विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| २० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तो मैं आपसे वैवस्वत मनुके विस्तारका वर्णन करूँगा। मैंने आपको यह बड़ा भारी प्राचीन इतिहास कह सुनाया। इसको सुननेसे प्रतिष्ठा बढ़ती है, धन मिलता है, यश मिलता है, आयुकी वृद्धि होती है और इस शुभ आख्यानको सुननेसे (अन्तमें) स्वर्गकी प्राप्ति होती है ॥ २४-२५ ॥
जनमेजय उवाच
विस्तरेण पृथोर्जन्म वैशम्पायन कीर्तय।
यथा महात्मना तेन दुग्धा चेयं वसुंधरा ॥ २६ ॥
**जनमेजयने कहा—**वैशम्पायनजी ! आप पृथुके जन्मका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, उन महात्माने इस पृथ्वीको किस प्रकार दुहा था ? ॥ २६ ॥
यथा च पितृभिर्दुग्धा यथा देवैर्यथर्षिभिः।
यथा दैत्यैश्च नागैश्च यथा यक्षैर्यथा द्रुमैः ॥ २७ ॥
यथा शैलैः पिशाचैश्च गन्धर्वैश्च द्विजोत्तमैः।
राक्षसैश्च महासत्त्वैर्यथा दुग्धा वसुंधरा ॥ २८ ॥
तेषां पात्रविशेषांश्च वैशम्पायन कीर्तय।
वत्सान् क्षीरविशेषांश्च दोग्धारं चानुपूर्वशः ॥ २९ ॥
पितरोंने इस पृथ्वीको जिस प्रकार दुहा था, देवता तथा ऋषियोंने, दैत्यों और नागोंने, यक्षों और वृक्षोंने इस पृथ्वीको जिस प्रकार दुहा था तथा पर्वत, पिशाच, गन्धर्व, द्विजोत्तम और महान् शक्तिशाली राक्षसोंने इस वसुंधरा पृथ्वीको जिस प्रकार दुहा था, वह बताइये। वैशम्पायनजी ! इन सबके पास कैसे-कैसे पात्र थे, कैसे-कैसे बछड़े थे, कैसा-कैसा दूध दुहा गया था और कौन-कौन दुहनेवाले थे ? इन सबका क्रमपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ २७-२९ ॥
यस्माच्च कारणात् पाणिर्वेनस्य मथितः पुरा।
क्रुद्धैर्महर्षिभिस्तात कारणं तच्च कीर्तय ॥ ३० ॥
तात ! प्राचीनकालमे महर्षियोंने जिस कारणसे वेनके हाथका मन्थन किया था और महर्षियोंने जिस कारण क्रोध किया था, उस कारणका भी आप वर्णन कीजिये ॥ ३० ॥
वैशम्पायन उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि पृथोर्वैन्यस्य विस्तरम्।
एकाग्रः प्रयतश्चैव शृणुष्व जनमेजय ॥ ३१ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**जनमेजय ! मैं तुमसे वेनके पुत्र पृथुका चरित्र अब विस्तारपूर्वक कहता हूँ, इस चरित्रको एकाग्र और सावधान होकर सुनो ॥ ३१ ॥
नाशुचेः क्षुद्रमनसः कुशिष्यायाव्रताय च।
कीर्तनीयमिदं राजन् कृतघ्नायाहिताय वा ॥ ३२ ॥
राजन् ! जिसका मन तुच्छ हो, जो अपवित्र हो, जो कुशिष्य हो और जो व्रत न करता हो तथा जो कृतघ्न हो एवं जो संसारका अहित करनेवाला हो, उससे इस चरित्रका वर्णन नहीं करना चाहिये ॥ ३२ ॥
स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं धर्म्यं वेदेन सम्मितम्।
रहस्यमृषिभिः प्रोक्तं शृणु राजन् यथातथम् ॥ ३३ ॥
राजन् ! यह (इतिहास) स्वर्ग, यश, आयु तथा धर्मकी प्राप्ति करानेवाला और वेदके समान है। ऋषियोंने इस रहस्यका वर्णन किया है, इसे तुम यथार्थ रीतिसे सुनो ॥ ३३ ॥
यश्चैनं कथयेन्नित्यं पृथोर्वैन्यस्य विस्तरम्।
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य न स शोचेत् कृताकृतैः॥ ३४ ॥
जो पुरुष ब्राह्मणोंको प्रणाम करके वेनके पुत्र पृथुके इस चरित्रको विस्तारपूर्वक कहता है, उसे कार्यकार्याके (मैंने सदा पाप कर्म किये, धर्म कभी नहीं किया, ऐसे) पश्चात्तापसे शोक नहीं करना पड़ता अर्थात् इस चरित्रको सुननेसे सब प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं और सब यज्ञोंके फल प्राप्त होते हैं ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पृथूपाख्याने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पृथुका उपाख्यानविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः
पृथुका उपाख्यान—वेनका अत्याचार करके नष्ट होना और पृथुका जन्म तथा चरित्र
वैशम्पायन उवाच
आसीद् धर्मस्य गोप्ता वै पूर्वमत्रिसमः प्रभुः।
अत्रिवंशसमुत्पन्नस्त्वङ्गो नाम प्रजापतिः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! प्राचीन कालकी बात है, धर्मके रक्षक अत्रिके वंशमें एक प्रजापति उत्पन्न हुए, जिनका नाम था अङ्ग। वे अत्रिके ही समान प्रभावशाली थे ॥१॥
तस्य पुत्रोऽभवद् वेनो नात्यर्थं धर्मकोविदः।
जातो मृत्युसुतायां वै सुनीथायां प्रजापतिः ॥ २ ॥
उनका पुत्र वेन हुआ, परंतु उसे धर्मके रहस्यका पता न था। वह राजा वेन मृत्युकी पुत्री सुनीथाके गर्भसे उत्पन्न हुआ था ॥ २ ॥
स मातामहदोषेण वेनः कालात्मजाऽऽत्मजः।
स्वधर्मं पृष्ठतः कृत्वा कामाल्लोभेऽन्ववर्तत ॥ ३ ॥
कालकी पुत्री सुनीथाका पुत्र वह वेन नानाके दोषसे अपने धर्मकी उपेक्षा कर कामके कारण लोभमें फँस गया ॥३॥
मर्यादां स्थापयामास धर्मापेतां स पार्थिवः।
हरिवंशपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः २१
वेदधर्मानतिक्रम्य सोऽधर्मनिरतोऽभवत् ॥ ४ ॥
वह राजा धर्मविहीन मर्यादाको स्थापित करने लगा और वेदोक्त धर्मोंका उल्लङ्घन कर अधर्ममें फँस गया ॥ ४ ॥
निःस्वाध्यायवषट्कारास्तस्मिन् राजनि शासति।
प्रवृत्तं न पपुः सोमं हुतं यज्ञेषु देवताः ॥ ५ ॥
उस राजाके शासनकालमे देवतालोग (उनकी तृप्तिके लिये किये जानेवाले) स्वाध्याय और वषट्कारसे वञ्चित हो गये थे; इसलिये अपने उद्देश्यसे अर्पित तथा यज्ञकुण्डोंमें होमे गये सोमका भी वे पान नहीं करते थे ॥ ५ ॥
न यष्टव्यं न होतव्यमिति तस्य प्रजापतेः।
आसीत् प्रतिज्ञा क्रूरेयं विनाशे प्रत्युपस्थिते ॥ ६ ॥
उसका विनाशकाल समीप आ गया था, अतः उस प्रजापतिने यह क्रूर प्रतिज्ञा घोषित की कि 'मेरे राज्यमें कोई यज्ञ और हवन न करे' ॥ ६ ॥
अहमिज्यश्च यष्टा च यज्ञश्चेति कुरुद्वह।
मयि यज्ञो विधातव्यो मयि होतव्यमित्यपि ॥ ७ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! (वह कहता था कि) 'मैं ही यज्ञोंद्वारा आराध्य और मैं ही यज्ञ करनेवाला हूँ तथा यज्ञ भी मैं ही हूँ। मेरे लिये ही यज्ञ और हवन करना चाहिये' ॥ ७ ॥
तमतिक्रान्तमर्यादमाददानमसाम्प्रतम्।
ऊचुर्महर्षयः सर्वे मरीचिप्रमुखास्तदा ॥ ८ ॥
जब वह इस प्रकार मर्यादाको तोड़ने लगा और अनुचितरूपसे (कर आदि लगाकर) सब कुछ लूटने लगा, तब जो मरीचि आदि बड़े-बड़े ऋषि थे, उन्होंने उससे कहा—॥८॥
वयं दीक्षां प्रवेक्ष्यामः संवत्सरगणान् बहून्।
अधर्मं कुरु मा वेन नैष धर्मः सनातनः ॥ ९ ॥
'हम बहुत वर्षोंमें पूर्ण होनेवाली दीक्षामें प्रवेश करेंगे। वेन ! अब तुम अधर्म न करो; क्योंकि यह सनातन धर्म नहीं है ॥ ९ ॥
निधनेऽत्र प्रसूतस्त्वं प्रजापतिरसंशयम्।
प्रजाश्च पालयिष्येऽहमिति ते समयः कृतः ॥ १० ॥
'निःसंदेह तुम इस वंशमें प्रजापतिके रूपमें उत्पन्न हुए हो और तुमने प्रतिज्ञा की थी कि 'मैं प्रजाका पालन करूँगा' ॥१०॥
तांस्तदा ब्रुवतः सर्वान् महर्षीनब्रवीत् तदा।
वेनः प्रहस्य दुर्बुद्धिरिममर्थमनर्थवित् ॥ ११ ॥
जब महर्षि इस प्रकार कह रहे थे, उस समय अनर्थको अपनानेवाले दुर्बुद्धि वेनने हँसकर उन लोगोंसे ये बातें कहीँ ॥
वेन उवाच
स्रष्टा धर्मस्य कश्चान्यः श्रोतव्यं कस्य वै मया।
श्रुतवीर्यतपःसत्यैर्मया वा कः समो भुवि ॥ १२ ॥
वेनने कहा—धर्मका रचनेवाला मेरे सिवा और कौन है ? मैं किसकी बात सुनूँ ? इस पृथ्वीपर वेद, वीर्य, तप और सत्यमें मेरे समान दूसरा कौन है ? ॥ १२ ॥
प्रभवं सर्वभूतानां धर्माणां च विशेषतः।
सम्मूढा न विदुर्नूनं भवन्तो मामचेतसः ॥ १३ ॥
आपलोग मूर्ख हैं और अचेत हो रहे हैं, अतः सब भूतोंके और विशेषतः धर्मोंके उत्पत्तिस्थान मुझ वेनको नहीं जानते ॥ १३ ॥
इच्छन् दहेयं पृथिवीं प्लावयेयं तथा जलैः।
खं भुवं चैव रुन्धेयं नात्र कार्या विचारणा ॥ १४ ॥
मैं चाहूँ तो पृथ्वीको भस्म कर दूँ अथवा इसको जलमें डुबो दूँ और पृथ्वी तथा आकाशको भी (अपने तेजसे) ढक दूँ; इसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है ॥ १४ ॥
यदा न शक्यते मोहादवलेपाच्च पार्थिवः।
अनुनेतुं तदा वेनस्ततः क्रुद्धा महर्षयः ॥ १५ ॥
गर्व और मोहके वशमें पड़े हुए उस राजा वेनको जब वे ऋषि अधर्म करनेसे न रोक सके, तब वे क्रोधमें भर गये ॥
निगृह्य तं महात्मानो विस्फुरन्तं महाबलम्।
ततोऽस्य सव्यमूरुं ते ममन्थुर्जातमन्यवः ॥ १६ ॥
फिर तो वे महात्मा उस उछल-कूद मचाते हुए महाबली राजाको बलपूर्वक पकड़कर क्रोधमें भर उसकी दाहिनी जाँघको मथने लगे ॥ १६ ॥
तस्मिंस्तु मथ्यमाने वै राज्ञ ऊरौ प्रजज्ञिवान्।
ह्रस्वाऽतिमात्रः पुरुषः कृष्णाभ्रश्चाति बभूव ह ॥ १७ ॥
राजाकी उस जङ्घाके मथे जानेपर उसमेंसे बहुत ठिगना और बहुत ही काला एक पुरुष निकला ॥ १७ ॥
स भीतः प्राञ्जलिर्भूत्वा स्थित्वाञ्जनमेजय।
तमत्रिर्विह्वलं दृष्ट्वा निषीदेत्यब्रवीत् तदां ॥ १८ ॥
जनमेजय ! वह डरा हुआ था, अतः हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब अत्रिने उसे भयसे विह्वल देखकर उससे कहा 'निषीद—बैठ जा' ॥ १८ ॥
निषादवंशकर्तासौ बभूव वदतां वर।
धीवरानसृजच्चाथ वेनकल्मषसम्भवान् ॥ १९ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ जनमेजय ! वह निषादोंके वंशका चलानेवाला हुआ और उसने धीवरोंको जन्म दिया। ये सभी वेनके पापसे उत्पन्न हुए थे ॥ १९ ॥
ये चान्ये विन्ध्यनिलयास्तुषारास्तुम्बुरास्तथा।
अधर्मरुचयो ये च विद्धि तान् वेनसम्भवान् ॥ २० ॥
| २२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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इन धीवरोंके अतिरिक्त और भी जो विन्ध्यमें रहनेवाले तुषार, तुम्बर तथा अधर्मसे प्रेम करनेवाले वनवासी ( गोण्ड-कोल आदि ) हैं, इन सबको तुम वेन ( के पाप ) से उत्पन्न हुआ समझो ॥ २० ॥
ततः पुनर्महात्मानः पाणिं वेनस्य दक्षिणम्।
अरणीमिव संरुद्धा ममन्थुस्ते महर्षयः ॥ २१ ॥
तदनन्तर वे क्रोधमें भरे हुए महात्मा महर्षि वेनके दाहिने हाथको अरणीके समान मथने लगे ॥ २१ ॥
पृथुस्तस्मात् समुत्तस्थौ कराज्ज्वलनसंनिभः ।
दीप्यमानः स्ववपुषा साक्षादग्निरिव ज्वलन् ॥ २२ ॥
तब उस हाथसे अग्निके समान पृथु उत्पन्न हुए, वे अपने शरीरसे साक्षात् प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २२ ॥
स धन्वी कवची जातः पृथुरेव महायशाः ।
आद्यमाजगवं नाम धनुर्गृह्य महारवम् ।
शरांश्र्च दिव्यान् रक्षार्थं कवचं च महाप्रभम् ॥ २३ ॥
महायशस्वी पृथु हाथमें धनुष और बाणको धारण किये हुए और रक्षाके लिये महाकान्तिमान् कवच और दिव्य बाणोंको धारण किये हुए ही उत्पन्न हुए। वे हाथमें महान् शब्द करनेवाले प्राचीन आजगव नामक धनुषको धारण किये हुए थे ॥ २३ ॥
तस्मिञ्जातेऽथ भूतानि सम्प्रहृष्टानि सर्वशः ।
समापेतुर्महाराज वेनश्च त्रिदिवं गतः ॥ २४ ॥
महाराज ! उनके उत्पन्न होनेपर सब प्राणी प्रसन्न होकर उनके पास दौड़ आये और वेन स्वर्गको चला गया ॥ २४ ॥
समुत्पन्नेन कौरव्य सत्पुत्रेण महात्मना ।
त्रातः स पुरुषव्याघ्र पुन्नाम्नो नरकात् तदा ॥ २५ ॥
पुरुषव्याघ्र कौरव ! उस महात्मा सत्पुत्रके उत्पन्न होनेपर उस वेनकी 'पुं' नामक नरकसे रक्षा हो गयी ॥ २५ ॥
तं समुद्राश्च नद्यश्च रत्नान्यादाय सर्वशः ।
तोयानि चाभिषेकार्थं सर्व एवोपतिष्ठिरे ॥ २६ ॥
उन पृथुका अभिषेक करनेके लिये सब समुद्र और नदियाँ चारों ओरसे जल और रत्न लेकर वहाँ उपस्थित हुईं ॥
पितामहश्च भगवान् देवैराङ्गिरसैः सह ।
स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ॥ २७ ॥
समागम्य तदा वैन्यमभ्यषिञ्चन्नराधिपम् ।
महता राजराज्येन प्रजापालं महाद्युतिम् ॥ २८ ॥
भगवान् पितामह भी अङ्गिराके पुत्र, पौत्रों तथा सभी देवताओंके साथ वहाँ आये और स्थावर-जङ्गम प्राणियोंने भी वहाँ आकर महाकान्तिमान् वेनके प्रजापालक पुत्र पृथुका बड़े भारी राजाधिराज-पदपर अभिषेक कर दिया ॥ २७-२८ ॥
सोऽभिषिक्तो महातेजा विधिवद्धर्मकोविदैः ।
आदिराज्ये तदा राज्ञां पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ॥ २९ ॥
पित्रापरञ्जितास्तस्य प्रजास्तेनानुरञ्जिताः ।
अनुरागात् ततस्तस्य नाम राजेत्यजायत ॥ ३० ॥
जब धर्मके जाननेवालोंने महातेजस्वी और प्रतापी वेनके पुत्र पृथुका राजाओंके आदिराज्य ( साम्राज्य )-पदपर विधिवत् अभिषेक कर दिया, तब उन्होंने पिताद्वारा पीड़ित की हुई प्रजाको अपनी सेवाओंसे खूब प्रसन्न किया। इस प्रकार प्रजासे अनुराग करनेके कारण उनका नाम राजा पड़ गया ॥
आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः ।
पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ ३१ ॥
जब ये समुद्रपर चलते थे, तब जल स्तम्भित हो जाता था ( अर्थात् समुद्रका जल स्थलकी तरह कड़ा हो जाता था ) और जब ये आकाशमें चलते थे, तब पर्वत इनके लिये मार्ग छोड़ देते थे। इस कारण इनके रथकी ध्वजा वृक्ष आदिसे कभी नहीं टूटती थी ॥ ३१ ॥
अकृष्टपच्या पृथिवी सिध्यन्त्यन्नानि चिन्तया ।
सर्वकामदुघा गावः पुटके पुटके मधु ॥ ३२ ॥
( उनके शासनकालमें ) पृथ्वी बिना जोते हुए ही अन्न देती थी। चिन्तनमात्रसे ही अन्न ( भोज्य पदार्थ ) तैयार हो जाते थे, गौएँ कामधेनुके समान सब कामनाओंको पूर्ण करती थीं और वृक्षोंके पत्ते-पत्तेमें मधुर रस भरा रहता था ॥ ३२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु यज्ञे पैतामहे शुभे ।
सूतः सूत्यां समुत्पन्नः सौत्येऽहनि महामतिः॥ ३३ ॥
इन्हींके ( राज्यत्व ) कालमें पितामहके शुभ यज्ञमें सोमको निकालनेके दिन सोमका अभिषव करते समय अर्थात् रस निकालनेके लिये सोमलताको कूटते समय महाबुद्धिमान् सूतकी उत्पत्ति हुई थी ॥ ३३ ॥
तस्मिन्नेव महायज्ञे जज्ञे प्राज्ञोऽथ मागधः ।
पृथोः स्तवार्थं तौ तत्र समाहूतौ सुरर्षिभिः ॥ ३४ ॥
तदनन्तर उसी महायज्ञमें बुद्धिमान् मागध प्रकट हुआ। देवता और ऋषियोंने पृथुकी स्तुति करनेके लिये उन दोनोंका वहाँ आवाहन किया था ॥ ३४ ॥
तावुचुऋषयः सर्वे स्तूयतामेष पार्थिवः ।
कर्मैतदनुरूपं वां पात्रं चायं नराधिपः ॥ ३५ ॥
सब ऋषियोंने उन दोनोंसे कहा कि तुम दोनों इन पृथिवीपतिकी स्तुति करो, यह कर्म तुम्हारे अनुरूप है और ये राजा भी स्तुतिके पात्र हैं ॥ ३५ ॥
तावूचतुस्तदा सर्वोस्तानृषीन् सूतमागधौ ।
आवां देवानृषींश्चैव प्रीणयावः स्वकर्मभिः ॥ ३६ ॥
उस समय सूत और मागधने उन सब ऋषियोंसे कहा,
हरिवंशपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः [ २३
'हम अपने कर्मोंसे देवता और ऋषियोंको प्रसन्न करेंगे ॥ ३६॥
न चास्य विद्मो वै कर्म न तथा लक्षणं यशः ।
स्तोत्रं येनास्य कुर्याम राज्ञस्तेजस्विनो द्विजाः॥ ३७॥
'परंतु ब्राह्मणो ! इन तेजस्वी राजाके कर्म, लक्षण और यशको तो हम जानते ही नहीं, जिससे इनकी स्तुति करें' ॥ ३७॥
ऋषिभिस्तौ नियुक्तौ च भविष्यैः स्तूयतामिति।
यानि कर्माणि कृत्वाम् पृथुः पश्चान्महाबलः ॥ ३८ ॥
तब ऋषियोंने उन्हें यह कहकर स्तुति-कार्यमें नियुक्त किया कि 'तुम दोनों इनके भविष्यमे होनेवाले गुणोंका उल्लेख करते हुए स्तवन करो।' उन्होंने वैसा ही किया। सूत और मागधने जो-जो कर्म बताये, उन्हींको महाबली पृथुने पीछेसे पूर्ण किया ॥ ३८॥
'सत्यवाग् दानशीलोऽयं सत्यसंधो नरेश्वरः ।
श्रीमाञ्जैत्रः क्षमाशीलो विक्रान्तो दुष्टशासनः ॥ ३९ ॥
(सूत और मागधने राजा पृथुकी स्तुति इस प्रकार आरम्भ की—) 'ये नरेश्वर सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले, सत्यवादी, दान देनेवाले, लक्ष्मीवान् और विजयी हैं। ये क्षमा करनेवाले, पराक्रमी तथा दुष्टोंका शासन करनेवाले हैं॥ ३९॥
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च दयावान् प्रियभाषणः ।
मान्यो मानयिता यज्वा ब्रह्मण्यः सत्यसंगरः ॥ ४० ॥
'ये धर्मज्ञ, कृतज्ञ, दयावान् और प्रिय भाषण करनेवाले हैं। ये माननीय हैं और (दूसरोंका) मान करनेवाले हैं। यज्ञ करनेवाले, ब्राह्मण-भक्त तथा सत्यप्रतिज्ञ हैं॥ ४०॥
शमः शान्तश्च निरतो व्यवहारस्थितो नृपः ।
ततः प्रभृति लोकेषु स्तवेषु जनमेजय ।
आशीर्वादाः प्रयुज्यन्ते सूतमागधवन्दिभिः ॥ ४१ ॥
'ये राजा शमसम्पन्न, शान्त, कार्यतत्पर तथा अपने व्यवहारमें संलग्न रहनेवाले हैं।' जनमेजय ! उसी समयसे लोगोंमे स्तुतिके अवसरोंपर सूत, मागध और वन्दियोंके द्वारा आशीर्वाद दिलानेकी प्रथा प्रचलित हुई ॥ ४१ ॥
तयोः स्तवैस्तैः सुप्रीतः पृथुः प्रादात् प्रजेश्वरः।
अनूपदेशं सूताय मगधान् मागधाय च ॥ ४२ ॥
प्रजाओके ईश्वर पृथुने उन दोनोंके इन स्तोत्रोंसे प्रसन्न होकर सूतको अनूपदेश और मागधको मगध देश दे दिया ॥ ४२ ॥
तं दृष्ट्वा परमप्रीताः प्रजाः प्राहर्महर्षयः ।
वृत्तीनामेष वो दाता भविष्यति जनेश्वरः ॥ ४३ ॥
इस बातको देखकर महर्षि परम प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रजाओसे कहा, 'ये जनेश्वर (राजा) तुम्हें वृत्ति-आजीविका देनेवाले होंगे' ॥ ४३ ॥
ततो वैन्यं महाराज प्रजाः समभिदुद्रुवुः ।
त्वं नो वृत्तिं विधत्स्वेति महर्षिवचनात् तदा ॥ ४४ ॥
महाराज ! महर्षियोंके ऐसा कहनेपर प्रजा वेनपुत्र राजा पृथुके पास दौड़-दौड़कर आने और कहने लगी कि 'आप हमारी वृत्तिका प्रबन्ध कीजिये' ॥ ४४॥
सोऽभिद्रुतः प्रजाभिस्तु प्रजाहितचिकीर्षया ।
धनुर्गृह्य पृषत्कांश्च पृथिवीमाद्रवद् बली ॥ ४५ ॥
जब प्रजा उनके पास इस प्रकार दौड़कर आयी, तब वे महाबली नरेश प्रजाका हित करनेकी इच्छासे अपने धनुष और बाण लेकर पृथिवीको लक्ष्य करके दौड़े॥४५॥
ततो वैन्यभयन्त्रस्ता गौर्भूत्वा प्राद्रवन्मही ।
तां पृथुर्धनुरादाय द्रवन्तीमन्वधावत ॥ ४६ ॥
तब तो पृथिवी वेन-कुमार पृथुके भयसे त्रस्त हो गौका रूप धारणकर भागने लगी। पृथु भी धनुष लेकर उस भागती हुई पृथिवीके पीछे दौड़ने लगे ॥ ४६॥
सा लोकान् ब्रह्मलोकादीन् गत्वा वैन्यभयात् तदा।
प्रददर्शाग्रतो वैन्यं प्रगृहीतशरासनम् ॥४७॥
पृथिवी राजा पृथुके भयसे ब्रह्मलोक आदि लोकोंमे गयी; परन्तु (उसने सर्वत्र ही) वेनपुत्र पृथुको हाथमें धनुष-बाण धारण किये अपने सामने खड़ा हुआ देखा ॥ ४७ ॥
ज्वलद्भिर्निशितैर्बाणैर्दीप्तस्तेजसमच्युतम् ।
महायोगं महात्मानं दुर्धर्षममरैरपि ॥ ४८ ॥
अलभन्ती तु सा त्राणं वैन्यमेवान्वपद्यत ।
कृताञ्जलिपुटा भूत्वा पूज्यालोकैस्त्रिभिः सदा ॥ ४९ ॥
उवाच वैन्यं नाधर्म्यं स्त्रीवधं कर्तुमर्हसि ।
कथं धारयिता चासि प्रजा राजन् विना मया ॥ ५० ॥
अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले पृथु प्रज्वलित तीखे बाणोंद्वारा और भी तेजसे उद्भासित हो रहे थे। वे महान् योगबलसे सम्पन्न महात्मा नरेश देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष थे। जब पृथिवीको कहीं भी शरण न मिली, तब वह पृथुकी ही शरणमें पहुँची और तीनों लोकोंकी सदासे पूजनीया पृथिवी दोनों हाथ जोड़कर वेनपुत्र पृथुसे कहने लगी—'आपको स्त्रीवधरूप अधर्मका काम करना उचित नहीं है। राजन् ! (पहले आप यह तो सोचिये कि) मेरे बिना इन प्रजाओको कहाँ स्थापित करेंगे ? ॥ ४८-५०॥
मयि लोकाः स्थिता राजन् मयेदं धार्यते जगत् ।
मद्विनाशे विनश्येयुः प्रजाः पार्थिव विद्धि तत् ॥ ५१ ॥
'राजन् ! ये सब लोक मुझपर ही स्थित हैं, मैं ही इस जगत्को धारण कर रही हूँ; (अतः) भूपाल ! आप इस बातको जान रक्खें कि मेरा विनाश होनेपर ये सब प्रजा भी नष्ट हो जायँगी ॥ ५१ ॥
| २४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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न त्वमर्हसि मां हन्तुं श्रेयश्चेत् त्वं चिकीर्षसि ।
प्रजानां पृथिवीपाल शृणु चेदं वचो मम ॥ ५२ ॥
'पृथ्वीपाल ! यदि आप प्रजाका कल्याण करना चाहते हैं तो आपको मेरा वध करना उचित नहीं है। साथ ही आप मेरी इस बातको भी सुनिये ॥ ५२ ॥
उपायतः समारब्धाः सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः ।
उपायं पश्य येन त्वं धारयेथाः प्रजा नृप ॥ ५३ ॥
'प्रायः सब कार्य ठीक उपायसे आरम्भ किये जानेपर ही सिद्ध होते हैं; अतः राजन् ! उस उपायका विचार कीजिये, जिससे कि आप प्रजाका पालन कर सकें ॥ ५३ ॥
हत्वापि मां न शक्तस्त्वं प्रजा धारयितुं नृप ।
अनुभूता भविष्यामि यच्छ कोपं महाद्युते ॥ ५४ ॥
'राजन् ! आप मेरा वध करके भी प्रजाका पालन एवं धारण न कर सकेंगे। अतः महाद्युते ! आप अपने क्रोधको शान्त करें, मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगी ॥ ५४ ॥
अवध्याश्च स्त्रियः प्राहुस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि ।
सत्त्वेषु पृथिवीपाल न धर्मं त्यक्तुमर्हसि ॥ ५५ ॥
'भूपाल ! तिर्यक्-योनिके प्राणियोंमें भी स्त्रियोंको अवध्य कहा है, अतः आप धर्मका परित्याग न करें' ॥ ५५ ॥
एवं बहुविधं वाक्यं श्रुत्वा राजा महामनाः ।
कोपं निगृह्य धर्मात्मा वसुधामिदमब्रवीत् ॥ ५६ ॥
ऐसे ही और बहुत-से (अनुनय-विनयके) वाक्योंको सुनकर धर्मात्मा और उदार मनवाले राजा पृथु अपने क्रोधको रोककर वसुधासे इस प्रकार बोले ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पृथूपाख्याने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पृथुका उपाख्यानविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः
पृथुका उपाख्यान—पृथ्वीका 'पृथुकी पुत्री' बनकर अनेक प्रकारके दूध देना तथा अनेक पात्रों एवं दुहनेवालोंका वर्णन
पृथुरुवाच
एकस्यार्थाय यो हन्यादात्मनो वा परस्य वा ।
बहून् वै प्राणिनो लोके भवेत् तस्येह पातकम् ॥ १ ॥
पृथुने कहा—वसुधे ! जो पुरुष इस संसारमें अपने या पराये किसी भी एक व्यक्तिके लिये बहुत-से जीवोंका वध करता है, उसे ही यहाँ पाप लगता है ॥ १ ॥
सुखमेधन्ति बहवो यस्मिंस्तु निहतेऽशुभे ।
तस्मिन् नास्ति हते भद्रे पातकं चोपपातकम् ॥ २ ॥
भद्रे ! जिस पापी व्यक्तिके मारे जानेसे बहुत-से प्राणियोंको सुख मिलता हो, उसको मारनेसे न तो पाप लगता है और न उपपातक ही ॥ २ ॥
एकस्मिन् यत्र निधनं प्रापिते दुष्टकारिणि ।
बहूनां भवति क्षेमं तत्र पुण्यप्रदो वधः ॥ ३ ॥
जहाँ दुष्टताका व्यवहार करनेवाले एक व्यक्तिका वध करनेसे बहुत-से मनुष्योंका कल्याण होता हो, वहाँ उसका वध करना पुण्यप्रद ही है ॥ ३ ॥
सोऽहं प्रजानिमित्तं त्वां हनिष्यामि वसुंधरे ।
यदि मे वचनं नाद्य करिष्यसि जगद्धितम् ॥ ४ ॥
अतः वसुंधरे ! यदि आज तू जगत्का हित करनेवाले मेरे वचनको नहीं मानती है तो मैं प्रजाके हितके लिये तेरा अवश्य वध कर डालूँगा ॥ ४ ॥
त्वां निहत्याद्य बाणेन मच्छशासनपराङ्मुखीम् ।
आत्मानं प्रथयित्वाहं प्रजा धारयिता चिरम् ॥ ५ ॥
तू आज मेरे शासनसे पराङ्मुख हो रही है, अतः आज तुझे बाणसे मारकर अपने देहको ही फैलाकर मैं उसपर प्रजाको धारण करूँगा ॥ ५ ॥
सा त्वं शासनमास्थाय मम धर्मभृतां वरे ।
संजीवय प्रजाः सर्वाः समर्था ह्यसि धारणे ॥ ६ ॥
अतएव धर्मचारियोंमें श्रेष्ठ देवि ! तू मेरे शासनको मानकर सारी प्रजाको जीवित रख; क्योंकि तू प्रजाको धारण करने—जीवित रखनेमें समर्थ है ॥ ६ ॥
दुहितृत्वं च मे गच्छ तत एनमहं शरम् ।
नियच्छेयं त्वद्वधार्थमुद्यतं घोरदर्शनम् ॥ ७ ॥
साथ ही तू मेरी पुत्री बन जा, तब मैं तेरे वधके लिये उठाये हुए इस भयंकर दीखनेवाले बाणको रोक लूँगा ॥ ७ ॥
पृथिव्युवाच
सर्वमेतदहं वीर विधास्यामि न संशयः ।
उपायतः समारब्धाः सर्वे सिद्ध्यन्त्युपक्रमाः ॥ ८ ॥
पृथ्वीने कहा—वीर ! मैं निस्संदेह यह सब कुछ करूँगी, परंतु ठीक उपायसे आरम्भ करनेपर ही सब कार्य सिद्ध होते हैं ॥ ८ ॥
उपायं पश्य येन त्वं धारयेथाः प्रजा इमाः ।
वत्सं तु मम सम्पश्य क्षरेयं येन वत्सला ॥ ९ ॥
हरिवंशपर्व ] षष्ठोऽध्यायः [ २५
अतः आप उस उपायको देखिये या ढूँढ़ निकालिये, जिससे आप इन प्रजाओंको पुष्ट करके धारण कर सकें। (इसकी युक्ति मैं बताती हूँ) आप मेरे लिये एक बछड़ेकी खोज कीजिये, जिससे मैं (स्नेहसे) पेम्हाकर दूध दूँ ॥ ९ ॥
समां च कुरु सर्वत्र मां त्वं धर्मभृतां वर ।
यथा विस्पन्दमानं मे क्षीरं सर्वत्र भावयेत् ॥ १० ॥
धर्मचारियोंमें श्रेष्ठ ! आप मुझे सर्वत्र सम (चौरस) कीजिये, जिससे कि मेरा झरता हुआ दूध सर्वत्र (व्याप्त) हो जाय ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
तत उत्सारयामास शैलाञ्छतसहस्रशः ।
धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विवर्धिताः ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय ! तब वेनपुत्र पृथुने धनुषके कोनेसे सैकड़ों और सहस्रों पर्वतोंको उठाकर (ईंटोंकी दीवार-के समान) खड़ा कर दिया, इससे पर्वत बड़े हो गये ॥ ११ ॥
इत्थं वैन्यस्तदा राजा महीं चक्रे समां ततः ।
मन्वन्तरेष्वतीतेषु विषमासीद् वसुंधरा ॥ १२ ॥
इस प्रकार वेनपुत्र राजा पृथुने पृथ्वीको सम (चौरस) कर दिया। पिछले मन्वन्तरोंमें यह पृथ्वी ऊँची-नीची थी ॥ १२ ॥
स्वभावेनाभवन् ह्यस्याः समानि विषमाणि च ।
चाक्षुषस्यान्तरे पूर्वमासीदेवं तदा किल ॥ १३ ॥
पहले चाक्षुष मन्वन्तरमे इस पृथ्वीके प्रदेश स्वभावतः ऊँचे-नीचे थे ॥ १३ ॥
न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले ।
प्रविभागः पुराणां च ग्रामाणां वा तदाभवत् ॥ १४ ॥
पहले सर्गमें पृथ्वीके विषम होनेके कारण नगर और ग्रामोंका विभाग नहीं हुआ था ॥ १४ ॥
न सस्यानि न गोरक्षा न कृषिनं वणिक्पथः ।
नैव सत्यानृतं तत्र न लोभो न च मत्सरः ॥ १५ ॥
उस समय न किसी प्रकारका धान्य होता था, न गोरक्षा होती थी और न खेती होती थी तथा न सत्य एवं मिथ्यासे मिला हुआ (वाणिज्य) होता था, उस समय न लोभ था न मत्सर ॥ १५ ॥
वैवस्वतेऽन्तरे चास्मिन् साम्प्रतं समुपस्थिते ।
वैण्यात् प्रभृति राजेन्द्र सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ १६ ॥
राजेन्द्र ! इस वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तरके आनेपर वेनपुत्र पृथुके समयसे ही इन सभी वस्तुओंकी उत्पत्ति हुई है ॥ १६ ॥
यत्र यत्र समं त्वस्य भूमेरासीद्विदांपत ।
तत्र तत्र प्रजाः सर्वाः संवासं समरोचयन् ॥ १७ ॥
निष्पाप नरेश ! जहाँ-जहाँ यह भूमि सम हो गयी, वहाँ प्रजाने रहना पसंद किया ॥ १७ ॥
आहारः फलमूलानि प्रजानामभवत् तदा ।
कृच्छ्रेण महता युक्त इत्येषमनुशुश्रुम ॥ १८ ॥
हमने ऐसा सुना है कि (वेनपुत्र पृथुद्वारा भूमिको दोहन होनेसे) पहले प्रजाओंका आहार फल और मूल था तथा वह भी उन्हें बड़ी कठिनतासे मिलता था ॥ १८ ॥
संकल्पयित्वा वत्सं तु मनुं स्वायम्भुवं प्रभुम् ।
स्वपाणौ पुरुषश्रेष्ठ दुदोह पृथिवीं ततः ।
सस्यजातानि सर्वाणि पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ॥ १९ ॥
तेनान्नेन प्रजास्तात वर्तन्तेऽद्यापि नित्यशः ।
पुरुषश्रेष्ठ ! वेन-पुत्र प्रतापी पृथुने प्रभु स्वायम्भुव मनुको बछड़ा बनाकर पृथ्वीसे सब प्रकारके धान्योंको अपने हाथमें ही दुहा। तात ! उस दिनसे सब प्रजा उसी अन्नसे आजतक बढ़ रही है ॥ १९ ॥
ऋषिभिः श्रूयते चापि पुनर्मुग्धा वसुंधरा ॥ २० ॥
वत्सः सोमोऽभवत् तेषां दोग्धा चाङ्गिरसः सुतः।
बृहस्पतिर्महातेजाः पात्रं छन्दांसि भारत ।
क्षीरमासीदनुपमं तपो ब्रह्म च शाश्वतम् ॥ २१ ॥
भारत ! सुना है, फिर ऋषियोंने भी भूमिको दुहा था, उस समय सोम उनका बछड़ा हुआ, अङ्गिराके पुत्र महातेजस्वी बृहस्पति दुहनेवाले बने और छन्द (वेद) पात्र बने थे। तपोमय शाश्वत ब्रह्म अनुपम दुग्धके रूपमें प्रकट हुआ था ॥ २०-२१ ॥
पुनर्देवगणैः सर्वैः पुरंदरपुरोगमैः।
काञ्चनं पात्रमादाय दुग्धेयं श्रूयते मही ॥ २२ ॥
(यह भी) सुना जाता है कि फिर इन्द्र आदि सब देवताओंने भी सुवर्णका पात्र लेकर इस पृथ्वीको दुहा था ॥ २२ ॥
वत्सस्तु मघवानासीद् दोग्धा च सविता प्रभुः ।
क्षीरमूर्जस्करं चैव वर्तन्ते येन देवताः ॥ २३ ॥
(उस समय) इन्द्र बछड़ा और भगवान् सूर्य दुहनेवाले बने तथा पुष्टिकारक अमृतरूपी क्षीर प्रकट हुआ, जिससे देवता सदा जीवित रहते हैं ॥ २३ ॥
पितृभिः श्रूयते चापि पुनर्मुग्धा वसुंधरा ।
रजतं पात्रमादाय स्वधाममितविक्रमैः ॥ २४ ॥
सुना है कि फिर अतुल पराक्रमी पितरोंने भी पृथ्वीको दुहा था, उन्होंने चाँदीका पात्र लेकर स्वधा (रूपी दूध) का दोहन किया था ॥ २४ ॥
यमो वैवस्वतस्तेषामासीद् वत्सः प्रतापवान् ।
अन्तकश्चाभवद् दोग्धा कालो लोकप्रकालकः ॥ २५ ॥
२६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
प्रतापी विवस्वान्-पुत्र यम उनका बछड़ा बने और लोकोंका अन्त करनेवाला काल-अन्तक उनका दुहनेवाला बना था॥२५॥
नागैश्च श्रूयते दुग्धा वत्सं कृत्वा तु तक्षकम्।
अलाबुं पात्रमादाय विषं क्षीरं नरोत्तम ॥ २६ ॥
नरोत्तम ! (फिर यह भी) सुना जाता है कि नागोंने तक्षकको वत्स बनाकर अलाबु (तूम्बी) के पात्रको लेकर विषरूपी दूध दुहा था ॥ २६ ॥
तेषामैरावतो दोग्धा धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ।
नागानां भरतश्रेष्ठ सर्पाणां च महीपते ॥ २७॥
भरतश्रेष्ठ भूपाल ! उस समय दुहनेवाला नाग ऐरावत था और सर्पोंने प्रतापी धृतराष्ट्रको दुहनेवाला बनाया था ॥
तेनैव वर्तयन्त्युग्रा महाकाया विषोल्बणाः ।
तदाहारास्तदाचारास्तद्वीर्यास्तदुपाश्रयाः ॥ २८ ॥
जिनमें स्पष्टरूपसे विष झलकता है, ऐसे ये विशाल शरीरवाले सर्प उस विषसे अपनी आजीविका चलाते हैं। ये उस विषको खाते हैं और इस विषका प्रयोग कर दूसरा आहार प्राप्त करते हैं तथा ये इस विषरूपी बलका सहारा लेकर इस संसारमें अपनी प्रतिष्ठा बनाये हुए हैं ॥ २८ ॥
असुरैः श्रूयते चापि पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
आयसं पात्रमादाय मायां शत्रुनिबर्हिणीम् ॥ २९॥
सुना जाता है कि असुरोंने भी लोहेका पात्र लेकर शत्रुओंको नष्ट करनेवाली माया (रूपी दूध) को इस पृथ्वीसे दुहा था ॥ २९ ॥
विरोचनस्तु प्राह्लादिर्वत्सस्तेषामभूत् तदा।
ऋत्विग्द्विमूर्द्धा दैत्यानां मधुर्दोग्धा महाबलः ॥ ३० ॥
उस समय प्रह्लादका पुत्र विरोचन उनका बछड़ा बना था और दैत्योंका ऋत्विक् दो सिरोंवाला महाबली मधु उनका दुहनेवाला था ॥ ३० ॥
तयैते माययाद्यापि सर्वे मायाविनोऽसुराः ।
वर्तयन्त्यमितप्रज्ञास्तदेषाममितं बलम् ॥ ३१ ॥
अमित बुद्धिवाले मायावी असुर आजकल भी उसी मायासे काम लेते हैं, यह माया ही उनका अपार बल है ॥ ३१ ॥
यक्षैश्च श्रूयते तात पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
आमपात्रे महाराज पुरान्तर्द्धानमक्षयम् ॥ ३२ ॥
तात ! यह भी सुना जाता है कि इसके बाद उस प्राचीन कालमें यक्षोंने भी पृथ्वीको दुहा था । महाराज ! उन्होंने कच्चे पात्रमें अन्तर्धान (गुप्त) होनेकी अक्षय विद्याको दुहा था ॥ ३२ ॥
वत्सं वैश्रवणं कृत्वा यक्षैः पुण्यजनैस्तदा ।
दोग्धा रजतनाभस्तु पिता मणिवरस्य यः ॥ ३३ ॥
उस समय यक्ष और राक्षसोंने विश्रवाके पुत्र कुबेरको बछड़ा तथा मणिवरके पिता रजतनाभको दुहनेवाला बनाया था ॥ ३३ ॥
यक्षानुजो महातेजास्त्रिशीर्षः सुमहातपाः ।
तेन ते वर्तयन्तीति परमर्षिरुवाच ह ॥ ३४ ॥
उन यक्षोंके छोटे भाई महातेजस्वी और महातपस्वी रजतनाभके तीन सिर हैं। इस अन्तर्धान-विद्यासे वे यक्ष जीविका चलाते हैं, इस प्रकार परमर्षि (व्यासदेव) ने कहा था ॥३४॥
राक्षसैश्च पिशाचैश्च पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
शार्वं कपालमादाय प्रजा भोक्तुं नरर्षभ ॥ ३५ ॥
नरश्रेष्ठ ! फिर राक्षसों और पिशाचोंने मुर्देकी खोपड़ी लेकर अपनी संतानको तृप्त करनेके लिये इस वसुन्धराको दुहा था ॥ ३५ ॥
दोग्धा रजतनाभस्तु तेषामासीत् कुरुद्वह ।
वत्सः सुमाली कौरव्य क्षीरं रुधिरमेव च ॥ ३६ ॥
कुरुवंशधर ! उस समय रजतनाभ उनका दुहनेवाला था और सुमाली उनका बछड़ा था। कौरव्य ! उस समय उन्होंने रक्तरूपी दूध दुहा था ॥ ३६ ॥
तेन क्षीरेण यक्षाश्च राक्षसाश्चामरोपमाः ।
वर्तयन्ति पिशाचाश्च भूतसंघास्तथैव च ॥ ३७॥
देवताओंकी ही भाँति यक्ष, राक्षस, पिशाच और भूतोंकी भी मण्डलियाँ उस दूधसे अपनी-अपनी आजीविका चलाती हैं ॥ ३७॥
पद्मपत्रे पुनर्दुग्धा गन्धर्वैः साप्सरोगणैः ।
वत्सं चित्ररथं कृत्वा शुचीन् गन्धान्नरर्षभ ॥ ३८ ॥
नरर्षभ ! फिर अप्सराओं और गन्धर्वोंने भी चित्ररथको बछड़ा बनाकर पद्मपत्रमें वसुधासे पवित्र गन्धोंको दुहा था ॥
तेषां च सुरुचिस्त्वासीद् दोग्धा भरतसत्तम ।
गन्धर्वराजोऽतिबलो महात्मा सूर्यसंनिभः ॥ ३९ ॥
भरतसत्तम ! उस समय सूर्यके तुल्य तेजस्वी और अत्यन्त बलवान् महात्मा गन्धर्वराज सुरुचि उनका दुहनेवाला था ॥ ३९॥
शैलैश्च श्रूयते राजन् पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
ओषधीर्वे मूर्तिमती रत्नानि विविधानि च ॥ ४० ॥
राजन् ! सुना जाता है कि पर्वतोंने भी पृथ्वीसे मूर्तिमती ओषधियों और नाना प्रकारके रत्नोंको दुहा था ॥ ४० ॥
वत्सस्तु हिमवानासीन्मेरुर्दोग्धा महागिरिः ।
पात्रं तु शैलमेवासीत् तेन शैला विवर्धिताः ॥ ४१ ॥
उस समय हिमाचल बछड़ा बना था, महागिरि मेरु दुहनेवाला था तथा पत्थरके पात्रकी दोहनी बनी थी । उस दूधसे पर्वतोंकी वृद्धि हुई ॥ ४१ ॥
हरिवंशपर्व ] षष्ठोऽध्यायः २७
वीरूद्भिः श्रूयते राजन् पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
पालाशं पात्रमादाय दग्धच्छिन्नप्ररोहणम् ॥ ४२ ॥
राजन् ! सुना जाता है कि इसके बाद पलाशके पत्तेका पात्र (दोना) लेकर वृक्षोंने भी पृथ्वीका दोहन किया। जल जाने या कट जानेपर जो पुनः अंकुरित होनेकी शक्ति है, वही उन्हें दूधके रूपमें प्राप्त हुई थी ॥ ४२ ॥
दुदॊह पुष्पितः सालो वत्सः प्लक्षोऽभवत् तदा ।
सेयं धात्री विधात्री च पावनी च वसुंधरा ॥ ४३ ॥
उस समय खिले हुए साल वृक्षने इस पृथ्वीको दुहा था और पाकड़का वृक्ष बछड़ा बना था। इस प्रकार यह पृथ्वी धात्री-विधात्री (माताके समान सबका धारण-पोषण करनेवाली) तथा पवित्र है ॥ ४३ ॥
चराचरस्य सर्वस्य प्रतिष्ठा योनिरॆव च ।
सर्वकामदुघा दोग्ध्री सर्वसस्यप्ररोहिणी ॥ ४४ ॥
यह पृथ्वी समस्त चराचर प्राणियोंका आश्रय-स्थान और उत्पत्ति-स्थान है। यह समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली कामधेनु है तथा यही सब प्रकारके सस्यों (अन्नके पौधों) को अंकुरित करनेवाली है ॥ ४४ ॥
आसीदियं समुद्रान्ता मेदिनीति परिश्रुता ।
मधुकैटभयोः कृत्स्ना मेदसाभिपरेप्लुता ।
तेनेयं मेदिनी देवी प्रोच्यते ब्रह्मवादिभिः ॥ ४५ ॥
पहले यह समुद्रतककी सारी पृथ्वी मधु और कैटभके मेद (चरबी) से भर गयी थी, इसलिये 'मेदिनी' नामसे विख्यात हुई; अतएव यह देवी ब्रह्मवादियोंद्वारा मेदिनी कही जाती है ॥ ४५ ॥
ततोऽभ्युपगमाद् राज्ञः पृथोर्वैन्यस्य भारत ।
दुहितृत्वमनुप्राप्ता देवी पृथ्वीति चोच्यते ।
पृथुना प्रविभक्ता च शोधिता च वसुंधरा ॥ ४६ ॥
सस्याकरवती स्फीता पुरपत्तनमालिनी ।
एवं प्रभावो वैन्यः स राजासीद् राजसत्तमः ॥ ४७ ॥
भरतवंशी राजन् ! फिर वेनपुत्र राजा पृथुके पुत्रीरूपमे अङ्गीकार करनेपर यह देवी उनकी पुत्री बन गयी, इससे यह पृथ्वी कहलाती है। इस पृथ्वीको पृथुने अनेक भागोंमें विभक्त एवं शुद्ध किया, इसको अन्न आदिकी खान बना दिया और समृद्धिशालिनी बनाकर इसे ग्रामों और नगरोंकी श्रेणियोंसे सुशोभित कर दिया। नृपश्रेष्ठ ! महाराज पृथु ऐसे प्रभावशाली थे ॥ ४६-४७ ॥
नमस्यश्चैव पूज्यश्च भूतग्रामैर्न संशयः ।
ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ४८ ॥
पृथुरेव नमस्कार्यो ब्रह्मयोनिः सनातनः ।
अतएव सभी प्राणियोंको निःसंदेह उनकी पूजा तथा वन्दना करनी चाहिये । वेद-वेदाङ्गके पारगामी महात्मा ब्राह्मणोंको भी (अत्रिकुलमें उत्पन्न होनेके कारण) ब्रह्म-योनि एवं सनातन पुरुष (विष्णुरूप) पृथुके प्रति निश्चय ही नमस्कार करना चाहिये ॥ ४८॥
पार्थिवैश्च महाभागैः पार्थिवत्वमभीप्सुभिः ॥ ४९ ॥
आदिराजो नमस्कार्यः पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।
पृथ्वीके स्वामित्वको चाहनेवाले महाभाग्यवान् राजाओंको भी आदि राजा वेनपुत्र प्रतापी पृथुको प्रणाम करना चाहिये ॥ ४९॥
योधैरपि च विक्रान्तैः प्राप्तुकामैर्जयं युधि ।
पृथुरेव नमस्कार्यो योधानां प्रथमो नृपः ॥ ५० ॥
जो पराक्रमी राजा युद्धमे विजय चाहते हों उनको भी योद्धाओंमें अग्रणी राजा पृथुको अवश्य प्रणाम करना चाहिये ॥
यो हि योद्धा रणं याति कीर्तयित्वा पृथुं नृपम् ।
स घोररूपान् संग्रामान् क्षेमी तरति कीर्तिमान् ॥ ५१ ॥
जो योद्धा राजा पृथुका कीर्तन करके युद्धमें जाता है, वह भयङ्कर संग्रामको कुशलपूर्वक तर जाता (उसमें विजय प्राप्त करता) और यशस्वी होता है ॥ ५१ ॥
वैश्यैरपि च वित्तार्थैः पण्यवृत्तिमधिष्ठितैः ।
पृथुरेव नमस्कार्यो वृत्तिदाता महायशाः ॥ ५२ ॥
वाणिज्य आदिसे आजीविका चलानेवाले धनवान् वैश्यों-को भी चाहिये कि वे वृत्ति (आजीविका) प्रदान करनेवाले महायशस्वी पृथुको अवश्य प्रणाम करें ॥ ५२ ॥
तथैव शूद्रैः शुचिभिस्त्रिवर्णपरिचारिभिः ।
आदिराजो नमस्कार्यः श्रेयः परमभीप्सुभिः ॥ ५३ ॥
इसी प्रकार परम कल्याण चाहनेवाले एवं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीनों वर्णोंकी सेवामे परायण रहनेवाले पवित्र शूद्रों-को भी आदि राजा पृथुको प्रणाम करना चाहिये ॥ ५३ ॥
एते वत्सविशेषाश्च दोग्धारः क्षीरमेव च ।
पात्राणि च मयोक्तानि किं भूयो वर्णयामि ते ॥ ५४ ॥
मैंने तुमसे इन बछड़ोंका, पात्रोंका, दुहनेवालोंका और दुग्धोंका वर्णन कर दिया। अब मैं तुमसे और क्या कहूँ ॥ ५४॥
य इदं शृणुयान्नित्यं पृथोरैश्वर्यमादितः ।
पुत्रपौत्रसमायुक्तो मोदते सुचिरं भुवि ॥ ५५ ॥
जो पुरुष (प्रत्येक कल्पमें होनेवाले अतएव) नित्य इस पृथु-चरित्रको आदिसे (अन्ततक) सुनता है, वह पुरुष पुत्र-पौत्रोंके साथ इस पृथ्वीपर चिर-कालतक आनन्द करता है ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पृथूपाख्याने षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पृथुके उपाख्यानकी समाप्तिविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
२८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सप्तमोऽध्यायः
मन्वन्तर, मनु, देवता और ऋषियोंका पृथक्-पृथक् वर्णन
जनमेजय उवाच
मन्वन्तराणि सर्वाणि विस्तरेण तपोधन।
तेषां सृष्टिं विसृष्टिं च वैशम्पायन कीर्तय ॥ १ ॥
**जनमेजयने कहा—**तपोधन वैशम्पायनजी ! सभी मन्वन्तरों तथा उनकी सृष्टि और विलीन होनेका वृत्तान्त अब आप विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥
यावन्तो मनवश्चैव यावन्तं कालमेव च।
मन्वन्तरं तथा ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २ ॥
ब्रह्मन् ! जितने मनु होते हैं और जितने समयतक एक मन्वन्तर रहता है, उसको मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
न शक्यो विस्तरस्तात वक्तुं वर्षशतैरपि।
मन्वन्तराणां कौरव्य संक्षेपं त्वेव मे शृणु ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तात ! कौरव्य ! मन्वन्तरोंके विस्तारका तो सौ वर्षोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता, अतः उसे संक्षेपमें ही मुझसे सुनो ॥ ३ ॥
स्वायम्भुवो मनुस्तात मनुः स्वारोचिषस्तथा।
उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥ ४ ॥
वैवस्वतश्च कौरव्य साम्प्रतो मनुरुच्यते ।
सावर्णिंश्च मनुस्तात भौत्यो रौच्यस्तथैव च ॥ ५ ॥
तथैव मेरुसावर्णाश्चत्वारो मनवः स्मृताः।
अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये॥ ६ ॥
कीर्तिता मनवस्तात मयैते तु यथाश्रुतम्।
ऋषींस्तेषां प्रवक्ष्यामि पुत्रान् देवगणांस्तथा ॥ ७ ॥
तात ! कौरव्य ! स्वायम्भुव मनु, स्वारोचिष मनु, उत्तम मनु, तामस मनु, रैवत मनु एवं चाक्षुष मनु (बीत गये हैं) और वर्तमान (सातवें) मनुका नाम वैवस्वत मनु है। (अब भविष्यके मन्वन्तरोंका वर्णन करते हैं—) तात ! सावर्णि मनु, भौत्य मनु और रौच्य मनु एवं चार मेरुसावर्णि (ब्रह्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, मेरुसावर्णि, दक्षसावर्णि—ये चारों मेरु पर्वतपर तप करके सिद्ध हो गये हैं, अतएव ये चारों मेरुसावर्णि कहलाते हैं, ) कहे गये हैं। तात ! मैंने भूत, भविष्यत् और वर्तमान (चौदह) मनुओंका गुरुओंसे जिस प्रकार सुना था वैसा वर्णन किया, अब मैं उनके ऋषि, पुत्र और देवताओंका वर्णन करता हूँ ॥ ४-७ ॥
मरीचिरत्रिर्भगवानङ्गिराः पुलहः क्रतुः।
पुलस्त्यश्च वसिष्ठश्च सप्तैते ब्रह्मणः सुताः ॥ ८ ॥
उत्तरस्यां दिशि तथा राजन् सप्तर्षयोऽपरे।
देवाश्च शान्तरजसस्तथा प्रकृतयः परे।
यामा नाम तथा देवा आसन् स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥ ९ ॥
आग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च मेधा मेधातिथिर्वसुः।
ज्योतिष्मान् द्युतिमान् हव्यः सवनः पुत्र एव च ॥ १० ॥
मनोः स्वायम्भुवस्यैते दश पुत्रा महौजसः।
एतत् ते प्रथमं राजन् मन्वन्तरमुदाहृतम् ॥ ११ ॥
राजन् ! स्वायम्भुव मन्वन्तरमें वर्तमान मन्वन्तरसे भिन्न मरीचि, भगवान् अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य और वसिष्ठ—ये ब्रह्माजीके सात पुत्र सप्तर्षि होकर उत्तर दिशामें रहते थे। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें शान्तरजा, प्रकृति तथा याम नामक देवता पूजित होते थे। स्वायम्भुव मनुके आग्नीध्र, अग्निबाहु, मेधा, मेधातिथि, वसु, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, हव्य, सवन और पुत्र—ये दस महाबली पुत्र थे। राजन् ! मैंने तुमसे यह पहले मन्वन्तरका वर्णन किया ॥ ८-११ ॥
और्वो वसिष्ठपुत्रश्च स्तम्बः काश्यप एव च।
प्राणो बृहस्पतिश्चैव दत्तो निश्च्यवनस्तथा ॥ १२ ॥
एते महर्षयस्तात वायुप्रोक्ता महाव्रताः।
देवाश्च तुषिता नाम स्मृताः स्वारोचिषेऽन्तरे ॥ १३ ॥
तात ! वायुने स्वारोचिष मन्वन्तरमें वसिष्ठके पुत्र और्व, स्तम्ब, काश्यप, प्राण, बृहस्पति, दत्त और निश्च्यवन—ये सात महाव्रतधारी ऋषि बताये हैं और देवताओंका नाम तुषित कहा है ॥ १२-१३ ॥
हविर्ध्रः सुकृतिर्ज्योतिरापोमूर्तिरयस्मयः।
प्रथितश्च नभस्यश्च नभ ऊर्जस्तथैव च ॥ १४ ॥
स्वारोचिषस्य पुत्रास्ते मनोस्तात महात्मनः।
कीर्तिताः पृथिवीपाल महावीर्यपराक्रमाः ॥ १५ ॥
द्वितीयमेतत् कथितं तव मन्वन्तरं मया।
तात ! महात्मा स्वारोचिष मनुके महावीर्यवान् और पराक्रमी हविर्ध्र, सुकृति, ज्योति, आप, मूर्ति, अयस्मय, प्रथित, नभस्य, ऊर्ज और नभ—ये (दस) पुत्र थे, उनका वर्णन कर दिया । पृथ्वीपाल ! यह मैंने तुमसे दूसरे मन्वन्तरका वर्णन कर दिया ॥ १४-१५½ ॥
इदं तृतीयं वक्ष्यामि तन्निबोध नराधिप ॥ १६ ॥
वसिष्ठपुत्राः सप्तासन् वासिष्ठा इति विश्रुताः।
हिरण्यगर्भस्य सुता ऊर्जा नाम सुतेजसः ॥ १७ ॥
ऋषयोऽत्र मया प्रोक्ताः कीर्त्यमानान् निबोध मे।
औत्तमेयान् महाराज दश पुत्रान् मनोरमान् ॥ १८ ॥
इष ऊर्जस्तनूजश्च मधुर्माधव एव च।
हरिवंशपर्व ] सप्तमोऽध्यायः २५
शुचिः शुक्रः सहश्चैव नभस्यो नभ एव च ॥ १९ ॥
भानवस्तत्र देवाश्च मन्वन्तरमुदाहृतम् ।
राजन् ! अब मैं तीसरे मन्वन्तरका वर्णन करता हूँ, सुनो। उत्तम नामक मन्वन्तरमें वासिष्ठ नामसे प्रसिद्ध वसिष्ठजीके सात पुत्र (सप्तर्षि) थे। वे पहले हिरण्यगर्भके पुत्र थे। उनके नाम ऊर्ज थे, तथा वे बड़े तेजस्वी थे। इस प्रकार मैंने ऋषियोंका वर्णन कर दिया। महाराज ! अब मैं उत्तम मनुके दस मनोहर पुत्रोंका वर्णन करता हूँ; सुनो— इष, ऊर्ज, तनूज, मधु, माधव, शुचि, शुक्र, सह, नभस्य और नभ (ये दस उत्तम मनुके पुत्र थे) और उस मन्वन्तरमें भानु नामक देवता थे। (इस प्रकार यह तीसरा) मन्वन्तर बताया गया ॥ १६-१९॥
मन्वन्तरं चतुर्थं ते कथयिष्यामि तच्छृणु ॥ २० ॥
काव्यः पृथुस्तथैवाग्निर्जन्मुर्धाता च भारत ।
कपीवानकपीवांश्च तत्र सप्तर्षयोऽपरे ॥ २१ ॥
पुराणे कथितास्तात पुत्राः पौत्राश्च भारत ।
सत्या देवगणाश्चैव तामसस्यान्तरे मनोः ॥ २२ ॥
पुत्रांश्चैव प्रवक्ष्यामि तामसस्य मनोर्नृप ।
द्युतिस्तपस्यः सुतपास्तपोमूलस्तपोधनः ॥ २३ ॥
तपोरतिरकल्माषस्तन्वी धन्वी परंतपः ।
तामसस्य मनोरेते दश पुत्रा महाबलाः ॥ २४ ॥
भारत ! अब मैं चौथे मन्वन्तरका वर्णन करता हूँ, सुनो। तामस नामक मन्वन्तरमें काव्य, पृथु, अग्नि, जन्यु, धाता, कपीवान् और अकपीवान्—ये सात सप्तर्षि थे। तात ! पुराणोंमें इनके बहुत-से पुत्र-पौत्रोंका वर्णन है। तामस मन्वन्तरमें सत्य नामक देवता थे। भारत ! अब मैं तामस मनुके पुत्रोंका वर्णन करता हूँ। राजन् ! तामस मनुके द्युति, तपस्य, सुतपा, तपोमूल, तपोधन, तपोरति, कल्माष, तन्वी, धन्वी और परंतप—ये दस महाबली पुत्र थे ॥ २०-२४॥
वायुप्रोक्ता महाराज पञ्चमं तदनन्तरम् ।
वेदबाहुर्यदुध्रश्च मुनिर्वेदशिरास्तथा ॥ २५ ॥
हिरण्यरोमा पर्जन्य ऊर्ध्वबाहुश्च सोमजः ।
सत्यनेत्रस्तथाऽऽत्रेय एते सप्तर्षयोऽपरे ॥ २६ ॥
देवाश्चाभूतरजसस्तथा प्रकृतयोऽपरे ।
पारिप्लवश्च रैभ्यश्च मनोरन्तरमुच्यते ॥ २७ ॥
अथ पुत्रानिमांस्तस्य निबोध गदतो मम ।
धृतिमानव्ययो युक्तस्तत्त्वदर्शी निरुत्सुकः ॥ २८ ॥
अरण्यश्च प्रकाशश्च निर्मोहः सत्यवाक् कविः ।
रैवतस्य मनोः पुत्राः पञ्चमं चैतदन्तरम् ॥ २९ ॥
इन सबका वायुने वर्णन किया है। महाराज ! अब पाँचवें (रैवत मन्वन्तरका वर्णन करता हूँ।) उस मन्वन्तरमे वेदबाहु, यदुध्र, वेदशिरा मुनि, हिरण्यरोमा, पर्जन्य, सोमपुत्र ऊर्ध्वबाहु और अत्रिपुत्र सत्यनेत्र—ये सात ऋषि थे। उस मन्वन्तरमें भूतरजा, प्रकृति, पारिप्लव और रैभ्य नामक देवगण थे। यह सब (पञ्चम) मन्वन्तरका वर्णन है। अब मैं रैवत मनुके पुत्रोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। धृतिमान्, अव्यय, युक्त, तत्त्वदर्शी, निरुत्सुक, अरण्य, प्रकाश, निर्मोह, सत्यवाक् और कवि—ये रैवत मनुके पुत्र हैं। यह पञ्चम मन्वन्तरका वर्णन हुआ ॥ २५-२९ ॥
षष्ठं ते सम्प्रवक्ष्यामि तन्निबोध नराधिप ।
भृगुर्नभो विवस्वांश्च सुधामा विरजास्तथा ॥ ३० ॥
अतिनामा सहिष्णुश्च सप्तैते वै महर्षयः ।
चाक्षुषस्यान्तरे तात मनोर्देवानिमाञ्शृणु ॥ ३१ ॥
आद्याः प्रभूता ऋभवः पृथग्भावा दिवौकसः ।
लेखाश्च नाम राजेन्द्र पञ्च देवगणाः स्मृताः ।
ऋषेराङ्गिरसः पुत्रा महात्मानो महौजसः ॥ ३२ ॥
नड्वलेया महाराज दश पुत्राश्च विश्रुताः ।
ऊरुप्रभृतयो राजन् षष्ठं मन्वन्तरं स्मृतम् ॥ ३३ ॥
नराधिप ! अब मैं छठे (चाक्षुष मन्वन्तर) का वर्णन करता हूँ, सुनो। तात ! चाक्षुष मन्वन्तरमें भृगु, नभ, विवस्वान्, सुधामा, विरजा, अतिनामा और सहिष्णु—ये सात महर्षि थे। राजेन्द्र ! अब (इस मन्वन्तरके) देवताओंका परिचय सुनो। आद्य, प्रभूत, ऋभु, पृथग्भाव और लेखा नामवाले देवताओंके पाँच गण थे, ये स्वर्गमें रहते थे। ये सब अङ्गिरा ऋषिके पुत्र थे और सभी परम तेजस्वी महात्मा थे। इनकी माताका नाम नड्वला था। महाराज ! (चाक्षुष मनुके) ऊरु आदि दस प्रसिद्ध पुत्र थे। राजन् ! यह छठे मन्वन्तरका वर्णन किया गया ॥ ३०-३३ ॥
अत्रिर्वसिष्ठो भगवान् कश्यपश्च महानृषिः ।
गौतमोऽथ भरद्वाजो विश्वामित्रस्तथैव च ॥ ३४ ॥
तथैव पुत्रो भगवानृचीकस्य महात्मनः ।
सप्तमो जमदग्निश्च ऋषयः साम्प्रतं दिवि ॥ ३५ ॥
(अब सप्तम मन्वन्तरका वर्णन करते हैं—) इस वर्तमान समयमें स्वर्गमें स्थित अत्रि, भगवान् वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र और सातवें महात्मा ऋचीकके पुत्र भगवान् जमदग्नि—ये सप्तर्षि हैं ॥ ३४-३५ ॥
साध्या रुद्राश्च विश्वे च मरुतो वसवस्तथा ।
आदित्याश्चाश्विनौ चैव देवौ वैवस्वती स्मृतौ ॥ ३६ ॥
मनोर्वैवस्वतस्यैते वर्तन्ते साम्प्रतेऽन्तरे ।
इक्ष्वाकुप्रमुखाश्चैव दश पुत्रा महात्मनः ॥ ३७ ॥
साध्य, रुद्र, विश्वेदेव, मरुत्, वसु, आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार, जो कि सूर्यके पुत्र कहलाते हैं,
| ३० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ये सब इस वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तरके देवता हैं और इस महात्मा वैवस्वत मनुके इक्ष्वाकु आदि दस पुत्र हैं ॥ ३६-३७ ॥
एतेषां कीर्तितानां तु महर्षीणां महौजसाम्।
राजन् पुत्राश्च पौत्राश्च दिक्षु सर्वासु भारत ॥ ३८ ॥
भरतवंशी राजन्! जिनकी चर्चा हुई है, इन परम तेजस्वी महर्षियोंके पुत्र और पौत्र सब दिशाओंमें (व्याप्त हैं) ॥ ३८ ॥
मन्वन्तरेषु सर्वेषु प्राग्दिशः सप्तसप्तकाः।
स्थिता लोकव्यवस्थार्थं लोकसंरक्षणाय च ॥ ३९ ॥
सब मन्वन्तरोंमें पूर्व कथित उन्चास पवन लोकोंकी व्यवस्था और रक्षा करनेके लिये स्थित रहते हैं ॥ ३९ ॥
मन्वन्तरे व्यतिक्रान्ते चत्वारः सप्तका गणाः।
कृत्वा कर्म दिवं यान्ति ब्रह्मलोकमनामयम् ॥ ४० ॥
प्रत्येक मन्वन्तरके बीतनेपर उनमेंसे अट्ठाईस पवन अपने कर्मको (पूर्ण) करके स्वर्गमें जाकर अनामय (व्याधिरहित) ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ४० ॥
ततोऽन्ये तपसा युक्ताः स्थानमापूरयन्त्युत।
अतीता वर्तमानाश्च क्रमेणैतेन भारत ॥ ४१ ॥
एतान्युक्तानि कौरव्य सप्तातीतानि भारत।
मन्वन्तराणि षट् चापि निबोधानागतानि मे ॥ ४२ ॥
भारत ! तब मन्वन्तरके अन्तमें दूसरे वायु तपोबलसे उनके पदपर आरूढ होकर उनके स्थानको पूर्ण कर देते हैं। कौरव्य ! बीते हुए और वर्तमान सात मन्वन्तरोंका वर्णन कर दिया। भरतनन्दन ! अब भविष्यके छः (सात) मन्वन्तरोंका वर्णन मुझसे सुनो ॥ ४१-४२ ॥
सावर्णा मनवस्तात पञ्च तांश्च निबोध मे।
एको वैवस्वतस्तेषां चत्वारस्तु प्रजापतेः ॥ ४३ ॥
परमेष्ठिसुतास्तात मेरुसावर्णतां गतः।
दक्षस्यैते हि दौहित्राः प्रियायास्तनया नृप।
महान्तस्तपसा युक्ता मेरुपृष्ठे महौजसः ॥ ४४ ॥
तात ! सावर्णि मनु पाँच हैं, उनको मुझसे सुनो। उनमेंसे एक तो सूर्यके पुत्र हैं और चार प्रजापति परमेष्ठीके, ये सब दक्षके नाती हैं तथा (दक्षकन्या) प्रियाके पुत्र हैं। राजन् ! मेरु पर्वतपर बड़ा भारी तप करके ये महातपस्वी मनु मेरुसावर्णि नामको प्राप्त हुए ॥ ४३-४४ ॥
रुचेः प्रजापतेः पुत्रो रौच्यो नाम मनुः स्मृतः।
भूत्यां चोत्पादितो देव्यां भौत्यो नाम रुचेः सुतः ॥ ४५ ॥
प्रजापति रुचिके पुत्र रौच्य मनु कहलाते हैं और भूति देवीके गर्भसे उत्पन्न रुचिके पुत्र भौत्य कहलाते हैं॥ ४५ ॥
अनागताश्च सप्तैते स्मृता दिवि महर्षयः।
मनोरन्तरमासाद्य सावर्णस्य ह ताञ्छृणु ॥ ४६ ॥
अब भविष्यत्-कालमें होनेवाले सावर्णि मन्वन्तरके जो सात महर्षि स्वर्गमें विराजमान हैं, उन (अष्टम मन्वन्तरके) ऋषियोंको सुनो ॥ ४६ ॥
रामो व्यासस्तथाऽऽत्रेयो दीप्तिमानिति विश्रुतः।
भारद्वाजस्तथा द्रौणिरश्वत्थामा महाद्युतिः ॥ ४७ ॥
गौतमस्यात्मजश्चैव शरद्वान् गौतमः कृपः।
कौशिको गालवश्चैव रुरुः काश्यप एव च ॥ ४८ ॥
(परशु-) राम, व्यास, अत्रिपुत्र दीप्तिमान्, भरद्वाजगोत्री द्रोणपुत्र महातेजस्वी अश्वत्थामा, गौतमके वंशज एवं गौतम-गोत्री शरद्वान् (के पुत्र) कृपाचार्य, कौशिकगोत्री गालव और काश्यपगोत्री रुरु ॥ ४७-४८ ॥
एते सप्त महात्मानो भविष्या मुनिसत्तमाः।
ब्रह्मणः सदृशाश्चैते धन्याः सप्तर्षयः स्मृताः॥ ४९ ॥
ये ब्रह्माजीके समान धन्यवादके पात्र भविष्यके सात मुनिश्रेष्ठ महात्मा सप्तर्षि कहे गये हैं ॥ ४९ ॥
अभिजात्याथ तपसा मन्त्रव्याकरणैस्तथा।
ब्रह्मलोकप्रतिष्ठास्तु स्मृताः सप्तर्षयोऽमलाः ॥ ५० ॥
ये जन्म, तप, मन्त्र और व्याकरणके प्रभावसे पवित्र सात ऋषि ब्रह्मलोकमें रहते हैं ॥ ५० ॥
भूतभव्यभवज्ज्ञानं बुद्ध्या चैव तु ये स्वयम्।
तपसा चै प्रसिद्धा ये संगताः प्रविचिन्तकाः ॥ ५१ ॥
ये ऋषि स्वयं अपने तपसे भूत, भविष्य और वर्तमान कालके सब वृत्तान्तको जानकर प्रसिद्ध हो गये हैं तथा परस्पर मिलकर परमात्मतत्त्वका विचार करते रहते हैं॥ ५१ ॥
मन्त्रव्याकरणाद्यैश्च ऐश्वर्यात् सर्वशश्च ये।
एतान् भार्यान् द्विजो ज्ञात्वा नैष्ठिकानि च नाम च॥५२॥
ये मन्त्र, व्याकरण आदिसे तथा ऐश्वर्यके कारण भी (सर्वत्र प्रसिद्ध हैं)। ब्राह्मण इन भरण करनेयोग्य ऋषियोंको तथा इनके नैष्ठिक कर्मों और नामोंको जानकर (कल्याणका भागी होता है) ॥ ५२ ॥
सप्तैते सप्तभिश्चैव गुणैः सप्तर्षयः स्मृताः।
दीर्घायुषो मन्त्रकृत ईश्वरा दीर्घचक्षुषः ॥ ५३ ॥
ये सातो अपने सात गुणोंके कारण सप्तर्षि कहलाते हैं और दीर्घायु, मन्त्रद्रष्टा, सर्वसमर्थ तथा दीर्घदर्शी हैं ॥ ५३ ॥
बुद्ध्या प्रत्यक्षधर्माणो गोत्रप्रवर्तकास्तथा।
कृतादिषु युगाख्येषु सर्वेष्वेव पुनः पुनः ॥ ५४ ॥
प्रवर्तयन्ति ते वर्णानाश्रमांश्चैव सर्वशः।
सप्तर्षयो महाभागाः सत्यधर्मपरायणाः ॥ ५५ ॥
इन्हें अपनी बुद्धिसे धर्मके महत्त्वका प्रत्यक्ष अनुभव होता है तथा ये गोत्रप्रवर्तक (गोत्र चलानेवाले) हैं। सत्यधर्ममें परायण रहनेवाले ये महाभाग सप्तर्षि सत्ययुग
सप्तमोऽध्यायः
हरिवंशपर्व ] सप्तमोऽध्यायः ३१
आदि सभी युगोंमें सर्वत्र (ब्राह्मण आदि चारों) वर्णों और (ब्रह्मचर्य आदि चारों) आश्रमोंको बारंबार स्वधर्ममें प्रवृत्त करते रहते हैं ॥ ५४-५५ ॥
तेषां चैवान्वयोत्पन्ना जायन्तीह पुनः पुनः।
मन्त्रब्राह्मणकर्तारो धर्मे प्रशिथिले तथा ॥ ५६॥
धर्मके शिथिल होनेपर इन्हीं ऋषियोंके वंशज विद्वान् पुरुष मन्त्र और ब्राह्मण भागके प्रणेता होकर बारंबार यहाँ धर्मोद्धारके लिये जन्म धारण करते हैं ॥ ५६॥
यस्माच्च वरदाः सप्त परेभ्य एव याचिताः।
तस्मान्न कालो न वयः प्रमाणमृषिभाषणे ॥ ५७॥
ये सातों वर देनेवाले हैं और दूसरे पुरुष इनसे याचना करते हैं; अतएव इन ऋषियोंके सम्बन्धमें विचार करनेपर न तो इनकी उत्पत्तिका समय बताया जा सकता है और न इनकी अवस्थाका परिमाण ही ॥ ५७॥
एष सप्तर्षिकोद्देशो व्याख्यातस्ते मया नृप।
सावर्णस्य मनोः पुत्रान् भविष्याञ्छृणु सत्तम ॥ ५८॥
राजन् ! मैंने तुमसे यह सप्तर्षियोंकी बात संक्षेपसे कह दी। सत्तम ! अब सावणि मनुके भविष्यमे होनेवाले पुत्रोंका वर्णन सुनो ॥ ५८ ॥
वरीयांश्चावरीयांश्च सम्मतो धृतिमान् वसुः।
चरिष्णुरप्यधृष्णुश्च वाजः सुमतिरेव च।
सावर्णस्य मनोः पुत्रा भविष्या दश भारत ॥ ५९॥
भारतवंशी राजन् ! वरीयान्, अवरीयान्, सम्मत, धृतिमान्, वसु, चरिष्णु, अधृष्णु, वाज, सुमति (तथा एक और)—ये सावणि मनुके भविष्यमे होनेवाले दस पुत्र हैं ॥ ५९ ॥
प्रथमे मेरुसावर्णे प्रवक्ष्यामि मुनीञ्छृणु।
मेधातिथिस्तु पौलस्त्यो वसुः काश्यप एव च ॥ ६०॥
ज्योतिष्मान् भार्गवश्चैव द्युतिमानङ्गिरास्तथा।
सावनश्चैव वासिष्ठ आत्रेयो हव्यवाहनः ॥ ६१ ॥
पौलहः सप्त इत्येते मुनयो रोहितेऽन्तरे।
देवानानां गणास्तत्र त्रय एव नराधिप ॥ ६२॥
अब मैं प्रथम मेरुसावर्ण अर्थात् नवम मनुके समकालीन ऋषियोंका वर्णन करता हूँ, सुनिये ! पुलस्त्यगोत्री मेधातिथि, कश्यपगोत्री वसु, भृगुवंशी ज्योतिष्मान्, अङ्गिरागोत्री द्युतिमान्, वसिष्ठगोत्री सावन, अत्रिपुत्र हव्यवाहन और पुलहगोत्री सप्त—रोहित* मन्वन्तरके ये सात ऋषि हैं और राजन् ! उस मन्वन्तरमें देवताओंके तीन ही गण होंगे ॥ ६०-६२॥
दक्षपुत्रस्य पुत्रास्ते रोहितस्य प्रजापतेः।
मनोः पुत्रो धृष्टकेतुः पञ्चहोत्रो निराकृतिः ॥ ६३ ॥
* मेरुसावर्णिका ही दूसरा नाम रोहित है।
पृथुः श्रवा भूरिधामा ऋचीकोऽपहतो गयः।
प्रथमस्य तु सावर्णेर्नव पुत्रा महौजसः ॥ ६४ ॥
ये दक्षके पुत्र रोहित प्रजापतिके पुत्र हैं और इन प्रथम सावणि मनुके धृष्टकेतु, पञ्चहोत्र, निराकृति, पृथु, श्रवा, भूरिधामा, ऋचीक, अपहत और गय—ये नौ महाबली पुत्र होंगे ॥ ६३-६४ ॥
दशमे त्वथ पर्याये द्वितीयस्यान्तरे मनोः।
हविष्मान् पौलहश्चैव सुकृतिश्चैव भार्गवः ॥ ६५॥
आपोमूर्तिस्तथाऽऽत्रेयो वासिष्ठश्चाप्रमः स्मृतः।
पौलस्त्यः प्रमितिञ्चैव नभोगश्चैव काश्यपः।
अङ्गिरा नभसः सत्यः सप्तैते परमर्षयः ॥ ६६ ॥
दसवें और दूसरे सावणि मनु (दक्ष सावणि) के मन्वन्तरमें पुलहगोत्री हविष्मान्, भृगुवंशी सुकृति, अत्रिवंशी आपोमूर्ति, वसिष्ठपुत्र अप्रम, पुलस्त्यगोत्री प्रमिति, कश्यपगोत्री नभोग और अङ्गिरावंशी नभस्के पुत्र सत्य-ये सात परम ऋषि होंगे ॥
देवतानां गणौ द्वौ तौ ऋषिमान्त्राश्च ये स्मृताः।
मनोः सुतोत्तमौजाश्च निकुम्भश्च वीर्यवान् ॥ ६७॥
शतानीको निरामित्रो वृषसेनो जयद्रथः।
भूरिद्युम्नः सुवर्चाश्च दश त्वेते मनोः सुताः ॥ ६८ ॥
उस समय (दक्षिण-मार्गके अभिमानी धूम आदि और उत्तरमार्गके अभिमानी अग्नि आदि ये) दो देवताओंके गण होंगे तथा ऋषियुक्त मन्त्रोंद्वारा जिन देवताओंका प्रतिपादन होता है, वे भी उस समयके देवता होंगे तथा मनुसुत, उत्तमौजा, निकुम्भ, वीर्यवान्, शतानीक, निरामित्र, वृषसेन, जयद्रथ, भूरिद्युम्न और सुवर्चा—ये मनुके दस पुत्र होंगे ॥ ६७-६८ ॥
एकादशेऽथ पर्याये तृतीयस्यान्तरे मनोः।
तस्य सप्त ऋषींश्चापि कीर्त्यमानान् निबोध मे ॥ ६९ ॥
अब ग्यारहवें मनु—एवं तीसरे सावणि मनु (रुद्र-सावर्णि) के मन्वन्तरमें जो सात ऋषि और देवता होंगे, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ६९ ॥
हविष्मान् काश्यपश्चापि हविष्मान् यश्च भार्गवः।
तरुणश्च तथाऽऽत्रेयो वासिष्ठस्त्वनघस्तथा ॥ ७० ॥
अङ्गिराश्चोदधिष्यश्च पौलस्त्यो निश्चरस्तथा।
पुलहश्चाग्नितेजाश्च भाव्याः सप्त महर्षयः ॥ ७१ ॥
ब्रह्मणस्तु सुता देवा गणास्तेषां त्रयः स्मृताः।
संवर्तकः सुशर्मा च देवानीकः पुरूद्वहः ॥ ७२॥
क्षेमधन्वा दृढायुश्च आदर्शः पण्डको मनुः।
सावर्णस्य तु पुत्रा वै तृतीयस्य नव स्मृताः ॥ ७३॥
कश्यपगोत्री हविष्मान्, भृगुवंशी हविष्मान्, अत्रिगोत्रोत्पन्न तरुण, वसिष्ठगोत्री अनघ, अङ्गिरागोत्री उदधिष्ण्य,
| ३२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
|---|
पुलस्त्यगोत्री निश्चर एवं पुलहगोत्री अमितौजा—ये सात महर्षि होंगे। ये सब-के-सब ब्रह्माजीके (मानस) पुत्र हैं। उस मन्वन्तरमें देवताओंके तीन गण होंगे तथा इन तीसरे सावर्णि मनुके संवर्तक, सुधर्मा, देवानकि, पुरूद्रह, क्षेमधन्वा, दृढायु, आदर्श, पण्ढक और मनु—ये नौ पुत्र माने गये हैं॥
चतुर्थस्य तु सावर्णेश्चर्षीन् सप्त निबोध मे।
द्युतिर्वसिष्ठपुत्रश्च आत्रेयः सुतपास्तथा ॥ ७४॥
अङ्गिरास्तपसो मूर्त्तिस्तपस्वी काश्यपस्तथा।
तपोधनश्च पौलस्त्यः पौलहश्च तपो रविः ॥ ७५ ॥
भार्गवः सप्तमस्तेषां विज्ञेयस्तु तपोद्युतिः।
पञ्च देवगणाः प्रोक्ता मानसा ब्रह्मणश्च ते ॥ ७६ ॥
अब मैं चतुर्थ सावर्तिके (अर्थात् ग्यारहवें मन्वन्तरके) ऋषियोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। वसिष्ठजीके पुत्र द्युति, अत्रिगोत्रमें उत्पन्न सुतपा, अङ्गिरागोत्री तपोधूर्त्ति, कश्यपगोत्री तपस्वी, पुलस्त्यवंशमें उत्पन्न तपोधन, पुलहगोत्री तपोरवि और सातवाँ भृगुवंशी तपोद्युति (को) समझना चाहिये। (इस मन्वन्तरमें) देवताओंके पाँच गण होंगे। वे सब ब्रह्माजीके संकल्पसे उत्पन्न होंगे ॥ ७४-७६ ॥
देववायुस्तुरङ्गश्च देवश्रेष्ठो विदूरथः।
मित्रवान् मित्रदेवश्च मित्रसेनश्च मित्रकृत्।
मित्रबाहुः सुवर्चाश्च द्वादशस्य मनोः सुताः ॥ ७७ ॥
इन बारहवें मनुके देवबाहु, अवुर, देवश्रेष्ठ, विदूरथ, मित्रवान्, मित्रदेव, मित्रसेन, मित्रकृत्, मित्रबाहु और सुवर्चा (-ये दस) पुत्र होंगे ॥ ७७ ॥
त्रयोदशेऽथ पर्याये भाव्ये मन्वन्तरे मनोः।
अङ्गिराश्चैव धृतिमान् पौलस्त्यो हव्यपस्तु यः ॥ ७८ ॥
पौलहस्तत्त्वदर्शी च भार्गवश्च निरुत्सुकः।
निष्कम्पस्तथाऽऽत्रेयो निर्मोहः काश्यपस्तथा ॥ ७९ ॥
सुतपाश्चैव वासिष्ठः सप्तैते तु महर्षयः।
त्रय एव गणाः प्रोक्ता देवतानां स्वयम्भुवा ॥ ८० ॥
फिर भविष्यके तेरहवें मनुके मन्वन्तरमें अङ्गिरागोत्री धृतिमान्, पुलस्त्यवंशी हव्यप, पुलहवंशोत्पन्न तत्त्वदर्शी, भृगुगोत्री निरुत्सुक, अत्रिगोत्री निष्प्रकम्प, कश्यपगोत्री निर्मोह और वसिष्ठगोत्री सुतपा—ये सात महर्षि होंगे और देवताओंके तीन गण होंगे, ऐसा स्वयं ब्रह्माजीने कहा है॥
त्रयोदशस्य पुत्रास्ते विज्ञेयास्तु रुचेः सुताः।
चित्रसेनो विचित्रश्च नयो धर्मभृतो धृतः ॥ ८१ ॥
सुनेत्रः क्षत्रवृद्धिश्च सुतपा निर्भयो दृढः।
रौच्यस्यैते मनोः पुत्रा अन्तरे तु त्रयोदशे ॥ ८२ ॥
अब तेरहवें मनु रुचिके पुत्रोंको इस प्रकार जानो—चित्रसेन, विचित्र, नय, धर्मभृत, धृत, सुनेत्र, क्षत्रवृद्धि, सुतपा, निर्भय और दृढ—ये तेरहवें मन्वन्तरमें रौच्य नामक मनुके पुत्र होंगे ॥ ८१-८२ ॥
चतुर्दशेऽथ पर्याये भौत्यस्यैवान्तरे मनोः।
भार्गवो ह्यतिबाहुश्च शुचिराङ्गिरसस्तथा ॥ ८३ ॥
युक्तदश्चैव तथाऽऽत्रेयः शुक्लो वासिष्ठ एव च।
अजितः पौलहश्चैव अन्त्याः सप्तर्षयश्च ते ॥ ८४ ॥
चौदहवें भौत्य नामक मनुके मन्वन्तरमें भृगुगोत्रोत्पन्न अतिबाहु, अङ्गिरागोत्री शुचि, अङ्गिरगोत्री युक्त, अत्रिगोत्रोत्पन्न युक्त, अत्रिगोत्री शुक्ल, वसिष्ठगोत्री शुक्र तथा पुलहगोत्री अजित—ये अन्तिम सप्तर्षि होंगे ॥ ८३-८४ ॥
एतेषां कल्प उत्थाय कीर्तनात् सुखमेधते।
यशश्चाप्नोति सुमहदायुष्मांश्च भवेन्नरः ॥ ८५ ॥
अतीतानागतानां वै महर्षीणां सदा नरः।
देवतानां गणाः प्रोक्ताः पञ्च चै भरतर्षभ ॥ ८६ ॥
मनुष्य प्रातःकाल उठकर इन भूत-भविष्यत्-कालके महर्षियोंका कीर्तन करनेसे सदा सुख पाता है, साथ ही वह बड़ा भारी यश पाता है और दीर्घायु होता है। भरतर्षभ ! उस समय देवताओंके पाँच गण होंगे ॥ ८५-८६ ॥
तरङ्गभीरूर्ध्वप्रभ तरस्वानुग्र एव च।
अभिमानी प्रवीणश्च जिष्णुः संक्रन्दनस्तथा ॥ ८७ ॥
तेजस्वी सबलश्चैव भौत्यस्यैते मनोः सुताः।
भौत्यस्यैवाधिकारो तु पूर्णे कल्पस्तु पूर्यते ॥ ८८ ॥
भौत्य मनुके तरङ्गभीरु, वप्र, तरस्वान्, उग्र, अभिमानी, प्रवीण, जिष्णु, संक्रन्दन, तेजस्वी और सबल—ये (दस) पुत्र होंगे तथा भौत्य मनुका अधिकारकाल पूर्ण होनेपर कल्प (अर्थात् ब्रह्माजीकी आयुका एक दिन) पूरा हो जाता है॥
इत्येते नामतोऽतीता मनवः कीर्तिता मया।
तैरियं पृथिवी तात समुद्रान्ता सपत्तना ॥ ८९ ॥
पूर्णे युगसहस्रं तु परिपाल्या नराधिप।
प्रजाभिश्चैव तपसा संहारस्तेषु भागशः ॥ ९० ॥
यह मैंने नाम लेकर बीते हुए (वर्तमान और होनेवाले) मनुओंका वर्णन किया। नराधिप ! ये (मनु) तपस्याके प्रभावसे हजार चतुर्युगी पूर्ण होनेतक नगरोंसे लेकर समुद्रतककी पृथ्वीका तथा प्रजाका सर्वदा पालन करते हैं। उक्त सभी मन्वन्तरोंमें अलग-अलग प्रजाका संहार होता है ॥ ८९-९० ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि मन्वन्तरवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें मन्वन्तर-वर्णनविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
[ हरिवंशपर्व ] अष्टमोऽध्यायः ३३
अष्टमोऽध्यायः
चारों युगों, मन्वन्तरों और ब्रह्माजीके दिन एवं वर्षका मान
जनमेजय उवाच
मन्वन्तरस्य संख्यानं युगानां च महामते ।
ब्रह्मणोऽह्नः प्रमाणं च वक्तुमर्हसि मे द्विज ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— परम बुद्धिमान् द्विजवर ! आप मुझसे मन्वन्तरोंके युगोंकी संख्याका वर्णन कीजिये तथा ब्रह्माजीके दिनका प्रमाण भी बताइये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
अहोरात्रं भजेत् सूर्यो मानवं लौकिकं परम् ।
तामुपादाय गणनां शृणु संख्यामरिन्दम ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी बोले— शत्रुदमन ! सूर्य मनुष्योंके दिन और रात्रिका विभाग करते हैं । इस लौकिक गणनासे आरम्भ करके मनुसे भी परे द्विपरार्धनामक ब्राह्म-गणनास्तकका वर्णन सुनो ॥ २ ॥
निमेषैः पञ्चदशभिः काष्ठा त्रिंशत् तु ताः कलाः ।
त्रिंशत्कलो मुहूर्त्तस्तु त्रिंशता तैर्मनीषिणः ॥ ३ ॥
अहोरात्रमिति प्राहुश्चन्द्रसूर्यगतिं नृप ।
विशेषेण तु सर्वेषु अहोरात्रे च नित्यशः ॥ ४ ॥
राजन् ! पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाओंकी एक कला होती है । तीस कलाओंका एक मुहूर्त होता है और बुद्धिमान् पुरुष तीस मुहूर्तोंको एक दिन-रात कहते हैं, जिसका निर्माण चन्द्रमा तथा सूर्यकी गतिद्वारा होता है । विशेषकर सूर्य-चन्द्रमाके उदय-अस्तसे मेरुके परिवर्ती भू-प्रदेशमें रात-दिन होता है ॥ ३-४ ॥
अहोरात्राः पञ्चदश पक्ष इत्यभिशब्दितः ।
द्वौ पक्षौ तु स्मृतो मासो मासौ द्वावृतुरुच्यते ॥ ५ ॥
पंद्रह अहोरात्र (दिन-रात) का नाम पक्ष है और दो पक्षों—पखवाड़ोंका एक महीना माना जाता है तथा दो महीनोंकी एक ऋतु कहलाती है ॥ ५ ॥
अब्दं द्वयनमुक्तं च अयनं ऋतुभिस्त्रिभिः ।
दक्षिणं चोत्तरं चैव संख्यातत्त्वविशारदैः ॥ ६ ॥
तीन ऋतुओंका एक अयन होता है और दो अयनोंका एक वर्ष होता है । संख्याके तत्त्वको जाननेमें चतुर पुरुषोंने उन दोनों अयनोंका नाम दक्षिणायन और उत्तरायण बताया है ॥ ६ ॥
मानेनानेन यो मासः पक्षद्वयसमन्वितः ।
पितॄणां तदहोरात्रमिति कालविदो विदुः ॥ ७ ॥
इस मानसे जो दो पक्षोंका (एक) मास होता है, उसे समयको जाननेवाले (चतुर पुरुष) पितरोंका (एक) दिन-रात कहते हैं ॥ ७ ॥
कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लपक्षस्तु शर्वरी ।
कृष्णपक्षं त्वहः श्राद्धं पितॄणां वर्तते नृप ॥ ८ ॥
कृष्ण-पक्ष उन पितरोंका दिन होता है और शुक्ल पक्ष उनकी रात्रि होती है, इसलिये राजन् ! कृष्णपक्षरूप दिनमें पितरोंका श्राद्ध होता है* ॥ ८ ॥
मानुषेण तु मानेन यो वै संवत्सरः स्मृतः ।
देवानां तदहोरात्रं दिवा चैवोत्तरायणम् ।
दक्षिणायनं स्मृता रात्रिः प्राज्ञैस्तत्त्वार्थकोविदैः॥ ९ ॥
मनुष्योंके मानसे जो एक वर्ष कहा गया है, वह देवताओंका एक दिन-रात होता है । तत्त्वको जाननेमें चतुर बुद्धिमान् पुरुषोंने उत्तरायणको देवताओंका दिन और दक्षिणायनको देवताओंकी रात्रि बताया है† ॥ ९ ॥
दिव्यमब्दं दशगुणमहोरात्रं मनोः स्मृतम् ।
अहोरात्रं दशगुणं मानवः पक्ष उच्यते ॥ १० ॥
देवताओंके दस वर्षोंका मनुका एक दिन-रात कहा है और इस दिन-रातका दसगुना मनुका एक पक्ष कहलाता है ॥ १० ॥
पक्षो दशगुणो मासो मासैर्द्वादशभिर्गुणैः ।
ऋतुर्मनूनां संप्रोक्तः प्राज्ञैस्तत्त्वार्थदर्शिभिः ।
ऋतुद्वयेण त्वयनं तद्द्वयेनैव वत्सरः ॥ ११ ॥
दस पक्षोंका मनुका एक मास होता है, बारह महीनोंकी एक ऋतु होती है । तत्त्वार्थदर्शी बुद्धिमानोंने
* चन्द्रलोकमें रहनेवाले पितर शुक्ल-पक्षमें चन्द्रमासे ढके हुए सूर्यको नहीं देखते । कृष्ण-पक्षमें सूर्य और चन्द्रमा एक-दूसरेके सम्मुख होनेके कारण उन्हें सूर्यका दर्शन होता है, इसलिये शुक्ल-पक्षको पितरोंकी रात्रि और कृष्ण-पक्षको पितरोंका दिन कहा है । इसीलिये सम्पूर्ण कृष्णपक्षको अथवा अत्यन्त आवश्यकता होनेपर दिनका अन्त होनेके कारण अमावास्याको श्राद्ध-काल बताया है ।
† तात्पर्य यह है कि मकर-संक्रान्तिसे मिथुन-संक्रान्तिके अन्ततक सूर्यके रथकी किरणोंके और अक्षांशकी किरणोंके प्रतिदिन ध्रुवकी ओर खिंचते रहनेसे उत्तरकी ओर चलनेवाला सूर्य मेरु पर्वतके शिखरपर रहनेवाले देवताओंको दीखता रहता है, अतः उत्तरायण देवताओंका दिन होता है तथा कर्क-संक्रान्तिसे लेकर धनुः-संक्रान्तिके अन्ततक उन दोनों प्रकारकी किरणोंके ध्रुवको प्रतिदिन क्रमशः छोड़ते रहनेसे दक्षिणकी ओर चलता हुआ सूर्य देवताओंको नहीं दीखता । अतएव दक्षिणायन देवताओंकी रात है ।
म० १० २
३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तीन ऋतुओंका एक अयन माना है और दो अयनोंका एक वर्ष कहा है * ॥ ११ ॥
चत्वार्येव सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् ।
तावच्छती भवेत् संध्या संध्यांशश्च तथा नृप ॥ १२॥
राजन् ! देवताओंके चार हजार वर्षोंका एक सत्ययुग होता है, चार सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है और इतना ही उसका संध्यांश होता है † ॥ १२ ॥
त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेता स्यात् परिमाणतः ।
तस्याश्च त्रिशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ॥ १३ ॥
तीन हजार वर्षोंके परिमाणका त्रेतायुग होता है और तीन सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है तथा इतना ही उसका संध्यांश होता है ॥ १३ ॥
तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिकीर्तितम् ।
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ॥ १४ ॥
इसी प्रकार दो हजार वर्षोंका द्वापरयुग कहा गया है; दो सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है और इतना ही उसका संध्यांश होता है ॥ १४ ॥
कलिवर्षसहस्रं च संख्यातोऽत्र मनीषिभिः ।
तस्यापि शतिका संध्या संध्यांशश्चैव तद्विधः ॥ १५ ॥
इसी गणनाके अनुसार बुद्धिमान् पुरुषोंने कलियुगको एक हजार वर्षोंवाला बताया है। सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है और इतना ही संध्यांश होता है ॥ १५ ॥
एषा द्वादशसाहस्री युगसंख्या प्रकीर्तिता ।
दिव्येनानेन मानेन युगसंख्यां निबोध मे ॥ १६ ॥
यह बारह हजार वर्षोंकी एक चतुर्युगीकी संख्या कही गयी । राजन् ! इस दिव्यमानसे तुम युगोंके वर्षोंकी गिनती समझ लो‡ ॥ १६ ॥
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैव चतुर्युगी ।
युगं तदेकसप्तत्या गणितं नृपसत्तम ॥ १७ ॥
मन्वन्तरमिति प्रोक्तं संख्यानार्थविशारदैः ।
अयनं चापि तत्प्रोक्तं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे ॥ १८ ॥
सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारोंको चतुर्युगी कहते हैं । नृपश्रेष्ठ ! संख्या करनेमें चतुर पुरुषोंने इकहत्तर चौकड़ी युगों (से कुछ अधिक काल) का नाम मन्वन्तर कहा है (क्योंकि हजारका चौदहवाँ भाग इतना ही होता है)। इसके भी दक्षिणायन और उत्तरायण—ये दो अयन कहे गये हैं * ॥ १७-१८ ॥
मनुः प्रलीयते यत्र समाप्ते चायने प्रभोः ।
ततोऽपरो मनुः कालमेतावन्तं भवत्युत ॥ १९ ॥
उत्तरायणके पूर्ण होनेपर मनु ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं । फिर इतने ही समयतक दूसरे मनु रहते हैं ॥ १९ ॥
समतीतेषु राजेन्द्र प्रोक्तः संवत्सरः स वै ।
तदेव चायुतं प्रोक्तं मुनिना तत्त्वदर्शिना ॥ २० ॥
राजेन्द्र ! तत्त्वदर्शी मुनिने दस हजार (अस्सी) मनुओंका ब्रह्माजीका एक वर्ष कहा है † ॥ २० ॥
ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं कल्पश्चेति स कथ्यते ।
सहस्रयुगपर्यन्ता या निशा प्रोच्यते बुधैः ॥ २१ ॥
निमज्जत्यप्सु यत्रोर्वी सशैलवनकानना ।
तस्मिन् युगसहस्रे तु पूर्णे भरतसत्तम ॥ २२ ॥
ब्राह्मे दिवसपर्यन्ते कल्पो निःशेष उच्यते ।
युगानि सप्ततिस्तानि साग्राणि कथितानि ते ॥ २३ ॥
कृतत्रेतादियुक्तानि मनोन्तरमुच्यते ।
चतुर्दशैते मनवः कीर्तिताः कीर्तिवर्द्धनाः ॥ २४ ॥
वेदेषु सपुराणेषु सर्वेषु प्रभविष्णवः ।
प्रजानां पतयो राजन् धन्यमेषां प्रकीर्तनम् ॥ २५ ॥
भरतसत्तम ! ब्रह्माजीका जो दिन कहा है, उसीका नाम कल्प है और विद्वान् पुरुषोंने हजार युगोंकी ब्रह्माजीकी जो रात्रि कही है, उसमें वन और पर्वतोंसहित पृथ्वी जलमें डूब जाती है और उन हजार चतुर्युगियोंके पूर्ण होनेपर जो ब्रह्माजीका दिन आरम्भ होता है, उसकी समाप्ति तकका समय एक कल्प कहलाता है । राजन् ! सत्ययुग, त्रेतायुगादिसहित इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर कहलाता है ।† यह कीर्ति
* अर्थात् देवताओंके बहत्तर हजार वर्षोंका मनुका एक दिन होता है ।
† युगके पहले भागका नाम संध्या और युगके अन्तिम भागका नाम संध्यांश है ।
‡ सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुगकी एक चतुर्युगी देवताओंके बारह हजार वर्षोंकी होती है अर्थात् दिव्य दस हजार वर्षोंके ये चारों युग होते हैं । इन चारों युगोंकी संध्याएँ एक हजार दिव्य वर्षोंकी होती हैं और इनके संध्यांश भी एक हजार दिव्य वर्षोंके होते हैं ।
* अर्थात् वे पहले धूमादिमार्गसे देवलोकमें पहुँचकर अपने अधिकारको भोगनेके अनन्तर उत्तरायणके मार्गसे ब्रह्मलोकमें पहुँच जाते हैं ।
† इकहत्तर चतुर्युगके हिसाबसे चौदह मन्वन्तरोंमें ९९४ चतुर्युग होते हैं । तथा ब्रह्माके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग होते हैं, अतः छः चतुर्युग और बचे । छः चतुर्युगका चौदहवाँ भाग कुछ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है । इस प्रकार एक मन्वन्तरमें इकहत्तर चतुर्युगके अतिरिक्त इतने दिव्य वर्ष और अधिक होते हैं ।
हरिवंशपर्व ] अष्टमोऽध्यायः ३५
बढ़ानेवाले चौदह मनुओंका वर्णन कर दिया। सभी पुराणों और वेदोंमें इन प्रभावशाली प्रजापति मनुओंका वर्णन आता है। राजन्! इनका कीर्तन करनेसे धनकी प्राप्ति होती है॥ २१-२५॥
मन्वन्तरेषु संहाराः संहारान्तेषु सम्भवाः।
न शक्यमन्तरं तेषां वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ २६॥
मन्वन्तरोंमें कितने ही संहार होते हैं और संहारके बाद कितनी ही सृष्टियाँ होती रहती हैं। इनके अन्तरको सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं बताया जा सकता॥ २६॥
विसर्गस्य प्रजानां वै संहारस्य च भारत।
मन्वन्तरेषु संहाराः श्रूयन्ते भरतर्षभ ॥ २७॥
भारत! भरतश्रेष्ठ! प्रायः सभी मन्वन्तरोंमें यदा-कदा प्रजाकी सृष्टि और संहारकी परम्पराका उपसंहार हो जाता है—यह बात सुननेमें आती है॥ २७॥
सशेषास्तत्र तिष्ठन्ति देवाः सप्तर्षिभिः सह।
तपसा ब्रह्मचर्येण श्रुतेन च समाहिताः ॥ २८॥
मन्वन्तरोंके बाद जो संहार होता है, उसमें तपस्या, ब्रह्मचर्य और शास्त्र-ज्ञानसे सम्पन्न कुछ देवता और सप्तर्षि शेष रह जाते हैं॥ २८॥
पूर्णे युगसहस्रे तु कल्पो निःशेष उच्यते।
तत्र सर्वाणि भूतानि दग्धान्यादित्यतेजसा ॥ २९॥
सहस्र चतुर्युगियोंके पूर्ण होनेपर कल्प पूरा हो जाता है। उस समय सब भूत द्वादश आदित्योंकी किरणोंसे भस्म हो जाते हैं॥ २९॥
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा सहादित्यगणैर्विभुम्।
योगं योगीश्वरं देवमजं क्षेत्रज्ञमच्युतम्।
प्रविशन्ति सुरश्रेष्ठं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥ ३०॥
और वे (द्वादश सूर्य) भी (जिसका ईंधन जल गया है, ऐसे अग्निकी भाँति अपनी आत्माका उपसंहार करके) देवताओंसहित ब्रह्माजीको आगे करके योगीश्वर योगस्वरूप, देव, अज, क्षेत्रज्ञ, अच्युत, सुरश्रेष्ठ, सर्वव्यापी, प्रभु श्रीहरि नारायणमें प्रवेश कर जाते हैं॥ ३०॥
यः स्रष्टा सर्वभूतानां कल्पान्तेषु पुनः पुनः।
अव्यक्तः शाश्वतो देवस्तस्य सर्वमिदं जगत् ॥ ३१॥
जो प्रत्येक कल्पका अन्त होनेपर (दूसरे कल्पका आरम्भ होनेके समय) वारंवार सब भूतोंको रचते हैं, जो अप्रकट, शाश्वत देव हैं, उन्हींका यह सम्पूर्ण जगत् है॥ ३१॥
तत्र संवर्तते रात्रिः सकलैरार्णवे तदा।
नारायणो दधे निद्रां ब्राह्मं वर्षसहस्रकम् ॥ ३२॥
(यह प्रलय सुषुप्तिके समय होता है, अतएव) जब सम्पूर्ण विश्व एकार्णवके जलमें निमग्न हो जाता है, तब रात्रि होती है और ब्रह्माजीके हजार वर्षोंतक नारायण निद्रा लेते हैं॥ ३२॥
तावन्तमिति कालस्य रात्रिरित्यभिशब्दिता।
निद्रायोगमनुप्राप्तो यस्यां शेते पितामहः ॥ ३३॥
जितने समयतक ब्रह्माजी योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते हैं, उतना समय उनकी रात्रि कहलाती है॥ ३३॥
सा च रात्रिरपक्रान्ता सहस्रयुगपर्यया।
तदा प्रबुद्धो भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ३४॥
पुनः सिसृक्षया युक्तः सर्गाय विदधे मनः।
सैव स्मृतिः पुराणेयं तद्वृत्तं तद्विचेष्टितम् ॥ ३५॥
जब वह रात्रि सहस्र चतुर्युगी बीतनेपर समाप्त होती है, तब लोकोंके पितामह भगवान् ब्रह्माजी जागते हैं। फिर रचनेकी इच्छासे युक्त होकर मनमें सृष्टि करनेका विचार करते हैं। उस समय उनकी चेष्टा और स्मृति पहले कल्पकी तरह ही होती है॥ ३४-३५॥
देवस्थानानि तान्येव केवलं च विपर्ययः।
ततो दग्धानि भूतानि सर्वाण्यादित्यरश्मिभिः ॥ ३६॥
देवर्षियक्षगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः।
जायन्ते च पुनस्तात युगे भरतसत्तम ॥ ३७॥
तात! उस समय (ब्रह्माण्डमें सूर्य आदि) देवताओंके (और पिण्डमें चक्षु आदिके) स्थान भी वे ही होते हैं। परंतु (जीवोंका) विपर्यय (उलट-फेर) होता रहता है। भरतसत्तम! सूर्यकी किरणोंसे भस्म होकर (भगवान् विष्णुमें लीन हुए) सब भूत तथा देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष, पिशाच, सर्प और राक्षस भी फिर उस युगमें उत्पन्न हो जाते हैं॥ ३६-३७॥
यथर्तवृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये।
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा ब्राह्मीषु रात्रिषु ॥ ३८॥
जैसे (ग्रीष्म-शीत आदि) ऋतुओंके चिह्न उन ऋतुओंके आनेपर प्रकट होने लगते हैं, इसी प्रकार ब्रह्माजीकी रात्रियोंके बीतनेपर (पूर्व कल्पके समान) अनेक रूपोंवाले प्राणी (फिर) दीखने लगते हैं॥ ३८॥
निष्क्रमित्वा प्रजाकारः प्रजापतिरसंशयम्।
ये च वै मानवा देवाः सर्वे चैव महर्षयः ॥ ३९॥
ते सङ्गाः शुद्धसङ्गाः शश्वद्धर्मविसर्गतः।
न भवन्ति पुनस्तात युगे भरतसत्तम ॥ ४०॥
तात! प्रजाओंको रचनेवाले प्रजापति (उस समय नारायणमेसे) निकलकर (फिर भूतोंको रचने लगते हैं।) जो-जो मनुष्य, देवता और महर्षिगण शाश्वतधर्म अर्थात् देहादिमें
| ३६ | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
आत्मबुद्धिरूप स्वाभाविक दोषोंको त्यागकर शुद्ध ब्रह्ममें पहुँचकर उसमें लीन हो जाते हैं, भरतसत्तम ! वे फिर (दूसरे) कल्पमें उत्पन्न नहीं होते ॥ ३९-४० ॥
तत्सर्वं क्रमयोगेन कालसंख्याविभागवित्।
सहस्रयुगसंख्यानं कृत्वा दिवसमीश्वरः ॥ ४१ ॥
रात्रिं युगसहस्रान्तां कृत्वा च भगवान् विभुः।
संहरत्यथ भूतानि सृजते च पुनः पुनः ॥ ४२ ॥
कालकी संख्याका विभाग करनेमें चतुर वे सर्वसमर्थ भगवान् परमात्मा क्रमानुसार सहस्र युगोंकी संख्यावाले दिन और (इसी प्रकार) सहस्र चतुर्युगियोंकी रात्रिको बनाकर प्राणियोंकी वारंवार रचना और संहार करते रहते हैं ॥ ४१-४२ ॥
व्यक्ताव्यक्तो महादेयो हरिनारायणः प्रभुः।
तस्य ते कीर्तयिष्यामि मनोर्वैवस्वतस्य ह ॥ ४३ ॥
विसर्गं भरतश्रेष्ठ साम्प्रतस्य महाद्युते।
वृष्णिवंशप्रसङ्गेन कथ्यमानं पुरातनम् ॥ ४४ ॥
यत्रोत्पन्नो महात्मा स हरिर्वृष्णिकुले प्रभुः।
सर्वासुरविनाशाय सर्वलोकहिताय च ॥ ४५ ॥
महादेव श्रीहरिनारायण प्रभु ही स्थूल-सूक्ष्म-रूप (में सर्वत्र विराजमान) हैं। महाद्युते! वर्तमान वैवस्वत मनु भी उनके ही अंश हैं। वृष्णिवंशके प्रसङ्गसे मैं उनकी पुरातन सृष्टिका वर्णन करूँगा। भरतश्रेष्ठ! वे परमात्मा और प्रभु श्रीहरि सारे असुरोंका विनाश तथा सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण करनेके लिये इसी वृष्णिवंशमें उत्पन्न हुए थे ॥ ४३-४५ ॥
इति श्रीमद्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि मन्वन्तरगणनायामष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें मन्वन्तर-गणनाविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
वैवस्वत मनु, यम, यमी (यमुना), अश्विनीकुमारों एवं शनैश्चरकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे दाक्षायण्यामरिंदम।
तस्य भार्याभवत् संज्ञा त्वाष्ट्री देवी विवस्वतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—शत्रुदमन ! कश्यपजीसे दक्षकी पुत्रीमें विवस्वान् उत्पन्न हुए और त्वष्टाकी पुत्री संज्ञादेवी उन विवस्वान् (सूर्य) की भार्या हुई ॥ १ ॥
सुरेणुरिति विख्याता त्रिषु लोकेषु भाविनी।
सा वै भार्या भगवती मार्तण्डस्य महात्मनः ॥ २ ॥
महात्मा मार्तण्डकी वह पवित्र अन्तःकरणवाली भार्या भगवती संज्ञा तीनों लोकोंमें सुरेणुके नामसे (भी) प्रसिद्ध है ॥ २ ॥
भर्तूरूपेण नातुष्यद् रूपयौवनशालिनी।
संज्ञा नाम सुतपसा दीप्तेनेह समन्विता ॥ ३ ॥
वह रूपयौवनशालिनी संज्ञा अपने पति सूर्यदेवके मण्डलके तीव्र तप, तेज, एवं दीप्तिके कारण प्रसन्न नहीं रहती थी ॥ ३ ॥
आदित्यस्य हि तद्रूपं मण्डलस्य सुतेजसा।
गात्रेषु परिदग्धं वै नातिकान्तमिवाभवत् ॥ ४ ॥
उस संज्ञाका रूप सूर्यमण्डलके तेजसे अङ्गोंके संतप्त होनेके कारण (झुलस-सा गया। अतएव सूर्य उसको) बहुत अच्छे नहीं लगते थे ॥ ४ ॥
न खल्वयं मृतोऽण्डस्थ इति स्नेहादभाषत।
अज्ञानात् कश्यपस्तस्मान्मार्तण्ड इति चोच्यते ॥ ५ ॥
(अदितिके) अज्ञानमें पड़नेपर कश्यपजीने स्नेहपूर्वक कहा था कि यह मरा नहीं है, किंतु अण्ड (गर्भ) में स्थित है, इसलिये तबसे सूर्य ‘मार्तण्ड’ कहे जाते हैं* ॥ ५ ॥
तेजस्त्वभ्यधिकं तात नित्यमेव विवस्वतः।
येनातितापयामास स्त्रींल्लोकान् कश्यपात्मजः ॥ ६ ॥
तात ! (कश्यपके माहात्म्यके कारण जीवित हुए) विवस्वान्में सर्वदा अधिक तेज रहता है। उसी तेजसे कश्यप-जीके पुत्र सूर्य तीनों लोकोंको तपाते रहते हैं ॥ ६ ॥
त्रीण्यपत्यानि कौरव्य संज्ञायां तपतां वरः।
आदित्यो जनयामास कन्यां द्वौ च प्रजापती ॥ ७ ॥
* जब सूर्य अदितिके गर्भमें थे, उस समय भृगु उनके पास भिक्षा माँगनेके लिये आये;—परंतु अदिति गर्भके बोझके कारण शीघ्रतासे चलकर भिक्षा न दे सकी, तब भृगुने अदितिको शाप दे दिया कि तेरा गर्भ मृत हो जाय। यह सुनकर अदिति व्याकुल हो गयी, तब कश्यपजीने अपनी शक्तिसे भृगुके शापको दूर कर दिया और कहा कि यह वास्तवमें मृत नहीं हुआ, अण्ड (गर्भ) के भीतर वर्तमान है। अदितिके (मेरा गर्भ मृत हो गया) इस विपरीत ज्ञानके कारण ही सूर्य मार्तण्ड कहलाते हैं।
हरिवंशपर्व ] नवमोऽध्यायः ३७
कुरुवंशी राजन् ! तपानेवालोंमें श्रेष्ठ आदित्यने संज्ञाके गर्भसे दो प्रजापति और एक कन्या—इन तीन संतानोंको उत्पन्न किया ॥ ७ ॥
मनुर्वैवस्वतः पूर्वं श्राद्धदेवः प्रजापतिः।
यमश्च यमुना चैव यमजौ सम्बभूवतुः ॥ ८ ॥
उनमें एक प्रजापति तो विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु थे और दूसरे प्रजापति श्राद्धदेव यम थे। इस तरह यम तथा यमुना नामक दो जुड़वीं संतान उत्पन्न हुई थी ॥
सा विवर्णं तु तद्रूपं दृष्ट्वा संज्ञा विवस्वतः।
असहन्ती च स्वां छायां सवर्णां निर्ममे ततः ॥ ९ ॥
तदनन्तर संज्ञाने सूर्यके कठिनतासे सहने योग्य तेजस्वी रूपको देखकर उनके तेजको न सह सकनेके कारण अपनी छायाको ही अपने समान नाम और रूपवाली बनाकर तैयार कर दिया* ॥ ९ ॥
मायामयी तु सा संज्ञा तस्याश्छाया समुत्थिता।
प्राञ्जलिः प्रणता भूत्वा छाया संज्ञां नरेश्वर ॥ १० ॥
उवाच किं मया कार्यं कथयस्व शुचिस्मिते।
स्थितास्मि तव निर्देशे शाधि मां वरवर्णिनि ॥ ११ ॥
वह मायामयी संज्ञा संज्ञाकी छायासे उत्पन्न हुई थी। नरेश्वर ! वह छाया संज्ञाको प्रणामकर हाथ जोड़कर बोली—'शुचिस्मिते ! बताओ, मुझे क्या करना चाहिये? श्रेष्ठ अङ्गोंवाली ! मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगी, तुम मुझे आज्ञा दो' ॥
संज्ञोवाच
अहं यास्यामि भद्रं ते स्वमेव भवनं पितुः।
त्वयेह भवने मह्यं वस्तव्यं निर्विकारया ॥ १२ ॥
इमौ च बालकौ मह्यं कन्या चेयं सुमध्यमा।
सम्भाव्यास्ते न चाख्येयमिदं भगवते क्वचित् ॥ १३ ॥
संज्ञाने कहा—तुम्हारा कल्याण हो ! मैं अब अपने पिताके घर जा रही हूँ, तुम मेरे इस घरमें शान्त होकर रहो। ये मेरे दोनों पुत्र हैं और यह एक सुमध्यमा (सुन्दर कटिवाली) कन्या है। इनका तू ध्यान रखना और इस रहस्यको भगवान् सूर्यसे कभी न बतलाना ॥ १२-१३ ॥
छायोवाच
आ कचग्रहणाद् देवि आ शापान्नैव कर्हिचित्।
आख्यास्यामि मतं तुभ्यं गच्छ देवि यथासुखम् ॥ १४ ॥
छायाने कहा—देवि ! मेरे बाल पकड़े जाने तथा शाप देनेकी नौबत आनेके पूर्व मैं यह बात किसी प्रकार भी न कहूँगी। आप सुखपूर्वक (अपने पिताके यहाँ) जायँ ॥
वैशम्पायन उवाच
समादिश्य सवर्णां तां तथेत्युक्ता च सा तया।
त्वष्टुः समीपमगमद् व्रीडितेव तपस्विनी ॥ १५ ॥
पितुः समीपगा सा तु पित्रा निर्भर्त्सिता तदा।
भर्तुः समीपं गच्छेति नियुक्ता च पुनः पुनः ॥ १६ ॥
अगच्छद् वडवा भूत्वा ऽऽच्छाद्य रूपमनिन्दिता।
कुरूनथोत्तरान् गत्वा तृणान्येव चचार ह ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—अपने समान नाम-रूपवाली छायाको आज्ञा देकर और उससे 'तथास्तु' कहे जानेपर वह तपस्विनी लज्जित-सी होती हुई अपने पिता त्वष्टाके यहाँ चली गयी। पिताके पास पहुँचनेपर उसके पिताने उसे बड़े जोरों-से डाँटा तथा उससे बार-बार पतिके पास ही जानेके लिये कहा। तब निन्दित कर्मोंसे सदा दूर रहनेवाली वह संज्ञा अपने रूपको बदलकर घोड़ीका रूप धारण करके उत्तरकुरुके देशोंमें जाकर घास चरने लगी ॥ १५-१७ ॥
द्वितीयायां तु संज्ञायां संज्ञेयमिति चिन्तयन्।
आदित्यो जनयामास पुत्रमात्मसमं तदा ॥ १८ ॥
उस दूसरी संज्ञाको भी संज्ञा ही समझते हुए सूर्य देवताने उसके गर्भसे अपने ही समान पुत्र उत्पन्न किया ॥ १८ ॥
पूर्वजस्य मनोस्तात सदृशोऽयमिति प्रभुः।
सवर्णत्वात्मनोर्भूयः सावर्णि इति चोक्तवान् ॥ १९ ॥
तात ! ये अपने बड़े भाई मनुके समान वर्ण तथा शक्तिवाले थे, अतएव सावर्णि कहलाये ॥ १९ ॥
मनुरेवाभवन्नाम्ना सावर्णि इति चोच्यते।
द्वितीयो यः सुतस्तस्याः स विज्ञेयः शनैश्चरः ॥ २० ॥
वे ही मनु हुए, जिनका नाम सावर्णि मनु है। उस (छाया) से जो दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ, उनको तुम शनैश्चर समझो ॥ २० ॥
संज्ञा तु पार्थिवी तात स्वस्य पुत्रस्य वै तदा।
चकाराभ्यधिकं स्नेहं न तथा पूर्वजेषु वै ॥ २१ ॥
मनुस्तस्याक्षमत्तत्तु यमस्तस्या न चक्षमे।
वह पार्थिवी* संज्ञा अपने पुत्रसे तो अधिक स्नेह करती थी, परंतु वैसा स्नेह उनसे पहलेकी संतानोंसे नहीं करती थी। मनुने तो इस बातको सह लिया, परंतु यम इसे न सह सके ॥ २१½ ॥
तां स रोषाच्च बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य वै बलात्।
* संज्ञाके समान नाम और वर्णवाली होनेसे छायाका नाम सवर्णा भी है। इसीके पुत्र सावर्णि मनु हैं।
* संज्ञाकी छायाके पृथ्वीमें पड़नेके कारण वह पृथ्वीसे उत्पन्न हुई, अतएव 'पार्थिवी' कहलाती थी।
३८ . श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
पदा संतर्जयामास संज्ञां चैवस्ततो यमः ॥ २२ ॥
वे वैवस्वत यम बालस्वभाव एवं रोषके कारण तथा होनहार (भावी) के वशीभूत हो संज्ञाको पैर दिखाकर डाँटने लगे ॥ २२ ॥
तं शशाप ततः क्रोधात् सावर्णिजननी नृप।
चरणः पततामेष तवेति भृशदुःखिता ॥ २३ ॥
राजन् ! इसपर सावर्णीकी माताने अति दुःखित हो कोपमें भरकर उन्हें शाप दिया कि 'तुम्हारा यह चरण गिर जाय' ॥ २३ ॥
यमस्तु तत् पितुः सर्वं प्राञ्जलिः प्रत्यवेदयत् ।
भृशं शापभयोद्विग्नः संज्ञावाक्यप्रतोदितः ॥ २४ ॥
छाया-संज्ञाके उस वाक्यसे पीड़ित और शापके भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर यमने हाथ जोड़कर पितासे वह सब बात कह दी ॥
शापोऽयं विनिवर्तेत प्रोवाच पितरं तदा ।
मात्रा स्नेहेन सर्वेषु वर्तितव्यं सुतेषु वै ॥ २५ ॥
वे पितासे बोले—'मुझे यह शाप न लगे । ( देखिये ) माताको तो सब पुत्रोंके प्रति समानरूपसे स्नेहपूर्वक व्यवहार करना चाहिये ॥ २५ ॥
सेयमस्मानपाहाय यवीयांसं बुभूपति ।
तस्यां मयोद्यतः पादो न तु देहे निपातितः ॥ २६ ॥
बाल्याद्वा यदि वा मोहात् तद्भवान् क्षन्तुमर्हति ।
'पर यह हम सबको छोड़कर सबसे छोटेसे ही स्नेहका व्यवहार करती है। सो मैंने उसके ऊपर पैर उठाया ही था, शरीरपर मारा नहीं था। मैंने यह काम लड़कपनसे किया हो अथवा मोहवश, परंतु आप मुझे क्षमा कर दें ॥ २६½ ॥
यस्मात् ते पूजनीयाहं लङ्घितास्मि त्वया सुत ॥ २७ ॥
तस्मात् तवैष चरणः पतिष्यति न संशयः ।
अपत्यं दुरपत्यं स्यान्नाम्बा कुजननी भवेत् ॥ २८ ॥
'(संज्ञाने कहा—) बेटा ! मैं तुम्हारी पूजनीया हूँ, तो भी तुमने मेरा तिरस्कार किया है, अतः तुम्हारा यह पैर निस्सन्देह गिर जायगा ।' संतान तो कुसंतान हो सकती है, परंतु माता कुमाता नहीं हो सकती ॥ २७-२८ ॥
शप्तोऽहमस्मि लोकेश जनन्या तपतां वर ।
तव प्रसादाच्चरणो न पतेन्मम गोपते ॥ २९ ॥
'लोकेश्वर ! माताने मुझे शाप दे दिया है, परंतु तपनेवालोंमें श्रेष्ठ गोपते ! आपकी कृपासे मेरा पैर न गिरे(ऐसी कृपा कीजिये )' ॥ २९ ॥
विवस्वानुवाच
असंशयं पुत्र महत् भविष्यत्यत्र कारणम् ।
येन त्वामाविशत् क्रोधो धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ॥ ३० ॥
सूर्यने कहा—पुत्र ! तुम धर्मज्ञ और सत्यवादी हो, तुमको जो क्रोध चढ़ आया इसमें निस्संदेह कोई बड़ा भारी कारण होगा ॥ ३० ॥
न शक्यमन्यथा कर्तुं मया मातुर्वचस्तव ।
कृमयो मांसमादाय यास्यन्ति धरणीतलम् ॥ ३१ ॥
तव पादान्महाप्राज्ञ ततस्त्वं प्राप्स्यसे सुखम् ।
कृतमेवं वचस्तथ्यं मातुस्तव भविष्यति ॥ ३२ ॥
शापस्य परिहारेण त्वं च त्रातो भविष्यसि ।
मैं तुम्हारी माताके वचनको ( सर्वथा तो ) लौटा नहीं सकता। ( पर ) महाप्राज्ञ ! कीड़े तुम्हारे चरणमेंसे मांस लेकर पृथ्वीतलपर चले जायेंगे, तब तुम्हें सुख मिलेगा । इस प्रकार तुम्हारी माताका कहा हुआ वचन ( भी ) सत्य हो जायगा और शापका परिहार होनेसे तुम्हारी भी रक्षा हो जायगी ॥ ३१-३२½ ॥
आदित्योऽथाब्रवीत् संज्ञां किमर्थं तनयेषु वै ॥ ३३ ॥
तुल्येष्वभ्यधिकः स्नेहः क्रियतेऽति पुनःपुनः ।
सा तत्परिहसन्ती तु नाचचक्षे विवस्वते ॥ ३४ ॥
फिर सूर्यने संज्ञासे कहा—'सभी पुत्र बराबर हैं, तो भी तू (किसीसे कम और किसीसे ) अधिक स्नेह क्यों करती है।' सूर्यने यह बात बार-बार कही, परंतु वह हँसती ही रह गयी और उसने सूर्यसे कुछ भी न कहा ॥ ३३-३४ ॥
आत्मानं सुसमाधाय योगात् तथ्यमपश्यत ।
तां शप्तुकामो भगवान् नाशाय कुरुनन्दन ॥ ३५ ॥
मूर्धजेषु च जग्राह समयेऽतिगतेऽपि च ।
सा तत् सर्वं यथावृत्तमाचचक्षे विवस्वते ॥ ३६ ॥
कुरुनन्दन ! भगवान् सूर्यने अपने चित्तको एकाग्र करके योगके द्वारा सत्य बात जान ली और शापद्वारा उसका विनाश करनेके लिये उसके केश पकड़ लिये । तब अपनी शपथके उतर जानेपर छायाने सूर्यनारायणसे सारी बात ज्यों-की-त्यों बतला दी ॥ ३५-३६ ॥
विवस्वांश्च तच्छ्रुत्वा क्रुद्धस्त्वष्टारमभ्यगात् ।
त्वष्टा तु तं यथा न्यायमर्चयित्वा विभावसुम् ।
निर्दग्धुकामं रोषेण सान्त्वयामास वै तदा ॥ ३७ ॥
सूर्यनारायण इस बातको सुनते ही क्रोधमें भरकर त्वष्टाके पास पहुँचे । त्वष्टाने विधिपूर्वक उनकी पूजा करके जब देखा कि ये तो रोषसे मुझे भस्म ही करना चाहते हैं, तब उन्होंने सूर्यनारायणको इस प्रकार शान्त करना-समझाना आरम्भ किया ॥ ३७ ॥
त्वष्टोवाच
तवातितेजसाक्षिप्तमिदं रूपं न शोभते ।
असहन्ती च तत् संज्ञा वने चरति शाद्वले ॥ ३८ ॥
हरिवंशपर्व ] नवमोऽध्यायः ३९
त्वष्टाने कहा—आदित्य ! आपका यह अतितेजस्वी रूप अच्छा नहीं लगता। इसको न सह सकनेके कारण ही संज्ञा हरी घासवाले वनमें (हरी घासोंको) चर रही है ॥ ३८ ॥
द्रष्टा हि तां भवानद्य स्वां भार्यां शुभचारिणीम् ।
नित्यं तपस्यभिरतां वडवारूपधारिणीम् ॥ ३९ ॥
पर्णाहारां कृशां दीनां जटिलां ब्रह्मचारिणीम् ।
हस्तिहस्तपरिक्षिप्तां व्याकुलां पद्मिनीमिव ।
श्लाघ्यां योगबलोपेतां योगमास्थाय गोपते ॥ ४० ॥
किरणोंके स्वामी ! आज आप हाथीके सूँडसे खींचे जानेके कारण पद्मिनीके समान व्याकुल हुई, शुद्ध आचरणवाली और योगके बलसे सम्पन्न अतएव योगसे घोड़ीका रूप धारण करके सदा तप करती हुई, पत्तोंका आहार करनेवाली, दुबली, दीन, जटाधारिणी और ब्रह्मचारिणी अपनी उस प्रशंसनीया भार्याको देखेंगे ॥ ३९-४० ॥
अनुकूलं तु देवेश यदि स्यान्मम तन्मतम् ।
रूपं निर्वर्त्तयाम्यद्य तव कान्तमरिंदम ॥ ४१ ॥
देवेश ! यदि आपको मेरी बात ठीक लगे तो शत्रुदमन ! मैं आज आपके रूपको मनोहर बना दूँ ॥ ४१ ॥
रूपं विषमतश्चासीत् तिर्यगूर्ध्वसमं तु वै ।
तेनासौ सम्भृतो देवरूपेण तु विभावसुः ॥ ४२ ॥
पहले सूर्यका रूप तिरछा, ऊँचा और सब ओरसे एक-सा था। उस रूपसे सम्पन्न होनेके कारण ही वे विभावसु कहे जाते हैं ॥ ४२ ॥
तस्मात्त्वष्टुः स वै वाक्यं बहु मेने प्रजापतिः ।
समनुज्ञातवांश्चैव त्वष्टारं रूपसिद्धये ॥ ४३ ॥
इसलिये उन प्रजापति सूर्यनारायणने त्वष्टाकी बातको बहुत अच्छा समझा और उन्होंने अपना रूप ठीक करनेके लिये त्वष्टाको अनुमति दे दी ॥ ४३ ॥
ततोऽभ्युपगमात् त्वष्टा मार्तण्डस्य विवस्वतः ।
भ्रमिमारोप्य तत् तेजः शातयामास भारत ॥ ४४ ॥
भारत ! तब त्वष्टाने मार्तण्ड (सूर्य) के समीप जाकर उनको सानपर चढ़ाकर उनके तेजको खरादना आरम्भ कर दिया ॥ ४४ ॥
ततो निर्भासितं रूपं तेजसा संहृतेन वै ।
कान्तात् कान्तरं द्रष्टुमधिकं शुशुभे तदा ॥ ४५ ॥
इस प्रकार तेजके छिल जानेसे उनका रूप खिल उठा और उनका रूप रम्यातिरम्य होकर अधिक सुशोभित होने लगा ॥ ४५ ॥
मुखे निर्वर्तितं रूपं तस्य देवस्य गोपतेः ।
ततः प्रभृति देवस्य मुखमासीत् तु लोहितम् ।
मुखरागं तु यत्पूर्वं मार्तण्डस्य मुखच्युतम् ॥ ४६ ॥
आदित्या द्वादशैवेह सम्भूता मुखसम्भवाः ।
धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोऽशो भगस्तथा ॥ ४७ ॥
इन्द्रो विवस्वान् पूषा च पर्जन्यो दशमस्तथा ।
ततस्त्वष्टा ततो विष्णुरजघन्यो जघन्यजः ॥ ४८ ॥
तबसे किरणोंके स्वामी भगवान् सूर्यके मुखका रूप बदल गया । उस समयसे उनका मुख रक्तवर्णका हो गया । उन मार्तण्डके मुखसे जो मुखराग छूटा था, उससे बारह आदित्य उत्पन्न हुए । उनके मुखसे धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, दसवें पर्जन्य, त्वष्टा, बारहवें विष्णु उत्पन्न हुए, जो अन्तमें प्रकट होनेके कारण सबसे छोटे होकर भी गुणोंमें सर्वश्रेष्ठ थे ॥ ४६–४८ ॥
हर्षे लेभे ततो देवो दृष्ट्वाऽऽदित्यान् स्वदेहजान् ।
गन्धैः पुष्पैरलङ्कारैर्भासता मुकुटेन च ॥ ४९ ॥
गन्ध, पुष्प, अलंकार और प्रकाशमान मुकुटोंसे सुशोभित अपने शरीरसे उत्पन्न हुए उन आदित्योंको देखकर भगवान् सूर्य बड़े प्रसन्न हुए ॥ ४९ ॥
एवं सम्पूजयामास त्वष्टा वाक्यमुवाच ह ।
गच्छ देव निजां भार्यां कुरुंश्चरति सोत्तरान् ॥ ५० ॥
वडवारूपमास्थाय वने चरति शाद्वले ।
इस प्रकार सूर्यनारायणका पूजन कर त्वष्टाने उनसे कहा—'देव ! अब आप अपनी पत्नीके पास जाइये । वह उत्तर कुरु (देशों) में भ्रमण कर रही है और हरी घाससे भरे हुए वनमें घोड़ीका रूप धारण करके विचर रही है' ॥
स तथा रूपमास्थाय स्वभार्यारूपलीलया ॥ ५१ ॥
ददर्श योगमास्थाय स्वां भार्यां वडवां ततः ।
अधृष्यां सर्वभूतानां तेजसा नियमेन च ॥ ५२ ॥
वडवावपुषा राजंश्चरन्तीमकुतोभयाम् ।
सोऽश्वरूपेण भगवांस्तां मुखे समभावयत् ॥ ५३ ॥
मैथुनाय विचेष्टन्ती परपुंसोपशङ्कया ।
सा तन्निरवमच्छुक्रं नासिकायां विवस्वतः ॥ ५४ ॥
तब सूर्यनारायणने भी अपनी पत्नीके रूपके अनुसार घोड़ेके समान विचरण करनेके लिये घोड़ेका ही रूप धारण कर लिया । उस समय सूर्यने ध्यानसे देखा तो उन्हें तेज और नियमके कारण सब भूतोंसे अधृष्य घोड़ीका रूप धारण करके किसी ओरसे भी भयकी आशंका न कर निर्भय हो विचरती हुई अपनी भार्या (संज्ञा) दीख पड़ी। राजन्! फिर तो घोड़ेके रूपमें भगवान् सूर्य उसके मुखके समीप पहुँचे । पर वह पर-पुरुषकी आशंकासे मैथुनके प्रतिकूल चेष्टा करने लगी और सूर्यके वीर्यको उसने अपनी नाकपरसे गिरा दिया ॥ ५१–५४ ॥