हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
हित चौरासी • • १७७ प्रेम सदा बढ़िवौ करै प्रतिछिन कला अशेष। पै पूनौँ यामें नहीं तातैं प्रेम विशेष॥ -रसखानिजी (२) नवरंग-जहाँ पर ऐसा प्रतिक्षण वर्द्धमान् प्रेम है, वहीं आनन्द है-रङ्ग है। शरीरों के संयोग में आनन्द नहीं, आनन्द तो है मन एवं आत्मा के मिलन में, प्रेम में। युगल किशोर का परस्पर में एक दूसरे के प्रति अपार प्रेम है अतः उनके बीच भी नवीन नवीन आनन्द की नित्य उत्पत्ति होनी भी स्वाभाविक है। इसनित्य नव प्रेमानन्द की उत्पत्ति एवं विलास किस प्रकार युगल में होता रहता है, श्रीहित ध्रुवदासजी के मुख से सुनिये- बृंदावन में सिन्धु द्वै, उमड़े रहत अपार। प्रेम मदन रस सौं भरे, राजत रंग अपार॥ प्रेम नेम रति रंग सुख, दिनहिं परस्पर होत। पल पल नव नव दसा फिरै, सहजहिं ओत प्रोत।। अदभुत जुगल किसोर रस, छिन छिन औरै और। प्रेम मगन विलसत दोऊ रसिकनि मनि सिरमौर॥ -रंग विनोद लीला से (३) नयौ रस- यह नित्य विहार रस, नित्य निरन्तर एक रस रहकर भी नवीन है। एक रस इसलिये कि इसमें न तो कभी किसी प्रकार न्यूनता का आभास ही होता ओर न इसमें अन्य किन्हीं भावों (दास्य, सख्य, वात्सल्य, शान्त किंवा ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्य, माहात्म्य आदि) का प्रवेश ही है। हाँ स्वयं यह अत्युज्ज्वल शृङ्गार रस स्वयं भले ही उक्त भावों का रूप रस विलास में धारण करले। यथा- रद छद में वीभत्स रस, हाथापाई वीर। कंप भयानक जानिये, रौद्र छुड़ावै धीर॥ वैसे यह नित्य विहार सर्वदा एक रस और नित्य नूतन है। यहाँ निरन्तर नये ही नये रस की उत्पत्ति और आस्वादन होता रहता है। सो किस प्रकार ? श्रीध्रुवदास जी बताते हैं-
१७८ • • हित चौरासी रति विनोद जामिनि जगे, सिथिल अटपटे बैन। अँग अँग अरसाने सबै, सरसाने सखि नैन।। सीस सीस तरें वाहु दै, जुरे मिथुन मुख चाहि। निसिदिन जीवन सखिनु कै, यहै परम सुख आहि।। हाँहिं सकल जौं गात, रौम रौम रसना सहित। तऊ कह्यौ नहिं जात पिय प्यारी कौ प्रेम रस।। यह है रस की नित्य नवीनता ! (४) नवल स्याम वृषभानु किसोरी–श्याम सुन्दर श्रीकृष्ण और गौर वदनि नवल किशोरी राधा का वास्तविक रूप क्या है; इसे वेद, उपनिषद, पुराण और महापुरुषों के अनुभव पूर्ण वाक्यों से अच्छी तरह समझा जा सकता है; अतः यहाँ संक्षेप में इतना ही कि ये दोनों अतर्क्य, अचिन्त्य, अव्यक्त एवं परात्पर ब्रह्म हैं—उस 'रसो वै सः के सगुण साकार विग्रह है। इस बात को यहाँ छोटे से स्थान में लिखने की आवश्यकता नहीं है। कहने की आवश्यकता केवल इतनी ही है कि यह पूर्ण पुरातन ब्रह्म; पुरातन होकर भी नित्य नवीन है नित्य–युवा है, किशोर है। इसे महा पुरुष गण किस प्रकार प्रकट करते हैं देखिये– श्रीराधे नव कुञ्ज नागरि तव क्रीताऽस्मि दास्योत्सवैः —श्रीराधा सुधा निधि अर्थात् “हे नव कुञ्ज नागरि' राधे! मैं आपके दास्य सुख में बिक चुकी हूँ। यहाँ नव कुञ्ज नागरि पद दृष्टव्य है। इसी प्रकार– "माई ! सहज जोरी प्रगट भई जु रंग की स्याम गौर, घन दामिनि जैसे। पहले हुती, अबहूँ है, आगैहुँ रहिहै; न टरिहै तैसे।।" —श्रीस्वामी हरिदासजी इसी तरह श्रीध्रुवदासजी कहते हैं– नित्य किशोरी नित्य किसोर। नित वृंदावन नित निसि भोर।। नित्य सहचरी नित्य विनोद। नित आनँद बरसत चहुँ कोद।।
हित चौरासी • • १७६ अन्त में नवल नागरि नवल जुवराज। नव नव वन, घन क्रीडंत, नव निकुंज विलसंत सर्वसु। नव नव रति नित नित बढ़त, नयौ नेह नव रंग नयौ रस।। नव विलास कल हास नव मधुर सरस मृदु बैन। नव किसोर हरिवंश हित नवल नवल सुख चैन।।
- श्रीदामोदर सेवक जी श्रीवृन्दावन परिकर की सभी वस्तुएँ, सब भाव और लीलाएँ सदा नित्य नवीन के साथ साथ रसमय और आनन्द मय हैं। यहाँ श्रीराधा नवीन हैं, उनके प्रियतम श्रीकृष्ण नित्य नवीन हैं। इसी प्रकार सखियाँ खग, मृग और अन्यान्य परिकर भी नित्य नवीन हैं। नित्य विहार में वेणु, वाद्य, सेवा सामग्री, कुञ-गृह, यमुना, सरोवर, गिरिवर, गान, तान, राग, रङ्ग, क्रीड़ा हाव भाव केलि विलास, हास परिहास, चितवन, रूप, सौन्दर्य्य, माधुर्य्य आदि सब नवीन-नित्य नवीन और रसमय हैं किं बहुना ? ये सभी एक रसमय उन्नत नित्य नवल युगल किशोर के ही रूप हैं अतः तत्स्वरूप हैं।
- ५५ - अवतरण-इस पद में श्रीहिताचार्य्य चरण दो दामिनियों की होड़ (स्पर्धा) के रूपक से स्वामिनि श्रीराधा के रूप सौन्दर्य्य की श्रेष्ठता का प्रकाश कर रहे हैं। रूपक यों है- दो चपला हैं; एक आकाश स्थित घन में निवास करने वाली तडित; दूसरी भूतल स्थित (गौराङ्गीश्री राधा ।) ये दोनों रूप, गुण, स्वभाव में प्रायः समान हैं या नहीं इसी का निर्णय होना है इस स्पर्धा में। दोनों की स्पर्धा के विषय केन्द्र हैं श्याम घन (सजल मेघ और श्रीकृष्ण जो प्रायः एक रूप हैं।) शर्त्त क्या है ? यह कि हम दोनों में से कौन नव घन श्याम (घटा) को विचलित कर सकता है।
१८० • • हित चौरासी इस प्रकार दोनों चपलाएँ आनन्द के उत्साह विनोद रस में तल्लीन होकर अपने अपने प्रयास में लग गयीं। एक आकाश तड़ित् सजल घन घटा से अपना विजय प्रयास करने लगी और दूसरी भूतल विराजित नव जलधर वपु श्रीकृष्ण से। मलार मूल-आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं। बिच लै स्याम घटा अति नौंतन, ताके रंग रसीं॥ एक चमकि चहुँ ओर सखी री, अपने सुभाइ लसी। आई एक सरस गहनी में, दुहुँ भुज बीच बसी॥ अंबुज नील उमै विधु राजत, तिनकी चलन खसी। (जै श्री) हित हरिवंश लोभ भेटन मन, पूरन सरद ससी॥५५॥ भावार्थ-(श्रीहित अलि ने कहा-“सखी !) आज दोनों दामिनियाँ (एक आकाश स्थित बिजली एवं दूसरी भूतल स्थित तड़ित् वपु गौराङ्गी श्रीराधा) मिल कर होड़ लगा चुकी हैं। (होड़ यह है।) कि अत्यन्त नूतन श्याम घटा को विचलित करें। बस; इसी होड़ की उमङ्ग में (दोनों) डूब रही हैं। हे सखी ! [होड़ के अनुसार क्रिया यह प्रारम्भ हुई कि] एक (आकाश स्थित दामिनि) तो चारों ओर चमक कर फिर अपने (पूर्ववत) स्वभाव में ही जा मिली, (अर्थात् जैसे कि सर्व काल वह चमक कर घन में समा जाती थी उसी प्रकार आज भी वह घन में समा गयी।) (मानो वह अपनी सारी करतूत कर चुकी। अब दूसरी भूतल स्थित दामिनि श्रीराधा ने क्या किया ? वह भी चमकी पर) एक रस मय पकड़ (बन्धन) में आ गयी और (श्याम घन की) दोनों भुजाओं के बीच में जा बसी। [श्याम घन की दोनों भुजाओं के बीच जा बसने पर आकाश तड़ित् ने सोचा कि मेरी, इसकी स्थिति समान रही पर जा बसने के उपरान्त उसने क्या किया; इस प्रकार है-] (उस गौराङ्गी दामिनि में एक आश्चर्य था कि उसके विधु (चन्द्र मुख) पर चार कमल दो नील और दो लाल-शोभित थे; (अर्थात् दामिनि श्रीप्रियाजी के श्रीअङ्गों से श्रीलालजी की नील कमल वत् दो भुजाएँ लिपट रही थीं और उनके चन्द्र वदन पर लाल कमल जैसी अनुराग रँगी अरुणिम आँखें लगी थीं
हित चौरासी • • १८१ किन्तु सौन्दर्य्य का भार न सह सकने के कारण) उन (बाहुओं एवं नयनों) की गति (शिथिल होकर) विचलित हो गयी खिसक पड़ी अर्थात् दामिनि के सुखद एवं मादक स्पर्श ने श्याम घन श्रीकृष्ण को विचलित कर दिया। किन्तु [फिर भी श्याम घन श्रीकृष्ण के] मन में पूर्ण शरद शशि [वत श्री प्रियाजी के मुख] को भेंट लेने (चुम्बन आदि लेने) का लोभ रहा ही आया। [इस प्रकार भूतल स्थित दामिनी श्रीराधा श्याम घटा रूप श्रीकृष्ण को विचलित करके आकाश स्थित दामिनि से विजयी हुई; क्योंकि आकाश तड़ित मेघ को विचलित न कर ही सकी, और न उसने उसमें कोई हलचल ही उत्पन्न की; इसलिये यह हार गयी। अन्ततोगत्वा इस होड़ से गौर वदनि दामिनि श्रीप्रियाजी के रूप सौन्दर्य्य की श्रेष्ठता सिद्ध हुई।]
- ५६ - अवतरण- युगल किशोर का सुख ही रसिक सखियों का सुख है; क्योंकि ये सखियाँ युगल के प्रति 'तत्सुख सुखित्वम्' की भावना में ही पगी हैं। इस पद में आशीर्वादात्मक पद्धति से जो कुछ कहा गया है; उससे यही उक्त ध्वनि, ध्वनित हो रही है। युगल सरकार सदा सर्वदा श्रीवृन्दावन की नव निकुञ्ज कुटी में आमोद प्रमोद, हास परिहास, रास विलास और रति विहार करते रहें और हम सखिजन उस विलास सुख का दर्शन करती रहें, यही हमारा परम और चरम सुख है। यह नित्य विहार की नित्य सिद्धा सखियों की भावना है। इसी भावना का आभास, श्रीहित हरिवंश चन्द्र रसिकाचार्य्य वर्य्य नित्य सहचरि भाव से रसोपासक रसिक जनों को इस प्रकार करा रहे हैं- मलार मूल-हौं बलि जाऊँ नागरी स्याम। ऐसें ही रंग करौ निसि वासर, वृंदा विपिन कुटी अभिराम।। हास विलास सुरत रस सिंचन, पसुपति दग्ध जिवावत काम। (जै श्री) हित हरिवंश लोल लोचन अलि, करहु न सफल सकल सुख धाम।।
१८२ • • हित चौरासी भावार्थ – श्रीहित सजनी आशीर्वाद देती हैं–'हे नागरी ! (श्रीराधा) हे श्याम ! (श्री कृष्ण !) मैं आप पर वलिहार जाऊँ। (आप दोनों) वृन्दावन की सुन्दर कुञ्ज कुटी में रात दिन–निरन्तर इसी प्रकार आनन्द मय रङ्ग विहार ही करते रहो ! निरन्तर हास विलास एवं सुरत रस के सिञ्चन द्वारा पशुपति शिवजी के द्वारा जलाये गये (दग्ध किये गये) कामदेव को जीवन दान देते हुए हे सकल सुख धाम ! हमारे लोल लोचन रूप भ्रमरों को सफल कीजिये न !' (अर्थात् आप दोनों स्वच्छन्द भाव से रति विलास करें और हम उसका दर्शन करके सुखी हों।) – ५७ – अवतरण–वसन्त की बहार है। समस्त वन विविध प्रसूनों से सुसज्जित है। मन हरण बसन्ती वायु झूम झूम कर बह रहा है। सखियों ने अनेकों कनक भाजनों में विविध भाँति के रङ्ग घोल रखे हैं, सबके करों में ललित पिचकारियाँ शोभा पा रही हैं। गुलाल, अबीर और बन्दन की झोलियाँ लटका रखी हैं सबने अपनी अपनी फेंट में। यदि एक ओर से पिचकारी रङ्ग फेंकती है, तो दूसरी ओर से चल पड़ती है अबीर और गुलाल की भरी मुट्ठी। आकाश ढँक जाता है, अबीर गुलाल की रङ्ग बिरङ्गी धूल से। इसके सिवाय दोनों पक्ष–श्रीलालजी और श्रीप्रियाजी के अङ्ग प्रत्यङ्गों के हाव भाव, चितवन, कटाक्ष, हास परिहास आदि की जो होली है, वह तो होली ही है, उसका रङ्ग, सुख और आस्वादन तो सहृदय रसिक जनों के लिये ही हृदय–गम्य है। अब इस रस केलि का वर्णन श्रीरसिकाचार्य्य चरण हित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु इस प्रकार करते हैं– गौरी मूल–प्रथम जथामति प्रनऊँ (श्री) वृंदावन अति रम्य। श्रीराधिका कृपा बिनु सबके मननि अगम्य।। वर जमुना जल सींचन दिनहीं सरद बसंत। विविध भाँति सुमनसि के सौरभ अलिकुल मंत।। अरुन नूत पल्लव पर कूँजत कोकिल कीर। निर्त्तनि करत सिखी कुल अति आनंद अधीर।।
हित चौरासी • • १८३ बहत पवन रुचिदायक सीतल मंद सुगंध। अरुन नील सित मुकुलित जहँ तहँ पूषन बंध॥ अति कमनीय विराजत मंदिर नवल निकुंज। सेवत सगन प्रीतिजुत दिन मीनध्वज पुंज॥ रसिक रासि जहँ खेलत स्यामा स्याम किसोर। उभै बाहु परिरंजित उठे उनींदे भोर॥ कनक कपिस पट सोभित सुभग साँवरे अंग। नील वसन कामिनि उर कंचुकि कसुँभी सुरंग॥ ताल रबाब मुरज उफ बाजत मधुर मृदंग। सरस उकति गति सूचत वर बँसुरी मुख चंग॥ दोउ मिलि चाँचरि गावत गौरी राग अलापि। मानस मृग बल बेधत भृकुटि धनुष दृग चापि॥ दोऊ कर तारिनु पटकत लटकत इत उत जात। हो हो होरी बोलत अति आनँद कुलकात॥ रसिक लाल पर मेलति कामिनि वंदन धूरि। पिय पिचकारिनु छिरकत तकि तकि कुंकुम पूरि॥ कबहुँ कबहुँ चंदन तरु निर्मित तरल हिंडोल। चढ़ि दोऊ जन झूलत फूलत करत किलोल॥ वर हिंडोर झँकोरनि कामिनि अधिक डरात। पुलकि पुलकि वेपथ अँग प्रीतम उर लपटात॥ हित चिंतक निजु चेरिनु उर आनँद न समात। निरखि निपट नैननि सुख तृन तोरतिं बलि जात॥ अति उदार विवि सुंदर सुरत सूर सुकुमार। (जै श्री) हित हरिवंश करौ दिन दोऊ अचल विहार॥५७॥ भावार्थ—मैं (सर्व) प्रथम अत्यन्त रमणीय श्रीवृन्दावन का अपनी बुद्धि के अनुसार प्रणयन (वर्णन) करता हूँ, जो (वृन्दावन) श्रीराधिका-कृपा के विना प्रायः सभी के मनों के लिये अगम्य (प्रवेश न पा सकने के योग्य) है। जो जमुना जल सिञ्चित है, जहाँ निरन्तर शरद् एवं वसन्त ऋतुएँ रही ही आती हैं और
१८४ • • हित चौरासी भ्रमर समूह से युक्त विविध प्रकार के पुष्पों का सौरभ भी छाया रहता है। कहीं लाल लाल आम के पल्लवों पर (बैठे) कोकिल और कीर कूज रहे हैं, तो कहीं अत्यन्त आनन्द से अधीर मयूर समुदाय ही नृत्य कर रहा है। (समस्त वृन्दावन में) रुचि दायक, शीतल एवं सुगन्ध मय पवन मन्द मन्द गति से बह रहा है और जहाँ-तहाँ (जलाशयों में), अरुण, नील एवं श्वेत कमल खिल रहे हैं। (ऐसे रमणीय वृन्दावन में) अत्यन्त कमनीय कोई नव निकुञ्ज मन्दिर शोभित है; जिसका सेवन निरन्तर ही अपने परिकर के सहित मीन केतु-काम देवों का समुदाय करता रहता है। जहाँ रसिक राशि किशोर श्रीश्यामा श्याम खेलते रहते हैं। आज दोनों (रसिक किशोर) प्रातः काल ही परस्पर वाहु परिरञ्चित (गल बहियाँ दिये) उनींदे उठ पड़े हैं। (श्रीलालजी के) सुन्दर श्याम अङ्ग पर कनक वर्ण का रेशमी वस्त्र शोभित है और कामिनि (श्रीप्रियाजी) के (गौर अङ्ग पर) नील वसन एवं उर कसूँभी कञ्चुकि। (होली खेल के समय) मधुर मधुर मृदङ्ग ताल, रबाव मुरज एवं डफ बज रहे हैं और इसी प्रकार वंशी और मुखचङ्ग (अपने स्वरों में) रस पूर्ण उक्तियों (नृत्य सम्बन्धी बोलों जैसे ता-ता थेई, ताथेई आदि) एवं गतियों (उरप तिरप सुधङ्ग आदि) की सूचना करते हैं। दोनों (प्रिया प्रियतम) हिल मिलकर गौरी राग के आलाप लेकर चाचरि गान करते एवं परस्पर भौंहों के धनुष तथा दृगों से भी बल पूर्वक (एक दूसरे के) मन रूपी मृगों को बेधते (घायल करते) हैं। पश्चात् दोनों अपने अपने हाथों की ताली पटकते और लटकते मटकते इधर से उधर और उधर से इधर आते जाते हैं एवं अत्यन्त आनन्द से उल्लसित होते हुए (कुलकते हुए) "हो हो होरी" ऐसा बोलते हैं। (होली में) कामिनि (श्रीराधा) रसिक लाल (श्याम सुन्दर) पर बन्दन (सिन्दूर) धूल डालती और प्रियतम ताक ताक कर (दाव घात पूर्वक) उन पर केशर धूल फेंकते और पिचकारी छिड़कते हैं। फिर कभी कभी वे (युगल किशोर) चन्दन तरु पर तरल हिण्डोल की रचना करते हैं और (उस पर) दोनों जन चढ़कर झूलते एवं प्रसन्न होते हुए किलोलें करते हैं। हिण्डोल की लम्बी झूलों (झँकारों) से (भीरु) कामिनि अधिक अधिक डरती तथा बार बार (भय से) रोमाञ्चित् होकर कम्पित अङ्गों से प्रियतम
हित चौरासी • • १८५ के हृदय में लिपट चिपट जाती हैं। (युगल सरकार की इस आनन्द क्रीड़ा के दर्शन से) हित का चिन्तन करने वाली (प्रेममयी) अपनी निज दासियों (सखियों) के हृदय में आनन्द समाता नहीं—उमड़ उमड़ चलता है। वे इस आत्यन्तिक सुख का अपनी आँखों दर्शन करके उस पर तृण तोड़ती¹ और वलिहार जाती हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं-“हे अति उदार और परम सुन्दर युगल किशोर ! हे सुरत क्रीड़ा के शूरवीर सुकुमार युगल वर !! आप दोनों दिन दिन (नित्य निरन्तर) इसी प्रकार अविचल विहार ही करते रहें, (यही हमारा परम सुख है।”) १. तृण तोड़ने का यह भाव है कि यह वस्तु सर्वश्रेष्ठ है एवं इसे किसी की नजर न लग जाय। (१) टिप्पणी— “प्रथम जथामति प्रनऊँ श्रीवृन्दावन अतिरम्य।” इस पंक्ति में प्रनऊँ शब्द का अर्थ अनेकों टीकाकारों ने 'प्रणाम' किया है। मुझे इससे कोई हुज्जत नहीं कि यह अर्थ क्यों ? किन्तु मुझे 'प्रनऊँ' का प्रणाम अर्थ इस पङ्क्ति में जाने क्यों स्वीकार नहीं। मुझे तो इसका अर्थ प्रणयन, वर्णन या अनुशीलन ही जँचा है। ऐसा क्यों ? मैं इसका स्पष्टीकरण करने की कोशिश करूँगा। अस्तु; 'प्रथम जथामति... रम्य', इस पूरी पङ्क्ति के सरलार्थ पर ध्यान दें और प्रनऊँ का प्रणाम अर्थ लेकर सरलार्थ यह होगा— 'मैं अपनी बुद्धि के अनुसार अत्यन्त रमणीय श्रीवृन्दावन को प्रथम ही प्रणाम करता हूँ।' यहाँ विचार करने की बात है कि क्या किसी को यथामति (बुद्धि के अनुसार) प्रणाम किया जाता है या हृदय की श्रद्धा के अनुसार ? देखा तो यही जाता है कि लोग बुद्धि के अनुसार प्रणाम नहीं करते वरं श्रद्धा और हृदय के अनुसार करते हैं। प्रणाम मति का विषय नहीं जो यथामति किया जाय। प्रणाम में मति की यथा तथ्यता की कोई आवश्यकता ही नहीं ! ऐसा भी नहीं होता कि
१८६ • • हित चौरासी बुद्धिमानों का प्रणाम विशेष और मूर्खों का लघु होता हो। यदि मतिमान् मनुष्य हृदय हीन है; तो उसका प्रणाम भी भाव रहित और केवल शिष्टाचार मात्र ही रह सकता है और यदि मूर्ख मनुष्य भावुक है ; तो वह अपने प्रणाम में हृदय के सम्पूर्ण भावों का योग करके अपने (प्रणाम) (नमन) को भी महान् बना सकता है। अतः कहना होगा कि प्रणाम हृदय श्रद्धा और नम्रता का शरीर क्रिया में परिणत रूप है। जिसका मस्तिष्क से कोई सम्बन्ध है ही नहीं। तब उक्त पद में 'जथा मति प्रनऊँ' का अर्थ 'यथामति प्रणाम करता हूँ' ऐसा न करके 'यथा बुद्धि प्रणयन करता हूँ; ऐसा अर्थ मेरी अल्प मति में अधिक उपयुक्त होगा। पाठक गण विचार करें- किसी विषय के वर्णन, प्रकाश या उल्लेख करने का नाम प्रणयन है। यह प्रणयन शब्द संस्कृत व्याकरण की पृण् धातु से बना है; जिसका अर्थ है- यन् प्रत्यय है। पश्चात् इस धातु से अनेकों शब्दों की सृष्टि हुई, यथा-प्रणयन्, प्रणेता, प्रणीत आदि। जब यह कहा जाता है कि अमुक सज्जन इस ग्रन्थ के प्रणेता हैं या यह ग्रन्थ अमुक द्वारा प्रणीत है; तो इसका यही अर्थ समझा जाता है कि वे इस ग्रन्थ के लेखक हैं या यह ग्रन्थ अमुक महाशय के द्वारा लिखा गया है। तब प्रणेता या प्रणीत का अर्थ लेखक और लिखित ही किया जाता है इसी प्रकार 'मैंने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया है' इसका भी यही अर्थ है कि मैंने इस ग्रन्थ का वर्णन, अनुशीलन या लेखन किया है जो मेरी अपनी बुद्धि के अनुसार हुआ है। ऐसी दशा में यथामति प्रणयन या 'जथामति प्रनऊँ' कुछ ठीक ठिकाने सा दिखता है। अब पाठक 'प्रनऊँ' का प्रणयन पर्याय करके उक्त पङ्कि का अर्थ लगा जावें- 'प्रथम जथा मति प्रनऊँ श्रीवृंदावन अति रम्य' अर्थ-"मैं प्रथम अपनी बुद्धि के अनुसार अत्यन्त रमणीय श्रीवृन्दावन का प्रणयन (वर्णन) करता हूँ।" अब 'प्रणऊँ' शब्द का प्रणयन या वर्णन-अर्थ लेकर कार्य कारण सङ्गठित बुद्धि से सम्पूर्ण पङ्कि का सङ्गठन देखिये कि कितना उपयुक्त है यह प्रणयन या वर्णन अर्थ-
हित चौरासी • • १८७ पहले कहा जा चुका है कि प्रणयन या वर्णन यथा मति किया जाता है क्योंकि वर्णन, अनुशीलन या प्रणयन से बुद्धि या मस्तिष्क का सम्बन्ध है। जिसके पास जैसी बुद्धि होगी वह उसी के अनुसार किसी भी विषय का वर्णन-प्रणयन कर सकेगा। हृदय से सम्बन्ध रखने वाले भाव प्रधान विषयों के वर्णन में भी कर्त्तव्य कार्य तो बुद्धि का ही होता है। भाव हृदय के होते हैं पर शब्द योजना और विषय का प्रकाश तो मस्तिष्क ही अपने अनुसार करता है; वहाँ पर हृदय का कोई कार्य नहीं रहता। और यदि हृदय भावुक और सरस भी है पर वर्णन करने के लिये मति नहीं है तो वर्णन नहीं किया जा सकता। अन्ततोगत्वा कहना पड़ेगा कि 'यथामति प्रनऊँ' का 'बुद्धि के अनुसार वर्णन करता हूँ' यही अर्थ अधिक सुसङ्गठित है। (२) टिप्पणी- दोउ मिलि चाँचरि गावत गौरी राग अलापि। मानस मृग बल बेधत भृकुटि धनुष दृग चापि॥ इनमें प्रथम पंक्ति के 'अलापि' को कई प्राचीन प्रतियों में अलाप लिखा गया है और तदनुसार दूसरी पङ्क्ति के 'चापि' को चाप। इसी से छन्द के अर्थ में बड़ा भारी अन्तर आ जाता है। पहली पङ्क्ति में 'अलाप' एक संज्ञा है और 'अलापि' है पूर्व कालिक क्रिया; जिसका अर्थ है-आलाप कर या अलाप लेकर। अब दूसरी पंक्ति में चाप होना चाहिये या 'चापि' इस पर विचार करें- पूर्व पंक्ति के 'अलापि' तुकान्त के अनुसार चापि ही ठीक है किन्तु अर्थ और भावार्थ के विचार से भी यह चापि ठीक है या नहीं; यह विचारणीय है। 'मानस मृग बल बेधत भृकुटि धनुष दृग चापि' इसका अर्थ करते समय कई टीकाकारों ने 'चापि' का अर्थ वाण करके भृकुटि धनुष में दृग वाण के चढ़ाये जाने का आशय सिद्ध किया है, किन्तु जहाँ तक शब्द संसार का विस्तार है, वहाँ तक चापि का अर्थ वाण नहीं है, ऐसा मेरा स्मरण और आग्रह है। तब 'चापि' का वाण अर्थ करके पङ्क्ति को सही बिठा लेना कुछ और बात है। एक प्राचीन टीकाकार लिखते हैं-
१८८ • • हित चौरासी अहौ प्यारी जू। या खेलि विषै तुम्हारी भाइ भरी भृकुटी हैं, सोई तौ धनुक हैं, और नेत्र हैं सोई चापि है। तिनमें कटाक्ष हैं, सोई बान हैं। तिन करि प्रीतम के मन रूपी मृग कौं वलात्कार सौं बेध्यौ है। हेत यह कै प्रीतम कौं प्रेम सौं रस बस करौ है। इति।। इस अर्थ में चापि का अर्थ डोरी किया जा सकता है जो धनुष पर वाण खींचने के लिये होती है। किन्तु टीका में भी ज्यों का त्यों चापि रख दिया गया है। टीकाकार का भाव चापि के लिये धनुष का ही है, या डोरी का या वाण का कुछ समझ में नहीं आ रहा है। वैसे तो चाप का सरलार्थ धनुष ही सर्वत्र किया जाता है। इस न्याय से भृकुटि धनुषों पर दृग धनुषों (चाप) का चढ़ाना कैसे सम्भव है ? चापि का अर्थ व्याकरण के अनुसार च+अपि=चापि; च=और अपि=भी अर्थात् चापि=और भी विशेष, अधिक ऐसा मान लिया जाय तो 'मानस मृग. .. चापि' इस पङ्क्ति का अर्थ निम्न प्रकार से गठित होगा- (श्रीप्रियाजी, श्रीलालजी के) मानस मृग को वल पूर्वक (मानस मृग वल) बेध रही (बेधत) हैं, भृकुटि रूप धनुष एवं विशेष दृगों से, (भृकुटि धनुष दृग चापि।) अब यह प्रश्न होता है कि वे विशेष दृग (दृग चापि) क्या हैं ? उनका परिचय लीजिये- खंजन मीन मृगज मद मेंटत, कहा कहौं नैननि की बातैं। सुनि सुंदरी कहाँ लौं सिखई, मोहन बसीकरन की घातैं।। बंक निसंक चपल अनियारे अरुन स्याम सित रचे कहाँ तैं। डरत न हरत परायौ सर्वसु मृदु मधुमिव मादिक दृग पातैं।। इसी उक्त पद की छाया लेकर पीयूष वर्षी विहारी ने एक सूत्र लिख दिया- अमी, हलाहल, मद भरे; स्वेत, स्याँम, रतनार। जियत, मरत, झुकि झुकि परत; जेहिं चितवत इक बार।।
हित चौरासी • • १८६ ये हैं वे दृग चापि (विशेष आँखें) जिनसे लालजी का मन मृग बेधा गया- वह चितवनि औरै कछू जेहिं बस होत सुजान। अस्तु; यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि ऐसी कितनी ही उपमाएँ हैं, जहाँ उपमा और उपमेय दोनों को एकत्र करने की आवश्यकता नहीं रहती। केवल एक के ही रख देने से दोनों का काम चल जाता है। देखिये- नेत्रान्तस्ते विकीर्णाद्भुत कुसुम धनुश्चण्ड सत्काण्ड कोटिः।
- श्रीराधा सुधा निधि अर्थात् "आपके नेत्र कोणों से पुष्प धन्वा कामदेव के कोटि कोटि प्रचण्ड शर विखरते रहते हैं।" यहाँ केवल 'कुसुम धनुः तो वताया किन्तु वाणों का विशेषण 'चण्ड' और संख्या सत्काण्ड कोटि' कहकर सङ्केत कर दिया गया। इसी प्रकार हित चौरासी के इक्यावनवें पद में केवल बहुत सी उपमाएँ दी गयी हैं उपमेय का पता तक नहीं है पर वे सब उपमेय उपमाओं के सहारे पकड़ में आ जाते हैं, नव नारंग कनक हीरावलि विद्युत सरस जलज मनि गोरी। पूरित रस पीयूष जुगल घट कमल कदलि खंजन की जोरी ।। कहने का तात्पर्य यह कि "चापि" का विशेष (खास) ऐसा अर्थ लेकर पंक्ति का अर्थ करने से कोई खास आपत्ति नहीं आती। जैसी कि चापि का वाण अर्थ लेने में आती है। कहीं कहीं 'चापि' का अर्थ चँपा कर या चाँप (दबा) कर ऐसा लिया गया है और सम्पूर्ण पङ्क्ति को यों बिठाया गया है- अपनी भृकुटि धनुषों से दृग [रूपी वाण] दबाकर (चँपाकर) वे (प्रियाजी) वलात्कार पूर्वक (लालजी के) मानस मृग का वेधन कर रही हैं। यहाँ दृगों को वाण माना गया है; चूँकि वाण के लिये कोई शब्द नहीं है। 'चापि' का दबाकर अर्थ भी उपयुक्त है पर चापि का वाण पर्याय तो कुछ जँचता ही नहीं। जिन्होंने चापि का पर्याय वाण लिखा; तो क्यों लिखा? वही जानें।
१६० • • हित चौरासी
- ५८ - अवतरण - शरद् की सुहावनी रात्रियों में जब प्रिया प्रियतम के मिलन की सुख घड़ियाँ हों, नायक का मन मसोस देने वाले नायिका मान की कल्पना भी कितनी दुःख प्रद है; रसज्ञ जन जानते हैं। आज श्रीप्रियाजी मानवती हैं। हित सखी जी मनाते मनाते थक सी गयी हैं। उन्होंने लाख प्रयत्न किये पर प्रियाजी का मान न टूटा, अन्त में कहना पड़ा-“राधिके ! जानती हो इस मान का परिणाम क्या होगा ? मैंने जो तुमसे प्रियतम की दशा कही है, उसे केवल दूती के उद्दीपन वाक्य समझ कर टाल रही हो ! वे तो तुम्हारे बिना अपने जीवन और यौवन को भी नगण्य मान बैठे हैं-उनसे उदास हो चुके हैं। जाकर तुम्हारे न आने का सन्देश कहने का विलम्ब है। फिर क्या होगा..... ?” सखी अञ्चल में मुँह ढाँप फफक कर रो पड़ी। अब मानिनि ने समझी, बड़ी देर में वस्तु स्थिति। तब कहीं मान टूटा। श्रीहित सखी ने कहा श्रीराधा मानिनि से- गौरी मूल-तेरे हित लैन आई, धंन ते स्याम पठाई; हरति कामिनि घन कदन काम कौ। काहे कौं करत बाधा, सुनि री चतुर राधा; भैंटि कैं मैंटि री माई प्रगट जगत भौ।। देखि री रजनी नीकी, रचना रुचिर पी की; पुलिन नलिन नभ उदित रौंहिनी धौ। तू तौऽब सयानी; तैं मेरी एकौ न मानी; हौं तोसौं कहत हारी जुवति जुगति सौं।। मोंहनलाल छबीलौ, अपने रंग रँगीलौ; मोहत विहंग पसु मधुर मुरली रौ। वे तौऽब गनत तन जीवन जौवन तब; (जै श्री) हित हरिवंश हरि भजहि भामिनि जौ।।५८।।
हित चौरासी • • १६१ भावार्थ-(हित सखी ने कहा-) "हे कामिनि ! मैं तो केवल तेरे ही कारण (प्रेम वश) तुझे लेने आयी हूँ; मुझे श्याम सुन्दर ने वन से यहाँ भेजा है, तब आप अब चल कर काम की सघन पीड़ा का हरण क्यों नहीं करतीं ? अरी चतुर राधा ! सुन तो सही, (तू ये) अकारण (व्यर्थ) बाधाएँ क्यों उपस्थित करती है ? सखी ! श्रीलालजी से मिलकर जगत् के भय को प्रकट रूप से मिटा डाल । अरी ! देख तो सही, कैसी सुन्दर रास रचना प्रियतम ने की है, कितनी नीकी रात है ? यमुना पुलिन पर कमल खिल रहे हैं और आकाश में रोहिणी पति चन्द्रमा भी उदित है। सखी ! वैसे तो तू बड़ी सयानी (चतुर) है पर तूने आज मेरी एक न मानी ! अरी युवति ! मैं तो सौ सौ युक्तियों के साथ (वे बातें) तुझसे कह कर हार गयी।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र (सखी भाव से) कहते हैं-"हे भामिनि ! मोहन लाल एक तो छबीले हैं दूसरे अपने रङ्ग में रँगीले भी; तिस पर फिर वे मुरली के मधुर स्वर से पशु पक्षियों तक को भी मुग्ध (मोहित) करने वाले हैं। यदि तुम आज चलकर उनका सेवन करोगी तो ही वे अब अपने जीवन और यौवन को कुछ गिनेंगे, (कुछ समझ कर रखना चाहेंगे;) अन्यथा नहीं । टिप्पणी- हरि भजहि भामिनि जौ यहाँ भजहि का भावार्थ 'सेवन करना' ऐसा है; भजन पूजन नहीं। यह शब्द भज् सेवायाम् धातु से बना है अतः सेवन करने का तात्पर्य है यहाँ, प्रियतम को रस दान पूर्वक मिलन सुख देने से। इस रस विलास प्रकरण में भजन क्रिया का लक्षण कुछ और है। श्रीप्रियाजी प्रियतम का भजन करें इसका अर्थ है वे चलकर उनकी विरह ज्वाला, काम पीड़ा शान्त करें। फिर जब मिलन होकर परस्पर में- सरस गति हास परिहास आवेस बस, दलित दल मदन बल कोक रस कामिनी।
१६२ • • हित चौरासी (जै श्री) हित हरिवंश सुनि लाल लावन्य भिदे, प्रिया अति सूर सुख सुरत संग्रामिनी॥ क्रीड़ा प्रारम्भ होती है, तब इस रस विलास प्रकरण का भजन समझा जाता है-भजन क्रिया सम्पन्न होती है।
- ५९ - अवतरण-अब एक सैद्धान्तिक पद के द्वारा जगत् मिथ्यात्व प्रकाश के साथ श्रीश्यामा श्याम के चरणों की सत्यता का निरूपण करते हैं। इन सत्य स्वरूप चरणों की सत्यता चरणों की प्राप्ति में श्रीश्यामा श्याम के तदीय जन ही प्रधान हेतु है अतएव उनका ही चरणाश्रय महान् और उचित है तथा इस काल व्याल ग्रस्त जगत् से छुड़ा लेने वाला है। अब जो लोग अपने मन को अनेकों स्थानों में नचाते किन्तु युगल सरकार में नहीं लगाते वे कितनी बड़ी भूल कर रहे हैं। उनकी न तो कहीं स्थिति है और न वे सुखी ही हैं। क्योंकि सच्चा सुख तो युगल किशोर के रसिक जनों के श्रीचरणों में है और वही मुमुक्षु जनों के लिये आश्रय ग्रहण करने योग्य हैं। श्रीहिताचार्य्य चरण इस पद में इसी सिद्धान्त का निरूपण कर रहे हैं- गौरी मूल-यह जु एक मन बहुत ठौर करि, कहु कौनें सचु पायौ। जहँ तहँ विपत्ति जार जुवती लौं, प्रगट पिंगला गायौ॥ द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि, परत कौन पै धायौ। कहिधौं कौन अंक पर राखै, जौ गनिका सुत जायौ॥ (जै श्री) हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल कौ खायौ। यह जिय जानि स्याम स्यामा पद कमल संगि सिर नायौ॥५९॥ [यह पद ओरछे के स्वनाम धन्य पण्डित प्रवर श्री हरिराम जी 'व्यास' के प्रश्न के उत्तर में कहा गया था, जिससे प्रभावित होकर व्यासजी श्री आचार्यपाद के शिष्य हो गये। इसी पर उन्होंने कहा है-श्रीहरिवंश कृपा करी, मिटे व्यास के संस ।।]
हित चौरासी • • १६३ भावार्थ - इस एक मन को बहुत स्थानों पर लगाकर कहो किसने सुख पाया ? उस (बहुत जगह मन को नचाने वाले) को तो जार युवती (व्यभिचारिणी) की भाँति जहाँ तहाँ दुःख ही दुःख है, पिङ्गला वेश्या ने इसका स्पष्ट गान किया है। दो घोड़ों को एक साथ जोड़ कर भला हठ पूर्वक उन दोनों के ऊपर कौन बैठ कर उन्हें दौड़ा सकता है ? तुम्हीं बताओ गणिका से उत्पन्न पुत्र को कौन पिता अपनी गोद में ले (अर्थात् वह किसका पुत्र कहा जाय ?) श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं यह विश्व प्रपञ्च एक दम झूठा है-असत् है और काल सर्प से ग्रसित है (अर्थात् अवश्य विनाशी है;) ऐसा अपने हृदय में समझ कर मैंने श्रीश्यामा श्याम पद कमल सङ्गी-रसिक भक्त जनों को अपना मस्तक झुका दिया अर्थात् उनके प्रति समर्पण पूर्वक मैंने उनका ही एक मात्र चरणाश्रय ग्रहण किया है। टिप्पणी- "प्रगट पिंगला गायौ" सुख मन की एकाग्रता में है, इधर उधर भटकाने में नहीं। पिङ्गला नाम की वेश्या अमलात्मा ब्रह्म ज्ञानियों की नगरी विदेह नगरी जनक पुर की निवासिनि होकर भी वेश्या वृत्ति से जीवन यापन करती थी। वह अपने सुख रूप आत्म तत्व को न जान कर पर पुरुषों में सुख ढूँढ़ती थी। एक दिन वह व्यभिचारिणी अर्ध रात्रि तक अनेक पुरुषों की प्रतीक्षा करती रही पर उस दिन उसके पास कोई भी न आया, तब वह बहुत दुःखी और निराश हुई। अब उसे अपने सुख रूप आत्मा का ध्यान हुआ। उसने इसी शोक अज्ञान ओर भूल के लिये जो पश्चात्ताप किया है, वह पिङ्गला गीत के नाम से श्रीमद्भागवत में वर्णित है उसे हम यहाँ अविकल रूप में उद्धृत करते हैं उस पिङ्गला ने कहा- अहो मे मोह विततिं पश्यता विजितात्मनः। या कान्तादसत: कामं कामये येन वालिशा।। सन्तं समीपे रमणं रति प्रदं, वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय।
अकामदं दुःख भयाधि शोक, मोह प्रदं तुच्छमहं भजेऽज्ञा।। अहो मयाऽऽत्मा परितापितो वृथा साङ्केत्य वृत्याति विगर्ह्य वार्त्तया। स्त्रैणन्नराद्यार्थ तृषोऽनुशोच्या- -त्क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती।। यदास्थिभिर्निर्मित वंश वंश्य स्थूणं त्वचा रोम नखैः पिनद्धम्। क्षरन्नवद्वारमगार मेत- द्विण्मूत्र पूर्णं मदुपैति कान्या।। विदेहानां पुरे ह्यास्मिन्नहमेकैव मूढ़ धीः। यान्यमिच्छन्त्यस्मादात्मदात्काममच्युतात्।। सुहृत्प्रेष्ठ तमो नाथ आत्माचायं शरीरिणाम्। तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा।। कियत्प्रियं ते व्यभजन्कामा ये कामदा नराः। आद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा काल विद्रुताः।। नूनं मे भगवान्प्रीतो विष्णुः केनापि कर्मणा। निर्वेदोऽयं दुराशाया यन्मे जातः सुखावहः।। मैवं स्युर्मन्द भाग्यायाः क्लेशा निर्वेद हेतवः। येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुषः शममृच्छति।। तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्य सङ्गताः। त्यक्त्वा दुराशाः शरणं व्रजामि तमधीश्वरम्।। सन्तुष्टा श्रद्धधत्येतद्यथा लाभेन जीवती। विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै।। संसार कूपे पतितं विषयै र्मुषिते क्षणम्। ग्रस्तं कालाहिनात्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्वरः।। आत्मैव ह्यात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात्। अप्रमत्त इदं पश्येद् ग्रस्तं कालाहिना जगत्।। श्रीमद्भागवत स्क०११अ०८ श्लोक ३० से ४२ तक
हित चौरासी • • १६५ अर्थात् (पिङ्गला ने कहा-) "अहो ! मुझ इन्द्रिय परायणा के मोह का विस्तार तो देखो, जो मैं मूर्खा इन तुच्छ एवं असद्बुद्धि कामियों से सुख की कामना करती हूँ। अरे ! मैं बड़ी बुद्धिहीन हूँ, जो अपने समीप ही रमण करने वाले तथा नित्य रति और धन के देने वाले इन प्रियतम सत्पुरुष परमेश्वर को छोड़ कर कामना पूर्ति में असमर्थ तथा दुःख, भय, राग शोक और मोह आदि देने वाले इन तुच्छ पुरुषों को भजती हूँ। अहो! मैंने इस अति निन्दनीय आजीविका-वेश्यावृत्ति से व्यर्थ ही अपने आत्मा को तपाया। हाय ! मैं इन स्त्री लम्पट, अर्थ लोलुप और अनुशोचनीय पुरुषों द्वारा खरीदे हुए शरीर से रति और धन की इच्छा करती थी। जो अस्थिमय टेढ़े तिरछे बाँसों एवं थूनियों से बना है, त्वचा, रोम और नखों से पूर्ण है तथा नाशवान भी है। मल और मूत्र से तो भरा ही है। जो नव द्वारों वाला घर रूप देह है उसका मेरे सिवाय और कौन सेवन करेगी। इस विदेह नगरी में एक मैं ही ऐसी मूर्खा और दुष्टा हूँ, जो इन आत्म प्रद अच्युत परमात्मा को छोड़ कर किसी अन्य से अपनी कामना पूर्ण कराना चाहती हूँ। ये सब शरीर धारियों के सुहृद, प्रियतम, स्वामी और आत्मा हैं; अब मैं इनके ही हाथ बिककर लक्ष्मीजी के समान इन्हीं के साथ रमण करुँगी।" (फिर वह अपने आप को सम्बोधन करके कहने लगी-) "अरी ! ये जो भोग और भोगों के देने वाले पुरुष हैं इन्होंने तेरा कितना प्रिय साधन किया ? अथवा और भी आदि अन्त वाले पुरुष तथा काल से भयभीत देव गण हैं वे भी अपनी स्त्रियों को कितना सन्तुष्ट कर पाते हैं ? अवश्य ही मेरे किसी शुभकर्म से श्रीभगवान् प्रसन्न हुए हैं, जिससे कि इस दुराशा से मुझको ऐसा सुखकारक वैराग्य उत्पन्न हुआ है। यदि मेरा भाग्य मन्द होता तो मुझको ये कष्ट न उठाने पड़ते जो वैराग्य के हेतु हैं; जिसके द्वारा जीव गृह आदि के बन्धनों को काटकर शान्ति लाभ करता है, अतः अब मैं इस उपकार को शिरोधार्य कर विषय जनित दुराशा को छोड़ उस जगदीश्वर की ही शरण में जाती हूँ। अब मैं सन्तोष और श्रद्धा पूर्वक प्रारब्ध वश जो कुछ मिलेगा उसी से जीवन निर्वाह करंती हुई इस आत्म रूप प्रियतम (रमण) के साथ ही विहार करूँगी। संसार कूप में पड़े हुए विषय वासनाओं से नष्ट दृष्टि और काल रूपी सर्प से डसे हुए इस आत्मा (जीव) की रक्षा केवल परमात्मा को छोड़ कर और कर ही कौन
१६६ • • हित चौरासी सकता है ? जिस समय जीव सम्पूर्ण विषयों से उपरत हो जाता है, उस समय वह स्वयं ही अपना रक्षक हो जाता है, अतः प्रमाद रहित होकर इस जगत को निरन्तर काल रूपी सर्प से ग्रस्त हुआ देखे।” अस्तु; उक्त उद्धरण में बहुत स्पष्ट है कि पिङ्गला ने अपने मन को अनेकों जारों में लगाकर अशान्त बना डाला और पश्चात् उपरत होकर उसने उस मन को अपने आत्मा में एक जगह स्थिर किया तब सुखी हुई। उसके मन की एकाग्रता ही सुख का कारण बनी। इस एक उदाहरण से प्रत्येक बहुमुखी मन वाले साधक, उपासकों को उपदेश किया गया है जो युगल किशोर किंवा अपने किन्ही भी इष्ट देव की उपासना प्रेम मार्ग से करना चाहते हैं; वे अपने मन को बखेरें नहीं वरं एकत्र करके-सँमेट कर उसे अविचल भाव से अपने प्रभु के चरणों से बाँध दें। (२) टिप्पणी- द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि परत कौन पै धायौ। कहिधौं कौन अंक पर राखै जो गनिका सुत जायौ।। जैसे दो घोड़ों पर कोई एक साथ नहीं बैठ सकता, इसी प्रकार अनेक स्थानों पर मन भी एक साथ नहीं लगाया जा सकता अर्थात् परमार्थ और संसार दोनों एक साथ नहीं हो सकते सादृश्यता से। किसी एक का महत्व तो कम होगा ही। यह संसार और संसार की वस्तुओं में मन का लगाना ही परमार्थ या प्रेम पथ का व्यभिचार है। मन को इस व्यभिचार वृत्ति से निकाल कर एक निष्ठ करना होगा। व्यभिचारी मन गणिका के बेटे की तरह है। गणिका पुत्र किस बाप का बेटा है निश्चित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार अनेक देवी देवताओं का उपासक वास्तव में किस एक देवता का है क्या पता? ऐसी दशा में जबकि वह एक साथ अनेकों का है, उसका मन भी अविचल भाव से एक किसी में नहीं लग सकता।