कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
७९
जीवधर्मबोध
(१९८७)
जीवभूमिका पर सब ठाढ़े । कहूँ तुच्छ कहूं गुणगण बाढ़े ॥
कर्म किये सर्वज्ञ हो सोईं । जैसे मूरख पंडित होईं ॥
सम्पति विपतियें जिव एक सारा । भिन्न भिन्न पदवी सो धारा ॥
दोहा-अल्पज्ञता जो जीवकी, सर्वज्ञता जो ईश ।
दूर दोहूको कीजिये, जीवहि विश्वा वीश ॥
चौपाई
चारों खानि जीव यक रासी । सबको लगी कर्मकी फांसी ॥
नरतन यही ज्ञान अधिकारी । ताते जीव भ्रम तिभिर बिड़ारी ॥
कञ्चनको भूषण बहु करही । न्यारो न्यारो नाम सो धरही ॥
भूषणदशा स्वर्ण जब लहिये । तब क्या कंचन नाम न कहिये ॥
धातु रूपहू कहिये कंचन । भूषणहू पुनि सोईं विरंचन ॥
कंचन आहि सत्य यक ताते । जो कछु चाहे रचिये बातें ॥
ऐसे जीव धातुसे सब है । माया ब्रह्मादिक बहु ढब है ॥
सांचो जीव जमा यक अहई । और खर्च बहु बानी बहई ॥
सूक्ष्म थूल जीवकी करनी । अज्ञ तज्ञ कछु भिन्न न वरनी ॥
पारख गुरु कोइ दूँदन जावै । जीवते इतर ताहि नहिं पावै ॥
पारख सदा जीवके पाहीं । प्रकट होत भ्रम तम बिनसाहीं ॥
भल विचार करिहैं जे प्रानी । सारासार सोईं पहिचानी ॥
जेते हंस पारख पदधारा । पारख पाय न पुनि संसारा ॥
अलख कि गति कहूँ लखी न जाई । पारख कृपाते सो दरसाई ॥
सत्यकबीर बचन-शब्द
साधो सतगुरु अलख लखाया, जाते आप आप दरसाया ॥
बीज मध्य ज्यों तरुवर दरसै, वृक्ष मध्य ज्यों छाया ।
आतममें परमातम दरसे, परमातममें माया ॥
(१९८८)
बोधसागर
८०
ज्यों नाभीमें शून्य देखिये, शून्य अण्ड आकारा ।
निहअक्षरसे अक्षर ऐसा, क्षर अक्षर विस्तारा ॥
ज्योंग्विमध्ये किरन देखिये, किरनि ज्योति परकाशा ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, जीवब्रह्मसे श्वासा ॥
श्वासामध्ये शब्द देखिये, शब्द अर्थके माहीं ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, न्यारा है वह साईं ॥
आपै बीज वृक्ष अंकुरी, आप पुहप फल छाया ।
सूर्य किरन परकाश आप है, आप ब्रह्म जिवमाया ॥
आतममें परमातम दरसै, परमातममें झाँई ।
झाँईमें यक झाँई दरसै, लखो कबीरा साईं ॥
छन्द-यह ज्ञान अगम अगाध कोई साधके मन भाय है ।
सो परख पारख परम गुरुकह परख पद परखाय है ॥
परखाय है सो परखपद जब दयानिधि हर्षाय है ।
सत्यनामके परताप पर्वल ताप त्रिविध नसाय है ॥
इति
अथ पंचकोष मिथ्यावर्णन—चौपाई
आप भूलि निजु फांसा लीना । पंचकोषमें बासा लीना ॥
पंचकोष यहि विधि पहिचानी । प्रथम अन्नमय कोष बखानी ॥
दुतिय प्राणमय कोष प्रमानो । तृतीय मनोमयकोषको जानो ॥
पुनि विज्ञान मय कोष अहई । फिरि अनंदमय पंचम कहई ॥
प्रथम अन्नमय कोष बखानो । अन्न भोगते ताथित मानो ॥
पंचतत्त्व परकृत पचीसा । तीनों गुन करि जिवतन दीसा ॥
जैसे घटको भाजन ठाटी । उपादान कारन है माटी ॥
तासु निमित्त कारन कोम्हारा । समवाय कारन चक्र विचारा ॥
८१
जीवधर्मबोध
( १९८९ )
तिमि तम उपादान कारनतन । राजसतामसनमित्तको कारन ॥
सातकसो समवाय बखानी । तीनों गुन करि देह उपानी ॥
सो तन कहे अन्नमय कोषा । बंधन ताहि चार है चोखा ॥
बसियौ रसियौ असियौ कसियौ । ये चारों बंधन तन लसियौ ॥
प्रथमें बसियो कहो बखानी । देहोहं यह तन मम मानी ॥
देहको सो आपा करि जानी । बंधन माह परा अज्ञानी ॥
दुनियौ रसियौ भेद उचारी । जेहि वर्णाश्रम जिव तनधारी ॥
सोइ वर्णाश्रम कर्म जो करिये । तेहि ते रसियौ बंधन परिये ॥
तृतिये असियौ कहिये ताही । निजु वर्णाश्रम जीव सराही ॥
तुच्छ इतर वर्णाश्रम देखे । बंधन असियौ गहे विशेषे ॥
चांथे कसियौ करे अकाजा । कुलकी लाज लोककी लाजा ॥
वेद अरु देव लाजामें फँसा । ताते परा जीवको संसा ॥
इन चारों बंधनको काटो । तब जिवकी अम संशय फाटो ॥
कुल अरु लोक वेद सुर लाजा । अस जब भाषे कुटुम समाजा ॥
हमरे कुलको यहि पथ डगरा । कुलकरनी तजि तू जस बिगरा ॥
तब जिव दुरि कुलधर्म सभारी । भित्रपंथ नहि सो पगधारी ॥
जो कोई यह लजा काटे । लोकलाज पुनि ताको डाटे ॥
लोग जो ऐसी बचन सुनायौ । बिगन्यौ श्रेष्ठ पुरुषको जायौ ॥
लोकलाज तब जिव नहि छोड़े । अपने कर्म ते सो मुख मोड़े ॥
लोक लाज जौ तोरके जाई । वेद लाज तेहि लेत फँसाई ॥
वेद लाज सो बंधन अहई । जब संसारी अस मिलि कहई ॥
काहू वेद शास्त्र परमाना । जो तू कर्म करे मनमाना ॥
वेदहु लाज लंघि जब जावै । देव लाज पुनि तोहि दबावै ॥
देव लाज कह कौन उलंघा । करे देव करनीमें भंगा ॥
इन्दी द्वारे देवन थाना । विषय भोग तिनके तन माना ॥
( १९९० )
बोधसागर
८२
आवत देख जो विषयबयारी । इन्द्री पटल सो देहि उघारी ॥
विषयानन्द जीव जब होई । तब शुभ करनी करे न कोई ॥
जब चहुलाज लंघि जिव जावै । बड़भागी कोइ प्रभु पद पावै ॥
अन्नमय यह कोष बखाना । जामैं जक्त जीव गल ताना ॥
प्राणमयी कोष याके आगे । विविधिप्रकार पौन संग लागे ॥
प्राण अपान समान उदाना । व्यानो नाग कूर्म कहि गाना ॥
किर्कल देवोदत्त धनंजय । ये सब पौन हैं कोष प्राणमय ॥
जेहि औसर जिव ऐसो कहई । प्राण हमारो तीक्ष्ण बहई ॥
प्राण पौनको स्वतह सुभाऊ । आपासो आरोप कराऊ ॥
गुदा अपान प्रवेश कराया । पवन सुभावन जीव सुभाया ॥
हृदय समान उदान सिरोई । व्यान अन्नपाचक है सोई ॥
नाग डकार कूर्म हग खोले । किर्कल छीक स्वतह सो बोले ॥
देवदत्त जसुहाई पूजै । मृतक शरीर धनंजय सूजै ॥
इतने इतर पौन बहुवादी । अंगफर्कन अफरन हिचक्यादी ॥
पौन कर्म सब मानै आपा । कोष प्रानमय बंधन थापा ॥
कोष मनोमय तासु अवांतर । पुनि हंकार कहे ताते पर ॥
शुभ और अशुभकर्म जो कछु कर । पुन्य पाप व्यौहारादिक नर ॥
सो सब मन इन्द्रीके करतब । कोष विज्ञानमयी कहिये अब ॥
पंच ज्ञान इंद्री छठये बुधि । तासु अवांतरचित्त सहित सुधि ॥
परमारथ सब उत्तम करनी । सो सुभाव सब इनको बरनी ॥
जिवसो कर्म आपनो धरई । कोष विज्ञानमय बंधन करई ॥
पुनि अनंदमय कोष पर तेही । बुद्धिको ऐसो ज्ञान भयो जेही ॥
हौमैं करि जिव करे बखाना । आपको बड़ अनंद हम जाना ॥
सो अनंद बंधन जिव केरा । कोष अनंदमयी यह टेरा ॥
पांचो कोष अवस्था पांचो । जागृतरूप अनन्तमय बांचो ॥
८३
जीवधर्मबोध
( १९९१ )
प्राण मनो विज्ञान जो तीनी । स्वप्न स्वरूप तिन्है कहि दीनी ॥
पुनि अनंदमय कोष जो आही । रूप सुषुप्ती कहिये ताही ॥
जाग्रत रजगुन रूप कहीजै । सतगुन रूप स्वप्न कहिदीजै ॥
तमगुन रूप सुषुप्ति कहावै । देहमन्त्री गुन सुभाव बतावै ॥
पुण्यदया वांछा रजगुनकह । पुन्य पिछार विषाद तमो यह ॥
वांछा रहित सतोगुन जानी । त्रिगुन कर्म नानाविधि मानी ॥
जिव अज्ञानते आपको कहई । पुण्यपाप सब मेरो अहई ॥
ज्ञानी गुनन सुभाव सो जाने । अज्ञानी अपनो करि माने ॥
यहि बिधि जेते तनके कर्मा । सो सब मन इंद्रिके धर्मा ॥
पाँचो तत्त्व त्रिगुनते भयऊ । गुन आज्ञा शक्तिसे कहेऊ ॥
चित्तसे अज्ञान शक्ती होई । मन अरु चित्त भेद नहिं कोई ॥
सर्वे कर्म जो जगके माहीं । मनहीं केर पसारा आहीं ॥
मन माया तिरगुन न्यौहारा । जक्तमाह भ्रम जाल पसारा ॥
अथ योग और भोग दोनों मिथ्या वर्णन
दोहा—षट्दल चक्रको भेदके, योगी पौन चढ़ाय ।
दल सहस्रके कमलमें, निर्विकल्प हो जाय ॥
हो विदेह पद अमर लह, विद्यामें ठहराय ।
भे निरद्वन्द्व न कल्पना, आपमें आप समाय ॥
चौपाई
जिमि योगी तिमि भोगी देखे । कमल भेद दोनों यक लेखे ॥
द्वन्द्वदीब दोनोंको खेला । इत नरनारी उत गुर चेला ॥
योगी उरध पौन चढ़ावै । भोगी अधषानी ले आवै ॥
नादके बल योगी अविनाशी । विंदके चल भोगी सुखराशी ॥
नारिपुरुष जब भा संयोगा । दोनों मिले भोग सुख भोगा ॥
माथेसे जब माथ जुरेऊ । सिरवर कमलते बिंद उतरेऊ ॥
( १९९२ )
बोधसागर
८४
नेत्रसे नेत्र जुटे जिहि बारा । द्वैदल कमल भेदि चलु पारा ॥
मुखसे मुख जेहि औसर चूमा । तबही बिंद अधो दिस घूमा ॥
तब घोडश दल कमल बधाना । द्वादशदलपर पुनि ठहराना ॥
अनहद चक्रते बिंद उतारा । मणिपूरकपर आसन धारा ॥
मणिपूरकते हेटको हेरा । स्वाधिष्ठान चक्र कर डेरा ॥
नारिपुरुष मिलि द्वन्द मचाया । स्वाधिष्ठान उतरि जल आया ॥
टिका अधारचक्र जब पानी । सह विकल्प भोगी तब जाना ॥
ज्ञान पुत्र योगा जब पायौ । अमर भयौ फिर गर्भ न आयौ ॥
योगी हृदये जबलों ज्ञाना । तबलों ताको अमर बखाना ॥
ज्ञान लोप होवे जेहि काला । तब योगीको हो जंजाला ॥
ज्ञानदृष्टि करि योगी जाना । मेंहंमि जगमें पसराना ॥
अज्ञ पुत्र तिमि योगी जाया । वंशवृद्धि जगमें फैलाया ॥
भोगी अमर भयौ तेहि बारा । तासु वंश जगमाह पसारा ॥
जबलों वंश जक्तमें ताका । भोगा अमर भयौ परिपाका ॥
तासु वंश जब हो संसारा । भोगी मृतक होय तेहि बारा ॥
आपै आप सकल जगमाही । अज्ञदृष्टि करि जा तन नाहीं ॥
योगी विद्या द्वारे जाना । भोगी अविद्याते अज्ञाना ॥
योग भोग दोनों हैं झूठे । संत सुजान दोहूते हूठे ॥
योगअरु भोग ब्रह्म जिव माया । नादर्शिद जो कछु उपजाया ॥
सो सब भर्म एक नहिं सांचा । सांचे सतगुरुको यह वाचा ॥
भर्मै नाद अरु भर्मै बिंदू । भर्महि तुर्क अरु भर्मै हिंदू ॥
भर्म निमाज भर्मही रोजा । भर्महि ते सब ईश्वर खोजा ॥
भर्महि देऊल भर्महि देवा । भर्महि पूजा भर्महि सेवा ॥
भर्महि धरती भर्म अकाशा । भर्महिको यह सकल प्रकाशा ॥
भर्मको रचित सकल संसारा । टूटै भर्म होय भव पारा ॥
इति योग और भोग मिथ्या
८५
जीवधमबाध
( १९९२ )
अथ स्वसंवेदमते अष्टांगयोगवर्णन सत्यकबीरवचन अष्टांगयोगकी रमैनी
अविगति लीला अगम अपारा । धरती धरचौ सत्य औतारा ॥
अविगति लीला अगम अलेखा । अवरन बरन रूप नहिरेखा ॥
जाकी गति सुर मुनि नहीं पाई । अविगतिकीगतिवरनि न जाई ॥
शेष सहस्रमुख निशिदिन गावे । अस्तुति करति पार नहीं पावे ॥
वेद जो कोट सहस्र पुन गावे । अविगति गतिवरनी नहीं जावे ॥
साखी-अविगतिकी बेगति है, मन बुध चितते दूर ।
आपमेटि सतगुरु मिलै, पावै दरस हजूर ॥
रमैनी
योगी बहुत योग जो करई । कृपा योगते नहीं निस्तरई ॥
फिर फिर आवै फिर-फिर जाई । कर्महि कर्म बहुत अरु झाई ॥
है निष्कर्म नाम जो ध्यावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥
कमही कम बंधावहु भारा । कमही कम अटका संसारा ॥
देह कर्म जो लीन उठाई । मनको कर्म छुटै नहीं भाई ॥
जब लगिमनकी कर्म न खोवै । तबलगि मननिर्मल नहीं होवै ॥
जब मनकी किरिया मिटि जाई । तब हरि मिलै सहजमे आई ॥
साखी-तन किरियाको छोड़िके, मन किरिया रुचिराख ॥
कर्म क्रिया अभिमान तजि, सत्यनाम निजु भाष ॥
रमैनी
तनकी करनी देहु बहाई । मनकी करनी सत्य मिलाई ॥
मनकी किरिया सत्य जो कोई । ताहि समान और नहीं कोई ॥
सांख्य योग करनी है सारा । जेहिते उतरे भव जल पारा ॥
सत्य क्रियाते ज्ञानी भैऊ । सत्यक्रिया साहिब मिलगैऊ ॥
सत्य क्रिया सतपुरुष हि ध्यावै । सत्कक्रिया सतनाम मिलावै ॥
साखी-सत्यक्रिया निर्वान है, तन मन ते सो भिन्न ।
मन पौना टढकै गहै, सत्यनाम निजु चिन्ह ॥
नं. ११ बोधसागर - ८
( १९९४ )
बोधसागर
८६
चौपाई
अब मैं सांख्ययोग जो कहऊँ । योग अष्टांगको लक्षण लहऊ ॥
एकएकके चार चार लक्षण । जो जानै सो होय विचक्षण ॥
येतो कहिये लक्षण बतीसा । योग अष्टांगमें एकै दीसा ॥
अष्टांग योग सांख्य जो जाने । अरु लक्षण बत्तिस पहिचाने ॥
समौ-तेई भवसागर तरे, याकरनी निजु सार ।
सत्यकिया सतसे गहै, सत्यनाम आधार ॥
रमैनी
प्रथमै योग ज्ञान है भाई । ताहिते सुखव परमपद पाई ॥
निरालंब आलंब न कोई । सतगुरु इच्छा होय सो होई ॥
कर्म भरम तजि साहेब जाने । भली बुरी कछु चित्त नहि आने ॥
निरवासनिक वास नहि कोई । जंगल वस्ती एक सो होई ॥
है निरवैर रहै ततसारा । बाहर भीतर अलख अपारा ॥
समौ-एकनामको जानिके, दूजा देय बहाय ।
तीरथ व्रत जप तप नहिं, आतम ताव समाय ॥
रमैनी
दूजा योग विचार विचारे । निरमोही है आप विचारे ॥
है निवैँ रहै जगमाहीं । जगके सुखमें लगै नाहीं ॥
मातु पिता सुत नारि न भावै । काम क्रोध मद लोभ भुलावै ॥
है निष्कंट शब्दसे लागे । अनहद सुने आतमा जागे ॥
देही छोड़ि विदेह समाना । हंसा पावै पद निर्बाना ॥
समौ-जो कछु करे विचारके, रह पुन्यपापते न्यार ।
कहै कबीर नामहि जाने, जाय पुरुष दरवार ॥
रमैनी
तीजे योग विवेक कहावै । बिन विवेक कोइ पार न पावै ॥
८७
जीवधर्मबोध
(१९९५)
जाको समाधान मन होई। भली बुरी कहि जावै कोई ॥
समदरशी समज्ञान विचारे। सबघट भीतर ब्रह्म निहारे ॥
प्रीति गहे सो नाम समाना। और सकल जग मिथ्या जाना ॥
जाके शांति होइ घट नाही। कोइ कछु कहै कोध मन नाही ॥
रमैनी
चौथा योग शील कहि दीना। विना शील साहेब नहिं चीन्हा ॥
निर्मल सोचे सोचि विचारे। शुचि रुचि दया धर्म उर धारे ॥
मनको संयम करै जो ज्ञानी। पांचों पकरि एक घर आनी ॥
सत्य शब्द भावै संसारा। सत्यहिसे उतरे भवपारा ॥
होय औतारा सत्य बखाने। भावै बुरा भला कोइ माने ॥
समौ-शीलक्षमा जब ऊपजै, अलख दृष्टि जब होय।
विना शील पहुँचे नहीं, लाखो कथै जो कोय ॥
रमैनी
पच्वां योग सन्तोष बखानी। बिन संतोष बुझे अज्ञानी ॥
मानै नहीं रंक औ राजा। है अमान नहिं काहुते काजा ॥
नर्क स्वर्ग बाँछै नहिं कोई। होय अबच्छक साहेब सोई ॥
मन अस्थिर करि प्रेम उपजावै। अनहद शब्द सुने चितलावै ॥
समौ-निरमल शब्द प्रकाशकर, रह सुखसेज समय।
सत्य नाम सन्तोष बिन, सत्यलोक नहिं जाय ॥
रमैनी
छठै योग रहै निरवैरा। जाते जगते होय न वैरा ॥
सब घट भीतर एक करि जानी। होय सुदृष्टि परम परमानी ॥
सुख दाई सबहिनको भावै। जलस्वरूप है अग्नि बुझावै ॥
शीतल है सबहीको भावै। समता हो रमताको पावै ॥
समौ-कंचन काँचि है एकसम, दुष्ट मित्र सम एक।
दूजा भाव न जानहीं, एक नामकी टेक ॥
( १९९६ )
बोधसागर
८८
रमैनी
सतवां योग सहज है मीता । सहज भावसे यम से जीता ॥
एक विचार प्रेम उपजावै । पांचों इन्द्री सहज समावै ॥
निरलोभी है लोभ भुलावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥
निस्संशीक होय जो कोई । संशय काल रहै नहिं कोई ॥
है निलैप कतहु नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागे ॥
समौ-सब जग जूठा जानिके, सत्य नाम है सार ॥
सहजे सहज प्रकट भया, सतगुरु शब्द सँभार ॥
रमैनी
अठयौ योग शून्य है नीका । एकनाम आगे जग लागे फीका ॥
श्रुत्रहीते सब जग उपराजा । श्रुत्रहीते शब्द जो बाजा ॥
सहज श्रुत्र जो लावै कोई । अलखको लखै आपही सोई ॥
सहज शून्य जो ध्यान लगावै । भवजल तरत वार नहिं लावै ॥
सुरति शब्द ले सहज समावै । सहज समाधि परमपद पावै ॥
समौ-ज्ञानविचार विवेकते, शील संतोष समाय ।
नाम गहों निर्भय रहो, सत्यलोक सहजे जाय ॥
इति अष्टांग योगकी रमैनी
अथ ज्ञानपरीक्षा चार
निरालंब । निर्भर्म । निर्वासनिक । निरस्वादी ॥ १ ॥
विचारपरीक्षा चार
निरमोही । निरबंध । निःशंक । निर्वान ॥ २ ॥
विवेकपरीक्षा चार
सर्वगी । सावधान । सुचेत । सारग्राही ॥ ३ ॥
शीलपरीक्षा चार
शुची । संयमी । श्रोता । वक्ता ॥ ४ ॥
८९
जीवधर्मबोध
( १९९७ )
संतोषपरीक्षा चार
अयाची । अवांछी । अमानी । अस्थिर ॥ ५ ॥
निर्वैरपरीक्षा चार
सुहृद । समता । शीतल । सुखदाई ॥ ६ ॥
सहजपरीक्षा चार
निष्प्रपंच । निस्तुरंग । निर्द्रढ़ । निलैष ॥ ७ ॥
शून्यपरीक्षा चार
लौलक्ष । धीरज । ध्यान । समाधि ॥ ८ ॥
समौ-कबीर बतीसो जब उगवै, तैतीसो छपि जाय ।
कहै कबीर सुन गोरख, आवागमन नसाय ॥
इति अष्टांगयोग स्वसंवेदमतै
अथ सातज्ञानभूमिकावर्णन
दोहा-सीषता विचार समानता, सिसरातो सुखपंत ।
बहुरि पदार्थ अभावनी, तुरिया ज्ञान गहंत ॥
चौपाई
प्रथम सीषता भूमि जो कहिये । शुभइच्छाते शुभ गति लहिये ॥
ज्ञानचाह सच्छास्त्र उचारन । सत्संगत अपकर्म निवारन ॥
द्वितीय विचार भूमिका सोई । दूँढ सुसंग सुविद्या जोई ॥
तृतीय समाता है वैरागा । तन मनते विषयनको त्यागा ॥
चौथे भूमि सिस्तांत कहावै । गेह नेह तजि अलग रहावै ॥
हो निवृत्त सब विषय बिहाई । हरिपद प्रीति न और सोहाई ॥
पंचई भूमि सुषुप्ति कहीजै । ईश्वरलीन भर्म भय छीजै ॥
छठे पदारथ अभावनी भाषा । प्रभुपद लीन न सुचितन राखा ॥
ऐसो ध्यान नाह अनुरागा । बिना जमाये सो नहि जागा ॥
सतई भूमि कहावै तुरिया । जहां पहुंचपुनिचितनहिफुरिया ॥
( १९९८ )
बोधसागर
९०
ऐसो ईश्वरमें लौं लागे । कोऊ जगावै तऊ न जागे ॥
इति ज्ञानभूमिका
अथ सात अज्ञानभूमिकावर्णन
दोहा-अशुची है जागृतो, महा जागृती गत ।
जागृत स्वप्ना स्वप्न, जागृत पुनि स्वप्ना सुषुप्त ॥
चौपाई
प्रथम अशुचि जागत अज्ञाना । तन सुख चाह सदा अलसाना ॥
दुतिये जागृत जाहि बखाना । अहं कुलीन श्रेष्ठ गुनज्ञाना ॥
तृतिये महाजागत यौं भाषे । दोहू लोक पौरुष हम राखे ॥
ऐसो मैं गुणज्ञान निधाना । मेरे वशमें अहै फलाना ॥
चौथे जागृत स्वप्ना यांचा । जो मैं कहों सुनो सब सांचा ॥
पंचम स्वप्ना जागत भाषा । देखे स्वप्न सुरति सब राखा ॥
छठयें स्वप्न भूमिका कहई । देखे स्वप्न सुरति नहिं रहई ॥
सप्तम भूमि सुषोपति होई । सुधिवुधिरहित जीव जब सोई ॥
सातो भूमि ज्ञान उर धारो । पुनि सातो अज्ञान विचारो ॥
यक पौरीपर दूजी पौरी । होय सघनता अगिली ठौरी ॥
प्रभुमें शुभ इच्छा जब होई । सच्छास्त्रन अवलोकै सोई ॥
सच्छास्त्रनको रस भल चीखी । ताकी बुद्धि भई तब तीखी ॥
सच्छास्त्रन पठि भयौ जो पक्का । तब तो दुतिय मूगिका तक्का ॥
दुतिय भूमिका आहि विचारा । तब सत्संगतको पग धारा ॥
सत्संगत जब जीव टटोले । तब ग्रन्थनकी ग्रन्थी खोले ॥
जबलों नहिं सत्संगत जूटे । ग्रन्थनकी ग्रन्थी नहिं छूटे ॥
दुतिय भूमिमें जब जिव पागा । तब तृतियेमें हो वैरागा ॥
हठ बैराग होय जिहि काला । चौथ भूमिकामें पग डाला ॥
जब चौथीमें हठ जिव भैऊ । तब पंचम हरिपद गहिलैऊ ॥
९१
जीवधमबाध
( १९९९ )
जब हरिपद तजि और न भावै । तब छटवों भूमिकामें जावै ॥
भयौ लीन जब छटवों भूमी । तब तेहि माह रह्यो सो रूमी ॥
जबलों लागि प्रीति अति गाढ़े । सतई भूमिमें भे तब ठाढ़े ॥
सतई भूमिमें जब जिव होई । तब नहिं तनहिंमें नहिं कोई ॥
छूटि गयौ तब देहको नाता । तब नहिं जक्त न जगतकी बाता ॥
विद्या और अविद्या दोई । भर्मरूप जानो सब सोई ॥
दोनों ब्रह्मा केर कल्पना । सो ब्रह्मा आवै भ्रम स्वप्ना ॥
ब्रह्मा आप जो भो भ्रमरूपा । ताकी कृत सकल भ्रमकृपा ॥
इति
अथ जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति मिथ्यावर्णन--चौपाई
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर टेरे । जीवनमुक्त न माह बडेरे ॥
सो तिहु भवसागरके कारन । बारबार तिनको बसुधारन ॥
व्यास वशिष्ठ पराशर बादा । दशरथ जनको ध्रुव प्रहलादा ॥
सो सब जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनितनधरि जगमें आवै ॥
सत्यकवीर वचन परमाना । ध्रुव प्रहलाद श्रेष्ठ करि जाना ॥
साठि हजार वर्ष ध्रुव भोगकर । प्रहलाद भोग चौकरी बह्तर ॥
इतने बड़ा भक्त नहिं कोऊ । आवागौन युक्त रह सोऊ ॥
जेते जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनि तनधरि जगमें आवै ॥
प्रलय विदेहमुक्त सब होई । उत्पतिमें तनधर सब सोई ॥
आवै जाय सो मुक्त न मानो । दोनों मुक्ति भर्म करि जानो ॥
सत्यकवीर वचन-शब्द
भर्मसेवा भर्मपूजा, भर्म जपतप ध्यान ।
भर्मकरिकरि भर्मबंधा, नहीं सब पहिचान ॥
भर्म इंद्री करी निग्रह, भर्म गुफा में वास ।
( २००० )
बोधसागर
९२
भर्म तो तहाँ लोकहो जहाँ, जीवनमुक्तको वास ॥
कहो जी तुम आये कहते, जाहुगे किस ठाँव ।
औरको उपदेश देतहो, आप समुझत नाह ॥
जानबेको कहा कहिये, कहेको पतियाय ।
कहै कबीर अनंतरधुनि उपजै, सहज शून्य समाय ॥
चौपाई
लोमस ऋषि आदिक मुनि नाना । जिनको हंस कबीर बखाना ॥
कोटिन उत्पति प्रलय जो होई । कबहुँ गर्भ नहिं आवै सोई ॥
मुक्तस्वरूप संत कह तिनको । आवागौनसूत्र नहिं जिनको ॥
सारशब्द सतगुरुको लहेऊ । जन्ममरणको संशय दहेऊ ॥
जक्तमाह जेते हैं कर्मा । सो सब मिथ्या जिवको भर्मा ॥
झूठ सत्य दोउ एकसम आहीं । यहि संसार सार कछु नाहीं ॥
उत्तम करनी जिवको करना । यद्यपि नहीं सार कछु बरना ॥
गर्भते शिशु बाहर हो जबसे । कर्मकरन लागे सो तबसे ॥
कर्मक्रिया सब तबते जागे । हाथपांव शिशु फेकन लागे ॥
हाथपांव मारन ते जाहीं । नफा होय कछु शिशुको नाहीं ॥
शिशुहि भलो कर पगमारनहै । बिन कर पग फेके दुखतन है ॥
हो बाल जब अधिक सयाना । माटी धूल खेल अरु काना ॥
ताहु कर्म नफा नहिं पावै । तऊ खेलमें घौस बितावै ॥
कर्म करत पहुंचै तरुणार्ई । लाभ कर्मते तब कछु पाई ॥
सोऊ लाभ नफा कछु नाहीं । सर्व कर्म मिथ्या है ताहीं ॥
आदि अवस्था यथा निहारी । कर्म करत बीते बयसारी ॥
कर्म करनकी बानि न होई । तौ निश्चय जिव जाय बिगोई ॥
भलो कर्म करिये तेहि काजा । जाते शुभगतिको सज साजा ॥
९३
जीवधर्मबोध
(२००१)
वेद कि बिधिते जो कोइ ध्यावै । जीवन्मुक्तकी पदवी पावै ॥
स्वसंवेद विधि कर्म जो करिये । पाय अमरपद बहुरी न मरिये ॥
सत्यकबीर वचन-शब्दहेली
हेली तीरथ जाय बलाय । हरदम परवी नहाय ॥
तीरथ कोट अनंत है रे गंग यमुन जहैं दोय ।
मध्य सरस्वती वहत है नहाये निरमल होय ॥
ब्रह्म नयके घाटमें हो आगे शिवको लिंग ।
ताहुँपै दक्षिना दीजिये रे बहे सहसमुख गंग ॥
आगे कलाली कि हाट है रे चोखा फूल चुबंत ॥
बिन सतगुरु पावै नहीं कोई साधूजन पीवंत ॥
शीश उतारि धरनि धरैरे ऊपर धरि ले पाय ।
ब्रह्म नयके घाट मेरे याविधि परवी नहाय ॥
ऋग यजुर साम अथर्वना रे चार वेदको ज्ञान ।
उनकी कहो उहो कौनगति बांधे गांठि पखान ॥
चारवेदको पिता है रे स्वसंवेद संगीत ।
साहिब कबीर जूके मोकदिमे रे अविगति ब्रह्म अतीत ॥
इति जीवनमुक्तमिथ्या
अथ वर्णाश्रममिथ्यावर्णन-चौपाई
वर्णाश्रम सब मिथ्या जाना । नरकृत सो अज्ञानते माना ॥
पूर्व कर्म बिन यहि तनमाहीं । केते विप्र शुद्ध हैं जाहीं ॥
केते शुद्ध विप्र सो भैऊ । मातु पिता नहीं ब्राह्मण रहेऊ ॥
जो कोई वर्णाश्रमते अटका । निश्चय सो सत्पन्थसे भटका ॥
मल अरु मूत्र कि देही जोई । ताको ब्राह्मण कहे न कोई ॥
ज्ञान द्वार जो ब्राह्मण भैऊ । वर्णाश्रम ताके नहीं रहेऊ ॥
( २००२ )
बोधसागर
९४
राजा पंडित मिसके दोई । वर्णाश्रम थापे सब सोई ॥
जिते जीव वर्णाश्रम बंधा । उत्तम विद्यासे सो अंधा ॥
उत्तम धर्म गहे नहीं पावै । वर्णाश्रम तिनको अटकावै ॥
लहै कबहुँ नहीं ज्ञान कि घाटी । जिनको वर्णाश्रमकी टाटी ॥
प्रथम जैन मते मैं भाषा । तीन वर्ण कुल करते राखा ॥
भरथने ब्राह्मण वर्ण थपाई । चार वर्णकुल यहि भांति कहाई ॥
चक्रवर्तिपद भरथ जो पायौ । दान देनको प्रजा बुलायौ ॥
प्रजा परीक्षाको मनलाया । बीच राहमें जल ढरकाया ॥
जलमय धरती हो जेहि ठाई । जीव असंख्य तहां प्रकटाई ॥
दान लेनको प्रजा जो चाले । दयावंत पथ गह्यो निराले ॥
जहां कीच तहँ पग नहीं दैऊ । भरथ भूप तेहि न्यारा कियऊ ॥
ब्रह्मचीन्हि जिन दाया पालो । कीच बीचमें सो नहीं चालो ॥
ब्राह्मण तिनको नाम उचारा । सबपर श्रेष्ठ धर्मसो धारा ॥
अजयपाल कनउजको राजा । रचे ताहिमें यज्ञ समाजा ॥
सातसौ वर्षके ऊपर भैऊ । लखब्राह्मण सो नेवति बोलैऊ ॥
येतो ब्राह्मण सो नहीं पाये । तब नरेश अस हुकम लगाये ॥
जो कोइ विप्र चिह्ने आवै । द्विजसम आदर दछिना पावै ॥
वर्ण विवेक न कीने राजा । जो आये तेहि यज्ञ समाजा ॥
भूप सबहि को द्विजकरि माना । विप्रतुल्य दे आदर दाना ॥
केते विप्र बने तेहि बेला । निज गल माह जनेऊ मेला ॥
नृप बुलाय सेनपति बंगाला । ताहूकी कहिये अस चाला ॥
कनउजसे द्विज पंच बोलाई । बंगालेमें सो चलिजाई ॥
ब्राह्मण पांच अरु कायथ पांचा । पहुँच जहां महीपति जांचा ॥
तिन्है प्रतिष्ठा दीन सो राजा । बस बंगाले सहित समाजा ॥
तिनको वंश पसारा कीना । भित्र भित्र पदवी सो लीना ॥
९५
जीवधर्मबोध
( २००३ )
उत्तम मध्यम तिनमें कीने । जैसो कर्म जासु लखि लीने ॥
ब्राह्मण तिनमें तीन बडोरे । चतुरजी वणुजी मुकुरजी टेरे ॥
कायथ श्रेष्ठ कहे मुनि तीनी । घोस बोस मीतर कहि दीनी ॥
यहि विधि जात वरण ठहराई । असल नकल दोनों मिलजाई ॥
असल नकल मिल एक जो भैऊ । मान बड़ाई जिव सब गहेऊ ॥
जात वरनमें जिव अरुझाना । बिन श्रमसाधु सो बंधनभाना ॥
जिमि नृप जातिवरन बिलगाई । भांति भांतिकी रीति चलाई ॥
तिमि विदेव तिहुँपुरके राजा । कीने जकतकेर सब काजा ॥
पद्मदर्शन पांखंड बनाई । श्रुति स्मृतिमें जग अरुझाई ॥
कुल मरजाद थाप सो सारा । बंधनमाह बंधा संसारा ॥
जातिवरनके हृदमें जोई । संसारी कहलावै सोई ॥
पद्मदर्शनके हृदके माहीं । जातिवरनको बंधन नाहीं ॥
सो बेहृदके चालनहारे । साधु सो मुक्तिके मग पग धारे ॥
हृद बेहृद दोहू जिन त्यागा । गुरुलखि परमधर्ममें लागा ॥
जाति वरन सब मिथ्या होई । ताको साधु न माने कोई ॥
विप्र शूद्र कर्महि ते होई । उत्तम मध्यम कर्महि जोई ॥
गजते अचल मुनीश उपाये । केशपिंगल मुनि उल्लू जाये ॥
पुण्य अगस्त्य अगस्त्यउपाना । कौशिकमुनि कुशसे प्रकटाना ॥
कपिसे कपिल मुनीस उपाये । लता शाखगौतम ऋषि जाये ॥
दोनासे द्रोनाचार्य बखाना । ऋषि तीतरी तीतरसे माना ॥
रजसे परसराम प्रकटाये । शृंगी ऋषि हरनीके जाये ॥
कैवर्तिनसे व्यास कहाई । विश्वामित्र चंडालिन जाई ॥
ब्रह्मा आप कमलसे होई । सकल सृष्टिको करता जोई ॥
वेश्यासे वशिष्ठ मुनि भैऊ । इत्यादिकमुनि ब्राह्मण कहेऊ ॥
नहीं ब्राह्मणी इनकी माता । तऊ जकतमें द्विज बिरुयाता ॥
( २००४ )
बोधसागर
९६
उत्तम मध्यम कर्महि आही । कर्मते उग्र क्षुद्र है जाही ॥
सत्यकबीर वचन
साखी—जबलगि नाता जातिको, तबलगि भक्ति न होय ।
नाता तोर हरि भजै, भक्त कहावै सोय ।
बड़े गये बड़ आपने रोम रोम हंकार ।
सतगुरुकी परचै बिना, चारो बरन चमार ॥
रमैनी
पहिलो तारो कोरि चमारा । फिर तारो राजन दरबारा ॥
शब्द
नाम सुमिरले अमृत बानी । क्या चतुराई ठाने नर प्रानी ॥
पठेरे भरथरी चारो वेदा । बिन सतगुरु नहिं पायौ भेदा ॥
गोरख खोजत जन्म सिराने । कायाकी गति उनहु न जाने ॥
पंडोने बहु विप्र हंकारा । तबहुँ न घंटबजा ओहि बारा ॥
जवहिजुरेहेकोटिन ऋषि राजा । तबहुँ न घंट अधरबिच बाजा ॥
जवहि श्वपच मंदिर पग धारा । बाजै घण्ट होय झनकारा ॥
कहे कबीर चारो बरन है नीचा । सबसे श्वपच भक्त है ऊँचा ॥
चौपाई
वैशांपायन ऋषिके पास । नृपतियुधिष्ठिर वचन प्रकाशा ॥
कृपाकरो कहिये ऋषि राया । कहगुनगही ब्राह्मण कहलाया ॥
तब ऋषिराय कहे समुझाई । ब्राह्मणको यह गुण बतलाई ॥
गहे धर्म अरु धर्मके गुनको । कबहुँ अधर्म अकर्म न उनको ॥
दुतिये कबहुँ मांस न खावै । कबहुँ न कोई जीव सतावै ॥
प्रथमें वस्तु पड़ी कोई पावै । बिन स्वामी आज्ञा न उठावै ॥
काम क्रोध लोभ मोह मत्सर । कबहुँ न जगविषयनमेंचितधर ॥
पंचम गहे पंच न गुन जबही । तप दम दया सत्य प्रियसबही ॥
९७
जीवधर्मबोध
( २००५ )
सोई ब्राह्मण जब ये गुन गहिये । बिन गुन सदा शूद्र तेहि कहिये ॥
जो चंडालमें ये गुन होही । निश्चय ब्राह्मण जानो सोही ॥
षटउर्मी विकार सब माहीं । गुण करि विप्र शूद्र विलगाहीं ॥
जो गह परमारथ शुभ करनी । मुक्तसे और चाह नहिं धरनी ॥
शमदम दान आदि शुभ गुन गह । ऋद्धि सिद्धि आदिक गुन गन लह ॥
एकै विधि चहुँ बरन बनाया । रुधिर विन्दुते सबकी काया ॥
सतसंगमें सब एकै जाती । लिखा भागवतमें यहि भांती ॥
नृप शौनक चहुँ बरन बनाये । गुण करि भिन्न भिन्न विलगाये ॥
केते शूद्र विप्र है जाही । केते विप्र शूद्र गुन ग्राही ॥
इति वर्णार्थम मिथ्या
अथ कर्तापुरुष विवै शवजीवनका विचार—चौपाई
अलख अगोचर जो प्रभु अहई । तासु कथा कैसे कोइ कहई ॥
हरि हर ब्रह्मा पार न पावै । और जीवकी कौन चलावै ॥
कर्ता पुरुष जत्तको जोई । ताको नाम न जाने कोई ॥
जेते नाम जत्तते माहीं । राय निरञ्जनको सब आहीं ॥
वेद कहे जस अण्ड उगाये । ताते अण्डज ब्रह्मा जाये ॥
नारा जलको नाम बतायन । जलमें गृह कीनो नारायण ॥
के पुनि जलको नाम कहे जो । जलपर शयन करे सो केशो ॥
निर्णय स्वसंवेद पुनि भाषा । अण्डज देव निरञ्जन राखा ॥
बहुरि कहे तो रेतको लेखा । ईश्वर जलपर तरते देखा ॥
पुनि जन्मुर जाहि निरताये । जलपर शब्द यहूह उठाये ॥
गर्ज यहूह ससुद्र न ऊपर । वासा ईश्वर करे जलनपर ॥
यह सबही उर ला व्यौहारा । करता भेद है अगम अपारा ॥
अस प्रभु किमि बिचारते जानी । ताते सुन सतपुरुषन बानी ॥
( २००६ )
बोधसागर
९८
सत्यपुरुषनकी बचन जो सुनिये । पुनि पुनि निज हृदयेमें गुनिये॥
करि बिचार गहिये सत सारा । जाते उतरे भवनिधि पारा ॥
इति
अथ धर्मव्योरा वर्णन-चौपाई
सब धर्मनको व्यौरा वर्णों । जेते धर्म कर्म संचरणो ॥
स्वसंवेद है सबकी आदी । ताते सकल मता मरजादी ॥
वेद अरु वानी जेते जगमहैं । स्वसंवेद है सकल पितामह ॥
ताते चार वेद प्रकटाने । आदि पिताकी खबर न जाने ॥
स्वसंवेद ते वेद बनाये । तामें ऋषि मुनि मता मिलाये ॥
यज्ञादिकमें हिंसा कर्मा । सो नहिं स्वसंवेदको धर्मा ॥
ऋषि मुनिनिज२शब्द जो मेला । ताते खिला और कछु खेला ॥
दोहा-पा कहिये त्रैदेवको, भाग कहावै खण्ड ।
ताते धर्म जो प्रकट भे, तासु नाम पाखण्ड ॥
चौपाई
षटदरशन सातवे पाखण्डा । धर्म कर्म पृथ्वी नौ खंडा ॥
सबही तीन वेदके अंशा । ऋषिमुनिसकल निरंजनवंशा ॥
स्वसंवेदते वेद भे चारी । ताते चार किताब निकारी ॥
स्वसंवेदते गह त्वच ज्ञाना । ताते सर्व शास्त्र बंधाना ॥
पञ्जः साम ऋग्वेद जो तीनी । तौरैत जम्बूर इक्षील कीनी ॥
अथर्वन वेदणे रचे कुराना । मता महम्मद सकल बखाना ॥
पीर नवी निज मता मिलाई । वेद विरुद्ध कर्म ठहराई ॥
यहि विधि भये विरोधी सारे । स्वसंवेद तजि पथगह न्यारे ॥
पांच तत्त्व गुण तीन कहाया । शक्ती और निरञ्जन राया ॥
इनहीकी पूजा जगमाहीं । परमपुरुष कोई जानत नाही ॥
शक्ति निरञ्जन छल बल कीने । परम पुरुषपद परदा दीने ॥