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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ८४५


नित्यपुष्पफलान् वृक्षान् कृतवांस्तत्र पर्वते ॥ ७ ॥
कमलनयन श्रीहरिने उस पर्वतपर बड़े-बड़े तनेवाले नाना प्रकारके सुवर्णमय वृक्ष भी बनाये हैं, जो सदा फूल और फलोंसे सम्पन्न रहते हैं ॥ ७ ॥

शतयोजनविस्तारं ततस्त्रिगुणमायतम्।
चकार स महादेवः पुनः सौमनसं गिरिम् ॥ ८ ॥
इसके बाद उन महान् देवता श्रीहरिने सौमनस गिरिका निर्माण किया, जिसकी चौड़ाई सौ योजन और लंबाई तीन सौ योजन है ॥ ८ ॥

नानारत्नसहस्राणां कृत्वा तत्र सुसंचयम्।
वेदिकां बहुवर्णां च संध्याभ्राभामकल्पयत् ॥ ९ ॥
वहाँ नाना प्रकारके सहस्रों रत्नोंका संचय करके अनेक रंगकी वेदिका बनायी, जो संध्याकालके बादलोंकी भाँति प्रकाशित होती थी ॥ ९ ॥

सहस्रशृङ्गं च गिरिं नानामणिशिलातलम्।
कृतवान् वृक्षगहनं षष्टियोजनमुच्छ्रितम् ॥ १० ॥
तत्पश्चात् भगवान्‌ने सहस्रशृङ्ग नामक पर्वतका निर्माण किया, जो नाना प्रकारकी मणिमयी शिलाओंसे अलंकृत था। घने वृक्षोंका वन उसकी शोभा बढ़ाता था। वह पर्वत साठ योजन ऊँचा था ॥ १० ॥

आसनं तत्र परमं सर्वभूतनमस्कृतम्।
कृतवानात्मनः स्थानं विश्वकर्मा प्रजापतिः ॥ ११ ॥
सम्पूर्ण विश्व जिनका कर्म है, उन प्रजापालक श्रीहरिने वहाँ अपने लिये एक स्थान बनाया, जो उनका सम्पूर्ण भूतोंसे सम्मानित उत्तम आसन है ॥ ११ ॥

शिशिरं च महाशैलं तुषारचयसंनिभम्।
चकार दुर्गगहनं कन्दरान्तरमण्डितम् ॥ १२ ॥
तदनन्तर भगवान्‌ने हिमराशि-सदृश महापर्वत हिमालय-का निर्माण किया, जो दुर्गम एवं गहन है। वह बहुत-सी कन्दराओंसे अलंकृत होता है ॥ १२ ॥

शिशिरप्रभवां चैव नदीं द्विजगणायुताम्।
चकार पुलिनोपेतां वसुधारामिति श्रुतिः ॥ १३ ॥
उन्होंने हिमालयसे प्रकट होनेवाली एक दिव्य नदीकी भी सृष्टि की, जिसका नाम वसुधारा (गङ्गा) है। असंख्य द्विज उसका सेवन करते हैं। उसके तट विशाल हैं ॥ १३ ॥

सा नदी निखिलां प्राचीं पुण्यां मुखशतैः श्रिताम्।
शोभयत्यमृतप्रख्यैर्मुक्ताशङ्खविभूषितैः ॥ १४ ॥
वह नदी सारी पुण्यमयी पूर्व दिशाको अपने सैकड़ों स्रोतोंसे व्याप्त करके उसकी शोभा बढ़ाती है। उसके वे स्रोत मोती और शङ्खके समान उज्ज्वल आभासे अलंकृत एवं अमृतके तुल्य मधुर जलसे परिपूर्ण हैं ॥ १४ ॥

नित्यपुष्पफलोपेतैश्छादयद्भिः सुसंवृतैः।
भूषिताभ्यधिकैः कान्तैः सा नदी तीरजैर्द्रुमैः ॥ १५ ॥
वही नदी अपने तटपर उत्पन्न हुए अधिक कमनीय वृक्षोंसे विभूषित है। वे वृक्ष सदा फूल और फलोंसे सम्पन्न, सघन तथा दूरतक छाया करनेवाले हैं ॥ १५ ॥

कृत्वा प्राचीविभागं च दक्षिणायामथो दिशि।
चकार पर्वतं दिव्यं सर्वकाञ्चनराजतम् ॥ १६ ॥
इस प्रकार पूर्व दिशाका विभाग करके उन्होंने दक्षिण दिशामें एक दिव्य पर्वतकी सृष्टि की, जो सारा-का-सारा सुवर्णमय एवं रजतमय प्रतीत होता है ॥ १६ ॥

एकतः सूर्यसंकाशमेकतः शशिसंनिभम्।
स बिभ्रच्छुशुभेऽतीव द्वौ वर्णौ पर्वतोत्तमः ॥ १७ ॥
वह एक ओरसे सूर्यके समान सुनहरी प्रभासे प्रकाशित होता है और दूसरी ओरसे चन्द्रमाके सदृश चाँदी-जैसी कान्तिसे सुशोभित होता है। इस प्रकार दो तरहके रंग धारण करनेवाले उस श्रेष्ठ पर्वतकी बड़ी शोभा होती है ॥ १७ ॥

तेजसा युगपद् व्याप्तं सूर्याचन्द्रमसाविव।
वपुष्मन्तमथो तत्र भानुमन्तं महागिरिम् ॥ १८ ॥
सर्वकामफलैर्वृक्षैर्वृतं रम्यैर्मनोरमैः।
वह एक ही साथ द्विविध तेजसे व्याप्त होकर एकत्र हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान जान पड़ता है। वह महान् पर्वत मूर्तिमान् सूर्य-सा प्रतीत होता है। सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंसे सम्पन्न, रमणीय एवं मनोरम वृक्ष उसे सब ओरसे घेरे हुए हैं ॥ १८½ ॥

चकार कुञ्जरं चैव कुञ्जरप्रतिमाकृतिम् ॥ १९ ॥
सर्वतः काञ्चनगुहं बहुयोजनविस्तृतम्।
इसके बाद भगवान्‌ने हाथीके समान आकारवाले एक पर्वतका निर्माण किया, जिसका विस्तार अनेक योजनका था। उसमें सब ओर सुवर्णमयी गुफाएँ शोभा पाती थीं ॥

ऋषभप्रतिमं चैव ऋषभं नाम पर्वतम् ॥ २० ॥
हेमकाञ्चनवृक्षाढ्यं पुष्पहासं स सृष्टवान्।
तत्पश्चात् उन्होंने वृषभके समान आकृतिवाले ऋषभ-नामक पर्वतकी सृष्टि की, जो सुवर्ण एवं काञ्चनमय वृक्षोंसे सम्पन्न था। अपने फूलोंके कारण वह पर्वत हँसता हुआ सा जान पड़ता था ॥ २०½ ॥

महेन्द्रमथ शैलेन्द्रं शतयोजनमुच्छ्रितम् ॥ २१ ॥
जातरूपमयैः शृङ्गैः सपुष्पितमहाद्रुमम्।
मेदिन्यां कृतवान् देवः प्रतिक्षोभमिवाचलम् ॥ २२ ॥
तदनन्तर भगवान्‌ने गिरिराज महेन्द्रका निर्माण किया, जो सौ योजन ऊँचा और सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित था। उसके विशाल वृक्ष सुन्दर फूलोंसे भरे रहते थे। वह पर्वत

८४६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

पृथ्‍वीपर मूर्तिमान् प्रतिक्षोभ-सा प्रतीत होता था ॥ २१-२२ ॥

नानारत्नसमाकीर्णं सूर्येन्दुसदृशप्रभम् ।
चकार मलयं चाद्रिं चित्रपुष्पितपादपम् ॥ २३ ॥

तदनन्तर श्रीहरिने नाना प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त और सूर्य-चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मलयानामक पर्वतकी सृष्टि की, जहाँ विचित्र फूलोंसे भरे हुए वृक्ष लहलहा रहे थे ॥ २३ ॥

मैनाकं च महाशैलं शिलाजालसमावृतम् ।
दक्षिणस्यां दिशि शुभ्रं चकाराचलमायतम् ॥ २४ ॥

इसके बाद उन्होंने दक्षिण दिशामें एक सुन्दर और विस्तृत पर्वत महाशैल मैनाककी रचना की, जो शिलासमूहोंसे व्याप्त था ॥ २४ ॥

सहस्रशिरसं विन्ध्यं नानाद्रुमलताकुलम् ।
नदीं च विपुलावर्तां पुलिनश्रोणिभूषिताम् ॥ २५ ॥
क्षीरसंकाशसलिलां पयोधारामिति श्रुतिः ।
सुरम्यां तोयकलिलां विहितां दक्षिणां दिशम् ॥ २६ ॥
दिव्यां तीर्थशतोपेतां प्लावयन्तीं शुभाम्भसा ।

तत्पश्चात् नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त सहस्र शिखरवाले विन्ध्यगिरिकी सृष्टि की, साथ ही वहाँसे प्रकट होनेवाली एक नदीका भी निर्माण किया, जो तटरूपी नितम्ब भागसे विभूषित थी। उसमें बड़ी भँवरें उठ रही थीं। उसका जल दूधके समान स्वच्छ था। वह पयोधरा (नर्मदा) के नामसे विख्यात हुई। जलसे भरी हुई वह दिव्य एवं रमणीय नदी सैकड़ों तीर्थोंसे सुशोभित थी और अपने मङ्गल-कारी जलसे दक्षिण दिशाको पवित्र एवं आप्लावित कर रही थी ॥ २५-२६ १/२ ॥

दिशां याम्यां प्रतिष्ठाप्य प्रतीचीं दिशमागमत् ॥ २७ ॥
अकरोत् तत्र शैलेन्द्रं शतयोजनमुच्छ्रितम् ।
शोभितं शिखरैश्चित्रैः सुप्रवृद्धैर्हिरण्मयैः ॥ २८ ॥

इस प्रकार दक्षिण दिशाको प्रतिष्ठित करके भगवान् पश्चिम दिशामें चले आये। वहाँ उन्होंने सौ योजन ऊँचे शैलराज अस्ताचलका निर्माण किया, जो बहुत बढ़े हुए विचित्र एवं सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित था ॥ २७-२८ ॥

काञ्चनीभिः शिलाभिश्च गुहाभिश्च विभूषितम् ।
समाकुलं सूर्यनभैः शालैस्तालैश्च भास्वरैः ॥ २९ ॥

सोनेकी शिलाएँ और गुफाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले साखू और ताड़के वृक्ष वहाँ सब ओर फैले हुए थे ॥ २९ ॥

शुशुभे जातरूपैश्च श्रीमद्भिश्चित्रवेदिकैः ।
षष्टिं गिरिसहस्राणि तत्रासौ संन्यवेशयत् ॥ ३० ॥
मेरुप्रतिमरूपाणि वपुषा प्रभया सह ।

शोभाशाली विचित्र वेदिकाओंसे युक्त सुवर्णमय शिखर उसकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। वहाँ भगवान्ने साठ हजार पर्वत बसाये थे, जो अपने शरीर और कान्तिसे मेरुपर्वतकी समानता करते थे ॥ ३० १/२ ॥

सहस्रजलधारं च पर्वतं मेरुसंनिभम् ॥ ३१ ॥
पुण्यतीर्थगुणोपेतं भगवान् संन्यवेशयत् ।
षष्टियोजनविस्तारं तावदेव समुच्छ्रितम् ॥ ३२ ॥

तदनन्तर भगवान्ने जलकी सहस्रों धाराएँ बहानेवाले एक मेरु-सदृश पर्वतको स्थापित किया, जो पुण्यतीर्थके गुणोंसे सम्पन्न था, जिसका विस्तार साठ योजन था, उसकी ऊँचाई भी उतनी ही थी ॥ ३१-३२ ॥

आत्मरूपोपमं तत्र वाराहं नाम नामतः ।
निवेशयामास गिरिं दिव्यं वैदूर्यपर्वतम् ॥ ३३ ॥

वहीं उन्होंने अपने रूपके समान वाराहनामक दिव्य पर्वतको बसाया, जो वैदूर्यमणिसे सम्पन्न था ॥ ३३ ॥

राजताः काञ्चनाश्चैव यत्र दिव्याः शिलोच्चयाः ।
तत्रैव चक्रसदृशं चक्रवन्तं महाबलम् ॥ ३४ ॥
सहस्रकूटं विपुलं भगवान् संन्यवेशयत् ।

उस पर्वतपर सोने और चाँदीके दिव्य शिलाखण्ड हैं, वहीं भगवान्ने चक्रसदृश महाबली चक्रवान् गिरिकी स्थापना की, जो सहस्रों शिखरोंसे सम्पन्न एवं विशाल था ॥ ३४ १/२ ॥

शङ्खप्रतिमरूपं च रजतं पर्वतोत्तमम् ॥ ३५ ॥
सितद्रुमसमाकीर्णं शङ्खं नाम न्यवेशयत् ।

इसके सिवा उन्होंने वहाँ एक रजतमय श्रेष्ठ पर्वतको स्थापित किया, जिसका स्वरूप शङ्खके समान उज्ज्वल था; इसीलिये उसका नाम शङ्ख रखा गया। वह श्वेत वर्णके वृक्षोंसे व्याप्त था ॥ ३५ १/२ ॥

सुवर्णं रत्नसम्भूतं पारिजातं महाद्रुमम् ॥ ३६ ॥
महतः पर्वतस्याग्रे पुष्पहासं न्यवेशयत् ।

उस महान् पर्वतके अग्रभागमें उन्होंने रत्नसम्भूत सुवर्ण तथा पुष्पमय हाससे सुशोभित पारिजात नामक विशाल वृक्षको स्थापित किया ॥ ३६ १/२ ॥

शुभामतिरंसां चैव घृतधारामिति श्रुतिः ॥ ३७ ॥
वराहः सरितं पुण्यां प्रतीच्यामकरोत् प्रभुः ।

पश्चिम दिशामें भगवान् वाराहने अत्यन्त जलसे भरी हुई एक शुभ एवं पुण्य नदीकी भी सृष्टि की, जो घृत-धाराके नामसे विख्यात है ॥ ३७ १/२ ॥

प्रतीच्यां संविधिं कृत्वा पर्वतान् काञ्चनोज्ज्वलन् । ३८ ।
गुणोत्तरानुत्तरस्यां संन्यवेशयदग्रतः ।

इस प्रकार पश्चिम दिशामें पर्वतोंके विभाग करके उन्होंने उत्तर दिशामें सुवर्णके समान कान्तिमान् पर्वत बसाये, जो गुणोंगे उत्कृष्ट थे ॥ ३८ १/२ ॥

भविष्यपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः [ २४७:


तत सौम्यगिरिं सौम्यमन्तरिक्षप्रमाणतः ॥ ३९ ॥
रुक्मधातुप्रतिच्छन्नमकरोद् भास्करोपमम् ।

तत्पश्चात् उन्होंने सूर्यके समान तेजस्वी तथा सुवर्णमय धातुओंसे ढँके हुए सौम्यगिरिकी सृष्टि की, जो आकाशके बराबर ऊँचा और सौम्य था ॥ ३९॥

स तु देशो विसूर्योऽपि तस्य भासा प्रकाशते ॥ ४० ॥
तस्य लक्ष्यमधिकं भाति तपसा रविणा यथा ।

वह देश सूर्यके प्रकाशित न रहनेपर भी उस पर्वतकी प्रभासे ही प्रकाशित होता रहता है। उस पर्वतकी शोभा तपते हुए सूर्यके द्वारा और अधिक उद्दीप्त हो उठती है ॥

सूक्ष्मलक्षणविज्ञेयस्तपतीव दिवाकरः ॥ ४१ ॥

जैसेमध्याह्न कालिक सूर्यके समीप श्रीहीन हुए चन्द्रमा सूक्ष्म दिखायी देते हैं, उसी प्रकार उस पर्वतके सामने तपते हुए सूर्य भी फीके पड़कर सूक्ष्म लक्षणोंसे लक्षित होते हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥ ४१ ॥

सहस्रशिखरं चैव नानातीर्थसमाकुलम् ।
चकार रत्नसंकीर्णं भूयोऽस्तं नाम पर्वतम् ॥ ४२ ॥

इसके बाद उन्होंने सहस्रों शिखरोंसे सुशोभित तथा नाना प्रकारके तीर्थोंसे व्याप्त रत्नपूर्ण अस्तगिरिका पुनः निर्माण किया ॥ ४२ ॥

मनोहरगुणोपेतं मन्दरं चाचलोत्तमम् ।
उद्दामपुष्पगन्धं च पर्वतं गन्धमादनम् ॥ ४३ ॥

तदनन्तर मनोहर गुणोंसे सम्पन्न श्रेष्ठ मन्दराचलका तथा उद्दाम पुष्पगन्धसे भरे हुए गन्धमादन पर्वतका निर्माण किया ॥ ४३ ॥

चकार तस्य शृङ्गेषु सुवर्णरससम्भवम् ।
जम्बू जाम्बूनदमयीमनन्ताद्भुतदर्शनाम् ॥ ४४ ॥

गन्धमादनके शिखरोंपर सुवर्णरसको प्रकट करनेवाले जम्बूवृक्षका निर्माण किया, जो जाम्बूनदमय (सुवर्णमय), अनन्त और अद्भुत दिखायी देता है ॥ ४४ ॥

गिरिं त्रिशिखरं चैव तथा पुष्करपर्वतम् ।
शुभ्रं पाण्डुरमेघाभं कैलासं च नगोत्तमम् ॥ ४५ ॥

इसके बाद तीन शिखरवाले त्रिकूट गिरि, पुष्कर पर्वत तथा श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल कान्तिवाले गिरिश्रेष्ठ कैलासका निर्माण किया ॥ ४५ ॥

हिमवन्तं च शैलेन्द्रं दिव्यधातुविभूषितम् ।
निवेशयामास हरिवाराहीं तनुमास्थितः ॥ ४६ ॥

तदनन्तर वाराहरूप धारण करनेवाले श्रीहरिने दिव्य धातुओंसे विभूषित गिरिराज हिमवान्‌को स्थापित किया ॥

नदीं सर्वगुणोपेतामुत्तरस्यां दिशि प्रभुः ।
मधुधारां स कृतवान् दिव्याम्ऋषिशताकुलाम् ॥ ४७ ॥

इसके सिवा उन भगवान्‌ने उत्तर दिशामें सर्वगुण-सम्पन्न दिव्य नदी मधुधाराकी सृष्टि की, जो सैकड़ों ऋषियोंसे सेवित है ॥ ४७ ॥

सर्वे चैव क्षितिधराः सपक्षाः कामरूपिणः ।
तदा कृता भगवता विचित्राः परमेष्ठिना ॥ ४८ ॥

उस समय परमेष्ठी भगवान् श्रीहरिने सभी पर्वतोंको पंखयुक्त, इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न तथा विचित्र बनाया था ॥ ४८ ॥

स कृत्वा प्रविभागं तु पृथिव्या लोकभावनः ।
देवासुराणामुत्पत्तौ कृतवान् बुद्धिमक्षयाम् ॥ ४९ ॥

इस तरह लोकभावन भगवान्‌ने पृथ्वीका विभाग करके देवताओं और असुरोंकी उत्पत्तिके लिये अपनी अक्षय बुद्धिका प्रयोग किया ॥ ४९ ॥

सर्वासु दिक्षु क्षतजोपमाक्ष-
श्चकार शैलान् विविधाभिधानान् ।
हिताय लोकस्य स लोकनाथः
पुण्याश्च नद्यः सलिलोपगूढाः ॥ ५० ॥

रक्तके समान लाल नेत्रवाले उन लोकनाथ भगवान् नारायणने समस्त जगत्‌के हितके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें भाँति-भाँतिके नामवाले पर्वतों और जलसे भरी हुई पवित्र नदियोंकी सृष्टि की ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥


षट्त्रिंशोऽध्यायः

जगतकी सृष्टिका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
जगतस्सृष्टमना देवश्चिन्तयामास पूर्वजः ।
तस्य चिन्तयतो वक्त्रात्रिःसृतः पुरुषः किल ॥ १ ॥
ततः स पुरुषो देवं किं करोमीत्युपस्थितः ।
प्रत्युवाच स्मितं कृत्वा देवदेवो जगत्पतिः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर

८४८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

सबके पूर्वज भगवान् नारायण जगत्‌की सृष्टिकी इच्छासे मन-ही-मन कुछ विचार करने लगे। कहते हैं—उसी समय उनके मुखसे एक पुरुष प्रकट हुआ। उस पुरुषने भगवान्‌के निकट खड़े होकर पूछा—'प्रभो! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' तब देवाधिदेव जगदीश्वरने मुसकराकर उसे इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १-२ ॥

विभजात्मानमित्युक्त्वा गतोऽन्तर्धानमीश्वरः।
अन्तर्हितस्य देवस्य सशरीरस्य भारत ॥ ३ ॥
प्रशान्तस्येव दीपस्य गतिस्तस्य न विद्यते।

'तुम अपने स्वरूपका विभाग करो।' ऐसा कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। भारत! जैसे दीपक बुझ जाय, उसी प्रकार शरीरसहित अन्तर्हित हुए उन भगवान्‌की कहीं कोई गति नहीं है ॥ ३½ ॥

ततस्तेनेरितां वाणीं सोऽन्वचिन्तयत प्रभुः ॥ ४ ॥
हिरण्यगर्भो भगवान् य एष छन्दसि श्रुतः।

तदनन्तर भगवान्‌के मुखसे प्रकट हुए प्रभावशाली पुरुष भगवान् हिरण्यगर्भ, जिनका नाम वेदमन्त्रोंमें सुना गया है, भगवान्‌की कही हुई पूर्वोक्त वाणीपर बारंबार विचार करने लगे ॥ ४½ ॥

एष प्रजापतिः पूर्वमभवद् भुवनाधिपः ॥ ५ ॥
तदा प्रभृति तस्याद्यो यज्ञभागो विधीयते।

ये ही सम्पूर्ण भुवनोंके अधिपति प्रजापति सबसे पहले उत्पन्न हुए थे। अतः तभीसे यज्ञका प्रथम भाग उन्हींको दिया जाता है ॥ ५½ ॥

प्रजापतिरुवाच

विभजात्मानमित्युक्तस्तेनास्मि सुमहात्मना ॥ ६ ॥
कथमात्मा विभज्यः स्यात् संशयो ह्यत्र मे महान्।

प्रजापति मन-ही-मन बोले—उन परमात्माने मुझसे कहा है कि तुम अपने स्वरूपका विभाग करो; परंतु मुझे अपने स्वरूपका विभाग कैसे करना होगा, इस विषयमें मुझे महान् संदेह है ॥ ६½ ॥

इति चिन्तयतस्तस्य ओमित्येचोत्थितः स्वरः ॥ ७ ॥
स भूमावन्तरिक्षे च नाके च कृतवांस्ततः।

ऐसा सोचते हुए उन भगवान्‌के मुखसे 'ॐ' इस स्वर-का उच्चारण हुआ। उन्होंने उस शब्दका पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग—तीनों लोकोंमें उच्चारण किया ॥ ७½ ॥

तं चैवाभ्यसतस्तस्य मनःसारमयः पुनः ॥ ८ ॥
हृदयाद् देवदेवस्य वषट्कारः समुत्थितः।

इस प्रकार 'ॐ' का जप करते हुए उन देवाधिदेव प्रजापतिके हृदयसे पुनः उनके मनका सारभूत वषट्कार प्रकट हुआ ॥ ८½ ॥

भूम्यन्तरिक्षानां च भूर्भुवःसुवरात्मिकाः।
महास्मृतिमयाः पुण्या महाव्याहृतयोऽभवन् ॥ ९ ॥

इसके बाद भूमि, अन्तरिक्ष एवं स्वर्गकी सारभूता 'भूः, भुवः, स्वः'—ये तीन पवित्र महाव्याहृतियाँ प्रकट हुईं, जो महास्मृतिमयी हैं ॥ ९ ॥

छन्दसां प्रवरा देवी चतुर्विंशाक्षराभवत्।
तत्पदं संस्मरन् दिव्यां सावित्रीमकरोत् प्रभुः ॥ १० ॥

तदनन्तर वेदोंमें श्रेष्ठ देवी गायत्री प्रकट हुईं, जो चौबीस अक्षरोंसे युक्त होती हैं। भगवान् ब्रह्माने उस पदका स्मरण करके दिव्य सावित्री-मन्त्रको प्रकट किया ॥ १० ॥

ऋक्सामार्थर्वयजुपश्चतुरो भगवान् प्रभुः।
चकार निखिलान् वेदान् ब्रह्मयुक्तेन कर्मणा ॥ ११ ॥

फिर प्रभावशाली भगवान् प्रजापतिने ब्रह्मयुक्त कर्मके द्वारा ऋक्, साम, अथर्व और यजुनामक चारों वेदोंका पूर्णतः प्रादुर्भाव किया ॥ ११ ॥

ततस्तस्यैव मनसः सनः सनक एव च।
सनातनश्च भगवान् वरदश्च सनन्दनः ॥ १२ ॥
सनत्कुमारश्च विभुस्तत्र जज्ञे सनातनः।
मानसाश्चैव पूर्वाद्या इत्येते षण्महर्षयः ॥ १३ ॥

तदनन्तर उन्हींके मनसे सन, सनक, सनातन, वरदायक भगवान् सनन्दन, ऐश्वर्यशाली सनत्कुमार तथा सनातन (द्वितीय) प्रकट हुए। ये छह महर्षि सबसे पहले उत्पन्न हुए ब्रह्माजीके मानसपुत्र हैं ॥ १२-१३ ॥

ब्रह्माणं कपिलं चैव पडेतांश्चैव योगिनः।
यतयो योगतन्त्रेषु यान् स्तुवन्ति द्विजातयः ॥ १४ ॥

योगी और यति ब्राह्मण योगतन्त्रोंमें ब्रह्मा और कपिलके साथ इन छः मन-सनक आदिकी स्तुति करते हैं ॥ १४ ॥

ततो मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।
भृगुमङ्गिरसं चैव मनुं चैव प्रजापतिम् ॥ १५ ॥
पितॄंश्च सर्वभूतानां देवतासुररक्षसाम्।
महर्षीनसृजच्छम्भुरण्वेतांश्च मानसान् ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् कल्याणकारी भगवान् ब्रह्माने मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा तथा प्रजापति मनु—इन आठ मानसपुत्र महर्षियोंकी सृष्टि की, जो सम्पूर्ण भूतों तथा देवताओं, असुरों और राक्षसोंके भी पिता थे ॥ १५-१६ ॥

एते युगसहस्रान्ते याश्चैषामभवन् प्रजाः।
कल्पे निःशेषमुक्ते तु ततो गच्छन्ति निर्वृतिम् ॥ १७ ॥

सहस्र युग व्यतीत होनेपर ये तथा इनकी जो प्रजाएँ होती हैं, वे सारा-का-सारा कल्प पूर्णतः समाप्त हो जानेपर निर्वृत्ति (परमानन्दमय मोक्ष) को प्राप्त हो जाती हैं ॥ १७ ॥

भविष्यपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः [ ८४९

भूयो वर्षसहस्रान्ते उत्पत्तिस्तु विधीयते।
एतेषामेव देवानां प्रजाकर्तृषु वै तथा ॥ १८ ॥
फिर सहस्रों वर्षोंके पश्चात् इन्हींकी देवसंतानोंकी सृष्टिके लिये उत्पत्ति होती है ॥ १८ ॥

किं तु कर्मविशेषेण देवतानां युगे युगे।
नामजन्मविशेषाश्च तथैव युगपर्यये ॥ १९ ॥
किंतु प्रत्येक कल्पमें युगका परिवर्तन होनेपर कर्म विशेषसे इन देवताओंके नाम और जन्ममें कुछ अन्तर आ जाता है ॥ १९ ॥

अङ्गुष्ठाद् दक्षिणाद् दक्ष उत्त्पन्नो भगवानृषिः।
तस्यैव तु पुनर्भार्या वामाङ्गुष्ठादजायत ॥ २० ॥
ब्रह्माजीके दाहिने अङ्गुष्ठसे भगवान् दक्ष ऋषि उत्पन्न हुए और बायेंसे फिर उन्हींकी पत्नीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २०॥

तस्य तत्राभवन् कन्या विश्रुता लोकमातरः।
याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः प्रजाभिर्मनुजाधिप ॥ २१ ॥
नरेश्वर ! दक्षके उस धर्मपत्नीके गर्भसे बहुत-सी विख्यात कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जो सम्पूर्ण लोकोंकी जननी हैं। उनकी प्रजाओंसे तीनों लोक भरे हुए हैं ॥ २१ ॥

अदितिं च दितिं कालां दनायुं सिंहिकां मुनिम्।
प्राधां क्रोधां च सुरभिं विनतां सुरसां तथा ॥ २२ ॥
दनुं कद्रूं च दुहितुः प्रददौ कश्यपाय तु।
दक्षने अपनी पुत्री अदिति, दिति, काला, दनायु, सिंहिका, मुनि, प्राधा, क्रोधा, सुरभि, विनता, सुरसा, दनु तथा कद्रू—इन तेरह कन्याओंका विवाह महर्षि कश्यपजीके साथ कर दिया ॥ २२॥

प्रजां संचिन्त्य मनसा गतिज्ञेनान्तरात्मना ॥ २३ ॥
अरुन्धतीं वसुं यामीं लम्बां भानुं मरुत्वतीम्।
संकल्पां च मुहूर्त्तां च साध्यां विश्वां च भारत ॥ २४ ॥
मनवे ब्रह्मपुत्राय कन्या दक्षो ददौ दश ।
भारत ! कालकी भावी गतिको जाननेवाली अपनी अन्तरात्मा एवं मनके द्वारा प्रजावर्गका चिन्तन करके दक्षने अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्त्ता, साध्या और विश्वा—ये दस कन्याएँ ब्रह्मपुत्र मनुको अर्पित कर दीं ॥ २३-२४॥

ततः सर्वानवद्याङ्ग्यः कन्याः कमलोचनाः ॥ २५ ॥
पूर्णचन्द्रानना दिव्या गन्धवत्यो मनोरमाः।
कीर्तिं लक्ष्मीं धृतिं पुष्टिं बुद्धिं मेधां क्षमां तथा॥ २६ ॥
मतिं लज्जां वसुं चैव दक्षो धर्माय वै ददौ।
तदनन्तर जिनके सारे अङ्ग निर्दोष, नेत्र कमलके समान प्रफुल्ल तथा मुख पूर्णचन्द्रके समान आह्लादजनक थे, वे दिव्य, मनोरम तथा उत्तम गन्धवाली कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, बुद्धि, मेधा, क्षमा, मति, लज्जा और वसु—दस कन्याएँ दक्षने धर्मको दे दीं ॥ २५-२६॥

अत्रेस्तु तनयो जातस्तस्य तोयात्मकः शशी ॥ २७ ॥
पुत्रो ग्रहाणामधिपः सहस्त्रांशुस्तमिस्रहा।
अत्रिके एक पुत्र हुआ, जिसका स्वरूप जलमय था। वही चन्द्रमा हुआ। चन्द्रमा ग्रहोंके स्वामी, सहस्रों किरणोंसे सुशोभित तथा अन्धकारका नाश करनेवाले हैं ॥ २७॥

तस्मै नक्षत्रयोगिन्यः सप्तविंशतिरुत्तमाः ॥ २८ ॥
रोहिणीप्रमुखाः कन्या दक्षः प्राचेतसो ददौ ।
प्राचेतस दक्षने उन्हें अश्विनी, रोहिणी आदि उत्तम सत्ताईस कन्याएँ ब्याह दीं, जो सब-की-सब नक्षत्रवाचक नामोंसे युक्त थीं ॥ २८॥

एतासां पुत्रपौत्रं च प्रोच्यमानं मया शृणु ॥ २९ ॥
कश्यपस्य मनोश्चैव धर्मस्य शशिनस्तथा।
इनके गर्भसे कश्यप, मनु, धर्म और चन्द्रमाद्वारा होनेवाले पुत्र-पौत्रोंका मेरेद्वारा वर्णन किया जाता है, उसे सुनो ॥ २९॥

अर्यमा वरुणो मित्रः पूषा धाता पुरंदरः ॥ ३० ॥
त्वष्टा भगोऽशः सविता पर्जन्यश्चेति विश्रुताः।
अदित्यां जज्ञिरे देवाः कश्यपाल्लोकभावनाः ॥ ३१ ॥
अर्यमा, वरुण, मित्र, पूषा, धाता, इन्द्र, त्वष्टा, भग, अंशु, सविता और पर्जन्य—ये बारह लोकभावन देवता कश्यपके अंश और अदितिके गर्भसे उत्पन्न हुए (ये ही बारह आदित्य कहलाते हैं) ॥ ३०-३१॥

दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम्।
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षश्च वीर्यवान् ।
द्वावप्यमितविक्रान्तौ तपसा कश्यपोपमौ ॥ ३२ ॥
हमारे सुननेमें आया है कि पहले कश्यपद्वारा दितिके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए थे—हिरण्यकशिपु तथा पराक्रमी हिरण्याक्ष । ये दोनों ही अनन्त पराक्रमी थे और तपस्या-द्वारा कश्यपजीकी समानता करते थे ॥ ३२ ॥

हिरण्यकशिपोः पुत्राः पञ्चैव सुमहाबलाः।
प्रह्लादश्चैव संह्रादस्तथानुह्राद एव च ॥ ३३ ॥
ह्रदश्चैव तु विक्रान्तः पञ्चमोऽनुह्रदस्तथा
प्रह्लादः पूर्वजस्तेषामनुह्रादस्तथा परः ॥ ३४ ॥
हिरण्यकशिपुके पाँच ही महाबली पुत्र थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं—प्रह्लाद, संह्राद, अनुह्लाद, पराक्रमी ह्रद और पाँचवाँ अनुह्रद । इनमें प्रह्लाद बड़े थे और उनसे छोटे अनुह्राद थे ॥ ३३-३४ ॥

प्रह्लादस्य त्रयः पुत्रा विक्रान्ताः सुमहाबलाः ।
विरोचनश्च जम्भश्च सुजम्भश्चेति विश्रुताः ॥ ३५ ॥

८५० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


प्रह्लादके विरोचन, जम्भ और सुजम्भ—ये तीन परम पराक्रमी महाबली और सुविख्यात पुत्र हुए ॥ ३५ ॥
बलिर्विरोचनसुतो बाण एको बलेः सुतः ।
वाणस्य चेन्द्रदमनः पुत्रः परपुरंजयः ॥ ३६॥
विरोचनके पुत्र बलि हुए और बलिका एकमात्र पुत्र बाणासुर हुआ। बाणके भी एक ही पुत्र हुआ, जिसका नाम था इन्द्रदमन। वह शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला था ॥ ३६ ॥
दनोः पुत्रास्तु बहवो वंशे ख्याता महासुराः ।
विप्रचित्तिः प्रथमजस्तेषां राजा बभूव ह ॥ ३७॥
दनुके बहुत-से पुत्र हुए, जो अपने वंशके विख्यात महासुर थे। उन सबमें विप्रचित्ति बड़ा था; अतः वही उनका राजा हुआ ॥ ३७ ॥
गणः प्रजज्ञे क्रोधायाः पुत्रपौत्रमनन्तकम् ।
रौद्राः क्रोधवशा नाम क्रूरकर्माण एव च ॥ ३८ ॥
क्रोधासे एक समुदाय प्रकट हुआ, जिसके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है। वह समुदाय या गण क्रोधवश नामसे प्रसिद्ध है। क्रोधवश नामवाले भयङ्कर असुर क्रूर कर्म करनेवाले होते हैं ॥ ३८ ॥
सिंहिका सुषुवे राहुं ग्रहं चन्द्रार्कमर्दनम् ।
ग्रस्तारं चैव चन्द्रस्य सूर्यस्य च विनाशनम् ॥ ३९ ॥
सिंहिकाने राहुनामक ग्रहको जन्म दिया, जो चन्द्रमा और सूर्यका मर्दन करनेवाला है। वही ग्रहणके द्वारा चन्द्रमाको ग्रस लेनेवाला और सूर्यको भी अदृश्य कर देनेवाला है ॥ ३९ ॥
कालायाः कालकल्पस्तु गणः परमदारुणः ।
अभवद् दीप्तसूर्याक्षो नीलमेघसमप्रभः ॥ ४० ॥
कालासे काल-सदृश अत्यन्त भयंकर गण प्रकट हुआ, जिसे कालेय कहते हैं। इस समुदायके नेत्र सूर्यके समान तेजस्वी होते हैं। इनकी अङ्गकान्ति नील मेघके समान काली है ॥ ४० ॥
सहस्रशीर्षा शेषश्च वासुकिस्तक्षकस्तथा ।
बहूनां कद्रुपुत्राणामेते प्राधान्यमागताः ॥ ४१ ॥
कद्रूके बहुत-से पुत्र हुए, जिनमें सहस्र फनवाले शेषनाग, वासुकि और तक्षक—ये प्रधान माने गये हैं ॥ ४१ ॥
धर्मात्मानो वेदविदः सदा प्राणिहिते रताः ।
लोकतन्त्रधराश्चैव वरदाः कामरूपिणः ॥ ४२ ॥
ये धर्मात्मा, वेदवेत्ता तथा सदा ही प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं। लोकतन्त्रको धारण करनेवाले वरदायक तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं ॥ ४२ ॥


तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्च महाबलः ।
अरुणश्चारुणिश्चैव विनतायाः सुताः स्मृताः ॥ ४३ ॥
तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, महाबली गरुड़, अरुण और आरुणि—ये विनताके पुत्र माने गये हैं ॥ ४३ ॥
इमाश्चाप्सरसः पुण्या विविधाः पुण्यलक्षणाः ।
सुषुवेऽष्टौ महाभागा प्राधा देवर्षिपूजिता ॥ ४४ ॥
देवर्षियोंद्वारा सम्मानित महाभागा प्राधाने पवित्र, नाना प्रकारके रूप-रंगवाली तथा पुण्यमय लक्षणोंसे युक्त निम्नाङ्कित आठ अप्सराओंको उत्पन्न किया ॥ ४४ ॥
अनवद्यां मनुं वंशामनूनामरुणप्रियाम् ।
अनुगां सुभगां भासीं स्त्रियः प्राधा व्यजायत ॥ ४५ ॥
अनवद्या, मनु, वंशा, अनूना, अरुणप्रिया, अनुगा, सुभगा और भासी—इन आठ कन्याओंको प्राधाने जन्म दिया ॥ ४५ ॥
अलम्बुषा मिश्रकेशी पुण्डरीका तिलोत्तमा ।
सुरूपा लक्षणा क्षेमा तथा रम्भा मनोरमा ॥ ४६ ॥
असिता च सुबाहुश्च सुवृत्ता सुमुखी तथा ।
सुप्रिया च सुगन्धा च सुरसा च प्रमाथिनी ॥ ४७ ॥
काष्या शारद्वती चैव मौनेयाप्सरसः स्मृताः ।
विश्वा वसुर्भरण्याश्च गन्धर्वाश्चैव विश्रुताः ॥ ४८॥
अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका, तिलोत्तमा, सुरूपा, लक्षणा, क्षेमा, रम्भा, मनोरमा, असिता, सुबाहु, सुवृत्ता, सुमुखी, सुप्रिया, सुगन्धा, सुरसा, प्रमाथिनी, काश्या और शारद्वती—ये अप्सराएँ मुनिकी संतानें बतायी गयी हैं। विश्वा, वसु, भरणी नामवाली कन्याएँ तथा सुविख्यात गन्धर्व भी मुनिकी ही संतति हैं ॥ ४६—४८ ॥
मेनका सहजन्या च पर्णिका पुञ्जिकस्थला ।
घृतस्थला घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा ॥ ४९ ॥
अनुम्लोचेत्यभिख्याता प्रम्लोचेति च ता दश ।
मनोवती चापि तथा वैदिक्योऽप्सरसस्तथा ॥ ५० ॥
प्रजापतेस्तु संकल्पात् सम्भूता भुवनप्रियाः ।
मेनका, सहजन्या, पर्णिका, पुञ्जिकस्थला, घृतस्थला, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, अनुम्लोचा तथा प्रम्लोचा—ये दस अप्सराएँ मनोवती तथा अन्य वेदवर्णित अप्सराएँ प्रजापतिके संकल्पसे उत्पन्न हुई हैं। ये समस्त भुवनोंमें प्रिय मानी गयी हैं ॥ ४९-५० १/२ ॥
अमृतं ब्राह्मणा गावो रुद्राश्चेति चतुष्टयम् ॥ ५१ ॥
सुरभ्यपत्यमित्येतत् पुराणे निश्चयो महान् ।
एतद् वै कश्यपापत्यं मनोर्वंशं निबोध मे ॥ ५२ ॥
अमृत, ब्राह्मण, गौएँ तथा रुद्र—ये चार सुरभिकी संतानें हैं, यह पुराणका महत्त्वपूर्ण निश्चय है। यहाँतक

भविष्यपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ ८५१


कश्यपकी संतानोंका वर्णन किया गया है, अब मुझसे मनुके वंशका वर्णन सुनो ॥ ५१-५२ ॥

संक्षेपेणैव तत् सर्वं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ ।
विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्व्यजायत ॥ ५३ ॥

निष्पाप नरेश ! वह सब मैं संक्षेपसे ही कहूँगा। विश्वेदेव विश्वाकी संतान हैं, साध्यादेवीने साध्य नामक देवोंको जन्म दिया ॥ ५३ ॥

मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवः स्मृताः ।
भानोस्तु भानवस्तात मुहूर्ताश्च मुहूर्तजाः ॥ ५४ ॥

मरुत्वतीके गर्भसे मरुत्वान् उत्पन्न हुए, वसुके पुत्र वसुके नामसे ही प्रसिद्ध हैं। तात ! भानुके पुत्र भानु और मुहूर्ताके पुत्र मुहूर्त हैं ॥ ५४ ॥

लम्बा घोषं विजज्ञेऽथ नागवीथी च जामिजा ।
पृथिव्यां विषमं सर्वं मरुत्वत्यामजायत ॥ ५५ ॥

लम्बाने घोषको जन्म दिया, जामिसे नागवीथी उत्पन्न हुई, पृथ्वीमें जो कुछ विषम है, वह सब मरुत्वतीसे उत्पन्न हुआ ॥ ५५ ॥

संकल्पायास्तु कौरव्य जज्ञे संकल्प एव च ।
धर्मस्य पुत्रो लक्ष्म्यास्तु कामो जज्ञे जगत्प्रभुः ॥ ५६ ॥

कुरुनन्दन ! संकल्पाके गर्भसे संकल्प नामवाला ही पुत्र हुआ। धर्म और उनकी पत्नी लक्ष्मीसे काम नामक पुत्रका जन्म हुआ, जो सम्पूर्ण जगत्‌पर अपनी प्रभुता स्थापित किये हुए है ॥ ५६ ॥

यशो हर्षश्च कामस्य रत्यां पुत्रद्वयं स्मृतम् ।
सोमस्य पुत्रो रोहिण्यां जज्ञे वर्चा महाप्रभः ॥ ५७ ॥

काम और उसकी पत्नी रतिसे दो पुत्र उत्पन्न हुए—यश और हर्ष। सोमके रोहिणीके गर्भसे महान् कान्तिमान् वर्चा नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ ५७ ॥

उद्यन्नेव भगवान् वर्चस्वी येन जायते ।
पुरूरवाश्च भगवानुर्वशी येन युज्यते ॥ ५८ ॥

यह वर्चा वही है, जिससे उदय लेते ही भगवान् सोम वर्चस्वी (तेजःपुञ्जसे परिपूर्ण) हो जाते हैं। उस वर्चा या बुधसे ऐश्वर्यशाली पुरूरवाका जन्म हुआ, जिनके साथ उर्वशीने प्रेमसम्बन्ध स्थापित किया था ॥ ५८ ॥

एवं पुत्रसहस्राणि स्त्रीणां चैव परस्परम् ।
एतावत् तु जगन्मूलं यन्न लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥ ५९ ॥

इस प्रकार स्त्रियों और पुरुषोंके परस्पर संयोगसे सहस्रों पुत्र और कन्याएँ उत्पन्न हुईं। इतना ही जगत्‌का मूल है, जिसपर सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है ॥ ५९ ॥

प्रजापतिस्तु भगवान् गुणतः प्रेक्ष्य देहिनः ।
आधिपत्येषु युक्तेषु नियोजयति योगवित् ॥ ६० ॥

योगवेत्ता भगवान् प्रजापतिने गुणकी दृष्टिसे समस्त देहधारियोंपर दृष्टिपात करके उन सबको यथायोग्य प्रभुत्वपर प्रतिष्ठित किया ॥ ६० ॥

दिशो दश क्षितिमृषयोऽर्णवान् नगान्
द्रुमौषधीरुरगसरित्सुरासुरान् ।
प्रजापतिर्भुवनसृजो नभो भुवः
क्रियां मखानथ कृतवान् गिरींश्च सः ॥ ६१ ॥

उन प्रजापतिने दसों दिशा, पृथ्वी, ऋषि, समुद्र, पर्वत, वृक्ष, ओषधि, सर्प, नदी, देवता, असुर, लोकस्रष्टा मरीचि आदि, आकाश, भूर्लोक, क्रिया, यज्ञ तथा पर्वतमाला—इन सबकी सृष्टि की है ॥ ६१ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे जगत्सर्गे षट्‌त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसंगमें जगत्की सृष्टिविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥


सप्तत्रिंशोऽध्यायः

ब्रह्माजीद्वारा विभिन्न वर्गके अधिपतियोंकी नियुक्ति

वैशम्पायन उवाच

त्रयाणामपि लोकानामादित्यानां च भारत ।
चकार शक्रं राजानमादित्यसमतेजसम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन ! ब्रह्माजीने इन्द्रको तीनों लोकों और आदित्योंका राजा बनाया, जो सूर्यके तुल्य तेजस्वी हैं ॥ १ ॥

स वज्री कवची जिष्णुरादित्यामभिजज्ञिवान् ।
स्मृतेः सहायो द्युतिमान् यथा सोऽध्वर्युभिः स्तुतः ॥ २ ॥

वे विजयशील इन्द्र अदितिके गर्भसे उत्पन्न हुए। वे अपने हाथमें वज्र और अङ्गोंमें कवच धारण करते हैं। वे स्मृतिके सहायक और कान्तिमान् हैं, अध्वर्यु (यजुर्वेदका स्वाध्याय करनेवाले) ब्राह्मण उनकी स्तुति करते हैं ॥ २ ॥

८५२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

जातमात्रोऽथ भगवान् स कुशैर्ब्राह्मणैर्धृतः।
तदाप्रभृति देवेशः कौशिकत्वमुपागतः ॥ ३ ॥
वे भगवान् इन्द्र ज्यों ही उत्पन्न हुए, त्यों ही ब्राह्मणोंने उन्हें कुशोंद्वारा धारण किया था, तभीसे देवेश्वर इन्द्र 'कौशिक' कहलाने लगे ॥ ३ ॥

अभिषिच्याधिराज्ये तु सहस्राक्षं पुरंदरम्।
ब्रह्मा क्रमेण राज्यानि व्यादेष्टुमुपचक्रमे ॥ ४ ॥
सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्रको त्रिलोकीके सम्राट-पदपर अभिषिक्त करके ब्रह्माजीने क्रमशः विभिन्न वर्गके राज्योंका विभाजन आरम्भ किया ॥ ४ ॥

यज्ञानां तपसां चैव ग्रहनक्षत्रयोस्तथा।
द्विजानामौषधीनां तु सोमं राज्येऽभ्यषेचयत् ॥ ५ ॥
उन्होंने यज्ञ, तप, ग्रह, नक्षत्र, द्विज और ओषधियोंके राज्यपर सोमका अभिषेक किया ॥ ५ ॥

दक्षं प्रजापतीनां तु अम्भसां वरुणं पतिम्।
पितॄणां सर्वनिधनं कालं वैश्वानरप्रभम् ॥ ६ ॥
दक्षको प्रजापतियोंका, वरुणको जलका तथा सबका अन्त करनेवाले, अग्निके समान तेजस्वी काल (यमराज) को पितरोंका अधिपति बनाया ॥ ६ ॥

गन्धानां चैव सर्वेषां भूतानां च शरीरिणाम्।
शब्दाकाशबलानां च वायुरोरीशस्तदा कृतः ॥ ७ ॥
उन दिनों सम्पूर्ण गन्ध, देहधारी भूत, शब्द, आकाश और बलके स्वामी वायुदेव बनाये गये ॥ ७ ॥

सर्वभूतपिशाचानां मृत्यूनां च गवां तथा।
उत्पातग्रहरोगणां व्याधीनामीतिनां तथा।
व्रतानां चैव सर्वेषां महादेवः कृतः प्रभुः ॥ ८ ॥
समस्त भूतों, पिशाचों, मृत्युओं, गौओं, उत्पातों, ग्रहों, रोगों, व्याधियों, ईतियों तथा सारे व्रतोंके अधिपति महादेवजी बनाये गये ॥ ८ ॥

यक्षाणां राक्षसानां च गुह्यकानां धनस्य च।
रत्नानां चैव सर्वेषां कृतो वैश्रवणः प्रभुः ॥ ९ ॥
यक्षों, राक्षसों, गुह्यकों और धन तथा सम्पूर्ण रत्नोंका आधिपत्य विश्रवाके पुत्र कुबेरको दिया गया ॥ ९ ॥

सर्वेषां दंष्ट्रिणां शेषो नागानामथ वासुकिः।
सरीसृपाणां सर्वेषां प्रभुर्वै तक्षकः कृतः ॥ १० ॥
बड़ी-बड़ी दाढ़वाले सर्पोंके शेष, नागोंके वासुकि और समस्त सरीसृपोंके तक्षक राजा बनाये गये ॥ १० ॥

सागराणां नदीनां च मेघानां वर्षणस्य च।
आदित्यानामवरजः पर्जन्योऽधिपतिः कृतः ॥ ११ ॥
आदित्योंमें सबसे छोटे जो पर्जन्य हैं, उन्हें सागरों, नदियों और मेघोंका तथा वर्षाका भी अधिपति बनाया गया ॥

गन्धर्वाणामधिपतिस्तथा चित्ररथः कृतः।
सर्वाप्सरोगणानां च कामदेवः प्रभुः कृतः ॥ १२ ॥
ब्रह्माजीने चित्ररथको गन्धर्वोंका तथा कामदेवको सम्पूर्ण अप्सराओंका स्वामी बनाया ॥ १२ ॥

चतुष्पदानां सर्वेषां वाहनानां च सर्वशः।
महेश्वरध्वजः श्रीमान् गोवृषोऽधिपतिः कृतः ॥ १३ ॥
महादेवजीके ध्वजस्वरूप जो वृषभरूपधारी श्रीमान् नन्दी हैं, उन्हें समस्त चौपायों और वाहनोंका अधिपति नियत किया ॥ १३ ॥

दैत्यानां च महातेजा हिरण्याक्षः प्रभुः कृतः।
हिरण्यकशिपुश्चैव यौवराज्येऽभिषेचितः ॥ १४ ॥
महातेजस्वी हिरण्याक्षको दैत्योंका राजा बनाया और हिरण्यकशिपुका युवराजके पदपर अभिषेक किया ॥ १४ ॥

गणानां कालकेयानां महाकालः प्रभुः कृतः।
दनायुषायाः पुत्राणां वृत्रो राजा तदा कृतः ॥ १५ ॥
महाकालको कालकेयनामक गणोंका स्वामी बनाया, उसमें जो दनायुषाके पुत्र थे, उनका राजा उन्होंने वृत्रासुरको बनाया ॥ १५ ॥

सिंहिकातनयो यस्तु राहुर्नाम महासुरः।
उत्पातानामनेकानामशुभानां प्रभुः कृतः ॥ १६ ॥
सिंहिकाका पुत्र जो राहु नामक महान् असुर है, उसे अनेकानेक उत्पातों और अशुभोंका स्वामी बनाया ॥ १६ ॥

ऋतूनामथ सर्वेषां युगानां चैव भारत।
पक्षाणां चैव मासानां तथैव तिथिपर्वणाम् ॥ १७ ॥
कलाकाष्ठामुहूर्तानां गतेरयनयोस्तथा।
कृतः संवत्सरो राजा योगस्य गणितस्य च ॥ १८ ॥
भरतनन्दन ! समस्त ऋतुओं, युगों, पक्षों, मासों, तिथियों, पर्वों, कला, काष्ठा और मुहूर्तों तथा उत्तरायण-दक्षिणायनकी गतिका राजा संवत्सर बनाया गया, वही योग और गणितका भी स्वामी हुआ ॥ १७-१८ ॥

पक्षिणां चैव सर्वेषां चक्षुषां च महाबलः।
सुपर्णो भोगिनां चैव गरुडोऽधिपतिः कृतः ॥ १९ ॥
सुन्दर पंखोंवाले महाबली गरुड़ समस्त पक्षियों, दूरतक दृष्टिपात करनेमें समर्थ प्राणियों तथा विशालकाय सर्पोंके अधिपति बनाये गये ॥ १९ ॥

अरुणो गरुडभ्राता जपापुष्पचयप्रभः।
योगानां चैव सर्वेषां साध्यानामधिपः कृतः ॥ २० ॥
जपाकुसुमकी राशिके समान लाल रंगवाले, गरुड़के भाई अरुण समस्त योगों तथा साध्योंके स्वामी बनाये गये ॥

भविष्यपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ ८५३


पुत्रोऽस्य विरथो नाम कश्यपस्य प्रजापतेः ।
राजा प्राच्यां दिशि तथा वासवेनाधिपः कृतः ॥ २१ ॥

प्रजापति कश्यपका जो विरथ नामक पुत्र था, उसे देवराज इन्द्रने पूर्व दिशाका राजा एवं अधिपति बना दिया ॥ २१ ॥

आदित्यस्य विभोः पुत्रो धर्मराजो महायशाः ।
दक्षिणस्यां दिशि यमो महेन्द्रेणैव सत्कृतः ॥ २२ ॥

भगवान् आदित्यके पुत्र महायशस्वी धर्मराज यमको दक्षिण दिशामें यमलोकका राजा बनाकर रखा गया और महेन्द्रने ही उनका सत्कार किया ॥ २२ ॥

कश्यपस्यौरसः पुत्रः सलिलान्तर्गतः सदा ।
अम्बुराज इति ख्यातः प्रतीच्यां दिशि पार्थिवः ॥ २३ ॥

कश्यपके औरस पुत्र वरुण, जो सदा जलके ही भीतर रहते थे और अम्बुराज नामसे विख्यात थे, पश्चिम दिशाके राजा बनाये गये ॥ २३ ॥

पुलस्त्यपुत्रो द्युतिमान् महेन्द्रप्रतिमः प्रभुः ।
एकाक्षः पिङ्गलो नाम सौम्यायां दिशि पार्थिवः ॥ २४ ॥

पुलस्त्यमनुके तेजस्वी पुत्र पिंगल, जो देवराज इन्द्रके समान प्रभावशाली और एक आँखवाले थे, उत्तर दिशाके स्वामी बनाये गये ॥ २४ ॥

एवं विभज्य राज्यानि स्वयम्भूर्लोकभावनः ।
लोकांश्च त्रिदिवे दिव्यान्ददौ स पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥

इस प्रकार लोकस्रष्टा स्वयम्भू ब्रह्माने विभिन्न राज्योंका विभाजन करके उन राजाओंके लिये स्वर्गमें भी पृथक्-पृथक् दिव्य लोक दिया ॥ २५ ॥

कस्यचित् सूर्यसंकाशान् कस्यचिद् वह्निसंनिभान् ।
कस्यचित् सुष्ठुविद्योतान् कस्यचिच्चन्द्रनिर्मलान् ॥ २६ ॥

किसीको सूर्यके समान और किसीको अग्निके तुल्य तेजस्वी लोक दिये । किसीको विद्युत्के समान भलीभाँति प्रकाशित होनेवाले और किसीको चन्द्रमाके समान निर्मल कान्तिमान् लोक प्रदान किये ॥ २६ ॥

नानावर्णान् कामगमाननेकशतयोजनान् ।
स तान् सुकृतिनां लोकान् पापदुष्कृतिदुर्लभान् ॥ २७ ॥

वे सब लोक नाना प्रकारके वर्णवाले और इच्छानुसार चलनेवाले थे, वहाँ सैकड़ों लोग निवास करते थे, वे सब-के-सब सत्कर्म करनेवाले पुण्यात्माओंके लोक थे । पापियों और दुष्कर्मियोंके लिये वे अत्यन्त दुर्लभ थे ॥ २७ ॥

येषां भासो विभान्त्यग्रे सौम्यास्तारागणा इव ।
एते सुकृतिनां लोका ये जाताः पुण्यकर्मिणः ॥ २८ ॥

ये सामने जो तारागणोंके समान सौम्यप्रकाश दिखायी देते हैं, सब-के-सब पुण्यात्माओंके ही लोक हैं । पुण्यकर्मी पुरुषोंके लिये ही इनकी सृष्टि हुई है ॥ २८ ॥

ये यजन्ति मखैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ।
स्वदारनिरताः शान्ता ऋजवः सत्यवादिनः ॥ २९ ॥
दीनानुग्रहकर्तारो ब्राह्मण्या लोभवर्जिताः ।
संत्यक्तरजसः सन्तो यान्ति तत्र तपोऽमलाः ॥ ३० ॥

जो लोग पर्याप्त उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त पवित्र ( निष्काम ) यज्ञोंद्वारा भगवान्‌की आराधना करते हैं, अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखते हैं तथा जो शान्त, सरल, सत्यवादी, दीन-दुखियोंपर अनुग्रह करनेवाले, ब्राह्मणभक्त, लोभहीन, रजोगुणरहित और निर्मल तपस्यासे युक्त हैं, वे साधुपुरुष ही उन लोकोंमें जाते हैं ॥ २९-३० ॥

एवं नियुज्य तनयान् स्वयं लोकपितामहः ।
पुष्करं ब्रह्मसदनमारुरोह प्रजापतिः ॥ ३१ ॥

साक्षात् लोकपितामह प्रजापति ब्रह्मा इस प्रकार अपने पुत्रोंको विभिन्न राज्योंमें नियुक्त करके पुष्कर नामक ब्रह्मधाममें चले गये ॥ ३१ ॥

सर्वे स्वयम्भुदत्तेषु पालनेषु दिवौकसः ।
रेमिरे स्वेषु लोकेषु महेन्द्रेणाभिपालिताः ॥ ३२ ॥

स्वयम्भू ब्रह्माजीके दिये हुए अपने-अपने पालनीय लोकोंमें स्थित रहकर देवेन्द्रसे सुरक्षित हुए समस्त देवता वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ३२ ॥

स्वयम्भुवा शक्रपुरःसराः सुराः
कृता यथार्हं प्रतिपालनेषु ते ।
यशो दिवं च प्रतिपेदिरे शुभं
मुदं च जग्मुर्मखभागभोजिनः ॥ ३३ ॥

यज्ञभागका भोजन करनेवाले इन्द्र आदि सब देवता स्वयम्भू ब्रह्माद्वारा यथायोग्य पालनकर्ममें नियुक्त किये जानेपर बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने अपने कर्तव्यका पालन करते हुए शुभ यश और स्वर्गलोक प्राप्त किया ॥ ३३ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहेऽधिपत्यस्थापने सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसङ्गमें अधिपतियोंकी स्थापनाविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

८५४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

अष्टात्रिंशोऽध्यायः

देवासुर-संग्राम तथा हिरण्याक्षद्वारा देवराज इन्द्रका स्तम्भन

वैशम्पायन उवाच

कदाचित् तु सपक्षास्ते पर्वता धरणीधराः।
प्रस्थिता धरणीं त्यक्त्वा नूनं तस्यैव मायया ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! एक समयकी बात है, पृथ्वीको धारण करनेवाले वे पंखधारी पर्वत इस पृथ्वीको छोड़कर अन्यत्र चले गये। निश्चय ही भगवान्की मायासे ही उन्होंने ऐसा किया था ॥ १ ॥

तदासुराणां निलयं हिरण्याक्षेण पालितम्।
दिशं प्रतीचीमागत्य ह्रदेऽमज्जन् यथा गजाः ॥ २ ॥

उस समय हिरण्याक्षद्वारा पालित असुरोंके निवासस्थान पश्चिम दिशामें जाकर वहाँके विशाल सरोवरमें वे सभी पर्वत हाथियोंके समान गोते लगाने तथा नहाने लगे ॥ २ ॥

तत्रासुरेभ्यः शंसन्त आधिपत्यं सुराश्रयम्।
तच्छ्रुत्वाथासुराः सर्वे चक्रुरुद्योगमुत्तमम् ॥ ३ ॥

वहाँ उन पर्वतोंने असुरोंसे कहा—देवताओंको तीनों लोकोंका आधिपत्य प्राप्त हुआ है, (वे छोटे होकर राज्यके भागी हो गये और दैत्य बड़े होकर भी उसे न पा सके) यह सुनकर उन सभी असुरोंने युद्धके लिये बड़ा भारी उद्योग किया॥ ३ ॥

क्रूरां च बुद्धिमतुलां पृथिवीहरणे रताः।
आयुधानि च सर्वाणि जगृहुर्भीमविक्रमाः ॥ ४ ॥

वे अपनी अनुपम क्रूर बुद्धिका सहारा ले पृथ्वीको हड़प लेनेके लिये प्रयत्नमें लग गये। उन भयंकर पराक्रमी असुरोंने सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका संग्रह किया ॥ ४ ॥

चक्राशनींस्तथा खड्गान् भुशुण्डीश्च धनूंषि च।
प्रासान् पाशांश्च शक्तींश्च मुसलानि गदास्तथा ॥ ५ ॥

चक्र, अशनि, खड्ग, भुशुण्डि, धनुष, प्रास, पाश, शक्ति, मूसल और गदा आदि आयुध ले लिये ॥ ५ ॥

केचित् कवचिनः सञ्जा मत्तनागांस्तथा परे।
केचिदश्वरथान् युक्ता अपरेऽश्वान् महासुराः ॥ ६ ॥

कोई कवच धारण करके युद्धके लिये तैयार हो गये। कोई मतवाले हाथियोंपर जा बैठे। कोई युद्धके लिये उद्यत हो घोड़े जुते रथोंपर आरूढ़ हुए। दूसरे महान् असुर घोड़ोंपर सवार हो गये ॥ ६ ॥

केचिदुष्ट्रांस्तथा खड्गान् महिषान् गर्दभानपि।
स्वबाहुबलमास्थाय केचिच्चापि पदातयः ॥ ७ ॥

कितने ही असुर ऊँटों, गैंडों, भैंसों और गदहोंपर बैठे थे। कितने ही अपने बाहुबलका भरोसा करके पैदल ही युद्धके लिये उद्यत थे ॥ ७ ॥

परिचार्य हिरण्याक्षं तलबद्धाः कलापिनः।
इतश्चेतश्च निष्पेतुर्हृष्टाः सर्वे युयुत्सवः ॥ ८ ॥

वे सब-के-सब हाथोंमें दस्ताने बाँधे, कवच पहने हर्षमें भरकर युद्धके लिये उत्सुक हो इधर-उधरसे निकले और हिरण्याक्षको सब ओरसे घेरकर चलने लगे ॥ ८ ॥

ततो देवगणाः पश्चात् पुरंदरपुरोगमाः।
दैत्यानां विदितोद्योगाश्चक्रुरुद्योगमुत्तमम् ॥ ९ ॥

तत्पश्चात् दैत्योंके उस युद्धविषयक उद्योगका पता पाकर इन्द्र आदि देवता भी युद्धके लिये बड़ी भारी तैयारी करने लगे ॥ ९ ॥

महता चतुरङ्गेन बलेन सुसमाहिताः।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणास्तूणवन्तः समार्गणाः ॥ १० ॥
उग्रायुधधरा देवाः स्वेष्वनीकेष्ववस्थिताः।
ऐरावतगतं शक्रमन्वगच्छन्त पृष्ठतः ॥ ११ ॥

वे देवता पूरी सावधानी रखकर विशाल चतुरङ्गिणी सेनाके साथ गोधाचर्मके बने हुए दस्ताने पहने, बाणोंसे भरे तरकस बाँधे, भयंकर आयुध धारण किये अपने-अपने दलमें खड़े हो गये और ऐरावतपर आरूढ़ हुए देवराज इन्द्रके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ १०-११ ॥

ततस्तूर्यनिनादेन भेरीणां च महास्वनैः।
अभ्यद्रवद्धिरण्याक्षो देवराजं पुरंदरम् ॥ १२ ॥

तदनन्तर वाद्योंके महान् शब्द और भेरियोंके गम्भीर घोषके साथ हिरण्याक्षने देवराज इन्द्रपर धावा किया ॥ १२ ॥

तीक्ष्णैः परशुनिस्त्रिंशैर्गदातोमरशक्तिभिः।
मुसलैः पट्टिशैश्चैव छादयामास वासवम् ॥ १३ ॥

उसने तीखे फरसों, तलवारों, गदाओं, तोमरों, शक्तियों, मुसलों और पट्टिशोंसे देवराज इन्द्रको आच्छादित कर दिया ॥ १३ ॥

ततोऽस्त्रबलवेगेन सार्चिष्मत्यः सुदारुणाः।
घोररूपा महावेगा निपेतुर्बाणवृष्टयः ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् उसके अस्त्रके बल और वेगसे आगकी लपटोंसे युक्त, अत्यन्त दारुण, घोर और महान् वेगवाली बाण-वर्षाएँ इन्द्रके ऊपर पड़ने लगीं ॥ १४ ॥

शिप्राश्च दैत्या बलिनः सितधारैः परश्वधैः।
परिघैरायसैः खड्गैः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ॥ १५ ॥

भविष्यपर्व ] अष्टत्रिंशोऽध्यायः ८५५


गण्डशैलैश्च विविधै रश्मिभिश्चाद्रिसंनिभैः। घातनीभिश्च गुर्वीभिः शतघ्नीभिस्तथैव च ॥ १६ ॥ युगैर्यन्त्रैश्च निर्मुक्तैरर्गलैश्च विदारणैः। सर्वान्देवगणान्दैत्याः संनिजघ्नुः सवासवान् ॥ १७ ॥ शेष बलवान् दैत्य सफेद धारवाले परसों, लोहेके परिघों, तलवारों, क्षेपणीयों, मुद्गरों, तेजोयुक्त एवं पर्वत-सदृश चट्टानों, महान् घात करनेवाली भारी शतघ्नियों (तोपों), जूएके समान आकारवाले अस्त्रों, निर्मुक्त यन्त्रों तथा विदीर्ण करनेवाले अर्गलोंसे इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंको मारने और घायल करने लगे ॥ १६--१७ ॥

धूम्रकेशं हरिमश्रुं नानाप्रहरणायुधम् । रक्तसंध्याभ्रसंकाशं किरीटोत्तमधारिणम् ॥ १८ ॥ नीलपीताम्बरधरं शितदंष्ट्रोर्ध्वधारिणम् । आजानुबाहुं हर्यक्षं वैदूर्याभरणोज्ज्वलम् ॥ १९ ॥ समुद्यतायुधं दृष्ट्वा सर्वे देवगणास्तदा। दैत्यराज हिरण्याक्षके केश धूम्रवर्णके थे । मूँछ-दाढ़ीका रंग हरा था । वह नाना प्रकारके प्रहरणशील आयुधोंसे युक्त था । उसकी अङ्गकान्ति संध्या-कालके बादलोंके समान लाल थी । उसने अपने मस्तकपर उत्तम किरीट धारण कर रखा था । उसके शरीरपर नीले और पीले रंगके वस्त्र थे, मुखमें ऊपरको उठी हुई तीखी दाढ़ें थीं और भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं । वह वैदूर्यमणिके बने हुए आभूषणोंसे उद्भासित हो रहा था । ऐसे हिरण्याक्षको हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्धके लिये उद्यत हुआ देख सब देवता तत्काल आतङ्कित हो गये ॥ १८-१९ ॥

ते हिरण्याक्षमसुरं दैत्यानामग्रतः स्थितम् ॥ २० ॥ युगान्तसमये भीमं स्थितं मृत्युमिवाग्रतः । प्रव्यथ्युः सुराः सर्वे तदा शक्रपुरोगमाः ॥ २१ ॥ दैत्योंके आगे खड़ा हुआ असुर हिरण्याक्ष प्रलयकालमें सामने स्थित हुए भयंकर मृत्युदेवताके समान प्रतीत होता था । वे इन्द्रादि सब देवता उस समय उसको देखकर अत्यन्त व्यथित हो उठे ॥ २०-२१ ॥

दृष्ट्वाऽऽयान्तं हिरण्याक्षं महाद्रिमिव जङ्गमम् । देवाः संविग्नमनसः प्रगृहीतशरासनाः । सहस्राक्षं पुरस्कृत्य तस्थुः संग्राममूर्धनि ॥ २२ ॥ चलते-फिरते महान् पर्वतके समान दैत्यराज हिरण्याक्ष-को आते देख सब देवताओंका चित्त उद्विग्न हो गया, वे हाथमें धनुष ले सहस्रलोचन इन्द्रको आगे करके युद्धके मुहानेपर खड़े हो गये ॥ २२ ॥


सा च दैत्यचमू रेजे हिरण्यकवचोज्ज्वला । प्रवृद्धनक्षत्रगणा शारदी द्यौरिवामला ॥ २३ ॥ सोनेके कवचसे प्रकाशित होती हुई दैत्योंकी वह सेना नक्षत्रोंसे भरे हुए शरद्-ऋतुके निर्मल आकाशकी भाँति शोभा पाती थी ॥ २३ ॥

तेऽन्योन्यमपि सम्पेतुः पातयन्तः परस्परम् । बभञ्जुर्बाहुभिर्बाहुद्वन्द्वमन्ये युयुत्सवः ॥ २४ ॥ वे देवता और दैत्य एक दूसरेको गिराते हुए टूट पड़े । युद्धकी इच्छावाले अन्य वीरोंने अपनी भुजाओंद्वारा शत्रु-पक्षके सैनिकोंकी दोनों बाँहें तोड़ डालीं ॥ २४ ॥

गदानिपातैर्भग्नाङ्गा बाणैश्च व्यथितोरसः । विनिपेतूः पृथक् केचित् तथान्येऽपि विजघ्निरे ॥ २५ ॥ कितनोंके अङ्ग गदाओंकी चोटसे भंग हो गये, बाणोंके प्रहारसे उनके वक्षःस्थलमें अत्यन्त पीड़ा होने लगी, कितने ही योद्धा युद्धस्थलसे पृथक् जा गिरते थे तथा दूसरे सैनिक भी मारे जाते थे ॥ २५ ॥

बभञ्जिरे रथान् केचित् केचित् सम्मर्दिता रथैः । सम्बाधमन्ये सम्प्राप्ता न शेकुश्चलितुं रथात् ॥ २६ ॥ किन्हींने रथ तोड़ डाले, कितने ही शत्रु-पक्षके रथोंसे स्वयं ही कुचल गये, दूसरे योद्धा चारों ओरसे इस तरह घिर गये कि रथसे हिल ही न सके ॥ २६ ॥

दानवेन्द्रबलं तत्र देवानां च महत् बलम् । अन्योन्यबाणवर्षेण युद्धदुर्दिनमावभौ ॥ २७ ॥ वहाँ एक ओर दानवराज हिरण्याक्षकी सेना थी तो दूसरी ओर देवताओंकी विशाल वाहिनी खड़ी थी । दोनों ओरसे परस्पर बाणोंकी वर्षा हो रही थी । उस समय युद्धके बादल छाये हुए जान पड़ते थे ॥ २७ ॥

हिरण्याक्षस्तु बलवान् क्रुद्धः स दितिनन्दनः । व्यवधंत महातेजाः समुद्र इव पर्वणि ॥ २८ ॥ दितिनन्दन हिरण्याक्ष महातेजस्वी और बलवान् था । वह कुपित होकर उसी तरह आगे बढ़ रहा था जैसे पूर्णिमाके दिन समुद्र बढ़ता है ॥ २८ ॥

तस्य क्रुद्धस्य सहसा मुखान्निष्पेरुरर्चिषः । साग्निधूमश्च पवनो ययौ तस्य समीपतः ॥ २९ ॥ क्रोधसे भरे हुए हिरण्याक्षके मुखसे सहसा आगकी लपटें निकलने लगीं । उसके निकटसे आग और धूम लिये हुए प्रचण्ड वायु चलने लगी ॥ २९ ॥

शस्त्रजालैर्बहुविधैर्धनुर्भिः परिघैरपि । सर्वमाकाशमावव्रे पर्वतैरुत्थितैरिव ॥ ३० ॥


१. गोफन नामक यन्त्रविशेष, जिसके द्वारा गोली या कंकड़ आदिको दूरतक फेंका जाता है ।

८५६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उसने नाना प्रकारके शस्त्र-समूहों, धनुषों और परिघोंसे सारे आकाशको ढक लिया, मानो उठे हुए पर्वतोंसे आकाश अवरुद्ध हो गया हो ॥ ३० ॥

बहुभिः शस्त्रनिर्भिन्नैश्छिन्नभिन्नशिरोरसः ।
न शेकुश्चलितुं देवा हिरण्याक्षार्दिता युधि ॥ ३१ ॥
युद्धमें बहुत-से शस्त्रों और तलवारोंसे देवताओंके सिर और वक्षःस्थल छिन्न-भिन्न हो गये थे। वे हिरण्याक्षसे इतने पीड़ित किये गये थे कि उनमें चलने-फिरनेकी भी शक्ति नहीं रह गयी ॥ ३१ ॥

सर्वे वित्रासिता देवा हिरण्याक्षेण संयुगे ।
न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि यत्नं कर्तुं विचेतसः ॥ ३२ ॥
उस युद्धस्थलमें हिरण्याक्षने समस्त देवताओंको इतना भयभीत कर दिया कि वे अचेत-से हो गये और यत्नशील होनेपर भी कोई यत्न न कर सके ॥ ३२ ॥

तेन शक्रः सहस्राक्षः स्तम्भितोऽस्त्रेण धीमता ।
ऐरावतगतः संख्ये नाशकदचलितुं भयात् ॥ ३३ ॥
उस बुद्धिमान् दैत्यने अपने अस्त्रद्वारा युद्धस्थलमें ऐरावतकी पीठपर बैठे हुए सहस्रलोचन इन्द्रको स्तम्भित कर दिया, जिससे वे भयके कारण भागनेमें भी असमर्थ हो गये ॥ ३३ ॥

सर्वांश्च देवानखिलान् स पराजित्य दानवः ।
स्तम्भयित्वा च देवेशमात्मस्थं मन्यते जगत् ॥ ३४ ॥
समस्त देवताओंको पूर्णरूपसे पराजित करके देवेश्वर इन्द्रको भी हिलने-डुलनेमें असमर्थ बना देनेके कारण वह दानव सारे जगत्‌को अपने अधीन मानने लगा ॥ ३४ ॥

सतोयमेघप्रतिमोऽग्निःस्वनं
$\hspace{1.5em}$प्रभिन्नमातङ्गविलासविग्रहम् ।
धनुर्विधुन्वन्तमुदारवर्चसं
$\hspace{1.5em}$तदासुरेन्द्रं ददृशुः सुराः स्थिताः ॥ ३५ ॥
वह सजल जलधरके समान भयानक गर्जना करता था, उसका शरीर मदकी धारा बहानेवाले मतवाले हाथीके समान विलासयुक्त जान पड़ता था, उस समय वहाँ खड़े हुए देवताओंने उदार तेजस्वी असुरराज हिरण्याक्षको बारंबार धनुषको हिलाते और उसकी टंकार फैलाते देखा ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे शक्रस्तम्भने अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारके प्रसङ्गमें इन्द्रका स्तम्भनविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥


एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

भगवान् वराहद्वारा हिरण्याक्षका वध

वैशम्पायन उवाच

निष्प्रयत्ने सुरपतौ धर्षितेषु सुरेषु च ।
हिरण्याक्षवधे बुद्धिं चक्रे चक्रगदाधरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब देवराज इन्द्र निश्चेष्ट और समस्त देवता पराजित हो गये, तब चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने स्वयं ही हिरण्याक्षके वधका विचार किया ॥ १ ॥

वाराहः पर्वतो नाम यः पूर्वैः समुदाहृतः ।
स एव भूत्वा भगवानाजगामासुरान्तकृत् ॥ २ ॥
पहले जिन पर्वताकार यज्ञवाराहका वर्णन किया गया है, वे ही असुरोंका विनाश करनेवाले भगवान् श्रीहरि इस वाराहरूपमें प्रकट हो वहाँ आये ॥ २ ॥

ततश्चन्द्रप्रतीकाशमगृह्णाच्छङ्खमुत्तमम् ।
सहस्रारं च तच्चक्रं चक्रपर्वतसंनिभम् ॥ ३ ॥
तदनन्तर उन्होंने चन्द्रमाके समान उज्ज्वल एवं उत्तम शङ्ख हाथमें ले लिया। फिर दूसरे हाथमें चक्र-पर्वतके सदृश विशाल तथा सहस्र अरोंसे युक्त सुप्रसिद्ध सुदर्शन चक्र धारण किया ॥ ३ ॥

महादेवो महाबुद्धिर्महायोगी महेश्वरः ।
पठ्यते योऽमरैः सर्वैर्गुह्यैर्नामभिरव्ययः ॥ ४ ॥
उन्हीं अविनाशी श्रीहरिका महादेव, महाबुद्धि, महायोगी और महेश्वर आदि गुह्य नामोंसे समस्त देवता कीर्तन करते हैं ॥ ४ ॥

सदसच्चात्मनि श्रेष्ठः सद्भिर्यः सेव्यते सदा ।
इज्यते यः पुराणश्च त्रिलोके लोकभावनः ॥ ५ ॥
साधु पुरुष सदा अपने हृदयमें जिन सदसत्स्वरूप श्रेष्ठ परमात्माका सेवन करते हैं, तीनों लोकोंमें जिन लोकभावन पुराण-पुरुषका पूजन किया जाता है ॥ ५ ॥

यो वैकुण्ठः सुरेन्द्राणामनन्तो भोगिनामपि ।
विष्णुर्यो योगविदुषां यो यज्ञो यज्ञकर्मणाम् ॥ ६ ॥
जो देवेश्वरोंके वैकुण्ठ, सर्पोंके अनन्त, योगवेत्ताओंके विष्णु तथा यज्ञकर्मियोंके यज्ञ हैं ॥ ६ ॥

हिरण्याक्ष-वध (पृष्ठ-संख्या ८५६)

भविष्यपर्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः [ ८५७


मखे यस्य प्रसादेन भुवनस्था दिवौकसः।
आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नन्ति त्रिधा हुतम् ॥ ७ ॥

जिनके कृपा-प्रसादसे अपने-अपने भुवनोंमें बैठे हुए देवता यज्ञमें महर्षियोंद्वारा दिये गये तथा हुत, हूयमान और प्रहुत नामक तीन प्रकारोंसे होमे गये घृतको भोजन करते हैं ॥ ७ ॥

यो गतिर्देवदैत्यानां यः सुराणां परा गतिः।
यः पवित्रं पवित्राणां स्वयम्भूरव्ययो विभुः ॥ ८ ॥

जो देवताओं तथा दैत्योंके भी आश्रय हैं, देवगणोंके लिये परम गति हैं, जो पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले, स्वयम्भू, अविनाशी तथा व्यापक हैं ॥ ८ ॥

यस्य चक्रप्रविष्टानि दानवानां युगे युगे।
कुलान्याकुलतां यान्ति यानि दृप्तानि वीर्यतः ॥ ९ ॥

प्रत्येक युगमें अपने बलपर घमंड करनेवाले दानवोंके कितने ही कुल जिनकी चक्राग्निमें प्रविष्ट हो वहीं विलीन हो गये हैं (वे ही भगवान् वहाँ पधारे ये) ॥ ९ ॥

ततो दैत्यद्रवकरं पौराणं शङ्खमुत्तमम्।
धमन् वक्त्रेण बलवानाक्षिपद् दैत्यजीवितम् ॥ १० ॥

तदनन्तर बलवान् भगवान् वाराहने दैत्योंको भयभीत करनेवाले अपने उत्तम एवं पुरातन शङ्खको मुखसे बजाते हुए बहुत-से दैत्योंके प्राण हर लिये ॥ १० ॥

श्रुत्वा शङ्खस्वनं घोरमसुराणां भयावहम्।
क्षुभिता दानवाः सर्वे दिशो दश व्यलोकयन् ॥ ११ ॥

असुरोंको भय देनेवाले उस घोर शङ्खध्वनिको सुनकर समस्त दानव क्षुब्ध हो गये और दसों दिशाओंकी ओर देखने लगे ॥ ११ ॥

ततः संरक्तनयनो हिरण्याक्षो महासुरः।
कोऽयमित्यब्रवीद् रोषान्नारायणमुदैक्षत ॥ १२ ॥

तब क्रोधसे लाल आँखें किये महान् असुर हिरण्याक्षने पूछा 'यह कौन है?' साथ ही उसने रोषपूर्वक नारायणकी ओर देखा ॥ १२ ॥

वाराहरूपिणं देवं संस्थितं पुरुषोत्तमम्।
शङ्खचक्रोद्यतकरं देवानामार्तिनाशनम् ॥ १३ ॥

वे वाराहरूपधारी भगवान् पुरुषोत्तम देवताओंकी पीड़ाका नाश करनेवाले थे, अतः हाथोंमें शङ्ख और चक्र लिये वहाँ खड़े हुए ॥१३ ॥

रराज शङ्खचक्राभ्यां ताभ्यामसुरसूदनः।
सूर्याचन्द्रमसोर्मध्ये यथा नीलपयोधरः ॥ १४ ॥

असुरसूदन श्रीहरि उन शङ्ख-चक्रोंसे ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो नील मेघ सूर्य और चन्द्रमाके बीचमें सुशोभित हो रहा हो ॥ १४ ॥

ततोऽसुरगणाः सर्वे हिरण्याक्षपुरोगमाः।
उद्यतायुधनिस्त्रिंशा दृप्ता देवमुपाद्रवन् ॥ १५ ॥

उस समय हिरण्याक्ष आदि सभी असुरोंने जो बलके घमंडमें भरे हुए थे, नाना प्रकारके आयुध और खड्ग लिये वहाँ भगवान् वाराहपर धावा किया ॥ १५ ॥

पीड्यमानोऽतिबलिभिर्दैत्यैः सर्वायुधोद्यतैः।
न चचाल हरियुद्धेऽकम्प्यमान इवाचलः ॥ १६ ॥

सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे उद्यत हुए अत्यन्त बलशाली दैत्योंद्वारा पीड़ा दी जानेपर भी भगवान् श्रीहरि उस युद्धमें विचलित नहीं हुए, वे पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े रहे ॥ १६ ॥

ततः प्रज्वलितां शक्तिं वाराहोरसि दानवः।
हिरण्याक्षो महातेजाः पातयामास वीर्यवान् ॥ १७ ॥

इतनेहीमें महातेजस्वी और पराक्रमी दानव हिरण्याक्षने भगवान् वाराहकी छातीपर एक अत्यन्त प्रज्वलित शक्तिका प्रहार किया ॥ १७ ॥

तस्याः शक्त्याः प्रभावेण ब्रह्मा विस्मयमागतः।
समीपमागतां दृष्ट्वा महाशक्तिं महाबलः ॥ १८ ॥
हुंकारेणैव निर्भर्त्स्य पातयामास भूतले।
तस्यां प्रतिहतायां तु ब्रह्मा साध्विति चाब्रवीत् ॥ १९ ॥

उस शक्तिके प्रभावसे ब्रह्माजीको बड़ा विस्मय हुआ। उस महाशक्तिको पास आयी देख महाबली भगवान् वाराहने हुंकारसे ही उसे तिरस्कृत करके भूमिपर गिरा दिया। उस शक्तिके प्रतिहत हो जानेपर ब्रह्माजीने भगवान्‌को साधुवाद दिया ॥ १८-१९ ॥

यः प्रभुः सर्वभूतानां वाराहस्तेन ताडितः।
ततो भगवता चक्रमाविध्यादित्यसंनिभम् ॥ २० ॥
पातितं दानवेन्द्रस्य शिरस्युत्तमकर्मणा।

जो समस्त प्राणियोंके प्रभु हैं, उन भगवान् वाराहको जब उस दैत्यने ताड़ित किया, तब उत्तम कर्म करनेवाले भगवान्‌ने भी अपना सूर्यके समान तेजस्वी चक्र घुमाकर दानवराज हिरण्याक्षके सिरपर दे मारा ॥ २०½ ॥

ततः स्थितस्यैव शिरस्तस्य भूमौ पपात ह।
हिरण्मयं वज्रहतं मेरुशृङ्गमिवोत्तमम् ॥ २१ ॥

तब वहाँ खड़े-खड़े ही उस दैत्यका सिर पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो मेरु पर्वतका सुन्दर एवं सुनहरा शिखर वज्रसे आहत हो धराशायी हो गया हो ॥ २१ ॥

हिरण्याक्षे हते दैत्ये शेषा ये तत्र दानवाः।
सर्वे तस्य भयत्रस्ता जग्मुराशु दिशो दश ॥ २२ ॥

दैत्य हिरण्याक्षके मारे जानेपर जो दानव वहाँ शेष रह

८५८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

गये, ये वे सभी भगवान्‌के भयसे संत्रस्त हो तात्कालिक दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ २२ ॥

जिनके चक्रकी आज्ञा सम्पूर्ण लोकोंमें कहीं भी प्रतिहत नहीं होती थी, जिनका भयंकर चक्र बड़े-बड़े युद्धके अवसरपर अपना सानी नहीं रखता था, वे चक्रपाणि भगवान् वाराह उस युद्धस्थलमें हाथमें दण्ड लिये प्रलयकालके यमराज-की भाँति शोभा पाते थे ॥ २३ ॥

स सर्वलोकाप्रतिचक्रचक्रो महाहवेष्वप्रतिमोऽग्रचक्रः ।
बभौ वराहो युधि चक्रपाणिः कालो युगान्तेष्विव दण्डपाणिः ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥


चत्वारिंशोऽध्यायः

देवताओंको अपने प्रभुत्वकी प्राप्ति, देवराज इन्द्रकी सम्पूर्ण लोकोंके आधिपत्यपर प्रतिष्ठा, सत्-असत् पुरुषोंकी यथोचित गतिके लिये आदेश देकर भगवान्‌का अन्तर्धान होना तथा देवेन्द्रद्वारा पर्वतोंके पंखोंका छेदन

वैशम्पायन उवाच
विद्राव्य तु रणे सर्वानसुरान् पुरुषोत्तमः ।
सुमोच तत्र बद्धांस्तान् पुरंदरमुखान् सुरान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! रणभूमिमें उन समस्त असुरोंको भगाकर भगवान् पुरुषोत्तमने वहाँ बँधे हुए इन्द्र आदि देवताओंको उस बन्धनसे मुक्त किया ॥ १ ॥

ततः प्रकृतिमापन्नाः सर्वे देवगणास्तथा ।
पुरंदरं पुरस्कृत्य नारायणमुपस्थिताः ॥ २ ॥

तदनन्तर स्वस्थ हुए समस्त देवता देवराज इन्द्रको आगे करके भगवान् नारायणके निकट गये ॥ २ ॥

देवा ऊचुः
त्वत्प्रसादेन भगवंस्त्वच्च बाहुबलेन च ।
जीवामोऽद्य महाबाहो निष्क्रान्ताश्चान्तकाननात्॥ ३॥

देवता बोले— भगवन् ! महाबाहो ! आपकी कृपा और बाहुबलसे आज हम मौतके मुखसे निकले हैं और जीवित बचे हैं ॥ ३ ॥

त्वच्छासनाद्धि भगवन् किं कुर्वन्त्वदितेः सुताः।
इच्छामः पादशुश्रूषां तव कर्तुं सनातन ॥ ४ ॥

भगवन् ! आपकी आज्ञासे ये अदितिके पुत्र क्या करें ? सनातनदेव ! हमलोग आपके चरणोंकी सेवा करना चाहते हैं ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां पुण्डरीकनिभेक्षणः ।
उवाच वचनं देवान् मुदायुक्तो हतद्विषः ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् कमलनयन श्रीहरिने जिनका शत्रु मारा गया था, उन देवताओंसे प्रसन्नतापूर्वक कहा ॥ ५ ॥

श्रीभगवानुवाच
यो यस्य भावतो लोको मयैव विहितः पुरा ।
पाल्यतां स तु यत्नेन नियोगश्च क्वचित् क्वचित्॥ ६ ॥

श्रीभगवान् बोले— पूर्वकालमें मैंने ही भावके अनुसार जिसके लिये जो लोक नियत कर दिया है, वह उसीका पालन करे और कभी-कभी वेदकी आज्ञाके पालनपर भी ध्यान देना आवश्यक है ॥ ६ ॥

ऐश्वर्ये प्रतिपन्नाः स्वं ऋतुभागपुरस्कृतम् ।
मयैव पूर्वं निर्दिष्टो नियोगः प्रतिपाल्यताम् ॥ ७ ॥

अब तुम्हें यज्ञभागके साथ ही अपना ऐश्वर्य भी प्राप्त हो गया है; अतः अब तुम्हे उस वेदाज्ञाका भी पालन करना चाहिये, जिसका पूर्वकालमें मैंने ही निर्देश किया है ॥ ७ ॥

शक्रं चोवाच भगवान् वचनं दुन्दुभिस्वनः ।
इदं यथावत् कर्तव्यं सत्सु चासत्सु च त्वया॥ ८ ॥

देवताओंसे ऐसा कहकर भगवान्‌ने दुन्दुभिके समान गम्भीर वाणीमें इन्द्रसे यह बात कही—'देवेन्द्र ! तुम्हे सज्जनों और असज्जनोंके प्रति यह आगे बताया जानेवाला बर्ताव अवश्य करना चाहिये ॥ ८ ॥

गच्छन्तु तपसा स्वर्गं मुनयः शंसितव्रताः ।
तव लोकं सुरश्रेष्ठ सर्वकामदुधं सदा ॥ ९ ॥

'सुरश्रेष्ठ ! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि तपस्या-से तुम्हारे उस स्वर्गलोकमें जायें, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है ॥ ९ ॥

भविष्यपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः [ ८५९

यायजूकाश्च ये केचिद् ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः। तेषां कामदुधा लोकाः स्वर्गमादिमनोहराः। यज्ञैरिष्ट्वा यायजूकाः फलं ते प्राप्नुवन्तु च ॥ १०॥

‘जो कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य यज्ञ करनेवाले हों, उन्हें मनोवाञ्छित कामनाओंको देनेवाले स्वर्गादि मनोहर लोक प्राप्त हों, यज्ञपरायण पुरुष यज्ञानुष्ठान करके तुम्हारे द्वारा स्वर्गादि फल प्राप्त करें ॥ १०॥

भावः सद्धर्मशीलानामभावः पापकर्मणाम्। सन्तः स्वर्गजितः सन्तु सर्वोश्रमनिवासिनः ॥ ११॥

‘सद्धर्मका आचरण जिनका स्वभाव बन गया है, ऐसे पुरुषोंकी संसारमें वृद्धि हो और पापकर्मियोंका अभाव हो जाय। सभी आश्रमोंमें निवास करनेवाले साधुपुरुष स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त करनेवाले हों ॥ ११॥

सत्यशूरा रणे शूरा दानशूराश्च ये नराः। ते नराः स्वर्गमश्नन्तु सदा ये चानसूयवः ॥ १२॥

‘जो सत्यको बोलने और निभानेमें शूरवीर हों, युद्धमें भी वीरता दिखाते हों, दानमें भी शौर्यका परिचय देते हों तथा दूसरोंके दोष कभी न देखते हों, ऐसे मनुष्य स्वर्गका सुख भोगें ॥ १२॥

अश्रद्दधानाः पुरुषाः कामिनोऽर्थपराः शठाः। अब्रह्मण्या नास्तिकाश्च नरकं यान्तु मानवाः ॥ १३॥

‘जो मनुष्य श्रद्धाहीन, कामी, स्वार्थपरायण, शठ, ब्राह्मणद्रोही और नास्तिक हों, वे नरकमें जायें ॥ १३॥

एतावत् क्रियतां वाक्यं मयोक्तं त्रिदशेश्वराः। ततो मयि स्थिते सर्वान् वाधिष्यन्ते न चारयः ॥ १४॥

‘देवेश्वरो ! मेरी कही हुई इस बातका पालन करो, तब मेरे रहते हुए तुम सब लोगोंको शत्रुगण बाधा न दे सकेंगे’॥

इत्युक्त्वान्तर्हितो देवः शङ्खचक्रगदाधरः। देवतानां च सर्वेषामभवद् विस्मयो महान् ॥ १५॥ एतदत्यद्भुतं दृष्ट्वा वाराहचरितं सुराः। नमस्कृत्य वाराहाय नाकपृष्ठमितो गताः ॥ १६॥

ऐसा कहकर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायणदेव अन्तर्धान हो गये। भगवान् वाराहका यह अद्भुत चरित्र देखकर सम्पूर्ण देवताओंको महान् विस्मय हुआ, वे भगवान् वाराहको नमस्कार करके वहाँसे स्वर्गलोकको चले गये ॥ १५-१६॥

ततः स्वान्याधिपत्यानि प्रतिपन्नानि दैवतैः। सर्वलोकाधिपत्ये च प्रतिष्ठां वासवो गतः ॥ १७॥

तदनन्तर देवताओंको अपना प्रभुत्व प्राप्त हुआ और सम्पूर्ण लोकोंके आधिपत्यपर देवराज इन्द्र प्रतिष्ठित हुए ॥ १७॥

विमुक्ता दानवगणैः प्रकृतिं धरणी गता। स्थैर्यहेतोर्धरण्यास्तु ज्ञात्वा चापस्कृतान् गिरीन् ॥ १८॥ स्वेषु स्थानेषु संस्थाप्य पर्वतानां पुरंदरः। चिच्छेद भगवान् पक्षान् वज्रेण शतपर्वणा ॥ १९॥

दानवगणोंसे छुटकारा पाकर पृथ्वी प्रकृतावस्थाको प्राप्त (स्वस्थ) हुई। पृथ्वीको स्थिर रखनेके विषयमे पर्वतोंको अपराधी जानकर भगवान् देवराज इन्द्रने उन्हें अपनी जगहपर स्थापित करके सौ पर्ववाले वज्रसे उन सबकी पाँखें काट दीं ॥ १८-१९॥

सर्वेषामेव पक्षा वै छिन्नाः शक्रेण धीमता। एकः सपक्षो मैनाकः सुरैस्तत्समयः कृतः ॥ २०॥

बुद्धिमान् इन्द्रने समय सभी पर्वतोंके पंख काट दिये, एकमात्र मैनाक ही पंखधारी रह गया। देवताओंने उसके साथ यह शर्त कर ली थी कि समुद्रमें स्थित रहनेपर तुम्हारे पंख नहीं काटे जायेंगे ॥ २०॥

एष नारायणस्यायं प्रादुर्भावो महात्मनः। वाराह इति विप्रेन्द्रैः पुराणे परिकीर्तितः ॥ २१॥

महात्मा नारायणका यह वाराह नामक प्रादुर्भाव (अवतार) श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा पुराणमें वर्णित है ॥ २१॥

कृष्णद्वैपायनमतं नानाश्रुतिसमाहितम्। नाशुचेर्न कृतघ्नाय न नृशंस्याय कीर्तयेत् ॥ २२॥

नाना श्रुतियोंसे अनुमोदित श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासके इस मतका उपदेश अपवित्र, कृतघ्न और नृशंस पुरुषको नहीं देना चाहिये ॥ २२॥

न क्षुद्राय न नीचाय न गुरुद्वेषकारिणे। नाशिष्याय तथा राजन् न कृतघ्नाय चैव हि ॥ २३॥

राजन् ! जो क्षुद्र हो, नीच हो, गुरुद्रोही हो, शिष्य न हो तथा कृतघ्न हो, ऐसे पुरुषको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये ॥ २३॥

आयुष्कामैर्यशःकामैर्महीकामैश्च मानवैः। जयैषिभिश्च श्रोतव्यो देवानामेष वै जयः ॥ २४॥

यह देवताओंकी विजयका प्रसंग है, जिन मनुष्योंको आयु, यश, भूमि और विजय पानेकी इच्छा हो, उन्हें इसको अवश्य सुनना चाहिये ॥ २४॥

पुराणवेदसम्बद्धः शिवः स्वस्त्ययनो महान्। पावनः सर्वसत्त्वानां तत्कालविजयप्रदः ॥ २५॥

यह प्रसंग पुराणों और वेदोंसे सम्बन्ध रखता है। यह कल्याणप्रद तथा महान् मङ्गलकारी है, समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाला तथा तत्काल विजय प्रदान करनेवाला है ॥

एष कौरव्य तत्त्वेन कथितस्त्वनुपूर्वशः।

८६० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


वाराहस्य नृपश्रेष्ठ प्रादुर्भावो महात्मनः ॥ २६ ॥
नृपश्रेष्ठ ! कुरुनन्दन ! महात्मा वाराहके प्रादुर्भावकी यह कथा मैंने क्रमानुसार तथा यथार्थरूपसे कही है ॥ २६ ॥

ये यजन्ति मखैः पुण्यैर्देवतानि पितॄनपि ।
आत्मानमात्मना नित्यं विष्णुमेव यजन्ति ते ॥ २७ ॥
जो लोग पवित्र यज्ञोंद्वारा देवताओं और पितरोंका यजन करते हैं तथा प्रतिदिन अपने मनसे आत्माका चिन्तन करते हैं, वे भगवान् विष्णुकी ही आराधना करते हैं ॥ २७ ॥

लोकायनाय त्रिदशायनाय ब्रह्मायनायात्मभवायनाय ।
नारायणायोत्तमहितायनाय महावराहाय नमस्कुरुष्व ॥ २८ ॥
राजन् ! जो सम्पूर्ण लोकोंकी गति, देवताओंके सहारे, वेदोंके प्रादुर्भाव-स्थान, आत्मयोनि ब्रह्माके भी आश्रय तथा अपने हितके स्थान हैं, उन महावाराहरूपधारी भगवान्‌को तुम नमस्कार करो ॥ २८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वाराहप्रादुर्भावे चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वाराहावतारविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥


एकचत्वारिंशोऽध्यायः

हिरण्यकशिपुकी तपस्या, वरप्राप्ति, अत्याचार, देवताओंको ब्रह्माजीका आश्वासन, भगवान् विष्णुका नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी सभामें जाना तथा उस सभाका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
वाराह एव कथितो नारसिंहमतः शृणु।
यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यह मैंने वाराह-अवतारकी कथा कही है, अब नरसिंह-अवतारका चरित्र सुनो, जिसमें भगवान्‌ने (नर और) सिंहका रूप धारण करके हिरण्यकशिपुका वध किया था ॥ १ ॥

पुरा कृतयुगे राजन् हिरण्यकशिपुः प्रभुः ।
दैत्यानामादिपुरुषश्चकार सुमहत् तपः ॥ २ ॥
राजन् ! पूर्वकालके सत्ययुगकी बात है, दैत्योंके आदि-पुरुष प्रभावशाली हिरण्यकशिपुने बड़ी भारी तपस्या की ॥ २ ॥

दश वर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च ।
जलवासी समभवत् स्थानमौनव्रतस्थितः ॥ ३ ॥
उसने काष्ठमौनव्रतमें स्थित होकर ग्यारह हजार पाँच सौ वर्षोंतक जलमें निवास किया ॥ ३ ॥

ततः शमदमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चैव हि ।
ब्रह्मा प्रीतोऽभवत् तस्य तपसा नियमेन च ॥ ४ ॥
तदनन्तर उसके शम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रिय-संयम), ब्रह्मचर्य, तप और नियमसे ब्रह्माजीको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४ ॥

ततः स्वयम्भूर्भगवान् स्वयमागत्य तत्र ह ।
विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ॥ ५ ॥
आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्देवैस्तैः सह ।
रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥ ६ ॥
दिग्भिश्चाथ विदिग्भिश्च नदीभिः सागरैस्तथा ।
नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्च महाग्रहैः ॥ ७ ॥
देवैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा ।
राजर्षिभिः पुण्यकृद्भिर्गन्धर्वैरप्सरोगणैः ॥ ८ ॥
चराचरगुरुः श्रीमान् वृतो देवगणैः सह ।
ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
समस्त चराचर प्राणियोंके गुरु, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ एवं श्रीसम्पन्न, स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजी सूर्यके समान वर्णवाले हंसयुक्त तेजस्वी विमानद्वारा आदित्यों, वसुओं, साध्यों, मरुद्गणों, देवताओं, विश्वसहायक रुद्रों, यक्षों, राक्षसों, किन्नरों तथा दिशा, विदिशा, नदी, समुद्र, नक्षत्र एवं मुहूर्तके अधिष्ठाता देवगणों, आकाशचारी महाग्रहों, देवों, ब्रह्मर्षियों, सिद्धों, सप्तर्षियों, पुण्यकर्मा राजर्षियों, गन्धर्वों, अप्सराओं तथा अन्यान्य देवसमूहोंके साथ उनसे घिरे हुए वहाँ पधारे। पधारकर वे उस दैत्यसे इस प्रकार बोले—॥ ५–९ ॥

ब्रह्मोवाच
प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत ।
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥ १० ॥
ब्रह्माजीने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दैत्यराज ! तुम मेरे भक्त हो, तुम्हारी इस तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारा भला हो, तुम कोई वर माँगो और मनोवाञ्छित पदार्थ प्राप्त करो ॥ १० ॥

ततो हिरण्यकशिपुः प्रीतात्मा दानवोत्तमः ।
कृताञ्जलिपुटः श्रीमान् वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ११ ॥
यह सुनकर दानवराज श्रीमान् हिरण्यकशिपुके दिलमें बड़ी प्रसन्नता हुई, उसने हाथ जोड़कर यह बात कही ॥ ११ ॥

हिरण्यकशिपुरुवाच
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः ।
न मानुषाः पिशाचाश्च निहन्युर्मां कथंचन ॥ १२ ॥

भविष्यपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः [ ८६१


हिरण्यकशिपु बोला—भगवन् ! देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य तथा पिशाच—ये कोई भी मुझे किसी तरह मार न सकें ॥ १२ ॥
ऋषयो नैव मां क्रुद्धाः सर्वलोकपितामह ।
शपेयुस्तपसा युक्ता वर एष वृतो मया ॥ १३ ॥
सर्वलोकपितामह ! तपस्वी ऋषि कुपित होकर मुझे कभी शाप न दें, यही वर मैंने माँगा है ॥ १३ ॥
न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन च ।
न शुष्केण न चार्द्रेण स्यान्न चान्येन मे वधः ॥ १४ ॥
न अस्त्रसे न शस्त्रसे, न पर्वतसे न वृक्षसे, न सूखेसे न गीलेसे और न दूसरे ही किसी आयुधसे मेरा वध हो ॥ १४ ॥
न स्वर्गेऽप्यथ पाताले नाकाशे नावनिस्थले ।
न चाभ्यन्तररात्र्यह्नोर्न चाप्यन्येन मे वधः ॥ १५ ॥
न स्वर्गमें न पातालमें, न आकाशमें न भूमिपर, न रातमें न दिनमें और न किसी दूसरे निमित्तसे मेरा वध हो ॥
पाणिप्रहारेणैकेन सभृत्यबलवाहनम् ।
यो मां नाशयितुं शक्तः स मे मृत्युर्भविष्यति ॥ १६ ॥
जो भृत्यों, सेनाओं और वाहनोंसहित मुझे एक ही थप्पड़से मारकर नष्ट कर देनेकी शक्ति रखता हो, वही मेरे लिये मृत्युरूप हो ॥ १६ ॥
भवेयमहमेवार्कः सोमो वायुर्हुताशनः ।
सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश ॥ १७ ॥
मैं ही सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश, नक्षत्र और दसों दिशाएँ हो जाऊँ ॥ १७ ॥
अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः ।
धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किंपुरुषाधिपः ॥ १८ ॥
मैं ही काम, क्रोध, वरुण, यम, इन्द्र, धनाध्यक्ष कुबेर, यक्ष और किम्पुरुषोंका स्वामी हो जाऊँ ॥ १८ ॥
मूर्तिमन्ति च दिव्यानि ममास्त्राणि महाहवे ।
उपतिष्ठन्तु देवेश सर्वलोकपितामह ॥ १९ ॥
सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ! देवेश्वर ! महासमरमें दिव्य अस्त्र मूर्तिमान् होकर मेरे पास स्वयं आ जायें ॥ १९ ॥

पितामह उवाच
एते दिव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः ।
सर्वकामप्रदा वत्स दुर्लभास्त्वतिमानुषाः ।
सर्वान् कामानल्पभावात् प्राप्स्यसि त्वं न संशयः॥२०॥
ब्रह्माजीने कहा—तात ! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुमको दे दिये। वत्स ! सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले ये दुर्लभ वर मानव-लोकके लिये अलभ्य हैं (किंतु तुम्हें तपोबलसे प्राप्त हो गये)। थोड़ी-सी इच्छा होते ही तुम सब कामनाओंको प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय हीं है ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवाञ्जगामाकाशमेव च ।
वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमें ही उस वैराज नामक ब्रह्मधामको चले गये, जो ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित है ॥ २१ ॥
ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा मुनिभिः सह ।
वरप्रदानं श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिताः ॥ २२ ॥
हिरण्यकशिपुको वरदान मिलनेका समाचार सुनते ही देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ २२ ॥

देवा ऊचुः
वरेनानेन भगवन् वधिष्यति स नोऽसुरः ।
तत्प्रसीदस्व भगवन् वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम्॥ २३ ॥
भवान् हि सर्वभूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ।
स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥ २४ ॥
देवता बोले—भगवन् ! इस वरके प्रभावसे उन्मत्त हुआ असुर हमलोगोंको बहुत कष्ट देगा, अतः हमारे ऊपर प्रसन्न होइये और उसके वधका भी कोई उपाय सोचिये; क्योंकि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिकर्ता, स्वयं प्रभावशाली, हव्य-कव्यके निर्माता तथा अव्यक्त प्रकृति और ध्रुवस्वरूप हैं ॥ २३-२४ ॥

वैशम्पायन उवाच
सर्वलोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः ।
आश्वासयामास सुरान् सुशीतैर्वचनाम्बुभिः ॥ २५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवताओंका वह लोकहितकारी वचन सुनकर भगवान् प्रजापतिने अपने सुशीतल अमृतवचनोंद्वारा उन सब देवताओंको आश्वासन देते हुए कहा—॥ २५ ॥
अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् ।
तपसोऽन्तेऽस्य भगवान् वधं विष्णुः करिष्यति ॥ २६ ॥
'देवताओ ! उस असुरको अपनी तपस्याका फल अवश्य प्राप्त होगा। फलभोगके द्वारा जब तपस्याकी समाप्ति हो जायगी, तब साक्षात् भगवान् विष्णु इस दैत्यका वध करेंगे' ॥ २६ ॥
एतच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे वाक्यं पङ्कजन्मनः ।
खानि स्थानानि दिव्यानि प्रतिजग्मुर्मुदान्विताः ॥ २७ ॥
भगवान् नारायणके नाभिकमलसे जन्म-ग्रहण करनेवाले ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर समस्त देवता प्रसन्न हो अपने-अपने दिव्य स्थानोंको लौट गये ॥ २७ ॥
लब्धमात्रे वरे तस्मिन् सर्वाः सोऽबाधत प्रजाः ।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥ २८ ॥
उस वरके प्राप्त होते ही दैत्य हिरण्यकशिपु सारी प्रजाको सताने लगा। ब्रह्माजीके वरदानसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया ॥ २८ ॥

८६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


आश्रमेषु मुनीन् सर्वान् ब्राह्मनान् संशितव्रतान् ।
सत्यधर्मरतान् दान्तान् धर्म्यानान् धीर्यवान् ॥ २९ ॥
उस घमण्डी दैत्यने विभिन्न आश्रमोंमें जाकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले, जितेन्द्रिय एवं सत्य-धर्मपरायण समस्त ऋषियों और ब्राह्मणोंका घोर तिरस्कार किया ॥ २९ ॥

त्रैलोक्यमनुदन्तांश्च पराजित्य महासुरः ।
त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः ॥ ३० ॥
तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले समस्त देवताओंको पराजित करके त्रिलोकीके राज्यको अपने अधिकारमें लाकर वह महान् असुर दानवराज हिरण्यकशिपु स्वर्गलोकमें निवास करने लगा ॥ ३० ॥

यदा वरमदेन्मत्तश्चोदितः कालधर्मणा ।
यज्ञियानकरोद् दैत्यान् देवतानप्ययज्ञियान् ॥ ३१ ॥
तथादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा ।
रुद्रा देवगणा यक्षा देवद्विजमहर्षयः ॥ ३२ ॥
शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुर्महाबलम् ।
देवं वेदमयं यज्ञं ब्रह्मदेवं सनातनम् ॥ ३३ ॥
भूतं भव्यं भविष्यं च प्रजालोकनमस्कृतम् ।
जब वरके मदसे उन्मत्त हो कालधर्मसे प्रेरित हुए उस असुरने दैत्योंको यज्ञभागका अधिकारी बना दिया और देवताओंको उस अधिकारसे वञ्चित कर दिया; तब आदित्य, साध्य, विश्वेदेव, वसु, रुद्र, देवगण, यक्ष, देवता, द्विज और महर्षि शरणागतवत्सल उन महाबली भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। जो देव (प्रकाशमान दिव्यविग्रहधारी), सर्ववेदमय, यज्ञपुरुष, सनातन ब्रह्मदेव, भूत, वर्तमान और भविष्यरूप तथा प्रजाजनोंसे अभिनन्दित हैं ॥ ३१-३३ ॥

देवा ऊचुः

नारायण महाभाग देव त्वां शरणं गताः ॥ ३४ ॥
त्वं हि नः परमो धाता त्वं हि नः परमो गुरुः ।
त्वं हि नः परमो देवो ह्याद्यानां सुरोत्तम ॥ ३५ ॥
देवता बोले—महाभाग नारायणदेव ! हम आपकी शरणमें आये हैं। आप ही हमारे लिये सबसे उत्कृष्ट धाता (भरण-पोषण करनेवाले) हैं और आप ही हमारे परम गुरु हैं। सुरश्रेष्ठ ! आप ही हम ब्रह्मादि देवताओंके भी परम देवता हैं ॥ ३४-३५ ॥

त्वं पद्मामलपत्राक्ष शत्रुपक्षभयावह ।
शमाय द्विपदंथायाक्षयाय भव नः प्रभो ॥ ३६ ॥
त्रायस्व जहि दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं प्रभो ।
निर्मल कमलपत्रके समान नेत्रवाले नारायण ! आप शत्रुपक्षको भय देते हैं। प्रभो ! आप दैत्यवंशके विनाश और हमारी रक्षाके लिये सदा उद्यत रहें। भगवन् ! आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मार डालिये और उसके अत्याचारसे हमारी रक्षा कीजिये ॥ ३६ ॥


विष्णुरुवाच

भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् ॥ ३७ ॥
तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपत्स्यथ मा चिरम् ।
भगवान् विष्णु बोले—अमरो ! भय छोड़ो; मैं तुम्हें अभयदान देता हूँ। देवताओ ! तुम पुनः शीघ्र ही पहलेकी भाँति स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर लोगे ॥ ३७ ॥

एष तं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् ॥ ३८ ॥
अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ।
मैं अभी वरदानके घमंडमें भरे हुए इस दानवराज दितिकुमार हिरण्यकशिपुको, जो देवेश्वरोंके लिये अवध्य बना हुआ है, इसके सहायक गणोंसहित मार डालता हूँ ॥ ३८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा स भगवान् विसृज्य त्रिदिवौकसः ॥ ३९ ॥
वधं संकल्पयित्वा तु हिरण्यकशिपोः प्रभुः ।
सोऽचिरेणैव कालेन हिमवत्पार्श्वमागतः ॥ ४० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने देवताओंको तो विदा कर दिया और स्वयं हिरण्यकशिपुके वधका संकल्प लेकर वे थोड़े ही समयमें हिमालय पर्वतके पास आ गये ॥ ३९-४० ॥

किं नु रूपं समास्थाय निहन्म्येनं महासुरम् ।
यत् सिद्धिकरमाशु स्याद् वधाय विबुधद्विषः ॥ ४१ ॥
वहाँ आकर उन्होंने सोचा कि मैं कौन-सा रूप धारण करके इस महान् असुरका वध करूँ, जो इस देवद्रोहीके वधके लिये सिद्धि-सफलता प्रदान करनेवाला हो ॥ ४१ ॥

अनुत्पन्नं ततश्चक्रे सोऽत्यन्तं रूपमास्थितः ।
नारसिंहमनाधृष्यं दैत्यदानवरक्षसाम् ॥ ४२ ॥
तदनन्तर उन्होंने जो पहले कभी उत्पन्न नहीं हुआ था ऐसा अत्यन्त विशाल नरसिंहरूप धारण किया। वह रूप दैत्य, दानव और राक्षसोंके लिये अजेय था ॥ ४२ ॥

सहायं तु महाबाहुर्जग्राहोङ्कारमेव च ।
अथोङ्कारसहायोऽसौ भगवान् विष्णुरव्ययः ॥ ४३ ॥
हिरण्यकशिपोः स्थानं जगाम प्रभुरीश्वरः ।
तेजसा भास्कराकारः कान्त्या चन्द्र इवापरः ॥ ४४ ॥
इसके बाद महाबाहु श्रीहरिने ओंकारको अपना सहायक बनाकर साथ ले लिया। ओंकारकी सहायतासे सम्पन्न हुए वे सर्वसमर्थ अविनाशी परमेश्वर भगवान् विष्णु हिरण्यकशिपुके स्थानपर गये, वे तेजसे सूर्यके समान और कान्तिसे दूसरे चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे ॥ ४३-४४ ॥

नरस्य कृत्यार्धतनुं सिंहस्यार्धतनुं विभुः ।
नारसिंहेन वपुषा पाणिं संस्पृश्य पाणिना ॥ ४५ ॥
ततोऽपश्यत विस्तीर्णां दिव्यां रम्यां मनोरमाम् ।
सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम् ॥ ४६ ॥

भविष्यपर्व ]**एकचत्वारिंशोऽध्यायः८६३

उन सर्वव्यापी परमेश्वरने आधा शरीर मनुष्यका और आधा सिंहका-सा बनाकर एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए नरसिंह-शरीरसे युक्त हो हिरण्यकशिपुकी वह विस्तृत, रमणीय, मनोरम, समस्त मनोवाञ्छित भोगोंसे युक्त एवं परम उज्ज्वल दिव्य सभा देखी ॥ ४५-४६ ॥

विस्तीर्णां योजनशतं शतमध्यर्धमायताम्।
वैहायसीं कामगमां पञ्चयोजनमुच्छ्रिताम् ॥ ४७ ॥

उस सभा-भवनकी लंबाई डेढ़ सौ योजन और चौड़ाई सौ योजनकी थी। उसकी ऊँचाई पाँच योजनकी थी। वह आकाशमें ही स्थित रहनेवाली और सभासदोंके इच्छानुसार चलनेवाली थी ॥ ४७ ॥

जराशोकक्लमव्यक्तां निष्प्रकम्पां शिवां शुभाम्।
शुभासनवतीं रम्यां ज्वलन्तीमिव तेजसा ॥ ४८ ॥

उसमें बुढ़ापा, शोक और थकावट इन दोषोंका प्रवेश नहीं था। वह अविचल, शिव (सुखद) एवं सुन्दर थी। उसमें सुन्दर सिंहासन सजाकर रखे गये थे। वह रमणीय सभा अपने तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रही थी ॥ ४८ ॥

अन्तःसलिलसंयुक्तां विहितां विश्वकर्मणा।
दिव्यरत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युताम् ॥ ४९ ॥

उसके भीतर जलाशय बना हुआ था। साक्षात् विश्वकर्माने उसका निर्माण किया था। वह फल-फूल देनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे सुशोभित थी ॥ ४९ ॥

नीलपीतासितश्यामैः सितैर्लोहितकैरपि।
अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीशतधारिभिः ॥ ५० ॥

उसके भीतर तने हुए चँदोवोंमें नीले, पीले, काले, श्याम, श्वेत और लाल रंगकी झालरें लगी थीं और उन्हींमे गुच्छे लटकाये गये थे, साथ ही उसमे सैकड़ों मञ्जरियाँ जड़ी हुई थीं ॥ ५० ॥

सिताभ्रघनसङ्काशा प्लवन्तीवाप्सु दृश्यते।
धन्यासनवती रम्या ज्वलन्ती इव तेजसा ॥ ५१ ॥

बहुमूल्य आसनोंसे युक्त तथा तेजसे प्रज्वलित होती हुई-सी वह रमणीय सभा आकाशमें श्वेत बादलोंके समान दिखायी देती थी और जलमे तैरती हुई विशाल नौका जान पड़ती थी ॥ ५१ ॥

प्रभावती भास्वरा च दिव्यगन्धमनोरमा।
न सुखा न च दुःखा सा न शीता न च घर्मदा ॥ ५२ ॥

वह विशेष सौन्दर्यसे सुशोभित तथा अतिशय दीप्तिसे प्रकाशित थी, अपनी दिव्य सुगन्धसे वह मनको मोह लेती थी। वहाँ न सुख था, न दुःख; न तो सर्दीका अनुभव होता था और न गर्मीका ही ॥ ५२ ॥

न क्षुत्पिपासे न ग्लानिं प्राप्य तां प्राप्नुवन्ति हि।
नानारूपैर्विरचिता विचित्रैरतिभास्वरैः ॥ ५३ ॥
स्तम्भैर्मणिमयैर्दिव्यैः शाश्वती चाक्षता च सा।
अतिचन्द्रं च सूर्यं च पावकं च स्वयम्प्रभा ॥ ५४ ॥

उस सभामें पहुँचकर सदस्यगण भूख, प्यास, ग्लानिका अनुभव नहीं करते थे, वह नाना रूपवाले विचित्र अत्यन्त प्रकाशमान एवं दिव्य मणिमय खंभोंसे निर्मित हुई थी, बहुत टिकाऊ और सुदृढ़ थी। चन्द्रमा, सूर्य और अग्निसे भी बढ़कर तेजोरराशिसे युक्त तथा अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली थी ॥ ५३-५४ ॥

दीप्यते नाकपृष्ठस्था भर्त्सयन्तीव भास्करम्।
सर्वे च कामाः प्रचुरा ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ ५५ ॥

स्वर्गके पृष्ठभागपर स्थित हो वह सभा सूर्यदेवको तिरस्कृत करती हुई-सी अपनी दीप्तिसे प्रकाशित होती थी, दिव्य और मानव सभी तरहके भोग वहाँ प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते थे ॥ ५५ ॥

रसवन्तः प्रभूताश्च भक्ष्यभोज्यं तथाक्षयम्।
पुण्यगन्धाः स्रजस्तत्र नित्यपुष्पफलद्रुमाः ॥ ५६ ॥

रसीले पदार्थ अधिक मात्रामें सुलभ होते थे। अक्षय भक्ष्य, भोज्य वहाँ सदा प्रस्तुत रहता था। पवित्र गन्धवाले पुष्पहार वहाँ बराबर बनते थे और नित्य फल-फूल देनेवाले वृक्ष उसमे सदा लहलहाते रहते थे ॥ ५६ ॥

उष्णे शीतानि तोयानि शीते चोष्णानि सन्ति वै।
पुष्पिताग्रान् महाशाखान् प्रवालाङ्कुरधारिणः ॥ ५७ ॥
लतावितानसंश्छन्नान् सरित्सु च सरःसु च।
मनोहरांश्च विविधान् ददर्श स तदा प्रभुः ॥ ५८ ॥
द्रुमान् बहुविधांस्तत्र मृगेन्द्रो ददृशे द्रुतम्।
गन्धवन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानि च ॥ ५९ ॥

वहाँ गर्मीमें शीतल जल और सर्दीमें गर्म जल सदा सुलभ होता था। उस समय भगवान् नृसिंहने देखा, वहाँ सरिताओं और सरोवरोंके तटपर विविध प्रकारके मनोहर वृक्ष शोभा पाते थे, उनकी डालियोंके अग्रभाग फूलोंके भारसे लदे हुए थे। वे वृक्ष विशाल शाखाओंसे सुशोभित थे। नये-नये पल्लवोंके अङ्कुर धारण करते थे और फैली हुई लता-बेलोंके विस्तारसे आच्छादित हो रहे थे। उनके फूलोंमें मनोहर गन्ध और फलोंमें स्वादिष्ट रस थे ॥ ५७-५९ ॥

तानि शीतानि तोयानि तत्र तत्र सरांसि च।
अपश्यत् सर्वतीर्थानि सभायां शतशो विभुः ॥ ६० ॥

उस सभामें भगवान्ने जहाँ-तहाँ शीतल जल, सरोवर तथा सम्पूर्ण तीर्थ देखे ॥ ६० ॥

नलिनैः पुण्डरीकैश्च शतपत्रैः सुगन्धिभिः।
रक्तैः कुवलयैर्नीलैः कुमुदैः संयुतानि च ॥ ६१ ॥

वे सरोवर नलिन, पुण्डरीक तथा शतदल नामवाले सुगन्धित कमलोंसे सुशोभित थे; लाल और नील कमल तथा कुमुद उनमें छा रहे थे ॥ ६१ ॥