ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
वल्ली २ ] कठोपनिषद् ११७
ओर चलते रहते हैं। अथवा वे परमात्मा सदा-सर्वदा सर्वत्र स्थित हैं। उनकी सर्वव्यापकता ऐसी है कि बैठे भी वही हैं, दूर देशमें चलते भी वही हैं, सोते भी वही हैं और सब ओर जाते-आते भी वही हैं। वे सर्वत्र सब रूपोंमें नित्य अपनी महिमामें स्थित हैं। इस प्रकार अलौकिक परमैश्वर्यस्वरूप होनेपर भी उन्हें अपने ऐश्वर्यका तनिक भी अभिमान नहीं है। उन परमदेवको जाननेका अधिकारी उनका कृपापात्र मेरे (आत्मतत्त्वज्ञ यमराजके सदृश अधिकारियोंके) सिवा दूसरा कौन हो सकता है॥ २१॥
सम्बन्ध— अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझानेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं—
अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्। महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥ २२॥
अनवस्थेषु=(जो) स्थिर न रहनेवाले (विनाशशील); शरीरेषु=शरीरोंमें; अशरीरम्=शरीररहित (एवं); अवस्थितम्=अविचलभावसे स्थित है; महान्तम्= (उस) महान्; विभुम्=सर्वव्यापी; आत्मानम्=परमात्माको; मत्वा=जानकर; धीरः=बुद्धिमान् महापुरुष; न शोचति=(कभी किसी भी कारणसे) शोक नहीं करता॥ २२॥
व्याख्या— प्राणियोंके शरीर अनित्य और विनाशशील हैं, इनमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। इन सबमें समभावसे स्थित परब्रह्म पुरुषोत्तम इन शरीरोंसे सर्वथा रहित, अशरीरी है। इसी कारण वे नित्य और अचल हैं। प्राकृत देश-काल-गुणादिसे अपरिच्छिन्न उन महान्, सर्वव्यापी, सबके आत्मरूप परमेश्वरको जान लेनेके बाद वह ज्ञानी महापुरुष कभी किसी भी कारणसे किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता। यही उसकी पहचान है॥ २२॥
सम्बन्ध— अब यह बतलाते हैं कि वे परमात्मा अपने पुरुषार्थसे नहीं मिलते, वरं उसीको मिलते हैं, जिसको वे स्वीकार कर लेते हैं—
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
११८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ २३॥*
अयम् आत्मा = यह परब्रह्म परमात्मा; न = न तो; प्रवचनेन = प्रवचनसे; न मेधया = न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन = न बहुत सुननेसे ही; लभ्यः = प्राप्त हो सकता है; यम् = जिसको; एषः = यह; वृणुते = स्वीकार कर लेता है; तेन एव लभ्यः = उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि); एषः आत्मा = यह परमात्मा; तस्य = उसके लिये; स्वाम् तनूम् = अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते = प्रकट कर देता है॥ २३॥
**व्याख्या—**जिन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन मैं कर रहा हूँ, वे न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ़-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्मतत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं, जो बुद्धिके अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं और न उनको ही मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनते रहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है। जो उनके बिना रह नहीं सकता। जो अपनी बुद्धि या साधनापर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमायाका परदा हटाकर उसके सामने अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं॥ २३॥
**सम्बन्ध—**अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते—
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥ २४॥
प्रज्ञानेन = सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा; अपि = भी; एनम् = इस परमात्माको; न दुश्चरितात् अविरतः आप्नुयात् = न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे
* यह मन्त्र मुण्डकोपनिषद् (३।२।३) में भी इसी प्रकार है।
वल्ली २ ] कठोपनिषद् १११
आचरणोंसे निवृत्त नहीं हुआ है; **न अशान्तः=**न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है; **न असमाहितः=**न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं; **वा=**और; **न अशान्तमानसः [ आप्नुयात् ]=**न वही प्राप्त करता है, जिसका मन शान्त नहीं है॥ २४॥
**व्याख्या—**जो मनुष्य बुरे आचरणोंसे विरक्त होकर उनका त्याग नहीं कर देता, जिसका मन परमात्माको छोड़कर दिन-रात सांसारिक भोगोंमें भटकता रहता है, परमात्मापर विश्वास न होनेके कारण जो सदा अशान्त रहता है, जिसका मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ वशमें की हुई नहीं हैं, ऐसा मनुष्य सूक्ष्म बुद्धिद्वारा आत्मविचार करते रहनेपर भी परमात्माको नहीं पा सकता, क्योंकि वह परमात्माकी असीम कृपाका आदर नहीं करता, उसकी अवहेलना करता रहता है; अतः वह उनकी कृपाका अधिकारी नहीं होता॥ २४॥
**सम्बन्ध—**उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्वको सुनकर और बुद्धिद्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्यों नहीं जान सकता? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः॥ २५॥
यस्य=(संहारकालमें) जिस परमेश्वरके; **ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे=**ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणिमात्र; **ओदनः=**भोजन; **भवतः=**बन जाते हैं (तथा); **मृत्युः यस्य=**सबका संहार करनेवाली मृत्यु (भी) जिसका; **उपसेचनम्=**उपसेचन (भोज्य वस्तुके साथ लगाकर खानेका व्यञ्जन, तरकारी आदि); **[ भवति ]=**बन जाता है; **सः यत्र=**वह परमेश्वर जहाँ (और); **इत्था=**जैसा है, यह ठीक-ठीक; **कः वेद=**कौन जानता है॥ २५॥
**व्याख्या—**मनुष्य-शरीरमें भी धर्मशील ब्राह्मण और धर्मरक्षक क्षत्रियका शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये अधिक उत्तम माना गया है; किंतु वे भी उन कालस्वरूप परमेश्वरके भोजन बन जाते हैं, फिर अन्य साधारण मनुष्य-शरीरोंकी तो बात ही क्या है। जो सबको मारनेवाले मृत्युदेव हैं, वे भी
१२०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
उन परमेश्वरके उपसेचन अर्थात् भोजनके साथ लगाकर खाये जानेवाले व्यञ्जन—चटनी—तरकारी आदिकी भाँति हैं। ऐसे ब्राह्मण-क्षत्रियादि समस्त प्राणियोंके और स्वयं मृत्युके संहारक अथवा आश्रयदाता परमेश्वरको भला, कोई भी मनुष्य इन अनित्य मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति कैसे जान सकता है। किसकी सामर्थ्य है, जो सबके जाननेवालेको जान ले। अतः (पूर्वीक २३ वें मन्त्रके अनुसार) जिसको परमात्मा अपनी कृपाका पात्र बनाकर अपना तत्त्व समझाना चाहते हैं, वही उनको जान सकता है। अपनी शक्तिसे उन्हें कोई भी यथार्थ रूपमें नहीं जान सकता; क्योंकि वे लौकिक ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति बुद्धिके द्वारा जाननेमें आनेवाले नहीं हैं ॥ २५ ॥
॥ द्वितीय वल्ली समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय वल्ली
सम्बन्ध —द्वितीय वल्लीमें जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया और उनको जानकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेनेका फल भी बतलाया गया। संक्षेपमें यह बात भी कही गयी कि जिसको वे परमात्मा स्वीकार करते हैं, वही उन्हें जान सकता है, परंतु परमात्माको प्राप्त करनेके साधनोंका वहाँ स्पष्टरूपसे वर्णन नहीं हुआ; अतः साधनोंका वर्णन करनेके लिये तृतीय वल्लीका आरम्भ करते हुए यमराज पहले मन्त्रमें जीवात्मा और परमात्माका नित्य सम्बन्ध और निवास-स्थान बतलाते हैं—
| ऋतं | पिबन्तौ | सुकृतस्य | लोकं |
|---|---|---|---|
| गुहां | प्रविष्टौ | परमे परार्धे। | |
| छायातपौ | ब्रह्मविदो | वदन्ति | |
| पञ्चाग्रयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥ |
वल्ल्बी ३ ]
कठोपनिषद्
१२१
सुकृतस्य लोके=शुभ कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्य-शरीरमें; परमे परार्धे=परब्रह्मके उत्तम निवास-स्थान (हृदय-आकाश)-में; गुह्यम् प्रविष्टौ=बुद्धिरूप गुफामें छिपे हुए; ऋतम् पिबन्तौ=सत्यका पान करनेवाले (दो हैं); छायातपो=(वे) छाया और धूपकी भाँति परस्पर भिन्न हैं; (यह बात) ब्रह्मविदः=ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष; वदन्ति=कहते हैं; च ये=तथा जो; त्रिणाचिकेताः=तीन बार नाचिकेत-अग्निका चयन कर लेनेवाले; (और) पञ्चाग्रयः=पञ्चाग्निसम्पन्न गृहस्थ हैं; [ ते वदन्ति ]=वे भी यही बात कहते हैं॥१॥
व्याख्या —यमराजने यहाँ जीवात्मा और परमात्माके नित्य सम्बन्धका परिचय देते हुए कहा कि ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महानुभाव तथा यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले आस्तिक सज्जन—सभी एक स्वरसे यही कहते हैं कि यह मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। पूर्वजन्माजित अनेकों पुण्यकर्मोंको निमित्त बनाकर परम कृपालु परमात्मा कृपापरवश हो जीवको उसके कल्याण-सम्पादनके लिये यह श्रेष्ठ शरीर प्रदान करते हैं और फिर उस जीवात्माके साथ ही स्वयं भी उसीके हृदयके अन्तस्तलमें—परब्रह्मके निवासस्वरूप श्रेष्ठ स्थानमें अन्तर्धामीरूपसे प्रविष्ट हो रहते हैं (छा० ३० ६। ३। २) इतना ही नहीं, वे दोनों साथ-ही-साथ वहाँ सत्यका पान करते हैं—शुभकर्मोंके अवश्यम्भावी सत्फलका भोग करते हैं (गीता ५। २९)। अवश्य ही दोनोंके भोगमें बड़ा अन्तर है। (परमात्मा असङ्ग और अभोक्ता हैं) उनका प्रत्येक प्राणीके हृदयमें निवास करके उसके शुभकर्मोंके फलका उपभोग करना उनकी वैसी ही लीला है, जैसी अजन्मा होकर जन्म ग्रहण करना। इसलिये यह कहा जाता है कि वे भोगते हुए भी वस्तुतः नहीं भोगते। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि परमात्मा सत्यको पिलाते हैं—शुभ-कर्मका फल भुगताते हैं और जीवात्मा पीता है—फल भोगता है। परंतु जीवात्मा फलभोगके समय असङ्ग नहीं रहता। वह अभिमानवश उसमें सुखका उपभोग करता है। इस प्रकार साथ रहनेपर भी जीवात्मा और परमात्मा दोनों छाया और धूपकी
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
भाँति परस्पर भिन्न हैं। जीवात्मा छायाकी भाँति अल्प प्रकाश—अल्पज्ञ है और परमात्मा धूपकी भाँति पूर्णप्रकाश—सर्वज्ञ! परंतु जीवात्मामें जो कुछ अल्पज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है, जैसे छायामें अल्प-प्रकाश पूर्णप्रकाशरूप धूपका ही होता है।*
इस रहस्यको समझकर मनुष्यको अपनेमें किसी प्रकारकी भी शक्ति-सामर्थ्यका अभिमान नहीं करना चाहिये और अन्तर्धामीरूपसे सदा-सर्वदा अपने हृदयमें रहनेवाले परम आत्मीय परम कृपालु परमात्माका नित्य-निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिये ॥ १ ॥
सम्बन्ध— परमात्माको जानने और प्राप्त करनेका जो सर्वोत्तम साधन 'उन्हें जानने और पानेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये उन्हींसे प्रार्थना करना है' इस बातको यमराज स्वयं प्रार्थना करते हुए बतलाते हैं—
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम्। अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतः शकेमहि ॥ २ ॥
ईजानानाम्=यज्ञ करनेवालोंके लिये; यः सेतुः=जो दुःखसमुद्रसे पार पहुँचा देनेयोग्य सेतु है; [तम्] नाचिकेतम्=उस नाचिकेत-अग्रिको (और); पारम् तितीर्षताम्=संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये; यत् अभयम्=जो भयरहित पद है; [तत्] अक्षरम्=उस अविनाशी; परम् ब्रह्म=परब्रह्म पुरुषोत्तमको; शकेमहि=जानने और प्राप्त करनेमें भी हम समर्थ हों ॥ २ ॥
व्याख्या— यमराज कहते हैं कि हे परमात्मन्! आप हमें वह सामर्थ्य दीजिये, जिससे हम निष्कामभावसे यज्ञादि शुभकर्म करनेकी विधिको भलीभाँति जान सकें और आपके आज्ञापालनार्थ उनका अनुष्ठान करके आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें तथा जो संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावाले विरक्त पुरुषोंके
- इस मन्त्रमें 'जीवात्मा' और 'परमात्मा'को ही गुहामें प्रविष्ट बतलाया गया है, 'बुद्धि' और 'जीव' को नहीं। 'गुहाहितत्वं तु परमात्मन एव दृश्यते' (देखिये—ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पाद २ सू० ११ का शाङ्करभाष्य)।
वल्ल्बी ३ ]
कठोपनिषद्
१२३
लिये निर्भय पद है, उस परम अविनाशी आप परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान्को भी जानने और प्राप्त करनेके योग्य बन जायँ।
इस मन्त्रमें यमराजने परमात्मासे उन्हें जाननेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये प्रार्थना करके यह भाव दिखलाया है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानने और प्राप्त करनेका सबसे उत्तम और सरल साधन उनसे प्रार्थना करना ही है॥२॥
सम्बन्ध— अब, उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके परमधाममें किन साधनोंसे सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथीके रूपककी कल्पना करके समझायी जाती है—
आत्मानः रथिनं विद्धि शरीरः रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥३॥
आत्मानम्=(हे नचिकेता! तुम) जीवात्माको तो; रथिनम्=रथका स्वामी (उसमें बैठकर चलनेवाला); विद्धि=समझो; तु=और; शरीरम् एव=शरीरको ही; रथम्=रथ (समझो); तु बुद्धिम्=तथा बुद्धिको; सारथिम्=सारथि (रथको चलानेवाला); विद्धि=समझो; च मनः एव=और मनको ही; प्रग्रहम्=लगाम (समझो) ॥३॥
इन्द्रियाणि हयानाहूर्विषयाः स्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहूर्मनीषिणः॥४॥
मनीषिणः=ज्ञानीजन (इस रूपकमें); इन्द्रियाणि=इन्द्रियोंको; हयान्=घोड़े; आहुः=बतलाते हैं (और); विषयान्=विषयोंको; तेषु गोचरान्=उन घोड़ोंके विचरनेका मार्ग (बतलाते हैं); आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्=(तथा) शरीर, इन्द्रिय और मन—इन सबके साथ रहनेवाला जीवात्मा ही; भोक्ता=भोक्ता है; इति आहुः=यों कहते हैं॥४॥
व्याख्या— जीवात्मा परमात्मासे बिछुड़ा हुआ है, अनन्त कालसे वह अनवरत संसाररूपी बीहड़ वनमें इधर-उधर सुखकी खोजमें भटक रहा है। सुख समझकर जहाँ भी जाता है, वहाँ धोखा खाता है। सर्वथा साधनहीन और दयनीय है। जबतक वह परम सुखस्वरूप परमात्माके समीप नहीं पहुँच जाता, तबतक
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
उसे सुख-शान्ति कभी नहीं मिल सकती। उसकी इस दयनीय दशाको देखकर दयामय परमात्माने उसे मानव-शरीररूपी सुन्दर सर्वसाधनसम्पन्न रथ दिया। इन्द्रियरूप बलवान् घोड़े दिये। उनके मनरूपी लगाम लगाकर उसे बुद्धिरूपी सारथिके हाथोंमें सौंप दिया और जीवात्माको उस रथमें बैठाकर—उसका स्वामी बनाकर यह बतला दिया कि वह निरन्तर बुद्धिकी प्रेरणा करता रहे और परमात्माकी ओर ले जानेवाले भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम आदिके श्रवण, कीर्तन, मननादि विषयरूप प्रशस्त और सहज मार्गपर चलकर शीघ्र परमात्माके धाममें पहुँच जाय।
जीवात्मा यदि ऐसा करता तो वह शीघ्र ही परमात्मातक पहुँच जाता; परंतु वह अपने परमानन्दमय भगवत्प्रासरूप इस महान् लक्ष्यको मोहवश भूल गया। उसने बुद्धिकी प्रेरणा देना बंद कर दिया, जिससे बुद्धिरूपी सारथि असावधान हो गया, उसने मनरूपी लगामको इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़ोंकी इच्छापर छोड़ दिया। परिणाम यह हुआ कि जीवात्मा विषयप्रवण इन्द्रियोंके अधीन होकर सतत संसारचक्रमें डालनेवाले लौकिक शब्द-स्पर्शादि विषयोंमें भटकने लगा। अर्थात् वह जिन शरीर, इन्द्रिय, मनके सहयोगसे भगवान्को प्राप्त कर सकता, उन्हींके साथ युक्त होकर वह विषय-विषके उपभोगमें लग गया ॥ ३-४ ॥
सम्बन्ध —परमात्माकी ओर न जाकर उसकी इन्द्रियाँ लौकिक विषयोंमें क्यों लग गयीं, इसका कारण बतलाते हैं—
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्चा इव सारथेः ॥ ५ ॥
यः सदा=जो सदा; अविज्ञानवान्=विवेकहीन बुद्धिवाला; तु=और; अयुक्तेन=अवशीभूत (चञ्चल); मनसा=मनसे (युक्त); भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथेः=असावधान सारथिके; दुष्टाश्चाः इव=दुष्ट घोड़ोंकी भाँति; अवश्यानि=वशमें न रहनेवाली; [ भवन्ति ]=हो जाती हैं ॥ ५ ॥
व्याख्या —रथको घोड़े ही चलाते हैं, परंतु उन घोड़ोंको चाहे जिस ओर, चाहे जिस मार्गपर ले जाना—लगाम हाथमें थामे हुए बुद्धिमान् सारथिका काम
वल्ल्मी ३ ]
कठोपनिषद्
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है। इन्द्रियरूपी बलवान् और दुर्धर्ष घोड़े स्वाभाविक ही आपातरमणीय विषयोंसे भरे संसाररूप हरी-हरी घासके जंगलकी ओर मनमाना दौड़ना चाहते हैं; परंतु यदि बुद्धिरूप सारथि मनरूपी लगामको जोरसे खींचकर उन्हें अपने वशमें कर लेता है तो फिर घोड़े मनरूपी लगामके सहारे बिना चाहे जिस ओर नहीं जा सकते। यह सभी जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषयोंका ग्रहण तभी कर सकती हैं, जब मन उनके साथ होता है। घोड़े उसी ओर दौड़ते हैं, जिस ओर लगामका सहारा होता है; पर इस लगामको ठीक रखना सारथिकी बलबुद्धिपर निर्भर करता है। यदि बुद्धिरूपी सारथि विवेकयुक्त स्वामीका आज्ञाकारी, लक्ष्यपर सदा स्थिर, बलवान्, मार्गके ज्ञानसे सम्पन्न और इन्द्रियरूपी घोड़ोंको चलानेमें दक्ष नहीं होता तो इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़े उसके वशमें न रहकर लगामके सहारे सम्पूर्ण रथको ही अपने वशमें कर लेते हैं और फलस्वरूप रथी और सारथिसमेत उस रथको लिये हुए गहरे गड्ढेमें जा पड़ते हैं। बुद्धिके नियन्त्रणसे रहित इन्द्रियाँ उत्तरोत्तर उसी प्रकार उच्छृङ्खल होती चली जाती हैं जैसे असावधान सारथिके दुष्ट घोड़े॥५॥
सम्बन्ध —अब स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धिको विवेकशील बनानेका लाभ बतलाते हैं—
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्चा इव सारथेः॥६॥
तु यः सदा=परंतु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकयुक्त बुद्धिवाला (और); युक्तेन=वशमें किये हुए; मनसा=मनसे सम्पन्न; भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथेः=सावधान सारथिके; सदश्चाः इव=अच्छे घोड़ोंकी भाँति; वश्यानि=वशमें; [ भवन्ति ]=रहती हैं॥६॥
व्याख्या —जो जीवात्मा अपनी बुद्धिको विवेकसम्पन्न बना लेता है—जिसकी बुद्धि अपने लक्ष्यकी ओर ध्यान रखती हुई नित्य-निरन्तर निपुणताके साथ इन्द्रियोंको सन्मार्गपर चलानेके लिये मनको बाध्य किये रहती है, उसका
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
मन भी लक्ष्यकी ओर लगा रहता है एवं उसकी इन्द्रियाँ निश्श्यात्मिका बुद्धिके अधीन रहकर भगवत्सम्बन्धी पवित्र विषयोंके सेवनमें उसी प्रकार संलग्न रहती हैं, जैसे श्रेष्ठ अश्व सावधान सारथिके अधीन रहकर उसके निर्दिष्ट मार्गपर चलते रहते हैं ॥ ६ ॥
सम्बन्ध— पाँचवें मन्त्रके अनुसार जिसके बुद्धि और मन आदि विवेक और संयमसे हीन होते हैं, उसकी क्या गति होती है—इसे बतलाते हैं—
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः ।
न स तत्पदमाजोति सः सारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥
यः तु सदा= जो कोई सदा; अविज्ञानवान्= विवेकहीन बुद्धिवाला; अमनस्कः= असंयतचित्त (और); अशुचिः= अपवित्र; भवति= रहता है; सः तत्पदम्= वह उस परमपदको; न आजोति= नहीं पा सकता; च= अपि तु; संसारम् अधिगच्छति= बार-बार जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है ॥ ७ ॥
व्याख्या— जिसकी बुद्धि सदा ही विवेकसे—कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे रहित और मनको वशमें रखनेमें असमर्थ रहती है, जिसका मन निग्रहरहित—असंयत है और जिसका विचार दूषित रहता है तथा जिसकी इन्द्रियाँ निरन्तर दुःखाचारमें प्रवृत्त रहती हैं—ऐसे बुद्धिशक्तिसे रहित मन-इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले मनुष्यका जीवन कभी पवित्र नहीं रह पाता और इसलिये वह मानव-शरीरसे प्राप्त होनेयोग्य परमपदको नहीं पा सकता, वरं अपने दुष्कर्मोंके परिणामस्वरूप अनवरत इस संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है—कूकर-शूकरादि विभिन्न योनियोंमें जन्मता एवं मरता रहता है ॥ ७ ॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाजोति यस्माद् भूयो न जायते ॥ ८ ॥
तु यः सदा= परंतु जो सदा; विज्ञानवान्= विवेकशील बुद्धिसे युक्त; समनस्कः= संयतचित्त (और); शुचिः= पवित्र; भवति= रहता है; सः तु= वह तो; तत्पदम्= उस परमपदको; आजोति= प्राप्त कर लेता है; यस्मात् भूयः= जहाँसे (लौटकर) पुनः; न जायते= जन्म नहीं लेता ॥ ८ ॥
वल्ल्बी ३ ]
कठोपनिषद्
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व्याख्या —इसके विपरीत जो छठे मन्त्रके अनुसार स्वयं सावधान होकर अपनी बुद्धिको निरन्तर विवेकशील बनाये रखता है और उसके द्वारा मनको रोककर पवित्रभावमें स्थित रहता है अर्थात् इन्द्रियोंके द्वारा भगवान्की आज्ञाके अनुसार पवित्र कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करता है तथा भगवान्को अर्पण किये हुए भोगोंका राग-द्वेषसे रहित हो निष्कामभावसे शरीर-निर्वाहके लिये उपभोग करता रहता है, वह परमेश्वरके उस परमधामको प्राप्त कर लेता है, जहाँसे फिर लौटना नहीं होता ॥ ८ ॥
सम्बन्ध —आठवें मन्त्रमें कही हुई बातको फिरसे स्पष्ट करते हुए रथके रूपकका उपसंहार करते हैं—
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः । सोऽध्वनः पारमाज्जोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥
यः नरः=जो (कोई) मनुष्य; विज्ञानसारथिः तु=विवेकशील बुद्धिरूप सारथिसे सम्पन्न (और); मनःप्रग्रहवान्=मनरूप लगामको वशमें रखनेवाला है; सः=वह; अध्वनः=संसारमार्गिके; पारम्=पार पहुँचकर; विष्णोः=सर्वव्यापी परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान्के; तत् परमम् पदम्=उस सुप्रसिद्ध परमपदको; आज्जोति=प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
व्याख्या —तृतीय मन्त्रसे नवम मन्त्रतक—सात मन्त्रोंमें रथके रूपकसे यह बात समझायी गयी है कि यह अति दुर्लभ मनुष्य-शरीर जिस जीवात्माको परमात्माकी कृपासे मिल गया है, उसे शीघ्र सचेत होकर भगवत्प्राप्तिके मार्गमें लग जाना चाहिये। शरीर अनित्य है, प्रतिक्षण इसका ह्रास हो रहा है। यदि अपने जीवनके इस अमूल्य समयको पशुओंकी भाँति सांसारिक भोगोंके भोगनेमें ही नष्ट कर दिया गया तो फिर बारम्बार जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्रमें घूमनेको बाध्य होना पड़ेगा। जिस महान् कार्यकी सिद्धिके लिये यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला था, वह पूरा नहीं होगा। अतः मनुष्यको भगवान्की कृपासे मिली हुई विवेकशक्तिका सदुपयोग करना चाहिये। संसारकी अनित्यताको और इन
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
आपातरमणीय विषय-जन्ति सुखोंकी यथार्थ दुःखरूपताको समझकर इनके चिन्तन और उपभोगसे सर्वथा उपरत हो जाना चाहिये। केवल शरीरनिर्वाहके उपयुक्त कर्तव्यकर्माका निष्कामभावसे भगवान्की आज्ञा समझकर अनुष्ठान करते हुए अपनी बुद्धिमें भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम तथा उनकी अलौकिक शक्ति और अहैंतुकी दयापर दृढ़ विश्वास उत्पन्न करना चाहिये और सर्वतोभावसे भगवान्पर ही निर्भर हो जाना चाहिये। अपने मनको भगवान्के तत्त्व-चिन्तनमें, वाणीको उनके गुण-वर्णनमें, नेत्रोंको उनके दर्शनमें तथा कानोंको उनके महिमा-श्रवणमें लगाना चाहिये। इस प्रकार सारी इन्द्रियोंका सम्बन्ध भगवान्से जोड़ देना चाहिये। जीवनका एक क्षण भी भगवान्की मधुर स्मृतिके बिना न बीतने पाये। इसीमें मनुष्य-जीवनकी सार्थकता है। जो ऐसा करता है, वह निश्चय ही परब्रह्म पुरुषोत्तमके अचिन्त्य परमपदको प्राप्त होकर सदाके लिये कृतकृत्य हो जाता है॥ १॥
सम्बन्ध— उपर्युक्त वर्णनमें रथके रूपककी कल्पना करके भगवत्प्राप्तिके लिये जो साधन बतलाया गया, उसमें विवेकशील बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके, इन्द्रियोंको विपरीत मार्गसे हटाकर, भगवत्प्राप्तिके मार्गमें लगानेकी बात कही गयी। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि स्वभावसे ही दुष्ट और बलवान् इन्द्रियोंको उनके प्रिय और अभ्यस्त असत्-मार्गसे किस प्रकार हटाया जाय; अतः इस बातका तात्त्विक विवेचन करके इन्द्रियोंको असत्-मार्गसे रोककर भगवान्की ओर लगानेका प्रकार बतलाते हैं—
इन्द्रियेभ्यः परा हार्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेशात्मा महान् परः॥ १०॥
हि इन्द्रियेभ्यः=क्योंकि इन्द्रियोंसे; अर्थाः=शब्दादि विषय; पराः=बलवान् हैं; च=और; अर्थेभ्यः=शब्दादि विषयोंसे; मनः=मन; परम्=पर (प्रबल) है; तु मनसः=और मनसे भी; बुद्धिः=बुद्धि; परा=पर (बलवती) है; बुद्धेः=(तथा) बुद्धिसे; महान् आत्मा=महान् आत्मा (उन सबका स्वामी होनेके कारण); परः=अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान् है॥ १०॥
बल्ली ३ ]
कठोपनिषद्
१२९
व्याख्या —इस मन्त्रमें ‘पर’ शब्दका प्रयोग बलवान्के अर्थमें हुआ है, यह बात समझ लेनी चाहिये; क्योंकि कार्य-कारणभावसे या सूक्ष्मताकी दृष्टिसे इन्द्रियोंको अपेक्षा शब्दादि विषयोंको श्रेष्ठ बतलाना युक्तियुक्त नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार ‘महान्’ विशेषणके सहित, ‘आत्मा’ शब्द भी ‘जीवात्मा’ का वाचक है, ‘महतत्त्व’ का नहीं। जीवात्मा इन सबका स्वामी है, अतः उसके लिये महान् विशेषण देना उचित ही है। यदि महतत्त्वके अर्थमें इसका प्रयोग होता तो ‘आत्मा’ शब्दके प्रयोगकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। दूसरी बात यह भी है कि बुद्धि-तत्त्व ही महतत्त्व है। तत्त्व-विचारकालमें इनमें भेद नहीं माना जाता। इसके सिवा आगे चलकर जहाँ निरोध-(एक तत्त्वको दूसरेमें लीन करने) का प्रसङ्ग है, वहाँ भी बुद्धिका निरोध ‘महान् आत्मा’ में करनेके लिये कहा गया है। इन सब कारणोंसे तथा ब्रह्मसूत्रकारको सांख्यमतानुसार महतत्त्व और अत्यन्त प्रकृतिरूप अर्थ स्वीकार न होनेसे भी यही मानना चाहिये कि यहाँ ‘महान्’ विशेषणके सहित ‘आत्मा’ पदका अर्थ जीवात्मा ही है।* इसलिये मन्त्रका सारांश यह है कि इन्द्रियोंसे अर्थ (विषय) बलवान् हैं। वे साधककी इन्द्रियोंको बलपूर्वक अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं, अतः साधकको उचित है कि इन्द्रियोंको विषयोंसे दूर रखें। विषयोंसे बलवान् मन है। यदि मनकी विषयोंमें आसक्ति न रहे तो इन्द्रियाँ और विषय—ये दोनों साधककी कुछ भी हानि नहीं कर सकते। मनसे भी बुद्धि बलवान् है, अतः बुद्धिके द्वारा विचार करके मनको राग-द्वेषरहित बनाकर अपने वशमें कर लेना चाहिये। एवं बुद्धिसे भी इन सबका स्वामी महान् ‘आत्मा’ बलवान् है। उसकी आज्ञा माननेके लिये ये सभी बाध्य हैं। अतः मनुष्यको आत्मशक्तिका अनुभव करके उसके द्वारा बुद्धि आदि सबको नियन्त्रणमें रखना चाहिये ॥ १० ॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥
- भाष्यकार प्रातःस्मरणीय स्वामी शङ्कराचार्यजीने भी यहाँ ‘महान् आत्मा’ को जीवात्मा ही माना है, महतत्त्व नहीं (देखिये ब्रह्मसूत्र अ० १ पा० ४ सू० १ का शाङ्करभाष्य)।
१३०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
महतः=उस जीवात्मासे; परम्=बलवती है; अव्यक्तम्=भगवान्की अव्यक्त मायाशक्ति; अव्यक्तात्=अव्यक्त मायासे भी; परः=श्रेष्ठ है; पुरुषः=परमपुरुष (स्वयं परमेश्वर); पुरुषात्=परमपुरुष भगवान्से; परम्=श्रेष्ठ और बलवान्; किञ्चित्=कुछ भी; न=नहीं है; सा काष्ठा=वही सबकी परम अवधि (और); सा परा गतिः=वही परम गति है ॥ ११ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें ‘अव्यक्त’ शब्द भगवान्की उस त्रिगुणमयी दैवी मायाशक्तिके लिये प्रयुक्त हुआ है, जो गीतामें दुरत्यय (अतिदुस्तर) बतायी गयी है (गीता ७।१४) तथा जिससे मोहित हुए जीव भगवान्को नहीं जानते (गीता ७।१३)। यही जीवात्मा और परमात्माके बीचमें परदा है, जिसके कारण जीव सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वरको नित्य समीप होनेपर भी नहीं देख पाता। इसे इस प्रकारणमें जीवसे भी बलवान् बतलानेका यह भाव है कि जीव अपनी शक्तिसे इस मायाको नहीं हटा सकता, भगवान्की शरण ग्रहण करनेपर भगवान्की दयाके बलसे ही वह इससे पार हो सकता है (गीता ७।१४)। यहाँ ‘अव्यक्त’ शब्दसे सांख्यमतावलम्बियोंका ‘प्रधान तत्त्व’ नहीं ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि उनके मतमें ‘प्रधान’ स्वतन्त्र है, वह आत्मासे पर नहीं है; तथा आत्माको भोग और मुक्ति—दोनों वस्तुएँ देकर उसका प्रयोजन सिद्ध करनेवाला है। परंतु उपनिषद् और गीतामें इस अव्यक्त प्रकृतिको कहीं भी मुक्ति देनेमें समर्थ नहीं माना है। अतः इस मन्त्रका तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—इन सबपर आत्माका अधिकार है; अतः यह स्वयं उनको वशमें करके भगवान्की ओर बढ़ सकता है। परंतु इस आत्मासे भी बलवान् एक और तत्त्व है, जिसका नाम ‘अव्यक्त’ है। कोई उसे प्रकृति और कोई माया भी कहते हैं। इसीसे सब जीवसमुदाय मोहित होकर उसके वशमें हो रहा है। इसको हटाना जीवके अधिकारकी बात नहीं है; अतः इससे भी बलवान् जो इसके स्वामी परमपुरुष परमेश्वर हैं—जो बल, क्रिया और ज्ञान आदि सभी शक्तियोंकी अन्तिम अवधि और परम आधार हैं—उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। जब वे दया करके इस मायारूप परदेको स्वयं हटा लेंगे, तब उसी क्षण वही भगवान्की प्राप्ति हो जायगी; क्योंकि वे तो सदासे ही सर्वत्र विद्यमान हैं ॥ ११ ॥
वल्ल्बी ३ ]
कठोपनिषद्
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सम्बन्ध—यही भाव अगले मन्त्रमें स्पष्ट करते हैं—
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्था न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥
एषः आत्मा=यह सबका आत्मरूप परमपुरुष; सर्वेषु भूतेषु=समस्त प्राणियोंमें रहता हुआ भी; गूढः=मायाके परदेमें छिपा रहनेके कारण; न प्रकाशते=सबके प्रत्यक्ष नहीं होता; तु सूक्ष्मदर्शिभिः=केवल सूक्ष्मतत्त्वोंको समझनेवाले पुरुषोंद्वारा ही; सूक्ष्मया अग्र्यया बुद्ध्या=अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धिसे; दृश्यते=देखा जाता है ॥ १२ ॥
व्याख्या—ये परब्रह्म पुरुषोत्तमभगवान् सबके अन्तर्धामी हैं, अतः सब प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं, परंतु अपनी मायाके परदेमें छिपे हुए हैं, इस कारण उनके जाननेमें नहीं आते। जिन्होंने भगवान्का आश्रय लेकर अपनी बुद्धिको तीक्ष्ण बना लिया है, वे सूक्ष्मदर्शी ही भगवान्की दयासे सूक्ष्मबुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं ॥ १२ ॥
सम्बन्ध—विवेकशील मनुष्यको भगवान्के शरण होकर किस प्रकार भगवान्की प्राप्तिके लिये साधन करना चाहिये?—इस जिज्ञासापर कहते हैं—
यच्छेद्वाद्भुमन्सी प्राज्ञस्तद्यच्छेञ्ज्ञान आत्मनि।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥
प्राज्ञः=बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि; वाक्=(पहले) वाक् आदि (समस्त इन्द्रियों) को; मनसी=मनमें; यच्छेत्=निरुद्ध करे; तत्=उस मनको; ज्ञाने आत्मनि=ज्ञानस्वरूप बुद्धिमें; यच्छेत्=विलीन करे; ज्ञानम्=ज्ञानस्वरूप बुद्धिको; महति आत्मनि=महान् आत्मामें; नियच्छेत्=विलीन करे; (और); तत्=उसको; शान्ते आत्मनि=शान्तस्वरूप परमपुरुष परमात्मामें; यच्छेत्=विलीन करे ॥ १३ ॥
व्याख्या—बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह पहले तो वाक् आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो—मनमें विषयोंकी स्फुरणा न
१३२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
रहे। जब यह साधन भलीभाँति होने लगे, तब मनको ज्ञानस्वरूप बुद्धिमें विलीन कर दे अर्थात् एकमात्र विज्ञानस्वरूप निश्चयात्मिका बुद्धिकी वृत्तिके सिवा मनकी भिन्न सत्ता न रहे, किसी प्रकारका अन्य कोई भी चिन्तन न रहे। जब यहाँतक दृढ़ अभ्यास हो जाय, तदनन्तर उस ज्ञानस्वरूपा बुद्धिको भी जीवात्माके शुद्ध स्वरूपमें विलीन कर दे। अर्थात् ऐसी स्थितिमें स्थित हो जाय, जहाँ एकमात्र आत्मतत्त्वके सिवा—अपनेसे भिन्न किसी भी वस्तुकी सत्ता या स्मृति नहीं रह जाती। इसके पश्चात् अपने-आपको भी पूर्व निश्चयके अनुसार शान्त आत्मरूप परब्रह्म पुरुषोत्तममें विलीन कर दे॥ १३ ॥
सम्बन्ध— इस प्रकार परमात्माके स्वरूपका वर्णन करके तथा उसकी प्राप्तििका महत्त्व और साधन बतलाकर अब श्रुति मनुष्योंको सावधान करती हुई कहती है—
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरात्रिबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥
उत्तिष्ठत =(हे मनुष्यो!) उठो; जाग्रत =जागो (सावधान हो जाओ और); वरात्र प्राप्य =श्रेष्ठ महापुरुषोंको पाकर—उनके पास जाकर (उनके द्वारा); निबोधत =उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लो (क्योंकि); कवयः =त्रिकालज्ञ ज्ञानीजन; तत् पथः =उस तत्त्वज्ञानके मार्गको; क्षुरस्य =छूरेकी; निशिता दुरत्यया =तीक्ष्ण की हुई दुस्तर; धारा [इब]=धारके सद्गुण; दुर्गम् =दुर्गम (अत्यन्त कठिन); वदन्ति =बतलाते हैं॥ १४ ॥
व्याख्या— हे मनुष्यो! तुम जन्म-जन्मान्तरसे अज्ञाननिद्रामें सो रहे हो। अब तुम्हें परमात्माकी दयासे यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला है। इसे पाकर अब एक क्षण भी प्रमादमें मत खोओ। शीघ्र सावधान हो जाओ। श्रेष्ठ महापुरुषोंके पास जाकर उनके उपदेशद्वारा अपने कल्याणका मार्ग और परमात्माका रहस्य समझ लो। परमात्माका तत्त्व बड़ा गहन है; उसके स्वरूपका ज्ञान, उसकी प्राप्तििका मार्ग महापुरुषोंकी सहायता और परमात्माकी कृपाके बिना वैसा ही दुस्तर है, जिस प्रकार छूरेकी तेज धारपर चलना। ऐसे दुस्तर मार्गसे सुगमतापूर्वक पार
बल्ली ३ ]
कठोपनिषद्
१३३
होनेका सरल उपाय वे अनुभवी महापुरुष ही बता सकते हैं, जो स्वयं इसे पार कर चुके हैं ॥ १४ ॥
सम्बन्ध —ब्रह्मप्राप्तिका मार्ग इतना दुस्तर क्यों है ? इस जिज्ञासापर परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसको जाननेका फल बतलाते हैं—
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाव्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥
यत्=जो; अशब्दम्=शब्दरहित; अस्पर्शम्=स्पर्शरहित; अरूपम्=रूपरहित; अरसम्=रसरहित; च=और; अगन्धवत्=बिना गन्धवाला है; तथा=तथा (जो); अव्ययम्=अविनाशी; नित्यम्=नित्य; अनादि=अनादि; अनन्तम्= अनन्त (असीम); महतः परम्=महान् आत्मासे श्रेष्ठ (एवं); ध्रुवम्=सर्वथा सत्य तत्त्व है; तत्=उस परमात्माको; निचाव्य=जानकर (मनुष्य); मृत्युमुखात्=मृत्युके मुखसे; प्रमुच्यते=सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें उस परब्रह्म परमात्माको प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित बतलाकर यह दिखलाया गया है कि सांसारिक विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे नित्य, अविनाशी, अनादि और असीम हैं। जीवात्मासे भी श्रेष्ठ और सर्वथा सत्य हैं। उन्हें जानकर मनुष्य सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है ॥ १५ ॥
सम्बन्ध —यहाँतक एक अध्यायके उपदेशको पूर्ण करके अब इस आख्यानके श्रवण और वर्णनका माहात्म्य बतलाते हैं—
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तः सनातनम्।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥
मेधावी=बुद्धिमान् मनुष्य; मृत्युप्रोक्तम्=यमराजके द्वारा कहे हुए;
१३४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १
नाचिकेतम्=नचिकेताके; सनातनम्=(इस) सनातन; उपाख्यानम्=उपाख्यानका; उक्त्वा=वर्णन करके; च=और; श्रुत्वा=श्रवण करके; ब्रह्मलोके=ब्रह्मलोकमें; महीयते=महिमान्वित होता है (प्रतिष्ठित होता है) ॥ १६ ॥
व्याख्या— यह जो इस अध्यायमें नचिकेताके प्रति यमराजका उपदेश है, यह कोई नयी बात नहीं है; यह परम्परागत सनातन उपाख्यान है। बुद्धिमान् मनुष्य इसका वर्णन और श्रवण करके ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठावाला होता है॥ १६॥
य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते।
तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥
यः=जो मनुष्य; प्रयतः=सर्वथा शुद्ध होकर; इमम्=इस; परमम् गुह्यम्=परम गुह्य—रहस्यमय प्रसङ्गको; ब्रह्मसंसदि=ब्राह्मणोंकी सभामें; श्रावयेत्=सुनाता है; वा=अथवा; श्राद्धकाले=श्राद्धकालमें; [ श्रावयेत् ]=(भोजन करनेवालोंको) सुनाता है; तत्=(उसका) वह श्रवण करानारूप कर्म; आनन्त्याय कल्पते=अनन्त होनेमें (अविनाशी फल देनेमें) समर्थ होता है; तत् आनन्त्याय कल्पते इति=वह अनन्त होनेमें समर्थ होता है॥ १७॥
व्याख्या— जो मनुष्य विशुद्ध होकर सावधानीसे इस परम रहस्यमय प्रसङ्गको तत्त्वविवेचनपूर्वक भगवत्प्रेमी शुद्धबुद्धि ब्राह्मणोंकी सभामें सुनाता है अथवा श्राद्धकालमें भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंको सुनाता है, उसका वह वर्णनरूप कर्म अनन्त फल देनेवाला होता है, अनन्त होनेमें समर्थ होता है। दुबारा कहकर इस सिद्धान्तकी निश्चितता और अध्यायकी समाप्तिका लक्ष्य कराया गया है॥ १७॥
॥ तृतीय वल्ली समाप्त ॥ ३ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥
ॐ
द्वितीय अध्याय
प्रथम वल्ली
**सम्बन्ध—**तृतीय वल्लीमें यह बतलाया गया कि वे परब्रह्म परमेश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंमें वर्तमान हैं, परंतु सबको दीखते नहीं। कोई विरला ही उन्हें सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा देख सकता है। इसपर यह प्रश्न होता है कि जब वे ब्रह्म अपने ही हृदयमें हैं तब उन्हें सभी लोग अपनी बुद्धिरूप नेत्रोंद्वारा क्यों नहीं देख लेते? कोई विरला ही क्यों देखता है? इसपर कहते हैं—
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू-
स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-
दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥
स्वयम्भूः=स्वयं प्रकट होनेवाले परमेश्वरने; खानि=समस्त इन्द्रियोंके द्वार; पराञ्चि=बाहरकी ओर जानेवाले ही; व्यतृणत्=बनाये हैं; तस्मात्=इसलिये (मनुष्य इन्द्रियोंके द्वारा प्रायः); पराङ्=बाहरकी वस्तुओंको ही; पश्यति=देखता है; अन्तरात्मन्=अन्तरात्माको; न=नहीं; कश्चित् धीरः=किसी (भाग्यशाली) बुद्धिमान् मनुष्यने ही; अमृतत्वम्=अमर पदको; इच्छन्=पानेकी इच्छा करके; आवृत्तचक्षुः=चक्षु आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंकी ओरसे लौटाकर; प्रत्यगात्मानम्=अन्तरात्माको; ऐक्षत्=देखा है॥ १॥
**व्याख्या—**शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध—इन्द्रियोंके ये सभी स्थूल विषय बाहर हैं। इसका यथार्थ ज्ञान करानेके लिये इन्द्रियोंकी रचना हुई है; क्योंकि इनका ज्ञान हुए बिना न तो मनुष्य किसी विषयके स्वरूप और गुणको ही जान सकता है और न उसका यथायोग्य त्याग एवं ग्रहण करके भगवान्के इन्द्रिय-
१३६ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय २
निर्माणके उद्देश्यको सिद्ध करनेके लिये उनके द्वारा नवीन शुभकर्मोंका सम्पादन ही कर सकता है। इन्द्रिय-निर्माण इसीलिये है कि मनुष्य इन्द्रियोंके द्वारा स्वास्थ्यकर, सुबुद्धिदायक, विशुद्ध विषयोंका ग्रहण करके सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्माकी ओर अग्रसर हो। इसीलिये स्वयंभूभगवान्ने इन्द्रियोंका मुख बाहरकी ओर बनाया, परंतु विवेकके अभावसे अधिकांश मनुष्य इस बातको नहीं जानते और विषयासक्तिवश उन्मत्तकी भाँति आपातखमणीय परिणाममें भगवान्से हटाकर दुःखशोकमय नरकोंमें पहुँचानेवाले अशुद्ध विषयभोगोंमें ही रचे-पचे रहते हैं। वे अन्तर्यामी परमात्माकी ओर देखते ही नहीं। कोई विरला ही बुद्धिमान् मनुष्य ऐसा होता है जो सत्सङ्ग, स्वाध्याय तथा भगवत्कृपासे अशुद्ध विषयभोगोंकी परिणामदुःखताको जानकर अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे लौटाकर, उन्हें भगवत्सम्बन्धी विषयोंमें लगाकर अन्तरात्माको—अन्तर्यामी परमात्माको देखता है॥ १॥
पराचः कामाननुयन्ति बाला- स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्। अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥
[ ये ] बालाः=जो मूर्ख; पराचः कामान्=बाह्य भोगोंका; अनुयन्ति=अनुसरण करते हैं (उन्हींमें रचे-पचे रहते हैं); ते=वे; विततस्य=सर्वत्र फैले हुए; मृत्योः=मृत्युके; पाशम्=बन्धनमें; यन्ति=पड़ते हैं; अथ=किंतु; धीराः=बुद्धिमान् मनुष्य; ध्रुवम्=नित्य; अमृतत्वम्=अमरपदको; विदित्वा=विवेकद्वारा जानकर; इह=इस जगत्में; अध्रुवेषु=अनित्य भोगोंमेंसे किसीको (भी); न प्रार्थयन्ते=नहीं चाहते ॥ २॥
व्याख्या— जो बाह्य विषयोंकी चमक-दमक और आपातरमणीयताको देखकर उनमें आसक्त हुए रहते हैं और उनके पाने तथा भोगनेमें ही दुर्लभ एवं अमूल्य मनुष्य-जीवनको खो देते हैं, वे मूर्ख हैं। निश्चय ही वे