कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
घृणाकी दृष्टिसे देखनेका फल
किसका पालन करेंगे क्या सौंपेंगे ? किसको सौंपेंगे ? बँकुण्ठके पर्वतपर मुसलमानोंके बच्चोंकी सब आत्मायें रहेंगी, नहरोंपर पक्षियोंके स्वरूपमें चरा करेंगी, इसको आवागमनके अतिरिक्त और क्या कहा चाहिये ? यदि कोई दूसरी जाति अथवा दूसरे धर्मका मनुष्य कहे कि, मुसलमानकी आत्मा मृत्युके पीछे पशु और पक्षी होता है तो वे असंतुष्ट हों । पर जब वे स्वयम् इस बातको स्वीकार करते हैं तो किससे कहा जावे ? इस बातको मुहम्मदी नहीं समझते कि, जब मानुषिक शरीर छोड़कर पशु पक्षी हो गया तो उससे क्या हीनावस्था होगी । वे लोग स्वजिह्वासे स्वीकार करते हैं मेरे कहनेकी आवश्यकता नहीं, न मैं यह कहना उचित ही समझता हूँ । जिसको वे बँकुण्ठ कहते हैं वह भी एक पृथ्वी है वहाँके वे पशु पक्षी हैं, मुसलमानोंके बच्चे और फिरउनके बच्चे दोनों पशुओंके योनिमें प्रवेश कर गये । फिर काफिर और मुसलमानोंमें क्या विभिन्नता है । शहीदोंकी आत्मायें सब हरे पक्षी होती हैं । हरा-लालश्वेत इत्यादि रङ्गके पशु समान हैं जहाँ उनका भाग्य है चरा करें जहाँ उनका भाग्य राह दिखावे वहाँ बसेरा करें । उनको क्या मालूम कि, खुदा कौन है, कहाँ चरने तथा बसेरा करनेसे क्या लाभ और क्या हानि है । सब प्रकारके पशुओं और पक्षियोंका नियम है कि, दिनभर चरते और साँझको बसेरा लेते हैं । खुदाई सिंहासन हो अथवा मानुषिक सिंहासन हो रातको तो कहीं बसेरा लेनाही पड़ेगा इन ध्यानो तथा विचारोंमें सभी मुसलमान धोखेमें पड़े हुए हैं ।
५१-तारीख मुहम्मदीके अनुसार-हदीसरोजतुलअहबाबके पहले फ़स्लके अन्तमें मुहम्मद साहब कहते हैं—
إِصْلَاحِ طَعْبَةٍ لِي أَرْكَامُهَا
अर्थात् पवित्र पुरुषोंकी पीठोंसे पवित्र माताओंकी पेटोंमें मैं बहुत दिवसोंसे पड़ता चला आता हूँ ।
मुहम्मद साहबका आवागमन—इस प्रकार बराबर होता चला आया है । मुहम्मदी इस प्रकार समझते हैं कि, आदमसे लेकर अबदुल्ला तक सब पिता प्रपितामह आपके पवित्र हों यह बात भी प्रमाणित नहीं होती । क्योंकि, आपके माता पिता पर महाकण्ठ उपस्थित हुआ । यदि कोई विचार करे कि, आदमका वीर्य और मुहम्मदकी आत्मातक इसलाबतअबःसे अरहाम ताहिरामें नुक़ल करता चला आया है तो फिर यह हदीस ठीक न होगी :—
योहन्ना नबी हजरत ईशा
أَوَّلُ مَخَاطِبِ اللَّهِ تَعَالَى
अर्थात् खुदाने सबसे पहले मुहम्मदके तेजको उत्पन्न किया ।
समीक्षा—यदि खुदाने सबसे पहलेही मुहम्मदके तेजको उत्पन्न किया होता तो आदमके वीर्यसे अबदुल्लाके वीर्यतक मुहम्मदकी आत्मा न आती । वरन् मुहम्मदहीका वीर्य तथा मुहम्मदकाही तेज समस्त संसारमें होता । क्योंकि, एकही शरीर तथा एकही प्राण समस्त संसारमें है । एकको छोड़कर दूसरेमें आत्माका प्रवेश करनेहीका नाम आवागमन है । लिखा गया है कि, खुदाने अपनी आत्माको आदममें फूँका । अतः खुदाकी आत्माने आदममें गमन किया । फिर मुहम्मदकी आत्मा खुदाकी आत्मासे पहले क्योंकर हो सकती है ।
५२ नरकमें देखा—मुहम्मद साहबके अनागतवक्ता होनेके तेरह वर्ष पीछे जब हजरतका मआराज (आकाशपर जाना) हुआ सन्स्त आकाशोंकी सैर करके जब आप फिर मक्केमें आये तब अबु-लहब हजरतजीके चचाने (तारीख मुहम्मदीके अनुसार) पूछा कि, तुमने अपने दादा अबदुल मतलबको कहाँ देखा, आपने उत्तर दिया कि, नरकमें देखा । यह बात सुनकर अबु-लहब जलमरा कि, मेरे पिताको यह नरकमें बताता है उसी दिनसे मुहम्मदका बैरी हो गया ।
समीक्षा—अब यहाँ पर विचारना तथा समझना चाहिये कि, जब मुहम्मद साहबने जाकर सब वैकुण्ठ तथा सब नरकोंको देखा तो सबको भरा पाया । वैकुण्ठके लोग वैकुण्ठमें और नरकके नरकमें थे । यदि कयामत (महाप्रलय) के पीछे लोग वैकुण्ठ तथा नरकको जाते तो वे सब स्थान भरे न होते । जब कि, कयामत (महाप्रलय) के पूर्वही नरक तथा वैकुण्ठको भरे तब कयामत (महाप्रलय) के दिनका हिसाब आज्ञानतासे करें । आवागमन अविश्वान्त प्रवाहित रहता है वैकुण्ठ नरक प्रत्येक समय तैयार रहता है ।
५३—मुहम्मदियोंकी कयामत (महाप्रलय) के स्थानोंमें अनेक प्रकारकी मूर्तियाँ दिखाई देंगी, जैसा जिसका स्वरूप है वैसीही योनि उनके लिये ठहराई गई है । इसी प्रकार उनका आवागमन होगा ।
५४—हदीसोंमें आया है कि, जब कयामत (महाप्रलय) में सब कुछ मिट जावेगा तब उसके पीछे अमृतस्त्रोत आकाशसे आवेगा । सब जीव पुनः जीवित हो जायेंगे । जितने जीव होंगे उतनेही छिद्र सब पृथ्वीपर होंगे समस्त छिद्रोंसे निकल निकलकर सब बाहर खड़े होंगे । कयामत (महाप्रलय) के
समीक्षा, मुहम्मद मुस्तफा
स्थानमें न्यायके लिये जावेंगे। हशर (महाप्रलय) गाह सदैवसे प्रचलित हो रहा है। पृथ्वीमें अनगिनती छिद्रसे तात्पर्य्य चौरासी लाख योनिसे है, अनगिनती योनि है सो सब भग है और आवहयात वीर्य है कि, यह आकाश अर्थात् ब्रह्माण्डसे उत्तरता है गर्भमें प्रवेश करके स्वरूप बनाता है। पुरुष आकाश है तथा स्त्री पृथ्वी है जब आरम्भमें पुरुष आकाश तथा पृथ्वी स्त्रीका स्वरूप हुआ तब वीर्य गर्भमें जाकर एकसे अनेक स्वरूप हो गया प्रत्येक छिद्रसे समस्त जीव निकल पड़े। न्याय यही है कि, अपने भाग्यानुसार सबको दण्ड तथा सुख है।
५५—देखो कुरानका चौबीस सिपारा सूरय मोमन (४) रकूअ (४५-४६) आयत पर्यन्त लिखा है कि, फिर बचा लिया खुदाने मूसाको बुरे दावसे जो करते थे और उलट पारी फिरऊनवालोंपर बुरी तरहकी विपत्ति। आग है कि, दिखा देती है उनको संध्यातक प्रातःकाल और जिस दिवस उठेगा कयामत (महाप्रलय) को प्रवेश करावेगा। फिरऊनवालोंको कठिनसे कठिन विपत्तिमें।
समीक्षा—कयामत (महाप्रलय) के पूर्व सहस्रों नरक तथा वैकुण्ठको जा चुके। सो बात पहले प्रमाणित हो गई। कयामत (महाप्रलय) की किसीको आवश्यकता नहीं रही। सकता की मृत्युको कब्रका कण्ट समझा गया। सुकर्मियोंको वैकुण्ठ तथा कुकर्मियोंको उस समय नरक दिखाई देता है। सब पुण्य फल तथा पापफल स्वप्नवत् बीत जाता है यह जीव अपने कर्मोंके अनुसार दुःख तथा सुखमें डाला जाता है। यहाँपर मैं मुसलमानोंकी प्रत्यक्ष गलती दिखाता हूँ। जो कोई सोचेगा समझेगा वो सुख पावेगा।
एक ब्रह्माण्ड है तथा दूसरा पिण्ड है। ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंका एक स्वरूप तथा एक अवस्था है, उसमें तनिक भी विभिन्नता नहीं, दोनोंके स्वरूपमें स्वरूप तथा एक अवस्था है, उसमें तनिक भी विभिन्नता नहीं, दोनोंके स्वरूपमें ब्रह्माण्ड पिण्डकी एकता है। सब पृथ्वीके तत्त्ववेत्तागण मानते हैं कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंका एकही स्वरूप तथा अवस्था है। जब पिण्ड दोनोंका और ब्रह्माण्ड एकही स्वरूप तथा अवस्था है तो ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंको महाप्रलय भी एकही स्वरूपका होना चाहिये। अपने समयपर पिण्डका विनाश होता है अपने समयपर ब्रह्माण्ड नष्ट होता है। एकही स्वरूप नष्ट तथा स्थितिका है। पिण्डकी स्थिति थोड़ी है ब्रह्माण्डका वय अधिक है। दोनों अपने अपने आयुका दौरा पूरा करके नष्ट हो जाते हैं।
इस बातमें यहूदी ईसाई तथा मुसलमान सभी बहुत भूल करते हैं कि, पिण्डके विनाशको ब्रह्माण्डके विनाशके समयका हिसाब लगाते हैं। क्योंकि,
पिण्ड तो अब नष्ट हुआ उसके सुकर्म तथा कुकर्मका हिसाब ब्रह्मांडके विनाश-कालमें होगा । जब पिंडका प्रलय हुआ तब उसी समय उसका हिसाब किताब हो गया । जब ब्रह्मांडका प्रलय होगा तब भी सबका भलीप्रकार हिसाब होगा । सब जीव अपने कर्मोंके साथ परलोकमें दूसरी उत्पत्ति तक रखे जावेंगे, जिसको मृत्युका सकता कहते हैं मुसलमान लोग उसीको कब्रका दुःख कहते हैं । वह जो यथार्थ बात है उसको भूलकर महम्मदी हदीसोंके लिखनेवाले भौति भौतिकी बातें बनाते हैं । कहते हैं कि, जब मनुष्य मर जाता है तब फरिश्ते उसको खुदाके सनीप ले जाते हैं वहाँसे भले बुरेका चिन्ह लेकर फिर उसको कब्रमें ला रखते हैं । यह सब भूल है वे यथार्थ तात्पर्यको न समझकर बातको दूसरे ढङ्गसे कहते हैं । यदि ज्ञानकी स्वच्छता होती तो ऐसी त्रुटी भी न होती । यह क्या बात है कि, रोगी तो मर गया पर उसका कफन दफन सहस्र अथवा लाख बरसके उपरान्त किया जावे । अवश्य ही उसका हिसाब उसी समय होगा ।
५६—कुरान तथा हदीसोंसे प्रगट है कि, जब महाप्रलय हो चुकेगा तो इसके पीछे सबकी भलाई बुराईको तराजूपर धरकर तौलेंगे, प्रत्येक मनुष्य अपनी अपनी भलाई बुराईके अनुसार फल पावेंगा । जिसका पुण्य अधिक होगा वह वैकुण्ठको एवं जिसकी बुराई अधिक होगी वह नरकको जावेगा, जिसकी भलाई-बुराई समान होगी वह मध्यमें जावेगा । मुसलमान लोग नरक तथा वैकुण्ठका वृत्तान्त जैसा उनको कहना आता है वह कहते हैं । वैकुण्ठ तथा नरकके मध्य स्थानको स्पष्ट नहीं कहते । क्योंकि, इस स्थानको पृथिवी कहते हैं । जहाँ पर जीव देह धरता है भौति भौति की योनिमें आवागमन किया करता है । पृथिवी आकाश और नरकवासी सब आवागमनमें संलग्न हैं कोई भी इससे बरी नहीं है ।
५७ बच्चेकी उत्पत्ति—प्रदारजुलनबौअत और तफसीर जलाली इत्यादिमें लिखा है कि, जब बच्चा गर्भमें आता है तब फरिश्ते आत्माको लाकर बच्चेकी मूर्तिमें डाल देते हैं जब यह बालक मातृगर्भसे बहिर्गत होता है तब हँसता है रोता है । जबतक यह बालक अनजान रहता है तबतक उसको वैकुण्ठके सुख दिखाई दिया करते हैं उनको देख देखकर वह हर्षित होता हुआ हँसता है । उसकी दृष्टिसे विलुप्त होनेके पीछे रोता है यह अपनी माताके गर्भसे बहिर्गत होता है उसको संसारकी बुराई तथा पाप घेर लेते हैं वैकुण्ठके पदार्थोंसे परदा हो जाता है । अन्त पूर्णतया अन्धकार घेर लेता है । फिर यह योग्य अवस्थाको प्राप्त कर जप तप करता है जैसी इसकी भक्ति होती है वैसाही प्रकाश प्राप्त कर लेता है ।
कुरानमें मूर्ति पूजा
समीक्षा—यहाँ विचारना उचित है कि, वही भोला बालक आदम था जबतक वह अनजान था यानी अत्यंत मूर्खताकी अवस्थाको अनजान जानना उचित है तब उसके लिये वैकुण्ठके सुख प्राप्त थे। वस्तुतः वैकुण्ठ, नरक, भय, चिन्ता, सुख, दुःख सब मूर्खोंके लिये हैं, बुद्धिमानोंके लिये नहीं हैं। बुद्धिमान तो वैकुण्ठ, नरक, दुःख, सुख सबको तुच्छ समझते हैं। वैकुण्ठ तथा नरकके दुःख सुखको यह आत्मा पूर्वसे ही जाननेवाली है। यदि यह पूर्वकर्मोंसे पवित्र होता तो ऐसा न होता यह बच्चा जितने कार्य करता है वे उसके पूर्वकर्मोंसे सम्बन्ध रखते हैं इसने पूर्व जन्ममें देह धरकर अवश्यही कर्म किये हैं। सब कर्मोंका जाननेवाला और कर्ता है। कोई जीव पशुओंमें हँसना नहीं जानता है। पर जब आत्मा मनुष्यका जामा (शरीर) पहनती है, तब उसको हँसने तथा रोनेका ज्ञान होता है। क्योंकि, उसको जब वैकुण्ठके सुख दिखाई देते हैं तब यह हँसता है, जब अन्तर्धान होते हैं तब यह रोता है। अन्यान्य पशु इस कार्यसे वञ्चित हैं। कहीं कहीं पुस्तकोंमें लिखा है कि, आदम अज्ञानावस्थामें हँसना नहीं जानता था पर जबसे उसने आज्ञा भङ्गकी तबसे उसको हँसना आया। इसका कारण यह है कि, आदम पहला आदमी था अनेक समयतक निर्जीव पदार्थ पत्थर इत्यादिके समान परलोकमें रह आया। हँसना रोना सब भूल गया था। इस कारण आदममें और आदमके बच्चोंमें इतना ही अन्तर है। क्योंकि आदम अनेक कालतक गतिविहीन पड़ा रहा। जब संसारमें आया तब अन्यान्य आदमजादोंके समान दुःख भी न पाया था। क्योंकि, हँसना और रोना भूल गया था। पर जब इसको शौतान गुरु मिला तब तुरन्त ही उसको सब विद्याओंकी सुधि हो गई। उसके पूर्वजन्मके सब कर्म प्रगट हो गये। यद्यपि बच्चा मूर्खता तथा आज्ञाना-वस्थासे अनजान कहलाता है पर उसके पूर्वकर्मके सब चिह्न उसमें प्रगट हो जाते हैं।
जो कहते हैं कि, फरिश्ते वैकुण्ठसे आत्मा लाकर मातृगर्भके पुतलेमें डाल देते हैं इसमें इतनी विभिन्नता है कि, मृत्युके पीछे आत्मा ऊपरको चढ़ती है ऊपरसे फिर किसी भोजन द्वारा जीवके वीर्य पथसे गर्भमें प्रवेश करती है। इस पर केवल इतना कहता है कि, क्या मनुष्य तथा पशुके वीर्यका एकही ढङ्ग है ? सबकी उत्पत्ति एकही स्वरूपसे हुआ करती है ? तनिक भी विभिन्नता नहीं ? क्या केवल मनुष्यकी ही आत्मा वैकुण्ठसे लाई जाती है कि, सब जीवोंकी ? क्या वीर्यको केवल शरीर बनानेकी सामर्थ्य है, रूह डालने का नहीं है ? वीर्य आत्मासे रहित नहीं। क्योंकि कबीर साहबका कथन है : चाममें माँस है
तात्पर्य—समीक्षा विशेष
मांसमें हाड़ है, हाड़में गूद है, गूदमें बिन्द है, बिन्दमें पौन है, पौनमें प्राण है, पौन और प्राण क्या भिन्न गाड़ ।
अतः वीर्यके साथ आत्मा है, आत्माके साथ उसके कर्म हैं । यदि वीर्यमें प्राण न होता तो उससे किसी वस्तुकी उत्पत्ति न होती । यदि आत्मा किसी और स्थानसे लाकर मातृगर्भमें डाला जाता तो शरीर भी किसा और स्थानसे लाकर स्त्रीके पेटमें रखा जाता । यह नहीं कि, आत्मा तो बँकुण्ठसे लाई जावे शरीर आपसे आप पेटमें बन जावे ।
५८ जिनका सर्प होना—मदारजुलनबोवतमें कहा है कि, जिन जब होता है तब अपना यथार्थ स्वरूप छोड़कर सर्प बन जाता है । जब उसके आयुका दौरा पूरा होजाता है तब सर्पकी देहमें गमन करता है । उसका चिह्न यह है कि, जब सापको मारते हैं उस समय ध्यान करना चाहिये कि, जिस सर्पके शरीरसे रक्त निकल उसकी जिन समझना चाहिये । जिसमें जलके स्वरूप कुछ पीला पीला या जल निकल उसको यथार्थ सर्प जानना उचित है । जिन तो आवागमन करे पर मनुष्य बिना आवागमनकेही रहे इस बातमें कोई विशेष प्रमाण दिखाई नहीं देता ।
५९ लौहमहफूजपर भाग्य—मुसलमानोंका विश्वास है कि, सब मनुष्योंका भाग्य पहलेसेही लौहमहफूजपर लिखा है । वह लौहमहफूज आकाशपर है दूसरी रवायतमें है कि, प्रत्येक मनुष्यके लिये पृथक् पृथक् लौहमहफूज है । फिर कहते हैं कि, सबके लिये एकही पुलसरात है । दूसरी रवायतम है कि, प्रत्येक मनुष्यके लिये पृथक् पृथक् पुलसरात है । ऐसेही कहा है कि, सबके लिये एकही तराजू है जिस पर सबकी भलाई बुराई तौली जायगी ; फिर दूसरी रवायतमें लिखा है कि, प्रत्येकके लिये पृथक् २ तराजू हैं । ये सब बातें अविद्याके कारण हैं कि कहने तथा समझनेमें लोगोंकी स्पष्टता नहीं । यह मैं पूर्वमें ही लिख आया हूँ कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंमें एकही बात है, कुछ विभिन्नता नहीं । यह कुछ कहा नहीं जाता कि, ब्रह्माण्ड पिण्ड हो गया कि, पिण्ड ब्रह्माण्ड हो गया । आकाश तथा पृथ्वी दोनों स्त्री और पुरुष होगये हैं इनसे समस्त संसारकी रचना हुई है यह दोनों दो हैं अथवा एक ? यह कौन कह सके वह लौहमहफूज कहनेको दो है वही दुबिधा तथा धोखा है वो मायाका खेल है उसे कौन पहचान सकेगा, पूर्वजन्मके सब चिन्ह मनुष्योंके शरीरसे दिखाई देते हैं यही लौहमहफूज है । जैसा कि मैं प्रथम लिख आया हूँ यह हृदय बुद्धिके समीप है बुद्धि आत्माके समीप है । आत्मलाभसे सब लाभ है । मनुष्य देह पाकर यदि अपनी मुक्तिका उपाय
न करे तो वह बड़ा अभाग्य है। ऐसा समय फिर कभी हाथ न लगेगा। इस मनुष्य देहके समान और कौन पदार्थ है? यदि इस शरीरमें चूका तो फिर लगातार आवागमन करताही रहेगा बहुत समयतक छुटकारा न होगा।
६० जीवोंका आनंत्य—आत्माके विषयमें मुहम्मदी इस प्रकार कहते हैं कि, खुदाने अनगिनती रुहेँ बनाई हैं यह बात कुछ कही नहीं जाती कि, एक है अथवा अनगिनती। इसका मकान तथा लामकान कहना उचित नहीं। वह एक है और अनेक भी है। उसके विवरणमें जिह्वा गूँगी है। मनुष्य हो अथवा देवता किसीमें कुछ कहनेकी सामर्थ्य नहीं है। यह बात समझना चाहिये कि, पहले केवल एक आदम था। इससे अनगिनती आदम हो गये। वह आदम न विभक्त हुआ न कुछ कम हुआ एक बीजसे वृक्ष उत्पन्न हुआ अनगिनती बीज तथा वृक्ष उत्पन्न हो गये। इस कारण मैं एक उदाहरण लिखता हूँ।
संन्यासीका उदाहरण—एक संन्यासी अपने योगबलसे अपनी आत्माको शरीरसे बाहर निकाल दूसरे शरीरमें प्रवेश करके अपनानाम जलदत्त रखा। एक समय वह जलदत्त सोया पड़ा था,। उसने उस समय स्वप्नमें देखा कि, एक नगरमें गया वहाँ मैं मदिरा पीकर मदमस्त हुआ। फिर उस स्वप्नावस्थामें गया फिर उसी स्वप्नावस्थामेंही दूसरा स्वप्न देखा कि, मैं एक परगनेका रईस हूँ उस शरीरके स्वप्नमें और स्वप्न देखा कि, मैं एक देशका राजा हो गया हूँ फिर उस स्वप्नमें और एक स्वप्न देखा कि, अब मैं स्त्री हो गया हूँ एक देवताकी पत्नी हूँ। फिर उस शरीरके स्वप्नकी अवस्थामें स्वप्न देखा कि, मैं हिरणीकी देहमें हूँ। उस हिरण्यकी देहमें और स्वप्न देखा कि, अब मैं लता हो गया हूँ और लता होकर एक वृक्षकी डालसे लपट रहा हूँ। फिर मैंने उस लताके शरीरमें और स्वप्न देखा कि, अब मैं जम्बूर (चिऊटी) हो एक कमलके पुष्पसे लपट रहा हूँ। उस देहमें स्वप्न देखा कि, अब मैं हाथी होकर ब्रह्माजीकी सवारीमें हूँ। ब्रह्मा मुझपर सवार होकर महादेवके भेंटके लिये गये हैं। जब मैं महादेवकी सभामें गया तब महादेवके दर्शनके प्रभावसे मुझको ज्ञान हो गया और फिर मैंने उस हाथीकी देहमें जो स्वप्न देखा तो मैं क्या देखता हूँ कि, मैं महादेव हो गया। फिर मैंने अपनेको बहुत बड़ा ज्ञानी पाया जब मैं ज्ञानी हो गया तब मुझको अपने सब आवागमन याद आये तब मैं अपनी पहली देहके पास जो संन्यासीकी थी गया। उस संन्यासीको सोतेसे जगाया, वह संन्यासी उठ खड़ा हुआ और अपने जाग्रत अवस्थाका सब कार्य करने लगा। फिर जलदत्तको जगाया। वह भी जागकर अपना सब कार्य करने लगा। रईसकी देहको सोतेसे जगाया
नबियों और उनके खुदापर एकदृष्टि
वह भी उठ खड़ा हुआ । फिर राजाकी देहको जीवित कर दिया और वह भी उठकर निजकार्यमें संलग्न हुआ । इसी प्रकार इस संन्यासीने अपनी सब देहोंको जगाया । उसने ज्ञानी होकर अपनी सारी देहोंको जीवित किया और अपना सारा समाचार कह सुनाया । प्रथम वह एक संन्यासी था । फिर कितनी जुदी २ मूर्तियाँ भाँति भाँतिके स्वरूप बन गये । एकही शरीर और एक आत्मासे कितनी अनगिनती और भाँति भाँतिके बहुततर शरीर तथा आत्मायें बन गईं । उसी समय उसी घड़ीसे अनेक हो गये । न बहुतेरे शरीर परमेश्वरने उत्पन्न किये थे न बहुतसी आत्मायेंही की थीं, इस कारण एक और अनेक कुछ कहाही नहीं जाता । एक भी है और अनेक भी है । ब्रह्मज्ञानीको अधिकार है कि जैसा स्वरूप चाहे स्वीकार करले । अब जानना चाहिये कि, जिसने यह संसार उत्पन्न किया, वह भी एक बड़ा ज्ञानी है ।
उस संन्यासीका गुरु शिव था और उसका ध्यान शिवमें था । अंतको परिणाम यह हुआ कि, वह स्वयम् शिव हो गया । यही परमेश्वर है यही सेवक है । ज्ञानकी अवस्था परमेश्वरी की है अज्ञानी होकर दास हो रहा है । जैसे मैंने पहले राजा विपश्चितका उदाहरण लिखा था, वैसेही यह उदाहरण संन्यासी और महादेवका है । वैसाही अग्नि देवता और पूर्वोक्त राजाकी अवस्थाको जानना चाहिये । जो कोई जिस देवताकी भक्ति करता है, अन्तको वही हो जाता है । स्वप्नवत् यह आवागमन करता जाता है । सिद्ध साधु तथा सामान्य आदि सभी आवागमनमें फँसे हुये हैं, किसीको कभी छुटकारा नहीं मिलता है ।
स्वप्नकी देह—सन् १८४२ ई० में जब मैं काशी नगरीमें था वहाँके मनुष्योंमें एक ऐसा रोग हुआ कि, कोई कोई रातको खा पीकर अपने पलंगपर लेटे जब सबेरा हुआ तब मुरदा पाये गये । ग्रंथोंमें यह बात विशेष विवरणके साथ लिखी गयी है कि, जो रातको सोता है यदि देरतक उसको स्वप्न आता है बहुत देरतक उसी स्वप्नको देखता रहता है तब उसका वह शरीर छूट जाता है । स्वप्नवाली देह ठीक हो जाती है । उसके स्वप्नमें साथ जो देह थी वही सूक्ष्म शरीर स्थूल होकर जाग पड़ती है । उसका प्रथम शरीर मृतक तथा निर्जीव हो जाती है । इस प्रकार सूक्ष्मसे स्थूल तथा स्थूलसे सूक्ष्म हो जाता है । जिसको वेद पुराणोंमें आधिभौतिक अन्तर्वाहिक देह कहा है ।
६१ मनशूरका सम्स तबरेज और बल्लेशाह होना— मुसलमानोंके फकीर स्पष्ट कहते हैं कि, जो मनशूर था वही शम्स तबरेज हुआ जो शम्सतबरेज था वही सरमद हुआ जो सरमद था वही बुल्लेशाह हुआ ।
६२ भूल— मुहम्मदियोंका ऐसा विश्वास है कि, एक बार उत्पन्न होकर करोगे, मरकर फिर जीवित होंगे, फिर कभी न मरोगे। इससे वे महाप्रलयके जीवनको समझते हैं। वो बात नहीं बरन् यह परमेश्वरमें लीन हो जानेकी बात है।
६३—बहुतरे महम्मदी अज्ञानतावश समझते हैं कि, मुझे निर्दोषकी परमेश्वरने नरकी बनाया। अथवा कष्टोंमें फँसाया।
अमीर खुसरो
न्याव न कीन कीन ठकुराई । विन कीने लिखि दीन बुराई ।
मौलवी रूम
हफ्तसद हफ्ताद कालिब दीदः अम् ।
बारहा चूँ सबजये रुईदः अम् ॥
मगज कुरआं अज जहाँ बरदाश्तम् ।
उस्तख्बों पेशे सगां अन्दा खतम् ॥
अर्थात् सात सौ सत्तर देह मैंने धरी, अनेक बार घास पातके संदूश जमा। कुरानका सार मैंने लिया, उसकी हड़डी (निःसार) कुत्तोंके सामने डालदी
६४—सयद भषशाहका वचन —
लख चौरासी बेलि लगाई । बेलि भरम भूलो मत भाई ॥
६५—इमाम जाफर साहिब—हयातुलकल्लबमें लिखा है हजरत इमाम जाफर साहबने फरमाया है कि, जब खुदाने जिबरईल इत्यादिको पृथ्वी पर मिट्टी लेनेको भेजा जिसमें कि, वह आदमकी प्रतिमा बनावे, उस समय पृथ्वी रोई चिल्लाई, क्योंकि, पृथ्वी अत्यन्त प्राचीन है इससे मनुष्योंके कुकम्मोंको सदैवसे जानती है। नहीं तो यह पृथ्वी कदापि रोती चिल्लाती नहीं। मनुष्योंके कुकम्मोंको यह जानती है।
६६ आदम और बेलकी बात — हदीसोंमें आया है कि, जब हजरत आदमको खुदाने बैकुण्ठसे निकाल दिया। इसके पीछे जिबराईलको भेजा कि, आदमको हल जोतना सिखलावे वँसाही हुआ। आदमने बेलको एक डण्डा मारा। बेलने कहा कि तू मुझको निर्दोषको क्यों मारता है? तू स्वयम् दोषी है। इससे प्रगट हुआ कि, मनुष्यमें पशु तथा पशुमें मनुष्य गमन कर रहा है। दोनोंमें एक, आत्मा है।
मसी हुद्ज्जाल ।
६७—लिखा है कि, महाप्रलयके पूर्व मसीहुद्ज्जाल प्रगट होगा।
उसका स्वरूप ऐसा होगा कि, उसका मूँह मनुष्यकासा और शिरपर गायकी सीगें होंगी, उसकी गायकी पूछ, घोड़ेकी गरदन, चीतेकी पीठ, हरिणकापेट, बन्दरके हाथ, ऊँटके पाँव होंगे और उसके एक हाथमें मुसलमानकी अगूठी तथा दूसरे हाथमें मूसाका ङ्ण्डा होगा । जिसको वह मूसाका सोटा छुलावेगा उसी समय उसका स्वरूप वैकुण्ठवासियोंकासा हो जायगा, जिसके माथेपर मुलेमानकी अगूठीका चिन्ह कर देगा उसी समय वह नरकका हो जावेगा । इस स्वरूपको मसीहूद्दज्जाल और दाबतुलअरज भी कहते हैं । प्रगट हुआ कि इस दाबतुलअरजमें खुदा गमन कर रहा है । नहीं तो उसको ऐसी शक्ति न हो तो यदि खुदा उसमें पैंठा न होता तो यह बल तथा सामर्थ्य कहाँ हो सकता था ?
६८—महाप्रलयका समाचार जड़ तथा चैतन्य सब कहेंगे । इसी कारण जड़में चैतन्य और चैतन्यमें जड़ गमन किया करता है ।
६९—शैतानका नरक जाना—मुसलमान कहते हैं कि, शैतान धिक्कारके योग्य है । भला पहले तो खुदाने कहा था कि, मेरे आतुरिक्त किसीको दण्डवत न करना, फिर खुदाने मिट्टीके पुतलेको दण्डवत करनेको कहा । यह तो खुदाहीकी ओरसे अधिकता थी । यह भी मान लिया कि, खुदाई आज्ञाको मानना उचित था । पर यह भी लिखा है कि, लौहमहफूज पर जब शैतान गया तब वहाँ लिखा हुआ था कि, एक मनुष्य सत्तर सहस्र वर्षतक तपस्या करेगा, अन्तमें वह नरकमें जायगा । शैतान सहस्र वर्ष तक रोता रहा तो भी नरकमें गया । उसकी कोई युक्ति काम न आई ।
मुसद्दस—छः लाख बरस बन्दगी में दिल जो दिया था ।
उस्ताद बदोनेक हयाते आब पिया था ॥
सालह वही इबलीसलकब दोनों लिया था ।
लाहासिल रोना सदहा तोबा किया था ॥
यह देखिले अब अगले करम जीवके जागे ।
तद्बीर नहीं चलती है तकदीर के आगे ॥
आदमसे कहे आदि पुरुष मानलै फरमान ।
हो जाबिता बाहोश व रख साबित ईमान ॥
एकरार खबरदार अदो तेरा है शैतान ।
बेसूद हुआ पन्द जो दुख द्रन्द घेरे आन ॥
दिन आधे ही आदम सो अदन छोड़के भागे ।
तद्बीर नहीं चलती है तकदीरके आगे ॥
जीव योनि. चौरासी लाख योनि
शहाद व नमरुद खुदा खुदको बताई ।
दशकंधर दुयौंधन को सीख सिखाई ॥
इवराहीमने सिखलाने में औकात गँवाई ।
मूसा की नसीहत फिरऊन फहम न आई ॥
टूटे न किसी हाल करम कालके धागे ।
तदवीर नहीं चलती है तकदीर के आगे ॥
दरगह से हुआ चोर करम डोर का बंधा ।
यम बन्द पड़ा है विषयानन्द यह अन्धा ॥
जाने नहि करता आजिज जीव जो बंधा ॥
हों पार निराधार शब्द सारके संधा ॥
पस होगये तापस मूँडचा मौन व नागे ।
तदवीर नहीं चलती है तकदीर के आगे ॥
आवागमननेही तकदीर ठहराया है और दूसरे किसीने नहीं ।
७०—जैसा कि, मैं पहले समाचारोंके अनुसार लिख आया हूँ कि, सब रुहँ मुहम्मदकी आत्माके गिर्द घूमा करती थीं । कारण यह कि, कबीर साहबके कथनानुसार मुहम्मद महादेवका औतार है । महादेव तमोगुण है, तमोगुणसे समस्त संसारकी उत्पत्ति है । सब तमोगुणसे बँधे हुये हैं सब तमोगुणको अपना राजा मानते हैं । इस कारण उसके चारों ओर फेरी करते हैं । वे अनगिनती जन्मोंसे बराबर आवागमन करते चले आते हैं । तमोगुण अर्थात् अन्धकार संसारका गुरु है ।
७१—बंचित रहनेका कारण — जब मुहम्मद साहबको पैगम्बरी मिली, तब आपके लिये खुदाकी ओरसे बही उत्तरा करती थी । उसके द्वारा आप कर्तव्याकर्तव्यकी बात बताते थे । इससे आवागमनका अंतर प्रकाश न रखते थे । सब पश्चिमी देशके पैगम्बर चार कारणसे आवागमनकी विद्याके जाननेके योग्य नहीं हो सके । उनके किसी पूर्व नबीको आवागमनका समाचार नहीं मिला और न कहा । इस कारण उनको इस बातका ध्यान भी नहीं हुआ । आवागमनके ज्ञान न होनेका कारण उनका मास भोजन तथा मदिराका पीना था जो उनके मनमें प्रकाश नहीं होने देता था । मांसाहारियोंसे कठिन तपस्या तथा वासनादमन नहीं हो सकती । इस कारण वे आवागमनकी विद्या जाननेसे वञ्चित रहे ।
अण्डजसे मनुष्य होनेके चिन्ह ऊभजसे मनुष्य होनेका चिन्ह
७२—चारवेद और किताबोंके सब विद्वान शरीयत, तरीकत, हकीकत, मारफतमें फँसे रहे। अल्प विद्या रखते थे इस कारण उनकी स्वच्छता नहीं हुई। आवागमनका ज्ञान हंसको अवस्था बिना प्रगट नहीं होता। मनुष्यकी चारों अवस्थाएँ बन्धन हैं।
अचेतावस्था—सुतरां डाक्टर गोल्डस्मिथके एनिमेटेंड नेचरमें लिखा है कि, एक विद्यार्थीको उसके शिक्षकने कठिन लेख लिखनेको दिया कि, उसको उसका लिखना कठिन हो गया। जब रातके समय अपने घर आया तब प्रदीप जलाकर लिखना चाहा। परन्तु वह इतना कठिन था कि, उसकी समझमें न आया तब विवश होकर सो गया। कुछ कालतक सोकर वह फिर उठा, लैम्प समीप रखकर उचितरूपसे लेख लिखकर फिर सोगया। जब सबेरे उठा तब अपना लेख भली प्रकार ठीक और अपने हस्ताक्षरमें लिखा देख बड़ा आश्चर्यान्वित हुआ। जब पाठशालामें गया तब उसने अपने शिक्षकसे कहा कि, मुझे बड़ा आश्चर्य है कि, मैंने तो इस लेखको लिखा नहीं था बरन् में अचेत होकर सो गया था, न जाने कौन मेरा यह लेख मेरे हस्ताक्षरमें लिख गया? क्या जाने कौन जिन्न या भूत लिख गया? यह बात सुनकर उसके शिक्षकको भी बड़ा आश्चर्य हुआ। चाहा कि, इस बातका यथार्थ जानें। उसने उस दिन और कठिन लेख लिखनेको दिया इसी प्रकार जब वह रातको अपने घर आया, बहुत सोच तथा चिन्ता करके विवश सोगया क्योंकि, उसको लिखना न आया इसी कारण सोगया अपने पलँगसे उठा। पूर्वानुसार उस लेखको अत्यन्त सावधानीसे लिखकर फिर सो गया। जब प्रातःकाल उठा तब वह लेख अपने हस्ताक्षर द्वारा लिखा हुआ पाकर अत्यन्त आश्चर्यान्वित हुआ। जब पाठशालामें गया तब अपने गुरुसे कहा कि, उसी प्रकार मेरा लेख रातको कोई मेरे हस्ताक्षरमें लिखकर चला गया है। उसका शिक्षक रातके समय उसके घरमें आकर छिप रहा। वह विद्यार्थी लैम्प आगे रखकर भलीप्रकार सोचने लगा, परन्तु उसके ध्यानमें कुछ नहीं आया कि, उस लेखको लिखें। अपने पलँगपर अचेत होकर सोगया। कुछ कालके पीछे पुनः अपने पलँगसे उठा। पूर्वानुसार लेख लिखके भली प्रकार प्रस्तुत करके फिर अपने पलँगपर सो गया। फिर सबेरे जब वह अपने पलँगसे उठा, उसके पहले उसका शिक्षक उस कमरेके बाहर निकल गया। वह विद्यार्थी अपना लेख उसी प्रकार लिखकर पाठशालामें गया। शिक्षकसे कहा कि, मेरी दशा तो पूर्वानुसारही हुई। न जाने मेरा लेख मेरे हस्ताक्षरमें कौन लिख जाता है। यह बात सुनकर उसके शिक्षकने कहा कि, ऐ लड़के ! यह सब तेराही कार्य
उद्भिजसे मनुष्य होनेका चिन्ह पिंडजसे मनुष्य होनेका चिन्ह
है। अपने कार्योंसे आप अनभिज्ञ है इस कारण इसको तू दूसरेका लेख बताता है। तथा अज्ञानसे दूसरेका किया और लिखा हुआ जानता है।
यथा—उसी अंग्रेजी पुस्तकमें एक पादरीकी कहानी लिखी है। यह बात प्रसिद्ध थी, कि, वह पादरी सोंते सोंते बड़े बड़े आश्चर्य कौतुक किया करता था। एक दिवस गिरजाघरमें एक मुरदा स्त्री आई। उसके लिये यह पादरी प्रार्थना करने गया। वह पादरी प्लेटफार्म पर खड़ा होकर प्रार्थना करने लगा। प्रार्थना कर चुकनेके बाद उस स्त्रीको कब्रमें गाड़ने ले चले। उसने देखा कि उस स्त्रीके हाथमें एक अंगूठी थी। यह अंगूठी उस मुरदेके किस काम आवेगी, यदि निकाली जावे तो धर्मशालाके कामोंमें लगे। अपने मनमें यह सोचता हुआ पादरी तो धर्मशालामें गया, लोग उस स्त्रीको गाड़कर चले गये। फिर वह पादरी जब सो गया तब थोड़ी देर पीछे उठ खड़ा हुआ। उठकर कबिरस्तानकी ओर चला, मुरदा स्त्रीकी कब्रपर पहुँचा चाहा कि, कब्र खोदकर उस स्त्रीके हाथसे अंगूठी निकाल लूँ। लोगोंने उसको यह काम करते देखा तो पकड़ लिया कहा कि, ऐसा काम क्यों करते हो? उसकी नौंद टूटी वह जाग गया। अपनेको कब्र खोदता पाकर लज्जित हुआ कहा कि, मैं तो स्वप्नावस्थामें यह काम करता था। लोगोंको मालूम भी था कि, उसका स्वप्न वैसाही था।
एक दिवस उस मनुष्यने एक ऐसा घृणित कार्य किया जिससे उसे बड़ी लज्जा आई। उसने एक क्वारी लड़कीके साथ सम्भोग किया। लोगोंने उसको पकड़कर जज साहबके सामने खड़ा किया। उससे प्रश्नोत्तर होने लगा, उस समय उसकी निद्रा भङ्ग हुई। अपनेको जजके सामने खड़ा पाकर पूछने लगा कि, मुझको यहाँ कैदकर क्यों लाये हो? मुझको तनिक भी सुधि नहीं। लोगोंने कहा कि, तू एक महाकुकर्मके दोषमें फँसा है। उसने कहा कि, मुझको सुधि नहीं। स्वप्नावस्थामें मुझसे यह कार्य हुआ है। मैंने इच्छापूर्वक नहीं किया है। जजने उसको स्वप्न स्थिति जाना। विदित होगया कि, इस पादरीके स्वप्न विचित्र हैं। उस पादरीने स्वप्नावस्थामेंही अनेकों पुस्तकें लिखी थी। उसके स्वप्नका हाल जानकर छोड़ दिया उसको किसी प्रकारका दण्ड नहीं दिया।
इसी प्रकार यह जीव चारों अवस्थाएँ जागृत, स्वप्न, सृषुप्ति और तुरियामें बँधा हुआ सब कार्य करता है। भूलकर अपने कार्योंको नहीं जानता। दास, स्वामी दोनों इन्हीं चारों अवस्थाओंमें फँसकर सब कार्य करते हैं भूल जाते हैं, यहीं कर्ता तथा कर्म होकर सब कौतुक कर रहा है, भ्रमसे दूसरा कर्ता मानता है। अपना कर्तव्य भूल गया है। जागृत अवस्थामें जो कुछ यह करता
है तब कुकर्मं सुकर्मंका हिसाब देता है पर स्वप्नावस्थाका हिसाब किताब नहीं होता । क्योंकि, मनुष्य जागृतवस्थामें अधिकृत है । इसीसे उसका लेखा होगा, पशु स्वप्नावस्थामें है इससे उनका हिसाब न होगा । ये चारों अवस्था जीवके भ्रम तथा अज्ञानको हैं । इन्हींमें बँधा हुआ यह आवागमन किया करता है । ईश्वर तथा जीव इन चारों अवस्थासे पृथक नहीं । पूर्वोक्त संन्यासी जब संन्यासी था तब भी चारों अवस्थामें फँसा था । जब वह बहुत बड़ा तपस्वी साधु तथा महादेवजी हो गया तब भी चारों अवस्थामें फँसाही रहा । इन चारों अवस्थासे जीव छूटा न शिव छूटा । पर वही छूटा जिसको स्वयम् सत्यगुरुने छुड़ाया । शेष सब आवागमनमें रहे । इन चारों अवस्थाकी विद्या अर्थात् सत्यज्ञान भूमिका और इन चारोंके सब कार्य, भ्रम तथा अज्ञानरूप उस विद्यार्थी तथा पादरीके समान हैं । यह कुछ करता नहीं और सब कुछ करता है । ज्ञानी वही है कि, जिसने भली भांति देख लिया और अन्तर दृष्टिसे जान लिया, क, मैं कैसे करता हूँ और कैसे नहीं करता ? उसने अहंकार छोड़ दिया और जब अहंकारको छोड़ दिया तब सब कुछ छूट गया ।
७३—आत्मा बादशाह है और चौरासी लाख योन उसका राज्य है । यह मणिमाणिक जड़ें महलोंमें रहता है और कभी कभी उजाड़ जंगल तथा बयाबानमें जा बैठता है । स्थान परिवर्तनके निमित्त यह दूसरा कुछ कदापि नहीं बनता । जो हो यह वही, राज्य राज्येश्वर तेजोमय शाहंशाह है । जो मनुष्य, पशु, स्थावर, जंगल सबमें एकही आत्मारूप है । पशु मनुष्यसे किसी बातमें कम नहीं । केवल आकारोंकी विभिन्नता है । सब बात एकही हैं कुछ विभिन्नता नहीं ।
७४ स्वाभाविक चेतना—प्राकृतिक नियम सब जीवोंमें समान रूपसे उपस्थित है, उसके लिये पिता तथा शिक्षकका कोई प्रयोजन नहीं है । जब बालक उत्पन्न होता है तो आपसे आप अपनी माताके स्तनोंको पकड़कर चूसने लग जाता है । आपही अपना करता है । सिखलाने तथा पढ़ानेकी कोई आवश्यकता नहीं होती । जिस योनिमें जाता है आपसे आप उस योनिका कार्य करने लग जाता है क्योंकि, यह सब योनियोंके स्वभाव तथा कर्मसे भली प्रकार अवगत है । सबका अनुभवी तथा अभ्यासी है । क्योंकि, सब योनियोंमें यह फिर चुका है । सबका जाननेवाला है । कुछ सिखाने पढ़ानेकी आवश्यकता नहीं रखता । सब जीव आपही आप वही गुण रखते हैं । पर चारों अवस्थाओंने उसको भुला दिया । स्त्रियोंको देखो कि, वह ऐसी मक्कारी (कपट) करती हैं । कि, पुरुषों-
को उल्लू बना देती हैं। कौसाही बुद्धिमान् और चतुर मनुष्य क्यों न हो पर त्रिया-
चरित्र तथा इनकी धूर्तताके आगे वह मूर्ख तथा अज्ञानके बराबर हैं। यह त्रिया-
चरित्र संसारमें प्रख्यात है, इस कलाको सीखनेके लिये कौन पाठशाला कौन
शास्त्र और कौन गुरु है? स्वयम्ही आपसे आप यह सब गुण उत्पन्न होते हैं।
यह सबका जानने तथा देखनेवाला है। भाग्य प्रत्येकको अपने आप सिखा देता
है। किसी शिक्षककी आवश्यकता नहीं रहती। सब जीव अपनी जातिकी बोली
तथा इन्द्रित चिन्होंको समझते हैं। पशु ऐसे ऐसे विचित्र कार्य करते हैं जिन्हें
कि, देखकर मनुष्यकी बुद्धि चकराती है जैसे चीनके लोगोंकी बोली लेपलेण्डर
और फारसीसियोंकी बोली हबशी नहीं समझते एक कूएँके मेढककी बोली दूसरे
कुएँका मेढक नहीं समझता इसी प्रकार सभी अपनी योनिके अनुरागी होते हैं
उसी भाषाको समझते हैं दूसरीको नहीं जानते।
पुण्यपापके फलका संक्षेप।
७५—इस संसारमें जितने मनुष्य हैं, किसीका आकार किसीसे मेल
नहीं रखता क्योंकि, सबसे पूर्वकर्म पृथक् पृथक् ढङ्गके बने हुये हैं। जैसा कि,
कृष्णचन्द्र और कबीरसाहबने कहा है मनुसंहिता इत्यादिमें लिखा है जो कपड़ा
चुरावे वो कोढ़ी होगा। घोड़ा चुरावे सो लंगड़ा हो। प्रदीप चुरावे वो अन्धा
हो। जो अप्रतिष्ठा सहित प्रदीप बुझावे सो काना हो। जो जल चुरावे वो पन-
डुब्बी हो। जो तेल चुरावे वो पतंग हो। जो हिरण चुरावे वो भेड़िया हो, जो
फल चुरावे सो बन्दर हो। जो पंडितका धन चुरावे सो घड़ियाल हो, अपवाद
लगानेसे मुँहमें दुर्गन्धि हो, रक्त चुरानेसे वनस्पती हो, दुराचारी मतका कीड़ा
होता है। क्रोधित तथा बदला लेनेवाला मनुष्य शेर हो। बहुत भोजन करने-
वाला मनुष्य सूअर हो। जो परस्त्रीके साथ गमन करे वह अन्धा हो। जो वेश्या
गमन करे वह गद्दा हो। जो दूसरेका धन लूटे वह भिखारी हो। जो मनुष्यका
वध करे वह कोढ़ी हो। जो सुवर्णदान करे वह सुवर्ण पावे। जो पृथिवी दान करे
वो हाथी घोड़ा पावे। जो अन्न दान करे तो मनुष्य देह पावे। जो किसीका ऋण
लेकर चुकता न करे तो उसकी स्त्री मर जावे। जो मिष्ठान्न दान करे वह स्वरूप-
मान हो। जो गुरुकी सेवा करे वो पवित्र तथा स्वच्छ हो। जो कोई अपने
आत्मीय स्वजनकी हत्या करे वह नशा खानेवाला हो। जो अपना उच्छिष्ट
भोजन दूसरेको करावे वो कुत्ता बिल्ली हो। जो कोई अपनी विद्या दूसरे को
न सिखावे वो बहरा हो। जो कोई गुप्त दान करे वह अपनी मनोकामना पावे।
जो गायका दान करे वो पवित्र हो। तीर्थ स्थानसे उच्च घरानेमें जन्म ले।
पुनर्जन्म पर भारतीय दर्शन
ब्रह्मद्वेषी निःसन्तान हो । जो देवताओंकी निंदा करे वो रोगी हो । जो काशीमें मरे वो राजा हो । जो दूसरोंको विद्या पढ़ावे वो विद्वान हो । व्यभिचारिणी स्त्री निपूती हो । जो गर्भिणीके साथ सम्भोग करे वो नरकमें जावे । जो मदिरा पीवे सो मँदक हो । जो तीर्थकी निंदा करे सो पिड़िला हो । जो मास खावे वो राक्षस हो ।
इसी प्रकार सब जीव अपने पूर्वकर्मोंके अनुसार इस संसारमें वारंवार देह धर करके प्रगट होते हैं, उनका वैसाही आकार हो रहा है । इनके कर्म ही ने इनका स्वरूप बनाया है । अनगिनती जन्मोंके कर्म उनको साथ लगे हुए हैं वे ही उनका आकार बनाते हैं और वे ही उनको ईश्वर हैं ।
विचित्र आकार ।
७६—अब यहाँ मैं चौरासी लाख योनिके विचित्र विचित्र आकारोंको दिखाता हूँ । उनको देखकर जाना जायगा कि, मनुष्य क्या है ? पशु किसको कहते हैं ? यह सब मृतियाँ मनुष्य और पशु दोनोंही नहीं कही जा सकती । इनमें दोनों रङ्ग ढङ्ग पाये जाते हैं । अतः मानुषिक तथा पाशविक आत्मा कोई नहीं है, आत्मा तो एकही है पर कर्म चित्रकारने भाँति भाँतिके स्वरूप खींचे हैं । उनमेंसे कुछ जीवधारियोंका हाल यहाँ लिखा जाता है—
गजूवा—एक पक्षी है, उसका शरीर तो पक्षीकासा है और मुखड़ा मनुष्यका जैसा है । उसमें नर मादाकी पहचान नहीं होती । यह जानवर पवित्र समझा जाता है ॥ १ ॥
मनुष्यके शिरका सर्प—पर्वत अलियामें एक प्रकारका सर्प उत्पन्न होता है, उसका शिर मनुष्यका, सब शरीर सर्पकासा होता है ॥ २ ॥
संगपुस्त—सीतान् देशमें एक पक्षी उत्पन्न होता है उसको सङ्गपुस्त कहते हैं—उसका चेहरा आँख, नाक, मुँह, दाडी, मूँछ सब मनुष्यकासा होता है तथा बाकी सारा शरीर पक्षीकासा एवं पीठ पत्थरके समान कड़ी होती है ॥ ३ ॥
जल मनुष्य—एक टापूमें पानीके मनुष्य देखे गये । वे मँदकके समान तैरते फिरते थे, उनकी पूँछ गजभर लम्बी थी, उनकी दुमकी नोक, गुच्छेदार थी । इस प्रकार कहा जाता है कि, सौदागरोंका जहाज तूफानी चपेटमें कहींका कहीं चला गया, एक ऐसे टापूमें जा पहुँचा जहाँ उसे ऐसे मनुष्य मिले थे ॥ ४ ॥
मनकता—एक प्रकारकी मछली होती है, उसके देहके ऊपरका भाग अर्थात् कटिके ऊपर तो सुन्दरी स्त्रीकासा होता है, कटिके नीचे मछली कीसी होती है इसके सब शरीर पर बूंद होती हैं, उसके दो पर भी होते हैं ॥ ५ ॥
शेष यहूदी—एक पशुका नाम है, उसका चेहरा मनुष्योंकासा है, दाढी मूँछ आदि सब कुछ है, दो पर भी हैं उसके आकारसे ऐसा प्रतीत होता है कि, यह कोई श्रेष्ठ है ॥ ६ ॥
अजीबुलखिलकत्—पर्वत बुकीस पर एक पशु उत्पन्न होता है, यह बड़ा बलिष्ठ होता है। इसका चेहरा सुन्दर युवककासा होता है। इसके मूँछ दाढी कुछ नहीं है, इसके शिरपर गायकेसे दो सींगें हैं, बाकी शरीर शेरकासा है, कम्बर मोटी है, बाघकीसी पूँछ और डुमका सिरा गुच्छेदार है। उसकी पूँछमें तीन या चार जगहोंमें गिरह हैं वे काले हैं। उसके पिछले दोनों पाँव आदमीके, अगले दोनों पाँव बैलकेसे हैं, नीचेकी टांगें ऊँटकीसी हैं, दो पर पक्षियोंके समान हैं ॥ ७ ॥
जिस समय नौशेरओं बादशाहके राज्यका समय आया तब उसने ईरानी टापुओं तथा भूमिकी सनद बनाई। जब वह बना चुका तब उस नदीमेंसे एक विचित्र पशु उत्पन्न हुआ। उसने आवाज दी कहा कि, ऐ बादशाह! तू मेरे रूपका है इस कारण तेरी यह सनद बन गई। उस पशुकी गरदन चेहरा और सिर, सुन्दर नौयुवककासा था। दाढी मूँछ कुछ नहीं थीं। उसकी लटोंके घूँघर-वाले सुन्दर बाल कंधेतक लटक रहे थे। उसकी पीठपर पक्षीके समान दो पर थे। उसका सारा शरीर शेर बबरके समान था, उसके चमड़े पर शेरकी तरह दाग थे, शेरकीसी उसकी पूँछपर पूँछका सिरा गुच्छेदार केवड़ेके फूलके समान था ॥ ८ ॥
उनका—कोहकाफमें जो जर्मरदके रङ्गका पहाड़ है। वह समस्त संसारको घेरे है। उसपर एक पक्षी रहता है उसको उनका कहते हैं। यह पक्षी बड़ा बलिष्ठ है। इसकी ग्रीवा शिर और मुँह एक सुन्दरी स्त्रीकासा है। उसके शिरपर ऐसे पर रहते हैं मानों बादशाही मुकुट धरा है। शेष शरीरका भाग समस्त पक्षीके समान है। यह बृहत् पक्षी है। इसके शरीरमें अन्यान्य पक्षी अपना घोंसला बनाया करते हैं ॥ ९ ॥
दो शिरके मनुष्य—एक पर्वतमें दो शिरके मनुष्य होते हैं ॥ १० ॥
छातीमें शिर—एक स्थानमें ऐसे मनुष्य हैं, जिनका शिर छातीमें होता है उस जगह नारियलके वृक्ष बहुत होते हैं ॥ ११ ॥
घुटनेके नीचे कान—एक स्थानमें ऐसे मनुष्य होते हैं, जिनका कान घुटनोंके नीचेतक पहुँचता है ॥ १२ ॥
श्वान मुख मनुष्य—सिकन्दर बादशाहने एक टापूमें इस प्रकारक मनुष्य
देखे थे, जिनका मुँह ताजी कुत्तेकासा था बाकी शरीर मनुष्योंकासा है ॥१३॥
अश्वमुख—एक प्रकारके मनुष्य हैं जिनका मुँह घोड़ेकासा और देह आदमीकी होती है ॥ १४ ॥
पचास गजका मनुष्य—सिकन्दर बादशाहने एक मनुष्य देखा जो पचास गज ऊँचा था । उसके शिरमें गायके समान दो सींगें थीं, वह मनुष्योंको पकड़ पकड़ कर खाता था । सिकन्दरशाहने उसको तीरोंसे मार डाला ॥ १५ ॥
एक टांगके मनुष्य—एक प्रकारके मनुष्य हैं कि, उनके एकही पाँव एकही हाथ एकही कान और एकही आँख है । मानों वे एक मनुष्यके आधे हैं । अनगिनती प्रकारके बिचित्र आकारवाले जीवधारी हैं । जिनके देखने सुनने से मानुषिक बुद्धि चकराती है । चौरासी योनिके जीवोंमें अनगिनती रङ्ग ढङ्ग हैं । सबका स्वरूप तथा स्वभाव न्यारा न्यारा है । इस सृष्टिकी सीमा नहीं । इसका वर्णन असम्भव है । परमेश्वरकी सृष्टि और उसके कौतुकका भेद कौन पा सकता है ? सारे जीव अपने पूर्व कर्मोंके अनुसार यहाँ वहाँ आवागमन कर रहे हैं । नाचते फिरते हैं बड़ा बाजीगर सबको नचाता फिरता है ।
तात्पर्य—इन बातोंके लिखनेसे मेरा यह है कि बुद्धिमान लोग समझे बूझेंगे कि, मनुष्य किसको कहते हैं पशु कौन है । मनुष्यका केवल वही स्वरूप तथा स्वभाव है । जिसके द्वारा अपने यथार्थको जान ले, शेषके सारे पशु हैं । एकही आत्मा सबमें आवागमन करती है । केवल अपने कर्मों ने स्वरूप तथा स्वभाव बदल डाला है । मन वचन और कर्म करके जैसे कर्म जिस जीवसे होते हैं वैसेही स्वरूप और अवस्थामें पुनः देह धरकर प्रगट होते हैं । सहस्रों प्रकारके बन्दर मनुष्योंके रूपके हैं । जिनमें विवेक नहीं हो सकता कि, यह सब मनुष्य हैं अथवा बन्दर हैं । कितने मनुष्य जो जङ्गलोंमें रहते हैं वे बन्दर समझे जाते हैं परन्तु वास्तवमें वे मनुष्य हैं पर वे मनुष्यतासे पृथक् हैं । सहस्रों प्रकारकी मूर्तियाँ आधे मनुष्य तथा आधे पशु रूपमें हैं पृथिवी तथा आकाशोंमें भरी हुई हैं इस सृष्टिका अन्त नहीं है । देहोंका निर्माण भी कर्मोंनेही किया है इन सबके चित्र प्रथममें दिये हैं । पूर्वके उपदेशको निम्न लिखित नजममें कहते हैं—
जो देखे स्वसम्बेद सद्गुरु की साख । कहे आदमी योनि हैं चार लाख ॥
यह पहचान इनसानकी सारी जात । वही आदमी है जो हो वासिफात ॥
दरोग और बातिलका जिसमें तमीज । वही आदमी हैं सो हरदिल अजीज ॥
वह सरताज हरजुमरेः सिलकत तमाम । इसीके लिये सारे दारुसलाम ॥
जो झूठ और सच जाने इनसों वही । हैं बाकी सो हैवान या अबलही ॥
आवागमन पर तीरीत समीक्षा, तात्पर्य
जो ठगको बताये रहीमो करीम । नहीं आदमी सो अकीलो फहीम ॥
जो कत्साब घर भेड़ जावे अमान । तो गरदन पे छूरी चले वे गुमान ॥
वही सारे हैवान है सर वसर । न सद्गुरुके रख होवे जिनकी नजर ॥
किया जिन्दा जो आदमों और नूहको । दिया सारे जाँदारमें रुह को ॥
नहीं फर्क हैं दोनों की रुह में । जो पश्चा सोई आदमो नूहमें ॥
हुआ इस पश्चाः पश्चा इन्सा हुआ । हो सदवार पैदा व फिर फिर मुआ ॥
यह हर योनिमें जा तना सुख करे । व अज करदये खेस पासख करे ॥
सभीमें वही गोशत और खून है । वमैं गोश होश आदमी योनि है ॥
कभी आदमी योनि फेरी करे । जो सद्गुरुकी पहचान देरी करे ॥
वह बद वख्त हैवैसे बदशूम है । जो पहचानसे उसके महरूम है ॥
परख पावें उसको जो साहब दिमाग । तो वेशक हो रोशन दाहनी चिराग ॥
यह तसवीर । इन्सान हैवानकी । परख लीजिये राह निरवानकी ॥
७७—निर्गमसे निर्धारण—यह पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों अपने अपने कर्मों करकेही स्थिर हैं । समस्त संसार कर्म करकेही चक्कर खा रहा है अपने कर्मोंसेही एक योनि छोड़कर दूसरी योनिमें जाता आता है । कबीर साहबका वचन है कि, यदि नेत्रके मार्गसे प्राण निकले तो पक्षी हो । नाककी राहसे निकले तो मक्खी मच्छर इत्यादिमेंसे हो । कानके पथसे बाहर हो तो प्रेत भूत इत्यादि हो । मुँहके राहसे बाहर हो तो अनाज खानेवाला कोई जीव हो । यदि मूत्रमार्गसे प्राण निकले तो पानीका कोई जीव हो । मलमार्गसे निकले तो विछा आदिका कीड़ा हो । यदि दसवें द्वारसे बाहर निकले तो बादशाह हो । यदि ग्यारहवें द्वारसे बाहर आवे तो परमधामको सिधारे फिर आवागमन न हो । दश द्वारोंकी सुधि सबको है, पर ग्यारहवें द्वारकी सुधि हंस कबीरके बिना और किसी दूसरेको नहीं है । इस प्रकार समस्त जीव कर्मोंके बन्धनसे खिंचे आवागमनमें रहा करते हैं ।
७८—पशुसे मनुष्य और मनुष्यसे पशु—देवीभागवतके पाँचवें स्कंधके दूसरे अध्यायसे उन्नीसवें तक बराबर कथा लिखी है कि, सम्भ दैत्यने कामान्ध होकर एक भैंसके साथ सम्भोग किया उससे महिषासुर नामक दैत्य उत्पन्न हुआ । शृंगी ऋषि हरिणीसे उत्पन्न हुये । गोकर्ण गऊसे उत्पन्न हुये । इससे प्रमाणित है कि, अपने अपने पूर्वकर्मनुसारही आकार बनता है ।
७९—भेदका कारण—भाग्यनेही इनको बुरा भला बनाया है, कोई धनाढ्य तो कोई दरिद्र है । कोई भला मोटा ताजा, कोई निर्बल तथा दुबला
पतला है। कोई सुखी और कोई दुःखी है। कोई अच्छी दशामें है, कोई दुर्दशाग्रस्त अवस्थामें पड़ा है। कोई तपस्वी तथा साधु है। कोई उच्चका लुच्छा पाजी बदमाश है। कोई कोमल कोई कठोर कोई भाग्यवान कोई महा अभागा कोई शान्त कोई क्रोधी कोई विशुद्ध और कोई कलुषित है। यदि पूर्ववका कर्म न होता तो सबका एकही ढङ्ग होता।
८०—पाठशालामें एकही पिताके दो पुत्र एक साथ पढ़ने बैठे। एक तो पढ़कर शोध्दही विद्वान हो गया। दूसरा कठिन परिश्रम करनेपर भी मूर्ख रह गया। उसका परिश्रम किसी काम न आया।
८१—यदि इस जीवने पहले कर्म नहीं किये थे तो उसके शरीर पर कम्मोंके चिन्ह किसने बनाये? भूखेको डकार नहीं आती। बिना कम्मोंके देहपर कम्मोंके चिन्ह नहीं बन सकते, बिना तेलके कभी दीपक भी जलता है? बिना तेलवाले पदार्थके तेल नहीं निकलता।
८२—ज्योतिषी वर्ष फल बनाकर भलाई बुराई सब कुछ पहलेसेही कह देते हैं। वैसाही सामुद्रिकी शारीरिक चिन्हसे कहते हैं।
८३—यदि हमारे पूर्वके कार्य हमको न रोकते तो हम अपनी समस्त कामनायें पूर्ण कर लेते। हमको रोकनेवाला कोई नहीं था।
८४—यदि पहले कर्म न करते तो कम्मोंके बन्धनमें न फँसते।
८५—हम अपने भाग्यके दास हैं फिर परमेश्वर हमारी क्या भलाई बुराई कर सकता है। निर्गुण तथा सगुण कर्म बन्धनोंमें फँसकर दुःख सुख भोगा करते हैं। जो दुःख सुखसे पृथक् है वे ही कम्मोंके बन्धनमें नहीं आते।
८६—निरञ्जनने कम्मोंका जाल बनाया, आपही उसमें फँस गया जो कोई कम्मोंसे मुक्तको पहचाने वही मुक्त है। शेषके सब आवागमनमें हैं यही साधारण नियम है। निम्नलिखित कवितामें विस्तारके साथ यह निरूपण करते हैं कि, सबकाही आवागमन होता है उससे कोई बचा हुआ नहीं है।
मुखम्मस तर्जीअबन्द
बनी आदम व हैवां मोरो मलख। हैं करते योनि योनिमें तना सुख ॥
सदा करते हैं कर्म अपने पासख। न इसमें शक है ऐ ईमान रासख ॥
तनासुख देखता हूँ मैं तनासुख
वही ब्रह्मा वही चिउँटी हुआ है। हो सदहा बार पैदा फिर मुआ है ॥
जिधर जावे तनासुखका कुआ है। वही माई वही खाला बुआ है ॥ तना० ॥