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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

हित चौरासी • • १६५ अर्थात् (पिङ्गला ने कहा-) "अहो ! मुझ इन्द्रिय परायणा के मोह का विस्तार तो देखो, जो मैं मूर्खा इन तुच्छ एवं असद्बुद्धि कामियों से सुख की कामना करती हूँ। अरे ! मैं बड़ी बुद्धिहीन हूँ, जो अपने समीप ही रमण करने वाले तथा नित्य रति और धन के देने वाले इन प्रियतम सत्पुरुष परमेश्वर को छोड़ कर कामना पूर्ति में असमर्थ तथा दुःख, भय, राग शोक और मोह आदि देने वाले इन तुच्छ पुरुषों को भजती हूँ। अहो! मैंने इस अति निन्दनीय आजीविका-वेश्यावृत्ति से व्यर्थ ही अपने आत्मा को तपाया। हाय ! मैं इन स्त्री लम्पट, अर्थ लोलुप और अनुशोचनीय पुरुषों द्वारा खरीदे हुए शरीर से रति और धन की इच्छा करती थी। जो अस्थिमय टेढ़े तिरछे बाँसों एवं थूनियों से बना है, त्वचा, रोम और नखों से पूर्ण है तथा नाशवान भी है। मल और मूत्र से तो भरा ही है। जो नव द्वारों वाला घर रूप देह है उसका मेरे सिवाय और कौन सेवन करेगी। इस विदेह नगरी में एक मैं ही ऐसी मूर्खा और दुष्टा हूँ, जो इन आत्म प्रद अच्युत परमात्मा को छोड़ कर किसी अन्य से अपनी कामना पूर्ण कराना चाहती हूँ। ये सब शरीर धारियों के सुहृद, प्रियतम, स्वामी और आत्मा हैं; अब मैं इनके ही हाथ बिककर लक्ष्मीजी के समान इन्हीं के साथ रमण करुँगी।" (फिर वह अपने आप को सम्बोधन करके कहने लगी-) "अरी ! ये जो भोग और भोगों के देने वाले पुरुष हैं इन्होंने तेरा कितना प्रिय साधन किया ? अथवा और भी आदि अन्त वाले पुरुष तथा काल से भयभीत देव गण हैं वे भी अपनी स्त्रियों को कितना सन्तुष्ट कर पाते हैं ? अवश्य ही मेरे किसी शुभकर्म से श्रीभगवान् प्रसन्न हुए हैं, जिससे कि इस दुराशा से मुझको ऐसा सुखकारक वैराग्य उत्पन्न हुआ है। यदि मेरा भाग्य मन्द होता तो मुझको ये कष्ट न उठाने पड़ते जो वैराग्य के हेतु हैं; जिसके द्वारा जीव गृह आदि के बन्धनों को काटकर शान्ति लाभ करता है, अतः अब मैं इस उपकार को शिरोधार्य कर विषय जनित दुराशा को छोड़ उस जगदीश्वर की ही शरण में जाती हूँ। अब मैं सन्तोष और श्रद्धा पूर्वक प्रारब्ध वश जो कुछ मिलेगा उसी से जीवन निर्वाह करंती हुई इस आत्म रूप प्रियतम (रमण) के साथ ही विहार करूँगी। संसार कूप में पड़े हुए विषय वासनाओं से नष्ट दृष्टि और काल रूपी सर्प से डसे हुए इस आत्मा (जीव) की रक्षा केवल परमात्मा को छोड़ कर और कर ही कौन

१६६ • • हित चौरासी सकता है ? जिस समय जीव सम्पूर्ण विषयों से उपरत हो जाता है, उस समय वह स्वयं ही अपना रक्षक हो जाता है, अतः प्रमाद रहित होकर इस जगत को निरन्तर काल रूपी सर्प से ग्रस्त हुआ देखे।” अस्तु; उक्त उद्धरण में बहुत स्पष्ट है कि पिङ्गला ने अपने मन को अनेकों जारों में लगाकर अशान्त बना डाला और पश्चात् उपरत होकर उसने उस मन को अपने आत्मा में एक जगह स्थिर किया तब सुखी हुई। उसके मन की एकाग्रता ही सुख का कारण बनी। इस एक उदाहरण से प्रत्येक बहुमुखी मन वाले साधक, उपासकों को उपदेश किया गया है जो युगल किशोर किंवा अपने किन्ही भी इष्ट देव की उपासना प्रेम मार्ग से करना चाहते हैं; वे अपने मन को बखेरें नहीं वरं एकत्र करके-सँमेट कर उसे अविचल भाव से अपने प्रभु के चरणों से बाँध दें। (२) टिप्पणी- द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि परत कौन पै धायौ। कहिधौं कौन अंक पर राखै जो गनिका सुत जायौ।। जैसे दो घोड़ों पर कोई एक साथ नहीं बैठ सकता, इसी प्रकार अनेक स्थानों पर मन भी एक साथ नहीं लगाया जा सकता अर्थात् परमार्थ और संसार दोनों एक साथ नहीं हो सकते सादृश्यता से। किसी एक का महत्व तो कम होगा ही। यह संसार और संसार की वस्तुओं में मन का लगाना ही परमार्थ या प्रेम पथ का व्यभिचार है। मन को इस व्यभिचार वृत्ति से निकाल कर एक निष्ठ करना होगा। व्यभिचारी मन गणिका के बेटे की तरह है। गणिका पुत्र किस बाप का बेटा है निश्चित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार अनेक देवी देवताओं का उपासक वास्तव में किस एक देवता का है क्या पता? ऐसी दशा में जबकि वह एक साथ अनेकों का है, उसका मन भी अविचल भाव से एक किसी में नहीं लग सकता।

हित चौरासी • • १६७ अब विचारणीय यह है कि इस एक मन को अनन्य भावेन कहाँ स्थिर रूप से लगा देना चाहिये और कहाँ नहीं ? दो वस्तुएँ सामने हैं एक काल सर्प ग्रसित संसार और दूसरे नित्य विहारी प्रेम स्वरूप श्रीराधावल्लभ। इसका उत्तर श्रीहिताचार्य पाद इसी पद की अन्तिम दो पङ्क्तियों में दे रहे हैं- हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल कौ खायौ। यह जिय जानि स्याम स्यामा पद कमल संगि सिर नायौ।। श्रीश्यामा श्याम के चरण कमल सङ्गियों का ही सङ्ग करना जीव का परम धर्म है। इसे प्राप्त करके वह मानो श्यामा श्याम का प्रेम पा गया। अतः विश्व प्रपञ्च की स्मृति भुलाकर अनन्य भाव से केवल हित मय श्रीराधा वल्लभलाल का ही हो रहे।

  • ६० - अवतरण- श्रीप्रियाजी का रूप सौन्दर्य एक अपार और अथाह सागर है किंवा सुमेरु गिरि है अथवा वह अवर्णनीय वस्तु है जिसका पार कोई और तो कहकर पावेगा ही क्यों स्वयं अखिल लोक नायक, रसिक चूड़ामणि,परात्पर ब्रह्म, अनन्त शक्ति भगवान्-श्रीकृष्ण भी नहीं पा सकते। वे केवल उनके रूप को देखा करते हैं, अनिमेष भाव से चकोरवत् किन्तु तृप्ति होती ही नहीं। वे अनन्त रूप होकर उस मुख माधुरी का पान करना चाहते हैं। वे दर्शन के समय पलकों का गिरना भी सह नहीं सकते, कोटि कोटि कल्पों के समान मानते हैं एक पलक मात्र को। स्वयं श्रीलालजी इस पद में अपने हृदय एवं नेत्रों की प्रेमाकुल, रूपाकुल दशा का वर्णन करते हैं श्रीहिताचार्य पाद के शब्दों में- गौरी मूल-कहा कहौं इन नैननि की बात। ये अलि प्रिया वदन अंबुज रस अटके अनत न जात।। जब जब रुकत पलक संपुट लट अति आतुर अकुलात। लंपट लव निमेष अंतर ते अलप कलप सत सात।। श्रुति पर कंज दृगंजन कुच बिच मृग मद है न समात। ( जै श्री ) हित हरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात।।६०।।

१६८ • • हित चौरासी भावार्थ - (श्रीलालजी अपनी प्रिय सखी हित सजनी से कहते हैं- "सखी !) मैं अपने इन नयनों की क्या बात कहूँ ? ये मेरे नयन भ्रमर श्रीप्रिया मुख कमल के रस में अटक कर अब अन्यत्र कहीं जाते ही नहीं। जब जब कभी ये नयन पलक सम्पुट में अलक लटों के कारण अन्तराय (विक्षेप) प्राप्त करते हैं; तब तब अत्यन्त आतुर होकर घबरा उठते हैं। ये रस लोलुप (नेत्र) लव निमेष काल के अन्तर से भी कम अन्तर को सैकड़ों सैकड़ों कल्पों के समान अनुभव करते हैं।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (श्रीलालजी के नयन श्रीप्रियाजी के) कानों में कमल (आभूषण बनकर) आँखों में अञ्जन और कुचों के बीच में मृग मद बन कर भी नहीं समाते) अर्थात् शान्ति तो पाते नहीं वरं उनके हृदय में रूप और प्रेम की तृषा बढ़ती ही रहती है।) इसलिये श्याम वपु श्रीलालजी उनकी नाभि सरोवर के जलचर मीन बन जाने की याचना कर रहे हैं; (ताकि निरन्तर मीन वृत्ति से श्रीप्रियाजी का रूप रस पान करने के लिये मिला करे, वह मेरा जीवन ही बन गया।) टिप्पणी-जिस अपार रूप ने श्रीलालजी को परवश कर दिया है, उसकी एक दिशा की ओर श्रीहित ध्रुवदास जी सङ्केत कर रहे हैं; क्योंकि समग्रता से कहने के लिये तो कोई समर्थ ही नहीं। वे कहते हैं- प्यारीजू की मुसकनि, बीजुरी सी कौंधि जाति; प्यारेजू के उर ते न रेखा सी टरति है। भरि भरि आवैं नैन, कैसेहूँ न पावैं चैन; बान की सी अनी हियैं खरक्यौ करति हैं।। लाड़िली नवेली अलबेली खानि माधुरी की; सहज सुभाइनि में सर्वसु हरति है। 'हित ध्रुव' नये नये छवि के तरंग उठैं; रीझि सीस चन्द्रिका जु पगुनु ढरति है। इस अपार रूप को देख देख कर प्रियतम श्याम सुन्दर की क्या दशा हो जाती है वह भी देखिये-

हित चौरासी • • १६६. ज्यों ज्यों लाल देखैं मुख नैननि कौं तृषा होति; प्यारीजू कौ रूप मानौं प्यास ही कौ रूप है। डीठि डीठि रही मिलि जैसें एक धारा ध्रुव; हौंहू भूली देखि दसा अतिही अनूप है॥ कौन रस स्वाद गह्यौ कैसेहूँ न जात कह्यौ; जानत न छाँह अरु कैसी होत धूप है। और सुख जेते सब भये हैं पतंग रस- राज के सुखनि पर प्रेम भान भूप है॥ इसी अनूप रूप पर इस रसोपासना की भिति खड़ी है- नैन पगनि चलिबौ तहाँ जौं ध्रुव बनहि तौ जाइ॥

  • ६१ - अवतरण - आज श्रीश्याम सुन्दर एवं श्रीप्रियाजी अपने समस्त वृन्दावन परिकर सहचरियों के साथ रास क्रीड़ा कर रहे हैं। इन रास परायण श्रीलाल की छबि का ही इस पद में वर्णन है- गौरी मूल-आजु सखी बन में जु बने प्रभु नाचत हैं ब्रज मंडन। वैस किसोर जुवति अंसनु पर दियें विमल भुज दंडन॥ कोंमल कुटिल अलक सुठि सोभित अवलंबित जुग गंडन। मानहु मधुप थकित रस लंपट नील कमल के खंडन॥ हास विलास हरत सबकौ मन काम समूह विहंडन। (जै श्री) हित हरिवंश करत अपनौ जस प्रकट अखिल ब्रह्मंडन॥६१॥ भावार्थ- (श्रीहित अलि ने कहा-)"हे सखी ! आज नव किशोर ब्रज भूषण प्रभु श्रीश्याम सुन्दर तरुणि गणों के कन्धों पर अपने विमल वाहु दण्डों को रखे बन ठन कर वृन्दावन में नाच रहे हैं। उनके दोनों गालों का सहारा लिये कोमल, घुँघराली और काली काली अलकावली बड़ी सुन्दर शोभा पा रही है। (ऐसा ज्ञात होता है) मानो रस लम्पट मधुप गण नील कमल के दलों पर (या कोष पर) लुभा कर अटक गये हैं।"

२०० • • हित चौरासी "सखी ! वे लालजी अपने हास विलास से सबके मनों का हरण करते हुए काम समूह को तो मानों तितर वित्तर किये दे रहे हैं। (श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु कहते हैं) इस प्रकार वे अपना यश समस्त ब्रह्माण्डों में प्रकट कर रहे हैं।" – ६२ – अवतरण—इस पद में केवल ललिता आदि आठ प्रधान सखियों के साथ युगल सरकार के रास नृत्य का वर्णन है। अन्य सखियाँ सम्मिलित नहीं है। वे केवल दर्शिका हैं। रास नृत्य का वर्णन श्रीहित सखी अपनी सखियों से कर रही हैं- गौरी मूल- खेलत रास दुलहिनी दूलहु। सुनहु न सखी सहित ललितादिक, निरखि निरखि नैननि किन फूलहु॥ अति कल मधुर महा मौहन धुनि, उपजत हंस सुताः के कूलहु। थेई थेई वचन मिथुन मुख निसरत, सुनि सुनि देह दसा किन भूलहु॥ मृदु पद न्यास उठत कुंकुम रज, अद्भुत बहत समीर दुकूलहु। कबहुँ स्याम स्यामा दसनांचल- कच कुच हार छुवत भुज मूलहु॥ अति लावन्य, रूप, अभिनय, गुन, नाहिन कोटि काम समतूलहु। भृकुटि विलास हास रस बरषत (जै श्री) हित हरिवंश प्रेम रस झूलहु॥६२॥ भावार्थ – "हे सखियो ! सुनो न ! ललिता आदिक सखियों के सहित दुलहिनि श्रीराधा और दूलह श्रीलालजी रास क्रीड़ा कर रहे हैं। अरी ! तुम सब

हित चौरासी • • २०१ उस रास को अपने नेत्रों देखकर फूल उठो न-परम प्रसन्न हो जाओ ! उस रास में, सूर्य कन्या यमुना के पुलिन पर अत्यन्त सुन्दर मधुर एवं महा मोहन ध्वनि (कङ्कण किङ्किणि, नूपुर, वंशी, ताल, रबाब, मुरज, मृदङ्ग आदि बाजों की) प्रकट हो रही है। दोनों (दुलहिनि एवं दूलह) के मुखों से 'थेई थेई' वचन उच्चरित होते हैं, उन्हें सुन सुन कर तुम अपनी देह सुधि क्यों नहीं भूल रही हो अर्थात् भूल रही हो, क्योंकि रास अत्युत्तम है न !" (रास नृत्य के समय) "मृदु पद न्यास (पैर पटकने) से केशर की धूल (ऊपर आकाश में) उठ रही है और वायु प्रवाह से वस्त्र भी (किसी रस पूर्ण) अद्भुत गति से फहरा रहे हैं; [ अथवा यमुना के दोनों कूलों में अद्भुत रीति से समीर बह रहा है।] कभी-कभी श्याम श्यामा के अधर, केश, उरोज हार एवं भुजमूल को छू देते हैं।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु (सखी भाव से) कहते हैं-' 'सखियों! दोनों के अत्यन्त लावण्य रूप अभिनय एवं गुणों की समता में कोटि-कोटि काम भी नहीं हैं।"" (अब श्रीहित सखी युगल किशोर के प्रति कहती हैं) "हे रसिक युगल किशोर ! आप इसी प्रकार अपनी भृकुटियों के नर्तन पूर्वक हास विलास रस का वर्षण करते हुए (सदा) प्रेम रस में झूलिये। – ६३ – अवतरण-श्रीमद्भागवत के अन्तर्गत रास पञ्चाध्यायी के प्रारम्भिक अध्याय में वर्णन आता है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया का आश्रय लेकर रास रसोत्सव करने की इच्छा की। यह उनका आत्म रमण था। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- भगवानपि ता रात्रीः शरदत्फुल्ल मल्लिका। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥ श्रीमद्भाग० १०/२९/१

२०२ • • हित चौरासी अर्थात् “परीक्षित् ! जिन रात्रियों में मल्लिका के फूल खिल उठे थे, शरद् काल की उन श्रेष्ठ रात्रियों को देखकर भगवान् ने भी योगमाया का आश्रय लेकर रमण करने की इच्छा की।” भगवान् के इच्छा करते ही सम्पूर्ण अनुकूल वातावरण तत्काल तैयार हो गया। चन्द्र देव अपनी सुधा रश्मियों से श्रीवन को अनुरञ्जित करते हुए उदित हो आये, जिससे दिशाएँ विदिशाएँ लाल लाल रङ्ग से जगमगा उठी, उस समय ऐसा प्रतीत हुआ मानो यह अरुणिम बाल चन्द्र अपनी प्रिया से फाग खेलकर मुख में गुलाल मर्षण किये उठ चला आया है। चन्द्रोदय से वन की समस्त लताएँ, ओषधियाँ वृक्ष, विटप, तरु जीवन-रस पाकर लहलहा उठे, लताएँ फूल गयीं। फूलों से सौरभ उधार लेकर पवन उसे ले चला पर भार अधिक होने से धीरे-धीरे ही चलता रहा। उसने समस्त वन को सौरभ से भर दिया। धीरे धीरे चन्द्र देव गगन में आगे बढ़े। प्रकाश और भी उज्ज्वल धवल हुआ। अब तो मानों उनकी किरण डोरियों से एक रश्मि वितान सा तन गया। तब मन मोहन ने अपनी प्रेम राग-गायिका मनोहर मुरली को अधरों से लगाया। वह अधर सुधा का पान करके मुग्ध कण्ठ से गा उठी मद-विह्वल-कारी मीठी तान। उसे सुना ब्रज की प्रेम मयी बालाओं ने। वे तान की डोर से बँधी श्याम सुन्दर के पास आयीं। फिर आगे क्या क्या हुआ वह सब श्रीहिताचार्य्य चरण बता रहे हैं- गौरी मूल-मोहन मदन त्रिभंगी। मोहन मुनि मन रंगी।। मोहन मुनि सघन प्रगट परमानँद गुन गंभीर गुपाला। सीस किरीट श्रवन मनि कुंडल उर मंडित बन माला।। पीतांबर तन धातु विचित्रित कल किंकिनि कटि चंगी। नख मनि तरनि चरन सरसीरुह मोहन मदन त्रिभंगी।। मोहन बैंनु बजावै। इहिं रव नारि बुलावै।।

हित चौरासी • • २०३ आई ब्रज नारि सुनत बंसी रव गृह पति बंधु विसारे। दरसन मदन गुपाल मनोहर मनसिज ताप निवारे॥ हरषित वदन बंक अवलोकनि सरस मधुर धुनि गावै। मधुमय स्याँम समान अधर धरैं मोहन बैनु बजावै॥ रास रच्यौ बन माँही। विमल कलप तरु छाँहीं॥ विमल कलपतरु तीर सुपेशल सरद रैन वर चंदा। सीतल मंद सुगंध पवन बहै तहाँ खेलत नंद नंदा॥ अदभुत ताल मृदंग मनोहर किंकिनि शब्द कराहीं। जमुना पुलिन रसिक रस सागर रास रच्यौ बन माँही॥ देखत मधुकर केली। मोहे खग मृग बेली॥ मोहे मृगधैनु सहित सुर सुंदरि प्रेम मगन पट छूटे। उडगन चकित थकित ससि मंडल कोटि मदन मन लूटे॥ अधर पान परिरंभन अति रस आनँद मगन सहेली। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक सचु पावत देखत मधुकर केली॥६३॥ भावार्थ—मोहन मदन का भी संमोहन करने वाले ललित त्रिभङ्गी है, वे मुनियों के भी मन को आनन्दित करने वाले हैं। ये मुनि मन मोहन गोपाल गुणों में गम्भीर और परम आनन्द की प्रकट रूप से श्रेष्ठ घनीभूत मूर्त्ति हैं। अहो ! उनके मस्तक पर किरीट, कानों में मणिमय कुण्डल और वक्षस्थल पर वनमाला शोभित है एवं सुन्दर कटि देश पर मधुर करधनी विराज रही है। कमल जैसे चरणों के नख सूर्यकान्त मणि की भाँति जगमगा रहे हैं, ऐसे सुन्दर हैं ये मोहन मदन त्रिभङ्गी। वे मन मोहन मुग्ध करने वाली वंशी बजा रहे हैं और वंशी के मीठे स्वर से (ब्रज) नारियों को बुला रहे हैं। उस वंशी का मधुर स्वर सुनते ही ब्रज नारियाँ अपने अपने घर, पति, एवं बंधुओं (कुटम्बीजनों) को भूलकर (मोहन के पास) आ गयीं। उन्होंने मनोहर मदन गोपाल का दर्शन करके काम ताप का निवारण किया। (ब्रज बालाओं ने दर्शन किया कि श्याम सुन्दर अपने) प्रसन्न वदन हैं,

२०४ • • हित चौरासी उनकी चितवन कुछ तिरछी अवलोकन से युक्त है और वे सरस तथा मधुर ध्वनि से वंशी में कुछ गा रहे हैं। इस तरह ये मधुमय श्याम सुन्दर मोहन वेणु को अपने अधरों पर समान रूप से धारण किये बजा रहे हैं। अब उन्होंने वृन्दावन के विमल कल्पवृक्ष के नीचे रास रचना की। एक तो पवित्र कल्पतरु, दूसरे यमुना का सुन्दर तट, शारदीय रात्रि, और तिस पर परम सुन्दर चन्द्रदेव। शीतल और सुगन्ध पूर्ण पवन मन्द मन्द बह रहा है ऐसे रम्य स्थल में नन्द नन्दन रास खेल रहे हैं। उस रास में अद्भुत ताल और मनोहर मृदङ्गों के साथ किङ्किणियाँ भी मधुर और मनोहर शब्द कर रही हैं। श्रीवृन्दावन यमुना पुलिन पर रसिक नन्द नन्दन ने इस रस सागर रास की रचना की है। इस केलि को, मधु पान करने वाले रसिक भ्रमर देख रहे हैं और उस पर पशु पक्षी, लता वेलि सभी मुग्ध हैं। इन मोहित मृग और धेनुओं के साथ सुर नारियाँ भी मोहित हो गयीं और प्रेम मग्न हो जाने के कारण उनके वस्त्र आदि भी (छूट छूट कर) अङ्गों से खिसकने लगे। आकाश में तारागण (रास देखकर) चकित हो गये, चन्द्र मण्डल थकित हो गया। और कोटि कोटि काम देवों के मन भी लूट लिये मन मोहन ने। आनन्द मग्न हो गयीं सहेलियाँ, अधरामृत के पान एवं आलिङ्गन के अत्यन्त रस से। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि इस मधुकर केलि (अर्थात् रसिक भ्रमर रूप श्रीलालजी की रास क्रीड़ा) को देखकर रसिक (इस दिव्य रस के आस्वादन करने वाले रसिक प्रेमी जन किंवा सखियाँ, वृन्दावन का परिकर आदि) सुख पा रहे हैं। टिप्पणी—यह श्रीमद्भागवत वर्णित रास पञ्चाध्यायी के भावों से तो मिलता ही है अपितु कहीं कहीं तो श्लोकों के शब्दार्थ और उनकी शृङ्खला तक पायी जाती है। इससे कहा जा सकता है कि इसमें श्रीहिताचार्य्य पाद ने नित्य रास का नहीं वरं महारास का वर्णन किया है किन्तु श्रीमद्भागवत के महारास और आचार्य्य वर्णित इस पद में एक अन्तर यह है कि श्रीमद्भागवत में अनेक गोपियों के साथ श्रीकृष्ण ने अनेक रूप धारण किये हैं पर यहाँ श्रीकृष्ण केवल

हित चौरासी • • २०५ एक राधा प्रियतम ही हैं। इसका कारण यह है कि आचार्य्य पाद के इष्टाराध्य श्रीराधावल्लभ लाल—श्रीकृष्ण, एक नारी व्रती पति और दक्षिण नायक है किन्तु श्रीमद्भागवत के श्रीकृष्ण जार, उपपति बहुनायक और प्रेमास्पद हैं। चूँकि यहाँ पर श्रीआचार्य्य पाद ने महा रास का वर्णन श्रीमद्भागवतानुसार ही किया है किन्तु फिर भी एक बात लक्ष्य में रखने की है कि सर्वत्र आपका लक्ष्य रस और रसिकता ही है। यहाँ तक कि आप उस रसिकता को रस विलास को मार्ग और अपमार्ग में भी खोज निकालते हैं तथा उसके प्रमाण भी ले लेते हैं मूढ़ पशु पक्षी कीट पतङ्गों से तब फिर ब्रज लीला या महारास में उन्हें रस का दर्शन नहीं होगा क्या ऐसा सम्भव है ? उन्होंने रस को कहाँ तक नीचे उतर कर देखा है; आप देखिये— प्रीति न काहु की कानि विचारै। मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै।। ज्यौं साँवन सरिता जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै। ज्यौं नादहि मन दिये कुरंगनि प्रगट पारधी मारै।। जै श्री हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहिं जारै। फिर जो लोग महाप्रभु के सिद्धान्त पर ब्रज और निकुञ्ज का झगड़ा (विवाद) खड़ा करते हैं उन्होंने शायद श्रीहिताचार्य्य के मर्म बेधन की ओर लक्ष्य नहीं किया है। वे व्यासजी के इस वाक्य को समझें— "हुतौ रस रसिकन कौ आधार" स्वयं आचार्य्य पाद इस पद की वर्णना में जो शब्द रखते हैं वे दृष्टव्य हैं, साथ साथ लक्ष्य में लाने योग्य हैं— (१) रसिक रस सागर रास रच्यौ बन माँहीं। (२) अधर पान परिरंभन अति रस, आनँद मगन सहेली। (३) रसिक सचु पावत............... पद का अन्तिम वाक्यांश 'रसिक सचु पावत' स्पष्ट कर रहा है कि यह महा रास केलि रसिक जनों के रस आस्वादनार्थ है, उनकी अपनी वस्तु है।

२०६ • • हित चौरासी

इसका वर्णन भी रस आस्वादनार्थ किंवा रस वर्णन के लिये है कोई व्रज लीला वर्णन इसका लक्ष्य नहीं। यह तो निर्विवाद है कि लक्ष्य की गति पर से ही वर्णन की गति जानी जाती है। अब यहाँ यह जानना चाहिये कि महारास का वर्णन होने पर भी इस पद में रस का ही वर्णन है। श्रीहिताचार्य्य पाद ने श्रीमद्भागवत में से भी अपनी इष्ट वस्तु रस कैसे और कहाँ से खोज निकाली है ? उसे देखिये, यहाँ प्रसङ्गानुसार यथा क्रम श्रीमद्भागवत से इस पद के भावों का सामञ्जस्य प्रकट किया जाता है- (१) 'मौंहन बैंनु बजावै' इस भाव का प्रकाश निम्न चरण से मिलता है- जगौ कलं वाम दृशां मनोहरम्। श्रीमद्भागवत १०/२९/३ अर्थात् "वंशी में वाम दृशा गोपियों के मन का हरण करने वाला गीत (श्याम सुन्दर ने) गाया।" जिसे सुनकर ब्रज बालाएँ आ गयीं। (२) "आईं व्रज नारि सुनत वंसी रव" अब इसका भाव साम्य श्रीमद्भागवत में किस प्रकार है उसे देखिये- निशम्य गीतं तदनङ्ग वर्द्धनं व्रजस्त्रियः कृष्ण गृहीत मानसाः। आजग्मु रन्योन्यमलक्षितोद्यमाः स यत्र कान्तो जव लोल कुण्डलाः॥ १०/२९/४ अर्थात् "उस कामोद्दीप गान के कान में पड़ते ही समस्त व्रज बालाएँ श्रीकृष्ण में आसक्त चित्त होकर एक दूसरे से अपनी चेष्टा छिपाती हुईं अपने कान्त के पास आयीं। उस समय अत्यन्त वेग के कारण उनके कानों के कुण्डल हिलते जाते थे।" इस आगमन के समय उन व्रज बालाओं को उनके भ्राता, पति, बन्धु वर्गों ने रोका तो सही पर वे किसी प्रकार भी न रुकीं। उनकी अवहेलना करके भी श्रीकृष्ण से जा मिलीं। आचार्य्य पाद कहते हैं-

हित चौरासी • • २०७ (आई ब्रज नारि सुनत बंसी रव) गृहपति बंधु विसारे- अब श्रीमद्भागवत में देखिये- ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृ बन्धुभिः। गोविन्दापहृतात्मानो न न्यवर्त्तन्त मोहिताः।। श्रीमद्भा. १०/२९/८ अर्थात् उनके पति, पिता भ्राता और बन्धुओं ने उन्हें बहुत कुछ रोका किन्तु श्रीगोविन्द ने उनके चित्तों को ऐसा कुछ खींच लिया था कि वे मुग्ध बालाएँ उनके रोके न रुक सकीं।" उन्होंने आकर मदन मोहन का दर्शन किया और उनके विरह जन्य काम ताप की शान्ति हो गयी। महाप्रभु और श्रीमद्भागवत का भाव साम्य देखिये- (४)"दरसन मदन गुपाल मनोहर मनसिज ताप निवारे" - और सर्वास्ता केशवालोक परमोत्सव निर्वृताः। जहुर्विरहजं तापं प्राज्ञं प्राप्य यथा जनाः।। श्रीमद्भाग. १०/३२/९ अर्थात् "जैसे मुमुक्षु जन ब्रह्मवेत्ता को पाकर संसार ताप से छूट जाते हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्ण दर्शन के परमोल्लास से आनन्दित होकर उन समस्त गोप बालाओं का विरह ताप दूर हो गया।" पश्चात् रास क्रीड़ा प्रारम्भ हुई- "रास रच्यौ बन माँही" और तत्रारभत गोविन्दो रास क्रीडामनुव्रतैः। रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपी मण्डल मण्डितः।। श्रीमद्भा. १०/३३/२-३ अर्थात् "फिर वहाँ गोविन्द ने रास क्रीड़ा प्रारम्भ की वे गोपियों के मण्डल में शोभित होकर रास के महोत्सव में सम्प्रवृत्त हुए।" इसी प्रकार दोनों प्रसङ्गों में रास नृत्य का सरस वर्णन मिलाइये-

२०८ • • हित चौरासी (६) "अदभुत ताल मृदंग मनोहर किंकिनि शब्द कराहीं" -हित चौरासी एवं- वलयानां नूपुराणां किङ्किणीनां च योषिताम्। सप्रियाणामभूच्छब्दस्तुमुलो रास मण्डले।। -श्रीमद्भा. १०/३३/६ अर्थात् "रास मण्डल में नृत्य करती हुई गोपियों के कङ्कण नूपुरों एवं किङ्किणियों का तुमुल शब्द होने लगा।" इस रास नृत्य का दर्शन करके देवताओं की सुन्दरियाँ मोहित हो गयीं। आचार्यपाद लिखते हैं- (७) "मोहे मृग धैनु सहित सुर सुंदरि प्रेम मगन पट छूटे। उडगन चकित थकित ससि मण्डल कोटि मदन मन लूटे॥" यही भाव श्रीमद्भागवत में भी- कृष्ण विक्रीडितं वीक्ष्य मुमुहुः खेचर स्त्रियः। कामार्दिताः शशाङ्कश्च सगणो विस्मितोऽभवत्।। -श्रीमद्भां. १०/३३/१९ अर्थात् "श्रीकृष्ण के इस विक्रीड़न को देखकर देवताओं की स्त्रियाँ कामातुरा होकर मोहित हो गयीं और चन्द्रमा भी अपने गणों (उडगण आदि) के सहित चकित हो गया।" रास ने सबको चकित तो कर दिया। और ब्रज बालाओं ने जो सुख लूटा उसका भी वर्णन करते हैं दोनों व्यास नन्दन- (८) अधर पान परिरंभन अति रस आनँद मगन सहेली। यह तो हुआ 'हित चौरासी में अब श्रीमद्भागवत में व्यासनन्दन शुकदेव जी क्या कहते हैं-

हित चौरासी • • २०६ काचिद्रास परिश्रान्ता पार्श्वस्थस्य गदाभृतः। जग्राह बाहुना स्कन्धं श्लथ वलय मल्लिका।। तत्रैकांसगतं बाहुं कृष्णस्योत्पल सौरभम्। चन्दनालिप्तमाघ्राय हृष्टरोमा चुचुम्ब ह।। कस्याश्चिन्नाट्य विक्षिप्त कुण्डल त्विष मण्डितम्। गण्डं गण्डे संदधत्या अदात्ताम्बूल चर्वितम्।। नृत्यन्ती गायती काचित्कूजन्नूपुर मेखला। पार्श्वस्थाच्युत हस्ताब्जं श्रान्ताधात्स्तनयोः शिवम्।। श्रीमद्भागवत-१०/३३/११,१२,१३,१४ अर्थात् “कोई गोपी नृत्य करते करते थक गयी उसकी कलाइयों से कङ्कण और केशों से मल्लिका के पुष्प खिसकने लगे तब उसने श्रीकृष्ण के कन्धों को अपनी भुजाओं से पकड़ लिया। एक गोपी ने अपने कन्धे पर रखी हुई कमल कुसुम से सुगन्धित श्रीकृष्ण की चन्दन लिप्त भुजा को सूँघ कर आनन्द पुलकित होकर चूम लिया। एक गोपी ने नाचने से हिलते हुए कुण्डलों की कान्ति से सुशोभित अपना कोमल कपोल श्रीकृष्ण चन्द्र के कपोल से मिलाया तब श्रीकृष्ण ने उसके मुख में अपना चबाया हुआ पान दे दिया। कोई गोपी नूपुर और मेखला की झनकार करती हुई नाच और गा रही थी जब वह विशेष थक गयी, तो उसने अपनी बगल में विराजमान् श्रीकृष्ण चन्द्र का शीतल कर कमल अपने स्तन पर रख लिया।” 'इत्यादि; उक्त सभी प्रमाण बता रहे हैं, कि श्रीहिताचार्य्य पाद ने इस पद में महारास वर्णन की शैली से अपना लक्ष्य-इष्ट रस का गान किया है। दूसरी बात यहाँ पर यह भी जान लेने की है कि जैसे अन्यत्र रास वर्णन में श्रीहिताचार्य्य ने श्रीप्रियाजी की उपस्थिति प्रत्येक रास प्रसङ्ग में आवश्यक समझी और वर्णन की है, वैसी यहाँ नहीं समझी और की भी नहीं क्योंकि श्रीमद्भागवत की यही शैली है। रसज्ञ जन जानते हैं कि महारास वर्णन को श्रीमद्भागवत के अनुसार वर्णन करके श्रीहिताचार्य्य ने उसमें आदि से अन्त तक रस-केवल रस की धारा बहायी है। वेणु वादन, गोपी आगमन, नृत्य, आलिङ्गन, एवं चुम्बन आदि

२१० • • हित चौरासी सभी रस पूर्ण क्रियाएँ हैं। मेरी मान्यता है कि वर्णन में महाप्रभु पाद का उद्देश्य महारास वर्णन न होकर रस प्रक्रिया वर्णन है। – ६४ – अवतरण-श्रीवृन्दावन में सदा शरद एवं वसन्त का साम्राज्य छाया रहता है। निरन्तर श्रीलालजी अपनी मधुर मुरली की तान भी छेड़ा करते हैं और रस एवं भावों से परिपूर्ण अनेक लीलाओं की रचना योजना करते रहते हैं। वैसे ये हैं तो मुनियों के ध्यान में भी न आने वाले पर प्रेम परवश अपने अनन्य प्रेमी जनों के लिये श्रीवन में नित्य प्रकट हैं। इसी बात को श्रीहिताचार्य पाद प्रकट करते हैं- गौरी मूल-बैनु माई बाजै बंसीवट। सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट।। जटिल क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट। दसननि कुंद कली छबि लज्जित सज्जित कनक समान पीत पट।। मुनि मन ध्यान धरत नहिं पावत करत विनोद संग बालक भट। दास अनन्य भजन रस कारन हित हरिवंश प्रकट लीला नट।।६४।। भावार्थ-(श्रीहित अलि ने सखियों से कहा) "हे सखी ! वंशीवट में वेणु तो बजती ही रहती है और यमुना के तट स्थित पवित्र एवं सुन्दर पुलिन पर; श्रीवन में सदा सर्वदा वसन्त भी रहा ही आता है। (ये वेणु बजाने वाले श्रीकृष्ण भी कितने सुन्दर हैं ? उनके श्रीअङ्गो में) मणियों से जड़ा हुआ किरीट और मकराकार कुण्डल शोभित हैं, मुख कमल पर अलकें क्या हैं मानों भ्रमर। दाँतों की पङ्क्ति से तो कुन्द की कलियों की छबि भी लजा उठी है। उनके शरीर पर स्वर्ण के जैसा पीत पट शोभा पा रहा है।" श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि जिन्हें अपने मन में ध्यान करते हुए मुनि जन (ध्यान तक में) नहीं पा सकते, वही बालकवत उन्नत किशोर 'सुरत रण शूर श्रीराधावल्लभ लाल निरन्तर श्रीवन में आमोद प्रमोद पूर्वक

हित चौरासी • • २११ क्रीड़ा करते रहते हैं। (अतएव निश्चय है,) ये लीला नटवर केवल अपने दासों के रस भजन के लिये ही प्रकट हैं। टिप्पणी- "दास अनन्य" प्रथम एक पद में श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु ने "यह जु एक मन बहुत ठौर करि कहि कौनैं सचु पायौ" इस उपदेश से साधक प्रेमियों के लिये अपने मन को एक जगह लगाने का उपदेश दिया। एक मन को अनेक स्थलों में लगाने से जार युवती (वेश्या) की तरह अशान्ति ही मिलती है शान्ति नहीं; जिसे श्रीराधावल्लभ लाल का एकान्तिक प्रेम इष्ट हो वह नितान्त रूप से अपने मन को एक मुख करे-अनन्य बने। अनन्य का अर्थ है केवल अपने प्रभु का हो रहना और उससे अतिरिक्त सारे विश्व प्रपंच को भूल जाना। अनन्यता में अपने प्रियतम से तल्लीन होने का आदेश निहित है; किन्तु किन्हीं देवी-देवताओं की निन्दा या विरोध का नहीं। यह अनन्यता इतनी एक मेक हो जाय अपने प्रियतम से कि (उससे छान कर न्यारी न किया जा सके) सर्वत्र केवल अपने इष्ट का दर्शन ही हो एवं और कुछ अन्य कहा जाने वाला रह ही न जाय वह बोल उठे- दर दिवार दरपन भये, जित देखौं तित तोहिं। कंकर पत्थर ठीकरी, भये आरसी मोहिं।। अथवा सर्वत्र अपने प्राण प्रियतम श्याम का दर्शन करने वाली गोपियों की भाँति वह अनन्य होकर गा उठे- जित देखौं तित स्याम मयी है। स्याम कुंज बन जमुना स्यामा मनहु स्यामता बेलि बई है।। श्रुति कौ अक्षर स्याम देखियत दीप सिखा पर स्याम तई है। हौं बौरी कै लोगन ही की स्याम पुतरिया बदल गई है।। चंद्र सार मृग सार स्याम है सब स्याम काम बिजई है। नर देवन की कहा कथा है अलख ब्रह्म छबि स्याम मई है।। अनन्यता का अर्थ बताते हुए इसी प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है-

२५२ • • हित चौरासी सो अनन्य जाके असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप रासि भगवंत॥ समस्त चराचर में भी अपने रूप राशि इष्ट देव का दर्शन करना ही अनन्यता है। यही है अनन्य साधना की सिद्धावस्था, जिसका सङ्केत श्रीहिताचार्य चरण कर रहे हैं- सद्योगीन्द्र सुदृश्य सान्द्र रसदानन्दैक सन्मूर्त्तयः सर्वेप्यद्भुत सन्महिम्नि मधुरे वृंदावने सङ्गताः। ये क्रूरा अपि पापिनो न च सतां सम्भाष्य दृश्याश्च ये; सर्वान्वस्तुतया निरीक्ष्य परम स्वाराध्य बुद्धिर्मम॥ श्रीराधा सुधानिधि २६४ अर्थात् "जिनका सङ्ग अद्भुत महिमा पूर्ण मधुर वृन्दावन से है, वे भले ही क्रूर पापी और सज्जनों के दर्शन सम्भाषण के अयोग्य व्यक्ति क्यों न हों किन्तु वे सभी लोग महान् योगीन्द्र गणों के भी लिये सुन्दर दर्शनीय, सघन रसदायी और एकमात्र आनन्द की मूर्तियाँ हैं। उनको वस्तुतया (यथार्थ दृष्टि से) देखकर उनमें मेरी अपनी स्वाराध्य बुद्धि है-वे मेरे लिये इष्टदेव के रूप हैं।" इस अनन्य साधना के दो दृष्टि कोण हैं एक सर्व दर्शन और दूसरा एकान्त दर्शन। ऊपर के प्रसङ्ग में अनन्यता का सर्वदर्शन (अर्थात् सर्वत्र अपने प्रियतम प्रभु का ही दर्शन करना अन्य का न देखना) का दिग्दर्शन कराया गया है अब अनन्यता के एकान्त दर्शन का नीचे के प्रसङ्ग में दिग्दर्शन कराया जाता है जिसका सूत्र श्रीहिताचार्यपाद निर्विरोध भाव से प्रकट करते हैं- रसना कटौ जु अन रटौं निरखि अन फुटौ नैन। श्रवन फुटौ जु अन सुनौं विनु राधा जस बैन॥ अर्थात् "श्रीराधा के सिवाय अन्य कुछ कहने बकने वाली जीभ कट कर गिर जाय, अन्य कुछ देखने वाले नेत्र फूट जायँ, और अन्य कुछ सुनने वाले कान भी फूट जायँ।" यह दृष्टि ऐकान्तिक, एक देशीय किसी एक रूप, नाम के प्रति भी हो सकती है और यही सर्वत्र, सर्व देशीय सब नाम रूपों के प्रति भी हो सकती है।

हित चौरासी • • २१३ जब प्रेमी की दृष्टि में सर्वत्र अपना इष्ट देव ही है तब अन्य है ही कहाँ ? तब उसका विरोध भी किससे और कहाँ रहा ? वह तो सर्वत्र उसे ही देखता है- जहँ देखौं तहँ आपनों इष्ट नाम गुरु धाम। ऐसे दृष्टि प्राप्त महात्मा के लिये विरोध करने के लिये कोई स्थल रह ही नहीं जाता। वह श्रीविहारिन देव जी के शब्दों में कहता है- अब हौं कासौँ बैर करौं। निजु मुख कहत पुकारत प्रभु हैं घट घट हौं विहरौं॥ इसी सर्वत्र इष्ट दर्शन की ऐकान्तिक साधना का मार्ग श्रीहरिराम 'व्यास' इस प्रकार प्रकट करते हैं- जाकी है उपासना, ताही की वासना; ताही कौ नाम रूप लीला गुन गाइये। यहै अनन्य धर्म परपाटी यहै; श्रीवृन्दावन तजि अनत न जाइये।। सोई व्यभिचारी आन कहै, आन करै, ताकौ मुख देखें दारुन दुख पाइये। 'व्यास' होइ उपहास त्रास कियें आस अछत कत दास कहाइये।। कितना स्पष्ट है इन व्यासजी की अनन्य धर्म परिपाटी ! जिसमें जिसकी उपासना उसी की वासना के साथ उसीके नाम रूप लीला गुणों का गान है। अपनी वस्तु से प्रीति है। अन्य किसी से विरोध का लेश भी नहीं। नित्य विहार का नित्य दर्शन करने वाले, सदा विहार की ऐनक लगाये हुए श्रावण के सूर परम रसिक श्रीभगवत रसिक जी के भी शब्द कुछ ऐसे ही हैं- नैननि देखौं और नहिं, श्रवन सुनौं नहिं और। घाँन न सूघौं और कछु, रसना कहौं न और।। रसना कहौं न और त्वचा परसौँ नहिं औरे। कुंज विहारी केलि झेलि इन्द्रिनु सब ठौरे।।

२१४ • • हित चौरासी भगवत रसिक अनन्य कोक उपदेसों सैननिं। बैननि मैंन जगाई रैन दिन देखौं नैननिं।। अनन्य श्रीभगवत रसिकजी अपनी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से सदा, सर्वत्र श्रीकुअ विहारी की केलि का दिव्य रस ही झेलते रहते हैं। यह है रसिकों की रसिक अनन्यता। अनन्यता का स्थूल अर्थ करने वाले लोग जो प्रायः अन्य देवी देवताओं की निन्दा, विरोध, एवं उपेक्षा आदि जो कुछ करते हैं वे अपने प्रभु के व्यापक रूप विस्तार को भूलकर किसी सङ्कीर्ण दायरे में आ जाते हैं। वे श्रीहित ध्रुवदासजी के नीचे लिखे सिद्धान्त को भूल जाते हैं- अपने अपने इष्ट कौं भजहिं जीव ते धन्य। किसी की निन्दा या विरोध करते समय हम अपनी स्थिति से-अनन्यता से उसी क्षण पतित हो जाते हैं जब हमें अपने इष्ट को छोड़कर किसी अन्य की स्मृति भी हो आती है। अनन्यता तो वह है जहाँ उपासक की स्मृति, तन, मन प्राण और आत्मा के कण कण में अपने प्रियतम का रूप समाया रहे इस प्रकार- आओ प्यारे मोहना पलक झाँपि तोहिं लेऊँ। ना मैं देखौं और कौं ना तोहिं देखन देऊँ।। इस अनन्यता की साधना का पथ श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती पाद इस तरह बता रहे हैं- स्वान्तर्भाव विरोधिनी व्यवहृतिः सर्वाः शनैस्त्यज्यतां, स्वान्तश्चिन्तित तत्वमेव सततं सर्वत्र संधीयताम्। तद्भावेक्षणतः सदा स्थिरचरेऽन्यादृग्तिरोभाव्यतां, वृन्दारण्य विलासिनो निशि दिवा दास्योत्सवे स्थीयताम्।। अर्थात् “अन्तर्भावों के विरोध करने वाले सभी व्यवहारों को धीरे धीरे त्याग दें, अपने अन्तः करण के नित्य चिन्तनीय तत्व को ही सदा सर्वत्र खोजता रहे। (उसी अन्तः करण चिन्तित तत्व श्रीराधावल्लभलालजी के) भाव को स्थिर चर सब में सर्वत्र देखा करे, अन्य दृष्टियों का ही त्याग कर दे और श्रीवृन्दारण्य विलासी श्रीराधा मुरली मनोहर के दास्य सुख में ही दिन रात लगा रहे।”