भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

१७२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ प्रश्न १ ]

(तथा) बृहस्पतिः=(बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी; नः=हमारे लिये; स्वस्ति [ दधातु ]=कल्याणकी पुष्टि करें; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=परमात्मन्! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो।

व्याख्या —गुरुके यहाँ अध्ययन करनेवाले शिष्य अपने गुरु, सहपाठी तथा मानवमात्रका कल्याण-चिन्तन करते हुए देवताओंसे प्रार्थना करते हैं कि ‘हे देवगण! हम अपने कानोंसे शुभ—कल्याणकारी वचन ही सुनें। निन्दा, चुगली, गाली या दूसरी-दूसरी पापकी बातें हमारे कानोंमें न पड़ें और हमारा अपना जीवन यजन-परायण हो—हम सदा भगवान्की आराधनामें ही लगे रहें। न केवल कानोंसे सुनें, नेत्रोंसे भी हम सदा कल्याणका ही दर्शन करें। किसी अमङ्गलकारी अथवा पतनकी ओर ले जानेवाले दृश्योंकी ओर हमारी दृष्टिका आकर्षण कभी न हो। हमारे शरीर, हमारा एक-एक अवयव सुदृढ़ एवं सुपुष्ट हो—वह भी इसलिये कि हम उनके द्वारा भगवान्का स्तवन करते रहें। हमारी आयु भोग-विलास या प्रमादमें न बीते। हमें ऐसी आयु मिले, जो भगवान्के कार्यमें आ सके। [देवता हमारी प्रत्येक इन्द्रियमें व्याप्त रहकर उसका संरक्षण और संचालन करते हैं। उनके अनुकूल रहनेसे हमारी इन्द्रियाँ सुगमतापूर्वक सन्मार्गमें लगी रह सकती हैं, अतः उनसे प्रार्थना करनी उचित ही है।] जिनका सुयश सब ओर फैला है, वे देवराज इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनिवारक ताक्ष्य (गरुड) और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति—ये सभी देवता भगवान्की दिव्य विभूतियाँ हैं। ये सदा हमारे कल्याणका पोषण करें। इनकी कृपासे हमारे सहित प्राणिमात्रका कल्याण होता रहे। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—सभी प्रकारके तापोंकी शान्ति हो।

प्रथम प्रश्न

ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैव्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भीः कबन्धी कात्यायनस्ते ह्येते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्याणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७३


ॐ=ॐ इस परमात्माके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; भारद्वाजः सुकेशा=भरद्वाज-पुत्र सुकेशा; च शैब्यः सत्यकामः=और शिविकुमार सत्यकाम; च गार्ग्यः सौर्यायणी=तथा गर्गगोत्रमें उत्पन्न सौर्यायणी; च कौसल्यः आश्वलायनः=एवं कोसलदेशीय आश्वलायन; च वैदर्भिः भार्गवः=तथा विदर्भनिवासी भार्गव; [ ] कात्यायनः कबन्धी=और कत्य ऋषिका प्रपौत्र कबन्धी; ते एते ह ब्रह्मपराः=वे ये छः प्रसिद्ध ऋषि, जो वेदपरायण (और); ब्रह्मनिष्ठाः=वेदमें निष्ठा रखनेवाले थे; ते ह=वे सब-के-सब; परम् ब्रह्म=परब्रह्मकी; अन्वेषमाणाः=खोज करते हुए; एषः ह वै तत् सर्वम् वक्ष्यति इति=यह समझकर कि ये (पिप्पलाद ऋषि) निश्चय ही उस ब्रह्मके विषयमें सारी बातें बतायेंगे; समित्पाणयः=हाथमें समिधा लिये हुए; भगवन्तम् पिप्पलादम् उपसन्नाः=भगवान् पिप्पलाद ऋषिके पास गये॥ १॥

व्याख्या—ओंकारस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्माका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है। प्रसिद्ध है कि भरद्वाजके पुत्र सुकेशा, शिविकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्रमें उत्पन्न सौर्यायणी, कोसलदेश-निवासी आश्वलायन, विदर्भदेशीय भार्गव और कत्यके प्रपौत्र कबन्धी—ये वेदाभ्यासके परायण और ब्रह्मनिष्ठ अर्थात् श्रद्धापूर्वक वेदानुकूल आचरण करनेवाले थे। एक बार ये छहों ऋषि परब्रह्म परमेश्वरकी जिज्ञासासे एक साथ बाहर निकले। इन्होंने सुना था कि पिप्पलाद ऋषि इस विषयको विशेषरूपसे जानते हैं; अतः यह सोचकर कि ‘परब्रह्मके सम्बन्धमें हम जो कुछ जानना चाहते हैं, वह सब वे हमें बता देंगे’ वे लोग जिज्ञासुके वेशमें हाथमें समिधा लिये हुए महर्षि पिप्पलादके पास गये॥ १॥

तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥

तान् सः ह=उन सुकेशा आदि ऋषियोंसे वे प्रसिद्ध; ऋषिः उवाच=(पिप्पलाद) ऋषि बोले—; भूयः एव=तुमलोग पुनः; श्रद्धया=श्रद्धाके साथ;

१७४ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न १

ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए; (और) तपसा=तपस्यापूर्वक; संवत्सरम्=एक वर्षतक (यहाँ); संवत्स्यथ=भलीभाँति निवास करो; यथाकामम्=(उसके बाद) अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार; प्रश्नान् पृच्छत=प्रश्न पूछना; यदि विज्ञास्यामः=यदि (तुम्हारी पूछी हुई बातोंको) मैं जानता होऊँगा; सर्वम्=तो निःसंदेह वे सब बातें; वः वक्ष्यामः इति=तुमलोगोंको बताऊँगा॥ २॥

**व्याख्या—**उपर्युक्त छहों ऋषियोंको परब्रह्मकी जिज्ञासासे अपने पास आया देखकर महर्षि पिप्पलादने उनसे कहा—तुमलोग तपस्वी हो, तुमने ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़े हैं; तथापि मेरे आश्रममें रहकर पुनः एक वर्षतक श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए तपश्चर्या करो। उसके बाद तुमलोग जो चाहो, मुझसे प्रश्न करना। यदि तुम्हारे पूछे हुए विषयका मुझे ज्ञान होगा तो निस्संदेह तुम्हें सब बातें भलीभाँति समझाकर बताऊँगा॥ २॥

**सम्बन्ध—**ऋषिके आज्ञानुसार सबने श्रद्धा, ब्रह्मचर्य और तपस्याके साथ विधिपूर्वक एक वर्षतक वहाँ निवास किया।

अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ।
भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति॥ ३॥

अथ=तदनन्तर (उनमेंसे); कात्यायनः कबन्धी=कत्य ऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने; उपेत्य=(पिप्पलाद ऋषिके) पास जाकर; पप्रच्छ=पूछा—; भगवन्=भगवन्!; कुतः वै=किस प्रसिद्ध और सुनिश्चित कारणविशेषसे; इमाः प्रजाः=यह सम्पूर्ण प्रजा; प्रजायन्ते=नाना रूपोंमें उत्पन्न होती है; इति=यह मेरा प्रश्न है॥ ३॥

**व्याख्या—**महर्षि पिप्पलादकी आज्ञा पाकर वे लोग श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वहीं तपश्चर्या करने लगे। महर्षिकी देख-रेखमें संयमपूर्वक रहकर एक वर्षतक उन्होंने त्यागमय जीवन बिताया। उसके बाद वे सब पुनः पिप्पलाद ऋषिके पास गये तथा उनमेंसे सर्वप्रथम कत्य ऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने श्रद्धा और विनयपूर्वक पूछा—'भगवन्! जिससे ये सम्पूर्ण चराचर जीव नाना रूपोंमें उत्पन्न होते हैं, जो इनका सुनिश्चित परम कारण है, वह कौन है?'॥ ३॥

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७५


तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥

तस्मै सः ह उवाच=उससे वे प्रसिद्ध महर्षि बोले—; वै प्रजाकामः=निश्चय ही प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छावाला (जो); प्रजापतिः=प्रजापति है; सः तपः अतप्यत=उसने तप किया; सः तपः तप्त्वा=उसने तपस्या करके (जब सृष्टिका आरम्भ किया, उस समय पहले); सः=उसने; रयिम् च=एक तो रयि तथा; प्राणम् च=दूसरा प्राण भी; इति मिथुनम्=यह जोड़ा; उत्पादयते=उत्पन्न किया; एतौ मे=(इन्हें उत्पन्न करनेका उद्देश्य यह था कि) ये दोनों मेरी; बहुधा=नाना प्रकारकी; प्रजाः=प्रजाओंको; करिष्यतः इति=उत्पन्न करेंगे ॥ ४ ॥

व्याख्या—कबन्धी ऋषिका यह प्रश्न सुनकर महर्षि पिप्पलाद बोले—हे कात्यायन ! यह बात वेदोंमें प्रसिद्ध है कि सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी परमेश्वरको सृष्टिके आदिमें जब प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने संकल्पस्वरूप तप किया। तपसे उन्होंने सर्वप्रथम रयि और प्राण—इन दोनोंका एक जोड़ा उत्पन्न किया। उसे उत्पन्न करनेका उद्देश्य यह था कि ये दोनों मिलकर मेरे लिये नाना प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न करेंगे। इस मन्त्रमें सबको जीवन प्रदान करनेवाली जो समष्टि जीवनी शक्ति है, उसे ही 'प्राण' नाम दिया गया है। इस जीवनी शक्तिसे ही प्रकृतिके स्थूल स्वरूपमें—समस्त पदार्थोंमें जीवन, स्थिति और यथायोग्य सामञ्जस्य आता है एवं स्थूल भूत-समुदायका नाम 'रयि' रखा गया है, जो प्राणरूप जीवनी शक्तिसे अनुप्राणित होकर कार्यक्षम होता है। प्राण चेतना है, रयि शक्ति और आकृति है। प्राण और रयिके संयोगसे ही सृष्टिका समस्त कार्य सम्पन्न होता है। इन्हींको अन्यत्र अग्नि और सोमके नामसे भी कहा गया है॥ ४॥

आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ ५ ॥

१७६ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न १

ह=यह निश्चय है कि; आदित्यः वै=सूर्य ही; प्राणः=प्राण है (और); चन्द्रमाः एव=चन्द्रमा ही; रयिः=रयि है; यत् मूर्तम् च=जो कुछ आकारवाला है (पृथ्वी, जल और तेज); अमूर्तम् च=और जो आकाररहित है (आकाश और वायु); एतत् सर्वम् वै=यह सभी कुछ; रयिः=रयि है; तस्मात्=इसलिये; मूर्तिः एव=मूर्तमात्र ही अर्थात् देखने तथा जाननेमें आनेवाली सभी वस्तुएँ; रयिः=रयि हैं॥ ५॥

व्याख्या— इस मन्त्रमें उपर्युक्त प्राण और रयिका स्वरूप समझाया गया है। पिप्पलाद कहते हैं कि यह दीखनेवाला सम्पूर्ण जगत् प्राण और रयि—इन दोनों तत्त्वोंके संयोग या सम्मिश्रणसे बना है; इसलिये यद्यपि इन्हें पृथक्-पृथक् करके नहीं बताया जा सकता, तथापि तुम इस प्रकार समझो—यह सूर्य, जो हमें प्रत्यक्ष दिखलायी देता है, यही प्राण है; क्योंकि इसीमें सबको जीवन प्रदान करनेवाली चेतना-शक्तिकी प्रधानता और अधिकता है। यह सूर्य उस सूक्ष्म जीवनी शक्तिका घनीभूत स्वरूप है। उसी प्रकार यह चन्द्रमा ही ‘रयि’ है; क्योंकि इसमें स्थूल तत्त्वोंको पुष्ट करनेवाली भूत तन्मात्राओंकी ही अधिकता है। समस्त प्राणियोंके स्थूल शरीरोंका पोषण इस चन्द्रमाकी शक्तिको पाकर ही होता है। हमारे शरीरोंमें ये दोनों शक्तियाँ प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गमें व्याप्त हैं। उनमें जीवनी शक्तिका सम्बन्ध सूर्यसे है और मांस, मेद आदि स्थूल तत्त्वोंका सम्बन्ध चन्द्रमासे है॥ ५॥

अथादित्य उदयन्त्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते। यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६॥

अथ=रात्रिके अनन्तर; उदयन्=उदय होता हुआ; आदित्यः=सूर्य; यत् प्राचीम् दिशम्=जो पूर्व दिशामें; प्रविशति=प्रवेश करता है; तेन प्राच्यान् प्राणान्=उससे पूर्व दिशाके प्राणोंको; रश्मिषु=अपनी किरणोंमें; संनिधत्ते=धारण करता है (उसी

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७७

प्रकार); यत् दक्षिणाम्=जो दक्षिण दिशाको; यत् प्रतीचीम्=जो पश्चिम दिशाको; यत् उदीचीम्=जो उत्तर दिशाको; यत् अधः=जो नीचेके लोकोंको; यत् ऊर्ध्वम्=जो ऊपरके लोकोंको; यत् अन्तरा दिशः=जो दिशाओंके बीचके भागों (कोणों) को (और); यत् सर्वम्=जो अन्य सबको; प्रकाशयति=प्रकाशित करता है; तेन सर्वान् प्राणान्=उससे समस्त प्राणोंको अर्थात् सम्पूर्ण जगत्के प्राणोंको; रश्मिषु संनिधत्ते=अपनी किरणोंमें धारण करता है॥ ६॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें जो जीवनी शक्ति है, उसके साथ सूर्यका सम्बन्ध दिखलाया गया है। भाव यह है कि रात्रिके बाद जब सूर्य उदय होकर पूर्वदिशामें अपना प्रकाश फैलाता है, उस समय वहाँके प्राणियोंके प्राणोंको अपनी किरणोंमें धारण करता है अर्थात् उनकी जीवनी शक्तिका सूर्यकी किरणोंसे सम्बन्ध होकर उसमें नवीन स्फूर्ति आ जाती है। उसी प्रकार जिस समय जिस दिशामें जहाँ-जहाँ सूर्य अपना प्रकाश फैलाता है, वहाँ-वहाँके प्राणियोंको स्फूर्ति देता रहता है; अतः सूर्य ही समस्त प्राणियोंका प्राण है॥ ६॥

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते। तदेतदृचाभ्युक्तम्॥ ७॥

सः एषः=वह यह सूर्य ही; उदयते=उदय होता है; वैश्वानरः अग्निः=(जो कि) वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) (और); विश्वरूपः प्राणः=विश्वरूप प्राण है; तत् एतत्=वही यह बात; ऋचा=ऋचाद्वारा; अभ्युक्तम्=आगे कही गयी है॥ ७॥

**व्याख्या—**प्राणियोंके शरीरमें जो वैश्वानर नामसे कही जानेवाली जठराग्नि है, जिससे अन्नका पाचन होता है (गीता १५। १४), वह सूर्यका ही अंश है; अतः सूर्य ही है। तथा जो प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँच रूपोंमें विभक्त प्राण है, वह भी इस उदय होनेवाले सूर्यका ही अंश है; अतः सूर्य ही है। यही बात अगली ऋचाद्वारा समझायी गयी है॥ ७॥

१७८ईशादि नौ उपनिषद्[ प्रश्न १

$$\begin{aligned} \text{विश्वरूपं} & \quad\quad \text{हरिणं} \quad\quad \text{जातवेदसं} \ & \text{परायणं} \quad\quad \text{ज्योतिरेकं} \quad\quad \text{तपन्तम्।} \ \text{सहस्ररश्मिः} & \quad\quad \text{शतधा} \quad\quad \text{वर्तमानः} \ & \text{प्राणः} \quad\quad \text{प्रजानामुदयत्येष} \quad\quad \text{सूर्यः॥ ८॥} \end{aligned}$$

विश्वरूपम्=सम्पूर्ण रूपोंके केन्द्र; जातवेदसम्=सर्वज्ञ; परायणम्=सर्वाधार; ज्योतिः=प्रकाशमय; तपन्तम्=तपते हुए; हरिणम्=किरणोंवाले सूर्यको; एकम्=अद्वितीय (बतलाते हैं); एषः=यह; सहस्ररश्मिः=सहस्रों किरणोंवाला; सूर्यः=सूर्य; शतधा वर्तमानः=सैकड़ों प्रकारसे वर्तता हुआ; प्रजानाम्=समस्त जीवोंका; प्राणः=प्राण (जीवनदाता) होकर; उदयति=उदय होता है॥ ८॥

**व्याख्या—**इस सूर्यके तत्त्वको जाननेवालोंका कहना है कि यह किरण-जालसे मण्डित एवं प्रकाशमय, तपता हुआ सूर्य विश्वके समस्त रूपोंका केन्द्र है। सभी रूप (रंग और आकृतियाँ) सूर्यसे उत्पन्न और प्रकाशित होते हैं। यह सविता ही सबका उत्पत्तिस्थान है और यही सबकी जीवन-ज्योतिका मूल स्रोत है। यह सर्वज्ञ और सर्वाधार है, वैश्वानर अग्नि और प्राण-शक्तिके रूपमें सर्वत्र व्याप्त है और सबको धारण किये हुए है। समस्त जगत्‌का प्राणरूप सूर्य एक ही है—इसके समान इस जगत्‌में दूसरी कोई भी जीवनी शक्ति नहीं है। यह सहस्रों किरणोंवाला सूर्य हमारे सैकड़ों प्रकारके व्यवहार सिद्ध करता हुआ उदय होता है। जगत्‌में उष्णता और प्रकाश फैलाना, सबको जीवन प्रदान करना, ऋतुओंका परिवर्तन करना आदि हमारी सैकड़ों प्रकारकी आवश्यकताओंको पूर्ण करता हुआ सम्पूर्ण सृष्टिका जीवनदाता प्राण ही सूर्यके रूपमें उदित होता है॥ ८॥

**सम्बन्ध—**इस प्रकार यहाँतक कात्यायन कबन्धीके प्रश्नानुसार संक्षेपमें यह बताया गया कि उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरसे ही उसके संकल्पद्वारा प्राण और रयिके संयोगसे इस सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति आदि होती है। अब इस प्राणशक्ति और रयिशक्तिके सम्बन्धसे परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार और उसका फल बतलानेके लिये दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं—

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७९

संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च तद्ये ह वै तदिष्टাপૂર્ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ९ ॥

संवत्सरः वै=संवत्सर (बारह महीनोंवाला काल) ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; तस्य अयने=उसके दो अयन हैं—; दक्षिणम् च=एक दक्षिण और; उत्तरम् च=दूसरा उत्तर; तत् ये ह=वहाँ मनुष्योंमें जो लोग निश्चयपूर्वक; तत् इष्टापूर्ते वै=(केवल) उन इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही; कृतम् इति=करनेयोग्य कर्म मानकर (सकाम भावसे); उपासते=उनकी उपासना करते हैं (उन्हींके अनुष्ठानमें लगे रहते हैं); ते चान्द्रमसम्=वे चन्द्रमाके; लोकम् एव=लोकको ही; अभिजयन्ते=जीतते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं (और); ते एव=वे ही; पुनः आवर्तन्ते=पुनः (वहाँसे) लौटकर आते हैं; तस्मात् एते=इसलिये ये; प्रजाकामाः ऋषयः=संतानकी कामनावाले ऋषिगण; दक्षिणम् प्रतिपद्यन्ते=दक्षिण (मार्ग)-को प्राप्त होते हैं; ह एषः वै रयिः=निस्संदेह यही वह रयि है; यः पितृयाणः=जो 'पितृयान' नामक मार्ग है॥ ९॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें संवत्सरको परमात्माका प्रतीक बनाकर उसके अङ्गरूप रयिस्थानीय भोग्य-पदार्थोंके उद्देश्यसे की जानेवाली उपासना और उसका फल बताते हैं। भाव यह है कि बारह महीनोंका यह संवत्सररूप काल ही मानो सृष्टिके स्वामी परमेश्वरका स्वरूप है। इसके दो अयन हैं— दक्षिण और उत्तर। दक्षिणायनके जो छः महीने हैं, जिनमें सूर्य दक्षिणकी ओर घूमता है—ये मानो इसके दक्षिण अङ्ग हैं और उत्तरायणके छः महीने ही उत्तर अङ्ग हैं। उनमें उत्तर अङ्ग तो प्राण है, इस विश्वके आत्मारूप उस परमेश्वरका सर्वान्तर्यामी स्वरूप है और दक्षिण अङ्ग रयि अर्थात् उसका बाह्य भोग्यस्वरूप है। इस जगत्में जो संतानकी कामनावाले ऋषि स्वर्गादि सांसारिक भोगोंमें आसक्त हैं, वे यज्ञादिद्वारा देवताओंका पूजन करना, ब्राह्मण

१८० ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न १


एवं श्रेष्ठ पुरुषोंका धनादिसे सत्कार करना, दुःखी प्राणियोंकी सेवा करना आदि इष्टकर्म तथा कुँआ, बावली, तालाब, बगीचा, धर्मशाला, विद्यालय, औषधालय, पुस्तकालय आदि लोकोपकारी चिरस्थायी स्मारकोंकी स्थापना करना आदि पूर्तकर्मोंको उत्कृष्ट कर्तव्य समझते हैं और इनके फलस्वरूप इस लोक तथा परलोकके भोगोंके उद्देश्यसे इनकी उपासना अर्थात् विधिवत् अनुष्ठान करते हैं; यह उस संवत्सररूप परमेश्वरके दक्षिण अङ्गकी उपासना है। इसीको ईशावास्य-उपनिषद्में असम्भूतिकी उपासनाके नामसे देव, पितर, मनुष्य आदि शरीरोंकी सेवा बताया है। इसके प्रभावसे वे चन्द्रलोकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अपने कर्मोंका फल भोगकर पुनः इस लोकमें लौट आते हैं; यही पितृयाण मार्ग है॥ ९॥

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्या-
दित्यमभिजproperty.. wait: दित्यमभिजयन्ते। एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायण-
मेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः॥ १०॥

अथ=किंतु (जो); तपसा=तपस्याके साथ; ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यपूर्वक (और); श्रद्धया=श्रद्धासे युक्त होकर; विद्यया=अध्यात्मविद्याके द्वारा, आत्मानम्=परमात्माकी; अन्विष्य=खोज करके (जीवन सार्थक करते हैं, वे); उत्तरेण=उत्तरायण-मार्गसे; आदित्यम्=सूर्यलोकको; अभिजयन्ते=जीत लेते हैं (प्राप्त करते हैं); एतत् वै=यह (सूर्य) ही; प्राणानाम्=प्राणोंका; आयतनम्=केन्द्र है; एतत् अमृतम्=यह अमृत (अविनाशी) (और); अभयम्=निर्भय पद है; एतत् परायणम्=यह परमगति है; एतस्मात्=इससे; न पुनः आवर्तन्ते=पुनः लौटकर नहीं आते; इति एषः=इस प्रकार यह; निरोधः=निरोध (पुनरावृत्तिका निवारक) है; तत् एषः=(इस बातको स्पष्ट करनेवाला) यह (अगला); श्लोकः=श्लोक है॥ १०॥

**व्याख्या—**उपर्युक्त सकाम उपासकोंसे भिन्न जो कल्याणकामी साधक हैं, वे इन सांसारिक भोगोंकी अनित्यता और दुःखरूपताको समझकर इनसे सर्वथा विरक्त हो जाते हैं। वे श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए संयमके

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १८१

साथ त्यागमय जीवन बिताते हैं और अध्यात्मविद्याके द्वारा अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले किसी भी अनुकूल साधनद्वारा सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरकी निष्काम उपासना करते हैं। यह मानो उस संवत्सररूप प्रजापतिके उत्तर अङ्गकी उपासना है। इसको ईशावास्य-उपनिषद्में सम्भूतिकी उपासना कहा है। इसके उपासक उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकमें जाकर सूर्यके आत्मारूप परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो जाते हैं। यह सूर्य ही समस्त जगत्के प्राणोंका केन्द्र है। यही अमृत—अविनाशी और निर्भय पद है। यही परम गति है। इसे प्राप्त हुए महापुरुष फिर लौटकर नहीं आते। यह निरोध अर्थात् पुनर्जन्मको रोकनेवाला आत्यन्तिक प्रलय है। इस मन्त्रमें सूर्यको परमेश्वरका स्वरूप मानकर ही उपर्युक्त महिमा कही गयी है। इसी बातको अगले मन्त्रमें स्पष्ट किया गया है॥ १०॥

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्।
अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥*

(कितने ही लोग तो इस सूर्यको); **पञ्चपादम्=**पाँच चरणोंवाला; **पितरम्=**सबका पिता; **द्वादशाकृतिम्=**बारह आकृतियोंवाला; **पुरीषिणम्=**जलका उत्पादक; दिवः परे अर्धे=(और) स्वर्गलोकसे भी ऊपरके स्थानमें (स्थित); **आहुः=**बतलाते हैं; **अथ इमे=**तथा ये; **अन्ये उ=**दूसरे कितने ही लोग; **इति आहुः=**ऐसा बतलाते हैं (कि यह); **परे=**विशुद्ध; **सप्तचक्रे=**सात पहियोंवाले (और); **षडरे=**छः अरोंवाले (रथमें); **अर्पितम्=**बैठा हुआ (एवं); **विचक्षणम्=**सबको भलीभाँति जाननेवाला है॥ ११॥

**व्याख्या—**परब्रह्म परमेश्वरके प्रत्यक्ष—दृष्टिगोचरस्वरूप इस सूर्यके विषयमें कितने ही तत्त्ववेत्ता तो यों कहते हैं कि इसके पाँच पैर हैं। अर्थात् छः ऋतुओंमेंसे हेमन्त और शिशिर—इन दो ऋतुओंकी एकता करके पाँच ऋतुओंको वे इस


* यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड ९ सूक्त १४ का बारहवाँ तथा ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त १६४ का बारहवाँ है।

१८२ईशादि नौ उपनिषद्[ प्रश्न १

सूर्यके पाँच चरण बतलाते हैं; तथा यह भी कहते हैं कि बारह महीने ही इसकी बारह आकृतियाँ अर्थात् बारह शरीर हैं। इसका स्थान स्वर्गलोकसे भी ऊँचा है। स्वर्गलोक भी इसीके आलोकसे प्रकाशित है। इस लोकमें जो जल बरसता है, उस जलकी उत्पत्ति इसीसे होती है। अतः सबको जलरूप जीवन प्रदान करनेवाला होनेसे यह सबका पिता है। दूसरे ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि लाल, पीले आदि सात रंगोंकी किरणोंसे युक्त तथा वसन्त आदि छः ऋतुओंके हेतुभूत इस विशुद्ध प्रकाशमय सूर्यमण्डलमें— जिसे सात चक्र एवं छः अरोंवाला रथ कहा गया है—बैठा हुआ इसका आत्मारूप, सबको भलीभाँति जाननेवाला सर्वज्ञ परमेश्वर ही उपास्य है। यह स्थूल नेत्रोंसे दिखायी देनेवाला सूर्यमण्डल उसका शरीर है। इसलिये यह उसीकी महिमा है॥ ११॥

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥

मासः वै=महीना ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; तस्य=उसका; कृष्णपक्षः एव=कृष्णपक्ष ही; रयिः=रयि है (और); शुक्लः प्राणः=शुक्लपक्ष प्राण है; तस्मात्=इसलिये; एते ऋषयः=ये (कल्याणकामी) ऋषिगण; शुक्ले=शुक्लपक्षमें (निष्कामभावसे); इष्टम्=यज्ञादि कर्तव्य-कर्म; कुर्वन्ति=किया करते हैं (तथा); इतरे=दूसरे (जो सांसारिक भोगोंको चाहते हैं); इतरस्मिन्=दूसरे पक्षमें—कृष्णपक्षमें (सकामभावसे यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान किया करते हैं) ॥ १२ ॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें महीनेको प्रजापति परमेश्वरका रूप देकर कर्मोंद्वारा उसकी उपासना करनेका रहस्य बताया गया है। भाव यह है कि प्रत्येक महीना ही मानो प्रजापति है, उसमें कृष्णपक्षके पंद्रह दिन तो उस परमात्माका दाहिना अङ्ग हैं; इसे रयि (स्थूल भूत-समुदायका कारण) समझना चाहिये। यह उस परमेश्वरका शक्तिस्वरूप भोगमय रूप है और शुक्लपक्षके पंद्रह दिन ही मानो उत्तर अङ्ग हैं। यही प्राण अर्थात् सबको जीवन प्रदान करनेवाले परमात्माका सर्वान्तर्यामी रूप है। इसलिये जो कल्याणकामी ऋषि हैं, अर्थात्

प्रश्न १ ]

प्रश्नोपनिषद्

१८३

जो रयिस्थानीय भोग-पदार्थोंसे विरक्त होकर प्राणस्थानीय सर्वात्मरूप परब्रह्मको चाहनेवाले हैं, वे अपने समस्त शुभकर्मोंको शुक्लपक्षमें करते हैं, अर्थात् शुक्लपक्षस्थानीय प्राणाधार परब्रह्म परमेश्वरके अर्पण करके कहते हैं—स्वयं उसका कोई फल नहीं चाहते; यही गीतोक्त कर्मयोग है। इनसे भिन्न जो भोगासक्त मनुष्य हैं, वे कृष्णपक्षमें अर्थात् कृष्णपक्षस्थानीय स्थूल पदार्थोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे सब प्रकारके कर्म किया करते हैं। इनका वर्णन गीतामें ‘स्वर्गपराः’ के नामसे हुआ है (गीता २। ४२—४४) ॥ १२ ॥

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यज्ञात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥

अहोरात्रः वै=दिन और रातका जोड़ा ही; प्रजापतिः =प्रजापति है; तस्य =उसका; अहः एव =दिन ही; प्राणः =प्राण है (और); रात्रिः एव =रात्रि ही; रयिः =रयि है; ये दिवा =(अतः) जो दिनमें; रत्या संयुज्यन्ते =स्त्री-सहवास करते हैं; एते =ये लोग; वै प्राणम् =सचमुच अपने प्राणोंको ही; प्रस्कन्दन्ति =क्षीण करते हैं (तथा); यत् रात्रौ =जो रात्रिमें; रत्या संयुज्यन्ते =स्त्री-सहवास करता है; तत् ब्रह्मचर्यम् एव =वह ब्रह्मचर्य ही है ॥ १३ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें दिन और रात्रिरूप चौबीस घंटोंके कालरूपमें परमेश्वरके स्वरूपकी कल्पना करके जीवनोंपयोगी कर्मोंका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि ये दिन और रात मिलकर जगत्पति परमेश्वरका पूर्णरूप हैं। उसका यह दिन तो मानो प्राण अर्थात् सबको जीवन देनेवाला प्रकाशमय विशुद्ध स्वरूप है और रात्रि ही भोगरूप रयि है। अतः जो मनुष्य दिनमें स्त्री-प्रसंग करते हैं अर्थात् परमात्माके विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रकाशमय मार्गमें चलना प्रारम्भ करके भी स्त्री-प्रसंग आदि विलासमें आसक्त हो जाते हैं, वे अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इस अमूल्य जीवनको व्यर्थ खो देते हैं। उनसे भिन्न जो सांसारिक उन्नति चाहनेवाले हैं, वे यदि शास्त्रके

१८४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ प्रश्न १ ]

नियमानुसार ऋतुकालमें रात्रिके समय नियमानुकूल स्त्री-प्रसङ्ग करते हैं तो वे शास्त्रकी आज्ञाका पालन करनेके कारण ब्रह्मचारीके तुल्य ही हैं। लौकिक दृष्टिसे यों कह सकते हैं कि इस मन्त्रमें गृहस्थोंको दिनमें स्त्री-प्रसंग कदापि न करनेका और विहित रात्रियोंमें शास्त्रानुसार नियमित और संयमित-रूपमें केवल संतानकी इच्छासे स्त्री-सहवास करनेका उपदेश दिया गया है। तभी वह ब्रह्मचर्यकी गणनामें आ सकता है* ॥ १३ ॥

अत्रं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥

अत्रम् वै=अत्र ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; ह ततः वै=क्योंकि उसीसे; तत् रेतः=वह वीर्य (उत्पन्न होता है); तस्मात्=उस वीर्यसे; इमाः प्रजाः=ये सम्पूर्ण चराचर प्राणी; प्रजायन्ते इति=उत्पन्न होते हैं ॥ १४ ॥

व्याख्या— इस मन्त्रमें अत्रको प्रजापतिका स्वरूप बताकर अत्रकी महिमा बतलाते हुए कहते हैं कि यह सब प्राणियोंका आहाररूप अत्र ही प्रजापति है; क्योंकि इसीसे वीर्य उत्पन्न होता है और वीर्यसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। इस कारण इस अत्रको भी प्रकारान्तरसे प्रजापति माना गया है ॥ १४ ॥

सम्बन्ध— अब पहले बतलाये हुए दो प्रकारके साधकोंको मिलनेवाले पृथक्-पृथक् फलका वर्णन करते हैं—

तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥

तत् ये ह वै=जो कोई भी निश्चयपूर्वक; तत् प्रजापतिव्रतम्=उस प्रजापति-

  • रजोदर्शनके दिनसे लेकर सोलाह दिनोंतक स्वाभाविक ऋतुकाल कहलाता है। इनमें पहली चार रात्रियाँ तथा ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रियाँ सर्वथा वर्जित हैं। शेष दस रात्रियोंमें पर्व (एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, ग्रहण, व्यतिपात, संक्रान्ति, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, रामनवमी आदि) दिनोंको छोड़कर पत्नीकी रतिकामनासे जो पुरुष महीनेमें केवल दो रात्रि स्त्री-सहवास करता है, वह गृहस्थाश्रममें रहता हुआ ही ब्रह्मचारी माना जाता है (मनुस्मृति ३।४५-४७, ५०)

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १८५


व्रतका; चरन्ति=अनुष्ठान करते हैं; ते मिथुनम्=वे जोड़ेको; उत्पादयन्ते=उत्पन्न करते हैं; येषाम् तपः=जिनमें तप (और); ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्य (है); येषु सत्यम्=जिनमें सत्य; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; तेषाम् एव=उन्हींको; एषः ब्रह्मलोकः=यह ब्रह्मलोक मिलता है॥ १५॥

व्याख्या— जो लोग संतानोत्पत्तिरूप प्रजापतिके व्रतका अनुष्ठान करते हैं अर्थात् स्वर्गादि लोकोंके भोगकी प्राप्तिके लिये शास्त्रविहित शुभकर्मोंका आचरण करते हुए नियमानुसार स्त्री-प्रसङ्ग आदि भोगोंका उपभोग करते हैं, वे तो पुत्र और कन्यारूप जोड़ेको उत्पन्न करके प्रजाकी वृद्धि करते हैं और जो उनसे भिन्न हैं, जिनमें ब्रह्मचर्य और तप भरा हुआ है, जिनका जीवन सत्यमय है तथा जो सत्यस्वरूप परमेश्वरको अपने हृदयमें नित्य स्थित देखते हैं, उन्हींको वह ब्रह्मलोक (परमपद, परमगति) मिलता है, दूसरोंको नहीं॥ १५॥

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥

येषु न=जिनमें न तो; जिह्मम्=कुटिलता (और); अनृतम्=झूठ है; च न=तथा न; माया=माया (कपट) ही है; तेषाम्=उन्हींको; असौ=वह; विरजः=विकाररहित, विशुद्ध; ब्रह्मलोकः इति=ब्रह्मलोक (मिलता है) ॥ १६॥

व्याख्या— जिनमें कुटिलताका लेश भी नहीं है, जो स्वप्नमें भी मिथ्याभाषण नहीं करते और असत्यमय आचरणसे सदा दूर रहते हैं, जिनमें राग-द्वेषादि विकारोंका सर्वथा अभाव है, जो सब प्रकारके छल-कपटसे शून्य हैं, उन्हींको वह विकाररहित विशुद्ध ब्रह्मलोक मिलता है। जो इनसे विपरीत लक्षणोंवाले हैं, उनको नहीं मिलता॥ १६॥

॥ प्रथम प्रश्न समाप्त १ ॥

द्वितीय प्रश्न

अथ हैनँ भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ। भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥

अथ ह एनम् = इसके पश्चात् इन प्रसिद्ध (महात्मा पिप्पलाद) ऋषिसे; वैदर्भिः भार्गवः = विदर्भदेशीय भार्गवने; पप्रच्छ = पूछा; भगवन् = भगवन्!; कति देवाः एव = कुल कितने देवता; प्रजां विधारयन्ते = प्रजाको धारण करते हैं; कतरे एतत् = उनमेंसे कौन-कौन इसे; प्रकाशयन्ते = प्रकाशित करते हैं; पुनः = फिर (यह भी बतलाइये कि); एषाम् = इन सबमें; कः = कौन; वरिष्ठः = सर्वश्रेष्ठ है; इति = यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें भार्गव ऋषिने महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं— (१) प्रजाको यानी प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं? (२) उनमेंसे कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं? (३) इन सबमें अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है? ॥ १॥

तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च। ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥

सः ह = उन प्रसिद्ध महर्षि (पिप्पलाद) ने; तस्मै उवाच = उन भार्गवसे कहा; ह आकाशः वै = निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश; एषः देवः = यह देवता है (तथा); वायुः = वायु; अग्निः = अग्नि; आपः = जल; पृथिवी = पृथिवी; वाक् = वाणी (कर्मेन्द्रियाँ); चक्षुः च श्रोत्रम् मनः = नेत्र और श्रोत्र (ज्ञानेन्द्रियाँ) तथा मन (अन्तःकरण) भी [देवता हैं]; ते प्रकाश्य = वे सब अपनी-अपनी शक्ति प्रकट करते; अभिवदन्ति = अभिमानपूर्वक कहने लगे; वयम् एतत् बाणम् = हमने इस शरीरको; अवष्टभ्य = आश्रय देकर; विधारयामः = धारण कर रखा है ॥ २॥

व्याख्या—इस प्रकार भार्गवके पूछनेपर महर्षि पिप्पलाद उत्तर देते हैं। यहाँ

प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १८७

दो प्रश्नोंका उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है। वे कहते हैं कि सबका आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही है; परन्तु उससे उत्पन्न होनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये चारों महाभूत भी शरीरको धारण किये रहते हैं। यह स्थूल शरीर इन्हींसे बना है। इसलिये ये धारक देवता हैं। वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन आदि चार अन्तःकरण—ये चौदह देवता इस शरीरके प्रकाशक हैं। ये देवता देहको धारण और प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये धारक और प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देहको प्रकाशित करके आपसमें झगड़ पड़े और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि 'हमने शरीरको आश्रय देकर धारण कर रखा है'॥ २ ॥

तान्वरिष्ठः प्राण उवाच। मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥

तान्=उनसे; वरिष्ठः प्राणः=सर्वश्रेष्ठ प्राण; उवाच=बोला; मोहम्=(तुमलोग) मोहमें; मा आपद्यथ=न पड़ो; अहम् एव=मैं ही; एतत् आत्मानम्=अपने इस स्वरूपको; पञ्चधा प्रविभज्य=पाँच भागोंमें विभक्त करके; एतत् बाणम्=इस शरीरको; अवष्टभ्य=आश्रय देकर; विधारयामि=धारण करता हूँ; इति ते=यह (सुनकर भी) वे; अश्रद्दधानाः=अविश्वासी ही; बभूवुः=बने रहे॥ ३॥

**व्याख्या—**इस प्रकार जब सम्पूर्ण महाभूत, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-रूप देवता परस्पर विवाद करने लगे, तब सर्वश्रेष्ठ प्राणने उनसे कहा—'तुमलोग अज्ञानवश आपसमें विवाद मत करो; तुममेंसे किसीमें भी इस शरीरको धारण करने या सुरक्षित रखनेकी शक्ति नहीं है। इसे तो मैंने ही अपनेको (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदानरूप) पाँच भागोंमें विभक्त करके आश्रय देते हुए धारण कर रखा है और मुझसे ही यह सुरक्षित है।' प्राणकी यह बात सुनकर भी उन देवताओंने उसपर विश्वास नहीं किया, वे अविश्वासी ही बने रहे॥ ३॥

१८८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न २

सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते। तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति॥४॥

सः=(तब) वह प्राण; अभिमानात्=अभिमानपूर्वक; ऊर्ध्वम् उत्क्रमते इव=मानो (उस शरीरसे) ऊपरकी ओर बाहर निकलने लगा; तस्मिन् उत्क्रामति=उसके बाहर निकलनेपर; अथ इतरे सर्वे एव=उसीके साथ-ही-साथ अन्य सब भी; उत्क्रामन्ते=शरीरसे बाहर निकलने लगे; =और; तस्मिन् प्रतिष्ठमाने=उसके ठहर जानेपर; सर्वे एव प्रातिष्ठन्ते=दूसरे सब देवता भी ठहर गये; तत् यथा=तब जैसे (मधुके छत्तेसे); मधुकरराजानम्=मधुमक्खियोंके राजाके; उत्क्रामन्तम्=निकलनेपर (उसीके साथ-साथ); सर्वाः एव=सारी ही; मक्षिकाः=मधुमक्खियाँ; उत्क्रामन्ते= बाहर निकल जाती हैं; च तस्मिन्=और उसके; प्रतिष्ठमाने=बैठ जानेपर; सर्वाः एव=सब-की-सब; प्रातिष्ठन्ते=बैठ जाती हैं; एवम्=ऐसी ही दशा (इन सबकी हुई); वाक् चक्षुः श्रोत्रम् च मनः=अतः वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन; ते=वे (सभी); प्रीताः प्राणम् स्तुन्वन्ति=प्राणकी श्रेष्ठताका अनुभव करके प्रसन्न होकर प्राणकी स्तुति करने लगे॥४॥

व्याख्या—तब उनको अपना प्रभाव दिखलाकर सावधान करनेके लिये वह सर्वश्रेष्ठ प्राण अभिमानमें ठेस लगनेसे मानो रूठकर इस शरीरसे बाहर निकलनेके लिये ऊपरकी ओर उठने लगा। फिर तो सब-के-सब देवता विवश होकर उसीके साथ बाहर निकलने लगे; कोई भी स्थिर नहीं रह सका। जब वह अपने स्थानपर स्थित हो गया, तब अन्य सब भी स्थित हो गये। जैसे मधुमक्खियोंका राजा जब अपने स्थानसे उड़ता है, तब उसके साथ ही वहाँ बैठी हुई अन्य सब मधुमक्खियाँ भी उड़ जाती हैं और जब वह बैठ जाता है तब अन्य सब भी बैठ जाती हैं, ऐसी ही दशा इन सब वागादि देवताओंकी भी

प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १८९

हुई। यह देखकर वाणी, चक्षु, श्रोत्र आदि सब इन्द्रियोंको और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंको भी यह विश्वास हो गया कि हम सबमें प्राण ही श्रेष्ठ है; अतः वे सब प्रसन्नतापूर्वक निम्न प्रकारसे प्राणकी स्तुति करने लगे॥ ४॥

सम्बन्ध— प्राणको ही परब्रह्म परमेश्वरका स्वरूप मानकर उपासना करनेके लिये उसका सर्वात्मरूपसे महत्त्व बतलाया जाता है—*

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः। एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत्॥ ५॥

एषः अग्निः तपति=यह प्राण अग्निरूपसे तपता है; एषः सूर्यः=यही सूर्य है; एषः पर्जन्यः=यही मेघ है; [एषः] मघवान्=यही इन्द्र है; एषः वायुः=यही वायु है (तथा); एषः देवः=यह प्राणरूप देव ही; पृथिवी=पृथ्‍वी (एवं); रयिः=रयि है (तथा); यत्=जो कुछ; सत्=सत्; =और; असत्=असत् है; =तथा; [यत्]=जो; अमृतम्=अमृत कहा जाता है (वह भी प्राण ही है)॥ ५॥

**व्याख्या—**वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले—यह प्राण ही अग्निरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है, यही मेघ, इन्द्र और वायु है। यही देव, पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है तथा सत् और असत् एवं उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है॥ ५॥

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्। ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च॥ ६॥

रथनाभौ=रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए; अराः इव=अरोंकी भाँति; ऋचः=ऋग्वेदकी सम्पूर्ण ऋचाएँ; यजूंषि=यजुर्वेदके मन्त्र (तथा); सामानि=सामवेदके मन्त्र; यज्ञः च=यज्ञ और; ब्रह्म क्षत्रम्=(यज्ञ करनेवाले) ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग; सर्वम्=ये सब-के-सब; प्राणे=(इस) प्राणमें; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित हैं॥ ६॥


* इस विषयका वर्णन अथर्ववेद काण्ड ११ सू० ४ में विस्तारपूर्वक आया है।

१९०ईशादि नौ उपनिषद्[ प्रश्न २

व्याख्या— जिस प्रकार रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए अरे नाभिके ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेदकी सब ऋचाएँ, यजुर्वेदके समस्त मन्त्र, सब-का-सब सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञादि शुभकर्म और यज्ञादि शुभकर्म करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग—ये सब-के-सब प्राणके आधारपर ही टिके हुए हैं; सबका आश्रय प्राण ही है॥ ६॥

सम्बन्ध— इस प्रकार प्राणका महत्त्व बतलाकर अब उसकी स्तुति की जाती है—

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि॥ ७॥

**प्राण=**हे प्राण!; **त्वम् एव=**तू ही; **प्रजापतिः=**प्रजापति है; [त्वम् एव]=तू ही; **गर्भे चरसि=**गर्भमें विचरता है; प्रतिजायसे=(और तू ही) माता-पिताके अनुरूप होकर जन्म लेता है; **तु=**निश्चय ही; **इमाः=**ये सब; **प्रजाः=**प्राणी; **तुभ्यम्=**तुझे; **बलिम् हरन्ति=**भेंट समर्पण करते हैं; **यः=**जो तू; प्राणैः प्रतितिष्ठसि=(अपानादि अन्य) प्राणोंके साथ-साथ स्थित हो रहा है॥ ७॥

व्याख्या— हे प्राण! तू ही प्रजापति (प्राणियोंका ईश्वर) है, तू ही गर्भमें विचरनेवाला और माता-पिताके अनुरूप संतानके रूपमें जन्म लेनेवाला है। ये सब जीव तुझे ही भेंट समर्पण करते हैं। भाव यह कि तुम्हारी तृप्तिके लिये ही अन्न भक्षण आदि कर रहे हैं। तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीरमें स्थित हो रहा है॥ ७॥

देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा।
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि॥ ८॥

(हे प्राण!) देवानाम्=(तू) देवताओंके लिये; **वह्नितमः=**उत्तम अग्नि; **असि=**है; **पितॄणाम्=**पितरोंके लिये; **प्रथमा स्वधा=**पहली स्वधा है; **अथर्वाङ्गिरसाम्=**अथर्वाङ्गिरस आदि; **ऋषीणाम्=**ऋषियोंके द्वारा; चरितम्= आचरित; **सत्यम्=**सत्य; **असि=**है॥ ८॥

व्याख्या— हे प्राण! तू ही देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम

प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १११


अग्नि है। पितरोंके लिये पहली स्वधा है। अथर्वाङ्गिरस आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है॥ ८॥

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता।
त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः॥ ९॥

प्राण=हे प्राण!; त्वम् तेजसा=तू तेजसे (सम्पन्न); इन्द्रः=इन्द्र; रुद्रः=रुद्र (और); परिरक्षिता=रक्षा करनेवाला; असि=है; त्वम्=तू ही; अन्तरिक्षे=अन्तरिक्षमें; चरसि=विचरता है (और); त्वम्=तू ही; ज्योतिषां पतिः=समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी; सूर्यः=सूर्य है॥ ९॥

**व्याख्या—**हे प्राण! तू सब प्रकारके तेज (शक्तियों)-से सम्पन्न तीनों लोकोंका स्वामी इन्द्र है। तू ही प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाला रुद्र है और तू ही सबकी भलीभाँति यथायोग्य रक्षा करनेवाला है। तू ही अन्तरिक्षमें (पृथ्वी और स्वर्गके बीचमें) विचरनेवाला वायु है तथा तू ही अग्नि, चन्द्र, तारे आदि समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी सूर्य है॥ ९॥

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति॥ १०॥

प्राण=हे प्राण!; यदा त्वम्=जब तू; अभिवर्षसि=भलीभाँति वर्षा करता है; अथ=उस समय; ते इमाः प्रजाः=तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा; कामाय=यथेष्ट; अन्नम्=अन्न; भविष्यति=उत्पन्न होगा; इति=यह समझकर; आनन्दरूपाः=आनन्दमय; तिष्ठन्ति=हो जाती है॥ १०॥

**व्याख्या—**हे प्राण! जब तू मेघरूप होकर पृथ्वीलोकमें सब ओर वर्षा करता है, तब तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा 'हमलोगोंके जीवन-निर्वाहके लिये यथेष्ट अन्न उत्पन्न होगा'—ऐसी आशा करती हुई आनन्दमें मग्न हो जाती है॥ १०॥

व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः।
वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः॥ ११॥

प्राण=हे प्राण!; त्वम्=तू; व्रात्यः=संस्काररहित (होते हुए भी); एकर्षिः=एकमात्र