भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

स्थान है वहाँ आपके शिष्योंको भी जाना उचित है।” उस समय महात्माके शिष्य अत्यन्त रुष्ट हुए, बड़े चलेने मोलवीकी गरदन पकड़ कर उसका शिर महात्माके चरणोंपर धर कर कहा कि, देख ! करोड़ों मक्के इन चरणोंमें हैं। महात्मा नित्य किया करने गये उस समय मोलवीका उस शिष्यसे बहुत वाद विवाद हुआ। जब महात्मा आये तब मोलवीने शिकायत की। उस समय महात्माने अपने शिष्यको समझाया कि, मक्काके विषयमें मोलवीका कहना बहुत ठीक है। वह पवित्र स्थान दर्शन योग्य है। तू भी मोलवीके साथ मक्काके दर्शनको चला जा। वह शिष्य गुरुमुख था, हाथ बाँध कर खड़ा होगा, उसी समय मोलवीके साथ जहाजपर सवार हो गया। थोड़ी दूर जहाज चला था कि, एक तूफान आया जिससे जहाज टूट गया, सब आदमी डूब गये, पर वह चेला एक तख्ते पर बैठा रह गया, वह भी डूबनेके समीप भी था ही उसी समय समुद्रसे एक हाथ निकलक साथ शब्द हुआ कि, यदि तू अपना हाथ मुझे पकड़ा दे तो मैं तुझको बचालूँ। उस चलेने पूछा कि, आप कौन हो ? फिर शब्द आया कि, मैं पैगम्बर साहब हूँ। उस चलेने जवाब दिया, मैं नहीं जानता कि, पैगम्बर साहब कौन हैं ? मैं केवल अपने गुरु महाराजको जानता हूँ दूसरेसे कुछ सम्बन्ध नहीं रखता। तब वह हाथ छिप गया, वह गुरुमुख तख्तपर बैठा हुआ डूबकी खाता जाता था। कुछ कालके पीछे एक हाथ और निकला, शब्द हुआ कि, मुझे अपना हाथ पकड़ादे तो मैं तुझको बचालूँ। उस चलेने पूछा कि, आप कौन हैं ? तब उत्तर आया, कि मैं स्वयम् परमेश्वर हूँ। गुरुमुखने उत्तर दिया कि, मैं अपने गुरुके सिवाय दूसरे किसीको भी नहीं मानता। मेरा परमेश्वर तो मेरा गुरु है, दूसरे परमेश्वरको मैं नहीं जानता। तब वह हाथ भी छिप गया। कुछ कालके पीछे तीसरा हाथ निकला उसने पुकार कर कहा कि, तू अपना हाथ मुझको पकड़ा मैं तेरा दादा गुरु हूँ। इसने उत्तर दिया कि, मैं अपना हाथ अपने गुरुको पकड़ाऊँगा दूसरेको हाथ कदापि न दूँगा। चाहे जीवित रहूँ या मर जाऊँ। तब वह हाथ भी विलुप्त हो गया। इसके पीछे स्वयम् सत्यगुरु आये। इस शिष्यको हृदयसे लगा लिया उसे तुरंतही अपने स्थान पर लेआये गुरुमुखकी पूरी परीक्षा हो चुकी। सर्व शब्द उन्हीं गुरु महाराजके ही थे। जो शिष्यकी पूर्ण परीक्षाके लिये प्रकट किये थे। इस कथनका परिणाम यह है कि, चाहें कोई किसी भी प्रकारके तीर्थ व्रत करे दान पुण्य यात्रा कर्म उपासना ज्ञानकी पूर्णता प्राप्त करे, कठिनसे कठिन तपस्या करे शुभकर्मोंको सीमा पर्यन्त पहुँचावे परन्तु मुक्ति केवल गुरुमुखकी ही होगी बाकी सारा संसार भवसागरमें डूब जावेगा।

गुरुमुख सांसारिक पदार्थोंपर ध्यान नहीं देता । जैसे हो वैसेही करलेता है, किसीसे राग द्वेष नहीं रखता, प्रत्येक बातमें सत्यता तथा स्वच्छता बर्तता है, अपने गुरुसे ऐसा प्रेम करता है जैसा कि, जलसे मछली करती है, वो प्राकृतिक मनुष्योंसे कम प्रेम रखता है । गुरुमुख जो कार्य करता है । वो केवल गुरुकी प्रसन्नताके लिये गुरुकी आज्ञाके अनुसार करता है । गुरुमुख अपना अहङ्कार छोड देता है सब कार्य सत्यगुरुकी ओरसे जानता है । वह काम सब सत्यगुरुके अर्पण करता है । गुरुमुख सदैव आलस्य तथा नींद आदिसे पृथक् रहता है । वह सदैव अपने सत्यगुरुकी प्रशंसा तथा कृतज्ञता स्वीकार किया करता है । गुरुमुख जो कार्य करता है वो परमार्थके लिये करता है वो धैर्यको कभी नहीं छोडता । मनमुखके जितने काम होते हैं वो सब गुरुमुखके विपरीत हैं । ग्रन्थ लोक संदेशासे थोडा यहाँ लिखता हूँ—

धम्मदास बचन

चौ० — धम्मदास जी बिनती लावे । संशय एक मेरे दिल आवे ॥
काया मध्य बहुत अस्थाना । कौन वस्तुका धरिये ध्याना ॥
कौन ताल और कौन द्वारा । कहैं होई हंसा करे बिहारा ॥
कहिये सत्गुरु मोहिं अरथाई । देखूं तो मो मन पतियाई ॥

सत्यगुरु बचन

जैसे दूधमें घीव रहाई । ऐसे पुरुष है तनके माहीं ॥
सद्गुरु पहले भेद बतावे । शब्द विदेह हंस घर आवे ॥
शब्द चढ़ि सो हंसा आवे । तबही पुरुषको दर्शन पावे ॥
छांडो धरती छाड अकाशा । छांडो पाँच तत्वको बासा ॥
कह कबीर निरन्तर घर पावे । हंसा घर होई सुरति लगावे ॥
विदेह नामको अङ्क जो पावे । यमसे जीव जान मुक्तावे ॥
सप्त स्वर्ग और सप्त पताल । चौदह भुवन तजि होइ निराला ॥
शब्दै धरती शब्द प्रकाशा । शब्द सँग हंसा देखि तमाशा ॥
शब्द ले हंसा करहू बाता । ताको आद्या करै न घाता ॥
ररा शब्दको देव वहाई । अमी शब्द मैं बैठो आई ॥
अमी शब्दकी बोलें बानी । तहवाँ सुरति करो पहचानी ॥
जब हंसा देही गुण त्यागे । तबनहिं चोर धर्मरायको लागे ॥
हम धर्मरायसे बाचा हारा । सौंप दीन्ह सकलो संसारा ॥
नतगुण होई जीवको बासा । सो सब रहे तुम्हारे पास ॥

जब लगिजीव गुण छूटेनाहीं । तबलगि रहे चौरासी माहीं ॥
जब लगि पाप पुण्यकी आशा । तब लगि लेई गर्भमें वासा ॥
कोटिन ज्ञान कथ दिखलावे । कोटिन ध्यान समाधि लगावे ॥
धर्मरायसे छूटे नाहीं । गुणतत जब लगि जीवके माहीं ॥

धर्मदास बचन

धर्मदास विनती तब लाई । अचरज बात जो कहो गोसाई ॥
देहीके गुण जो कैसे छाँडे । कैसे निगुण उलटे माँडे ॥
कैसे तन आपा विसरावे । कैसे जीव परम पद पावे ॥
ततगुण बिनु काया नहिं चाले । कौन जुगुतसे उनको पाले ॥
कैसे मनुवा अस्थिर होही । कैसे हंसा होय विदेही ॥
आठ काठसे देह बनाई । उनको कैसे दे विसरा ॥
निःअक्षरको कैसे पावे । कैसे गुणको मार ढहावे ॥
सब जिव तुम सौपे धरमराये । हंसको पन्थ दृढावन आये ॥
एको जीतन होय उबारा । मोसे चलै न पन्थ तुम्हारा ॥

साखी- तत्त्वगुण छुट न देहको, कैसे होय उबार ।
पन्थ तुम्हारा कठिन है, धर्मराय बरियार ॥

सत्यगुरु बचन

चौ० -धर्मदास तू परमहित मोरा । तुम्हरो पला न पकरै चौरा ॥
जिते जीव परवाना पावे । तब सो हंसा लोक सिधावे ॥
लोक जानमें भेद है भाई । कोई न पूछै चित्त लगाई ॥
सहज अठासी द्वीप सुधारा । जहां सब हंसा करे विसारा ॥
जैसे चाल चलै संसारा । तैसे तैसे द्वीप मझारा ॥
सर्व मूल तोहि देउँ बताई । तुमसे कछू न राखुँ छिपाई ॥
द्वीप अंशके हैं बड़े भारा । सकल हंस उन द्वीप मझारा ॥
निःतत्त्वी जाय पुरुष दरबारा । सकल द्वीपसे द्वीपसो न्यारा ॥
पुरुष हजूर जौ चाह रहाई । सो जिव आप दिये विसराई ॥
एक छन मांहि अमर घर जाई । छनहा हंस देउँ पहुँचाई ॥
जब सद्गुरु मन्दिर पग देई । चरण धोइ चरणामृत लेई ॥
सेवाकरत सुरति चल आई । तबहि काल घर बजै बधाई ॥
धर्मदास मैं कहूँ पुकारा । विरला जाय पुरुष दरबारा ॥

साखी - शब्दको खोज करें नहीं, चिन्ता देह शरीर ॥
बिना शब्द पहुँच नहीं, अस कथ कहैं कबीर ॥

बिना अहारी जीव है, बिना अग्नि बिन पान ।
बिना पिण्ड हंसा चलै, है छन कर पहचान ॥
चित्र हंस बिना पिण्डका, उदय सो देखो नाम ।
भेद जो दे गुरु समर्थ, तब देखो वह ठाम ॥

शब्द—धरमनि वहि देश हमारो बासा ।

अमर पुरुष जहाँ आप विराजै हंसा करत विलासा ॥
विष्णु विरञ्जि औ शिव सनकादिक थके ज्योतिके पासा ।
चौदह खण्ड वसै यम चौदह यह सब काल तमशा ॥
सात सुरतिके आगे समरथ श्वेत भूमि परकाशा ।
संशय लोक नहीं है बाकी खुले केवडा बारह मासा ॥
वहांके गये बहुरि नहिं आवे आवागमनको नाशा ।
सदा आनन्द होत है वा घर कबहू न होत उदासा ॥
चन्द्र न सूर दिवस नहिं रजनी नहिं धरणी आकाशा ।
अमृत भोजन हंसा पावे रहत पुरुष के पासा ॥
कहैं कबीर सुनो धरमदासा छाडो खलक की आशा ।

सत्यगुरु कबीर साहब कहते हैं कि, जो जीव पाँच तत्त्व और तीन गुणसे अलग हो वही सत्यपुरुषके दरबार पहुँचता है । परन्तु जितने जीव सत्यगुरुके शरणमें आते हैं उन सब पर साहबकी दया होती है । उनको रहने को उत्तम स्थान दिये जाते हैं, जहाँ वे सुखपूर्वक निर्भयतासे रहते हैं, परन्तु पुरुषका दर्शन नहीं पाते । जो पाँच तत्त्व और तीन गुणसे अलग होते हैं, वही त्रिगुणातीत लोग सत्यपुरुषके दर्शनके अधिकारी होते हैं । इसी कारण सत्यगुरुने कहा है कि, सत्यलोकमें अट्ठासी सहस्र द्वीप हैं, उन सब द्वीपोंमें हंसोंका स्थान होता है, जहाँ वे आनन्द पूर्वक रहते हैं । जो कोई उसमें कर्म करता है, वह सत्यगुरुकी दयासे पाँच तत्त्व तथा तीन गुणसे छूट जाता है । बिना पाँच तत्त्व तीन गुणसे छूटना अत्यन्त असम्भव है । युगों युगोंमें सत्यगुरुके हंस अपने कर्तव्योंसे सत्यपुरुषोंके लोकके मार्गका उपदेश देकर जीवोंको सत्यलोकके पथपर करते हैं । पीछे अपने कथनको चरितार्थ करते हुए अपनी चर्यासे सिद्ध करके दिखाते हैं कि, सत्यपुरुषके हंस ऐसे होते हैं, कलियुगके हंसोंने भी इस कराल युगमें सिद्ध करके दिखा दिया है कि, इस कराल युगका भी सत्य पुरुषके हंसोंपर कोई असर नहीं होता ।

उनका शास्त्र

कबीर साहिबकी स्वसंवेद वाणी है क्योंकि, उसमें परमार्थका निरूपण है यही वाणी सभी हंसोंके लिये नियत है स्वच्छ तथा निर्मूल है अनेक स्थानोंपर स्वसंवेदकी भिन्न २ पुस्तकें मिलती हैं सन्त महन्त उनके बड़ी सावधानीसे रक्षा करते हैं कि, उनमें किसी प्रकारका उलटफेर न हो जायें एवं जो मिथ्या पक्षपाती जनोंने अपनी ओरसे कुछ मिला दिया हो तो वो जाननेमें आजावे इस कारण पूरी चौकसी की जाती है। इतना करने पर भी छली लोग छलसे नहीं चूकते। इसी कारण कबीर साहब कुछ सताद्वियोंके पीछे अपनी पुस्तकोंको रद्दकर देते हैं। वर्तमान कालमें कबीर पन्थियोंके पास सत्ययुग, त्रेता, और द्वापर युगोंकी पुस्तकें नहीं हैं। उसका भी मुख्य कारण यही बात है गरीबदासजी अपने अर्जनाम में यही बहुत लिखते हैं कि—

है सतगुरु मेहवीन अविनत' कबीर । छुटे इस्मके 'नालजनम की जञ्जीर ॥
वाबन लाख वाणी जो दीनी डुबोय । सुने रामानन्दा रहे मुख गोय' ॥
अगम धन्य ध्यानं अमानं अमाँ । स्वसम्बेद साखी सुरती कर वयौ' ॥
स्वसम्बेद पढिये जो पूरन मुराद' । स्वसम् पर स्वसम्बाच लागी समाध ॥
है सत्यपुरुष साहब दयाके जो मूल' । गरीबदास झूले समाधान फूल ॥

किन्हीं २ छला कपटी, तथा विद्वोही गुरुविमुखियोंने स्वयं ग्रन्थबनाकर उसमें अपने मतलबकी सारी बातें रखदी हैं पर उनमें वक्ता कबीर साहब और श्रोता धर्मदासजीको ही लिखा है। सद्गुरुके हंस लोग तो उन छलियोंके छल को शीघ्रही पहचान लेते हैं, कितने एक सरल दृश्यके भोले भाले लोग उन ग्रन्थोंको पढ सुनकर भटक जाते हैं। इस प्रकार कालपुरुष तथा उसके पुत्रलोग बड़ा छल करके स्वच्छ अमृतको विषमय करनेका उद्योग करते हैं। परन्तु बुद्धिमान सचेत लोग तुरन्तही पहिचान लेते हैं स्पष्ट जान लेते हैं कि, जो कबीर साहबके प्राचीन ग्रन्थ तथा वाणी हैं उसके विरुद्ध यह बात कैसे हो सकती है। इस कारण स्वसंवेद पाठ करनेवालोंको सदा सावधान रहना चाहिये कि, जब सत्यगुरुके ग्रंथ तथा वाणीको पढे अथवा सुनें तो उसपर भली प्रकार शोध विचार किया करें। जहाँ कहीं कबीर साहबके वाणीके विरुद्ध पावें तो तुरन्त समझ लें कि, यहाँ तो काल के पुत्रोंमेंसे किसीकी कबीरके नामसे बनावट है कि, वो कितनेही कबीर पन्थी कबीर साहब तथा धर्मदासजीके नामसे धूर्तता करके कबीर पन्थियोंको भटकाया चाहते हैं वही यमके दूतोंकी धूर्तता है। कालके पुत्रोंने अनेक युक्तियाँ

शाहंजाह इबराहीम अहम श्रेष्ठ मन्शूर और शिवली

की और कर रहे हैं कि, मनुष्योंको सत्यपन्थसे भटका दें इस कारण कबीर साहबने पहलेहीसे प्रबंध कर दिया है कि कुछ गाड़िया पुस्तकोंकी दिल्ली नगरमें गड़वादी हैं जो नियत समय पर निकलेंगी वे शुद्ध तथा निर्दोष हैं । वही प्रचलित होगी जिनमें कुछभी दोष न होगा । उपरोक्त पुस्तकें सर्वथाही निर्दोष और अनुपम हैं । उन ग्रन्थोंके पढ़ने सुननेसे यमके कपट निरर्थक हो जावेंगे । केवल चारसौ वर्षोंने कबीर साहबकी वाणीकी यह दशा होने लगी तो ऐसी अवस्थामें इतिहास तथा अन्यान्य पुस्तकोंकी क्या गणना है ! जो अत्यन्त प्राचीन पुस्तकें थीं सब दूषित हो गईं, वे तनिक भी शुद्ध नहीं रहیں । सब ग्रन्थ कट कुट हो गये हैं पर स्वसंवेद अशुद्ध नहीं होता क्योंकि, सब औपधर्म्यके ग्रंथोंके श्रोता वक्ता मर गये । परन्तु स्वंवेदके श्रोता वक्ता कदापि नहीं मरते, सदैव जीवित रहते हैं । स्वसंवेद जब मृत्युके समीप पहुँचता है तो फिर उसमें जी डाला जाता है जिससे हरा भरा हो जाता है । स्वसंवेदकी शिक्षा उत्पत्ति कालसे लेकर आजतक बराबर चली आती है । परन्तु उस पर चलनेवाले थोड़े होते हैं । उसका कारण ये है कि, १-कालपुरुष मुंह २ से बोलता हुआ संसारको भटकाता है जीवोंकी बुद्धिको नष्ट करता हुआ अन्तःकरणको अशुद्ध कर देता है । २-यह जीव पशुवत् कर्मकी तृष्णाको नहीं छोड़ता है, मांस खाता है, निषेध कर्मोंको करता है । उसमें ऐसा लुब्ध हो जाता है कि, उनको छोड़ना उसे अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है । ३-इस संसारकी मान बड़ाई तथा लज्जा आदि भी इस जीवको नहीं छोड़ते । ४-प्रत्येक पुरुषकी बुद्धिपर बैठकर काल पुरुष अपनी प्रभुताई कर रहा है । ५-कबीर साहबकी दयादृष्टि हो पर उसके गुरुकी दया न हो तो भी कार्य्य नहीं चलता दोनोंकी ही दयादृष्टि होनी चाहिये । जिस समय गुरु दया करते हैं तो कबीर साहबकी उस पर पूरी दयादृष्टि हो जाती है फिर उसके उद्धार होनेमें कोई भी कसर नहीं रह जाती । सत्ययुग द्वापर त्रेता और कलियुगके हंसोंके लिये युगानुरूप सत्यपुरुषका शास्त्र रहा है, जिससे सहजही में जीव सत्यपुरुषके उपदेशोंको समझले । जिस किसीने इन चारों युगोंमें सत्यपुरुषका कहना न माना उसे दुखसागरमें मग्न होना पड़ा पर जिसने कथन माना उसका उद्धार हो गया कालका उनपर कुछ भी प्रभाव न चला । सत्यपुरुषका शास्त्र युगानुसारी भाषामें रहता है कलियुग के जीवोंको जैसा चाहिये उसी भाषामें सत्यपुरुषका शास्त्र मौजूद है इसीसे अग्नित जीवोंका उद्धार हो गया है इबराहीम अद्वम आदिको इसी युगकी भाषामें उपदेश मिला था ।

भिन्न पन्थोंके संस्थापक शिष्य गण ।

नानक शाह साहब

नानकशाह साहब कबीर साहबके खास चेलोंमें थे। उनको सत्य गुरुने पञ्जाब प्रान्तकी गुरुवाई प्रदान की थी, उसका जन्म मौजा तिलोंडी जिला लाहौर (पञ्जाबदेशमें) हुआ था। सम्बत् १५२६ विक्रमीमें कालू नामक खत्रीके गृहमें उनका जन्म हुआ। लड़कपनसेही श्रेष्ठताके चिन्ह परिलक्षित थे। जब उनका वयस सोलह वर्षका हुआ तब माताने एक दिवस बीस रुपये देकर कहा कि, इन रुपयोंसे उत्तम सौदा कर लाओ। नानक साहब उन रुपयोंको लेकर चले, आगे एक मण्डली साधुओंकी मिली इसको देखकर इनका हृदय स्वच्छ हुआ सोचा कि, साधुओंको खिलानेसे बहुत अच्छा सौदा हो सकता है वह बीस रुपया जो पासमें था उससे भण्डारा करके उस स्थानपर सब साधुओंको खिला घरको चले गये। फिर जब नानक साहबकी वयस (आयु) अठ्ठाईस वर्षकी हुई तब सम्बत् १५५३ विक्रमीमें उन्होंने बेईनदीके भीतर गोता मारा। तब उस समय आपको जिन्दा बाबा मिले, दूध उपदेश देकर अपना शब्द भली भाँति दृढ़ाया नदीके बाहर निकले तो पञ्जाब देशमें उनकी महिमा फैली। उनके शिष्योंकी लाम लग गई।

नानकशाह साहब तो अपने जीवन भर गुरुके आज्ञाकारी ही होकर सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश किया करते थे। पर नानकशाहके पीछे इस पन्थके लोग कबीर गुरुसे फिर गये इस कारण सत्यपुरुषकी भक्ति और स्वसंवेदकी शिक्षा छूट गई। काल पुरुषकी भक्तिको और लोग झुक पड़े। गुरुके विरुद्ध होनेपर अनेक काल तक उनके पास कोई ग्रंथ नहीं रहा। गुरु अर्जुनजीने सन्तोंकी बाणी एकत्रित करके एक ग्रंथ प्रस्तुत किया जो अबतक उनके पास उपस्थित है। अब वे लोग कबीर साहबको तो अपना गुरु स्वीकार नहीं करते, वरन् अन्यान्य भक्तोंके समान एक भक्त जानते हैं। इस कारण अनेक प्रमाणोंको एकत्रित करता हूँ कि, नानक देवके कबीर साहिबही गुरु थे।

इतिहासिक प्रमाण १—एच. एम. एलफिन्स्टन साहब जो अंग्रेजी इतिहास लिखनेवालोंमें नामी और बहुत बड़े इतिहास लेखक हो गये हैं वह अपने भारतके इतिहासमें इस प्रकार लिखते हुए नानकशाहके विषयमें साक्षी देते हैं कि नानक शाह कबीर साहबके शिष्योंमेंसे एक शिष्य थे। परन्तु उन्होंने अपने लेखमें कोई पृथक् वृत्तान्त कबीर साहबके विषयमें नहीं लिखा है, इसका

कारण यह है कि, उसके अनुगामियोंमेंसे किसीने भारतके देशी इतिहासमें कोई भाग नहीं लिखा ।

एलफिन्स्टन साहबके भारत इतिहासके १२ वें जिल्दके प्रथम भागके ६७८ पृष्ठमें देखो—वह सिक्खोंके विषयमें इस प्रकार लिखते हैं कि, इस धर्मके आचार्य नानक पन्द्रहवीं शताब्दीके अन्तमें प्रगट हुये थे । वे कबीर साहबके शिष्य थे । अतएव वह एक प्रकारके हिन्दू एक ईश्वरवादी थे । परन्तु उनके धर्मका मुख्य अभिप्राय सबको एक धर्ममें मिलाकर भेदभाव मिटानेका था ।

द्वितीय प्रमाण २—भारतके इतिहासका संक्षेप, जिसको कौलास चन्द्र मच्छना बी. ए. और देवेन्द्रनाथ राय बी. ए. आफ एल. एम. एस. कालेज भवानी-पुरने लिखा है । वह इस प्रकार है, देखो भारतके इतिहासके एकसौ पाँच पृष्ठ में ।

रामानन्दके बारह शिष्योंमें कबीर साहब बड़ेही सुप्रख्यात हुये । उन्होंने बीजकका निर्माण किया । पण्डितोंके लिये शास्त्र तथा वेदके आशयको गूढ़ बताया । नानक साहबने सर्व धार्मिक युक्तियाँ कबीर साहबसे सीखी थीं ।

फिर देखो उसी पुस्तकके एकसौ आठ पृष्ठमें नानकशाहने सिक्खधर्म, पन्द्रहवीं शताब्दीमें स्थापित किया । उन्होंने सर्व धार्मिक रीतियाँ कबीर साहब से प्राप्त कीं ।

तृतीय प्रमाण ३—एच. एच. विलसन साहब अपनी दरसनामक किताबमें तीसरे प्रकरण पृष्ठ ६९ में हिन्दुओंके धर्मके विषयमें लिखते हुए कबीरपंथियोंके विषयमें लिखते हैं कि, कबीर साहबकी शिक्षाका प्रभाव उनके मुख्य २ शिष्योंपर बहुत पड़ा । वो उनकी अनुपस्थितिमें उससे भी बढ़कर सिद्ध हुआ । क्योंकि सर्व पन्थोंको इस पन्थकी शाखायें कह सकते हैं । गुरु नानक, साहब जो हिन्दुओं में एक विशेष धर्मके आचार्य हुये हैं, प्रायः अपने धार्मिक ध्यानमें कबीर साहबका ही प्रायः अनुकरण किया है ।

चतुर्थ प्रमाण ४—ग्रन्थ लेखकके पहिले लिखेका व्याख्यान करनेके समय मालकाम साहबके लेखसे निम्नलिखित अनुवाद किया है । “प्रख्यात तथा सुप्रसिद्ध कबीरके विषयका नानकने अनुकरण किया है । कबीर पंथी कहते हैं, कि, नानकने कई सहस्र साखिया कबीर साहबके पुस्तकोंसे ली हैं ।” मालकाम साहबकी पुस्तक भारतके इतिहासको देखो । वहां यह सब मिलेगा ।

पंचम प्रमाण ५—मोनियर विलियम साहब एक सुप्रसिद्ध अंग्रेज जिन्होंने स्वयम् भारतवर्षका भ्रमण किया है जो ब्लेयल कालेज आक्स फोर्डमें प्रोफेसर थे, अपनी पुस्तक भारतके धार्मिक ध्यान तथा आयुके छठे प्रकरणके १५८ पृष्ठमें लिखते हैं जो इस प्रकार आरम्भ होता है ।

तत्त्वा और जीवा

एकता धर्म जिसके रचयिता कबीर साहब हुए हैं—

इसमें कोई संदेह नहीं कि, पन्द्रहवीं तथा लोलहवीं शताब्दीके बीच उत्तर भारत में कबीर साहबके धर्मका बड़ा प्रचार हुआ। इसमें संदेह नहीं कि, यही धर्म पञ्जाबी सिख धर्मकी जड़ है, यह इस बातसे जाना जाता है कि, कबीर साहबकी बाणी नानकशाह तथा उनके स्थानापत्रोंने स्थान स्थानपर अपनी पुस्तकोंमें उद्धृत की है।

षष्ठप्रमाण ६—ये ही महाशय अपनी पुस्तकके १६२ पृष्ठमें सिक्खधर्मके ग्यारहवें प्रकरणमें नानक साहबका विवरण करते हैं तथा जो कुछ वह करते हैं, वह ट्रम्प साहबके ज्ञातव्यकी उस विज्ञताके अनुसार करते हैं, जिसे कि, उन्होंने स्वयम् लाहौरमें आकर प्राप्त किया था, उनका लेख यह है कि, नानक शाहने नये धर्मके बनानेकी बात नहीं कही यथार्थमें उस धर्मकी जड़ कबीर साहबकी बाणी ही है। क्योंकि, कबीरके धर्म पुस्तकको ही वह अपनी पुस्तकमें उद्धृत करते हैं।

सप्तम प्रमाण ७— राजा शिवप्रसाद साहब बनारसी कृत तारीख आइ-नानुभा प्रथम भाग जो नौनाब लेपिटनेण्ट गवर्नर बहादुर, अवध पश्चिमोत्तर प्रान्त सन् १८७२ ई. की आज्ञानुसार सरकारी मुद्रालयोंमें सातवीं बार पाँच सहस्र छपा था। उसके एकसौ पाँच पृष्ठकी पहली पंक्तिमें यह लिखा है कि, पन्द्रहवीं शताब्दीमें कबीर साहबके शिष्योंमें से नानकशाहने सिक्खोंका एक नवीन धर्म प्रचलित किया।

अष्टम प्रमाण ८— डबल्यू. डबल्यू. हण्टर सी. आई. ई. एल. एल. डी. साहबने अपनी इण्डियन इम्पायर इतिहास पुस्तकके एक सौ चौरानबे पृष्ठमें कबीर साहबके कौतुकोंके विषयमें लिखा है। फिर इसी पुस्तकके १०३ और १०४ पृष्ठमें कबीर साहब तथा नानक शाहके विषयमें लिखा है।

नवम प्रमाण ९—एक दिवस साधू हॉसूदासजी आकर गोस्वामी धर्म दासजीसे कहने लगे कि हे स्वामीजी ! आज दिनतक एक साधु पञ्जाब देशसे आया है, उसने नानकशाहका विचित्र वृत्तान्त और करामातकी बातें सुनाई हैं। धर्मदास साहबने कहा कि, वह बातें सुनाओ हॉसूदासने कितनी ही बातें सुनाई उन्हें सुनकर धर्मदास साहबने कहा कि, हे हॉसूदासजी ! गुरु नानकजी तो मेरे गुरु भाई ही हैं।

दशम प्रमाण १०—गोस्वामी गरीबदास स्पष्ट रूपसे कहते हैं कि, नानकशाह तथा दादुराम इत्यादि कबीरसाहबके अनन्य शिष्य हैं।

एकादशमा प्रमाण ११ कितनेक कबीर पन्थी विद्वान्, गुणी साधु कहते हैं कि नानकशाह, कबीर साहबके शिष्य हैं । इसमें कोई सन्देहही नहीं है ।

द्वादशमा प्रमाण १२— जब यह फकीर (अर्थात् पुस्तकका रचयिता) सन् १८५२ ई. में अपने गुरु महाराजके साथ था वह भी यही कहा करते थे कि, नानकशाह कबीर साहबके शिष्य हैं अनेक बार उनका विवरण मेरे समक्ष करते थे जिससे मैंने जाना कि, वास्तवमें नानकदेव कबीर साहबके अनन्य शिष्योंमें हैं । अनेक पुस्तकोंमें कबीर साहब तथा नानक साहबका वृत्तान्त लिखा हुआ है । अब मैं इस पुस्तकके अन्तमें (आठवें परिच्छेदके १२२ प्रश्नके उत्तरमें) समप्रमाण और भी लिखूंगा ।

नानकशाह साहबके जन्म साखीकी विशेष बातें ।

यहाँ अब मैं वह बातें लिखता हूँ जिनको स्वयम् नामक साहबकी जन्म साखीसे चुना है । सब जन्म साखियोंमें भाई वालेकी जन्म साखी सर्वोत्कृष्ट तथा बड़ी प्रामाणिक मानी जाती हैं, इसी जन्म साखीको सब मानते भी हैं । नानक साहबके परमधाम सिधार जानेपर भाई बाला गुरु अङ्गदजीके पास गया । अङ्गदजी नेत्रोंमें जलभर कर उससे कहने लगे कि, हे भाई बाला ! आप तो गुरुजीके साथ फिरते रहे हो आपको सब वृत्तान्त अच्छी तरह मालूम है । मुझे सत्यगुरुके भ्रमण तथा घूमने फिरनेका सब हाल कहो । इस बातपर भाई बालाने गुरु अङ्गदजीसे जो कुछ कहा वही बात इस जन्म साखीमें लिखी हुई है । यह जन्म साखी सम्बत् १५८३ विक्रमीकी है जिससे ये बातें लिखी गई हैं । सवाल जवाब पंजाबीमें है उनका साथही साथ अर्थ कर दिया गया है । जन्म साखी २६६ पृष्ठ भाई मरदाना नानक साहबसे प्रश्न करता है कि—

प्रश्न—हे महाराज तू सानू जो गुरु मिलिया सो कौन मिलिया, आहा ते नाम उसदाकी आहा ।

अर्थ—हे महाराज ! तुमे कौन गुरु मिला है, उसका नाम क्या है !

उत्तर—ता फिर नानकजीने कहिया, नाम उसदा बाबा जिन्दा हुआ है, जित्यै तोड़ी पवन और जल है सब उसदे बचन बिच चलदे हैं ।

अर्ध—उसका नाम बाबा जिन्दा है, जहाँतक पवन और जल हैं, सब प्राणी उसकी अज्ञाके बीच चलते हैं ।

फिर देखो (पृष्ठ २२६) भ्रमणके समय एक साधुने नानक साहबसे पूछा कि, तुसाड़ा (अर्थात् तुम्हारा) गुरु कौन है ? तब नानकजीने उत्तर दिया था कि, मेरा गुरु जिन्दा है ।

फिर देखो ३४६ पृष्ठ । जब नानक साहब कन्धार देशको गये तब उनको यारअली नामक एक फकीर मिला । उसके नानकशाहसे बहुतेरे प्रश्नोत्तर हुये । उनमें एक प्रश्न यह भी था—

बारअलीने पूछा कि, आपका गुरु कौन है ! तब नानक साहबने उत्तर दिया कि, मेरा गुरु बाबा जिन्दा है ।

अब मैं यहाँ वही भाषा लिखता हूँ जिसमें यारअली और नानक साहबमें बातें चीतें हुई थीं—

बोलो भाई बाहु गुरु ! नानक उभ्ये उडारी लेभो ता जाय कन्धार विच्छ खड़े हुये । उत्थे एक मुगल फकीर आहा उस नाल भेट गई तब उसने पूछया ।

अर्थ—नानकजी वहाँसे उडके कन्धारमें पहुँचे वहाँ एक मुगल फकीरसे भेट हुई, तब उसने नानक साहबसे पूछा ।

“शु’माचे नाम दारी? ता गुरु नानक बोल्या” मा’, नाम नानक निरङ्कारी! फिर मुगल बोल्या “न’ फहमीदम” ता गुरु नानक बोल्या मा’ बन्द ए खुदायेम । फिर मुगल बोल्या, “शुमा’ पीर कुदाम” ता गुरु नानक बोल्या, मा’ पीर जिन्दा पीर” ता फिर मुगल बोल्या “शुमा’ पीर जिन्दा पीर” ता गुरु नानक कहा? आरे’ आ’रे । ता फिर मुगल कहा? ‘मा’ एतकादनेस्त” ता गुरु नानक कहा । “चेगुप्त” ता “मुगल कहा, पैदा” शुदी मुरीद शुदी ।

ता गुरु नानक कहा, “यक” खुदाय पीर शुदी कुल आलम मुरीद शुदी फकीर खबरदार निगाह दीगर नदारी । ता मुलग’ पीर उत्थ डगा ।

ता गुरु नानक कहिया, “एक” खुदायदीरा दीगरे नेस्त । ता मुगल बोलिया “शुभा” पीर मामुरीद।”

ता गुरु नानक कहिया “शु”मानाकचे’दारी” ता मुगल कहिया “ना”म मन यार अलीअस्त” ता गुरुनानक कहिया, “ना”म शुमाबाबुलकन्धारी ।”

पृष्ठ ३९६ जब नानक शाह बाबर बादशाहके साथ वार्तालाप कर रहे थे, तब बाबर शाहने पूछा कि, सुन नानक ! तू कबीरका चेला है ? तब गुरु-नानकने कहा, हाँ ।


१ प्र०—तुमारा नाम क्या है? २ उ०—मेरा नाम नानक निरंकारी है । ३ प्र०—मैंने नहीं समझा । ४ उ०—मैं ईश्वरका दास हूँ । ५ प्र०—तुमारा कौन गुरु है । ६ उ०—मेरा जिन्दा पीर गुरु है । ७ प्र०—तुमारा गुरु जिंदा पीर है ? । ८ उ०—हाँ हाँ । ९ मुझे विश्वास नहीं है । १० क्या कहा ? ११ पैदा होते ही शिष्य हुआ । १२ ईश्वर-गुरु है संसार चेला है सन्तको उसके अतिरिक्त दूसरी दृष्टि नहीं होती । १३ मुगल चरणोंपर गिरा । १४ एक ईश्वरके बिना दूसरा कोई नहीं है । १५ आप मेरे गुरु, मैं आपका चेला हूँ । १६ तुमारा नाम क्या है ? १७ मेरा नाम यारअली है । १८ तुमारा नाम बाबुल कन्धारी ।

कबीर पन्यके प्रवर्तक महात्मा धर्म दासजी

सुन बाबर कलन्दर कबीर ऐसा था जो परमेश्वरके समान था उससे परमेश्वरमें किसी प्रकारकी विभिन्नता नहीं थी । उसे परमेश्वरसे जो भिन्न देखता है वो परमेश्वरका सेवक नहीं है । वह (कबीर) बड़ाही पवित्र है ।

फिर देखो ३१८ पृष्ठ, जब नानक शाह ध्रुव मण्डलमें पहुँचे तो वहाँ उनसे स्वयम् कबीरसाहबने आकर यों कहा—

चौ०—कहे कबीर सुन नानक भाई । हम तुमको उपदेश कराई ॥

फिर देखो १२७ पृष्ठ, जब, नानक शाह विरक्तकी अवस्थामें भाई लालूके घरमें गये उसने देखा तो उनके गलेमें जनेऊ था तब भाई लालू नानक शाहके लिये भोजन तयार करा बुलाने गया । नानकशाहने कहा कि, मेरा भोजन यहाँ ही ले आओ, भाई लालूने कहा कि, आपके गलेमें जनेऊ है बिना चौँकाके आप कैसे खाओगे ?

इससे स्पष्ट मालूम होता है कि, नानक शाह वैष्णव थे फकीरी अवस्थामें केवल वैष्णवहीके गलेमें जनेऊ तथा कण्ठी इत्यादि होती है, दूसरे किसीके नहीं होती ।

नानकशाह पञ्जाबसे भ्रमण करते हुये कुरुक्षेत्र गये । वहाँसे हरिद्वार पहुँचे वहाँसे पीलीभीत होते हुए अयोध्या जा विराजे, वहाँसे काशीजीमें जाकर कबीर साहबको मिले । अपने गुरुका दर्शन करके आनन्दको प्राप्त हुए ।

यह बात यहाँतक जानी गई सो लिखी गई । भविष्यमें भली भाँति प्रमाणित किया जावेगा । अब यहाँपर कुछ बातें नानक बोधमेंसे लिखना भी उचित है । वह वार्तालाप जो नानक शाह और कबीर साहबकी हुई वह यह है —

चौ०—देश पंजाव पहुँच सो जाई । जिन्दा रूप धन्यो सोभाई ॥

अनहद वाणी किया पुकारा । सुनके नानक दरस निहारा ॥

सुनके अमरलोककी वाणी । जान परा तब समरथ ज्ञानी ॥

नानक वचन

अरज सुनो प्रभु जिन्दा स्वामी । कहां अमरलोक बसे निजधामी ॥

कोई न जाने तुम्हरा भेदा । खोज थके ब्रह्मा चहुँ वेदा ॥

कोई न कहे अमर विज वानी । धन्य कबीर पुरुष तुम ज्ञानी ॥

आवागम ते कोई नहि छूटा । तीनलोक मुनिवर सब लूटा ॥

हम धरि जन्म बहुत तप कीन्हा । अमर भेद हमहूँ नहि चीन्हा ॥

कहु गुरु भेद सकल ब्रह्मण्डा । सात द्वीप पृथिवी नौ खंडा ॥

जिन्दा वचन

नानक अहो बहुत तप कीन्हा । निरङ्कार बहुतै दिन चीन्हा ॥
निरङ्कारते पुरुष निनारा । अजरदीप टाके टकसारा ॥
वहाँते प्रकट निरञ्जन काला । ताको कठिन भयङ्कर ख्याला ॥
तीन लोक उन दियो भुलाई । उन सँग पुरुष न एकौ पाई ॥
पुरुष बिछोह भयो तुम जबते । काल कठिन मग रोक्यो तबते ॥
जबते हमसे बिछुन्यौ भाई । साठ हजार जन्म तुम पाई ॥
धरि धरि देह भक्ति भल कीन्हा । फिर काल चक्र निरञ्जन दीन्हा ॥
निर्गुण मांहि निरञ्जन थाना । जप जप जाहि भये जिव हीना ॥
घाट रोंकि सत्पुरुष छिपावा । चार वेद कथ जीव भर्मावा ॥
यह गति सुना निरञ्जन केरी । सत्य पुरुष कोई बिरला हेरी ॥
गहो मम शब्द तो उत्तरो पारा । बिन सत शब्द गये यम द्वारा ॥

नानक वचन

धन्य पुरुष तुम यह पद भाखी । यह पद अमर गुप्त कहै राखी ॥
अरज हमार सुनो प्रभु स्वामी । तुमही कहि गुरु आदि निशानी ॥
तुम निज पुरुष गुप्त कहाँ रहिया । यह तुम हममें नाहीं कहिया ॥
जबते हम तुमको नहीं पावा । अगम अपार भरम फैलावा ॥
कहो गोसाई हमते ज्ञाना । पार पुरुष हम तुमको जाना ॥
काल दयाल तुम्ही निरवारा । सकल सृष्टिके तुम करतारा ॥
अमर लोक निज कहो निनारा । सकल सृष्टि तिरदेव पुकारा ॥
हम धरि देह बहुत दुख मानी । बहुत दिवसमें मिली निशानी ॥
पिण्ड ब्रह्ण्डको हमते कहिये । अगम गँभीर शब्दते लहिये ॥

इस स्थान पर कबीर साहबने नानक साहबको पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंका एक स्वरूप दिखाया है । कालपुरुषके धोखे तथा दगाका विवरण करके कहा है कि, हे नानक ! तू मेरे सार शब्दको स्वीकार करे तो भवसागरके पार उत्तर सकेगा । इतना सुनकर नानक साहबने कहा कि—

चौ०—धन्य पुरुष प्रभु निर्मल ज्ञानी । अजर सार निज तुम्हरी बानी ॥
धन्य कबीर परम गुरु ज्ञानी । भेद जो अमर सुनाई बानी ॥
वाह गुरु समरथ वाह गुरु जिन्दा । काट देव मम भव जल फन्दा ॥

जिन्दा वचन

सुन नानक निर्गुण व्यवहारा । करै भक्त सब काल पसारा ॥
मरे जिये यह संधि कहावै । जपतप करे तिरथ भरमावे ॥

काल सुमिरिके डुबकी मारें । खाली रहे अन्त में हारें ॥

वे नहिं पुरुष खोजको पावें । उलट पलट भवसागर आवें ॥

अब यहाँ कबीर साहब नानक साहबसे सब तीर्थ व्रत इत्यादिका विवरण करते हैं कि—विना यथार्थ ज्ञानके सबमें कालपुरुषकी धूर्तता तथा दगाबाजी ही होती है ।

नानक वचन

आगे सुनी न काहू जानी । धन्य कबीर पुरुष तुम ज्ञानी ॥

कालको चक्र कठिन बल जोरा । इतने जीव बचाओ मोरा ॥

बली पुरुष तुम कालको नाथा । अमरलोक मोहिं लेचल साथा ॥

निरङ्कार अब सुमिरौ नाहीं । फेर न जन्मों या जग माहीं ॥

तीनों लोक काल है देवा । जान परा अब हमको भेवा ॥

निर्गुण जपूं न सर्गुण ध्याऊँ । पारपुरुष तुम शरणा पाऊँ ॥

पुरुष पुरान मिले निजपीरा । खेवा मोर लगाओ तीरा ॥

अब यही सत्यगुरुने नानक साहबको अपना शब्द देकर कालपुरुषसे अलग किया है । फिर प्रलयका समस्त वृत्तान्त सुनाके काल पुरुषका सब ढङ्ग प्रगट किया है एवं भली भाँति समझा दिया है कि, हे नानक ! अब तुम पर कालका बल नहीं चलेगा, यदि मेरे पथपर अटल रहे तो ।

नानक वचन

धन्य पुरुष ज्ञानी करतारा । जीवकाज प्रकट संसारा ॥

यहाँ ते गया न साबित कोई । अजर पुरुष तुम निश्चल होई ॥

नाम कबीर जपै जिन जोई । ताकी फेंट न पकरै कोई ॥

धन्य कर्ता प्रभु बन्दी छोरा । ज्ञान तुम्हार महाबल जोरा ॥

दिया दान मोहि किया उबारा । कबहुँ न छोड़ूं शरण तुम्हारा ॥

मैंने सुना है कि, तावरीख अकबरीमें कबीर साहब और नानक साहबके विषयमें बातें अनेक लिखी हैं । दूसरी पुस्तकोंमें भी उपरोक्त बातें लिखी हुई हैं यहाँ तक कि, कितनेही साधुभी इस बातको जानते हैं । नानक शाह साहबको सत्यगुरुने कालपुरुषके देशसे छुड़ा करके अमर कर दिया, नानकजी हंस कबीर हो सुक्ति रूप हो गये, एवं अधिकारी होकर अपनी इच्छानुसार लोककल्याण करते रहे ।

कबीर साहब तो सम्बत् १५७५ विक्रमीमें अन्तर्धान हो गये पर नानक साहब पृथिवीपर अपना धर्म प्रचलित करते हुए सत्यपुरुषकी भक्तिका उप-

देश करते फिरे । जब सत्यलोकको गये तो वहाँसे कबीर साहबने उन्हें पृथिवी-पर भेज दिया कि, हे नानक ! अभी तुम पृथिवीपर जाओ आप नाम जपो तथा दूसरोंसे जपाओ । नानक साहब सत्यलोकसे पलटे, सत्य गुरुके वचनानुसार पृथिवीपर भ्रमण करते हुए लोगोंको उपदेश करते फिरते थे, उनके साथ भाई बाला और मरदानभी रहा करते थे, अपनी सिद्धिके बलसे दोनोंको अपनेही साथ उडाले जाते थे । नानकशाहसाहबका शरीर दिव्य तत्त्वका हो गया था, वे त्रिगुणातीत हो गये थे, उनको प्यासकी कुछभी चिन्ता नहीं थी । भाई बाला भी भूखका कष्ट सहन कर सकता था परन्तु मरदाना मीरासी (गानेवाला) भूख सहन करनेमें जरा कच्चा था । इस कारण जरासी भी भूख लगनेपर वह भूख भूख करके पुकारता था । एक दिवस वह नितान्तही विवश होकर कहने लगा कि, गुरुजी ! अब आप मुझको विदा कीजिये मैं अपने घरको जाऊँगा क्योंकि, मैं तुम्हारे साथ भूखा मरता हूँ ।

यह देख नानक साहबने उसे समझाया कि, तू घर मत जा, यहाँसे आठ कोसके ऊपर एक कूड़ा राक्षस रहता है, यह प्रायः मनुष्योंको पकड़ पकड़ कर खाता है । तुझको भी खा जावेगा । मरदानेने कहना न मान कर कहा कि, गुरुजी अब मुझे अपने घरवालोंका मोह लगा है, मुझे जाने दीजिये । यद्यपि नानक साहबने कईबार मना किया पर उसने न माना, उनसे बिदा होकर घरको चला । राहमें उसको कूड़ा राक्षस मिला और पकड़ लिया । कड़ाहमें तेल भरकर तपाने लगा जिसमें मरदानेको भूनकर उसमें खाजावे । जब कूड़ेने मरदानेको पकड़ लिया उसने देखा कि, यह तो अवश्यही मुझको भूनकर खालेगा, तब उसने नानक साहबका ध्यान करके कहा कि, गुरुजी ! अब मेरे प्राण बचाओ । मैंने जो आपका कहना न माना उसका फल मुझको मिल गया अब मैं आपकी शरणमें हूँ । अब आपकी आज्ञा कभी अस्वीकार न करूँगा । इस प्रकार उसने विनय की तब नानक साहबने सब कुछ मालूम कर लिया कि, कूड़ेने मरदानेको पकड़ लिया । अब भूनकर उसको खाया ही चाहता है । बालासे कहा कि, हे भाई बाला ! अब वह मुझको इस दुःखमें स्मरण करता है । तब बालेने कहा कि, गुरुजी ! आपने तो उसको बहुत समझाया था परन्तु उसने आपका कहना न माना । अब अच्छा है कि, कूड़ा राक्षस उसको खाजाय जो आज्ञा नहीं मानता उसकी ऐसीही दशा होनी चाहिये । नानक साहबने कहा कि, यह बात अच्छी नहीं, वह तो अब मेरे शरण में है । मैं कैसे उसकी सहायता न करूँ ? उस मरदाना पर दया आई । बालेको अपने साथ लिये एक पलभरमें उसके पास पहुँचे ।

महाराज वीरसिंह

कूड़ा राक्षसने मरदानेको बाँधकर गरम तेलमें डाल दिया । वह तेलका कड़ाह साहबकी दयासे ठण्ढा हो गया, कूड़े को बड़ा आश्चर्य हुआ कि, यह कौन पुरुष है । जिसके कारण मेरी उत्तम कड़ाही एकदम पानीके समान ठण्ढी हो गई ।

यह कूड़ा राक्षस पहले ब्राह्मण और बड़ा पण्डित था । एक दिवस वह बैठता था कि, उसके गुरु आये । उनको देखकर वह अपनी विद्याके घमण्डसे नहीं उठा, न गुरुको प्रणामही किया । गुरुने कहा कि, हे पापी ! तूने अपनी विद्याके घमण्डसे प्रणाम नहीं किया है इस कारण राक्षस हो जा ; कूड़ाने अपने गुरुके चरणोंपर गिरकर कहा कि, अब मेरे अपराधोंको क्षमा करो । गुरुने उसको एक दर्पण देकर कहा कि, तू अवश्यही राक्षस होगा पर जिसको खानेको पकड़े उसे इस दर्पणमें देख लेना । जो कोई मनुष्य दिख ई दे उसको मत खाना जो पशु दिखाई दे उसको खा जाना । जब तुमको कोई मनुष्य दिखाई देगा उसके द्वारा तेरी इस योनिसे मुक्ति हो जायगी ।

कूड़ेने मरदानेको कड़ाहीमें डाला, कड़ाही ठण्ढी हो गई, नानक साहबने कूड़ेसे कहा कि, तू इसको भूनकर क्यों नहीं खाता क्या विलम्ब है ? कूड़ेने उस दर्पण द्वारा नानक साहबको देखा तो स्पष्ट रूपसे मनुष्यकी भव्य मूर्ति दिखाई दी ।

तब वह कूड़ा राक्षस नानक साहबके चरणोंपर गिरा, विनय करने लगा कि, महाराज ! आज मेरे गुरुका वचन पूरा हुआ । आजदिनतक जो मैं मनुष्योंको मारकर खाता था, प्रत्यक्षमें तो वे सब मनुष्यरूपमें दिखाई देते थे । परन्तु यथार्थमें वे सब पशुही थे । आजके दिवस केवल आप एक मनुष्य मिले हो दूसरा मनुष्य कभी कोई नहीं मिला, जितने मिले सब पशुही मिले । उन्हींको मैं खाया करता था । आप मनुष्य मिले हो, मेरा छुटकारा कीजिये । कूड़े राक्षस पर नानक साहबकी दया हुई वह सुखी हो गया । यह उदाहरण मैंने इस कारण लिखा है, कि, केवल हंस कबीरही को मनुष्यत्वका पद प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं होता क्योंकि, जैसे मैंने पहले सुपच सुदर्शनका वृत्तान्त लिखा कि, पुष्करजीमें सवा लाख प्रदीप जलवाकर जब देखा तो केवल सुपच सुदर्शनजी मनुष्य दिखाई दिये । शेष सभी डङ्गर, ढोर, कीड़े, मकोड़े, पशु, पक्षी इत्यादि थे । तब श्रीकृष्णचन्द्रने पाण्डवोंसे कहा कि, हे राजा युधिष्ठिर ? यमने सुपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता देखी कि, नहीं ! वही बात तथा गुण नानक साहब तथा दूसरे हंस कबीरोंमें देखलो । कुछ भी विभिन्नता नहीं जिनको हंस पद प्राप्त नहीं हुआ सो सब बकुले हैं केवल हंस कबीर ही मनुष्य हैं ।

साखी - काहे हिरनी दूबरी, यही हरियरे ताल ।

लक्ष शिकारी एक मृग, कैंतिक टारे भाल ॥

हंस कबीरोंमें ही ताकद है कि, अन्यान्य ब्रह्माण्डोंमें उड़कर चले जायें वहाँकी सैर करें। अतः नानक साहब केवल इस पृथिवीपरही नहीं बरन् अन्यान्य देशों तथा द्वीपों और ब्रह्माण्डोंकी भी सैर करते रहे हैं, केवल संसारहीमें बंद न रहे तथा लोकोपकार भी अच्छा किया।

तीनलोकके जीव तो कूएके मेंडकके समान हैं, क्योंकि वे बाहर नहीं निकल सकते। परन्तु हंस कबीर शक्तिमान हैं जहाँ चाहें चले जावें एक पल भरमें करोड़ों योजन उड़ जावें। नानक साहबकी जन्म साखियोंमें लिखा है तथा स्वयं नानकसाहबने कहा भी है कि, मैंने अनेक बार देह धारण की है, मैं सदैव ठाकुरपूजा करता था, इस कारण मुझको मुवितपद शीघ्र प्राप्त हुआ है, मुझको जिन्दा बाबा मिले, आवागमनका समस्त दुःख दूर हुआ।

एक अंग्रेजी पढ़े लिखेका मुझसे बातलाप हो रहा था, तब नानक साहबके सैरकी बात छिड़ी तो मैंने कहा कि, वे एक ऐसे देशमें गये जहाँ केवल स्त्रियाँही स्त्रियाँ थीं कोई मर्द ही नहीं था, वह स्त्रियोंका देश था। यह बात सुनकर उसने मेरी बातका खण्डन किया कि, भला जी ? योरोपवासियोंने समस्त पृथ्वीको छान डाला पर ऐसा देश पृथ्वीपर कोई नहीं जहाँ केवल स्त्रियाँही हों कोई मर्द न हों ! मैंने उत्तर दिया कि, विलायतवालोंने केवल पृथ्वीका ही भ्रमण किया है आकाशका नहीं। नानक साहब तो करोड़ों योजन एक पलभरमें उड़ जाते थे, न जाने यह वृत्तान्त किस ब्रह्माण्डका है जहाँ केवल स्त्रियाँ ही हैं ? नानक साहब ब्रह्मज्ञानी थे। ब्रह्मज्ञानी स्वयम् पवित्र परमेश्वरके समान हैं, ब्रह्मज्ञानीकी बड़ी प्रतिष्ठा कही है यथा—“ब्रह्म जानाति ब्रह्मैव भवति” इति श्रुतिः। यदि नानक साहब ब्रह्मज्ञानी न होते तो आपही सत्यलोकको कैसे जा सकते थे ? सारे सिद्धोंमें इनकी श्रेष्ठता कैसे होती ? यथार्थमें उन्हें ईश्वरी विद्या प्राप्त थी। इसीके बल वे बली थे।

दादूरामजी

दादूरामजी भी कबीर साहबके मुख्य शिष्योंमें थे, जबतक संसारमें रहे तब तक सत्यगुरुके अनुगृहीत होते हुए कृतज्ञ रहे। उनके सिधारनेके बाद उनके अनुयायियोंने वही काम किया जो नानक साहबके शिष्योंने किया है। उन लोगोंने कबीर साहबका नाम छोड़ दिया। सत्यगुरुका नाम छोड़तेही सत्य-पुरुषकी उपासना और स्वसंवेदकी शिक्षा उनसे पृथक् होगई। वे लोग स्वयम् सत्यगुरुका नाम छोड़कर अन्धकारमें चलते हुए भौति भौतिकी उपासना करने लगे। जहाँ जहाँ कबीर साहबका नाम और श्रेष्ठता थी उसको छोड़कर अपने

आप अपने पैरपर कुल्हाड़ा मारते गये। सत्यगुरुके नामसे उनको घृणा होने लगी—जहाँ कबीर साहबका नाम देखते उसी ग्रंथको पसन्द न करते। कालपुरुषने उनकी बुद्धिपर ऐसा परदा डाला कि, उनको तनिक भी सुधि नहीं रही, सत्यगुरुके नाम छिपानेमें ही प्रसन्न होने लगे। दादुराम स्वयम् सत्यगुरुसे बड़ा प्रेम रखते थे। सुतरां गरीबदासजीकी बाणीमें लिखा है कि, दादुरामजी एक दिवस अपनी सभामें बैठे थे तब लोगोंसे पूछा कि, इस सभामें ऐसा भी कोई है जिसने कबीर साहबका दर्शन किया हो? उस समय एक बूढ़ा मनुष्य बोला कि, महाराज! मैंने कबीर साहबका दर्शन किया है। उस समय श्रीदादुरामने कहा कि, यदि तुमने दर्शन किया है तो मुझको सत्यगुरुका रङ्गरूप बतलाओ? वह बूढ़ा विवरण करने लगा कि, जब मैं छोटा बालक था, तब मेरा दादा कबीर साहबके दर्शनोंको जाया करता था, मैं भी अपने दादाकी उँगली पकड़कर उसके साथ जाता, जब मुझे कबीर साहबका दर्शन होता था उस समय मैं कबीर साहबकी शरीरकी ओर देखा करता था। साहबकी देह ऐसी जान पड़ती थी जैसे स्वच्छ दर्पण हो, उसके आर पार दिखाई देता था, दृष्टि रुकती नहीं थी। स्वच्छ काँचमें तो दृष्टि रुकभी जावे पर कबीर साहबका शरीर दृष्टिको तनिक भी नहीं रोकता था। यह बात सुनकर दादुरामने जान लिया कि, इस बूढ़ेने निश्चय कबीर साहबका दर्शन किया है। तब दादुरामने एक जलसे भरा बर्तन मँगवाया और उस बूढ़ेकी आँखें धोई उस जलको आप पीकर सभी सभासदोंको पिलाकर कहा कि, धन्य वे आँखें हैं जिन्होंने सत्यगुरुका दर्शन किया। ऐसी देह इस पृथिवीमें न किसी दूसरेकी है न होनी है वे तो एक केवल कबीर साहबही थे उसी समयकी दादुरामजीकी यह साखी है कि—

“जिन आँखन गुरु देखिया, सो किन पीवे धोवे।” कबीर साहबका शरीर नहीं था। वह एक केवल कौतुक था जिससे कि, शरीर दिखाई देता था। समस्त स्वसंवेदका यही कथन है कि, कबीर साहब विदेह हैं। उनकी देह केवल देखने मात्र है वास्तवमें नहीं है।

गोपालदास दादूपन्यी कृत दादुरामजीकी जन्म साखीके पहले विश्रामके अनुसार दादुरामजी सम्बत् १६०१ विक्रमीमें उत्पन्न हुए जब ग्यारह वर्षके हुए तो उनको कबीर साहब बूढ़े के स्वरूपमें मिल गये। उस समय दादुराम लड़कोंके साथ खेल रहे थे। बूढ़े बाबाने उनसे एक पैंसा मँगगा, दादुरामने पैंसा, लाकर उसी समय दे दिया। उस पैंसेका बूढ़े बाबाने पान मँगवाकर खाया। पीछे दादुरामजीसे पूछा कि, इस पानकी पीक कहाँ डालूँ। दादुरामने कहा कि, मेरे

मुंहमें डाल दीजिये । बूढ़े बाबाने पानकी पीक दादूरामके मुंहमें डाल दी । उस समय दादूरामका हृदय स्वच्छ तथा प्रकाशित हो गया ; कबीर साहब अन्तर्धान हो गये । जब पहले कबीर साहब मिले तब दादूरामने पूछा कि, आपकी क्या जाति है ? कहाँ रहते हो ? क्या नाम है ? कबीर साहबने उत्तर दिया कि, मेरी जात पाँत कुछ नहीं मैं सब स्थानोंमें रहता हूँ, बूढ़न मेरा नाम है । जो मुझसे प्रेम करता है वही मुझको पाता है, दूसरा नहीं ।

सातवषोंके पीछे दादूरामको सत्यगुरु फिर दिखाई दिये, ददूरामका काम पूरा कर दिया, पीछे दादूरामका धर्म पृथिवीपर प्रचलित हुआ लोग उनके उपदेश ग्रहण करनेको आने लगे, उनकी बड़ी कीर्ति होगई; बूढ़ा बाबा दादूरामका प्रसिद्ध गुरु हुआ ।

गुरुदेव अङ्गकी साखी दादूराम बचन
सामरमें सदगुरु मिले, दिये पानकी पीक ।
बूढ़ा बाबा जस कहे, यह दादू की सीख ॥
मेरे कन्त कबीर है, वर और नहिं वरिहैं ।
दादू तीन तिलाक है, चित्त और न धरिहैं ॥
गोपालदास दादूपन्थी कृत दूसरा विश्राम

दादूरामकी जन्मसाखी

तीजे पहर निकट भई सांझा । खेलत हते सो लडकन मांझा ॥
बीते जबहि एकादश बरसू । बूढ़ा रूप दियो हरि दरसू ॥
साखी - दादू पूछे देव तुम, कौन सो जात कहाव ।

बूढ़ा जाति न पाति है, प्रीतिसँ कोई पाव ॥

चौ०- परम पुरुष परमेश्वरगामी । देव भये पद अन्तरजामी ॥
भव संसार तरन और तारू । ऋद्धि सिद्धि मुक्ती दरबारू ॥
मांग्यो आनि जो पैसा एकू । सब काहूको लियो बिबेकू ॥
बालक दीन्हो बार न लाई । रीझे बाबा सब सुखदाई ॥
विगसे बाबा निकट बुलाई । सकल शरीर हाथ तब लाई ॥
सरस्वति बोल दियो मुखमाहीं । राम दियो भेटे कोइ नाहीं ॥
सरबस देव माथ कर दीनो । बालक बुद्धि जानि नहिं लीनो ॥
एक बुंद पग ऊपर आई । चरणों लागि मुक्ति होय जाई ॥
रहे जो सात बरस घर माहीं । फिर दियो दरस निरञ्जन राई ॥
कर उपदेश भय अन्तरधाना । तब स्वामी प्रगटे ज्यों भाना ॥

जहाँ व्यवपार पिताकर भाई । स्वामी हरिको भक्ति चलाई ॥
छाड़यो देश तज्यो घरबारा । स्वास उसास भजैं करतारा ॥
पुनि सामरको कियो पयाना । बाढी प्रीत विरह अधिकाना ॥
पारब्रह्म ते तारी लागी । गुप्त ज्योति उर अन्तर जागी ॥
झिल मिल नूर तेज निज देखी । जीवन जन्म भो सुफल विशेषी ॥
उपजा अनुभव ज्ञान अपारा । आया कबीर तुरत तेहि वारा ॥
मिले कबीर समाधि जगाई । ब्रह्मानन्द प्रकाश उगाई ॥
पदसे पद साखीसे साखी । रहनि गहनि सबही सो भाखी ॥
निर्गुण ब्रह्मको कियो समाधू । तबही चले कबीर साधू ॥
तुर्ककी राह खोज सब छाडी । हिन्दूकी करनी ते न्यारी ॥
षट् दर्शन से नाही सङ्गा । निसिदिन रहे रामके रङ्गा ॥
स्वाँग भेष पछ पंथ न मानी । पूर्ण ब्रह्म सत्य कर जानी ॥
देवी देव न पूजा पाती । तीरथ ब्रत न सेवा जाती ॥
हिन्दू तुर्कन झगडा कीन्हों । सब काहूको उत्तर दीन्हों ॥

दादूरामजीके ग्रंथों तथा जन्मसाखियोंको देखकर साराहाल मालूम हो जायगा ।

मुझको स्मरण होता है कि, लगभग आठ दस वर्ष बीते होंगे कि, एक मनुष्य मुझसे कहता था कि, अभी मैं दादूरामजीका दर्शन कश्मीरके पर्वतमें करके ही लौट रहा हूँ। परन्तु दादूपंथियोंने भी यथाशक्ति कबीर साहबका नाम छिपानेमें कुछ भी उठानेमें बाकी नहीं छोड़ा है।

शिवनारायणदासजी

शिवनारायणदासजी जातिके राजपूत कसबा चन्दबारा, (परगना जफर आबाद जिला गाजीपूर सूबा इलाहाबाद) के रहनेवाले थे। अंग्रेजी^१^ अधिकारके आरम्भकालमें सत्यगुरुका प्रताप शिवनारायणदास पर प्रगट हुआ, उनके हृदयमें प्रकाश फैल गया, उनका पंथ ससार में प्रचलित हुआ, उन्होंने कई एक ग्रंथभी बनाये थे, जो उनके शिष्योंमें विद्यमान हैं।

अगहन सुदी त्रयोदशी शुक्रवार सम्बत् १७९१ विक्रमी में शिवनारायणदासको सत्यगुरु मिले। उनसे पूछा कि, आपका क्या नाम है। तब सत्यगुरुने कहा कि, मेरा नाम दुःखहरण है। जो कोई दुःखहरणका दर्शन पावेगा उसका

^१^ अंग्रेज लोग उसी समयसे भारतवर्षमें अपनी कला, कौशल और व्यवहारादि जमाने लगे थे, पर उस समय इनका राज्य नहीं हुआ था।