूँ और सेना-सहित तुम्हारे पास आया हूँ। प्रभो ! तुम मेरे परम प्रिय हो ॥ ८० ॥

उक्तश्चैष मया राजा जरासंधोऽल्पचेतनः । कृष्णाद् विरम दुर्बुद्धे विग्रहाद् रणकर्मणि ॥ ८१ ॥

‘मैंने इस मन्दबुद्धि राजा जरासंधसे कहा था कि अरे दुर्बुद्धे ! तू इस विग्रहमें श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेसे विरत हो जा, किंतु इसने नहीं माना ॥ ८१ ॥

तदेषोऽद्य मया त्यक्तो मम वाक्यस्य दूषकः । भग्नो युद्धे जरासंधस्त्वया द्रवति सानुगः ॥ ८२ ॥

‘इसने मेरे इस कथनकी निन्दा की थी, अतः अब मैंने इसे त्याग दिया है। युद्धमें तुम्हारे द्वारा पराजित होकर यह जरासंध अपने साथियोंसहित भागा जा रहा है ॥ ८२ ॥

निर्वैरो नैष संयाति स्वपुरं पृथिवीपतिः । त्वय्येव भूयोऽप्यपरं दर्शयिष्यति किल्बिषम् ॥ ८३ ॥

‘परंतु यह राजा वैर-भाव छोड़कर अपने नगरको नहीं लौट रहा है; अतः यह फिर तुम्हारे प्रति ही दूसरे पापपूर्ण कृत्यका प्रदर्शन करेगा ॥ ८३ ॥

तदिमां संत्यजाशु त्वं महीं हतनराकुलाम् । क्रव्यादगणसंकीर्णां सेवितव्याममानुषैः ॥ ८४ ॥

‘इसलिए अब तुम शीघ्र ही इस भूमिको त्याग दो। यह मुर्दे मनुष्योंसे भरी हुई है और यहाँ सब ओर हिंसक प्राणी छा गये हैं। अब यह स्थान मानवेतर (राक्षस आदि) प्राणियोंके ही सेवन करने योग्य है ॥ ८४ ॥

करवीरपुरं कृष्ण गच्छामः सबलानुगाः । शृगालं वासुदेवं वै द्रक्ष्यामस्तत्र पार्थिवम् ॥ ८५ ॥

‘श्रीकृष्ण ! अब हमलोग सैनिकों और सेवकोंसहित करवीरपुरमें चलें। वहाँ शृगालनामसे विख्यात राजा वासुदेव रहते हैं। उनसे हम मिलेंगे ॥ ८५ ॥

इमौ रथवरोदग्रौ युवयोः कारितौ मया । योजितौ शीघ्रतुरगैः खङ्गचक्राक्षकूवरौ ॥ ८६ ॥

‘ये दो श्रेष्ठ रथ मैंने तुम दोनों भाइयोंके लिये तैयार कराये हैं। इनमें शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं। इनके सभी अङ्ग, पहिये, धुरे और कूबर आदि सुदृढ़ हैं ॥ ८६ ॥

शीघ्रमारुह भद्रं ते बलदेवसहायवान् । त्वरामः करवीरस्थं द्रष्टुं तं वसुधाधिपम् ॥ ८७ ॥

‘तुम्हारा भला हो। तुम बलदेवके साथ शीघ्र रथपर आरूढ़ हो जाओ। हमें करवीरपुरमें निवास करनेवाले राजा शृगालसे मिलनेके लिये जल्दी लगी हुई है' ॥ ८७ ॥

वैशम्पायन उवाच पितृष्वसृपतेर्वाक्यं श्रुत्वा चेदिपतेस्तदा । वाक्यं हृष्टमनाः कृष्णो जगाद जगतो गुरुः ॥ ८८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय अपने फूफा चेदिराज दमघोषका यह वचन सुनकर जगद्गुरु श्रीकृष्णके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—॥ ८८ ॥

अहो युद्धाभिसंतप्तौ देशकालोचितं त्वया । बान्धवप्रतिरूपेण संसिक्तौ वचनाम्बुना ॥ ८९ ॥

‘अहो ! हमलोग युद्धसे संतप्त हो गये थे। आपने एक आत्मीय बन्धुकी भाँति आकर अपने देशकालोचित वचन-रूपी जलसे हमें नहला दिया है ॥ ८९ ॥

देशकालविशिष्टस्य हितस्य मधुरस्य च । वाक्यस्य दुर्लभा लोके वक्तारश्चेदिसत्तम ॥ ९० ॥

‘चेदिराज ! इस जगत्में देशकालके अनुरूप हितकर और मधुर वचन बोलनेवाले लोग दुर्लभ हैं ॥ ९० ॥

चेदिनाथ सनाथौ स्वः संवृत्तौ तव दर्शनात् । नावयोः किंचिदप्राप्यं ययोस्त्वं बन्धुरीदृशः ॥ ९१ ॥

‘चेदिनाथ ! आपके दर्शनसे हम दोनों सनाथ हो गये। जब हमारे आप-जैसे बन्धु यहाँ मौजूद हैं, तब यहाँ हमारे लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है ॥ ९१ ॥

जरासंधस्य निधनं ये चान्ये तत्समा नृपाः । पर्याप्तौ त्वत्सनाथौ स्वः कर्तुं चेदिकुलोद्वह ॥ ९२ ॥

‘चेदिकुलभूषण ! हम दोनों आपसे सनाथ होकर जरासंध तथा उसके समान जो दूसरे राजा हैं, उन सबको मौतके घाट उतार देनेमें समर्थ हैं ॥ ९२ ॥

यदूनां प्रथमो बन्धुस्त्वं हि सर्वमहीक्षिताम् । अतःप्रभृति संग्रामान् द्रक्ष्यसे चेदिसत्तम ॥ ९३ ॥

‘चेदिप्रवर ! समस्त राजाओंमें आप ही यदुवंशियोंके प्रथम बन्धु हैं। अबसे आपको बहुत-से संग्राम देखनेको मिलेंगे ॥ ९३ ॥

चाक्रं मौसलमित्येवं संग्रामं रणवृत्तयः । कथयिष्यन्ति लोकेऽस्मिन् ये धरिष्यन्ति पार्थिवाः ॥ ९४ ॥

‘युद्धसे जीवन-निर्वाह करनेवाले जो राजा इस लोकमें जीवित रहेंगे, वे आजके इस चाक्र-मौसल युद्धकी सदा चर्चा करेंगे ॥ ९४ ॥

राज्ञां पराजयं युद्धे गोमन्तेऽचलसत्तमे । श्रवणाद् धारणाद्वापि स्वर्गलोकं व्रजन्ति हि ॥ ९५ ॥

‘पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्तके समीप युद्धमें हमारे द्वारा जो यह राजाओंकी पराजय हुई है, इसके सुनने अथवा स्मरण करने-से भी मनुष्य स्वर्गलोकमें जायँगे ॥ ९५ ॥

तद्गच्छाम महाराज करवीरं पुरोत्तमम् ।

विष्णुपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ३८१


त्वयोद्दिष्टेन मार्गेण चेदिराज शिवाय वै ॥ ९६ ॥

'अतः महाराज चेदिराज ! अब हमलोग आपके बताये हुए मार्गसे अपने कल्याणके लिये उत्तम नगर करवीरपुरको चलें' ॥ ९६ ॥

ते स्यन्दनगताः सर्वे पवनोत्पातिभिर्हयैः ।
भेजिरे दीर्घमध्वानं मूर्तिमन्त इवाग्नयः ॥ ९७ ॥

तदनन्तर वे सब-के-सब तीन मूर्तिमान् अग्नियोंके समान रथपर आरूढ़ हो हवाकी भाँति उड़नेवाले घोड़ोंद्वारा विशाल मार्गपर चल दिये ॥ ९७ ॥

ते त्रिरात्रोषिताः प्राप्ताः करवीरं पुरोत्तमम् ।
शिवाय च शिवे देशे निविष्टास्त्रिदशोपमाः ॥ ९८ ॥

वे देवोपम वीर मार्गमें तीन रात निवास करके उत्तम करवीरपुरमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपने भलेके लिये एक सुखद स्थानमें डेरा डाला ॥ ९८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि करवीरपुराभिगमने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्ण आदिकी करवीरपुरमें गमनविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥


चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा शृगालका वध तथा उसके पुत्रका करवीरपुरके राज्यपर अभिषेक

वैशम्पायन उवाच

तानागतान् विदित्वाथ शृगालो युद्धदुर्मदः ।
पुरस्य धर्षणं मत्वा निर्जगामेन्द्रविक्रमः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! उन सबके आनेका समाचार पाकर इन्द्रके समान पराक्रमी रणदुर्मद राजा शृगाल अपनी पुरीपर आक्रमण हुआ समझकर नगरसे बाहर निकला ॥ १ ॥

रथेनादित्यवर्णेन भास्वता रणगामिना ।
आयुधप्रतिपूर्णेन नेमिनिर्घोषहासिना ॥ २ ॥
मन्दराचलकल्पेन चित्राभरणभूषिणा ।
अक्षय्यसायकैस्तूणैः पूर्णेनार्णवघोषिणा ॥ ३ ॥
हर्यश्वेनाशुगतिनासक्तेन शिखरेष्वपि ।
हेमकूबरगर्भेण दृढाक्षेणातिशोभिना ॥ ४ ॥
सुवन्धुरेण दीप्तेन पतत्त्रिचरगामिना ।
खगतेनेव शक्रस्य हर्यश्वेन रथाद्रिणा ॥ ५ ॥
सावित्रे नियमे पूर्णे यं ददौ सविता स्वयं ।
आदित्यरश्मिभिरिव रश्मिभिर्यो निगृह्यते ॥ ६ ॥
तेन स्यन्दनमुख्येन द्विषत्स्यन्दनघातिना ।
स शृगालोऽभ्ययात्कृष्णं शलभः पावकं यथा ॥ ७ ॥

वह एक श्रेष्ठ रथपर चढ़कर चला । उसका वह रथ सूर्यके समान तेजःपुञ्जसे प्रकाशित हो रहा था । वह रणभूमिमें (अप्रतिहतगति) से जानेवाला था । उसमें सभी तरहके अस्त्र-शस्त्र भरे हुए थे । उसके पहियोंकी जो घरघराहट होती थी, वही मानो उसका अट्टहास था ( अथवा वह पहियोंकी घर्घर ध्वनिसे मेघकी गम्भीर गर्जनाका उपहास कर रहा था)। उसका आकार मन्दराचलके समान था । उस रथको विचित्र आभरणोंसे विभूषित किया गया था । वह अक्षय सायकोंसे भरे हुए तूणीरोंसे परिपूर्ण था तथा समुद्रकी गम्भीर गर्जनाके समान घरघराहट पैदा करता था । उसमें हरे रङ्गके शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए थे । वह पर्वतके शिखरोंपर भी कहीं अटकता नहीं था । उसके कूबरके *भीतरी भागमें सोना जड़ा हुआ था, उसका धुरा भी सुदृढ़ था, उस रथकी बड़ी शोभा हो रही थी । वह सुन्दर रस्सियोंसे भलीभाँति बँधा हुआ था, उसकी दीप्ति सब ओर छिटक रही थी; वह पक्षिराज गरुड़के समान तीव्र गतिसे चलनेवाला था और इन्द्रके हरित अश्वसे जुते हुए आकाशगामी पर्वताकार रथकी समानता करता था । शृगालने नियमपूर्वक गायत्री जप करके सूर्यदेवकी आराधना की थी । उसका वह नियम पूर्ण होनेपर साक्षात् भगवान् सूर्यने उसे वह रथ दिया था, जो सूर्यकी किरणोंके समान सुनहरी बागडोरोंसे उस रथके घोड़ोंको काबूमें लाया जाता था । शत्रुओंके रथोंको नष्ट कर देनेवाले उस श्रेष्ठ रथके द्वारा राजा शृगाल उसी तरह श्रीकृष्णपर चढ़ आया जैसे पतिंगा आगपर टूट पड़ता है॥२-७॥

चापपाणिः सुतीक्ष्णेषुः कवची हेममालिकः ।
सितप्रावरणोष्णीषः पावकाकारलोचनः ॥ ८ ॥

उसके हाथमें धनुष और तीखे बाण शोभा पाते थे । वह कवच धारण करके सोनेकी मालासे विभूषित था । उसकी चादर और पगड़ी श्वेतवर्णकी थी और नेत्र अग्निके समान जलते-से प्रतीत होते थे ॥ ८ ॥

मुहुर्मुहुर्ज्याचपलं विक्षिपन् दुःसहं धनुः ।
निर्वमन् रोषजं वायुं सानलज्वालमण्डलम् ॥ ९ ॥


* कूबर रथका वह भाग है, जिसपर जूआ बाँधा जाता है।

३८२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

वह बारंबार अपने दुःसह धनुषको हिलाता हुआ उसकी प्रत्यञ्चा खींचता था और आगकी ज्वालाओंसे युक्त रोषजनित उच्छ्वास छोड़ रहा था ॥ ९ ॥

भाभिर्भूषणपंक्तीनां दीप्तो मेरुरिवाचलः।
रथस्थ इव शैलेन्द्रः शृगालः प्रत्यदृश्यत ॥ १० ॥

अपने आभूषण-समूहोंकी प्रभाओंसे प्रकाशित होकर वह राजा शृगाल मेरूपर्वतके समान शोभा पाता था और रथपर बैठे हुए गिरिराज-सा दृष्टिगोचर होता था ॥ १० ॥

तस्यारसितशब्देन रथनेमिस्वनेन च।
गुरुत्वेन च नाम्यन्ती चचालोर्वी भयातुरा ॥ ११ ॥

उसके गर्जनेकी ध्वनि, रथके पहियोंकी घर्घराहट और भारीपनसे दबी जाती हुई पृथ्वी भयसे आतुर हो डगमगाने लगी ॥ ११ ॥

तमापतन्तं श्रीमन्तं मूर्तिमन्तमिवाचलम्।
शृगालं लोकपालाभं दृष्ट्वा कृष्णो न विव्यथे ॥ १२ ॥

लोकपालोंके समान तेजस्वी और मूर्तिमान् पर्वतके समान विशालकाय श्रीमान् राजा शृगालको आक्रमण करते देख श्रीकृष्णके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई ॥ १२ ॥

शृगालश्चापि संरब्धः स्यन्दनेनाशुगामिना।
समीपे वासुदेवस्य युयुत्सुः प्रत्यदृश्यत ॥ १३ ॥

इधर शृगाल भी रोषमें भरकर उस शीघ्रगामी रथके द्वारा श्रीकृष्णके पास आकर युद्धके लिये उत्सुक दिखायी देने लगा ॥ १३ ॥

वासुदेवं स्थितं दृष्ट्वा शृगालो युद्धलालसः।
अभिदुद्राव वेगेन मेघराशिरिवाचलम् ॥ १४ ॥

श्रीकृष्णको अपने सामने खड़ा देख शृगालकी युद्ध-लालसा जाग उठी और जिस प्रकार मेघोंका समूह वर्षाद्वारा पर्वतपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने वेगपूर्वक उन-पर धावा किया ॥ १४ ॥

वासुदेवः स्मितं कृत्वा प्रतियुद्धाय तस्थिवान्।
तद् युद्धमभवत् ताभ्यां समरे घोरदर्शनम्।
उभाभ्यामिव मत्ताभ्यां कुञ्जराभ्यां यथा वने ॥ १५ ॥

तब भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर उसका सामना करनेके लिये खड़े हो गये; फिर तो समरभूमिमें उन दोनोंका बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा, जैसे वनमें दो मदमत्त हाथी आपसमे लड़ रहे हों ॥ १५ ॥

शृगालस्त्वब्रवीत् कृष्णं समरे समुपस्थितम्।
युद्धरागेण तेजस्वी मोहात्स्खलितगौरवः ॥ १६ ॥

उस समय मोहवश जो अपने गौरवसे गिर गया था, उस तेजस्वी शृगालने समराङ्गणमें उपस्थित हुए श्रीकृष्णसे युद्धविषयक आसक्तिसे प्रेरित होकर कहा ॥ १६ ॥

गोमन्ते युद्धमार्गेण यत् त्वया कृष्ण चेष्टितम्।
अनायकानां मूर्खाणां नृपाणां दुर्बले बले ॥ १७ ॥
स मे सुविदितः कृष्ण क्षत्रियाणां पराजयः।
कृपणानामसत्त्वाना मयुद्धानां रणोत्सवे ॥ १८ ॥

'कृष्ण! तुमने गोमन्तके समीप नायकरहित मूर्ख नरेशों-की दुर्बल सेनाके भीतर युद्धके मार्गसे जो-जो चेष्टाएँ की हैं, उनके विषयमें मुझे सब कुछ भलीभाँति विदित हो गया है। क्षत्रियोंके उस पराजयसे मैं अच्छी तरह परिचित हूँ; परंतु वे क्षत्रिय कायर, धैर्य और शक्तिसे रहित तथा समरोत्सवमें कभी युद्ध न कर सकनेवाले थे ॥ १७-१८ ॥

तिष्ठेदानीं यथाकामं स्थितोऽहं पार्थिवे पदे।
क्व यास्यसि मया रुद्धो रणेष्वापरिनिष्ठितः ॥ १९ ॥

'परंतु इस समय तुम इच्छानुसार युद्ध करनेके लिये खड़े हो जाओ, मैं यहाँ राजाके पदपर प्रतिष्ठित हूँ। यदि मैं तुम्हें सब ओरसे घेरा डालकर रोक लूँ, तो तुम कहाँ जाओगे; क्योंकि तुम तो रणकर्ममें परिनिष्ठित (निपुण) हो नहीं ॥ १९ ॥

न चाहमेकं सबलो युक्तस्त्वां योद्धुमाहवे।
अहमेकस्त्वमप्येको द्वौ युध्यस्व रणे स्थितौ ॥ २० ॥

'तुम अकेले हो और मैं सेनाके साथ हूँ। अतः रणभूमि-में तुम्हारे साथ युद्ध करना मेरे लिये उचित न होगा। इधरसे मैं अकेला रहूँ और उधरसे तुम, फिर हम दोनों समरभूमिमें डटकर युद्ध करें ॥ २० ॥

किं जनेन निरस्तेन त्वं वाहं च रणे स्थितः।
धर्मयुद्धेन निधनं व्रजत्वेकतरो रणे ॥ २१ ॥

'साधारण लोगोंको मारनेसे क्या लाभ? रणभूमिमें खड़े हुए तुम या मैं—दोनोंमेंसे एक योद्धा धर्मयुद्धके द्वारा मृत्युको प्राप्त हो ॥ २१ ॥

लोकेऽस्मिन् वासुदेवोऽहं भविष्यामि हते त्वयि।
हते मयि त्वमप्येको वासुदेवो भविष्यसि ॥ २२ ॥

'तुम्हारे मारे जानेपर इस संसारमें मैं अकेला ही वासुदेव रहूँगा और मेरे मारे जानेपर तुम भी अकेले वासुदेव बने रहोगे' ॥ २२ ॥

शृगालस्य वचः श्रुत्वा वासुदेवः क्षमापरः।
ईर्ष्यान्तं प्रहरस्वेति तमुक्त्वा चक्रमददे ॥ २३ ॥

शृगालकी यह बात सुनकर क्षमाशील भगवान् वासुदेव-ने उस ईर्ष्यालु नरेशसे कहा, 'पहले तुम प्रहार करो' ऐसा कहकर उन्होंने हाथमें चक्र ले लिया ॥ २३ ॥

ततः सायकजालानि शृगालः क्रोधमूर्च्छितः।
चिक्षेप कृष्णे घोराणि युद्धाय लघुविक्रमः ॥ २४ ॥

तब युद्धके लिये शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले

विष्णुपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ३८३


शृगालने क्रोधमे उन्मत्त होकर श्रीकृष्णपर घोर वाण-समूहोंकी वर्षा आरंभ कर दी ॥ २४ ॥

शस्त्राणि यानि चान्यानि मुसलाद्यानि संयुगे ।
पातयामास गोविन्दे स शृगालः प्रतापवान् ॥ २५ ॥
प्रतापी शृगालने उस युद्धमें गोविन्दपर मूसल आदि अन्य शस्त्रोंका भी प्रहार किया ॥ २५ ॥

शृगालप्रहितैरस्त्रैः पावकज्वालमालिभिः ।
निर्दयाभिहतः कृष्णः स्थितो गिरिरिवाचलः ॥ २६ ॥
सोऽस्त्रप्रहाराभिहतः किंचिद् रोषसमन्वितः ।
चक्रमुद्यम्य गोविन्दः शृगालस्य परिक्षिपत् ॥ २७ ॥
शृगालके चलाये हुए अस्त्रोंद्वारा, जिनसे आगकी लपटें उठ रही थीं, निर्दयतापूर्वक आहत होनेपर भी श्रीकृष्ण पर्वतके समान अविचल-भावसे खड़े रहे। उसके अस्त्रोंके प्रहारसे घायल होकर किञ्चित् रोषसे युक्त हुए भगवान् गोविन्दने चक्र उठाकर शृगालपर प्रहार किया ॥ २६-२७ ॥

तं रथस्थं प्रमाणस्थं शृगालं युद्धदुर्मदम् ।
जघान समरे चक्रं जातदर्पं महाबलम् ॥ २८ ॥
रणदुर्मद महाबली शृगाल घमण्डमें भरकर रथपर ही बैठा रहा, अपनी जगहसे हटा नहीं। इसी समय (भगवान्‌के चलाये हुए) चक्रने समरभूमिमें उसपर गहरी चोट की ॥ २८ ॥

ततः सुदर्शनं चक्रं पुनरायाद् गुरोः करे ।
चक्रेणोरसि निर्भिन्नः स गतासुर्गतोत्सवः ।
पपात क्षतजस्रावी शृगालोऽद्रिरिवाहतः ॥ २९ ॥
इसके बाद सुदर्शन चक्र पुनः जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णके हाथमें आ गया। उस चक्रसे आहत होकर शृगालकी छाती फट गयी और वह वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति खूनकी धारा बहाता हुआ प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके जीवनका सारा आनन्दोत्सव समाप्त हो गया ॥ २९ ॥

निशाम्य तं निपतितं वज्रपातादिवाचलम् ।
तस्य सैन्यान्यपययुर्विमनांसि हते नृपे ॥ ३० ॥
वज्रपातसे धराशायी हुए पर्वतकी भाँति राजा शृगालको पृथ्वीपर पड़ा देख, उसके मारे जानेपर उसके सारे सैनिक खिन्नचित्त होकर भाग गये ॥ ३० ॥

केचित् प्रविश्य नगरं कश्मलाभिहता भृशम् ।
रुरुदुर्दुःखसंतप्ता भर्तृशोकाभिपीडिताः ॥ ३१ ॥
कुछ सैनिक नगरमे प्रवेश करके अत्यन्त मोहग्रस्त, दुःखसे सन्तप्त तथा स्वामीके शोकसे पीड़ित हो फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ३१ ॥

केचित् तत्रैव शोचन्तः स्मरन्तः सुकृतानि च ।
पतितं भूपतिं भूमौ न त्यजन्ति स्म दुःखिताः ॥ ३२ ॥
कुछ सैनिक वहीं शोक करने लगे। वे स्वामीके उपकारोंका स्मरण करके दुखी हो भूमिपर पड़े हुए भूपालको छोड़ नहीं रहे थे ॥ ३२ ॥

ततो मेघनिनादेन स्वरेणारिविमर्दनः ।
कृष्णः कमलपत्राक्षो जनानामभयं ददौ ॥ ३३ ॥
तदनन्तर शत्रुमर्दन कमलनयन श्रीकृष्णने मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे उन सब लोगोंको अभयदान दिया ॥ ३३ ॥

चक्रोचितेन हस्तेन राजताङ्गुलिपर्वणा ।
न भेतव्यं न भेतव्यमिति तानभ्यभाषत ॥ ३४ ॥
नास्य पापस्य दोषेण निराबाधकरं जनम् ।
घातयिष्यामि समरे नेदं शूरव्रतं मतम् ॥ ३५ ॥
उन्होंने अङ्गुलिपर्वसे सुशोभित तथा चक्र धारण करनेके योग्य उठे हुए दाहिने हाथके द्वारा संकेत करके उन सब-से कहा, 'सैनिको ! तुम डरो मत ! डरो मत !! इस पापीके अपराधसे मैं समरभूमिमें निरपराध मनुष्योंका वध नहीं करूँगा; क्योंकि—यह वीरोंका व्रत नहीं है' ॥ ३४-३५ ॥

अश्रुपूर्णमुखा दीनाः क्रन्दमाना भृशं तदा ।
ते स्म पश्यन्ति पतितं धरण्यां धरणीपतिम् ॥ ३६ ॥
चक्रनिर्दारितोरस्कं भिन्नशृङ्गमिवाचलम् ॥ ३७ ॥
वे सैनिक अत्यन्त दीनभावसे क्रन्दन करते हुए उस समय पृथ्वीपर पड़े हुए पृथ्वीपति शृगालकी ओर देख रहे थे। उनका सारा मुखमण्डल आँसुओंसे भींगा हुआ था। राजाका वक्षःस्थल चक्रसे विदीर्ण हो गया था। वह टूटे हुए शिखरवाले पर्वतके समान भूमिपर पड़ा था ॥ ३६-३७ ॥

विलपन्ति स्म ते सर्वे सचिवाः सप्रजा भृशम् ।
साश्रुपातेक्षणा दीनाः शोकस्य वशमागताः ॥ ३८ ॥
वे समस्त सचिव तथा प्रजावर्गके लोग शोकके वशीभूत हो नेत्रोंसे अश्रुपात करते हुए अत्यन्त दीनभावसे विलाप करते थे ॥ ३८ ॥

तेषां रुदितशब्देन पौराणां विस्वरैः स्वरैः ।
महिष्यस्तस्य निष्पेतुः सपुत्रा रुदिताननाः ॥ ३९ ॥
उन पुरवासियोंके रोनेके शब्द तथा फटे हुए स्वरोंसे अनिष्टकी आशङ्का करके राजा शृगालकी रानियाँ भी पुत्रोंको साथ लिये रोती हुई वहाँ निकल आयीं ॥ ३९ ॥

तास्तं निपतितं दृष्ट्वा श्लाघ्यं भूमिपतिं पतिम् ।
स्तनानाुरुज्य करजैर्भृशार्ताः पर्यदेवयन् ॥ ४० ॥
अपने स्पृहणीय पति भूमिपाल शृगालको वहाँ धरतीपर पड़ा देख वे रानियाँ अत्यन्त आर्त हो अपनी अङ्गुलियोंसे स्तनोंको नोचती हुई करुण विलाप करने लगीं ॥ ४० ॥

३८४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

उरांस्युरसिजांश्चैव शिरोजान्याकुलान्यपि ।
निर्दयं ताडयन्त्यस्ता विस्वरं रुरुदुः स्त्रियः ॥ ४१ ॥
वे स्त्रियाँ अपनी छाती, स्तन और वहाँ फैले हुए सिरके बालोंको भी निर्दयतापूर्वक पीटती हुई फुक्का फाड़-फाड़कर रोने लगीं ॥ ४१ ॥

तस्योरसि सुदुःखार्ता मृदिताः क्लिन्नलोचनाः ।
पेतुरूध्वंभुजाः सर्वाश्छिन्नमूला लता इव ॥ ४२ ॥
वे सब रानियाँ अत्यन्त दुःखसे आतुर और मर्दित हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई दोनों बाँहें ऊपर उठाकर जड़से कटी हुई लताओंकी भाँति राजाकी छातीपर गिर पड़ीं ॥ ४२ ॥

तासां बाष्पाम्बुपूर्णानि नेत्राणि नृपयोषिताम् ।
वारिविप्रहतानीव पङ्कजानि चकाशिरे ॥ ४३ ॥
उन राजरानियोंके आँसूभरे नेत्र जल (या ओले) से आहत हुए कमलोंके समान प्रकाशित होते थे ॥ ४३ ॥

ताः पतिं पतितं भूमौ रुदन्त्यो हृदि ताडिताः ।
लालप्यमानाः करुणं योषितः पर्यदेवयन् ॥ ४४ ॥
धरतीपर पड़े हुए पतिकी ओर देखकर रोती और छाती पीटती हुई ये राजपत्नियां करुण विलाप करती हुई शोकोद्गार प्रकट करने लगीं ॥ ४४ ॥

पुत्रं चास्य पुरस्कृत्य बालं प्रस्रुतलोचनम् ।
शक्रदेवं पितुः पार्श्वे द्विगुणं रुरुदुः स्त्रियः ॥ ४५ ॥
उस राजाके बालक पुत्र शक्रदेवको अपने आगे पिताके पास खड़ा करके वे रानियाँ और दूने वेगसे रोने तथा विलाप करने लगीं । उस बालकके नेत्रोंसे भी आँसू बह रहा था ॥

अयं ते वीर विक्रान्तो बालः पुत्रो न पण्डितः ।
त्वद्विहीनः कथमयं पदे स्थास्यत पैतृके ॥ ४६ ॥
वे बोलीं—'वीर महाराज ! यह आपका पराक्रमी पुत्र अभी बालक है, विद्वान् नहीं हो सका है । अब आपके बिना यह अपने पैतृक राज्यपर कैसे प्रतिष्ठित हो सकेगा ? ॥ ४६ ॥

कथमेकपदे त्यक्त्वा गतोऽस्यन्तःपुरं परम् ।
अतृप्तास्तव सौख्यानां किं कुर्मो विधवा वयम् ॥ ४७ ॥
'(प्राणनाथ !) आप अपने अन्तःपुरकी रानियोंको सहसा त्यागकर क्यों परलोकको चले गये ? हम आपके दिये हुए सुखोंसे अभी तृप्त नहीं हुई थीं । हाय ! हम विधवा हो गयीं, अब क्या करें ?' ॥ ४७ ॥

तस्य पद्मावती नाम महिषी प्रमदोत्तमा ।
रुदती पुत्रमादाय वासुदेवमुपस्थिता ॥ ४८ ॥
राजा शृगालकी पटरानीका नाम पद्मावती था । वह स्त्रियोंमें श्रेष्ठ थी । पद्मावती रोती हुई अपने पुत्रको साथ ले भगवान् वासुदेवके पास गयी ॥ ४८ ॥

यस्त्वया पातितो वीर रणप्रोक्तेन कर्मणा ।
तस्य प्रेतगतस्यायं पुत्रस्त्वां शरणं गतः ॥ ४९ ॥
और बोली—'वीर ! आपने युद्ध-कर्मके द्वारा जिन्हें मार गिराया है, उन्हीं परलोकवासी नरेशका यह पुत्र आपकी शरणमें आया है ॥ ४९ ॥

यदि त्वां प्रणमेतासौ कुर्याद् वा शासनं तव ।
नायमेकप्रहारेण जनस्तप्येत दारुणम् ॥ ५० ॥
'यदि ये महाराज आपको प्रणाम करते—आपके सम्मुख विनीत भावका परिचय देते अथवा आपकी आज्ञाका पालन करते तो आपके एक ही प्रहारसे इन्हें संतापका भागी नहीं होना पड़ता ॥ ५० ॥

यदि कुर्यादयं मूढस्त्वयि बान्धवकं विधिम् ।
नैवं परीतः कृपणः सेवेत धरणीतलम् ॥ ५१ ॥
'यदि ये मूढ (विवेकशून्य) नरेश आपके प्रति बन्धु-जनोचित बर्ताव करते तो इन्हें मांसभक्षी जन्तुओंसे घिरकर पृथ्वीका सेवन नहीं करना पड़ता ॥ ५१ ॥

अयमस्य विपन्नस्य बान्धवस्य तवानघ ।
सन्तती रक्ष्यतां वीर पुत्रः पुत्र इवात्मजः ॥ ५२ ॥
'अनघ ! वीर ! यह आपके इस मरे हुए बान्धवकी ही सन्तति है; आप अपने पुत्रकी ही भाँति इसकी रक्षा करें' ॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा महिष्या यदुनन्दनः ।
मृदुपूर्वमिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ ५३ ॥
रानीका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ यदुनन्दन श्रीकृष्णने मधुर वाणीमें कहा--॥ ५३ ॥

राजपत्नि गतो रोषः सहानेन दुरात्मना ।
प्रकृतिस्था वयं जाता देवि सैषोऽस्मि बान्धवः ॥ ५४ ॥
'राजरानी ! मेरा रोष तो इस दुरात्माके मारे जानेके साथ ही दूर हो गया । देखें ! अब हम स्वाभाविक स्थितिमें हैं । मैं आपका वही भाई-बन्धु हूँ ॥ ५४ ॥

रोषो मे विगतः साध्वि तव वाक्यैरकल्मषैः ।
योऽयं पुत्रः शृगालस्य ममाप्येष न संशयः ॥ ५५ ॥
'साध्वी रानी ! तुम्हारे इन निर्दोष वचनोंसे मेरा सारा क्रोध दूर हो गया । राजा शृगालका जो यह पुत्र है, यह मेरे लिये भी पुत्रके ही समान है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥

अभयं चाभिषेकं च ददाम्यस्मै सुखाय वै ।
आहूयन्तां प्रकृतयः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ॥ ५६ ॥
पितृपैतामहे राज्ये तत्र पुत्रोऽभिषिच्यताम् ।
'मैं इसके सुखके लिये इसे अभय देनेके साथ ही इसका राज्याभिषेक भी कर दूँगा । आप समस्त प्रकृतियों तथा मन्त्री और पुरोहितोंको भी बुलवाइये, जिससे आपके इस पुत्र-

विष्णुपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः [ ३८५


को, इसके बाप-दादोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया जाय' ॥
ततः प्रकृतयः सर्वाः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ॥ ५७ ॥
अभिषेकार्थमाजग्मुर्यतो वै रामकेशवौ ।
तदनन्तर, सारी प्रकृतियाँ (प्रजा आदि), पुरोहित और मन्त्री भी राजकुमारका अभिषेक करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ श्रीबलराम और श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ ५७ ॥
ततः सिंहासनस्थं तु राजपुत्रं जनार्दनः ॥ ५८ ॥
अभिषेकेन दिव्येन योजयामास वीर्यवान् ।
इसके बाद पराक्रमी भगवान् जनार्दनने राजकुमारको राज्य सिंहासनपर बिठाकर दिव्य अभिषेककी विधिसे उसका राज्याभिषेक कर्म सम्पन्न किया ॥ ५८ ॥
अभिषिच्य शृगालस्य करवीरपुरे सुतम् ।
कृष्णस्तदहरेवाशु प्रस्थानमभ्यरोचयत् ॥ ५९ ॥
शृगालके पुत्रको करवीरपुरके राज्यपर अभिषिक्त करके श्रीकृष्णने उसी दिन वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर देना उचित समझा ॥ ५९ ॥
रथेन हरियुक्तेन तेन युद्धार्जितेन वै ।
केशवः प्रस्थितोऽध्वानं वृत्रहा त्रिदिवं यथा ॥ ६० ॥
जैसे इन्द्र स्वर्गलोकको जाते हैं, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण भी युद्धमें प्राप्त हुए उस अश्वयुक्त रथके द्वारा मथुराके पथपर चल दिये ॥ ६० ॥
शक्रदेवोऽपि धर्मात्मा सह मात्रा परंतपः ।
सबालवृद्धयुवतीमुख्याः प्रकृतयस्तथा ॥ ६१ ॥
शिविकायामथारोप्य शृगालं युद्धदुर्मदम् ।
संहता दूरमार्गेण पश्चिमाभिमुखा ययुः ॥ ६२ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाला धर्मात्मा राजा शक्रदेव भी माताके साथ बालक, वृद्ध और युवती आदि सारी प्रकृतियोंको साथ ले रणदुर्मद शृगालके शवको पालकीमें सुलाकर सब लोग संगठित हो नगरसे दूरके रास्तेपर पश्चिमाभिमुखी ओर चले ॥ ६१-६२ ॥
नैधनस्य विधानेन चक्रुस्ते तस्य सत्क्रियाम् ।
सत्कारं कारयामासुः पितॄणां पारलौकिकम् ॥ ६३ ॥
श्मशान-भूमिमें ले जाकर अन्त्येष्टिकी विधिसे उन सबने शक्रदेवद्वारा राजाका दाह-संस्कार करवाया और पितरोंके लिये पारलौकिक कृत्यका सम्पादन कराया ॥ ६३ ॥
उद्दिश्योद्दिश्य राजानं श्राद्धं कृत्वा सहस्रशः ।
ततस्ते सलिलं दत्त्वा नामगोत्रादि कीर्तनैः ॥ ६४ ॥
पितुर्युपरते घोरे शोकसंविनमानसाः ।
कृत्वोदकं तदा राजा प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ ६५ ॥
राजाके उद्देश्यसे सहस्रों प्रकारकी वस्तुएँ श्राद्धमें देकर उन सबने शृगालके लिये नाम-गोत्र आदिके उच्चारणपूर्वक जलदान किया। इस प्रकार पिताकी घोर मृत्यु हो जानेपर शोकसे व्याकुलचित्त हुए राजा शक्रदेवने उन्हे जलाञ्जलि देकर अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया ॥ ६४-६५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शृगालवधो नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शृगालका वधनामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥


पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

बलराम और श्रीकृष्णका मथुरामें प्रत्यागमन और स्वागत

वैशम्पायन उवाच
तौ तु स्वल्पेन कालेन दमघोषेण संगतो ।
अथाध्वविधिना तौ तु पञ्चरात्रोषितौ पथि ॥ १ ॥
दमघोषेण संगम्य एकरात्रोषिताविव ।
जग्मतुः सहितौ वीरौ मुदा परमया युतौ ।
नगरीं मथुरां प्राप्तौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर, वे दोनों भाई चेदिराज दमघोषके साथ मिलकर यात्रा करने लगे। मार्गके नियमानुसार चलते हुए उन्होंने बीच-बीचमें पाँच रात निवास किया; किंतु दमघोषके साथ रहनेसे उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि हम एक ही रात मार्गमें रहे हैं। इस प्रकार परमानन्दसे सम्पन्न हो वे दोनों वीर वसुदेवकुमार साथ-साथ थोड़े ही समयमें मथुरा नगरीमें जा पहुँचे ॥ १-२ ॥

ततः प्रत्युद्गताः सर्वे यादवा यदुनन्दनौ ।
सबला हृष्टमनस उग्रसेनपुरोगमाः ॥ ३ ॥
उस समय उग्रसेन आदि सभी यादवोंने सेनासहित आगे आकर प्रसन्नचित्तसे उन दोनों यदुनन्दन वीरोंका स्वागत किया ॥ ३ ॥

श्रेण्यः प्रकृतयश्चैव मन्त्रिणश्च यथोचिताः ।
सबालवृद्धा सा चैव पुरी समभिवर्तत ॥ ४ ॥
अनेक प्रकारके शिल्पियोंद्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाले नाना जातिके शिल्पी, प्रजावर्ग, मन्त्री तथा बालकों और

३८६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

वृद्धोंसहित सारी मथुरापुरी यथोचित रीतिसे उनके स्वागतमें जुटी थी॥ ४॥
नन्दितूर्याण्यवाद्यन्त स्तूयेतां पुरुषर्षभौ।
रथ्याः पताकामालिन्यो भासन्ति स्म समन्ततः॥ ५॥
आनन्दवर्धक मङ्गल-वाद्य बजने लगे। उन दोनों पुरुष-प्रवर वीरोंकी स्तुति होने लगी। सब ओरकी गलियाँ और सड़कें पताकाओंसे अलङ्कृत हो उत्तम शोभा पाने लगीं॥
हृष्टा प्रमुदिता सर्वा पुरी परमशोभिता।
आश्रोस्तयोरागमने यथैवेन्द्रमहे तथा॥ ६॥
उन दोनों भाइयोंके आनेसे इन्द्रोत्सवके समान सारी पुरी परम शोभासे सम्पन्न हो हर्षसे खिल उठी। सर्वत्र आनन्द छा गया॥ ६॥
मुदितास्तत्र गायन्ति राजमार्गेषु गायकाः।
स्तवाशीर्बहुला गाथा यादवानां प्रियंकराः॥ ७॥
सड़कोंपर आनन्दमग्न हुए गायक यादवोंको प्रिय लगने-वाली आशीर्वादयुक्त गाथाएँ गा रहे थे॥ ७॥
गोविन्दरामौ सम्प्राप्तौ भ्रातरौ लोकविश्रुतौ।
स्वे पुरे निर्भयाः सर्वे क्रीडध्वं यादवाः सुखम्॥ ८॥
और सर्वत्र यह घोषणा करते थे कि 'यादवो! विश्वविख्यात वीर दोनों भाई श्रीकृष्ण और बलराम अब अपने नगरमें आ गये हैं, अतः सबलोग निर्भय होकर सुखपूर्वक क्रीड़ा करो'॥ ८॥
न तत्र कश्चिद् दीनो वा मलिनो वा विचेतनः।
मथुरायामभूत् कश्चिद् रामकृष्णसमागमे॥ ९॥
बलराम और श्रीकृष्णके आ जानेपर उस मथुरापुरीमें कोई भी दीन, मलिन अथवा उदासचित्त नहीं दिखायी देता था॥ ९॥
वयांसि साधुवाक्यानि प्रहृष्टा गोहयद्विपाः।
नरनारीगणाश्चैव भेजिरे मानसं सुखम्॥ १०॥
पक्षी सुमधुर बोली बोलते थे; गौ, घोड़े और हाथी भी बहुत प्रसन्न थे तथा स्त्रियों और पुरुषोंके मनको भी बड़ा ही सुख मिला॥ १०॥
शिवाश्च प्रववुर्वाता विरजस्का दिशो दश।
दैवतान्यपि सर्वाणि हृष्यन्त्यायतनेष्वथ॥ ११॥
शीतल एवं सुखदायिनी हवाएँ चलने लगीं, दसों दिशाओंकी धूल उड़ गयी और मन्दिरोंमें स्थित सम्पूर्ण देवता भी बड़े प्रसन्न हुए॥ ११॥
यानि लिङ्गानि लोकस्य वृत्तानीह कृते युगे।
तानि सर्वाण्यदृश्यन्त तयोरागमने तदा॥ १२॥
सत्ययुग आनेपर इस जगत्में जो-जो लक्षण एवं वृत्तान्त घटित होते हैं, वे सब-के-सब श्रीकृष्ण एवं बलरामके आगमन-पर प्रत्यक्ष दिखायी देने लगे॥ १२॥
ततः काले शिवे पुण्ये स्यन्दनेनारिमर्दनौ।
हरियुक्तेन तौ वीरौ प्रविष्टौ मथुरां पुरीम्॥ १३॥
तदनन्तर, मङ्गलमय पुण्यमुहूर्तमें वे दोनों शत्रुमर्दन वीर उस अश्वयुक्त रथके द्वारा मथुरापुरीमें प्रविष्ट हुए॥ १३॥
प्रविशन्तं पुरीं रम्यां गोविन्दं राममेव च।
अनुजग्मुर्यदुगणाः शक्रं देवगणा इव॥ १४॥
उस रमणीय पुरीमें प्रवेश करते समय श्रीकृष्ण और बलरामके पीछे समस्त यादव उसी प्रकार चले, जैसे देवता इन्द्रके पीछे चलते हैं॥ १४॥
वसुदेवस्य भवनं पितुस्तौ यदुनन्दनौ।
प्रविष्टौ दृष्टवदनौ चन्द्रादित्याविवाचलम्॥ १५॥
जैसे चन्द्रमा और सूर्य सुमेरुपर्वतकी गुफामें प्रवेश करते हों, उसी प्रकार वे दोनों यदुनन्दन वीर पिता वसुदेवके घरमें प्रविष्ट हुए। उस समय उन दोनोंके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी॥ १५॥
तत्रायुधानि संन्यस्य गृहे स्वे स्वैरचारिणौ।
समुदाते यदुवरौ वसुदेवसुतावुभौ॥ १६॥
वहाँ अपने घरमें आयुधोंको रखकर वे दोनों यदुकुल-तिलक वसुदेवपुत्र स्वेच्छानुसार विचरते हुए आनन्दमग्न रहने लगे॥ १६॥
ततस्तु वसुदेवस्य पादौ समभिपीड्य च।
तत्रोग्रसेनं राजानमन्यांश्च यदुपुङ्गवान्॥ १७॥
यथान्यायं पूजयित्वा तौ सर्वैश्चाभिनन्दितौ।
जग्मतुर्हृष्टमनसौ मातुरेव निवेशनम्॥ १८॥
तदनन्तर, वसुदेवजीके दोनों चरणोंको दबाकर राजा उग्रसेन तथा अन्य प्रधान यदुवंशियोंका यथोचित सत्कार करनेके पश्चात् उन सबके द्वारा स्वयं भी अभिनन्दित हो, वे दोनों भाई प्रसन्न मनसे माताके ही महलमें चले गये १७-१८
एवं तावेकनिर्माणौ मथुरायां शुभाननौ।
उग्रसेनानुगौ भूत्वा कंचित्कालं सुमोदतुः॥ १९॥
इस प्रकार एक ही तत्त्वके बने और एक ही उद्देश्यकी सिद्धिके लिये प्रकट हुए वे दोनों श्रीकृष्ण और बलराम राजा उग्रसेनके अनुगामी होकर कुछ कालतक वहाँ सुखसे रहे॥ १९॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रामकृष्णयोर्मथुरां प्रत्यागमने पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलराम और श्रीकृष्णका मथुरामें प्रत्यागमनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥

[विष्णुपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३८७


षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

बलरामजीकी व्रजयात्रा तथा उनके द्वारा यमुनाजीका आकर्षण

वैशम्पायन उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य स्मृत्वा गोषेषु सौहृदम्।
जगामैको व्रजं रामः कृष्णस्यानुमते स्थितः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कुछ कालके अनन्तर गोपोंके सौहार्दका स्मरण करके श्रीकृष्णकी अनुमति ले बलरामजी अकेले ही व्रजमें गये ॥ १ ॥

स गतस्तत्र रम्याणि ददर्श विपुलानि वै।
भुक्तपूर्वाण्यरणयानि सरांसि सुरभीणि च ॥ २ ॥

वहाँ जाकर उन्होंने बहुत-से बड़े-बड़े सुगन्धित वन तथा सरोवर देखे, जो पहले उनके उपभोगमें आ चुके थे ॥ २ ॥

स प्रविष्टस्तु वेगेन तं व्रजं कृष्णपूर्वजः।
वन्येन रमणीयेन वेषेणालंकृतः प्रभुः ॥ ३ ॥

श्रीकृष्णके पूर्वज बलरामजी बड़े वेगसे उस व्रजमें प्रविष्ट हुए। उस समय वे प्रभावशाली संकर्षण वनवासियोंके योग्य रमणीय वेष-भूषासे अलंकृत थे ॥ ३ ॥

स तानभाषत प्रीत्या यथापूर्वमरिंदमः।
गोपांस्तेनैव विधिना यथान्यायं यथावयः ॥ ४ ॥

शत्रुदमन बलराम पहलेकी ही भाँति उसी तौर-तरीकेसे अवस्थाकी छोटाई-बड़ाईके अनुसार यथायोग्य सब गोपोंके साथ मिले और प्रेमपूर्वक उनसे बातचीत करने लगे ॥ ४ ॥

तथैव प्राह तान् सर्वांस्तथैव परिहर्षयन्।
तथैव सह गोपीभिर्योजयन् मधुराः कथाः ॥ ५ ॥

उन्होंने पूर्ववत् सबका हर्ष बढ़ाते हुए सबसे उसी तरह बातें कीं तथा गोपियोंके साथ भी पहले-जैसी ही मधुर चर्चाएँ छेड़ दीं ॥ ५ ॥

तमूचुः स्थविरा गोपाः प्रियं मधुरभाषिणः।
रामं रमयतां श्रेष्ठं प्रवासात् पुनरागतम् ॥ ६ ॥

रमानेवाले (मनको आनन्दित करनेवाले) पुरुषोंमें श्रेष्ठ बलरामजी परदेशमे रहकर फिर लौटे थे और गोपोंके बहुत ही प्रिय थे। अतः मधुरभाषी बड़े-बूढ़े गोपोंने उनसे कहा—॥ ६ ॥

स्वागतं ते महाबाहो यदूनां कुलन्दन।
अद्य स्म निर्वृतास्तात यत्त्वां पश्यामहे वयम् ॥ ७ ॥

'यदुकुलको आनन्दित करनेवाले महाबाहो ! तुम्हारा स्वागत है। तात ! आज हम बहुत खुश हैं, क्योंकि हमे दीर्घकालके बाद तुम्हे देखनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है ॥ ७ ॥

प्रीताश्चैव वयं वीर यत्त्वं पुनरिहागतः।
विख्यातस्त्रिषु लोकेषु रामः शत्रुभयंकरः ॥ ८ ॥

'वीर ! तुम जो पुनः लौटकर यहाँ आये हो, इससे हम बहुत संतुष्ट हैं। शत्रुओंको भय देनेवाले वीर बलरामकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है ॥ ८ ॥

वर्धनीया वयं वीर त्वया यादवन्दन।
अथवा प्राणिनस्तात रमन्ते जन्मभूमिषु ॥ ९ ॥

'वीर ! यादवन्दन ! यहाँ आकर तुमने हमारा गौरव बढ़ाया है, यह तुम्हारे लिये उचित ही है। अथवा तात ! अपनी जन्मभूमिमें सभी प्राणियोंको सुख मिलता है ॥ ९ ॥

त्रिदशानां वयं मान्या ध्रुवमद्यामलानन।
ये स्म दृष्टास्त्वया तात काङ्क्षमाणारतवागमम् ॥ १०॥

'अमलानन ! तुमने जो हम लोगोंपर कृपादृष्टि की है, इससे निश्चय ही अब हम देवताओके लिये भी माननीय हो गये। तात ! हमलोग प्रतिदिन तुम्हारा शुभागमन चाहते थे॥१०॥

दिष्ट्या ते निहता मल्लाः कंसश्च विनिपातितः।
उग्रसेनोऽभिषिक्तश्च माहात्म्येन जनेन वै ॥ ११ ॥

'बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम दोनों भाइयोंके द्वारा वे मल्ल मारे गये, कंस भी मार गिराया गया तथा उग्रसेनका राज्यपर अभिषेक हो गया। उनके महात्मापन (साधुस्वभाव) के कारण ही सब लोगोंने उनको राज्यपर अभिषिक्त किया है ॥ ११ ॥

समुद्रे च श्रुतोऽस्माभिस्तिमिना सह विग्रहः।
वधः पञ्चजनस्यैव जरासंधेन विग्रहः।
गोमन्ते च श्रुतोऽस्माभिः क्षत्रियैः सह विग्रहः ॥ १२ ॥

'हमने यह भी सुना है कि समुद्रमे तिमि (पञ्चजन नामक मगरमच्छ) के साथ तुमलोगोंका युद्ध हुआ था। उसमें पञ्चजन मारा गया। तत्पश्चात् मथुरामें जरासंधके साथ बड़ा भारी युद्ध हुआ। इतना ही नहीं, हमारे सुननेमें यह भी आया है कि गोमन्तपर्वतके निकट क्षत्रियोंके साथ तुम लोगोंका घोर युद्ध हुआ था ॥ १२ ॥

दरदस्य वधश्चैव जरासंधपराजयः।
तत्रायुधावतरणं श्रुतं नः परमाहवे ॥ १३ ॥

'उस संग्राममे राजा दरदका वध हुआ और जरासंधकी पराजय हुई। सुना था कि उस महायुद्धमें तुम लोगोंके लिये आकाशसे दिव्य आयुध उतर आये थे ॥ १३ ॥

वधश्चैव शृगालस्य करवीरपुरोत्तमे।
तत्सुतस्याभिषेकश्च नागराणां च सान्त्वनम् ॥ १४ ॥

३८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

‘इसके सिवा, उत्तम करवीरपुरमे राजा शृगालका वध करके उसके पुत्रका वहाँ अभिषेक किया गया और वहाँके नागरिकोंको तुम्हारी ओरसे सान्त्वना दी गयी ॥ १४॥

मधुरायां प्रवेशश्च कीर्तनीयः सुरोत्तमैः।
प्रतिष्ठिता च वसुधा पार्थिवाश्च वशीकृताः ॥ १५॥

‘फिर तुमलोगोंका मथुरामें प्रवेश हुआ, जो देवताओंके लिये कीर्तन करने योग्य है। पृथ्वीका भार उतारकर तुमने इसे भलीभाँति प्रतिष्ठित कर दिया और भूमण्डलके सभी नरेशोंको वशमें कर लिया ॥ १५ ॥

तत्र चागमनं दृष्ट्वा सभाग्याः स्म यथा पुरा।
तेन स्म परितुष्टा वै हृषिताश्च सबान्धवाः ॥ १६॥

‘तुम्हारा शुभागमन देखकर हम पूर्ववत् सौभाग्यशाली हो गये हैं। हमें सब तरहसे संतोष प्राप्त हुआ है और हम अपने बन्धु-बान्धवोंसहित हर्षसे उत्फुल्ल हो उठे हैं’॥ १६॥

प्रत्युवाच ततो रामः सर्वांस्तानभितः स्थितान्।
यादवेष्वपि सर्वेषु भवन्तो मम बान्धवाः ॥ १७॥
इहावयोर्गतं बाल्यमिह चैवावयो रतम्।
भवद्भिर्वर्द्धिताद्वैव यास्यामो विक्रियां कथम् ॥ १८॥

तब बलरामजीने अपने सब ओर खड़े हुए उन समस्त गोपोंसे कहा—‘समस्त यादवोंके होते हुए भी आपलोग ही हमारे सगे बान्धव हैं। यहीं हम लोगोंका बचपन बीता, यहीं हम खेले-कूदे और आप लोगोंने ही हमें पाल-पोषकर बड़ा किया; फिर हम आप लोगोंको भुला कैसे सकते हैं॥ १७-१८॥

गृहेषु भवतां भुक्तं गावश्च परिरक्षिताः।
अस्माकं बान्धवाः सर्वे भवन्तो वृद्धसौहृदाः ॥ १९॥

‘हमने आपके घरोंमें खाया-पीया और गौएँ चरायीं। आप सब लोग हममे अनुराग रखनेवाले हमारे बन्धु-बान्धव हैं’ ॥ १९॥

ब्रुवत्येवं यथातत्त्वं गोपमध्ये हलायुधे।
संहृष्टवदना भूयो बभूवुर्व्रजयोषितः ॥ २०॥

हल धारण करनेवाले बलरामजी जब इस प्रकार यथार्थ बात कह रहे थे, उस समय उनकी बातें सुनकर व्रजसुन्दरियोंके मुखपर पुनः प्रसन्नता छा गयी ॥ २० ॥

ततो वनान्तरगतो रेमे रामो महाबलः।
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ते रामाय विदितात्मने ॥ २१॥
गोपालैर्देशकालज्ञैरूपानीतं वारुणी।
सोऽपिबत् पाण्डुराभ्रामस्तत्कालं ज्ञातिभिर्वृतः॥२२॥

तदनन्तर, महाबली बलराम वनके भीतर जाकर सुखपूर्वक विचरने लगे। इसी समय उनके मनोभावको जानकर देश-कालके ज्ञाता गोपालगण उनके लिये वारुणी (सुधा या शहद) ले आये। फिर उन बन्धुजनोंसे घिरे हुए गौर-कान्ति बलरामने उस समय उसका पान किया ॥ २१-२२ ॥

वनान्तरगतो रामः पानं मदसमीरणम्।
उपनिन्युस्ततस्तस्मै वन्यानि विविधानि च ॥ २३॥
प्रत्यग्ररमणीयानि पुष्पाणि च फलानि च।
मेध्यांश्च विविधान् गन्धान् भक्ष्यांश्च हृदयंगमान्।
सद्यो हृतानि पद्मानि विकचान्युत्पलानि च ॥ २४॥

वनमें गये हुए बलरामजीने जो मद्य पीया था, वह कुछ नशा लानेवाला था; उसके पीनेके बाद ग्वाल-बाल उनके लिये वनके नाना प्रकारके पुष्प और फल ले आये, जो अभी नये (ताजे) होनेके कारण बड़े रमणीय लगते थे। इसके सिवा गोपोंने उनके लिये भाँति-भाँतिकी पवित्र गन्ध तथा मनोरम भक्ष्य पदार्थ प्रस्तुत किये। तुरंतके लाये हुए विकसित कमल और उत्पल भी भेंट किये ॥ २३-२४॥

शिरसा चारुकेशेन किंचिदावृत्तमौलिना।
श्रवणैकावलम्बेन कुण्डलेन विराजता ॥ २५॥
चन्दनाद्रेण पीतेन वनमालावलम्बिना।
विबभावुरसा रामः कैलासेनेव मन्दरः ॥ २६॥

बलरामजीके सिरके बाल बड़े मनोहर थे। उसपर रखा हुआ मुकुट कुछ टेढ़ा था। उनके एक कानमें सुन्दर कुण्डल लटक रहा था। वक्षःस्थल चन्दनके अनुलेपसे आर्द्र एवं पीत था, उसपर वनमाला लटक रही थी। ऐसे वक्षसे बलरामजीकी वैसी ही शोभा होती थी, जैसे कैलास पर्वतसे मन्दराचल सुशोभित होता है॥ २५-२६॥

नीले वसानो वसने प्रत्यग्रजलदप्रभे।
रराज वपुषा शुभ्रस्तिमिरेद्ये यथा शशी ॥ २७॥

उन्होंने नूतन जलधरके समान कान्तिवाले दो नीले वस्त्र धारण कर रखे थे और शरीरसे वे गोरे थे; अतः अन्धकार-राशिमें चन्द्रमाके समान सुशोभित होते थे ॥ २७॥

लाङ्गलेनावसिक्तेन भुजगाभोगवर्तिना।
तथा भुजाग्रश्लिष्टेन मुसलेन च भास्वता ॥ २८॥

उनके एक हाथमें सर्प-शरीरके समान हल शोभा पाता था और दूसरेमें प्रकाशमान मुसल ॥ २८ ॥

स मत्तो बलिनां श्रेष्ठो रराजाघूर्णित्ताननः।
शैशिरीषु त्रियामासु यथा स्वेदालसः शशी ॥ २९॥

बलवानोंमे श्रेष्ठ बलरामजी मधुसे मत्त-से हो रहे थे। उनका मुख झूम रहा था। वे ऐसे लगते थे, मानो शरद्की रातोंमे स्वेद-बिन्दुओंसे युक्त अलसाये हुए चन्द्रमा शोभा पाते हों ॥ २९ ॥

रामस्तु यमुनामाह स्नातुमिच्छे महानदि।
एहि मामभिगच्छ त्वं रूपिणी सागरंगमे ॥ ३०॥

विष्णुपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ३८९

उस समय बलरामजीने यमुनासे कहा—'महानदि ! मैं स्नान करना चाहता हूँ। सागरगामिनि ! मूर्तिमती होकर आओ, चलो मेरे साथ' ॥ ३० ॥

संकर्षणस्य मत्तोक्तां भारतीं परिभूय सा । नाभ्यवर्तत तं देशं स्त्रीस्वभावेन मोहिता ॥ ३१ ॥

संकर्षणकी बातको मतवालेकी बहक समझकर नारी-स्वभावसे मोहित हुई उस नदीने उसकी अवहेलना कर दी। वह उनके अभीष्ट स्थानको नहीं गयी ॥ ३१ ॥

ततश्चुक्रोध बलवान् रामो मदसमीरितः । चकार स हलं हस्ते कर्षणाधोमुखं बली ॥ ३२ ॥

तब बलवान् बलराम मदसे प्रेरित हो कुपित हो उठे। उन्होंने यमुनाका कर्षण करनेके लिये हलका मुख नीचेको कर लिया ॥ ३२ ॥

तस्यामुपरि मेदिन्यां पेतुस्तामरसस्रजः । मुमुचुः पुष्पकोशैश्च वासरेण्वरुणं जलम् ॥ ३३ ॥

यमुनाको खींचते समय उनके गलेसे जो कमल-पुष्पकी मालाएँ टूटकर पृथ्वीपर गिरीं, वे पुष्प-कोशोंद्वारा सुगन्धित परागसे अरुण रंगका जल छोड़ने लगीं ॥ ३३ ॥

स हलेनानताग्रेण कूले गृह्य महानदीम् । चकर्ष यमुनां रामो व्युत्थितां वनितामिव ॥ ३४ ॥

जिसका अग्रभाग कुछ झुका हुआ था, उस हलको यमुनाके तटसे लगाकर स्वेच्छाचारिणी वनिताके समान उस महानदीको अभीष्ट दिशाकी ओर खींचा ॥ ३४ ॥

सा विह्वलजलस्रोता ह्रदप्रस्थितसंचया । व्यावर्तत नदी भीता हलमार्गानुसारिणी ॥ ३५ ॥

उसका जल-स्रोत क्षुब्ध हो उठा। कुण्डोंमें जो अगाध जलराशिका संचय था, वह वहाँसे निकलने लगा और वह नदी भयभीत-सी होकर हलके बनाये हुए मार्गसे चलने लगी ॥

लाङ्गलादिष्टवर्त्मा सा वेगगा वक्रगामिनी । संकर्षणभयत्रस्ता योषेवाकुलतां गता ॥ ३६ ॥

हलकी रेखा ही उसे गन्तव्य मार्गका आदेश दे रही थी। सीधे मार्गपर वेगसे बहनेवाली वह नदी टेढ़े रास्तेपर मन्थर गतिसे चलने लगी। वह संकर्षणके भयसे त्रस्त हुई किसी युवतीकी भाँति व्याकुल हो उठी थी ॥ ३६ ॥

पुलिनश्रोणिविम्बोष्ठी मृदितैस्तोयताडितैः । फेनमेखलसूत्रैश्च च्छिन्नैरम्बुदगामिनी ॥ ३७ ॥

दोनों किनारे ही उसके नितम्ब थे, रक्तकमलोंका समूह ही उसके अरुण अधरोंका प्रतीक था। फेन ही उसके मेखला-सूत्र थे, जो जलसे ताड़ित और मर्दित होकर छिन्न-भिन्न हो गये थे; वह नदीरूपिणी युवती समुद्ररूपी प्रियतमके साथ समागम करनेवाली थी ॥ ३७ ॥

तरङ्गविषमापीडा चक्रवाकोन्नतस्तनी । वेगगम्भीरवक्राङ्गी त्रस्तमीनविभूषणा ॥ ३८ ॥

उसके तरङ्गरूपी शिरोभूषण ऊँचे-नीचे हो रहे थे; चक्रवाकरूपी स्तन ऊँचे उठे हुए थे; उसके गम्भीर अंग वेगके कारण वक्र हो रहे थे; वह त्रस्त मीनरूपी आभूषणोंसे विभूषित थी ॥ ३८ ॥

सितहंसेक्षणापाङ्गी काशक्षौमोच्छ्रिताम्बरा । तीरजोधूतकेशान्ता जलस्खलितगामिनी ॥ ३९ ॥

श्वेत हंस उसके नेत्र और अपाङ्ग थे, काश-पुष्प उसके फहराते हुए रेशमी वस्त्र थे, तटवर्ती पौधे या वृक्ष उसके केश थे तथा जलका प्रवाह ही उसकी स्खलित गतिका प्रतीक था॥

लाङ्गलोल्लिखितापाङ्गी क्षुभिता सागरंगमा । मत्तेव कुटिला नारी राजमार्गेण गच्छती ॥ ४० ॥

उसके नेत्र-प्रान्त मानो हलकी नोकसे छिल गये थे, वह सागरगामिनी क्षुब्ध हो उठी थी, वह कुटिला एवं मतवाली स्त्रीके समान खुली सड़कपर चल रही थी ॥ ४० ॥

कृष्यते सातिवेगेन स्रोतःस्खलितगामिनी । उन्मार्गानीतमार्गा सा येन वृन्दावनं वनम् ॥ ४१ ॥

ऊँचे-नीचे प्रवाह ही उसकी स्खलित गतिके सूचक थे। वह उस विपरीत मार्गपर लायी गयी थी, जिस ओर वृन्दावन सुशोभित होता था ॥ ४१ ॥

वृन्दावनस्य मध्येन सा नीता यमुना नदी । रोरूयमाणेव खगैरन्विता तोयवासिभिः ॥ ४२ ॥

यमुना नदी वृन्दावनके बीचसे लायी गयी थी। जलमें निवास करनेवाले पक्षी उसके साथ-साथ बोलते हुए आ रहे थे। उन पक्षियोंके शब्दोंमें मानो वह नदी ही जोर-जोरसे रो रही थी ॥ ४२ ॥

सा यदा समतिक्रान्ता नदी वृन्दावनं वनम् । तदा स्त्रीरूपिणी भूत्वा यमुना राममब्रवीत् ॥ ४३ ॥

वह नदी जब वृन्दावनको लाँघ गयी, तब स्त्रीरूपमें प्रकट हो बलरामजीसे बोली—॥ ४३ ॥

प्रसीद नाथ भीतास्मि प्रतिलोमेन कर्मणा । विपरीतमिदं रूपं तोयं च मम जायते ॥ ४४ ॥

'नाथ ! प्रसन्न होइये। मैं आपके इस विपरीत कर्मसे बहुत डर गयी हूँ। मेरा यह रूप और जल विपरीत हो गया है ॥ ४४ ॥

असत्यहं नदीमध्ये रौहिणेय त्वया कृता । कर्षणेन महाबाहो स्वमार्गाव्यभिचारिणी ॥ ४५ ॥


१. नेत्रके अन्तभाग।

३९०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

'रोहिणीनन्दन ! महाबाहो ! आपने इस तरह मुझे खींचकर नदियोंके बीचमें 'असती' बना दिया। मुझे मेरे मार्गसे भ्रष्ट कर दिया ॥ ४५ ॥
प्राप्तां मां सागरे पूर्वं सपत्न्यो वेगगर्विताः।
फेनहासैर्हसिष्यन्ति तोयव्यावृत्तगामिनीम् ॥ ४६॥
'जब मैं समुद्रके निकट जाऊँगी, उस समय मेरी सौतें वेगसे गर्वित होकर अपने फेनरूपी हासोंद्वारा मेरी हँसी उड़ायेंगी, मुझे जलके द्वारा विपरीतगामिनी बतायेंगी ॥४६॥
प्रसादं कुरु मे वीर याचे त्वां कृष्णपूर्वज ।
सुप्रसन्नमना नित्यं भव त्वं सुरसत्तम ॥ ४७ ॥
'श्रीकृष्णके बड़े भैया वीर सुरश्रेष्ठ ! आप मुझपर कृपा करें। मैं आपसे याचना करती हूँ, आप मुझपर सदा प्रसन्न-चित्त रहें ॥ ४७ ॥
कर्षणायुधकृष्टास्मि रोषोऽयं विनिवर्त्यताम् ।
मूर्ध्ना गच्छामि चरणौ तवैषा लाङ्गलायुध ।
मार्गमादिष्टुमिच्छामि क्व गच्छामि महाभुज ॥ ४८ ॥
'हलायुध ! मैं आपके कर्षणायुध (हल) से यहाँतक खींच लायी गयी हूँ। आप अपने इस रोषको लौटा लें। मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखती हूँ। महाबाहो ! मुझे राह बताइये, मैं कहाँ जाऊँ ?' ॥ ४८ ॥

वैशम्पायन उवाच
प्रणयावनतां दृष्ट्वा यमुनां लाङ्गलायुधः।
प्रत्युवाचार्णववधूं मदक्लान्त इदं वचः ॥ ४९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! समुद्र-पत्नी यमुनाको प्रेमसे नतमस्तक हुई देख मधुके मदसे क्लान्त हुए बलरामजीने यह बात कही ॥ ४९ ॥
लाङ्गलादिष्टमार्गा त्वमिमं मे प्रियदर्शने।
देशमम्बुप्रदानेन प्लावयस्वाखिलं शुभे ॥ ५० ॥
'शुभे ! प्रियदर्शने ! मैंने हलके द्वारा तुम्हारे जानेके लिये मार्ग बता दिया है, तुम इस सारे प्रदेशको अपना जल देकर आप्लावित कर दो ॥ ५० ॥
एष ते सुभ्रु संदेशः कथितः सागरंगमे ।
शान्तिं व्रज महाभागे गम्यतां च यथासुखम् ॥ ५१ ॥
यावत् स्थास्यति लोकोऽयं तावत् तिष्ठतु मे यशः।
'सुभ्रू ! सागरगामिनी महाभागे ! यह तुम्हारे लिये सन्देश कहा गया है। शान्ति धारण करो और जहाँ तुम्हारी मौज हो चली जाओ। जबतक यह संसार रहेगा, तबतक मेरा यह सुयश भी बना रहेगा' ॥ ५१ १/२ ॥
यमुनाकर्षणं दृष्ट्वा सर्वे ते व्रजवासिनः ॥ ५२ ॥
साधु साध्विति रामाय प्रणामं चक्रिरे तदा ।
यमुनाजीका आकर्षण हुआ देख समस्त व्रजवासियोंने उस समय साधु ! साधु !! (वाह-वाह) कहकर बलरामजीको प्रणाम किया ॥ ५२ १/२ ॥
तां विसृज्य महाभागां तांश्च सर्वान् व्रजौकसः॥ ५३ ॥
ततः संचिन्त्य मनसा रामः प्रहरतां वरः।
पुनः प्रतिजगामाशु मथुरां रोहिणीसुतः ॥ ५४ ॥
महाभागा यमुना तथा उन समस्त व्रजवासियोंको विदा करके प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ रोहिणीपुत्र बलरामजीने मन-ही-मन कुछ सोचकर पुनः शीघ्र ही मथुराको प्रस्थान किया॥
स गत्वा मथुरां रामो भवने मधुसूदनम् ।
परिवर्तमानं ददृशे पृथिव्याः सारमव्ययम् ॥ ५५ ॥
मथुरा पहुँचकर बलरामने पृथ्वीके सारभूत अविनाशी मधुसूदनको भवनके भीतर शय्यापर करवट बदलते देखा ॥
तथैवाध्वन्यवेषेण सोपदिङ्गे जनार्दनम् ।
प्रत्यग्रवनमालेन वक्षसाभिविराजता ॥ ५६ ॥
तब उसी राहगीरके वेषमें बलरामने नूतन वनमालासे विभूषित सुन्दर वक्षःस्थलद्वारा भगवान् जनार्दनका आलिङ्गन किया ॥ ५६ ॥
स दृष्ट्वा तूर्णमायान्तं रामं लाङ्गलधारिणम् ।
सहसोत्थाय गोविन्दो ददावासनमुत्तमम् ॥ ५७ ॥
लाङ्गलधारी बलरामको शीघ्रतापूर्वक आते देख गोविन्दने सहसा उठकर उनके लिये उत्तम आसन दिया ॥ ५७ ॥
उपविष्टं तदा रामं पप्रच्छ कुशलं व्रजे ।
बान्धवेषु च सर्वेषु गोषु चैव जनार्दनः ॥ ५८ ॥
जब बलरामजी बैठ गये, तब श्रीकृष्णने उनसे व्रजकी कुशल पूछी। समस्त बान्धवों तथा गौओंके विषयमें भी जिज्ञासा की ॥ ५८ ॥
प्रत्युवाच ततो रामो भ्रातरं साधुभाषिणम् ।
सर्वत्र कुशलं कृष्ण येषां कुशलमिच्छसि ॥ ५९ ॥
तब बलरामने उत्तम भाषण करनेवाले भाई श्रीकृष्णको इस प्रकार उत्तर दिया, 'श्रीकृष्ण ! तुम जिनकी कुशल चाहते हो, उनकी सर्वत्र कुशल है' ॥ ५९ ॥
ततस्तयोर्विचित्रार्थाः पौराण्योऽत्राभवन् कथाः।
वसुदेवाग्रतः पुण्या रामकेशवयोस्र्तदा ॥ ६० ॥
तदनन्तर वसुदेवजीके आगे बलराम और श्रीकृष्णकी विचित्र अर्थसे युक्त पवित्र एवं पुरातन कथाएँ होने लगीं ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि यमुनाकर्षणे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलरामजीके द्वारा यमुनाजीका आकर्षणविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

विष्णुपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ३९१ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीकृष्णका यादवोंके साथ रुक्मिणी-स्वयंवरके अवसरपर कुण्डिनपुरमें जाना तथा राजा कैशिकद्वारा उनका सत्कार . वैशम्पायन उवाच एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता लोकप्रवृत्तिका नराः । चक्रायुधगृहं सर्वे लोकपालगृहोपमम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! इसी बीचमें जगत्में होनेवाली प्रवृत्तियों अथवा घटनाओंकी सूचना देने- वाले सब लोग मथुरामें आये और लोकपालोंके भवनकी भाँति शोभा पानेवाले चक्रधारी श्रीकृष्णके गृहमें एकत्र हुए ॥ १ ॥ तेष्वात्ययिकशंसीषु लोकप्रवृत्तिकेष्विह । कृतसंज्ञा यदुश्रेष्ठाः समेताः कृष्णसंसदि ॥ २ ॥ वे लोग विनाशकारी युद्धका समाचार बताना चाहते थे। उनके आ जानेपर आपसका संकेत पाकर समस्त श्रेष्ठ यादव श्रीकृष्णकी सभामें जुट गये ॥ २ ॥ समागतेषु सर्वेषु यदुमुख्येषु संसदि । प्रवृत्तिका नराः प्राहुः पार्थिवात्ययिकं वचः ॥ ३ ॥ समस्त प्रधान यादवोंके उस सभामे आ जानेपर वे समाचार या सन्देश लानेवाले मनुष्य राजाओंके विनाशका कारणभूत वचन इस प्रकार बोले-॥ ३ ॥ जनार्दन नरेन्द्राणां पार्थिवानां समागमः । भविष्यति क्षितीशानां समृद्धानामनेकशः ॥ ४ ॥ 'जनार्दन ! अनेक देशोंके विवाहार्थी पृथ्वीपतियों, शासकों एवं नरेशोंका समागम होनेवाला है ॥ ४ ॥ त्वरितास्तत्र गच्छन्ति नानाजनपदेश्वराः । कुण्डिने पुण्डरीकाक्ष भोजपुत्रस्य शासनात् ॥ ५ ॥ 'कमलनयन ! भोजपुत्र रुक्मीका निमन्त्रण पाकर अनेक जनपदोंके राजा बड़ी उतावलीके साथ वहाँ कुण्डिनपुरमें जा रहे हैं ॥ ५ ॥ प्रकाशं सा कथास्तत्र श्रूयन्ते मनुजेरिताः । रुक्मिणी किल नामास्ति रुक्मिणः प्रथमा स्वसा ॥ ६ ॥ भावी स्वयंवरस्तत्र तस्याः किल जनार्दन । इत्यर्थमेते सबला गच्छन्ति मनुजाधिपाः ॥ ७ ॥ 'जनार्दन ! वहाँ लोगोंके मुँहसे यह बात स्पष्टरूपसे सुनी जाती है कि रुक्मीकी जो पहली बहन है, जिसका नाम रुक्मिणी है, उसका वहाँ स्वयंवर होनेवाला है। इसीलिये ये नरेशगण सेनाओंसहित वहाँ पधार रहे हैं ॥ ६-७ ॥ तस्यास्त्रैलोक्यसुन्दर्यास्तृतीयेऽहनि यादव । रुक्मभूषणभूषिण्या भविष्यति स्वयंवरः ॥ ८ ॥ 'यदुनन्दन ! आजसे तीसरे दिन सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित रहनेवाली उस त्रिलोकसुन्दरी रुक्मिणीका स्वयंवर होगा ॥ ८ ॥ राज्ञां तत्र समेतानां हस्त्यश्वरथगामिनाम् । द्रक्ष्यामः शतशस्तत्र शिबिराणि महात्मनाम् ॥ ९ ॥ 'हाथी, घोड़े और रथसे यात्रा करके वहाँ एकत्र हुए महामनस्वी नरेशोंके सैकड़ों शिविर हमें वहाँ देखनेको मिलेंगे। सिंहशार्दूलदृप्तानां मत्तद्विरदगामिनाम् । सदा युद्धप्रियाणां हि परस्परममर्षिणाम् ॥ १० ॥ जयाय शीघ्रं सहिता बलौघेन समन्विताः । निरुद्धाः पृथिवीपालाः किमेकान्तचरा वयम् । निरुत्साहा भविष्यामो गच्छामो यदुनन्दन ॥ ११ ॥ 'जो सिंह और बाघके समान अपने बलके घमण्डमें भरे रहते हैं, मतवाले हाथियोंके समान चलते हैं, सदा युद्धसे ही प्रेम रखते हैं और आपसमें एक दूसरेके प्रति अमर्षसे भरे रहते हैं, ऐसे नरेशोंपर शीघ्र विजय पानेके लिये बहुत-से भूपाल अपने सैन्यसमूहके साथ संगठित होकर वहाँ रुक्मिणी- को पानेकी इच्छासे रुके हुए हैं। यदुनन्दन ! क्या हमलोग एकान्तमे रहनेवाले कोल-भील हैं, जो ऐसे अवसरपर उत्साह- हीन हो बैठे रहेंगे, हम भी अवश्य उत्साहपूर्वक वहाँ चलेंगे' ॥ श्रुत्वैतत् केशवो वाक्यं हृदि शल्यमिवार्पितम् । निर्जगाम यदुश्रेष्ठो यदूनां संहितो बलैः ॥ १२ ॥ यह समाचार सुनकर श्रीकृष्णको ऐसा लगा, जैसे उनके हृदयमें किसीने काँटा-सा चुभो दिया हो। वे यदुश्रेष्ठ गोविन्द यदुवंशियोंकी सेनाके साथ नगरसे बाहर निकले ॥ १२ ॥ यादवास्ते बलोदग्राः सर्वे संग्रामलालसाः । निर्ययुः स्यन्दनवरैर्गर्वितास्त्रिदशा इव ॥ १३ ॥ वे समस्त यादव, जो बलमें बढ़े-चढ़े थे और संग्रामकी लालसा रखते थे, श्रेष्ठ रथोंद्वारा यात्राके लिये निकले। उस समय वे गर्वीले देवताओंके समान जान पड़ते थे ॥ १३ ॥ बलाग्रेण नियुक्तेन हरिरीशानसम्मतः । चक्रोद्यतकरः कृष्णे गदापाणिर्व्यरोचत ॥ १४ ॥ अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाली श्रेष्ठ सेनाके साथ यात्राके लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीकृष्ण, जो शिवजीके परम प्रिय हैं, एक हाथमें चक्र और दूसरेमें गदा लिये बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ १४ ॥

३९२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

यादवाश्चापरे तत्र वासुदेवानुयायिनः ।
रथैरादित्यसंकाशैः किङ्किणीप्रतिनादितैः ॥ १५ ॥

दूसरे यादव भी सूर्यके समान तेजस्वी तथा छोटी-छोटी घण्टियोंके नादसे निनादित रथोंद्वारा भगवान् वासुदेवके पीछे-पीछे वहाँ जानेको उद्यत हुए ॥ १५ ॥

उग्रसेनं तु गोविन्दः प्राह निश्चितदर्शनः ।
तिष्ठ त्वं नृपशार्दूल भ्रात्रा मे सहितोऽनघ ॥ १६ ॥

उस समय निश्चित दृष्टि रखनेवाले भगवान् गोविन्दने राजा उग्रसेनसे कहा— 'अनघ ! नृपश्रेष्ठ ! आप मेरे बड़े भाई बलरामजीके साथ यहीं रहिये ॥ १६ ॥

क्षत्रिया विकृतिप्रज्ञाः शास्त्रनिश्चितदर्शनाः ।
पुरीं शून्यामिमां वीर जघन्येऽभिपतन्ति ह ॥ १७ ॥

'वीर ! प्रायः क्षत्रिय छल-कपटमे चतुर होते हैं, उनकी दृष्टि राजनीतिक ही सीमित रहती है । कहीं ऐसा न हो कि वे मेरे जानेके पश्चात् इस पुरीको सूनी समझकर इसपर आक्रमण कर दें ॥ १७ ॥

अस्माकं शङ्किताः सर्वे जरासंधवशानुगाः ।
मोदन्ते सुखिनस्तत्र देवलोके यथामराः ॥ १८ ॥

'हमसे शङ्कित हो वे सब-के सब जरासंधके वशवर्ती हो गये हैं और देवलोकमे निवास करनेवाले देवताओंकी भाँति वे जरासंधके यहाँ बड़े सुख और आनन्दसे रहते हैं' ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भोजराजो महायशाः ।
कृष्णस्नेहेन विक्लुतं बभाषे वचनामृतम् ॥ १९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकी वह बात सुनकर महायशस्वी भोजराज उग्रसेन उनके स्नेहसे गद्गद हुई अमृतमयी वाणीमें बोले ॥ १९ ॥

कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्द्धन ।
श्रूयतां यदहं त्वद्य वक्ष्यामि रिपुसूदन ॥ २० ॥

'कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो !!! तुम यादवोंका आनन्द बढ़ानेवाले हो। शत्रुसूदन ! इस समय मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसको सुनो ॥ २० ॥

त्वया विहीनाः सर्वे स्म न शक्ताः सुखमासितुम् ।
पुरेऽस्मिन् विषयान्ते वा पतिहीना इव स्त्रियः ॥ २१ ॥

'तुम्हारे बिना हम सब लोग इस नगर या राज्यमे सुखसे नहीं रह सकते, ठीक उसी तरह जैसे पतिहीन स्त्रियाँ कहीं भी सुखसे नहीं रह पाती हैं ॥ २१ ॥

त्वत्सनाथा वयं तात त्वद्बाहुबलमाश्रिताः ।
विभीमो न नरेन्द्राणां सेन्द्राणामपि मानद ॥ २२ ॥

'दूसरोंको मान देनेवाले तात ! तुमसे ही हमलोग सनाथ हैं। तुम्हारे बाहुबलका आश्रय लेकर हम नरेन्द्रोंकी तो बात ही क्या है ? देवेन्द्रसहित देवताओंसे भी नहीं डरते हैं ॥ २२ ॥

विजयाय यदुश्रेष्ठ यत्र यत्र गमिष्यसि ।
तत्र त्वं सहितोऽस्माभिर्गच्छेथा यादवर्षभ ॥ २३ ॥

'यदुश्रेष्ठ ! यादवप्रवर ! तुम विजयके लिये जहाँ-जहाँ भी जाओ, वहाँ हम लोगोंके साथ ही चलो' ॥ २३ ॥

तस्य राज्ञो वचः श्रुत्वा सस्मितं देवकीसुतः ।
यथेष्टं भवतामद्य तथा कर्तास्म्यसंशयम् ॥ २४ ॥

राजा उग्रसेनका यह वचन सुनकर देवकीनन्दन श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए बोले, 'महाराज ! आप लोगोंकी जैसी इच्छा होगी, वैसा ही मैं करूँगा इसमें संशय नहीं है' ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु वै कृष्णो जगामाशु रथेन वै ।
भीष्मकस्य गृहं प्राप्तो लोहितायति भास्करे ॥ २५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण शीघ्र ही रथसे चल दिये और सूर्यका रंग लाल होते राजा भीष्मकके घरपर जा पहुँचे ॥ २५ ॥

प्राप्ते राजसमाजे तु शिविराकीर्णभूतले ।
रङ्गं सुविपुलं दृष्ट्वा राजसीं तनुमाविशत् ॥ २६ ॥

राजाओंका समाज आ चुका था । उनके शिविरोंसे कुण्डिनपुरके आस-पासका भूभाग आच्छादित हो गया था । स्वयंवरका रङ्गमथल भी बहुत विस्तृत था । उसे देखकर भगवान् श्रीकृष्णने राजस प्रकृतिका आश्रय लिया ॥ २६ ॥

वित्रासनार्थं भूपानां प्रकाशार्थं पुरातनम् ।
मनसा चिन्तयामास वैनतेयं महाबलम् ॥ २७ ॥

उन्होंने राजाओंको डराने और अपने प्रभावको प्रकाशित करनेके लिये पुरातन वाहन महाबली विनतानन्दन गरुड़का मन-ही-मन चिन्तन किया ॥ २७ ॥

ततश्चिन्तितमात्रस्तु विदित्वा विनतात्मजः ।
सुखलक्ष्यं वपुः कृत्वा निलिल्ये केशवान्तिके ॥ २८ ॥

उनके चिन्तन करनेमात्रसे ही उनके मनोभावको जान-कर विनताकुमार गरुड़ सुखपूर्वक देखने योग्य सौम्य शरीर धारण करके श्रीकृष्णके पास छिपे हुए आये ॥ २८ ॥

तस्य पक्षनिपातेन पवनोद्ध्रान्तकारिणा ।
कम्पिता मनुजाः सर्वे न्युब्जाश्च पतिता भुवि ॥ २९ ॥

उनका पंखसंचालन वायुको भी उद्भ्रान्त कर देनेवाला था । इसकी हवा लगनेसे वहाँके सारे मनुष्य काँप उठे और औंधे होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २९ ॥

गरुडाभिहताः सर्वे प्रचेष्टन्तो यथोरगाः ।
तान् संनिपतितान् दृष्ट्वा कृष्णो गिरिरिवाचलः ॥ ३० ॥

विष्णुपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ३९३


स तदा पक्षवातेन मेने पतगसत्तमम्।
गरुडके वेगसे आहत होकर पृथ्वीपर गिरे हुए वे सारे मनुष्य सर्पोंके समान छटपटाने लगे। उन सबको गिरा हुआ देख पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हुए श्रीकृष्णने उस समय पङ्खकी हवासे ही यह अनुमान कर लिया कि पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ आ गये ।(फिर उन्होंने मन-ही-मन उनका आदर किया) ॥ ३०१/२ ॥

ददर्श गरुडं प्राप्तं दिव्यस्रगनुलेपनम् ॥ ३१ ॥
पक्षवातेन पृथिवीं चालयन्तं मुहुर्मुहुः।
थोड़ी देरमें ही उन्होंने देखा, गरुड़ आ पहुँचे। वे दिव्य पुष्पोंके हार और दिव्य चन्दनसे अलंकृत थे। वे अपने पंखोंके संचालनसे उठी हुई वायुके द्वारा पृथ्वीको भी वारंवार हिला देते थे ॥ ३११/२ ॥

पृष्ठासक्तैः प्रहरणैर्लेलिहन्तमिवोरगैः ॥ ३२ ॥
वैष्णवं हस्तसंश्लेपं मन्यमानमवाङ्मुखम् ।
उनके पृष्ठभागमें कुछ दिव्य आयुध सटे हुए थे, जिनसे ऐसा जान पड़ता था कि कुछ सर्प उन्हें चाट रहे हैं। वे मुँह नीचे किये मन-ही-मन अनुभव कर रहे थे कि मुझे भगवान् विष्णुके वरद हस्तका स्पर्श प्राप्त हो रहा है॥३२१/२॥

चरणाभ्यां प्रकर्षन्तं पाण्डुरं भोगिनां वरम् ॥ ३३ ॥
हेमपत्रैरुपचितं धातुमन्तमिवाचलम्।
गरुड़ अपने दोनों पंजोंसे एक विशाल सर्पको खींचे चले आ रहे थे, जिसका रंग श्वेत था। वे सुवर्णमय पंखोंसे सम्पन्न होनेके कारण विविध धातुओंसे युक्त पर्वतके समान प्रतीत होते थे ॥ ३३१/२ ॥

अमृतारम्भहर्तारं द्विजिह्वेन्द्रविनाशनम् ॥ ३४ ॥
त्रासनं दैत्यसंघानां वाहनं ध्वजलक्षणम्।
ये वे ही गरुड़ थे, जिन्होंने एक बार अमृतका अपहरण कर लिया था। वे बड़े-बड़े सर्पराजोंका विनाश करनेमें समर्थ, दैत्यसमूहोंको भयभीत करनेवाले तथा भगवान् विष्णुके ध्वजचिह्न एवं वाहन थे ॥ ३४१/२ ॥

तं दृष्ट्वा स ध्वजं प्राप्तं सचिवं साम्परायिकम् ॥ ३५ ॥
धृतिमन्तं गरुत्मन्तं जगाद मधुसूदनः।
दृष्ट्वा परमसंरूहृष्टः स्थितं देवमिवापरम्।
तुल्यसामर्थ्यया वाचा गरुत्मन्तमवस्थितम् ॥ ३६ ॥
अपने ध्वज, सचिव तथा संकटकालके साथी धैर्यवान् गरुड़को आया देख भगवान् मधुसूदनको बड़ा हर्ष हुआ। वे दूसरे देवताकी भाँति सामने खड़े थे। इस प्रकार सम्मुख उपस्थित हुए गरुड़से अपने समान शक्तिशालीनी वाणीद्वारा मधुसूदनने इस प्रकार कहा ॥ ३५-३६ ॥


श्रीकृष्ण उवाच
स्वागतं खेचरश्रेष्ठ सुरसेनारिमर्दन ।
विनताहृदयानन्द स्वागतं केशवप्रिय ॥ ३७ ॥
**श्रीकृष्ण बोले—**आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ ! तुम्हारा स्वागत है। देवसेनाके शत्रुओंका मर्दन करनेवाले केशवप्रिय विनतानन्दन ! तुम्हारा स्वागत है ॥ ३७ ॥

व्रज पत्ररथश्रेष्ठ कैशिकस्य निवेशनम् ।
वयं तत्रैव गत्वाद्य प्रतीक्षाम स्वयंवरम् ॥ ३८ ॥
पंख ही जिनका रथ है, उन पक्षियोंमें सबसे श्रेष्ठ गरुड़ ! तुम राजा कैशिकके भवनमे चलो। हम आज वहीं चलकर स्वयंवरकी प्रतीक्षा करें ॥ ३८ ॥

राज्ञां तत्र समेतानां हस्त्यश्वरथगामिनाम्।
द्रक्ष्यामः शतशस्तत्र समेतानां महात्मनाम् ॥ ३९ ॥
वहाँ हाथी, घोड़े और रथोंद्वारा यात्रा करनेवाले सैकड़ों महामनस्वी नरेश एकत्र हुए हैं, जिनका हमें दर्शन प्राप्त होगा ॥ ३९ ॥

एवमुक्त्वा महाबाहुर्वैनतेयं महाबलम् ।
जगामाथ पुरीं कृष्णः कैशिकस्य महात्मनः ॥ ४० ॥
वैनतेयसखः श्रीमान् यादवैश्च महारथैः।
महाबली विनतानन्दन गरुड़से ऐसा कहकर महाबाहु श्रीमान् कृष्ण गरुड़ तथा महारथी यादवोंके साथ महामना कैशिककी राजधानी कुण्डिनपुरमें गये ॥ ४०१/२ ॥

विदर्भनगरीं प्राप्ते कृष्णे देवकिनन्दने ॥ ४१ ॥
हृष्टाः प्रमुदिताः सर्वे निवासायोपचक्रमुः ।
सर्वे शस्त्रास्त्रायुधधरा राजानो बलशालिनः ॥ ४२ ॥
देवकीनन्दन श्रीकृष्णके विदर्भनगरमें पहुँच जानेपर उनके साथके सब लोग बड़े प्रसन्न हुए । सबके मनमे बड़ा हर्ष हुआ। वे समस्त बलशाली तथा अस्त्र-शस्त्रधारी राजपूत वहाँ ठहरनेकी तैयारी करने लगे ॥ ४१-४२ ॥

वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु राजा नयविशारदः ।
कैशिकस्तत उत्थाय प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ४३ ॥
अर्घ्यमाचमनं दत्त्वा स राजा कैशिकः स्वयम्।
सत्कृत्य विधिवत् कृष्णं स्वपुरं सम्प्रवेशयत् ॥ ४४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! इसी समय नीतिविशारद राजा कैशिक प्रसन्नचित्तसे उठकर स्वयं ही श्रीकृष्णके पास गये और उन्हें अर्घ्य, आचमन आदि देकर विधिपूर्वक सत्कार करके अपने नगरमें ले आये ॥ ४३-४४॥

पूर्वमेव तु कृष्णाय कारितं दिव्यमन्दिरम्।


१. ये राजा कैशिक विदर्भराज भीष्मकके पिता तथा रुक्मीके पितामह थे।

३९४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विवेश सबलः श्रीमान् कैलासं शंकरो यथा ॥ ४५ ॥

उन्होंने श्रीकृष्णके लिये पहलेसे ही एक दिव्य भवनका निर्माण करा रखा था। जैसे भगवान् शंकर कैलासधाममें जाते हैं, उसी प्रकार श्रीमान् कृष्णने अपनी सेनाके साथ कैशिकके उस भवनमें प्रवेश किया ॥ ४५ ॥

सुखेन उषितः कृष्णस्तस्य राज्ञो निवेशने ।
पूजितो बहुमानेन स्नेहपूर्णेन चेतसा ॥ ४६ ॥

इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्ण उस राजमहलमें खान-पान आदिसे एवं रत्न-राशियोंद्वारा भलीभाँति पूजित हो सुखपूर्वक रहने लगे। राजा कैशिकने बड़े ही सम्मानके साथ स्नेहपूर्ण हृदयसे उनका पूजन किया था ॥ ४६ ॥

खाद्यपानादिरत्नौघैरर्चितो वासवानुजः ।
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरो सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीस्वयंवरविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥


अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीकृष्णके आगमनसे चिन्तित हुए राजाओंकी सभामें जरासंध और सुनीथका भाषण

वैशम्पायन उवाच

ते कृष्णमागतं दृष्ट्वा वैनतेयसहाच्युतम् ।
बभूवुश्चिन्ताव्यग्रिणः सर्वे नृपतिसत्तमाः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीकृष्णको गरुड़के साथ आया देख सभी श्रेष्ठ नरपति चिन्तामग्न हो गये ॥ १ ॥

ते समेत्य सभां राजन् राजानो भीमविक्रमाः ।
मन्त्राय मन्त्रकुशला नीतिशास्त्रार्थवित्तमाः ॥ २ ॥

राजन् ! वे भयानक पराक्रमी राजा नीति-शास्त्रके भी अच्छे ज्ञाता तथा मन्त्रणा करनेमें कुशल थे। उन्होंने परस्पर मन्त्रणा करनेके लिये एक सभामें एकत्र होनेका विचार किया ॥ २ ॥

भीष्मकस्य सभां गत्वा रम्यां हेमपरिष्कृताम् ।
सिंहासनेषु चित्रेषु विचित्रास्तरणेषु च ।
निपेदुस्ते नृपवरा देवा देवसभामिव ॥ ३ ॥

फिर जैसे देवता देवसभामें विराजमान होते हैं, उसी प्रकार वे श्रेष्ठ नरेशगण राजा भीष्मककी सुवर्णभूषित रमणीय सभामें जाकर विचित्र बिछौनोंसे युक्त भाँति-भाँतिके सिंहासनोंपर बैठे ॥ ३ ॥

तेषां मध्ये महाबाहुर्जरासंधो महाबलः ।
बभाषे स महातेजा देवान् देवेश्वरो यथा ॥ ४ ॥

उनके बीचमें महाबली, महातेजस्वी और महाबाहु जरासंधने उसी तरह भाषण देना आरम्भ किया, जैसे देवराज इन्द्र देवताओंके समक्ष प्रवचन करते हैं ॥ ४ ॥

जरासंध उवाच

श्रूयतां भो नृपश्रेष्ठा भीष्मकश्च महामतिः ।
कथ्यमानं मया बुद्ध्या वचनं वदतां वराः ॥ ५ ॥

जरासंध बोला—इस सभामें उपस्थित हुए वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेशो ! मैं यहाँ अपनी बुद्धिके अनुसार जो कुछ कह रहा हूँ, उसे आपलोग तथा परम बुद्धिमान् राजा भीष्मक भी सुनें ॥ ५ ॥

योऽसौ कृष्ण इति ख्यातो वसुदेवसुतो बली ।
वैनतेयसहायैन सम्प्राप्तः कुण्डिनं त्विह ॥ ६ ॥
कन्याहेतोर्महातेजा यादवैरभिसंवृतः ।
अवश्यं कुरुते यत्नं कन्यायाप्तिर्यथा भवेत् ॥ ७ ॥

वे जो श्रीकृष्ण नामसे विख्यात बलवान् वसुदेवपुत्र इस कुण्डिनपुरमें गरुड़के साथ पधारे हैं, बड़े तेजस्वी हैं। यहाँकी राजकन्याको प्राप्त करनेके लिये ही वे यादवोंसे घिरे हुए यहाँतक आये हैं। जिस तरह भी कन्याकी प्राप्ति हो सके वैसा प्रयत्न वे अवश्य करेंगे ॥ ६-७ ॥

यदत्र कारणं कार्यं सुनयोपेतमृद्धिमत् ।
कुरुध्वं नृपशार्दूला विनिश्चित्य बलाबलम् ॥ ८ ॥

श्रेष्ठ नरपतियो ! यहाँ जो सुनीतिसे युक्त तथा समृद्धिका हेतुभूत कारण (उपाय) काममें लाने योग्य है, उसे अपने बलाबलका विचार करके आपलोग करें ॥ ८ ॥

पदातिनौ महावीर्यौ वसुदेवसुतावुभौ ।
वैनतेयं विना तस्मिन् गोमन्ते पर्वतोत्तमे ।
कृतवन्तौ महाघोरं भवद्भिर्विदितं हि तत् ॥ ९ ॥

वसुदेवके ये दोनों पुत्र महान् पराक्रमी हैं। ये लोग पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्तपर गरुडको साथ लिये बिना पैदल ही आये थे, तो भी इन्होंने जो घोर महायुद्ध किया था, वह आपलोगोंको विदित ही है ॥ ९ ॥

वृष्णिभिर्यादवैश्चैव भोजान्धकमहारथैः ।
समेत्य युध्यमानस्य कीदृशो विग्रहो भवेत् ॥ १० ॥

इस समय जब ये यदुवंशी, वृष्णिवंशी, भोजवंशी तथा अन्धकवंशी महारथियोंके साथ मिलकर युद्ध करेंगे, तब इनका

[ विष्णुपर्व ] अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३९५


संग्राम कैसा होगा—(यह आपलोग स्वयं अनुमान कर सकते हैं) ॥१०॥

कन्यार्थे यतमानेन गरुडस्थेन विष्णुना।
कः स्थास्यति रणे तस्मिन्नपि शक्रः सुरैः सह ॥ ११॥

राजकन्याके लिये यत्न करते हुए इन गरुडवाहन भगवान् विष्णुके साथ युद्धमे देवताओंसहित इन्द्र ही क्यों न हों, कौन ठहर सकेगा ॥ ११॥

यदा चास्मै नापि सुता कदाचित् सम्प्रदीयते ।
ततो ह्ययं बलादेनां नेतुं शक्तः सुरैः सह ॥ १२॥

यदि कदाचित् इन्हें कन्या न भी दी जाय तो ये देवताओंके साथ उपस्थित हो बलपूर्वक इसे ले जानेमे समर्थ हैं॥

पुरा एकार्णवे घोरे श्रूयते मेदिनी वियम् ।
पातालतलसम्मग्ना विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ १३॥
वाराहं रूपमास्थाय उद्धृता जगदादिना ।
हिरण्याक्षश्च दैत्येन्द्रो वराहेण निपातितः ॥ १४ ॥

सुना जाता है कि प्राचीन कालमे यह पृथ्वी भयंकर एकार्णवमें निमग्न हो रसातलमे जा पहुँची थी। उस समय जगत्‌के आदि कारण इन्हीं प्रभावशाली विष्णुने वाराहरूप धारण करके इसका उद्धार किया था। उस समय दैत्यराज हिरण्याक्षको भी वाराहरूपसे ही मार गिराया था ॥ १३-१४॥

हिरण्यकशिपुश्चैव महाबलपराक्रमः ।
अवध्योऽमरदैत्यानामृषिगन्धर्वकिन्नरैः ॥ १५॥
यक्षराक्षसनागानां नाकाशे नावनिस्थले ।
न चाभ्यन्तररात्र्यहोर्न शुष्केणार्द्रेकेण च ॥ १६ ॥

महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न दैत्यराज हिरण्यकशिपु देवताओं और दैत्योके लिये भी अवध्य था। ऋषि, गन्धर्व और किन्नर भी उसे मार नहीं सकते थे। यक्ष, राक्षस और नागोंके लिये भी वह अजेय था। वह न तो आकाशमें मर सकता था, न पृथ्वीपर। न रातमे न दिनमे और न सूखे अस्त्रसे न गीले अस्त्रसे ही ॥ १५-१६ ॥

अवध्यस्त्रिषु लोकेषु दैत्येन्द्रस्त्वपराजितः ।
नरसिंहेन रूपेण निहतो विष्णुना पुरा ॥ १७॥

तीनो लोकोंमे अवध्य वह दैत्यराज किसीसे पराजित होनेवाला नहीं था, तो भी पूर्वकालमे भगवान् विष्णुने नरसिंहरूप धारण करके उसे मार डाला ॥ १७॥

वामनेन तु रूपेण कश्यपस्यात्मजो बली ।
अदित्या गर्भसम्भूतॊ बलिर्बद्धोऽसुरोत्तमः ॥ १८॥
सत्यरज्जुमयैः पाशैः कृतः पातालसंश्रयः ।

बनाये गये पाशोंद्वारा बाँध लिया और उसे पाताललोकका निवासी बना दिया ॥ १८½ ॥

कार्तवीर्यो महावीर्यः सहस्रभुजविग्रहः ॥ १९ ॥
दत्तात्रेयप्रसादेन मत्तो राज्यमदेन च ।

कृतवीर्यका पुत्र महापराक्रमी अर्जुनका शरीर दत्तात्रेयजीकी कृपासे सहस्र भुजाओंसे सुशोभित होता था। वह राज्यमदसे उन्मत्त हो गया था ॥ १९½ ॥

जामदग्न्यो महातेजा रेणुकागर्भसंभवः ॥ २० ॥
त्रेताद्वापरयोः संधौ रामः शस्त्रभृतां वरः ।

(उसके दमनके लिये भगवान् विष्णु) त्रेता और द्वापरकी सन्धिके समय रेणुकाके गर्भसे प्रकट हुए। वे शस्त्रधारियोंमे श्रेष्ठ महातेजस्वी जमदग्निकुमार परशुरामके नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ २०½ ॥

पशुना वज्रकल्पेन सप्तद्वीपेश्वरो नृपः ।
विष्णुना निहतो भूयः छद्मरूपेण हैहयः ॥ २१ ॥

इस तरह पुनः छद्मरूपधारी भगवान् विष्णुने हैहयवंशमे उत्पन्न राजा कार्तवीर्यको, जो सातो द्वीपोंका स्वामी था, अपने वज्रतुल्य फरसेसे मार डाला ॥ २१ ॥

इक्ष्वाकुकुलसम्भूतो रामो दाशरथिः पुरा ।
त्रिलोकविजयं वीरं रावणं संन्यपातयत् ॥ २२॥

तत्पश्चात् वे इक्ष्वाकु-कुलमें दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें प्रकट हुए। उन्होंने पूर्वकालमें त्रिलोकविजयी वीर रावणको मार गिराया था ॥ २२ ॥

पुरा कृतयुगे विष्णुः संग्रामे तारकामये ।
षोडशार्द्धभुजो भूत्वा गरुडस्थो हि वीर्यवान् ॥ २३॥
निजघानासुरान् युद्धे वरदानेन गर्वितान् ।
कालनेमिश्च दैत्येयो देवानां च भयप्रदः ॥ २४॥

प्राचीन कालकी बात है—सत्ययुगमें जब तारकामय संग्राम हुआ था, उस समय पराक्रमी विष्णु आठ भुजाओंसे युक्त हो गरुडपर बैठकर वहाँ पधारे। वहाँ उन्होंने वरदानसे गर्वित हुए असुरोंको युद्धमे मार डाला तथा देवताओंको भय देनेवाले कालनेमि नामक दैत्यका भी वध कर दिया ॥ २३-२४॥

सहस्रकिरणाभेन चक्रेण निहतो युधि ।
महायोगबलेनाजौ विश्वरूपेण विष्णुना ॥ २५ ॥

यह सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, उन भगवान् विष्णुने युद्धमे महान् योगबलसे सूर्य-तुल्य तेजस्वी चक्रद्वारा उस दैत्यका संहार किया था ॥ २५ ॥

अनेन प्राप्तकालास्ते निहता बहवोऽसुराः ।
वने वनचरा दैत्या महाबलपराक्रमाः ॥ २६ ॥
निहता बालभावेन प्रलम्बारिष्टधेनुकाः ।

३९६ | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश


इन श्रीकृष्णने ऐसे बहुत-से असुरोंको मार डाला है, जिनका काल आ पहुँचा था। वनमें विचरनेवाले महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न प्रलम्ब और धेनुक नामक दैत्योंको इन्होंने बाल्यावस्था में ही वनके भीतर मार गिराया ॥ २६ ॥

शकुनीं केशिनं चैव यमलार्जुनकावपि ॥ २७ ॥
नागं कुवलयापीडं चाणूरं मुष्टिकं तथा।
कंसं च बलिनां श्रेष्ठं सगणं देवकीसुतः ॥ २८ ॥
न्यहनद् गोपवेषेण क्रीडमानो हि केशवः।

पूतना, केशी, यमलार्जुन, कुवलयापीड हाथी, चाणूर, मुष्टिक तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ कंसको भी उसके गणोंसहित इन देवकीपुत्र केशवने नष्ट कर दिया है। उस समय ये गोपवेषमें क्रीडा करते थे ॥ २७-२८ ॥

एवमादीनि दिव्यानि छद्मरूपाणि चक्रिणा ॥ २९ ॥
कृतानि दिव्यरूपाणि विष्णुना प्रभविष्णुना ।

इन प्रभावशाली चक्रधारी विष्णुने ये तथा और भी इसी तरहके बहुत-से दिव्य छद्मरूप समय-समयपर धारण किये हैं॥

तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि भवतां हितकाम्यया ॥ ३० ॥
तं मन्ये केशवं विष्णुं सुराद्यमसुरान्तकम् ।

इसलिये मैं आपलोगोंके हितकी इच्छासे यह कह रहा हूँ कि श्रीकृष्ण देवताओंके आदि कारण एवं असुर-विनाशक विष्णु हैं। मैं उन्हें ऐसा ही समझता हूँ ॥ ३० ॥

नारायणं जगद्योनिं पुराणं पुरुषं ध्रुवम् ॥ ३१ ॥
स्रष्टारं सर्वभूतानां व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ।
अधृष्यं सर्वलोकानां सर्वलोकनमसकृतम् ॥ ३२ ॥
अनादिमध्यनिधनं क्षरमक्षरमव्ययम् ।
स्वयम्भुवमजं स्थाणुमजेयं सचराचरैः ॥ ३३ ॥
त्रिविक्रमं त्रिलोकेशं त्रिदशेन्द्रारिनाशनम् ।

वे जगत्की उत्पत्तिके स्थानभूत पुराणपुरुष अविनाशी भगवान् नारायण हैं। वे ही समस्त भूतोंकी सृष्टि करनेवाले तथा व्यक्ताव्यक्तरूप सनातन परमात्मा हैं। सम्पूर्ण लोक मिलकर भी उन्हें पराजित नहीं कर सकते। सारा संसार उनके चरणोंमें मस्तक झुकाता है। वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित, क्षर (सर्वभूतय), अक्षर (कूटस्थ) और अविकारी हैं। वे ही स्वयंभू, अजन्मा, सदा स्थिर रहनेवाले तथा चराचर प्राणियोंके लिये अजेय हैं। उन्हींको मैं देवेन्द्रके शत्रुओंका विनाशक, त्रिलोकीनाथ, त्रिविक्रमरूपधारी विष्णु मानता हूँ ॥ ३१-३३ ॥

इति मे निश्चिता बुद्धिर्जातोऽयं मथुरामधि ॥ ३४ ॥
कुले महति वै राज्ञां विपुले चक्रवर्तिनाम् ।
कथमन्यस्य मर्त्यस्य गरुडो वाहनं भवेत् ॥ ३५ ॥

यही मेरी बुद्धिका निश्चय है। ये विष्णु ही मथुरामें चक्रवर्ती राजाओंके महान् एवं विशाल कुलमें प्रकट हुए हैं। अन्यथा दूसरे किसी मनुष्यका वाहन गरुड़ कैसे हो सकते हैं॥

विक्षेपेण तु कन्यार्थे विक्रमिष्ये जनार्दने ।
कः स्थास्यति पुमानद्य गरुडस्याग्रतो बली ॥ ३६ ॥

विशेषतः जब भगवान् जनार्दन राजकन्याकी प्राप्तिके लिये पराक्रम प्रकट करनेपर तुल जायेंगे, तब कौन ऐसा बलवान् पुरुष है, जो आज गरुड़के सामने खड़ा हो सकेगा॥

स्वयंवरकृतेनासीद् विष्णुः स्वयमिहागतः।
विष्णोरागमनं चैव महान् दोषः प्रकीर्तितः ॥ ३७ ॥
भवद्भिरनुचिन्त्येदं क्रियतां यदनन्तरम् ।

इस स्वयंवरके लिये साक्षात् विष्णु यहाँ पधारे हैं। विष्णुका आगमन होनेपर हमारे लिये जो महान् दोष (बाधा) उपस्थित है, उसे मैंने बताया। अब आप लोग भी इसपर विचार करके आगे जो कुछ करना हो, वह करें ॥ ३७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं विप्लवमाणे तु मगधानां जनेश्वरे ॥ ३८ ॥
सुनीथोऽथ महाप्राज्ञो वचनं चेदमब्रवीत् ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! मगधदेशका राजा जब इस प्रकार भाषण दे चुका, तब महाबुद्धिमान् सुनीथने इस प्रकार कहा ॥ ३८ ॥

सुनीथ उवाच

सम्यगाह महाबाहुर्मगधाधिपतिर्नृपः ॥ ३९ ॥
समक्षं नरदेवानां यदानृत्तं महाहवे।
गोमन्ते रामकृष्णभ्यां कृतं कर्म सुदुष्करम् ॥ ४० ॥

सुनीथ बोले—महाबाहु मगधराज ठीक कहते हैं। गोमन्त पर्वतके गभीर महासमरमें जैसी घटना घटित हुई थी तथा बलराम और श्रीकृष्णने जो अत्यन्त दुष्कर कर्म कर दिखाया था, वह इन समस्त नरेशोंने अपनी आँखों देखा था ॥ ३९-४० ॥

गजाश्वरथसम्बाधा पत्तिध्वजसमाकुला ।
निर्दग्धा महती सेना चक्रलाङ्गलवह्निना ॥ ४१ ॥

हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी तथा पैदलों और ध्वजोंसे व्याप्त हुई राजाओंकी वह विशाल सेना चक्र और हलरूपी अग्निसे जलकर भस्म हो गयी ॥ ४१ ॥

तेनायं मागधः श्रीमाननागतमचिन्तयत् ।
ध्रुवते राजसेनायामनुस्मृत्य सुदारुणम् ॥ ४२ ॥
पद्मात्योर्युध्यतोस्तत्र बलकेशवयोर्भुवि ।
दुर्निचार्यतरो घोरो ह्यभवद् वाहिनीक्षयः ॥ ४३ ॥

इसलिये इन श्रीमान् मगधनेशाने आज भावी परिणाम-का विचार किया है। राजाओंकी सेनामें जो अत्यन्त दारुण घटना घटित हुई थी, उसका स्मरण करके ये इस समय...

[विष्णुपर्व ] \hfill एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः \hfill ३९७


उपर्युक्त बात कह गये हैं। वहाँ युद्धमें बलराम और श्रीकृष्ण पैदल ही लड़ रहे थे, तो भी हमारी विशाल वाहिनीका ऐसा घोर संहार हुआ, जिसे रोकना अत्यन्त कठिन हो गया था ॥ ४२-४३ ॥

विदितं वः सुपर्णस्य स्वागतस्य नृपोत्तमाः।
पक्षवेगानिलोद्भूता वभ्रमुर्गगनेचराः ॥ ४४ ॥
श्रेष्ठ नरपतियो! गरुड़के आते समय यहाँ जो प्रभाव पड़ा था, उसे आपलोग अच्छी तरह जानते हैं। उनके पंखोंके वेगसे जो वायु उठी थी, उसका झोंका खाकर आकाशचारी प्राणी चक्कर काटने लगे थे ॥ ४४ ॥

समुद्राः क्षुभिताः सर्वे चचालाद्रिर्मही मुहुः।
वयं सर्वे सुसंत्रस्ताः किमुत्पातेति विह्वलाः ॥ ४५ ॥
सारे समुद्र क्षुब्ध हो उठे थे। पर्वत काँपने लगे और धरती भी बार-बार डोलने लगी थी। हम सब लोग यह सोचकर भयभीत एवं व्याकुल हो गये थे कि यह कैसा उत्पात खड़ा हो गया ॥ ४५ ॥

यदा संनह्य युध्येत आरूढः केशवः खगम्।
कथमस्मद्विधः शक्तः प्रतिस्थातुं रणाजिरे ॥ ४६ ॥
जब केशव कवच बाँधकर गरुड़की पीठपर आरूढ़ हो युद्ध करेंगे, उस समय हमारे-जैसा पुरुष समराङ्गणमें कैसे ठहर सकता है ॥ ४६ ॥

राज्ञां स्वयंवरो नाम सुमहान् हर्षवर्धनः।
कृतो नरवरैराद्यैर्यशोधर्मस्य वै विधिः ॥ ४७ ॥
स्वयंवर राजाओंके लिये महान् आनन्दवर्धक उत्सव है। पूर्वकालके श्रेष्ठ नरेशोंने इसे सुयश और धर्मकी सिद्धिके लिये प्रचलित किया था ॥ ४७ ॥

इदं तु कुण्डिनगरमासाद्य मनुजेश्वराः।
पुनरेवैष्यते क्षिप्रं महापुरुषविग्रहम् ॥ ४८ ॥
परंतु मनुजेश्वरो ! इस कुण्डिनपुरमें आकर हमारे सामने पुनः शीघ्र ही महापुरुषके साथ महान् युद्धका अवसर आन चाहता है ॥ ४८ ॥

यदि सा वरयेदन्यं राज्ञां मध्ये नृपात्मजा।
कृष्णस्य भुजयोर्वीर्यं कः पुमान् प्रसहिष्यति ॥ ४९ ॥
यदि राजकुमारी रुक्मिणी राजाओंके बीचमें किसी दूसरे नरेशका वरण कर ले, तब कौन ऐसा पुरुष है—जो श्रीकृष्णकी भुजाओंका पराक्रम सह सकेगा ॥ ४९ ॥

विज्ञापितमिदं दोषं स्वयंवरमहोत्सवे।
तदर्थमागतः कृष्णो वयं चैव नराधिपाः ॥ ५० ॥
इस स्वयंवर-महोत्सवमें यह युद्धकी सम्भावना ही महान् दोष है, जिसे सूचित कर दिया गया। श्रीकृष्ण तथा हम सब नरेश भी स्वयंवरके लिये ही यहाँ पधारे हैं ॥ ५० ॥

कृष्णस्यागमनं चैव नृपाणामतिगर्हितम्।
कन्याहेतोर्नरेन्द्राणां यथा वदति मागधः ॥ ५१ ॥
राजकन्याके उद्देश्यसे श्रीकृष्णका आगमन हम सब नरेशोंके लिये अत्यन्त गर्हित सिद्ध हो रहा है—जैसा कि मगधराजका कथन है ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरे मागधसुनीथवाक्ये अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीस्वयंवरके प्रसंगमें जरासंध और सुनीथका भाषणविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥


एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

दन्तवक्त्र और शाल्वका भाषण सुनकर भीष्मकका श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन करते हुए उन्हें प्रसन्न करनेका ही निश्चय करना

वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्ते वचने सुनीथेन महात्मना।
करूपाधिपतिर्वीरो दन्तवक्त्रोऽभ्यभाषत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! महामना सुनीथके ऐसा कहनेपर करूपदेशके वीर राजा दन्तवक्त्रने भाषण देना आरम्भ किया ॥ १ ॥

दन्तवक्त्र उवाच
यदुक्तं मागधेनात्र सुनीथेन नराधिपाः।
युक्तपूर्वमहं मन्ये यदस्माकं वचो हितम् ॥ २ ॥
दन्तवक्त्र बोला—राजाओ ! यहाँ मगधराजने और राजा सुनीथने जो कुछ कहा है, उसे मैं युक्तिसंगत मानता हूँ; क्योंकि इनका प्रवचन हमलोगोंके लिये हितकर है ॥ २ ॥

न च विद्वेषणेनाहं न चाहंकारवादिना।
न चात्मविजिगीषुत्वाद् दूषयामि वचोऽमृतम् ॥ ३ ॥
मैं न तो विद्वेषके कारण, न अहंकारवादी होनेके कारण और न अपनी विजयकी अभिलाषा रखनेके ही कारण आप दोनोंके अमृतमय वचनोंको सदोष बता रहा हूँ ॥ ३ ॥