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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १७९

संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च तद्ये ह वै तदिष्टাপૂર્ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ९ ॥

संवत्सरः वै=संवत्सर (बारह महीनोंवाला काल) ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; तस्य अयने=उसके दो अयन हैं—; दक्षिणम् च=एक दक्षिण और; उत्तरम् च=दूसरा उत्तर; तत् ये ह=वहाँ मनुष्योंमें जो लोग निश्चयपूर्वक; तत् इष्टापूर्ते वै=(केवल) उन इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही; कृतम् इति=करनेयोग्य कर्म मानकर (सकाम भावसे); उपासते=उनकी उपासना करते हैं (उन्हींके अनुष्ठानमें लगे रहते हैं); ते चान्द्रमसम्=वे चन्द्रमाके; लोकम् एव=लोकको ही; अभिजयन्ते=जीतते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं (और); ते एव=वे ही; पुनः आवर्तन्ते=पुनः (वहाँसे) लौटकर आते हैं; तस्मात् एते=इसलिये ये; प्रजाकामाः ऋषयः=संतानकी कामनावाले ऋषिगण; दक्षिणम् प्रतिपद्यन्ते=दक्षिण (मार्ग)-को प्राप्त होते हैं; ह एषः वै रयिः=निस्संदेह यही वह रयि है; यः पितृयाणः=जो 'पितृयान' नामक मार्ग है॥ ९॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें संवत्सरको परमात्माका प्रतीक बनाकर उसके अङ्गरूप रयिस्थानीय भोग्य-पदार्थोंके उद्देश्यसे की जानेवाली उपासना और उसका फल बताते हैं। भाव यह है कि बारह महीनोंका यह संवत्सररूप काल ही मानो सृष्टिके स्वामी परमेश्वरका स्वरूप है। इसके दो अयन हैं— दक्षिण और उत्तर। दक्षिणायनके जो छः महीने हैं, जिनमें सूर्य दक्षिणकी ओर घूमता है—ये मानो इसके दक्षिण अङ्ग हैं और उत्तरायणके छः महीने ही उत्तर अङ्ग हैं। उनमें उत्तर अङ्ग तो प्राण है, इस विश्वके आत्मारूप उस परमेश्वरका सर्वान्तर्यामी स्वरूप है और दक्षिण अङ्ग रयि अर्थात् उसका बाह्य भोग्यस्वरूप है। इस जगत्में जो संतानकी कामनावाले ऋषि स्वर्गादि सांसारिक भोगोंमें आसक्त हैं, वे यज्ञादिद्वारा देवताओंका पूजन करना, ब्राह्मण

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एवं श्रेष्ठ पुरुषोंका धनादिसे सत्कार करना, दुःखी प्राणियोंकी सेवा करना आदि इष्टकर्म तथा कुँआ, बावली, तालाब, बगीचा, धर्मशाला, विद्यालय, औषधालय, पुस्तकालय आदि लोकोपकारी चिरस्थायी स्मारकोंकी स्थापना करना आदि पूर्तकर्मोंको उत्कृष्ट कर्तव्य समझते हैं और इनके फलस्वरूप इस लोक तथा परलोकके भोगोंके उद्देश्यसे इनकी उपासना अर्थात् विधिवत् अनुष्ठान करते हैं; यह उस संवत्सररूप परमेश्वरके दक्षिण अङ्गकी उपासना है। इसीको ईशावास्य-उपनिषद्में असम्भूतिकी उपासनाके नामसे देव, पितर, मनुष्य आदि शरीरोंकी सेवा बताया है। इसके प्रभावसे वे चन्द्रलोकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अपने कर्मोंका फल भोगकर पुनः इस लोकमें लौट आते हैं; यही पितृयाण मार्ग है॥ ९॥

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्या-
दित्यमभिजproperty.. wait: दित्यमभिजयन्ते। एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायण-
मेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः॥ १०॥

अथ=किंतु (जो); तपसा=तपस्याके साथ; ब्रह्मचर्येण=ब्रह्मचर्यपूर्वक (और); श्रद्धया=श्रद्धासे युक्त होकर; विद्यया=अध्यात्मविद्याके द्वारा, आत्मानम्=परमात्माकी; अन्विष्य=खोज करके (जीवन सार्थक करते हैं, वे); उत्तरेण=उत्तरायण-मार्गसे; आदित्यम्=सूर्यलोकको; अभिजयन्ते=जीत लेते हैं (प्राप्त करते हैं); एतत् वै=यह (सूर्य) ही; प्राणानाम्=प्राणोंका; आयतनम्=केन्द्र है; एतत् अमृतम्=यह अमृत (अविनाशी) (और); अभयम्=निर्भय पद है; एतत् परायणम्=यह परमगति है; एतस्मात्=इससे; न पुनः आवर्तन्ते=पुनः लौटकर नहीं आते; इति एषः=इस प्रकार यह; निरोधः=निरोध (पुनरावृत्तिका निवारक) है; तत् एषः=(इस बातको स्पष्ट करनेवाला) यह (अगला); श्लोकः=श्लोक है॥ १०॥

**व्याख्या—**उपर्युक्त सकाम उपासकोंसे भिन्न जो कल्याणकामी साधक हैं, वे इन सांसारिक भोगोंकी अनित्यता और दुःखरूपताको समझकर इनसे सर्वथा विरक्त हो जाते हैं। वे श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए संयमके

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १८१

साथ त्यागमय जीवन बिताते हैं और अध्यात्मविद्याके द्वारा अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले किसी भी अनुकूल साधनद्वारा सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरकी निष्काम उपासना करते हैं। यह मानो उस संवत्सररूप प्रजापतिके उत्तर अङ्गकी उपासना है। इसको ईशावास्य-उपनिषद्में सम्भूतिकी उपासना कहा है। इसके उपासक उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकमें जाकर सूर्यके आत्मारूप परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो जाते हैं। यह सूर्य ही समस्त जगत्के प्राणोंका केन्द्र है। यही अमृत—अविनाशी और निर्भय पद है। यही परम गति है। इसे प्राप्त हुए महापुरुष फिर लौटकर नहीं आते। यह निरोध अर्थात् पुनर्जन्मको रोकनेवाला आत्यन्तिक प्रलय है। इस मन्त्रमें सूर्यको परमेश्वरका स्वरूप मानकर ही उपर्युक्त महिमा कही गयी है। इसी बातको अगले मन्त्रमें स्पष्ट किया गया है॥ १०॥

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्।
अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥*

(कितने ही लोग तो इस सूर्यको); **पञ्चपादम्=**पाँच चरणोंवाला; **पितरम्=**सबका पिता; **द्वादशाकृतिम्=**बारह आकृतियोंवाला; **पुरीषिणम्=**जलका उत्पादक; दिवः परे अर्धे=(और) स्वर्गलोकसे भी ऊपरके स्थानमें (स्थित); **आहुः=**बतलाते हैं; **अथ इमे=**तथा ये; **अन्ये उ=**दूसरे कितने ही लोग; **इति आहुः=**ऐसा बतलाते हैं (कि यह); **परे=**विशुद्ध; **सप्तचक्रे=**सात पहियोंवाले (और); **षडरे=**छः अरोंवाले (रथमें); **अर्पितम्=**बैठा हुआ (एवं); **विचक्षणम्=**सबको भलीभाँति जाननेवाला है॥ ११॥

**व्याख्या—**परब्रह्म परमेश्वरके प्रत्यक्ष—दृष्टिगोचरस्वरूप इस सूर्यके विषयमें कितने ही तत्त्ववेत्ता तो यों कहते हैं कि इसके पाँच पैर हैं। अर्थात् छः ऋतुओंमेंसे हेमन्त और शिशिर—इन दो ऋतुओंकी एकता करके पाँच ऋतुओंको वे इस


* यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड ९ सूक्त १४ का बारहवाँ तथा ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त १६४ का बारहवाँ है।

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सूर्यके पाँच चरण बतलाते हैं; तथा यह भी कहते हैं कि बारह महीने ही इसकी बारह आकृतियाँ अर्थात् बारह शरीर हैं। इसका स्थान स्वर्गलोकसे भी ऊँचा है। स्वर्गलोक भी इसीके आलोकसे प्रकाशित है। इस लोकमें जो जल बरसता है, उस जलकी उत्पत्ति इसीसे होती है। अतः सबको जलरूप जीवन प्रदान करनेवाला होनेसे यह सबका पिता है। दूसरे ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि लाल, पीले आदि सात रंगोंकी किरणोंसे युक्त तथा वसन्त आदि छः ऋतुओंके हेतुभूत इस विशुद्ध प्रकाशमय सूर्यमण्डलमें— जिसे सात चक्र एवं छः अरोंवाला रथ कहा गया है—बैठा हुआ इसका आत्मारूप, सबको भलीभाँति जाननेवाला सर्वज्ञ परमेश्वर ही उपास्य है। यह स्थूल नेत्रोंसे दिखायी देनेवाला सूर्यमण्डल उसका शरीर है। इसलिये यह उसीकी महिमा है॥ ११॥

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥

मासः वै=महीना ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; तस्य=उसका; कृष्णपक्षः एव=कृष्णपक्ष ही; रयिः=रयि है (और); शुक्लः प्राणः=शुक्लपक्ष प्राण है; तस्मात्=इसलिये; एते ऋषयः=ये (कल्याणकामी) ऋषिगण; शुक्ले=शुक्लपक्षमें (निष्कामभावसे); इष्टम्=यज्ञादि कर्तव्य-कर्म; कुर्वन्ति=किया करते हैं (तथा); इतरे=दूसरे (जो सांसारिक भोगोंको चाहते हैं); इतरस्मिन्=दूसरे पक्षमें—कृष्णपक्षमें (सकामभावसे यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान किया करते हैं) ॥ १२ ॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें महीनेको प्रजापति परमेश्वरका रूप देकर कर्मोंद्वारा उसकी उपासना करनेका रहस्य बताया गया है। भाव यह है कि प्रत्येक महीना ही मानो प्रजापति है, उसमें कृष्णपक्षके पंद्रह दिन तो उस परमात्माका दाहिना अङ्ग हैं; इसे रयि (स्थूल भूत-समुदायका कारण) समझना चाहिये। यह उस परमेश्वरका शक्तिस्वरूप भोगमय रूप है और शुक्लपक्षके पंद्रह दिन ही मानो उत्तर अङ्ग हैं। यही प्राण अर्थात् सबको जीवन प्रदान करनेवाले परमात्माका सर्वान्तर्यामी रूप है। इसलिये जो कल्याणकामी ऋषि हैं, अर्थात्

प्रश्न १ ]

प्रश्नोपनिषद्

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जो रयिस्थानीय भोग-पदार्थोंसे विरक्त होकर प्राणस्थानीय सर्वात्मरूप परब्रह्मको चाहनेवाले हैं, वे अपने समस्त शुभकर्मोंको शुक्लपक्षमें करते हैं, अर्थात् शुक्लपक्षस्थानीय प्राणाधार परब्रह्म परमेश्वरके अर्पण करके कहते हैं—स्वयं उसका कोई फल नहीं चाहते; यही गीतोक्त कर्मयोग है। इनसे भिन्न जो भोगासक्त मनुष्य हैं, वे कृष्णपक्षमें अर्थात् कृष्णपक्षस्थानीय स्थूल पदार्थोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे सब प्रकारके कर्म किया करते हैं। इनका वर्णन गीतामें ‘स्वर्गपराः’ के नामसे हुआ है (गीता २। ४२—४४) ॥ १२ ॥

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यज्ञात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥

अहोरात्रः वै=दिन और रातका जोड़ा ही; प्रजापतिः =प्रजापति है; तस्य =उसका; अहः एव =दिन ही; प्राणः =प्राण है (और); रात्रिः एव =रात्रि ही; रयिः =रयि है; ये दिवा =(अतः) जो दिनमें; रत्या संयुज्यन्ते =स्त्री-सहवास करते हैं; एते =ये लोग; वै प्राणम् =सचमुच अपने प्राणोंको ही; प्रस्कन्दन्ति =क्षीण करते हैं (तथा); यत् रात्रौ =जो रात्रिमें; रत्या संयुज्यन्ते =स्त्री-सहवास करता है; तत् ब्रह्मचर्यम् एव =वह ब्रह्मचर्य ही है ॥ १३ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें दिन और रात्रिरूप चौबीस घंटोंके कालरूपमें परमेश्वरके स्वरूपकी कल्पना करके जीवनोंपयोगी कर्मोंका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि ये दिन और रात मिलकर जगत्पति परमेश्वरका पूर्णरूप हैं। उसका यह दिन तो मानो प्राण अर्थात् सबको जीवन देनेवाला प्रकाशमय विशुद्ध स्वरूप है और रात्रि ही भोगरूप रयि है। अतः जो मनुष्य दिनमें स्त्री-प्रसंग करते हैं अर्थात् परमात्माके विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रकाशमय मार्गमें चलना प्रारम्भ करके भी स्त्री-प्रसंग आदि विलासमें आसक्त हो जाते हैं, वे अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इस अमूल्य जीवनको व्यर्थ खो देते हैं। उनसे भिन्न जो सांसारिक उन्नति चाहनेवाले हैं, वे यदि शास्त्रके

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ प्रश्न १ ]

नियमानुसार ऋतुकालमें रात्रिके समय नियमानुकूल स्त्री-प्रसङ्ग करते हैं तो वे शास्त्रकी आज्ञाका पालन करनेके कारण ब्रह्मचारीके तुल्य ही हैं। लौकिक दृष्टिसे यों कह सकते हैं कि इस मन्त्रमें गृहस्थोंको दिनमें स्त्री-प्रसंग कदापि न करनेका और विहित रात्रियोंमें शास्त्रानुसार नियमित और संयमित-रूपमें केवल संतानकी इच्छासे स्त्री-सहवास करनेका उपदेश दिया गया है। तभी वह ब्रह्मचर्यकी गणनामें आ सकता है* ॥ १३ ॥

अत्रं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥

अत्रम् वै=अत्र ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; ह ततः वै=क्योंकि उसीसे; तत् रेतः=वह वीर्य (उत्पन्न होता है); तस्मात्=उस वीर्यसे; इमाः प्रजाः=ये सम्पूर्ण चराचर प्राणी; प्रजायन्ते इति=उत्पन्न होते हैं ॥ १४ ॥

व्याख्या— इस मन्त्रमें अत्रको प्रजापतिका स्वरूप बताकर अत्रकी महिमा बतलाते हुए कहते हैं कि यह सब प्राणियोंका आहाररूप अत्र ही प्रजापति है; क्योंकि इसीसे वीर्य उत्पन्न होता है और वीर्यसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। इस कारण इस अत्रको भी प्रकारान्तरसे प्रजापति माना गया है ॥ १४ ॥

सम्बन्ध— अब पहले बतलाये हुए दो प्रकारके साधकोंको मिलनेवाले पृथक्-पृथक् फलका वर्णन करते हैं—

तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥

तत् ये ह वै=जो कोई भी निश्चयपूर्वक; तत् प्रजापतिव्रतम्=उस प्रजापति-

  • रजोदर्शनके दिनसे लेकर सोलाह दिनोंतक स्वाभाविक ऋतुकाल कहलाता है। इनमें पहली चार रात्रियाँ तथा ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रियाँ सर्वथा वर्जित हैं। शेष दस रात्रियोंमें पर्व (एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, ग्रहण, व्यतिपात, संक्रान्ति, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, रामनवमी आदि) दिनोंको छोड़कर पत्नीकी रतिकामनासे जो पुरुष महीनेमें केवल दो रात्रि स्त्री-सहवास करता है, वह गृहस्थाश्रममें रहता हुआ ही ब्रह्मचारी माना जाता है (मनुस्मृति ३।४५-४७, ५०)

प्रश्न १ ] प्रश्नोपनिषद् १८५


व्रतका; चरन्ति=अनुष्ठान करते हैं; ते मिथुनम्=वे जोड़ेको; उत्पादयन्ते=उत्पन्न करते हैं; येषाम् तपः=जिनमें तप (और); ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्य (है); येषु सत्यम्=जिनमें सत्य; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; तेषाम् एव=उन्हींको; एषः ब्रह्मलोकः=यह ब्रह्मलोक मिलता है॥ १५॥

व्याख्या— जो लोग संतानोत्पत्तिरूप प्रजापतिके व्रतका अनुष्ठान करते हैं अर्थात् स्वर्गादि लोकोंके भोगकी प्राप्तिके लिये शास्त्रविहित शुभकर्मोंका आचरण करते हुए नियमानुसार स्त्री-प्रसङ्ग आदि भोगोंका उपभोग करते हैं, वे तो पुत्र और कन्यारूप जोड़ेको उत्पन्न करके प्रजाकी वृद्धि करते हैं और जो उनसे भिन्न हैं, जिनमें ब्रह्मचर्य और तप भरा हुआ है, जिनका जीवन सत्यमय है तथा जो सत्यस्वरूप परमेश्वरको अपने हृदयमें नित्य स्थित देखते हैं, उन्हींको वह ब्रह्मलोक (परमपद, परमगति) मिलता है, दूसरोंको नहीं॥ १५॥

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥

येषु न=जिनमें न तो; जिह्मम्=कुटिलता (और); अनृतम्=झूठ है; च न=तथा न; माया=माया (कपट) ही है; तेषाम्=उन्हींको; असौ=वह; विरजः=विकाररहित, विशुद्ध; ब्रह्मलोकः इति=ब्रह्मलोक (मिलता है) ॥ १६॥

व्याख्या— जिनमें कुटिलताका लेश भी नहीं है, जो स्वप्नमें भी मिथ्याभाषण नहीं करते और असत्यमय आचरणसे सदा दूर रहते हैं, जिनमें राग-द्वेषादि विकारोंका सर्वथा अभाव है, जो सब प्रकारके छल-कपटसे शून्य हैं, उन्हींको वह विकाररहित विशुद्ध ब्रह्मलोक मिलता है। जो इनसे विपरीत लक्षणोंवाले हैं, उनको नहीं मिलता॥ १६॥

॥ प्रथम प्रश्न समाप्त १ ॥

द्वितीय प्रश्न

अथ हैनँ भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ। भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥

अथ ह एनम् = इसके पश्चात् इन प्रसिद्ध (महात्मा पिप्पलाद) ऋषिसे; वैदर्भिः भार्गवः = विदर्भदेशीय भार्गवने; पप्रच्छ = पूछा; भगवन् = भगवन्!; कति देवाः एव = कुल कितने देवता; प्रजां विधारयन्ते = प्रजाको धारण करते हैं; कतरे एतत् = उनमेंसे कौन-कौन इसे; प्रकाशयन्ते = प्रकाशित करते हैं; पुनः = फिर (यह भी बतलाइये कि); एषाम् = इन सबमें; कः = कौन; वरिष्ठः = सर्वश्रेष्ठ है; इति = यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें भार्गव ऋषिने महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं— (१) प्रजाको यानी प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं? (२) उनमेंसे कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं? (३) इन सबमें अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है? ॥ १॥

तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च। ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥

सः ह = उन प्रसिद्ध महर्षि (पिप्पलाद) ने; तस्मै उवाच = उन भार्गवसे कहा; ह आकाशः वै = निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश; एषः देवः = यह देवता है (तथा); वायुः = वायु; अग्निः = अग्नि; आपः = जल; पृथिवी = पृथिवी; वाक् = वाणी (कर्मेन्द्रियाँ); चक्षुः च श्रोत्रम् मनः = नेत्र और श्रोत्र (ज्ञानेन्द्रियाँ) तथा मन (अन्तःकरण) भी [देवता हैं]; ते प्रकाश्य = वे सब अपनी-अपनी शक्ति प्रकट करते; अभिवदन्ति = अभिमानपूर्वक कहने लगे; वयम् एतत् बाणम् = हमने इस शरीरको; अवष्टभ्य = आश्रय देकर; विधारयामः = धारण कर रखा है ॥ २॥

व्याख्या—इस प्रकार भार्गवके पूछनेपर महर्षि पिप्पलाद उत्तर देते हैं। यहाँ

प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १८७

दो प्रश्नोंका उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है। वे कहते हैं कि सबका आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही है; परन्तु उससे उत्पन्न होनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये चारों महाभूत भी शरीरको धारण किये रहते हैं। यह स्थूल शरीर इन्हींसे बना है। इसलिये ये धारक देवता हैं। वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन आदि चार अन्तःकरण—ये चौदह देवता इस शरीरके प्रकाशक हैं। ये देवता देहको धारण और प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये धारक और प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देहको प्रकाशित करके आपसमें झगड़ पड़े और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि 'हमने शरीरको आश्रय देकर धारण कर रखा है'॥ २ ॥

तान्वरिष्ठः प्राण उवाच। मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥

तान्=उनसे; वरिष्ठः प्राणः=सर्वश्रेष्ठ प्राण; उवाच=बोला; मोहम्=(तुमलोग) मोहमें; मा आपद्यथ=न पड़ो; अहम् एव=मैं ही; एतत् आत्मानम्=अपने इस स्वरूपको; पञ्चधा प्रविभज्य=पाँच भागोंमें विभक्त करके; एतत् बाणम्=इस शरीरको; अवष्टभ्य=आश्रय देकर; विधारयामि=धारण करता हूँ; इति ते=यह (सुनकर भी) वे; अश्रद्दधानाः=अविश्वासी ही; बभूवुः=बने रहे॥ ३॥

**व्याख्या—**इस प्रकार जब सम्पूर्ण महाभूत, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-रूप देवता परस्पर विवाद करने लगे, तब सर्वश्रेष्ठ प्राणने उनसे कहा—'तुमलोग अज्ञानवश आपसमें विवाद मत करो; तुममेंसे किसीमें भी इस शरीरको धारण करने या सुरक्षित रखनेकी शक्ति नहीं है। इसे तो मैंने ही अपनेको (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदानरूप) पाँच भागोंमें विभक्त करके आश्रय देते हुए धारण कर रखा है और मुझसे ही यह सुरक्षित है।' प्राणकी यह बात सुनकर भी उन देवताओंने उसपर विश्वास नहीं किया, वे अविश्वासी ही बने रहे॥ ३॥

१८८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न २

सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते। तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति॥४॥

सः=(तब) वह प्राण; अभिमानात्=अभिमानपूर्वक; ऊर्ध्वम् उत्क्रमते इव=मानो (उस शरीरसे) ऊपरकी ओर बाहर निकलने लगा; तस्मिन् उत्क्रामति=उसके बाहर निकलनेपर; अथ इतरे सर्वे एव=उसीके साथ-ही-साथ अन्य सब भी; उत्क्रामन्ते=शरीरसे बाहर निकलने लगे; =और; तस्मिन् प्रतिष्ठमाने=उसके ठहर जानेपर; सर्वे एव प्रातिष्ठन्ते=दूसरे सब देवता भी ठहर गये; तत् यथा=तब जैसे (मधुके छत्तेसे); मधुकरराजानम्=मधुमक्खियोंके राजाके; उत्क्रामन्तम्=निकलनेपर (उसीके साथ-साथ); सर्वाः एव=सारी ही; मक्षिकाः=मधुमक्खियाँ; उत्क्रामन्ते= बाहर निकल जाती हैं; च तस्मिन्=और उसके; प्रतिष्ठमाने=बैठ जानेपर; सर्वाः एव=सब-की-सब; प्रातिष्ठन्ते=बैठ जाती हैं; एवम्=ऐसी ही दशा (इन सबकी हुई); वाक् चक्षुः श्रोत्रम् च मनः=अतः वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन; ते=वे (सभी); प्रीताः प्राणम् स्तुन्वन्ति=प्राणकी श्रेष्ठताका अनुभव करके प्रसन्न होकर प्राणकी स्तुति करने लगे॥४॥

व्याख्या—तब उनको अपना प्रभाव दिखलाकर सावधान करनेके लिये वह सर्वश्रेष्ठ प्राण अभिमानमें ठेस लगनेसे मानो रूठकर इस शरीरसे बाहर निकलनेके लिये ऊपरकी ओर उठने लगा। फिर तो सब-के-सब देवता विवश होकर उसीके साथ बाहर निकलने लगे; कोई भी स्थिर नहीं रह सका। जब वह अपने स्थानपर स्थित हो गया, तब अन्य सब भी स्थित हो गये। जैसे मधुमक्खियोंका राजा जब अपने स्थानसे उड़ता है, तब उसके साथ ही वहाँ बैठी हुई अन्य सब मधुमक्खियाँ भी उड़ जाती हैं और जब वह बैठ जाता है तब अन्य सब भी बैठ जाती हैं, ऐसी ही दशा इन सब वागादि देवताओंकी भी

प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १८९

हुई। यह देखकर वाणी, चक्षु, श्रोत्र आदि सब इन्द्रियोंको और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंको भी यह विश्वास हो गया कि हम सबमें प्राण ही श्रेष्ठ है; अतः वे सब प्रसन्नतापूर्वक निम्न प्रकारसे प्राणकी स्तुति करने लगे॥ ४॥

सम्बन्ध— प्राणको ही परब्रह्म परमेश्वरका स्वरूप मानकर उपासना करनेके लिये उसका सर्वात्मरूपसे महत्त्व बतलाया जाता है—*

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः। एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत्॥ ५॥

एषः अग्निः तपति=यह प्राण अग्निरूपसे तपता है; एषः सूर्यः=यही सूर्य है; एषः पर्जन्यः=यही मेघ है; [एषः] मघवान्=यही इन्द्र है; एषः वायुः=यही वायु है (तथा); एषः देवः=यह प्राणरूप देव ही; पृथिवी=पृथ्‍वी (एवं); रयिः=रयि है (तथा); यत्=जो कुछ; सत्=सत्; =और; असत्=असत् है; =तथा; [यत्]=जो; अमृतम्=अमृत कहा जाता है (वह भी प्राण ही है)॥ ५॥

**व्याख्या—**वे वाणी आदि सब देवता स्तुति करते हुए बोले—यह प्राण ही अग्निरूप धारण करके तपता है और यही सूर्य है, यही मेघ, इन्द्र और वायु है। यही देव, पृथ्वी और रयि (भूतसमुदाय) है तथा सत् और असत् एवं उससे भी श्रेष्ठ जो अमृतस्वरूप परमात्मा है, वह भी यह प्राण ही है॥ ५॥

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्। ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च॥ ६॥

रथनाभौ=रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए; अराः इव=अरोंकी भाँति; ऋचः=ऋग्वेदकी सम्पूर्ण ऋचाएँ; यजूंषि=यजुर्वेदके मन्त्र (तथा); सामानि=सामवेदके मन्त्र; यज्ञः च=यज्ञ और; ब्रह्म क्षत्रम्=(यज्ञ करनेवाले) ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग; सर्वम्=ये सब-के-सब; प्राणे=(इस) प्राणमें; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित हैं॥ ६॥


* इस विषयका वर्णन अथर्ववेद काण्ड ११ सू० ४ में विस्तारपूर्वक आया है।

१९०ईशादि नौ उपनिषद्[ प्रश्न २

व्याख्या— जिस प्रकार रथके पहियेकी नाभिमें लगे हुए अरे नाभिके ही आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार ऋग्वेदकी सब ऋचाएँ, यजुर्वेदके समस्त मन्त्र, सब-का-सब सामवेद, उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञादि शुभकर्म और यज्ञादि शुभकर्म करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अधिकारिवर्ग—ये सब-के-सब प्राणके आधारपर ही टिके हुए हैं; सबका आश्रय प्राण ही है॥ ६॥

सम्बन्ध— इस प्रकार प्राणका महत्त्व बतलाकर अब उसकी स्तुति की जाती है—

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे। तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि॥ ७॥

**प्राण=**हे प्राण!; **त्वम् एव=**तू ही; **प्रजापतिः=**प्रजापति है; [त्वम् एव]=तू ही; **गर्भे चरसि=**गर्भमें विचरता है; प्रतिजायसे=(और तू ही) माता-पिताके अनुरूप होकर जन्म लेता है; **तु=**निश्चय ही; **इमाः=**ये सब; **प्रजाः=**प्राणी; **तुभ्यम्=**तुझे; **बलिम् हरन्ति=**भेंट समर्पण करते हैं; **यः=**जो तू; प्राणैः प्रतितिष्ठसि=(अपानादि अन्य) प्राणोंके साथ-साथ स्थित हो रहा है॥ ७॥

व्याख्या— हे प्राण! तू ही प्रजापति (प्राणियोंका ईश्वर) है, तू ही गर्भमें विचरनेवाला और माता-पिताके अनुरूप संतानके रूपमें जन्म लेनेवाला है। ये सब जीव तुझे ही भेंट समर्पण करते हैं। भाव यह कि तुम्हारी तृप्तिके लिये ही अन्न भक्षण आदि कर रहे हैं। तू ही अपानादि सब प्राणोंके सहित सबके शरीरमें स्थित हो रहा है॥ ७॥

देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा।
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि॥ ८॥

(हे प्राण!) देवानाम्=(तू) देवताओंके लिये; **वह्नितमः=**उत्तम अग्नि; **असि=**है; **पितॄणाम्=**पितरोंके लिये; **प्रथमा स्वधा=**पहली स्वधा है; **अथर्वाङ्गिरसाम्=**अथर्वाङ्गिरस आदि; **ऋषीणाम्=**ऋषियोंके द्वारा; चरितम्= आचरित; **सत्यम्=**सत्य; **असि=**है॥ ८॥

व्याख्या— हे प्राण! तू ही देवताओंके लिये हवि पहुँचानेवाला उत्तम

प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १११


अग्नि है। पितरोंके लिये पहली स्वधा है। अथर्वाङ्गिरस आदि ऋषियोंके द्वारा आचरित (अनुभूत) सत्य भी तू ही है॥ ८॥

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता।
त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः॥ ९॥

प्राण=हे प्राण!; त्वम् तेजसा=तू तेजसे (सम्पन्न); इन्द्रः=इन्द्र; रुद्रः=रुद्र (और); परिरक्षिता=रक्षा करनेवाला; असि=है; त्वम्=तू ही; अन्तरिक्षे=अन्तरिक्षमें; चरसि=विचरता है (और); त्वम्=तू ही; ज्योतिषां पतिः=समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी; सूर्यः=सूर्य है॥ ९॥

**व्याख्या—**हे प्राण! तू सब प्रकारके तेज (शक्तियों)-से सम्पन्न तीनों लोकोंका स्वामी इन्द्र है। तू ही प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाला रुद्र है और तू ही सबकी भलीभाँति यथायोग्य रक्षा करनेवाला है। तू ही अन्तरिक्षमें (पृथ्वी और स्वर्गके बीचमें) विचरनेवाला वायु है तथा तू ही अग्नि, चन्द्र, तारे आदि समस्त ज्योतिर्गणोंका स्वामी सूर्य है॥ ९॥

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति॥ १०॥

प्राण=हे प्राण!; यदा त्वम्=जब तू; अभिवर्षसि=भलीभाँति वर्षा करता है; अथ=उस समय; ते इमाः प्रजाः=तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा; कामाय=यथेष्ट; अन्नम्=अन्न; भविष्यति=उत्पन्न होगा; इति=यह समझकर; आनन्दरूपाः=आनन्दमय; तिष्ठन्ति=हो जाती है॥ १०॥

**व्याख्या—**हे प्राण! जब तू मेघरूप होकर पृथ्वीलोकमें सब ओर वर्षा करता है, तब तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा 'हमलोगोंके जीवन-निर्वाहके लिये यथेष्ट अन्न उत्पन्न होगा'—ऐसी आशा करती हुई आनन्दमें मग्न हो जाती है॥ १०॥

व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः।
वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः॥ ११॥

प्राण=हे प्राण!; त्वम्=तू; व्रात्यः=संस्काररहित (होते हुए भी); एकर्षिः=एकमात्र

१९२ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न २


सर्वश्रेष्ठ ऋषि है (तथा); वयम्=हमलोग (तेरे लिये); आद्यस्य=भोजनको; दातारः=देनेवाले हैं (और तू); अत्ता=भोक्ता (खानेवाला) है; विश्वस्य=समस्त जगत्‌का; सत्पतिः=(तू ही) श्रेष्ठ स्वामी है; मातरिश्व=हे आकाशमें विचरनेवाले प्राण!; त्वम्=तू; नः=हमारा; पिता=पिता है॥ ११॥

**व्याख्या—**हे प्राण! तू संस्काररहित होकर भी एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। तात्पर्य यह कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है, अतः तुझे संस्कारद्वारा शुद्धिकी आवश्यकता नहीं है; प्रत्युत तू ही सबको पवित्र करनेवाला एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। हमलोग (सब इन्द्रियाँ और मन आदि) तेरे लिये नाना प्रकारकी भोजन-सामग्री अर्पण करनेवाले हैं और तू उसे खानेवाला है। तू ही समस्त विश्वका उत्तम स्वामी है। हे आकाशचारी समष्टिवायुरूप प्राण! तू हमारा पिता है; क्योंकि तुझीसे हम सबकी उत्पत्ति हुई है॥ ११॥

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि। या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२॥

(हे प्राण!) या ते तनूः=जो तेरा स्वरूप; वाचि=वाणीमें; प्रतिष्ठिता=स्थित है; =तथा; या श्रोत्रे=जो श्रोत्रमें; या चक्षुषि=जो चक्षुमें; =और; या मनसि=जो मनमें; सन्तता=व्यास है; ताम्=उसको; शिवाम्=कल्याणमय; कुरु=बना ले; मा उत्क्रमीः=(तू) उत्क्रमण न कर॥ १२॥

**व्याख्या—**हे प्राण! जो तेरा स्वरूप वाणी, श्रोत्र, चक्षु आदि समस्त इन्द्रियोंमें और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंमें व्यास है, उसे तू कल्याणमय बना ले। अर्थात् तुझमें जो हमें सावधान करनेके लिये आवेश आया है, उसे शान्त कर ले और तू शरीरसे उठकर बाहर न जा। यह हमलोगोंकी प्रार्थना है॥ १२॥

प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्। मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३॥

इदम्=यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् (और); यत् त्रिदिवे=जो कुछ स्वर्गलोकमें; प्रतिष्ठितम्=स्थित है; सर्वम्=वह सब-का-सब; प्राणस्य=प्राणके;

प्रश्न २ ] प्रश्नोपनिषद् १९३

वशे=अधीन है (हे प्राण!); माता पुत्रान् इव=जैसे माता अपने पुत्रोंकी रक्षा करती है, उसी प्रकार (तू हमारी); रक्षस्व=रक्षा कर; =तथा; नः श्रीः च=हमें कान्ति और; प्रज्ञाम्=बुद्धि; विधेहि=प्रदान कर; इति=इस प्रकार यह दूसरा प्रश्न समाप्त हुआ॥ १३॥

**व्याख्या—**प्रत्यक्ष दीखनेवाले इस लोकमें जितने भी पदार्थ हैं और जो कुछ स्वर्गमें स्थित हैं, वे सब-के-सब इस प्राणके ही अधीन हैं। यह सोचकर वे इन्द्रियादि देवगण अन्तमें प्राणसे प्रार्थना करते हैं—'हे प्राण! जिस प्रकार माता अपने पुत्रोंकी रक्षा करती है, उसी प्रकार तू हमारी रक्षा कर तथा तू हमलोगोंको श्री—कान्ति अर्थात् कार्य करनेकी शक्ति और प्रज्ञा (ज्ञान) प्रदान कर।'

इस प्रकार इस प्रकरणमें भार्गव ऋषिद्वारा पूछे हुए तीन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए महर्षि पिप्पलादने यह बात समझायी कि समस्त प्राणियोंके शरीरोंको अवकाश देकर बाहर और भीतरसे धारण करनेवाला आकाश-तत्त्व है। साथ ही इस शरीरके अवयवोंकी पूर्ति करनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी— ये चार तत्त्व हैं। दस इन्द्रियाँ और अन्तःकरण—ये इसको प्रकाश देकर क्रियाशील बनानेवाले हैं। इन सबसे श्रेष्ठ प्राण है। अतएव प्राण ही वास्तवमें इस शरीरको धारण करनेवाला है, प्राणके बिना शरीरको धारण करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। अन्य सब इन्द्रिय आदिमें इसीकी शक्ति अनुस्यूत है, इसीकी शक्ति पाकर वे शरीरको धारण करते हैं। इसी प्रकार प्राणकी श्रेष्ठताका वर्णन छान्दोग्य-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके आरम्भमें और बृहदारण्यक-उपनिषद्के छठे अध्यायके आरम्भमें भी आया है। इस प्रकरणमें प्राणकी स्तुतिका प्रसङ्ग अधिक है॥ १३॥

॥ द्वितीय प्रश्न समाप्त २॥

तृतीय प्रश्न

अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रतिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥

अथ ह एनम्=उसके बाद इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद)-से; कौसल्यः आश्वलायनः=कोसलदेशीय आश्वलायनने; =भी; पप्रच्छ=पूछा; भगवन्=भगवन्!; एषः प्राणः=यह प्राण; कुतः जायते=किससे उत्पन्न होता है; अस्मिन् शरीरे=इस शरीरमें; कथम् आयाति=कैसे आता है; वा आत्मानम्=तथा अपनेको; प्रविभज्य=विभाजित करके; कथम् प्रतिष्ठते=किस प्रकार स्थित होता है; केन उत्क्रमते=किस ढंगसे उत्क्रमण करता—शरीरसे बाहर निकलता है; कथम् बाह्यम्=किस प्रकार बाह्य जगत्‌को; अभिधत्ते=भलीभाँति धारण करता है (और); कथम् अध्यात्मम्=किस प्रकार मन और इन्द्रिय आदि शरीरके भीतर रहनेवाले जगत्‌को; इति=यही (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें आश्वलायन मुनिने महर्षि पिप्पलादसे कुल छः बातें पूछी हैं—(१)जिस प्राणकी महिमाका आपने वर्णन किया, वह प्राण किससे उत्पन्न होता है? (२) वह इस मनुष्य-शरीरमें कैसे प्रवेश करता है? (३) अपनेको विभाजित करके किस प्रकार शरीरमें स्थित रहता है? (४) एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाते समय पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता है? (५) इस बाह्य (पाञ्चभौतिक) जगत्‌को किस प्रकार धारण करता है? तथा (६) मन और इन्द्रिय आदि आध्यात्मिक (आन्तरिक) जगत्‌को किस प्रकार धारण करता है? यहाँ प्राणके विषयमें वे ही बातें पूछी गयी हैं, जिनका वर्णन पहले उत्तरमें नहीं आया है और जो पहले प्रश्नके उत्तरको सुनकर ही स्फुरित हुई हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रश्नोत्तरके समय सुकेशादि छहों ऋषि वहाँ साथ-साथ बैठे सुन रहे थे॥ १॥

प्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् १९५

तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥

तस्मै सः ह उवाच = उससे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; अतिप्रश्नान् पृच्छसि = तू बड़े कठिन प्रश्न पूछ रहा है (किंतु); ब्रह्मिष्ठः असि इति = वेदोंको अच्छी तरह जाननेवाला है; तस्मात् = अतः; अहम् = मैं; ते = तेरे; ब्रवीमि = प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ ॥ २ ॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें महर्षि पिप्पलादने आश्वलायन मुनिके प्रश्नोंको कठिन बतलाकर उनकी बुद्धिमत्ता और तर्कशीलताकी प्रशंसा की है और साथ ही यह भाव भी दिखलाया है कि 'तू जिस ढंगसे पूछ रहा है, उसे देखते हुए तो मुझे तेरे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देना चाहिये। परंतु मैं जानता हूँ कि तू तर्कबुद्धिसे नहीं पूछ रहा है, तू श्रद्धालु है, वेदोंमें निष्णात है; अतः मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर दे रहा हूँ' ॥ २ ॥

आत्मन एष प्राणो जायते यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥ ३ ॥

एषः प्राणः = यह प्राण; आत्मनः = परमात्मासे; जायते = उत्पन्न होता है; यथा = जिस प्रकार; एषा छाया = यह छाया; पुरुषे = पुरुषके होनेपर (ही होती है); [ तथा ] = उसी प्रकार; एतत् = यह (प्राण); एतस्मिन् = इस (परमात्मा) के ही; आततम् = आश्रित है (और); अस्मिन् शरीरे = इस शरीरमें; मनोकृतेन = मनके किये हुए (संकल्प) से; आयाति = आता है ॥ ३ ॥

व्याख्या—यहाँ महर्षि पिप्पलादने क्रमसे आश्वलायन ऋषिके दो प्रश्नोंका उत्तर दिया है। पहले प्रश्नका उत्तर तो यह है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राण परमात्मासे उत्पन्न हुआ है। (मु० उ० २। ३) वह परब्रह्म परमेश्वर ही इसका उपादानकारण है और वही इसकी रचना करनेवाला है; अतः इसकी स्थिति उस सर्वात्मा महेश्वरके अधीन—उसीके आश्रित है—ठीक उसी प्रकार जैसे किसी मनुष्यकी छाया उसके अधीन रहती है। दूसरे प्रश्नका उत्तर यह है कि मनद्वारा किये हुए संकल्पसे वह शरीरमें प्रवेश करता है। भाव

१९६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ प्रश्न ३ ]

यह है कि मरते समय प्राणीके मनमें उसके कर्मानुसार जैसा संकल्प होता है, उसे वैसा ही शरीर मिलता है, अतः प्राणोंका शरीरमें प्रवेश मनके संकल्पसे ही होता है॥ ३ ॥

सम्बन्ध— अब आश्लायनके तीसरे प्रश्नका उत्तर विस्तारपूर्वक आरम्भ किया जाता है—

यथा सप्तम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते एतान्नामानेता- न्नामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥

यथा=जिस प्रकार; सप्तम्राद एव=चक्रवर्ती महाराज स्वयं ही; एतान् ग्रामान् एतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्व=इन गाँवोंमें तुम रहो, इन गाँवोंमें तुम रहो; इति=इस प्रकार; अधिकृतान्=अधिकारियोंको; विनियुङ्क्ते=अलग-अलग नियुक्त करता है; एवम् एव=उसी प्रकार; एषः प्राणः=यह मुख्य प्राण; इतरान्=दूसरे; प्राणान्=प्राणोंको; पृथक् पृथक् एव=पृथक्-पृथक् ही; संनिधत्ते=स्थापित करता है॥ ४ ॥

व्याख्या— यहाँ महर्षि उदाहरणद्वारा तीसरे प्रश्नका समाधान करते हुए कहते हैं—‘जिस प्रकार भूमण्डलका चक्रवर्ती सप्तम्राद भिन्न-भिन्न ग्राम, मण्डल और जनपद आदिमें पृथक्-पृथक् अधिकारियोंकी नियुक्ति करता है और उनका कार्य बाँट देता है, उसी प्रकार यह सर्वश्रेष्ठ प्राण भी अपने अङ्गस्वरूप अपान, व्यान आदि दूसरे प्राणोंको शरीरके पृथक्-पृथक् स्थानोंमें पृथक्-पृथक् कार्यके लिये नियुक्त कर देता है॥ ४ ॥

सम्बन्ध— अब मुख्य प्राण, अपान और समान—इन तीनोंका वासस्थान और कार्य बतलाया जाता है—

प्रायूपस्थेऽपानं चक्षुः श्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष होतद्भुतमत्रं समं नयति तस्मादेताः समाधिषो भवन्ति ॥ ५ ॥

प्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् १९७

प्राणः= (वह) प्राण; पायूपस्थे= गुदा और उपस्थमें; अपानम् [ नियुङ्क्ते ] = अपानको रखता है; स्वयम्= स्वयं; मुखनासिकाभ्याम्= मुख और नासिकाद्वारा (विचरता हुआ); चक्षुःश्रोत्रे= नेत्र और श्रोत्रमें; प्रातिष्ठते= स्थित रहता है; तु मध्ये= और शरीरके मध्यभागमें; समानः= समान (रहता) है; एषः हि= यह (समान वायु) ही; एतत् हुतम् अन्नम्= इस प्राणाग्निमें हवन किये हुए अन्नको; समम् नयति= समस्त शरीरमें यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है; तस्मात्= उससे; एताः सप्त= ये सात; अर्चिषः= ज्वालाएँ (विषयोंको प्रकाशित करनेवाले ऊपरके द्वार); भवन्ति= उत्पन्न होती हैं॥ ५॥

व्याख्या— यह स्वयं तो मुख और नासिकाद्वारा विचरता हुआ नेत्र और श्रोत्रमें स्थित रहता है तथा गुदा और उपस्थमें अपानको स्थापित करता है। उसका काम मल-मूत्रको शरीरके बाहर निकाल देना है; रज, वीर्य और गर्भको बाहर करना भी इसीका काम है। शरीरके मध्यभाग—नाभिमें समानको रखता है। यह समान वायुको ही प्राणरूप अग्निमें हवन किये हुए—उदरमें डाले हुए अन्नको अर्थात् उसके सारको सम्पूर्ण शरीरके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है। उस अन्नके सारभूत रससे ही इस शरीरमें ये सात ज्वालाएँ अर्थात् समस्त विषयोंको प्रकाशित करनेवाले दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाएँ और एक मुख (रसना)—ये सात द्वार उत्पन्न होते हैं; उस रससे पुष्ट होकर ही ये अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं॥ ५॥

सम्बन्ध— अब व्यानकी गतिका वर्णन किया जाता है—

हृदि ह्येष आत्मा अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां
द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु
व्यानश्चरति ॥ ६ ॥

एषः हि= यह प्रसिद्ध; आत्मा= जीवात्मा; हृदि= हृदयदेशमें रहता है; अत्र= इस (हृदय) में; एतत्= यह; नाडीनाम् एकशतम्= मूलरूपसे एक सौ नाडियोंका समुदाय है; तासाम्= उनमेंसे; एकैकस्याम्= एक-एक नाडीमें; शतम् शतम्= एक-

१९८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ३

एक सौ (शाखाएँ) हैं (प्रत्येक शाखा-नाडीकी); द्वासप्ततिः द्वासप्ततिः = बहत्तर-बहत्तर; प्रतिशाखानाडीसहस्राणि = हजार प्रतिशाखानाडियाँ; भवन्ति = होती हैं; आसु = इनमें; व्यानः = व्यानवायु; चरति = विचरण करता है॥ ६॥

व्याख्या— इस शरीरमें जो हृदयप्रदेश है, जो जीवात्माका निवासस्थान है, उसमें एक सौ मूलभूत नाडियाँ हैं; उनमेंसे प्रत्येक नाडीकी एक-एक सौ शाखा-नाडियाँ हैं और प्रत्येक शाखा-नाडीकी बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा-नाडियाँ हैं। इस प्रकार इस शरीरमें कुल बहत्तर करोड़ नाडियाँ हैं; इन सबमें व्यानवायु विचरण करता है॥ ६॥

सम्बन्ध— अब उदानका स्थान और कार्य बतलाते हैं, साथ ही आश्वलायनके चौथे प्रश्नका उत्तर भी देते हैं—

अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७॥

अथ = तथा; एकया = जो एक नाडी और है, उसके द्वारा; उदानः ऊर्ध्वः = उदानवायु ऊपरकी ओर; [ चरति ] = विचरता है; [ सः ] पुण्येन = वह पुण्यकर्मोंके द्वारा; [ मनुष्यम् ] = मनुष्यको; पुण्यम् लोकम् = पुण्यलोकोंमें; नयति = ले जाता है; पापेन = पापकर्मोंके कारण (उसे); पापम् [ नयति ] = पापयोनियोंमें ले जाता है (तथा); उभाभ्याम् एव = पाप और पुण्य दोनों प्रकारके कर्मोंद्वारा (जीवको); मनुष्यलोकम् = मनुष्य-शरीरमें; [ नयति ] = ले जाता है॥ ७॥

व्याख्या— इन ऊपर बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियोंसे भिन्न एक नाडी और है जिसको ‘सुषुम्णा’ कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तकमें गयी है। उसके द्वारा उदानवायु शरीरमें ऊपरकी ओर विचरण करता है। (इस प्रकार आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका समाधान करके अब महर्षि उसके चौथे प्रश्नका उत्तर संक्षेपमें देते हैं—) जो मनुष्य पुण्यशील होता है, जिसके शुभकर्मोंके भोग उदय हो जाते हैं, उसे यह उदानवायु ही अन्य सब प्राण और इन्द्रियोंके सहित वर्तमान शरीरसे निकालकर पुण्यलोकोंमें अर्थात् स्वर्गादि उच्च लोकोंमें ले जाता